मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
सहज ध्यान: प्रकृति के सौंदर्य पर मन को एकाग्र करें
आज सुबह एकदम सुंदर धूप निकला है। यूजुअली यहां पे इतना जल्दी सनराइज नहीं होता और सनराइज होता भी है तो धूप इतना सुंदर नहीं दिखता। अभी क्या है? समर सीजन आ रहा है। तो अर्ली मॉर्निंग मैं जैसे ही वो ब्रेकफास्ट करने को गया था। अभी 7:00 बजे कमरे से बाहर निकल के ही देखा एकदम चारों ओर धूप ही धूप है। सो अभी गर्मी के दिन भी आ गए हैं। और समर मॉर्निंग्स जो होता है वो बड़ा ही सुंदर दिखता है। अर्ली मॉर्निंग ये धूप की वजह से। सो यह सीजन चेंज होते हैं। देखिए आध्यात्मिक जीवन में यदि हम देखेंगे जब हम ध्यान करते हैं तो किसी एक सीन के ऊपर में अपने मन को एकाग्र करते हैं। यह सीजन है। यह प्रकृति है, प्रकृति के साथ में यह जो प्राकृतिक सौंदर्य है, इसको भी हम ध्यान के भीतर में बूंद दे सकते हैं। व्यू कर दे सकते हैं। जिससे कि क्या होगा कि अभी यह तो फ्रेश मेरा मेमोरी है। जैसे ही मैं कमरे से बाहर निकला वैसे ही देखा कि सुबह का खुशनुमा प्रकाश सूर्य का प्रकाश वो पेड़-पौधों के ऊपर में गिर रहा है और पेड़ पौधे भी एकदम प्रकाशित हो रहे हैं। यहां पे ये वाइट लाइट है सूरज का और ये पेड़पधों का ये जो ग्रीन कलर है तो ग्रीन कलर जैसे कि वो जैसे शाइन हो रहा है भीतर से ऐसा लग रहा है। सो ये फ्रेश मेमोरी है मेरा। सो नेक्स्ट टाइम अभी जब मैं ध्यान करने को बैठूंगा तो आई विल फोकस ऑन दिस फ्रेश मेमोरी ऑफ नेचुरल ब्यूटी। देखिए यह जो ब्यूटी है, हैप्पीनेस है। दीज़ आर ऑल इंटरकनेक्टेड कांसेप्ट्स। खास करके प्राकृतिक सौंदर्य और इसलिए आप देखिए कि हमारे ज्यादातर मंदिर जो होते हैं प्राकृतिक सौंदर्य के बीच में बसे होते हैं। वह पहाड़ के ऊपर में हो, नदी के किनारे हो, वन में हो, जंगल में हो, कहां पे भी आप देखिए प्रकृति की गोद में मंदिरों को बसाया जाता है। क्यों? एक्चुअली मंदिर बनते कैसे हैं? तो किसी साधक ने वहां पर तपस्या की है। तो कोई भी साधक है तपस्या करने के लिए सर्वप्रथम ऐसा स्थान चुनेगा जहां पर कि उसको प्रकृति का सौंदर्य देख वो देख सकता है। यहां पर मैं मेडिटेशन क्लास लेता हूं। तो एक लड़का आया एक दिन वो उसको मैंने कहा अपनी नजरों को झुका करके ध्यान करना है। तो वह थोड़ा उसने प्रयास किया। उसके बाद में बोलता है कि महाराज मैं जब नजरों को झुकाता हूं तो फिर मुझे ना थोड़ी सी घबराहट होने लगती है। पता नहीं उसको क्लस्ट्रोफोबिया ना कि ऐसा कुछ होगा तो व्हाटएवर तो मैं क्या करूं? आंख बंद करने से ही घबराहट होती है। तो मैं यदि ध्यान करने का प्रयास करता हूं तो तो मैंने कहा ठीक है इसका एक सॉल्यूशन है। तुम आंख झुका करके मत करो ध्यान। आंख झुकाना है क्योंकि हम हृदय के भीतर में ईश्वर की कल्पना करते हैं। इसका एक सहज सॉल्यूशन यह है कि तुम अपनी नजर के सामने भगवान का फोटो रखो और उनके ऊपर में ध्यान करो। आंख खुली रखकर के करो। इससे कोई आपत्ति नहीं है। यह तो एक सहज उपाय है। और एक बेटर उपाय क्या है? मैंने कहा तुम अपने घर की छत के ऊपर में चले जाओ। संध्या के समय या अर्ली मॉर्निंग के टाइम में आसपास में जो पेड़ पौधे होंगे उसके ऊपर में देखकर के ध्यान करो। जो तुम अपने हृदय में विजुअलाइज करते थे ईश्वर को जिस अपने इष्ट को उसी इष्ट को तुम जब पेड़ पौधों को देखते हो उनके भीतर में विजुअलाइज करो। देखो कि तुम्हारा मन सहज रूप से एकाग्र हो जाएगा। मैं यहां पर शाम को हमारी लाइब्रेरी है। उसकी छत के ऊपर में थोड़ा सा वॉकिंग करता हूं। तो सामने ही है समुंदर का किनारा और फिर उस समय तो संध्या हो रही है। तो आकाश के जब सूरज बादलों के पीछे में छुप जाता है तो बादलों का कलर कैसा वो मैंगो कलर का हो जाता है। ऑरेंज कलर का हो जाता है। पिंक कलर का हो जाता है। तो वो मैं कभी-कभी आकाश के सामने यह जो बादलों का जो कलर बदलता है वो उसके सामने देखता रहता हूं। आपकी नजर जितनी क्षितिज की ओर जाएगी, जितनी होराइजन की ओर जाएगी, जितनी दूर जाएगी, उतना ही आप देखेंगे कि आपका मन जो है जैसे कि अपने तन से अपने खुद का यह जो सेल्फिश एक सेल्फिश नहीं कहेंगे। एक सेल्फ अब्सॉर्ब्ड एक वर्ल्ड है ना अपना उससे कहीं जाकर के दूर चला जाएगा। अपना सेल्फ अब्सॉर्प्शन किस में होता है? मुझे यह चाहिए। मुझे यह नहीं चाहिए। राग और द्वेष यह मुझे चाहिए और यह मुझे नहीं चाहिए। यह मेरा मेरे साथ में अच्छा उसका व्यवहार है। इसका व्यवहार मेरे साथ में अच्छा नहीं है। यह करने से मुझे प्रॉफिट होता है। यह करने से मुझे लॉस होता है। यह करने से मेरा भविष्य अच्छा होगा। यह करने से मेरा भविष्य बिगड़ेगा। ऐसा करने से मेरे परिवारजन सुखी रहेंगे। ऐसा करने से दुखी रहेंगे। यह इस ऐसा करने से बिजनेस में बेनिफिट होगा। ऐसा करने से बिजनेस में लॉस होगा। यह जो अपना सेल्फ अब्सॉर्ब्ड वर्ल्ड है राग और द्वेष के ऊपर बना है। अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश पंच क्लेश किंतु यूजुअली ये राग और द्वेष जो है नजर के सामने हमको दिखाई देते हैं। तो यह जो सेल्फ अब्सॉर्बड अपना जगत है आप क्षितिज की ओर देखेंगे, बादल की ओर देखेंगे तो देखेंगे कि वहां पे अपना मन कहां पे चला जाता है। मैं कभी-कभी मॉर्निंग वॉक करने के लिए जाऊंगा समुंदर के किनारे। तो अगेन सेम इस समुंदर का जो पृथ्वी आकाश के साथ में समुंदर जहां पर मिलता है होराइजोन तो वहां पर मैं होराइजोन पे अपना मन को एकाग्र करने का प्रयास करूंगा। ऐसा लगेगा जैसे कि मैं उड़ते-उड़ते जैसे हवा में एक मुक्त पंखी की तरह उड़ते-उड़ते एक क्षितिज की ओर जा रहा हूं। मेरे ऊपर में किसी का बंधन नहीं है। मेरे ऊपर में किसी भी तरह का बोझा नहीं है। मेरा मन संपूर्ण रूप से हल्का हो गया है। जो भी चिंता है, जो भी ए्जायटी है, जो भी टेंशन है, जो भी रिस्पांसिबिलिटीज है, जो भी फियर्स है, वो सब जैसे कि मेरे किनारे पर रह गए हैं और मैं मुक्त पंखी की तरह ये होराइजन की ओर उड़ता जा रहा हूं। चारों ओर ठंडा हवा है। नीचे में अनंत समुंदर है। ऊपर में अनंत आकाश है। सामने अनंत क्षतिज है। तो देखेंगे कि यह प्रकृति हमको एक चांस देती है। जैसा प्रकृति की ओर आप निहारेंगे वैसे ही आप देखेंगे कि यह जो सेल्फ अब्सॉर्ब्ड अपना यह जो लाइफ है उससे पल भर के लिए आप निकल कर के चले आएंगे। सो दैट इज़ वन ऑफ द ब्यूटीज ऑफ नेचर। वन ऑफ दिस यू कैन से दैट एडवांटेज ऑफ लिविंग विद नेचर अनफॉर्चूनेटली आजकल हमारे साथ में जो होता है खास करके जो महानगर में रहते हैं ये प्रकृति का सौंदर्य प्राप्त करना उनके लिए बड़ा ही मुश्किल होता है आजकल स्कूल हॉस्पिटल बहुत ज्यादा कोई बनाना नहीं चाहता हर अभी एक समय था कि भारत में इस तरह की सेवा की जरूरत थी अन्नदान की जरूरत थी स्वास्थ्य दान की जरूरत थी। विद्यादान की जरूरत थी। अभी भी है। अन्नदान की जरूरत अभी भी है। स्वास्थ्य दान की जरूरत अभी भी है। विद्या दान की जरूरत अभी भी है। किंतु यह जो ज्ञान दान है, आध्यात्मिक ज्ञान दान वो अभी सबसे ज्यादा जरूरत है। जो परिस्थिति स्वामी जी ने अमेरिका में पाई थी। उस समय अमेरिका में जाकर के स्वामी जी ने चार योगों का प्रचार किया। वहां पर स्वामी जी ने शिव