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Ma Sarada Life ·

Ma Sarada devi 7 July 2023 मातृसान्निध्ये : स्वामी ईशानानन्द लिखित

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तो मंत्र साहित्य किताब में से हम पाठ कर रहे थे इस को अभी आगे बढ़ाएंगे पिछली बार हमने देखा की किस तरह से ब्रह्मचारी जादू नाथ शरद महाराज की बात सुनकर के मां के लिए भर बारिश में तूफान में 108 पद्मभ फूल चुन्नी के लिए जाता है और फिर जब वो वापस आता है मां उसको सर पर हाथ रख के आशीर्वाद भी देती है किंतु फिर पता चला की कुछ दोनों बाद इसी ब्रह्मचारी को मलेरिया हो गया और वो हमारे कनखल सेवा आश्रम में संज्ञान शरीर त्याग किया संज्ञान अर्थात की आखिरी तक महाराज जी होश में थे और मां का नाम स्मरण कर रहे होंगे ऐसा हमको किसी ने बताया नहीं है किंतु हम अवश्य यह सब अनुमान कर सकते हैं और मैन उनको आखिरी समय दर्शन भी दिया होगा यह भी हम अनुमान कर सकते हैं तो यह ब्रह्मचर्य की बात हुई समाप्त अभी हम एक दूसरी प्रसंग है निशानानंद जी महाराज जो करते हैं उसका पाठ करेंगे महाराज जी लिखने हैं 13 पूजा दिन सोकल केदार बाबू राजेंद्र और ई जेरंबाती जय 1318 की साल की जगतद्री पूजा के समय में राजेंद्र बाबू राजेंद्र और केदार बाबू हम तीन लोग जयरामबाती गए अब यह 1318 बंगाली एयर है और इंग्लिश एयर जो होता है वो तकरीबन 6 से 7 साल इसमें से माइंस करके मिलता है यानी की 18 है तो हम अनुमान लगा सकते हैं की 1912 का यह समय होगा और ये जो केदार बाबू की बात की गई है राजेंद्र की बात की गई है तो मैंने ये पहले भी हमने डिस्कस किया था की ये तीन जो थे केदार बाबू का वहां पर विद्यालय था और इस विद्यालय के यह सब स्टूडेंट है केदार बाबू अपने से टीचर थे तो केदार बाबू ने यह स्वदेशी वगैरा आंदोलन के समय में उन्होंने सोचा की चलो मैं अपने विद्यार्थियों के साथ में यह स्वदेशी आंदोलन में भाग लेट हूं तो यह सब उनके स्टूडेंट राजेंद्र वर्मा वगैरा और केदार बाबू थे उनके शिक्षा किंतु फिर जैसे धीरे-धीरे आश्रम की तरह होने लगा फिर बहुत सारे लोगों ने इसमें से सन्यास भी लिया केदार बाबू ने सन्यास लिया था नाम हुआ था स्वामी केशव आनंद है तो यह तीनों जगतद्री पूजा के आगे समय जयरामबाती गए थे हमारी वर्दमाराज कहते हैं हम लोगों की जो हमारे घर में जो खेत की ये जो सब सब्जी शक वगैरा जो निकलता है वो जो पटा है वो मैं साथ में लेकर गया था जय अंबाती में खूब आनंदी तो हो हिले एवं बोलते लागेलें एक खान है थोड़ी-थोड़ी मिले ना माझे माझे बड़ों मुश्किलें पढ़ने हुए यहां पर तरकारी वगैरा सब समय नहीं मिलता है और बीच-बीच में बड़ी ही मुश्किल में पढ़ना पड़ता है की जय राम बाटी में तो सब्जी वगैरा सब समय नहीं मिलता है तो मैं देख रही हूं की ठाकुर ही है जो की तुम लोगों के मध्य से यह सब जुगाड़ कर दे रहे हैं आर्मी वोल्वो बायोस्कोप बोलिए