Transcript
ओम स्थापकााय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः तो गीता के ऊपर में बोलना है आप सब लोग इस टाइम इकट्ठा हुए बहुत अच्छा अमिता दी का ग्रुप मैंने सुना कि बहुत लंबे अरसे से आप लोग पेंडेमिक के समय समय से ही इस तरह से नियमित ऑनलाइन क्लास ले रहे हैं और विभिन्न अपने संघ के जो साधु हैं जो लोगों का पढ़ाई लिखाई में काफी अच्छे से रुचि है उन लोगों को बुला करके आप क्लास वगैरह लेते हैं इट्स वेरी गुड क्योंकि देखिए कि इस जगत में कलयुग में ठाकुर कहते हैं अन्नगत प्राण अर्थात कि तपस्या करने की जैसे कि वह ध्रुव ने अभी कितने हजार साल तक एक पैर पर खड़े रहकर के तपस्या की। इस तरह की क्षमता आजकल हम लोगों में होना वह ऑलमोस्ट इंपॉसिबल है। तो फिर हम लोगों के लिए फिर सेकेंडरी माध्यम क्या है? हमारे संघ के रिवियर्ड प्रेसिडेंट महाराज से एक बार हम मंत्र लेते हैं। उसके बाद में मंत्र जप तो हम नियमित करते हैं किंतु फिर भी हम देखते हैं कि हमारे पास में यथेष्ठ समय रहता है कि जप के अलावा भी कोई धार्मिक प्रवृत्ति की जाए। तो इस तरह की धार्मिक प्रवृत्ति सत ग्रंथ का पाठ अपने शास्त्रों के ऊपर में स्मरण मनन निदि्यासन वाचन पठन यह सब बड़ी ही अच्छी प्रवृत्तियां है और इससे सत ग्रंथ के पाठ से और उसके श्रवण से अपनी चित्त शुद्धि होती है। तो आप सब लोग इकट्ठा होकर के इस तरह से साधुओं के प्रवचनों का आयोजन करते हैं। बड़े ही जतन पूर्वक मन लगा के सुनते हैं। तो बड़ा अच्छा लगा। आप सबको मैं ठाकुर मां स्वामी जी के पास में प्रार्थना कि उनके आशीर्वाद सतत आप सबके ऊपर बने रहे। अच्छा अभी आज का जो विषय है गीता हमको तो पता है कि श्री रामकृष्ण देव ने गीता के बारे में क्या कहा है सर्वप्रथम तो उनका जो सबसे इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट है उन्होंने कहा है जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण तवे तो वेदांते दिगदी ना उनके जीवन का जो आखिरी पल जो आखिरी समय जो चल रहा था श्री रामकृष्ण देव के जीवन को हम यदि कुछ पर्वों में बांट दें तो जैसे कि बाल्य पर्व जो कामार पुकुर में उनकी जो बाल्य लीला हुई थी वह एक समय उसके बाद में साधन पर्व जबकि वह कोलकाता आए कालीवाड़ी में अपने बड़े भाई के साथ में सर्वप्रथम तो बड़े भाई उनके रामकुमार पुजारी थे उसके बाद में श्री रामकृष्ण देव को पूजा का जिम्मा मिला तो वहां से उन्होंने जो प्रारंभ किया एक के बाद एक सनातन धर्म की जितनी भी साधनाएं हैं और इसके अलावा सिर्फ हमारे हिंदू धर्म की ही नहीं इस्लाम या तो फिर क्रिश्चियनिटी की भी साधना करके उन्होंने सर्वश्रेष्ठ सिद्धियां प्राप्त की। प्रत्येक साधना में जो सर्वश्रेष्ठ सिद्धि कही गई है उसको उसको उन्होंने प्राप्त किया और उसके बाद में जब श्री मां शारदा देवी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ और ठाकुर ने जब से उनकी शोडशी पूजा की उससे फिर यह तृतीय पर्व ठाकुर का प्रारंभ होता है। वह है आनंद पर्व। दक्षिणेश्वर में जैसे कि ठाकुर ने आनंद की हाट बिठाई थी। एक के बाद एक सभी अंतरंग शिष्य जैसे कि उनके पास में आन मिले थे। किंतु अभी जैसे कि यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि सृष्टि स्थिति प्रलय यह जो एक जीवन की एक साइकिल है उसके अनुसार हम देखते हैं कि क्रमशः सबके कर्म ग्रहण करके ठाकुर को धीरे-धीरे करके गले का रोग उनके शरीर में प्रवेश किया और फिर वहां से ही ठाकुर के जीवन का जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण समय आत्म प्रकाश पर्व वह प्रारंभ हुआ और ठाकुर ने जैसे कि दो-तीन घटनाएं इस आत्म प्रकाश पर्व की है। जब से ठाकुर को कैंसर हुआ तब से लेकर के एक तो है कि वह काली पूजा उन्होंने ठाकुर ने कहा कि काली पूजा का समग्र बंदोबस्त करो। इसके बाद में जब बंदोबस्त हुआ किंतु भक्तों ने देखा कि ना ही मूर्ति है ना ही पुजारी है। तो फिर क्या ठाकुर के मन में है पता नहीं। पूजा के उपकरण ठाकुर के सामने सजा के सब लोग बैठे थे। एकाएक गिरीश घोष के मन में आया कि ठाकुर तो स्वयं मां काली के ही तो वो मूर्तिमंत स्वरूप है। मां काली को यदि देखना है तो ठाकुर के अलावा और किस में हम उनको देखेंगे। तो वैसे ही वो गिरीश घोष ने इमीडिएटली उनका तो पता था भैरव जैसा उनका भक्ति था। इमीडिएटली फूल लेकर के ठाकुर के चरणों में अर्पित किए और ठाकुर साथ-साथ में समाधस्थ हो गए। और फिर वह एक बड़ी इंपॉर्टेंट घटना आत्म प्रकाश पर्व की। देखिए कि जब आनंद पर्व चल रहा था, जब तक ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे, जब तक अंतरंग भक्तों का उनके पास में आगमन हो रहा था। एक के बाद एक और ठाकुर जब तक अपने जो त्यागी संतान थे उनका चयन करके उनके पास में धीरे-धीरे करके तपस्या करवा रहे थे तब तक ठाकुर ने प्रकाश्य रूप से ऐसा नहीं कहा कि हां जो राम थे जो कृष्ण थे वही मैं हूं। ऐसा ठाकुर ने प्रकाश्य रूप से नहीं कहा। उन्होंने हिंट दे दी है। वह कभी-कभी कहते हैं कि चैतन्य देव की तीन अवस्थाएं होती है। कभी बाह्य दशा, कभी अंतरबाह्य दशा, अर्धबाह्य दशा और कभी अंतर्दशा। बाह्य दशा में भक्तों के साथ में वार्तालाप करते हैं। अर्धबाह्य दशा में वह मत्त होकर के नृत्य कीर्तन करते हैं। भाव में महाभाव में मत्त होकर के और अंतर्दशा में जैसे कि एक ही बार में संपूर्ण रूप से समाधि में मग्न हो जाते हैं। तब जब ठाकुर यह बात कहते हैं तब वह मास्टर महाशय जैसे कुछ लोग थे कि जिनके मन में यह बात आती थी कि ठाकुर के भीतर में भी तो हम लोग इसी तीन तरह की अवस्था का दर्शन करते हैं। तो क्या ठाकुर भी वही चैतन्य देव ही फिर से अवतार लेकर के आए हैं। किंतु वह समय एक ऐसा था कि ठाकुर बहुत ज्यादा इसको एनकरेज नहीं करते थे। रामचंद्र दत्त वगैरह जो भक्त ठाकुर का अवतार का बोलकर के जो प्रचार करते थे वह भी ठाकुर को इतना पसंद नहीं था इतना अच्छा नहीं लगता था किंतु जैसे ही कैंसर प्रारंभ हुआ ठाकुर के गले का रोग प्रारंभ हुआ आत्म प्रकाश पर्व जब प्रारंभ हुआ तब ठाकुर ने जैसे कि धीरे-धीरे करके सबको यह कहना शुरू कर दिया कि हां जो राम जो कृष्ण वही वही थे श्री रामकृष्ण। हमको पता है कि ठाकुर के जीवन का जो अंतिम समय था उस समय नरेंद्र उनके सामने बैठा हुआ था और नरेंद्र के मन में वह एक प्रश्न हुआ था। जब ठाकुर का अंतिम समय चल रहा था। उसी समय हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी के मन में वह एक प्रश्न आया था कि क्या सही में श्री रामकृष्ण जो इस तरह से कहते हैं वह अवतार ही है क्योंकि देखिए कि अवतार के जीवन में जितने भी लक्षण अवतार के जितने भी लक्षण होते हैं सभी तो ठाकुर में दिख रहे हैं। तो उस समय ठाकुर का जो डेथ बेड था जो ठाकुर का अंतिम समय चल रहा था उस समय नरेंद्र ने यह अपने मन में सोचा था कि यदि इस समय ठाकुर कहे कि हां मैं अवतार हूं तो मैं यह बात मानूं तो साथ-साथ में ही ठाकुर ने क्या कहा जो राम थे जो कृष्ण थे वही अभी श्री रामकृष्ण होकर के अवतरित हुए हैं। किंतु यह तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं। क्योंकि वेदांत तो कहता है कि हम सब में वही एक आत्मन है और वही आत्मन और वही ब्राह्मण एक ही है। तो ऐसा तो कोई ईश्वर है या तो अवतार है या तो मैं हूं। इस तरह से तो कोई डिफरेंस नहीं होना चाहिए। तो यह बात जैसे कि ठाकुर ने नरेंद्र को कही उस समय उनका संदेह भंग करने के लिए। यह तो एक बात है। साथ में ही देखिए कि वह जो काशीपुर का पर्व प्रथम जानकारी की वह बड़ी ही इंपॉर्टेंट घटना कि ठाकुर जब उस दिन थोड़ा सा स्वस्थ महसूस कर रहे थे और जैसे ही बागान में टहलने को निकले और वैसे ही सामने जब उन्होंने गिरीश घोष को देखा और गिरीश को पूछा कि अच्छा तुम जो सबको मेरा अवतार बोलकर के प्रचार कर रहे हो ऐसा क्यों कर रहे हो? इमीडिएटली गिरीश घोष उनके पैरों में दंडवत होकर के कहता है कि व्यास और वाल्मीकि जिनके गुणगान गाते थकते नहीं है उनके बारे में मैं क्या कहूंगा साथ में ही ठाकुर को हमने देखा कि सबको स्पर्श करके कह रहे हैं तुम सबको चैतन्य हो तो जो भगवान कृष्ण थे वही इस समय श्री रामकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए हैं और जिस तरह से भगवान कृष्ण ने गीता का जो संदेश था उसी संदेश संदेश को श्री रामकृष्ण देव ने उसी संदेश को जैसे कि फिर से उन्होंने इस नए आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद के माध्यम से उसका प्रचार किया है। भगवान कृष्ण के पास में उनका पक्का शिष्य था यह अर्जुन और श्री रामकृष्ण देव के पास में उनके शिष्य थे स्वामी विवेकानंद अभी देखिए कि गीता का यदि मुख्यत्व संदेश यदि हमको देखना है। गीता का हार्ट क्या है? गीता का मुख्य संदेश क्या है? तो वह संदेश जैसे कि स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण संघ का यह जो लोगो है सिंबल है उसी के भीतर में जैसे कि ठाकुर का भी संदेश और श्री कृष्ण का भी संदेश गीता का संदेश उसमें जैसे कि उन्होंने कैप्चर कर लिया है। हमारा लोगो यदि आपने देखा होगा तो आपको पता होगा कि उसके भीतर में क्या है। सब सर्वप्रथम तो हमको दिखते हैं वो समुंदर की यह लहरें जो कि स्वामी विवेकानंद के अनुसार ये कर्म योग का प्रतीक है। उसके भीतर में आप देखिए कि एक कमल खिला हुआ है जो कि भक्ति योग का प्रतीक है। फिर पीछे में देखिए कि सूर्योदय हो रहा है जो कि ज्ञान योग का प्रतीक है और उसके पूरे को आवरण करके जो सर्पाकार वर्तुलाकार जो सर्प है वह है राजयोग का प्रतीक और फिर इनके बीच में जो हंस है वह है जैसे कि परमहंस हमारी आत्मन इन सभी योगों का समन्वय करके वह पूर्णता प्राप्त करती है तो यह जो चारों चारों योगों का समन्वय है ज्ञान, कर्म, भक्ति और ध्यान। वही जैसे कि गीता का भी हार्ट है और यही जैसे कि श्री रामकृष्ण देव के जीवन का भी मुख्य संदेश है। देखिए कि अभी सब समय ऐसा होता है कि जैसे-जैसे एक के बाद एक संत महापुरुषों का आगमन होता है, वैसे-वैसे ही देखेंगे कि वह उनके शायद वह उनके नाम पर कोई नया सिस्टम ना चालू करें। किंतु उनको फॉलो करने वाले जो लोग होते हैं, वह कुछ ना कुछ उनके नाम पर प्रारंभ कर देते हैं। तो वह लोग जब इस तरह से प्रारंभ करते हैं कि हां हमारे गुरु ने यह एक मेथड बताई है जो कि हमको लगता है बड़ा अच्छा है तो ठीक है और फिर कोई नए गुरु प्रकट होंगे और कोई संत महात्मा प्रकट हो गए। उन्होंने अपनी एक मेथड प्रारंभ की। तो ऐसा करके करके बहुत बार देखते हैं कि यह संत, यह महापुरुष, यह एक ऋषि मुनि, यह कोई एक सिद्ध या तो फिर कोई साधक या तो फिर यह कोई फिलॉसोफर इतनी सारी साधन पद्धतियां हमको दिखती है। किंतु कोई आम आदमी यह सब विभिन्न साधन पद्धतियों को देखकर के कंफ्यूज ना हो जाए। इसीलिए बीच-बीच में अवतार प्रकट होते हैं और अवतार का कार्य होता है समन्वय करने का। जितनी भी साधन पद्धतियां हमारे सनातन धर्म में ऋषि मुनियों ने प्रदर्शित करके गए हैं। उस किसी भी साधन पद्धति में आपस में वैमनस्य नहीं है। आपस में विरोधाभास कभी भी नहीं है। सभी साधन पद्धतियां जैसे कि एक दूसरे की पूरक है। मनुष्य का जो मन है, मनुष्य का जो प्रोफाइल है, साइकोलॉजी है, उसके अनुसार वह विभिन्न साधन पद्धतियों को फॉलो करता है। यदि किसी का एक्टिव नेचर है तो वह कर्म योग को फॉलो करेगा। किसी का यदि कंटप्लेटिव नेचर है तो वह राजयोग को फॉलो करेगा। जिसमें यदि डिवोशनल नेचर है, जो कोई सेंटीमेंटल या इमोशनल है, वह भक्ति योग को फॉलो करेगा। और किसी में यदि दृढ़ संकल्प शक्ति है, किसी में प्रचंड विल पावर है और उसकी इंद्रियों पर संयम है तो वह ज्ञान योग को फॉलो करेगा। मनुष्य की पर्सनालिटी के अनुसार सभी की यह जो एलिजिबिलिटी है या तो फिर जिसको कहेंगे अधिकारित्व जिसका जो अधिकार है जिसका जो अधिकारी है उसके अनुसार उसको साधन पद्धति फॉलो करनी चाहिए। और इसके बारे में हमने देखा भी है। जैसे कि श्री रामकृष्ण देव के पास में जो विभिन्न जब साधक जो अंतरंग भक्त आते थे ज्यादातर भक्तों को ठाकुर भक्ति योग के बारे में ही बताते थे। कहते थे कि ताली बजाते बजाते हाथ ताली बजाते बजाते भगवान का गुणगान कीर्तन करो। यही तुम लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ साधना है। तो यह किंतु फिर हमने देखा कि नरेंद्र को जैसे कि ठाकुर अष्टावक्र संहिता सिखा रहे हैं। नरेंद्र को ठाकुर जैसे कि अद्वैत वेदांत का उपदेश दे रहे हैं। और कभी-कभी शुरू-शुर में जब नरेंद्र यह सब पढ़ता था तो यह ठाकुर जब कहते थे कि अच्छा तुम अष्टावक्र संहिता पढ़ो तो नरेंद्र कभी-कभी नाराज भी हो जाता था। वह तो ब्राह्म समाज में जाता था। तो ब्राह्म समाज वैसे तो निराकारों का नाम देते हैं किंतु वह है पक्के द्वैतिष्ट अर्थात कि यह ईश्वर निराकार ईश्वर अलग है और मैं उनसे अलग हूं। जबकि यह अद्वैत वेदांत में जैसे ही यह जो महावाक्य है उसका श्रवण नारायण करेगा तो साथ-साथ में ही वह घबरा जाएगा। वह कहता है ऐसा कैसे हो सकता है कि अहम ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्मन हूं। यह मैं कैसे बोल सकता हूं? यह तो पाप है। ऐसा बोलकर के वह थोड़ा डर जाता था। ठाकुर को कहता भी था कि ये सब किताबों में पाप के बारे में लिखा है। यह सब किताबें जला देनी चाहिए। तब ठाकुर हंसते-हंसते कहते थे कि अच्छा तुमको यदि नहीं पढ़ना है तो मेरे लिए तुम पाठ तो करो। इतना तो तुम कर सकते हो कि नहीं? तो ऐसा करके उन्होंने नरेंद्र को धीरे-धीरे करके भुला फुसला करके अद्वैत वेदांत का पाठ करवाया था। तो जिसका जो अधिक जो जिस साधन पद्धति का अधिकारी है उसके पास में वह साधन भजन करवाना है और देखना है कि कभी भी यह नहीं कहना है कि मेरी साधन पद्धति दूसरों की साधन पद्धति से बेटर है या तो फिर ऐसा कहना कि दूसरे लोगों के लगता है कि उनके पास में बहुत ज्यादा भक्त आ रहे हैं तो मैं एक काम करता हूं। मैं अपनी साधन पद्धति छोड़कर के उनकी अपना लेता हूं। तो इस तरह की गलतियां हमको अपने जीवन में नहीं करनी है। तो यह बात है कि गीता का जो सेंटर मैसेज कि सभी तरह के योगों का समन्वय जिस तरह से उसमें किया गया है वैसे ही देखिए कि हमारा जो सिंबल है हमारा जो लोगो है उसमें भी आपको एग्जैक्टली यही बात दिखेगी। दूसरा एक गीता का बड़ा ही महत्वपूर्ण उपदेश है जो कि ठाकुर हमको बताते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं? यदि गीता को आप 10 बार बोलेंगे तो जो होगा वह है गीता का मूल मंत्र। तो गीता को हम यदि 10 बार बोलेंगे तो क्या होगा? गीता गीता गीता अर्थात कि त्यागी। त्यागी अर्थात कि त्यागी यानी कि त्याग। त्याग ही है। जैसे कि ठाकुर के अनुसार गीता का मूल मंत्र। जैसे कि देखिए कि वो जो प्रबोध बाबू थे केदार बाबू केदार बाबू जो कि क्वालपाड़ा के वहां पे जो क्वालपाड़ा आश्रम के जो फाउंडर है एक बार मां को मिलने के लिए दक्षिणी जयराम भाटी गए थे। तो उन्होंने मां को पूछा था कि क्या मां हम तो ऐसा लगता है हमको कि ठाकुर जैसे कि सभी मतों का समन्वय करने के लिए ही जैसे कि उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था और उसी के लिए उन्होंने इस जीवन को ग्रहण किया है। तब मां ने क्या उत्तर दिया था? नहीं त्याग ही है ठाकुर के जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य त्याग ही है ठाकुर के जीवन का। जैसे कि मूल मंत्र और फिर मां ने यह भी कहा था कि विभिन्न तरह की साधन पद्धतियों के माध्यम से उस साधन पद्धति के ईश्वर को प्राप्त करना यह भी ठाकुर के जीवन का एक बड़ा ही महत्व का उद्देश्य है। तो अभी देखिए कि त्याग या तो फिर यह मोक्ष प्राप्त करना या तो फिर यह ईश्वर प्राप्ति करना यही गीता का हमको पता है कि मूल मंत्र है। स्वामी जी कहते हैं कि गीता है जैसे कि उपनिषदों का सार संचय। जैसे कि उपनिषदों में बहुत सारा एक गहन रूप से जैसे कि आत्म तत्व का उपदेश दिया गया है। किंतु उसको समझने के लिए हमारे पास में एक प्रचंड मेधा शक्ति चाहिए। जबकि गीता के भीतर में एक के बाद एक इतने सरल सहज शब्दों में भगवान कृष्ण ने उसी उपनिषदों का सारांश हमारे सामने प्रस्तुत कर दिया है कि जिसको पढ़कर के हमको बहुत ज्यादा मेधा शक्ति की आवश्यकता नहीं है। यह जानने की आवश्यकता नहीं। जैसे कि संस्कृत है या तो फिर संस्कृत का व्याकरण है या तो फिर बहुत गहरी व्याख्याएं हैं। कोई-कोई शब्दों की इतना सब कुछ जानने की इतनी कोई आवश्यकता नहीं है। सहज सरल शब्दों में भगवान कृष्ण ने गीता में उसी उपनिषदों का संदेश हमारे सामने रखा है। और कभी-कभी मैसेज को रिपीट करना, विभिन्न