Transcript
अच्छा तो स्वामी जी कहते हैं वर लेंस और अवर बर्निंग इसे व्हाट वे कल कितना एक सुंदर एक कोटेशन है हम दीपक है और हमारा जो जालना है उसको हम जीवन कहते हैं वे आर लेंस और अवर बर्निंग इसे व्हाट वे कल लाइक व्हेन डी सप्लाई ऑफ ऑक्सीजन गिव्स आउट दें डी लैंप मस्त को आउट जैसे की कोई भी जो फ्लेम है जो कोई भी दीपक है या तो कोई अग्नि है उसको प्रज्वलित रखना के लिए हमको चाहिए ऑक्सीजन और ऑक्सीजन जब भी मिलन बैंड हो जाता है तो जो है दीपक जो है या तो यह जो ज्योति जो है वो बोझ जाति है जो वे कैन डू कप डी लैंप क्लीन हमारा क्या कम है हमको सिर्फ यह जो खासकर के उसे तरह के जो लैंप आते थे ना वो वो जैसे वो कांच के गोली में बैंड हो जिसको लांटर्न कहते हैं तो उसमें यदि वो बहुत ज्यादा वो ऐश जो है वो रख जो है वो यदि बहुत ज्यादा जाम जाएगी तो क्या होगा की उसको हवा आने जान का जो रास्ता है वो बैंड हो जाएगा तो हवा आने जान का रास्ता बैंड हो जाएगा तो दीपक भी जो है वो जो अग्नि जो है प्रदीप वो भी बुझ जाएगा इसलिए स्वामी जी कहते हैं की हम है दीपक और हमारा जालना जो है हमारा प्रज्वलित होना जो है वो है जीवन हमारा जीवन आधा दीपक का जीवन जैसे आधारित है ऑक्सीजन के ऊपर में और ऑक्सीजन की सप्लाई इस प्रदीप को मिलती रहे उतना ही हम जीवन में कर सकते हैं दीपक को जलन के लिए कर सकते हैं अर्थात की हमारा जीवन ये नीतिपरायण हो ये हमको हमेशा देखना है ये नीति है ये जो धर्म है यह अध्यात्म है ये ऑक्सीजन है जी ऑक्सीजन को ग्रहण करके हमारा ये जो जीवन रूपी ये जो प्रदीप है वो सब समय जलता राहत है प्रज्वलित होता राहत है आगे स्वामी जी क्या कहते हैं लाइव इस एन प्रोडक्ट एन कंपाउंड और सच मोस्ट रिजॉल्व आईटी सेल्फ मेक इन इट्स एलिमेंट यदि यह गी है या तो फिर यह वैक्स है मॉम है जिसका दीपक जलता है ईंधन जो होता है दीपक के जलने के भीतर में तो यह जो लैंप देखिए लैंप के भीतर में आप या तो हम लोग चाहे तेल डालेंगे या तो गी डालेंगे या तो यह मोमबत्ती है तो मॉम होगा तो यह गी या तेल जो है वो तो एक कंपाउंड है उसको जलन से वो जो पंचमहाभूत में वो विलेन हो जान वाला वैसे ही हमारा शरीर जो है वो गी की तरह जो है वो दीपक की तरह प्रज्वलित होता है और ये जो अग्नि जो है वो आध्यात्मिक ओजस ओजस के बड़े में हमने पहले डिस्कस किया था वो जस्ट क्या है हमारी प्राणशक्ति या तो हमारी आध्यात्मिक शक्ति जिसमें ज्यादा ओजस होता है उसमें ज्यादा वो जो है वो आध्यात्मिक कहा जाएगा ओवर ज्यादा सात्विक होगा और जिसमें ओजस कम है वो ज्यादा तामसिक होगा या तो फिर राजसिक होगा ओजस बहुत ही कम हो जाएगा तब कहानी जाकर के वो तामसिक हो जाएगा तो देखिए स्वामी जी ने कितना सुंदर ये मेटाफोर दिया है हमारा शरीर या तो हमारा जीवन इस प्रदीप की तरह है ये पांच महाभूत का बना हुआ है और जैसे जैसे हम साधना करते जाएंगे वैसे-वैसे यह शिखा जो है और ज्यादा प्रकाशित होती जाएगी और ज्यादा ब्राइट होती जाएगी इसमें से जो है आध्यात्मिक ज्योति या तो ओजस जो है हम पूरे समाज को देंगे हमारे भीतर में इतनी वो मतलब एक एक इस तरह की एक शक्ति प्रकट होगी की वो कहां कैसे वो जो मैं जागी मघई जैसे वो जो पापी जो थे उन्होंने कितने सारे वो उन्होंने दुष्कर्म किया थे वो भी जो है वो भगवान कृष्णा चैतन्य के चरणों में आकर के उन्होंने अपना जीवन धन्य बना दिया था जैसे माथुर बाबू के बड़े में देखिए धनी आदमी थे धन का महत्व वो समझते थे धन की वह जो महिमा है वो उनको पता था उनको ऐसा लगता था की यह जो पूरा संसार जो है जितने भी लोग हैं उन सब लोग धन के लिए ही ललाट है और जो भी आदमी है वो सब की एक कीमत है आप किसी से कुछ कम करवाना चाहते हैं तो अच्छा कम हो एन की बड़ा कम हो यदि आप किसी आदमी को इतना रुपया देंगे तो के जितने भी वह मैन हेसिटेशन से जितने भी वो एक्सक्यूज है वो सब चले जाएंगे वो आपका कम कर देगा यदि आप किसी से बड़ा कम भी करवाना चाहते हो तो शुरू में वो बोलेगा आदमी का रहे नहीं मैं इस तरह का कम नहीं करता किंतु उसको इतना रुपया दे दो तो वो सब तरह का कम करेगा तो वो ऐसा सोचता था की धन जो है ये दौलत जो है ये पैसा जो है वही जीवन का सर्वश्रेष्ठ है फिर उसने जब ठाकुर को दर्शन किया ठाकुर का वो जो शुद्ध पवित्र जीवन देखा तब उनको पहले बार ऐसा लगा की अरे जो आदमी धन के सामने में रुकिए पैसों के सामने में नजर उठाकर के भी नहीं देखा उसकी वो तनिक भी परवाह नहीं करता तो वो आदमी कैसा होना चाहिए तो देखिए जिसको धन का महत्व पता है पैसों का महत्व गरिमा पता है वही आदमी जब ऐसे किसी को देखेगा जिसको पैसों की कुछ भी परवाह नहीं तो जाकर के सीधा उनके पैरों में गिर जाएगा अभी मथुरा बाबू को मां में मां में ऐसा लगता था आखिर था तो विषय आदमी ठाकुर की चाहे कितनी भी श्रद्धा भक्ति करें सब कुछ वो विषय से वो मेजर करेगा सब सब कुछ जो है पैसों से नापेगा तो वो बीच-बीच में मां में सोचता था की ठाकुर को मैं किस तरह से एक ऐसी व्यवस्था करके जाऊं ऐसा तो नहीं होगा की मैं सब समय के लिए कालीबाड़ी का वो जो है की करता हारता रहूंगा अभी चाहिए यदि उसकी बीबी का यदि देहांत हो जाए तो वो तो जमाई है वो तो रसमणि का लड़का तो नहीं है इसका ये जो मैनेजमेंट है हो सकता है उसके हाथ में से इमीडीएटली चला जाए और किसी जमाई को मिल जाएगा और यह बाद में की और माथुर बाबू की पहले बीबी का देहांत हो गया तो जो है उसका बाबू के हाथ से जान वाला था उसे समय किंतु रश्मानी ने क्या सोचा की मधुर बाबू का जो मैनेजमेंट स्किल जो है वह इतना मतलब तो अब एफिशिएंट है की वह किसी भी तरह से उनको अपने परिवार में रखना चाहती थी तो रसमणि ने अपनी दूसरी लड़की एक छोटी लड़की की शादी जो है वो मथुरा बाबू के साथ में कर दी जिससे की मथुरा बाबू परिवार में बने रहे किंतु वह जो ट्रांजिशन का समय था उसे समय मथुरा रहते थे वो बार-बार ठाकुर के पास आकर के कहते थे की आप जो है मां को कहिए की कालीबाड़ी का जो मैनेजमेंट कालीबाड़ी का यह जो अथॉरिटी मेरे हाथ में रहे अभी ऐसा नहीं है की मैं चाहता हूं की मैं यह सब कंट्रोल करूं किंतु मुझे यह डर है की मेरे चले जान के बाद में आपकी सेवा कौन करेगा तो उसे समय ठाकुर ने शायद मां को कुछ प्रार्थना की होगी मुझे एक्जेक्टली याद नहीं ए रहा है किंतु इस तरह से उसे समय मथुरा तो मथुरा बाबू को ऑलरेडी पता था यह उसे समय के पहले की बात है उसे पहले से ही माथुर बाबू को पता था की वो सब समय तो वह काली वाली का मैनेजर नहीं करने वाला है में एडमिनिस्ट्रेटर नहीं रहने वाला है तो उसने क्या किया एक दिन ठाकुर जब मां के गर्भ ग्रह में मां के साथ में वो पूजा वगैरा कुछ कर रहे थे या तो फिर मां के साथ में वो प्रार्थना वगैरा कर रहे थे उसे समय हृदय बाहर खड़ा था हृदय और माथुर बाबू तो आ माथुर बाबू ने हृदय को कहा की देखो ठाकुर के सेवा ठीक ठीक से चलती रहे उसके लिए मैं चाहता हूं की कुछ जिले जो है कुछ जिला जो है वो मैं ठाकुर के नाम से लिख के जाऊं इससे क्या होगा उसे जिला में की जमींदारी जो है वो मेरे पास में है वो मैं ठाकुर को दे दूंगा तो उसकी जमींदारी का जो पैसा आएगा वो जो कर जो वसूल करते हैं टैक्स जमीन के ऊपर में जो टैक्स वो लोग जो कलेक्ट करते हैं उसमें से जो है ठाकुर की सेवा चलती रहेगी पहले के जमाने में ऐसा होता था जबकि राजा कोई बड़ा मंदिर बनाता था तो कुछ कुछ जिला जो है वह मंदिर के वह नाम लिख देता था इससे क्या होता था की उसे जिला में से उसे जिले में से जो टैक्स कलेक्ट होता था वो सब मंदिर की वो सर संभल करने के लिए मंदिर का मेंटेनेंस करने के लिए लगता था तो माथुर बाबू हृदय के साथ में इस तरह से बात कर रहे थे तो सुद्दनली ठाकुर ने आकर के देखा उन्होंने सुन लिया अभी इन दोनों की इच्छा नहीं थी की ठाकुर को सुना है क्योंकि उनको पता था की ठाकुर ये सब बात सुनकर के बड़े नाराज हो जाते थे वह पैसा क्यों ग्रहण करेंगे तो वो चुप के चुप के ऐसी बातें कर रहे थे किंतु देखिए ईश्वर की इच्छा ठाकुर ने आकर के वो बात सुन ली और सुनकर के सब गुस्से हो गए इतना नाराज हो गए की दौड़ करके माथुर बापू को करने के लिए गए की साला साला ठाकुर तो गली बहुत साड़ी बोलते थे लिखी हुई जो गलियां है वह तो बड़ी ही माइल्ड गलियां है बड़ी ही मतलब वह जो है सभ्य गलियां है वो बड़ी असभ्य गलियां भी ठाकुर बोला कर देता है तो इस लिखा है की साला लिखा है तो ठाकुर दौड़कर के मातृ बाबू को करने के लिए गए की साला तू मुझे विषय कर देना चाहता है अर्थात की तू मुझे संसारी कर देना चाहता है तो मतलब मछु बाबू हुई बेचारे डर गए की ठाकुर क्या ना क्या कर दे यदि मां में मां में उनसे नाराज हो जाएंगे तो उसका कितना अजीत होगा तो उसे सोच करके माथुर बाबू ने हृदय के साथ में यह बात करना बैंड कर दिया की ठाकुर को किस तरह से वो उनके भविष्य के लिए क्या कुछ रखकर के जाए अब ठाकुर का भी यह सा था देखिए वो मैंने रसमणि और माथुर बाबू जी मंदिर के मलिक थे जिसमें वो रहते थे जिनकी वजह से उनको खाना मिलता था उन्हें को करने को जाते थे रसमणि को तो चांटा मार ही दिया था वह मंदिर में बैठे थे ठाकुर रश्मानी आई थी ठाकुर को कहा की गाना गई ठाकुर गाना ग रहे कुछ मां का भजन ग रहा है और रश्मानी जो है वह मतलब उसका उल- चुन रही है क्या कर रही है सोच रही होगी कोई कोर्ट कैसे चल रहा है उसके बड़े में तो ठाकुर ने देखा की वो मां का भजन वो ग रहे हैं तो वो ध्यान नहीं दे रही तो सीधा उसके मुंह पे छाता मार दिया तो ठाकुर रसमणि कुमार यहां पे मथुरा बाबू को करने के लिए दौड़ रहे थे तो त्याग और वैराग्य देखिए की ये संसार में कुछ भी पढ़ा नहीं है ये लोग उनको पैसे दे ना दे उनको वो जो मां कहती थी ना जो कुछ लड़के तपस्या के लिए जाते थे युवान साधु तो मां बोलती थी की अरे तुम लोग ये धूप में मारे मारे भिक्षा करके कहां घूमोगे फिर ठाकुर का वो जो माथे तो माथुर जुगतो अर्थात की अपुर के लिए जो मछली का माता जो है और यह जो पाइल्स की जो बाटी है वो मथुरा उनको देता था तो बोल करके उन्होंने एक जगह पे बैठ करके शांति से साधना की तुम लोग मारे मारे दुख में तो मां को भी पता था ठाकुर को भी वैसे ठाकुर को पता तो होना ही चाहिए को जो है वह मछली ईश्वर भाव में इतने तन्मय थे की जड़ी उनको लगता है की सामने वाले में विषय या तो सांसारिपन या तो यह जो मैटेरियलिज्म जो है या इंद्रिय के सुख भोग जो है यदि उनमें दिखाई देते हैं और वो ठाकुर के साथ में उसे तरह की कोई बातें करते हैं तो इतने नाराज हो जाते की उनको करने तक को दौड़ जाते हैं तो मथुरा बाबू को तो यह सब अच्छे से पता था तो मैं डर करके फिर अभी वो मत रो ठाकुर के साथ में ऐसी बातें करना बैंड कर दिया और साथ-साथ में हृदय के साथ में भी उसे समय क्या हुआ की चंद्रमणि देवी है वह दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आई उनका चंद्रमणि वो अक्षय जो है अक्षय का देहांत हो गया था तो चंद्रमणि देवी को फिर इतना दुख लगा था की उन्होंने सोच लिया की अभी वो कमर कुकर नहीं जाएगी तो शायद 12 साल वो दक्षिणी शोर में ही रही थी तो दक्षिणेश्वर में उसे समय चंद्रमणि रहने को आई थी तो मोहब्बत में रहती थी ठाकुर सब समय जो है दिन में एक दो बार जाकर के मां के पास में जाकर के उनकी तो गर्भधारण ही मां थी मां के पास जाकर के बैठने थे अच्छी बातें करती थी करते थे और उनको चंद्रमणि देवी भी इतनी सहज सरल थी अपने स्वभाव में और ईश्वर के प्रति इतनी भक्ति थी की वो मतलब सब कुछ मतलब जिसको वो ईश्वर को साक्षात ईश्वर जो है वो विराजमान है इस जगत में ईश्वर उनकी बात सुनते हैं ये बात पे उनको इतना विश्वास था हम लोग जैसे देखिए हम लोग एवं साधु भी बने हैं यहां पे भी आए हैं तो किंतु हम लोग ऐसा नहीं सोचते की ऐश्वर्या पे मेरे सामने वो ये जो फोटोग्राफ है उसमें