मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन उसमें भी एक स्लाइड शो जो बनाया है एआई के माध्यम से वह हम देख रहे थे इसको कल हमने देखा कि व्हाट आवर कंट्री नाउ वांट्स आर मसल्स
गरीबों की सेवा ही नहीं, उनके दर्द को महसूस करना भी सीखें
ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टिल जाइगेंटिक विल्स व्हिच नथिंग कैन रेजिस्ट दैट कैन ओनली बी क्रिएटेड बाय अंडरस्टैंडिंग एंड रियलाइजिंग द आइडियल ऑफ अद्वैत दैट आइडियल ऑफ द वननेस ऑफ ऑल। देखिए यह जैसे-जैसे अ आप स्पिरिचुअल लाइफ में आगे बढ़ते हैं, आप देखेंगे कि यह जो पूरा जगत है, उसके साथ में आपका आइडेंटिफिकेशन होने लगेगा। पहले तो जब हम यह धर्मशास्त्र पढ़ते हैं तो कोई भी धर्मशास्त्र आप पढ़ेंगे सब जगह पर आपको यह एक तो अवश्य देखने को मिलेगा कि सबके प्रति करुणा या दया होनी चाहिए और रामकृष्ण मिशन में जैसे है शिव ज्ञान से जीव सेवा अर्थात कि दूसरों को सहाय करना मैत्री करुणा या तो फिर यह कंपैजन है चैरिटी है या तो फिर बुद्धिज्म का जैसे कंपैजन है। यह सभी धर्म में आपको देखने को मिलेंगे। किंतु यह क्या है कि हम लोग पहले तो पढ़ते हैं। फिर यह लॉजिकली स्वीकार करके उसके ऊपर में एक्शन लेते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि हम जिनकी सेवा कर रहे हैं। हो सकता है कि उसके ऊपर में हमारा द्वेष भाव किसी ना किसी कारण से प्रगटित हो जाए। जिसको हम हेल्प कर रहे हैं। हो सकता है कि उसके साथ में हमारा कभी-कभी झगड़ा भी हो जाए। उनके साथ में हमारा जो रिलेशन है वह भी शायद बिगड़ जाए। किंतु बिकॉज़ ऑफ दिस कि हमने पढ़ा है, धर्मशास्त्र में पढ़ा है कि सबको सहाय करनी है। तो हमारी इमोशंस को भी सप्रेस करके हम सहाय करते हैं। जैसे मैंने अपने रांची के दिनों का भी उदाहरण दिया था कि कभी-कभी ऐसा हो जाता था कि जो विलेज लेवल वॉलंटियर्स है उनका उनके भीतर में तमस देखकर के मैं नाराज हो जाता था। मैं कहां से गुजरात से अपना घर बार छोड़ कर के वहां रांची के गांव में काम करने को आया हूं और यह जो वॉलंटियर है जिनको कि पैसा मिलता है जिनको कि हमने मोटर बाइक दी हुई है किसी किसी को काम करने के लिए वे लोग यदि ठीक से काम नहीं करेंगे तो गुस्सा तो आएगा ही आएगा कि अरे भाई हम साधु लोग जो है जब अपना घर बार छोड़कर के आए हैं हम यहां पर दिन रात पड़े रहकर के काम करते हैं तो तुम लोग जो है गांव गांव में ही रहते हो। तुम्हारे ही गांव के एक घर में से दूसरे घर जाकर के जो रिपोर्ट कलेक्ट करना है, वह तुम नहीं कर पा रहे हो। यह कौन सी बात हो गई? तो फिर देखिए कभी-कभी गुस्सा भी आ जाएगा उन लोगों के ऊपर में। किंतु क्या है कि हमने एक व्रत ले लिया है कि इनको सहाय करनी है और एक कंपैजन भीतर में से वह भी होता है। यह सिर्फ लॉजिकल नहीं है। जो लोग इस तरह से शिव ज्ञान से जीव सेवा या आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए कर्म योग की सहाय लेते हैं। उन सबके भीतर में दया, करुणा, कंपैशन, एमैथी वो भर-भर करके पड़ा हुआ है। किंतु क्या है? तभी भी एक तरह का सेपरेशन है। मैं मैं हूं। आई एम अ फॉर्चूनेट पर्सन कि मैं एक अच्छे घर में जन्म लिया। अच्छे से पढ़ाई लिखाई करने का मौका मिला। फिजिकली मेंटली मैं फिट हूं। तो क्यों नहीं मैं समाज को कुछ कंट्रीब्यूट करूं। और जब मैं इन लोगों को देखता हूं किस तरह से अनफॉर्चूनेट है। किस तरह से जैसे कि विधाता ने उनके साथ में एक क्रूर मजाक किया है। जैसे कि उनके साथ में एक तरह का बेईमानी किया है। तो ऐसा सोच कर के हम लोग उनके प्रति दया तो रहती है। किंतु एक सेपरेशन अवश्य रहेगा। किंतु जैसे-जैसे आप देखेंगे कि आप आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ते जाएंगे सबके साथ में अपना एक इनर कनेक्शन स्पिरिचुअल कनेक्शन बैठना शुरू हो जाएगा। उसके बाद में आपको इस तरह से कॉन्शियसली सोचने की जरूरत नहीं है कि हां इसके प्रति मेरी दया है। हां इसको मुझे हेल्प करना है। वो इस तरह से सोचने की वजह दया भाव की वजह अपना नेचर बाय डिफॉल्ट ही एक हेल्पफुल नेचर हो जाएगा। अपना नेचर बाय डिफॉल्ट ही भीतर में से सब समय एक ऐसा एक शांति, आनंद, सहाय और मित्रता का एक झरना बहना शुरू हो जाएगा कि जैसे कि हमको लगेगा कि हम बाय डिफॉल्ट लोगों को सहाय कर रहे हैं। और देखिए यह सहाय शब्द भी है उस समय अदृश्य हो जाएगा। एक व्यक्ति जनरली अपना दिन कैसे बिताता है? वो खाता है, पीता है, परिवारजनों की संभाल रखता है, जॉब करता है। इसका डिफॉल्ट पाथ है। उसका डिफॉल्ट बिहेवियर है। तो वैसे ही यह जो कंपनी में से जो प्रीसेट हो के जो डिफ़ॉल्ट आए हैं, वह सब रिसेट हो जाएंगे आज के लैंग्वेज में। और उसका जो डिफॉल्ट बिहेवियर है वो चेंज हो के इस तरह से मैत्री, करुणा, कंपैशन, एंपैथी और सहायता, मित्रता में परिणत हो जाएगा। हेल्पफुलनेस में परिणत हो जाएगा। सो, यह जो ट्रांसफॉर्मेशन है, यह है आवर जर्नी टुवर्ड्स अद्वैत। जैसे-जैसे हम खास करके हिंदू आध्यात्मिक जो पथ है जितने भी सारे सभी में आप देखेंगे कि वननेस उसकी ओर ही हम जाते हैं। एकत्व की ओर ही जाते हैं। तो, यह एक हमने ऑलरेडी कल देख लिया। दूसरा है कि देखिए द टेस्ट ऑफ
सत्य शक्ति प्रदान करता है, दुर्बलता नहीं
ट्रुथ। एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एस पोइजन। देयर इज नो लाइफ इन इट। इट कैन नॉट बी ट्रू। ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग। यह सत्य की परीक्षा क्या है? जो भी हमको फिजिकली, इंटेलेक्चुअली और स्पिरिचुअली शारीरिक रूप से, बौद्धिक रूप से और आध्यात्मिक रूप से हमको कमजोर बनाता है। उसको जहर की तरह उसका त्याग करना चाहिए। विषवत उसका त्याग करना चाहिए। उसके भीतर में कोई भी जीवन नहीं। इसके भीतर में किसी भी तरह का प्राण नहीं है। वह सत्य नहीं हो सकता। सत्य हमेशा बलप्रद होता है। अभी देखिए ये जो आध्यात्मिक जीवन में जैसे-जैसे आगे जाएंगे तो यह सब डेफिनेशन भी ना वो हमको विचित्र लगने लगेगा। जब हम उन लोगों का जीवन स्टडी करेंगे जो लोग कि सही-सही में आध्यात्मिक रास्ते पर बहुत ही उच्च आयाम पर पहुंचे हुए हैं। राजा महाराज वो भुवनेश्वर मठ में उस समय निवास कर रहे थे। तो एक दिन सुबह को मॉर्निंग वॉक के लिए निकले तो साथ में एक सेवक महाराज है छाता लेकर के साथ में चल रहे हैं। तो अभी क्या है कि राजा महाराज का एक स्टैंडर्ड पाथ था मॉर्निंग वोक का कि वो रेलवे स्टेशन की ओर ना इस तरह से कहीं पर जाएंगे फिर पूरा एक राउंड लगा करके वो जो मठ है मठ के गेट में फिर से प्रवेश करेंगे। तो यह राजा महाराज का पूरा एक पाथ था। तो एक दिन इसी तरह से वह निकले हुए लोग वो रास्ते में एकाएक एक जंगल जैसा आया तो सोचा होगा चलो इसमें से थोड़ा सा निकल ले तो वहां से निकलने का प्रयास किया जा रहे हैं जा रहे हैं ऑलमोस्ट यह जो मठ का गेट है उससे 10 मिनट की दूरी पर ही होंगे वहां तक आकर के पहुंचे हैं एकाएक एक पशु की दहाड़ सुनाई दी तो जैसे ही दहाड़ सुनाई दी। राजा