महाराज की उम्र कम थी तो मां क्या करती थी जो भी छोटा मोटा कम होता था वो वर्धा महाराज को दे करके करवाती थी और कहती थी तुम मेरे साथ में ही रहो देखिए कितना बड़ा भाग्य की बात है की कोई मतलब यदि मतलब हमको तो मां का दर्शन भी दुर्लभ है और वर्धा महाराज को देखिए की मां का हर छोटा-छोटा कम करने के लिए मां खुद कहती है की तुम मेरे पास में ही रहना कोई दिन सुंदरपुर शिलांग तो देवेंद्र बाबू प्रभृति ठाकुर नाम लीला कीर्तन कोरिया मां के सुने लेने इस दिन शाम को शिलांग के भक्ति थे उनका नाम था देवेंद्र बाबू वो जयरामबाती आए थे और ठाकुर का नाम कीर्तन कर करके सातों नाम कीर्तन मैन 1909 का जो कीर्तन होता है वो करके मां को सुनाया था अभी यहां पे हमारे आश्रम में जो लोग हमारे मंदिर का नियमित जो लोग दर्शन करने के लिए आते हैं तो राम नाम संकीर्तन है फिर मानव संकीर्तन है शिवा नाम संकीर्तन है इस तरह से नाम संकीर्तन नियमित रूप से हमारे यहां पे होता है तो क्या होता है की 108 नाम होते हैं मां के या तो फिर भगवान शिवा के इस तरह से फिर ये नाम के आगे में फिर जी तरह से कुछ तोत्र वगैरा होता है भगवान की स्तुति के लिए और फिर ऐसे ही किसी स्तोत्र के साथ में यह नाम संकीर्तन समाप्त होता है तो बहुत ही एक सुंदर एक भक्तिमय वातावरण मंदिर में उसे समय यू खड़ा होता है बहुत सारे भक्ति पता चला है की नाम कीर्तन ए आज तो इस को सुनने के लिए इस में पार्टिसिपेट करने के लिए आते हैं और वह जैसे की राम नाम संकीर्तन है तो इतना सहज होता है वो चांटिंग करना की वो साथ-साथ में जैसे वो हमारे वो महाराज ग रहे हैं उनके साथ-साथ में ही वे लोग भी ग सकते हैं बहुत ही सुंदर वातावरण बंता है तो यहां पे लिखा है की देवेंद्र बाबू आए थे शिलांग से और शाम को मां को ठाकुर का नाम संकीर्तन करके सुनाया था है इस समय से ठाकुर का नाम ठाकुर के ऊपर में स्तोत्र वगैरा है वो रचना उसकी होने की शुरुआत इस समय से हो गई थी इसीलिए देखिए की स्वामी जी का वो जो ये है ना स्थापक धर्मस्य यह श्लोक स्वामी जी ने एक जगह पे वो पूजा करने के लिए गए थे एक भक्ति के वहां पे तो उसे दिन ठाकुर का वो कुछ उत्सव भक्ति ने रखा था तो स्वामी जी गए और पूजा के आसन पर बैठे और आसन पर बैठकर के उन्होंने कुछ ही क्षण में यह श्लोक की रचना कर दी स्थापत्य धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूप है यह श्लोक की रचना स्वामी जी ने वैसे ही दो ही मिनट में बैठ करके कर दी थी तो इसी तरह से ठाकुर के ऊपर मैं स्तोत्र है भजन है वगैरा की रचना तो इस समय से आरंभ हो गई थी स्वामी जी ने की है काली महाराज ने की है बहुत सुंदर सुंदर स्तोत्र इस समय से रचे गए थे तो अभी उसका पाठ भी जो है मां के सामने यह भक्ति ने करके सुनाया पूजा और दिनेश लाडू इत्यादि जगाधरी देवी प्रसाद आमदर कपड़े बंधिया डिलन पूजा के दूसरे ही दिन ये लोग कल पड़ा वापस चले आए और मैन