सही-सही में बैठे होंगे या तो मंदिर में सही-सही बैठे होंगे हमारे लिए ईश्वर क्या है एक एक्सट्रैक्ट कॉन्सेप्ट है की हां एक एथिकल लाइफ जो है एक साधन भजन का जो जीवन है एक साधना मैं जीवन वो हमको जीना है किंतु ठाकुर मतलब साक्षात विराजमान है मंदिर में मेरे सामने खड़े हैं मैं उनके साथ में बात कर रहा हूं इस तरह का कन्वैक्शन जो है हम लोग पढ़े लिखे लोगों को इतना इजीली नहीं आता की चंद्रमणि देवी हमारी दृष्टि से पड़ी लिखी नहीं थी किंतु यह जो संस्कार जो है भारतीय संस्कार जो है हमारे 10 हजार साल की ये जो आध्यात्मिक जो हमारी जो संपद है उसका जो सरूप जो संस्कार होते हैं वो संस्कार क्या है ईश्वर के अस्तित्व में इस तरह से विश्वास करना स्वामी जी ने जाकर के ठाकुर को जब कहा की आपने ईश्वर को देखा है तो उसमें ठाकुर क्या कहते हैं जी तरह से मैं तुमको देख रहा हूं इस तरह से मैंने ईश्वर को देखा है और इतना ही नहीं मैं तुमको भी उसे ईश्वर के दर्शन करवा सकता हूं तो ईश्वर साक्षात हमारे सामने विराजमान है उनके साथ में हम बात कर सकते हैं उनका परामर्श उनकी सलाह ले सकते हैं उनके चरणों में अपना जीवन समर्पित कर सकते हैं हमारा जो अहंकार है हमारे यह जो सब कामना वासनाएं हैं वो उनको हम त्याग कर सकते हैं ये कनविक्शन जो है हमको नहीं आता हम लोग सब इंटेलेक्चुअल और एक्सट्रैक्ट रूप में यह सब सोचते हैं किंतु चंद्रमणि देवी का ऐसा नहीं था ठाकुर का तो नहीं था किंतु चंद्रमणि देवी का तो और भी नहीं था क्या होता था की जब वो वहां पे वो एक मिल थी तो मिल्की जो ये सिटी बजती है ना तो क्या होता है की जब इंटरवल वगैरा होता है या मिल जो है तो मिल बैंड होने के समय या चालू होने के समय वो किसी वो सिटी बजती है तो मिल्की ट बजती थी तो चंद्रमणि देवी क्या सोचती थी की वही कुंड का वह शंकर बाज रहा है या तो बैकुंठ में जो है भगवान विष्णु को भोग दिया जा रहा है तो जब तक वह मिल्क सिटी नहीं बजेगी दोपहर को 12:00 बजे ने ऐसा कुछ और छुट्टी होने के लिए वहां के वर्कर्स को तो वह तब तक मां चंद्रमणि देवी भजन नहीं ग्रहण करेगी और अभी ऐसा कभी-कभी ऐसा होता था की ठाकुर खुद परेशान हो जाते थे करें अपनी मां को कैसे मने मिल्की जो सिटी है वो कभी-कभी डेरी से भी बजेगी कभी-कभी जल्दी भी बचेगी उनका जो नियम है तो जब तक सिटी नहीं बजेगी चंद्रमणि देवी भजन ने ही ग्रहण करेगी सुबह से उपवास है और ऊपर में से क्या होता था की इस संडे को छुट्टी रहती थी मिल में तो सिटी नहीं बजेगी तो चंद्रमणि देवी भजन भी नहीं करेगी आहार भी नहीं करेगी तो एक दिन क्या हुआ हृदय ने कहानी से एक सिटी का जुगाड़ कर लिया और पीछे से जाकर के सिटी बजाने लगा और जाकर के चंद्रमणि देवी को बाद में कहता है की चलो सिटी बैक गई अब आहार ग्रहण कर लीजिए तो चंद्रमणि देवी हंसते-हंसते कहती है की अरे नहीं मुझे पता है की तुम सिटी बजा रहे थे वो बैकुंठ की सिटी नहीं है उसकी आवाज अलग ही है देखिए की इतना सहज सरल विश्वास था ठाकुर खुद कभी कभी परेशान हो जाते थे मतलब ठाकुर का सहज सरल विश्वास से कहानी ना ज्यादा मनी के देवी का तो अभी मथुरा बाबू ने क्या एक नया प्लेन बनाया अभी ठाकुर जी दी उनसे वो जिला है जमींदारी है वो ग्रहण नहीं करेंगे ठाकुर उनसे पैसा नहीं ग्रहण करेंगे तो अभी चंद्रमणि देवी जग को जाकर के मनाएंगे की आप थोड़ा सा पैसा ले लीजिए की जिससे की आप जो है ठाकुर की सेवा में लगा सके तो वो जैसे जब से वो चंद्रमणि देवी आई वहां पे नबूवत में र रही है मथुरा बाबू बीच-बीच में जाकर के वो उनके साथ में बात करते हैं ठाकुर मां करके करते हैं बड़े उनको इज्जत देते हैं सम्मान देते हैं वो चंद्रमणि देवी भी बड़ी खुश रहती है उनसे की हां चलो मेरा बेटा आया है मेरा लड़ता आया है माथुर और मेरे से बात कर रहा है तो अभी एक दिन मथुरा बाबू ने देखा की बात-बात में वह चेस देखकर के मौका देख कर के बात निकाल दी चंद्रमणि देवी को बोलना है की आपको जो है की आपके लिए मैं कुछ सेवा करना चाहता हूं आपके लिए मैं कुछ जमींदारी जो है कुछ पैसा है मैं आपके नाम से लिखवा देना चाहता हूं क्या आप उसको ग्रहण करेगी है और आप ग्रहण कीजिए जिससे की मेरे हृदय को संतोष मिले की मैंने आपकी सेवा करने का मुझे एक अवसर मिला है तो ये सुनकर के अभी चंद्रमणि देवी बड़ी बेचारी वो असमंजस में पद गए बड़ी ही वो मतलब जिद्दा में पद गए वो वो बोलती है की अरे मुझे तो किसी चीज का अभाव नहीं है मैं जमींदारी है ये पैसा है वो सब लेकर के मैं क्या करूंगी तो वो मथुरा बाबू पूछता है क्या आपको किसी चीज का भाव नहीं है तो चंद्रमणि देवी बड़ी अभी देखिए वो एक छोटी सी मोहब्बत में रही है वह हमारी तरह आज हम तो हमारे पास में ये बैंक बैलेंस होता है मेडिकल इंश्योरेंस होता है कहानी किसी का पेंशन आता है तो हम लोग तो कितने वो मतलब अपने को इकोनॉमिकली सेफ रखना को पर्यटन करते हैं ये चंद्रमणि देवी के पास में बेचारी के पास में नहीं बैंक बैलेंस है ना ही किसी तरह का इंश्योरेंस से ना ही जमीन जायदाद है उनके लड़के भी जो है वो बड़ा लड़का तो देहांत हो गया बीच वाला लड़का कुछ करता है नहीं करता है और को रामेश्वर और रामकृष्ण तो जो है वैसे ही पागल हो के बेटा है तो भविष्य में उनकी कौन देखभाल करेगा कुछ ठीक नहीं है किंतु फिर भी वो सोच कर के ये खोज नहीं का रही है की उनको किस चीज का अभाव है तो आखिर में जब मथुरा बाबू बहुत ही विनंती करने लगा की नहीं मां आप ठाकुर मां आप तो कुछ ना कुछ तो मतलब आप मेरे से ग्रहण कीजिए आपकी सेवा करने का मुझे मौका दीजिए तो आखिर में जाकर के चंद्रमणि देवी कहती है की अच्छा-अच्छा ठीक है यदि तुमको बहुत ही एक इच्छा है तो मुझे लगता है की मुझे वो जो ये जो तंबाकू के पेट जो है दुखता पता बांग्लादेश रन लगा जी आदमी को पैसों का इतना मतलब गर्व है पैसों की जिसके लिए इतना इंर्पोटेंस है वह जल्दी ऐसे लोगों को देखा