महाराज ऐसे भीत हो गए। इस तरह से संतस्त हो गए। जैसे छोटा बच्चा है। छोटे बच्चे को डर लगता है तो कैसा वह माने वह डर जाता है। उसकी आंखें फैल जाती है। उसका देह कंपन करने लगता है और भयभीत हो जाता है। माने एग्जजेक्टली वही बाल गोपाल भाव राजा महाराज के भीतर में प्रकट हुआ कि अरे उन्होंने जोर से चिल्ला करके कहा यह तो बाघ की दहाड़ है। शेर की दहाड़ है। जंगल में शेर है तो पता नहीं था शेर अभी हमको आकर आ जाएगा तो वो सेवक महाराज सोच रहे हैं अभी वो वो भी क्या है शहर के लोगों को जैसे कि मैं शहर का हूं मैं गांव में जब जाता था शुरू शुरू में सब कुछ मुझे आश्चर्य माने चकित म इस तरह से लगता था एवरीथिंग इज स्ट्रेंज सब कुछ कुछ विचित्र है गांव में जाएंगे तो गांव में एक तरह की बदबू आती है वो बाद में आना बंद हो गई क्योंकि क्या है शहर में फिर गांव में से शहर में आएंगे तो दूसरी तरह की एक बदबू आएगी। वहां पे धुएं की बदबू है। यहां पे गाय के गोबर की गाय के गोबर की या और कुछ तो जो भी है प्रथम बार आप किसी एरिया में प्रवेश करते हैं। आपको सब कुछ विचित्र लगता है। अब ये जो सेवक महाराज थे शहर के थे जंगल वगैरह देखा नहीं था। वो बेचारे किंग कर्तव्य विमूढ़ हो गए। अर्थात कि क्या करें क्या ना करें समझ नहीं आ रहा है। शेर की दहाड़ कैसी होती है पता नहीं। सही में शेर आ जाएगा तो क्या होगा वह पता नहीं तो अभी वह सेवक महाराज भी बेचारे थोड़े से यह हो गए कि क्या करें उसी समय दो-तीन लोग वहां से निकल रहे थे तो राजा महाराज ने पूछा उनको अरे यह जो किसी पशु के गर्जन की आवाज आ रही है क्या यह शेर है क्या तो इन लोगों ने कहा नहीं महाशय यह मोश है मोश अर्थात मैं मोस्ट प्रोबेबबली अनुमान करके कहता हूं कि बेल या तो फिर भैंस ऐसा कुछ होगा तो जो भी है तो बफेलो तो अभी जैसे ही उन्होंने ऐसा कहा तो राजा महाराज और भी डर गए। अरे यह तो होता है तो उससे भी शेर से भी ज्यादा भयानक है। बोल के बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह दौड़ना शुरू कर दिए। कभी किसी पेड़ के पीछे में छुप जाते हैं। फिर चारों ओर देखते हैं कि कहीं से वह आ तो नहीं रहा बफेलो और फिर से दौड़ना शुरू करेंगे। फिर से किसी पेड़ के पीछे में छुप जाएंगे। फिर से चारों ओर देखेंगे तो सेवक महाराज कहते हैं राजा महाराज की वह जो अद्भुत मूर्ति का दर्शन हुआ था जैसे बिल्कुल एक बाल गोपाल जभी मां यशोदा उसके पीछे में दौड़ती है उसको पनिश करने के लिए कि गोपियों के वहां से मक्खन चुरा के यह खा रहा है तो मां यशोदा को कंप्लेन हुई मां यशोदा पीछे दौड़ती है तो वह बेचारा बाल गोपाल भीत और संतस्त होकर के डर करके भय के मारे कैसा दौड़ दौड़ता है। तो वैसे ही राजा महाराज के चेहरे पे देह पे बिल्कुल एक छोटे शिशु की तरह भय और एक तरह का ऐसा एक भाव प्रकट हुआ जिसको कि सेवक महाराज कहते हैं यदि मैं इसका फोटो लेता लिटरली वो ऐसा लिखते हैं कि यदि मैं इसका फोटो लेता और आपको दिखाता तभी आप समझ पाते कि ये किस तरह का भाव उनमें प्रकट हुआ है। तो फॉर्चूनेटली राजा महाराज ऐसे दौड़ते दौड़ते कभी पेड़ के पीछे में छुपते-छुपते कभी चारों ओर नजर करते-करते आखिर में वो गेट के पास आ गए। गेट मुश्किल से 10 मिनट दूर था वहां पे। इसी 10 मिनट के भीतर में ही ऐसी लीला उन्होंने की है। तो ऐसा करके वो भीतर में आकर के गेट में प्रवेश किए। तब कहीं जाकर चैन की सांस ली। तो देखिए कि कभी-कभी यह जो स्वामी जी की बात हम पढ़ते हैं, हमको यह भी याद रखना है कि आध्यात्मिक जीवन में इस तरह से रिचनेस है। इस तरह की कॉम्प्लेक्सिटीज है कि कोई भी एक स्टेटमेंट उठा के आप उसको ऐसा नहीं कह सकते कि यह एब्सोल्यूट ट्रुथ है और और कुछ नहीं। देखिए ऐसा नहीं है कि राजा महाराज के भीतर में भय का प्रवेश हुआ है। बस यह एक तरह की लीला है। तो माने जस्ट रिचनेस ऑफ स्पिरिचुअल लाइफ। तो यहां पर स्वामी जी और देखिए यहां पर जो आवश्यकता थी स्वामी जी एक गुलाम भारत को यह सब कह रहे थे और गुलाम भारत में उस समय अवश्य आवश्यकता थी फिजिकल मेंटल एंड स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ की। कि उस समय स्वामी जी को पढ़कर के स्वामी जी से अनुप्रेरित होकर के जो एक के बाद एक महापुरुष लोगों ने अपना जीवन धन्य किया है और देश की सेवा में उन्होंने इतना सारा कंट्रीब्यूशन किया है। सुभाष चंद्र बोस कहे अरोबिंदो कहे ना कि यह जो उस समय के फ्रीडम मूवमेंट के जो प्रथम पंक्ति के जितने भी लीडर थे सभी के सभी इन वन वे और अनदर स्वामी विवेकानंद से प्रभावित थे। तो देखिए कि स्वामी जी को एक पूरे देश को जागृत करना था। देश के साथ में बार-बार ऐसा होता आ रहा है कि हम लोग सोचते हैं कि स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ इज द ओनली स्ट्रेंथ। यह जो गीता का जो उपदेश है माम अनुस्मर युद्धस मेरा स्मरण करो। कर्म मुझे समर्पित करो और युद्ध करो। वह बात भूल करके हम बाद में यह जो बुद्धिस्ट एक तरह का जो शून्यवाद है या तो फिर यह वैष्णव दीन हीन भाव है उसमें हम इस तरह से डूब गए थे। यह जो मधुर भाव स्वामी जी को यह मधुर भाव के प्रति बड़ा ही क्रोध था। देखिए उन्होंने ठाकुर के भीतर में मधुर भाव देखा है और फिर उन्होंने यह भी देखा है कि ठाकुर का जो चरित्र है इतना प्रचंड स्ट्रांग चरित्र है ठाकुर जो फाइट करते हैं ठाकुर जो युद्ध करते हैं ठाकुर का युद्ध पता है ना महामाया के साथ में ठाकुर ने युद्ध किया है हमारे भीतर में कामना वासना रूपी जो राक्षस है वो जब हमारे सर के ऊपर में बैठ जाएंगे सवार हो जाएंगे और हमको हैवानियत से भरे सब कर्म करवाएंगे। कामना वासना के साथ में वह सबके साथ में ठाकुर ने युद्ध किया है और सर्वश्रेष्ठ युद्ध जो है वो धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र यहां पर धर्मक्षेत्र मानस क्षेत्र अर्थात कि मन के भीतर में जो धर्म युद्ध है उसमें ठाकुर विजय प्राप्त किए हैं। तो यही जो गीता का उपदेश जो है ठाकुर ने बखूबी उनके जीवन में हमको चरितार्थ होता हुआ अप्लाई होता हुआ दिखता है। बस वही बात है कि बहुत सारे लोग यह युद्ध के कांसेप्ट को नहीं समझ करके समझते थे और यदि इवन उस युद्ध का जो ग्रॉस कांसेप्ट भी समझे तो भी तो हम लोग उसमें नाकाम हो गए। यानी कि विदेशी आक्रमकों के सामने भी हम अपना मुकाबला नहीं कर पाए हैं। भीतर के जो आक्रमक है उसके साथ में भी हम मुकाबला नहीं कर पाए हैं। यानी कि दोनों दो दोनों तरह के युद्ध में हम पराजित हुए हैं। कर्मक्षत्र रूपी जो कुरुक्षेत्र है उसमें भी पराजित हुए हैं। और यह जो मनस क्षेत्र रूपी कुरुक्षेत्र है उसके भीतर में भी हम पराजित हुए हैं। तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि आपको सिर्फ फिजिकली और इंटेलेक्चुअली नहीं स्पिरिचुअल यह जो कुरुक्षेत्र है तीनों कुरुक्षेत्र में आपको विजय प्राप्त करनी है। या तो फिर कहेंगे कि एक्सटर्नल जो कुरुक्षेत्र है और इंटरनल कुरुक्षेत्र है दोनों के भीतर में आपको विजय प्राप्त करनी है। बाह्य