ज्ञान से जीव सेवा नहीं कहा। वहां पर कहा कि ये लोग भोगवाद की जो चरम सीमा पर बैठे हुए हैं। अभी इन लोगों को चाहिए कि कुछ मन की शांति या तो फिर यह मटेरियलिस्टिक उनका जो लाइफ हो गया है उससे एक सेबेटिकल लेकर के एक ब्रेक लेकर के वो एकेडेमिक वर्ल्ड में आप यदि ब्रेक लेते हैं अपने टीचिंग में से कहीं से तो उसको और कहीं दूसरी जगह पे जाते हैं तो उसको कहते हैं सेबेटिकल। तो ऐसा अपना जो मटेरियलिस्टिक लाइफ है उससे सेबेटिकल लेकर के आपको एक स्पिरिचुअल जो एक एक्सपीरियंस है सब लोगों को चाहिए। आजकल आप अमेरिका में देखेंगे योगा स्टूडियो माने योगा क्लासेस नहीं क्लासेस का कांसेप्ट तो फिर भी अभी छोटा हो गया है स्टूडियो अर्थात कि वहां पे सब कुछ है वहां पे आपके लिए मसाज सोना ये जिम वहां पे क्लोथिंग यह आपका ब्रांड ब्रांड सब मिल जाएगा जितने भी यह जो योगा क्लोथिंग ब्रांड्स है यह लूलू लेमन बोल के एक है तो वो सब कुछ वहां पे एक साथ में आपको देखने को मिलेगा योगा सन भी होगा, सब कुछ होगा। सो क्या है कि लोगों को आजकल एक जैसे d्नीलैंड है तो इंडिया में तो नहीं है। बहुत सारे लोगों को d्नीलैंड का एक्सपीरियंस नहीं है। किंतु जो खास करके अमेरिका, यूरोप या जापान वगैरह में रहते हैं। d्नीलैंड इज़ एन इंटीग्रेटेड एक्सपीरियंस। आप वहां पे जाइए। सब तरह के एक्सपीरियंस आपको मिलेंगे। आपको वो माने फ़ूड माने सब तरह का बेस्ट वो जो आइसक्रीम वगैरह जो भी है जो कि बच्चों को चाहिए। बच्चों को एक्साइटमेंट के लिए जो कोई भी चाहिए सब एक्सपीरियंस आपको बड़े ही सोफिस्टिकेटेड रूप में पैकेज करके वहां पे मिलते हैं। तो अभी यह योगा है वगैरह भी एक सोफिस्टिकेटेड पैकेज करके लोगों को परोसा जा रहा है। मैं दिल्ली गया था अक्षरधाम में तो देखा दैट इज आल्सो सॉर्ट ऑफ अ स्पिरिचुअल। वहां पे सब कुछ है। ऐसा होना ही चाहिए। हमको भी ऐसा करना चाहिए। व्हाट आई मीन टू से इज़ के एक इंटीग्रेटेड एक्सपीरियंस आजकल सबको चाहिए। अभी यह अहमदाबाद में अपना नया सेंटर बना है। तो वहां पे महाराज है। वह ऐसा ही कह रहे हैं कि एक म्यूजियम होना चाहिए। फिर एक वीडियो दिखाने के लिए कुछ होना चाहिए कि ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में अभी यह इतना बड़ा लीला प्रसंग है। युगनायक है। गंभीरानंद जी का मां का लाइफ है। स्वामी जी का यह कंप्लीट वर्क है। कौन पढ़ने को जाने वाला है? तो छोटे-छोटे वीडियो बना करके वहां पे एक थिएटर में वो जैसे आई मैक्स थिएटर वो जो अक्षरधाम में है ऐसा एक आई मैक्स थिएटर बना करके 3D ना कि ऐसा करके ठाकुर का लाइफ ठाकुर मास्वामी जी का लाइफ अपना इंडियन कल्चर एंड स्पिरिचुअलिटी वो सब लोगों के सामने प्रेजेंट करना है। पीपल वांट दिस इंटीग्रेटेड स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस नाउ डेज। ये जो विदेश में आप देखेंगे ना अभी रिसेंटली मैं एक आर्टिकल पढ़ रहा था न्यूयॉर्क टाइम्स में अभी ये जो अल्ट्राव्थदी लोग जो है ना बिलियनर मल्टी बिलियनर जो कि टेक इंडस्ट्री में उन्होंने भयानक पैसा बना दिया है। अभी उन लोगों के पास में लग्जरी ब्रांड्स कहो लग्जरी गुड्स कहो खाने-पीने की भोग की जो चरम सीमा है वह लोग इजीली अटेंड कर लेते हैं। क्योंकि उनके पास में उस लेवल का वेल्थ है। तो भाई अभी उनको क्या चाहिए? अभी उनको चाहिए एक्सपीरियंस। ऐसा आउट ऑफ वे ऐसा एक्सपीरियंस जो कि उनको पैसा खर्च करने से यूजुअली नहीं मिलता है। तो जैसे अभी ट्रैकिंग एक एक्सपीरियंस है। हिमालय में ट्रैकिंग करना। अंटार्कटिक में जाकर के आर्कटिक और अंटार्कटिक यह नॉर्थ पोल और साउथ पोल वहां पर आप जाएंगे तो लाइफ के लिए स्ट्रगल तो करना है। भयानक ठंड है तो आपको वो गर्म कपड़े पहन करके वो बहुत सारा कुछ प्रिकॉशन लेकर के वहां पे जाना है। बट दीज़ आर द एक्सपीरियंसेस। माने जो अल्ट्रा वेल्थी है उन्होंने अच्छे से अच्छा खाना जो है वह उन्होंने खा लिया है। अच्छे से अच्छे कपड़े जो पहनने हैं वह पहन लिए हैं। वो जो पेरिस, लंदन, जापान, टोक्यो ये लोग हांगकांग ये जो वर्ल्ड दुबई यह जो वर्ल्ड के टॉप सिटीज है जो आपको टॉप कंफर्ट प्रोवाइड कर सकते हैं, वह सब उन्होंने कर लिए। नाउ दे वांट सम सॉर्ट ऑफ एक्सपीरियंस। और इसीलिए अल्ट्रा वेल्थी लोगों के लिए यह स्पेस ट्रैवल वो जो ब्लू ओरिजिन ये Amazon वालों का है वे लोग टिकट बेचते हैं वो मिलियन मिलियन डॉलर की कि आपको स्पेस का एक्सपीरियंस लेना है। बैठिए हमारे स्पेसशिपिप में आपको हम स्ट्रेटोस्फीयर तक लेके जाएंगे। जीरो ग्रेविटी का सफर करवाएंगे। सो दिस एक्सपीरियंस इंडस्ट्री यह अभी बढ़ रही है। जो लोग इस तरह का आपको पैकेज एक्सपीरियंस ऑफर करते हैं दे आर अभी उनका डिमांड है। सो यू सी कि स्पिरिचुअलिटी में भी ऐसा है कि अ आज तक ऐसा था कि हम लोग स्कूल ज्यादा ज्यादा से ज्यादा स्कूलों को बढ़ाते हैं। स्कूल में बच्चों को बढ़ाते हैं। या तो फिर यह हॉस्पिटल अभी यह सब चल रहा है। वृंदावन में अभी वह कैंसर बोर्ड का इनोगेशन हुआ तो अपना प्रेसिडेंट मैडम वो स्वयं आई थी। सो दीज़ आर गुड साइंस। उसमें कुछ है नहीं। किंतु ज्यादातर अभी देखेंगे कि इस तरह का स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस प्रोवाइड करना, रिट्रीट करवाना इसी के ऊपर में लोगों का अभी ज्यादा ध्यान चल रहा है। सो यह क्या है कि बेसिकली हम अपने बारे में सोच रहे थे। पूरा एक डायवर्जन में चले गए। प्रकृति जो है प्रकृति के ऊपर में हम जितना अपने मन को एकाग्र करेंगे उतना ही हम देखेंगे कि यह जो सेल्फ अब्सॉर्ब्ड लाइफ है अपना उससे निकल कर के आपको एक नया एक्सपीरियंस होगा। तो दैट वाज़ वन ऑफ द थिंग्स आई वांटेड टू शेयर। अच्छा स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन देख रहे थे। उसी के अंतर्गत एक स्लाइड शो है। तो वो स्लाइड शो यह कल वाला हमने ऑलरेडी देख लिया। दे
exploration, adventure, and curiosity drives the power of the human spirit मानव आत्मा की शक्ति: अन्वेषण, साहस और जिज्ञासा
व्हाट आवर कंट्री नाउ वांट्स आर मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टिल जैगेंटिक विल्स व्हिच नथिंग कैन रेजिस्ट दैट कैन ओनली बी क्रिएटेड बाय अंडरस्टैंडिंग एंड रियलाइजिंग द आइडियल ऑफ द अद्वैता दैट आइडियल ऑफ द वननेस ऑफ़ ऑल यह भी हमने देख लिया द टेस्ट ऑफ ट्रुथ एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एस पोइजन देयर इज़ नो लाइफ इन इट इट कैन नॉट बी ट्रू ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग और अ कोल्ड टू यूथ बी स्ट्रांग माय यंग फ्रेंड्स दैट इज माय एडवाइस टू यू यू विल बी नियरर टू हेवन थ्रू फुटबॉल देन थ्रू द स्टडी ऑफ़ द गीता यू विल अंडरस्टैंड द उपनिषद्स बेटर एंड द ग्लोरी ऑफ़ आत्मन व्हेन योर बॉडी स्टैंड्स फर्म अपॉन योर फीट एंड योर फील एंड यू फील योरसेल्व्स एज मैन। देखिए यह जो एडवेंचरस स्पिरिट जो था ना यूरोप के भीतर में उसी की वजह से वो दुनिया के प्रत्येक कोनों में जाकर के उन्होंने एक्सप्लोरेशन किया। अभी ये एडममंड हिलरी है उसने यह माउंट एवरेस्ट सर किया। फिर यह जो कैप्टन कुक है वह सरकुम नेविगेशन ऑफ अर्थात कि जहाज में बैठकर के पूरे पृथ्वी की परिक्रमा उसने