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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 8 Oct 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का लाइफ हम स्टडी कर रहे थे। ऑलरेडी वराह नगर मठ यह जो फेज है स्वामी जी का वहां से हमने स्टार्ट किया। इसका प्रथम चैप्टर था कि ठाकुर की महासमाधि के बाद के कुछ दिन और द्वितीय चैप्टर था कि वराह नगर मठ का फाउंडेशन वो किस तरह से हुआ और प्रारंभ के कुछ दिन। इसके बाद में थर्ड चैप्टर कंफर्मेशन ऑफ फेथ कि किस तरह से ठाकुर के पास में से गेरुआ तो ग्रहण किया। वराह नगर मठ की स्थापना भी तो हो गई। किंतु यह श्रद्धा जो है चैलेंज के सामने किस तरह से श्रद्धा को दृढ़ीभूत किया जाता है वह फेस अभी यह थर्ड चैप्टर में हम देख रहे हैं और एज ऑलवेज कि यह जो चैप्टर्स है और यह जो डिमार्केशन है स्वामी जी की लाइफ का जिस तरह से पीरियड बनाए हैं वह मैंने बनाए हैं स्वामी जी की आप इंग्लिश बायोग्राफी बाय हिज ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल या तो फिर बेंगली बायोग्राफी बाय स्वामी गंभीरानंद जी महाराज उसमें देखेंगे कि चैप्टर्स जिस तरह से बनाए हैं वह थोड़ा सा डिफर होता है कि किस तरह से मैंने बनाए हैं। तो विद दिस प्रियमबल विद दिस पूर्व भूमि का हम प्रारंभ करते हैं। देखिए कि इस युगनायक में से एक पोर्शन लेकर के हम पाठ कर रहे थे। जो सबसे पहला इस चैप्टर का

नरेन के नेतृत्व कौशल और उन्होंने अपने गुरुभाइयों को वराहनगर मठ में आकर रहने के लिए कैसे प्रेरित किया 1

पॉइंट है कि किस तरह से नरेंद्रनाथ यानी कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद की लीडरशिप के अनुसरण करते हुए त्यागी संतान वराह नगर मठ में आन पड़े थे। आन इकट्ठा हुए थे और किस तरह से नरेंद्र सबके अभी शुरू-शुर में तो क्या था कि कभी-कभी यह लोग घर चले जाते थे। कभी-कभी उनके मां-पिताजी आकर के उनको डराधमका करके घर ले जाते थे। तो उस समय स्वामी जी उनके घर जाकर के उनको फिर यह ठाकुर की बातें पुराने दक्षिणेश्वर के दिनों की बातें यह सब याद करवा करके फिर से खींच करके वराह नगर मठ में ले आते थे। तो यह सब कुछ हमने देखा और फिर यह जो लीडरशिप वाला पोर्शन था उसका एक आखिरी पैराग्राफ बचा हुआ है। वह हम देख लेते हैं। क्या लिखते हैं गंभीरानंद जी महाराज? इसके पहले तो जो हुआ हमको पता ही है कि किस तरह से बार-बार मां-पिताजी ये त्यागी संतानों को घर ले जाते थे। त्यागी संतान यानी कि यह जो 16 डायरेक्ट डिसाइपल माइनस वन स्वामी विवेकानंद तो यह 15 और उस समय विज्ञान महाराज तो बहुत बाद में आए थे। तो उन दोनों को छोड़ दे तो फिर बाकी जितने भी थे वो वो लोग कभी-कभी आते थे कभी-कभी चले जाते थे। तो किस तरह से स्वामी जी उनको मठ में ले आते थे। तो यहां पे क्योंकि बार-बार यह तो संघर्ष करना पड़ता है स्वामी जी को बार-बार जाकर के उनको मनाना पड़ता है। तो गंभीरानंद जी लिखते हैं नरेंद्र ओ दमीबार पात्र छिले ना नरेंद्र भी हारने वाला नहीं था। भले ही चाहे इस त्यागी संतानों के मां-पिताजी जितना भी उन त्यागी संतानों पे दमन गुजारे, जुल्म गुजारे, उनको अपने कमरे में बंद कर दे, उनको कहे कि यह नरेंद्र पागल लड़का है। उसका संगत मत करना। वो कुछ भी कर ले। नरेंद्र हारने वाला नहीं था। गहे फिरिया नरेंद्र पुनरागमन भए जखन तारा रुद्ध द्वार को पाठाभ्यास निरतो ताकी तेन तोख नरेंद्रनाथ हठात जड़े मतो उपस्थित होया गुरुद्वारे ऊपरज परी कराघात करिया द्वार उद्घाटन कराई तेन एवं गुरु भ्राता के राज पथे टानिया लिया गया अभिभावके अशखाते अग्निमय वाणी उत्सव खुल्यादित्य महाराज का एक सेंटेंस पूरे एक पैराग्राफ जैसा क्या है? इसका अर्थ जब यह त्यागी संतान वराह नगर मठ से अपने घर वापस आ जाते तो उनको डर तो लगता ही था कि नरेंद्र कभी भी आकर के उनको फिर से खींच के ले जाएगा। तो यहां पर नरेंद्र का डर तो यहां पर दूसरी ओर है मां-पिताजी का डर कि वे लोग कहते हैं घर में ही रहो शादी करो। अभ्यास करो, पढ़ाई लिखाई करो वगैरह। तो नरेंद्र फिर से कहीं ना आ जाए। फिर से कहीं मां-पिताजी के साथ में झगड़ा ना हो जाए। इस डर से यह लड़के लोग अपने कमरे का दरवाजा बंद करके पाठाभ्यास अर्थात कि विद्या में स्टडी में जब निरत हो जाते स्टडी में जब लग जाते तब नरेंद्रनाथ हटात एकाएक कहां से झड़ की तरह तूफान की तरह आकर उपस्थित होता और यह बंद दरवाजे पर जोर-जोर से अपने हाथ मार करके जोर-जोर से दरवाजा खटखटा करके कैसे भी करके दरवाजा खुलवाता और फिर इनके हाथ पकड़ कर के लड़कों के उनको यह रास्ते राजपथ अर्थात कि रास्ता रास्ते पर खींच के ले जाता और फिर उनके पिताजी की असाक्षात अर्थात कि पिताजी की नजरों से दूर अपनी अग्निममई वाणी से उनको पुनः उद्दीपित करता। देखिए यह सीन जो

