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ओम स्थापतयेचा धर्म स्वरूप ने अवतार वरिष्ठय रामकृष्ण यत नमः कल हम देख रहे थे की किस तरह से मैन अपने हाथों से कल पड़ा आश्रम में अपने फोटो की स्थापना की थी मैंने कहा था मैं आऊंगी और तुम लोग फोटो रख लेना तो फिर इन लोगों ने क्या किया इन लोगों ने कहा की हमको तो पता है की शक्ति पूजा ही विधि है अर्थात की ईश्वर की स्थापना करनी चाहिए शक्ति के साथ में ही तो उन्होंने मां का भी फोटो रखा था और मैन भी अपना फोटो अपने मस्तिष्क पर स्पर्श करवा करके उसकी स्थापना की थी तो वह प्रसंग कल हमने देखा अभी आज महाराज आगे क्या कहते हैं तार पर रनार डेरी देखिए शक्ल की ऊ फल मिष्टी ग्रहण कोरिया दीपुर बेले आश्रम हाइट पिछने दर्ज दिया पे हटिया लक्खी दीदी राधु माखू नलिनी दीप प्रकृति के सेंजेलिया केदार बाबू यह लोग अर्ली मॉर्निंग आए थे कोलकाता जान के लिए जय राम बेट से निकले थे अर्ली मॉर्निंग आकर के मैन सर्वप्रथम तो स्नान करने के बाद में ठाकुर घर में ठाकुर और अपने खुद के फोटो की स्थापना की इसके बाद में उन्होंने देखा और फिर एक प्रकाश महाराज को दे करके थोड़ा सा होम भी करवाया इसके बाद में मैन देखा की खाने में अभी भी डेरी हो रही है तो फिर वह केदार बाबू की मां फिर साथ में लक्ष्मी दीदी राजू मंकू नलिनी जी वगैरा सब साथ में लेकर के गांव में टहलने के लिए निकले हैं इन लोगों का घर वहां से कुछ दूरी पर था तो वहां पर उनका घर देखने के लिए गए है की जो खान पैर प्रकाश महाराज यहां सनी बा मंत्र आमदर ऊपर खूब असंतुष्ट हो या बाली लेने थोड़ी डर के बाद में प्रकाश महाराज ने यह सुना की मां चलते चलते पैदल चलते चलते केदार बाबू के घर गई है तो यह बात सुनकर के प्रकाश महाराज बड़े ही नाराज हो गए और नाराजगी से हमको खाने लगे तो उम्र मार ज्यादा किछुई जानो ना तुम लोगों को मां का तुम लोगों को मां को सलमान देना थोड़ा सा भी नहीं आता है मां पैदल चल के गई है जगत जननी स्वयं पैदल चल के क्या जा शक्ति है मां के लिए वो पालकी वगैरा की तो व्यवस्था करवानी चाहिए मां को किस तरह से पैदल चल के जान दिया ऐसा बोलकर के प्रकाश महाराज नाराज हो गया प्रकाश महाराज को शरद महाराज ने भेजो था बोला था की रास्ते में मां का पूरा जतन करना तो प्रकाश महाराज कहते हैं मुझे बिना बताए मां को पैदल चलवा कर के क्यों ले गए पता नहीं है मां की इतनी उम्र है मां को पर में अर्थराइटिस है चलना भी मां के लिए मुश्किल है और वैसे भी मां जहां पर जाति है तो मां का तो सलमान करना ही चाहिए पालकी वगैरा साथ में हनी चाहिए महाराजा प्रकाश महाराज वो नाराज होकर बोलते हैं जय हो फिर बार समय मां के पालकी कोरेनिए शो अभी भले जो हो गया सो हो मां चल करके गई किंतु मां जब लौटती है तब मां को पालकी में बिठाकर के ले ए रहा एक था बोलिए शाहिद केदार बाबू के चली लेने ऐसा खाने के बाद में के प्रकाश महाराज ने इमीडियाटली