की है। तो ये देखेंगे कि ये जो एज ऑफ एक्सप्लोरेशन था यूरोप में वो खास करके ये न जो 17th और 16th सेंचुरी से स्टार्ट हुआ था। अलोंग विद दिस एडवांसमेंट इन सेलिंग टेक्नोलॉजी। ये जो इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन है ये जो इंटरनल कंबस्शन ये जो स्टीम इंजन है इंटरनल कंबस्शन इंजन तो बाद में आया उस समय का जो स्टीम इंजन था और यह जो फिर एक जो एक्सप्लोजन वहां पे हुआ ब्रिटेन और यूरोप में ये क्यूरियोसिटी है एक्सप्लोरेशन है वो जो सालों की म 1000 साल की ये जो फ्यूडल सिस्टम थी वहां पे कि एक जो किसान है उसको जमीन के साथ में बांध करके करके रख देते हैं। और जो लैंड लॉर्ड है वह जो किसान जो वहां पर मजदूरी करते हैं खेत मजदूर को उनको जैसे कि गुलाम बना करके उनके पास में से कार्य करवाते हैं। वो जो पूरा एक सिस्टम था उसमें जैसे ही इंडस्ट्रियलाइजेशन के आने से यह एक नया मर्चेंट क्लास खड़ा हुआ और यह मर्चेंट क्लास के पास में यह जो पुराने लैंड लॉर्ड थे उससे भी अधिक पैसा जब आने लगा तो यह एक भयानक एक एक्सप्लोजन हुआ। यह वारेन हेस्टिंग्स वगैरह जो कि ब्रिटेन में आप देखेंगे कि उनका कोई वैल्यू नहीं क्योंकि ना ही वे लोग लैंडेड वो क्या कहेंगे जेंट्री अर्थात कि उनके पास में ना ही कोई हेरिडिटरी टाइटल है ना ही कोई हेरेडिटरी उनके पास में लैंड है तो वे लोग नोबल मैन नहीं है वे लोग सिर्फ एक आम आदमी है किंतु ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करके भारत में आकर के जो एक नंबरी दो नंबरी तीन नंबरी वो सब करके इतना इतना धनी होकर के वो ब्रिटेन में वापस जाते हैं कि वहां की ये जो नोबिलिटी है लैंडेड नोबिलिटी जो कि जमीन से जितना पैसा जिन लोगों के पास में आता है उससे कहीं ज्यादा रुपया ये लोग विदेश में एडवेंचर करके खड़ा करते हैं कलेक्ट करते हैं। सो यह देखकर के चारों ओर जो एक्सप्लोजन हुआ पृथ्वी के प्रत्येक कोनों को उन्होंने छान मारा है। उन्होंने प्रत्येक कोने को उन्होंने एक्सप्लोर किया है। अफ्रीका के घने जंगल यहां पे ये नॉर्थ पोल यहां पे ये साउथ पोल दुनिया का सबसे बड़ा पर्वत सबसे ऊंचा पर्वत सबसे दुर्गम जगह है जहां पे और कोई जाने को तैयार नहीं है। यह एक पूरा एक एडवेंचर का दौर चला है। और ये एडवेंचर जो है ऐसा कुछ यह जो एक्सपीरियंस राइट हम लोग सोचते हैं कि एक्सपीरियंस की लाइफ में कोई जरूरत नहीं है। किंतु एक्सपीरियंस ही है जो कि हमारे संस्कारों को क्या कहेंगे कि हम मैं कहूंगा कि संस्कारों को ये करता है। प्यूरिफाई तो नहीं संस्कारों को परिपुष्ट तो नहीं एक कल्चर करता है। संस्कारों को कल्चर करता है। इस अर्थ में कि एक तरह का रिचनेस एक तरह का डेप्थ देता है। हम लोग खास करके पिछले जो कुछ सेंचुरीज़ में भारत में ऐसा हुआ कि जो भी बाहर से का जो जगत है वो जो बाहर का जो एक्सपीरियंस है एक्सपीरियंस को मार दो। यह जो संस्कार है उसको तोड़ दो। प्रॉब्लम यह हुआ हमारे साथ में कि संस्कार तोड़ते हमारा सेल्फ कॉन्फिडेंस टूट गया। अभी संस्कार को तोड़ना यह अपने घमंड को तोड़ना यह पॉसिबल होता है जगत में मुश्किल से 1% 2% लोगों के लिए बाकी जो लोग हैं उनके लिए ऑप्शन यह नहीं है कि संस्कार को तोड़ना उनका लिए ऑप्शन है संस्कार को सुसंस्कृत करना अच्छा इस तरह से उसको डेप्थ देना इस तरह से उसको एनरच करना इस तरह से उसको आप कहेंगे कि पॉजिटिविटी प्रदान करना जो कि आपके भीतर में से एक तरह का आत्मसंतोष और आत्मविश्वास प्रकट करें। फिर यह आत्मसंतोष और इस आत्मविश्वास को आप आध्यात्मिक जगत में बहाइए। तमस में से आपको रजस में आना है। रजस में से आपको सत्व में जाना है। इसकी वजह हम प्रयास करने को गए। तमस में से सीधा रजस पे सत्व पे छलांग मारने को गए और उसमें जो गिरे सो ऐसे गिरे और ऐसी मार खाई कि हजार साल तक हम लोग गुलाम बन के पड़े रहे। सो यह जो पूरा अपना अंडरस्टैंडिंग है स्पिरिचुअल लाइफ का उसको हमको थोड़ा सा डीपन करने की जरूरत है। जो पाथ है ब्रह्म ज्ञान का वो ऐसा कोई पाथ नहीं है कि आज मैंने ठान लिया कि मुझे ब्रह्म ज्ञान के लिए अपने मन में से जितने भी अंकट बंकट है जितना भी कूड़ा कचरा है सबको हटा देना है। मुंह से बोलने से तो यह होगा नहीं। हमको यह एक्सपीरियंस रूपी संस्कार को सुसंस्कृत करने की एक्सरसाइज करनी होगी। इसीलिए स्वामी जी को देखिए कि भारत की जगह कितना ज्यादा वेलकम अमेरिका में मिला। ऐसा नहीं है कि अमेरिका में स्वामी जी की निंदा नहीं हुई है। ऐसा नहीं है कि भारत में स्वामी जी को सराहा नहीं गया है। भारत में स्वामी जी के इनफ एडमायरर्स थे। विदेश में खास करके अमेरिका में स्वामी जी के इनफ दुश्मन थे। मैं तो कहूंगा कि शायद 50-50 दोनों जगह पर होगा। भारत में यदि 50% एडमायरर थे तो 50% उनके निंदुक थे। तो शायद अमेरिका में भी जो 50% एडमायरर्स थे तो 50% निंदुक थे। इस बात में अमेरिका और भारत में कोई डिफरेंस मुझे तो अल्टीमेटली नहीं दिखता है। विदेश में मैटर क्या करता है कि जो स्वामी जी के एडमायरर्स थे उन लोगों के पास में एक कहेंगे कि समाज में उनकी प्रतिष्ठा इतनी थी कि जो निंदुक लोग हैं उनका मुंह बंद हो गया था। जबकि भारत में ऐसा है कि निंदुक लोगों के पास में इस तरह का पावर था कि जो एडमायरर्स थे वो बेचारे ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे। तो इसीलिए देखिए कि भारत में कार्य शुरू करने के लिए स्वामी जी ने प्रयास तो बहुत किए किंतु अल्टीमेटली वो जो अमेरिका जाना है। उस समय स्वामी जी मद्रास में थे। उस समय का मद्रास प्रवरज्या समाप्त करके मद्रास में है और प्लान चल रहा है कि अमेरिका जाना है तो वहां के आई थिंक मैसूर के ही राजा ने उनको प्रॉमिस किया कि अच्छा स्वामी जी आपको यदि वहां पर जाना है तो मैं आपको फंड करूंगा आपको प्रमोट करूंगा। ठीक है? वो सब बात हुआ। फिर आखिरी घड़ी में क्या हुआ? तो राजा ने ना ही पैसा दिया ना ही स्वामी जी को सहाय की। तो उस समय स्वामी जी कहते हैं कि यहां के राजाओं का कुछ ठिकाना नहीं है। असली राजा तो राजपूताना के हैं। प्राण जाए पर वचन न जाए। रघुकुल नीति सदा चली आई। वो जो प्रॉमिस है रघुकुल का रघुनंदन का वो प्रॉमिस अभी भी वे लोग फॉलो कर रहे हैं। यहां के राजाओं के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है। सो स्वामी जी को यह सब अनुभव हो चुके थे। जबकि अमेरिका में देखिए कि बेलून मठ की स्थापना करने के लिए जो पैसा चाहिए था वह अमेरिका से आया है। सारा ओलीबुल ने दिया है। मिस मूलर ने दिया है। ईटी स्टडी ने दिया है। यह जो जोसेफाइन मैक्लाउड ने दिया है। बेटी लेगेट ने दिया है। माने यह जो सब स्वामी जी के जो क्लोजली एसोसिएटेड वेस्टर्न डिसाइपल्स थे उन लोगों ने स्वामी जी की सहाय की है। उनके पैसों से बेलूर मठ का जमीन खरीदा गया है। और फिर बाद में निखिलंद जी मोस्ट प्रोबेबबली निखिलंद जी हॉलीवुड से जब आए थे तो साथ में उनके साथ में दो लेडी डिसाइपल्स थी तो उन्होंने बेलूर मठ का मंदिर जो है ठाकुर का जो मेन टेंपल उसको कंस्ट्रक्ट करने के लिए पैसा उन्होंने दिया था। सो अब देखिए कि ये जो जो फाउंडेशन जो डालना था भारत के उत्थान का वो फाउंडेशन डाला गया है अमेरिका के पैसों से नहीं कि