तरह की साधन पद्धतियों को विभिन्न तरह की फिलॉसोफीस को बार-बार हमारे सामने दोहराना इस 18 चैप्टर में 700 श्लोक में। तो देखिए कि हम यदि इसका गीता का यदि सहज रूप से पाठ भी करते हैं तो भारतीय सनातन धर्म का जो मूल है वह हमको बड़ा ही सहज रूप से समझ में आ जाएगा। तो अभी जो हम आज जो मैं करना चाहता हूं जो पहला अध्याय है अर्जुन विषाद योग तो इसका जो अर्जुन जहां से बोलने का प्रारंभ करता है वो मैं एक बार अर्जुन के यह जितने भी श्लोक हैं वो सब मैं एक बार पाठ कर लेता हूं आज। हमको पता है कि महाभारत के युद्ध में अ यहां पे एक ओर पांडव थे और एक ओर थे कौरव और फिर बीच में अर्जुन का रथ खड़ा था। तो अर्जुन ने सबसे पहले तो भगवान कृष्ण को कहा कि मुझे यह सब जो सेनाएं हैं, सेनापति है, जो विभिन्न योद्धाएं हैं, इनका एक बार मुझे दर्शन करना है। इन दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर के मेरे रथ को ठहराओ। तो भगवान कृष्ण ने भी ऐसा किया। किंतु जैसे ही अर्जुन ने यह देखा कि नजर के सामने यही चाचा, मामा, ताऊ या जितने भी उनके रिलेटिव्स थे, उनके गुरु थे, वह सब उनके विरोध में शत्रुओं की सेना में खड़े थे। तो एक ऐसा होता है कि जैसे कि मरकट वैराग्य जैसे कहते हैं ना कि कभी-कभी परिस्थिति ऐसी विरोधीभासी हो जाती है कि हमारे मन में एकाएक वैराग्य प्रकट होता है। ठाकुर की एक कहानी है। ठाकुर कहता है कि एक लड़का था जिसको कि नौकरी नहीं मिल रही थी। तो फिर वह घर छोड़कर के चला गया। लोगों लोगों ने ऐसा समझा कि वह साधु हो गया है और वह भी ऐसा दिखावा करता था। किंतु कुछ दिनों के बाद में उस लड़के का पत आया कि आप लोग चिंता मत कीजिएगा मुझे नौकरी मिल गई है। और फिर जो नौकरी हो गई उसकी तो उसके पैसों में से उसने एक सोने की एक अंगूठी भी बनाकर के पहनना शुरू कर दिया। तो क्या है कि वह क्यों घर छोड़ के गया था? क्यों ऐसा नहीं है कि बहुत ज्यादा वैराग्य आ गया था। या तो फिर ईश्वर पर इतनी श्रद्धा और भक्ति आ गई थी। नौकरी नहीं मिल रही थी तो यदि नौकरी नहीं मिलती है तो चलो थोड़ा बहुत साधुपन किया जाए जो साधुगिरी की जाए गुरुगिरी की जाए तो ऐसा सोच करके उसने घर छोड़ा था। ऐसा होता है कभी-कभी कि यदि बहुत विकट परिस्थितियां नजर के सामने आ जाती है और फिर हमारे पास में वह साहस नहीं रहता कि मैं किस तरह से इसका सामना करूंगा तो सामयिक रूप से वैराग्य कभी-कभी हमारे मन में प्रकट होता है। तो इसी तरह से यह दोनों जो शत्रु सेनाओं को जब यह अर्जुन ने देखा तो क्षण भर के लिए उसके मन में यह संदेह प्रकट हुआ। दो तरह के संदेह प्रकट हुए। सर्वप्रथम तो एक तरह का दया भाव आया कि मैं किस तरह से अपने ही स्वजनों की हत्या करूंगा। और इस तरह का प्रश्न होना स्वाभाविक भी है। अभी देखिए कि जब यह युद्ध की ओर जब यह मामला बढ़ रहा था उस समय तो यह अर्जुन ये जो पांडव है या तो इवन भगवान कृष्ण है उन सब लोगों ने बड़ा ही मेहनत किया था। बड़ी ही चेष्टाएं की थी कि कैसे भी करके युद्ध ना हो। कैसे भी करके पांडवों को उनका अधिकार मिल जाए। जब उनको इवन भगवान कृष्ण को भी एज ए एंबेसडर भेजा गया तो फिर इन लोगों ने क्या कहा कि जो यह जो सुई होती है वो सुई जितनी जमीन पर खड़ी रहती है उतनी जमीन भी हम आपको पांडवों को देने को तैयार नहीं है। तो फिर चलो आखिर में ऐसा हुआ कि पांडवों को यदि अपना अधिकार चाहिए होगा तो युद्ध करना ही पड़ेगा। तो भगवान कृष्ण की यह जो प्रयास था एज ए आखरी आखिरी घड़ी में एज ए एंबेसडर जाने का वह भी जब विफल हुआ तब कहीं जाकर के युद्ध की परिस्थिति आई है। किंतु फिर जब युद्ध सामने आ गया तो अर्जुन के मन में यह एक प्रश्न अवश्य खड़ा हो गया कि मैं यह राज्य के लोभ में, यह धन के लोभ में, वैभव के लोभ में, मैं यह क्या करने को जा रहा हूं। मेरे सामने जो मेरे सगे संबंधी खड़े हैं उनका मैं क्या वध करने वाला हूं और इनका वध करके यह जो लहूल लुहान हुआ जो यह जो राज्य है यह जो रक्त से सिंचा हुआ यह धन है वह मेरे किस काम में आएगा इस तरह के जो धन वैभव राज्य इसका भोग करके मुझे मिलने वाला क्या है तो एक तरह की दया भी उसके मन में आई दूसरा कि देखिए भले ही चाहे कितने भी बड़े योद्ध क्यों ना हो एक बार जब शत्रु शत्रु सेना को अपनी नजर के सामने देखते हैं तो हृदय के धपकारे तो बढ़ ही जाते हैं। तो यह दोनों जैसे कि रीजन हृदय के अर्जुन के हृदय में खड़े हुए थे कि पहले तो दया दूसरी ओर है एक तरह का डर कि किस तरह से मैं इतनी बड़ी सेना का सामना करूंगा। देखिए कि अर्जुन ने हमेशा से सही डिसीजन लिया है। जब अर्जुन और यह दुर्योधन दोनों भगवान कृष्ण के पास में सहाय मांगने के लिए गए तो हमको पता है कि अर्जुन के भीतर में कृष्ण के प्रति जो भक्ति थी उस कृष्ण भगवान कृष्ण सोए हुए थे। लेटे हुए थे। आंखें बंद थी। वो शयन कर रहे थे। तो अर्जुन ने क्या किया? भगवान के प्रति भक्ति है तो उनके पैरों के पास में उसने जाकर के खड़ा रहा और यह दुर्योधन था वह बड़ा घमंडी था। तो उसने क्या किया कि भगवान कृष्ण के सर के पास में जाकर खड़ा रहा। अभी जब भगवान कृष्ण ने अपनी आंखें खोली तो सर्वप्रथम उनका उनकी नजर पड़ी अर्जुन के ऊपर में तो उन्होंने क्या कहा कि देखो आप मैं तो समझ गया हूं कि आप दोनों मेरे पास में सहाय मांगने के लिए आए हैं। तो मेरे पास में दो चीजें हैं। एक तो है मेरी बड़ी ही पावरफुल सेना। दूसरा है मैं स्वयं तो आपको जो दोनों में से एक आप मांग लीजिए दोनों को मैं एक-एक दूंगा। तो अभी अर्जुन के ऊपर में प्रथम नजर पड़ी थी तो भगवान ने कहा कि तुम पहले मांग लो। तो उस समय यह दुर्योधन सोच रहा है कि अरे यदि अर्जुन इतनी बड़ी सेना को मांग लेगा तो फिर मैं कृष्ण को लेकर के क्या करूंगा? वह ऐसे डर में पड़ा है। किंतु फिर अर्जुन ने क्या किया? अर्जुन ने भगवान कृष्ण को ही चाहा। अभी भगवान कृष्ण ने पहले से ही कह दिया था मुझे ले रहे हो किंतु मैं हथियार धारण नहीं करने वाला हूं। किंतु फिर भी अर्जुन ने क्या कहा कि नहीं मुझे आप ही चाहिए। तब कहीं जाकर के दुर्योधन की जान में जान आई और उसने भगवान की सेना को लेकर के बड़ा खुश हो गया। तो देखिए कि जितने भी माइलस्टोन है युद्ध शुरू होने के पहले प्रत्येक माइलस्टोन पर अर्जुन जैसे कि सही निर्णय करता है। वह गलत निर्णय कभी नहीं करता। यानी कि आखिरी घड़ी में यह जो एकाएक उसके हृदय में यह संदेह प्रकट हुआ कि मैं किस तरह से इन लोगों का सामना करूंगा या किस तरह से युद्ध करूंगा। तो इसलिए हम अर्जुन को कायरता अर्जुन के हृदय के भीतर में यह कायरता प्रवेश कर गई है। ऐसा कहने की बजाय हम इस तरह से एटलीस्ट मैं इस तरह से कहना पसंद करूंगा कि अर्जुन के हृदय के भीतर में एक तरह से परफॉर्मेंस एंग्जायटी प्रकट हुई है। क्योंकि क्या है कि देखिए हम सभी लोगों के जीवन में इस तरह से मौका आता है कि जबकि हमको एक बहुत बड़ा कार्य करना होता है। तो जब बहुत बड़ा कार्य करना होता है तो जब यह जैसे कि स्टेज फ्राइट जिसको कि कहते हैं। अभी जैसे कि अभी मैं पहली- पहली बार मैंने बोलना शुरू किया था। तो मैंने तो पहले इस तरह से प्रवचन देने का ऐसा कोई खास अभ्यास नहीं था। किंतु मेरा जब लिमड़ी पोस्टिंग हुआ और वहां के जो बड़े महाराज थे अभी लिमड़ी क्या है? एक गांव ही है और आसपास में छोटे-छोटे गांव है जहां पर हमने जब गुजरात में अर्थक्वेक हुआ था तो हमने वहां पर बहुत सारी स्कूलें बनाई थी। तो वहां के जो बड़े महाराज हैं हम उनको बापा कहा करते थे। अभी तो उनका देहांत हो गया। तो बापा यानी कि पिताजी यानी उनकी उम्र बड़ी उम्र में ज्वाइन किए थे आत्मस्थानंद जी के पास में तो आत्मस्थानंद जी ही परम पूजनीय आत्मस्थानंद जी महाराज ही उनको बापा करके पुकारते थे तो फिर हम सभी लोग उनको बाबा महाराज कहते थे तो बाबा ने बाबा मुझे लेकर के सब गांव में जाते थे तो अभी होता ऐसा था कि स्टेज पर तो वह खड़े रहेंगे और मैं तो ब्रह्मचारी था ट्रेनिंग सेंटर से आया था तो मैं क्या करता था कि वह किताबें बेचने के लिए जो बुक स्टॉल लगाया या जाता है। मैं वहां पर खड़ा रहता था। चारप वालंटियर हम सभी साथ में भी रहते थे। तो वालंटियर लोग बुक सेल करेंगे और साधु लोग प्रवचन देंगे। किंतु मैं तो ब्रह्मचारी था। मैं क्यों वहां पर स्टेज पर जाकर बैठूं? तो मैं वहां पर वो पीछे में बुक स्टॉल होता था। वहां पर खड़ा रहता था। अभी बाबा जाते-जाते रास्ता में कहते भी है कि तुमको बोलना है। मैंने कहा बाबा मुझे तो कभी बोलने का प्रैक्टिस है नहीं। मैं जाकर क्या करूंगा? किंतु फिर भी अभी मैं ऐसा दो-तीन बार बोला तो फिर बाबा कुछ बोले नहीं ठीक है हम लोग वहां पर पहुंच गए तो पहुंच गए तो अभी मैं वहां पर बुक स्टोल में पीछे खड़ा हूं खड़े-खड़े शांति से आराम से वो आनंद से बाबा का लेक्चर सुन रहा हूं तो उनका लेक्चर जैसे समाप्त हुआ वैसे उन्होंने माइक पर अनाउंस कर दिया कि अभी वो ब्रह्मचारी महाराज पीछे में खड़े हैं वो बोलेंगे मैं तो एकदम टेंशन में आ गया मैंने कहा अरे बाप रे ये क्या हो गया वो जो वॉलंटियर है वो मुझे धक्का मार रहे जाइए महाराज जाइए आपको बुला रहा है मैंने कहा अरे बाप वो कैसे भी करके वह स्टेज के ऊपर गया माइक ऐसे हाथ में पकड़ा इतने सारे लड़के बैठे थे स्कूल तो बड़ी थी छोटी स्कूल में भी इवन 500 600 बच्चे हो जाते हैं फिर यह टीचर प्रिंसिपल इतने सारे सब लोग मेरा हृदय धकधक करने लगा अभी ऐसा नहीं है कि मैंने ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ा नहीं है या वेदांत को नहीं पढ़ा है सब कुछ पढ़ लिया है। छोटे बच्चों के सामने 10 मिनट बोलना यह कोई बड़ी बात नहीं है। मैं आराम से आंखें बंद करके बोल सकता हूं। किंतु एक एंग्जायटी जो होती है, स्टेज फ्राइट एकाएक अपने माइंड में आ जाता है। तो क्या करें, क्या ना करें, एकदम माइंड जो है काम करना बंद कर देता है। तो फिर मैंने बुद्धि यह लगाई कि बुक स्टोल तो था ही वहां से किताब लेकर के मैं आ गया स्टेज के ऊपर में। किताब खोल करके जो लिखा था भीतर में मैंने दो-तीन पेज पढ़ लिए। बिल्कुल सर नीचा करके ऊपर में किसी के सामने बिना देखे और ऐसा करके मैं चला गया वापस भाग गया अपनी जगह पे तो देखिए कि इट इज नॉट अ फियर एक्चुअली क्योंकि फियर कहां से प्रकट होता है? डर कहां से प्रकट होता है? डर प्रकट होता है अज्ञान में से। जब अज्ञान होता है जैसे कि अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश योग शास्त्र में कहे गए हैं। अविद्या यानी कि मुझे पता नहीं है कि मेरा असली स्वरूप क्या है? उसमें से प्रकट होता है अस्मिता यानी कि इस देह के साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन। इस आइडेंटिफिकेशन में से प्रकट होते हैं राग और द्वेष। कोई कोई चीजें मुझे बड़ी अच्छी लगती है। उसके प्रति मेरी बड़ी प्रीति बन जाती है। तो वह है राग। द्वेष है कि किसी के प्रति मेरी घृणा या तो गुस्सा या ऐसा कुछ प्रकट होता है। तो राग और द्वेष में से ही आखिर में प्रकट होता है अभिनिवेश या तो फिर जीवन का भय। तो देखिए कि अविद्या