है की जिसके लिए पैसा जो है इस तरह की एक सेफ्टी जो है एक भविष्य के लिए कुछ बैंक बैलेंस या कुछ पूंजी जमा करके जाए ये सब चीजों का इनको कोई कोई फिक्र नहीं है तब उनको लगता है की ये लोग देवता जैसे हैं और माथुर बाबू कहते हैं की देखिए आप जैसी मां नहीं रहती तो ठाकुर जैसा लड़का भी पैदा नहीं होता तो मां के साथ में भी ऐसा हुआ था जब वो दक्षिण वहां पे दक्षिण भारत में घूमने के लिए गई थी तीर्थ यात्रा के लिए तो वहां पे मां मधुर में गई थी रामेश्वरम के मां मधुर दो में से एक जगह मैं एग्जैक्ट लोकेशन भूल गया तो शशि महाराज उनको लेकर के गए थे तो अभी जहां वह गई थी मंदिर में प्रणाम किया फिर वहां के स्थानक जो राजा है वो राजा खुद मां के दर्शन करने के लिए वहां पर आया और आकर के फिर मां को कहता है की मेरा अपना जो खजाना है पूरा खजाना में खोल करके रखना हूं आपको उसमें से है वह ले तो अभी मां शारदा देवी हमारी तो महा सोचती है की मां शशि महारा जो उनको लेकर के गए और मां के साथ में ये राज हूं मां को वगैरा भी थे तो मां जाकर के खजाना देखते है वो मनी है वो फिर वो जो हीरा है मानिक है वो सोना मोर है और पैसों का वो ठग है तो मतलब वो तो इतना भाव वो कहेंगे की वो मतलब धन दौलत पड़ा हुआ है तो अभी इसमें से क्या लेने मां को तो कुछ लेना जिससे लगता ही नहीं है तो फिर मैन सोचा की मुझे तो इसमें से कुछ नहीं चाहिए राजू को यदि कुछ चाहिए तो वो ले ले तो मैन राजू को बोला की राजू तुमको इसमें से कुछ चाहिए अभी देखिए हमको पता है की राजू कितनी पागल है राजू पगली मानी यह सब किस तरह से वो मां का जीवन मां को परेशान करके रख देते थे एक बार राधा हो गई थी तो वो जो बेगुन की ऐसा कुछ है सीधा उठा करके मां को मारा था और मां के शरीर पर पूरा लाल लाल ऐसा टूट गया था तो राधु पागल है फिर भी राजू जो है महामाया का अंश है जब इतना सर प्रलोभन उसके सामने में रखना को आया तो राजू सोच रही है की मुझे क्या लेना है इसमें से यहां मां भी सोच रही है मां का हृदय जो मां खुद बोलती है किसी को ये प्रसंग का वर्णन करती है मेरा हृदय जो है वो जो धक-धक और कर रहा है मुझे ऐसा ग रहा है की राजू कहानी प्रलोभन में पढ़कर के ये जो हीरा है ये सोना मोर है ये सब कुछ मांगना ले ये सब कुछ ले लगी तो मैं उसका क्या करूंगी तो ऐसा मास सोच रही है तो राजू भी देखिए महामाया की वो अंश है महामाया का तो उसमें उसमें से ही तो उनका शरीर ग्रहण शरीर धरण है की जिससे की जिसका आश्रय लेकर के मां जो है पृथ्वी पर र सके वरना मां खुद तो शरीर त्याग करने के लिए वो तैयार हो गई थी ठाकुर के जान के बाद में ठाकुर ने ही तो कहा था की ये राजू जो है महामाया का अंश है उसका सहारा लेकर के तुम रहना पृथ्वी पर रहना तो राजू ने आखिर में पूरा सब कुछ देखकर के आखिर में कहा की देखो मेरी एक पेंसिल है पेंसिल टूट गई है वो खत्म हो गई है तो मुझे पेंसिल मुझे ला करके दे दो तो ये बात सुनकर