भारत में संन्यास की महिमा

है वो थोड़ा सा समझना है। सेंटेंस बड़ा लंबा है। पढ़ने से थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड लगता है। किंतु समझने में काफी सरल है। देखिए हजारों सालों से भारत में यह सन्यास की प्रथा चली आ रही है। सन्यास और संसार दो रास्ते हैं इस जगत में। अभी संसार के रास्ते पर ज्यादातर लोग चलते ही हैं। किंतु सन्यास का रास्ता उन लोगों के लिए है जो मुट्ठी भर जो लोग हैं उन लोगों के लिए है कि वे लोग जन्म से ही इतने शुद्ध संस्कार लेकर के वे लोग जन्म ग्रहण करते हैं। देह धारण करते हैं कि बचपन से ही जैसे कि सांसारिक वासनाओं के प्रति उनका मन लगता ही नहीं है। किंतु क्या है कि इस तरह के यह जो यंग लड़के लड़कियां होते हैं उनको गाइडेंस देने वाले बहुत कम ही लोग होते हैं। ज्यादातर केस में आप देखेंगे कि कोई लड़का या लड़की यंग यंग अवस्था में यदि इस तरह की बातें करें कि हां मुझे शादी नहीं करनी है। हां मुझे पैसा कमाने में इंटरेस्ट नहीं है। हां मुझे यह संसार के जो ऑब्लिगेशंस है उसमें ज्यादा कोई इंटरेस्ट नहीं है। तो लोग या तो उनकी मजाक उड़ाएंगे या तो फिर उनके ऊपर में कटाक्ष का बाण फेंकेंगे या तो फिर उनको डराएंगे धमकाएंगे कहेंगे कि अरे तुम यदि बूढ़े होगे तो तुम्हारी रक्षा कौन करेगा तुम्हारी ट्रीटमेंट कौन करेगा क्योंकि क्या है कि ऑब्वियसली कि जब तक आपके पेरेंट्स जीवित है तब तक तो आप एक दूसरों की संभाल लेंगे किंतु जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाएगी 30 40 50 60 होती जाएगी। आपके पेरेंट्स का जब निधन हो जाएगा तो फिर आपकी केयर करने वाला कौन होगा? देखिए मैं खुद अ मैंने जब यह सब ठीक किया कि मुझे घर छोड़कर के अभी त्याग का रास्ता अपनाना है। तो क्या है कि बहुत सारे लोग आकर के मुझे किस तरह की बातें करते थे। मेरे जो कुछ मित्र थे काफी अच्छे मित्र थे। वह आकर के मुझे कहते हैं कि अरे पगले यह सब बुढ़ापे में करना होता है। यह तुम युवानी में यह भर युवानी में यह तुम त्याग की बातें क्यों करते हो? तो अभी मैं उनको किस मुंह से समझाऊं कि मेरे मन में क्या चल रहा है। फिर मेरे कुछ रिलेटिव्स थे। वह मुझे आकर के कहते हैं कि देखो तुम एक बात समझ लो। तुम यदि शादी नहीं करोगे तो अभी तो ठीक है किंतु 30-40 साल की तुम्हारी उम्र होगी ना तुम्हारा कोई भी रिलेटिव तुमको अपने घर में नहीं आने देगा। यह बात तुम याद रखना क्योंकि क्या है कि बिना शादी किया हुआ पुरुष लोग उसको एक खतरे की दृष्टि से देखते हैं। अपने घर में उसको बुलाएंगे तो घर में जो बाकी सब लेडीज है उसके साथ में वह दुर्व्यवहार करेगा। ऐसा करेगा किसको पता? क्योंकि उसके मन की वासनाएं हैं। उसको एक नेचुरल आउटलेट तो मिलता नहीं है। शादी यदि की है तो यह सब क्या है कि मन की वासनाओं को एक नेचुरल आउटलेट मिल जाता है। तू शादी नहीं करोगे सब मन के भीतर में वासनाएं भर के रहेगी तो फिर कोई भी ना तुमको 30 साल की उम्र के बाद में अपने घर में ही नहीं आने देगा। तो यह बात तुम याद रखना। ऐसा करके मेरे रिलेटिव्स मुझे समझाते थे। तो क्या है कि देखिए कि यह सब मैंने देखा है। रामकृष्ण संघ के जितने भी साधु होंगे सब ने इस तरह से कुछ ना कुछ उनको देखने को मिला है। मैं एक साधु की बात करता हूं। एक महाराज थे। उन्होंने मुझे यह कहानी बताई थी। अभी यह महाराज के मित्र दूसरे साधु। तो अभी यह साधु के पिताजी बीमार थे। तो यह महाराज ने कहा अपने मित्र साधु को कि आप भी मेरे साथ में चलिए। मैं घर जाकर के थोड़ा सा उनको देख के फिर हम लोग वापस आ जाएंगे। अभी क्या है पिताजी बीमार है उनका आखिरी समय चल रहा है तो फिर अभी एक ऑब्लिगेशन बनता है कि जाकर के मिलकर थोड़ा सा सांत्वना देकर वापस आ जाए। तो जिन महाराज के पिताजी बीमार थे उनके जो मित्र साधु थे उन साधु ने मुझे यह कहानी बताई है। वह मुझे कहते हैं कि हम दोनों उनके पिताजी के घर गए देखा कि पिताजी मृत्यु शैया पर शायद है। मां पास में बैठकर के रो रही है और यह जो स्वामी जी थे, वह इकलौते संतान थे अपने मां-पिताजी के और अभी पिताजी तो उनका मृत्यु अभी पास में ही आ गया है। बूढ़ी मां है। अकेली बैठी-बैठी रो रही है। तो अभी क्या है कि ऐसा कोई रिलेटिव नहीं है कि मां की कोई संभाल रखेगा। तो अभी जैसे ही यह स्वामी जी वहां जाकर बैठे तो उनके वृद्ध पिताजी और वृद्ध मां ने उनका हाथ पकड़ लिया। कहा कि बेटा अब तुम वापस मत जाना। तुम यदि चले जाओगे तो तुम्हारी मां की कौन संभाल रखेगा। और देखिए कि यह जो लड़का है उनका हाईली टैलेंटेड रामकृष्ण मिशन में तो आपको पता ही है कि किस तरह से हाईली टैलेंटेड सब यंग लड़के ज्वाइन करने को आते हैं। तो मां-पिताजी का इकलौता लड़का है। इतना अच्छा सा पढ़ाई लिखाई किया है और फिर यह इस तरह से उनको छोड़कर के चला जाए। साधु होने के लिए आप सोचिए कि क्या उनके हृदय पर गुजरती होगी। तो जो मित्र साधु थे जिन्होंने मुझे यह कहानी बताई वो कहते हैं कि मेरी आंखों में आंसू आना शुरू हो गए क्योंकि क्या है कि घर की यह परिस्थिति अभी पिताजी तो चलो अभी तो जाने ही वाले हैं उनको तो आप कुछ नहीं कर सकते किंतु वृद्धा मां जो अकेली रहेगी घर में क्या होगा बेचारी का कहीं किस दिन गिर गई तो फिर उसको हॉस्पिटल कौन ले जाएगा आधी रात को इमरजेंसी मेडिकल इमरजेंसी आ गई तो कौन उसकी केयर करेगा ऐसे तो हम न्यूज़पेपर में कितना ही पढ़ते हैं कि वह वृद्ध कपल है। हस्बैंड वाइफ अकेले रहते हैं। एक दिन दो-तीन दिन देखा कि वे लोग कमरे में से अपने घर में से बाहर ही नहीं आ रहे। तो फिर पड़ोसियों ने घर तोड़ के देख दरवाजा तोड़ के भीतर में गए। पता चला दोनों का डेथ हो गया है। या तो पता नहीं कुछ हुआ है। कुछ मर गए हैं और तीन-चार दिनों तक खबर रखने वाला कोई नहीं था। तो यह मित्र साधु कहते हैं मुझे कि मेरी आंखों में आंसू आना शुरू हो गए और मैं तो कहता हूं वो वो जो साधु जिनके ये पिताजी थे वो तुम कहते हैं कि भाई तुम एक काम करो ना तुम कुछ दिन यहां पर रह जाओ ना मैं जाकर के आश्रम में जाकर के बड़े महाराज को बताऊंगा कि वहां पर आवश्यक है तो उसको यहां पर रहने की जरूरत है किंतु जिन जिनके ये पिताजी थे जिस साधु के वह दोनों मां पिताजी जो हाथ पकड़ करके बैठे हैं हाथ खींच करके छुड़वा लिया और खड़े हो गए और अपने मित्र को कहते हैं चलो यहां से निकलते हैं। तो जो साधु साथ में गए हैं वह जाने को तैयार नहीं है। वह कहते हैं अरे भाई तुम्हारी मां की अवस्था तो देखो कैसी है। किंतु यह साधु कहते हैं कि नहीं बस ठीक किया था कि 10 मिनट यहां पे बैठेंगे 10 मिनट हो गया अभी निकलो। तो जो मित्र साधु वहां से जाना नहीं चाहते थे तो यह दूसरे साधु उनका हाथ पकड़ कर के खींच के ले आए। देखिए कैसा रिवर्स। तो अभी क्या है कि आप संसार में रहते हैं तो संसार में यह जो संबंध प्रेम यह जो मायाजाल है आपको इस तरह से जोरो करके बांध के रखेगी कि इसको तोड़ के निकल के सन्यास लेने के लिए आना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है। तो यहां पर

श्री रामकृष्ण और माँ सारदा का हमारे प्रति स्नेह ही रामकृष्ण संघ की नींव है

देखिए कि अह यह जो श्री रामकृष्ण देव के 16 त्यागी संतान उन लोगों ने अपने घर अपना घर छोड़ा अपने मां-पिताजी को छोड़े किस तरह से छोड़ पाए तो यह जो प्रेम का बंधन होता है संसार का वो किस तरह से यह लोग उसको तोड़ पाए तो इस तरह से कि ठाकुर ने उनको उससे भी ज्यादा प्रेम और स्नेह दिया था। ठाकुर का जो प्रेम था मां शारदा का जो प्रेम था अपने त्यागी संतानों के प्रति वह इतना अद्भुत था इतना वह दिव्य था इतना संसार के परे था कि उससे मोहित होकर के आकर्षित होकर के बिना आकर्षित हुए बिना मोहित हुए आप रह नहीं सकते। तो इसीलिए यह देखिए कि यह त्यागी संतान ठाकुर की महासमाधि के बाद की यह सब घटनाएं हैं। कि रामकृष्ण संघ की स्थापना होने वाली है। किंतु यह स्थापना करने के लिए जो सर्वप्रथम स्टेप है कि एक आश्रम बनाकर के सबको इकट्ठा रहना है। वही एक सबसे बड़ा क्राइसिस का टाइम है। देखिए कि आज रामकृष्ण मिशन को 100 साल होने को आए। यह 100 साल में आप पूछेंगे कि यदि कभी क्राइस ठाकुर की कृपा से हम लोगों ने कोई बहुत क्राइसिस को फेस तो किया है। बहुत सारी क्राइसिस को फेस किया है। किंतु हमको कभी ऐसा नहीं लगा कि यह क्राइसिस ऐसी क्रिटिकल है कि कभी हमारे संघ को ही ना तोड़ दे। जब यह बंगभंग मूवमेंट स्टार्ट हुआ था 1902 1905 के आसपास की घटना 1905 के आसपास की कि यह बंगाल का डिवीजन करने वाली थी ब्रिटिश गवर्नमेंट तो यह एकाएक ये जो रेवोल्यूशनरी जु्वार जो आया रेवोल्यूशनरी वेव जो आया बंगाल का उस समय बहुत सारे यंग लड़के हैं वे लोग रेवोल्यूशनरी हो गए थे किंतु फिर थोड़े कुछ समय के बाद में कुछ-कुछ लोगों को लगा कि नहीं यह सब वो ब्रिटिश लोगों की बंदूक से गोली मार करके हत्या करना या ब्रिटिश लोगों पर बम फेंकना इस तरह का टेररिज्म जो है वह कोई लॉन्ग टर्म सॉल्यूशन नहीं है भारत के लिए। आज भी देखिए कि जो लोग अपने देश के लिए टेररिज्म का इस्तेमाल करते हैं देश के विकास के लिए या तो देश की मुक्ति के लिए या तो देश के डेवलपमेंट के लिए उन लोगों का कभी कुछ होने वाला नहीं है। टेररिज्म इज नेवर एन आंसर। स्पिरिचुअलिटी इज द आंसर। तो इस तरह के कुछ-कुछ लड़के रामकृष्ण मिशन में आकर के ज्वॉइ होना शुरू हुए थे। तो उस समय ब्रिटिश गवर्नमेंट की रामकृष्ण मिशन पर बहुत ही कड़ी नजर रहती थी। अपने सेंटर में यह सीआईडी के सब ऑफिसर जा करके सभी साधुओं को तंग किया करते थे। आपका नाम क्या है? पता क्या है? यह बताओ। यह सब चलता रहता था। तो वो एक क्राइसिस हमने देखा है। ठाकुर की कृपा से वह क्राइसिस भी टल गया। उसके बाद में हमने देखा कि संघ के ही भीतर में से कुछ ऐसे तत्व कुछ इस तरह के लोग खड़े हुए जो कि संघ को भीतर में से ही तोड़ना चाहते थे। किंतु ठाकुर की कृपा से यह क्राइसिस भी टल गया और यह जो और बाली जो म्युनिसिपालिटी का टैक्स हमारे जो बेलूर मठ के ऊपर में लगाने वाले थे ब्रिटिश गवर्नमेंट वो यदि लग जाता तो एक बहुत बड़ा फाइनेंशियल नुकसान हमको हो जाता। अपनी सेवा कार्य की जो यह सब एक्टिविटीज है वहीं पर रुक जाती। किंतु ठाकुर की कृपा से उससे भी हम निकल आए। यह कोई भी क्राइसिस जो है बाद आज हम रामकृष्ण मिशन का हिस्ट्री स्टडी करते हैं। 1886 1886 में प्रथम मठ वराह नगर मठ की स्थापना हुई। यह 2025 चल रहा है 2025 देखिए इतना जो इतिहास है ऑलमोस्ट आपका 1130 इयर्स के आसपास का यह इतिहास 1140 इयर्स का देखिए कि ऐसी कोई भी क्राइसिस नहीं है जो कि हमको ऐसा लगा हो कि हमारे संघ को तोड़ देगी। ऐसी क्रिटिकल क्राइसिस ऐसा कभी नहीं हुआ। किंतु यह जो सर्वप्रथम जो ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह त्यागी संतानों को इकट्ठा करके एक आश्रम में जमा करना यह एक क्रिटिकल क्राइसिस थी और यह क्रिटिकल क्राइसिस का सॉल्यूशन सिर्फ नरेंद्रनाथ के हाथ में था भविष्य के स्वामी विवेकानंद यदि स्वामी जी अपने उस मिशन में फेल हो जाते और यह त्यागी संतान एक मठ में आकर के इकट्ठा ना होते तो भविष्य का रामकृष्ण संघ रामकृष्ण मिशन हमारी जो इतनी सारी एक्टिविटी देश विदेश में हमारे ये जो शाखा प्रशाखाएं फैली है हजारों यंग लड़के यहां पर साधु होने को आते हैं। अपना भविष्य उज्जवल बनाते हैं। अपना कुल जो है अपने मां-पिता जी का जो पूरा यह एक यह है लीनिएज है। उसको वे लोग दिव्यता प्रदान करते हैं। उनके पाप धो देते हैं। वह संभव नहीं होता। तो यहां पर देखिए कि यह सब बातें कि आज हमको लगता है कि अच्छा ठीक है ठाकुर के पास में दक्षिणेश्वर में यह यंग लड़के जाते थे। ठाकुर ने उनको मेडिटेशन करना सिखाया। ब्रह्मचर्य व्रत का उनको शिक्षा दिया और फिर ये ठाकुर की महासमाधि जब हुई तो ये लड़के लोग सब इकट्ठा आ करके रहने लगे। ऐसा हम फटाफट करके पढ़ लेते हैं। किंतु यह जो एक्चुअल आप इसके उसको ग्रेनुअल डिटेल्स में जाएंगे, डीप डिटेल्स में जाएंगे तो पता चलेगा कि यह जो एक के बाद एक स्टेप आज हमको जो सहज लग रहे हैं, वह जब स्टेप्स लिए जा रहे थे, वह कोई इतना सहज नहीं था। आज हमको यह सब चीजें भूतकाल में देखते हैं तो विद द बेनिफिट ऑफ एंड साइड हमको यह सब इनएविटेबल लगता है कि अरे वह तो होना ही था। ठाकुर के आशीर्वाद थे, मां के आशीर्वाद थे। यह त्यागी संतानों को तो एक आश्रम बना के साथ में रहना ही था। कौन सी बड़ी बात है? किंतु देखिए कि जब हम एक्चुअल हिस्ट्री को डिटेल में पढ़ते हैं और अपने को उस समय में ट्रांसपोर्ट कर देते हैं। मान लीजिए आज मेरे पास में टाइम मशीन है और आज मैं 1886 में चला जाता हूं। बस यही एक महीने पहले ठाकुर की महासमाधि हुई है और एक ही महीने के बाद में अभी मैं त्यागी संतान हूं। मैं त्यागी संतान को फॉलो कर रहा हूं। देख रहा हूं कि वो अपने घर जा रहे हैं। शरद महाराज फॉर एग्जांपल घर जा रहे हैं। घर में पिताजी की डांट सुन रहे हैं और फिर पिताजी की डांट सुनकर के यहां पर नरेंद्र का डर है कि यह स्वामी जी अभी आ जाएंगे। हाथ पकड़ कर के हमको वराह नगर मठ में ले जाएंगे। तो यह डर के मारे दरवाजा बंद करके बैठकर के स्टडी कर रहे हैं। थोड़ी देर हुई ना हुई जोर-जोर से कोई दरवाजा खटखटा रहा है। मेरा हृदय धबकना शुरू हो गया। पता चल गया कि नरेंद्र आकर के खड़ा हो गया है। डरते डरते दरवाजा खुला। तो सही में स्वामी जी खड़े हैं। स्वामी जी ने हाथ पकड़ा और खींच करके रास्ते पर ले गए और फिर से सुनाने लगे। वही अमृतमय वाणी कि हम लोग दक्षिणेश्वर जाते थे। ठाकुर के साथ में रहते थे। ठाकुर का प्रेम जो है वह कितना स्निग्ध, कितना शीतल, कितना दिव्य था। उसके सामने यह संसार तो बिल्कुल फीका है। इस तरह से जब नरेंद्र बात करना शुरू करेगा तो फिर से हृदय पिघल जाएगा। सोचेंगे कि अरे मैं यहां पर कहां इस कचरे में पड़ा हुआ हूं। कहां संसार में पड़ा हुआ हूं। छोड़ो यह सब स्टडी को। गोली मारो कैरियर को। छोड़ो मां पिताजी को। चलो चलते हैं वही वराह नगर मठ में जहां पर दूसरे मेरे गुरु भाई रह रहे हैं। तो ऐसा करके नरेंद्र उसको खींच करके ले जाता है। जब हम यदि अपने नजरों से अपने को वहां पर ले जाते तो हमको यह डाउट हो जाता कि नरेंद्र का यह जो मिशन है वो सक्सेस होगा कि भी नहीं। इतने सारे लड़कों को एक के बाद एक खींच करके पकड़ के ले आ के एक जगह पर रखना और यह सब तो एक-एक अपने यह है ना सभी तो महारथी है। सभी के भीतर में भयानक टैलेंट है। यदि इन लोगों को खुला छोड़ दिया जाए तो एक-एक त्यागी संतान ठाकुर का क्या से क्या नहीं कर लेगा। वे लोग चुपचाप नरेंद्र की बात सुन रहे हैं। चुपचाप उन्होंने ठाकुर की बात सुनी। यह भी तो कोई मिरेकल से कम नहीं है। आज हम देखिए

हर कोई वहीं काम करना चाहता है, जहाँ प्रतिभा को सम्मान मिलता हो और सामाजिक दृष्टिकोण अत्यंत उदार हो

कि हम कोई भी वर्क एनवायरमेंट में जाते हैं वो चाहे एकेडमिक एनवायरमेंट हो ना कि कॉर्पोरेट सेक्टर हो कहां पे भी हम जाते हो जहां पे एक से ज्यादा 101 टैलेंटेड लोग इकट्ठा होते हैं। देखेंगे कि कितना भयानक ईगो क्लेश इन लोगों में होता है। तो यह जो ईगो क्लेश है उससे बचकर के उनको एक डायरेक्शन में ले जाकर के काम करवाना वह तो जो इस तरह के हाई प्रेशर एनवायरमेंट में रहा है उन्हीं को पता है कि किस तरह से दूसरों को सम्मान देना, किस तरह से टैलेंट को एप्रिशिएट करना, किस तरह से लीडरशिप को फॉलो करना, किस तरह से लीडरशिप एस्टैब्लिश करनी वो भी तो एक बहुत बड़ी टैलेंट है। ये जो बड़ी-बड़ी मल्टीीनेशनल कंपनीज है वहां का वर्क कल्चर वर्क एथिक्स आप देखेंगे तो आप अभी रिसेंटली मैं एक न्यूज़ पेपर रिपोर्ट पढ़ रहा था उसमें लिखा था कि अभी जितने भी देश हैं सभी लोग चाहते हैं कि हमारे यहां पे एआई स्टार्टअप कंपनीज़ स्टार्ट हो। अभी प्रॉब्लम क्या है कि देखिए जो एआई इंजीनियर्स है वो लोग हाईली डिमांड में है। उन लोगों को बड़ा हाई सैलरी चाहिए वरना तो वे लोग आपके वहां पर रहेंगे नहीं क्योंकि उनको तो हमेशा बेटर ऑफर्स आती रहती है। तो अब क्या है कि गल्फ कंट्रीज है वे लोग मिलियंस ऑफ डॉल सैलरी वे लोग ऑफर करते हैं। चाइना भी मिलियंस ऑफ डॉलर सैलरी ऑफर करता है। किंतु फिर भी ये जितने भी एआई इंजीनियर्स हैं यूरोप भी ऑफर करता है। इंडिया की कंपनियां भी ऑफर करती है। किंतु ज्यादातर एआई इंजीनियर्स अमेरिका में जाना प्रेफर करते हैं। क्यों? क्योंकि अमेरिका में सैलरी के अलावा एक लिबरल एनवायरमेंट उनको मिलता है कि जहां पर वह अपने बीवी बच्चों को भी ले जा सकते हैं। बच्चों के लिए पढ़ाई का भी एक बहुत अच्छा एक मौका है। उनकी जो वाइफ है उनको एक सोशल एक चाहिए एनवायरमेंट वो मिलता है। इन लोगों को इंजीनियर को अपना रिसर्च यदि पर्स्यू करना है तो रिसर्च के लिए एक एक टीम वर्क उनको मिल जाता है। मतलब सो मेनी अदर देन ये जो मॉनिटरी बेनिफिट्स है उसके अलावा पे पैकेज के अलावा दूसरे इतने सारे बेनिफिट्स है अमेरिका जो ऑफर करता है कि सभी लोग वहां पे जाना चाहते हैं। तो एक्चुअली क्या है कि देखिए कि दिस मॉनिटरी बेनिफिट के ऊपर से भी जाकर के यह जो एनवायरमेंटल बेनिफिट है जो एक सोशल बेनिफिट लोगों को मिलते हैं उसके प्रति लोग ज्यादा आकर्षित होते हैं। तो यहां पे भी देखिए कि आप यह एक आपको कॉर्पोरेट कल्चर क्रिएट करना पड़ेगा ना। तभी तो आप हाईएस्ट टैलेंट को अट्रैक्ट कर पाएंगे। गल्फ कंट्री हो, चाइना हो, यूरोप हो, भले ही चाहे गमे जितना ही बड़ा वे लोग पे पैकेज आपको देते होंगे पर एनम आपको इतना मिलियन देते होंगे। बट नो वन कंपेयर्स टू द सोशल सिस्टम, लिबरल सिस्टम दैट अमेरिका हैज़ क्रिएटेड। सो फार। अभी वहां पे भी वह पगला आ गया है। पता नहीं क्या करेगा। तो एनीवे यहां पे भी रामकृष्ण मिशन में भी आप देखिए कि आपको एक लिबरल एनवायरमेंट खड़ा करना है कि जहां पे टैलेंट को सराहा जाता है। जहां पे लीडरशिप क्वालिटी जिनमें होती है उनके प्रति रिस्पेक्ट प्रकट की जाती है। यहां पे जिसके पास में टैलेंट है तो टैलेंट को अप्लाई करने का उसको एक अपॉर्चुनिटी प्राप्त होता है। यह नेपोटिज्म कि यह मेरा लड़का है तो इसको मैं प्रमोशन दूंगा और यह मेरा लड़का नहीं है या तो फिर मेरा विध्वेषी है तो उसको मैं साइड पर कर दूंगा। इस तरह का एक टॉक्सिक एनवायरमेंट खड़ा करने से अपना संघ कभी भी आगे नहीं बढ़ता। तो देखिए कि यह

नरेन के नेतृत्व कौशल और उन्होंने अपने गुरुभाइयों को वराहनगर मठ में आकर रहने के लिए कैसे प्रेरित किया 2

अपना इंस्टिट्यूशनल सेटअप किस तरह से स्टार्ट हुआ। किस तरह से भविष्य के रामकृष्ण संघ में परिणत हुआ। उसके पीछे यह सब स्वामी जी का फुटवर्क रहा है। तो मैं यह सेंटेंस थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड है किंतु साहित्य की दृष्टि से भी बड़ा सुंदर है। मैं फिर से एक बार पढ़ता हूं। गहे फिरिया नरेंद्र पुनरागमन भए जोख तारा वृद्ध द्वार को के पाठाभ्यास निरत थाकीते तो नरेंद्रनाथ हठात झड़े तो उपस्थित होइया गुरुद्वारे ऊपर जुप कराघात करिया द्वार उद्घाटन कराई तेन एवं गुरु भ्राता के राजपथ टानिया लया गया अभिभावक के ओखाते अग्निमय वाणी उत्सो खुलियाते यह त्यागी संतान जब नरेंद्र के भय से जब घर में वापस आ जाते तो वे लोग अपने कमरे का दरवाजा बंद करके स्टडी करने में लग जाते। किंतु उसी समय एकाएक तूफान की तरह नरेंद्रनाथ आकर के उपस्थित होता। दरवाजे पर जोर-जोर से आघात करता, खटखटाता और कैसे भी करके दरवाजा खुलवाता और फिर अपना गुरु भाई जो है उसका हाथ पकड़ कर के रास्ते पर लेकर खींच के जाता और पिताजी की अनुपस्थिति में पिताजी की एब्सेंस में उसको फिर से वही अग्निमय दिव्य वाणी का श्रवण करवाता जो कि उन्होंने श्री रामकृष्ण देव के मुख से दक्षिणेश्वर में सुनी थी और इस तरह से जब उनका उनका हृदय विगलित हो जाएगा। तब यही गुरु भ्राता को नरेंद्र अपने वराह नगर मठ में ले चला आता। तनी कोख काहार बाड़ी ते उपस्थित हो ते ताहार किु ठीक छिलोना। नरेंद्र कब किसके घर आकर के खड़ा हो जाएगा। किसका ब्रेन वाश करने लगेगा उसका कुछ ठीक नहीं था। कोई शेड्यूल नहीं था। सब अनएक्सेक्टेड रखना है। अनप्रिडिक्टेबिलिटी जो होती है ना यह स्ट्रेटजी का बहुत बड़ा पार्ट है। यदि आप किसी का ब्रेन वाश करना चाहते हैं और एक प्रेडिक्टेबल पैटर्न बना देते हैं तो फिर क्या है? सामने वाला उसका एंटीडोट खोज निकालेगा। इस समय वो आता है तो इस समय मैं घर छोड़ के चला जाता हूं। वो आकर के किसके साथ बात करेगा? किंतु अनप्रिडिक्टेबिलिटी यानी कि कब कहां पे आकर के नरेंद्र खड़ा हो जाएगा? किसका हाथ पकड़ करके उसको खींच के ले जाएगा। कब किसका किस तरह से ब्रेन वाश करना शुरू कर देगा कुछ ठीक नहीं था। तो ऐसा करके करके सर्वप्रथम रामकृष्ण इंस्टट्यूट इंस्टीटशंस जो है उसका फाउंडेशन नरेंद्र ने डाला है। स्वामी विवेकानंद ने डाला है। तो यह तो हो गया कि

आंटपुर यात्रा की पूर्वभूमिका

ठाकुर की महासमाधि के बाद में किस तरह से नरेंद्र की लीडरशिप है। उसने इस अपने गुरु भाइयों को ठाकुर के त्यागी संतानों को इकट्ठा करके रखा। तो यह एक मामला हो गया। अभी इसके बाद में जैसे कि यह चैप्टर का टाइटल है एफमेशन ऑफ फेथ श्रद्धा का दृढ़ीकरण। वह दो घटनाएं जो कि इस चैप्टर में ली गई है वह प्रारंभ होती है। सर्वप्रथम तो बाबूराम महाराज थे ठाकुर के त्यागी संतान स्वामी विवेकानंद के एक गुरु भाई स्वामी भविष्य के स्वामी प्रेमानंद। उनकी माता जी उनको गांव में आने का निमंत्रण देती है। कोलकाता के पास में ही एक गांव है। उसका नाम है आठपुर। तो यह क्रिसमस की छुट्टी में अर्थात कि दिसंबर 1886 अगस्त 1886 में ठाकुर की महासमाधि हुई और उसके कुछ ही महीनों के बाद में अगस्त सितंबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर बस ऑलमोस्ट तीन महीने के बाद में ही 4 महीने के बाद में ही यह बाबूराम महाराज की मां ने यह सभी गुरु भाइयों को आठपुर आने का निमंत्रण दिया। कोलकाता के पास के ही एक गांव। तो यह सभी त्यागी संतान आठपुर जाते हैं। क्रिसमस की छुट्टी के दरमियान। अभी क्या है कि छुट्टी वगैरह उनको कांसेप्ट इनके लिए तो है नहीं। स्टडी वगैरह तो ऑलमोस्ट छोड़ ही दिया है। ठीक कर ही दिया है कि मठ में रहना है। किंतु फिर क्या है कि बाकी सब लोगों के लिए तो छुट्टी का माहौल था। तो इसके लिए वे लोग छुट्टी में वहां पर गए और फिर जो घटना हुई वहां की वह रामकृष्ण संघ के इतिहास में चीर स्मरणीय घटना है। तो उसका अभी हम पाठ करते हैं। युगनायक में से ही स्वामी गंभीरानंद जी महाराज युगनायक स्वामी विवेकानंद किताब के लेखक क्या लिखते हैं? बराह नगर मठेर तो सब प्राथमिक अवस्था चलिते वराह नगर मठ की उस समय प्राथमिक अवस्था ही चल रही थी ऑब्वियसली पता है कि अक्टूबर में अगस्त में ठाकुर की महासमाधि हुई। अक्टूबर में वराह नगर मठ की स्थापना हुई और मठ की स्थापना के बाद में इमीडिएटली तो सब गुरु भाई है। मठ में आकर के रहते नहीं थे। अपने-अपने घर बीच बीच-बीच में चले जाना पड़ता था। नरेंद्र उनको खींच के ले आता था। तो अक्टूबर में स्थापना हुई मठ की और दिसंबर की ही यह घटना है। इसलिए महाराज लिखते हैं कि वराह नगर मठ की उस समय प्राथमिक अवस्था चल रही थी। एवं त्यागी भक्तों दे मध्य संभव तो तारक बढ़ो गोपाल काली और शशि शेखा ने स्थाई भा आन और त्यागी भक्तों में से संभवतः मोस्ट प्रोबेबबली तारक बूढ़ो गोपाल काली और शशि वहां पे नियमित रूप से रह रहे हैं। देखिए बूढ़ो गोपाल अर्थात कि भविष्य के स्वामी अद्वैतानंद जी तारक अर्थात कि महापुरुष महाराज स्वामी शिवनंद रामकृष्ण संघ के द्वितीय परमाध्यक्ष काली अर्थात स्वामी अभैदानंद और शशि अर्थात स्वामी रामकृष्णानंद जिन्होंने दक्षिण भारत में रामकृष्ण संघ के प्रचार का बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया था। तो यह चार त्यागी संतान उस समय मठ में नियमित रूप से रह रहे थे। ठाकुर के 16 त्यागी संतान हमको पता है। विज्ञानानंद जी बहुत बाद में आए। यह भी हमको पता है। तो बाकी जो 15 लोग थे तो 15 लोगों में से सिर्फ चार ही है जो कि अभी वराह नगर मठ में नियमित रूप से रह रहे थे। ऐन समय श्रीक्त तो बाबू रामर बाड़ी आठपुर होते निमंत्रण आशिलो उस समय बाबूराम महाराज के घर आठपुर से निमंत्रण आया बाबूराम महाराज यानी कि ठाकुर के और एक त्यागी शिष्य 16 में से एक बोने शेखाने जाते होबे बो दिन अर्थात कि क्रिसमस को बो दिन कहते हैं तो क्रिसमस की छुट्टी में आठपुर जाना होगा प्रथमे कथा छिलो नरेंद्र नरेंद्र बाबूराम प्रभुति द्विचारी जनजावे पहले तो ऐसी बात थी कि नरेंद्र अर्थात कि स्वामी विवेकानंद और बाबूराम अर्थात कि भविष्य के स्वामी प्रेमानंद इस तरह से दो-तीन ही त्यागी संतान वहां पर जाएंगे किंतु क्रमे जाना जानी होइया बेश एकटी बड़ो दल जमिया गेलो किंतु अभी तो बात तो फैलने ही वाली है कि बाबूराम महाराज के घर से आठपुर से निमंत्रण आया है। उनकी मां मातंगिनी देवी जो कि ठाकुर की बहुत बड़ी भक्त थी। बहुत ही निष्ठावान भक्त थी। उन्होंने आमंत्रण दिया है। तो फिर यह स्वामी जी और बाबूराम महाराज इनके साथ में दूसरे त्यागी संतान भी आने को तैयार हो गए। और आखिर में कितने लोग वहां पर गए? नरेंद्र अर्थात स्वामी विवेकानंद बाबूराम अर्थात भविष्य के स्वामी प्रेमानंद शरद स्वामी शारदानंद शशि स्वामी रामकृष्णानंद तारक महापुरुष महाराज काली अभेदानंद जी निरंजन निरंजनानंद जी गंगाधर यानी अखंडानंद जी और शारदा अर्थात कि स्वामी त्रिगुणातीतानंद जी देखिए कितने हुए नर नरेंद्र बाबूराम शरद शशि तारक काली निरंजन गंगाधर और शारदा नौ नौ ठाकुर के जो 16 डायरेक्ट डिसाइपल है त्यागी संतान मोनेस्टिक डिसाइपल उसमें से नौ त्यागी संतान वहां पे ट्रेन में बैठकर के वहां पर गए एवम शंगे बाया तबला और तानपुरा लते भू लेना और यह नौ त्यागी संतान वहां गाड़ी में ट्रेन में बैठकर के आठपुर जाते हैं और साथ में तबला और तानपुरा लेना भूले नहीं है। हावड़ा स्टेशन हो ते तारककेश्वर गामी गाड़ी ते उठियाई नरेंद्रनाथ गान धरी लेन हावड़ा स्टेशन से तारककेश्वर जाने वाली ट्रेन में बैठकर के ही नरेंद्र ने गान छेड़ा शिव शंकर वयोम वयोम भोला इत्यादि शिव शंकर वयोम वम भोला वगैररा नरेंद्र का जो गला था इतना सुमधुर नरेंद्र गायक था कि हमको तो पता है कि मास्टर महाशय ठाकुर के कथामृत के लेखक तो वह अपनी प्रथम मुलाकात प्रथम ना द्वितीय तृतीय मुलाकात का ही वो जो वर्णन करते हैं उसमें वह लिखते हैं कि ठाकुर के गले का तो गान उन्होंने सुना है और पता है कि इतना सुमधुर जो ईश्वर के भजन ठाकुर गाते हैं कि मन जो है संसार में से विराग होकर के संसार में से निकल कर के संपूर्ण रूप से ईश्वर में आ जाए तो ठाकुर का तो गले का वो स्वर सुना है। किंतु उस दिन उन्होंने देखा कि संध्या का रात अंधेरे अंधेरा हो गया है। संध्या के बाद का समय है। ठाकुर का जो कमरा है दक्षिणेश्वर काली मंदिर में उस कमरे के वरांडे में बाहर में ठाकुर खड़े हैं और उनके सामने नरेंद्र है और नरेंद्र गान गा रहा है। एक के बाद एक ईश्वरीय भजन गा रहा है और ठाकुर समाधि में मग्न हो गए हैं। तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि ठाकुर के बाद में इतना सुमधुर गान गाने वाला उन्होंने नरेंद्र को ही देखा है और उस समय ठाकुर तो भाव समाधि में थे तो चेहरे का जो हास्य है चेहरे पर जो आनंद है जैसे कि दुनिया भर का आनंद इकट्ठा होकर के उनके हृदय में से निकल कर के छलक छलक करके चेहरे पर स्प्लेश हो रहा है तो यह भाव समाधि और संगीत की सुमधुर छवि छवि अपने हृदय में धारण करके मास्टर महाशय अपने घर वापस आए। इस तरह से मास्टर महाशय वो डिस्क्रिप्शन देते हैं। तो नरेंद्र जब गान गाता है, ईश्वरीय भजन गाता है तो जैसे कि देवता स्वयं उनको सुनने के लिए श्रवण करने के लिए स्वर्ग छोड़कर के पृथ्वी पर उपस्थित हो जाते हैं। तो वही नरेंद्र इतना सुमधुर कंठ से गाड़ी में ही गान चालू कर दिया। शिव शंकर वम वयोम भोला वगरा ए भाबे समस्त पथटी गीत बा ओ आनंद रोले मुखरित कोरिया तारा हरिपाल स्टेशन ना मिले इस तरह से यह संपूर्ण ट्रेन जर्नी जो थी समस्त पथ था वो गीत वाद्य और आनंद के रोल से मुखरित करके आनंद से परिपूर्ण करके वह लोग हरिपाल स्टेशन पे पहुंचे एवं शेखा ने होइते 8 माइल पथ घोडार गाड़ी ते छोड़िया शारपुर बे आठ पूरे पहुंचिले और वहां से हरिपाल स्टेशन से घोड़ा गाड़ी में बैठकर के 8 माइल दूसरा पथ था उसमें वो घोड़ा गाड़ी में बिता करके आखिर में संध्या के पहले आठपुर में पहुंचे

आंटपुर के वे आनंदमय दिन

तहां दिग के पिया बाबू रामेर माता श्रीजुक्ता मातंगी िनी देवी आनंद आत्महारा होले उनको प्राप्त करके बाबूराम की माताजी श्रीक्ता मातंगिनी देवी आनंद से आत्महारा हो गई आनंद से भरपूर हो गई वो शकल के पुत्रवत ग्रहण पूर्वक आहार और शयनादि शुभ व्यवस्था कोरियादिल वो सबको अपने पुत्र की तरह ग्रहण किया और सबके लिए आहार और शयन की सुंदर व्यवस्था कर दी जमीदार दार गहे

माँ सारदा का दिव्य प्रेम — रामकृष्ण संघ की नींव में बहती करुणा की धारा

लोक जने अभाव ना थाकी ले ओ इ देर आदर जतने भार तेनी स्वहस्ते तुल्या लेल लेन जमींदार के घर में काम करने के लिए लोगों का कोई अभाव नहीं था। इसके बावजूद यह ठाकुर के त्यागी संतानों के आदर और यत्न करने का जिम्मा उन्होंने अपने हाथों में ले लिया। देखिए यह छोटे से दो सेंटेंस है। इन दो सेंटेंस में कितना सब कुछ आ जाता है। आध्यात्मिक जीवन जो है यह आध्यात्मिक जीवन में सिर्फ यह बात नहीं है कि हम लोग अपनी ईश्वर के प्रति ईश्वर के प्रति आकर्षण की यह जो यात्रा है उसको पार करें। इसके अलावा भी इसके बहुत सारे फैक्टर्स हैं। हमने ऑलरेडी देखा कि ठाकुर मां स्वामी जी श्री रामकृष्ण मां शारदा स्वामी विवेकानंद इन तीनों यह तीन जो है वो हमारी यह जो रामकृष्ण भावधारा है उसके केंद्र में यह तीन विराजमान है। और यह तीनों अह यह ह्यूमन लाइफ जो है, ह्यूमंस यह ह्यूमैनिटी जो है, ह्यूमन स्पीशीज़ जो है, उसके तीन इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट को रिप्रेजेंट करते हैं। अह श्री रामकृष्ण है ही रिप्रेजेंट्स एन इंडिविजुअल्स जर्नी टुवर्ड्स स्पिरिचुअलिटी। एक मनुष्य उसकी ईश्वर के प्रति आत्मज्ञान के प्रति ब्रह्म ज्ञान के प्रति निर्वाण के प्रति आत्म साक्षात्कार के प्रति जो भी शब्द आप यूज करना चाहे उसके प्रति जो उसकी यात्रा है इंडिविजुअल की वो रिप्रेजेंट करते हैं श्री रामकृष्ण कम्युनिटी लाइफ है इट्स रिप्रेजेंटेड बाय मां शारदा क्योंकि देखिए कि हम लोग तो अकेले रहने वाले नहीं है इस जगत में हम लोगों को हमेशा कम्युनिटी में ही रहना है। इवन हम लोग जिन लोगों ने सन्यास ले लिया है, हम लोग भी आश्रम में एक कम्युनिटी में रहते हैं। तो कम्युनिटी लाइफ है किस तरह से लीड किया जाए, उसका सबसे बड़ा उदाहरण है मां शारदा देखिए। मां के जीवन की बातें तो हमने बहुत पढ़ी कि किस तरह से घर में रहा जाए। परिवारजनों के साथ में रहा जाए। किस तरह से समाज में रहा जाए। किंतु मां ने जो वो आदर्श स्थापित किया है ना वो इतना उच्च आदर्श है कि कभी-कभी हम डर जाते हैं पढ़कर के सुनकर के कि क्या हम उस आदर्श को पहुंच भी पाएंगे कि नहीं। देखिए कि मां का जीवन का मां के जीवन के आखिरी दिन चल रहे थे। यह 1920 मां की महासमाधि हुई 1920 में। तो यह 1920 के आसपास की ही घटना है। हमको पता है कि राधु मां मां शारदा देवी राधु को अपनी पुत्री की तरह उसका जतन करके उसको बड़ी कर रही थी। जब ठाकुर की महासमाधि हुई और मां ने सोचा कि मैं किस तरह इस संसार में रह पाऊंगी। किस तरह से ठाकुर ने तो कहा है कि मैंने और क्या किया है? तुमको इससे भी और कहीं बहुत कुछ ज्यादा आगे करना है। तो मां यह सोच रही थी कि मैं किस तरह से किंतु रहूं इस संसार में इस पृथ्वी पर। ठाकुर तो चले गए। प्राण के देवता तो चले गए। जिनके साथ में उन्होंने अपना जीवन सर्वस्व जिनको कि समर्पित कर दिया था। वह तो चले गए। अभी मैं किस तरह पृथ्वी पर रहूं, किस तरह से पृथ्वी के निवासियों का आध्यात्मिक कल्याण करूं। वह बात जब मां के मन में चल रही थी। उस समय ठाकुर ने ये जो उनके भाई की पत्नी ने मां के भाई की पत्नी ने राधु को जन्म दिया और राधु वो पागली मामी वही पागली मामी। वो पागली मामी सही में पागल थी। अपनी लड़की की संभाल नहीं रख रख पाती थी। तो मां ने उस लड़की को अर्थात राधु को अपनी खुद की लड़की के रूप में बड़ा करने का जिम्मा लिया और उसी समय ठाकुर प्रकट होकर कहते हैं कि यही है योग माया और उसका आश्रय ले रहो। यानी कि मां का संसार के प्रति एक माया का आकर्षण होना चाहिए। माया का सब यदि रास्ता टूट गया, माया के यदि सभी बंधन टूट गए तो फिर मां संसार में नहीं रह पाएगी। पृथ्वी पर नहीं रह पाएगी। जो वैुंठ लोक है जहां पे कि मां का सही स्वरूप वहां पर वो मां चली जाएगी। तो यह राधु का राधु के प्रति माया का आश्रय रखकर के मां ने जीवन धारण किया है। तो वह 1900 1900 साल की घटना है कि जबकि राधु का जन्म हुआ था तब से लेकर के मां राधु को अपनी बच्ची की तरह ही बड़ी कर रही थी। किंतु यह बात है 1920 की। राधु की उम्र ऑलमोस्ट 20 साल की हो गई है। राधु की शादी भी हो गई है। राधु का बच्चे का जन्म भी हो गया है। किंतु जिस तरह से राधु की मां पागल थी तो वैसे ही राधु के भीतर में राधु अर्थात राधा रानी मां उसको प्रेम से राधु करके पुकारती थी। तो यह राधु के भीतर में भी अपनी मां का पागलपन का कुछ ना कुछ असर शायद आ गया होगा और फिर वो मां शारदा को जिस तरह से परेशान करती थी जिस तरह से दुर्व्यवहार करती थी कि ये उद्बोधन की यह घटना है साधु है बाकी जो डिवोटी है वे लोग एकदम नाराज हो जाते गुस्सा हो जाते थे क्रोधित हो जाते थे किंतु क्या करें राधु के प्रति मां का तो मातृभाव है आप अपनी मां से उसकी बच्ची को कैसे छीन सकते हैं? भले ही चाहे यह बच्ची अपनी मां के प्रति कितना ही दुर्व्यवहार क्यों ना करती रहे। तो यह घटना है। मां मृत्यु शैया पर सोई हुई है। बीमारी तो बढ़ती ही जा रही है। देश विदेश से कितने भक्त हैं जो कि मां के दर्शन के लिए वहां पर उद्बोधन में आकर के खड़े हुए हैं। स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ की स्थापना की तो ऑलरेडी देश विदेश में हमारी जो ब्रांचेस है वह फैल गई है। और सबके लिए तो मां साक्षात देवी समान है। साक्षात जगत धात्री जगत जननी समान है। और मां के जीवन की आखिरी बीमारी चल रही है। सब जगह से साधु ब्रह्मचारी भक्त देश विदेश के सब लोग यह आशा रख के उद्बोधन में आए हैं कि मां का दर्शन हो। मां का आखिरी आशीर्वाद प्राप्त हो। किंतु मां के खुद के घर में दूसरी ही लीला चल रही है। यह राधु पागल की तरह मां को गाली पर गाली दी जा रही है। अभी क्या है कि राधु का तो छोटा बच्चा है। तो राधु की खुद की तो कैपेसिटी नहीं थी। अपने बच्चे की चिंता करने की उसकी संभाल रखने की तो मां ने कहा होगा किसी ओल्ड लेडी डिवोटी को कि उसके बच्चे की संभाल रखना तो बस राधु जो जो क्रोध आया वो मां को गाली के बाद गाली दी जा रही है और इतनी खराब खराब गालियां कि जो यह स्मृति कथा लिखते हैं वे लोग कहते हैं कि हम लोग लिख नहीं पाएंगे इस तरह का राक्षसी पैशाचिक व्यवहार राधु मां के साथ में कर रही है और मां चुपचाप सब कुछ सहन करते जा रही है। सहन करते ही जा रही है। तो यह लोग कहते हैं कि किस तरह की आपकी यह दिव्य शक्ति होगी कि इतना भयानक दुर्व्यवहार आप सहन कर पाएंगे। यहां पे देश विदेश के हजारों हजारों भक्तों साधुओं के लिए मां साक्षात देवी है। यदि एक आदेश करेगी तो वे लोग अपने प्राण न्योछावर कर देंगे। और यही देवी के प्रति यह लड़की है। पागल लड़की उनको ऐसी भयानक गाली दे रही है कि हम लोग सुन नहीं पाएंगे और किसी को ऐसी एक गाली भी देगी ना उसकी हम पिटाई कर लेंगे और मां को तो ऐसी हजारों गालियां दे जा रही है और मां सब कुछ चुपचाप सहन करती है। आखिर में किंतु ऐसा बोल दिया राधु ने तुम मरो। तुम्हारे मुंह में आग लगे और तुम मरो। ऐसा करके जब बोला तब मां को गुस्सा आ गया। मां ने नाराज होकर के कहा कि देखो कि मैं जब मरूंगी ना तो तुमको पता चलेगा कि तुम्हारी क्या अवस्था होती है। वैसे ही तुम पागल हो। तुम्हारी रक्षा तुम्हारी संभाल ये तुम्हारी केयर यह साधु लोग इसीलिए करते हैं कि क्योंकि तुम मेरे रक्षण में हो। जिस दिन मैं चली जाऊंगी याद रखना कि तुम मरोगे भी ना तो कोई तुमको देखने वाला नहीं होगा। कोई तुमको खाना खिलाने वाला नहीं होगा। पता नहीं तुम्हारे भविष्य में कितनी लातें पड़ी है। कितना तुमको कितनी गालियां पड़ी है तुम्हारे भविष्य में। तुमको पता नहीं यह बात। मां ने आखिर में यह बात कह दी। देखिए कि किंतु यह बात कब कही दिन आफ्टर डेज आफ्टर डेज राधु मां को गाली दिए ही जा रही है। मां का अपमान किए ही जा रही है। उसके बाद में मां को ऐसा बोलना पड़ा। किंतु देखिए मां ने यदि ऐसा एक आदेश किया होता अपने त्यागी संतानों को कि इसको निकालो यहां से तो एक क्षण में विदिन वन सेकंड ये जितने भी साधु सन्यासी भक्त थे वो राधु को पकड़ कर के कहां उसको फेंक देते मां को एक आदेश मात्र करना था वो आदेश मां ने कभी नहीं किया आखिरी घड़ी तक राधु मां के साथ में रही तो यह है कि संसार ये जो कम्युनिटी लाइफ किस तरह तरह से लीड करना भयानक सहनशक्ति होनी चाहिए। यदि सहनशक्ति करुणा प्रेम नहीं होगा तो यह कम्युनिटी लाइफ हम लीड नहीं कर पाएंगे। तो यह एक जो बात है कि ठाकुर का जो आध्यात्मिक साधना का वो जो रिप्रेजेंट वो करते हैं। ठाकुर की आध्यात्मिक साधना की कहानियां भरपूर है। प्रचंड तपस्या उन्होंने की है। तो वह हमारे लिए ईश्वर प्राप्ति के लिए या तो फिर निर्वाण प्राप्ति के लिए आदर्श है। ठाकुर कम्युनिटी लाइफ के आदर्श है मां शारदा और स्वामी विवेकानंद है ह्यूमन सिविलाइजेशन एज ए होल किस तरह से स्टडी करें किस तरह से इंप्रूव करें स्वामी जी का पूरा कंप्लीट वर्क से वी नो दैट सो यहां पे देखिए कि ठाकुर ने रामकृष्ण संघ ने यह जो एक बनाया है एक पूरा पैकेज एक कंप्लीट पैकेज आज की लैंग्वेज में कहेंगे कि आध्यात्मिक साधना किस तरह से करनी है कम्युनिटी लाइफ में किस तरह से रहना है और फिर ये ह्यूमंस सिविलाइजेशन है उसको किस तरह से स्टडी करना है उसको किस तरह से इंप्रूव करना है तो यहां पे यह जो मातंगिनी देवी है बाबूराम महाराज की मां देखिए गंभीरानंद जी क्या कहते हैं कि जब यह त्यागी संतान आठपुर में आए तो मातंगिनी देवी आनंद से आत्महारा हो गई अर्थात कि आनंद से भरपूर हो गई और सिर्फ बाबूराम ही उनका एक लड़का है ये नौ लड़कों में से किंतु नौ लड़कों को उन्होंने उन्होंने बाबूराम की तरह ही अपने पुत्र संतान की तरह ही स्वीकार किया और उन सब की खातिर करने के लिए वह तो जमींदार का घर था। धनपति का घर था। 10 नौकरों को लगा सकती थी वो मातंगिनी देवी। किंतु 10 नौकरों को नहीं लगा के अपने खुद से उनकी सेवा उनकी केयर करने का जिम्मा उन्होंने ग्रहण किया। यह कब संभव है कि जबकि ये हम लोग अपने को रामकृष्ण भावधारा में ढाल देंगे। यह स्पिरिचुअलिटी है। यह हृदय की करुणा है। कम्युनिटी लाइफ और यह जो सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग है, उससे जब हम भरपूर हो जाएंगे तभी कोई मां या तभी कोई स्त्री या जो पराए के लड़के हैं उनको अपने लड़के की तरह स्वीकार करेगी। हम लोग यदि अपने रिलेटिव्स के वहां पर जाते हैं। मुझे याद है मैं मेरी मां के घर जाया करता था। गांव में था। तो अभी क्या है कि मेरी मां का जो मां के पिताजी का घर अर्थात कि मेरी मां का मोसाल जिसको कहते हैं ससुराल और मोसाल ऐसा दो होता है ना मां का पिताजी का घर और जो हस्बैंड का घर होता है तो मेरे मां के पिताजी के घर में छुट्टियों में जाया करता था। तो मेरी मां की मां वो हमको देखकर के मैं था और फिर हम मेरे जैसे तीनचार लड़के थे। हमको देखकर के इतनी आनंद से आत्महारा यह जो लिखा है ना कि आनंद से आत्महारा वही यह जो आठपुर गांव में जाते हैं हमें भी गांव में जाता था मेरी मां की मां मेरी नानी वो देखकर के इतनी आनंद से आत्महारा हो जाती अपने हाथों से खाना बना के खिलाती अपने हाथों से जतन करती किंतु वो क्यों करती क्योंकि मैं हूं उनकी लड़की का पुत्र इसलिए अभी मैं और किसी के घर जाऊंगा तो थोड़ी ना मुझे इस तरह से इतना जतन करके और कोई जो है स्त्री वृद्ध वृद्धा स्त्री मुझे इस तरह से अपने पोते की तरह ग्रहण करेगी। किंतु यहां पर ठाकुर ने वह जो एक कम्युनिटी लाइफ जो क्रिएट किया है अपने भक्तों के भीतर में इतना स्ट्रांग और पावरफुल है दिव्यता से भरा हुआ है कि इवन परायों के लड़के को यह जमींदार की पत्नी है जो कि घमंड से तो भरी होते हैं ना जमींदार तो उस समय के और जमींदार की पत्नी यह बाकी लड़कों को अपने खुद के संतान के रूप में ग्रहण करती है। दो-तीन सेंटेंस में भी देखिए कि कितना डीप फिलॉसोफिकल सिग्निफिकेंस है। इसके बाद में आठपुर में क्या हुआ वह सब अभी हम कल देखेंगे आज ही। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: क्या हमें माँ सारदा की सहनशक्ति की कहानियों से प्रेरणा लेकिन हमारी अपनी सहनशक्ति कभी इतनी ज्यादा नहीं होने वाली है. माँ की सहनशीलता क्या हमारे लिए केवल श्रद्धा और प्रशंसा के विषय होकर रह जाएंगे?

वो ठाकुर बीच-बीच में जो नॉनवेज बातें करते हैं ना उसमें से एक कहते हैं आ जदी दांड मुतवो तोरा घरेघरे मुतवी [हंसी] मैं यदि खड़ेखड़े मुतूंगा पेशाब करूंगा तो तुम लोग घूमते घूमते पेशाब करोगे। [हंसी] अर्थात ठाकुर कहते हैं मैं जी 100 आना करूंगा तो तुम लोग एक आना करोगे। यानी कि मां ने जो आदर्श दिखा दिया है उसका यदि 1% भी हम लोग कर पाए तो हमारा जीवन धन्य है ना। मां का तो अनुकरण करना तो असंभव है। मां के लेवल पर जाना भी असंभव है। किंतु क्या इन्होंने एक आदर्श दिखा दिया है। सो वी हैव टू रीच दैट आदर्श यथासंभव यथाशक्ति।

हमें सहनशील तो होना चाहिए, लेकिन कम्युनिटी स्तर पर — सिविलाइज़ेशन (सभ्यता) स्तर पर नहीं

हां ऑफ कोर्स ऑफ कोर्स। नो नो नो नो नो ऑफ कोर्स नॉट ऑफ कोर्स नॉट। अब देखिए कि भारत को साधु बनाने का दो लोगों ने ट्राई किया। बुद्ध ने ट्राई किया तो हजार साल की गुलामी आ गई। माने देश को साधु बनाने का। गांधी जी ने ट्राई किया तो भारत के पार्टीशन हो गए। राइट? तो वो देश को तो साधु नहीं होना है ना। देश पर आक्रमण होता है तो उसका मुंहत जवाब देना है। गीता क्या है? रामायण क्या है? बहुत सारे लोग बोलते हैं। म ये आश्चर्य की बात होगी। मैंने सुना है। कहते हैं कि असली राम रामायण के नहीं है। योग वाशिष्ट के हैं। असली कृष्ण वो महाभारत के कुरुक्षेत्र वाले नहीं है। वो वृंदावन वाले भगवत के हैं। अरे भाई वो भागवत के कृष्ण भी कृष्ण है और कुरुक्षेत्र के कृष्ण भी कृष्ण है। वो योग वाशिष्ट के राम भी राम है और वो रावण का संहार करने वाले राम भी राम है। ये तो अपनी ट्रेडिशन है। उसको छोड़कर के कहां वो पागलपन चालू कर दे रहे हो? अब देखिए ठाकुर को वह जो हवलदार जिसने कि सोचा कि ठाकुर वह मथुर बाबू का प्रिय पात्र होने के लिए यह सब नौटंकी करते हैं तो ठाकुर को लातों से मारा तो ठाकुर कहते हैं कि नहीं उसको छोड़ दो उसको क्षमा कर दो। अभी यही बात स्वामी जी या तो फिर आप महावीर हनुमान का ही उदाहरण ले लीजिए ना कि मां वो सीता का अपहरण करके रावण ले गया तो जाकर के रावण का वो जो राजमहल है उसकी जो नगरी है उसको जला के वापस आ गया है तब उसको थोड़ी ना छोड़ना है। यानी वो जो इंडिविजुअल केस में ठीक है वो कम्युनिटी लाइफ में डिफरेंट हो जाता है। सिविलाइजेशनल लेवल पे बिल्कुल अलग हो जाता है।

कहानी: कैसे माँ सारदा एक स्थिति में प्रेम सिखाती हैं और दूसरी में प्रहार

देखिए कि ऑन हिज ऑन देयर ओन वे प्रत्येक ठाकुर मां स्वामी जी ने तीनों को रिप्रेजेंट किया है। ऐसा नहीं है कि एक्सक्लूसिव स्पिरिचुअल या एक्सक्लूसिव कम्युनिटी आप एक-एक को भी स्टडी करेंगे ना आपको होल वो कंप्लीट स्पेक्ट्रम देखने को मिलेगा। वैसे है कि थोड़ा सा प्रॉपर स्टडी करना पड़ेगा। अब मां के जीवन में ही देख लीजिए सुंदर म देखिए किस तरह से ऑोजिट घटनाएं चलती है। अह किस तरह से मां कॉन्टेक्स्ट गियर चेंज करती है। हमको पता नहीं चलता। थोड़ा सा स्टडी करने से पता चलेगा मां गियर चेंज कर रही है। अ एक घटना सुंदर घटना कि ये वर्दा महाराज वो अभी क्या है वो वहां से आए हैं ना क्वालपाड़ा स्वदेशी स्वदेशी वुमन में घूम रहा है। तो अभी ये राधु माकू ये मां के साथ में जो रहती थी कहा कि हमारे लिए नए वस्त्र लेकर आओ। तो इन्होंने स्वदेशी मिलके वस्त्र लेकर के गए। तो वे दोनों नाराज हो गई कि इस अभी क्या है मोटा खद्दर का कापड़ होता है तो ऐसा नहीं वह पतला वाला वो माने स्मूथ सिल्क जैसा चाहिए कॉटन का तो वर्दा महाराज नाराज होकर बोलते हैं अरे वो तो विदेशी मिल का कपड़ा है वो थोड़ी ना पहना जाता है स्वदेशी पहनो ऐसा बोल के उनको डांट रहा है तब मां कहती है कि अरे बेटा उनको जो चाहिए ले दो ना उसमें स्वदेशी विदेशी का क्या बात है ऐसा कहने के बाद में मां कहती है ओरा वो तो अमर छे माने ये जो ब्रिटिश लोग हैं वो भी तो मेरे संतान है उसमें इस तरह का तुम क्यों भेद करते हो यह स्वदेशी है, विदेशी है। और ऐसा कहने के बाद में महाराज खुद लिखते हैं, वरदा महाराज खुद लिखते हैं। इसके बाद में जब इस तरह से मिल से कोई कपड़ा लाना है या इन लड़कियों के लिए कुछ ले आना है तो मां मुझे नहीं कहती थी और किसी को कहती थी। यानी कि उनकी भावना को ठेस ना पहुंचे। क्यों? वर्दा महाराज भी तो कम नहीं है ना। मां के साथ में रह के ये तो गियर चेंज करना ये लोग भी सीख गए हैं। तो वो कहते हैं कि कुछ समय के बाद में ये राधु माखु नलिनी उनका मन समझ करके उनकी इच्छा के अनुसार वो परचेस करना वो मेरा ऐसा सुंदर ऐसा हो गया था कि सब लोग कुछ भी परचेस करना है तो मेरे थ्रू करवाते थे। यानी देखिए अभी जो पक्के स्वदेशी वाले वो अभी विदेशी मिल का कपड़ा इन लोगों के लिए खरीदते हैं। तो यह तो मां का एक स्वरूप हुआ। दूसरा स्वरूप कि जयराम भाटी के पास के ही गांव में से एक रेवोल्यूशनरी एक क्रांतिकारी था। वह पकड़ में नहीं आ रहा था। तो पुलिस वालों ने क्या किया? उसकी गर्भवती पत्नी और उनकी बहन दोनों को पकड़ करके रास्ते से चला करके वो पुलिस स्टेशन ले गए। अभी उस समय की जैसा था स्त्रियों के लिए वो चेहरा छुपाना वो पालकी में जाना वगैरह लोगों के सामने नहीं आना। तो जब बाजार में से चला करके उनको अपमान करके पुलिस स्टेशन ले गए दो लेडीज को इनोसेंट लेडीज को तब मां का जो क्रोध है ऐसा भूक उठा मां ने चिल्ला करके कहा कि वहां पर कोई लड़का नहीं था मर्द नहीं था जो कि पुलिस वाले को दो चांटा मार के लड़कियों को छुड़ा के ले आता। अच्छा यह तो मां का रुद्र स्वरूप सब लोग डर गए। उसके बाद में शाम को खबर आया कि दोनों इनोसेंट लेडीज को छोड़ दिया है। तो वहां पर मामला खत्म हुआ। रात की बात है जो म की फ्रेज जो है पंच लाइन जो है रात को मां के त्यागी संतान मां के साथ में बैठे हुए हैं। उस समय मां कहती है कि देखो ये विक्टोरिया का पुण्य जितने दिन चला उतने दिन ये ब्रिटिश शासन चला भारत में। किंतु अभी उसका पुण्य खत्म हो गया है और ब्रिटिश शासन यहां से जाएगा। सही में कि इस घटना के कुछ ही समय बाद में भारत में यह जो फ्रीडम मूवमेंट स्टार्ट हुआ और यह फिर ब्रिटिश लोगों को जाना पड़ा। यानी कि मां भी ऐसे गियर चेंज करती है कि जहां पे वो अपने बच्चों के रूप में उनको लेती है वहां पे उनके प्रति पूरी सहानुभूति स्वदेशी विदेशी वाली बात नहीं चलेगी वहां पे। किंतु जब भारत की अस्मिता पे आघात होता है तो फिर नहीं। अभी तुम लोग निकलो यहां से।

संघ में भक्तों के बीच सौहार्द का अद्भुत वातावरण

अब अपने कोई भी आश्रम में जाएंगे ना देखेंगे कि भक्तों के बीच में जो एक सौहार्द प्रकट होता है। कोई कोई भक्त कहते हैं कि महाराज जी अभी हमारे रिलेटिव्स के साथ में बात करना उनके घर जाना अभी हमको अच्छा ही नहीं लगता है। हम लोग तो आश्रम में ही बैठे रहते हैं दिन भर। आश्रम का ही काम करते हैं। आश्रम के साधु ही अभी अपने हो गए हैं। आश्रम के भक्त अभी अपने हो गए हैं। अपने वो जो ठाकुर वो रामलाल के बारे में कहते हैं ना कि अपने हुए पराए पराए हुए अपने। आपनार हो पर होो आपनार तो बिल्कुल रामकृष्ण संघ में ये म ठाकुर ने बस यही एक स्टेटमेंट ही दिया है कि आखिरी आखिरी समय में कि वैसे बहुत सारी घटनाएं हो चुकी थी बाय दैट टाइम कि ठाकुर जब रामलाल को कहते हैं कि तुम अपनी खुड़ी की संभाल रखना अपनी चाची की यानी कि मां शारदा की तो रामलाल कहता है कि उनको जहां पर रहना है वो रहे तो ठाकुर नाराज हो गए समझ गए कि उसके मन का भाव क्या है? तो बोला कि तुम पुरुष हुए क्यों हो? तुम मर्द मानुष हुए क्यों हो? अपने घर की स्त्रियों की यदि संभाल नहीं रखोगे तो ठाकुर को पता चल गया था। तो ठाकुर और फिर मां की संभाल रखने वाले कौन थे जिसके पर ठाकुर को सही भरोसा रहता। तो यही सब त्यागी संतान यानी कि दो तरह से एक तो उनकी खुद की सेवा तो ये लोग कर ही रहे हैं मच बेटर देन रामलाल। किंतु उनका जो सबसे बड़ा जो टेंशन था आखिरी समय में यदि एक रिस्पांसिबिलिटी रहा होगा तो मां के प्रति रहा होगा। और उनको स्पष्ट रूप से समझ आ गया था कि रामलाल जो है मां की संभाल नहीं रखने वाला है। मां की संभाल रखने वाले यह त्यागी संतान ही है। सो ये ठाकुर कहते हैं कि अपनार होलो पर पर होलो अपना मेरे थे वो पराए हो गए। पराए है अपने हो गए। ओम