जो है वही है भय का मूल कारण योग शास्त्र की दृष्टि से। तो अर्जुन के हृदय में जो भय प्रकट हुआ तो वह एक क्षण भर के लिए जैसे कि उसने अपना जो क्षत्रिय स्वभाव है क्षण भर के लिए जो उसके भीतर में जो वीरत्व है क्षण भर के लिए उसके पास में गांडीव की जो शक्ति है क्षण भर के लिए उसके साथी स्वयं भगवान कृष्ण है वह भूल गया और शत्रु सेना को देखकर के उसके माइंड में स्टेज फ्राइट या तो फिर एंग्जायटी खड़े हुए। यह ऐसी बात हो गई कि जो महावीर जब वह हनुमान वहां पर खड़े हैं लंका के सामने इस भारत की ओर बीच में बड़ा समुंदर है और लंका में जाकर के खबर करनी है वो जो कि पहले तो रावण को संदेश देना है भगवान राम का देखना है मां सीता का दर्शन करना है तो किंतु कैसे जाएंगे वह तो इतना बड़ा समुंदर है बीच में रामसेतु तो अभी बना नहीं है किंतु उस समय ऐसा था कि हनुमान जी को अपना जो स्वरूप था उनकी जो शक्ति थी वह वो विस्मृत हो गए थे। किसी को उनको वह शक्तियां याद करवानी थी और जैसे ही उनको याद करवा दिया गया कि आपके भीतर में वह शक्ति है। इमीडिएटली हनुमान जी ने छलांग लगाई और वह समुंदर पार करके लंका पे जाकर खड़े हुए। तो ऐसा होता है कि हम सबके भीतर में यह जो जगत है उसका फेस करते-करते बहुत सारी विडंबनाएं, विपद और आप यह जब खड़ा होता है हमारे सामने तो हम लोग भी क्षण भर के लिए डर जाते हैं कि अरे मैं इस मुसीबत का किस तरह से सामना करूंगा। यदि हम स्टूडेंट है तो यदि परीक्षा का डर लगता है, जॉब करते हैं तो जॉब सिक्योरिटी पहले तो क्या था? 9 टू फाइव आपका गारंटी जॉब होता था। गवर्नमेंट का जॉब यदि मिल गया तो फिर आपको 9 से पांच काम करना है। आपका पेंशन पक्का है। आपको निकालने वाला कोई नहीं है। किंतु आज गवर्नमेंट में भी कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम आ गया है। वो 11 महीने का कॉन्ट्रैक्ट करेंगे। आपको परमानेंट रखेंगे नहीं। और प्राइवेट सेक्टर में तो पूछिए ही मत कि कभी भी बॉस फोन करके आपको बोल देगा कि तुमको फायर कर दिया गया है। तो यह जो फियर होता है अपनी जॉब सिक्योरिटी का फियर, इकोनॉमिक सिक्योरिटी का फियर या तो फिर जब बीमारी आ जाती है अपने प्रियजनों के भीतर में या तो हमारे भीतर में तो एक भय हो जाता है। प्रियजनों को शायद गवा दे तो क्या होगा? शरीर में व्याधि प्रवेश हुआ है तो फिर अपना बाकी का जीवन कैसे जाएगा? यह जो फियर और फिर जब हम न्यूज़ पेपर पढ़ते हैं तो और ज्यादा हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है कभी-कभी कि अरे यह सब जगत में क्या हो रहा है? तो यह यह आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तीन तरह की यह जो व्याधियां है, तीन तरह के जो ताप है, वह बीच-बीच में आकर के हमारे सर पर खड़े होते हैं और यह उसके उसको फेस करके ही अपना ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। यह जो नर्वस एंग्जायटी है, या तो फिर यह जो लाइफस्टाइल डिसीज है, वह इसी में से स्टार्ट होते हैं। क्योंकि भय लगता है। भय में से प्रकट होता है। स्ट्रेस और स्ट्रेस में से प्रकट होते हैं। यह जितने भी लाइफस्टाइल डिसीज कहो हाई ब्लड प्रेशर है, हाई शुगर है, हाई कोलेस्ट्रॉल है, वह सब उसी में से होते हैं प्रकट। तो फिर देखिए कि इन सब का सॉल्यूशन क्या है? सॉल्यूशन वैसे अपने उपनिषदों में तो स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि रूपी यह जो जीवन चक्र है उसके परे हमको जाना है। जब तक हम इस देह के साथ में हमारा अटैचमेंट रहेगा। जब तक जीवन के सुख उपभोग को मैक्सिमाइज करने के लिए हम सोचते रहेंगे। तब तक हम इसी चक्की में संसार रूपी चक्की में पीसते ही रहेंगे। पीसते ही रहेंगे। हमको सर्वप्रथम जीवन का जो सही उद्देश्य है वह है मोक्ष प्राप्ति। या तो फिर ईश्वर साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन या तो फिर आत्म साक्षात्कार। यह जो अपने जीवन का उद्देश्य है उसको बड़े ही दृढ़ रूप से अपनी नजर के सामने स्पष्ट करके रखना है। और जैसे ही यह जीवन का उद्देश्य हमारे सामने स्पष्ट हुआ उसके बाद में ही यह जो चारों योग है कर्म, ज्ञान, भक्ति, ध्यान इन चारों का अनुष्ठान यथाशक्ति प्रारंभ कर देना है। कई बार हम लोग सोचते हैं हमको बताया जाता है कि अपना यह जो सांसारिक जीवन है, अपना यह जो कॉर्पोरेट लाइफ है, सोशल लाइफ है, इकोनॉमिकल लाइफ है, पॉलिटिक्स जो है, इन सबको यदि इंप्रूव करना है तो गीता का पाठ आवश्यक है। गीता में से हम मैनेजमेंट करने के लिए सब बहुत कुछ सीखेंगे। अच्छी बात है। बुरा कुछ नहीं है। किंतु यह कैसा हुआ पता है? बहुत कुछ समय पहले मैं एक इंजीनियरिंग का एक एक्सपीरियंस में पढ़ रहा था। एक इंजीनियर जो कि यह जो थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज कहते हैं ना ये यूरोपियन लोग हम तो अपने को थर्ड वर्ल्ड कंट्री नहीं कहेंगे। किंतु वे लोग कहते हैं यूरोप वाले कि यह एशिया अफ्रीका के कंट्री थर्ड वर्ल्ड कंट्री है। तो ऐसा ही एक इंजीनियर एक थर्ड वर्ल्ड कंट्री में जाता है। उसको वहां पे उनको दीवाल में कंस्ट्रक्शन वर्क करने के लिए दीवाल में होल करने के लिए ड्रिल दिया गया था। बड़ा ही सोफेस्टिकेटेड ड्रिल है। ड्रिलिंग मशीन। तो यह जो हाथ से जो ड्रिल चलाना होता है। तो वह पावर उसका सॉकेट में डाल दीजिए। उसका पावर ऑन हो जाएगा। फिर उसका बटन दबाइए। उसके सामने वाला जो लोहे का यह जो होता है वह गोल-गोल घूमना शुरू करेगा। उसको आप दीवाल में जैसे ही मारेंगे तो वह ड्रिल होना छोटा सा होल दीवाल में बन जाएगा कि उसके भीतर में आपको कुछ भी डालना है। नेल डालना है। वो जो भी आप डालना है डाल सकते हैं। अभी यह इंजीनियर ने यह सब ड्रिल दे तो दिया। फिर कुछ समय के बाद में इंस्पेक्शन करने को गया तो देखा कि यह लोगों ने मैसेज किया कि वो ड्रिल मशीन काम नहीं कर रहा है। आप आकर के और कुछ हमको वो जो हथौड़ी वगैरह है वह दे दीजिए। तो यह इंजीनियर कहता है कि अरे भाई हथौड़ी से दीवार में होल करेंगे। उससे बेटर है आपके पास में ड्रिल मशीन वो क्यों काम नहीं कर रहा इंस्पेक्शन करने के लिए वापस गया। देखा तो इन लोगों को पता ही नहीं था ड्रिल मशीन कैसे चलाना है। प्लास्टिक का मशीन था उसको उल्टा करके वह जो नेल था वो ड्रिल मशीन से उसको हथौड़ी की तरह यूज करते थे। हैमर की तरह यूज करते थे प्लास्टिक का मशीन वो नेल दीवाल के भीतर में डालने के लिए। एक बार आप जोर से मारेंगे प्लास्टिक टूट जाएगा। तो एक्चुअली क्या है कि देखिए ड्रिल मशीन का उद्देश्य है उसको पावर में उसको डाल करके फिर उसको चलाना। नहीं कि उसको एक हथौड़ी की तरह एक हैमर की तरह यूज करना। तो यहां पर भी देखिए कि गीता को हम यदि श्रीमद्भगवत गीता को अपना सांसारिक जीवन अच्छा करने के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं। उसके जो टीचिंग्स है उसको इस्तेमाल करते हैं। नथिंग रॉन्ग विद दैट बट वी विल ऑलवेज हैव टू रिमेंबर कि श्रीमद्भगवत गीता का एकमात्र जो सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है वह है कि हमको इस संसार के परे ले जाना। किंतु यह बात देखिए कि गीता हमको यह नहीं कहती कि आप अपने समय से आगे त्याग को स्वीकार कीजिए। जैसे कि ठाकुर कहते हैं ठाकुर कहते हैं एक नारिक होता है। वह जो कोकोनट होता है। कोकोनट के भीतर में वह जो वाइट वो जो कोकोनट रहता है बाहर में उसका शेल रहता है। हार्ड शेल रहता है। भीतर में वो जो वाइट खाने वाला कोकोनट रहता है। तो जब कोकोनट कच्चा होता है तो भीतर का वह जो खाने वाला है वह उसकी दीवाल के साथ में वो वो चिपका हुआ रहता है। किंतु जैसे ही कोकोनट वह मैच्योर हो जाता है। भीतर का जो है वह सेपरेट हो जाएगा। वह जो कोपरा जिसको कहते हैं उसको आप तोड़ करके बाहर वाले शेल को तोड़ करके भीतर वाला खाने का पदार्थ आप आराम से उसको सेपरेट कर सकते हैं। खा सकते हैं। तो जब यह वैराग्य है या तो त्याग है उसको समय के साथ में आना है। प्रीमेच्योर वैराग्य यदि होगा मरकट वैराग्य तो यह अर्जुन की तरह होगा। अर्जुन को अपने जीवन का जो कर्तव्य है उस कर्तव्य को समाप्त करना है। वह कर्तव्य को जब वह निष्ठा पूर्वक निष्काम भाव से समाप्त करेगा तभी उसके अंत में उसको वैराग्य प्राप्त होगा। इसके पहले यदि वह युद्ध के मैदान को छोड़कर के भाग जाएगा तो फिर क्या होगा? वह वैराग्य मरकट वैराग्य की तरह ही होगा। जैसे कि ठाकुर की एक कहानी है। एक ऋषि मुनि ने जाकर के एक राजा को कहा कि राजा आप वन में आकर के मेरे आश्रम में रहिए और वहां पर रहकर के तपस्या कीजिए। तो राजा ने क्या उत्तर दिया कि देखिए अभी भी मेरे मन के भीतर में इतनी कामना वासनाएं हैं कि यदि मैं आश्रम में आकर के रहूंगा तो आश्रम में एक मैं दूसरा राज्य खड़ा कर दूंगा। क्यों? क्योंकि राज्य चलाना यह सब कब होता है? मन के भीतर में संसार के प्रति कामना वासनाओं के प्रति स्ट्रांग एक अट्रैक्शन रहता है। उसी में से यह कर्म प्रारंभ होते हैं। और यह सकाम कर्म में से ही तो फिर यह राज्य शासन वगैरह चलता है। तो जब तक हमारे कर्मों की संशुद्धि नहीं होती, जब तक संस्कार की संशुद्धि नहीं होती, तब तक हम यदि जोर जबरदस्ती करके वैराग्य धारण करेंगे तो वैराग्य मरकट वैराग्य की तरह जैसे वह लड़का नौकरी नहीं मिल रही है। घर छोड़कर चला गया। फिर कुछ दिनों के बाद जब नौकरी मिल गई तो वह घर में पत्र लिखता है कि अब चिंता मत कीजिएगा और एक अंगूठी भी उसने खरीद कर ली। तो ऐसा कुछ हो जाता यदि अर्जुन उस समय अपने कर्तव्य का पालन नहीं करके युद्ध क्षेत्र छोड़कर के चला जाता तो फिर वह जंगल में जाता वन में जाता जहां पर भी जाता वो कभी भी शांति से सुख से नहीं रह पाता और इसीलिए देखिए कि भगवान ने उसको उपदेश दिया कि देखो तुम यह संसार में रहो या तो फिर संसार हमारे लिए है। अर्जुन को कहा कि तुम इसी कुरुक्षेत्र के युद्ध में सर्वप्रथम युद्ध करके अपना जो कर्तव्य है उसको समाप्त कर दो। जैसे ही समय जाएगा युद्ध समाप्त होगा तुम्हारी भी कामनाएं वासनाएं साथ-साथ में ही समाप्त हो जाएगी। इसके बाद में यदि ज्ञान के मार्ग पे त्याग और वैराग्य के मार्ग पर आगे बढ़ना है तो तुम बढ़ना। तो ऐसा हुआ भी सही। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त जब हुआ पांडवों ने क्या किया? परीक्षित को सब राज्य वगैरह दे दिया और अपने से उन्होंने स्वर्गारोहण की यात्रा प्रारंभ की। तो वह जो स्वर्गारोहण की यात्रा जब उनकी सफल इसीलिए हुई क्योंकि उन्होंने युद्ध करके युद्ध का अपना जो कर्तव्य था वह समाप्त कर दिया था। उसको समाप्त करने से पहले यदि स्वर्गारोहण की वह यात्रा करते तो पता नहीं रास्ते में क्या हो जाता। वह कभी सफल नहीं होती। तो मैं आज आखिर में यह जो अर्जुन के जो शोक अर्जुन का जो विषाद है उसको मैं एक बार आज सिर्फ पाठ कर लेता हूं। उसका सिर्फ चेंटिंग कर लेता हूं। यह प्रथम अध्याय का 28 श्लोक है। 28वा श्लोक अर्जुन उवाच धृष्टवम स्वजनम कृष्णा युत्सुम समुपस्थितम सिदती ममगात्राण मुखम च परिशुष्यति वेपथ शरीरे में रोम हर्षण जायते गांडवम संस्थेते हत्वा तव परिदह्यते न च शको व्यवस्थात तुम भ्रमतिव चमे मनः निमितानी चपश्यामि विपरीतानी केशव नच श्रेय नुपस्याम हत्वा स्वजन माहवे न काक्षे विजयं कृष्णा न च राज्यम सुखान च किमनो राज्य न गोविंद किम भोग जीविते नवा य सामर्थ काक्षितम नो राज्यम भोगा सुखानच त इव तमेवस्थिता युद्ध प्राण्यक्त्वा धनाच आचार्या पित पुत्रा तथैव च पितामहा मातुला शसुरा पौत्रा शाला संबंधिन तथा हेतान हंतच्छामि न तोपी मधुसूदन अपि त्रैलोक्य राज्यस्य हेत किम कृते निहत धरा का प्रीति स्या जनार्दन पापमेवा श्रय दस्मान हत ताना हतनाता तस्मान नारहा वयंम हंतुम धत राष्ट्रान स्ववान स्वजं स्वजनम ही कथम हत्वा सुखी न श्याम माधव यद्यपते न पश्यती लोभो पत चेतस कुलक्षय कृतम दोषम मित्र द्रोहे चपातकम कथम नमस्याभह कथम नय मस्माभह पापा दस्स निवर्तितुम कुलक्षय कृतम दोषम प्रपस्य द्व जनार्दन कुलक्षय प्रणसती कुल धर्मसना सनातना धर्मे नष्ट कुलम कृष्णम अधर्मो विभवत अधर्माभवत कृष्ण प्रदुष्यती कुल स्तः स्त्रीशु दुष्टा सुवारय जायते वर्ण शंकर संकरो नरकायव कुलग नाम कुलस च पतती पितरो हेशाम लुप्त पिंडो दक क्रिया दोष रेत दोष रेत कुलग्ना वर्ण संकराकारक उत्साध्य धर्म कुल धर्मास शाश्वतः उत्स कुल धर्म मनुष्यणा जनार्दन नरके नियतम वासो भवत सुश्रुम अतो महत पापम करतुम वयंम यद्राज्य सुख लोभन हंतुम स्वजन मुता यदि माम प्रतिकारम अशस्त्रम शस्त्र पाणय धराष्ट्र रण ह्यो तस्मै तरम भवेत एव मुक्तजुन संख्ये रथोपस्थ उपावत विज सशम चापम शोक संविग्न मानस कृष्ण का अर्जुन का जो पूरा वक्तव्य है उसने किस तरह से एक्सक्यूज बना करके एक के बाद एक भगवान कृष्ण के सामने अपनी व्यथा रखी। अपना विषाद जो है उसने प्रकट किया। अभी इसके बाद में भगवान कृष्ण जिस तरह से एक के बाद एक स्टेप बाय स्टेप उसको अर्जुन को समझाते हैं कि किस तरह से अपना कर्तव्य सर्वप्रथम समाप्त करके स्टेप बाय स्टेप मोक्ष और सन्यास की ओर आगे बढ़ना है। तो यदि हमको और ज्यादा समय मिलेगा भविष्य में तो उसके बारे में हम इसको देखेंगे। आज यहीं पे इसको समाप्त करते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। यह बेसिकली योगशास्त्र का कांसेप्ट है। किंतु योग शास्त्र जैसे कि गीता का ही अंतर्गत पार्ट है। इसलिए देखिए कि अविद्या तो हमको पता ही है कि हमारा मूल स्वरूप है। वही आत्मन जो कि समय, अवकाश और कोजालिटी की सीमाओं से परे है। जिसको कि ना ही तलवार काट सकती है, ना ही पानी भीगा सकता है, ना ही अग्नि उसको जला सकता है। तो वह जो आत्मन है उसको भूल जाकर के हम लोग समझते हैं कि यह जो एक सीमित देह है जिसको कि ईजीली तलवार काट सकती है जिसको कि ईजीली पानी भीगा सकता है जिसको कि ईजीली अग्नि जला सकता है जन्म मृत्यु जरा व्याधि जिसके साथ में हमेशा जुड़ा है वो मैं हूं तो यह हो गई अविद्या और अविद्या जैसे ही माने अविद्या का जो आवरण जैसे ही हुआ वैसे ही मैंने सोचना शुरू कर दिया कि मेरा नाम है कृष्ण सखानंद मेरा जन्म हुआ है अभी यही 30 35 35 40 साल पहले और अभी और इतने कुछ साल जाएंगे तो फिर मैं मर भी जाऊंगा। तो यह एक जो एक कनेक्शन बैठ गया है छोटे से देह के साथ में। उसके बाद में होता क्या है? राग और द्वेष। कुछ-कुछ चीजें हैं जो कि मुझे पसंद है और कुछ-कुछ चीजें मुझे नहीं पसंद है। जैसे नहीं पसंद होने वाली चीजों में मैं एक बात बताऊं कि यह नॉर्थ इंडिया में ज्यादातर समय में बिताया है तो वहां का जो टेस्ट है खाने का और यहां जो साउथ इंडिया का खाना वो बड़ा डिफरेंट लगता है। कभी-कभी लगता है यहां का खाना कभी अच्छा नहीं लगेगा। तो फिर मैं क्या करूंगा ऐसा करके किंतु देखिए कि साधु हुए हैं तो फिर जी्हा का टेस्ट तो नहीं होना चाहिए। जो अस्वाद व्रत जो होता है वह तो हम सब क्योंकि कभी भी कहीं पर भी पोस्टिंग हो सकता है। पहली बार मैं जब बेलूर मठ में गया था तो वहां का खाना नहीं अच्छा लगता था। किंतु बेलूर मठ छोड़कर के जाएंगे कि भी कहां वो तो अपना घर है। तो फिर कैसे भी करके वह खाने का हैबिट बनाया। तो यह जो राग और द्वेष यह चीज मुझे अच्छी लगती है। यह चीज अच्छी नहीं लगती। अभी अभिनिवेश कहां से प्रकट होता है? यह भय लगता है कि जो चीज मुझे अच्छी लगती है वह मेरे पास में से छीन ली जाएगी और जो चीज मुझे अच्छी नहीं लगती है मुझे कभी जोर जबरदस्ती करके उसको करना पड़ेगा जैसे कि मुझे अच्छा लगता है नॉर्थ इंडियन खाना तो वह खाना मेरे से छीन लिया जाएगा तो फिर मैं इस तरह से मैं कुछ भी नहीं जैसे कि जॉब है जॉब सिक्योरिटी है वह बड़ा ही कि ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिससे कि अपने जो बॉस होते हैं वह अपने से नाराज हो जाए और मुझे नौकरी से निकाल दे तो वह भाई भय बना है। भय क्यों बना है? क्योंकि मुझे जॉब सिक्योरिटी चाहिए। और जॉब सिक्योरिटी क्यों चाहिए? क्योंकि मुझे संसार चलाना है। संसार क्यों चलाना है? संसार के प्रति आकर्षण है। और किस चीज के प्रति मेरा घृणा है या तो अच्छी नहीं लगती। तो जिन लोगों को मैं भिखारियों को देखता हूं रास्ते पर आते-जाते उन लोगों जैसा मुझे नहीं बनना। उन लोगों के प्रति मेरा द्वेष है। तो उन लोगों जैसा मैं ना बन जाऊं। नौकरी मेरी ना छीन जाए। उसके लिए मुझे जो वहां पर कहा जाएगा वो एथिकल हो ना कि अनएथिकल हो मुझे उसको करना है। तो वो डर के मारे जो कर रहा हूं तो डर इसी में से प्रकट होता है कि मेरी पसंद की चीज मेरे हाथ से ना चली जाए। जो चीज मुझे नहीं पसंद है उसको मुझे कहीं कंपलसरी ना करना पड़े।