ये भारत के पैसों से तो भारत की ये जो परिस्थिति आन पड़ी थी वो क्यों आन पड़ी थी कि हमने स्पिरिचुअलिटी को मिसअंडरस्टैंड करके लोगों के भीतर में इस तरह से उसको फैलाना शुरू किया कि लोगों को स्पिरिचुअल बनाने की वजह लोगों का जो आत्म आत्मश्रद्धा है, आत्मसम्मान है, आत्मविश्वास है, उसी को तोड़ दिया। और इसीलिए यह जो एक्सपीरियंस है जगत का हमको चाहिए। आप जाइए हिमालय को सर कीजिए, जाइए नॉर्थ पोल की यात्रा कीजिए, जाइए अंटार्कटिका जाइए। वहां पे देखिए कि चाइना ने चारों ओर अपने आर्कटिक में खास करके आर्कटिक और अंटार्कटिक। नॉर्थ पोल और साउथ पोल दोनों जगह पर अपना रिसर्च स्टेशन बनाना शुरू किया है और नाम है रिसर्च स्टेशन भीतर में क्या वो सब उनका प्लान है वो तो अभी भगवान ही जाने और हम भारत वाले हैं कि यह है आई थिंक कि अपना एक रिसर्च स्टेशन नॉर्थ पोल पे तो है। आई डू नॉट नो कि साउथ पोल पे है कि नहीं। किंतु एक छोटा सा प्रेजेंस है। जबकि चाइना ने अपना प्रेजेंस चारों ओर फैलाना शुरू किया है। अमेरिका इतने सालों के बाद में फिर से चांद पे आदमी को भेज रहा है। यह जो आर्टेमिस मिशन है तो चारों ओर से यह एक्सपेंशन जो है एडवेंचरस स्पिरिट जो है यह जो खतरों को झेलने की खतरों का सामना करने का जो एक उत्साह है वो उत्साह होना चाहिए। यदि यह उत्साह होगा तो क्या है? भीतर में से मददानगी प्रकट होगी। भीतर में से वह जो सोया हुआ शेर जो है वो दहाड़ करके जागृत होगा। हमको मददानगी देगा। हमको आत्मसम्मान देगा। हमको आत्मसंतुष्टि देगा। आत्मश्रद्धा देगा। और फिर उस आत्मश्रद्धा को लेकर के हम उसको स्पिरिचुअल लाइफ में रिीडायरेक्ट करें। सो दैट विल बी द प्रॉपर एप्लीकेशन ऑफ स्पिरिचुअलिटी। प्रॉब्लम कहां पर आता है? जो लोग सोचते हैं कि मैं स्पिरिचुअल होना चाहता हूं, वे लोग यह पूरा एडवेंचर है, एक्सपीरियंस है, एनरचमेंट ऑफ संस्कार है, यह जो एनरचमेंट ऑफ माइंड जो है, उसको अवॉइड करना चाहते हैं। वो बोलते हैं कि मैं एक कोने में पड़ा रह के और फिर मैं बस ईश्वर का नाम रोते-रोते पुकारता रहूंगा। यह एक गलती स्पिरिचुअल लोग करते हैं। और यह जो गलती है यहां पर यह जो कभी-कभी यह वेस्टर्न मिलिटरिज्म या तो फिर यह वेस्टर्न एडवेंचरिज्म एक एक्सट्रीम मटेरियलिज्म में चला जाता है और फिर यह वॉर है, रेवोल्यूशन है, सिविल वॉर है उसमें प्रवेश कर जाता है। इसीलिए यह सेकंड वर्ल्ड वॉर इसीलिए यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर इसीलिए यह कोल्ड वॉर और इसीलिए आज जो हम देख रहे हैं यूरोप ये जो यूक्रेन में जो हो रहा है ईरान में जो हो रहा है तो क्या है कि रन एमोक इंग्लिश एक शब्द है रन एमोक का अर्थ क्या है कि कोई भी एक टेंडेंसी है उसको बिना किसी गाइडेंस दिए आपने खुला छोड़ दिया है। जैसे एक छोटा शिशु है उस शिशु को मां खुला छोड़ देगी। तो यह बच्चा क्या करेगा? चारों ओर दौड़ता घूमेगा। कभी मिट्टी में जाकर गिरेगा। कभी वह कीचड़ में जाकर गिरेगा। कभी वो किसी को परेशान करेगा। कभी क्या करेगा? अभी दूसरी मां जो है शिशु को उठाकर के एकदम अपनी गोद में लेकर घूमती है। उसको थोड़ा सा भी उसको खुला नहीं छोड़ेगी। ये दोनों केस में क्या होगा? जिस शिशु को संपूर्ण रूप से खुला छोड़ दिया गया है, वह क्या है? उसका नेचर जो है हाइपर एक्टिव हो जाएगा। दूसरों को परेशान करने वाला जिसको कि प्रॉब्लम चाइल्ड कहते हैं साइकोलॉजी में जहां पर भी जाएगा कुछ ना कुछ गड़बड़ खड़ी करेगा। तो बिल्कुल खुला छोड़ दिया उसके साथ ऐसा होता है। और जो जिस शिशु को मां अपनी गोद में बिठा के चारों ओर घूम रही है उसको कुछ भी उसके हाथ से नहीं करने देती। खिलाएगी भी अपने हाथ से कपड़े भी अपने हाथ से पहनाएगी। स्नान भी अपने हाथ से कराएगी। उसको पूरा प्रोटेक्शन में रखेगी। यह जो शिशु है वो गुजराती में एक शब्द है मावड़ियों। मावड़ियों का अर्थ क्या है कि वो मां को पकड़ कर के रहता है चारों ओर सब समय। मां को छोड़कर के वो बेचारा रह नहीं पाता। वो डरपोक हो जाता है। भीतु हो जाता है। सब समय वो किसी थोड़ा सा भी वह बड़ा आवाज होता है तो रोना शुरू कर देता है। दौड़ के मां की गोद में जाकर बैठ जाता है। तो दोनों शिशुओं का क्या है कि डेवलपमेंट नहीं होता प्रॉपर्ली। प्रॉपर डेवलपमेंट चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट क्या कहते हैं? थोड़ा सा खुला छोड़ना है। थोड़ा सा प्रोटेक्शन में रखना है। तो ये ये और यह जो बैलेंस कहां पे मेंटेन करना है? वो जो मां की ये जो शक्ति कहां पे आती है मातृत्व की मातृत्व का जो डेप्थ कहां पर प्रकट होता है मां ये ठीक ठीक समझ पाती है कि बैलेंस कहां पे करना है कितना उसको खुला छोड़ना है कितना उसको प्रोटेक्शन में रखना है कितना उसको मुसीबत को फेस करने देना है कितना उसको आपको सहाय करनी है यह जो बैलेंस जो है मातृत्व का यही सबसे बड़ा सीक्रेट है जो मां इस सीक्रेट को समझती है उसका बेटा बेटा जो है बड़ा होकर के समाज के लिए देश के लिए संस्कृति और सिविलाइजेशन के लिए आशीर्वाद रूप बनेगा और जो मां इस बैलेंस को नहीं समझ पाती है उसका लड़का जो है वह भविष्य में ट्रबल मेकर ही बनेगा। तो देखिए कि यह जो अपना मन जो है उसको भी इस तरह से यह अपना यह मातृत्व की यह परीक्षा है। मेरे मातृत्व की परीक्षा कि मैं अपने मन को कितना खुला छोड़ता हूं। कितना मैं उसको एडवेंचर एक्सपीरियंस और चैलेंज में फेंकता हूं और कितना मैं उसको वापस खींच करके मैं उसको किसी एक तरह के डिसिप्लिन में रखने का प्रयास करता हूं। दिस बैलेंस जो है अपनी लाइफ में हमको मेंटेन करना है। यदि हमने एक ही बार में जगत को छोड़कर के एक कोने में रहना राजकोट में एक लड़का आता था पब्लिकेशन में हमारा स्टाफ तो गांव से आता है। आते-आते उसको डेढ़ दो घंटा एक डेढ़ घंटा ईजीली हो जाता है। वह आने जाने का माने डेढ़ घंटा सुबह को डेढ़ घंटा रात को घर वापस जाने का तो 3 घंटा तो उसका वह कम्यूट में जाता है। कभी बस मिलेगा तो ठीक है नहीं मिला तो और भी ज्यादा टाइम लगेगा। तो मैं उसको कहता हूं कि अरे तुमने शादी तो कर दी है। तुम राजकोट में ही आकर के रहो ना। गांव से क्यों आना जाना करते हो? तो बोलता है मेरी मां मना करती है मुझे घर से निकलने के लिए। बोलती है कि तुम यहीं पर रहो मेरे साथ में। तो मैंने कहा तुम मां को यहां पे ले आओ। बोला नहीं नहीं नहीं वो गांव छोड़ के नहीं जाना चाहती। तो अभी देखिए कि यह है अपने बच्चे वह शादीशुदा है। नौकरी करता है। फिर भी मां उसको कहती है मेरे ही पास में रहो बोल के वो 3 घंटा 4 घंटा वो बस में से अपडाउन करेगा। गुड। मैं उसको मैं उसको एडमायर करता था। मैंने कहा वेरी गुड। मां की बात सुनते हो वो बहुत अच्छी बात है। इसमें गलत कुछ नहीं है। ऑन दी अदर हैंड अमेरिकन बच्चों को देखिए कि जैसे ही हाई स्कूल छोड़कर के कॉलेज में आए वो मां-बाप ही कहेंगे भैया अभी तुम निकलो यहां से और हमको हमारा लाइफ लीड करने दो। तुमको जो करना है करो। वो जो मैकडोनाल्ड में जाकर के वो बर्गर बांटो ना कि जो कुछ भी करो पैसा अपना कमाओ और अपना कॉलेज का जो ट्यूशन है वह भी तुम अपने से करो मैनेज। हमारे से जो थोड़ा बहुत होगा वो हम तुमको हेल्प करेंगे। बोल करके उसको पूरा बाहर फेंक देते हैं। तो अमेरिकन बच्चे जो है वह एकदम एक एक्स्ट्रोवर्ट एडवेंचरस अग्रेसिव होते हैं। और अपने काफी इस तरह के लड़के जो कि मैं बता रहा हूं। थोड़े से वो डरपोक तरह के एडवेंचर के नाम से ही डर जाएंगे। यह लड़के का संस्कार बहुत अच्छा है जिसकी मैं बात कर रहा हूं। किंतु मैं हमेशा देखता हूं कि उसका जो पोटेंशियल है ना पोटेंशियल को एक्स एक्सप्लइट करने में पोटेंशियल को मैनिफेस्ट करने में वो हमेशा डरता रहता है। एक दिन उसको ऑफर आया कि और कहीं पर उसको अच्छे नौकरी मिल रही है ज्यादा पैसों से तो वो छोड़ के चला गया। तो ठीक है। अभी उसका प्रोग्रेस हो उसमें किसी को कुछ बोलना नहीं है। उस समय मैं था नहीं पब्लिकेशन में। मैं बाद में आया था। यह स्टोरी मुझे बाद में पता चली। वह छोड़कर के चला गया आश्रम को। वहां पर जॉब कर रहा है। पैसा ज्यादा है। किंतु जो वर्किंग आवर्स है, डिमांड जो है उसके ऊपर में हार्ड वर्क की थोड़ी सी ज्यादा है। तो बोल के ना वह वापस चला आया। बोला आश्रम में जो पीस है, आश्रम में जो मन की शांति है, बहुत मुझे चाहिए। तो मैं जब वहां पर आया मैंने यह पूरा स्टोरी सुना। मैंने कहा पगले तुम्हारा उम्र अभी मुश्किल से 27 28 साल का है। ये पीस ऑफ माइंड की क्या फालतू की बातें कर रहे हो? पीस ऑफ माइंड की बात करना तुम 60 70 के हो जाओगे। अभी तो तुम्हारा हार्ड वर्क करने का टाइम है। अभी तो बैंक बैलेंस बनाने का टाइम है। क्या फालतू पीस ऑफ माइंड बोलते रहते हो। किंतु देखिए अभी अगेन आई एडमायर हिम फॉर हिज संस्कारा। बहुत अच्छा काम करता है। किंतु जो उसका पोटेंशियल है वो पोटेंशियल मैनिफेस्ट नहीं कर पा रहा है। सो दैट इज वन थिंग कि आपको अपना पोटेंशियल है जो मैनिफेस्ट करना है। अपने को दबा दबा करके ही हमने अपनी सिविलाइजेशन की अल्टीमेटली यह हालत की है कि ये छोटे-छोटे आसपास के देश है जिसका कुछ हतभागा बांग्ला ते बोले हतभागा अर्थात कि जिसका नसीब टूटा फूटा हुआ है। ऐसे लोग ऐसे जो हतभागा जो कंट्रीज है अपने आसपास के छोटे-छोटे वे लोग भी आकर के हमको आंख दिखा जाते हैं और हम उसका कोई मुकाबला नहीं कर पाते। अभी तक अभी कल परसों ही हमारी बात हो रही थी। बड़ा हम लोग विश्वुरु बन गए ऐसा सोच के घूम रहे थे और यह जो नया प्रेसिडेंट आया अमेरिका उसने हमारी अकल ठिकाने लगा दी। सो देखिए कि यह नाम बड़े दर्शन खोटे जैसा हिंदी में कहावत है। नाम बड़े अर्थात कि हम प्रशंसा तो अपनी बड़ी करते हैं अपनी या और किसी की किंतु सही में उनको मिलने को जाएंगे पता चलेगा प्रशंसा लायक उसमें कुछ नहीं है। प्रशंसा करने लायक उनमें कुछ नहीं है। तो यह नाम बड़े दर्शन खोटे उस जैसा हमारा हो जा रहा है। यहां पे है अपने पास में अद्वैत वेदांत। उससे भी अद्वैत वेदांत का भी बाप है अजातिवाद। वहां तक हम चले गए हैं कि जगत की रचना हुई ही नहीं है। जगत की सृष्टि जगत की उत्पत्ति हुई ही नहीं है। एवरीथिंग इज व्हाटएवर यू सी इज नथिंग बट ब्रह्मण। यहां तक हम थ्योरिटिकली चले गए हैं। और जो 10 15 20 25 100 200 संत महात्मा ऋषि मुनिगण होंगे। संत अवतार होंगे। उनके जीवन में यह प्रतिफलित होता हुआ सा भी दिखता है। किंतु यह जो करोड़ों करोड़ों भारतवासी है हमारे भाई-बहन है उनकी परिस्थिति तो देखिए स्वामी जी कहते हैं दे आर लिविंग नेक्स्ट टू दी एनिमल्स। माने ये जो एनिमल टेंडेंसी जिस तरह की होती है एनिमल अवस्था जिस तरह की होती है उस अवस्था में ये लोग जीते हैं। तो फिर व्हाट इज द मीनिंग ऑफ सच अ हाई सिविलाइजेशन? ये जो हाई फिलॉसोफी है ये हाई आइडियल्स है उसको प्रोड्यूस करने का क्या लाभ हुआ? यदि इसको आप प्रैक्टिकल एप्लीकेशन नहीं कर पाते हैं। प्रैक्टिकल
Practical application of vedanta
एप्लीकेशन शब्द का अर्थ भी बता दूं। इसका अर्थ यह सिर्फ नहीं दो अर्थ होते हैं। प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ वेदांत कहां पे होता है? एक तो मैं अपने खुद के इंडिविजुअल लेवल पर वेदांत को अप्लाई करता हूं। इस अर्थ में कि वेदांत में यह जो कर्म मार्ग यह जो साधन मार्ग कहा गया है यह जो उपासना पद्धति कही गई है कि नित्यानित्य वस्तु विवेक यह अमूत्र फल भोग विराग समाधि षटक संपत्ति मुमुक्षुत्व यह जो साधन चतुष्टय वेदांत में कहे गए हैं उसको मुझे पालन करना है। अपना जीवन धन्य करना है। यह तो एक एप्लीकेशन ऑफ वेदांत हुआ। दूसरा कि आपको यह भी तो देखना है कि मेरे आसपास में जो लोग हैं उनकी क्या परिस्थिति है। क्या मैं अपने को धन्य करके मैं शांत होकर के बैठ जाऊंगा? क्या यह है वेदांत? वेदांत तो यह कहता है कि एवरीथिंग इज ब्रह्मन। और कहेंगे कि ओनली ब्राह्मण इज नथिंग एल्स इज देयर। तो फिर यह जो हमको पशुवत परिस्थिति में अपने भाई बांधव बैठे हुए हैं क्या उनकी उन्नति करना उनको सहाय करना उनके लिए कुछ ना कुछ हम हेल्पफुल ना हो सके क्या यह करने का मेरा कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है क्या भीतर में से दया वगैरह कुछ नहीं आता है तो जब हम समाज की ओर अपनी नजर बढ़ाएंगे और समाज में लोगों को हेल्प करने का प्रयास करेंगे और फिर भारतीय ही क्यों पूरे विश्व को पूरी पूरी मानव सभ्यता को पूरी मानव जात को क्यों नहीं हम अपने भीतर में अपनी ये जो करुणा का यह जो आंचल है उसमें हम आवरत क्यों नहीं कर लेंगे अवतार तो आते हैं पूरी मनुष्य सभ्यता के लिए पूरी ह्यूमन स्पीशीज के लिए नहीं कि एक ज्योग्राफिकल बाउंड्री हमने बना दी है यह रेशियल लिंग्विस्टिक बाउंड्री हमने बना दी है उसके भीतर में जो लोग आते हैं उसी के प्रति करुणा है और इसके बाहर में जो लोग हैं उनके के प्रति मेरा विद्वेष है। यदि वेदांत इज सो कॉस्मिक वेदांत इज सो यूनिवर्सल देन व्हाई कैन नॉट बी माय कंपैजन बी इक्वली कॉस्मिक एंड इक्वली यूनिवर्सल। तो यह जो मनुष्य की तड़प जहां पे भी है वहां पे मेरी दया है, करुणा है, दावित होनी चाहिए। स्वामी जी अमेरिका गए थे भारत के लिए पैसा लाने के लिए और अमेरिका में जहां जहां भी देखते हैं कि कोई गरीब है, कोई जरूरतमंद है, कोई मुश्किल में आन पड़ा है, फटा करके उसको रुपया दे देते थे। तो अब जैसे क्रिस्टिन ग्रीन स्टीडल है ना स्वामी जी की बहुत अच्छी डिसाइपल थी। सिस्टर क्रिस्टिन जो भारत में आकर के बाद में रही भी थी। तो उस समय क्या था कि उसका बहुत बड़ा फैमिली था। फैमिली में नौकरी करने वाली वो अकेली थी। स्कूल टीचर का काम करती थी। तो वह स्वामी जी को कभी-कभी लेटर लिखेगी। कभी-कभी जो पर्सनल मीटिंग्स जो होती थी उसमें बताएगी कि उसकी जो फाइनेंशियल जो प्रॉब्लम्स है उसके घर के बारे में तो स्वामी जी उसको मॉनिटरी सहाय भी करते थे। माने आध्यात्मिक उपदेश तो उसको देते ही थे। उसको वेदांत के बारे में उपदेश देते ही थे। साथ में पैसे की भी सहाय करते थे। तो देखिए कि क्यों आप यह कहे कि सिर्फ भारतवासी के प्रति मेरा कंपैजन है। अमेरिका वासी के नैरोबी वासी कि जापान वासी के इवन जो साउथ एशिया में जितने कंट्रीज है क्यों नहीं उनके प्रति मेरी सहाय सहानुभूति कंपैजन हो। दैट कंपैजन हैज़ टू बी यूनिवर्सल। दैट इज द प्रॉपर एप्लीकेशन ऑफ़ वेदांता। और वो जो यूनिवर्सल कंपैशन होने के लिए एक स्ट्रेंथ चाहिए। यह मेरा दुश्मन है। यह मेरा