क्या किया जो प्रसाद वगैरा होता है वो मुड़ी अर्थात की मामराज जिसको कहते हैं लाडू है लड्डू है वो सब इनको दे दिया साथ में की वहां पर भी क्वालपाड़ में भी जो भगत है उनको भीतर में बांटना आपके परिवारजन है उनको भी प्रसाद का लाभ मिला बोल करके मैन इनको प्रसाद देती है श्री श्री मां जैसे था की दिन तो खून नहीं अमृत सकता है तहर जुन्नु टोरी तोर कारी कीमिया माताजी कोरिया लोहिया जय तम इस समय से हम लोग क्या करते थे वर्धा महाराज लिखने थे की हम लोग नियमित रूप से या तो हमारे खेत में पक्की हुई सब्जियां या तो फिर पास का जो शहर है बड़ा शहर जो है बड़ा तो नहीं है वो सब तो और एरिया ही है किंतु यह जयराम भाटी कोयल पड़ा से तो बड़ा ही है तो कोतुलपुर में से वो वहां के बाजार में से सब्जियां खरीद करके वो अपने सर पे रखकर के जय राम बाटी में जाते थे और मां को वो सब देते थे मां कोनो कोनो दिन आभार मसाला तेल आता इत्यादि हल्दीग्राम जो यह डर दुकान यह सब लेकर आओ तो यह लोग क्या करते थे वहां पास में एक दूसरा गांव था वहां से हल्दीग्राम गांव का नाम है हल्दीग्राम और एक दुकान थी बोलकर के कोई होगा उसकी दुकान है वहां से यह नमक फिर यह तेल वगैरा खरीद करके वह जयरामबाती जाकर के मां को देते थे कल पड़ा आश्रम में आर्थिक अवस्था मोटे अक्षर खिलौना प्रकार आश्रम चली तो ग्वालपाड़ा आश्रम की स्थापना तो केदार बाबू ने कर दी किंतु आर्थिक अवस्था तो कहां से अच्छी होगी ऐसा तो नहीं ए करके डोनेशन देता है गांव है छोटा लोग अपना घर चला सके इस में सबको संतुष्टि है ऐसा एक्स्ट्रा मनी एक्स्ट्रा इनकम कहां होने वाला है ज्यादातर तो किसान है या तो फिर छोटी मोती दुकान चलते हैं या तो फिर इन लोगों का कोई छोटा मोटर ट्रेड राहत है कोई व्यवसाय राहत है तो इसमें कहां से वे लोग डोनेशन के लिए पैसा जुगाड़ करेंगे ये केदार बाबू ने साहस करके इस तरह से आश्रम की स्थापना की वही एक बहुत बड़ी बात है तो कैसे भी तरह से यह लोग अपना गुजरात चला रहे थे हालांकि ये सभी के घर में वैसे तो देखा जाए तो ईशा आनंद जी महाराज के घर में भी हम देखते हैं की खाने पीने का तो ऐसी कोई समस्या नहीं थी वो लोअर मिडिल क्लास कहे जा कर सकते हैं या तो फिर मिडिल क्लास भी का सकते हैं जी तरह की उनकी अवस्था थी और शुरू में तो सभी ने घर त्याग करके आश्रम में नहीं ए गए थे रहने के लिए घर के साथ में सब संपर्क नहीं तोड़ दिया था उसे समय वो तो सन्यास लेने के बाद की बात है तो वैसे आश्रम की अवस्था वैसे इतनी अच्छी नहीं थी किंतु हम अनुमान करके का सकते हैं की साधु लोगों का खाने-पीने रहने का जो व्यवस्था है वो तो अपने अपने घर में ठीक ही हो रहा था साधु तो नहीं है यह सब उसे समय वो आंटी अर्थ है बाद में इन लोगों ने सन्यास ग्रहण किया भक्ति थे बाद में सन्यास ग्रहण किया साधारण निकट हुए थे चंद अब दान ग्रहण कोरा हुई तो ना किंतु देखिए साथ में साथ में क्या लिखने हैं जान सामान्य से लोगों के पास से हम लोग चंदा या तो फिर दान ग्रहण नहीं करते थे क्यों नहीं ग्रहण करते थे की लोगों का एक प्रिंसिपल होता है की हम लोग डोनेशन के ऊपर में नहीं हमारी हमारी खुद की मेहनत है यह क्योंकि यह तो चरखा काटते थे ना चढ़े में से ये मुकद्दर का कपड़ा बनाते थे उसको सेल करके हम लोग अपना निर्वाह करेंगे तो इस तरह से एक भावना होती है तो इसलिए वे लोग डोनेशन भी कलेक्ट नहीं करते थे सृजों अमर आश्रम देखिए कितना मतलब प्रिंसिपल और कितना आदर्शवादी बात की इसीलिए चरखा बोना हो चढ़े में से वो खड्डर का कपड़ा बनाना होगा ये तो इसमें तो दिन सब चला जाएगा तो समय कब मिलेगा या तो डेरी शाम को या तो फिर संध्या हो गई है उसे समय इनको समय मिलेगा तो फिर उसे समय संध्या के समय आश्रम का समाज संपूर्ण कम समाप्त करके फिर वे लोग मैन यह जो फरमाइश की है मैन ये जो सब कहा है की वहां से नमक ले आना तेल ले आना या तो फिर सब्जी वगैरा ले आना तो शाम को डेरी तक उनको समय मिलता था फिर वे लोग यह सब लेकर के जय राम बेट जाते थे लोगों की उम्र कम थी और इस तरह से सर के ऊपर में ये बोसा लेकर के चलने की सर के ऊपर में बाहर लेकर के चलने की चीज लेकर के उनको अभ्यास नहीं था उनको हैबिट नहीं थी तो बीच-बीच में तक जाते थे तो क्या करते थे वो जो भी चीज वस्तुएं जो है वो बोरी जो भी रखा होगा वो नीचे में उतरेंगे थोड़ा सा विश्राम करेंगे फिर से थोड़ा अपने सर पे लेकर के चलेंगे किंतु मां का भाव सब समय यह राहत था की कब कहानी जाकर के जय राम बाटी पहुंचे मां के साथ मां का दर्शन करें मां का आशीर्वाद प्राप्त करें और हम यह हनुमान भी कर सकते हैं की वह कितना सुंदर वो गांव का वह तो परिवेश है वो खेत और खेत होते हैं खुला खेत होते हैं में से यह जो धन वगैरा लहरा रहे हैं या फिर वो दूर-दूर में पेड़ होंगे फिर बीच-बीच में वो वेस्ट बंगाल में तो इतनी सारे वो तालाब वगैरा आते रहते हैं तो ताला वगैरा होते हैं बीच-बीच में तो इतना सुंदर ये मतलब प्राकृतिक दृश्य प्राकृतिक परिवेश इसमें से राज चलते चलते ये लोग जयरामबाती जा रहे हैं मां के भीतर में मां के प्रति जो निष्ठा और भक्ति है वो इतनी तीव्र है की ये जो सर के ऊपर में बोसा लेकर के जा रहे हैं ये भर उसकी थकान उनको जरा सी भी महसूस नहीं हो रहे चले ही जा रहे हैं चलते ही जा रहे हैं और फिर आखिर में जय रामबाती पहुंचेंगे और संध्या का समय है फिर ऐसा नहीं है की दिन का समय संध्या का समय है धीरे-धीरे करके सूर्य देवता अस्त हो रहे हैं आकाश में एकदम संध्या का समय तो पता है ना की वो साधना के लिए उत्कृष्ट समय है ठाकुर खुद कहते थे की जब संध्या हो जाए तो सब कम रख करके ईश्वर का नाम लेना चाहिए और यह लोग क्या करते थे संध्या होने से ही सब बाकी वो जो दांत ये जो चरखा घूमना फिर ये खड्डर का कपड़ा बनाना आश्रम का जो साफ सफाई करना और जो भी कम लोप करते होंगे खाना बनाना वगैरा वो सब रख कर के वो महाकाल नाम लेते लेते मां का कम आरंभ करेंगे मैन देखिए की कर्म और साधना किस तरह से हमारे संघ में इतना धनिष्ठा रूप से एक दूसरे के साथ में बना हुआ है एक दूसरे के साथ में संलग्न है हम लोग कभी यह नहीं कहते की कर्म छोड़ कर के ध्यान करो या ध्यान छोड़कर के कर्म करो ध्यान और कर्म साथ-साथ में कर सकते हैं जब और कर्म साथ-साथ में हो सकता है यह हम लोगों का दृढ़ विश्वास है क्योंकि हमने ऐसा होते हुए देखा है इस तरह से स्मृति कथाओ में हमने पढ़ा है हमारे जो सीनरी साधु है उनके जीवन में हमने इस आदर्श का चरितार्थ होते हुए प्रति फलित होते हुए या तो फिर कहेंगे प्रैक्टिकल होते हुए हमने देखा है मैंने यह सिर्फ थ्योरी नहीं है की एक हद से जब करो दूध से हाथ से कर्म करो यह कोई थ्योरी नहीं है रामकृष्ण मिशन में ये वास्तविक सत्य है बहुत सारे साधु जो लोग सिंसियर है एक निष्ठा है उन्होंने इस आदर्श को इस टीचिंग को ठाकुर्मा स्वामी जी के अपने जीवन में उन्होंने उसको प्रैक्टिकल करके दिखाए है तो संध्या का समय सर के ऊपर में बोसा रख करके ये वर्धा महाराज और उनके साथ में और कोई राजेंद्र होगा वगेरा कोई उनके बंधु और फिर बाद में सब इन लड़कों ने सन्यास लिया तो यह सब एक किया दो होकर के अपने सर पे बोसा रख करके जा रहे हैं प्रकृति का इतना सुंदर दृश्य किंतु उनके हृदय में जो है बार-बार मां का नाम ही रिपीट होता होगा या तो फिर ठाकुर का नाम ही रिपीट होता हो गई ये लोग तो अपने मुंह से ऐसा कहेंगे नहीं की हम लोग इतना यूनिवर्स जब करते थे या तो इतना सब कुछ करते थे यह साधनाएं करते थे जो भी स्मृति कथा पढ़ेंगे उसमें कभी भी कोई जो साधु स्मृति कथा का रहा है ये कभी नहीं रहेगा की मैंने क्या साधना कर दी मैंने कितना जाप कर दिया यह मास्टर महाशय का इतना बड़ा कथा अमृत उन्होंने लिखा किंतु अपने खुद के बड़े में कहानी पे भी कुछ भी नहीं लिखा आप बस वो ठाकुर को प्रश्न कर रहे हैं ठाकुर उसका उत्तर दे रहे हैं इतना ही कथा अमृत्व में है किंतु फिर बात बात में जब दूसरे साधुओं से दूसरे भक्तों से मास्टर महाशय की जीवनी के बड़े में मास्टर महाशय के ऊपर में श्रुति कथा जब पढ़ने हैं तब हम को सुनकर के पढ़कर के आश्चर्य होता है की अरे मास्टर महाशय इतने साधना करते थे तो उन्होंने खुद क्यों नहीं लिखा कथा मूल रूप में की हां मैंने ठाकुर के पास में यह बात सुनकर के वहां पंचवटी में जाकर के पुरी रात भर जब किया या पुरी रात भर ध्यान किया ऐसा मास्टर कहानी नहीं लिखने हैं तो यह लोग लिखने हैं सिर्फ अपने इस्ट देवता के बड़े में सिर्फ के बड़े में जिनके ऊपर में इनकी एक निशीथ भक्ति है नहीं की अपने बड़े में की हां हम लोग मां का यह मां के लिए धन है या तो फिर मां के लिए नमक है तो फिर तो तेल है या तो फिर सब्जी है ये सब लेकर जा रहे हैं जयरामबाती सर के ऊपर में बोझ भी है बीच-बीच में तक भी जा रहा है और बीच-बीच में बोसा किसी पेड़ के नीचे में रख करके हम लोग विश्राम भी कर लेते हैं किंतु सतत मां के भीतर में मां का नाम स्मरण चल रहा है या तो फिर ठाकुर का नाम स्मरण चल रहा है यह लोग अपने मुश्किल यह बात कभी भी नहीं करेंगे यह सब चीज हमको अनुमान करके ये सब स्मृति कथाओ में जोड़नी है सूती कथाओ में यह सब चीजों को एड करना है कोनो कोनो दिन संधर्व पर जिया दीक्षित मां बिछाना शून्य चौक भुजिया एक तो विश्राम को रितेश दिन जयरामबाती में जाते-जाते संध्या भी बीट जाति थी रात रात्रि आरंभ हो जाति थी अंधेरा हो जाता था देखते थे जाकर के की मां अपने बचाने पे लेती हुई विश्राम कर रही है बा कौन शिकाई रखिबे शॉप बोलिया देते हैं मां सोते-सोते ही कौन सी चीज कहां पर रखती है कौन शिकाई रखते हुए शिकार की वो जो छठ के ऊपर में से रस्सी के द्वारा जो टांग ते है कोई एक मिट्टी का पत्र जिससे की उसमें कीड़ी चीटियां हैं या तो फिर और कोई जीव जंतु है उसमें ना प्रवेश कर जाए इसके लिए छठ के ऊपर में से रस्सी के द्वारा मिट्टी का कोई पत्र टांग ते है तो कौन सा शिक उसको बांग्ला में बोलते हैं शिक तो इसमें वह कौन सी चीज उसमें रखती है ना की और घर में कहां पर रखती है मांस सोते-सोते ही इनको बता देती थी अमरावती निर्देश मटन जिनेश कुली जत्थस्थ ठाणे रक्षा देता हम लोग भी जैसे-जैसे मां रहेगी वैसे-वैसे सब चीज रखते जाएंगे कोरिया लेट इसी तरह से हमने कुछ दिन जाएंगे तो पता चल जाएगा की मां रहेगी की सब्जी है वह यहां पे रखो नमक है यहां पे रखो आता है यहां पे रखो तेल जो है वो यहां पे रखो मैप कुछ दिन जान से तो ये सब समझ जाएंगे फिर हम आपको बताना नहीं पड़ता था हम जो चीज जहां पर रखती है ठीक इस से जगह पर उसको रख देते थे देखिए कर्मयोग में आदर्श स्वामी जी कहते हैं ना की बड़ा कम तो कोई भी कर सकता है लोगों की नजर के सामने जिससे की लोग क्योंकि एक लोगों के सामने रिकॉग्निशन मिलन एक बहुत पावरफुल मोटिवेशन मोटीवेटिंग फैक्टर है तो मैं इतना बड़ा कम करूंगा लोग मेरे सामने देख रहे हैं और चाहे मेरे मुंह पर मेरी प्रशंसा ना करें किंतु अपने मां में मां में तो अवश्य यह हम लोग सोचते होंगे अरे भाई इतने इस इस आदमी ने कितना अच्छा कम कर दिया वगैरा तो लोगों की प्रशंसा प्राप्त करना लोगों की ये जो एक रिकॉग्निशन प्राप्त करना इससे ये बहुत ही पावरफुल मोटिवेशन है ये मोटिवेशन हमको बड़े-बड़े कम करने में बड़ा सहायता करता है जैसे की कोई बहुत बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी चला ली ना की कोई बहुत बड़ा मैंने म्यूजिक कंपोजिशन कर दिया ना की कोई मेरे बहुत बड़ा साहस जैसे की एवरेस्ट सर कर लिया वो जो एडमंड हिलेरी का जो है कहानी हमको पता है की एवरेस्ट पे जाकर के इतनी मेहनत करके वो एवरेस्ट शिखर जो है वह उन्होंने उसके ऊपर सर्वप्रथम मनुष्य अभी मैंने सर्वप्रथम वेस्टर्न परसों अदर वाइस तो वहां के वह जो शेरपा है वगैरा नेपाली शेरपा वे लोग तो नियमित जाते ही होंगे और आज वो भले ही हम लोग कहेंगे की यह सबसे पहले था शेरपा लोग या हमारे ऋषि मनी तो कब से वो कैलाश ए शिखर पर गए होंगे हमारा कोई हमारा कोई संस्कृत में नाम भी होगा पता नहीं है किंतु जो भी है अभी अब वेस्टर्न दुनिया के साथ में चल रहा है तो कहना पड़ता है की उसका नाम एवरेस्ट है और फिर एडमंड हिलेरी और फिर उसके साथ में जो उसका गाइड था वो नेपाली इन दोनों ने सर्वप्रथम वो शिखर सर किया शिखर जय किया सर्वप्रथम उसके ऊपर चढ़े थे तो अभी ये तो पुरी दुनिया देख रही है ना इतना बड़ा कम आपने किया तो वो करना वो मोटिवेशन फैक्टर आपको बर्थ बर्फ का तूफान भी है बड़ी खाई भी है नजर के सामने ये सब क्रॉस करने में ये सब पर करने में ये मोटिवेशन फैक्टर हेल्प करता है किंतु यह छोटे-छोटे कम जो है मैन कहा की मेरे लिए यह चीज ले आना सर के ऊपर में बोसा रख करके कल पड़ा से जयरामबाती जाना फिर वहां मां जो-जो कहती है यह यहां पर रख दो ये यहां पर रख दो तो एक्जेक्टली अभी कुछ दोनों में समझ लिए फिर एक्जेक्टली कौन सी चीज कहां पर रखती है यह देखने में इतना नाग दुनिया सा कम होता है किंतु जो चीज अभी कोई उसके बड़े में नहीं सुनता या कोई इसके प्रशंसा नहीं करता या तो फिर यह जो चीज आप ईश्वर के प्रति श्रद्धा और निष्ठा के साथ करते हैं यह ठीक-ठीक करना यह कर्म योग से इसलिए स्वामी जी कहते हैं छोटा छोटा कम जो है वो बड़े ही मतलब वो एफिशिएंट रूप से निकुंता भावे बांग्लादेश बोले एकदम परफेक्टली जो कर सके वो उसको कहा जाएगा की उसने कर्मयोग में वो जो है सिद्धि प्राप्त की है मास्टरी प्राप्त की है बाद में मां को बोलना नहीं पड़ता था की कौन सी चीज कहां पर रखती है हम लोग अपने से ही ठीक कर लेते थे की क्या कौन सी चीज कहां पे रहेगी प्रणाम कोरले मां माता इक्टू लिया तो मदर चैतन्य हो भक्ति विश्वास हो इत्यादि बोलियां आशीर्वाद कोरिया की ऊ मुड़ी लेते बोली देन एवं प्रायदें ही बोली देन आई मात्रक उमादेर कथा भक्तशिला एवं गाजर का था वह लोग बोले थे चिलम इत्यादि जब चीज वगैरा रख दी उसके बाद में मां थोड़ा सा अपना सर उठा करके वृद्धा माथी शरीर भी मतलब बार-बार बीमा हो रहा था तो थोड़ा सा सर उठा करके मां आशीर्वाद देती थी तुम तुमको भक्ति प्राप्त हो तुमको चैतन्य प्राप्त हो चैतन्य प्राप्त होना अर्थात मेरा जो असली स्वरूप है मेरा जो ट्रांसफर रूप है इस आत्मस्वरूप का दिशा होना की मैं यह शरीर नहीं हूं मैं इंद्रियां नहीं हूं या तो फिर मैं इस इंद्रियों के भोग नहीं हूं मैं तो हूं सच्ची आनंदमय आत्मा तो यह ज्ञान होना इसी को चैतन्य होना कहते हैं ठाकुर ने भी पहले जान वाली को जी दिन कल्पतरु हुए थे तो यही आशीर्वाद दिया था की तुम दिल चैतन्य हो तुम लोगों को चैतन्य प्रताप हो तो मां भी इस तरह से आशीर्वाद देती थी और फिर कहती थी की देखो वहां पे थोड़ा सा ये मुरमुरा है मरा है वो का लो या तो फिर ये का लो ऐसा करके कुछ खाने को देती थी और फिर बोलती थी की देखो अभी जस्ट कुछ ही समय पहले मैं तुम्हारे बड़े में सोच रही थी मैं तुम्हारे बड़े में सोच रही थी की कहां हो क्या कर रहे हो तो इस तरह से मां कहती थी और कहती थी की तुम्हारे बड़े में सोच रही थी और यह सोच रही थी की तुम को कौन-कौन सा कम देना है अभी जब तुम आओगे मैं सोच के रखा है जी तरह से आज हम अपने वह यह नोटपैड वगैरा होता है उसमें हम लिख देते हैं और टास्क सब लिख देते हैं तो यह करना है यह करना है मां अपने दिमाग में सब टास्क फिट करके रखती थी वह सब एक के बाद एक कौन सा लड़का आएगा इसको क्या उससे क्या कम उसको देना है अमरा शुकुल कोठा शून्य मुड़ी अचले लोहिया खाए थे असमीज फ्री तम हम लोग सब बात सुनते थे और ठीक कर देते थे की कौन सा कम कब होना है कैसे होना है और फिर अपने वस्त्र में थोड़ा सा यह मुरमुरा है वो बंद करके खाता खाता पवाड़ा आश्रम में फिरते थे कोनो कोनो दिन रात्रि प्राय बरोटा हो या जाए तो कभी-कभी तो आश्रम में वापस आते आते रात को 12:00 बाज जाते थे और यह जो सुंदर कथा वो बात कहीं है ना यहां पे ये जो मुरमुरा जो है मुड़ी जो है अपने वस्त्र में बंद करके रास्ते में खेतन में से खेत में से वो जंगल में से खाते-खाते कल पड़ा ए रहे हैं यह पढ़कर के ही वो ठाकुर की बात याद आई है की ठाकुर को भी मां चंद्रमणि देवी ने उनके वस्त्र में उनके थोड़ा सा वह मुरमुरा बंद के दिया था और वह ठाकुर भी इस तरह से खाते-खाते जा रहे थे देखा की आकाश में एकदम कल कलर के बादल छ गए हैं मेघ छ गया है और उसमें यह सफेद बगलान की हर एक लाइन करके सफेदी ये जो बेंगल हैं वो उड़ते उड़ते जा रहे हैं तो इतना सुंदर दृश्य प्रकृति की ये जो शोभा है वो इतनी सुंदर है की उसने ठाकुर के मां को इस तरह से एकाग्र कर दिया की ठाकुर को पहले ईश्वर दर्शन कहो ना की आत्मा स्वरूप का ज्ञान हुआ पहले दर्शन पहले भववेश बांग्ला ते बोले सबसे पहले बार ठाकुर को भाव हुआ और वो वहीं पर गिर गए मुरमुरा जो था वो खेत की वो जमीन में गिर गया खेत में और वो भाव में चले गए तो अभी इतना सुंदर परिवेश भी हमारे मां को जैसे हम कभी-कभी सोचते हैं ना की मंदिर में जाएंगे भगवान की मूर्ति के सामने बैठेंगे तो हम हमारा मां एकाग्र होगा किंतु ठाकुर का सबसे पहले मंदिर में या तो कोई भगवान का नाम लेते लेते या तो भगवान के सामने खड़े रहते नहीं हुआ था और सबसे पहले भाभावेश हुआ था प्रकृति के सौंदर्य को देखते हुए तो अभी यह लोग भी अपने वस्त्र में मुरमुरा बंद करके ए रहे हैं जय राम पड़ा वापस और प्रकृति का इतना सुंदर नजर चारों और है तो हम लोग भी अनुमान करके का सकते हैं हनुमान करके सोच सकते हैं की उनका मां भी किस तरह की आध्यात्मिक ऊंचाई को छूटा होगा ये रास्ते में आते आते तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा