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meditation ·

ध्यान में आने वाली बाधाएँ और उनके समाधान 23 jun 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः आज का टॉपिक है स्वामी विवेकानंद का लाइफ जीवन। इसको स्टार्ट करने से पहले किंतु एक दो पॉइंट हम देखते हैं। मैं इस वीकेंड में जो कुछ सोच रहा था वो जैसे हम लोगों को हैबिट होती है बैठे-बैठे सोचने की। तो जो एक पॉइंट था मेरे मन में

ध्यान में आने वाली बाधाएँ और उनके समाधान

जैसे हमने उस दिन थोड़ा सा डिस्कस किया था जब हम संतान भाव और मातृभाव की चर्चा कर रहे थे। कि वेदांत एक तरह से यदि देखें तो किस तरह से कर्म के सिद्धांत के अनुसार बना है। इस अर्थ में कि यदि हम बुरा कर्म करेंगे तो उसके जो बुरे संस्कार हैं वह अपने मन के ऊपर में रह जाएंगे। और यदि अच्छा कर्म करेंगे तो उसके जो अच्छे संस्कार हैं वह मन में रहेंगे। और यदि उपासना करते हैं यानी कि अच्छे और बुरे इन दोनों कर्मों के परे जाने की प्रयास करते हैं तो यह जो अच्छे कर्म और बुरे कर्म और उसके जो अच्छे संस्कार और उसके बुरे संस्कार इन दोनों से हम परे जाकर के संस्कारों को ही जड़ मूल्य से हम नष्ट कर दे सकते हैं। यानी कि एक फिलोसोफिकल डिस्कशन था पूरा हमने किया था और हमने यह भी देखा कि किस तरह से हम यदि मां के ऊपर में मान और अभिमान करते हैं तो किस तरह से मां की कृपा से ही जैसे कि यह सब संस्कार नष्ट हो जाएंगे। इसके बारे में और एक कुछ है। जैसे कि अभी मैं यह तो हो गया एक डिस्कशन। किंतु यदि हम सुबह को आंख बंद करके थोड़ी देर बैठते हैं तो हमारा एक्सपीरियंस क्या कहता है? अदर देन यह जो पूरा फिलॉसोफी है बिय्ड फिलॉसोफी अपना एक्सपीरियंस क्या कहता है? इन प्रैक्टिकल लाइफ। अभी जैसे कि आज सुबह की ही बात मैं बताऊं। मंदिर में मंगल आरती में मैं गया था। वहां से आकर के अपने कमरे में मैं बैठा था। तो आंख बंद करके ही क्या होता है कि दुनिया भर के जितने भी विचार है, जितना भी भविष्य की चिंता है, भूतकाल की पास्ट जीवन की जितनी भी रिग्रेट्स है, या तो फिर आज का जो भी कार्य है, वह सब एक साथ में इकट्ठा होकर के अपने सर के भीतर में मंडराने लगता है। कभी किसी पर गुस्सा आता है, कभी किसी के साथ नाराजगी हो जाती है। कभी किसी के साथ में ऐसा लगता है कि और ज्यादा बातें करें तो यह जो है पूरा आंख बंद करके बैठने से ही इस तरह से विचारों का तुम युद्ध धमा युद्ध या तो कहेंगे कि एक स्टम एक प्रचंड झंझवात की तरह एक तूफान की तरह यह विचार जो है अपने मन में उठते हैं और कहां पे 15 20 मिनट चला गया पता ही नहीं चलेगा और फिर थोड़ा सा मैं मेहनत करता हूं कि अरे मैं तो जप करने को बैठा हूं इस सुबह को इस शुभ मुहूर्त में ब्रह्म मुहूर्त में मैं तो यह शुभ क्षण में यह आश्रम है। इतना सुंदर वातावरण है और इतना माने ठाकुर ने मुझे ओपॉर्चुनिटी दिया है ठाकुर के नाम का चिंतन करने का। तो ऐसे ही यह 10 मिनट इधर 10 मिनट इधर करके मैं फेंक दे रहा हूं। जैसे कि यह समय की कोई कीमत ही नहीं है। ऐसा क्यों है? इससे मुक्ति पाने के लिए मुझे क्या करना होगा? तो यदि हम एक कन्वेंशनल थिंकिंग करें कि मेरे मन में यह जो पिछले जो कुछ भी मैंने कर्म किए हैं वह संस्कार अभी भी बैठे हुए हैं और इन संस्कारों को जैसे-जैसे मैं उपासना करके करके क्षय करता जाऊंगा। जैसे-जैसे मैं साधन भजन करके जप ध्यान करके यह स्वाध्याय करके यह चिंतन मनन स्मरण मनन निधि्यासन करके कर्म योग करके भक्ति योग करके ज्ञान योग करके यह जो जितनी भी साधन पद्धति विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूप से जो दर्शाई गई है उसका मैं अनुष्ठान करूंगा। उसको मैं अपने जीवन में उसका अप्लाई करूंगा। तो धीरे-धीरे क्या होगा कि यह जो संस्कार है वह क्षय होते जाएंगे, क्षीण होते जाएंगे। तो वह तो एक है। किंतु फिर हमने जिस तरह से ठाकुर की बात सुनी ठाकुर क्या कहते हैं कि शेर का मुखौटा पहन करके एक आदमी हमको डराने को आता है। फिर जैसे ही यह आदमी हमारे हमको पता चल गया कि यह तो शेर नहीं है। यह तो मेरा मित्र ही है। जो कि यह मुखौटा पहने हुए हैं, मास्क पहने हुए हैं। तो जैसे ही हमने उसको पहचान लिया, वह हंसते-हंसते चला जाएगा वहां से जाकर के और किसी को डर दिखाएगा। तो यहां पर बात ऐसी नहीं है कि शेयर के साथ में युद्ध करके शेयर के साथ में फाइट करके आपको आपके भीतर में वह स्ट्रेंथ होना चाहिए। उस स्ट्रेंथ की वजह से शेयर के साथ में आपने फाइट किया। शेयर को हराया उसके ऊपर का मुखौटा जबरन जोर पूर्वक जबरदस्ती से हमने हटाया तब कहीं पता चला कि यह तो अपना मित्र है। तो इस तरह से नहीं जैसे ही पहचान लिया वैसे ही वह भाग जाएगा। अर्थात कि करना क्या है शेयर को भगाने के लिए हमको ज्ञान चाहिए नहीं कि कर्म वि इज वेरी इंपॉर्टेंट देखिए अब जैसे कि ठाकुर का दूसरा उदाहरण है कि एक अंधेरा कमरा है उसमें आपको बत्ती जलाए एक मान लीजिए 1000 साल से कमरा अंधेरा है तो इसके भीतर में बत्ती जलाएंगे तो क्या धीरे-धीरे करके वह अंधेरा वहां से जाएगा ना कि जैसे बत्ती जलाने से ही क्षण भर में ही अंधेरा गायब हो जाएगा। तो यहां पर क्षण भर में ही गायब हो जाएगा। ऐसा नहीं है कि 1000 साल का अंधेरा आपको और 200 300 साल तक घिसते घिसते धोते धोते वहां से निकालना है। ऐसा नहीं। यह दो उपमाएं हो गई। मान लीजिए एक घर के भीतर में मान लीजिए कि काली लगी हुई है। अब जैसे कि कीचड़ है, कचरा है, कूड़ा है, बहुत सारा पड़ा हुआ है। तो इस घर को यदि आपको कीचड़ कचरे से मुक्त करना है तो आपको इसको धोना होगा, क्लीन करना होगा, झाड़ू लगाना पड़ेगा, मोपिंग करना पड़ेगा, बहुत कुछ करना पड़ेगा। तब कहीं जाकर के यह कमरा कीचड़ से, गंदगी से मुक्त होगा। तो यहां पर आपको एक्चुअल कर्म करना है। किंतु एक ऐसा कमरा वैसे तो क्लीन ही है किंतु बस उसमें अंधेरा है क्योंकि प्रकाश का कोई किरण उस कमरे में नहीं आ रहा। तो जैसे ही आपने खिड़की दरवाजे खोल दिए वैसे ही कमरे में प्रकाश आ गया। तो और जैसे ही प्रकाश आया वैसे ही हमको पता चल गया कि यह कमरा तो क्लीन ही है। उसमें आपको और कुछ करने की जरूरत नहीं थी। अंधेरे की वजह से शायद आपको ऐसा दिखता होगा कि कूड़ा कचरा है। तो देखिए कि यह दोनों उपमा है। एक है कर्म के माध्यम से हमको मुक्ति प्राप्त करनी है। दूसरा है कि ज्ञान के माध्यम से मुक्ति प्राप्त करनी है। कर्म के माध्यम से मुक्ति किस तरह से प्राप्त करेंगे कि एक्चुअल कमरे के भीतर में कचरा पड़ा हुआ है। कूड़ा पड़ा हुआ है। उसको आपने मेहनत करके जैसे कि हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में थे तो हमको संडे क्लीनिंग एक होता था। आप सोचेंगे कि संडे को क्लास नहीं होते हैं। वैसे प्रतिदिन पांच क्लास होते थे। तो हम उसको पंचतपा कहते थे। तो पंचतपा में भी यदि मान लीजिए सर्वप्रियनंद जी का क्लास है, भजनानंद जी का क्लास है तो वह पंचतपा जैसा नहीं लगता था। किंतु बाकी सब क्लास लगते थे। एटलीस्ट मुझे लगते थे। दूसरों का पता नहीं। तो ये प्रतिदिन सप्ताह के छह दिन क्लास है। सप्ताह में एक दिन संडे को क्लास नहीं है। तो आप सोचेंगे कि अच्छा तो बढ़िया मजे से हम वहां पे इधर-उधर घूमेंगे। किसी सीनियर साधु के साथ में वार्तालाप करेंगे। पुराने दिनों की बातें करेंगे या तो फिर लाइब्रेरी में जाकर थोड़ा बैठेंगे। वहां पे वह बास्केटबॉल कोर्ट है। वहां पर जाकर बास्केटबॉल खेलेंगे। वॉलीबॉल बास्केटबॉल नहीं वॉलीबॉल। तो ऐसा कुछ करेंगे क्या? या तो फिर दो-तीन ब्रह्मचारी इकट्ठा होकर चाय बाय बनाएंगे और गप लगाएंगे। ऐसा कुछ करेंगे क्या? नहीं। उस दिन आपको क्लीनिंग करना है क्योंकि देखिए कचरा वगैरह तो आता ही है कमरे में और फिर वहां पर नौकर वगैरह तो कोई है नहीं। जो कुछ भी करना है साधुओं को ब्रह्मचारियों को ही करना है। तो वहां पर संडे क्लीनिंग करना पड़ता था। और संडे क्लीनिंग फिर कभी-कभी इतना हैवी हो जाता था कि फिर ऐसा लगता था कि इससे बेटर है कि हम क्लास में जाकर बैठते हैं। तो वहां पे कुछ काम तो नहीं करना पड़ता। सिर्फ सुनना ही तो है। तो ऐसा यदि कमरे के भीतर में सही-सही कूड़ा कचरा पड़ा हुआ है तो आपको मेहनत करके उसको क्लीन करना है। झाड़ू लगाना है। फिर डस्टिंग करना है। वो जो स्पाइडर वेव्स होती है उसको निकालना है। मोपिंग करना है। सब कुछ करना है। आपको एक्चुअली कर्म करना पड़ेगा उसको क्लीन करने के लिए। किंतु दूसरा कमरे में सिर्फ अंधेरा ही है। हमको पता नहीं है कि कचरा है कि नहीं। जैसे ही खिड़की दरवाजे खोल दिए तो वैसे ही पता चला कि प्रकाश जैसे ही भीतर में गया तो पता चला कि यह कमरा क्लीन ही है। अंधेरे की वजह से हमको पता नहीं चल रहा था। तो यह हो गया ज्ञान। हमको नॉलेज प्राप्त हुआ। हमको ज्ञान प्राप्त हुआ। हमको पता चला। यह पता चलना कि हां इसके भीतर में कचरा है ही नहीं। वो बस खिड़की दरवाजा ही खोलना था। प्रकाश थोड़ा डालना ही था कि पता चल गया कि कचरा नहीं है और दूसरे में कचरे को एक्चुअली मेहनत करके निकालना है। तो यह जो कर्म का जो सिद्धांत है वह हमको ऐसा कहता है कि हमारे भीतर में पाप या तो फिर यह दुष्कर्म का जो दुष्ट यह जो चरित्र है या तो फिर यह जो दुः ये जो अशुभ संस्कार है वह इस तरह से बैठे हुए हैं कि आपको कितना ही मेहनत करके इसको हटाना है। और दूसरा सिद्धांत यह कहता है कि नहीं मनुष्य जन्मगत पवित्र ही है। पवित्र ही रहेगा। उसका चरित्र, उसके संस्कार शुभ ही रहेंगे। बस आपको पहचानना है कि यह शुभ्रत्व या तो फिर यह शुभ संस्कार हमारे भीतर में ही है। तो प्रश्न होगा कि मान लीजिए मैं कोई बहुत बुरा कार्य करता हूं। किसी की हत्या करता हूं, किसी पर अत्याचार करता हूं, किसी का शोषण करता हूं, किसी का दमन करता हूं। तो फिर यह जो दुष्कर्म है जो मैंने किए हैं वह क्या इस तरह से मेरे मन के ऊपर में नहीं बैठ जाएंगे कि फिर इसको हटाने के लिए मुझे कर्म करना पड़े। यह प्रश्न है। किंतु जैसे कि देखिए कि यदि हम यह जो ज्ञान मार्ग उसको ठीक-ठीक समझे तो मुझे ऐसा लगता है कि भले चाहे हमने 1000 दुष्कर्म भी किए हो यदि हम उससे मुक्ति पाना चाहिए चाहते हैं ज्ञान के रास्ते से तो फिर वह भी संभव है। या तो फिर आप यह एकदम दृढ़ रूप से जान लीजिए कि हां मेरा जो अंतर्मन है वो ब्राह्मण ही है और यह जो संस्कार है वह संस्कार सिर्फ उसके ऊपर में एक आवरण मात्र है। तो वह एक तो वेदांत के रास्ते से एक संभव है। अद्वैत वेदांत के माध्यम से या तो फिर यह भक्ति मार्ग जो है भक्ति मार्ग क्या कहता है कि यदि मां के साथ में जगत जननी के साथ में एक प्रेम का अद्भुत यदि हम नाता बनाएं रिश्ता जोड़ें तो उसके माध्यम से यह सब चला जाएगा। यानी कि देखिए कि यह द्वैत या अद्वैत उसके ऊपर में यह डिपेंड नहीं करता कि आप ज्ञान के रास्ते से सिर्फ जानकारी के माध्यम से सिर्फ नॉलेज के माध्यम से अपने संस्कार को शुद्ध करें। यह ज्ञान का रास्ता और यह कर्म का रास्ता। यह मुझे ऐसा लगता है कि कर्म के रास्ते में जो अपने जो पुरानी जो वैदिक प्रथाएं थी कि यह कर इस विधि करने से या यह होम करने से या यह यज्ञ करने से या तो फिर इस तरह से दान दक्षिणा देने से या तो फिर तपस्या करने से यह जो हजारों-हजारों साल ऋषि मुनि तपस्या करते थे। इसके पीछे का तात्पर्य या तो फिर हेतु सिर्फ यही था कि यह जो यदि मान लीजिए कि इस जन्म में या तो फिर पिछले जन्म में यदि भयानक हत्याकांड हमने किया है, भयानक पाप किया है, भयानक दुष्कर्म किए हैं तो उसको काटने के लिए हमको तपस्या करनी है। तो वह एक कर्म के माध्यम से तपस्या का एक रास्ता था और यहां पे ज्ञान के माध्यम से हमको आत्म तत्व को पहचानने का एक यह रास्ता है। यदि हम यह रागात्मिका भक्ति कहें या तो फिर यह प्योर अद्वैत वेदांत कहें दोनों रास्ते ज्ञान के रास्ते हैं। दोनों के माध्यम से या तो फिर यदि हम मां को अपनी जननी के रूप में स्वीकार करें तो भी हमको ज्ञान हो जाएगा कि हां मैं तो मां का संतान हूं। चाहे जितने भी पाप मैंने किए हो भूतकाल में वह मुझे कभी स्पर्श नहीं करने वाले हैं। और या तो फिर यह अद्वैत वेदांत का रास्ता है। शंकराचार्य की वह जो फेमस उपमा है कि रास्ते से जा रहे हैं। रास्ते में वह रस्सी पड़ी हुई है। अभी रस्सी का टुकड़ा रास्ते में है और अंधेरे में हमको ऐसा लगा कि सांप है। तो जैसे ही हमने उसको सांप के बारे में सोचा हम एकदम डर गए। एकाएक डर गए और किंतु फिर यही मोबाइल आजकल के युग में तो सबके पास मोबाइल है। मोबाइल में वह टॉर्च भी होती है। तो उसमें से वह टॉर्च उसके ऊपर में मारा तो जैसे ही पता चला कि अरे यह तो सांप नहीं है। यह रस्सी का टुकड़ा है। तो साथ-साथ में ही हमारा भय चला गया। यानी कि ऐसा नहीं है कि आपको मेहनत करके साथ यह जो सांप है उसके साथ में रेसलिंग करके उसको हरा देना है। फिर पता चलेगा। जब सांप को आपने हरा दिया तब पता चलेगा यह सांप नहीं है। यह तो रस्सी का टुकड़ा है। ऐसा नहीं है। ना ही सांप के साथ में रेसलिंग करने की जरूरत है। ना ही उससे भागने की जरूरत है। बस मोबाइल की यह जो टॉर्च है उसके ऊपर में डालना है। उसी से हमको पता चल जाएगा। तो यह है जो ज्ञान का रास्ता। यह ज्ञान के रास्ते में प्योर अद्वैत वेदांत भी आता है। और यह जो रागात्मिका भक्ति है यह दोनों आती है। दोनों के माध्यम से हम सिर्फ ज्ञान के शस्त्र से अपने संस्कारों से मुक्ति पा सकते हैं। तो अच्छा यह तो हुआ फिलॉसोफी। अभी यह फिलॉसोफी को आप प्रैक्टिकल कैसे करेंगे? जैसे मैंने कहा आज सुबह की ही मैं बात लेता हूं। सुबह को जैसे ही मैं अपने कमरे में आया जैसे ही थोड़ी देर आंख बंद करके बैठा इस तरह से सब तरह के विचार आना शुरू हो गए कि कैसे अब खास करके क्या विचार है तो कल एव्री संडे हमारा बाल विकास एक क्लास होता है बच्चों के लिए तो होता ऐसा है कि अभी तक उसका कोई फिक्स शेड्यूल नहीं है। हर बार नए-नए टीचर नया-नया उसका जो टाइम टेबल है वह बनाना पड़ता है। तो मैं सोच रहा था जैसे ही आंख बंद करके बैठा कि कल का जो क्लास था उसका जो टाइम टेबल मैंने बनाया था शेड्यूल बनाया था उसमें नेक्स्ट वीक क्या इंप्रूव करने की जरूरत है फिर किस तरह से और जो इंस्ट्रक्टर है टीचर है उनको किस तरह से अरेंज करेंगे क्योंकि एव्री संडे सभी का अवेलेबिलिटी सेम नहीं होता है कोई इंस्ट्रक्टर इस टाइम हमको अवेलेबल है तो नेक्स्ट टाइम हो सकता है नहीं भी अवेलेबल है तो किस तरह से उसको सोच करेंगे करेंगे मैनेज। तो यह सोच रहा था सोचते-सचते 10 मिनट पसार हो गया। एकाएक मैंने सोचा अरे यह सब मैं क्या सोच रहा हूं? यह सब सोचने के लिए तो पूरा दिन भर मेरे पास में पड़ा है। संडे तो अभी इतना दूर है और छ दिन पड़े हैं बीच में। इस समय इस शुभ मुहूर्त में मुझे यह सब सोचने की क्या आवश्यकता है? तो अच्छा ठीक है। मैं अभी फिर से अपने मन को कंसंट्रेट कर रहा हूं। फिर थोड़ी देर के बाद में सोचा और कुछ नया विचार चालू हो गया है और फिर 510 मिनट ऐसे चला गया। तो यह जो है ऐसा जब बार-बार होता है तब हमको इस यह जो ज्ञान का जो रास्ता है उसके ऊपर में सही-सही संदेह होने लगता है कि क्या सही में ईश्वर के साथ में एक संतान और मां इस तरह से नाता बनाने से क्या हम सही-सही में अपने मन के यह जो संस्कार है उसको काट सकते हैं या तो फिर यदि वेदांत में हमको इंटरेस्ट है और मैं यदि दृढ़ता पूर्वक यह सोचना शुरू शुरू कर देता हूं कि हां मैं ही आत्मन हूं। तो क्या इस विचार से हमको सही में इस तरह के विचारों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है? यह संदेह होता है। देखिए मेरा अभी तक का जो एक्सपीरियंस है वह मैं बताता हूं कि जैसेजैसे हम यह सोचना शुरू करें। खास करके मैं वेदांत की दृष्टि से कहूंगा। जैसे-जैसे हम यह सोचना शुरू करें कि यह सुबह का सुंदर एक एटमॉस्फियर है और इसमें मैं अपने कमरे में बैठा हूं। चारों ओर शांति है और बस ईश्वर के नाम में ईश्वर के गुणगान में ईश्वर के स्मरण मनन में मैं तल्लीन हूं। और मेरे भीतर में से जो आत्म तत्व है उसका प्रकाश इस तरह से फैल रहा है मेरे हृदय में कि जैसे कि यह जितने भी विचार हैं जितने भी यह चिंताएं हैं जितना भी यह भविष्य की यह प्लानिंग है, यह भूतकाल की जितनी भी रिग्रेट्स है, वह सब जैसे कि इसके भीतर में गल जा रही है। सब कुछ इसके भीतर में डिसॉल्व हो जा रहा है। जैसे ही मैंने यह सोचना शुरू किया सही-सही में तो हो सकता है कि पहले दिन कुछ रिजल्ट ना मिले, दूसरे दिन कुछ ना मिले, तीसरे दिन कुछ ना मिले। किंतु वि प्रैक्टिस ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम आप देखेंगे कि यह स्ट्रेटजी सही-सही में काम करती है। मैं सही-सही जैसे आज का ही कि एक बार तो पहले यह सब हुआ 10-15 मिनट यह सब मेरे मन के भीतर में चला। फिर मैंने सोचा कि नहीं इस तरह से यदि इसके सामने में हार मान जाएंगे तो नहीं चलेगा। अपने मन को सब तरह के विचारों से सब तरह की यह जो जितने भी यह कर्म है भीतर में सबसे मुक्ति पानी होगी। यह आत्म तत्व मैं आत्मन हूं। यह सोचना होगा। माने यह विश्वास करना होगा। तो जैसे ही मैं यह अपने मन को अपने ऊपर में फिर से कंसंट्रेट करने का प्रयास करता हूं तो यह सही में ऐसा होता है कि सही में यह विचार चले जाएंगे। सही में भीतर में जो शांति है, भीतर में जो आनंद है, भीतर में जो बेफिकराई है, वह सब धीरे-धीरे करके बाहर आने शुरू हो जाएगा। किंतु वही बात है कि इस बात का हमको प्रैक्टिस