के वो मां को बड़ा एकदम आखिर में वो एकदम सऊदी अब हुआ मां कर हृदय शांत हुआ की अरे ये तो पेंसिल ही चाहिए तो ये सब धन भंडार बैंड करो वो चलो बाहर रास्ते में एक दुकान थी दुकान में से 10 पैसे की एक पेंसिल ला करके राघव को दे दी तो देखिए ये लोगों का जीवन भी किस तरह से ये जो राजा होते हैं या तो माथुर बाबू होते हैं ये लोग क्या सोचते हैं की जीवन में आप सब कुछ जो है पैसों से नाप सकते हैं आपका इनाम जो है आपकी इज्जत जो है आपकी इंटीग्रिटी जो है आपकी ऑनेस्टी भी जो है कोई आदमी कोई गवर्नमेंट ऑफिसर बड़ा ऑनेस्टी दिखाने का पर्यटन करता है कहता है वो मैं इतना ईमानदार हूं की मैं एक पैसा भी किसी का नहीं लूंगा तो यह सब लोग वीडियो है वह दो नंबर एक कम करने वाले उनको पता है की सभी ऑफिसर की एक कीमत रहती है उसको 1 लाख नहीं तो 2 लाख दे दो 2 लाख नहीं तो 3 लाख दे दो वो हमारे लिए भ्रष्टाचार करेगा ही तो जिन लोगों के पास में इस तरह से पैसा राहत है वो लोगों को बड़ा ही बने वो बड़ा ही तुच्छड़ दृष्टि से देखते हैं वो लोग बोलते हैं वो लोग सोचते हैं की किसका इनाम किसी का वो जो इंटीग्रिटी किसी का ऑनेस्टी सब कुछ चीजों के ऊपर में एक प्राइस टैग लगा हुआ है ऐसा अभी ऑफ कोर्स हमको पता है की सब गवर्नमेंट ऑफिसर ऐसे नहीं होते बहुत ही अल्पसंख्यक ऑफिसर ही ऐसे होते हैं सभी लोग ऑफिसर ऐसे होते तो भारत देश कब का टूट चुका होता तो जो भी है उन लोगों की बात अलग है किंतु यह जो मथुरा बाबू यह तो यह इस तरह के जो राजा वो लोग देखते हैं की ऐसा जीवन की शुद्ध पवित्र है यहां पर स्वामी जी ने कहा है ना की जो वे कैन डू कप डी लैंप क्लीन यह जो प्रदीप जो है उसको शुद्ध विचित्र उसको स्वच्छ रखना है जिससे की साधना रूपी साधन वजन रूपी ऑक्सीजन इसको मिलता रहे हमारी डे जो है प्रदीप की तरह यह जो एक दीप शिखा की भांति प्रज्वलित होती है और ये जो दीप शिखा मैं जो ओजस है ये जो चंद्रमणि देवी वहां पर जाकर के रहती थी दक्षिणेश्वर में तो माथुर बाबूजी जैसा महा मतलब इतना मलिक इतना कहा जाएगा इतना बड़ा आदमी वो भी जाकर के चंद्रमणि देवी के पास में जाकर के बैठता था और उनके साथ में बात करने का उसको अच्छा लगा मैंने ठाकुर की तो बात की छोड़ दीजिए ठाकुर तो ईश्वर के अवतार है आध्यात्मिकता के अप पूर्ण स्तोत्र है बोनफायर जैसे की मैंने वो सिर्फ प्रदीप नहीं है वो जो मैंने वो वाइल्ड फायर जैसे हैं वह पूरा जंगल में आज लगती है तो कितना बड़ा वो अग्नि प्रगतित होता है तो इस तरह से वह जो फॉरेस्ट फायर जैसा ठाकुर की वो जो दिव्या अग्नि किंतु ठाकुर की मां भी जो है वो कम नहीं है तो हमारे जब हमारा जीवन जो है साधना से प्रज्वलित होना शुरू होगा तो हम भी जो है आध्यात्मिक शक्ति का प्रकाश सबको देंगे और कितने ही लोग जो है हमारे सानिध्य में आकर के हमारी वाणी का श्रवण करके तृप्ति होंगे धन्यवाद तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा