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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 7 Oct 2025

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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद के जीवन की घट घटनावली उसका हम स्टडी कर रहे हैं इस सप्ताह ऑलरेडी वराह नगर मठ यह जो फज़ है। इसके हमने प्रथम दो चैप्टर देख लिए हैं। प्रथम चैप्टर में हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि के बाद में अ ठाकुर ने मां शारदा देवी और स्वामी जी दोनों को दर्शन देकर के भविष्य किस तरह से रामकृष्ण संघ का समुन्नत समोज्जवल होने वाला है। उसका एक इंगित प्रदान कर दिया था। इसके बाद में ठाकुर के अस्थियों को लेकर के थोड़ा सा विवाद हुआ था और फिर यह जो त्यागी लड़के हैं जो सब उनका भविष्य क्या है वो क्या अपने घर चले जाएंगे शादी करेंगे नौकरी करेंगे यह सब करेंगे कि ठाकुर के दर्शाए हुए आदर्श के अनुसार त्याग तपस्या और ईश्वर आराधना का जीवन व्यतीत करेंगे तो वह डिबेट चला इसके बाद में हमने देखा कि सेकंड चैप्टर वराह नगर मठ की स्थापना हुई और वराह नगर मठ के कुछ प्रारंभिक दिनों की कुछ-कुछ घटनाएं तो फिर सुरेश मित्र अपने घर में वह पूजा कर रहा था। ठाकुर ने आकर के दर्शन दिया। वो दौड़ा दौड़ा नरेंद्र के घर आया। नरेंद्र और भनाथ ने मिलकर के वराह नगर जो एरिया है कोलकाता का सबबर्ब वहां पे जाकर के एक जो घर था पुराना टूटा फूटा घर पोड़ोवाड़ी लोकेरा बोलतो अर्थात कि वो जला हुआ टूटा फूटा घर इसको भाड़े पर लिया और फिर वहां पर मठ की स्थापना हुई ठाकुर के व्यवहृत जो सब वस्त्र थे जो उनकी पादुका थी और ठाकुर के जो अस्थि थे वहां पर रक्षित रखे गए और शशि महाराज ने पूजा का प्रारंभ किया। पूजा का जिम्मा लिया। और कुछ उसी दिनों की कुछ मधुर घटनाएं जो कि स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्रनाथ दत्त अपनी किताब में उसका उल्लेख करते हैं। अभी हम तृतीय चैप्टर की ओर कल से आगे बढ़ रहे हैं। तृतीय चैप्टर का मैंने टाइटल दिया है अफमेशन ऑफ फेथ या तो फिर श्रद्धा का दृढ़ीकरण। ठाकुर के दिशा निर्देश अनुसार ठाकुर की प्रेरणा से उन्होंने वैसे तो त्याग अपना ही लिया है। त्यागमय जीवन अपना ही लिया है। किंतु यह त्यागमय जो जीवन है ठाकुर के रहते रहते जो घटनावली हुई थी। अभी उनके अंतर्ध्य होने के बाद में उनकी दैहिक महासमाधि होने के बाद में क्या वही उत्साह वही त्याग वही तपस्या वही मुमुक्षुत्व वही ईश्वर प्राप्ति की व्याकुलता वही इंद्रिय संयम वही संसार के प्रति विराग वही शास्त्र और परंपरा के प्रति प्रेम वही साधना में सतत लगे रहना यह सब क्या गुरु भाई मेंटेन कर पाएंगे कि नहीं ठाकुर एक उदाहरण देते हैं ना कि एक अग्नि जल रहा है उसके ऊपर में यह आलू है वगैरह जो है उबालने के लिए रखे है तो अग्नि की वजह से क्या है कि पानी में आप कुछ उबालने को रखेंगे आलू है या ऐसी और कोई सब्जी तो वह जंप लगाएगी क्योंकि एनर्जी नीचे में से मिल रही है तो यह सब लोग सोच रहे हैं कि हम अपनी ताकत से उछल कूद कर रहे हैं किंतु नीचे की अग्नि यदि बुझ जाए तो फिर यह पानी ठंडा हो जाएगा और यह जो वेजिटेबल को बॉईल करने के लिए रखा है वे लोग भी ठंडे हो जाएंगे और जंप करने की शक्ति उनमें में रहेगी नहीं। तो यहां पे वैसे तो ठाकुर सबके हृदय में वर्तमान है ही है। ठाकुर की महासमाधि के बाद में उनकी जो भस्म थी अस्थि थी उसका एक-एक अंश गुरु भाइयों ने ग्रहण किया था। यानी कि लिटरली और मेटाफोरिकली दोनों रूप से ठाकुर इन लोगों के हृदय में वैसे तो वर्तमान थे। किंतु क्या है कि यह सब चीजें अपने जीवन में जब आती है, टेस्ट जब आता है, तब सही-सही पता चलता है कि ठाकुर के प्रति हमारा जो आकर्षण या प्रेम कितना दृढ़तम है कि जब जीवन चैलेंजेस फेंकना शुरू करेगा, तो उस चैलेंज के सामने भी हम टिके रह पाएंगे। तो वह जीवन की चैलेंज तो ऑफ कोर्स यह प्रारंभ हो ही गई है। नरेंद्र के घर की क्या परिस्थिति थी हमको पता है। और इन जनरल वराह नगर मठ में रहना है। खाने-पीने का कोई ऐसा तो बंदोबस्त था नहीं। वैसे यहां पर गंभीरानंद जी ने युगनायक में लिखा है कि सुरेश मित्र ने जब घर का भाड़ा देने का ठीक किया था तो उसी घर के भाड़े में से एक ब्राह्मण को भी रखा गया था जो कि खाना बनाए एज ए कुक उसको रखा गया था किंतु बाद में ऐसे बहुत सारे विवरण आते हैं जबकि वहां पर हमको ऐसा देखने को मिलता है कि आज घर में जो खाना है मठ में वो वो सम इनफ टफ नहीं है सबके लिए। तो यह लोग सब तपस्या कर रहे हैं। पता नहीं ठाकुर पर छोड़ दिया है कि जब खाना मिलेगा तब मिलेगा। नहीं मिलेगा तो हम लोग बैठकर के तपस्या ही करते रहेंगे। तो वह सब है सब तपस्या के काफी इंसिडेंट्स है। तो फिर यह क्या है कि चैलेंज जब आती है तब पता चलता है कि ठाकुर के प्रति अपनी श्रद्धा कितनी दृढ़ है। देखिए हम सभी के जीवन में जब हम दीक्षा लेते हैं रामकृष्ण संघ में परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज है या परम पूजनीय वाइस प्रेसिडेंट महाराज है तो वो जो दीक्षा का माहौल जो जिस दिन का होता है हमको ऐसा लगता है कि बस अभी चंद ही दिनों में हम लोग तपस्या करके ईश्वर प्राप्ति कर लेंगे ठाकुर के दर्शन प्राप्त कर लेंगे इतना सुंदर जब भी अपने कोई भी आश्रम में दीक्षा होती है तो माहौल बनता है वॉलंटियर्स जो होते हैं वो सुंदर वो कुर्ता धोती पहन करके ऐसा करके वह आश्रम में आ जाते हैं। सुबह से वह फूल वगैरह तैयार करना है। वो गुरु को ऑफर करने का जो थाला होता है बास्केट होती है गुरु पूजा के लिए वो तैयार करते हैं। पहले से ही सब इंस्ट्रक्शन दी जाती है। भूखे पेट आप सबको अर्ली मॉर्निंग मंदिर में जाकर के बैठ जाना है। फिर अपने परम पूजनीय जो महाराज जी है दीक्षा गुरु वो आगमन करेंगे वह आपको मंत्र देंगे सब इंस्ट्रक्शन देंगे उसके बाद में गुरु प्रणाम होगा सर के ऊपर में ठाकुर की जो अस्थि है वो स्पर्श करवाएंगे तो उस दिन तो लगता है कि वाह अभी यह जन्म जो है हम लोग तैर गए हैं भवसागर तैर ही गए हैं। उसके बाद में मैं जब राजकोट में था तो यह लोग जो दीक्षा लेते थे तो कभी-कभी एक-द सप्ताह के बाद में उनको मैं पूछता था कि अच्छा बताओ तो कि दीक्षा के समय जितना जो आपको इंस्ट्रक्शन दिया गया है कि जिस इस तरह से जप करना है तो उसमें से कितना करते हो? तो अभी बेचारों का चेहरा ऐसा हो जाता था कि महाराज के सामने झूठ कैसे बोले और फिर जो उत्तर है वह शर्मिंदा करने वाला था तो वे लोग कुछ ना कुछ बहाने बना देते थे कि अच्छा मैं इस सप्ताह तो बाहर गया था काम के लिए तो कुछ हो नहीं पाया जैसे ही मैं वापस आया हूं वैसे ही मैं फिर से स्टार्ट कर दूंगा तो ऐसे उत्तर से मैं समझ जाता था कि विदिन वन वीक जो वो उत्साह था वो इस तरह का रहा नहीं है तो देखिए कि आपको को तो पूरा जीवन इस मंत्र के साथ में बिताना है। बहुत बार हम लोग हताश निराश हो जाते हैं। मंत्र वगैरह कहां अदृश्य हो जाता है उस समय पता भी नहीं चलता। इसलिए बार-बार आश्रम में आकर के एक्टिविटी में पार्टिसिपेट करके वह जो अग्नि जो है आराधना रूपी ईश्वर आराधना रूपी वो अग्नि को सतत प्रज्वलित रखना पड़ता है। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर तो चले गए। जब तक ठाकुर थे, जब तक ठाकुर की आध्यात्मिक साधना की तरंगे, आध्यात्मिक उपलब्धि की तरंगे चारों ओर बह रही थी, तो उस बहती गंगा में स्नान करके तो सभी लोग शांति से रह रहे थे। किंतु ठाकुर के अंतर् ध्यान होने के बाद में पंचमहाभूत के देह का विलय होने के बाद में हृदय में जो ठाकुर बैठे हैं उस हृदय में बैठे हुए ठाकुर के प्रति इतनी निष्ठा रख पाना इन द फेस ऑफ चैलेंजेस जीवन तो चैलेंज फेंकता ही जाएगा तो फिर वो टिकी रहेगी कि नहीं देखिए इवन ठाकुर के साथ में सुंदर इंसिडेंट है कि अब डॉक्टर सरकार ठाकुर की ट्रीटमेंट करने के लिए आते आते थे। तो अभी डॉक्टर सरकार का क्या था कि एक तो घोर मटेरियलिस्टिक वो उनका माइंडसेट था। उन्होंने एक किताब लिखी है लिखी थी वो मास्टर महाशय को गिफ्ट में दी थी। किताब का टाइटल था फिजियोलॉजिकल बेसिस ऑफ साइकोलॉजी। अर्थात कि मन में जो कुछ भी क्रियाएं हो रही है हमारी ये चित्त मन बुद्धि चित्त अहंकार रूपी जो अंतःकरण है उसके जितने भी यह सब जो कॉम्बिनेशन परम्यूटेशन है जो कॉन्शियसनेस का पूरा साइंस जो है वो पूरा फिजियोलॉजिकल प्रोसेस के ऊपर में ही डिपेंडेंट है। यह फिजिकल बॉडी में ये जो एंजाइम्स है, हॉर्मोंस है, वह जो रिलीज होते हैं, वही हमारी कॉन्शियसनेस को चालित करते हैं। अर्थात कि अपनी कॉन्शियसनेस है। इट इज वो अपने मटेरियल बॉडी के ऊपर में ही डिपेंडेंट है। जबकि वेदांत रिवर्स कहता है। वेदांत कहता है कि बेस्ड अपॉन द हेल्थ ऑफ आवर कॉन्शियसनेस आवर बॉडी रिएक्ट्स। यदि मैं खुश हूं तो मेरा शरीर हेल्दी रहेगा। मैं सतत डिप्रेशन में रहता हूं या फियरफुल रहता हूं या रिजेंटफुल रहता हूं या स्ट्रेस में रहता हूं तो मेरा बॉडी पे उसका बड़ा ही नेगेटिव असर होगा। तो यह वेदांत का पॉइंट ऑफ व्यू है कि कॉन्शियसनेस प्राइमरी है। बॉडी उसको रिसोंड करता है। जबकि यह डॉक्टर सरकार का था ये फिजियोलॉजिकल बेसिस ऑफ साइकोलॉजी अर्थात कि यह बॉडी जो है मटेरियल बॉडी यही प्राइमरी है और अपनी कॉन्शियसनेस या अपना माइंड उसको रिसोंड करता है। तो वो उनका पॉइंट ऑफ व्यू कथामृत में इनफ हमको चर्चा और डिबेट दिखाई देती है ठाकुर और डॉक्टर सरकार के बीच में। तो अभी एक बार का डायल वार्तालाप है कि ठाकुर की ट्रीटमेंट करने के लिए वह डॉक्टर सरकार आए हुए हैं। तो अभी क्या है कि रह रहे हैं काशीपुर में इतना सुंदर गार्डन है। इतना सुंदर मकान है और डॉक्टर सरकार तो माने दुनियादारी समझने वाले आदमी थे ना। तो उनको समझ में आता है कि यह खर्चा कितना हो रहा है यहां पे। तो किसी ने कहा कि यह जो जितने भी डिस उनके ये जो भक्त हैं वे लोग पैसा देते हैं। तो डॉक्टर सरकार वो मजाक करके कहते हैं देखा कांचन दरकार अर्थात कि यह कांचन अर्थात कि रुपया उसकी जरूरत है। इसके बिना यह कैसे चलेगा काम? ठाकुर बार-बार कहते हैं ना कामिनी कांचन त्याग कामिनी कांचन त्याग। तो यह डॉक्टर सरकार सामने कहते हैं कि आपकी जो ट्रीटमेंट के लिए खर्चा हो रहा है यह डिवोटी लोग यह जो सब आपके लिए खर्चा कर रहे हैं वो पैसा नहीं होता तो ट्रीटमेंट कैसे होता आपके लिए इतना महंगा घर भाड़े करना ये सब कैसे होता आपका तो ठाकुर कहते हैं कि बड़ो झंजाल माने ये बड़ी झंझट है तो डॉक्टर सरकार उस उसी समय डॉक्टर सरकार के एक मित्र वहां पर बैठे हुए थे तो वो सामने वो एक बार डॉक्टर कामिनी कांचन ठाकुर बार-बार कहते हैं ना तो ऑलरेडी कांचन को लेकर के तो डॉक्टर सरकार ने कह दिया अभी साथ-साथ में उनका जो मित्र बैठा है वह कहता है कि एर परिवार रेधे बेध अर्थात ये ठाकुर की जो पत्नी है ठाकुर के लिए खाना बना देती है तो डॉक्टर सरकार खुश होकर के बोले देखा कामिनी दरकार बोले अर्थात कि कामिनी की भी जरूरत है कि आपकी पत्नी नहीं होती आपके लिए खाना बनाने के लिए तो कैसे चलेगा हमें स्पेशल खाना खाना है ना डाइट जो कहते हैं डाइट फूड खाना है। सामान्य तो खा नहीं सकते। गले में कैंसर है निकल जाएगा। वो भीतर में जाने में भी तकलीफ है। तो वो स्पेशल डाइट ठाकुर के लिए जिस तरह से वो वैद्य कह देते थे उस तरह से मां बनाती थी। तो डॉक्टर सरकार ने कहा कामिनी भी दरकार और कांचन भी दरकार। दोनों की जरूरत है। तो ठाकुर बेचारे क्या बोलेंगे? बोलेंगे बड़ी बहुत झंझट है। क्या करेंगे यह सब को लेकर के? तो डॉक्टर सरकार कहते हैं झंझट ना थक ले सबाई परम मोहंश माने झंझट नहीं रहती तो सभी लोग परमहंस हो जाते सभी के जीवन में चैलेंज तो है ही है यदि चैलेंज नहीं है क्राइसिस नहीं है प्रॉब्लम नहीं है तो हम लोग सभी लोग परमहंस होकर बैठ जाएंगे ना वो आपको यह क्राइसिस है उसका सामना करके आपको परमहंस होना है वो उसके क्राइसिस का सामना करने के लिए आपको कामिनी और कांचन चाहिए माने जो डॉक्टर सरकार कहना चाहते हैं चाहते थे। उसके सामने निश्चय ठाकुर का जो कहना था कि यह जो हमारी जीवन की जो आवश्यकता है जिसको कि इस तरह से आप लस्ट और गोल्ड या तो फिर मनी एंड यह डिजायर उसके रूप में आप व्यक्त कर रहे हैं। उसको ट्रांसेंट करके ही तो महापुरुष हुआ जाता है ना। एक सामान्य आदमी जब भी जीवन की चैलेंज आएगी, तो वह सोचेगा लस्ट एंड ग्रीड जो है वह इसका उत्तर है। ठाकुर कहते हैं कि वो जब तक आपका उत्तर वही रहेगा कि लस्ट एंड ग्रीड तब तक आप आम आदमी ही बने रहेंगे। उसको ट्रांसेंट करके ही तो आपको महापुरुष होना है। तो खैर यहां पे जो हम लोग कहना चाहते हैं दिस एफमेशन ऑफ फेथ ये जो चैप्टर है कि देखिए कि चैलेंज के सामने रह के यह जो डिजायर्स है शरीर के मन के उसको ट्रांसेंड करके इनको रहना है। तो यह जो ट्रांसेंडेंटल प्रोसेस जो ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह गुरु भाइयों की प्रारंभ हुई थी। उसमें दो बड़ी ही महत्वपूर्ण घटनाएं आंठपुर का इंसिडेंट किस तरह से 24 दिसंबर क्रिसमस ईव को नरेंद्र की यह जो प्रेरणामय वाणी है उसको सुनकर के श्रवण करके सभी गुरु भाइयों ने ठीक किया कि वह लोग श्री रामकृष्ण को और श्री रामकृष्ण के उपदेश के प्रचार को अपना जीवन समर्पित करेंगे। सो वो एक इंसिडेंट और दूसरा फेमस इंसिडेंट कि वराह नगर मठ में वापस आकर के आठपुर से इन लोगों ने विजा होम करके विधिवत सन्यास लिया। तो ये दो घटनाओं का उल्लेख मैंने इस चैप्टर में किया है। ऑफ कोर्स जैसे मैंने पहले ही कहा था ये चैप्टर्स जो है वो सब मैंने ही बनाए हैं। डिफरेंट-डिफरेंट किताबों में से मटेरियल कलेक्ट करके। तो अभी ऑलरेडी इस चैप्टर का प्रथम पॉइंट है नरेंद्र की लीडरशिप। उसका हम पाठ करना शुरू कर दिए थे। यह पोर्शन मैंने युगनायक में से लिया है और उसमें भी यह सुंदर स्टेटमेंट है वो गंभीरानंद जी महाराज का नरेंद्र का जो दैहिक कांत थी उनकी जो फिजिकल ब्यूटी थी उसके बारे में। तो यह सेंटेंस वैसे तो कल हमने देख ही लिया है। मैं सिर्फ एक बार रिपीट कर देता हूं क्योंकि यह लिटरेरी दृष्टि से इतना सुंदर है। महाराज जी की ये जो लेखनी जो है गंभीरानंद जी की उसमें कभी-कभी फ्लैशेस होते हैं। फ्लैशेस ऑफ यू कैन से ब्रिलियंस फ्लैशेस ऑफ यू कैन से कि जीनियस। तो ये जीनियस ब्रिलियंट सेंटेंस है। स्वामी जी को डिस्क्राइब करने के लिए आप पेजेस आफ्टर पेजेस लिख सकते हैं। पूरी किताब लिख सकते हैं। किंतु एक ही स्टेटमेंट में यदि आपको उनका संपूर्ण दैहिक जो उनकी सुंदरता है वो व्यक्त करनी है तो इस सेंटेंस के अलावा और कोई स्टेटमेंट आपको नहीं मिलेगा। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? सुंदर सुगठित तहार समुन्नत और सबल शरीर सुंदर सुगठित उनका अर्थात कि स्वामी जी का समुन्नत और सबबल शरीर सुंदर अर्थात कि ब्यूटीफुल सुगठित अर्थात कि वेल फॉर्म्ड समुन्नत यानी कि स्ट्रेट ऐसा झुका हुआ या बूढ़े की तरह दिखते हैं। ऐसा नहीं उन्नत देह और सबल शरीर अर्थात कि फिजिकली फिट उज्जवलताहार देह कांत उज्जवल थी उनकी देह कांत अर्थात कि शरीर का जो वर्ण था शरीर का जो रंग था वो था उज्जवल प्रशस्त ललाटे प्रतिभ चिन्ह प्रशस्त जो ललाट ललाट अर्थात कि फोरहेड जो सुविस्तृत वाइड फोरहेड जो उनका था। उसमें प्रतिभा के चिन्ह दिखाई देते थे। प्रशांत बदने बिरत्व और दृढ़ संकल्पो अंकितो प्रशांत वदन वदन अर्थात कि चेहरा प्रशांत अर्थात कि पीसफुल प्रशांत चेहरे पे विरत्व और दृढ़ संकल्प अंकित थे। आयत नयन ध्वए अपूर्व मोहिनी शक्ति उनके जो दो नयन ध्व दो नयन जो थे नयन ध्वय अर्थात कि दो नयन उसमें एक तरह की मोहिनी शक्ति थी चलन बलने एकटा स्वच्छंद और आत्मविश्वास परिस्ो चाल चलन में एक स्वच्छ स्वच्छंदता और आत्मविश्वास परिस्पट हो रहा था अथच वेशभूषाय वैराग्य सुस्पष्ट छाप एवं आचार व्यवहारे अकपटता इतनी जो माने ईश्वर ने उनको इतनी यह जो वेल्थ दी है इतना यह जो उनको धन दिया है इसके बावजूद उनका जो वेशभूषा अर्थात कि पोशाक वगैरह जो पहनते थे उसमें वैराग्य की सुस्पष्ट छाप थी और उनका जो आचार और व्यवहार था उनका जो बिहेवियर था उसमें थी संपूर्ण अकपटता सौहार्द्य और अपरे प्रति श्रद्धा चिर प्रकटितो सौहार्द्य अर्थात कि फ्रेंडलीनेस और दूसरों के प्रति श्रद्धा हमेशा प्रकटित होती रहती थी। चिंताहार अद्भुत साहस उनके यह जो विचारधारा है उसमें अद्भुत साहस था। गंभीर जो ओ भयो दर्शनेर समावेश उनका जो बिहेवियर है उनका यह जो पर्सनालिटी है उसमें गंभीरता और प्रियदर्शन का समावेश था। कारजे महावीर सदृश्य क्रांतिहीनता और गुरु भक्ति और उनका जो कार्य था उसमें महावीर की तरह क्रांतिहीनता अर्थात कि टायरलेसनेस और गुरु भक्ति अर्थात कि ठाकुर के प्रति संपूर्ण समर्पण एक ही सेंटेंस में देखिए कितना सुंदर रूप से स्वामी जी की देह कांत है। स्वामी जी का सौंदर्य है। उतनी सुंदर रूप से वर्णना की गई है। ठाकुर का सौंदर्य भी कम नहीं था। मां जब ठाकुर के देह को मालिश करती थी, तेल लगा के मसाज जब करती थी, तब मां कहती है कि उनके देह से जैसे कि एक सुवर्ण कांत एक गोल्डन ग्लो उनके देह में से प्रकट होता था। ठाकुर जब गंगा में स्नान करने को जाते दक्षिणेश्वर में तो लोग लाइन लगाकर के देखने के लिए खड़े हो जाते। मांक ने खुद ने यह बात कही है। कामार पुकुर की घटना जब ठाकुर एक बार वहां पास में ही सिहोड़ ग्राम है। यह हृदय का गांव तो कामार पुकुर से सिहोड़ जाने के लिए पालकी में बैठकर के जाना। उन्होंने जैसे ही अपने कमरे में से घर में से बाहर निकले तो देखा कि इतने सारे लोग इकट्ठा होकर के उनको देख रहे हैं। तो ठाकुर ने पूछा अरे हृदय ये लोग मेरी ओर क्यों देख रहे हैं? ये लोग यहां पर क्यों इकट्ठा हुए हैं? तो हृदय कहता है कि आपने एक तो सुंदर सिल्क के कपड़े पहने हैं। ऊपर में से पान चिबा रहे हैं तो होठ लाल हो गए हैं। तो आप इतने सुंदर दिख रहे हैं कि सब लोग आपको देखने के लिए यहां पर खड़े हो गए हैं। तो ठाकुर थोड़े से नाराज हो गए। बोला कि अरे छी यह देह के प्रति लोगों का इतना आकर्षण देह के प्रति जो स्पिरिचुअल वेल्थ जो है यह जो आध्यात्मिक संपद है उसके प्रति दृष्टि नहीं है। दैहिक यह जो ब्यूटी है उसके प्रति यह उन लोगों का आकर्षण तो ठाकुर अपने घर में वापस चले गए। उस दिन वो फिर से घर से बाहर ही नहीं निकले। जब वो वहां पर पास में ही हवलदार पुकुर यदि आप लोग कामार पुकुर गए होंगे तो देखा होगा कि ठाकुर के कमरे ठाकुर का जो घर है वहां पास में ही वो तालाब है वहां पे लोग स्नान करने के लिए वगैरह जाते हैं। तो वो ठाकुर हलदार पुकुर जाते थे तो वह जो गमछा लगा के टॉवेल से अपने को देह को ढक करके जब जाते थे तो सब स्त्रियां जो है उनको देखने के लिए खड़ी हो जाती थी। तो ठाकुर नाराज हो जाते थे। ठाकुर हृदय को कहते हैं कि एक वस्त्र मुझे दो जिससे कि मैं अपना चेहरा छुपा दूं। तो फिर यह लोग यहां से जाए और नहीं जाएगी तो मैं यहां जो गमछा मैंने पहना है वो मैं छोड़ दूंगा। तो ठाकुर दिगंबर हो जाएंगे तो स्त्रियां वैसे ही भाग जाएंगी। तो हृदय कहता है अरे ना मामा यहां पे आप इस तरह से दिगंबर मत होइए। ये बहुत ही बुरा लगेगा सबको। तो देखिए कि ठाकुर को दैहिक कांत थी। माने वह जो फिजिकल ब्यूटी थी किंतु ठाकुर उसको पसंद नहीं करते थे। यह तंत्र साधना के समय ठाकुर की यह जो छाती है चेस्ट है सब समय उसका एक क्रिमजन रेडिश कलर एक रेडिश ग्लो उसमें से प्रकट होता रहता था। फिर ठाकुर ही कहते हैं बाद बात बाद में मैंने अपने देह को ऐसा मार मार करके कि यह जो सौंदर्य है भीतर ढुके जा भीतरे ढुके जा अर्थात कि भीतर में चले जा भीतर में चला जा ऐसा करके मार मार करके ठाकुर ने एक दैहिक सौंदर्य को भीतर में उन्होंने प्रवेश करवा दिया। इसीलिए मां कहती है कि बादबाद में जिन्होंने ठाकुर का जो ठाकुर का दर्शन किया है उनको पता नहीं है कि ठाकुर के देह की कांत वर्ण का उनका जो यह गोल्डन ग्लो था कितना खूबसूरत था। यह मैंने देखा है जब ठाकुर के पास में मां पहली बार रहने को आई थी। दक्षिणेश्वर में भी और कामारकुर में भी। तो देखिए कि यह एक फिजिकल ब्यूटी तो है ही है। आप जब आध्यात्मिकता के उच्च क्षेत्रों में हायर स्टेजेस में आप प्रवेश करेंगे तो यह जो स्पिरिचुअल ग्लो जो है भीतर में से वो फिजिकल ग्लो के रूप में वह प्रकट तो होगा ही होगा। और इसके प्रति अपना आकर्षण ना होना ही सबसे अच्छा है। कोई कोई ब्राह्म भक्त है उन्होंने वर्णन किया है कि जब ठाकुर समाधि में जाते थे या भाव में जब प्रवेश करते थे उनके चेहरे का जो हास्य जो है इतना सुमधुर हो जाता था कि कोई भी फोटोग्राफ जो है इतना दिव्य हास्य जो है उनके चेहरे की जो प्रसन्नता है उसको कैप्चर नहीं कर सकता। एक एक बात मैंने शायद पहले भी बताई थी। बेलूर मठ में आरोग्य भवन है। अर्थात कि रिटायरमेंट होम हम साधुओं का। तो ऐसा होता है कि तिथि पूजा के दिन हम जितने भी ब्रह्मचारी थे उस समय और जो भी जूनियर साधु होते हैं वो सभी आरोग्य भवन में जो रिटायर्ड साधु होते हैं सीनियर साधु सब उनको प्रणाम करने के लिए जाते हैं। तो मैं भी उस समय टीसी में था। तिथि पूजा अर्थात कि ठाकुर मां और 16 डायरेक्ट डिसाइपल अर्थात कि 18 दिन साल में 18 दिन आपको बेलूर मठ में आपके जो सीनियर हैं सबको जाकर के प्रणाम करना है। मठ ऑफिस में जाना है। मिशन ऑफिस में जाना है। आरोग्य भवन में जाना है। जहां पे जो सीनियर साधु हैं सबको प्रणाम करना है। तो वो ब्रह्मचारी हम जो नए-नए थे बड़ा तकलीफ भी होता था। बेलूर मठ में 100 से ज्यादा सीनियर साधु होंगे। सबको प्रणाम करना यानी कि आप सोच लीजिए आपकी कमर की क्या हालत होगी किंतु खैर वो एक मैंने इट्स अ एक्सरसाइज इन ह्यूमिलिटी तो बेल वहां पे हम लोग गए थे प्रणाम करने के लिए आरोग्य भवन वहां पे टॉप फ्लोर जो था एक स्वामी जी रहते थे सीनियर बड़े ही सीनियर साधु और पेंटिंग का उनको बड़ा शौक था तो उनके कमरे में आप जाएंगे तो पेंटिंग की सब तरह की सामग्री आपको दिखाई देंगी वो जो वाटर कलर होते हैं ना बोतल होती है लिक्विड कलर की तो बहुत सारी बोतलें इधर-उधर वो छोटी-छोटी कलर की बोतल रखी होगी डिफरेंट-डिफरेंट साइज के डिफरेंट-डिफरेंट टाइप के वो ब्रश होंगे। फिर वो जो वुडन फ्रेम होता है ना जिसके ऊपर में आप वो जो पेपर रखते हैं ड्राइंग करने के लिए पेंट करने के लिए आप खड़े-खड़े ना बैठे-बैठे पेंट कर सकते हैं। तो वो एक वुडन फ्रेम था। वुडन वुडन फ्रेम के ऊपर में वो जो बड़े-बड़े पेपर होते हैं खास करके ड्राइंग के लिए वाटर कलर ऑयल पेंटिंग के लिए यूज होते हैं तो वो पेपर उसमें लगे रहते थे तो एक बार मैं इस महाराज को प्रणाम करने के लिए गया टॉप फ्लोर पे तो देखा कि ठाकुर का वो जो कल्पतरु पोज़ जो है जो जिसको कि हम कॉमनली कल्पतरु पोज़ कहते हैं कि इस तरह से ठाकुर खड़े हैं। एक हाथ इस तरह से है एक हाथ इस तरह से है। तो इस यह जो पोज है उन्होंने पेंट किया है। तो अभी क्या है कि हाथ पैर उसका प्रपोशन वगैरह तो खैर ठीक है। वो तो कॉमन टाइप का ही था। आपको ऐसा ही लगेगा कि किसी 5 साल के बालक ने उसको ड्र पेंट किया है। अभी क्या है कि एक तो फोटो रियलिस्टिक पेंटिंग होता है कि एग्जजेक्टली जिस तरह से आपको मनुष्य दिखता है वैसा ही आप उसको पेंट कीजिए और फिर बहुत सारी एब्स्ट्रैक्ट स्टाइल में भी पेंटिंग होते हैं। तो और यह एब्स्ट्रैक्ट स्टाइल जो है उसका बड़ा मतलब रिस्पेक्ट भी बड़ा है। फोटो रियलिस्टिक आपको लगेगा कि जैसा दिखता है ऐसा ही मैं पेंट करूं। किंतु वो तो क्या है कि उसमें शुरू-शुर में हमको ऐसा लगेगा कि बहुत मेहनत करनी पड़ती होगी फोटो रियलिस्टिक करने में। किंतु वो स्टाइलिस्टिक पेंटिंग होता है ना वो तो इधर-उधर आपने वो ब्रश के स्ट्रोक्स मार दिए वो हो गया। ऐसा ही हमको लगता है। बड़ी-बड़ी आर्ट गैलरी में जाएंगे ना हम लोग डिसपॉइंट हो जाएंगे। हमको ऐसा लगता है कि वहां पे जाकर के अच्छे से वो फोटोग्राफ्स जिस तरह के पेंटिंग दिखने को मिलेंगे। किंतु नहीं वो सब एब्स्ट्रैक्ट। अभी जिसको यह एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट समझ में आता है वही लोग उसको एंजॉय कर पाएंगे। तो मैंने देखा ठाकुर का इस तरह से एक एब्स्ट्रैक्ट टाइप का पेंटिंग बनाया था। चेहरा है, इस तरह के हाथ है, बॉडी है। किंतु उस एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग को जैसा ही मैंने देखा ना, मैं इतना आश्चर्यचकित हो गया। ठाकुर के चेहरे पे वह जो दिव्य आनंद जो प्रगटित हो रहा था डिवाइन जॉय अद्भुत अद्भुत माने इतना सुंदर उनका वो जो चेहरे का एक्सप्रेशन उन्होंने ड्र ड्रॉ किया था पेंट किया था वो भी एब्स्ट्रैक्ट रूप में व्हिच वाज़ रियली वंडरफुल अभी हम लोग तो क्या ट्रेनिंग सेंटर में थे तो उस समय और वैसे भी उस समय मोबाइल का इतना यह नहीं था तो यदि होता मेरे पास में मोबाइल तो मैंने अवश्य उसका फोटो फोटो ले लिया होता। तो एनीवे अभी मुझे पता नहीं उस पेंटिंग का वगैरह का क्या हुआ। वो महाराज का तो आई थिंक निधन कब का हो गया है। पता नहीं अभी उनके पेंटिंग्स का क्या हुआ। किंतु देखिए कि यह जो भीतर में जो डिवाइन जॉय जो होता है दिव्य आनंद जो होता है वो इट रिशेप्स आवर बॉडी। हमारा जो देह है उसको रिशेप करता है। लिटरली उसको रिफॉर्म करता है। उसको रि आर्किटेक्ट करता है। और इसीलिए यह जो सब यह सुंदर वर्णन दिया गया है स्वामी जी का इट इज नथिंग बट इनर जॉय एक्सप्रेसिंग इन द फॉर्म ऑफ दी बॉडी। तो यह पूरा डिस्क्रिप्शन इसके बाद में महाराज जी क्या लिखते हैं? समस्त मिलिया ए नबिन जुबक के स्वतई ईश्वर निर्दिष्ट नेता बोलिया मने हो तो ये समस्त मिला करके यह जो दैहिक अंगकांत है फिजिकल ब्यूटी है फिजिकल ग्लो जो है जॉय का और फिर उनका जो बिहेवियर है जिसमें कि यह सेल्फ कॉन्फिडेंस प्रकट होता है उनका एटीट्यूड जो है फ्रेंडली एटीट्यूड है और उनके कार्य में जो टायरलेसनेस और ईश्वर ठाकुर ठाकुर के प्रति जो श्रद्धा जो भक्ति प्रकट होती है सब मिलाकर के इस नवीन युवक को देखकर के सचमुच में ईश्वर निर्दिष्ट नेता बोलकर के मन में होता था। यानी कि ओरेटर बाय डिवाइन राइट। स्वामी जी के बारे में अमेरिका में वो न्यूज़पेपर लिखते हैं कि ही इज़ एन ओरेटर बाय डिवाइन राइट। अर्थात कि वो ईश्वरीय आदेश से वो वक्सु वक्ता बना हुआ है। और एक न्यूज़ पेपर में वो वही वो नाइंथ सितेंंबर जो स्वामी जी 11th सप्टेंबर 11th सितंबर में वो स्वामी जी वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ शिका रिलीजन शिकागो में स्पीच देते हैं। उसके बाद में वो न्यूज़पेपर वाले लिखते हैं ना तो इस एक न्यूज़पेपर उनकी प्रशंसा करके लिखता है। ही इज़ एन ओरेटर बाय डिवाइन राइट। और दूसरा एक न्यूज़पेपर लिखता है टू आस्क स्वामी इस हिस क्रेडेंशियल्स इज लाइक आस्किंग अ सन फॉर इट्स क्रेडेंशियल टू शाइन। अर्थात कि स्वामी जी को यह पूछना कि आपका अधिकार क्या है? आपके पास में कौन सा आइडेंटिटी प्रूफ है जिसको लेकर के आप पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में वक्तव्य देंगे। तो यह ऐसा पूछने के बराबर है कि सूरज सूरज के पास में सन के पास में कौन सा आइडेंटिटी प्रूफ है? कौन सा एलिजिबिलिटी कौन सा ऑथॉरिटी है जिससे कि वह प्रकाशित हो रहा है। तो देखिए कि यहां पे भी ईश्वर निर्दिष्ट नेता बोलकर के हमको लगता था एवं केो ना बोलिया दिल तहां के चिन्हित विलंब हो तो नाम और यदि कोई नहीं भी बोलेगा कि यह उनके लीडर है त्यागी संतानों के फिर भी उनको समझने में कि वही लीडर है इसमें आपको ज्यादा देर नहीं लगती थी। यह जो मां की वह फेमस कहानी मां के जीवन में हमने उसका हमने देखा था उसको काशी में मां है। गुलाब मां और मां शारदा दोनों एक ही कमरे में बैठे हुए हैं। एक लेडी डिवोटी मां का दर्शन करने के लिए आ रही है। पहले कभी मां का दर्शन नहीं किया। पहली ही बार मां को मिल रही है। तो जैसे ही कमरे में प्रवेश करती है, देखती है कि दोनों वृद्ध महिलाएं दोनों सफेद कपड़े पहने हुए और दोनों एक कमरे के इस कॉर्नर में आसन लगा के जप कर रही है। दूसरे कॉर्नर में वो दूसरी लेडी आसन लगा के जप कर रही है या बैठी हुई है। तो यह लेडी डिवोटी पहले तो थोड़ा सा कंफ्यूज हो गई कि कौन सी मां शारदा है और कौन सी दूसरी लेडी है। तो अब क्या है कि वह ईश्वरी का ईश्वर का चेहरा जो होता है ना माने मां के चेहरे पे वह जो दिव्य कांत जो थी डिवाइन जो वो ग्लो वो तो दिख ही रहा था तो जाके मां को प्रणाम करने को गई तो मां मां को ऐसा लगा कि चलो थोड़ा सा हंसी मजाक किया जाए तो मां क्या कहती है कि अच्छा मां समझ गई कि वो मुझे प्रणाम करने के लिए आई है तो मां वो गुलाब मां की ओर दिशा निर्देश करके इशारा करके कहती है कि अच्छा मां को ही प्रणाम करना है ना जाकर उनको करो करो प्रणाम वही मां है वही मां शारदा है तो लेडी डिवोटी ने सोचा अभी ये लोग तो जिस लेवल के हैं म स्पिरिचुअल लेवल के वहां पे तो ये लोग झूठ तो बोलेंगे नहीं ठाकुर की ये जो सत्य निष्ठा है वो तो जग जाहिर है तो ये लोग झूठ क्यों बोलेंगे तो उसने सोचा ठीक है वो गुलाब मां की ओर गई तो गुलाब मां नाराज हो गई अरे तुम जाओ उनको जाकर प्रणाम करो वही तो मां शारदा है वो मजाक कर रही है तुम्हारे साथ में जाओ जाओ जाकर उनको प्रणाम करो तो ये लेडी बेचारी और कंफ्यूज जैसे मां की ओर जाती है तो मां को लगा कि रंग जमा है अभी। तो फिर से कहा कि अरे नहीं नहीं वही तो मां शारदा है। बड़ी लज्जाशीला है। वो प्रणाम स्वीकार नहीं करना चाहती। जाओ जाकर उनको ही प्रणाम करो। तो अभी ऐसा दो-तीन बार जब हुआ तब ये गुलाब मां नाराज हो गई और चिल्ला के बोल उठी कि ईश्वर का चेहरा समझ में नहीं आ रहा है क्या? मनुष्य का चेहरा कैसा होता है? ईश्वर का चेहरा कैसा होता है? क्यों मेरे पास आते हो? जाओ जाकर उन्हीं को प्रणाम करो। वही मां है। तब ये लेडी डिवोटी को अकल आई कि ना सही बात है। इनिशियली उसकी जो इंस्टिंक्ट थी कि वही मां शारदा है। क्योंकि ईश्वर का चेहरा आप कभी भी मिस्टेक नहीं कर सकते। तो वो फिर आखिर में उसको अकल आ गई कि नहीं वही मां है और फिर वो वैसे ही मजाक कर रही है। फिर जाकर उसने मां को प्रणाम किया। तो यहां पे भी देखिए गंभीरानंद जी लिखते हैं कि कोई यदि नहीं भी कहेगा आपको कि यह नरेंद्रनाथ यह त्यागी संतानों के यह जो लीडर है श्री रामकृष्ण के प्रथम डिवोटी यानी कि उनके प्रधान शिष्य है तो आपको कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। देखकर के ही आपको यह बात समझ में आ जाएगी। बला बाहुल्यो ठाकुर निर्देश अनुसार नरेंद्र प्रति अगाध भो बाशाार फले एवं नरेंद्र व्यक्तित्व प्रभावे युक भक्तगण तहां के निर्विचारे हो अभिसंबादित रूपे अग्राशन छाड़िया दिया छिलेन और कहने की जरूरत नहीं है कि ठाकुर के निर्देश अनुसार नरेंद्र के प्रति अगाध प्रेम होने की वजह से और नरेंद्र के व्यक्तित्व के प्रभाव से यह जितने भी युवक भक्तगण थे। उन्होंने बिना किसी सोच समझ बिना किसी बिना किसी सोचे यानी बिना कोई चिंतन किए अविसवादित रूपे मने बेझिझक उन्होंने नरेंद्र के लिए नेता का जो पद था वह खाली करके रखा था। नेता का पद था नरेंद्र को समर्पित करके रखा था। ठाकुर का ही निर्देश था कि नरेंद्र सबका लीडर है और नरेंद्र की फिर यह जो जो कैरेक्टरिस्टिक थी उनके ये जो एट्रिब्यूट्स थे वो इस तरह के दिव्य जो एक आनंद प्रकट करवाने वाले थे कि जितने भी बाकी ये जो डायरेक्ट डिसाइपल थे उन्होंने नरेंद्र को स्वयं उनको अपना लीडर स्वीकार कर लिया था। श्रीमद् स्वामी अभदानंदो लिख्या छिले श्रीमद् स्वामी अभेदानंद जी ने लिखा है आर जीवन कथा बोलकर के उनकी किताब है उसमें आमादे शकले मने छिलो महासमाधिर पूर्वबे एक दिन रात्रे श्री श्री ठाकुर नरेंद्र के काछे डाकिया बोलिया छिलेन हम सबको पता था हम सबको याद था कि महासमाधि के पहले एक दिन रात को ठाकुर ने नरेंद्र को अपने पास में बुलाकर के कहा हां तू ही छले दे एकत्रे राखिया देखा शोना करिश तू सब यह लड़के को एक साथ में रख के उनकी केयर करना आमरा ठाकुर से निर्देश स्मरण करिया नरेंद्रनाथ के शकले प्रदान करिया तहां निर्देश अनुसारे चलिताम हम लोग यानी कि काली महाराज कहते हैं बाकी सब डायरेक्ट डिसाइपल थे जो ठाकुर के त्यागी संतान हम लोग यह ठाकुर की बात को याद करके नरेंद्रनाथ को ही सबसे आगे करके और उसके दिशा निर्देश अनुसार उसकी गाइडेंस और लीडरशिप के अनुसार चलते और एवं मठे नियमितो भावे ध्यान धारणा पूजा पाठ कीर्तना आदि कोरिया दीन अतिबाहित कोरिता और उसी की लीडरशिप में उसी के गाइडेंस में मठ में रेगुलर रूप से ध्यान धारणा पूजा पाठ और कीर्तन वगैरह करके अपने दिन बिताते प्रकृत पखे नरेंद्रनाथ छिलो आमादे शकल समय आशा भरोसा सुख शांतनार स्थल सच कहे तो नरेंद्रनाथ ही था हम सबके आशा और भरोसा माने ये जीवन की जो आशा है आध्यात्मिक जीवन की कि हम प्रगति कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं घर बार छोड़कर के यहां पर आए हैं तो आखिर में ऐसा तो नहीं होगा कि माया मिली ना राम ना आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ पाए आए ना ही संसार का सुख भोगने को मिला ना ही मां पिताजी की सेवा करने का सद्भाग्य मिला या तो फिर जो धर्म है उसका निवाह कर पाए निर्वाहन कर पाए मां पिताजी की सेवा का तो यह जो आशा और भरोसा था कि नहीं ठाकुर के दिशा निर्देश अनुसार हमने जो यह घर त्याग किया है यह जो त्याग हमने त्याग का जो व्रत है वह धारण किया है वह नरेंद्रनाथ की लीडरशिप हमको सही में अपना यह जो यह है डेस्टिनेशन वहां तक हमको ले ही जाएगी। सुख और सांत्वना हमको यदि बीच-बीच में निराश भी हो जाए तो भी नरेंद्रनाथ हमको सांत्वना देगा। हमको भरोसा दिलवाएगा। हमारे हृदय को शांति पहुंचाएगा। तो यह काली महाराज का इसके बाद में गंभीरानंद जी आगे लिखते हैं अंग्रेजी अंग्रेजी जीवनी एवं बांग्ला जीवनी होते हमरा जानते पारी आठ पुर पुरबे तनी गुरु भ्राता दिग दग के सनाश अवलंबन कर बार जनो कतोई ना जत्नो कोिया छिले इंग्लिश लाइफ स्वामी जी का एक इंग्लिश लाइफ ऑलरेडी लिखा ही गया था बाय ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल और एक बंगाली लाइफ स्वामी जी का लिखा गया था। तो इन दोनों के आधार से हमको यह जानने को मिलता है कि आठपुर जाने से पहले ही स्वामी जी गुरु भ्राताओं को सन्यास अवलंबन करवाने के लिए कितना ही प्रयत्न करते थे। नरेंद्र प्रथम द के बाड़ी वैशिक व्यापारे अति मात्र व्यस्त छिलेन शुरू शुरू में नरेंद्र उनके घर के यह जो समस्या है उसको लेकर के बड़े व्यस्त तो थे किंतु उहा हो ते जमनी तनी इू अभ्याहति पायलेन एवं सनाश आदर्श पालन विषय निजे के मुक्त बोध कर लेन अमनी जे शकल जुबक भक्तो स्वगहे फिरिया पाठाभ्यास निरत होया छिलेन तहा दिग के बराह नगरे लोया आशी बार जनो त देर मने वैराग्य तूफान बहा बद्ध परिकर होइले किंतु यह अपना यह जो कोर्ट केस था उसमें से जैसे ही थोड़ा सा मुक्ति मिला साथ-साथ में ही सन्यास के आदर्श का जो पालन है उसके लिए उन्होंने अपने को नियुक्त किया और जो जो युवक भक्त अपने घर चले गए थे और विद्या अभ्यास में स्टडी में फिर से वह लग गए थे उनको वराह नगर मठ में ले आने के लिए उन्होंने और उनके मन में वैराग्य का तूफान खड़ा करने के लिए स्वामी जी तैयार हुए बद्ध परिकर होले संकल्प धारण किया घंटार पर घंटा तनी तहादेर शहीद जुक्ति बिचारे रतो थाकिया शय अभिप्राय सिद्ध करते चाहते आवर्स आफ्टर आवर्स घंटों के घंटो वो बाकी सब त्यागी युवकों के साथ में गुरु भाइयों के साथ में युक्ति विचार में रत रहते हैं। यदि कोई कहता कि नहीं मुझे पिताजी का आदेश है कि घर में ही रहना है। मेरी मां ने कहा है तुमको तो शादी करनी ही होगी। अब ये सब जो नाटक जो चलता था तो घंटों के भर घंटों स्वामी जी उनके साथ में आर्गुममेंट करते रहते और सन्यास ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ व्रत है। यह सिद्ध करवाने के लिए वह लगे रहते। देखिए मां पिताजी का भी तो यह होता है ना कि अपना लड़का भी घर संसार करे अभी ये माने ये जो जिस तरह से सबकी इच्छा होती है योगानंद जी योगेंद्र महाराज उनकी मां बार-बार कहती है तुम शादी कर लो तुम्हारे पिताजी ने कन्या पक्ष को वचन दे दिया है अभी तुम शादी नहीं करोगे तो फिर हमारा नाम खराब हो जाएगा हम तो इतने प्रतिष्ठित परिवार के हैं। अभी वचन भंग होगा पिताजी का तो समाज में उनकी आबरू जो है वो नष्ट हो जाएगी। समाज में प्रेस्टीज उनकी खत्म हो जाएगी। तो ऐसा करके करके फिर वो मां और भी धमक देकर कहती है तुम शादी नहीं करोगी तो मैं आत्महत्या कर लूंगी वगैरह-वगैरह। तो फिर वो योगानंद जी महाराज बेचारे शादी तो कर लेते हैं। किंतु शादी करने के बाद में फिर देखा कि वह पैसा कमाने की ओर इनकी ऐसी कोई दृष्टि नहीं है। तो मां कहती है कि अरे तुम बहू को ले आए हो। पैसा नहीं कमाओगे तो क्या करोगी वह तुम उसका उसका बेचारी का होगा क्या भरण पोषण कैसे चलेगा तो योगानंद जी आश्चर्यचकित होकर के कहते हैं कि तुमने कहा बोल के ही तो मैंने शादी की अभी तुम मेरे से नौकरी भी करवाओगी तो मां नाराज होकर कहती है तेरे मन में वासना नहीं होती तो तुम थोड़ी ना शादी करते मेरे कहने से तो जैसे ही योगानंद जी ने यह बात सुनी वो बेचारे बड़े ही वह आश्चर्यचकित हो गए और शॉक्ड हो गए कि देखिए कि मां पिताजी किस तरह से अपने संतान को संसार के रास्ते में ले आने के लिए यह सब करते हैं। वह जो शशि महाराज के पिताजी वराह नगर मठ में आते हैं। मास्टर महाशय उस समय थे तो कथामृत में वर्णन है कि वो जैसे ही शशि महाराज को पता चला पिताजी आए हैं तो वैसे ही वह मठ छोड़कर के भाग गए कहीं पे और अभी उनके पिताजी खोज रहे हैं कि कहां है उनका लड़का कहां है? कोई नहीं मिल रहा है। तो मास्टर महाशय सामने में मिल गए। तो मास्टर महाशय के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। अभी मास्टर महाशय कहते हैं कि मैं भी ठाकुर के पास जाता था। अभी उनकी बीमारी के समय हम लोग सभी साथ में ही वहां पर उनकी सेवा भी करते थे। किंतु उनकी महासमाधि के बाद में अभी मैं फिर से अपनी जॉब चालू कर दी है। टीचर की जॉब है। मेरा परिवार भी है, फैमिली भी है, बच्चे भी है वगैरह-वगैरह। तो उनके पिताजी कहते हैं कि देखो मैं भी तो अपने लड़के को शशि को यही कहता हूं ना कि तुम घर में आओ। तुमको ये शादी करो। अपना नौकरी करो मां पिताजी की सेवा करो और उसके बाद में तुम जितना धर्म करना हो ना करना तुम आप ही की तरह माने मास्टर महाशय को कहते हैं उनके पिताजी मैं भी उसको कहता हूं आप ही की तरह रहो ना ये बिना मतलब घर छोड़कर के सन्यास लेना यह सब क्या नौटंकी है तो बेचारे मास्टर महाशय लिखते हैं कि मैं क्या उत्तर दूं इस बात का वो खुद तो संसार में रहे हैं और तो किसी को उपदेश देने का उनका ये मतलब मोरल ऑथॉरिटी नहीं है तो एक एक बार नरेंद्र और मास्टर महाशय और ठाकुर वार्तालाप हो रहा था तो नरेंद्र जो गीत गा रहा था वो ठाकुर को इतना अच्छा नहीं लगा भाव प्रकट नहीं हो रहा था क्योंकि क्या है कि नरेंद्र के पिताजी का तो देहांत हो गया है और नौकरी खोज रहा है तो उम्मीदवारी की अवस्था है ना उम्मीदवार अर्थात कि जो सांसारिक चीजों को प्राप्त करने के लिए जो बेचारा मारामारा घूमता है उम्मीदवार का अर्थ तो समझ में ही आता है कि आप यदि कुछ नौकरी करने के लिए आप जाएंगे इंटरव्यू के लिए अप्लाई करेंगे तो कहेंगे कि यह एक उम्मीदवार है। एक उम्मीद लगा के बैठा है कि मुझे नौकरी मिल जाएगी। तो नरेंद्र के गीत में ठाकुर को इतना आनंद नहीं आया तो ठाकुर ने बातबात में कह दिया कि यह उम्मीदवार की अवस्था है। यह नौकरी खोज रहा है। बोलकर के भाव अदृश्य हो गया है। तो नरेंद्र को थोड़ा सा अच्छा नहीं लगा। तो वह लेट गया। तो वह लेट गया। देखकर के मास्टर महाशय को लगा कि वह जैसे ठाकुर ने थोड़ी सी उसकी मजाक की कि अभी कैसा संसार में फंसा हुआ है। तो मास्टर महाशय ने भी उसमें वो जोड़ दिया अपना। हंसते-हंसते कहा कि क्यों क्यों लेट गए? पता है कि क्यों लेट गए हैं। ठाकुर ने ऐसा कहा कि गान में उनके गीत में यह भाव नहीं आ रहा है। बोल कर के। तो जैसे ही मास्टर महाशय ने ऐसा कहा तो ठाकुर ने साथ-साथ में उत्तर दे दिया। वो जो ठाकुर के जो उस तरह के नॉनवेज उदाहरण जो कि वो आप सभ्य समाज में वो मास्टर महाशय ने पहली पहली बार कथामृत लिखा था ना इस तरह के ठाकुर के जो नॉनवेज बातें हैं बहुत सारी लिख दी थी। फिर स्वामी जी ने लेटर में उनको लिखा कि देखिए यह तो सब अच्छे-अच्छे घर की स्त्रियां भी इसको पढ़ेगी। तो यह ठाकुर यह जो नॉनवेज उदाहरण देते थे नॉनवेज बातें करते थे वह तो पुरुषों के सामने करते थे। तो थोड़ा सा इसको कम कर दीजिए अपनी किताब में तो पूरा पूरा तो नहीं हटा दिया कुछ-कुछ रखा है तो उसमें से यह एक तो ठाकुर कहते हैं कि आमी भाषुर के निय लज्जाय मरी वो अपर पुरुष संग की को करे था के कि एक एक स्त्री वो अपने एक रिलेटिव के साथ में उसका एक इंडसेंट उसका रिलेशन था तो अभी रिलेटिव के साथ में है तो वह तो लज्जा तो होगी ही होगी किंतु फिर भी वह तो है तो रिलेटिव किंतु दूसरी एक स्त्री है जो कि एक पर पुरुष के साथ में इस तरह का अवैध संबंध बना के रखती है। तो रिलेटिव के साथ में ही यह जो इस तरह का जो रिलेशन है वो उससे मुझे लज्जा होती है। तो पर पुरुष के साथ में उस स्त्री ने जो संबंध रखा है वो उसको लज्जा नहीं हो रही क्या? उसको कितनी लज्जा होगी? तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा तो मास्टर समझ गए कि नरेंद्र जो भी है वह तो है तो त्यागी और मास्टर महाशय संसार करके बैठे हैं। तो दूसरों के प्रति कटाक्ष करने का कि वह उम्मीदवार है। उसका संसार में मन लगा है बोलकर के गीत ठीक से भाव पूर्वक नहीं गा पाता। इस तरह का कटाक्ष करने का मास्टर महाशय को क्या अधिकार है? तो यहां पर भी जब यह शशि महाराज के पिताजी कहते हैं मास्टर महाशय को कि मैं भी तो चाहता हूं ना कि वह आप ही की तरह रहे। घर संसार करें और फिर बाद में जितना धर्म करना हो वो करना ना कौन मना करता है? जैसे आप लोग कर रहे हैं। तो मास्टर महाशय बेचारे चुप होकर के बैठे रहे। तो क्या इस बात का उत्तर दें? तो यहां पे भी नरेंद्र जब ये त्यागी लड़के अपने घर चले जाते थे। गुरु भाई मां-पिताजी उनको कैसे भी करके फुसला करके पटा करके संसार में बांध रखना चाहते थे तो नरेंद्र घंटों के बाद घंटों उनके साथ में आर्गुममेंट करता रहता था और सन्यास का जो समुजल आदर्श है उनके सामने रखता रहता था नरेंद्र उद्दीपनामई वक्तताय गुरु भाई देर मने पूर्व कथा दपकरिया झोलिया उठितो एवं तत्काले मतो संसार वासना ही प्रभु हो तो नरेंद्र की उद्दीपनामई वक्रुता की वजह से गुरु भाइयों के मन में पूर्व कथा अर्थात कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ बिताए दिनों की बातें दप करके फट करके प्रज्वलित हो उठती और उस समय के लिए तो संसार वासना जो थी हीन प्रभ हो जाती अर्थात कि संसार वासना के प्रति संसार वासना का जो जोर है वह कम हो जाता अभी ऐसा नहीं है कि इनका मन संसार में लगा है किंतु बात वही है कि अभी वह जो एक एक आदमी की कहानी है ना वो गाय ले जाता है तो चार चोर उनको लगा कि यह इसके इस आदमी के पास में से गाय को चुरा ले किंतु खींच के यदि ले जाएंगे तो फिर वह चिल्लाना शुरू कर देगा तो फिर पुलिस वाले आकर के दंड देंगे तो उन्होंने एक चालाकी की ये चारों चोर रास्ते में खड़े रह गए कुछ-कुछ डिस्टेंस पे आधेआधे किलोमीटर नहीं ऐसा यह आदमी जा रहा है गाय को लेकर के तो पहला चोर कहता है अरे पंडित जी आप बकरे को ले कहां जा रहे हैं? तो वो बड़ा वो आदमी गाय को ले जाने वाला पंडित बड़ा ही नाराज हो गया। चिल्ला के बोलता है अरे मूर्ख ये गाय गाय है। बकरा थोड़ी ना है। तो फिर थोड़ा सा आगे बढ़े। वो चोर तो बोला कि नहीं पंडित जी बकरा ही है। आपको देखने में भ्रम हो रहा है। तो पंडित ने ध्यान नहीं दिया। थोड़ा सा दूर गया तो दूसरा चोर मिला। वही बात कर रहा है कि पंडित जी बकरे को ले कहां जा रहे हैं। तो इस बार पंडित जी को और भी क्रोध आ गया और जोर से चिल्लाए और फिर थोड़ा सा आगे गए। तीसरे चोर ने कहा कि पंडित जी कहां आप बकरे को लेकर जा रहे हैं? तो अभी पंडित के मन में संदेह प्रकट हुआ कि तीन लोगों ने कहा कि यह बकरा है तो मुझे यह बकरा है कि गाय है। ध्यान से देख रहे हैं। वैसे तो गाय ही दिख रही है। तो तीन लोगों ने जब बोल दिया है कि बकरा है तो फिर अभी फिर वो थोड़ा सा आगे चौथा चोर खड़ा है। तो वो बोल रहा है पंडित जी आप बकरे को ले कहां जा रहा है? तो इस बार पंडित को लगा कि नहीं मेरी ही आंखें भ्रम कर रही है। यह बकरा ही है गाय नहीं। बोल के उसको छोड़ के चले गए। और ये चारों चोर ने मिलकर के गाय चुरा ली। तो यहां पर भी मन में तो लगता है ठाकुर की बात सुनकर के स्वामी जी की बात सुनकर के कि नहीं यह अध्यात्म का रास्ता है। वही सर्वश्रेष्ठ रास्ता है। किंतु जब संसार में रहते हैं हजार लोग हजार तरह की सलाह देते हैं तब तो हमारा मन सही में विचलित हो जाता है। ये ठाकुर के साथ में भी तो वही बात ना कि ये कामार पुकुर में बेचारी चंद्रामणि देवी है। ठाकुर की माता जी। तो यह आए दिन दक्षिणेश्वर से खबर आती है। कोलकाता से खबर आती है कि आपका लड़का पागल हो गया है। निवस्त्र होकर के घूम रहा है। दिगंबर हो के पता नहीं क्या-क्या नाटक कर रहा है। तो बेचारी चंद्रामणि देवी तो टेंशन में आ गई कि मेरा एक लड़का इतना मेरा लाडला लड़का ऐसा उसके हाथ में इसके साथ में ऐसी हालत। तो अभी क्या है कि 10 लोग 10 सलाह देने वाले तो बैठे हैं ना। सब ने मिलकर के वह चंद्रामणि देवी को सलाह दी। इसका शादी करवा दो। इसका विवाह करवा दो। बहू आएगी तो ऑटोमेटिक उसका मन संसार में लग जाएगा। तो फिर वो इसके बाद में तो फिर यह विवाह का प्रसंग प्रारंभ हुआ। किंतु खैर वो एक दूसरी कहानी है। किंतु यहां पर भी ऐसा ही कि जब आप संसार में अपने घर वापस जाएंगे तो मां-पिताजी तो प्रयास करेंगे ही करेंगे कि लड़का यहां पे रह जाए। किंतु जब नरेंद्र जाकर के फिर से उनका रिब्रेन वाश करता था। पहला ब्रेन वाश तो ठाकुर ने कर दिया। दूसरा ब्रेन वाश नरेंद्र कर रहा है। तो जब तक नरेंद्र के साथ में बात करते थे तब तक यह संसारी लोगों की बातें जो चार लोग मिलकर के बोल रहे हैं कि यह बकरा है गाय नहीं तो कुछ क्षण के लिए तो वह बात अदृश्य हो जाती थी। गाय गाय माता के रूप में ही दिखना शुरू हो जाता था। नरेंद्र उद्दीपनामई वक्तता गुरु भाई दे मने पूर्व कथा दपकरिया जलिया उठी तो म नरेंद्र की बातों से उद्दीपनामई वाणी से पूर्व कथा दक्षिणेश्वर दिनों की बातें प्रज्वलित हो जाती और उस समय के लिए तो संसार वासना क्षीण होकर के दिखने हीन होकर के दिखना शुरू हो जाती केो केहो नरेंद्र आहने पाठादि त्याग कोरिया बराह नगरे जतेन किंतु अभिभावके उत्पीड़ने ने दुई एक दिन पर आ गहे फिरते कोई कोईकोई नरेंद्र के आह्वान सुनकर के उनका अभ्यास त्याग करके वराह नगर में जाते किंतु उनके अभिभावक अर्थात कि वाली गार्डियंस या तो मां पिताजी के उत्पीड़न अर्थात कि उनका यह जो सतत एक डिमांड रहता है वह सुनकर के कुछ ही दिनों में फिर से घर वापस चले आते। इसमें और भी कुछ है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम ॐ