मित्र है। मित्र को सहाय करूंगा। दुश्मन को सहाय नहीं करूंगा। यह जो आदमी बोलता है, मान लीजिए ही इज़ फंडामेंटली वीक इन हिस कैरेक्टर। ही इज़ फंडामेंटली उसके भीतर में सेल्फ कॉन्फिडेंस का अभाव है। बोल करके यह जगत को मित्र और शत्रु में बांटता है। जिसके भीतर में इतना सेल्फ कॉन्फिडेंस हो, जितनी आत्मश्रद्धा हो कि जगत में शत्रु जैसा कोई है ही नहीं। कि भले ही चाहे वो मेरा विद्वेष कर रहा हो, भले ही चाहे वो मेरा अहित करना चाहता हो, अहित यदि करता है तो एक थप्पड़ मार के उसकी अकल ठिकाने लाएंगे। किंतु उसके प्रति अपने मन में विद्वेष नहीं रखेंगे। अब जैसे यह टीचर है। टीचर है। स्कूल में आप गड़बड़ करेंगे क्लास रूम में। अभी आजकल तो मारना बंद हो गया है। कॉरपोरल पनिशमेंट चली गई है ज्यादातर जगहों से। किंतु एक समय था कि यह कॉरपोरल पनिशमेंट ही गुजराती में कहते हैं। सो वागे चमचम विद्या आवे धम धम माने जो टीचर की सोटी जो है वो जैसे चमचम करके आपके हाथ में लगेगी वैसे ही धमधम करके यह विद्या आएगी तो क्या है कि ये पनिशमेंट एंड ट्रेनिंग पनिशमेंट एंड यह कल्चर कल्चरिंग ऑफ द माइंड दोनों हमको करना है। तो वो आत्मश्रद्धा जब होगी तभी तो हम कहीं जाकर के जगत को एक विश्वास के साथ में एक फेस कर पाएंगे। वरना तो हम लोग हमेशा क्या है कि एक छोटी सी अपने लिए एक बनाया है। कुप मंडुक जिसको कहते हैं कुएं के मेंढक की तरह यह मेरा जगत है। उसी में मुझे रहना है। इससे बाहर मैं नहीं जा सकता। बाहर मैं जाना नहीं चाहता। स्वामी जी का वो फेमस एक्सपीरियंस। साउथ इंडिया में किसी पंडित के साथ में वो डिबेट कर रहे थे। पंडित को कहा स्वामी जी ने कि विदेश में जाकर के वेदांत का प्रचार करना है। तो यह पंडित जोर-जोर से चिल्ला रहा है। कदापि ना कदापि ना कभी नहीं कभी नहीं। तो स्वामी जी कहते हैं उसकी ये जो कदापि ना शब्द है ऑलवेज वो मुझे याद रहेंगे। इतना फेनेटिसिज्म है उसके भीतर में। यदि ये फनेटिसिज्म आप में है तो व्हाई नॉट इट टू चैनल इट इन अ पॉजिटिव डायरेक्शन। अपने संस्कार को सुसंस्कृत करने के लिए अपनी यह जो आसपास में जिनको भी हेल्पफुल हो सके उनको हेल्पफुल करने में यह फनेटिसिज्म लगाओ ना। यह जो देश का विकास रुंध देने के लिए लोगों का डेवलपमेंट को स्टॉप करने में फेनेटिसिज्म को क्यों आप अप्लाई करते हैं? सो, यहां पे स्वामी जी का यह जो फेमस स्टेटमेंट है, वर्ल्ड फेमस स्टेटमेंट कि यू विल बी नियर टू हेवन थ्रू फुटबॉल देन थ्रू द स्टडी ऑफ़ गीता। बहुत सारे बंगाली लोग खास करके बंगाल में फुटबॉल का चलन है। तो बंगाली लोग खास करके यंग लोग जो है इस स्टेटमेंट को काफी पसंद करते हैं और करना ही चाहिए। एक तरह की मैं यहां पे एक बार गया था एक कॉलेज में तो मैं खड़ा था एक जगह पे तो एक दूसरा लड़का ये अपने मित्रों के साथ में बात कर रहा है। मैं देख रहा था। तो बच्चे का ये जो लड़का था कॉलेज का हाइट और बॉडी एकदम जबरदस्त था। बड़ा हैंडसम था। फिट था एकदम फिजिकली और वो उसके सामने जो खड़े थे उसके दो-तीन मित्र बता रहा है कि मैंने किस तरह से ये स्टेट लेवल कंपटीशन पास की उसके बाद में कैसे मैं नेशनल लेवल में जा रहा हूं। कौन सी कंपटीशन थी मुझे नहीं पता। अ कौन सी स्टेट लेवल की कौन सी नेशनल लेवल की वो भी नहीं पता। किंतु जिस कॉन्फिडेंस से वो बात कर रहा था और जिस जितना वो एडमिरेशन से उसके वो जो मित्र उसको सुन रहे थे तो लगा कि ही मस्ट बी समबडी माने उसने कुछ प्राप्त किया है माने मेडल वगैरह कुछ मिला होगा अदरवाइज लोग को इतना एडमायर नहीं करेंगे और फिजिकल फिटनेस जिस तरह की थी देखकर के ही लगता था कि हां कि वो फिजिकल जो भी चैलेंजेस है वो चाहे क्रिकेट होगा ना फुटबॉल होगा ना कबड्डी होगा जो भी होगा ही वुड हैव एक्सेल इन दैट इस तरह का बॉडी था। तो देखिए कि इस तरह के नवयुवक चाहिए। मुझे देखकर के बड़ा अच्छा लगा। स्वामी जी का आइडियल है इस लड़के के भीतर में। यदि इफ इफ ओनली आई कैन इंटरेस्ट हिम इनू अद्वैत वेदांत। तो क्या है उसका लाइफ बन जाता। फिजिकल फिटनेस है ही है और इंटेलेक्चुअल भी है। जिस तरह से वो बात कर रहा था। अपने को प्रमोट करने की भी एक स्किल होती है ना। वो बहुत सारे लोग वैसे कबड्डी है, कुश्ती है। कर तो लेते हैं बहुत अच्छे से। किंतु उसके बारे में अपना जो प्रोफेशन है स्पोर्ट्स प्रोफेशन उसके बारे में बात करने को जाएंगे ना मुंह से दो अच्छे टिक भी शब्द भी नहीं निकल पाएंगे तो ये लड़के को मैं देख रहा था फिजिकली भी फिट है और अपने को प्रमोट करने की भी उसमें यह है कैपेसिटी इतना इंटरेस्टिंगली वो स्टोरी को घुमा घुमा घुमा करके वो बता रहा था। सो इंटेलेक्चुअल भी है माने दैट इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी इज देयर एंड फिजिकल फिटनेस इज देयर ओनली इफ ओनली इफ आई कैन गिव हिम अद्वैत वेदांत किंतु क्या है ऑफ कोर्स ऐसा तो पॉसिबल नहीं कि जस्ट मैं उसके पास में जाऊं और अद्वैत वेदांत के बारे में बताना शुरू करूं उस स्कूल में एक दो लेक्चर थे मेरे किंतु आई डू नॉट रिमेंबर कि उस लड़के ने अटेंड किए कि नहीं। आई थिंक नहीं किए थे। वो हो किया होता तो मैं पहचान लेता उसको इमीडिएटली। सो एनीवे द थिंग इज दैट कि देखिए कि यहां पे इस तरह के नवयुवक है भारत में नहीं है ऐसा नहीं फिजिकली फिट हैं मेंटली फिट है चैलेंज स्वीकार करना चाहते हैं एडवेंचर चाहते हैं लाइफ में सेल्फ प्रमोशन चाहते हैं सेल्फ डेवलपमेंट चाहते हैं वि इज वेरी गुड उनको जाकर के वेदांत देना है उनको जाकर के कुरमा स्वामी जी की बातों को देना है वे लोग इमीडिएटली तो ऐसा तो नहीं कि चलो चलो मेडिटेशन करना शुरू कर दे या ऐसा कुछ। किंतु यह सीड जो है कि हां देयर इज वन सच रिच ट्रेडिशन जो कि उनकी लाइफ को ट्रांसफॉर्म कर सकती है। लाइफ को अपग्रेड कर सकती है। सो दैट सीड इटसेल्फ इफ इट इज़ देयर इन देयर माइंड। तब फिर जब समय आएगा वो ठाकुर कहते हैं ना कि एक पुराना घर था। पुराने घर की खिड़की के ऊपर में एक बीज पड़ा था किसी पेड़ का। तो बीज जब तक खिड़की के ऊपर में पड़ा है तब तक तो कुछ होने वाला नहीं। समय के साथ में यह इमारत पुरानी धंस गई। यह सीढ़ जो है जमीन में गिरा, मिट्टी में गिरा। कहीं से थोड़ा सा मॉइस्चर सनलाइट मिल गया तो उसमें से फिर पौधा खड़ा हो गया। तो यह खिड़की के ऊपर में रखे हुए बीज की तरह यह ठाकुर मां स्वामी जी वेदांत के उपदेश है। एक बार अपने हृदय में डाल [गला साफ़ करने की आवाज़] के रख दीजिए। कहीं एक कॉर्नर में अपनी ब्रेन के अपने माइंड के इसको बांध करके रख दीजिए। फिर जब समय आएगा देखेंगे इफ यू आर फॉरर्चूनेट इनफ इसमें से एक सुंदर वट वृक्ष प्रकट होगा जो कि यह जो संसार ताप दगध अपना जो मन है उसको शीतल छाव प्रदान करेगा। सो दैट इज दैट पावर ऑफ गीता एंड उपनिषद एंड ठाकुर मा स्वामी जीस टीचिंग्स फिजिकली और मेंटली फिट हो कोई और फिर उनको यह सब टीचिंग उनके जीवन में जाए देन दे विल प्रोग्रेस रियली फार इन देयर लाइफ देयर विल बी ए दे विल बी ए ब्लेसिंग टू देयर फैमिली एंड देयर सोसाइटी आज यहीं तक अभी नेक्स्ट स्लाइड है कल से देखेंगे ओम ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
एक भक्त: आज के युवा को वेदांत से कैसे जोड़ें?
ना आपकी बात बिल्कुल सही है और यहीं पे जो आप जो आपका ये जो एक थिंकिंग था ना वो जो क्वेश्चन था कि हाउ कैन बी उपनिषद माइन ऑफ स्ट्रेंथ वो बात यहां पे अभी अप्लाई होती है कि उपनिषद्स आर अ माइन ऑफ स्ट्रेंथ कि वहां पर वह आपको उपनिषद का प्रॉपर स्टडी इतना आत्मश्रद्धा देगा कि दैट विल हेल्प यू इन योर वर्ल्डली लाइफ आल्सो हां यस यस यस उपनिषद जो हमको आत्मश्रद्धा देता है ब्रह्म सा ब्रह्म चीज ब्रह्म वस्तु जो है अपना रियल नेचर ब्रह्मन है नहीं कि यह छोटा सा बॉडी यह चीज हम जब सुनेंगे तभी हमको वो भीतर में से स्ट्रेंथ मिलेगा। दैट स्ट्रेंथ हम फिर स्पोर्ट्स में लगाए ना कि और किसी भी फील्ड में लगाए। वी विल बी सक्सेसफुल देयर। ना मैं क्या कह रहा था कि देखिए ये जो है कि ये यूथ युवावस्था है जबकि हमको यह धार्मिक जो है धर्म जो है बेसिकली वो ऐसा लगता है कि यह बूढ़े लोगों के लिए है और इसके साथ में मेरा कोई रिलेवेंस नहीं है। किंतु यहीं पे तो वह जो ओरिजिनल आपकी बात थी कि उपनिषद्स आर माइन ऑफ स्ट्रेंथ। वह यहां पर अभी हमको पता चलता है कि इन वि वे उपनिषद्स आर माइन ऑफ स्ट्रेंथ। यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि दो तरह से हो गया कि यदि आपके भीतर में स्ट्रेंथ है फुटबॉल खेलकर के जो स्ट्रेंथ आती है दैट विल हेल्प यू अंडरस्टैंड उपनिषद गीता बेटर एंड इफ यू कैन अंडरस्टैंड उपनिषद एंड गीता बेटर यू कैन प्ले फुटबॉल बेटर। दिस इज अ फीडबैक लो कि वहां पर जो आत्मश्रद्धा वहां पर जो आपका ब्रह्म ब्रह्म तत्व मेरा ट्रू नेचर यह बॉडी नहीं मन नहीं बुद्धि नहीं चित्त नहीं अहंकार नहीं मेरा ट्रू नेचर है ब्रह्मन देखिए प्रॉब्लम कहां पे होता है हम लोगों के साथ में आई कैन टेल यू स्टैंडर्ड फार्मूलास 1000 टाइम्स प्रॉब्लम कहां पे होता है कि जो जिस तरह से उपनिषदों को बताना है ना वो हमने बताया नहीं है स्वामी जी का रीडिंग रीडिंग देखिए और शंकराचार्य का रीडिंग देखिए। दोनों एक ही उपनिषद के ऊपर के रीडिंग है। स्वामी जी कहते हैं कि अभी ही दैट इज द स्ट्रेंथ स्ट्रेंथ स्ट्रेंथ अभय फियरलेसनेस आत्मश्रद्धा दैट इज व्हाट उपनिषद टीच मी। और जबकि ट्रेडिशनल रूप से आप उपनिषद गीता को स्टडी करेंगे तो जैसे हमने देखा कि त्याग वैराग्य की बात ज्यादा देखने को मिलेगी। अभी यह 17 18 साल के बच्चे को या 27 28 साल का लड़का जो कि अभी उसका शादी हुआ है अभी वह कैरियर बना रहा है। उसके लिए त्याग वैराग्य का क्या अर्थ है? कुछ नहीं। वो 40 50 60 साल के बाद में ठीक है। उसको अभी चाहिए आत्मश्रद्धा। सो दैट इज व्हाट स्वामी जी सेस। उपनिषद्स आर फुल ऑफ आत्मश्रद्धा। दैट इज व्हाट वी शुड टीच देम। माने उनको सिखाने का तरीका जो है दैट वी नीड टू चेंज। रेदर देन के ऐसा कहना कि उपनिषद उनके लिए रिलेवेंट नहीं है। ऐसा कहना चाहिए कि उपनिषद सिखाने का तरीका उसको हमको अपग्रेड।
एक भक्त: वेदांत तभी लोकप्रिय होगा, जब वह वास्तविक समस्याओं का समाधान देगा
मैं जो पहली बार वो वेदांत पढ़ना शुरू किया था ना तो ये पंजीकरण ये पंजीकरण को पढ़कर के ना मुझे लगता था इस किताब को मैं उठा के फेंक दूं। ये अग्नि का इतना परसेंटेज फिर ये इसका इतना परसेंटेज उसका इतना परसेंटेज अरे भाई ये क्या है मैं मॉडर्न कॉस्मोलॉजी पढ़ के आया था तो वो तो एकदम स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सृष्टि की रचना कैसे हुई है आफ्टर द बिग बैंग राइट तो इसके साथ में ये पंजीकरण है क्या इसको कैसे मैं स्वीकार कर लूं माने मुझे अपनी बुद्धि शक्ति पे संपूर्ण रूप से क्या बोलेंगे ठंडा पानी डाल देना होगा तभी मैं इसको स्वीकार कर पाऊंगा बट देखिए कि वेदांत इज नॉट पंछीकरण आप उसको ले ना ले डज नॉट मैटर। स्वामी जी इस तरह की कोई बातें नहीं करते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि उपनिषद में ब्रह्म शक्त ब्रह्म तत्व जो है उसको हमको अपनाना है। नहीं कि माया तत्व को सृष्टि की रचना कैसे हुई? क्यों हुई? क्या है? दैट फॉरगेट द होल थिंग। सोचिए कि व्हाट इज योर ट्रू नेचर? एंड व्हाट इज द अल्टीमेट नेचर ऑफ द रियलिटी एंड हाउ टू बिल्ड अ ब्रिज बिटवीन देम। ये चार योगों का समन्वय। दैट इज व्हाट स्वामी जी इज़ बेसिकली टेलिंग अस। और यह जो मैंने उस समय भी कहा था ये कॉम्प्रहेंसिव फिलॉसोफी के बारे में स्वामी जी ने पॉइंट्स लिख के गए हैं। एक पूरी किताब के लिए वो किताब लिखना चाहते थे और किताब के लिए उन्होंने पॉइंट्स लिखे हैं। ये पॉइंट्स ऐसे हैं जैसे योग सूत्र है उसमें कैसे सूत्र लिख दिए हैं वैसे ही उन्होंने सूत्र लिखे हैं। और दैट इज माय और मैं सूत्र पढ़ा पूरे पॉइंट्स इज अ कॉम्प्रीहेंसिव फिलॉसोफी। बस उसमें क्या है कि अभी स्वा ऐसा नहीं है कि स्वामी जी ने नया कुछ कहा है उस सूत्रों में उन्होंने कंप्लीट वर्ष में जो कुछ भी कहा है जो कि इतना बिखरा पड़ा है वहां पर उन्होंने सिस्टमेटिकली उसको एनुमरेट किया है। सो व्हाट वाज़ माय प्लान इन द ट्रेनिंग सेंटर कि जैसे ही मैं यहां से निकलूूंगा मेरे पास में थोड़ा सा समय आएगा कंप्लीट वर्क्स में से सर्च करके करके एक सूत्र को लूंगा इस जो एस्स में से और फिर उस सूत्र रिलेटेड जो कुछ भी स्वामी जी कहते हैं वो कलेक्ट करूंगा फिर उस सूत्र के नीचे में व्याख्या के रूप में डाल दूंगा यानी स्वामी जी का ही सूत्र स्वामी जी की ही व्याख्या बीच मेरा एक पैराग्राफ जैसा रहेगा रिकंसाइलेशन के लिए तो ऐसा करके मैं पूरा किताब लिखूंगा दैट विल बी कॉम्प्रिहेंसिव फिलॉसोफी ऑफ़ स्वामी विवेकानंद अनफॉर्चूनेटली हुआ नहीं मेरे से [हंसी] बट दैट प्लान इज स्टिल देयर जैसे मेरे बहुत सारे प्रोजेक्ट है वन ऑफ दिस प्रोजेक्ट एक्चुअली आप भी कर सकते हैं देखिए मैं वो वो है ना वो उसको टेक्स्ट को स्कैन करके डाल दूंगा अपने ग्रुप में मैंने आपके साथ में वो नोटबुक एलएम तो शेयर किया ही है जिसके पास में टाइम है वो एक-एक सूत्र डालिए नोटबुक एलएम में वो आपको अपने ही लिटरेचर में से वो कंपाइल करके देगा वो उसके नीचे में आप बिठा दीजिए देखिए आप कोई भी बना सकता है अभी तो आई मीन अभी यदि अभी अपने पास में तो क्या है कि आप अब जैसे ये एआई कंपनी है उनके पास में तो एडवांस वर्जन होती है। उस एडवांस वर्जन में आप सभी सूत्र एक साथ में डाल दीजिए। बोलेंगे कि सभी सूत्रों के रिलेटेड टेक्स्ट आप निकाल के इसके बीच में डाल दीजिए। तो विद वन गो वो पूरा फिलॉसफी आपको रेडी करके दे देगा। है ना? और अपने पास में वो एडवांस वर्जन नहीं होने से हम एक-एक सूत्र डालते रहिए। वह आपको एक-एक सूत्र का उत्तर देता जाएगा।
एक भक्त: ठाकुर ने तो कह ही दिया है—ब्रह्म-शक्ति अभेद हैं। जगत का त्याग क्यों करें, जबकि जगत ही ब्रह्म है?