चाहिए। यह किस तरह से है पता है? प्रैक्टिस और स्ट्रेंथ यह दोनों में शायद ऐसा लगता है कि डिफरेंस बहुत बड़ा है। ऊपर ऊपर से शायद हमको नहीं दिखेगा। किंतु डिफरेंस किस तरह से है? देखिए ये थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड हो जाएगा कांसेप्ट। किंतु बिकॉज़ कि यह मेरा एक्सपीरियंस है। इसलिए मैं बता रहा हूं। स्ट्रेंथ हम किसको कहते हैं? जैसे कि विल पावर। विल पावर क्या है? कि मैंने तपस्या करके करके अपने विल पावर को बढ़ाया है। विल पावर को मैंने इस तरह से बढ़ाया है कि जब भी यह विचार आते हैं इस तरह के मुझे डिस्टर्ब करने के लिए साथ-साथ में ही मैं विल पावर रूपी तलवार निकाल करके उसके साथ में युद्ध करूंगा और इसको हरा दूंगा। यह हो गया विल पावर वाला रास्ता। यहां पर सिर्फ एक प्रैक्टिस है। बार-बार अपने मन को फिर से फिर से आत्म तत्व पर केंद्रित करना है। फिर से फिर से यह कल्पना करनी है। या तो कंस्ट्रक्ट क्रिएट करना है कि मेरे भीतर में आत्म तत्व है। मेरे भीतर में यह आनंद है। मेरे भीतर में यह बेफिकराई है। मेरे भीतर में यह जो शांति है, वह बाहर में आ रही है। मेरे पूरे देह में प्रसरित हो रही है। यह बस इसको प्रैक्टिस ही करना है। इसके लिए आपको कोई बहुत ज्यादा स्ट्रेंथ नहीं चाहिए। जैसे कि यह कैसा हो गया पता है? यदि उपमा देकर कहे कि एक बॉडी बिल्डर है यह जिम्नेशियम में जाता है और वह वेट लिफ्टिंग करता है। अभी आप जितना हैवी वेट लिफ्ट करेंगे उतना ही आपका मसल पावर होना चाहिए। यदि आपने अभी-अभी शुरू शुरू में प्रैक्टिस करना शुरू किया है उसको उठाएंगे वेट को तो आपको जो कि मान लीजिए आधा केजी है या पौना केजी है इतना ही वेट उठा पाएंगे किंतु जैसे-जैसे आपके मसल बनते गए वह प्रोटीन शेक पीना शुरू किया और जैसे-जैसे आपका डेडिकेशन बढ़ता गया इसमें तो मान लीजिए दो-3 किलो केजी है या उससे भी ज्यादा है आप उठा पाएंगे। आपके मसल यहां पर बिल्ड हो रहे हैं। आप स्ट्रेंथ यूज कर रहे हैं। ऑन दी अदर हैंड। अब जैसे कि यह प्रैक्टिस किसको कहते हैं? यह हो गया आपका स्ट्रेंथ। या तो हो गया विल पावर। यह बॉडी बिल्डिंग का जिमनेशियम में जाकर आप जो करते हैं वह आप विल पावर बिल्ड करते हैं। साधना की लैंग्वेज में यदि कहे तो और यह जो प्रैक्टिस यह क्या है? जैसे कि हमारे यहां पे यह सीपी क्लीनिक है सेरेब्रल पालसी तो वहां पे मैं जाता हूं तो अभी बच्चों का क्या है? है। वैसे तो वह बड़े हो गए हैं 8 10 साल के 11 12 साल के। किंतु जैसे वो चारप साल का ये जो बच्चा होता है ना दो-ती साल का उसका कैसा है आई हैंड कोऑर्डिनेशन जिसको कहते हैं आंख और हाथ यह दोनों एक साथ में काम करने चाहिए। तो यह मोटर स्किल जो होती है कि मैं मैं इस चीज को उठा के यहां पर रखूंगा तो वो मैं कर सकता हूं। बच्चे में धीरे-धीरे डेवलप होता है। यह जिनको सेरेब्रल पालसी हो गया है, उनको यह सब हैंड आई कोऑर्डिनेशन है या मोटर स्किल है उसको डेवलप करने में टाइम लगता है। तो छोटे बच्चों के खिलौने जो होते हैं वह उनके लिए रखे हैं। तो फिर यह लड़के किस तरह से प्रैक्टिस करेंगे कि एक जैसे कि एक लकड़ी ऐसा खड़ा करके प्लास्टिक का रखा है। फिर यह जो छोटे-छोटे यह जो शेप होते हैं, राउंड शेप होता है, स्क्वायर शेप होता है। तो यह स्क्वायर शेप को उठा उसके बीच में एक होल होता है। जैसे यह मेंदू वड़ा जो दिखाया होगा उसमें बीच में एक होल होता है। तो इसी तरह से ये स्क्वायर शेप को उठा के यह जो प्लास्टिक का यह जो लकड़ी है उसके उसके ऊपर में डालना है। तो यह स्क्वायर शेप उसमें आ जाएगा। जितने भी स्क्वायर शेप है उसको एक के ऊपर में एक रखना है। जितने ट्रायंगल शेप है उनको एक के ऊपर में एक रखना है। जितने कि ये सर्कुलर शेप है उसको एक के ऊपर में एक रखना है। यहां पे आपको स्ट्रेंथ की जरूरत नहीं है। एक छोटा सा प्लास्टिक का स्क्वायर शेप है, ट्रायंगल शेप है। उसको कोई भी उठा सकता है। एक्चुअली यह सब बच्चों के गेम्स है। वह दो-ती साल का बच्चा भी होगा ईजीली उठा करके रख देगा। बच्चे को या तो फिर यह जो सेरेब्रल पालसी वाले जो अपने हैं स्टूडेंट इनको प्रॉब्लम कहां होता है? हैंड आई कोऑर्डिनेशन होता नहीं है। कहां पे रखने को जाएंगे? कहां पे रख देंगे? शेप नहीं रिकॉग्नाइज कर सकते हैं। तो धीरे-धीरे करके शेप रिकॉग्नाइज करना पड़ेगा। यहां पे स्ट्रेंथ का मामला नहीं है। यहां पे सिर्फ प्रैक्टिस का मामला है। जैसे-जैसे आप प्रैक्टिस करते जाएंगे, वैसे-वैसे ही आप परफेक्ट होते जाएंगे। फिर मैं जब यहां पर असेसमेंट के लिए जाऊंगा स्टूडेंट्स के तो मैं फिर यह वो लोग एक गेम्स है वगैरह रखेंगे। फिर एक के बाद एक स्टूडेंट को ले आएंगे। फिर यह जो सब है वो स्क्वायर शेप एक साथ में एक के ऊपर में एक रखेंगे। ट्रायंगल एक के ऊपर में एक रखेंगे। फिर मैं कहूंगा अरे वाह देखो ये हैंड आई कोऑर्डिनेशन सीख लिया। यह मोटर स्किल सीख ली। कितना अच्छा है। वेरी गुड। फिर मैं वो ए ग्रेड दूंगा असेसमेंट में। तो एक्चुअली यह जो अपने मन को बार-बार अपने ही ऊपर में केंद्रित करना है इट्स नॉट अ मैटर ऑफ जस्ट विल पावर क्योंकि मैंने खुद का जो अनुभव है मेरा मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा विल पावर कोई इतना ज्यादा है किंतु मैंने जो प्रैक्टिस की है अभी तक प्रैक्टिस इज गुड इनफ कि मैं उसको खास करके ध्यान करने को जब हम बैठते हैं जप करने को हम बैठते हैं तो मन जब भटकता है तो उसको बार-बार पकड़ करके अपने ऊपर पर केंद्रित कर सकते हैं। देखिए विल पावर की जरूरत कहां पर पड़ेगी कि कामना वासना का एक प्रचंड आवेग जो है एक प्रचंड लहर है वह हमारे सामने आ रही है। उस समय उसके सामने टिकने के लिए हमको विल पावर चाहिए। यह जो बॉडी बिल्डिंग करते हैं जिम में जाकर के उस समय उसकी जरूरत पड़ेगी। अब जैसे कि खाने को बैठे हैं। मैंने ठीक किया है कि मिठाई नहीं खाऊंगा। किंतु यह या तो साउथ इंडिया है, मैसूर पार्क है या बड़ी सुंदर-सुंदर मिठाइयां आती है कभी-कभी। तो कोई वो वो किचन में जो परोसने वाले हैं वो सीधा लाकर के सामने रख देंगे। ये लीजिए महाराज। तो वो स्प्लिट सेकंड में आपको डिसाइड करना है कि इसको खाए कि ना खाए। फिर उस समय मुश्किल हो जाता है कभी-कभी। ले लेते हैं। अच्छा ठीक है दे दो। इतनी सुंदर मिठाई है। अब जैसे ही वह प्लेट में रख दिया फिर रिग्रेट होगा। अरे भाई यह मुझे तो नहीं खाना था। क्यों झूठ-मूठ का मैंने ले लिया? किंतु वो जो स्प्लिट सेकंड का जो डिसीजन था कि उसने सीधा मेरी थाली के ऊपर में लाकर रखा और कहा दे दूं क्या तो उस समय मना करना वो शायद मेरे से नहीं हो पाएगा तो फिर मैं इसको कहता हूं जो परोसने वाले हैं भाई मुझे मिठाई तुम ऑफर ही मत करो वो लेके आओगे तब तो यह टेंपटेशन आएगा ना तुम देना ही मत मुझे तो फिर क्या है कि यदि थोड़ा सा लंबा टाइम रहता है मैं देख रहा हूं कि वह मिठाई ले आया है अभी चारप लोग खाने को बैठे हैं तो तो छोटा सा आश्रम है ज्यादा लोग होते नहीं खाने के टाइम में तो एक के बाद एक सबको दे रहा है तो मेरे तक आते-आते या तो फिर मुझे बाईपास करके और आगे चला जाएगा दो-ती मिनट लगेगा तो दो-ती मिनट में मैं अपने विल पावर को स्ट्रेंथन कर दूंगा कि हां नहीं नहीं खाना है भले ही चाहे वो पूछ भी ले गलती से वैसे तो बोला है कि मत पूछना मुझे मत ऑफर करना गलती से ऑफर कर भी दे तो फिर हम मना कर देंगे कि नहीं नहीं खाऊंगा तो दिस इज बेटर कि दो-ती मिनट का टाइम मिला है बाय दैट टाइम मैं अपने विल पावर को मैं स्ट्रेंथन कर दे रहा हूं। उसको मैं ठीक-ठाक कर दे रहा हूं। किंतु यदि सीधा मेरे सामने आएगा, सीधा मेरे थाली के ऊपर में रखेगा। आप लेना है कि नहीं लेना है? तो यह स्प्लिट सेकंड का डिसीजन है। हो सकता है कि उसमें मैं हार जाऊं। हो सकता है मैं हां बोल दूं। हो सकता है कि मैं ले लूं फिर मैं रिग्रेट करूं। तो उस समय यदि मान लीजिए कि यह जो विल पावर मेरा इतना स्ट्रांग होता कि यह स्प्लिट सेकंड वाला डिसीजन में भी मैं कभी हारूंगा नहीं। सीधा मेरी नजर के वहां से वह बॉक्स उठा के सीधा सबसे पहले मुझे ही सर्व करने को आया है। उठा के वह जो मैसूर पार्क है सीधा मेरी थाली के ऊपर में रख दिया है। महाराज दे दूं क्या ऐसा बोलता है एक स्प्लिट सेकंड डिसीजन में ही मेरा विल पावर इतना स्ट्रांग है कि मैं मना कर दूं ना चाहिए और वो वहां से चला गया। वो इतना विल पावर डेवलप करतेकरते टाइम लगेगा। किंतु जब तक वो टाइम नहीं आता है तब तक यह सब ट्रिक्स हमको आजमानी पड़ती है। सो दैट इज अ मैटर ऑफ विल पावर कि डे टू डे जो हम प्रैक्ट जो जागृत अवस्था में जो हमारे सामने टेंप्टेशन आते हैं उससे कैसे मुक्त हुआ जाए तो उसमें हमको विल पावर चाहिए किंतु ये जो जप करते हैं ध्यान करते हैं जो आंतरिक जीवन का जो मामला है उसमें जिस तरह से मेरा अनुभव जा रहा है। मैं अभी थ्यरी की बात नहीं कर रहा। कभी-कभी हम यह थ्यरीज इतनी सारी पढ़ते हैं। फिलॉसोफी जब पढ़ते हैं, उसको हमको समझ में नहीं आता कि मैं एक्चुअल जो मेरे सामने समस्या है, वहां पर मैं कैसे उसको अप्लाई करूं। सो, मैं अभी थ्यरी को छोड़ देता हूं। सिर्फ मेरा एक्सपीरियंस ही बता रहा हूं। तो जब हम आंतरिक जीवन है हमारा जब या ध्यान करने को बैठते हैं उस समय जो हमको बार-बार मन को फिर से आत्म तत्व पे मां के मां के ऊपर में ठाकुर के ऊपर में लेकर आना है। उसके लिए सिर्फ प्रैक्टिस ही चाहिए। उसके लिए फिर वो प्रचंड विल पावर है नहीं है। डज नॉट मैटर। यह मुझे ऐसा लग रहा है कि ठाकुर की शायद ही हम पर कृपा है कि हमारे जीवन को ना जैसे एक इनर लाइफ और आउटर लाइफ इन दोनों में उन्होंने बनाया है। आउटर लाइफ में यानी कि यह जगत के साथ में हम जो व्यवहार करते हैं वहां पर जो टेंपटेशन आते हैं उससे मुक्त होने के लिए उस टेंपटेशन से फाइट करने के लिए हमको विल पावर डेवलप करना पड़ेगा। उसके लिए हमको जैसे कि जिम में जाकर के बॉडी बिल्डिंग करना पड़ेगा। बहुत पसीना बहाना पड़ेगा। वो तब कहीं जाकर के वो मामला ठीक होने वाला है। किंतु जहां तक ये अपना इनर लाइफ का प्रश्न है, जहां पे सिर्फ हम है और मां है। हम है और यह ब्राह्मण है, आत्म तत्व है। जहां तक यह सिर्फ इनर लाइफ का मामला है, तब तक हमको प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट यह कांसेप्ट काम करता है। आप जैसे-जैसे प्रैक्टिस करते जाएंगे, वैसे-वैसे ही आप देखेंगे कि चीजें आपके कंट्रोल में आना शुरू होंगी। आपके विचार आपके कंट्रोल में आना शुरू होंगे। व्हिच इज़ अ अब देखिए जैसे कि यह सब चीजें क्या है ना कि हम लोग इंस्टिंक्टिवली शायद अनुभव करते हैं किंतु शब्दों में व्यक्त करना किसी एक सिस्टमेटिक वे में उसको प्रेजेंट करना वो कभी-कभी वो होता नहीं है। यह जो मेरे मन में वैसे तो इस तरह का अनुभव मेरा काफी समय का है। किंतु यह जो एग्जैक्टली जो जिस शब्दों में अभी मैं इसको व्यक्त कर रहा हूं यह आईडिया आज सुबह को ही मुझे आया। आज सुबह को ही मुझे लगा कि यह जो मैं बार-बार अपने मन को अपने पर फिर से लाकर के केंद्रित कर रहा हूं। बार-बार मैं विचारों से अपने डिस्ट्रैक्शन से मैं मुक्ति पा रहा हूं। उसके पीछे कोई बहुत बड़ा विल पावर मुझे नहीं चाहिए। ऐसा नहीं है कि मुझे बहुत कष्ट करना पड़ता है। मुझे बहुत सारा भीतर में से एनर्जी वेस्ट करना पड़ता है। जिससे कि मैं एग्जॉस्ट हो जाऊंगा। ऐसा कुछ नहीं है। प्रैक्टिस करके करके मैं ले आ रहा हूं। बार-बार मैं ले आ रहा हूं। और मुझे कोई ऐसा कोई तकलीफ महसूस नहीं होती है। तब मुझे लगा कि देखिए कि यह जो मिठाई का उदाहरण और यह वाला उदाहरण इन दोनों में क्या डिफरेंस है। उसमें मुझे यदि ये मिठाई वाले उदाहरण में एक्चुअल मुझे विल पावर चाहिए। मुझे पता है कि मुझे अपने माइंड को एकदम स्ट्रेंथन करना पड़ेगा। जब से यह परोसने वाला जैसे ही वह मिठाई का बक्सा उठाता है, तभी से मुझे अलर्ट हो जाना पड़ेगा। तभी से मुझे अपनी शक्तियों को जैसे कि केंद्रित करना पड़ेगा। वो आ रहा है मिठाई लेके अभी से तुम अलर्ट हो जाओ वो सीधा ले यदि आ जाएगा तो हो सकता है कि मैं उस समय हार जाऊं और मिठाई ले लूं यदि मुझे अलर्ट नहीं होता हूं यदि मेरे पास में वार्निंग नहीं आती है प्री वार्निंग नहीं आती है तो हो सकता है कि आई मे फॉल प्रे टू दैट टेंप्टेशन उसमें प्रलोभन का शिकार हो जाऊं ऐसा पूरा हो सकता है किंतु जैसे मैं देखता हूं कि वह आ रहा है प्रलोभन थोड़ा सा भी मुझे अपने पास में टाइम रहता रहता है प्रिपेयर करने को तो फिर मैं जितना भी विल पावर है उसको समन करते-करते उसको म अपने उसको अपने सामने फोर फ्रंट में ले आ के मैं तैयार रहता हूं। सो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा खुद का अनुभव से बता रहा हूं कि वो प्रैक्टिस डजंट रिक्वायर स्ट्रेंथ। इट जस्ट रिक्वायर्स प्रैक्टिस। सो जैसे छोटा बच्चा है वो हैंड आई कोऑर्डिनेशन या मोटर स्किल डेवलप करता है। उसमें कोई स्ट्रेंथ की जरूरत नहीं है। सो दैट मेक प्रैक्टिस अगेन एंड अगेन आप करते रहेंगे। हो सकता है कि वी कैन जब ध्यान का जहां तक मामला है वहां में उसमें हम लोग सक्सेसफुल हो जाए। फिर यह जो आउटर वर्ल्ड है यह बाह्य जगत है उसमें तो हमको सही में विल पावर डेवलप करना ही होगा। क्योंकि यह जो जितना भी हमारे सामने टेंपटेशन आता है या तो जितना भी हमारे सामने एक रिएक्शन आता है वो सबसे बचना इतना आसान काम नहीं है। उस समय विल पावर हमको लाना पड़ेगा। सो ये एक पॉइंट हो गया। दूसरा पॉइंट। अब अब जैसे

सभी के प्रति सहानुभूति

कि कल एक डिवोटी के साथ में मेरा वार्तालाप हो रहा था। तो उन्होंने मुझे पूछा कि अच्छा मैं क्या न्यूज़ पढ़ता हूं क्या? तो मैंने कहा कभी-कभी पढ़ लेता हूं रेगुलर पढ़ता हूं वैसे किंतु पहले की तरह नहीं जब मैं अपने घर में था पूर्वाश्रम की बात करूं मैं बहुत ज्यादा न्यूज़ पढ़ता रहता था किंतु फिर जब मैं यहां पे या तो फिर जब से मैंने घर छोड़ा तब से लेकर के पूरे 1415 साल मैंने न्यूज़ पढ़े ही नहीं थे और अभी जो है अभी का जो है कि मैं जो ट्रेंड होता है जो या तो जो आइडियाज होते हैं इंटरनेशनल लेवल पे उससे मैं मैं अपने को फमिलियर रखता हूं साइंस टेक्नोलॉजी जी वगैरह वगैरह जो भी है इंटरनेशनल अफेयर्स है आई कीप इन टच क्योंकि अभी वो वाला जो है कि पूरा 12 15 साल मैंने इस तरह से बिताए थे कि मुझे यह भी नहीं पता कभी-कभी कि इंडिया का प्राइम मिनिस्टर कौन है तो इस तरह की परिस्थिति अभी नहीं है। तो जैसे ही मैंने यह कहा तो फिर उन्होंने सामने प्रश्न किया कि अच्छा मुझे न्यूज़ पढ़ने की बहुत एक हैबिट हो गई है। बार-बार मैं यह मोबाइल खोल करके देखता रहता हूं कि क्या नोटिफिकेशन आता है क्या है? तो किस किस तरह से इससे बचना चाहिए? तो वह एक वार्तालाप हो रहा था। वार्तालाप करते-करते जो दो-तीन बातें मेरे माइंड में जो आई एक चीज क्या है कि बहुत बार ऐसा होता है कि अपने जो आइडियल्स होते हैं ना वो एब्स्ट्रैक्ट होते हैं। किस अर्थ में कि उसको हम प्रैक्टिकल नहीं कर उसको हम कंक्रीट नहीं करते हैं आइडियाज को। किस अर्थ में? अब जैसे कि देखिए मैं अपना घर छोड़कर के मैं रांची में गया था ट्राइबल एरिया में। मैं सोच रहा था कि मैं वहां पर रह के सेवा का काम करूंगा। सो इससे बड़ा आइडियल क्या हो सकता है? एक यंग लड़के के जीवन में। राइट? आध्यात्मिकता है वगैरह वो साइड पे है। उस एक क्षण के लिए रख दे। वो ठाकुर मास्वामी जी है। वो ठीक है। तू मेन जो मुझे करना था वो गांव ये ट्राइबल लोगों की सेवा करनी थी। तो इतना बड़ा सैक्रिफाइस करके मैं वहां पर गया। सो वि इज वेरी गुड। यह जो मेरा आइडियल था मेरे जीवन में गांधी जी ने जो कहा था कि यंग लड़कों को शहर छोड़ के यह कैरियर छोड़कर के गांव में जाना चाहिए और वहां पर गांव की सेवा करनी चाहिए। बिकॉज़ इंडिया लिव्स इन द विलेजेस। भारत जो है वो गांव में रहता है। सो ऐसा जो मैंने सोच करके रखा था व्हिच नाउ आई एम डूइंग इट। व्हिच इज गुड। ओके? उसमें कोई बुरी बात नहीं है कि यह जो मेरे आइडियल्स जो है उसके अनुसार मैं कार्य कर रहा हूं। किंतु यहां पर देखिए जो एक चीज मैंने धीरे-धीरे करके नोटिस करना शुरू किया मेरा एक है कि मैं सेल्फ एनालिसिस करता रहता हूं। तो यह सेल्फ एनालिसिस करने की यह जो हैबिट है इस हैबिट से मुझे जो दो-तीन चीजें मेरे बारे में समझ में आना शुरू हुई कि मैं वैसे तो एब्स्ट्रैक्ट रूप में यह जो दया जिसको कहते हैं, कंपैजन जिसको कहते हैं, करुणा जिसको कहते हैं, एंपैथी जिसको कहते हैं। ये सब का बेसिक मीनिंग यही है कि दूसरों का दुख हम अनुभव करते हैं और उस दुख को अनुभव करके दूसरों का पेन दूसरों का सफरिंग अनुभव करके हम उसको रिस्पॉन्ड करते हैं। जो लोग इस तरह से नहीं करते उन लोगों के भीतर में एमैथी नहीं होती है। यदि सामने कोई आदमी खड़ा है जो कि बड़े दुख में जी रहा है और देखकर के यदि मुझे सहानुभूति नहीं होती। मैं उसको हेल्प करने को आगे नहीं जाता तो इस तरह का व्यक्ति पशुवत ही होगा। इससे ज्यादा उसमें कोई डिफरेंस नहीं है। मैं सिर्फ अपना स्वार्थ ही देखूंगा। इसके आगे मैं और कुछ नहीं देखूंगा। भले ही चाहे मेरी स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरे लोग सफर करें डज नॉट मैटर। मैं इनको इग्नोर करूंगा। वह तो एक है। फिर उससे भी बड़ा माने पशुवत एक है कि मुझे यदि अपने बेनिफिट के लिए दूसरों को एक्टिवली कष्ट देना पड़े तो भी कोई दिक्कत नहीं है। मैं जानबूझकर के उनको कष्ट दूंगा। उनका शोषण करूंगा। उनसे झूठमूठ का पैसा पढ़ाऊंगा। उनके ऊपर में मैं अत्याचार करूंगा। उनकी धन संपत्ति में लूट लूंगा। क्योंकि मुझे यह भोग करना है। तो वह तो पशुवत बहुत बड़ा आचरण हो गया। किंतु इन जनरल बहुत सारे लोगों के साथ में क्या होता है कि अच्छे से मिडिल क्लास फैमिली में रह रहे हैं। और सामने ही एक बस्ती है तो वहां पर लोग कष्ट में रह रहे हैं। अभी प्रतिदिन वो स्कूटर लेकर के वह बस्ती के सामने से ही निकल कर के अपने घर में आते हैं। जॉब पे जाते हैं, दुकान जाते हैं, बिजनेस में जाते हैं। सब कुछ करते हैं। किंतु बस्ती में जिस तरह से ये जो नंगे बच्चे खेल रहे हैं, वे लोग सफरिंग कर रहे हैं। देखकर के बहुत ज्यादा कोई सिंपथी नहीं होती। लगता है कि अरे इन लोगों का कर्म ही ऐसा है। इन लोगों का संस्कार ही ऐसा है। वो भगवान ने उनके साथ में ऐसा ही किया है। तो ये इसको कहते हैं इनडिफरेंस। तो एक तो है कि एक्टिवली दूसरों का शोषण करना। दूसरा है कि यह इनडिफरेंस यानी कि उनको इग्नोर करना। तीसरा है कि एक एक्टिव एंपैथी होना कि हां इनका दुख देख के मुझे मुझे भी कष्ट होता है। मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए। भले उसके लिए मुझे अपना खुद का कंफर्ट है, अपना फैमिली है, अपना करियर है, अपना लाइफ है। भले ही चाहे उसको सैक्र सैक्रिफाइस करना पड़े। तो नेचुरली दिस इज अ वेरी गुड आइडियल जो माने तीन कैटेगरी यदि कहेंगे कि जो एक्टिवली दूसरों को कष्ट देता है, वह सबसे बुरा है। यदि दूसरों के कष्ट को इग्नोर करता है। क्योंकि पता है कि मैं थोड़ा सा भी इन लोगों के साथ में इनवॉल्व होने को जाऊंगा। पता नहीं मेरे साथ में क्या-क्या सब गड़बड़ होना शुरू होगा। ये तो बस्ती में रहने वाले झोपड़पट्टी में रहने वालों की तो सब बेड हैबिट होती है। कोई शराब पीता है, कोई यह करता है, कोई क्रिमिनल है। ऐसे लोगों के साथ में थोड़ी ना मैं ये होने को जाऊंगा। मैं फमिलियर होने को जाऊंगा। ऐसे लोग मेरे घर में आकर के गड़बड़ करना शुरू कर देंगे तो यहां पे तो फैमिली लेकर के रहते हैं। कहां ऐसे लोगों के साथ में हम संबंध बनाएंगे? तो इग्नोर करो उनको। सो व्हिच इज़ लेस। और फिर एक्टिवली उनको हेल्प करना व्हिच इज़ ग्रेटेस्ट आइडियल। तो किंतु जैसे मैंने रांची में जाकर के अपना खुद का सेल्फ एनालिसिस करना प्रारंभ किया। मुझे धीरे-धीरे करके पता चलता गया कि ट्राइबल जो है उनके प्रति तो मेरा सिंपैथी है। जब भी मैं गांव में जाता हूं मैं एक्टिवली बिय्ड गोइंग बियों्ड माय नॉर्मल ड्यूटीज जितना हो सके उतना मैं उन लोगों को हेल्पफुल होने का प्रयास करता हूं। नॉर्मल ड्यूटी में क्या आता है कि दिव्यान के माध्यम से जो प्रोजेक्ट चलते हैं वो ठीक-ठाक चलते रहे उतना ही देखना है मुझे तो दैट इज अ विद इन द बाउंड ऑफ माय नॉर्मल ड्यूटीज गोइंग बियों्ड दैट गांव वालों का तकलीफ होता है बहुत सारा गवर्नमेंट के जो लोकल जो म्युनिसिपालिटी गवर्नमेंट होती है म्युनिसिपालिटी तो होती नहीं है वो किंतु जो लोकल जो कुछ भी होता है वह पुलिस वाले होते हैं यह प्राइमरी हेल्थ सेंटर होता है वगैरह-वगैरह तो उनके साथ में कुछ भी प्रॉब्लम होता है। आई विल एक्टिवली ट्राई टू हेल्प देम गोइंग आउट ऑफ माय वे। सो इतना सारा मैं अपना दे रहा हूं वहां पे। व्हिच इज वेरी गुड। एट द सेम टाइम जो लोग मेरे साथ में काम करते थे ना उनके प्रति कभी-कभी मेरा एक इंपेशेंस का भाव प्रकट हो जाता था। मुझे ऐसा लगता था कि मैं इतना इन लोगों को ट्राइबल लोगों को हेल्प करने का प्रयास कर रहा हूं और ये वॉलंटियर्स जो है हमारे या स्टाफ है जो इतने सेल्फिश है कि थोड़ा सा भी आउट ऑफ देयर वे जाकर के कुछ नहीं करेंगे। थोड़ा सा भी मैं रिक्वेस्ट करूंगा हमारे फैकल्टी जो होंगे उनका एक रूटीन होता है कि इतनाइतना उनको करना है। इतना गांव में जाना है। अभी मैं कहूंगा कि चलो थोड़ा सा एक्स्ट्रा हम घूम ले तो इन लोगों को आवश्यकता है तो बेटर रहेगा। अब जैसे कि सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाए हैं गांव में तो सेल्फ हेल्प ग्रुप चलाने के लिए आज यदि देखा कि हम तीन गांव में जाएंगे तो माने जनरली आपका ऐसा है कि दो-तीन गांव आप विजिट करेंगे एक दिन में तो हो जाएगा। गांव के बीच का जो डिस्टेंस है, गांव के रास्तों की जो परिस्थिति है और जो एक्टिव ड्यूटी ओवर होते हैं एट आवर्स ड्यूटी ओवर होते हैं नौकरी के तो दो-तीन गांव यदि हुए तो बहुत हो गया। अभी यह जो मेरे साथ में आते हैं जो लोग नौकरी करते थे हमारे यहां पे कुछ-कुछ लोग वॉलंटियर्स भी थे तो उनको यदि मैं ऐसा कहूंगा ना कि आज तीन नहीं चार पांच कर लेते हैं यहां तक तो आ ही गए हैं दूसरा गांव यहां पास में ही है तो नेक्स्ट वीक आने की बजाय आज यदि जाकर के उनको जो भी प्रॉब्लम है सॉल्व कर लेते हैं बेटर रहेगा तो यह लोग इमीडिएटली मना कर देंगे नहीं महाराज हमारा तो ड्यूटी एट आवर्स का है तो तीन ही गांव में जाएंगे पांच गांव छह गांव क्यों जाएंगे आप इतना हमारे पर क्यों इतना प्रेशर डालते हैं। इतना काम क्यों करवाते हैं? तो फिर मैं नाराज होकर कहता तुमको दिखता नहीं है। मैं इतना सब सैक्रिफाइस करके यहां पे आता हूं। गांव वालों को हेल्प करने के लिए तुम लोगों यहां पे रहते हो। यहां के लोकल हो। यहां पे थोड़ा सा भी तुम्हारे भीतर में सिंपैथी नहीं है। 8 आवर्स ड्यूटी आवर्स ये सब क्या नाटक है? गांव के विकास के लिए सब कुछ सैक्रिफाइस कर देना है। एट आवर्स की बात फालतू की क्यों करते हो? कभी-कभी झगड़ा हो जाता था। कभी-कभी मैं अपने को रोक लेता था। झगड़ा करने से कोई लाभ नहीं है। तो किंतु यह जो रिेंटमेंट मेरे भीतर में बिल्ड अप होता था। यह जो मेरे आसपास में जो काम करते हैं, धीरे-धीरे कभी-कभी देखा कि गांव वालों के प्रति भी बड़ा रिजेंटमेंट हो जाता है। क्यों? क्योंकि मैं चाहता हूं कि हम लोग तो यह सेवा करने के लिए कर रहे हैं। दिव्यांग से जो कुछ भी गांव में जा रहा है सब कुछ तो सेवा कार्य है। आप मैं यदि मेरा आउट ऑफ वे जाकर के इतना करता हूं तो गांव में जो कमेटी बनाई है गांव के जो तीन-चार लोगों को वहां पर प्रेसिडेंट, सेक्रेटरी, ट्रेजर रखा है वे लोग थोड़ा सा आउट ऑफ वे जाकर के गांव के और भी जो गरीब लोग हैं उनको क्यों नहीं हेल्प करेंगे? गांव में मैं गया देखा कि एक घर में आना भी नहीं है। बिल्कुल मतलब भूखे बच्चे पड़े हैं। तो मैं जाकर के वहां जो अपना सेक्रेटरी होगा लोकल ही गांव का ही ट्राइबल ही उसको मैं कहूंगा अरे देखो तो तुम्हारी गांव में तुम्हारे बगल के घर में लोगों की यह परिस्थिति है। बच्चों की ये परिप्प कर दो उनको तुमको तुम दिव्यांग से इतना सब कुछ मिल रहा है। क्या तुमको शेयर करने का नहीं आता क्या? किसी ने सिखाया नहीं है। तो वो कहेगा अरे महाराज लोगों का ऐसा ही है। वे म 10 बहाने बता देगा। इन लोगों का संस्कार ऐसा है। संस्कार शब्द तो कैसे हमारा है। वह अपनी भाषा में किंतु ऐसा ही कुछ कहेगा कि वह लोग जो कर रहे हैं वह उन्हीं की गलती के परिणाम से भुगत रहे हैं। जो कहेंगे वो गांव में वो करेंगे नहीं तो अपनी गलती भुगतेंगे। तो फिर मुझे नाराज होकर कहना पड़ेगा कि तुम भी तो तुम्हारी गलती से भुगत रहे थे। हम लोग वहां से दिव्यांश से आते हैं। इतना मेहनत करके गवर्नमेंट का तो यहां पे कुछ है नहीं। यह हम ही लोग तो कुछ कर रहे हैं। रामकृष्ण मिशन कर रहा है। तुमको शर्म नहीं आती क्या? तो कि तुम सामने यह जो तुमको जो मिल रहा है तुम दूसरों के साथ शेयर करो। क्यों नहीं करते हो तुम? किंतु अगेन अभी उन लोगों का माइंडसेट ऐसा हो जाता है कभी-कभी कि नहीं करेंगे तो नहीं ही करेंगे। यू विल हैव टू लिव विद इट। तो यह रिेंटमेंट मेरे भीतर में कभी-कभी बिल्ड हो जाता था। तो अभी देखिए कि मैं सेल्फ एनालिसिस कर रहा हूं और मैं धीरे-धीरे करके यह बात को समझ रहा हूं कि एक तो है मेरा एब्स्ट्रैक्ट कंपैजन कि गांव वालों को सबको हेल्प करना है। ट्राइबल लोगों को सबको हेल्प करना है। दूसरा है कि कंक्रीट एग्जांपल जैसे यह मगरू है या अखिलेश है ना कि यह है। ये सब ट्राइबल नाम है। जिन लोगों के साथ में ये ट्राइबल लोग एक्चुअल ट्राइबल लोग कि जिनके साथ में मैं प्रतिदिन काम करता था। मगरू के ऊपर में मेरा बड़ा गुस्सा है। क्यों? क्योंकि उसने वो गांव में जाकर के जो रिक्शा भाड़ा देना था मुझे पता चला दूसरों से किसी से कि ₹40 की बजाय एक्चुअली खर्चा होता है ₹40 और उसने बनाया है वाउचर ₹60 का। ₹20 उसने अपनी पॉकेट में रखा है। तो जाकर के मैंने उसको डांट दिया। शर्म नहीं आती है आश्रम का ₹20 पॉकेट में रखते हो क्या? तुमको ठाकुर का काम है। हम लोग यहां पे बिना काम पैसा लिए काम करते हैं। तुम ₹20 के लिए ऐसा कर दिया तुमने। वो उसके ऊपर में गुस्सा। अभी मगरू जो जिसकी मैं बात कर रहा हूं सालों सालों से वो हमारा वॉलंटियर था और वो प्रतिदिन गांव में जाकर के कितने लोगों को हेल्प करता था तो ₹20ों के लिए मैं उसके ऊपर में नाराज हो गया और फिर उसके ऊपर में मेरा रिजेंटमेंट ये वो कुछ ना कुछ वजह से बढ़ता ही गया व्हिच इज बैड प्रॉब्लम क्या है यहां पे कि एब्स्ट्रैक्ट कंपैशन है मेरे में किंतु जब कंक्रीट एग्जांपल की बात आती है किसी एक पर्टिकुलर व्यक्ति व्यक्ति की बात आती है तो वहां पर मेरा कंपैजन है ना जैसे कि हवा हो जाता है वहां पर मेरी उसके ऊपर में एक्सपेक्टेशन इतनी ज्यादा है कि मैं फिर सब समय एक रिजेंटमेंट उसके सामने पोषण करके रखता हूं कि यह यह नहीं कर रहा है वो नहीं कर रहा है ₹20 झूठमठ का उसने पॉकेट में डाला है। अभी एक्चुअली यदि देखें ना तो देखिए यह कैसे डायलेमा होते हैं। आदर्श के कैसे डायलेमा है। उसने वो आश्रम का पैसा चोरी करके अपने उठाया उसने अपने पॉकेट में डाला वि इज बेड उसको कुछ तो कहना ही पड़ेगा मुझे ऑन दी अदर हैंड कि देखिए कि यह जगत जो है माया का जगत है वो कहां मुझे आदर्श व्यक्ति मिलेगा रोबोट बनाना पड़ेगा मुझे आजकल ये जो रोबोट आते हैं ना वो यूनिट्री के ना टेस्ला के इस तरह का मुझे रोबोट बनाना पड़ेगा यदि मुझे 100% ऑनेस्ट चाहिए तो यदि मैं जो कहता हूं 100% उसका पालन करें तो अब जैसे गांव में मीटिंग है रखा है मीटिंग तो हमारे जो वॉलंटियर होते हैं उनको साइकिल वाहनी कहते थे। क्यों? क्योंकि उस समय ना ही मोबाइल था ना ही वो व्हीकल कोई इतने सारे अवेलेबल है। तो ये हमारे वॉलंटियर जिनको जो कि गांव में साइकिल पे जाएंगे। साइकिल पे जाकर के एक के एक गांव से दूसरे गांव जाएंगे। वहां के जो हमारे जो कमेट के मेंबर्स हैं उनको नोटिस देंगे कि इस दिन इस समय इस जगह पे अपना मीटिंग है। सबको आना है। अभी मैं उस दिन मीटिंग में जाऊंगा। एक्सपेक्टेशन है कि 30 35 लोग उपस्थित होने चाहिए। हुए हैं उपस्थित सिर्फ 10 12 लोग। तो जिसकी ड्यूटी थी जिसका रिस्पांसिबिलिटी था नोटिफिकेशन देने का वो अभी क्या वो सही-सही में सब गांव में गया है। मोबाइल के पहले का यह युग है और वैसे तो मोबाइल आना शुरू हो गए थे। किंतु डोंट एक्सपेक्ट के ट्राइबल एरिया में तो कुछ नहीं था। तो ना ही मेरे पास में कोई वेरिफिकेशन का कोई यह है कि वह सही में गांव में गया है। सही में नोटिस दिया है और सही में यह जो गांव वाले अपनी आलस की वजह से नहीं आए हैं। मेरे मन में यह संदेह हो रहा है कि मैं उसको 10 गांव में जाने को बोला था। 10 गांव में 10 कमेट जो है उसको नोटिस देने को बोला था। तो उसने आलस की वजह से फांकी मार दी है। उसने सिर्फ पांच ही गांव में जाकर के नोटिस दी है। अभी वह कह रहा है कि बाकी के पांच गांव से नहीं आए तो वो उनकी गलती है। मैंने तो उनको बताया है कि नहीं आया और उस समय मेरे पास में ऐसा कोई माध्यम नहीं है। शॉर्ट ऑफ कि मैं खुद उस गांव में जाकर के उनको पूछूं और किसी को पूछूंगा वालंटियर को कि जाओ बाकी के पांच गांव में पूछ के आओ। तो तो वे लोगों को नोटिस मिला कि नहीं? अभी यह वालंटियर तो सब साथ में काम कर रहा है ना। वह बोलेगा कि मैं यदि बता दूंगा उसकी गलती तो कल कल कहीं जाकर के वह मेरी गलती बता देगा। तो बेटर है कि सब अपनी-अपनी गलतियों को छुपा दें या अपनी-अपनी ये जो फांकीबाजी है उसको छुपा करके रखें। महाराज के सामने जाकर कुछ नहीं कहना है। तो यह संदेह मेरे मन में प्रकट हो रहा है। ऐसा बार-बार होता है। तुमने क्या पैसा ठीक से लिया है कि नहीं लिया है? वाउचर ठीक से बनाया है कि नहीं बनाया है। गांव में जाकर के जो नोटिस देना था वह दिया है कि नहीं दिया है? मेरी एक्सपेक्टेशन इन लोगों के प्रति इतनी ज्यादा कि सब समय मुझे ऐसा लगता है कि वे लोग कुछ ना कुछ तो गड़बड़ कर रहे हैं और कुछ ना कुछ गड़बड़ अभी ये आश्रम का काम है ठाकुर का काम है आप गड़बड़ करेंगे मैं कुछ नहीं कहूंगा तो कैसे चलेगा मेरा भी तो एक ड्यूटी बनता है मेरा भी तो एक ये बनता है धर्म है कि गड़बड़ होने से मैं फिर उसके ऊपर मैं कुछ एक्शन लूं किंतु यह जो बहुत ज्यादा जो उनसे मैं एक्सपेक्टेशन रख रहा था उसका परिणाम यह आया आया कि धीरे-धीरे करके सबके प्रति मेरे मन में एक प्रकार का रिेंटमेंट बिल्ड अप हो रहा है। वंटियर्स जो है जो साइकिल वाहिनी ये मगरू वगैरह जो कि प्रतिदिन गांव में जाते थे हमारी वो दिव्यायन से लेकर रांची से उनके प्रति भी एक तरह का रिजेंटमेंट हमारे जो दिव्यान के भीतर में जो फैकल्टी है उनके प्रति एक क्रोध कि सब के सब आलसी है। थोड़ा सा भी आउट ऑफ वे जाकर के ट्राइबल लोगों को हेल्प नहीं करेंगे। और फिर यह गांव के जो हमारे सेक्रेटरी प्रेसिडेंट ट्रेजरर है गांव के विवेकानंद सेवा समिति हमने बनाया था विवेकानंद सेवा संघ तो प्रत्येक गांव में एक विवेकानंद सेवा संघ है तो उसमें हमारे दिव्यान में जो ट्रेनिंग चल रही है उसके एक्स ट्रेनीज़ ये लोग गांव से आकर के दिव्यान में रहकर के ट्रेनिंग लेंगे और गांव में जाएंगे तो यह हमारे एक्स ट्रेनीज़ होंगे तो एक्स ट्रेनस में से हम किसी किसी को बनाते थे इस तरह से ऑफिस बियरर्स तो ऑफिस ऑफिस बियरर्स पे गुस्सा क्योंकि वो जो प्रोजेक्ट चल रहा है दिव्यान की ओर से गांव में उसको प्रॉपर्ली मॉनिटर नहीं कर रहे हैं। ऐसा करके करके किंतु एक दिन मुझे समझ में आया कि देखो यह बहुत बड़ा गड़बड़ हो रहा है। मेरा धर्म है कि मैं उनको टोकूं। मेरा धर्म है कि मैं उनको डांटूं। किंतु ऐसा करते-करते उनके ऊपर में रिजेंटमेंट मेरे मन में नहीं बनना चाहिए। वरना तो क्या होगा कि कंपैजन लेकर के मैं गांव में आया हूं। कहां यह कंपैशन बढ़ना चाहिए। कहां मेरे आसपास में जितने भी है सबको यह फील होना चाहिए कि हां महाराज के मन में हमारे प्रति एक प्रेम का भाव है। एक सिंपथी एक एक एंपैथी का एक भाव है। ऐसा नहीं हो के वे लोग मेरे ऊपर में द्वेष रखना यदि शुरू कर दें तो तो फिर मैं यह कंपैशन ले आया हूं। क्या अर्थ है इस बात का? हां, मैं बहुत सारे प्रोजेक्ट बहुत ही एफिशिएंटली रूरल लेवल पर इंप्लीमेंट कर रहा हूं। किंतु यह तो सब एब्स्ट्रैक्ट हो गया। इन कंक्रीट देखें तो जो लोग मेरे आसपास में हैं, जो लोग मेरे साथी हैं, जो लोग मेरे कलीग्स, कोवर्कर्स हैं, उनके प्रति उनके मन में तो मेरे प्रति द्वेष के अलावा और कुछ नहीं है। तो ऐसा नहीं होना चाहिए। सिंपैथी, एमैथी सबके प्रति होनी चाहिए। एब्स्ट्रैक्ट कि यह प्रोजेक्ट्स जो है वह आउट ऑफ एमैथी मैं एज बेटर एज पॉसिबल करने का प्रयास करूंगा। किंतु साथ में यह कंक्रीट एमैथी जो है कि आसपास में मेरे जो भी व्यक्ति है एक्चुअल इंटरपर्सनल रिलेशनशिप है उसमें यह कांसेप्ट रिफ्लेक्ट होने चाहिए। वरना क्या होगा कि मेरा काम जो है मेरा यह प्रोजेक्ट जो है उसको मैं बड़ा अच्छे से चलाऊंगा। किंतु प्रोजेक्ट्स में जो लोग इनवॉल्व है सबके साथ में मेरा एक द्वेष भाव रह जाएगा। तो बाय द ग्रेस ऑफ ठाकुर कि मैं रांची जब छोड़ा तो सबके साथ में मेरा बहुत ही अच्छा रिलेशन था। यह चाहे मेरे साइकिल वाहिनी वाले हो ना कि ये फैकल्टी हो ना कि ये गांव के वालंटियर्स हो वेरी गुड रिलेशंस रख के मैं छोड़ के आया हूं। तो बट किंतु क्या है कि मुझे यह सब सेल्फ एनालिसिस करना पड़ता था कि ये जो आइडियाज है वो आइडियाज एब्स्ट्रैक्ट ना रह जाए कंक्रीट हो। इस अर्थ में कि आइडियाज मैं इंप्लीमेंट तो कर रहा हूं किंतु जिनके ऊपर में यह आइडियाज इंप्लीमेंट हो रहे हैं सब के सब मेरे विरोध में कहीं ना चले जाए। सो दिस इज व्हाट आई वास डिस्कसिंग यस्टरडे विद अ डिवोटी। वो उनका ऐसा कहना था कि उनकी वाइफ के साथ में उनका कभी-कभी झगड़ा हो जाता है। तो बोलते हैं कि मैं इतना धार्मिक हूं। मंदिर में आता हूं। वेदांत पढ़ने का प्रयास करता हूं। फिर वाइफ के साथ में झगड़ा हो तो फिर कैसे चलेगा? तब मैंने यह सब कहना शुरू किया कि यह सब हमारे कांसेप्ट है। आप आश्रम में आते हैं। बहुत अच्छा काम करते हैं। बहुत अच्छा काम करते हैं। सही में और किंतु यदि जो आपके सबसे तकरीबी है म जो आपके सबसे आपके सबसे क्लोजेस्ट रिलेटिव है उनके साथ में यदि झगड़ा होगा तो ये एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट है ना। आपने कंक्रीट नहीं किए हैं इस अर्थ में कि आप काम एस सच अच्छा कर रहे हैं। किंतु यह जो इंटरपर्सनल रिलेशनशिप है उसको आप इग्नोर कर रहे हैं। सो दिस इज व्हाट दो तीन पॉइंट आज यहीं तक अभी कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: कभी-कभी हम गृहस्थों को अपने बच्चों को डांटना पड़ता है। उन्हें किस प्रकार डिसिप्लिन किया जाए कि वे हमसे क्रोधित न हो जाएं?

ना यह अच्छा आपने मैपिंग किया या तो फिर इसको पैरेलल कि बच्चे यदि अपना ये आइडियल है तो मेरे खुद के बच्चों में मेरे खुद के लड़के लड़कियों में ये आइडियल क्यों नहीं है वे लोग क्या नहीं देख रहे हैं कि मैं इतना अच्छा मतलब मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अच्छा कर रहा हूं पता नहीं उनकी दृष्टि से क्या है किंतु वे यदि हमारे आइडियल्स को नहीं फॉलो करेंगे तो उनके ऊपर गुस्सा आएगा पढ़ाई लिखाई खास करके अब जैसे कि मैंने देखा है वह पिताजी इंजीनियर है वह उसके बच्चे जो है पढ़ाई लिखाई में इंटरेस्ट नहीं है तो अभी पिताजी कहते हैं अरे भाई मैंने इतना देखो मेरे पास में कुछ नहीं था मेरे जो मेरे खुद के जो पिता थे पिताजी थे वो बड़े गरीब थे छोटे से घर में रहते थे इलेक्ट्रिसिटी भी नहीं था लाइट भी नहीं था वो जो दिए का प्रकाश है उसमें मेहनत करके करके मैंने पढ़ाई लिखाई की है साइकिल पे जाते थे कॉलेज में और ना ही कुछ था उस समय कोई फैसिलिटी उसमें हम इंजीनियरिंग किए तुमको मैंने सब कुछ दिया है। अच्छी स्कूल दी है। अच्छा ट्यूशन दिया है। एक तुमको स्कूटी दे दिया है। वो क्या चाहिए तुमको? और फिर भी पढ़ाई नहीं करते हो। यह गुस्सा आएगा ही आएगा। क्योंकि ये जो मिडिल क्लास जो एक आइडियल है कि करियर अच्छा बनाना है। ऐसा नहीं है कि भाई वो बहुत सारा पैसा हमको वारसे में मिला है तो मजे से उड़ाएंगे। ऐसा तो नहीं है। यदि पढ़ाई लिखाई नहीं करोगे तो आ जाओगे सीधे लोअर क्लास के लेवल पे। राइट? तो मैंने जिस तरह से मेहनत करके मैं सीए हुआ हूं, इंजीनियर हुआ हूं। डॉक्टर हुआ हूं। तो तुम देख रहे हो यह तुम बीकॉम में भी एडमिशन नहीं मिलेगा तुमको यदि इस तरह से करोगे तो व्हिच इज ये फ्लैश पॉइंट और रहेगा ही रहेगा और रियली कि मैं ये आपको फाइन लाइन बच्चे को बहुत डांटा तो बच्चा विरोध में चला जाएगा। अभी मां खुद कहती है ना एक एक सास एक एक औरत एक लेडी डिवोटी मां के पास में आई तो लेडी डिवोटी आके मां को कंप्लेन करती है मेरी जो बहू है वो बहू अभी हम लोग तो इतने आदर्श में हम लोग बड़े हुए हैं मेरी बहू जो है एकादशी का उपवास नहीं करती यह नहीं करती वो नहीं करती उस समय तो स्त्रियों के ऊपर में इतने सारे रिस्ट्रिकशंस थे माने आप ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई भी एक स्त्री सब तरह के रिस्ट्रिक्शन फॉलो करके चले इट्स नॉट गोइंग टू बी पॉसिबल हमेशा उसके सर पे आप गिल्ट फीलिंग का टोपला डाल देने वाले हैं। तो यह आकर के ये केदार बाबू की मां ही थी। वो जो ये जो उदाहरण मैं दे रहा हूं वहां पे क्वालपाड़ा में केदार बाबू थे जिन्होंने ये क्वालपाड़ा आश्रम स्टार्ट किया था। उन्हीं की मां उन्हीं की मां उसी की बहू पे सब समय यह शासन करती रहती है। सब समय उसको डांटती रहती है। तब कहीं जाकर के मां ने कहा कि देखो इतना डांटना नहीं चाहिए। आजकल तो आपके खुद को बच्चों को आप बहुत डांटेंगे ना तो विरोध विरोध में चले जाएंगे। आपके सामने रेबेलियन करेंगे। आप जो कहेंगे फिर आपको सताने के लिए उससे बिल्कुल उल्टा करेंगे। नहीं नहीं इतना डांटना नहीं चाहिए। तो मां ने भी उस समय कहा था। तो क्या है कि यह फाइन लाइन है। अभी बच्चों का भविष्य बनाना या तो सास अपनी बहू को कुछ कहे उनके लिए तो अच्छा ही है। इन लोगों यंग है। पता नहीं है कि भविष्य में क्या होने वाला है। हमने तो जगत देखा है। भाई आज आपको लगेगा कि मैं मूवी देखता हूं। बड़ा मजे मेरे पिताजी क्यों आकर के ऐसा कहते हैं कि तुम स्टडी करो। वही बच्चा जब बड़ा होगा वही अपने पिताजी को कोसेगा कि मुझे बताया नहीं। ठीक से गाइड नहीं किया। इसलिए आज मेरी यह हालत है। तो दिस इज रियली अ वेरी फाइन लाइन। और किस तरह से दिस इज अ प्रैक्टिकल एस्पेक्ट ऑफ वेदांत। राइट? हम लोग थ्योरी तो पढ़ लेते हैं। किंतु जब हम उसको हाउ टू प्रैक्टिस इट डे टू डे व्हिच यहां पे विज़डम आता है। नॉलेज एंड विज़डम। डिफरेंस क्या है? नॉलेज सबके पास में है। इंटरनेट खोल के आप देखेंगे आपको नॉलेज मिल जाएगा। बट हाउ टू ट्रांसलेट दिस नॉलेज इन प्रैक्टिकल लाइफ? दैट इज विज़डम। प्रॉब्लम दूसरा एक प्रॉब्लम कहां पर है ना हम लोग एनालाइज भी नहीं करते हैं मेरे मेरा जो एक सेंट्रल जो बात कहना चाहता हूं वी नीड टू एटलीस्ट एनालाइज हम लोगों ने प्रॉब्लम समझ में नहीं आता है हमारे लिए नहीं एक एक जैसे कि ये बाय डिफॉल्ट हम चलाते हैं कि ये जो प्रोजेक्ट चलाना है उसमें मुझे अपना बेस्ट देना है और जो प्रोजेक्ट चलाने के लिए मुझे हेल्प करते हैं उन सबको डांटते रहना है तभी ये लोग प्रोजेक्ट ठीक-ठीक चलाएंगे वरना तो पता नहीं क्या गड़बड़ करेंगे मुझे मेरे बच्चे का भविष्य सुधारना है तो मुझे उसको सब समय डांटते रहना पड़ेगा। उसका भविष्य सुधर जाएगा तो आज मुझे गाली दे रहा है। भविष्य में मुझे मेरी प्रशंसा करेगा कि हां अभी बहुत सारे मैंने देखा है स्टूडेंट्स को अमेरिका से आए हैं अपने टीचर को मिलने के लिए जाते हैं। कहते हैं अब जैसे राजकोट में मैं एक्चुअल एग्जांपल बताता हूं। राजकोट में हमारे पब्लिकेशन में एक रिटायर्ड प्रिंसिपल वो एज ए वॉलंटियर आते थे। तो वो बार-बार कहते थे महाराज मेरा एक स्टूडेंट अमेरिका से आया। लंदन से आया। मेरी बड़ी प्रशंसा कर रहा है कि सर आपने जो उस समय डांटते थे अच्छा किया। आज हम लोग अमेरिका में बैठे हैं। हमारे अपने खुद के बच्चों को हम नहीं समझा सकते किंतु आपने हमारा भविष्य का गणतर किया। तो वो मुझे बार-बार कहते हैं महाराज देखिए उस समय की ये जो थी गुजराती में कहते हैं ना सोटी वागे चमचम विद्या आवे धमधम तो वो बिल्कुल ठीक था। हम लोग इस तरह से स्टूडेंट को पढ़ाते थे। आज सब अमेरिका लंदन में बैठे हैं। और आजकल देखिए स्टूडेंट को कोई डांटता नहीं है। तो स्टूडेंट का भविष्य क्या होगा किसको पता? तो यह उनका बड़ा एक कंप्लेन रहता था ना

प्रश्न: स्वामीजी भी अपने गुरुभाईयों को डांटते थे, लेकिन वे जानते थे कि स्वामीजी उनसे कितना प्रेम करते थे।

किंतु यह स्वामी जी का उदाहरण आपने परफेक्ट दिया है। देखिए कि रामकृष्ण मिशन अच्छा हो मतलब भविष्य में बढ़े आगे उसके लिए स्वामी जी ने जीवन दे दिया। इससे बड़ा आइडियल क्या हो सकता है? किंतु इसी रामकृष्ण मिशन को चलाने वाले जो गुरु भाई थे उनको स्वामी जी जिस हद तक डांटते थे कि फिर ये स्वामी जी उस समय सेकंड टाइम अमेरिका थे और शरद महाराज ने मिसेज ओलीबुल को कंप्लेन किया। वो उनको ग्र ग्रेनी करके पुला पुकारा करते थे अर्थात कि नानी मां तो शरद महाराज और ओलीबुल का जो रिश्ता था तो शरद महाराज उनको कहते थे ग्रेनी तो उनको एक लेटर लिखा कहा कि नरेंद्र हमको इस तरह से डांटता है कि अब हमारी अवस्था बहुत खराब है तो मिसेज ओली बुल स्वामी जी को लेटर लिखती है शर्म नहीं आती अपने गुरु भाइयों को इस तरह से डांटते हो अब बेचारे गुरु भाई डायरेक्ट तो नहीं बोल पाएंगे तो इस तरह से जाके उनको कंप्लेन कर दिया स्वामी जी जो लेटर लिखते हैं ना मिसेज ओलीबुल को सही में पढ़ने लायक है। इतना सुंदर लेटर लिखे स्वामी जी बोलते हैं मैं इंपेशेंट हो जाता हूं। आपकी बात बिल्कुल सही है। गुरु भाई ने जो त्याग किया है जो तपस्या की है उससे माने जो 16 जो है उनके अलावा है कौन इस जगत में ठाकुर का नाम सही में आगे ले जाने के लिए और मैं इनको डांटता हूं इस तरह से व्हिच इज वेरी बैड। किंतु मैं बहुत इंपेशेंट हो जाता हूं। ठाकुर का जो यह मुझे मुझे पता चल गया है कि मैं अभी ज्यादा नहीं रहने वाला हूं। ठाकुर का मिशन मेरी एब्सेंस में चलना चाहिए। तो इसलिए मैं डांटता हूं उनको। तो देखिए स्वामी जी को एकदम आखिरी जो ब्लैकमेल का वो जो होता है ना कि मैं नहीं रहूंगा तो तुम्हारा क्या होगा? तो वो सामने वाला सेंटीमेंटल होकर के अब जैसे वो हरि महाराज को ब्लैकमेल करते हैं इमोशनल ब्लैकमेल। वो हरि महाराज को कहते हैं कि तुमको अमेरिका जाना पड़ेगा। हरि महाराज कहते मेरे से नहीं होगा। तो स्वामी जी ने उनको गले आलिंगन करके रोना शुरू कर दिया कि मैं ही जा मेरा अपना जीवन नष्ट कर दूंगा। मैं ही मर जाऊंगा। तुम लोग कुछ हेल्प नहीं करोगे तो बेचारे वो हृदय पिघल गया। अच्छा ठीक है मैं जाता हूं वहां पे। सो दैट इज स्वामी जीस अल्टीमेट वेपन कि वो इमोशनल ब्लैकमेलिंग मैं मरने वाला हूं। तुम लोग नहीं करोगे तो क्या होगा? सो वहां तक स्वामी जी को जाना पड़ा था। यू आर राइट कि स्वामी जी के हृदय में जो प्रेम है एवरीवन कैन सी दैट। डांटना फॉर द आउट ऑफ एोगेंस आउट ऑफ डिजायर फॉर पावर। यह भी सामने वाले देखते हैं और डांटना आउट ऑफ लव। अब जैसे कि मां बच्चे को डांटती है। मां बच्चे को मारती है। म कितने बच्चों को मां मारती भी है। तो वो मारती है तो बच्चे को पता है कि वो भले ही चाहे इस क्षण मुझे मार रही है। नेक्स्ट दूसरी ही पल मेरे लिए अच्छा खाना बना करके मुझे प्रेम करके अपनी गोद में बिठा करके मुझे शांत करेगी। बच्चा पता है उसको तो इसलिए मां के साथ में कभी वह गुस्सा नहीं करता। सो दैट कंपैशन दंड और प्रेम यह दोनों साथ में चलने चाहिए। तभी वो सामने वाला समझ पाएगा कि आपका जो यू आर अ जेन्युइन पर्सन यू आर नॉट अ फ्रॉड।

प्रश्न: आंतरिक जीवन में हम जो साधना करते है वो किस प्रकार बाह्य जीवन में हमारी इच्छा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होती है?

ये जो आपने जो कहा ना कि बाहर के जगत में तो और भी डेंजरस उदाहरण है। अभी जस्ट रिसेंटली एक न्यूज़ रिपोर्ट आया था ना कि एक यंग आईएएस ऑफिसर बड़ा प्रॉमिसिंग और बड़ा आइडियलिस्टिक और उसके बारे में न्यूज़पेपर में भी अच्छा कुछ दो-तीन बार छपा होगा। सडनली उसके घर में वह छापा मारा तो पता चला कि 10 लाख नहीं 15 लाख नहीं ऐसा कुछ रुपया कैश मिला है। तो अब देखिए कि जो आईएएस ऑफिसर मिडिल क्लास फैमिली से जो बनते हैं वो यूपीएससी एग्जाम पास करना वो सब कितना कठिन है और पूरा उसके मां-बाप की कितनी उसके ऊपर में आशा होगी और उसने फिर चरित्र की वीकनेस की वजह से वह ब्राइब ले लिया। अभी बहुत सारे लोगों को तो पकड़े भी नहीं जाते हैं। यह बेचारा आ गया पकड़ में। वो बदनाम भी हो गया। तो आपका पूरा लाइफ टाइम का ये जो था एक गुडविल आपने जनरेट किया था वो सब विद इन वन मोमेंट वो शटर हो गया ना। सो यू आर राइट कि बाहर के जगत में और भी बड़े भयानक टेंप्टेशन है। आपने एक बड़ा अच्छा बनाया वेरी गुड क्वेश्चन कि इनर लाइफ में जो अपनी जो इनर प्रैक्टिस जो होती है हाउ कैन इट इंपैक्ट आवर आउटर लाइफ विल पावर प्रैक्टिस। तो इस तरह से कि मान लीजिए कि बार-बार आप अपने मन को जो आत्म तत्व पर केंद्रित करते हैं तो आत्म तत्व जैसे कि वह है ना चंदन को घिसते हैं तो कैसी चंदन की खुशबू आती है। लकड़ी वैसे पड़ी रहेगी तो उसमें से वो खुशबू नहीं आएगी। ये शुरू-शुर में मैं अपने वो जाता था मंदिर में वह चंदन की लकड़ी है इसको घिसो तो इसमें से तो कोई खुशबू नहीं आ रही क्योंकि जैसे घिस पानी डाल के वो पत्थर के ऊपर में जैसे आप घिसना शुरू करें पेस्ट जैसे बनती जाएगी वैसे खुशबू आती जाएगी। सो यह आत्म तत्व ऐसा है। जितना उसके ऊपर में हम अपने मन को एकाग्र करते जाएंगे उसकी यह जो सुवास है यह जो ज्ञान भक्ति वैराग्य रूपी सत चित आनंद रूपी अस्थि भांति प्रिय रूपी ये जो सुवास है इसकी वो अपने पूरे बॉडी में वो फैलती जाएगी और दिस इंटर्न इट विल स्ट्रेंथन आवर विल पावर ये विल पावर का फूड क्या है आपको फूड या एक्सरसाइज अल्टीमेटली क्या है तो यह आत्म तत्व ही उसका एक्सरसाइज या तो आत्मत्व ही उसका फ़ूड है मोर दैन दैट विल पावर फीड्स ऑन आत्म तत्व। या तो फिर मान लीजिए कि मैं ऐसा इमेजिन करता हूं कि मैं मां की गोद में बैठा हूं। तो मां का यदि सही में अवतरण होगा मेरे हृदय में तो मां का जो प्रेम है वो जो फैलना शुरू होगा दैट लव इज द फूड फॉर विल पावर। सो विल पावर उससे स्ट्रेंथन होता जाएगा।

प्रश्न: यदि बाह्य जगत में मेरी इच्छा शक्ति कमजोर है तो मेरी आंतरिक साधना भी कमजोर होगी। दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

हियर आई विल से दैट अह बेटर नॉट टू इक्वेट देम बोथ। सी बोथ आर रिलेटेड व्हिच इज ऑब्वियस इफ माय इनर प्रैक्टिससेस आर गुड एंड इफ आई एम इन टच विथ माय आत्मत्व और इष्ट मोर एंड मोर इट विल फीड अपॉन दैट दैट जॉय दैट ब्लीस दैट पीसफुलनेस व्हिच रिलीजेस फ्रॉम आत्मत्व और फ्रॉम द ईस्ट इट फीड्स इट अह नरिशेस द विल पावर व्हिच इज़ वेरी ऑब्वियस कि बोथ आर डायरेक्टली कनेक्टेड बट आई विल सजेस्ट दैट इफ इफ आय एम अनेबल टू एक्सरसाइज विल पावर ओर एक्सरसाइज दिस रिस्ट्रेंट इन माई आउटर बिहेवियर डू नॉट टेक इट एस अ लैक ऑफ माय इनर प्रैक्टिस बिकॉज़ दिस विल क्रिएट वन डेंजरस थिंग कॉल्ड गिल्ट फीलिंग दैट माय इनर प्रैक्टिस सम हाउ इज़ नॉट गुड इनफ देन द सेम थिंग विल हैपन दैट आई वाज़ रिसाइनफुल टुवर्ड्स माई को-वर्कर। व्हाई बिकॉज़ आई फील दैट दे आर नॉट गुड इनफ। नाउ सी फ्रॉम देयर पॉइंट ऑफ व्यू दे आर डूइंग एज मच एज इज पॉसिबल फॉर देम। जस्ट माय एक्सपेक्टेशन इज टू मच एंड दिस एक्सपेक्टेशन इट प्रोड्यूसेस रिजेंटमेंट इन मी। सो हियर इफ आई कीप ऑन थिंकिंग दैट माय एक्सटर्नल विल पावर मैनिफेस्टेशन इज़ नॉट गुड इनफ। दैट मींस माय इनर प्रैक्टिस इज़ नॉट गुड। दिस आइडिया इट विल जनरेट गिल्ट फीलिंग। एंड दिस आईडिया विल ऑल्सो जनरेट रिज़ेंटमेंट व्हिच इज़ इवन मोर डेंजरस। सो बेटर टू कीप देम बोथ सेपरेट। इवन दो बोथ आर कनेक्टेड बेटर टू कीप देम सेपरेट इन आवर माइंड। गो ऑन प्रैक्टिसिंग एंड इनर इनर प्रैक्टिस। गो ऑन प्रैक्टिसिंग इनर प्रैक्टिस। गो ऑन एक्सरसाइजिंग विल पावर इन आउटर वर्ल्ड। एंड लेट इट बी अप टू ठाकुर दैट हाउ मच आई कैन अचीव इन बोथ दिस फील्ड। बिकॉज़ द पाथ ऑफ साधना इज सो ट्रिकी। एवरी पॉइंट लाइक आई सेड दैट व्हेन आई फर्स्ट रिटर्न टू बेलूर मठ। आई जॉइंड बेलूर मठ एंड फ्रॉम देयर आई वास पोस्टेड टू नागपुर। अह एट दैट टाइम आवर इंचार्ज वाज़ सुहितानंद जी महाराज। सो ही सेंड मी टू नागपुर। ही गव मी सम इंस्ट्रक्शन बी प्योर, बी होली, स्टडी एज़ मच एज़ यू वांट एटसेट, एटसेट। व्हेन आई रिटर्न फ्रॉम नागपुर ही वास टॉकिंग विथ मी सेड ओके व्हाट डीड यू डू देयर सो आई टोल्ड हिम महाराज आई ट्राई टू बी एस प्योर एस होली एस पॉसिबल सो ही लिसन टू मी फॉर सम टाइम एंड देन इमीडिएटली ही सेड सी बी वेरी केयरफुल व्हाट यू आर सेइंग यू कीप सेइंग दैट आई ट्राई टू बी वेरी प्योर वेरी होली दिस आइडिया विल गोज़ रिजेंटमेंट इन योर हार्ट टुवर्ड्स अदर्स। व्हाई? बिकॉज़ आफ्टर अ वाइल यू विल स्टार्ट थिंकिंग दैट अदर्स आर नॉट एज गुड एस यू एंड दिस विल क्रिएट अ एनिमिटी टुवर्ड्स देम व्हिच इज वेरी बैड। सो, इट्स नॉट दैट ही डजंट वांट मी टू बी प्योर एंड होली। व्हाट ही इज़ सेयिंग, डोंट हारप अपॉन इट। डोंट गो ऑन थिंकिंग अबाउट इट। बी होली एंड प्योर विदाउट थिंकिंग, व्हिच इज़ पैराडॉक्सिकल। बिकॉज़ दैट पाथ ऑफ स्पिरिचुअलिटी इज़ फुल ऑफ पिटफॉल्स। इट्स फुल ऑफ ट्रिक्स एंड ट्रैप्स। सो एवरीथिंग इवन द बेस्ट ऑफ द बेस्ट आई एम डूइंग लॉट ऑफ जपम वि इज वेरी गुड बट नेक्स्ट मोमेंट इट विल कॉज एोगेंस इन मी सी आई एम डूइंग वन आवर ऑफ जपम एंड माय अदर साधुस लिविंग इन द सेम सेंटर दे कैन नॉट इवन सीट फॉर 10 मिनट्स दैट मींस आई एम बेटर देन देम नाउ डूइंग जपम इट शुड रिड्यूस माय ईगो इट शुड रिड्यूस माय टेंप्टेशन एवरीथिंग इंस्टेड ऑफ़ दैट द सेम जपम इज़ इंक्रीजिंग माय एोगेंस व्हिच इज़ पैराडॉक्सिकल राइट सो स्पिरिचुअल पाथ इज फुल ऑफ ट्रैप्स एंड वी हैव टू बी केयरफुल हियर।

प्रश्न: कौन सी साधना बाह्य साधना है और कौन सी आंतरिक?

देखिए एज ए रूल ऑफ थंब यदि कहे तो अपने कमरे में अकेले बैठ के जो कुछ भी हम करेंगे दैट विल बी पार्ट ऑफ इनर साधना। कमरे से बाहर निकल कर के जो कुछ भी करते हैं पार्ट ऑफ एक्सटर्नल साधना। बट अगेन देयर आर नो सच आई मीन अब मंदिर में जाकर बैठते हैं तो अगेन इट्स अ यू एंड ठाकुर। राइट? सो कहेंगे कि जब तक दूसरे लोगों को इनवॉल्व नहीं करते हैं ना तब तक जहां तक हम अकेले हैं जो कुछ करते हैं इट्स अ पार्ट ऑफ आवर इनर साधना और जहां पे दूसरे लोग इकट्ठा हो अब जैसे मैं एक एग्जांपल देता हूं माने सेम सिचुएशन है उसको आप दोनों तरीके से देख सकते हैं मेरा जो खुद का अनुभव है मैं जब लिमड़ी में था तो मैं मंदिर में काम करता था अभी लिमड़ी में मैं ही अकेला था मैं और बापा महाराज दो ही थे तो बाबा महाराज तो मंदिर में आएंगे नहीं काम करने के लिए जो कुछ भी करना है मुझे करना करना है। सो मैं वहां पर चंदन घिस रहा हूं। वहां पर मैं फूल तोड़ रहा हूं। वहां पर मैं ठाकुर को सजा रहा हूं। ठाकुर को वस्त्र पहना रहा हूं। ठाकुर के सामने मैं आरती कर रहा हूं। सब कुछ मुझे अकेले करना है। दैट मींस ये मेरी इनर साधना हो गई। अब जैसे मैं राजकोट में आया। वहां पे भी मेरा मंदिर में ड्यूटी था। वहां पे किंतु चार ब्रह्मचारी और है मेरे साथ में। एक साथ में बैठकर के ठाकुर के लिए फूलों का यह जो वाज़ है वो वो सजा रहे हैं। बट दिस बिकम्स एन एक्सटर्नल साधना। क्योंकि मुझे दूसरों के साथ में कोऑर्डिनेट करना है। मैं अकेला यहां पे नहीं चंदन घिस रहा। साथ में दूसरा एक ब्रह्मचारी खड़ा है। वो ठाकुर के लिए वह तुलसी के पत्ते सजा रहा है। साथ में एक दूसरा एक वॉलंटियर खड़ा है। वो ठाकुर के लिए बिल पत्र धो रहा है। धो के वो पूजा के थाले में सजा रहा है। मैं वहां पे चंदन सिर्फ घिस नहीं रहा हूं। साइलेंटली जो वहां पे है सबके साथ मैं बात कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं। कोऑर्डिनेशन चल रहा है। इन दैट सेंस मैं जो कुछ भी करूंगा वहां पे वह सबको असर होने वाली है। सो व्हेन अ सेकंड पर्सन इज़ कंसर्न तो हमारी एक्सटर्नल स्टार्ट हो गया। क्योंकि देयर इज़ नो सच अ थिंग। आप पूजा भी करेंगे साथ में तंत्रधारक महाराज बैठे हैं तो आपको कोऑर्डिनेशन करके ही पूजा करनी है। सो दिस इज़ अ रूल ऑफ़ थंब।