मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का भारत में दिए हुए भाषणों का एक स्लाइड शो वो हम देख रहे थे
Slavery in India on - spiritual, community, and civilizational levels
कल हमने देखा कि स्वामी जी क्या कहते हैं। फर्स्ट ऑफ ऑल कि भारत में जो एक गुलाम मानस बना हुआ है जे इतने सालों की एक गुलामी के भीतर में रहकर के तो उसको सबसे पहले हमको दूर हटाना है। गुलामी से मुक्त होना है। यह स्वामी जी ने कल हमको कहा और फिर इसके ऊपर में हमने यह भी देखा कि इस गुलामी की व्याख्या हम किस तरह से कर सकते हैं। जिस तरह से हमारी फंडामेंटल फ्रेमवर्क है कि स्पिरिचुअलिटी, कम्युनिटी एंड सिविलाइजेशन तीन लेवल के ऊपर में हम लोग ठाकुर मां स्वामी जी का जो मैसेज है तीन डायमेंशन से स्टडी कर सकते हैं। तीन एस्पेक्ट से स्टडी कर सकते हैं। तो उसमें यह जो स्पिरिचुअल डायमेंशन है उसमें गुलामी क्या है? तो हमारी यह जो बेसिक इंस्टिंक्ट्स जो है हमारा पशुभाव जो है उसके वशवर्ती रहना बार-बार क्रोध करना लोगों का जो धन है उसको छीन लेना लोगों पर अत्याचार करना लोगों का शोषण करना मिथ्यावाद का सहारा लेना यह हमारी बेसिक इंस्टिंक्ट है। मनुष्य ऐसा चाहता है। इंद्रियों के जो विषय है उसका वह भोग करना चाहता है। जितना हम इन विषयों के वशवर्ती होते जाएंगे यह इंद्रियां जितना हमको नचाएगी उतना हम पपेट बनकर के कठपुतली बनकर के नाचेंगे उतना ही हम इंद्रियों के गुलाम रहेंगे। आध्यात्मिक जीवन में हम गुलाम रहेंगे। तो वह गुलामी की एक व्याख्या स्पिरिचुअल डायमेंशन में सोशल डायमेंशन में हमने देखा कि एक बहुमत होता है। बहुमत के अनुसार हम चलना चाहते हैं। हम कभी-कभी सोशल सिचुएशन में अपना जो मत है, अपना जो ओपिनियन है, उसको प्रकट नहीं कर पाते हैं। और फिर एक सोशल स्ट्रेटिफिकेशन के भीतर में रहना चाहते हैं। सोसाइटी ने यदि यह कह दिया यह इस वर्ण का है, वह उस वर्ण का है तो हम लोग उसको मान लेते हैं। मेरिट या डिमैरिट नहीं देखते हैं। यदि ब्राह्मण का लड़का है तो उसी को अधिकार है वेद अभ्या अध्ययन करने का। क्षत्रिय का जो लड़का है उसी को अधिकार है। राज्य शासन सीखने का। वैश्य है, शूद्र है तो उनके अधिकार उतने ही है जो कि उनके पुरखे करते आ रहे हैं। यह जो भारत में उस समय के भारत में यह वंश परंपरागत यह जो सब हो गया था कास्ट सिस्टम वो इतनी रिजिड हो गई थी कि जिसके भीतर में शारीरिक बल भी है। किंतु यदि वह शूद्र या वैश्य का लड़का है तो वह क्षत्रिय नहीं बन पाएगा। वो जो महाभारत का फेमस कि सूत पुत्र कर्ण कौन था तो सूत का पुत्र था रथ चलाने वाले का पुत्र था बोलकर के उसको और कहीं क्षत्रिय भले ही चाहे वह कितना ही वह मेधावी हो युद्ध शास्त्र में धनुर्वेद में किंतु और कोई उसको क्षत्रिय के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। दुर्योधन ने किया तो फिर एक तरह से दुर्योधन के प्रति उसकी लॉयल्टी हो गई। फिर जब महाभारत का युद्ध होता है कुंती छुप के आकर के सीक्रेटली उसको मिलती है कि तुम्हारा तो तुम तो मेरी गर्भ से तुमने जन्म लिया है तुम क्षत्रिय ही हो तो फिर किंतु अभी अभी बोलने से क्या होगा जीवन भर तो है बेचारे कर्ण ने सूतपुत्र का वह जो एक लेबल उस पर लग गया था तो उसके जो सोसाइटी में जो उसका जो रिस्पेक्ट होना चाहिए था क्षत्रिय के रूप में वह तो मिला नहीं। अभी जब युद्ध हो रहा है खुद के लड़के हो सकता है कि कर्ण के बाण से वृद्ध हो जाए तो अपने बच्चे को बचाने के लिए कुंती आई है। यह डिक्लेअ करती है तुम तो मेरे ही संतान हो। तो ऐसा कैसे चलेगा? तो देखिए कि सोशल स्ट्रेटिफिकेशन उस युग में बड़ा ही स्ट्रांग था। महाभारत के समय इतना नहीं था। वहां पर फिर भी आप देखिए एकलव्य है जैसे कि तो उसके पास में वह था तो सही कि कैसे भी करके वह सीख ले किंतु हमको यह भी पता है कि एकलव्य को अपना अंगूठा काट करके द्रोणाचार्य को देना पड़ा था कि तुम तुमने तो मेरी वो द्रोणाचार्य स्वयं तो उसका उसको शिक्षित करेंगे नहीं उसको धनुर्वेद सिखाएंगे नहीं तो ठीक है उनकी मूर्ति बनाकर के धनुर्वेद सीखा अभी द्रोणाचार चार्य को लगा कि एकलव्य जो है अर्जुन से ज्यादा मेधावी हो गया है इसमें तो फिर सिखाया तो कुछ नहीं किंतु झूठमूठ का वह गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया तो देखिए कि वो एक स्ट्रेटिफिकेशन का प्रारंभ उसी युग से हो गया था और पिछले 1000 साल में तो इतना स्ट्रांग यह सब था कि यह जो सोशल स्ट्रक्चर है उसमें आप अपनी मेधा के अनुसार उसमें हम अपनी क्षमता के अनुसार, टैलेंट के अनुसार अपने को डेवलप ही नहीं कर पाएंगे। समाज ने जो रोल हमारे पर थोप दिया है, उसी को हमको फॉलो करना है। तो वो एक सामाजिक गुलामी थी और सिविलाइजेशनल स्केल पर गुलामी का क्या अर्थ है वह तो हम सबको पता ही है कि किस तरह से विदेशी हमलावरों ने भारत को गुलाम बना के रखा। तो देखिए कि सिविलाइजेशनल स्केल पर, कम्युनिटी के लेवल पर, सोसाइटी के लेवल पर और इंडिविजुअल स्पिरिचुअल लेवल पर तीन लेवल पर यह गुलामी चलती है। हमको तीनों से मुक्त होना होगा। सिर्फ एक से मुक्त होने से नहीं चलेगा। अदरवाइज भारत में क्या ब्रह्म ज्ञानियों की कमी थी? स्वामी जी ने तो कहा है कि ऐसा एक भी युग नहीं गया। जबकि भारत की धरती पर किसी न किसी ब्रह्मज्ञानी के चरणों की रज ना गिरी हो। भारत की इस भूमि पर कोई ना कोई ब्रह्मज्ञानी विचरण न करता हो। किंतु इंडिविजुअल लेवल पर मुक्ति प्राप्त करने से क्या लाभ है? यदि आप कम्युनिटी को आप इंप्रूव नहीं कर पाएंगे। कम्युनिटी को इस गुलामी की जंजीर से नहीं मुक्त करवा पाएंगे। चैतन्य देव ने एक प्रयास किया था बंगाल में कि आ चंडाल जितने भी है जो भी निम्न वर्ण का नीची जात का नीची कास्ट का जो भी आप कहे तथाकथित उस समय की लैंग्वेज में उस समय के ग्रामर के अनुसार तो उन सबको उन्होंने हृदय से लगाया था आलिंगनबद्ध किया था सबको उन्होंने हरि नाम दिया था यह जो हरि नाम की लूट है हरि नाम का बांटते बांटते उन्होंने सबको जो है अपने यह जो वैष्णव समाज में ग्रहण किया था। तो कभी-कभी यह अटेमप्ट हुआ है किंतु ऑल इंडिया लेवल पे एक इंटेंस एफर्ट जो होना चाहिए था वो हुआ नहीं है। तो वो एक था प्रॉब्लम और सिविलाइजेशनली तो भारत गुलाम था ही था। यह सब एक दूसरे के साथ में कनेक्टेड है। देखिए जब इंडिया का फ्रीडम मूवमेंट स्टार्ट हुआ तो गांधी जी ने पहले ही कहा कि यह दलित लोगों के साथ में जो अत्याचार हो हुए थे या हो रहे हैं उसको सबसे पहले हमको दूर करना होगा। अदरवाइज भारत गुलामी से हम लोग मतलब क्या है कि यह जो सोशल स्ट्रेटिफिकेशन है यही तो रीजन है कि यह ब्रिटिश और मुस्लिम सर्वप्रथम एंटर हो पाए। अदरवाइज तो उनको एंट्री का कोई रास्ता ही नहीं मिलता। उच्च वर्णों वाले सब कुछ भोग करेंगे। ये धरती का उपभोग करेंगे। यहां पर अच्छे कुएं में से अच्छा पानी है तो सवर्णों के लिए है। यहां पर अच्छे खेत की जो अच्छी फसल है वह हमारे लिए है। अच्छी गायों का अच्छा दूध है वह भी हमारे लिए है। फिर वह बीमार गाय है या फिर वह धरती जहां पर फसल ही नहीं निकलती या वो कुआं जहां पर अच्छा मीठा पानी ही नहीं आता। वह बाकी सबके लिए है। यह जो सब एक बन एक क्या कहेंगे? एक लोगों पे एक तरह का अत्याचार कि या तो फिर शोषण होना शुरू हुआ था। उनको उनके अधिकारों से जो वंचित रखा गया था। यही तो कारण है जब विदेश से लोग आए तो इतना इजीली वे लोग जो तथाकथित पिछड़े वर्ग के हैं उन्होंने अपने साथ में कर लिए और इनके माध्यम से उन्होंने बाकी के भारत पर राज्य किया। तो क्या है ऑलरेडी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भारत की जो प्रगति है उसके साथ में अपने को आइडेंटिफाई नहीं कर पा रहा
A strong sense of national identification among citizens is indispensable for a nation’s survival and progress.
है। देखिए यह ओनरशिप या आइडेंटिफिकेशन बहुत ही आवश्यक है। कोई भी इंस्टट्यूट को आगे बढ़ना है। इंस्टट्यूट हो ना कि सोसाइटी ना कि समाज हो ना कि ऑर्गेनाइजेशन हो। वो डेवलप कब होगा? जबकि उसके जितने भी मेंबर्स हैं उन सबका इसके साथ में आइडेंटिफिकेशन होगा। इसके साथ में ओनरशिप होगा। मैं किसी किसी संस्था का मुझे पता है। वहां का जो हेड होता है वो वन मैन शो चलता है। वही सब डिसीजन लेंगे। जितने भी वर्कर्स हैं उन्हीं के कंट्रोल में रहेंगे। जितने भी डिपार्टमेंट है वही डायरेक्ट हैंडल करेंगे। तो फिर वहां के जो मेंबर्स हैं उनका कोई स्टेक नहीं रहता। उस ऑर्गेनाइजेशन के डेवलपमेंट में। उनका कोई ओनरशिप नहीं रहता उस ऑर्गेनाइजेशन के डेवलपमेंट में। फिर वे लोग साइड पर हो जाते हैं। निष्क्रिय हो जाते हैं। और निष्क्रिय होना तो फिर भी ठीक है। किंतु यदि इस तरह के ऑर्गेनाइजेशन को किसी को तोड़ना है तो उसको सिर्फ यही पता लगाना है कि ऑर्गेनाइजेशन के भीतर में डिसंटेंडेड लोग कितने हैं। जो कि नाराज है ऑर्गेनाइजेशन से। बिछड़ गए हैं ऑर्गेनाइजेशन की मेन स्ट्रीम से या तो साइडलाइन हो गए हैं, कट ऑफ हो गए हैं। ऐसे लोग कितने हैं? इनका संपर्क करो। ऑर्गेनाइजेशन को तोड़ने के लिए भीतर से ही आपको सहाय मिल जाएगी। बहुत बार जो भारत में हुआ है कि शत्रु सेना ने हमला किया है। वह जो किला है वहां के राजा का बड़ा मजबूत है। किंतु क्या करेंगे? अ ये शत्रु वाले भीतर में से ही किसी को पटा दिया है। किले का दरवाजा उसी ने पीछे से जाकर खोल दिया। शत्रु सेना भीतर में चली आई। इस तरह के गद्दार कहां से जन्म लेते हैं? या तो फिर इस तरह का डिस्कंटेंट जो है राजा के प्रति कहां से जन्म लेता है? जबकि वहां की प्रजा है या तो ऑर्गेनाइजेशन के जो मेंबर है इंस्टीट्यूशन के यह जो मेंबर्स हैं उनका उस ऑर्गेनाइजेशन इंस्टीट्यूशन समाज या देश में कोई स्टेक नहीं रहता। ओनरशिप नहीं रहती, आइडेंटिफिकेशन नहीं रहता। अपने को कट ऑफ महसूस करते हैं। तब यह लोग जो है जो कि अपने को कट ऑफ महसूस करते हैं मेन स्ट्रीम से वे लोग इजी शिकार हो जाते हैं। अभी आजकल यह हनी ट्रैप का चला है। यह दुश्मन देश वाले हैं। कोई ना कोई प्रलोभन देकर के किसी को पटाएंगे जो कि अच्छी इन भारत के जो रक्षा संस्थान है उसमें अच्छी पोस्ट हो। जिसके सीक्रेट उसको पता हो। इसको हनी ट्रैप करेंगे। हनी ट्रैप कैसे करेंगे? तो विभिन्न प्रलोभन देकर के। तो इस तरह से लोग क्यों हनी ट्रैप में फंस जाते हैं? उनके भीतर में ऑलरेडी कुछ ना कुछ डिसकंटेंट होता है। जिसके भीतर में डिस्कंटेंट होता है मेन स्ट्रीम के प्रति जिसके मन के भीतर में वहां का जो ऑर्गेनाइजेशनल सिस्टम है, मेन स्ट्रीम है उसमें उन लोगों का ओनरशिप या तो फिर एक हिस्सा नहीं रहता। तब ऐसा होता है। देखिए कम्युनिस्ट कंट्रीज जितने भी है सबका अनुभव है। फार्म को कलेक्टिवाइज कर दिया। कलेक्टिवाइजेशन का क्या अर्थ है? यह अभी देखिए खेती जिसने भी की है पता है कि एक बड़े जमीन पर आप खेती करेंगे। एक साथ में एक ही प्रकार के बीज बोएंगे तो उसको मेंटेन करना उसको चलाना इजी है। किंतु जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े हो जाएंगे और प्रत्येक टुकड़ा उसका जो मालिक है अपने-अपने छोटे-छोटे टुकड़ों में खेती करने का प्रयास करेगा। वेस्टेज भी बहुत होगा और मेंटेनेंस भी बहुत होगा और फिर जो फसल होनी चाहिए वह इतनी अच्छी नहीं होगी। यानी कि अमेरिका में देखेंगे 100-100 एकड़ के खेत है। तो क्या है मैकेनाइज्ड ले वह मशीन लगा करके 100 एकड़ में वह खेती करते हैं। अच्छी किस्म का यह जो बीज डालेंगे उसमें सीड्स डालेंगे। फिर विमान से वह पेस्टिसाइड डालेंगे। वो फिर हार्वेस्टिंग मशीन से हार्वेस्ट करेंगे। तो कंपेयर टू 100 एकड़ के खेत में आप जितना फसल निकल सकता है एक ही मालिक के कंट्रोल में उस वही 100 एकड़ की जमीन का आप 100 टुकड़े कर दीजिए एक-ए एक एकड़ के और 100 लोगों के हाथ में थमा दीजिए। यह 100 लोगों को वो एक जो 100 एकड़ की जमीन में एक मालिक को जितना मेहनत करना पड़ता था उससे 10 गुना मेहनत ये 100 लोगों को अपनी एक-ए एक एकड़ के टुकड़े में करना पड़ेगा और उसकी जो फसल होगी वह आधी होगी। तो क्या है कि कलेक्टिवाइजेशन एक स्टार्ट हुआ। किसान से उसकी जमीन छीन लो। उस टेट की मालिकी की रहेगी। किसान जो है उसके ऊपर में काम करेगा मजदूर की तरह। तो प्रॉब्लम यहां पे वही है कि ओनरशिप नहीं है तो जमीन की किसान काम ही नहीं करेगा। फांकी मारेगा आलसू हो जाएगा। उसका ओनरशिप होना चाहिए। फिर जैसे ही ओनरशिप वापस दे दिया तो फिर से किसान लोग मेहनत करके फिर से अच्छा सा फसल निकालने लगे। तो ओनरशिप होना चाहिए। बड़ी जमीन आप कहते हैं कि बड़ी जमीन पर आपको काम करना है तो बड़ी जमीन का एक ओनर होना चाहिए। स्टेट ओनरशिप से नहीं चलेगा। यह जो अपना हिस्सा है ऑर्गेनाइजेशन के भीतर में, समाज के भीतर में, इंस्टीट्यूशन के भीतर में दैट इज फंडामेंटली वाइटल फॉर द हेल्थ ऑफ दैट ऑर्गेनाइजेशन, इंस्टीट्यूशन, समाज या सोसाइटी जो कि भारत में नहीं हुआ था। एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत का ऐसा था कि जिसका कि भारत के साथ में कोई आइडेंटिफिकेशन ही नहीं था। मेरी कास्ट यह है। मेरी कास्ट के साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन है। मैं इस नाथ का हूं। इस नाथ के साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन है। मैं इस अह धर्म को फॉलो करता हूं। इस धर्म के साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन है। भारत देश के साथ में आइडेंटिफिकेशन नहीं है। भारत देश के प्रति मेरा प्रेम, पेट्रियोटिज्म या ओनरशिप जैसा कुछ नहीं। बोलकर के जैसे ही विदेशी आक्रमण प्रारंभ हुए। हम लोग उन लोगों ने पाया कि हम लोग छोटे-छोटे टुकड़ों में बटे हुए हैं और एक बहुत सारा वर्ग है समाज का। बहुत सारे टुकड़े हैं इस समाज के। जिनको कि समाज के साथ में कोई लेना देना ही नहीं है। तो फिर इन विदेशी हमलावरों ने हमारे भीतर में जो डिवीजन थे उसका बेनिफिट उठा के हमको आपस में झगड़ा दिया और हमारे पे शासन किया। वो कहते हैं ना ब्रिटिश लोगों की पॉलिसी क्या थी? डिवाइड एंड रूल। किंतु देखिए सही-सही में आप स्टडी करेंगे हिस्ट्री का तो परिस्थिति क्या थी पता है? वी वेर ऑलरेडी डिवाइडेड एंड दे रूल्ड अस वी वेर ऑलरेडी डिवाइडेड अमोंग्स अस एंड देन दे केम एंड रूल अस तो यह परिस्थिति थी उन्होंने कहीं हमको डिवाइड नहीं किया आपस में हम लोग डिवाइड हो चुके थे और उन्होंने आकर के हम पे रूल किया शासन किया। सो ये एक बहुत ही इंपॉर्टेंट लेसन है कि यदि सिविलाइजेशन को डेवलप होना है तो सोशल लेवल पे कम्युनिटी लेवल पे इस तरह का स्ट्रेटिफिकेशन कम्युनिटी लेवल पर इस तरह की गुलामी नहीं चलेगी कि वहां पे गुलामी जैसा ही तो हो गया। आज मेरा जन्म एक इस तरह के घर में हुआ है। मेरे पिताजी जो है वो चमार है ना कि फिर यह झाड़ू लगाने वाले हैं ना कि यह टॉयलेट क्लीनर है। तो अभी मेरे में चाहे जितना भी टैलेंट क्यों ना हो मेरा जीवन वही टॉयलेट क्लीन करने में ही जाएगा। मेरा जीवन जो है वो वही मैनुअल लेबर में ही जाएगा। यह कौन सी बात हो गई? सो ये सामाजिक बंधन जो है, सामाजिक गुलामी है, उसको तोड़ना है। यह जो हमारा कुछ
Sri Ramakrishna represents the next step in human evolution; our very survival depends on shaping our lives according to his teachings. श्री रामकृष्ण मानव विकास का अगला चरण हैं; हमारा अस्तित्व उनके उपदेशों को अपने जीवन में ढालने पर निर्भर है।