युद्ध आप जब करेंगे उस समय आपके भीतर में एक प्रचंड आत्मविश्वास चाहिए और वही प्रचंड आत्मविश्वास आपको आपके भीतर में जो युद्ध चल रहा है उसके साथ में करना है। अभी कल ही जैसे हमने कहा हमको लगता है कि कहां इतना बड़ा क्राइसिस अपने जीवन में कहां आ गया है। ज्यादातर लोगों का लाइफ जो होता है ना बड़ा ही मंडेन लाइफ होता है। मंडेन का क्या अर्थ है कि सामान्य लेवल का लाइफ होता है। हम लोग तो कोई राजा के पुत्र नहीं है कि मेरे सामने इतने बड़े-बड़े डिसीजन आ जाए कि शत्रु आए हैं तो मुझे क्या करना है? इतना बड़ा पॉलिसी डिसीजन लेना है तो मुझे क्या करना है? अब ये मिनिस्टर फिनिशर जो होते हैं जो लोग बड़े ही हायर पोजीशन में होते हैं गवर्नमेंट में या तो कॉर्पोरेट एडमिनिस्ट्रेशन में मैनेजमेंट में उनको सब लॉन्ग टर्म डिसीजन लेने होते हैं कि अभी यह एआई टेक्नोलॉजी है उसको किस तरह से एडवांस करना है किस तरह से उसको अप्लाई करना है कि यहां पे वॉर हो रही है और अपने टैंकर फंस गए हैं वहां पे तो वहां पे उससे कैसे निकालना है जैसे कि इंडिया का इकोनमी बच के रहे वो जो कॉस्मिक लेवल जो डिसीजन है ज्यादातर लोगों को नहीं करने। हमारा जो दायरा जो है डिसीजन मेकिंग का काफी सीमित होता है। तो हमको लगता है कि अरे हमारे जीवन में कहां ना ही ऐसा कोई एक्सटर्नल युद्ध है ना ही इंटरनल युद्ध है ना ही आउटर टर्मोइल है ना ही इनर टर्मोइल है। किंतु देखिए कि पलपल प्रति पदक्षेप ऑन एववरी स्टेप आपको यह प्रेय और श्रेय उसके सामने झुझना है। अभी आज मैं खाने को बैठा हूं। मेरी नजर के सामने मिठाई आ गई और अभी मैं 50 तो क्रॉस हो ही रहा है ऑलमोस्ट नियरली तो मुझे अभी यह शुगर है फिर हाई कैलोरी फूड है यह जो ऑयली फैटी फूड है उस सब से अभी मुझे दूर रहना है तो यह डिसीजन तो मैंने लिया है किंतु जैसे ही मेरी नजर के सामने मिठाई आई तो प्रलोभन को नहीं रोक पाया और फट करके खा लिया अभी कल ही एक यहां पर डिवोटी आते हैं तो डिवोटी ने मुझे कहा कि महाराज मैं नागपुर गया था तो वहां से मैं एक ऑरेंज बर्फी लाया हूं तो मैं कल आपके लिए लेके आऊंगा। तो मैंने जैसा ही सुना मैंने कहा अरे वाह मैं भी तो नागपुर में था और मैंने भी यह वहां पे ये ऑरेंज ये जो होता है ना सब मिठाई वगैरह वो भी मैंने खाई है तो लेके आओ। अच्छा ठीक है। अभी मैं कल बोल तो दिया। फिर मुझे अभी सुबह से लग रहा है। अरे मैंने बोल दिया है वह लेके आएगा। फिर मुझे खाना भी पड़ेगा और मैंने तो डिसाइड किया है नहीं खाना। देखिए यह जो जब एकाएक वो जब बोलता है ऑरेंज की बर्फी है तो फट करके भीतर में से यही आया कि हां खा लेंगे। फिर मैं सुबह से सोच रहा हूं। अरे यार ये तो ठीक नहीं है। तो देखिए ये जो प्रत्येक स्टेप पे ऑन एवरी स्टेप आपको श्रेय और प्रेय मेरे लिए श्रेष्ठ क्या है और मेरी इंद्रियों को मेरी यह जो वासना है उसको क्या भाता है ये दोनों के सामने मुझे जूझना है और यदि धीरे-धीरे करके ना यह बिल्ड अप होता जाता है। अपना विल पावर बिल्ड अप होता है। देखिए मैं मिठाई के बारे में ही बताता हूं। एक समय था कि मैंने दो-ती साल एक भी मिठाई नहीं खाई थी। तो मेरा विल पावर इतना स्ट्रांग हो गया था कि अच्छे से अच्छी मिठाई भी आ जाए। उस समय मैं राजकोट में था। गुजराती मिठाई आएगी। वहां पर मंदिर में तो मिठाई आती ही है और फिर वहां पर क्या है कि जैसे कि अभी दीक्षा है तो गुरु महाराज दीक्षा गुरु आएंगे तो उनको ऑफर करने के लिए बहुत सारे डिवोटी बहुत अच्छी-अच्छी चीजें ले आते हैं। अभी वह दीक्षा गुरु जो है प्रेसिडेंट महाराज, रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज या रिव्यर्ड वाइस प्रेसिडेंट महाराज वह बेचारे कितना खाएंगे वो इधर तिनक भर ऐसा टेस्ट करेंगे बाकी सब साधुओं के लिए भेज देंगे तो किचन में सब पड़ा रहता है। फिर वो सर्व करने के समय महाराज ये लीजिए महाराज ये लीजिए। तो जितना भी प्रलोभन आता था मैंने देखा था उस समय दो-ती साल मैंने मिठाई नहीं खाया है तो ऐसा विल पावर हो गया थी कि अच्छे से अच्छी चीज भी यदि मेरे सामने आ जाए मैं उसको नहीं खाऊंगा फिर अभी एकाएक ऐसा हुआ यहां पर आने के बाद भी मेरा विल पावर बड़ा स्ट्रांग था किंतु एकाएक आखिरी पांच छ महीना में ऐसा हुआ एक दिन यहां पे एक लोकल मिठाई है बहुत अच्छी है मैं नाम भूल गया उसका एक पेपर की तरह उसको वो रोल होता है ना उस तरह से रोल करके रखते हैं। काफी फेमस है यहां पे। तो एक दिन एक नजर के सामने आ गया। तो मैंने एब्सेंट माइंडेडली उसको खा लिया। तो मैंने खा लिया। उस समय तो बड़ा पश्च पश्चाताप हुआ। किंतु फिर क्या है? एक बार यह विल पावर ब्रेक हो गया। यह जो डिसीजन ब्रेक हो गया। फिर हर दो-तीन सप्ताह के बाद में ऐसा एक गलती हो जाता है। मैं एक आध कोई मिठाई खा लेता हूं। तो फिर मैंने सोचा कि अरे अभी नहीं यह तो फिर से गड़बड़ हो रहा है। फिर से अपने को जागृत करना है। फिर से युद्ध करना है अपनी इंद्रियों के सामने। ठीक है। अभी मैं सब सोच रहा था। एकाएक कल ये डिवोटी ने कह दिया कि ऑरेंज बर्फी है। तो अभी मैं सुबह से सोच रहा हूं कि अभी क्या करें? क्या ना करें। वो बोल दिया है अभी मैं तो वो ले तो आएगा। अभी यदि मैं नहीं खाऊंगा। वो पूछेगा महाराज कैसा लगा? झूठ भी नहीं बोल सकता ऐसा बोल के कि अच्छा लगा नहीं खा के झूठ बोलना कि अच्छा लगा वह भी ठीक नहीं है वह सत्य का पालन नहीं होता और फिर यदि खा लेता हूं तो यहां पर नियम भंग हो जाता है तो यू सी कि एव्री क्षण हमारे सामने यह डिसीजन मेकिंग श्रेय और प्रेय आता जाता है। उस समय हमको श्रेय को वरण करना है। यह आउटर फ कुरुक्षेत्र हो ना कि इनर कुरुक्षेत्र हो हमको यह युद्ध करते जाना है और यह युद्ध में कौन टिकता है जब हम सत्य को वरण करेंगे और सत्य का अर्थ यहां पे सिर्फ सत्य वचन का पालन नहीं नीतिमत्ता का पालन भी हो जाता है। कारण के क्योंकि आप देखेंगे अब अब जैसे यह डकैत है। ठीक है? वो वो डकैत काली थी वहां पे वो तेलो भेलों के मैदान में मां आ रही है रास्ते में देखा एक डाकात का डाकात के साथ में मुलाकात हो गई डाकात बाबा अपने डकैत बाबा तो उन लोगों की एक काली है काली को फिर वे लोग कहते हैं कभी-कभी कि नरबलि भी चढ़ाते थे और फिर नरबलि ऑफर करके काली को ये लोग डकैती करने को जाते थे तो फिर वे लोग यदि यह कहेंगे सत्य है हमारे लिए डकैती करना, नरबली चढ़ाना तो यह तो कोई सत्य नहीं हुआ। सत्य वो है जो कि नीतिमत्ता को फॉलो करता है। जो स्टैंडर्ड एथिक्स एंड मोरल बिहेवियर कोड है अपने शास्त्र में उसको यदि आप फॉलो करेंगे तब आप सत्य वचन का पालन करेंगे। ऐसा कहलाएगा। सत्य अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान यह जो 10 यम है पांच यम पांच नियम योग शास्त्र में जो दिए गए हैं यह जो एथिक्स एंड मोरल फ्रेमवर्क खड़ी करता है इसको दृढ़ता पूर्वक पकड़ के रखना यह हो गया सत्य का पालन नहीं कि मेरा मैं यदि चोर हूं तो चोरी करना मेरे लिए सत्य है दैट इज नॉट अ वे ऑफ ट्रुथ। तो देखिए कि सत्य का पालन अर्थात कि एक स्ट्रांग एथिक्स एंड मोरल फ्रेमवर्क अपने जीवन में होनी चाहिए। और इसको यदि हम फॉलो करेंगे तब आप देखेंगे कि हमारे सामने कैसे एक के बाद एक झंझवात आते जाते हैं। हमारे सामने एक के बाद एक क्राइसिस आते जाती है और उससे हम फाइट करके अपने को बचाते हैं। उसके साथ में फाइट करके हम अपना लाइफ जब लीड करेंगे तो साथ-साथ में ही क्या होगा? हमारे भीतर में एक स्ट्रांग विल पावर जो है वो डेवलप होना शुरू हो जाएगा। और यह जो स्ट्रांग विल पावर है उसको फिर आप अभी ध्यान करने के लिए लगाइए। उसको अभी आप मेडिटेशन में जब ध्यान में लगाइए। देखिए कि आपका मन कैसा फटाक करके एकाग्र हो जाता है। आपका मन जो है कैसा फटाक करके ईश्वर के ऊपर में केंद्रित हो जाता है। सो
अत्याचार का सामना आतंकवाद से नहीं, सत्याग्रह से करना है
ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग और जो असत्य है वह हमको वीक करता है। अभी आप देखिए कि इंटरेस्टिंगली भारत की जो पूरी फ्रीडम मूवमेंट है महात्मा गांधी ने उसका नाम दिया है सत्याग्रह अर्थात कि सत्य के ऊपर में आग्रह। देखिए आजकल ये जो हम इंटरनेशनल सीन देखते हैं कि किस तरह से जिन लोगों के ऊपर में तथाकथित अत्याचार होते हैं वे लोग टेररिज्म का सहाय लेते हैं कि हम लोग दूसरों के देश में जाकर के इस तरह से एक्सप्लोजन करवाएंगे। टेररिस्ट एक्टिविटी करेंगे, क्रिमिनल एक्टिविटी करेंगे जिससे कि हमारी फ्रीडम की पुकार जो है जगत सुने। तो यह एक रास्ता है अपने को फ्रीडम दिलवाने का। दूसरा एक रास्ता है देखिए मैं अपने फ्रीडम मूवमेंट के बारे में जब पढ़ रहा था गांधी जी ने अहिंसा की आंदोलन का ऐलान कर दिया है। उस समय यह चौरीचोरा बोलकर के एक जगह है। वहां पे थोड़ा सा वायलेंस हुआ जो फ्रीडम फाइटर थे गांधी जी के उन्होंने शायद थोड़ा बहुत तोड़फोड़ इधर-उधर किया। तो जैसे ही गांधी जी के पास में यह न्यूज़ गया। उन्होंने इमीडिएटली यह फ्रीडम मूवमेंट को रुकवा दिया। कहा कि हम लोग अभी भी सत्याग्रह को फॉलो करने के लिए तैयार नहीं है। तो यह जब मैं पहली बार इतिहास में पढ़ा था जब यह मेरा अवेकनिंग हो रहा था। हिस्टोरिकल और यह सब मैं थिंकिंग प्रारंभ किया था। उस समय मुझे बड़ा ही गुस्सा आ गया था कि ये क्या पागलपन जैसी बात करते हैं। यह ब्रिटिश गवर्नमेंट के सामने हमको थोड़ा सा भी क्या कहेंगे? दया दिखाने की जरूरत नहीं है। भारत पे उन्होंने जिस तरह से अत्याचार किया है, भारत की धन संपत्ति का जिस तरह से शोषण किया है, उन्होंने जो पॉलिसी बनाई है, उस पॉलिसी की वजह से भारत की आज जो अवनति हुई है, ऐसे लोगों के सामने हमको दया दिखाने की क्या जरूरत है? ये जो जितने भी क्रांतिकारी है जिन्होंने ठीक किया है कि अब जैसे कि वो जो अमृतसर हत्याकांड का वो जो कर्नल क्या मैं उसका नाम भूल गया। तो उसको मारने के लिए वह सब कुछ लोग क्रांतिकारी तैयार हो गए उसका मर्डर करने के लिए। तो गांधी जी का कहना है कि नहीं कोई भी हो भले चाहे ब्रिटिश ऑफिसर जो कि हमारे हिंदुओं की हमारे भारतीय भाइयों की इस तरह से हत्या की हो हम सामने हत्या का मार्ग नहीं इस्तेमाल करेंगे। हम सामने वायलेंस का रास्ता नहीं इस्तेमाल करेंगे। और यदि वायलेंस रिपोर्ट भी हुआ जैसे चौरीचौरा में तो फिर हमने गांधी जी ने यह नॉन वायलेंट मूवमेंट जो है उस समय के लिए स्थगित कर दी। तो मुझे उस समय बड़ा गुस्सा आता था कि क्यों इस तरह से वो लोग ब्रिटिश लोगों पे हमको इतनी दया दिखानी है। उनके प्रति इतना मतलब उनके प्रति दया ना भी दिखाए। तो हम लोग जो अपने को गांधी जी ने अपने को यह जो नियम के कानून में बांध के रखा था कि सत्य रक्षा करनी ही है। नॉन वायलेंट रास्ते से जाना ही है। एक एथिकल एंड मोरल फ्रेमवर्क के थ्रू ही भारत को फ्रीडम प्राप्त करना है। ये एथिक्स एंड मोरालिटी का स्टेट क्राफ्ट में क्या काम है? तो ये एक मेरा एक था उस समय। किंतु जैसे-जैसे मेरा यह हिस्टोरिकल अंडरस्टैंडिंग एक्सपंड होता गया। मैंने देखा कि जहां-जहां पे वायलेंस का सहारा लिया गया है मुक्ति के नाम पे, फ्रीडम के नाम पे, इंडिपेंडेंस के नाम पे, जस्टिस के नाम पे, वहांवहां पे इनएविटेबली माने हिस्ट्री का यह 100% रूल है कि जिन लोगों ने वायलेंस का सहारा लेकर के एक रेवोल्यूशन लाया है, उस रेवोल्यूशन के जो लीडर है, अल्टीमेटली उसी वायलेंस की ज्वाला में भस्मीभूत हो गए है या तो फिर उसी वायलेंट रेिवोल्यूशन ने बाद में उसी देश में भयानक तबाही मचाई है। यह जो आप फ्रेंच रेवोल्यूशन से प्रारंभ कीजिए। वो जो वहां का राजा था लुईस उसके सामने लोगों का बड़ा ही आक्रोश था। तो रेवोल्यूशन आया। राजा और रानी का सर तो काट दिया। किंतु फिर उसके बाद में इसी जो रेवोल्यूशन है उसके लीडर्स ने बाकी जनरल फ्रेंच प्रजा की हत्या करना शुरू की और इस भयानक हद तक वो हत्याकांड हुआ था। लोग फिर से वो राजा को याद कर रहे हैं कि इससे तो अच्छा था वो राजा का शासन। भले ही चाहे इनफिशिएंट था। भले ही चाहे हमको खाने को नहीं मिलता था। किंतु आए दिन हर किसी ना किसी को पकड़ कर के यह जो रिवोल्यूशनरी गार्ड है वो ले जाते हैं और गिलोटिन में बिठा के सर काट देते हैं। तो ऐसा तो एटलीस्ट नहीं होता था। तो देखिए कि यह और फिर इसके बाद में नेपोलियन आया इन लोगों को हटा के और नेपोलियन ने जो एक के बाद एक युद्ध प्रारंभ किए हैं उस युद्ध की ज्वाला में फ्रांस का इतना भयानक अवनति हुआ है। आप हिस्ट्री पढ़ेंगे तो पता चलेगा। सेम थिंग कि ये कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन चाइना में और रशिया में जो रशिया का जो जार था जार को हटा करके यह रेवोल्यूशन लाया गया। किंतु फिर इस रेवोल्यूशन ने कम्युनिस्ट रेिवोल्यूशन ने बाद में जो रशिया में जो तबाही मचाई है 1000 झार इकट्ठा हो के भी इतनी तबाही नहीं मचा सकते। यह जो जर्मनी में था जर्मनी का चांसलर करप्ट है वगैरह-वगैरह बोल के नज़ पार्टी और हिटलर पावर में आ गए। फिर उन्होंने क्या किया पता है? जर्मनी के ऊपर में एक 1000 बमबर की रेड होती थी। एवरी नाइट सोच करके देख लीजिए। 1000 बमबर रेड करेंगे वह इंसेंडियरी बम फेंकेंगे तो उस देश की क्या हालत होगी सिटी की क्या हालत होगी लोगों की क्या हालत होगी ये जापान है जापान में भी ये मेजर रिस्टोरेशन और वगैरह-वगैरह जो हुआ बाद में तो उन्होंने ठीक किया कि हम लोग भी युद्ध करके अपना क्या है सोसाइट इंटरनेशनल एक प्रेस्टीज प्राप्त करेंगे इसका क्या परिणाम आया जापान पे एटम बम फेंका गया जापान ने खुद ने जो चाइना में अत्याचार किए उसका आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते और इन टर्न जापान के ऊपर में इतना अत्याचार हुआ माने चाइना की हमको पता है एवरीवेयर आप देखिए कि वायलेंट रेवोल्यूशन जहां पे भी आया है या तो फिर असत्य नीतिमत्ता विहीन कार्य करके जहां पे फ्रीडम जस्टिस इंडिपेंडेंस यह सब लाने का प्रयास किया गया है वह जितने भी प्रयास है सब विफल हुए हैं। सत्य है और यह एथिक्स एंड मोरालिटी का फ्रेमवर्क है। उसके आधार पर ही सोसाइटी डेवलप होगी। देखिए भारत का बहुत बड़ा सदनसीब है। आज हम कभी-कभी दूसरे देशों को देखते हैं और हमको लगता है कि यह लोग तो कितने पावरफुल है। कितने स्ट्रांग है। किसी किसी को रशिया की एनवी करते हैं। हमको रशिया जैसा होना है। कोई-कोई कहते हैं हमको इजराइल जैसा होना है। कोई कहता है हमको चाइना जैसा होना है। मैं खुद बहुत बार कहता हूं कि हमको चाइना से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। किंतु उस सब सोसाइटी में वायलेंस जो है हम कल्पना भी नहीं कर सकते। आज हम एक तरह से शांति से एक तरह से आध्यात्मिक लाइफ यदि आध्यात्मिक इंक्लिनेशन है मेरा तो एक तरह का आध्यात्मिक लाइफ लीड करने में हम भारतवासी सक्षम है। किंतु यह सभी देशों में आप जाइए। आध्यात्मिकता अर्थात कि धर्म। धर्म अर्थात कि कोई एक चर्च या ऐसा कोई इंस्टीट्यूशन जिसको कि आपको पैर पकड़ करके चलना है। वहां का लीडर जो आपको कहेगा गुलाम की तरह आपको स्वीकार करना है। यह जो ऑर्थोडॉक्स कैथोलिसिस ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियनिटी रशिया का यह जो बाकी इस्लामिक कंट्रीज का तो पता ही है। यह चाइना में भी ऐसा है कि वहां पे जितने भी धर्म है सब गवर्नमेंट के कंट्रोल में है। कैथोलिक चर्च जो कि अपने को बड़ा इंडिपेंडेंट समझता है। पूरे पूरे विश्व में जो बिशप है कार्डिनल है उनका आर्च बिशप है उनका अपॉइंटमेंट वेटिकन से होता है। यहां आंध्र प्रदेश में ही विशाखापट्टनम में ही एक आर्च बिशप को अपॉइंट किया गया। उसके लिए वेटिकन का एंबेसडर स्वयं यहां पे आया था। किंतु चाइना में देखिए कि पूरा ऑथॉरिटी उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को सु ये कर दिया है। सुप्र कर दिया है। कम्युनिस्ट पार्टी जिसको कहेगी उसको आर्चबिशप बनाना है। उसको कार्डिनल बनाना है और किसी को नहीं। तो वह सब जगह पर देखिए कि धर्म के नाम पर सिर्फ आपको एक इंस्टिट्यूशनल हां जी हां ही करना है। जी हजूरी ही करनी है। वो वहां इंस्टीट्यूशन का लीडर भले ही चाहे आध्यात्मिक रूप से पूरा जीरो हो शून्य हो किंतु आपको उसको फॉलो करना है। माने वो जो एक गार्डरियो प्रवाह जिसको कहते हैं ना कि एक शिप की तरह बकरे की तरह आपको उसको फॉलो करते जाना है। बस वैसा ही है। जबकि भारत में एक तरह का मानसिक शांति है। जिस तरह की आध्यात्मिक नीतिमत्ता आप फॉलो करना चाहे आप कर सकते हैं। तो अदर देन वेस्टर्न कंट्रीज वेस्टर्न यूरोप और अमेरिका आज एक भारत ही एक ऐसा देश है जहां पे आपको स्पिरिचुअल फ्रीडम है। और वहां पे भी देखिए अभी क्या सब चल रहा है हमको पता ही है। यानी कि यह जो टेस्ट ऑफ़ ट्रुथ है, व्हाट स्ट्रेंथ्स अस दैट इज़ ट्रुथ एंड व्हाट विक्स अस दैट इज़ अनट्रुथ। और इसका अर्थ यही है कि एक मोरल और एथिकल फ्रेमवर्क के भीतर में हमको कार्य करना है। इसके बाद में देखिए अ कॉल टू द यूथ। बी
गीता-पाठ से भी अधिक फुटबॉल खेलकर आत्मज्ञान की ओर बढ़ा जा सकता है।
स्ट्रांग माय यंग फ्रेंड्स। दैट इज माय एडवाइस टू यू। यू विल बी नियर टू हेवन थ्रू फुटबॉल देन थ्रू द स्टडी ऑफ गीता स्वामी जी का वो जो फेमस है यू विल अंडरस्टैंड द उपनिषद्स बेटर एंड द ग्लोरी ऑफ द आत्मन व्हेन योर बॉडी स्टैंड्स फ्रॉम अपॉन योर फीट एंड यू फिल योरसेल्व्स एज मैन। देखिए ये यहां पे फिजिकल स्ट्रेंथ का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। यदि फिजिकल स्ट्रेंथ नहीं है तो फिर ये जो स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ हमको भीतर में डेवलप करनी है उसके लिए जो एक फ्रेमवर्क चाहिए ना वो शरीरम अध्यम खलु धर्म साधन जो शरीर जो है वो धर्म का साधन है। यदि शरीर ही वीक है तो आप धर्म कैसे करेंगे? अभी आपको धर्म अब ठाकुर की ही तपस्या आप देख लीजिए और किसी का भी शरीर होता वह कहां टुकड़े-टुकड़े हो जाता कहां किसी का शरीर तहसनहस हो जाता इतनी प्रचंड तपस्या ठाकुर ने उस शरीर के माध्यम से की है। स्वामी जी ने खुद कहा है यह भेतो शरीर बेंगली भेतो शरीर स्वामी जी कहते हैं भतो भात भात के ऊपर में से भतो अर्थात कि भात खा के जो शरीर बना है भतो शरीर स्वामी जी कहते हैं इस भतो शरीर के माध्यम से बहुत ज्यादा मैं तपस्या नहीं कर पाया इसके लिए जो अखंडानंद जी को उन्होंने वह जो स्वप्न में आकर के दर्शन दिया था कि एक मुस्लिम फकीर का देह धारण किया प्रचंड बलशाली है और इस तरह से वह रास्ते से जा रहे हैं। तो अखंडानंद जी ने पूछा कि इस तरह का वेश क्यों धारण किया है? तो स्वामी जी ने दो उत्तर दिए थे। सर्वप्रथम तो उत्तर दिया था कि इस्लामिक बॉडी एंड वेदांतिक ब्रेन अर्थात कि इस तरह का सोसाइटी जिसमें सभी को समान अधिकार है। भारत में इस्लाम का प्रवेश हुआ वो सिर्फ और सिर्फ हम पर अत्याचार करके नहीं हुआ। हम लोगों के भीतर में यह जो अपर कास्ट एंड लोअर कास्ट का जो डिवीजन हो गया था तो बहुत सारे लोअर कास्ट वालों ने एक इज्जत प्राप्त करने के लिए सम्मान प्राप्त करने के लिए इस्लाम अपनाया था। तो यह देखिए कि यह तो एक उत्तर स्वामी जी ने दिया कि यह इस्लामिक बॉडी एंड वेदांतिक ब्रेन हमारे पास में वेदांत रूपी जो सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्य है वह इसी तरह की सोसाइटी में स्प्रेड हो सकते हैं जहां पर भी इक्वलिटी है। और दूसरा स्वामी जी ने कहा यह जो मुस्लिम फकीर के जैसा बलिष्ठ देह नहीं होगा तो फिर वेदांत का पालन कैसे होगा? वेदांत में जो तपस्या दिखाई गई है, वेदांत में जो एक प्रचंड मन और शरीर को एकाग्र करने के लिए ऑस्टेरिटीज जो करनी है, वो इस तरह का शरीर नहीं होने से कैसे होगा? तो यहां पे भी यह जो सोशल स्ट्रेंथ का अर्थ है कि इस तरह का सोसाइटी जहां पे स्ट्रेटिफिकेशन नहीं है जहां पे उच्च नीच का भेदभाव नहीं है। तो इक्वलिटी के बेस पर बना हुआ सोसाइटी और एक स्ट्रांग फिजिकल बॉडी जिसके पास में है। ये स्वामी जी ने दो उत्तर दिए थे। तो यहां पे भी सेम थिंग स्वामी जी फिर से कहते हैं कि स्ट्रांग हो मेरे मित्रों। अदरवाइज क्या है कि यदि कमजोर शरीर रहेगा तो उपनिषद की धारणा नहीं होगी। गीता की धारणा नहीं होगी। उपनिषद के ये जो ऋषि मुनियों का देह उनका मन उनके ये जो आत्मश्रद्धा देखिए। यह नचिकेता की आत्मश्रद्धा देखिए। अर्जुन को देखिए। भीम को देखिए। यह परशुराम को देखिए। यह भगवान राम महावीर को आप देखिए। कि कैसे प्रचंड बलशाली लोग थे। कैसी प्रचंड आत्मश्रद्धा थी। तो यदि वो आत्मश्रद्धा नहीं जागृत करेंगे बस एक रोते-रोते मैं दीन हूं। मैं हीन हूं। इस तरह का भाव रखेंगे। धर्म में आध्यात्मिकता में आप कभी भी ऊपर नहीं आ पाएंगे। और इसीलिए हमने जब ठाकुर का कथामृत डिस्कस कर रहे थे। उसी समय हमने देखा था कि ठाकुर ने कहा दीन हीन भाव ऐसा करके थूक रहे हैं ठाकुर तो मैं पिंजरे में बद्ध पंखी होने को क्यों जाऊंगा ऐसा बोलकर के ठाकुर थूक रहे हैं क्यों क्योंकि दीनहीन भाव बोलकर के आध्यात्मिकता में और कुछ नहीं है। ईगो को भले ही चाहे अप टू एन एक्सटेंट हम कर्म कम करने के लिए दीनहीन भाव का आरोप करें। अल्टीमेटली भक्ति है उल्लास और उत्साह से भरपूर। ठाकुर में ही आप देखिए जब भक्ति भाव में आकर के नृत्य करते थे तो वो मास्टर महाशय वर्णन में लिखते हैं। अभी वह कैसा नृत्य होगा उसकी तो हम कल्पना ही नहीं कर सकते। किंतु मास्टर महाशय जो वर्णन में जो लिखते हैं सिंह विक्रम से नृत्य कर रहे थे। तो यह सिंह विक्रम जस्ट आप सोचिए कि ठाकुर सिंह विक्रम से नृत्य कर रहे हैं तो कैसा एक उत्साह कैसा आत्मश्रद्धा कैसा उल्लास किस तरह की मधुर शक्ति एक स्त्री की कमनीयता और पुरुष का सिंहत्व पुरुष की मददानगी ये दोनों मिलाकर के किस तरह से एक प्रचंड आध्यात्मिक प्रवाह ठाकुर के भीतर में से प्रकट होता होगा तो वह क्या है? स्ट्रेंथ स्ट्रेंथ स्ट्रेंथ। वह चाहे सामाजिक स्ट्रेंथ हो। सामाजिक स्ट्रेंथ की डेफिनेशन क्या कही स्वामी जी ने? कि सभी लोग एक समान हो। आज जिसने मेरा धर्म स्वीकार किया वह मेरे साथ में बैठकर के यदि एक भिखारी ने मेरा धर्म स्वीकार किया है तो उस धर्म के राजा के साथ में बैठकर के वो खाना खा सकता है। ईश्वर के सामने दोनों समान है। तो एक सामाजिक एकत्व सामाजिक हार्मोनी सोशल हार्मोनी वो हो गया सोशल स्ट्रेंथ। मेंटल स्ट्रेंथ का अर्थ है स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ या तो इंटेलेक्चुअल स्ट्रेंथ का अर्थ है आत्मश्रद्धा और इंद्रियों पे संयम और फिर फिजिकल स्ट्रेंथ तो है ही है। आप देखिए कि यह जितने भी गुरु भाई थे ऑलमोस्ट सभी लोग कुश्ती सीखे थे। सभी लोग व्यायाम करते थे। सभी लोग जिमनेशिया अखाड़ा उस समय का उसमें जाते थे। वरना तो स्वामी जी ने कहा है ना वराह नगर मठ में हमने इस तरह की तपस्या की है कि उसको देखकर के भूत भी भाग जाते हैं। माने जो भूत जो कि इस तरह से ऑस्टेरिटी या तो भयावह जगहों पे रहने को आदि है वे लोग भी भाग जाएंगे। इस तरह की ऑस्टेरिटी स्वामी जी कहते हैं हम लोग ने वराह नगर मठ में की है। तो वह उस लेवल की यदि ऑस्टेरिटीज करनी है, उस लेवल की यदि तपस्या करनी है, तो फिर देखिए इंटरेस्टिंगली अह फिर क्या है? समय-समय की बात है। अभेदानंद जी अमेरिका से आए हैं। बेलूर मठ में रह रहे हैं और सबको बता रहे हैं। उस समय के अभेदानंद जी जब आए थे तो स्वामी जी का तो महासमाधि हो चुका था और राजा महाराज थे मठ के अध्यक्ष थे। तो राजा महाराज के पास में सभी जो नवागत जो नए आए हुए साधु ब्रह्मचारी है राजा महाराज के पास में वह आते थे उपदेश सुनने के लिए धार्मिक बातें सुनने के लिए तो अभी अभेदानंद जी आए हैं उन्होंने देखा कि ये लड़के लोग जो है आज की यंग जनरेशन वे लोग तपस्या नहीं कर रही हमने तो इतनी तपस्या की थी हमने इतना ऑस्टेरिटी किया था अभेदानंद जी काली महाराज सबको कह रहे हैं और फिर राजा महाराज को कहते हैं राजा राजा तुम लोग इनके इसके साथ में अच्छी-अच्छी बातें तो करते हो। भजन कीर्तन करवाते हो। हंसी मजाक गप वगैरह तो चलता है। तो ठाकुर भी यह सब करते थे। उसमें कोई मना नहीं है। ठाकुर किंतु हमसे तपस्या भी करवा ली थी ठाकुर ने। और तुम जो है उनसे तपस्या नहीं करवाते हो। तपस्या करवाओ उनको। ऐसा बोल के पीछे में लगे हैं। तो राजा महाराज भी कुछ बोले नहीं। फिर एक दिन ठीक हुआ कि यह जो कुछ साधु ब्रह्मचारी है वहां पर भिक्षा करने को जाएंगे। एक दिन और भिक्षा करके अन्न ग्रहण करेंगे। तो ठीक है। तो जिस दिन सुबह को भिक्षा करने की बात थी तो यह सब साधु ब्रह्मचारी आए होंगे राजा महाराज के कमरे में आशीर्वाद लेने के लिए। तो राजा महाराज ने कहा देखो यह तुम लोग एक काम करो यह मैं तुमको ₹5 देता हूं। उस समय के ₹5 तो बड़ी रकम है। तुम लोग किसी दुकान से चावल वगैरह खरीद कर लो और फिर यहां पे मठ में आकर के उस चावल में से भात या राइस जो भी है बना करके तुम लोग आहार करना। तो इसका मतलब तो तपस्या हुआ ही नहीं ना। माने वो चावल खरीद करना है। फिर बैठकर के उसमें से राइस बना भात बनाना है मठ में। तो यह तो आप किचन में ही खाना खा लेते। डाइनिंग हॉल में ही खाना खा लेंगे। वहां पे तो ऐसा ही होता है। वहां पर राइस खरीद करते हैं बाजार से और वो जो रसोया है वो खाना बनाता है। यहां पे ऑस्टेरिटी के नाम पर सिर्फ इतना ही हुआ कि आप बाजार में गए हैं पैसा देकर राइस खरीदा है और अपने हाथों से बनाए हैं। इतना ही तो हुआ ना ऑस्टेरिटी। ये तो कोई मीनिंग नहीं है। तो उस समय राजा महाराज ने कहा देखो वो जो एक समय था तपस्या करने का और आज ये एक समय है। यह एक दूसरा समय है। आज तुम लोगों से उस तरह की तपस्या होगी नहीं। तो देखिए कि राजा महाराज ने ऐसा कहा तो सही क्यों क्योंकि क्या है कि राजा महाराज भी समझते थे कि यह जो गुरु भाइयों का जिस तरह से देह बना था प्रचंड एक तपस्या के लिए तो उस समय के जो साधु ब्रह्मचारी थे उनका देह उस तरह का नहीं था। किंतु बोल करके अभी इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे इतिहास में पूरे भविष्य में सब समय के लिए हम लोग इस तरह के कमजोर देह लेकर के बैठे रहे जिससे कि तपस्या के नाम पर हमको यही करना है कि बाजार में से चावल खरीद करके कुकर में रख करके राइस बना के खाना है। इस तरह का हमेशा के लिए तो आवश्यक नहीं है करना। लेट अस लर्न फ्रॉम द हिस्ट्री। हम अपने को फिर से उसी फिजिकल और मेंटल स्टेमिना की ओर ले जाए जो स्टेमिना गुरु भाइयों में था। तभी तो हम जाकर के कहीं यह गीता और उपनिषद के संदेश को फिर से अपने जीवन में अप्लाई कर पाएंगे। तो यह स्लाइड अभी यहां पर समाप्त होती है। इसके बाद वाला स्लाइड अभी हम कल देखेंगे। यह वाला स्लाइड कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
एक भक्त: यह बहुत अच्छी बात कही कि हमें ऋषि-मुनियों की तरह सशक्त और मेधावी बनना है।
मैं जब रांची में था ना तो वहां पे एक विद्यालय है नेतरहाट विद्यालय। तो हमारे शशांकानंद जी के साथ में इन लोगों का अच्छा था तो कभी-कभी ले जाते थे तो मैं देखता था वो काफी उन्होंने बड़ा सुंदर रूप से वो एजुकेशन सिस्टम का किया है। वो पेड़ के नीचे में क्लास करेंगे और फिर वो म वैदिक सिस्टम अपनाने का प्रयास किया है। व्हिच इज वेरी गुड। यहां पे बेलूर मठ में आप देखेंगे ना वेद विद्यालय है अपना तो वहां पे भी वो पेड़ के नीचे में क्लास लेंगे। सुबह से लेकर के रात तक का एक रूटीन है। वहां पे सब आ जाता है। सुबह को योगासन करना है। सात्विक आहार करना है। समय पे आपको मंदिर में जाकर के यह आरती वगैरह देखना दर्शन करना है। भजनगान करना है। तो आजकल देखिए काफी सारे इंस्टट्यूट में यह जो वैदिक प्रथाएं अप्लाई हो रही है। गुजरात में तो आपको पता ही है यह स्वामी नारायण का गुरुकुल अपना एक साधु है। वहां से आया है। तो मुझे बताता है। वो जब जॉइ करने को आया ना ब्रह्मचारी के रूप में बोलता है मुझे हंसी आता है। माने बेलूर मठ में ब्रह्मचारी को जो ऑस्टेरिटीज करनी है उससे कहीं ज्यादा तो मैं वहां पर करके आया हूं।
एक भक्त: आज के युग में हमें कौन-सी तपस्या करनी चाहिए?
शिव ज्ञान जीव सेवा स्वामी जी ने कह दिया है कि यथाशक्ति क्योंकि क्या है? देखिए ऑस्टेरिटी का अर्थ क्या है? फंडामेंटली व्हाट इज अ साइंस ऑफ ऑस्टेरिटी। ये जो मैं ये जो छोटा में है जो कि सब कुछ ग्रहण करना चाहता है उसके ऊपर में से मन को हटाना है और आत्मन कहो ना कि ईश्वर कहो उसके पास में ले जाना है जो सेल्फिशनेस है उसकी ओर से हमको आध्यात्मिकता की ओर ले जाना है तो फ्रॉम सेल्फिशनेस टू स्पिरिचुअलिटी अ आप फिजिकल ऑस्टेरिटी जो कि एक रास्ता था देयर इज़ अ इज़ियर वे कि हम पहले सेल्फिशनेस से सेल्फलेसनेस की ओर जाए फ्रॉम देयर हम स्पिरिचुअल िटी की ओर जाए। सो स्वामी जी ने बीच में एक स्टेप दे दिया सेल्फलेसनेस। सो बीइंग सेल्फलेस मींस टू हेल्प अदर्स टू टेक अवे अटेंशन फ्रॉम अस टू फोकस इट अपॉन अदर्स। सो व्हिच इज़ अ इज़ियर वे जो कि आपको एकदम हार्ड कोर ऑस्टेरिटी। अब जैसे ध्रुव ने एक पैर पे खड़े रह के 1000 साल तपस्या की। या तो फिर नचिकेता की जो कहानी है, वह अभी डायरेक्ट ही आपको सेल्फिशनेस से स्पिरिचुअलिटी की ओर लेके जाती है। व्हिच विल बी वेरी डिफिकल्ट फॉर अस टू फॉलो। सो, लेट अस हैव दिस इज़ियर स्टेप शिव ज्ञान जीव सेवा।
एक भक्त: Selfishness से Spirituality तक पहुँचना बहुत बड़ी jump है। इसलिए बीच में Selflessness चाहिए। लेकिन उससे भी पहले हम एक छोटा सा जम्प लगा सकते है—Enlightened Self-interest
ना, यू आर राइट। एक्चुअली माने अच्छा है कि डिवोशन नहीं कहा। [हंसी] क्योंकि डिवोशन देखिए प्रॉब्लम डिवोशन के साथ में वही है कि आप सेल्फिशनेस से मुक्ति नहीं पा रहे हैं। डिवोशन ट्रेडिशनली स्पीकिंग इज़ अ पार्ट ऑफ़ दैट हार्ड ओशनेरिटी। अह माने डायरेक्ट आपको सेल्फिशनेस से स्पिरिचुअलिटी की ओर शरणागति की ओर जंप लगाना है। सेल्फिशनेस टू सरेंडर। लेट अस गिव इट ए नेम। किंतु यह जंप इतना बड़ा है कि डिवोशन अपने आप में इट फॉल्स शॉर्ट। उसके साथ में आपको हार्ड ऑस्टेरिटीज ऐड करना होगा। जितने भी आप भक्ति मार्गी साधु संत देखेंगे प्रचंड ऑस्टेरिटी है सभी के जीवन में। बिना ऑस्टेरिटी का कोई भक्ति मार्गी संत आपको नहीं दिखेगा। हम लोग अनफॉर्चूनेटली क्या करते हैं? उस ऑस्टेरिटी को साइड कर देते हैं। अब जैसे राम प्रसाद की ही बात राम प्रसाद के जो मातृ भक्ति की जो पदावली है हमने उसका स्टडी एक बार किया था। अभी रामप्रसाद के खुद के जीवन में जो ऑस्टेरिटी था अपना घर बार छोड़कर के वो एक सेपरेटली जगह पर जाकर रहता था। एक दिन घर गया किसी कारण से देखा कि उसके घर की हालत इतनी खराब है। उसकी बीवी बेचारी बच्चों को खाना नहीं खिला पा रही है। वो रो रही है तो उसको लगा कि नहीं अरे मुझे थोड़ा घर का भी ख्याल रखना है। बोल करके थोड़ा सोचा तो सही। किंतु जैसे ही फिर से भीतर से भक्ति भाव का जो उथला मारा वो फिर से वो घर छोड़कर चला गया। यानी कि देखिए वह समझ पा रहा है कि मेरा फैमिली का यह इतना खराब परिस्थिति है। भीतर से वह ही फील्स टोन बिटवीन दिस टू ऑब्लिगेशंस। अब बीवी बच्चों को भूखा रोता हुआ कौन देख पाएगा? एट द सेम टाइम ईश्वर की ओर जो आकर्षण है वो घर में उसको जाने नहीं देता। वो सेपरेटली एक जगह पर रह के ऑस्टेरिटी करता है। सतत एक के बाद एक पदा पदावली लिखता जाता है। सो हम लोग यह नहीं देखेंगे कि क्या ऑस्टेरिटी है। हम लोग देखेंगे अरे वाह मां की भक्ति में इतनी सुंदर पदावली लिखी है। तो लेट अस फॉलो भक्ति मार्ग व्हिच इज इज़ियर। बट हियर इज द कैच। कि भक्ति मार्ग इज अ पार्ट ऑफ दैट हार्ड ऑस्टेरिटी साधना। आपको सीधा सेल्फिशनेस से सरेंडर की ओर जाना है। व्हिच इज वेरी डिफिकल्ट। और इसीलिए स्वामी जी ने यह सेल्फिशनेस सेल्फलेसनेस का उपदेश दिया। एंड एस यू सेड के इवन इज़ हियर इज एनलाइटेंड सेल्फ इंटरेस्ट। दैट इज़ यू आर राइट दैट वे।
एक भक्त: राजा महाराज की बैल वाली घटना तो बेहद रोचक है। लेकिन contrast के लिए स्वामी विवेकानंद की भी एक ऐसी ही घटना है।
वो है कि लंदन की घटना है। राजा स्वामी जी और यह स्टडी इट इज स्टडी और यह मिस मिलर तीन लोग रास्ते से जा रहे हैं। तो एकाएक पागल वो वो बफेलो दौड़ा हुआ आ रहा है। तो इट इज़ स्टडी सपोज टू बी अ कैप्टन इन इंडियन आर्मी वो ब्रिटिश आर्मी ही इज़ सपोज़ टू प्रोटेक्ट दैट मिस मूलर ना। अभी दोनों ने तो पेंट पहने हैं स्वामी जी ने और उसने तो तो भाग जाएंगे। मिस मूलर ने वह जो उस समय का वो जो कपड़े पहने हो ना हैवी स्कर्ट वगैरह वो दौड़ नहीं पाएगी तो अवश्य जो बफेलो है उसको तो मार देगा तो फिर क्या है कि ईटी स्टडी को कुछ करना चाहिए वो भाग खड़ा हुआ स्वामी जी ने सोचा यदि मैं भी भागूंगा तो फिर इनका क्या होगा तो सीधा वो बफेलो के सामने जाकर खड़े रह गए वो बुल वो बुल जैसे ही स्वामी जी के सामने आया देखा स्वामी जी ऐसे निडरता से खड़े हैं तो वहां से वो अबाउट टर्न होकर के चला गया और यह सब इंस्टिंक्टिव होता है आप लॉजिकली नहीं सोचते कि क्योंकि क्योंकि उस समय मैंने खुद ने फेस किया। मैं जब नर्मदा में भ्रमण कर रहा था तो एक गांव में प्रवेश किया एकाएक देखा चार पांच बेल सामने से दौड़े आ रहा है। तो स्प्लिट सेकंड अभी ये तो लाइफ बचानी है तो फाइट एंड फ्लाइट इन इंस्टिंक्ट हम सब में होती है। इंस्टिंक्टिवली में साइड पे जंप कर लिया। उस समय में ऐसा इधर-उधर देखा किसका जीवन बचाना है वो सपने में भी नहीं सोचते हैं। सो विद इन दैट इंस्टिंक्टिव फाइट एंड फ्लाइट इंस्टेंट आपको डिसाइड करना है कि आई एम गोइंग टू सेव समवन नॉट मायसेल्फ। यह आपके डीएनए लेवल तक चले जाना चाहिए। तब यह सब होता है
एक भक्त: स्वामी विवेकानंद का निर्भीक साहस और राजा महाराज का मधुर बाल्यभाव—क्या अद्भुत contrast है!
ना बिकॉज़ कि राजा महाराज का जो पर्पस था ना [गला साफ़ करने की आवाज़] जीवन में वो अभी लीला के लेवल तक आकर फिक्स हो गया था। इवन स्वामी जी की लाइफ में एक मिशन था। मां की लाइफ में एक मिशन है। ठाकुर की लाइफ में एक मिशन है। यह मिशन फिर लीला में परिणत हुआ। जीवन के आखिरी आखिरी दिनों में। मां का भी आप बाली का भाव देखेंगे। कहां वह तांत्रिक को बुला के उसके सामने ऐसे दीनहीन भाव से खड़ी रहती है जैसे कि हाथ जोड़ के कि वह यदि राधु को नहीं बचाएगा तो फिर मां का कोई तारणहार नहीं है। वो जो लीला जो सब है स्वामी जी के खुद के आखिरी दिनों में वही हमने कल ही डिस्कस किया था। राजा महाराज और स्वामी जी वो वहां पे वो बागान में एक एक लाइन दौड़ दी है। लाइन के इस साइड का हिस्सा राजा महाराज का है। उस साइड का हिस्सा वो स्वामी जी का है। सो वो जो बचपना जो है लीला में उनका मिशन जब परिणत होता है जीवन के आखिरी दिनों में। जबकि राजा महाराज का था सब कुछ बना बनाया उनको मिल गया है। अभी उनको सिर्फ लीला ही करनी है। नो नॉट इवन एंड ऑफ हिज लाइफ। माने वो प्रेसिडेंट होने के बाद के आई थिंक अभी ऑफ कोर्स टाइमलाइन नहीं है। 20 इयर्स राजा महाराज ऑलमोस्ट रहे हैं। राइट? स्वामी जी का महासमाधि 1902 से राजा महाराज की महासमाधि 1922 ऑलमोस्ट। तो 20 इयर्स के समवेयर इन बिटवीन है। और उनका बचपना पहले से ही है। उन्हें नॉट टुवर्ड्स द एंड ऑफ हिज लाइफ। [हंसी] स्वामी जी की महासमाधि के बाद में एक बार राजा महाराज बहुत बीमार हो गए आई थिंक तीन-चार साल के बाद की बात है। तो उस जब तक स्वामी जी थे तब तक क्या था कि स्वामी जी ने उन पर जिम्मा दिया हुआ था। वो जो बाली म्युनिसिपालिटी का केस जो चल रहा था ना कि हमारे पे टैक्स डाला था और टैक्स से किसी भी तरह अपने को बचाना है। इंटरेस्टिंगली मां ने भी ऐसा किया था। वो जो जयराम बाटी मां का घर है उसको आश्रम बोल के वहां पे म्युनिसिपालिटी ने टैक्स डाल दिया था। तो मां एक बार नहीं थी तो वहां पर जो सेवक महाराज रहते थे उन्होंने वो टैक्स का पैसा दे दिया। मां जब कोलकाता से वापस आई तो मां ने कहा देखो जब तक मैं हूं तुम लोगों के पास में पैसा आता रहेगा। मैं जब नहीं रहूंगी तो पैसा आएगा नहीं आएगा किसको पता है? तुम एक काम करो। यह जो वहां पर वो जो चेयरमैन है उसको लेटर लिखो। मैं खुद साइन करूंगी। जाकर उसको बोलो कि उसको टैक्स माफी करवाए। तो यह जो सेवक महाराज ने फिर वो लेटर ले गए चारप बार जाना पड़ा। अल्टीमेटली वो टैक्स माफी मिल गई थी। तो सेम थिंग कि हमारे बेलूर मठ के साथ हुआ था। टैक्स लगा दिया था। तो उसके लिए कोर्ट केस चल रहा है कि ये रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन है। टैक्स माफी कर दो। तो उसके लिए राजा महाराज कंटीन्यूअस कोर्ट कचहरी में जाते थे। वो एक उनका मिशन मोड था। और ये केस खत्म हुआ। स्वामी जी की महासमाधि हुई। सब कुछ हुआ। सो महासमाधि के ऐसे तीन-चार साल के बाद में ही राजा महाराज बहुत ही सीरियसली बीमार हो गए। उसके बाद में किंतु जब वो सुस्त हुए तब से फिर उनका वो मिशन मोड चला गया। फिर वह एकदम बालक भाव में आ गए थे। एक बार शुद्धानंद जी उस समय वो जॉइंट सेक्रेटरी थे। माने शरद महाराज के रहते-रते ही उनको जॉइंट सेक्रेटरी बना दिया गया था। तो एक दिन राजा महाराज के पास आए कंप्लेन लेके कि महाराज जी देखिए यह सब लड़के जो है ना आपके साथ में आकर के गप लगाते हैं किंतु काम नहीं करना चाहते। आप उनको यहां से निकालिए। काम करने को भेजिए और यदि काम नहीं करते हैं ना तो संघ में से निकाल दीजिए और यदि हम किसी को संघ में से निकालते हैं आप इनको वापस अपने पास में मत लाइएगा। ऐसा बोल के शुद्धानंद जी बोल रहा है। तो जैसे ही उन्होंने ऐसा कहा राजा महाराज ऐसे नाराज हो गए बोला कि देखो भाई हम लोग तो यहां पे स्नेह के बंधन से बंध के आए हैं। ठाकुर ने हमको स्नेह के बंधन में बांधा है। तभी तो हम लोग आकर के इतना ऑस्टेरिटी किए उतना काम किए। ये लड़के बेचारे साधु होने को आए हैं। उनका आध्यात्मिक तुम कुछ कल्याण नहीं करोगे। उनको गाइडेंस नहीं दोगे। उनको स्नेह प्रेम नहीं दिखाओगे। सिर्फ काम करवाओगे। ऐसा थोड़ी ना चलेगा। ये लोग काम करने को थोड़ी ना आए हैं। माने काम स्वामी जी का जो है कि शिव ज्ञान जीव सेवा उससे प्रेरित होकर के आए अवश्य है। किंतु ये आंख बंद करके दिन भर काम करते रहना। दैट इज आल्सो नॉट द आइडियल ऑफ रामकृष्ण मिशन। जैसे आप बहुत बार होता है। आप क्यों सिर्फ ठाकुर को लेते हैं? क्यों सिर्फ भक्ति मार्ग को लेते हैं? क्यों स्वामी जी को नहीं लेते? ऐसा यदि कोई कहता है तो ऐसा रिवर्स भी होता है। सिर्फ स्वामी जी को लेना, सिर्फ काम करते रहना तो फिर क्या है? भीतर में से एक तरह का खालीपन दिखेगा। फिर या तो विकृति आएगी या तो फिर वो आदमी छोड़ के चला जाएगा। ठाकुर मास्वामी जी तीन एक तीन है ना। तो राजा महाराज जिस तरह से यह बात करते हैं जो आपने ठीक ही कहा। ही इज़ थ्रोट ऑफ दैट एंकर कि एक टेंडेंसी एक और यदि चली जाए भक्ति मार्ग की तो फिर उनको थोड़ा सेंटर में खींच के लाना है कि नहीं कर्म योग करना है और कर्म में बहुत ज्यादा चला जाए आपका तो वह खींच करके सेंटर में लाना है कि नहीं आध्यात्मिकता के बिना कर्म किसी काम का नहीं
एक भक्त: आपकी बात बिल्कुल सही है। आध्यात्मिक आधार के बिना सेवा का उत्साह टिक नहीं पाता। यही समस्या अनेक NGO में दिखाई देती है।
या तो फिर क्या होगा कि वे लोग इंडिविजुअल लेवल पर अपना पर्स्यू करेंगे वो किसी ना किसी और किसी जगह पे जाकर के मंदिर में जाकर के इंडिविजुअल लेवल पर पर्स्यू करेंगे। राइट? पर यहां पे तो फिर वह बात नहीं रह गई कि आप ठाकुर के पास आए हैं। फिर वो कहीं वो काली मंदिर है। यहां पे आश्रम के सामने ही है। मैं वहां पर जाऊं संध्या आरती अटेंड करने को। वो तो कैसा विचित्र लगेगा। ओम