आई थिंक दे गिवन दो इसलिए मैं हमेशा कहता हूं देखिए जो लोग पॉपुलर वेदांत के प्रचारक हैं दे आर डूइंग अस ए डिस सर्विस कि वही ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाला वो प्रचार अभी भी कर रहे हैं एक्चुअली नाउ द टाइम इज चेंज उस लेंस से आप मां और स्वामी जी को समझ ही नहीं पाएंगे ठाकुर को तो फिर भी चलो आपने समझ लिया त्यागराज थे त्यागियों के राजा थे बट हाउ विल यू अंडरस्टैंड मां मास्ट लाइफ एक फैमिली में रहती है। सबको ले रहती है। सबके प्रति करुणा ममता है। किस तरह से विल यू अंडरस्टैंड स्वामी जीसस लाइफ? कि अमेरिका गए। बहुत सारे लोग बोलते हैं मठ बनाने के लिए अमेरिका गए। मैंने कहा दैट इज वेरी नैरो माइंडेड इंटरप्रिटेशन ऑफ स्वामी जीसस एक्शन। कि ह्यूमैनिटी का जो सफरिंग है, ह्यूमैनिटी का जो कॉल है कि कॉल टू डिवाइन कि आप आइए हमको सहाय कीजिए। वो सुनकर के स्वामी जी गए। डोंट लिमिट स्वामी जीसस वेस्टर्न मिशन कि हां भाई इंडिया में यह रामकृष्ण मिशन स्टार्ट करना है। बोल के गए थे। ठाकुर की अस्थियों के लिए गंगा के किनारे एक मंदिर बनाना है। उसके लिए सहाय प्राप्त करने के लिए गए। दैट इज अ वेरी नैरो रीडिंग ऑफ स्वामी जीसस ट्रेवल्स एंड स्वामी जीसस वर्क। वो वहां के लोगों की पुकार सुनकर के वो गए हैं। और वो लोगों ने उनको सराहा है, अपनाया है, अपना बना दिया है। राइट? सो स्वामी जी ने कहा यह हेल फैमिली को यू हैव फॉरएवर बिकम ए पार्ट ऑफ माय माइंड। सो हाउ इज दिस पॉसिबल कि यदि सिर्फ ये एक मंदिर बनाना है उसके लिए सहाय मांगने को गए। सो दिस एंटायर लेटर डेवलपमेंट ऑफ रामकृष्ण मिशन इट कैन नॉट बी एक्सप्लेंड विद ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या। इट हैज़ टू बी ब्रह्म शक्ति अभेद।
एक भक्त: रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों के लिए तो वेदांत बहुत ही व्यावहारिक है। आप लोगों पर हम गृहस्थों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर ज़िम्मेदारियाँ हैं।
देखिए मैं मैं कभी छुट्टी नहीं लेता। मेरा ट्रैवल होता है सिर्फ वन सेंटर से दूसरे सेंटर में ट्रांसफर होता है तो बीच में थोड़ा बहुत ट्रैवल कर लेता हूं मिनिमम। तो एक साधु के साथ में रिसेंटली मेरा बात हो रहा था। वो मुझे बोलता है तुम यार इतना काम करते हो। अभी यहां तो काम नहीं पहले बहुत काम था। उस समय की बात कि वह तो तुम इतना काम करते हो। तुम थक नहीं जाते हो। तुम छुट्टी क्यों नहीं लेते हो? तुम कहीं हिमालय कनखल वगैरह जाकर के तुम तपस्या क्यों नहीं करते? अभी मैं उसको तो यह मैंने बात नहीं बताई। किंतु मैं मन में सोचता हूं कि यदि मैं कर्म योग करता हूं तो मैं थकूंगा कैसे? एक बात दूसरा कि यदि कर्म योग तपस्या है तो उसको छोड़कर के मुझे दूसरी तपस्या करने की जरूरत क्या है? एक्चुअली आई अंडरस्टैंड हिज पॉइंट ऑफ व्यू। क्योंकि हम ज़्यादातर टाइम कर्म योग करते नहीं कर्म भोग ही करते हैं। सो आई अंडरस्टैंड हिज़ पॉइंट ऑफ़ व्यू कि मने वने और कोणे बीच-बीच में रिट्रीट करके थोड़ा सा सेल्फ रिफ्लेक्शन करना चाहिए। तो दैट इज़ अंडरस्टैंडेबल। बट माय एंडेवर हैज़ बीन कि मुझे प्रॉपर कर्म योग करना है। इस अर्थ में कि कर्म साधना हो जानी चाहिए। इस अर्थ में कि जो भी सेल्फ रिफ्लेक्शन होना है, जो भी स्पिरिचुअल डेवलपमेंट होना है, मैं कर्म के माध्यम से ही करूं। क्यों? में स्वामी जी के शब्दों पर मुझे विश्वास नहीं है। मैं तो स्वामी जी को पढ़ के यहां पे आया हूं। स्वामी जी मेरे आइडियल है। हाउ कैन नॉट आई बिलीव स्वामी जी? फिर मैं यदि इस तरह से ट्रेडिशनल तपस्या करने को जाऊंगा। दैट मींस कि फिर मुझे स्वामी जी पर विश्वास नहीं रहा। राइट? सो फिर मुझे वही यही मेरा मित्र कहता है। तुम यार वो वृंदावन वाले हित प्रेमानंद जी को सुना करो। बहुत अच्छी बातें करते हैं। तो अगेन अभी मैं उसको कुछ नहीं बोलता। किंतु फिर यह ठाकुर मां स्वामी जी ये अपना जो विराट इन रिच लिटरेचर है। उसका अर्थ क्या रह गया? फिर वह मुझे कहता है कि वह भी ठाकुर मां स्वामी जी की बात करते हैं। मैंने कहा व्हाई वुड आई लिसन टू हिम इन ऑर्डर टू अंडरस्टैंड ठाकुर मास्वामी जी।
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अपना यह खत्म होने वाला है ना ये अभी ये हो ही जाएगा। कुछ ही क्लास बाकी है ले माय प्लान ऑफ कैंपेन के। इसके बाद में मैं सोच ही रहा था कि क्या नेक्स्ट लूं। सो लेट अस सी मैं सोच रहा था कि ज्ञान योग से एक ले लिया है दो ले लिए है कॉस्मोस माइक्रोकोजम माइक्रोकोजम राजयोग से ले लिया है प्राण वाला तो अभी भक्ति योग और कर्म योग बाकी है मैं सोच रहा था उन दोनों में से एक-एक लूं तो बट लेट अस सी राइट नाउ ऑप्शंस आर ओपन और और फिर वो भी एक है कि वो कॉम्प्रिहेंसिव स्वामी जी का फिलॉसोफी है। सो उसको भी ले सकते हैं। वो एक हम हां सूत्र फॉर्म में है। एक एक सूत्र लेंगे फिर उसको डिस्कस करते जाएंगे। ओम