डिस्कशन कल हुआ और इसके साथ में यह भी डिस्कस हुआ कि देखिए एक बहुत ही डीप कांसेप्ट है जिसके ऊपर में मैं काफी समय से सोच रहा हूं। सही कहूं तो 5 छ साल से सोच रहा हूं। किंतु इसको मैं इतना इजीली आर्टिकुलेट नहीं कर पाया। वो कांसेप्ट क्या है? देखिए कि यह इवोल्यूशन या तो डेवलपमेंट ह्यूमन स्पीशीज का सिविलाइजेशन का ऐसा स्मूथली नहीं होता कि फर्स्ट स्टेप, सेकंड स्टेप, थर्ड स्टेप, फोर्थ स्टेप ऐसा नहीं। जंप लगता है। फर्स्ट फ्लोर से सेकंड फ्लोर पे जंप लगाया। फिर वहां पे थोड़ा समय विश्राम किया। फिर सेकंड फ्लोर से थर्ड फ्लोर पे जंप लगाया। फिर वहां पे थोड़ा सा विश्राम किया। यह डायवर्सिटी एंड एक्सटिंशन एक ऐसा समय आता है कि जबकि यह क्लाइमेट है, नेचर है, बड़ा ही फेवरेबल रहता है। जब यह नेचर या क्लाइमेट फेवरेबल रहेगी, बहुत सारी स्पीशीज जन्म ग्रहण करेगी। बहुत सारे इकोलॉजिकल निशेस जो है इकोलॉजिकल कॉर्नर है उसका बेनिफिट उठा के अपनी-अपनी जो फिजिकल ट्रेट है उस तरह की कॉर्नर में ढालने का प्रयास करेगी। दैट इज कॉल्ड डायवर्सिटी और जो कहेंगे कि वैविध्य। अभी किंतु क्या होता है? कुछ समय के बाद में यह फेवरेबल क्लाइमेट या फेवरेबल एनवायरमेंट एकाएक नेचुरल डिजास्टर में परिणत हो जाते हैं। वह चाहे वह मिटराइट स्ट्राइक हो जिसने कि यह रेप्टाइल्स को डायनासोर को ख़ कर दिया एक्सटिंक्ट कर दिया ना कि यह जो क्लाइमेट चेंज हो ना कि फिर ये हवा में जो ऑक्सीजन का जो कंपोज़शन हो मत कि व्हाटएवर द रीज़ंस ये जो आप जियोलॉजी इवोल्यूशन स्टडी करेंगे तो आपको बहुत सारे रीजन दिखाई देंगे कि मास एक्सटिंशन क्यों आता है? तो एकाएक एक जो क्लाइमेट है वो चेंज होता है या दुर्घटना होती है और भयानक सिचुएशन खड़ी होती है पृथ्वी के ऊपर में उस समय क्या आपकी फिजिकल ट्रेड आपको सहाय करती है सर्वाइव करने में कि नहीं वह डिपेंड करता है कि इस डिजास्टर में यह जो मास एक्सटिंशन है इसको आप पार करके बच पाएंगे कि नहीं जो कि मिटराइड स्ट्राइक हुआ पृथ्वी पे पृथ्वी का वातावरण जो है टेंपरेचर है भयानक रूप से बढ़ने लगा तो रेप्टाइल्स जिनका कि खून ठंडा था उनका तो एक्सटिंशन हो गया किंतु मैमल्स जिनका कि खून गर्म था और उनके भीतर में होमियोस्टेसिस था। होमियोस्टेसिस अर्थात कि बॉडी टेंपरेचर जो है वह एक लेवल मेंटेन करता है। 13 ना कि 33° व्हाटएवर मैं भूल गया। किंतु वह लेवल मेंटेन करता है अप टू एन एक्सटेंट। बाहर का क्लाइमेट भले ही चाहे फ्लक्चुएट हो बॉडी टेंपरेचर जो है वििन अ नैरो रेंज मेंटेन होता है। तो ये जो होमियोस्टेसिस है दैट होमियोस्टेसिस ने हम मैमल्स को बचाया और फिर मैमल्स का इवोल्यूशन हुआ। तो देखिए कि यह जो डायवर्सिटी एक्सटिंशन डायवर्सिटी एक्सटिंशन इस तरह से लिप्स एंड बाउंड्स लिप्स एंड बाउंड्स में इवॉल्यूशन चलता है। ह्यूमन सिविलाइजेशन के लेवल पे जब हम आते हैं वो हो गया फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक का इवोल्यूशन। अभी हम देखते हैं कॉन्शियसनेस का इवोल्यूशन। क्योंकि ह्यूमन सिविलाइजेशन जब स्टार्ट होती है तभी कॉन्शियसनेस काेंस बढ़ जाता है। इंस्टीटशंस काेंस बढ़ जाता है। तो अभी जो इवोल्यूशन है उसमें कांसेप्ट क्या है? जिनको कि हम अवतार कहते हैं। अवतार क्या है? इट्स नथिंग बट इवोल्यूशनरी लिप। इवोल्यूशनरी हायर स्पीशीज। अभी जब हम एक्सटिंशन आता है तो कौन बचेगा जिन्होंने कि अपनी कॉन्शियसनेस को अपने माइंड को अपनी साइकोलॉजी को इस अवतार के लाइफ एंड टीचिंग के ऊपर में ढाला है वे लोग बचेंगे और बाकी लोग जो है बाकी की जो सिविलाइजेशन है वे लोगों धीरे-धीरे करके एक्सटिंक्ट होना शुरू हो जाएगी। यह जितना भी आप हिस्ट्री स्टडी करेंगे, इवोल्यूशन स्टडी करेंगे, यह बात आपको पक्का पता चलता है। अभी देखिए कल भी हमारा जैसे एक डिस्कशन हुआ था कि हम इस तरह का क्लेम करें ही क्यों कि आप यदि हमारे पास में नहीं आएंगे तो आप एक्सटिंक्ट हो जाएंगे। यह सर्वधर्म समन्वय है। उदार भाव है। वह तो रामकृष्ण संघ का रामकृष्ण भावधारा का हार्ट है। हारद है। तो हम लोग इस तरह का क्लेम करेंगे तो हमारा जो कोर टीचिंग है उसी से क्या हम नहीं विमुख हो जाएंगे। किंतु देखिए कि ऐसा तो नहीं है कि हम लोग लोगों पर अत्याचार करके लोगों का विनाश करने को जाने वाले हैं। प्रकृति करने वाली है। उसमें तो हमारा कोई हाथ नहीं। हम तो ठाकुर से यही प्रार्थना करेंगे कि एक्सटिंशन ना आए। किंतु एक्सटिंशन आएगा ही। यह जो कि नियम है संसार का युद्ध है, सिविल वॉर है, यह पेंडेमिक है, यह सोसाइटल डिसइीग्रेशन है, इकोनॉमिकल कोलप्स कोलैप्स है, इकोलॉजिकल कोलैप्स है। यह सब तो चलता ही रहेगा। यह आएगा ही आएगा। इन दैट केस अवतार और अवतार का ऑर्गेनाइजेशन या तो फिर अवतार से जुड़े जितने भी नेटवर्क है वही है कि हमको बचा करके रखेंगे। तो दैट इज वन थिंग कि हम लोग यह एक्सटिंशन नहीं लाते नेचर लाता है। हम तो सबको सहाय करने का प्रयास करेंगे। सो दैट इज वन थिंग। दूसरा कि देखिए कि नो वन
Sri Ramakrishna is the foundation of a multilingual, multiethnic, multiracial, and multireligious society.
इज मैं अपने को कहूंगा कि इस जगत के जो टॉप 10 लिबरल लोग हैं उसमें मैं अपने को समावेश करूंगा। मैं मैं तो चाहता हूं एक मल्टीलिंगुअल मल्टी कल्चरल मल्टी एथेनिक सोसाइटी बने। जहां पे सब तरह के व्यू पॉइंट को इक्वलेंस दिया जाए। वहां पे मनुष्य की डिग्निटी जो है उसको मेंटेन किया जाए। उसको उसकी रक्षा की जाए। इस तरह से मैं चाहता हूं। किंतु यह जो मल्टीलिंगुअल, मल्टी एथनिक, मल्टी रेशियल, मल्टीकल्चरल एक वैविध्यपूर्ण सोसाइटी बनानी है तो उसका जो यह कोर कंपोनेंट होना चाहिए रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा। क्योंकि यह देखिए अमेरिका एक मेल्टिंग पोर्ट था। वहां पर दुनिया भर से उन्होंने सब तरह की विविध जातियां, विविध भाषाएं, विविध कल्चर सबको आमंत्रण दिया। खुले हाथों से आवकारा। स्वामी जी को भी इसी तरह से अमेरिका में वेलकम मिला था। किंतु फिर बाद में क्या हुआ? कुछ इस तरह के तत्व अमेरिका में प्रवेश कर गए जो कि धर्मूनी थे जो कि अपनी बिलीफ में बहुत ही रिजिड थे। बहुत ही मिडीवलिस्टिक थे। अर्थात कि हम ही लोग सही है। बाकी सब गलत है। इस तरह की विचार वाले कुछ वहां पर प्रवेश कर गए। और उसका जो बैकलेश आया यह बैकलेश अभी हमको दिख रहा है कि इमीग्रेशन के अगेंस्ट में यह इंडियंस के अगेंस्ट में किस तरह का हेट किस तरह का फोबिया अभी अमेरिका में फैल रहा है तो यदि एक मल्टीलिंगुअल मल्टीेशियल मल्टीकल्चरल एक डायवर्स व्यू पॉइंट वाला एक सोसाइटी को सक्सेस होना है तो ठाकुर मां स्वामी जी के सिद्धांत पे ही यह सोसाइट सोसाइटी सक्सेस हो सकती है। अभी आप यहां पे प्रश्न करेंगे कि आप मल्टीलिंगुअल सोसाइटी के बारे में कहते हैं, मल्टीकल्चरल, मल्टीरेशियल इस तरह की सोसाइटी के बारे में कहते हैं तो मल्टीर रिलीजियस सोसाइटी क्यों नहीं? मल्टी रिलजियस भले डज नॉट मैटर। किंतु कोई भी रिलीजन, कोई भी कल्चर, कोई भी लैंग्वेज, कोई भी रेशियल ग्रुप ऐसा कभी ना कहना शुरू कर दे कि वी आर सुपीरियर टू अदर्स। वही जो वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन दैट इज द आईडिया ऑफ द सोसाइटी। स्वामी जी भी वहां पे गए। उन्होंने तो ऐसा नहीं कहा जिस तरह से कोई-कोई क्लेम करना चाहता था कि हमारा रिलीजन सुपीरियर है। स्वामी जी ने तो ऐसा नहीं कहा। बुद्धिस्ट इज़ नॉट टू बिकम ए क्रिश्चियन। क्रिश्चियन इज़ नॉट टू बिकम ए हिंदू। बुद्धिस्ट इज़ टू बिकम ए बेटर बुद्धिस्ट। क्रिश्चियन इज़ टू बिकम ए बेटर क्रिश्चियन। सो फॉलो योर पॉइंट ऑफ व्यू बट डू नॉट हेट अदर्स। दूसरों के प्रति सहानुभूति रखो। कन्वर्जन करने का प्रयास करो। कोई मना नहीं करता है। स्वामी जी अमेरिका जाकर कन्वर्जन करके आए। हम लोग कन्वर्जन से डरते क्यों हैं? वे लोग यहां पे आते तो हम वहां पे जाएं। जो फिट सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट जो आईडियोलॉजी सुपीरियर होगी वो टिकेगी। बाकी का एक्सटिंशन हो जाएगा। सोसाइटी में इस तरह से आपको एक सिस्टम बनाना है कि एक आइडियोलॉजी दूसरे पे अत्याचार ना करें। बस ये एक बेसिक फंडामेंटल मॉडल तैयार रखना है। किंतु ये जो मॉडल है जहां पे सबको इक्वल डिग्निटी मिलती है। जितने भी एथेनिक ग्रुप है सबको इक्वल डिग्निटी। जितने भी रेशियल ग्रुप है सबको इक्वल डिग्निटी। जितने भी लैंग्वेज ग्रुप है सबको इक्वल डिग्निटी। जितने भी ये कल्चरल ग्रुप्स हैं उनको इक्वल डिग्निटी। कि जितनी भी ये आइडियोलॉजीस या तो रिलीजियस ग्रुपिंग है उनको इक्वल डिग्निटी यह इक्वल डिग्निटी सबको वही प्रदान कर सकता है वो है रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा तो यह रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा रूपी फाउंडेशन के ऊपर में यह मल्टी कल्चरल मल्टी एथेनिक मल्टीेशियल मल्टीलिंगुअल सोसाइटी का निर्माण होना चाहिए। भारत ऑलरेडी वहां पे पहुंच चुका है। अपने यहां पे एथनिक, रिलीजियस, कल्चरल, लिंग्विस्टिक डायवर्सिटी जो है वो अद्भुत है। पूरे यूरोप में जितनी डायवर्सिटी नहीं उतना भारत के एक देश में है। आप नॉर्थ से साउथ, ईस्ट से वेस्ट जाइए। देखेंगे आपको स्किन कलर में डायवर्सिटी दिखाई देगी। लैंग्वेज तो एक ही स्टेट में आपको 10 उसकी डायलेक्ट दिखाई दे दिखाई देती है। रिलीजियस डायवर्सिटी तो अद्भुत है। उसका कोई प्रश्न ही नहीं है। तो और भारत ने किसी पर अत्याचार नहीं किया। स्वामी जी कहते हैं ना बार-बार कहते हैं कि दूसरे दूसरे देशों की आईडियोलॉजी या रिलीजन किस तरह से फैले हैं। पहले तो सैनिक लोग गए हैं हाथ में तलवार लेकर के और जो विधर्म है उनका सत्यानाश कर दिया है। विनाश कर दिया है। फिर वह जो विनाश हुआ जो देश है या समाज है सोसाइटी है वहां पर फिर धार्मिक प्रीचर गए हैं। भारत ने तो ऐसा नहीं कहा नहीं किया। बुद्धिज्म जो फैला शांति से फैला है। आशीर्वाद और सहृदयता से फैला है। हिंदू धर्म जो है ये स्पाइस रूट के माध्यम से यह जो नॉर्थ ईस्ट साउथ ईस्ट एशिया है वहां पे जो हिंदूइज़्म फैला तो देखेंगे कि शांति और प्रेम से फैला है। तलवार या तो फिर आक्रमण करके हमने अपने को कभी नहीं फैलाया। स्टेट पेट्रोनेज हिंदूइज़्म को कभी नहीं मिला। बोलकर के यह जो हिंदू धर्म है स्वामी जी कहते हैं दूसरे देशों का या दूसरे धर्मों का आगमन जैसे तूफान की तरह है रास्ते में जो आता है सब कुछ तोड़फोड़ कर देता है। जबकि भारतीय धर्म का भारतीय भावधारा हिंदू धर्म का आगमन गुलाब के ऊपर में सुबह को जो यह जो बलप्रद पोषणकारी ओस गिरती है गुलाब की जड़ों को सशक्त बनाती है। इसी तरह हिंदू धर्म का किसी भी देश में आगमन है। भीतर से आपको स्ट्रेंथन करेगा। आपके रूट्स जो है उसको फैलाएगा। आपका जो माइंड है उसको विकसित करेगा। आपका जो मन है उसको वो एनरच करेगा। दिस इज हिंदूइज़्म। तो क्या है? और हिंदूज़्म का भी एसेंस जो आज के युग में कहे तो वो है रामकृष्ण भावधारा। तो रामकृष्ण भावधारा का भविष्य मैं किस तरह से देख रहा हूं। एक इस तरह का सोसाइटी का निर्माण रामकृष्ण भावधारा रूपी फाउंडेशन के ऊपर में हो कि जहां पे सभी मनुष्य को सभी इंडिविजुअल्स को सभी को इक्वल डिग्निटी प्राप्त हो। एट द सेम टाइम कोई भी ग्रुप, कोई भी आईडियोलॉजी, कोई भी लैंग्वेज या कोई भी एथनिक माइनॉरिटी या मेजॉरिटी इस तरह का क्लेम करना ना शुरू कर दे कि हम सुपीरियर है या तो फिर हमारे पास में स्पेशल टैलेंट है। हमको एक स्पेशल स्थान चाहिए। हमको स्पेशल प्रिविलेजेस चाहिए। नहीं। स्पेशल प्रिविलेज किसके लिए नहीं? सबको इक्वल प्रिविलेज। सबको इक्वल ओपॉर्चुनिटी। सबको इक्वल डिग्निटी कोई भी किसी को भी स्पेशल प्रिविलेज, स्पेशल डिग्निटी, स्पेशल अपॉर्चुनिटी इस तरह का नहीं होना चाहिए। सो दिस इज रामकृष्ण भावधारा का फ्यूचर जो है वो मैं देख रहा
strong nation is one with which citizens feel identified, in which citizens have ownership
हूं। इस तरह की सोसाइटी जब हम क्रिएट करेंगे तो होगा क्या? इस सोसाइटी के जितने भी इंडिविजुअल है, नागरिक है, मेंबर्स हैं, उनका इस सोसाइटी में एक स्टेक होगा, एक ओनरशिप होगी। और इस ओनरशिप की वजह से इस सोसाइटी को डिफेंड करने के लिए यह लोग अपने प्राणों की बाजी लगा देंगे। देश को डिफेंड कब कौन करता है? तभी करेगा जब कि इस देश ने हमको कुछ दिया है या तो देश के साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन है। यह मॉडर्न नेशन स्टेट फ्रांस जब बना, ब्रिटेन जब बना और उन्होंने फ्रांस खास करके फ्रेंच रिवोल्यूशन के बाद में मोनार्की में से ये मॉडर्न नेशन स्टेट बना और फ्रेंच आर्मी ने यह जो फ्यूडल जितने भी किंग किंगडम्स जितने भी थे उस पे आक्रमण किया। इतना इजीली नेपोलियन का विजय होता गया। क्यों? ये ऑस्ट्रिया है, हंगेरी है, रशिया है, यह स्पेन है। स्पेन तो नहीं मार खाया बेचारे ने वहां पे। किंतु यह इटली है। यहां पे क्या था? फ्यूडलिज्म था, मोनार्की थी। तो वहां के जो सर्फ है जिनको सर्फ कहते हैं। गुलाम म जो खेत में काम करते थे उनको सर्फ कहते थे। एसीआरएफ सर्फ। तो यह जो खेत मजदूर थे उनका कोई स्टेक ही नहीं है। उस प्रदेश के डेवलपमेंट में कोई ओनरशिप ही नहीं है। तो फ्रेंच आर्मी जब भी आती है तो यह लोग डट करके युद्ध नहीं करेंगे। या तो हार जाएंगे, भाग जाएंगे, हतोत्साह होकर के वो युद्ध करेंगे। बोल के यह लोग इजी प्रे हो गए नेपोलियन के। नेपोलियन जीता जो है उसके पीछे उसके खुद की ब्रेवरी और जो युद्ध के मैदान पे उसका जो टैलेंट था वो तो था ही था। किंतु साथ में एक बहुत बड़ा एक फैक्ट यह था कि फ्रांस जो है अभी मॉडर्न स्टेट हो गया है। वहां पर जितने भी नागरिक हैं उनका देश में ओनरशिप है। देश के साथ में आइडेंटिफिकेशन है। जबकि ये जो फ्यूडल मोनार्कीज़ जितनी भी थी जिस पे ये अटैक करता था नेपोलियन खास करके ये ईस्टर्न यूरोप की साइड में ऑस्ट्रिया हंगेरी रशिया ये इटालियन सिटी स्टेट्स वगैरह जितने भी थे वहां पे फ्यूुडलिज्म था और आम जनता का आम नागरिक का देश के साथ में कोई आइडेंटिफिकेशन नहीं कोई हिस्सा नहीं देश के डेवलपमेंट में बोल कर के ये मॉडर्न नेशन स्टेट जब भी आया अपनी आर्मी लेके इन लोगों ने घुटने टा टेक दिए उसके सामने भारत के साथ में वही मोनार्की एंड एक तरह का आप क्या कहेंगे लोगों का स्टेक चला गया था देश के साथ में देश के भविष्य के साथ में देश की प्रगति के साथ में बोलकर के यूरोपियन ये ब्रिटिश लोग जब भी जैसे ही आए सीधा हम लोगों ने हमारे राजा जितने भी थे प्रजा के प्रजा ने नहीं राजा जितने भी थे सब का पुरुष निकले और उनके सामने घुटने टेक दिए नो डाउट किसी किसी ने फाइट किया। झांसी की रानी है, महाराणा प्रताप है, अमर नाम है भारत के इतिहास में। किंतु इन जनरल जो भारत का जो रूलिंग वर्ग था, जो शासक वर्ग, उन्होंने सीधे घुटने टेक दिए थे। बोल के ब्रिटिश लोगों को बड़ा मजा आ गया था भारत को लूटने का। सो देखिए कि दिस इज हाउ अ सोसाइटी वर्क्स। तीन तरह से आपके ऊपर में गुलामी है और तीनों लेवल पर गुलामी को काटना है और रामकृष्ण संघ का भविष्य क्या है? रामकृष्ण भावधारा का भविष्य क्या है? इस तरह से मैं थोड़ा सा सोचता हूं। तो आज यहीं तक अभी कल के क्लास में और थोड़ा सा देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु आज ठाकुर की तिथि पूजा और ठाकुर को मेरा वही प्रार्थना आप सबके लिए है कि ठाकुर मां स्वामी जी की कथा और कहानी वार्ता और वार्तालाप इसके ऊपर में आप सबका श्रद्धा भक्ति बढ़े उसके बाद में ठाकुर खुद देख लेंगे क्या करना है। देखिए मैं हमेशा कहता हूं रामकृष्ण संग में तपस्या का कोई इतना आवश्यकता ही नहीं है। एक हाथ में कथामृत ले लीजिए एक हाथ में जपमाला ले लीजिए कुछ नहीं है। इजीिएस्ट वे और ठाकुर महा स्वामी जी के प्रसंग है। ऑफकोर्स यस रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा समग्र माने वो लोग डिटॉक्सिक वो कहते हैं ना आजकल वो वाईफाई फ्री ज़ोन में जाते हैं। कितना ₹00 ₹1 लाख दे के सब रिट्रीट में आपको फ्री रिट्रीट हो रहा है। डिटॉक्सिकेशन
प्रश्न: मेरे कुछ रिश्तेदार मेरे साथ इतना बुरा व्यवहार करते हैं कि मैं टूट जाती हूँ, उदास हो जाती हूँ और रोने लगती हूँ। ऐसे में अब मैं क्या करूँ, मुझे समझ नहीं आता।
देखिए गहन शोक जब आता है तो उसका कोई इजी सॉल्यूशन तो है नहीं। ठाकुर को भी अक्षय उनके भाई के पुत्र का जब मृत्यु हुआ तो पहले तो हंस रहे हैं फिर रो रहे हैं और कहते हैं कि हृदय में वह जो गमछा जो निचोड़ते हैं तो किस तरह से हृदय को कोई उनके निचोड़ रहा है। इस तरह का दुख हो रहा था। तो देखिए कि जीवन में है दुख कष्ट आएंगे। आध्यात्मिकता आपको इमीडिएटली शायद हेल्प ना करें। ठाकुर मां स्वामी जी की यह जो वार्ता और वार्तालाप शायद इमीडिएटली आपको हेल्प ना करें। किंतु देखिए कि यही वार्ता और वार्तालाप को ले रहेंगे ना तो कुछ ही समय में यह शोक है वो उससे आप तैर जाएंगे। तरति शोकम आत्मवित जैसे वह अपने शास्त्र में कहा है। शोक से तैर जाएंगे। आपको समय देना होगा। विश्वास रखना होगा। बहुत बार ऐसा होता है कि कोई किसी भावधारा धर्म के प्रति आकृष्ट तो तो होता है। फिर किंतु जब प्रॉब्लम आता है तो वे लोग सोचते हैं कि अरे यहां से तो मुझे कुछ मिला नहीं। कोई कुछ बेटर कुछ खोजते हैं। किंतु ऐसा कुछ करने से बेटर कुछ सोच खोजने को जाने में देखिए बेटर मिल जाता है तो बहुत अच्छा है। किंतु अदरवाइज क्या होगा कि एक भटकता हुआ माइंडसेट बन जाता है। फिर कहीं पे वह सेटल नहीं होंगे। यहां पे कुछ समय पहले एक वॉलंटियर आए थे तो आकर के तो बहुत अच्छी बात वंटियर माने एक भाई आए थे बोले कि मैं यहां पे एज अ वॉलंटियर काम करना चाहता हूं। बहुत अच्छी बातें कर रहा है। मैंने कहा कि ठीक है आप आइए डेली मंदिर में आइए और फिर जितना वो प्रवचन वगैरह हो सुनिए और फिर जब भी काम की जरूरत होगी तो हम आपको बुलाएंगे। तो बोले कि हां मैं आऊंगा। पहले मैं थोड़ा सा तीर्थ यात्रा जाके आता हूं। तो ठीक है। तीर्थ यात्रा पर जाइए। तो वो उस उस दिन के बाद से कभी देखा ही नहीं। क्यों? एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ जाते हैं। कभी एक बार मुलाकात हुई। मैंने कहा आप कभी आते नहीं। बोला बोला नहीं मुझे वहां पर जाना है यह काम करना है अरुणाचलम में वहां पर तीन दिन का हमको फ्री रहने को मिलता है छछ महीने पे वो बुकिंग करना है और मन का तो जो उद्वेग या तो जो रेस्टलेसनेस है वह तो वैसे का वैसा ही है तो 10 जगह पे जाकर के 10 चीजों के साथ में ट्राई करना बेटर है एक जगह पर रहिए म भरोसा होना चाहिए उस जगह पे भाव के ऊपर में भरोसा होना चाहिए वहां के तो एंड गिव इट ए टाइम। अब धीरे-धीरे करके शौक जाएगा। समय देना होगा। समय ही एक सबसे बड़ा यहां पे वैद्य है।
प्रश्न: हम अपने राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए अवतारों पर इतना निर्भर क्यों हैं? क्या यह हमारी कमजोरी नहीं है? चीन जैसे देश अवतारों पर निर्भर नहीं हैं, फिर भी हमसे बेहतर प्रगति कर रहे हैं। स्वामीजी भी वेदांत के ‘आत्मश्रद्धा’ का ही संदेश देते हैं।
इस तरह का डिस्कशन स्टिमुलेटिंग फॉर इंटेलेक्चुअल डिस्कशन ना। उन्हें एक फूड फॉर थॉट प्रदान करता है। देखिए आई एग्री विद यू। अवतार आते हैं हमारा जो राक्षसों का वध करने के लिए राइट इतिहास में तो ऐसा ही हुआ है। किंतु यह जो रामकृष्ण अवतार है उनका एक यूनिकनेस क्या है? सर्वप्रथम तो बाहर के शत्रुओं का उन्होंने वध किया नहीं ब्रिटिश लोगों का। दूसरा कि इवन आंतरिक शत्रुओं का जो वध है उन्होंने हमको गाइड गाइडेंस देकर के छोड़ दिया। अब अब जैसे कि हृदय के साथ में जो ठाकुर का जो बात कि मैं तुम्हारे कामार पुकुर को सोने से मढ़ के जाता यदि मुझे लगता है इससे तुम्हारा कुछ भला होने वाला है किंतु नहीं होने वाला राइट तो ठाकुर ने हमको गाइडेंस देकर छोड़ा है स्वामी जी का स्वामी जी का फेमस स्टेटमेंट मेरे रहते-रहते वट वृक्ष के रहते रहते छोटे पौधे जो है पनपेंगे नहीं मेरा जाना आवश्यक है ठाकुर से भी छोटी उम्र में ठाकुर से भी 10 साल कम उम्र में उन्होंने महासमाधि ले ली जिससे जिससे कि रामकृष्ण मिशन का प्रारंभ हो और विस्तार हो। दूसरा यह दो फैक्टर है। तीसरा आप देखिए कि जो उस समय के सही में राक्षस थे शुभम निशुम ना कि रक्तबीज जो भी कहो ये ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज उसके साथ में तो भारतवासी ही लड़े हैं। आजकल हम भले चाहे कुछ अह बिग लेटर अह बिग नेम अह अह इंडिपेंडेंट फ्रीडम फाइटर्स का नाम लेते हो गांधीजी यह वगैरह-वगैरह किंतु व्हाट इज द फैक्ट कि घर गांव-गांव से घर-घर से गली-गली से फ्रीडम फाइटर निकले थे फॉर द फ्रीडम मूवमेंट। राइट? और भारतवासियों ने भारत के लिए फ्रीडम प्राप्त किया है। और आज आप डेमोक्रेसी का मैप देख लीजिए। यह जो पूरा एशिया जो है वो रिप्रेसिव गवर्नमेंट से भरा है। साउथ एशिया का तो पता ही है। यहां पर चाइना है। ऊपर में रशिया है। यहां पे इस समय साइड में सब गल्फ मोनेकीस है। कोई भी फंक्शनिंग डेमोक्रेसी नहीं है। यह पूरा नेबरहुड में इंडिया इज द ओनली फंक्शनिंग डेमोक्रेसी। फंक्शनिंग डेमोक्रेसी का अर्थ ही है कि सिटीजंस आर टेकिंग द रिस्पांसिबिलिटी ऑफ़ द स्टेट। ऑटोक्रेसी का अर्थ ही वही है कि सिटीजंस ने अपना जो रिस्पांसिबिलिटी है उसको छोड़ दिया है। सो जो मुट्ठी भर फंक्शनिंग डेमोक्रेसी है वेस्टर्न यूरोप और नॉर्थ अमेरिका उसके साथ में इंडिया आता है। राइट? सो पहले के अवतारों ने अवश्य राक्षसों का वध किया। रामकृष्ण अवतार ने हमारा ऑन आवर बिहाफ राक्षसों का वध नहीं किया। हमको वो नरिश करके गए हैं। सो दैट इज वन पॉइंट और दूसरा जो आपका था कि कॉन्फ्लिक्ट बिटवीन वेदांत एंड अवतारवाद। तो अगेन यहां पे इसी थीम से मैं इसका भी उत्तर दूंगा कि अगेन पुराण में जो हुआ सो हुआ। उसका इतना डिटेल तो अपने पास में इंफॉर्मेशन नहीं बोल के क्या कहेंगे? किंतु एटलीस्ट आधुनिक युग में तो है कि रामकृष्ण भावधारा में वेदांत का प्राधान्य क्यों है? हम लोग ऐसा कभी नहीं कहते कि अवतार की ये जो ब्लाइंड डिवोशन टू अवतार इज योर वे ऑफ़ साल्वेशन। हम कहते हैं कि आत्मश्रद्धा इज अ वे ऑफ़ साल्वेशन। त्याग और आत्मश्रद्धा व्हिच इज द फंडामेंटल एस्पेक्ट इन रामकृष्ण विवे संघ। राइट? साधु हो ना कि सन्यासी हो। सबको पता है काम कांचन त्याग करना है। ठाकुर ने ऐसा कभी नहीं कहा मेरी पूजा करो। ठाकुर ने हमेशा कहा काम कांचन त्याग करो। यानी कि वेदांत का जो फंडामेंटल रूल जो है त्याग उसी का उन्होंने महात्म गाया है। आज आप वो जो पता है ना वो जो आप वर्ड एनालिसिस वर्ड क्लाउड बनाते हैं। वर्ड क्लाउड जो आप एक टेक्स्ट को एक एआई सॉफ्टवेयर में ऐसे में डाल दीजिए। आपको वर्ड क्लाउड बनाएगा। इस अर्थ में कि कौन से वर्ड का प्रोमिनेंस सबसे ज्यादा है। वेटेज सबसे ज्यादा है उस टेक्स्ट के भीतर में। आप देखेंगे काम कांचन त्याग का जो वेटेज है सबसे ज्यादा होगा। अगेन एंड अगेन इसको बताया गया है। जबकि आप दूसरी इस तरह की जो क्लेम करते हैं कि वी आर फॉलोअर्स ऑफ अवतार तो उनकी भक्ति पे अब भागवत या तो भागवत के जो जितने भी स्पीकर्स हैं उनको आप देखेंगे कि वह जो लाल जी की सेवा करना वही उनके जीवन का सबसे बड़ा देह है। दैट इज नॉट वि अस। अह स्वामी जी ने तो स्पष्ट कहा है कि ठाकुर ने मुझे ऐसा कभी नहीं कहा कि तुम लोग मेरी पूजा करना। शशि महाराज का था और म मोस्ट इंपोर्टेंटली शशि महाराज जब ठाकुर पूजा का प्रवच प्रवर्तन किए स्वामी जी ने बार-बार विरोध किया है। एक्सटेंसिवली विरोध किया है। सो जो टिपिकल अवतारवाद है वो अपने यहां पे नहीं है। देखिए अवतारवाद का जो फंडामेंटल क्या है ना वी आर गिविंग अप आवर एजेंसी। अपना यह जो फ्री विल है, अपनी यह जो इंडिपेंडेंस है, वह हम गवा देते हैं। शरणागत हो गए। शरणागति इज अ वेरी इंपॉर्टेंट पार्ट ऑफ साधना। किंतु वेदांत का जो फंडामेंटल तो यही है कि आपका आत्मश्रद्धा और आत्म ततीक्षा। आप यदि ततीक्षा नहीं करेंगे, मैं काम कांचन में फंसा। मैं किसी को दोष नहीं दे सकता। मेरे ग्रह बिगड़े हुए थे बोल के मैं फंसा। ये उसने मुझे आकर फंसाया बोल के फंसा। वेदांत इस तरह के एक्सक्यूज एक्सेप्ट ही नहीं करता। आपका विल पावर कमजोर हो गया। आपकी तपस्या कमजोर हो गई। बोल के आप उसमें फंसे हैं। वेदांत स्क्वेयरली पुट्स द रिस्पांसिबिलिटी अपॉन योर ओन शोल्डर्स। सो दैट इज द हार्ट ऑफ वेदांत। राइट? तो हार्ट ऑफ वेदांत इज़ ऑलरेडी विद इन आवर भावधारा। यहां पे ऐसा कभी नहीं कहा गया कि तुम्हारे पास में एक्सक्यूज है कामकांचन में डूबने का। और फिर जो है देखिए गिरीश घोष का फेमस उदाहरण है कि तुम मुझे बकलमा दे दो और तुम पहले जो चाहे करो किंतु इवन आफ्टर डूइंग दैट काम कांचन त्याग तो आ ही जाएगा राइट इफ यू आर वेरी सिंसियर इन फॉलोविंग भक्ति मार्ग से कि वेदांत मार्ग से काम कांचन त्याग को आना ही आना है। ऐसा ठाकुर का एक भी भक्त नहीं है जो कि इस तरह का क्लेम करता हो। मैं काम कांचन में भी डूबा हूं। ठाकुर की कृपा भी प्राप्त हुई है। दोनों चीज एक साथ में नहीं चली। यानी कि वेदांत का जो हार्ट है त्याग और आत्मश्रद्धा एंड आत्म ततीक्षा दैट ऑलरेडी इस पार्ट ऑफ विदिन रामकृष्ण विवेकानंद भावतारा अवतारवाद का जो मोस्ट एसेंशियल पार्ट है कि हमको एक सहाय करता है आध्यात्मिक साधना में आगे बढ़ने के लिए यह कथा और कहानी वार्ता और वार्तालाप यह हमारे मन को निर्मल करता है। किंतु निर्मल मन करके हमको उसको कंसंट्रेट तो हम ही को करना है। उससे निर्मल मन को लेकर के साधना तो हम ही को करनी है। हमारे होकर के साधना वो नहीं करने वाले। वही अजामिल की कहानी ठाकुर फेमसली कहता है कि नाम महात्म नाम से सब होगा। तो ठाकुर ने कहा नहीं नहीं तपस्या भी करनी पड़ेगी। काम कांचन त्याग करना पड़ेगा। तो वो कहता है क्यों? अजामिल तो ठाकुर ने साथ में ही कहा ऐसा है अजामिल के बारे में एक बार नारायण का नाम लिया मुक्त हो गया। किंतु उसके बाद के जन्म में उसने बहुत तपस्या की है। और यह जो आप बोल रहे हैं वो इंडिविजुअल लेवल पर बोल रहे हैं। अवतार का इंपैक्ट जो होता है वो सिविलाइजेशनल लेवल पर होता है। सिविलाइजेशनल लेवल पर उन्होंने हमारे वती ये ब्रिटिश राज्य को भगाया नहीं। मैं हमेशा कहता हूं व्हिच इज सच अ स्ट्रेंज फिनोमिना। आप इंडियन हिस्ट्री को पढ़ेंगे। भगवान राम ने रावण का वध किया। भगवान कृष्ण ने महाभारत के युग में एक्टिव पार्टिसिपेशन किया। यह मां भगवती के जितने भी अवतार आए उन्होंने राक्षसों का निकंदन करने के लिए आए हैं। रामकृष्ण अवतार इज सच अ यूनिक अवतार विदिन दिस इंडियन मिल दैट उन्होंने हमारे सामने जो इस युग का सबसे बड़ा राक्षस खड़ा था उसका वध ही नहीं किया। इनफैक्ट उनके प्रति काफी सहानुभूति रगी है। उन्हें रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर पढ़ के आपको रेवोल्यूशनरी लिटरेचर नहीं लगेगा। बाद में जो बंगाल के जितने भी रेवोल्यूशनरी है सभी के हाथ में स्वामी जी की किताब रहती थी यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा। किंतु वहां पे ऐसा कहीं नहीं है कि लेट अस गेट यूनाइटेड टू थ्रो ब्रिटिशर्स आउट। राइट? वो हमारे पे छोड़ दिया है। गांव-गांव से घर-घर से फ्रीडम फाइटर निकले हैं भारत को आजादी दिलवाने के लिए। उन्होंने हमारे वती वो कार्य नहीं किया। दिस इटसेल्फ शोज़ कि यह जो अवतार है उन्होंने दे आर नॉट टेकिंग अवे आवर एजेंसी। दे आर नॉट टेकिंग अवे आवर फ्री विल और आवर इंडिपेंडेंस वह उन्होंने हमको दान किया है और यदि वही बात एक बार राजा राम आए सुशासन करके चले गए फिर हजार साल का वो जो एक के बाद एक पगले आए और हम कुछ कर नहीं पाएंगे क्योंकि क्या है हमने अपना फ्री विल या एक एजेंसी जिसको कहते हैं वो दान दे दिया है राजा जो कहे वो सही तो भारत में अभी ऐसा नहीं है कि चलो इवन जितने भी डिक्टेटोरियल स्टेट है। यह ऑटोक्रेटिक स्टेट है। अच्छा ऑटोक्रेट आया तो अच्छा चलेगा। पागल ऑटोक्रेट आया तो खत्म कर देगा। चाइना का हिस्ट्री सबसे बड़ा उदाहरण है। माओजे ने जो बर्बादी की है, जो भयानक अत्याचार किया है, वो हमारे रोंगटे खड़े हो जाएंगे। पढ़ेंगे तो। अभी आजकल उनके अच्छे दिन चल रहे हैं क्योंकि उनके दो-तीन अच्छे-अच्छे डिक्टेटर आ गए। एक पगला नया आ जाएगा तो वो क्या करेगा कुछ ठीक नहीं है। सो दैट इज व्हाट कि यूनिकनेस ऑफ रामकृष्ण अवतार।
हम सभी की यही प्रार्थना है कि यह सुबह की क्लास निरंतर चलती रहे और हम सब इसका लाभ लेते रहें।
मैं जब तक आरोग्य भवन नहीं जाऊंगा मैं क्लास करता रहूंगा। वहां से भी यदि जब तक बोल बोल पाऊंगा जितने दिन बोलता रहूंगा तब तक क्लास चलाता रहूंगा। ओम