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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 30 Jul 2025

prayer

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लाइफ हम स्टडी कर रहे थे। विभिन्न सोर्स से कलेक्ट किया हुआ मटेरियल मैंने चैप्टर्स में बांटा हुआ है। तो देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद के समय से हमने स्वामी जी का लाइफ प्रारंभ किया है। तो आफ्टर द महासमाधि ऑफ श्री रामकृष्ण एंड लास्ट डेज इन काशीपुर यह चैप्टर 16 से 30 अगस्त 1886 का है कि किस तरह से हमने यह पूरा चैप्टर देख ही लिया है। इस चैप्टर के भीतर में जो पॉइंट है कि मां को उसी दिन रात को ठाकुर का दर्शन हुआ। इसकी वजह से जो शिष्यों के भीतर में एक मायूसी व्याप्त हो गई थी। एक हताशा और निराशा जो व्याप्त हो गई थी ठाकुर के जाने से ग्रीफ शोक और ताप व मां को दर्शन हुआ यह समाचार जब फैला तो सबके हृदय में एक आशा की किरण जागृत हुई और फिर उसी दर्शन के कुछ दिनों के बाद में हमने देखा कि किस तरह से नरेंद्र को भी अर्थात स्वामी विवेकानंद को भी ठाकुर का दर्शन हुआ। इसके बाद की कुछ घटनाएं हमने देखी कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि के बाद में काशीपुर गार्डन रखना है कि नहीं। इसके बारे में मतभेद हो गए थे। जो लोग डोनेशन दे रहे थे उन लोगों ने कहा खास करके रामबाबू ने कि मठ जो है काशीपुर गार्डन हाउस उसका लीज 30 अगस्त को समाप्त होता है तो उसको वहीं पर छोड़ दिया जाए और सब लड़के अपने-अपने घर चले जाए। तो वह एक बात हुई। उसके बाद में ठाकुर की अस्थियों को लेकर के जो पूरी कहानी है उसका हमने डिस्कशन किया। 23 अगस्त को जन्माष्टमी में ठाकुर की जो बची हुई अस्थियां थी उसका मेजर पोर्शन तो शशि महाराज और निरंजन महाराज ने निकाल दिया था। जो बची हुई अस्थियां थी वो काकुड़गाची गार्डन में गार्डन योगोद्यान में उसको क्सक्रेट किया गया और वहां पर ठाकुर की पूजा प्रारंभ हुई। उसके बाद में मां जाती है उत्तर भारत में पिल्गिमेज में यात्रा करने के लिए और यह पूरा चैप्टर का अंत आया कि किस तरह से एक उत्तर भारत के साधु ने उसको भी ठाकुर का दर्शन हुआ। यह घटनावली समाप्त होने के बाद में फिर एक नया पॉइंट चैप्टर प्रारंभ होता है। अर्ली डेज ऑफ वराह नगर मठ ठाकुर की महासमाधि के बाद में बच्चों का क्या भविष्य होना चाहिए उसका डिस्कशन यहां पर है और इस चैप्टर में वह भी सब घटनाएं आएगी। एक बार वराह नगर मठ की स्थापना हो गई तो फिर उसका भविष्य उसकी कार्यावली उसके जो दिव्य प्रेरणादाई प्रसंग है वह सब इसी चैप्टर में आएंगे। तो इसमें हमने खास करके युगनायक स्वामी विवेकानंद पुस्तक में से गंभीरानंद जी महाराज का एक पूरा एनालिसिस था। ये उसको हमने पढ़ा था। उसमें हम ऑलमोस्ट उसके आखिरी पोर्शन तक पहुंच गए हैं। ऑलरेडी इसमें जो डिस्कस हुआ कि किस तरह से गंभीरानंद जी हमको कहते हैं कि यह जो प्रवीण भक्त थे अर्थात कि जो गृहस्थ भक्त थे उन लोगों को यह बात शायद समझ में ही नहीं आ रही थी कि क्यों नरेंद्र बाकी सब त्यागी संतानों को इकट्ठा करके एक साथ में क्यों रहना चाहता है। वो तो एक बात है। दूसरा कि यह त्याग की जरूरत ही क्या है? यदि हमने नारायण स्वयं इस सृष्टि के कर्ता स्वयं मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर आए थे। उनका आशीर्वाद यदि प्राप्त किया है तो तपस्या करके फिर और कौन सी सिद्धि प्राप्त करनी है? तपस्या करके यदि आप सिद्धि प्राप्त करेंगे तो वही नारायण का दर्शन होगा जिनका दर्शन तो उनको प्रतिदिन दक्षिणेश्वर में होता ही रहा था तो कौन सी बड़ी आपको तोप मार देनी है सन्यास लेकर के तो वो एक जो एक फिलॉसोफिकल डिबेट एक फिलॉसोफिकल डिफरेंस ऑफ ओपिनियन उसका एक डिस्कशन हुआ और अपना भी जो कुछ एनालिसिस चला था हमने भी देखा कि किस तरह से ठाकुर के आने से एक नया युग धर्म प्रारंभ हुआ है। बात ऐसी नहीं है कि वेद, उपनिषद, गीता या तो फिर शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत के ऊपर में ठाकुर ने कुछ नया कहा है। ठाकुर ने वही बातों को फिर से आज के युग के लिए आज के युग की भाषा में उसी संदेश को दोहराया है। वह तो एक और दूसरा कि युगोपयोगी आज की व्यवस्था के अनुसार आज की आवश्यकता के अनुसार आज के मनुष्य जो है अन्नगत प्राण अन्नमय कोश में रहने वाला मनुष्य उसकी जो आध्यात्मिक नीड है उसके अनुसार ठाकुर ने साधन पद्धति गठित की है। वो तो एक ठाकुर का वन पार्ट ऑफ दी मिशन, वन एस्पेक्ट ऑफ दी मिशन, दूसरा कि हम सबको किसी ना किसी कम्युनिटी में रहना है। तो कम्युनिटी ही है आज की सिविलाइजेशन का बेसिक यूनिट। जैसे कि हमने उस दिन डिस्कस किया था कि एक हिस्टोरियन आर्नोल्ड टोयन वो देखता है उसने एनालाइज किया है कि यदि हिस्ट्री का ठीक-ठीक स्टडी करना है तो हिस्ट्री का जो सबसे फंडामेंटल यूनिट है उसका एक स्टडी करना होगा और पहले तो खोज निकालना होगा कि हिस्ट्री का यूनिट कौन सा है। जैसे कि आप यदि जियोमेट्री जियोग्राफी है तो जियोग्राफी का स्टडी करते हैं तो सबसे पहले तो आपको यह देखना होगा कि आप मेजरमेंट कैसे करते हैं। बिना मेजरमेंट के जियोग्राफी का स्टडी किसी काम का नहीं। तो मेजरमेंट में यह लोंगिट्यूड, अल्टीट्यूड यह सब होता है। उसमें भी हाइट किस तरह से मेजर की जाए? यह डिस्टेंस कैसे मेजर किए जाए? तो यह किलोमीटर है, माइल है वगैरह वगैरह जो मेजरमेंट के यूनिट है वही तो सबसे पहले आपका आता है। आपको नक्शा बनाना है तो मेजरमेंट का यूनिट कौन सा है? प्रत्येक एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी कौन सी है? यह नहीं समझेंगे तो नक्शा किसी काम का रहेगा नहीं। वो मिडीवल एजेस में सब नक्शे बनते थे। ये जो सब शुरूशरू के ये जो जहाज लेकर के यात्रा करते थे उस समय के नक्शे आप यदि देखेंगे वो वर्ल्ड मैप देखकर के हमको हंसी आएगी। क्यों? क्योंकि ज्योग्राफी की समझ हमारी बड़ी कच्ची थी कि ये पृथ्वी पर कौन सा कॉन्टिनेंट कहां पे है? उसका साइज क्या है? तो कभी-कभी ये अफ्रीका को इतना छोटा करके दिखाते थे। कभी इस देश को बहुत बड़ा करके दिखाएंगे। क्यों? क्योंकि समझ ही नहीं है कि एक्चुअल मेजरमेंट क्या है। तो जब प्रॉपर मेजरमेंट होने लगा तब कहीं जाकर के प्रॉपर वर्ल्ड मैप बनना शुरू हुआ। तो बिना मेजरमेंट यूनिट के और उसका डेफिनेशन के कोई भी साइंस अधूरा है। तो यहां पे भी हिस्ट्री का मेजरमेंट यूनिट क्या है? तो सिविलाइजेशन सिविलाइजेशन को पकड़ कर के उसका डेफिनेशन देखकर के टोयनबी ने स्टडी ऑफ हिस्ट्री की रचना की। तो यहां पर देखिए कि जब ठाकुर यहां पर फिर से जन्म लेते हैं इस युग में तो ठाकुर को जो अपना ह्यूमैनिटी है उसके सभी एस्पेक्ट को आवृत करना है। सभी एस्पेक्ट को उनको एक नवजीवन प्रदान करना है। सभी एस्पेक्ट में प्राण संचार करना है। जैसे दुर्गा पूजा की कोई भी प्रतिमा की हम एक एक बार उसका यह करते हैं, स्थापना करते हैं तो स्थापना करने के समय सबसे पहले तो प्राण संचार किया जाता है। प्रतिमा के भीतर में एक बार प्रतिमा के भीतर में प्राण जागृत हुए उसी के बाद में ही उनकी पूजा होती है। एक वो कहानी है ना वह ठाकुर कहते हैं कि एक आदमी शराबी वह शराब के नशे में धूर्त होकर के मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने जाकर के कहता है कि मां तुम जितना चाहे यह श्रृंगार कर लो सजधज लो किंतु देखना कि दशहरा के दिन यह सब लोग तुमको पानी में डाल के डुबो देने वाले हैं। तो वह पढ़कर के हमको हंसी तो अवश्य आता है। किंतु हमको यह बात ख्याल रखनी है कि किसका विसर्जन करते हैं? जला अभिषेक या तो पानी में विसर्जन किसका करते हैं? मां दुर्गा का नहीं करते। मां दुर्गा को जिस प्रति मिट्टी का जिस मिट्टी की प्रतिमा के भीतर में मां दुर्गा रह रही थी उस पंचमहाभूत की प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। मां दुर्गा को तो हमने आवाहन किया। मां प्रतिमा में आकर के प्रतिष्ठित हुई। पूजा जब समाप्त हो गई तब मां को हमने फिर से विदाई किया। मां फिर कैलाश में जाकर के भगवान शिव के साथ में रहने लगी। तब तो कहीं जाकर के फिर हम उस प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। तो यह बात हमको ख्याल में रखनी है। मनुष्य देह को हम कभी नहीं जलाते। हम लोग जलाते हैं मृत देह को। जब हमारे भीतर में से यह जीवात्मा दूसरे देह की ओर दूसरे जन्म की ओर गति करता है। तो जब तक इस भीतर में प्राण नहीं है इस देह के भीतर में तो यह मृत देह ही होगा। तो ठाकुर के जन्म के समय में ठाकुर के अवतरण के समय में भारत की ऐसी ही परिस्थिति थी। मृत देह की तरह पड़ा था। हजार साल की गुलामी जिसने भी चाहा आकर के अत्याचार किया। तो इस मृत मृत प्राय मृत तो नहीं कहेंगे क्योंकि स्वामी जी ने ही कहा है कि ऐसा एक भी समय नहीं था जबकि भारत में कोई ना कोई ब्रह्म ज्ञानी का अवतरण ना हुआ हो तो एक लॉन्ग लाइन ऑफ साधु संत महात्मा साधक और सिद्ध आपको प्रत्येक युग में प्रत्येक सदी में प्रत्येक साल में आपको देखने को मिल जाएंगे। किंतु यह जो पॉलिटिकल दुरावस्था थी हमारी उसमें से तो भारत को पुनः जागृत करना होगा। तो यह जो ठाकुर को जो प्राण प्रतिष्ठा करनी थी भारतीय भूमि के भीतर में और सिर्फ भारत ही नहीं ठाकुर ना आते तो पूरा विश्व जो है पता नहीं सेकंड वर्ल्ड वॉर में सभी लोग एक दूसरे के सामने एटम बम फेंकते और सब कुछ शायद तहसनहस हो जाता। अभी सेकंड वर्ल्ड वॉर में एटॉमिक टेक्नोलॉजी सिर्फ अमेरिका के पास थी। किंतु एटलीस्ट यह कोल्ड वॉर जब प्रारंभ हुआ तो सभी के पास में एटम बम आ गया है। तो अभी यह लोग एक दूसरे पर फेंकना शुरू करेंगे तो पूरी पृथ्वी ही ध्वस हो जाएगी। तो इस तरह की भयावह परिस्थिति में ठाकुर ने यह जो आध्यात्मिकता का सिंचन किया विश्व की भूमि के पृथ्वी के भीतर में वही हमको बचा करके रखा है। तो हम क्या

Consciousness = Sri Ramakrishna, Community = Ma Sarada, Civilization = Swami Vivekananda

डिस्कस कर रहे थे? व्हाट इज द मेजरमेंट? यूनिट ऑफ मेजरमेंट ठाकुर ने किस में-किस में प्राण संचार किया है। यदि इतिहास को स्टडी करेंगे तो मुझे ऐसा लग रहा है कि टोयनबी का एनालिसिस अधूरा था। उसने सिर्फ सिविलाइजेशन को एक यूनिट के रूप में देखा। मुझे ऐसा लग रहा है कि तीन यूनिट को हमको मेजर करना होगा। यदि ठीक-ठीक ह्यूमन सिविलाइजेशन या तो फिर ह्यूमन स्पीशीज को समझना है तो यह तीन यूनिट कौन से हैं? पहले तो एक इंडिविजुअल आता है। मेरा खुद का साइकोलॉजी, मेरा खुद का कॉन्शियसनेस, मेरी खुद की यह जो जीवन की गति क्या है? क्या मैं तमस की ओर जा रहा हूं? कि सत्व की ओर जा रहा हूं। मैं पशुत्व की ओर जा रहा हूं कि दिव्यत्व की ओर जा रहा हूं। विषय वासना में लिप्त हो रहा हूं कि त्याग, वैराग्य, भक्ति से मेरा मन भरा हुआ है। तो एक मनुष्य की गति क्या है? वह समझनी होगी। उसके बाद में सेकंड यूनिट आता है कम्युनिटी। कोई भी एक सिविलाइजेशन है या तो फिर मनुष्य है। इन दोनों दोनों का गठन कम्युनिटी में ही होता है। आज मैं जो कुछ भी हूं मेरे परिवार की देन है। यदि मैं अच्छे परिवार में जन्म लेता हूं तो मुझे बहुत सारे अच्छे संस्कार बचपन में मिलेंगे। और यदि इस तरह के डिस्फंक्शनल फैमिलीज आजकल हम जिसको कहते हैं तो यदि डिस्फंक्शनल फैमिलीज में मैं जन्म लेता हूं तो मेरी अवस्था आज इतनी अच्छी नहीं रहेगी। तो एक दूसरा यूनिट है कम्युनिटी और तीसरा यूनिट ऑफ ऑफ कोर्स है सिविलाइजेशन। तो तीन यूनिट को हमको देखना है। जभी भी हम एक ह्यूमन स्पीशीज या तो यह मनुष्य जाति का एक आकलन करते हैं। मनुष्य जाति को समझने का प्रयास करते हैं। तो देखिए कि ठाकुर को इन तीनों यूनिट में प्राण संचार करना था। मनुष्य की गति पशुत्व से मोड़ के ईश्वरत्व की ओर ले जानी थी। कम्युनिटी में जो झगड़ा होता है, डिस्फंक्शनालिटीज होती है, द्वेष होता है, उसकी वजह उसको प्रेम से भर देना था। और यह जो सिविलाइजेशन होती है, जिसमें जो शक्तिशाली लोग हैं, वह कमजोर लोगों का शोषण करते हैं। उसको रिवर्स करके जिसके पास में सही शक्ति है, वह कमजोर लोगों को सहाय करेंगे। तो, यह तीन बड़े कार्य ठाकुर को करने थे। तो यह जो पूरा वर्ल्ड व्यू था ठाकुर का और फिर यह जो और हमको यह भी पता है कि यह जो इंडिविजुअल पर्सन है एक इंडिविजुअल ह्यूमन है उसकी ईश्वरत्व की ओर जो यात्रा है आध्यात्मिक यात्रा ठाकुर ने अपने जीवन में उसको एग्जिंपलीफाई किया कम्युनिटी को एक लविंग एक प्रेम से भर के किस तरह से सभी लोग साथ में रह सकते हैं। इस कम्युनिटी एस्पेक्ट को मां शारदा देवी ने एग्ेंंपलीफाई किया है। और यह जो सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट है कि जहां पे जो शक्तिशाली है वो बाकी लोगों को सहाय करेंगे नहीं कि शोषण करेंगे। तो यह सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट और फिर उसमें और भी बहुत कुछ है। यह साइंस है, टेक्नोलॉजी है, फिलॉसोफी है, अंडरस्टैंडिंग विडम है, आर्ट्स, लिटरेचर, कल्चर है। ये जितने भी एस्पेक्ट ये तीन यूनिट के साथ में कनेक्टेड है। तो स्वामी जी ने यह एग्ेंंपलीफाई किया सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट को और फिर बा इन तीनों ने मिलकर के एज ए होल किस तरह से मनुष्य सभ्यता को उसका उत्थान किया जाए उसको हमको इन तीनों ने मिलकर के उपदेश दिया। तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में एक्चुअली देखिए कि ठाकुर को जो संदेश देना था उसका वन थर्ड संदेश ही दिया गया है। अभी तो उसका जो सेकंड एस्पेक्ट है कम्युनिटी एस्पेक्ट जो कि मां एग्जिंपलीफाई करने वाली थी। मां की लीला तो अभी प्रारंभ हुई ही नहीं है। ठाकुर के रहते रहते तो मां लज्जा पटावृता थी। इवन नरेंद्र के रहते रहते स्वामी जी के रहते-रहते भी मां ने प्रकाशय जाहिर में आकर के इतना वो दीक्षा देना भक्तों को आशीर्वाद देना इतना नहीं किया है। यानी कि अभी तो स्वामी जी को अपना संदेश देना बाकी था। उसके बाद में मां को अपना संदेश देना बाकी था। तो एक पूरा जो यूनिट है उसको तो अभी अनफोल्ड होना बाकी था श्री रामकृष्ण देव के उपदेश को। तो यह नहीं समझ के यह रामचंद्र दत्त जैसे लोगों ने सोचना शुरू कर दिया कि ठाकुर भले ही चाहे ठाकुर को अवतार कहते हो किंतु अवतार का अर्थ क्या है? अवतार का एक सिग्निफिकेंस क्या है? वह नहीं समझ करके अवतार को एक सामान्य गुरु की तरह ट्रीट कर रहे हैं और अपने को अवतार के शिष्य के रूप में प्रधान शिष्य के रूप में वह प्रोजेक्ट कर रहे हैं। ऐसा सब स्टार्ट हो गया। तो देखिए कि स्वामी जी को इस तरह का जो विरोध है उसके अगेंस्ट में जाकर के पूरा संघ का भविष्य उनको देखना था। तो यह सब डिस्कशन हमारा चल रहा था। अभी हम जहां पे आए हैं यह जो गंभीरानंद जी का सेंटेंस है। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज?

श्रीरामकृष्ण के जीवन और संदेश का अभिनवत्व बहुत कम लोग समझ पाए थे

आरो देखा जाए श्री श्री ठाकुर आगमनेर द्वारा जगत सुत कल्याण साधित तो होइबे ए विश्वास भक्त मात्रे रोई हृदय पूर्ण रूपे विराजितो थाकी ले ओ ताहार वाणी ते एमो एक अभिनव तो आ जा फले नवज सूत्रपात होइबे एवं से नवजग प्राची प्राचीने सहित आपनार अभिछद्ध संबंधो रखा कर ले ओ उहा प्राचनेर पुनरावत्ति बा अनुकृति मात्र ना होइया एक नवीन संस्कृति प्रेरणा आिया दीबे ओ विश्व मानव के समसूत्र गांधीबे ए रूप बुझवार मतो सुख दृष्टि छिलो अति ऑल्पो कोयक जोनेर एक एक सेंटेंस में पूरा पैराग्राफ आ गया और इस पैराग्राफ का आप अर्थ विस्तार करेंगे तो एक पूरा निबंध एक पूरा ऐसे आप रचना कर सकते हैं। क्या कहते हैं महाराज जी? गंभीरानंद जी महाराज कि और भी देख सकते हैं और इससे आगे भी देख सकते हैं कि ठाकुर के आगमन के द्वारा जगत का सुमहत कल्याण साधित होगा। यह विश्वास भक्तों के हृदय में पूर्ण रूप से विराज कर तो रहा था। यह जितने भी भक्त हैं इसमें चाहे गिरीश घोष हो, बलराम बसु हो, नाग महाशय हो यह फिर यह गुलाब मां हो, गोपाल मां हो, गौरी मां हो, योगेंद्र मां हो जो कोई भी हो मनोमोहन हो ना कि ये सुरेश मित्र हो ना कि ये फिर यह विजय कृष्ण गोस्वामी हो ना कि इवन केशव सेन हो। इन सभी को यह बात समझ में तो आ गई थी कि ठाकुर की जो महत्ता है वह बहुत उनकी समझ से बाहर में है और ठाकुर के आगमन के द्वारा जगत का सुमहत कल्याण साधित होगा। सुमहत कल्याण ये सब संस्कृत वर्ड्स महाराज ने यूज किए हैं। यह विश्वास उनके हृदय में पूर्ण रूप से विराज कर तो रहा था। किंतु ये किंतु क्या है? किंतु कि उनकी वाणी में एक अभिनवत्व है। ठाकुर की वाणी में एक अभिनवत्व है जिसके परिणाम स्वरूप एक नवयुग का सूत्रपात होगा और यह नवयुग प्राचीन युग जो था हमारा वैदिक संस्कृति का वैदिक युग उसके साथ में अपना एक अविच्छेद्य संबंध स्थापित करके तो रखेगा किंतु फिर भी वह प्राचीन युग की पुनरावृति या अनुकृति यानी कि नकल मात्र न रह के एक नवीन संस्कृति की प्रेरणा लाएगा और विश्व मानव को समसूत्र में बांधेगा। यह समझने की सूक्ष्म दृष्टि बड़े कम लोगों के भीतर में थी। एक ठाकुर आए हैं तो किंतु अभी क्या है कि ब्रिटिश राज तो भारत पर चल रहा है। भारत नाथ जात में बटा हुआ है। भारत इतने हजारों 1000 साल से गुलाम है। भारतीयों में किसी भी तरह की क्षमता नहीं है। अपनी रक्षा करने का एक वैदिक संस्कृति वैदिक युग था। वह पुराणों और धर्म पुस्तकों के भीतर में बंद होकर के रह गया है। तो यह एक दृढ़ मान्यता लोगों के मन में बैठ गई थी कि भारत अच्छा यह गुलाम है तो गुलाम ही तो रहेगा। भारतवासी जो बेहाल है तो बेहाल ही रहेंगे। वैदिक संस्कृति किताबों के भीतर में बंद है तो किताबों के भीतर में ही बंद रहेगी। कहां वो ऋषि मुनि यह मैत्रेई गार्गी जैसी यह जो ब्रह्म वेत्ताएं ये जो सब थी वो कहां से वो लोग फिर से पृथ्वी पर आने वाली है भारत देश में कहां यह वशिष्ठ व्यास वाल्मीकि जैसे ऋषि मुनि फिर से ईश्वरीय तत्व की नारायण का गुणगान गाने वाले हैं। कहां पे यह जो सब ऋषि मुनि भगवान बुद्ध ये चैतन्य महाप्रभु शंकराचार्य जैसे महान जो यह युग दृष्टा थे वह फिर से भारत की भूमि पर चलने वाले हैं। कहां यह सब होने वाला है? वो किताबों में था। किताबों में रहेगा। आज का भारत जैसे ब्रिटिश राज की चुंगल में फंसा हुआ है। जैसे ब्रिटिश लोग हमारा शोषण कर रहे हैं तो वैसा ही चलता रहेगा। तो एक नया भविष्य, एक नया सत्य युग प्रारंभ होगा। यह समझने की क्षमता ठाकुर के बड़े अल्प शिष्यों के भीतर में थी। और इसी वजह से जब नरेंद्र ने यह युग धर्म प्रवर्तन यह फिर से नया प्रारंभ किया तो कुछ-कुछ लोगों ने नरेंद्र का विरोध करना शुरू किया। कहा जैसे कि किस तरह से आप एक यंग मैन को उपदेश देते हैं। कहेंगे कि तो अपने घर में रहो। मां-पिताजी की सेवा करो। नौकरी करो। पहले तो उनका भरण पोषण कल्याण करो। फिर शादी करो और फिर बीवी बच्चे करो। और फिर बाद में जो कुछ टाइम होगा और धर्म कर्म करना। ऐसी एक जो दुनियादारी भरी सलाह हमको दी जाती है। मैं खुद मैं जब सन्यास लेने के लिए ठीक किया था। सन्यास तो नहीं किंतु मैं करियर नहीं बनाना है। एक सामान्य जीवन नहीं जीना है। ऐसा ठीक किया था और घर छोड़ने का प्रयास जब मैं कर रहा था उस समय मेरा एक मित्र मुझे मिलने के लिए आया। अभी यह मित्र मेरा बड़ा पुराना मित्र था। हम लोग साथ में पढ़ाई लिखाई करते थे। एक साथ में घूमते फिरते थे और काफी हमारा एक बंधुत्व था। किंतु वह एक बड़ा ही पक्का एक बिजनेसमैन फैमिली में वह जन्म ग्रहण किया था। बिजनेस फैमिली में और उसका फ्यूचर वही था कि अपना जो घर का जो बिजनेस है उसको आगे बढ़ाना है। तो वह आकर के मुझे कहता है कि अरे भाई तुम यह सब क्या पागलपन कर रहे हो? इस छोटी सी उम्र में 17 18 साल उम्र होगी उस समय मेरी बस उतनी ही होगी। उस इस उम्र में तुम क्या यह सब धर्म कर्म की बातें कर रहे हो। यह तो सब बूढ़े लोग करेंगे। धर्म की बातें तुम पहले तो ग्रेजुएशन करो। मां-पिताजी का संभाल रखो। परिवार को देखो। बाद में जब बूढ़े हो जाओगे तब तुम धर्म करना। तो ये सलाह जो कि एक प्रॉपर दुनिया माने यदि आप कहा जाए तो यह सलाह में गलत कुछ नहीं है। आप एक जो एक एस्टैब्लिश्ड पाथ है उससे आप भट आप एक नया रास्ता बनाने को जाएंगे तो प्रॉब्लम क्या होगा कि 90% लोग इस नए रास्ते में भटक जाते हैं और कहां अपने सर के ऊपर में बहुत सारी मुसीबत का ढग लाकर के खड़ा कर देते हैं। और फिर यही लोग अपने परिवारजनों के लिए बहुत एक बड़ा मुसीबत बन करके रह जाते हैं। तो देखिए क्राइम है यह सब कितने ही जगह एक क्रिमिनल है। वे लोग भी शायद ऐसा ही सोच के स्टार्ट किए होंगे कि एक रेगुलर कैरियर नहीं बनानी। किंतु रेगुलर कैरियर नहीं बनानी बोल के वो लोग साधु तो नहीं हो गए। क्रिमिनल हो गए हैं। तो मेरा भविष्य क्या होगा? किसको पता? यहां पर नरेंद्र का भविष्य क्या होगा? किसको पता? ऑलरेडी पिताजी के मृत्यु के बाद में नरेंद्र जिस तरह से जिस कुछ लोगों का संग करना प्रारंभ कर दिया था नरेंद्र का वही पक्का बंधु जिस तरह से मेरे मित्र ने आकर के मुझे ऐसी सब सलाह दे रहा था वो जो भवनाथ ठाकुर के पास में जाकर के रोते-रोते कहता है कि हमको हमको कभी यह अंदाजा नहीं था कि नरेंद्र जैसा नरेंद्र इस गलत कुसंस्कार और कुसंग में पड़कर के अपना जीवन नष्ट करेगा इस तरह तो ठाकुर ने पहले तो कुछ बोला नहीं किंतु जब बार-बार इस तरह की बातें चलने लगी तो ठाकुर ने डांट करके उसको कहा कि तुम चुप करो इस तरह की बातें मेरे सामने मत करो तो क्या क्योंकि ठाकुर को पता है कि नरेंद्र के हृदय में क्या था तो जो भी है इस तरह की सलाह जब कोई वृद्ध प्रवीण व्यक्ति हमको देता है या हमारे मित्र देते हैं उसमें गलत कुछ नहीं है उनको ऐसा ही लगता है कि यह करेगा क्या यदि संसार नहीं करेगा तो क्या वह रास्ता भटक जाएगा पागल हो जाएगा क्रिमिनल हो जाएगा। पता नहीं कब से क्या से क्या ना कर दे यह तो उन लोगों को यह सब डर लगता है। किंतु देखिए कि जब इस तरह से कोई बातें करता है। अभी मेरा मित्र मुझे बता रहा है। चलो उसका तो अज्ञान था। किंतु यही रामचंद्र दत्त यही जो सब ठाकुर के प्रवीण भक्त थे। उन लोगों ने जिस तरह से स्वामी जी के पीछे में लगना शुरू किया तो उन पगलों को समझ में नहीं आया कि जिनको वह नारायण का अवतार स्वयं गिनते हैं उनके प्रधान शिष्य यह स्वामी जी इसका ये क्या कोई रास्ता भटक करके कोई उल्टा पुल्टा थोड़ी ना कर सकते हैं। वह थोड़ी ना अपना जीवन फेंक दे सकते हैं। तो यह उनको समझ में नहीं आया। दूसरा एक समझ में नहीं आया कि नारायण के साथ में उनकी जो धर्मपत्नी या तो उनके साथ में जो शक्ति का अवतरण होता है वह नारायणी स्वयं है। जगदंबा जगत जननी स्वयं है। तो यह बात भी इन लोगों को समझ में नहीं आई। यानी कि ठाकुर का जो पूरा मिशन अनफोल्ड होने वाला था। ठाकुर ने तो सिर्फ वन थर्ड करके गए थे। उसका टू थर्ड स्वामी जी और मां को करना था। तो स्वामी जी और मां का क्या उद्देश्य है? ठाकुर के मिशन में उनका क्या रोल है? उनका क्या प्रभाव और महत्ता होने वाला है? यह यह जो कुछ-कछ लोग थे उस पूरा मामले को समझ ही नहीं पाए। इसलिए बाद में देखेंगे कि यह जो अंतरंग बहिरंग यह जो डिवीजन हुए हैं, वह सिर्फ ठाकुर के कैंसर के समय नहीं हुए। इस तरह के डिवीजन सतत होते आ रहे हैं। ठाकुर के कैंसर के समय भी डिवीजन हुए। अंतरंग और बहिरंग। उस समय जो ठाकुर के अंतरंग थे उनके भीतर में फिर से डिवीजन होना शुरू हुआ। जो लोग स्वामी जी के साथ में और मां के साथ में खड़े थे उन लोगों का एक हो गया ग्रुप और स्वामी जी और मां से अलग होकर के जो अपने को खुद को गुरु बनाकर के एक गादी बना के लेकर के गादीपति के रूप में अपना जो घोषणा कर रहे थे उनका एक ग्रुप हो गया। तो यह अंतरंग बहिरंग डिवीजन इस तरह से कई बार अपने संग में हुआ है। स्वामी जी की महासमाधि के बाद में भी हुआ और फिर यह जो राजा महाराज की महासमाधि के बाद में भी हुआ था शरद महाराज की महासमाधि के बाद में। तो यह सब सब समय के लिए हमारे मन में यह हमारे सामने यह टेस्ट आता रहता है कि यह जो प्रॉपर ठाकुर की परंपरा है गुरु परंपरा ठाकुर का यह जो धर्म चक्र प्रवर्तन है उसको फॉलो कर रहे हैं। उसको हम समझ रहे हैं कि नहीं समझ रहे हैं ना कि फिर हम अपना खुद का एक सेपरेट एक इंटरप्रिटेशन ठाकुर मां स्वामी जी के यह मिशन के ऊपर में बिठा रहे हैं। तो यहां पे भी इस तरह से समझने की सूक्ष्म दृष्टि बहुत ही अल्प लोगों के भीतर में थी। तो यह एक हो गया। दूसरा देखिए इस सेंटेंस के भीतर में गंभीरानंद जी महाराज और भी एक बात करते हैं कि उनकी वाणी में एक इस तरह का अभिनवत्व है जिसके परिणाम स्वरूप फल स्वरूप नवयुग का सूत्रपात होगा। परंतु यह नवयुग का जो डेफिनेशन देने के समय महाराज जी एक बात बड़ी क्लियर करते हैं कि यह जो प्राचीन युग था, सत्य युग था, भारतीय सनातन धर्म संस्कृति थी, इसके साथ में वह अपना अविछेद्य संबंध रक्षा करेगा। ऐसा नहीं है कि बुद्धिज्म ने जिस तरह से एक अलग ही डायरेक्शन में अपने सनातन धर्म को ले जाने का प्रयास किया। रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा रामकृष्ण शारदा विवेकानंद भावधारा इस तरह का कोई नया प्रयास नहीं करेगी। सनातन हिंदू धर्म के भीतर में ही रहकर के हमको एक अभिनव संदेश देना है। इसलिए सनातन अभिनव संस्कृति के साथ में अविच्छेद्य संपर्क संबंध रक्षा करके भी उस प्राचीन संस्कृति की ना पुनरावृत्ति होगी ना अनुकृति होगी। अर्थात कि उसको रिपीट भी नहीं किया जाएगा। उसका क्लोनिंग भी नहीं किया जाएगा। उसकी नकल भी नहीं की जाएगी। यह जो सनातन जो भारत में हमेशा से ऐसा होता आ रहा है। जब भी कोई सोचता है कि अच्छा भारत की परिस्थिति आज अच्छी नहीं है तो चलो कुछ नया प्रारंभ किया जाए। तो यह ब्रह्मो समाज है। इस तरह की कुछ कुछ ये थियोसोफिकल सोसाइटीज है। उन लोगों ने क्या सोच लिया कि पुरानी हिंदू संस्कृति को ही तोड़फोड़ करके उसको तहसनहस करके ये क्रिश्चियनिटी या इस्लाम ना कि ऐसा कुछ आधार बना करके नया कुछ प्रारंभ किया जाए। उस समय भी भगवान बुद्ध के समय भी बुद्ध ने तो नहीं किंतु उनके जो शिष्य थे उन्होंने यह ठीक कर लिया कि हिंदू सनातन धर्म है उसमें यह बलि प्रथा है जाति प्रथा है यह जो सब यह दूषण है दुर्गुण है उसको हटाने के लिए एक नया ही धर्म प्रारंभ किया जाए किंतु यह भारत की मिट्टी ही ऐसी है कि सनातन हिंदू संस्कृति को छोड़कर के और कुछ ज्यादा समय तक टिकने वाला नहीं तो बुद्धिज्म भी भारत में से चला गया। यह जो बात बाद बात बाद बात बादबाद की यह जो रिफॉर्म सोसाइटीज थी स्वामी जी के समय की वेल वह भी चली गई। वही हिंदू सनातन संस्कृति के भीतर में जिनजिन नई मूवमेंट्स ने जन्म लिया है वे टिक गई। अभी रामकृष्ण मूवमेंट जो है वो हिंदू सनातन संस्कृति के साथ में अविछेद्य रूप से जुड़ी तो है किंतु साथ-साथ में ही वो उसकी अनुकृति या पुनरावृत्ति नहीं है। युग के अनुसार उसका एक अभिनव संदेश है और अभिनव संदेश क्या है? वह तो देखा ही मनुष्य कम्युनिटी और सिविलाइजेशन। इंडिविजुअल कम्युनिटी और सिविलाइजेशन तीन लेवल पे मनुष्य को पुनः जागृत करना है। इंडिविजुअल लेवल पे यह जितनी भी ये विभिन्न साधन पद्धतियां थी, विभिन्न स्कूल्स थी, वेदांत की विभिन्न शाखाएं थी, सबका समन्वय ठाकुर ने किया। यह ज्ञान योग हो, कर्म योग हो, भक्ति योग हो ना कि राजयोग हो, इन सब के भीतर में कोई विरोधाभास नहीं है। एक ही साधक चारों योगों का एक साथ में अनुष्ठान करके ईश्वर तत्व या तो आत्म तत्व प्राप्त कर सकता है। तो वो एक अभिनव संदेश इंडिविजुअल लेवल पर कम्युनिटी लेवल पर प्रेम भोबासा मां का जीवन देखिए। किस तरह से पागली मामी यह अपने परिवार जनों के साथ में रहती थी और स्वामी जी का सिविलाइजेशनल जो अंडरस्टैंडिंग है तो यह जो अभिनवत्व भी है इसके भीतर में और पर प्राचीन सनातन संस्कृति के साथ में एक अविछेद्य संबंध भी है। तो यह दोनों को मेंटेन करके ठाकुर का नया भाव नए युग में प्रचार होने वाला है। अनफॉर्चूनेटली बहुत कम उस समय ठाकुर के शिष्य थे जिनको कि यह अभिनवत्व एक रेवोल्यूशनरी रेडिकल जो इंटरप्रिटेशन था या तो फिर ऐसा कहेंगे कि भावधारा थी उसको अल्प लोगों को ही समझती जोन को एक भाग्यवान मात्र इहार आभास पया छिले एवं तदोपेक्षा अल्पोत को एक जने इहार वास्तव रूपयाने जीवन पात करते प्रस्तुत तो कुछ कुछ अल्प लोग ही भाग्यवान लोग ही उसको उनको इसका आभास मिला था और जिसको आभास मिला था उसमें भी सिर्फ कुछ ही लोग थे जो कि इसके वास्तविककरण करने के लिए अपना जीवन बलिदान करने के लिए प्रस्तुत थे। ठाकुर का, स्वामी जी का और मां का यह भविष्य में जो उनका संदेश है किस तरह से अनफोल्ड होने वाला है इसका आभास कुछ ही लोगों को मिला था और जो कुछ लोगों को आभास मिला था उसमें कुछ ही लोग थे जो कि अपना जीवन बलिदान करने के लिए तैयार थे इस श्री रामकृष्ण भावधारा रूपी वेदी के सामने बला बाहुल लो ए शेषोक्त दोलेर अग्रणी छिले नरेंद्रनाथ एवं तारे स्वीकृति होते पावा जाए श्री माओ ए शधान जानते बोलिया तार समस्त शक्ति लया सुय जुबो को संतान दे पश्चाते दणया छिलेन अभी कहने की जरूरत नहीं है कि जो कुछ लोग अल्प लोग भाग्यवान लोग जिनको कि ठाकुर का संदेश का अभिनवत्व क्या है भविष्य में इसका क्या प्रभाव होने वाला है इसका जो अल्प लोगों को समझ में आया था उस दल के उस अल्प लोगों के अग्रणी थे नरेंद्रनाथ और नरेंद्रनाथ की स्वीकृति से हमको जानने को मिलता है कि श्री मां शारदा देवी को भी इस बात का पता था इस सत्य का संधान था और इसीलिए वह अपनी समस्त शक्ति लेकर के अपने युवक संतानों के पीछे में खड़ी थी। अपने युवक संतानों को भरोसा देने के लिए खड़ी थी। देखिए यह कितना सुंदर स्टेटमेंट है। शक्ति स्वयं अपनी समस्त शक्ति लेकर के उपस्थित थी इन संतानों की रक्षा करने के लिए। जगत जननी जो शक्ति स्वरूपिणी है जो शक्ति स्वयं है वो अपनी समग्र शक्ति लेकर के यदि कुछ युवक संतानों के पीछे में खड़ी हो तो उन लोगों का रास्ता और कौन रोकने वाला है?

कहानी : माँ सारदा ने त्यागी शिष्यों के आहार और आश्रय के लिए ठाकुर से प्रार्थना की

त एक समय ठाकुर निकट प्रार्थना करिया छिले अभी वह फेमस कहानी कि मां ने ठाकुर के पास में प्रार्थना की थी क्या की थी ठाकुर तुम एले ए को कोई के लिए लीला कोरे आनंद के चले गले और ओमनीशप शेष होए गो मां ने ठाकुर के पास में प्रार्थना करके क्या कहा था कि ठाकुर तुम आए यह कुछ लोगों को लेकर के लीला करके आनंद करके चले गए और आपके जाने के साथ में ही सब कुछ क्या शेष हो गया समाप्त हो गया ता होले आर ए तो कोष्टो कोरे आशार की द्वरकार छिलो यदि सब समाप्त ही हो जाने वाला था तो इतना कष्ट करके आने की क्या आवश्यकता थी नरदेह धारण करके तपस्या करने की क्या आवश्यकता थी उस पागल आदमी के पैरों की आघात सहन करने की क्या आवश्यकता थी काशी वृंदावन देखे छ अनेक साधु भिख कोरे खाए आर गाछ तलाए घरे घरे बेड़ाए काशी वृंदावन में देखा है बहुत सारे साधु हैं भिक्षा करके खाते हैं और पैरों के पेड़ों की छांव में वह रहते हैं और पेड़ों की छांव में वह घूमतेघूमते चलते रहते हैं से रकम साधु तो अभाव नहीं इस तरह के साधुओं का तो अभाव नहीं है तुम्हार नाम कोरे शप छेड़े बेरिए हमार छेलेरा जे दुटी अन्य जन घरेघरे बेड़ावे ता आ देखते पारबो ना तुम्हारा नाम करके जिन्होंने समस्त अपना परिवार अपना स्वजन सब कुछ छोड़कर के घर छोड़कर के निकल कर के जो लड़के आए हैं वह दो रोटी दो मुट्ठी अन्न प्राप्त करने के लिए भिक्षा मांगते मांगते घूमते रहते हैं वो मैं देख नहीं पाओगी अमार प्रार्थना तुम्हार नाम में जारा बेरुबे तादेर मोटा भात का पड़े अभाव जनो ना होए मेरी प्रार्थना है तुम्हारा नाम लेकर के जिन्होंने घरत्या त्याग किया है, जिन्होंने घर छोड़ा है, उनको एक सामान्य रोटी, कपड़ा और रोटी और कपड़े का अभाव जैसे कि ना हो और शब्द तोमा के आर तो भाव उपदेश एकत्र थाकबे और ए संसार ताप दगध लोकेरा तादेर का ऐसे तो कथा सुने शांति पावे वो तुम्हारा नाम लेकर के तुम्हारा भाव लेकर के और तुम्हारा उपदेश उपदेश लेकर के साथ में रहे और इस संसार ताप दग्ध संसार रूपी ताप से जो लोग दग्ध हो गए हैं जल गए हैं इस तरह के लोग इनके पास में आएंगे और तुम्हारी वाणी का श्रवण करके उनका हृदय शीतल होगा यह लोग शांति प्राप्त करें ए जन नहीं तो तुम तो आशा इसीलिए तो तुम्हारा आना हुआ है ओ देर घरे घरे बेड़ानो देखे हमार प्राण आकुल होए उठे। यह लोग जो घूम घूमते घूमते भटकते रहते हैं चारों ओर यह देखकर के मेरा प्राण आकुल हो रहा है। मेरा प्राण व्यथित हो रहा है। अवश्य ए प्रार्थना उच्चारित होया छिलो 1890 ख्रिस्ताब्दे किंतु अंतर्निहित भावोटी सर्वदा सर्वोकालीन बोलिया हमरा एक ने उ्रत करिला यह जो प्रार्थना है मां ने करी की थी 1990 में हमको पता है कि वराह नगर मठ की स्थापना ठाकुर की महासमाधि के 2 महीने के भीतर में ही हो गई थी 1886 में ही हो गई थी किंतु हमको पता है कि किस तरह से एक के बाद एक जो मठ के जो रसददार थे खास करके यह सुरन बाबू और यह बलराम बाबू इनकी समाधि के बाद में उनके देहत्याग के बाद में मठ का जो भरण पोषण करने वाला ऐसा कोई रहा नहीं था। मास्टर महाशय और गिरीश घोष थे। किंतु वे लोग इतने धने नहीं थे जितने कि यह सुरेंद्र बाबू और यह बलराम बाबू थे। तो मठ में प्रायः खानेपीने का अभाव होने लगा और फिर नरेंद्र ने सबको यह कह पहले तो वराह नगर मठ के दो फेज आप देखेंगे एक तो कि वराह नगर मठ के ये जो दो पृष्ठ पोषक थे यह जो रसददार ठाकुर की लैंग्वेज में यह जो दो रसददार जब तक थे तब तक तो वराह नगर मठ बड़ा सुख पूर्वक चला। अभी सुख पूर्वक यानी कि उस समय की डेफिनेशन के अनुसार प्रचंड साधना प्रचंड तपस्या में चला था। किंतु फिर भी एक जो एक आखिरी घड़ी तक यह जो बात आ जाए कि अभी खाना नहीं ही मिल रहा है। अब क्या करें? तो ऐसा नहीं था। कैसे भी करके खाने रहने का पीने का जुगाड़ तो हो जाता था। तो वह एक पीरियड था जबकि नरेंद्र सबको कहता था कि आप लोग सब इकट्ठा होकर के रहिए। गुरु भाइयों को कहता था और कहता था कि मैं मुझे ठाकुर ने कहा है कि सभी को साथ में इकट्ठा करके रखना है। यानी कि नरेंद्र स्वयं स्वामी विवेकानंद स्वयं बीच-बीच में यह नॉर्थ इंडिया पिलगिरी मैच के लिए जाते थे। किंतु वह वापस आ जाते थे और अपने गुरु भाइयों को भी कहते थे कि तुम लोग सभी मठ में इकट्ठा होकर के रहो। किंतु फिर जब यह सुरेंद्र बाबू और यह बलराम बाबू दोनों का एक साथ में ही कुछ ही समय के अंतर में जब निधन हुआ इसके बाद में जब मठ में जब एक फाइनेंशियल क्राइसिस प्रकट हुआ आर्थिक तंगी प्रारंभ हुई उस समय फिर स्वामी जी ने एक्टिवली अपने गुरु भाइयों को एनकरेज करना शुरू किया कि हां अभी आप लोग मठ त्याग करके धीरे-धीरे करके विभिन्न जगहों पर तीर्थ क्षेत्रों में जाकर जाकर के तपस्या करने का प्रयास कीजिए। यह तपस्या कीजिए। देखिए इंटरेस्टिंगली स्वामी जी ने उस समय प्रमदादास मित्र को एक पत्र लिखा था। एक जो फाइनल एक एफर्ट करने के लिए कि मठ बना रहे। तो यह फाइनल एफर्ट करने के लिए स्वामी जी ने प्रमदादास को मित्र प्रमदादास मित्र काशी के जो वो पंडित थे जिनके साथ में स्वामी जी का वह पत्र व्यवहार चलता रहता था। तो उनको स्वामी जी ने एक लेटर लिखा। बड़े विस्तृत रूप से लिखा कहा कि देखिए ठाकुर आए थे जगत का कल्याण करने के लिए एक अभिनव संदेश लेकर के और हम चाहते हैं कि ठाकुर के नाम से एक मठ की स्थापना हो जहां पर भी यह जो युवा साधु आते हैं सन्यास ग्रहण करेंगे आध्यात्मिक चिंतन मनन ये ट्रेनिंग प्राप्त करेंगे शिक्षा प्राप्त करेंगे ठाकुर के उपदेश के अनुसार अपना जीवन का गढ़तर करेंगे इस तरह का एक मठ हम चाहते हैं। बंगाल में उनकी जन्मभूमि में गंगा के किनारे स्थापित हो और हम ठाकुर के जो अस्थि है उनकी वहां पर नियमित पूजा अर्चना हो और यह वेद वेदांत उपनिषद सनातन हिंदू संस्कृति की नियमित रूप से वहां पर चर्चा हो और वहां से ही यह पूरे विश्व में यह प्रीचर्स जो है यह धर्म उपदेशक वो वो वहां से जाकर के ठाकुर का और यह सनातन हिंदू संस्कृति का संदेश संदेश प्रसार करें। तो किंतु इस अभी ये स्वामी जी अपने पत्र में लिख रहे हैं पूरा डिस्क्रिप्शन। किंतु प्रॉब्लम यह है कि यह जो बंगाली लोगों के जो यह अवस्था है यह बातें करने में तो बड़े माहिर है किंतु इस तरह का किसी भी प्रतिष्ठान खड़ा करने के लिए जो आर्थिक सहाय देनी होती है उसमें यह लोग पीछे हट जाते हैं तो आप एक हमारे अभी एक दाता है पृष्ठपोषक है। आपकी शरण में हम हैं। आप यदि चाहे तो यह काशी के और वहां के आसपास के कुछ धनी लोगों का संपर्क करके कुछ धन इकट्ठा कीजिए और हमको दीजिए तो फिर हम लोग जो है इस तरह से कुछ प्रारंभ करें और उस समय हुआ ऐसा था कि सुरेंद्र बाबू मृत्यु से पहले मठ को ₹1000 कुछ देकर के गए थे। किंतु स्वामी जी पत्र में लिखते हैं कि देखिए कि इस तरह से ₹1000 से तो कुछ होने वाला नहीं है। यदि हमको जमीन ही खरीदनी है गंगा के किनारे ना कि कोई अच्छी जगह तो 4 5000 से कम में तो जमीन ही नहीं आएगी। उसके बाद में मंदिर का निर्माण नियमित सेवा के लिए जो परमानेंट फंड खड़ा करना है वह सब तो बाद की बातें हैं। तो आप ही हमारे भरोसा दाता है। ऐसा करके स्वामी जी ने एक लास्ट डीच एफर्ट लगा दिया था कि मठ को उठाना ना पड़े। मठ चलता रहे। किंतु प्रमदाद बाबू ने जो एक उसका रिप्लाई दिया वह रिप्लाई तो अभी हमारे पास में नहीं है। किंतु रिप्लाई में उन्होंने किसी भी तरह का स्वामी जी की जो यह रिक्वेस्ट थी उसका किसी भी तरह का उत्तर नहीं दिया। उसके ऊपर में ठंडा पानी डाल दिया। जो भी है तो स्वामी जी ने उसके उत्तर में लिखा कि आपकी बात भी ठीक है। अभी हम सभी साधु सन्यासी हैं। हम विभिन्न जगहों पर फैल रहे हैं। इस अर्थ में कि एक जगह पर रहने के लिए हमारे पास में आर्थिक यह जो आवश्यकताएं जो होती है वह पूर्ण करने के लिए आर्थिक माध्यम नहीं है। कोई फाइनेंशियल सिक्योरिटी नहीं है। इसलिए हम सभी लोग प्रवरज्या के लिए निकल रहे हैं। तो वह स्वामी जी ने इस पत्र के उत्तर में लिखा था। तो देखिए कि यह वराह नगर मठ में पहले तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में एक क्राइसिस था कि यह त्यागी संतान लोग कैसे रहेंगे कहां रहेंगे इकट्ठा हो सके रहेंगे कि नहीं रह पाएंगे कि भी नहीं वो जो प्रश्नार्थ चिन्ह उस समय थे तो इसी तरह के प्रश्नार्थ चिन्ह यह 19 1890 के समय में भी थे उस समय स्वामी जी ने स्वयं और यह तो एक बात थी यह जो प्रवरज्या करने के लिए निकल रहे थे तो एक आर्थिक संकट जो था फाइनेंशियल क्राइसिस वह तो एक था मठ के सामने दूसरा है कि सन्यासी के अंतर की जो एक आह्वान होती एक अंतर का एक जो एक आकर्षण होता है एक खुला आसमान खुला मैदान खुली जमीन ये खुली धरती ये वन है यह नदी है समुंदर है पर्वत है इसके प्रति वेरान में जाकर के तपस्या करने की एक जो सन्यासी के अंतर की एक जो वासना होती है एक जो अनंत का आह्वान जो होता है वह भी एक कारणभूत था। तो दोनों ने मिलकर के आर्थिक संकट और यह अनंत का आह्वान दोनों ने मिलकर के मठ के जो भी यह त्यागी संतान थे उनको पूरी पृथ्वी पर बिखेर दिया। तो उस समय मां ने किंतु यह प्रार्थना की थी। तो गंभीरानंद जी यहां पर लिखते हैं कि मां की यह जो सुंदर प्रार्थना है भले ही चाहे उन्होंने 1890 में की थी किंतु यह 1886 1886 में भी उतनी ही रिलेवेंट है जितनी यह 1890 में थी और यह कितनी सुंदर प्रार्थना है कि तुम आए यह सब लीला की और फिर सबको इतना आनंद दिया सबको एक स्नेह के सूत्र में बांधा और फिर तुम चले गए तो फिर तुम्हारे आने का अर्थ क्या था अवतार जब जन्म ग्रहण करते हैं, पृथ्वी पर अवतरण करते हैं, तो उनकी यह जो भावधारा है, वह तो हजारों हजारों साल तक चलनी ही चाहिए। यदि आपको यह लोगों को ठगना ही था सन्यास का नाम लेकर के त्याग का नाम लेकर के ईश्वर प्राप्ति का नाम लेकर के उनको अपने घर में से निकालना ही था तो फिर आपको तो उनकी व्यवस्था भी करनी है। उनके रहने का खाने का कुछ ये भी करना है, जुगाड़ करना है। वरना तुम्हारा नाम लेकर के यह लोग घर बार छोड़ के आ तो गए। अभी ये तुम ही उनको छोड़ दोगे। मध्य समुद्र में। यह तो ऐसा हो गया कि ठाकुर कहते हैं कि सन्यास कौन सही-सही ग्रहण कर सकता है? सन्यास का आध्यात्मिक यात्रा करने का अधिकारी कौन है? ठाकुर पूछते हैं। फिर यह उत्तर भी वही देते हैं। यह खिजोर का जो पेड़ होता है, उसके ऊपर में से यह लंबा पेड़ होता है उसका। तो उसके ऊपर में से दोनों हाथ छोड़कर के जो जंप लगा सकता है, वही आध्यात्मिक जीवन का पूर्ण अधिकारी है। इस अर्थ में कि आपको एक लीप ऑफ फेथ लेना होगा। ईश्वर पर भरोसा करके आपको अंधेरे में जंप लगाना होगा। अंधे कुएं में अंधी खाई में जंप लगाना होगा। और आपको यह विश्वास करना होगा कि यह भगवान आपको आधे रास्ते में ही हवा में ही जैसे पकड़ ले और आपको आकाश की ओर उड़ते-उड़ते ले जाए। यह तो फिर क्योंकि क्या है कि देखिए यह जो एक अंधा विश्वास गुरु के ऊपर में नहीं रहता है कि गुरु मेरी रक्षा करेंगे इष्ट मेरी रक्षा करेंगे तो हम लोग क्या करेंगे तो वो जैसे कि वो इंग्लिश कहावत है कि हैव द फेथ इन गॉड बट कीप योर पाउडर ड्राई अर्थात कि यह जो जहाज लेकर के यह जो सब खलासी लोग जाते थे ये ये कैप्टन वगैरह जो जाते थे उस समय ब्रिटेन के तो अभी यह समुंदर यात्रा इतनी भयानक है कि ईश्वर पर भरोसा किए बिना तो आप समुद्र यात्रा कर ही नहीं सकते। तो वह तो है कि की कि हैव द फेथ इन गॉड। किंतु साथ-साथ में ही ये जो ये जो ये होता है ना पायरेट्स पायरेट्स लोग कभी भी अटैक कर सकते हैं। उस समय तो पायरेसी ही बहुत चलता था। अभी भी चलता है वैसे किंतु उस समय भी चलता था। तो उसके लिए जब पायरेट अटैक करते हैं तो आपके पास में बंदूक उनको बंदूक से गोली मारने के लिए जो गन पाउडर होता है वो गन पाउडर यह लोग साथ में रख के चलते थे यह जहाज के ऊपर में और यह गन पाउडर को ड्राई रखना पड़ता था। यह समुंदर की डैंप वेदर है बीच-बीच में यह जो समुंदर का पानी यह जो जहाज के ऊपर में धस करके आते हैं तरंग उन सबसे गन पाउडर को बचा के रखना है। गन पाउडर थोड़ा भी डैंप हो गया तो वह शूट नहीं कर पाएंगे। ना ही आप तोप फोड़ पाएंगे ना ही बंदूक में से गोली निकलेगी। यानी कि गन पाउडर को आपको ड्राई रखना है। तो तभी आप उसमें से गोली छोड़ पाएंगे। शूटिंग कर पाएंगे। यह कैनन छोड़ पाएंगे उससे। तो हैव द फेथ इन गॉड बट द कीप योर पाउडर ड्राई। ईश्वर के ऊपर में भरोसा भी रखो। साथ-साथ में यह गन पाउडर है उसको ड्राई रखो। इसके बिना आपका काम नहीं चलने वाला। किंतु यहां पर है यदि आप सही-सही आध्यात्मिक होना चाहते हैं तो हैव द फेथ इन गॉड एंड फॉरगेट द गन पाउडर। किसी भी तरह का गन पाउडर लेकर के समुद्र यात्रा नहीं करनी। ईश्वर पर भरोसा करके ही यात्रा करनी है। चाहे वह तूफान आए, चाहे सुनामी आए, चाहे पायरेट्स का अटैक हो, चाहे कुछ भी हो जाए। ईश्वर ही एकमात्र रक्षा करता है, यह भरोसा यदि होता है, तभी इस यात्रा में आगे बढ़िए। वरना तो अपने घर में ही रहिए। तो ठाकुर ने यह सब उपदेश तो 1000 दे दिए। किंतु फिर जब ठाकुर का नाम लेकर के यह लड़के लोग जब घर छोड़कर के आ गए तो फिर ठाकुर यदि अपना प्रॉमिस नहीं निभाएंगे। ठाकुर कहेंगे कि मध्य समुंदर में आपकी नौका आ गई है। अभी यहां से सुनामी आ रही है। यहां से पायरेट्स आ रहे हैं। सर के ऊपर में भयानक वो धोधमार बारिश हो रही है। और मैं तुम्हारी रक्षा नहीं करूंगा। जो तुम हो चाहे अपना तुम अपनेप से संभाल लो तो फिर तो यह लड़के लोग बेचारे कहां जाएंगे तो इसलिए मां कहती है कि तुमने आया तुम आए यह सब लीला की ये सब लोगों को इकट्ठा किया अभी तुम यदि इनके सामान्य रोटी कपड़ा मकान की व्यवस्था नहीं करोगे तो यह लोग बेचारे भिक्षा करतेकरते गांवगांव शहर शहर जो भटकते रहेंगे तो वह मैं देख नहीं पाऊंगी तुम कैसे भी तरह से उनके लिए रहने की जगह खाने खाने के लिए सामान्य राइस चावल उसका व्यवस्था और पहनने के लिए सामान्य कपड़ों की व्यवस्था अवश्य करो। तो यह प्रार्थना माने वह जो बराह नगर मठ की यानी कि रामकृष्ण संघ की रामकृष्ण मठ की वह जो सेकंड क्राइसिस थी मठ प्रारंभ होने के समय भी क्राइसिस था कि मठ के लिए कौन पैसा देगा और उन 1890 में भी 1890 में भी यह जो सुरेंद्र बाबू बलराम बाबू चलबसे उसके समय की जो क्राइसिस है उस क्राइसिस के समय मां ने यह बात कही थी। किंतु यह बात यह दोनों क्राइसिस को अप्लाई होती है। बोलकर के महाराज जी कहते हैं कि मां की इस प्रार्थना को उसका जो भाव है वह सर्वकालीन है। हमेशा के लिए यह भाव बना रहेगा बोलकर के इस प्रार्थना को उन्होंने यहां पर ही रेफर किया। अच्छा। तो ये गंभीरानंद जी का जो पूरा एनालिसिस है। यहां पर समाप्त होता है। उसके बाद में कुछ-कुछ कहानियां है। यह कहानियां क्या है? वह अभी हम इसकी नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: मां शारदा ने 1890 में ठाकुर से आहार और आश्रय के लिए प्रार्थना की थी, लेकिन यह प्रार्थना पूरी होने में कितना लम्बा समय लगा था। यहाँ तक की स्वामीजी के निधन के बाद भी बेलूर मठ में हमारे साधुओं और मद्रास में शशी महाराज को बहुत कष्ट सहना पड़ा था। अर्थात प्रार्थना के पुरण के लिए लंबी धीरज रखनी पड़ती है.

नहीं यहां पे दूसरा प्रॉब्लम क्या है पता है? अपनी एंबिशन भी तो साथ-साथ में बढ़ रही है। अभी देखिए यदि मां की प्रार्थना को आप एस सच गिने माने एक लिमिटेड दृष्टि से कि ये जो 16 डायरेक्ट डिसाइपल थे और उस समय ये वीरानंद जी वगैरह जो चारप लोग आना शुरू हुए थे नए-नए अभी उनके लिए तो कुछ ही समय के बाद में विदिन टू थ्री इयर्स आलम बाजार मठ बन गया था और वहां पे इस तरह का जो फाइनेंशियल क्राइसिस कंटीन्यूअस चला ऐसा तो नहीं है। आलम बाजार मठ ठीक ठीक ही चल रहा था और फिर स्वामी जी आए तो बेलूर मठ की स्थापना हो गई तो वो तो अपना एक मां की प्रार्थना वहीं पर प्रतिफलित हो जाती है। हमारा प्रॉब्लम है कि एंबिशन इतना है कि पूरे जगत में मठ स्थापना है। अभी आप कहिए ये जो गैर फायदा उठाना या एडवांटेज उठाना मां की प्रार्थना का वो हम लोग कर रहे हैं ना। इसलिए तो प्रॉब्लम आता है। आप बेलूर मठ में बैठे रहते तो कोई दिक्कत नहीं था। अब चेन्नई जाकर मठ खोल रहे हैं। फिर कहते हैं कि हमको तकलीफ हो रही है। यह तो किसका गलती है बताइए? यह तो मां की प्रार्थना का वह डिसएडवांटेज लेना हो गया ना। अभी चाइना में जाकर मठ चालू करना है। अभी बताइए अब क्या करेंगे? मां भी बेचारी सोचती होगी। मैंने इतना लंबा तो सोचा मैंने भी नहीं था। ना एक्चुअली जॉब किया है। वरा नगर मठ की जब अवस्था खराब थी तो शशि महाराज पास की एक स्कूल में जाकर के टीचर का वो नौकरी कर रहे थे। भरण पोषण करने के लिए मटका मैंने सब ट्राई कर लिया है।

प्रश्न: प्रार्थना को साकार करने के लिए, हमें ईश्वर में विश्वास रखना होगा और किसी भी शॉर्टकट का सहारा नहीं लेना होगा।

ऑफकोर्स कि पत्थर नहीं उठाना है। और ठाकुर की फेमस कहानी के अनुसार वो धोबी के वस्त्र के ऊपर में पैर रख के जा रहा है। तो धोबी लोग मारने को आए। तो इतना पक्का भक्त था भगवान का कि भगवान को उसकी रक्षा करने के लिए अपना वो वैुंठ धाम छोड़कर के निकलना पड़ा। माने वह अपना धाम छोड़कर के भगवान को निकलने के लिए मजबूर कर रहा। इतना भक्ति तो उसका था। किंतु इतना नहीं था कि वह भगवान एक्चुअली आकर के उसको हेल्प करें। बीच में ही उसने पत्थर उठा लिया। माने कि उसकी भक्ति अधूरी रह गई। माने ही इस सामान्य आदमी से तो वह बहुत ही ऊपर उठा है। यह तो बात पक्की है। किंतु उसकी भक्ति इतनी भी नहीं है कि वो मतलब उसके लॉजिकल कंक्लूजन तक ले जाए। राइट? तो इसीलिए देखिए कि ये जो हम एनालिसिस कर रहे हैं रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का और भावधारा का कि तीन एस्पेक्ट में यह बटा हुआ है। एक तो सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट है, कम्युनिटी एस्पेक्ट है, इंडिविजुअल एस्पेक्ट है। ये तीनों एक दूसरे के साथ में बड़े ही क्लोजली रिलेटेड है। कम्युनिटी लेवल पर यदि हमारे पास में क्राइसिस आती है तो उसको फेस करने के लिए जो स्ट्रेंथ जो है यह जो अपना इंडिविजुअल जो ईश्वर के साथ में रिलेशन है वहीं से प्राप्त होगी। और यह सिविलाइजेशनल यानी कि ये कॉर्पोरेट लेवल पर जो चैलेंजेस आती है अपना वर्क प्लेस है ना कि ये वर्किंग एनवायरमेंट है जगत के साथ में जो अपना डीएलिंग है उसके साथ में जो क्राइसिस आएगी उसके लिए भी जो माइन ऑफ स्ट्रेंथ है दैट इज आवर इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी। देखिए स्वामी जी को बहुत सारे लोग यह प्रोफेट पेट्रियोट बोलकर के प्रोजेक्ट करते हैं। उसमें स्वामी जी के खुद के भाई जो भूपेंद्रनाथ थे उनका भी यही था कि स्वामी विवेकानंद इज अ प्रोफेट पेट्रियोट। यह जो बंगाल में यह जो कम्युनिज्म आया उसमें यह स्वामी जी को मिसरीड करने का भी एक बहुत बड़ा एक फैक्टर है कि स्वामी जी ने यह गरीबों के लिए पदलितों के उत्थान की बात की। तो उन्होंने यह सोच लिया कि स्वामी जी इस आल्सो कम्युनिस्ट। किंतु यह जो तथाकथित कम्युनिस्ट है उसके साथ में स्वामी जी का डिफरेंस कितना बड़ा है। स्वामी जी के भीतर में जो ये जो भक्ति साधना आत्मश्रद्धा यानी कि एक इंडिविजुअल एस्पेक्ट था। वही फेमस कहानी कि गिरीश घोष के साथ में दक्षिणेश्वर में साधन कर रहे हैं। ध्यान कर रहे हैं। गिरीश तो बैठ नहीं पाया। वो मॉस्किटो की बाइट्स इतनी लग रही थी। जब उसने आंख खोल के देखा तो स्वामी जी पूरे देह पर इतने सारे मॉस्किटो बैठे हैं जैसे कि काला कंबल पूरे देह पर बिछाया हो ऐसा लग रहा है। गिरीश डर गया और स्वामी जी को पुकारने लगा। अरे नरेंद्र नरेंद्र उठो तुम्हारे देह पर इतने मच्छर नरेंद्र सुन नहीं रहा। तो उठकर के नरेंद्र को धक्का मारा तो जैसे ये लकड़ी का ये पुतला जो होता है एक प्रतिमा उसी की तरह वो पद्मासन में ही स्वामी जी गिरे तो माने वो जो एक प्रचंड ईश्वर के ऊपर में उनका यह जो था मन ईश्वर की ओर धावित हो रहा था उसको कि स्वामी जी ने श्रद्धा दी है ना यह जितने भी गुरु भाई थे देखिए वो लाटू महाराज की फेमस कहानी कि शरद महाराज सोए हुए हैं रात को खटखट करके आवाज होती है तो सोच सोच रहे हैं चूहा आ गया है कि क्या? फिर थोड़ी देर के बाद में खड़े होकर के देखा तो खटखट आवाज बंद हो गया। फिर लेट गए तो फिर से प्रारंभ हो गया। तब उनको पता चला कि ये लाटू महाराज है छुप छुप करके रात को पूरी रात जप कर रहा है। तो शरद महाराज बोलते हैं कि तुम ही साला अपने अकेले बेनिफिट उठा जाओगे जप का और हम सोते रहेंगे। ऐसा तो होगा नहीं। हम भी पूरी रात बैठकर के जप करेंगे। तो यह जो उनका जो प्रचंड साधना में अनुराग था इसी को तो उनको बचाकर रखा ना। यह चाहे कम्युनिटी की जितनी क्राइसिस आ जाए। गुरु भाइयों में मतभेद नहीं था। ऐसा नहीं है। वह बड़े डिफरेंस ऑफ ओपिनियन थे। यह कहानियां बड़ी प्रसिद्ध है और जो प्रकाश में नहीं आई है। ऐसी भी बहुत सारी घटनाएं हैं। किंतु वो आध्यात्मिकता एक ऐसा था कि जिसने कि सबको एक सूत्र में बांध करके रखा। एक तो अपनी साधना दूसरा कि ठाकुर के प्रति अपना प्रेम। तो यह जो है उसने उनको इतना भरोसा दिलाया कि पूरे जगत की चैलेंज को वह फेस करके अल्टीमेटली वो विजय हुए हैं।

Q: as you said during discussion on asmita, we are not supposed to react when someone insults us. wont this non-reaction/disengagement on our part would isolate us from the society?

सो बेटर आई विल नॉट इट। सो ही इज़ दैट ओके थॉट इट इज़ नॉट ओके। फर्स्ट ऑफ़ ऑल वी हैव टू अंडरस्टैंड दैट व्हाट वी डिस्कस्ड इट इज़ अ बेस्ड ऑन द प्रीमाइस दैट वी हैव डेवलप्ड अ हेल्दी अस्मिता। दैट इज द फर्स्ट स्टेज बिफोर वी स्टार्ट एनी साधना एज वी डिस्कस्ड यस्टरडे आल्सो दैट हैविंग दिस फ्रैक्चरर्ड पर्सनालिटी दैट इज हैविंग दिस इंफोरिटी एज वेल एज सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स विद दिस इफ वी एंटर स्पिरिचुअल लाइफ वी आर गोइंग टू फेस पावरफुल हेड विंड फॉर व्हिच वी हैव नो डिफेंस फर्स्ट ऑफ़ आल हैव अ हेल्दी ईगो हैव अ हेल्दी अस्मिता व्हिच गिव्स अस अ ट्रेमेंडस सेल्फ कॉन्फिडेंस एंड देन ओनली वी कैन सैक्रिफाइस दिस अस्मिता इन एब्सेंस ऑफ अ हेल्दी अस्मिता इफ वी हैव दिस काचा आमी और दिस अनराइप सेंस ऑफ सेल्फ एज इट सेड इन आवर लिटरेचर इफ वी एंटर स्पिरिचुअल लाइफ इट इज़ गोइंग टू कॉस्ट टू मेनी कंट्राडिक्शंस एंड वन ऑफ द कंट्राडिक्शंस एज यू ऑलरेडी सेड इज़ दिस वन दैट ऑलरेडी आई एम सफरिंग फ्रॉम सम सॉर्ट ऑफ़ सेल्फ डाउट एंड विथ दिस सेल्फ डाउट आई हैव एंटर्ड अ स्पिरिच लाइफ एंड आई एम ट्राइंग टू प्रैक्टिस शरणागति। नाउ विथ दिस सेल्फ डाउट इज ऑलरेडी देयर। नाउ आई एम प्रैक्टिसिंग शरणागति एंड देन समवन ट्राइस टू इंसल्ट मी एंड देन समवन ट्राइस टू टेक एडवांटेज ऑफ़ मी एंड देन समवन ट्राइ टू कम आफ्टर मी। इन दैट केस आई विल बिकम कंप्लीटली डिफेंसलेस। व्हिच इज़ वेरी डेंजरस। राइट? इन स्पिरिचुअल लाइफ वी हैव टू रिमेन वल्लनरेबल बट वी आर नॉट ट्रूली डिफेंसलेस बिकॉज़ वी हैव फेथ इन गॉड। दिस फेथ इन गॉड इवेंचुअली इट विल टेक अस अक्रॉस दिस ओशन। सो व्हेयर दिस फेथ इन गॉड कम व्हेन आवर ईगो इज सुसंस्कृत। आवर संस अस्मिता इज़ सुसंस्कृत। विदाउट दिस स्ट्रांग अस्मिता एंड देन विदाउट रनाउंसिंग दिस अस्मिता एंटरिंग स्पिरिचुअल लाइफ हैज़ प्रूव्ड वेरी डेंजरस फॉर अस इंडियंस फॉर लास्ट 1000 इयर्स। सो दिस वी हैव टू रिमेंबर।

माँ के घर में आर्थिक संकट और नारायण अयंगर की सहाय

नहीं देखिए हमको हम वी नीड टू डिराइव सम इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन बिकॉज़ साधन का रास्ता जो है ना वो इतना लंबा है और इतना जैसा आपने कहा कि अभी मां ने प्रार्थना की है और मां की प्रार्थना का वो हम बैंक में रख के वो जैसे ठाकुर ने वह बलराम बाबू को कहा था कि यह ₹200 ना कि इतना बलराम बाबू की जमींदारी में रखा है। पहले तो मां को पूछा कि रात को कितनी रोटी खाती हो? तो मां तो बेचारी शर्मा गई। किस मुंह से कहे कि मैं इतनी रोटी खाती हूं। किंतु फिर भी ठाकुर लगे रहे हैं। तो फिर मां ने कहा कि चार ना कि इतनी रोटी खाती हूं रात को। तो फिर ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है तो तुमको महीने में ₹5 ना कि इतना होने से चल जाएगा। फिर यह ₹200 ना कि समथिंग ये बलराम बाबू की जमींदारी में रखा वो इन्वेस्ट करके और उसमें से जो वो मंथली इंटरेस्ट आता है बलराम बाबू मां को देंगे। तो यह मां की यह प्रार्थना है। उसमें यह मंथली इंटरेस्ट ये कंपली इंस्टॉलमेंट हम निकाल रहे हैं। वो खींच रहे हैं। खींच रहे हैं अभी। ना देखिए मां मां के साथ में वही हुआ ना मां का अकेले का चल जाता किंतु फिर बाद में भक्त संख्या बढ़ने लगी तो फिर तो पैसा कहां से आएगा इतने सारे भक्तों को खिलाने का और मां बिना खाए जाने भी नहीं देगी तो फिर हुआ ऐसा कि कोलकाता से शरद महाराज सब जुगाड़ करके वह पैसा भेजते हैं। किंतु आखिर आखिर में हुआ ऐसा कि अह जो राधु है उसकी बीमारी इतनी बढ़ गई कि खर्चा इतना होने लगा कि फिर एक बार शरद महाराज को मां को लेटर लिखना पड़ा कि यह जुगाड़ करके पैसा भेजने में मुझे देरी हो रहा है। दिक्कत हो रहा है। तो मां एकदम पत्र पढ़कर के एकदम यह हो गई। अलर्ट हो गई कि देखो शरद के पास में अभी पैसा नहीं है और शरद जैसा शरद रामकृष्ण संघ का जनरल सेक्रेटरी यदि पैसा मां को पैसा भेजने में देरी करे उसका अर्थ है कि रियल फाइनेंशियल क्राइसिस चल रही है तो फिर मां राधु को कहती है कि राधु तेरे लिए मेरा धर्म कर्म सब गया कहां ठाकुर ने कहा था ₹4 में महीना चल जाएगा वो नहीं हो के अभी इतने ही रुपया खर्च हो रहा है हर महीने मेरा उस समय वो नारायण आयंगर बोल के एक डिवोटी था बेंगलुरु का तो कुछ समय वह जय राम भाटी रह के गया था और वहां पर बेंगलुरु में वह बड़े अच्छी पोजीशन में था तो फिर यह जो सब क्राइसिस चल रही थी ना फाइनेंसियल क्राइसिस अब देखिए यह भी एक बड़ा कैसा मधुर कंट्राडिक्शन है शक्ति जिसने यह प्रार्थना की उसको खुद को फाइनेंशियल क्राइसिस सहन करनी पड़ती है कंट्राडिक्शन तो एनीवे जो डिवोटी थी मां का जो भक्त था त्यागी संतान मोस्ट प्रोबेब्ली वर्दा महाराज जी थे तो उन्होंने क्या किया कि यह नारायण आयंकर बोल के गया था कि जब पैसों की जरूरत हो तो मुझे बताइएगा। तो उन्होंने पूरा विवरण लिख के कि यह राधु क्या बीमारी यह भक्तों की संख्या बढ़ रही है। शरद महाराज को जुगाड़ करने में तकलीफ हो रही है। ऐसा बोल के पूरा एक लेटर उनको भेजा। तो फिर उसी समय फिर नारायण आयंगर हर महीने फिर जय राम भाटी पे पैसा भेजना उसने स्टार्ट कर दिया था। ना मां ने नहीं लिखवाया। लेटर नहीं यह त्यागी संतान ने ही लिखा था यह लेटर माने वो वरदा महाराज ने कि जो भी मां के सेवक होंगे जय राम भाटी में उनको याद था कि नारायण आयंगर बोल के गया है कि पैसों की जरूरत हो मुझे बताइएगा एक्चुअली वो आया था साधु होने के लिए तो मां ने कहा कि देखिए पहली बात देखिए जो लोग गवर्नमेंट ऑफिसर इस तरह से जो रहे हैं उनका कष्ट करने का हैबिट ऐसा होता नहीं है। तो मां ने कहा कि आप एक काम कीजिए आपकी नौकरी जो है ना उसका कुछ ही समय बचा है रिटायर होने में। उसके बाद में आपको पेंशन मिलेगा तो पेंशन-पेंशन लेकर के शांति से आप सन्यास लीजिए जैसे आप अपना मटेरियल नीड भी आप कर पाए तो नारायण के आयंगर के मन में था वैसे स्ट्रांग सन्यास लेने का किंतु फिर मां का भी तो एक इंसाइट होता है ना वो उस समय आ जाता तो शारीरिक कष्ट सहन नहीं कर पाता फिर यह ना रहा घर का ना रहा घाट का माया मिली ना राम ऐसा ना हो जाए तो बोलकर के मां ने वापस भेजा तो वह वापस गया नौकरी कर रहा है फिर से रिटायरमेंट लिया फिर उसने सन्यास लिया था सन्यास लिया अपने ही ऑर्डर में अपने ही ऑर्डर में उस समय यह सब टाइट रूल नहीं थे ना कि ये अद्वैतानंद जी ये सब तो ठाकुर से भी बड़े थे उम्र में नहीं आजकल तो साधु लोग क्या कहते हैं कि ठाकुर भी आएंगे तो उनको भी हम नहीं रखेंगे आज ग्रेजुएट नहीं है तो आपको डिस्पेंसरी देंगे तो क्या चला पाओगे स्कूल देंगे तो चला पाओगे पब्लिकेशन में दे देंगे एडिट करना होगा कैसे करेंगे बार-बार वो ठाकुर का नाम लेने पढ़ के ही भाव में चले जाएंगे तो फिर कैसे चले

Ramakrishna Mission represents all that is best in the world

अभी जैसे देखिए जैसे क्रिश्चियनिटी है राइट क्रिश्चियनिटी इज़ अ फाउंडेशनल रिलीजन इन यूरोप इस्लाम है इज अ फाउंडेशनल मतलब इज़ अ मेजर मेन रिलीजन इन मिडिल ईस्ट तो एवरीवन इज़ फमिलियर विद दैट थिंकिंग इंडिया में एक हिंदू सनातन संस्कृति है जिसके साथ में सभी लोग फमिलियर हैं। आज भगवान राम की कहानी, भगवान कृष्ण की कहानी, मां सीता की कहानी सभी बच्चों को पता है। सो, इट हैज़ गॉन इनटू द वेरी ब्लड ऑफ आवर सिविलाइज़ेशन। यह इनकी कहानियां जो है। तो, ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियां भी एक दिन अवश्य आएगा कि यह पूरे नस नस में रक्त के प्रत्येक कण में फैलना शुरू हो जाएगी। वह दिन आना ही है। यदि हमको ठाकुर पे वो विश्वास है। वरना वो श्री रामचंद्र रामबाबू की तरह ठाकुर अवतार थे। ठीक है। अभी उनका प्रधान शिष्य मैं हूं। तो कहां उसकी खुद की तो कोई लायकात नहीं है। तो यानी कि क्या है कि लिप सर्विस तो पे करते हैं कि ही इज़ एन अवतार। किंतु फिर उसका जो इंप्लिकेशन है उस इंप्लिकेशन के लॉजिकल कंक्लूजन तक हम नहीं पहुंचते। मैं रामकृष्ण मिशन को किस तरह से देखता हूं पता है? इट्स लाइक अमेरिका। अभी अमेरिका में रशियन लोग भी माइग्रेट करके गए हैं। इटालियन भी गए हैं। आरिश भी गए हैं। ब्रिटिश भी गए हैं। अफ्रीका वाले भी गए हैं। चाइनीस, इंडियन, पाकिस्तानी, जापानीज, कोरियन, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया पूरे जगत से लोग माइग्रेट करके गए हैं। किंतु कौन माइग्रेट किया है? द बेस्ट ऑफ द बेस्ट। जिन लोगों को अपने देश में कोई होप नहीं दिख रही है, वह लोग वहां पे गए हैं। तो पूरे जगत में से बेस्ट मैन पावर है। अमेरिका में इकट्ठा हुआ है। बोल के अमेरिका ये जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है, ये मून शॉट ये जो सब टॉप ऑफ द लाइन ये जो सब टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन ब्रेक थ्रू है अमेरिका कर पा रहा है। अभी चाइना फाइना उसको कॉपी करेंगे वहां से वो पायरेसी करके वगैरह करके किंतु फ्रंट लाइन पे जो एकदम कटिंग एज इनोवेशन करना है वो नहीं कर पाएंगे यही सुंदर पिचाई मैं कई कई स्टूडेंट्स को कहता हूं कभी-कभी इंडिया में होता तो वो बजाज स्कूटर घुमाता अपनी बीवी बच्चों को पीछे में बिठा करके वहां पे वो Google का सीईओ हो गया है वही ये जो मार्क जुगरबर्ग है वो मतलब अभी जैसे स्टीव जॉब्स है स्टीव जॉब्स वन ऑफ द बेस्ट कंपनी का स्थापक उसके फादर थे। ये सीरियन रेफ्यूजी थे। वो एक गोरी लड़की के साथ में शादी की और यह स्टीव जॉब्स का जन्म हुआ। अभी यह उसके फादर सीरिया में रहते तो हु वुड ही बी? स्टीव जॉब्स का जन्म सीरिया में होता तो वो कौन होता? नोबडी वो वहां एक टेररिस्ट अटैक में मर गया होता। तो अमेरिका इज अ कलेक्शन ऑफ द बेस्ट पीपल फ्रॉम ऑल ओवर द वर्ल्ड। और उनमें ये एक एकता भी है। ऐसा नहीं है कि वो इंडिया जाकर के एक इंडियन कहेगा कि मैं पाकिस्तानी के साथ में काम नहीं करूंगा। एक ही कंपनी Google में दोनों एंप्लई है। दोनों कोऑपरेट करके काम करेंगे। भले ही चाहे यहां पे अपने घर में चाहे जितना झगड़ते रहे ये जापानीज और चाइनीस के बीच में जितना झगड़ा यहां एशिया में है वो अमेरिका जाके ये झगड़ा नहीं करेंगे। सो अमेरिका रिप्रेजेंट्स द बेस्ट ऑफ एंटायर वर्ल्ड सपोज टू बी। अभी आजकल वहां पे गड़बड़ हो रही है। किंतु एज ऑफ टुडे अमेरिका रिप्रेजेंट्स द बेस्ट ऑफ द वर्ल्ड। तो रामकृष्ण मिशन सिमिलरली इट रिप्रेजेंट्स द बेस्ट ऑफ भक्ति। रामकृष्ण मिशन रिप्रेजेंट्स द बेस्ट ऑफ वेदांता, बेस्ट ऑफ कर्म योगा एंड बेस्ट ऑफ ध्यान योगा। यह जितनी भी स्ट्रीम्स है भारतीय सनातन धर्म की हिंदू सनातन संस्कृति की सभी स्ट्रीम्स में से बेस्ट लोग यहां पे इकट्ठा हुए। क्योंकि देखिए मैं मैं खुद जैन परिवार में मेरा जन्म हुआ। तो अभी ट्रेडिशनली या तो आइडियली स्पीकिंग मुझे जैन होना था। किंतु मेरे में मुमुक्षुत्व था। जो कि वह जैन धर्म या जैन ट्रेडिशन मुझे कभी भी प्रोवाइड नहीं करने वाली है। तो मेरा मुमुक्षत तो मुझे ठाकुर के पास ले आया। ऐसा कितनी ही विभिन्न ट्रेडिशन में जिनका जन्म हुआ है जो कि उनकी होम ट्रेडिशन या बर्थ ट्रेडिशन उनको वो सेटिस्फेक्शन नहीं दे पा रही है तो मुमुक्षुत्व उनको फिर ठाकुर के पास ले आया है तो ठाकुर के पास में आने वालों की भक्तों की संख्या कंपैरेटिवली कम भी है वी रिप्रेजेंट्स द बेस्ट ऑफ एंटायर स्पेक्ट्रम ऑफ हिंदू सनातन संस्कृति और फिर हिंदू ही कहां पूरे विश्व में से तो लोग यहां पर आ रहे हैं क्रिश्चियन ट्रेडिशन िशन में से इस्लामिक ट्रेडिशन में से सभी जितनी भी ट्रेडिशंस है वहां से बेस्ट ऑफ द बेस्ट इंडिया में आ रहा है। रामकृष्ण मिशन में आ रहे हैं। सो वन डे विल कम दैट कि यहां से जो एक कटिंग एज स्पिरिचुअल एक रिसर्च जो स्टार्ट होगा ये स्पिरिचुअल जो वेव जो फैलेंगे इट विल इनडेट द एंटायर वर्ल्ड।

प्रश्न: ठाकुर की महासमाधि के बाद मां और स्वामीजी संघर्ष कर रहे थे। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि राम बाबू ने सोचा कि वह ठाकुर की आध्यात्मिक विरासत के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं।

यहां पर प्रॉब्लम मतलब प्रॉब्लम नहीं इसका की क्या है कि मेरा एटीट्यूड क्या है? या तो मैं जेन्युइन साधक हूं कि मैं अपना एक पर्सनल बेनिफिट उठाने के लिए आया हूं। इस अर्थ में कि ठाकुर यदि अवतार है मान लीजिए तो उनकी आराधना करने से मेरे सांसारिक जो सब सपने हैं वह फलीभूत हो जाएंगे। किंतु ठाकुर को ही जब कैंसर हो गया तो फिर ठाकुर अवतार किस काम के? खुद की रक्षा नहीं कर पा रहे तो मेरी रक्षा कैसे करेंगे? बोलकर के वो एक बहिरंग एक दल निकल गया जिसमें यह भवनाथ भी शामिल था। ठाकुर ने खुद कहा कि वह काशीपुर आया था वर राजा सज करके और आकर पूछ रहा है कि ठाकुर कैसे हैं? अभी यही भना जिसको कि ठाकुर ईश्वर कोटि कहते थे कहते थे कि यह नरेंद्र पुरुष है वो प्रकृति है। इन दोनों की जोड़ी है। अभी नरेंद्र के साथ में जिसकी जोड़ी हो वो वो किस लेवल का होगा। तो उसको भी उसके मन में भी शायद ऐसा होगा कि खुद की आध्यात्मिक उन्नति की वजह ठाकुर से मुझे पर्सनल क्या बेनिफिट हो रहा है? मटेरियली नहीं बट एटलीस्ट स्पिरिचुअली क्या हो रहा है? मुझे ठाकुर की सेवा करनी है। यदि मैं जेन्युइन साधक हूं तो नहीं कि ठाकुर से मुझे बेनिफिट उठाना है। तो वो एटीट्यूड का प्रश्न है। तो यहां पे भी सेम थिंग बाद में ठाकुर को ही यदि ऐसा बोलने वाले लोग थे कि खुद के अगर रक्षा नहीं कर पाए तो हमारी क्या रक्षा करेंगे? तो सेम इशू तो बाद में भी स्टार्ट हुआ कि यह रामचंद्र के मन में तो ऐसा था ही था कि मैं ही गुरु हो जाऊं ठाकुर के बाद में। तो फिर वो जेनुइननेस यदि साधना में नहीं रहेगी तो स्वामी जी को कैसे स्वीकार करेंगे। बात प्रश्न यह नहीं है कि स्वामी जी एक अभी फाइनेंशियली स्ट्रगल कर रहे हैं। प्रश्न है कि उनका खुद का एटीट्यूड क्या है स्वामी जी के प्रति? क्योंकि ठाकुर का इतना आविर्भाव होने के बाद में भी कैंसर के समय यदि लोग इधर-उधर हो जाते हैं तो फिर आप और कितना आपको आविर्भाव करना है बताइए। आपको स्पर्श करके आपको चैतन्य करवा दिया। इतने बार-बार भाव समाधि चल रहे हैं। इतना दिव्य उनका उपदेश है। इससे ज्यादा आपको क्या देखना है? हमने आपके सामने क्या चमत्कारों की हारमाला पूरी खड़ी कर दे और यदि खड़ी करते भी तो भी यह लोग संतुष्ट नहीं होते। सो प्रश्न यह नहीं है कि ठाकुर मास्वामी जी अपने से क्या करते हैं या उनका मैनिफेस्टेशन कहां तक जाता है? प्रश्न म दैट इज आल्सो ए फैक्टर बट मच मोर ग्रेटर फैक्टर इज कि मैं यानी कि कोई भी एक इंडिविजुअल साधक है क्या एटीट्यूड लेकर के यहां पे आते हैं हां इवन टुडे इवन टुडे आज देखिए ना ठाकुर मां स्वामी जी का पूर्ण अविर्भाव हो चुका है किंतु कितने लोग हमको मतलब इस दृष्टि से देखते हैं कि रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा विश्व का भविष्य है इस दृष्टि से देखने वाले कितने हैं लाख दो लाख होंगे मुश्किल

प्रश्न: ठाकुर की लीला को समझने के लिए हमारी दृष्टि बहुत छोटी है। our understanding of historical timeline is very limited

ना किंतु देखिए ये ये अगेन यहां पे एक बात मैं कहूंगा हिस्ट्री कैसे डेवलप होती है पता है कि पहले लगता है कि हिस्ट्री का जो डेवलप मतलब हिस्ट्री के जो इवेंट्स है ना एकदम स्लोली स्लोली स्लोली बढ़ रही है फिर एकाएक पता नहीं क्रिटिकल मास आएगा क्रिटिकल इवेंट आएगी वहां पे एक्सप्लोजन होगा सब कुछ जैसे कि परिवर्तित हो जाएगा जैसे कि ये 20थ सेंचुरी में ही देखिए साइंस में पिछले 100 सालों से ये जो फिजिक्स की हमारी अंडरस्टैंडिंग थी धीरे-धीरे करके डेवलप हो रही थी। किंतु यह आइंस्टाइन है, नेल्स बोहर है, यह यह जो है हज़नबर्ग है। ये कुछ लोगों का जन्म एक ही साथ में हुआ। और यह 19th सेंचुरी के प्रारंभ में ही यह रिलेटिविटी और क्वांटम डायनेमिक्स ये दो थ्यरी ऐसी आ गई कि दोनों ने मिलकर के विदिन ए शॉर्ट स्पैन ऑफ 2030 इयर्स पूरा फिजिक्स का नक्शा चेंज कर दिया। पॉलिटिकली देखिए फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर पिछले 200 300 सालों से एक ही तरह का एक चल रहा था यह पॉलिटिकल अरेंजमेंट किंतु फर्स्ट वर्ल्ड वॉर सेकंड वर्ल्ड वॉर विद इन 50 इयर्स पूरे विश्व का नक्शा संपूर्ण रूप से बदल दिया जो कि बिफोर माने स्वामी जी के ही समय में किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि विदिन 50 इयर्स जगत संपूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाएगा। तो यहां पर भी आज हमको ऐसा लगता है कि स्लोली एंड ग्रेजुअली हिस्ट्री का प्रवाह बढ़ रहा है। किंतु कल कहीं जाकर ऐसी कोई क्रिटिकल घटना हो जाए जो कि जगत का नक्शा संपूर्ण बदल करके रख दे। तब क्या होंगे? ये चक्रवृद्धि ब्याज का यही जादू है ना। हा हा