जो पालकी में बैठकर के ही तो मां वहां से आई थी जयरामबाती में तो पालकी वाले तो वहां पे उपस्थित थे ही तो प्रकाश महाराज ने उनको बुलाया और पालकी और पालकी उठाने वाले जिसको बंगाली में बेहरा कहते हैं इन लोगों को लेकर के वहां मां जहां पर गई थी केदार बाबू के घर पर वहां पर चलने लगे साथ में जो लोग गए थे वह लोग वहां से वापस लोट रहे थे प्रकाश महाराज उनको रास्ते में मिले केदार बाबू के घर से वापस लोट रहे थे उसे समय मां को कहा एक ही अन्य मां को कहा अरे मां यह तुम्हारे साथ यह आपके साथ में किस तरह का अन्य हो रहा है आपने चल करके क्यों जाएगी यही कथा शाहिद पालकी ते उठी लेने ऐसा का के मां को प्रकाश महाराज ने कहा मां आप पालकी में बैठिए तो मैन थोड़ा सा नाराज होकर के पालकी में बैठे आश्रम में आशिया आश्रम में आशा मां असंतुष्ट हुई या बोली लेने प्रकाश ग्वालपाड़ा जब मां वापस ए गई आश्रम में तो नाराज होकर के बोली प्रकाश हम लोगों का गांव है हम लोगों का देश है इस गुजरात और राजस्थान वगैरा में हम अपने गांव को अपना देश बोलते हैं और जैसे यहां बंगाल में कहते हैं ना ए आम आदमी इसका हिंदी क्या होगा किंतु यहां पर गुजरात और राजस्थान में इसको बोलते हैं हम लोग अपना देश है ये मेरा एक मारवाड़ी मित्र था तो वह हम लोग छोटे थे तो वह बीच-बीच में बोलना था छुट्टी होने पर की मैं अपने देश जा रहा हूं तो मैं सोचता था की अरे ये तो इंडिया में तो राहत है फिर इंडिया छोड़कर के कौन से देश में जाएगा फिर मुझे पता चला की वो अपने गांव जा रहा है तो बोल रहा है मैं अपने देश जा रहा हूं तो यह महाराज हो गई कहा की प्रकाश एटा आम आधे पड़गा ये हम लोगों का देश है ग्वालपाड़ा हेलो अमर बैठक खाना कुआं पड़ा है मेरा बैठक खनर लोग यह सब लड़के कोलकाता से आकर के श्वास छोड़कर के अभी क्या है की कोलकाता में तो सब समय वो संयम में रहना पड़ता है पुरुष लोगों के सामने नहीं जा पाएगी पर्दा में रहना पड़ता है वह अंदरमहल में रहना पड़ता है सभी घरों के भीतर में महिलाओं के रहने के लिए एक दूसरा भीतर में कैमरा था वहां पर वहां से बेचारी बाहर भी नहीं ए पाएंगे बाहर में पेड़ पर चलने फर्न का प्रश्न ही नहीं तो पालकी की व्यवस्था करनी पड़ेगी तो इस तरह से पूरे वो रिस्ट्रिक्शन में मां को रहना पड़ता था तो मां कहती है की यहां पे देश में मैं एकदम शांति से निश्चित रूप से रहती हूं मुक्त रूप से रहती हूं कोलकाता से आई हूं तो जैसे की मैं लंबी सांस लेकर के मुझे शांति की सांस लेती हूं क्योंकि वहां पे इस तरह से मुझे संयम में रिस्ट्रिक्शन में रहना पड़ता है तोमरा तो शेखन आम के कचर बेहतर पूरे रखो तुम लोग तो मुझे वहां पर जी तरह से पंखे कोई पिंजरे में रखते हैं पिंजरे को खाचा कहते हैं तो मां कहती है वहां पर कोलकाता में तुम लोग मुझे पिंजरे में बैंड करके रखते हो जैसे एक पंछी को रखते हैं मुझे सब समय संकुचित होकर के रहना पड़ता है एक खाने ओ जड़ी तो मधिर कथम तो पार्टी बढ़ते हुए बोना यहां पर भी यदि तुम लोगों की तुम लोगों के अभिप्राय के अनुसार तुम लोगों के मत के अनुसार मुझे संयम में रिस्ट्रिक्शन में रहना होगा तो मैं तुम लोगों की हाजिरी उपस्थित यहां पे नहीं सुन कर पाओगी शरद के लिख दो शरद महाराष्ट्र तो सब कुछ मां की व्यवस्था करते थे मां जब पहलवान जय रामबाती जाति थी तो मां की सेवा के लिए मां को कोलकाता ले आने के लिए ये प्रकाश महाराज जैसे अन्य साधुओं को शरद महाराज जी बेचते थे तो मैन कहा की तुम लोग जी तरह से कोलकाता की तरह मुझे यहां पे भी नियम कानून इस तरह से एक रिस्ट्रिक्शन में बांधना चाहते हो तो मैं यहां पर इस तरह से नहीं र पाऊंगी तुम शरद को लिख दो तो खून प्रकाश महाराज जोड़ हाथ कोरिया बोली ते लागिलान तब प्रकाश महाराज हाथ जोड़कर के खाने लगे शरद महाराज आम के पेट खूब व ठाणे अपना के लिए शरद महाराज ने मुझे आदेश किया है की रास्ते में आपको बड़ी सावधानिता सावधानी के साथ में ले आऊं अमर मैन हुए शीलो दिशा हाय हमारे त्रुटि से अपनी हटेगी है मुझे लगा की मैंने शरद महाराज ने मुझे जो कहा की बड़ी सावधानी से जाट ना करके बड़े ही श्रद्धा भक्ति पूर्वक मां को ले आना तू मेरे ही ध्यान भांग होने की वजह से आप वहां पर चली गई मुझे पता नहीं चला की आप पैदल जा रही है तो मेरी ही गलती से आपको पैदल जाना पड़ा ऐसा मैंने सोचा इसलिए मैंने कहा की इसलिए मैं इस तरह से बिहेव कर रहा था मां अपना जेरूप अभिप्राय से रूपी करीबन तो मां आपका जी तरह से मां है वैसे ही आप कीजिए अच्छा देखिए अभी इस इंसिडेंट को पढ़कर के हमको थोड़ा सा एक आश्चर्य होता है आश्चर्य ही नहीं जो की हमारा लिटरेचर जिन्होंने पढ़ा है की जब मां पहले बार दक्षिणेश्वर में आई थी ठाकुर के साथ में रहने के लिए आ जितनी भी बार ठाकुर के साथ में रहने के लिए दक्षिणेश्वर में आई थी हमको पता है की किस तरह से एक छोटे से नौबत में रहती थी मैंने पढ़ा था वो दक्षिणेश्वर में पहले मुलाकात में मैं खुद जब गया था उससे पहले मैंने बहुत मां की लाइफ भी पड़ी थी कथा अमरूद भी पड़ा था लीला प्रसंग भी पड़ा था सुना था की मैं इतनी छोटी सी जगह में रहती थी तो वह सुना वह तो एक चीज हो गया किंतु जब मैं पहले बार दक्षिणेश्वर गया पहले बार मैंने मोहब्बत देखा तब मुझे भी सही में आश्चर्य हुआ था पढ़ने के बाद में भी क्या इस छोटी सी जगह में पूरा संसार किया जा सकता है लीला प्रसंग में कथामृत में पूरा वर्णन है गंभीरानंद जी की मां की जीवनी में की इतनी सी छोटी जगह में 8 फुट / 8 फुट भी शायद नहीं होगी इतनी छोटी जगह में ठाकुर के लिए खाना भी बंता था मां खुद वहां पर शयन करती थी वो जितना भी वो खाना पकाने के लिए जितना समाज रहेगा मां के खुद के वस्त्र वगैरा जो कुछ भी रहेगा ऊपर में से कोलकाता से स्त्री भक्ति आएंगे तो वो वहां पे जाकर के मां के साथ में बैठकर के वो बात करेगी या तो विश्राम करेगी पूरा संसार जैसे की एक छोटी सी इतनी सी रूम में मां को रहना पड़ता था और मां इस तरह से रहती थी की जैसे की वह कालीबाड़ी का वो जो खजांची कहता है ना की हमने सुना है की वह यहां पर है किंतु कभी उनको देखा नहीं है मां के बड़े में सुना था की हां की छोटा-मट्टा चार्ज है उनकी जो धर्म पत्नी है उनकी सा धर्मिणी जो है वह भी खजांची अर्थात की वहां का मैनेजर वहां का में एडमिनिस्ट्रेटर इस ने कभी मां को नहीं देखा था तो देख लीजिए मां कितने सुबह को उसे अर्ली मॉर्निंग सबके उठने से पहले वो वहां पे गंगा के किनारे जाकर के नित्य कर्म वगैरा सब समाप्त करके वापस आकर के अपने वो नौबत में वो रुक जाति थी फिर वहां से बाहर निकालना मुश्किल एक बार तो अंधेरे में मां जा रही थी तो एक मगरमच्छ के ऊपर में पर पद गया तो मां तो इतनी डर गई थी और फिर बाद में मैन ही कहा था की अभी सोच जाना है तो सुबह को ही जाना होगा इस समय तो कोई नहीं रहेगा अर्ली मॉर्निंग तो फिर दिन भर आपको यदि कुछ प्रॉब्लम भी होता है सोच जान का तो आपको तो रॉक करके रखना पड़ता है तो मैन कहा की इस तरह से सोच को रॉक के रॉक के तो पेट का रोग हो गया तो अब सोच लीजिए की कितना वह कठिन एक जीवन होगा बाद में हमने देखा की काशीपुर में ठाकुर लोगों को चिकित्सा के लिए कैंसर की चिकित्सा के लिए लायक गए तो फिर वहां पर भी एक छोटे से रूम में मारे थे वह सीडी के नीचे वाला वहीं पर मां खाना पाक देती ठाकुर के लिए वो डायट पत्तियां जो है वो बनती थी वो रूम भी आप देखेंगे तो हमको लगेगा अरे मां इस तरह से कैसे रहती है किंतु देखिए की हम हमको लगेगा की मां ऑफ कोर्स मां संयम की प्रतिमूर्ति है मां त्याग तपस्या जो हिंदू नारियों का यह जो स्वामी जी ने कहा है ना की सीता जो है वो भारतीय नई का आदर्श है हमेशा के लिए भारतीय नई को किस तरह से एक जीवन ज्ञापन करना है एक आदर्श जीवन कैसे जीना है वह सीता बता कर मां सीता बता करके गई है तो सीता का ही मां सीता का ही आज का स्वरूप है हमारे खुद के इस आधुनिक युग में कलियुग में कहा जाए तो मां शारदा तो मां शारदा इतना संयम में रहती थी किंतु देखिए की यही मां सामने क्या कहती है है की जब वह जय रामबाती जाति है कल पड़ा जाति है या तो फिर जब कमरपुकुर तो के ससुराल है किंतु मां का खुद का जो घर है उसका पितृ पितृ निवास वहां पर तो मां छोटी बच्ची की तरफ मुक्त रूप से रहनी चाहिए रहती थी और जब ये कोलकाता से लोग आते थे वो जल्दी देखेंगे मां अरे मां रास्ते पे चल रही है अब सुबह को भक्ति लोग ए गए रात को तो अभी कोलकाता के लोगों को तो ऐसा हैबिट है की सुबह को उठ करके चाय पीएन तो मां क्या करती थी छोटी सी वो छोटा सा एक बर्तन लेकर के वहां तो दूदू वगैरा मिलन कितना मुश्किल है तुझे राम बाटी के घर घर जाति थी कहती थी करें मेरे बच्चे लोग आए हैं उनको बनाने के लिए चाय के लिए दूध नहीं है दूध मिलेगा क्या ऐसा करके कितने घरों से दूध भिक्षा करके ला करके मां इनके लिए चाय बनती थी तो वहां पर इस तरह का वह लज्जा या इस तरह का संयम नहीं है जी तरह का की वह दक्षिणेश्वर में या तो कोलकाता में होना चाहिए था हमको पता है की उद्बोधन की उद्बोधन मंत्र महेरवादी उद्बोधन का निर्माण ही शरद महाराज ने इसलिए किया की मां जब भी कोलकाता आई है तो किसी ना किसी भक्ति के वहां रुकेगी या तो फिर मां के लिए भाड़े का घर करना पड़ेगा और फिर वहां पर क्या है की मां को प्रणाम करने के लिए इतने सारे भक्ति लोग आएंगे तो फिर उनके लिए व्यवस्था करना मुश्किल है मां भीतर में रहेगी घर के भीतर में तो वहां पे थोड़ी सी तो जगह चाहिए की मां सब कुछ अपना ठाकुर की पूजा ठीक से कर पे खाना ठीक से पाक पे वो अपने से शांति से थोड़ा सा र पे उनके साथ में जो अन्य स्त्री भक्ति वगैरा है उनके साथ में मिल बैठ करके थोड़ा सा गैप वगैरा लगा सके वह वार्तालाप कर सके वह सबके लिए तो थोड़ा सा तो एक विस्तृत जगह चाहिए तो इसके लिए मां जितनी बार कोलकाता आई थी तकलीफ होती थी रहने की जगह खोजना के लिए बोलकर के ही तो शरद महाराज ने रीड करके पैसा उधर लेकर के महीरवादी की निर्महेरवादी का निर्माण किया था तो इसीलिए हमको ये देखिए की कोलकाता की मां और यह जयरामबाती क्वालपाड़ा की मां और दोनों में किस तरह से डिफरेंस है वो भक्ति लोगों को भी पता चल गया था की मां जब कलकत्ता आई है तो मां को मिलने के लिए मां को साथ में बातें करने के लिए बहुत सर रिस्ट्रिक्शन है वो गुलाब मां वहां पे सामने ही खड़ी रहती है और कोई भी वक्त इधर-उधर की उल्टी-पुल्टी बातें करता है या तो फिर मां का बहुत ज्यादा समय ले लेट है तो ऐसा दांत करके उसको भाग देती है बेचारा वह वापस नहीं आएगा किंतु यदि मां के पास में बैठकर के संतान की तरह अपने मां की बात करनी है मां का आशीर्वाद प्राप्त करना है तो सर्वश्रेष्ठ जगह है जय राम बाटी जाना भले वहां रास्ते में जान जाते-जाते कितना ही कष्ट हो कल पड़ा विष्णुपुर तक तो ट्रेन ए जाति है विष्णुपुर से वो बैलगाड़ी में बैठकर के कल पड़ा तक तो ए गए किंतु कल पड़ा से जय राम भतीजा ना वो तब पूरा वो कहानी वो खेत में से जाता है पानी गिरा तो दलदल हो जाएगा रास्ता जंगल है जंगल में कांटे वाले पेड़ पौधे हैं तो इस तरह से वो आपको रास्ता करके जयरामबाती जाना है तो जैसे की लोग तपस्या कैलाश मानसरोवर वगैरा जगह पर तीर्थ क्षेत्र क्यों बनाए गए हैं की आप कठिन रास्ता पर करके मां में सही सही श्रद्धा भक्ति लेकर के भगवान के पास जाएंगे तो आपको तपस्या करने के जैसा पूनिया मिलेगा तो वैसे ही कोलकाता के लोगों के लिए जय राम बाटी जाना खास करके यह विष्णु पूर्व से ग्वालपाड़ा होकर के जय राम भारती का जान का रास्ता है वो इस तरह का रास्ता था की आपके पास सही सही तपस्या करवा दे हालांकि ऑफ कोर्स अमरनाथ यात्रा करने के लिए उसे समय तो कितनी मतलब मीना मीना तक आपको यात्रा करनी पड़ती थी यहां पर मुश्किल से एक दिन दो दिन का मामला होगा आप रात को जल्दी कल पड़ा आगे रात को विश्राम किया सुबह को निकाल गया तो उसे शाम तक तो आप शायद जयरामबाती पहुंच जाएंगे तो किंतु फिर भी आजकल के लोगों के लिए हमारी जो कैपेसिटी है उसके अनुसार एक दिन की भी इस तरह से कठिन यात्रा एक तपस्या के समाज है तो इस तरह से कठिन यात्रा करके वे लोग जयरामबाती जाते थे हम आपको प्रणाम करते थे मां के आशीर्वाद प्राप्त करते थे तो ये डिफरेंस है कॉइल्पद और जयरामबाती की मां और यह कलकत्ता की मां है मां कि कलकत्ता में आएगी तो हमारी वो भारतीय परंपरा के अनुसार भारतीय परंपरा नहीं है देखिए एक्चुअली यहां पे भी हमको समझना है की ये सब खूब प्रथाएं मुगल के ये जो इस्लामिक आक्रमण हुआ था उसे समय भारत में आई है वरना तो हम वैदिक युग में वेद के समय में देखते हैं वैदिक आगे में की यह जो गार्गी मैत्री वगैरा कितनी ही वो स्त्री रियान मतलब ऋषि लोग सिर्फ पुरुष नहीं होते थे स्त्रियां भी ऋषि होती थी तो इस तरह से उनको सम्मान के साथ में तो उनको समाज में अंतर किंतु फिर हमारे समाज की अदभुट्टन हुआ जबकि यह विदेशी आक्रमण शुरू आशा आक्रमणों की शुरुआत हुई हमारे पुरुष महिलाओं की रक्षा नहीं कर पे और इसी के लिए हम राजस्थान में देखते हैं की वहां की रानियां जोहार करते थे यदि पता चले की युद्ध क्षेत्र में रैंक क्षेत्र में उनके पति का वहां के राजा का मृत्यु हुआ है और दुश्मन अभी शहर में प्रवेश करने की वाले हैं तो सभी स्त्रियां रानियां क्या करती थी एक बहुत बड़ी चिंता प्रकट करती थी प्रज्वलित करती थी और उसमें प्रवेश करके शरीर का बलिदान देती थी की दुश्मन के हाथ में पढ़ने की बजे यह सम्मान इज्जत सा वो सती होना वो ज्यादा बटर है तो यह सब प्रथम होने के बाद में हुई अभी आज यदि भारत फिर से सीकर है अभी हमारी मिलिट्री हमारी पॉलीटिकल सिस्टम हमारी सोशल सिस्टम इतनी स्ट्रांग है की महिलाओं की रक्षा कर शक्ति है तो फिर से आप देखिए की यही जैसे की निवेदिता को स्वामी जी ने भारत में बुलाया था क्यों कन्या शाला की शुरुआत करने के लिए और फिर जब यह महिला भक्ति मां के पास जाकर के कहती थी की मां हमारी बच्ची तो 14 साल की हो गई अभी उसकी शादी नहीं हो रही है क्या होगा जैसे की 14 साल की लड़की इतनी बड़ी हो गई अभी शादी नहीं होगी तो बेचारी पुरी पूरा जीवन कुंवारी रहेगी इस तरह से वो बेचारे दुख करते थे तब वहां क्या कहती थी अरे तुम इतना दुख क्यों करती हो इसमें क्या है कौन सी बड़ी बात है जाकर के उसको निवेदिता उसकी स्कूल में उसको भारती कर दो वो बढ़ेगी लिखेगी बड़ी होगी देश का कल्याण करेगी समाज का कल्याण करेगी घर का कल्याण करें तो ये मां का एटीट्यूड था हां मां उसे पुराने जमाने के वो उसे समाज में मैन जन्म लिया था और मैन जीवन पर ठाकुर और मैन ठाकुर ने ही मां को शिक्षा दी थी की संयम से किस तरह से पूरे जीवन पर रहना है किंतु यही मां को यह भी पता था है वह बीता हुआ युक्त पुराना युक्त था की जब महिलाओं को इस तरह से रिस्ट्रिक्शन में रहना पड़ता था अब यह नए भारत की शुरुआत है ठाकुर के आने से सतयुग की फिर से शुरुआत हो गई है कृत्य युग की फिर से शुरुआत हुई सतयुग का जो संस्कृत नाम है वो कृत्य योग है तो कृत्य युग की फिर से शुरुआत हो गई है और महिलाओं को अब वही मुक्ति वही फ्रीडम है जो की वैदिक आगे में था जो की पहले वाला था उसमें जितना फ्रीडम था उतना ही फ्रीडम उतना ही सम्मान उतना ही सिक्योरिटी इस नए युग में होने वाला है हालांकि हम जब न्यूज़पेपर पढ़ने हैं तो हमको थोड़ा सा कष्ट भी होता है दुख भी होता है की किस तरह से अत्याचार हो रहे हैं किंतु फिर भी देखिए की परसेंटेज वॉइस चढ़ी देखा जाए तो इस तरह की घटनाएं मुश्किल से वन परसेंट या 2% होगी पूरे सोसाइटी में ज्यादातर महिलाएं सुरक्षित होती है तो यह नए युग की मैन पुराने के सभी नियम का पालनपुर भी किया और साथ में नए युग का जो नया प्रभात जो है उसका जो सूचना जो है वो भी मैन कर दी मैन ही अपने हाथों निवेदिता कन्यशाला की स्थापना हुई थी मां गई थी वहां पर जैसे कोयल पड़ा में ठाकुर के फोटो की स्थापना करके पूजा की थी वैसे ही वो निवेदिता की स्कूल में ठाकुर का फोटो रख करके पूजा मैन ही की थी और यह जो नया प्रभात जो है स्त्रियों के फ्रीडम का नए रूप से नए जमाने में रहने का उसका वो संचार जो है उसका जो शुभारंभ जो है उसका वह जो फाउंडेशन स्टोन जिसको कहते हैं वो मैन ही रखा था निवेदिता स्कूल की स्थापना करके वहां पर ठाकुर की फोटो की पूजा करके ठाकुर में ठाकुर को स्थापित किया है की वहां से एक पूरा नया भारत वहां से स्टार्ट होगा तो मां का जीवन हम देखते हैं परंपरा और आधुनिकता यह दोनों किस तरह से सबमिशन है इन दोनों का किस तरह से परफेक्ट बैलेंस है अभी आज के युग में यदि कहा जाए की महिलाओं को इस तरह से रिस्ट्रिक्शन या संयम में नहीं रहना तो क्या मतलब पुराने हमारे संस्कार संस्कृति हमारी वालुज सब कुछ भूल जाना है नहीं उसका भी एक स्थान है वो किंतु यह जो बिहेवियर अर्थात की अपने आचार्य व्यवहार में इसको लाना है जैसे की पुराने समय में साधु सन्यासी इस तरह से होते थे की जहां पे गांव है गांव में कभी वो भिक्षा करने के लिए ही प्रवेश करते थे बाकी तो गांव से बाहर में ही रहते थे स्त्रियों का चेहरा भी कभी नहीं देखते थे एकदम कठोर तपस्या का पालनपुर करते थे उपवास वगैरा नियमित करते थे अभी आज रामकृष्ण मिशन के सन्यासियों को देखिए की इस तरह का कठोर संयम तपस्या उपवास वगैरा जो है नियमों का पालनपुर या तो फिर परंपरागत वीडियो का पालनपुर हम इतना नहीं करते हैं हमारा जो संयम है वह मानसिक संयम है और साथ में ही कर्मयोग की साधना है तो वैसे ही जैसे वो संयम और साधना का स्वरूप सन्यासियों के लिए ठाकुर ने और स्वामी जी ने परिवर्तित कर दिया है वैसे ही स्त्रियों के लिए भी ये संयम लज्जा जैसे कहते हैं ना मां कहती है लज्जत स्त्रियों का आभूषण है उनका ये है रहना है तो वैसे ही ये भी वो जैसे ये तपस्या जैसे हैं मानसिक तपस्या है वैसे ही ये जो स्त्रियों के जो गन थे जिसको की बहिर रूप से प्रकट होते थे वो अभी मानसिक रूप से प्रकट होना है उनका जीवन जैसे निवेदिता है फिर बाद में अभी तो शारदा मठ की स्थापना हो गई है वहां की सन्यासियों को आप देखते हैं तो यह इन लोगों का पूरा जीवन पूरा वालुज सिस्टम किस तरह से आधुनिक युग के साथ में उसको अपडेट किया जाए साथ-साथ में ही अपनी परंपरागत मूल्य को उसके साथ में बैलेंस करवा करके है यह ठाकुर मां और स्वामी जी ने हमको समझाया है और मां के जीवन में इन दोनों का परफेक्ट बैलेंस उनको दिखता है कभी-कभी हम सोचेंगे की मां का जीवन इतना रिस्ट्रिक्टेड था मैं खुद मेरी बहन अमेरिका में रहती है और वो जब करती है तो अभी क्या होगा की मैं उसको कैसे कहूंगा की तुम माता जीवन फूलों करो मां है अमेरिका की लाइफ वहां की लाइफस्टाइल वहां पे जब करने के लिए जाना मैन डेरी कहां नौबत में मां का जीवन और कहां पर वो अमेरिका का जीवन कहां पर दोनों का मेल है कैसे मैं उसको समझाऊं की अरे वो मां का लाइफ है उसमें से तुमको शिक्षा लेनी है उसमें से तुमको सीखना है कैसे मैं बताऊं की वह क्या मैं उसको का डन की अपने घर में ही बैठे रहना 24 घंटा किसी का मुंह मत देखना घर के बाहर मत निकालना अमेरिका में क्या सब संभव है और आप जब करने के लिए जा रहे हैं वह भी वह मतलब इस तरह का एक एक्स्ट्रा शब्द फॉरवर्ड एक एनवायरनमेंट में वह रहती है वह न्यूयॉर्क में तो किस तरह से यह मां का लाइफ वहां की स्त्रियों के लिए वो एक आदर्श स्वरूप हो सकता है तो वालुज लेनी है नहीं की उसके सरकमस्टेंसस करिया कल आप वालुज लेनी है आदर्श लेने है जी तरह से हमने ठाकुर के आदर्श ग्रहण किया ठाकुर की तरह पुरी पुरी रात भर जग करके नहीं हम लोग जब ध्यान करते हैं ठाकुर की तरह ना ही हम लोग बार-बार समाधि में चले जाते हैं ठाकुर तो छोड़ी दीजिए डायरेक्ट भी साइकिल जी तरह से थे स्वामी जी राजा महाराज लट्टू महाराज सुबोध महाराज कृष्णानंद जी शशि महाराज इनकी तरफ भी हमारा जीवन नहीं हो सकता है किंतु क्योंकि क्या है की वो संभव ही नहीं शरीर मां इतना कठिन तपस्या करने के लिए साथ ही नहीं देगा किंतु उनके जो आदर्श है वह आदर्श हमने अपने जीवन में अपने है जितना यह था संभव हो सके उसका पालनपुर करने की चेष्टा करते हैं और वही आदर्श का एक आधुनिक स्वरूप कर्मयोग जो है कर्मयोग के रूप में हम इस साधना को परिवर्तित करके उसका पालनपुर कर रहा है तो यह परंपरा और आधुनिकता यह ट्रेडीशन और मॉडर्नाइजेशन यह दोनों का जो परफेक्ट बैलेंस है वो रामकृष्ण मिशन और ठाकुरमार स्वामी जी के जीवन में हमको देखने को मिलता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं कल नहीं कल संडे है परसों ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा