Invocation
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में से एक प्रवचन माय
वैश्विक वेदांत
प्लान ऑफ कैंपेन इसको हम पढ़ रहे हैं। यह जो पैसेज है इसको हमने कल पढ़ा था ग्लोबल वेदांत। इसका जो लास्ट जो पैराग्राफ्स है उसको फिर से एक बार पढ़ के उसके ऊपर में थोड़ा सा विशेष चर्चा करते हैं। क्या कहते हैं स्वामी जी? दैट आई वेंट टू अमेरिका वाज नॉट माय डूइंग और योर डूइंग बट द गॉड ऑफ इंडिया हु इज गाइडिंग हर डेस्टिनी सेंट मी एंड विल सेंड 100्स ऑफ सच टू ऑल द नेशंस ऑफ द वर्ल्ड। मैं अमेरिका गया था। इसमें ना ही मेरी कोई पढ़ाई है ना ही आपका कोई कंट्रीब्यूशन है। यह जो भारत के जो भाग्य विधाता है उन्होंने ही मुझे अमेरिका भेजा था। और मेरे जैसे सैकड़ों युवकों को पूरे विश्व में भेजेगा सनातन हिंदू धर्म का प्रचार करने के लिए। नो पावर ऑन अर्थ कैन रेजिस्ट इट। विश्व की ऐसी कोई भी सत्ता नहीं है। विश्व की ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है कि जो कि इसका मुकाबला कर सके। इसका विरोध कर पाए। दिस आल्सो हैज़ टू बी डन। इसको भी करने की जरूरत है। यू मस्ट गो आउट टू प्रीच योर रिलीजन प्रीच इट टू एव्री नेशन अंडर द सन। प्रीच इट टू एव्री पीपल। दिस इज द फर्स्ट थिंग टू डू। आपको अपना धर्म, उपनिषद, वेदांत, योग इसका पूरे विश्व में प्रचार करना ही होगा। जितने भी मनुष्य हैं इस विश्व में सब में उनका प्रचार करना ही होगा। यह सबसे पहला कार्य हमको करना है। एंड आफ्टर प्रीचिंग स्पिरिचुअल नॉलेज अलोंग विद इट कम द सेकुलर नॉलेज एंड एव्री अदर नॉलेज दैट यू वांट। और एक बार आप आध्यात्मिक सत्यों का प्रचार करेंगे। वेद उपनिषद की सनातन वाणी का प्रचार करेंगे। उसके बाद में वही यूरोपियन देशों में से सेुलर नॉलेज अर्थात कि साइंस, टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग वगैरह भारत में आएगी और माने मॉडर्न जितना भी नॉलेज है वह सब भारत में आएगा। बट इफ यू अटेम्प्ट टू गेट द सेकुलर नॉलेज विदाउट रिलीजन, आई टेल यू प्लेनली व्हेन इज योर अटेमप्ट इन इंडिया। किंतु धर्म का प्रचार किए बिना धर्म को भारत की रगरग में बहाए बिना यदि आप यह साइंस टेक्नोलॉजी मॉडर्न लर्निंग है उसको अपनाने का प्रयास करेंगे तो आपका यह प्रयास व्यर्थ ही रह जाएगा। यह मैं आपको स्पष्ट रूप से बताना चाहता हूं। इट विल नेवर हैव ए होल्ड ऑन पीपल। लोगों भारतीय जनमानस के ऊपर में इसका कभी भी कोई गहन गहरा प्रभाव नहीं पड़ेगा। इवन द ग्रेट बुद्धिस्टिक मूवमेंट वाज़ अ फेलियर पार्शियली ऑन अकाउंट ऑफ दैट। यह महान बुद्धिस्ट मूवमेंट थी वो इसी वजह से जो कि फेल हो गई। अच्छा अभी यह जो पैराग्राफ है उसको पढ़कर के हमारे मन में एक प्रश्न आता है। जैसे कि कल भी हमने डिस्कस किया था। कि भारत में इतनी स्पिरिचुअलिटी होने के बावजूद और स्वामी जी के बाद में भारत में से इतने सारे रिलीजियस प्रीचर है जिन्होंने यूरोप अमेरिका जाकर के भारतीय आध्यात्मिकता का प्रचार किया और यह सिर्फ रामकृष्ण संघ के ही साधु नहीं दूसरे कितने ही डिनॉमिनेशंस के साधु हैं। साधक थे और सिद्ध थे कि जिन्होंने विदेश में वेद और उपनिषद का वेदांत और योग का प्रचार किया है। हमको पता है थोड़ा सा भी हिस्ट्री आप देख लेंगे तो इतने सारे जो कि प्रीचर्स है हिंदू धर्म के उन्होंने विदेश में जाकर के प्रचार किया है। यह आज का जो योगा क्रेज है यह 21 जून आ रहा है। इंटरनेशनल योगा डे। आप देखेंगे कि न्यूयॉर्क के टाइम स्क्वायर में इतने सारे लोग इकट्ठा होकर के योगा करते हैं। हालांकि वो योग का फिजिकल एस्पेक्ट को ही ज्यादा ध्यान में रखते हैं। फिजिकल फिटनेस पे ही ज्यादा ध्यान देते हैं। किंतु जो भी है उसको तो एटलीस्ट ये लोग एक्सेप्ट करते हैं। और उसके बाद में यह नमस्ते कहना फिर यह मंत्रो उच्चारण करना जितने भी आसन है उसके प्रॉपर संस्कृत नेम प्रोनाउंस करना। फिर यह जो चटिंग करना क्लास के स्टार्टिंग में ओमकार क्या है उसकी डेफिनेशन देना यह सब तो धीरे-धीरे करके बैक डोर से प्रवेश कर ही जाएगा। तो यह और सिर्फ यह अमेरिका में नहीं है। आप देखेंगे कि जो भी माने इतने रिस्ट्रिक्टेड माइंड स्पेस है जिस देशों की मतलब भारतीय विचार के विरोध में वहां पे भी योगा का खुलेआम प्रचार होता है। खुलेआम प्रैक्टिस होती है और कोई इसका विरोध नहीं करता। वो चीन है ना कि ये गल्फ कंट्रीज है ना कि इवन पाकिस्तान है ये सेंट्रल ईस्टर्न यूरोप है रशिया है सब जगह पे आप देखिए वहां पे लिबरल गवर्नमेंट तो नहीं है किंतु योगा और यह योगा के साथ में एसोसिएटेड यह पूरा फिलॉसोफी वहां पर ओपनली प्रीच होता है। ओपनली प्रैक्टिस होता है। तो हम लोग यह यह प्रश्न तो हमारे मन में उठेगा ही कि स्वामी जी ने जो बारगेन हमको दिया है स्वामी जी ने हमको वह जो फार्मूला दी है कि हमको योग वेदांत का प्रचार करना है। महावाक्य ओमकार या प्रणव मंत्र का अर्थ यह सब कुछ लोगों को बताना है और साथ में ही यह वेस्टर्न सिविलाइजेशन के पास में से यह मॉडर्न लर्निंग है। आजकल माने एवरीथिंग मॉडर्नाइज़ हमको यदि करना है। अभी जैसे कि यह बेटर क्रॉप किस तरह से लिए जाए, किस तरह से बेटर गवर्नेंस दी जाए। यह डेमोक्रेटिक अपना सिस्टम है। यह अपना ब्यूरोक्रेसी है। इंडियन ब्यूरोक्रेसी देखिए कि 100% ब्रिटिश मॉडल को अनुसरण करता है। यह ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके बाद में ब्रिटिश राज इन दोनों ने भारत में जो ब्यूरोक्रेसी बना करके गए हैं, उसके फंडामेंटल कोई चेंजेस हमने इंडिपेंडेंस के बाद में नहीं किए हैं। वही जुडिशियल सिस्टम जिस प्रिंसिपल पे कार्य करती है। ये ब्यूरोक्रेसी जिस प्रिंसिपल पे मिलिट्री ये सब कुछ उसी समय का है। इनफैक्ट मैं एक इंटरव्यू देख रहा था एक बार YouTube के ऊपर में एक यूनिट है मिलिट्री यूनिट उसका जो कैप्टन ना मेजर जो भी उसका कमांडर था उसका इंटरव्यू था। तो वह कहता है कि हमारी सब यह ब्रिटिश ट्रेडिशन है और वी आर वेरी प्राउड ऑफ आवर ट्रेडिशन। यह कुछ पिछले तीन-चार साल पहले की ही बात है। तो वो जो प्रश्न जो उसका इंटरव्यू ले रहा था वह कहता है कि अच्छा आपको यह तो पता है ना कि यही ब्रिटिश आर्मी है जिसने कि जिसकी वजह से जिसका सहारा लेकर के ब्रिटिश लोगों ने भारत पे राज किया। आज इंडिपेंडेंट इंडिया में भी आप यदि उसी ब्रिटिश ट्रेडिशन को लेकर के वही ब्रिटिश फ्लैग है। उसको माने ब्रिटिश फ्लैग नहीं सभी यूनिट का अपना-अपना एक फ्लैग होता है। तो वो फ्लैग सब ब्रिटिश के जमाने के थे। तो वो वही फ्लैग आज आप फिर से लेकर के घूम रहे हैं तो आपको क्या ऐसा कुछ कंट्राडिक्शन नहीं लगता? तो वह कहता है कि नहीं मिलिट्री यूनिट है। इट सर्व्स ऑन इट्स ओनर। वह ओनर के साथ में हम लोग काम करते हैं जो कि सत्ताधारी है। उनके हम बड़े ही ओबिडिएंट हैं। यह दूसरे देशों की तरह कि सत्ताधारी जो है जो पॉलिटिशियन उनकी बात अच्छी नहीं लगी तो चलो रेबेलियन करके उसको भगा दो। हम अपना मिलिट्री रूल एस्टैब्लिश कर दें। ऐसा नहीं है। इंडियन आर्मी इज अ ओनरेबल आर्मी इज एन ओबेडियंट आर्मी। जो सत्ता में होगा उसकी बात हम सुनेंगे। सो मैंने मुझे थोड़ा सा ओड लगा था उस समय बट दे आर राइट आर्मी जो है इट्स एन इंस्ट्रूमेंट ऑफ स्टेट तो व्हाटएवर यहां पे जो हमारा कहना है कि बहुत कुछ जो है कि हमने विदेश से ग्रहण किया है किंतु और भी बहुत कुछ ग्रहण करने की जरूरत है खास करके यह लेटेस्ट टेक्नोलॉजी है चिप मेकिंग मैन्युफैक्चरिंग है या तो फिर यह मॉडर्न ये एआई टेक्नोलॉजीस है वगैरह-वगैरह तो अभी यहां पे यह प्रश्न होगा कि वी वी हैव केप्ट आवर एंड ऑफ द बारगेन। स्वामी जी ने जो फार्मूला कहा कि आप योग वेदांत का प्रचार कीजिए और सामने में यह जितना भी मॉडर्न कटिंग एज टेक्नोलॉजीस है उसको आप भारत में लाइए। यह जो एक्सचेंज जब होगा तभी भारत का कल्याण होगा। यदि आप आध्यात्मिकता वाला जो बारगेन है वन एंड वाला उसको छोड़कर के सिर्फ आप एक मॉडर्न लर्निंग में जाएंगे तो उससे अकल्याण ही होगा और कुछ नहीं होगा। तो देखिए कि इसका उदाहरण हमको दो बहुत बड़े उदाहरण देखने को मिलते हैं। एक है चाइना और दूसरा है रशिया। तो रशिया में भी इस तरह से रेवोल्यूशन आया और होल सेल यह वेस्टर्न यूरोप से सब आइडियाज इंपोर्ट किए गए। चाइना में भी वही हुआ। लोकल कल्चर को तोड़ दिया गया। लोकल कल्चर का खात्मा कर दिया गया और उसके ऊपर में यह विदेशी आइडियाज को बिठा दिया गया। तीसरा बहुत बड़ा एग्जांपल है जापान का। जापान ने यह काम सबसे पहले किया कि जो लोकल कल्चर है उस समय का उसको सप्रेस करो और यह फॉरेन कल्चर को अपनाओ। कल्चर माने कि ये खानपान रीति रिवाज लैंग्वेज वो सब नहीं। किंतु यह जो पूरा लाइफ स्टाइल है आपको पूरा जो इंस्टीटशंस है इंस्टीट्यूशन को पूरा मॉडिफाई करना है। वेस्टर्नाइज कर देना है। तो यह वेस्टर्नाइज इंस्टीट्यूशन करने के बाद में क्या हुआ कि तीनों देश में एक पहले रशिया और चाइना में भयानक सिविल वॉर हुआ और जापान का दिमाग जो बिगड़ा है पूरे आज आसपास के जितने भी देश थे सब पे हमला करके कितना खूनामकी किया है सेकंड वर्ल्ड वॉर में। तो यह जो ब्लड शेड वहां पर फैला है लोकल कल्चर को सप्रेस करके लोकल विस्टम को सप्रेस करके वेस्टर्न विडम को होलसेल वेस्ट वेस्टर्न इंस्टीटशंस वेस्टर्न लर्निंग को होलसेल इंपोर्ट करके वहां पे जो हुआ है भारत ने ऐसा नहीं किया अपना लोकल विज़डम हमने बना करके रखा है और इतना ही नहीं योग और वेदांत का यथाशक्ति प्रचार भी किया है किंतु अभी आज के कॉन्टेक्स्ट में खास करके यह प्रश्न हमारे सामने आएगा कि हमने इतना कंट्रीब्यूट तो किया योग और वेदांत का इतना प्रचार तो किया किंतु फिर भारत की जो परिस्थिति है आज की वो इट इज नॉट समथिंग दैट वी वी कैन बी दैट मच प्राउड ऑफ हां साउथ एशिया में बाकी सब देशों की कंपेयर में यदि देखेंगे तो हमको लगेगा चलो इंडिया बाकी सब देशों से आगे है साउथ एशियन कंट्रीज में किंतु जब हम अपना अपना कंपैरिजन ईस्ट एशिया या तो साउथ ईस्ट एशिया के साथ में करते हैं तो एक बड़ा सीरियस इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स हमारे भीतर में प्रकट हो जाता है। ये जितने भी साउथ ईस्ट एशियन ईस्ट एशियन कंट्रीज हैं जिसको कि एशियन टाइगर्स कहते हैं। ये जापान, साउथ कोरिया, सिंगापुर, हांगकांग इवन ये मलेशिया और इंडोनेशिया और आखिर में चाइना इन लोगों ने जो मॉडर्न एज में जो प्रगति की है, खास करके पिछले 30-40 सालों में, वह अद्भुत है। उसके सामने हम यदि इंडिया का कंपैरिजन करें तो मैं बीच-बीच में यह सब थोड़ा स्टडी करता रहता हूं कि चाइना में क्या डेवलपमेंट हो रहा है। तो वहां पे एक कंपनी है यूनिट्री बोल के वो रोबोट बना रही है। तो इतने मतलब इफेक्टिव रोबोट्स वो बनाती है तो उसको देख के हमको लगेगा कि यह कंज्यूमर टेक्नोलॉजी यदि इन लोगों की इतनी एडवांस है तो यही रोबोटिक्स का यह लोग मिलिट्री एप्लीकेशन कैसे करेंगे? भयानक चीज है। इस तरह का एफिशिएंट रोबोट जो कि आप घर-घर में सेल करने को तैयार है। एंड इट्स वर्किंग वेरी वेल। तो फिर यह इसका मिलिट्री एप्लीकेशन तो फिर हम ही को फेस करना है। तो फिर यह सब अभी यह वहां का डीप सीक है। जब से डीप सीक आया है हमको पता है कि वहां का जो जिस दिन वो वो हुआ था रिलीज उसके दो-तीन दिन के बाद में अमेरिका का शेयर मार्केट जो था उसमें एआई कंपनियों की प्राइस बिल्कुल गिर गई थी। क्यों? क्योंकि पता है कि यह लोग बिलियंस ऑफ डॉलर खर्च करके जो फ्रंटियर मॉडल्स डेवलप करते हैं कंपेयर टू दैट यह डीप सी ना कि उसका जो पैरेंट कंपनी है कुछ ही मिलियन डॉल में उन्होंने इतना इफेक्टिव मॉडल बना दिया तो ये लोग क्या इतना सारा पैसा लेकर के लोगों को ठगते हैं क्या अमेरिकन एi कंपनीज़ तो यह बाकी कंपनीज़ है एनवीडिया के स्टॉक थे कितना उसमें गिरावट आ गई दूसरे ही दिन तो देखिए कि चाइना में यह सब एडवांस डांस कटिंग एज डेवलपमेंट जो होता है ये लोग स्टिल द फाइटर डेवलप करते हैं और फिर यह सब ड्रोंस डेवलप करते हैं। देख के हम भारत की ओर देखते हैं और भारत के न्यूज़ पेपर खोल करके उसकी हेडलाइंस पढ़ते हैं। खास करके मुझे मैं एकदम डिप्रेशन में चला जाता हूं। ये क्या हो रहा है? तो यह प्रश्न स्वाभाविक है और
भारतीय, चीनी और अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना
मैंने कुछ नंबर्स इकट्ठा किए हैं। कुछ स्टैटिस्टिकल नंबर्स मैं शेयर करता हूं। देखिए कि यह नंबर बेसिकली क्या कहते हैं? यह अमेरिका का डाटा है। यहां पे दो बेसिकली नंबर्स मैंने कलेक्ट किए हैं। एक तो है एंप्लॉयमेंट दूसरा है जीडीपी। जीडीपी यानी कि ग्रॉस ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट। राइट? अभी हमको पता है थोड़ा सा सर्च करेंगे तो पता चलेगा कि यह जो इकोनॉमी है इकोनॉमी में बेसिकली तीन सेक्टर कहे जाते हैं। एक तो है एग्रीकल्चरल सेक्टर। एग्रीकल्चरल सेक्टर क्या है? हमको पता है कि इसके भीतर में यह जो क्रॉप्स है या तो फिर यह वेजिटेबल्स है ना कि जमीन में से या तो फिर इवन लाइव स्टॉक है, एनिमल हस्बेंडरी है, बी कीपिंग है वह सब कुछ एग्रीकल्चर सेक्टर में आएगा। इसके बाद में दूसरा बड़ा सेक्टर है इंडस्ट्रियल सेक्टर जिसमें कि यह मैन्युफैक्चरिंग है या तो फिर कोई भी इंडस्ट्रियल प्रोसेस है केमिकल प्रोसेस होती है कोई भी प्रोसेस होती है वह सब इंडस्ट्रियल सेक्टर में आती है। भारत में देखेंगे कि ये जितने भी ये बड़े-बड़े जो ये है नाम हमारे टाटा हो ना कि फिर ये बिरला हो ना कि ये अडानी हो ना कि अंबानी हो यह सभी लोगों की बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज है। यह भारत हैवी इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्री लिमिटेड बीएचईएल या तो फिर यह एचएल हिंदुस्तान एयररोनॉटिक्स लिमिटेड यह सभी लोग मैन्युफैक्चरिंग करते हैं। कोई कार मैन्युफैक्चर करता है। कोई एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चर करता है। कोई यह प्लंबिंग इंस्ट्रूमेंट है उसको मैन्युफैक्चर करता है। तो जो कोई भी इंडस्ट्रियल प्रोसेस के द्वारा कोई भी गुड्स मैन्युफैक्चर होते हैं उसको मैन्युफैक्चरिंग या तो फिर यह इंडस्ट्रियल सेक्टर कहते हैं। और यह तीसरा बड़ा सेक्टर है सर्विस सेक्टर। तो यह सर्विस सेक्टर में बेसिकली यह मेडिकल सर्विसेज है। यह टीचर का काम है ना कि यह ब्यूरोक्रेट का काम है ना कि यह जितनी भी कंसल्टिंग सर्विसेज है, लॉयर का काम है, सॉफ्टवेयर इंजीनियर का काम है, ऑथर है, राइटर है, न्यूज़ेपर है, वह जितना भी इंटेलेक्चुअली करने वाला डिजाइनिंग है, कंप्यूटर साइंस है, यह सब कुछ सर्विस सेक्टर में आएगा। तो बेसिकली इकोनॉमी में तीन मेजर सेक्टर है एग्रीकल्चरल, इंडस्ट्रियल और सर्विस सेक्टर। अभी देखिए कि तीन सेक्टर का जीडीपी में कंट्रीब्यूशन क्या है? जीडीपी क्या है कि कोई भी एक देश का टोटल इकोनॉमिक आउटपुट। तो अभी यह टोटल इकोनॉमिक आउटपुट है किसी भी एक देश का। उसमें देखिए कि आप तीन सेक्टर का डिफरेंट-डिफरेंट आउटपुट होगा। ये एग्रीकल्चर सेक्टर का इकोनमी में क्या कंट्रीब्यूशन है? इंडस्ट्रियल सेक्टर का इकोनमी में क्या कंट्रीब्यूशन है? और यह सर्विस सेक्टर का क्या कंट्रीब्यूशन है? तो ये तीनों सेक्टर का इकोनमी में कंट्रीब्यूशन होगा। यदि जीडीपी कोई भी एक देश का 1% है तो यह 1% के डिवीजन यह तीन सेक्टर करेंगे। और कोई भी सेक्टर का जिस तरह से जीडीपी में कंट्रीब्यूशन होता है उसी तरह से किसी भी सेक्टर का एंप्लॉयमेंट परसेंटेज होता है कि यह सेक्टर है एग्रीकल्चर सेक्टर वो टोटल पपुलेशन के कितने परसेंटेज लोगों को एंप्लॉय करता है। तो यह इंडस्ट्री में कितने परसेंट एंप्लॉयड है और सर्विस सेक्टर में कितने परसेंट एंप्लॉयड है। यानी कि देखिए कि तीन सेक्टर फॉर एव्री सेक्टर ये इतने परसेंट लोगों को एंप्लॉय करता है और यह इतना परसेंट कंट्रीब्यूट करता है। अभी एक जैसे कि नॉर्मल कंट्री होना चाहिए। एक नॉर्मल थिंकिंग होना चाहिए। जैसे कि देखिए एक सहज रूप से उदाहरण दें तो मान लीजिए कि आप रोटी बनाते हैं अपने घर में तो एक घर में सिर्फ हस्बैंड और वाइफ है और यह हस्बैंड और वाइफ वाइफ जब रोटी बनाती है अपने अकेले से रोटी बनाती है तो एक वाइफ रोटी बनाएगी तो कितनी बनाएगी एक साथ में चार पांच बनाएगी क्योंकि चार पांच दो ही लोग खाने वाले हैं तो एक एक आदमी को माने एक वूमन को एंप्लॉयमेंट मिला है और उसका कंट्रीब्यूशन है चारप रोटी बनाने का। अभी दूसरा जो घर है उसमें देखेंगे कि जॉइंट फैमिली है चार लेडीज मिलकर के रोटी बनाती है और वह बनाती है 2025 रोटी बनाती है 30-40 बनाएगी क्योंकि खाने वाले लोग ज्यादा है तो एंप्लॉयमेंट चार लेडीज को मिलता है और जो कंट्रीब्यूशन है वह 20-25 रोटी का है और तीसरा घर है वह और भी बड़ा जॉइंट फैमिली है या हॉस्टल जैसा है वहां पर पूरी 100 लेडीज रोटी बनाती है और मिलकर के 1000 2000 रोटी बना देती है। तो अभी आप देखिए कि जितने लोग एंप्लॉय है उतना ही आउटपुट होगा। एक लेडीज एक वूमन यदि रोटी बनाती है तो 10 15 5 6 जो भी है इतनी बनाएगी। चारप यदि लेडीज रोटी बनाएगी तो 20 25 30 40 बना लेगी और 100 लेडीज मिलकर के रोटी बनाएगी तो 1000 2000 बना देगी। यह एक नॉर्मल थिंकिंग है। जितने लोगों को आप एंप्लॉय करते हैं, उतना आपका आउटपुट रहेगा और इतना ही होना चाहिए। अदरवाइज यदि 1000 लेडीज मिलकर के 10-15 रोटी बनाएगी, तो आप कहेंगे कि बाकी यह कर क्या रहे हैं वहां पे? वो गप लगा रहे हैं कि आलसू है क्या उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है ना कि इक्विपमेंट गड़बड़ है कि पूरा वहां का जो इंस्टीट्यूशनल सेटअप है वही गड़बड़ है? यह प्रश्न हमको स्वाभाविक रूप से होगा। यानी कि इतना तो हम समझते हैं कि यदि एक लेडीज रोटी बनाएगी तो उसका कंट्रीब्यूशन उसके अनुसार होना चाहिए। चार रोटी बनाने वाले हैं तो उनका कंट्रीब्यूशन चार पर्सन की तरह होना चाहिए। 100 लोग रोटी बनाते हैं तो उनका कंट्रीब्यूशन इतना होना चाहिए। यह एक नॉर्मल थिंकिंग है और इकोनॉमिक्स इसी तरह से काम करता है। अभी देखिए कि अमेरिका का यह जो चार्ट है यह एग्रीकल्चर सेक्टर हमको क्या कहता है कि ये लोग वन अमेरिका की जितनी भी वर्क फोर्स है उसका 1.6% एंप्लॉय करते हैं और उनका जीडीपी कंट्रीब्यूशन है 0.8%। अभी देखिए कि यदि आप 1.6% वर्क फ़ोर्स को एंप्लॉय करते हैं और 8 कंट्रीब्यूशन है तो यह थोड़ा सा कम है। किंतु यह हम सबको पता है कि एग्रीकल्चर सेक्टर में आपको एंप्लॉयमेंट बहुत ज्यादा लगाना पड़ता है। कंपैरेटिवली आउटपुट थोड़ा सा कम रहता है। तो यह मोर और लेस एक नॉर्मल रेंज के भीतर में आता है। इसके बाद में इंडस्ट्री को देखिए। इंडस्ट्री है 19% लोगों को एंप्लॉय करती है। टोटल वर्क फ़ोर्स अमेरिका की अमेरिका की पपुलेशन है। मान लीजिए 30 करोड़ के आसपास है। उसमें से वर्किंग पपुलेशन होगी शायद मान लीजिए 18 करोड़ के आसपास की होगी। 1820 करोड़ के आसपास की होगी। उसमें से 20% को यदि ये लोग एंप्लॉय करते हैं यानी कि 2 करोड़ के आसपास में कुछ एंप्लॉयमेंट होगा जो कि इंडस्ट्री में काम करते हैं। तो यह जो 2 करोड़ लोग हैं 20% पॉपुलेशन अह नियरली उस का कंट्रीब्यूशन है 18% तो यह भी मोर और लेस एक नॉर्मल थिंकिंग के भीतर में आता है कि आप 20% लोगों को एंप्लॉय करते हैं तो 18% कंट्रीब्यूशन आपका होता है और यह आखिर में आता है सर्विस सेक्टर। सर्विस सेक्टर में 79.4 यानी कि ऑलमोस्ट 80% लोगों को एंप्लॉयमेंट मिलता है और जीडीपी कंट्रीब्यूशन है 81% वि इज अगेन विद इन द नॉर्मल रेंज। तो यह एक नॉर्मल कंट्री का इस तरह का चार्ट होता है कि यह जितना परसेंटेज पॉपुलेशन को आपने एंप्लॉय किया उतना ही आपका कंट्रीब्यूशन जीडीपी कंट्रीब्यूशन है। यदि एक पर्सन रोटी बनाता है तो नॉर्मल रेंज 10, 12, 15, 20 के आसपास का होगा। चार लोग रोटी बनाते हैं तो 20, 25, 30, 40, 50, 60 इसके आसपास की रोटी बना सकते हैं। 100 लोग रोटी बनाते हैं तो फिर 1000, 2000 मिलकर के हो जाएगी। तो यह एक नॉर्मल थिंकिंग है। अभी देखिए कि चाइना का किस तरह से है। चाइना में एग्रीकल्चर सेक्टर में 22% लोगों को एंप्लॉयमेंट है। किंतु उनका जीडीपी कंट्रीब्यूशन है सिर्फ 7%। यानी कि यह यह वाला हो गया कि चार लोग रोटी बनाते हैं किंतु रोटी बनती है मुश्किल से 810 तो यह प्रश्न होगा कि ये चार लोग रोटी बनाएंगे 810 बनाएंगे तो ये करते क्या है दिन में छ सात घंटा यदि उनको एंप्लॉयमेंट मिलना चाहिए तो उसका कंट्रीब्यूशन तो कुछ है नहीं यानी कि वहां पे बहुत ज्यादा इनफिशिएंसी है। बहुत सारे लोगों को काम नहीं मिल रहा है। वे लोग वैसे ही बैठे हैं और उसका रिजल्ट है पॉवर्टी क्योंकि आप एंप्लॉयमेंट यदि आप कुछ प्रोड्यूस नहीं करेंगे तो ऐसा तो नहीं है कि मुफ्त में कोई आपको पैसा देगा तो यानी कि 22% पॉपुलेशन का यदि 7% ही कंट्रीब्यूशन है जीडीपी में तो उसका अर्थ इस तरह का हुआ कि ऑलमोस्ट 13 टू 14% पीपल जो है एग्रीकल्चर सेक्टर में उनके पास में ज्यादा कुछ कामधाम नहीं है और 13 टू 14% पॉवर्टी होगी उस सेक्टर में अच्छा इंडस्ट्री का देखिए गजब डाटा है। 27% एंप्लॉयमेंट है किंतु नियरली 40% आउटपुट है। यह तो ऐसा हो गया कि चार लोग रोटी बना रहे हैं और सीधी 1215,000 रोटी बना दी। व्हिच इज गुड एक्चुअली आपका जितना कंट्रीब्यूशन ज्यादा होगा, जितना आउटपुट ज्यादा होगा, उतना ही आपको तो उतना यह मिलेगा, रिटर्न मिलेगा। व्हिच इज़ वेरी गुड। और सर्विस सेक्टर जो है उनका वो मोर और लेस नॉर्मल है। 50% को एंप्लॉयमेंट मिलता है तो 53% कंट्रीब्यूशन है व्हिच इज नॉर्मल। तो उनका सर्विस सेक्टर नॉर्मल है। इंडस्ट्रियल सेक्टर का आउटपुट बहुत ज्यादा है। वहां के लोग बहुत ज्यादा प्रोडक्टिव है और एग्रीकल्चर का जो आउटपुट है वहां पे प्रोडक्टिविटी बड़ी कम है। अच्छा। तो यह हो गया चाइना। अभी हम देखते हैं इंडिया के बारे में। इंडिया का सब कुछ ऊपर नीचे उलटपुलट है। क्या है इंडिया का? देखिए यह एग्रीकल्चर में हमारी 45% पपुलेशन एंप्लॉयड है और जीडीपी कंट्रीब्यूशन है मुश्किल से 17%। यानी कि आप देख लीजिए कि एटलीस्ट 25 26% पपुलेशन जो कि यहां पर एग्रीकल्चर में एंप्लॉयड है उनको ज्यादातर कुछ काम ही नहीं है और भयानक पॉवर्टी है। अभी भारत में आप बोलेंगे 45% 40% इसका अर्थ क्या है पता है? 100 150 करोड़ की यह पॉपुलेशन है हमारी 150 करोड़ की। उसमें से यदि 45% गिनेंगे तो नियरली 60 करोड़ ना कि इतने होते हैं जो कि एंप्लॉयड है एग्रीकल्चर सेक्टर में 60 करोड़ लोग और 60 करोड़ में से जो कुछ काम करने वाले हैं जिनका कुछ सीरियस आउटपुट है वो होंगे मुश्किल से 6 करोड़ ना कि 7 करोड़ इससे ज्यादा नहीं 8 9 10 करोड़ एट द मोस्ट यानी कि 50 करोड़ लोग हैं भारत में एग्रीकल्चर सेक्टर में जिनका कि ज्यादा कुछ आउटपुट नहीं है और भयानक गरीबी इन लोगों के बीच में है। यह जो फिगर है भारत का वह बड़ा ही डेंजरस है। यह जब तक यह हमारा 45% उसमें से मुश्किल से यह एंप्लॉयमेंट परसेंटेज होगा 17% इसका कुछ ना करें तब तक भारत का कुछ ज्यादा उत्थान नहीं होने वाला है। भारत में जो थोड़ा बहुत डेवलपमेंट हो रहा है। अभी जैसे इंडस्ट्री को देखिए इंडस्ट्री का फिगर थोड़ा सा नॉर्मल है। 23% लोगों को एंप्लॉय करते हैं तो जीडीपी कंट्रीब्यूशन है 27% वि इज गुड। और यह साथ में किंतु ये सर्विस सेक्टर को देखिए भारत का जो जो कोई भी इकोनॉमिक डेवलपमेंट हो रहा है उसके पीछे में कंट्रीब्यूशन है सर्विस सेक्टर का। 30% 31.5% को एंप्लॉय करते हैं और जीडीपी कंट्रीब्यूशन है यह 54% वि इज वेरी गुड। सर्विस सेक्टर में हमारा आउटपुट या तो फिर प्रोडक्टिविटी गेन बहुत ज्यादा है। किंतु यह जो प्रोडक्टिविटी गेन जो सर्विस सेक्टर में है उसको पूरा तोड़ देता है यह एग्रीकल्चर सेक्टर। यानी कि एक एग्रीकल्चर सेक्टर जहां पे 60 करोड़ ना कि आसपास लोग हैं। मुश्किल से उसमें 10 12 करोड़ को सीरियस एंप्लॉयमेंट मिलता है। बाकी सब लोग आइदर अनइंप्लॉयड है या तो फिर यह टेंपरेरी एंप्लॉयमेंट मिलता रहता है। फिर यह लोग माइग्रेंट लेबर होकर के शहरों में जाएंगे और वहां पे जिस तरह का काम मिलेगा उस तरह का करेंगे। तो यह जो भारत की जो इकोनॉमिक डेवलपमेंट है उसके ऊपर में यह एग्रीकल्चर सेक्टर का बहुत बड़ा एक खतरा मंडरा रहा है और यदि हम यह चाइना या तो यूएसए की तरह थोड़ा बहुत नॉर्मल होने का प्रयास नहीं करेंगे तो फिर होगा क्या कि यह जो जो बर्डन है इतने 40 50 करोड़ लोगों का वो पूरी इकोनमी को लेकर के डूबेगा। हम चाहे सर्विस सेक्टर में चाहे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कितना ही मेहनत क्यों ना कर लें कितना ही प्रोडक्टिविटी गेन क्यों ना बढ़ा लें क्योंकि किंतु यह एग्रीकल्चर सेक्टर है वो हमेशा हमारे ऊपर में बर्डन बन करके रहेगा और यह फिगर कोई छोटी-मोटी नहीं है कि कुछ साल में आप इसका उकेल ला दे उसका कोई सॉल्यूशन ला दे इसका सॉल्यूशन इतनी बड़ी जो जनसंख्या है 40 50 करोड़ उसका सॉल्यूशन ्यूशन लाने के लिए आपको एटलीस्ट 30 टू 40 इयर्स तक का बड़ा सॉलिड पॉलिसी डिसीजन बड़ा सॉलिड इकोनॉमिक डेवलपमेंट होना चाहिए जो कि मुझे नहीं दिख रहा है। 6% यदि आसपास का हमारा जो आज का जीडीपी ग्रोथ रेट है उसके अनुसार देखें तो इस अगले 40-50 साल में हम लोग यह मलेशिया इंडोनेशिया के लेवल तक भी नहीं पहुंचने वाले हैं। आज हमारा पर कैपिटा जीडीपी यह जो 2800 ने 2900 है मलेशिया ना इंडोनेशिया का वगैरह का देखेंगे तो 4000 ना कि इतना है यानी कि वो बाकी सबके साथ में कंपटीशन करना तो छोड़ ही दीजिए अमेरिका तो कहां है यूरोप कहां है चाइना कहां है ये यहां तक कि ये इंडोनेशिया मलेशिया तक यदि उनके साथ में भी हमको इकोनॉमिक कंपटीशन करनी होगी पर कैपिटा जिसको कि कहते हैं ना लाइफस्टाइल इंप्रूवमेंट यह जो जनरल पब्लिक है उनकी लाइफस्टाइल इंप्रूवमेंट यदि हमको उनको इंडोनेशिया मलेशिया के लेवल का करना होगा 30-40 साल का समय हमारे सामने है उसमें यह हो सकता है उससे कम में कुछ नहीं हो सकता तो यह जो भारत की जो भयानक अवस्था है बिकॉज़ कि हमारी जनसंख्या ज्यादा है 150 करोड़ के आसपास है बोल के आज हम चिल्ला रहे हैं कि हमने जापान को पीछे छोड़ दिया किंतु जापान में पर कैपिटा इनकम देखेंगे तो 45000 ना कि $50,000 के आसपास का होगा। हमारी पर कैपिटा इनकम देखेंगे 2800 ना उतना कोई है पर एनम डॉलर जीडीपी में तो पर कैपिटा जीडीपी में। तो देखिए कि इसके पीछे में रीजन क्या है? क्योंकि हमारा एग्रीकल्चर सेक्टर बड़ा ही इनफिशिएंट है। आधे से ऑलमोस्ट हाफ ऑफ पपुलेशन जो भारत की है ऑलमोस्ट आधी जनसंख्या एग्रीकल्चर में है और उनके पास में ज्यादा कुछ काम बिल्कुल नहीं है। इंडस्ट्रियल और सर्विस सेक्टर वो खास करके भारत का जो सर्विस सेक्टर है वही पूरा बर्डन उठा रहा है। यह जो 6% जो जीडीपी ग्रोथ रेट है अपना वह पूरा सर्विस सेक्टर की वजह से ही है और कुछ यहां पे नहीं है। तो यदि हमको यह चाइना या यूएसए की तरह एक नॉर्मल कंट्री बनना होगा। देखिए आप चार्ट देख लीजिए तीनों को कंपेयर करके। अमेरिका मोस्ट नॉर्मल है। चाइना में इंडस्ट्रियल आउटपुट बहुत ज्यादा है। एग्रीकल्चरल प्रोडक्टिविटी बहुत कम है। किंतु इंडिया का तो जो है पूरा एग्रीकल्चर सेक्टर बिल्कुल रिवर्स डायरेक्शन में जाता है। राइट? तो अभी यह जो परिस्थिति है इस परिस्थिति में अभी हमारे सामने एक बड़ा सीरियस प्रश्न होता है। मैंने खुद इस प्रश्न के बारे में सोचा है कि स्वामी जी
पहले आध्यात्मिकता और फिर वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक प्रगति - यह कहकर क्या स्वामीजी ने भारत के साथ अन्याय किया है?
ने यह जो बार-बार कहते हैं कि धर्म के माध्यम से ही भारत का विकास होगा। धर्म ही भारत की नींव है। रिलीजन या तो आध्यात्मिकता, स्पिरिचुअलिटी यही भारत की प्राणशक्ति है। तो अभी यह प्रश्न होगा कि यह जो ऑलमोस्ट 50% पपुलेशन है भारत की एग्रीकल्चर सेक्टर में क्या इसके साथ में बहुत बड़ा अन्याय तो नहीं हो रहा है। चाइना ने जैसे जो भी कहो आप आज चीन को कि उन्होंने यह होलसेल कम्युनिज्म यानी कि यह यूरोपियन फिलॉसोफी को भी अपना लिया और अमेरिका से ये जो मॉडर्न मैन्युफैक्चरिंग टेक्निक है उनका रिसर्च डेवलपमेंट है वो सब चुरा लिया है। आज आज अमेरिका में आप देखिए कितने न्यूज़पेपर में कितना कंप्लेन आता है कि चाइना उनकी पेटेंट चुरा रहा है। किंतु किसी का साहस नहीं है चाइना के सामने कुछ भी बोलने का। क्यों? कि दो चीज है। चाइना में सबसे चीपेस्ट मैन्युफैक्चरिंग अवेलेबल है। और अभी चीपनेस का प्रश्न नहीं रहा। अभी क्वालिटी का प्रश्न आ गया है। बहुत सारी अमेरिकन कंपनीज़ है उन लोगों के पास में मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बची ही नहीं है। उनको यदि मैन्युफैक्चरिंग करना है तो चीन में ही जाकर के करना पड़ेगा। क्योंकि यह जो लेटेस्ट मशीन टूल्स यह लेटेस्ट रोबोटिक्स टेक्नोलॉजी यह जो मोस्ट हाईली एजुकेटेड वर्क फ़ोर्स अभी आज है चाइना में। तो चाइना ने उनकी पेटेंट भी चुरा ली। उनकी यह जो मैन्युफैक्चरिंग जो कैपेसिटीज है उसको भी चुरा लिया। और इसके बावजूद यह लोग अमेरिकन लोग उनके सामने कुछ नहीं बोल पा रहा है। और भारत को आए दिन उपदेश देते रहते हैं। ऐसा मत करो, वैसा मत करो और अमेरिका ना यूरोप में से कोई एक कोई भी निकम्मा आदमी भी खड़ा होकर के कोई भी स्टेटमेंट दे देगा। भारत के सभी न्यूज़पेपर रोना धोना शुरू कर देंगे। अरे उसने हमको यह कह दिया। उसने हमको यह कह दिया। यानी कि ये राष्ट्रीय सम्मान जैसा कुछ है ही नहीं हमारी देश प्रजा में। इस तरह से हमको लगता है कभी-कभी। हम लोग हजार 150 करोड़ लोग दिन भर चिल्लाते रहे। यूरोप अमेरिका के पेट का पानी भी नहीं हिलने वाला। और वहां पर कोई भी थर्ड रेट आदमी कोई भी स्टेटमेंट दे दे हम लोग बेचारे को नींद उड़ जाती है। तो यह जो परिस्थिति है आज भारत की जो कि हमको नजर से दिखती है तो यह प्रश्न हो सकता है कि स्वामी जी ने आध्यात्मिकता का कोई एक्सेसिव प्रचार तो नहीं कर दिया। हां आप चलिए आप आप कहते हैं कि जीवन में आध्यात्मिकता होनी चाहिए तो एक इंडिविजुअल लेवल पर होनी चाहिए। मुझे आध्यात्मिक होना चाहिए। मैं यह बात समझता हूं। आपको होना चाहिए। यदि आपको लगता है कि जीवन में जो दुख कष्ट है, यह जो टेंशन है, यह जो समस्याएं हैं, फिजिकल मेंटल प्रॉब्लम है, इसका सॉल्यूशन यदि ईश्वर सानिध्य से हो सकता है, तो बड़ी अच्छी बात है। हमारे इंडिविजुअल लेवल पर स्पिरिचुअलिटी हो इस बात में किसी को कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु स्वामी जी जो इस तरह का एक स्वीपिंग स्टेटमेंट देते हैं कि भारत का जो भविष्य का उत्थान है, उसकी नींव आध्यात्मिकता है। तो यह प्रश्न हमारे मन में आएगा कि क्या स्वामी जी ने यह बात करके भारत के साथ में कहीं अन्याय तो नहीं कर दिया। क्या भारत हमेशा के लिए एक ये जो एग्रीकल्चर के जो 50% है हमारा एंप्लॉयमेंट उसको लेकर के हमेशा के लिए वह डूब तो नहीं जाएगा। क्योंकि क्या होता है कि यह जो प्रकृति का जो नियम है कि यदि आप डेड बॉडी पड़ा है जंगल में तो 1000 स्कैवेंजर आकर के उसको खा जाएंगे वो डेड बॉडी को रोट नहीं होने देंगे। डेड बॉडी को सड़ने नहीं देंगे। वरना तो क्या है उसमें से सभी बाकी जो लोग हैं जीवंत प्राणी है उसमें यह उसका जहर फैलेगा। उसमें यह बीमारी फैलेगी। पहले के जमाने में ऐसा होता था कि यदि आप एक किले के ऊपर में आप अटैक करते हैं वह जो बाहर से आने वाले जो शत्रु सेना वे लोग क्या करेंगे कि यह जो किले के भीतर में जो पानी जाता है जिस नदी में से ना कि जिस कुएं में से उसमें डेड बॉडी फेंक दिया करते थे। अभी डेड बॉडी जाएगा पानी के वह जो सोर्स है उसमें वह तो सड़ेगा। सड़ेगा उसमें से वह पोइजन फैलेगा और वह पानी जो पिएगा वह बीमार होगा मर जाएगा। यानी कि किले के भीतर में जो लोग यह पानी पी रहे हैं उनको तो और कोई सोर्स नहीं है अभी पानी पीने का। किले में से बाहर आकर के दूसरी नदी या दूसरे कुएं में से जो पानी जा रहा है उसी को पीना है और वो यदि पोइजन हो गया तो भयानक बीमारी भीतर में सब मर जाएंगे। सो एक नेचर का नियम है कि किसी भी रोटन चीज है सड़ती हुई चीज उसको इमीडिएटली खत्म कर देना है। बीमारी फैलने नहीं देनी। तो जो सिविलाइजेशन भी जो जब सड़ रही है उसमें डेवलपमेंट नहीं हो रहा डेड सिविलाइजेशन है तो यह विदेशी आक्रमणकारी उस पर हमला करेंगे उसको तहसनहस कर देंगे या तो तहस-नहस कर देंगे या तो फिर अपनी कोई नई सिविलाइजेशन स्टार्ट करेंगे तो अभी यह प्रश्न हो सकता है कि यदि हमारी सिविलाइजेशन एडवांस नहीं होगी और पड़ीपड़ी सड़ती रहेगी तो यह पहले 1000 साल जैसा हुआ हमारे साथ में कि गुलाम बनके रहे तो दूसरे 1000 साल साल कहीं गुलाम बन के ना रह जाए। यह 200 300 सालों का जो कुछ भी इंडिपेंडेंस मिला सो मिला। वरना जो हमारी तकदीर जो है हमारी किस्मत जो है गुलाम होकर के रहने की फिर से 1000 साल की गुलामी। यह जो यदि हम अपना यह एग्रीकल्चर सेक्टर का जो नियरली 50% जो है अपनी वर्क फोर्स उसका कोई सॉल्यूशन नहीं लाएंगे। तो तो यह प्रश्न एक सीरियसली हमारी नजर के सामने उठता है और इस प्रश्न का देखिए मैंने सोचने का प्रयास किया। अभी आप सोच के कितना सोचेंगे? आप यदि कहते हैं कि सर्विस इंडस्ट्री को डेवलप करें। ऑलरेडी सर्विस इंडस्ट्री ओवर बर्डन है। आपने देखा कि यह यदि मुश्किल से 30% को एंप्लॉय करती है किंतु 54% उसका जीडीपी में कंट्रीब्यूशन है। ऑलरेडी इट इज़ वर्किंग ओवर टाइम। ऑलरेडी इट इज़ वर्किंग ऑन जैसे कि एड्रिनालिन पे काम कर रही है। ऑलरेडी स्टेरॉइड पे काम कर रही है अपनी सर्विस इंडस्ट्री। इतना कम होने के बाद में भी नियरली 50% से भी ज्यादा वो कंट्रीब्यूशन कर रही है। सो सर्विस इंडस्ट्री को आप कितना कुछ करेंगे? ये जो मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री है वो भी तो ठीक से काम कर रही है। 23 के अगेंस्ट में 27 तो इसमें आप बहुत ज्यादा कुछ अभी इंप्रूवमेंट नहीं कर सकते हैं। जो कुछ भी इंप्रूवमेंट करना है वो एग्रीकल्चर सेक्टर में करना है। और यह हमारा पता है ना एक विज़ रहता है स्पिरिचुअल लोगों का। मेरा भी एक था कि स्पिरिचुअल माने सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग इसका अर्थ क्या है? गांव में जाकर के रहेंगे। गांव में शुद्ध हवा पानी है। लोगों का मन बड़ा पवित्र है। लोग सरल है। शहरों शहरवासियों की तरह कपटी नहीं है। शहरवासियों की तरह वो सब आपके मुंह पे एक बात कहेंगे। पीछे में दूसरी बात कहेंगे। ऐसा नहीं है। प्लस उनको सहाय चाहिए। तो मैं गांव में जाकर के रहूंगा और जो कुछ थोड़ा बहुत मुझे आता है मैथमेटिक्स लैंग्वेज वगैरह वहां पर बच्चों को सिखाऊंगा। वहां पर नदी के किनारे एक छोटी सी कुटिया बनाएंगे। वहां पर दिन भर में मैं स्कूल चलाऊंगा दिन के दौरान और पूरी रात जप ध्यान करूंगा, मेडिटेशन करूंगा, स्टडी करूंगा। ऐसे सिंपल थिंकिंग, सिंपल लिविंग एंड हाई थिंकिंग ऐसा कुछ करना है। यह जो स्पिरिचुअल लोगों का यह जो कॉनसेप्शन रहता है, इसीलिए देखिए कि भारत में अर्बनाइजेशन जो है यानी कि कितने परसेंट गांव में रहते हैं। कितने शहर में रहते हैं। अमेरिका उसमें ऑलमोस्ट 80% अर्बनाइजेशन हो चुका है। यानी कि गांव में सिर्फ 20% लोग रहते हैं। रूरल एरिया में और सिटी में 80% लोग रहते हैं। चाइना में अर्बनाइजेशन का 66% हो चुका है। यानी कि 66% ऑफ़ पपुलेशन अर्बन एरियाज में रहती है। और इंडिया का कितना है परसेंटेज पता है? सिर्फ 33% यानी कि 150 करोड़ की पपुलेशन में से सिर्फ 33% ही अर्बन एरियाज में रहते हैं। बाकी सब रूरल एरियाज में रहते हैं। तो यह रूरल एरिया में एंप्लॉयमेंट और यह रहना ये सब मिलाकर के उसका डेवलपमेंट ही नहीं हो रहा है। मॉडर्न जो डेवलपमेंट की थ्यरी है कहती है कि अमेरिका चाइना की तरह अर्बनाइजेशन कीजिए। रूरल पपुलेशन को कैसे भी करके अर्बन सेंटर्स में लेके आइए। सिटीज में लेके आइए। उनको मैन्युफैक्चरिंग या सर्विस सेक्टर में लगाइए। दिस इज द ओनली वे ऑफ डेवलपमेंट। यह जो सिविलाइजेशनल अपग्रेडेशन जब जब तक आपकी पपुलेशन है 70% के आसपास की पॉपुलेशन रूरल एरिया में रहेगी। आप जब तक एग्रीकल्चर पर डिपेंड करेंगे तब तक आपका यह सिविलाइजेशनल अपग्रेडेशन होगा नहीं। जब तक आपका अर्बनाइजेशन नहीं होगा। जब तक ये इंडस्ट्रियलाइजेशन नहीं होगा। जब तक कि यह सर्विस सेक्टर है वो तगड़ा नहीं हो जाएगा तब तक आपका इकोनॉमिक डेवलपमेंट मिडीवल एज का रह जाएगा। यह माने वो जो अंधकार युग था यूरोप में एक समय अंधकार युग था। उसमें ना ही डेवलपमेंट होता था, ना ही कुछ था। साइंस टेक्नोलॉजी को दबा करके रख दिया था। यह चर्च वालों ने बाइबल के विरुद्ध में कुछ बोलना नहीं है और बीच-बीच में ब्लैक प्लेग होता था। प्लेग हमको पता है क्या है? कितनी भयानक बीमारी है। उसमें भी यह ब्लैक प्लेग उसका भी एक विशेष स्वरूप जब एक बार यह ब्लैक प्लेग फैला यूरोप में कितने हजारों लाखों लोगों की उसने हत्या कर दी। वो पूरा डीपॉपुलेट हो गया था यूरोप उस समय में। तो वो था यूरोप का अंधकार युग। आज यदि आप कहेंगे भारत में अंधकार युग नहीं है। चलिए यह तो मानते हैं। किंतु हम लोग कोई बहुत ज्यादा डेवलपमेंट ही तो नहीं कर पा रहे हैं। यदि हम ये सिविलाइजेशनल अपग्रेडेशन नहीं करेंगे। रूरल एरियाज में से अर्बन एरियाज में मास माइग्रेशन होना, इंडस्ट्रियलाइजेशन और सर्विस सेक्टर में लोगों को धकेलना जब तक यह लार्ज स्केल नहीं होगा तब तक आज की जो मॉडर्न थ्यरी है इकोनॉमिक्स की उसके अनुसार भारत ये मिडीवल एजेस में ही रहेगा। यह इंडोनेशिया, मलेशिया ऐसे जो कंट्रीज है उससे भी कहां पीछे पड़ा रहेगा। और जिस किसी की भी इच्छा हो यह तुच्छ कंट्री है हमारे आसपास के आए दिन भारत को गाली देते रहते हैं। आए दिन भारत पर छुपके छुपके आक्रमण करते रहते हैं। हमारी पीठ में छुरा मारते रहते हैं और हम कुछ कर भी नहीं पाते हैं। क्योंकि इनके बड़े पावरफुल मित्र भी है। वह जैसे कि एक चारों ओर से कांस्परेसी मिलकर के हुआ है कि जब भी फार्म सेक्टर में कोई भी रिफॉर्म आना हो सब लोग मिलकर के जैसे विरोध करते हैं क्योंकि सबको पता है फार्म सेक्टर में रिफॉर्म होगा एग्रीकल्चर में यदि कुछ भी अपग्रेडेशन होगा तो इंडिया का सिविलाइजेशनल अपग्रेडेशन होगा क्योंकि आप अभी एज ऑफ टुडे सर्विस सेक्टर में इंडस्ट्रियल सेक्टर में इतना डेवलपमेंट नहीं कर पाएंगे क्योंकि ये इतना बड़ा जो पत्थर है बहुत बड़ा ये वो हमारे गले में यह एग्रीकल्चर सेक्टर का पड़ा हुआ है। तो यह डेवलपमेंट नहीं हो रहा है या तो फिर हम नहीं कर पा रहे हैं। इसके पीछे का एक फैक्टर क्या स्वामी जी का ऐसा कहना है कि हम लोगों को आध्यात्मिकता के आधार पर ही सब कुछ करना है। वह चाहे इंडस्ट्रियलाइजेशन हो, चाहे वह हमारा सर्विस सेक्टर हो। स्वामी जी के समय में नहीं था। किंतु स्वामी जी होते तो यह अवश्य एआई और सॉफ्टवेयर की बातें करते। तो यह सब डेवलपमेंट आध्यात्मिकता के बेसिस पर होना है। तो यह स्पिरिचुअलिटी क्या हमको सडनली हमारी एक वीकनेस तो बनकर के नहीं रह गई है? यह प्रश्न हमको हो सकता है। मेरे मन में भी काफी बार हुआ था। स्वामी जी ने खुद ने इस बात का उत्तर दिया है। स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि एक रामकृष्ण परमहंस को पैदा करने के लिए यदि करोड़ लोगों को भूखे मरना पड़े तो उस तरह के वो परमहंस की क्या आवश्यकता है? इस तरह का स्टेटमेंट स्वामी जी ने स्वयं दिया है। यानी कि कुछ स्पिरिचुअल लोगों को पैदा करने के लिए एक बुद्ध आए 1000 साल में। फिर एक भगवान राम आए। दूसरे 1000 साल के बाद में फिर यह भगवान रामकृष्ण आए। दूसरे 1000 साल के बाद में तो 1000 साल में एक अवतार को पैदा करने के लिए आपको वह 1000 साल तक जो आम आदमी है उसको आध्यात्मिकता को ही लेकर के बैठे रहना पड़ेगा। तो यह आम आदमी के साथ में किस तरह का न्याय हुआ? दिस क्वेश्चन कम्स इन आवर माइंड। तो इसका सॉल्यूशन क्या है? वो भी हमको थोड़ा सा समझना होगा। धर्म को जनरली हम लोग आजकल
समाधान: शिव ही जीव है
वेस्टर्न व्यू पॉइंट के साथ में देखते हैं। या तो फिर कहेंगे कि यह जो बुद्धिस्ट व्यू पॉइंट था धर्म का कि धर्म यदि आप अपनाते हैं तो धर्म के साथ में और कुछ भी नहीं रहता है। जगत मिथ्या ब्रह्म सत्य तो जगत को मिथ्या करके जगत को छोड़कर के आपको ब्राह्मण को अपनाना है। जगत को त्याग करके निर्वाण प्राप्त करना है। जगत को त्याग करके फादर इन हेवन का या तो फिर सन उसका जो है जो पृथ्वी पर उसका अवतार अवतरण हुआ है। उसका उसकी दया प्राप्त करने का जगत को छोड़कर के ही यह सब हो सकता है। यह एक ट्रेडिशनल व्यू पॉइंट है जो कि बुद्धिज्म के साथ में भी जुड़ा हुआ है और यह जो वेस्टर्न रिलीज खास करके क्रिश्चियनिटी के साथ में यह जुड़ा हुआ है। तो अभी क्या है कि हम लोगों का जो माइंडसेट है ना अभी जो कि एक बहुत बड़ा ट्रेजडी भारत के साथ में हो रहा है आजकल के युग में कि यंग पपुलेशन जो है वो अपना जो नॉलेज है अपना जो इंफॉर्मेशन है वो सब कहां से ग्रहण करती है तो यह सब पॉपुलर कल्चर में से ये टीवी देख के मूवीज देख के ना कि ये जो मॉडर्न पॉप म्यूजिक है उसको सुनकर के यह वेस्टर्न जो होलसेल कल्चरल इन्वजन है वो भारत पे हुआ है। उसमें से यह फिर यह लोग सब ग्रहण करते हैं कि रिलीजन का क्या अर्थ है? तो यह जो वेस्टर्न कांसेप्ट ऑफ रिलीजन है वो भारत के ऊपर में हिंदू धर्म के ऊपर में थोप दिया है। जैसे कि और यह इवन यह जो भक्ति मूवमेंट थी मिडिवल एजेस की यह चैतन्य महाप्रभु ना कि यह मीराबाई है ना कि नरसी मेहता है। इन लोगों ने इसको पॉपुलराइज किया। उसका भी एक अंश तो ऐसा कहता है कि यदि ईश्वर पर प्रेम है तो जगत जैसे कि भस्मा भस्म जैसा लगने लगेगा। जगत जैसे कि आपको बिल्कुल ही आलूनी बांग्ला शब्द है। बिल्कुल आपको बे नीरस लगने लगेगा। तो फिर अभी आप सोचिए कि ऑलरेडी यह जो बुद्धिज्म का डिग्रेडेशन से जो भारत में जो मूवमेंट्स जो सब स्टार्ट हुई थी इवन यदि आप शंकराचार्य को भी देखिए कि वो कितना हार्ड कोर सन्यासी संप्रदाय था वो शंकराचार्य ने जिसको एस्टैब्लिश किया तो यह जो धर्म है वो धर्म में हम धार्मिक भी हो सकते हैं। हम स्पिरिचुअल भी हो सकते हैं। साथ-साथ में ही यह जगत में भी हम जय कर सकते हैं। जगत में भी हम विजय प्राप्त कर सकते हैं। यह कांसेप्ट जैसे कि आजकल की जो पॉपुलर इमेजिनेशन है उसमें से अदृश्य हो गया है। रामकृष्ण और इसका जो सॉल्यूशन है वो सॉल्यूशन स्वामी जी ने दिया है। आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च यानी कि आपको सिर्फ अपने आत्मन की मुक्ति के बारे में नहीं सोचना। वेदांत का विपरीत अर्थ घटन नहीं करना। सब कुछ ब्राह्मण है। यह आप कह सकते हैं कि सब कुछ ब्राह्मण है तो जो ब्राह्मण नहीं है उसका त्याग कर दे। किंतु क्या ब्राह्मण नहीं है? और जो भगवान राम उन्होंने सोचा कि वह वन में जाएंगे सन्यास लेकर के तो वो वशिष्ठ मुनि को उनको कहना पड़ा कि अच्छा राम बताओ तो कि ऐसा क्या है इस जगत में जो कि ब्राह्मण नहीं है। ईश्वर नहीं है और जिसका तुम त्याग करोगे तो भगवान राम चुप हो गए। सब कुछ तो ब्राह्मण है। सब कुछ तो ईश्वर है। तो आप त्याग किस चीज का करेंगे? किंतु यह पॉपुलर इमेजिनेशन में यह जो कांसेप्ट इतना डीपली चला गया है कि यह जो जगत है या तो फिर यह सांसारिकता है या तो फिर यह व्यवहार है या इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग है, सर्विस सेक्टर है या तो फिर यह गवर्नेंस है, मिलिट्री है, उन सबके साथ में धर्म का कुछ लेना देना नहीं। यदि आप धार्मिक है तो आप कमजोर हो जाएंगे। आप मूर्ख बन जाएंगे। जिसको धर्म करना है वह करो। जिसको धर्म नहीं करना है, वह यह सब बाकी की चीजें करें। यानी कि बाकी की चीजें करने वालों बड़े-बड़े बिजनेसमैन है, बड़े पॉलिटिशियन है, बड़े यह है, वो है, इंडस्ट्रियलिस्ट है। वे लोग लिप सर्विस तो देंगे धर्म को। किंतु उनको यह बड़ा सीरियसली पता होता है कि ज्यादा सीरियसली हम यदि स्पिरिचुअल हो जाएंगे तो अपना बिजनेस है वह डूब जाएगा। यानी कि वो सबको लिप सर्विस दो। बाकी जो कुछ करना है हम अपने हिसाब से करते रहो। तो यह जो स्प्लिट है बिटवीन रिलीजन एंड बिटवीन द वर्ल्ड यह बड़ी ही भयानक है भारत के लिए। खास करके दूसरे देशों में ये चिंता नहीं है। अमेरिका में चिंता नहीं है कि रिलीजन हम चर्च में है। चर्च के बाहर जैसे ही आए हमको वर्ल्डली वाइज हो जाना है। क्योंकि उनको चिंता क्यों नहीं है? क्योंकि धर्म चर्च के बाहर कभी आता ही नहीं है। तो जैसे स्वामी जी ने कहा कि वो जो अमेरिका में धर्म का क्या स्थान है? तो वहां पर जैसे कि एक बड़ी धनवान एक महिला है उसके जो जो बैठक कक्ष है उसके भीतर में एक जापानीज वाज है। क्यों? क्योंकि जापानीज वाज रखने की एक फैशन चली है आजकल। तो ऐसा धर्म एक फैशन के रूप में रखना है वो बड़ा सजधज करके संडे को चर्च में जाना है या स्वामी जी जैसे कोई फॉरेन प्रीचर्स आ जाए तो उसका एक एग्जोटिक वैल्यू है बोल कर के उनको पार्टी पार्टी में बुलाना है और उनको बाकी सबके सामने वो दिखाना है कि देखिए हम लोग ऐसे लोगों के साथ में वो मिलते जुझुलते रहते हैं बस वहीं तक धर्म का वैल्यू है उससे ज्यादा कुछ नहीं है किंतु भारत में जबकि धर्म अपनी रगरग में खून के प्रत्येक बिंदु में अपने डीएनए में तक चला चला गया है। हमारे लिए इस तरह का स्प्लिट बड़ा भयानक है। क्योंकि यदि सब जगह पर धर्म है और आप फिर यह कहेंगे कि यह सांसारिकता है या वर्ल्डलीनेस है, जीडीपी डेवलपमेंट है या तो फिर इंडस्ट्रियलाइजेशन टेक्नोलॉजी अपना स्पेस प्रोग्राम है, एआई टेक्नोलॉजीस है। उसको धर्म से दूर रखो। तो फिर ये जाएंगे कहां? फिर तो जगह ही नहीं है जाने की। अमेरिका, यूरोप, चाइना में आप तो धर्म जो है चर्च के बाहर में या तो फिर यह जो वहां का यह जो टेंपल है उसके बाहर में आएंगे आप बाकी सब चीजों को लेकर के आराम से रहेंगे। किंतु भारत में धर्म आध्यात्मिकता सिर्फ मंदिर में नहीं है। सिर्फ भगवान की मूर्ति में नहीं है। सिर्फ तीर्थ क्षेत्र में नहीं है। वह प्रत्येक मनुष्य के हृदय में है। इस तरह की परिस्थिति में यदि हम स्पिरिचुअलिटी और यह सेकुलर और स्पिरिचुअल इन दोनों के बीच में यदि गैप करेंगे इन दोनों को यदि सेपरेट करेंगे तो भारत का उत्थान कभी नहीं होगा। यानी कि भारत को यदि स्वामी जी के आइडियल्स को लेकर के उत्थान करना है तो यह जो सबसे पहला रिलीजन स्पिरिचुअलिटी को मिसकसेप्शन है उसको हटाना है। स्वामी जी का जो मंत्र जो है महामंत्र आत्मानो मोक्षार्थम जगत हिताय च उसके अनुसार यह जो वर्ल्ड है और यह जो अनदर वर्ल्ड है दिस वर्ल्ड एंड अनदर वर्ल्ड यह जगत पर जगत यहोक परलोक इन दोनों के बीच में एक सेतु बंधन करना है और इस सेतु के माध्यम से आप आसानी से इस जगत में भी रह सकते हैं और उस जगत में भी रह सकते हैं। यह है भविष्य के भारत की स्वामी जी की कल्पना थोड़ा सा टेक्निकल हो गया डिस्कशन एनीवे अभी इसके बाद में नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: कृपया फिर से बताएं कि आपने आध्यात्मिकता और आर्थिक विकास के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित किया?
अभी जैसे रामकृष्ण मिशन को ही देखिए। यह जो इस की कल बात हो रही थी राइट इस है ना कि कोई भी दूसरे धार्मिक ये है खास करके हिंदू धर्म के उसमें आपको धर्म के बारे में बहुत सारा चर्चा सुनने को मिलेगा। बड़े-बड़े मंदिर बना देंगे। बड़ी-बड़ी पूजा होगी, सब कुछ होगा। किंतु रामकृष्ण मिशन को आप किस तरह से देखते हैं कि हमारे यहां पर यह सेवा प्रतिष्ठान भी है। हमारे यहां पर इंजीनियरिंग कॉलेज भी है। अपने यहां पर हाई स्कूल भी है। अपने यहां पे ये मेडिकल सर्विज भी अवेलेबल है। यह रूरल और एग्रीकल्चर डेवलपमेंट भी होता है। यानी कि रामकृष्ण मिशन में ठाकुर ने चाहे कुछ भी कहा हो कि आप यदि वो ईश्वर दर्शन होगा तो ईश्वर के पास में आप क्या मांगेंगे कि हस्पताल स्कूल बना दो। ऐसा मांगेंगे ना कि आत्मा की मुक्ति मांगेंगे या तो कि ईश्वर का दर्शन मांगेंगे। वो ठाकुर ने जो भी कहा हो स्वामी जी ने जिस तरह से उसको इंटरप्रेट किया है हम लोग यह स्कूल, हॉस्पिटल और मंदिर इन दो तीनों में कोई फर्क नहीं समझते हैं। तो यह है स्वामी जी का आईडिया कि आप यह वर्ल्ड में रहने के लिए जो कुछ भी डेवलपमेंट करना है, वर्ल्ड में एक्सेल होने के लिए जो कुछ करना है, वह भी कीजिए और साथ में आप स्पिरिचुअल भी रहिए।
प्रश्न: आध्यात्मिकता के आधार पर कृषि क्षेत्र का विकास कैसे हो सकता है?
नहीं एक बहुत अच्छा प्रश्न है। इसके बारे में मैं जब रांची में था तो मैंने भी काफी सोचा था। देखिए भारत में गांव में आप जाएंगे ना तो आपको क्या देखने को मिलेगा पता है? जैसे हम मां मां का जीवन जो पढ़ते हैं ना तो यह गांव में कितनी रूढ़िच चुस्तता है। जाति और नाती को लेकर के कितना सब कुछ है। यह जाति वाले उसके साथ में वह मैरिज नहीं करेंगे। इसको एक्सक्लूड करके रखेंगे। तो एक्चुअली धर्म का जो दुष्प्रभाव यदि कहेंगे विकृत होकर के जो बहुत ज्यादा जिसको कहेंगे कि सुपरस्टिशन जो सब फैला हुआ है उसको हटा के धर्म का जो मूल स्वरूप है आत्मन की अमरत्व आत्मन की महत्ता वो वेदांत उसमें उन लोगों में जैसा ही हम स्प्रेड करेंगे ना साथ में ही हम देखेंगे कि उनके भीतर में जागृति आना शुरू हो जाएगा। मैं यह रांची में जाता था। ट्राइबल लोगों के साथ में बात करता था। देखता था कि यह जो विकसित होने में उनके जीवन में जो सबसे बड़ी बाधा है ना वो है उनका माइंडसेट। अभी आप कहेंगे कि आप लोग एक काम कीजिए हम लोग दिव्यायन जो कि हमारा जो कृषि विज्ञान केंद्र था रामकृष्ण मिशन का उसका नाम था दिव्यायन। तो दिव्यायन से हम आपको मान लीजिए आप लोग सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाइए और आप सेल्फ हेल्प ग्रुप में आप सेविंग्स कीजिए और जितना सेविंग आप करेंगे ना उसका उतना ही हम लोग आपको देंगे। यानी कि आपका सेविंग 1000 का है तो उसके अगेंस्ट में हम आपको ₹1000 देंगे। गवर्नमेंट की स्कीम थी। जितना सेविंग वे लोग करते हैं उतना हमको देना है। तो 2000 आपके पास में हो जाएंगे। यह 2000 लेकर के आप कुछ ना कुछ लोन लेकर के 2000 में से आप कुछ ना कुछ कोटेज इंडस्ट्री स्टार्ट कीजिए। वो चाहे वो माने यह अगरबत्ती बनाना है, आचार बनाना है, गमछा बनाना है ना कि एनिमल हस्बेंडरी कोई यह चिकन है या तो गोट है उसको परचेस करके उसको यह करना है, डेवलप करना है आपका एनिमल फार्म तो आप कुछ भी यह उसमें से लेकर के कर सकते हैं। तो उस समय मैंने देखा कि यह जो माइंडसेट जो रिस्ट्रिक्टेड होता है ना तो ऐसा नहीं सोचेंगे कि किसका क्या नीड है, किसको कितना देना। कौन-कौन सा यह है, कौन से सब कास्ट का यह है, कौन सा फिर हमने सबसे बड़ा काम किया था जो कि सिमिलर कास्ट के हैं। उन्हीं लोगों का बनाना है ग्रुप। अदरवाइज तो प्रॉब्लम हो जाएगा। किंतु यह जो सब है रिस्ट्रिक्शन इन थिंकिंग आप मनुष्य का यह नहीं देखते हैं कि उसमें टैलेंट कितनी है। उसका बैकग्राउंड देखते हैं कि यह कौन सी जाति का है, कहां से आया है, क्या है उसका। तो ये एक बहुत बड़ा डेंजर है। बहुत बड़ा रुकावट है हमारे डेवलपमेंट में। सो दैट इज व्हाट वी नीड टू रिमूव। कल्चरल जिसको कहेंगे ना अपग्रेडेशन वो करना होगा। यह जो रिस्ट्रिक्टेड माइंड स्पेस जो है ना रूरल सेक्टर में वह मैंने देखा है। इन लोगों का हृदय सरल होता है। जैसे मैंने कहा ना यह जो शहर वाले जो होते हैं ना उन लोगों का गांव के प्रति एक आइडियलिस्टिक थिंकिंग रहता है कि गांव में सभी लोग एकदम सरल सहज जीवन जीते हैं। वे लोग हम जाएंगे तो बड़े खुले हृदय से हमको इनवाइट करेंगे। हमारी बड़ी यह जो स्वामी जी कहते हैं ना कल ही हमने पढ़ा कि ये कश्मीर से कन्याकुमारी कहां पे भी चले जाइए जब तक गांव में एक रोटी का टुकड़ा है तब तक वो जो आगंतुक है मेहमान है वह भूखा नहीं रहेगा भिक्षुक भूखा नहीं रहेगा व्हाट इज गुड किंतु यह जो सब है जैसे ही वहां पे वो दूसरी नाती दूसरी जाति यह सब बातें आ जाएगी फटाफट करके यह जो उनके हृदय के दरवाजे हैं वो बंद होना शुरू हो जाएंगे ऐसा नहीं है कि उन लोगों के साथ में एनिमिटी है या तो फिर झगड़ा वगैरह कुछ है किंतु वही है कि यह हमारा ही यह उनका है। उसका एक सुंदर उदाहरण है
कहानी: स्वामी योगानंद और रूढ़िवादी महिलाएं
योगेंद्र महाराज। योगेंद्र महाराज एक समय उन्होंने ठीक किया कि वो बाहर में जाकर के घूमेंगे और कहीं पेड़ के नीचे में बैठकर के तपस्या करेंगे। तो वहीं वराह नगर के आसपास में ही कहीं पे वह एक पेड़ के नीचे में बैठकर के तपस्या कर रहे थे। वह नदी थी। शायद यही भागीरथी ही होगी और उसके किनारे बैठकर के तपस्या कर रहे हैं। तो हुआ ऐसा कि वहां पे वो घाट के ऊपर में कुछ लेडीज वो पानी भरने के लिए ना कपड़े धोने के लिए आई। तो उन्होंने देखा यह युवा सन्यासी है। चेहरे पर इतना तेज है। इतना उनके भीतर में यह तपस्या का भाव दिख रहा है। तो नेचुरली स्त्रियों का हृदय है। वह तो बेचारी उनके पास में सब आकर के 101 लेडीज होंगी। तो सब आकर के वो उनके सामने इर्दगिर्द बैठ गई। उनको घेर करके और फिर सब कंप्लेन करना शुरू किया। अरे तुम तो इतने युवान लड़के हो। इतने खूबसूरत दिखते हो। इतना तेज है तुम्हारे चेहरे पे। तुम अपने मां-बाप को छोड़कर के यहां पर पेड़ के नीचे बैठे हो। भिक्षा का अन्न खा रहे हो। तुमको पता नहीं तुम्हारे मां के हृदय में किस तरह का बीतता होगा। कितना दुख होता होगा। तुमको माने पिताजी मां के ऊपर में थोड़ी सी भी दया नहीं है। ऐसा बोलकर कि कुछ कुछ कंप्लेन कर रही है। कुछ ने रोना शुरू कर दिया। यह जो स्त्रियों का हृदय होता है। मातृ हृदय होता है कि इतना सुंदर लड़का है। इतना तेज है चेहरे पे और इस तरह से तपस्या कर रहा है। वो कुछ लोग रो रही है। कुछ कंप्लेन कर रही है। कुछ कह रही है कि अरे जाओ तुम अपने घर चले जाओ। मां की सेवा करो। मां को इतना कष्ट क्यों दे रहे हो? वगैरह-वगैरह। तो योगेंद्र महाराज सोचे यह तो बड़ी मुसीबत में फंस गए। अभी इनको कुछ कहने से और ज्यादा कंप्लेन करेगी और ज्यादा पीछे लगेगी और जो रो रही है तो जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया है तो फिर इसलिए वो योगेन महाराज ने हिंदी में बोलना शुरू किया ये तो पूरा वराह नगर कोलकाता सब बेंगली में है तो उन्होंने हिंदी में बोला क्या माई आप क्या कह रहे हैं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जैसा उन्होंने हिंदी में बात किया वो जितनी भी लेडीज थी सबका चेहरा बदल गया। अरे, यह तो हिंदी भाषी है। यह तो मेढो। मेढो, अर्थात कि यह जो नॉर्थ इंडिया वाले जो होते हैं, मारवाड़ी ना कि ऐसा कोई। तो, यह तो मेढो है। ऐसा बोल करके सब लोग खड़ी हो गई। क्रोधित हो करके आपस में बोल रही है। यह निश्चय यहां पे चोरी करने के लिए आया है। सन्यासी का रूप धरा है उसने और फिर दिन में जाकर के लोगों के घर में जाकर के देखेगा कि कहां पे पैसा रखा है, कहां पे क्या है। और फिर रात को आकर के चोरी करेगा। ऐसा तुम मार करके भगा देंगे तुमको। भागो यहां से। माने पूरा स्वरूप उनका चेंज हो गया। अभी जो बेंगली में जो बोल रही है योगेंद्र महाराज को तो ऑब्वियसली सब समझ में आ रहा है किंतु अभी हंस भी नहीं पा रहे हैं क्योंकि वो तो बेंगली जानते नहीं है। तो जो भी है ऐसा हुआ ऐसा कुछ फिर घटना फिर लेडीज लोग तो चली गई। योगेंद्र महाराज जब मठ में वापस आए स्वामी जी के साथ में एक बार बात कर रहे हैं और स्वामी जी को उन्होंने पूरा प्रसंग बताया हंसते-हंसते। तो जितने भी गुरु भाई है सब लोग हंस रहे हैं। अच्छी बात है। अच्छा मन एक एक्सपीरियंस हो गया भिक्षा करने का। किंतु स्वामी जी थोड़े सीरियस हो गए। और फिर कहा देखो भाई इसी को कहते हैं पेट्रियोटिज्म। जो अपनी नाथ के अपनी जात के अपनी लैंग्वेज वाले हैं उसके प्रति इतना प्रेम है। किंतु जैसे ही पता चला कि इसको अपनी लैंग्वेज नहीं आती। दूसरी लैंग्वेज का है तो उनका जो भी प्रेम है, जो भी करुणा है, जो दया है, सब हवा हो गया। तो यह भारत में देखिए कि आपको कोई पाकिस्तान से बुलाने की जरूरत नहीं है उसके साथ में इस तरह का व्यवहार करने के लिए। आपस में ही इतनी लैंग्वेजेस है, इतना डिवीजन है और यदि हम आपस में इस तरह का वेयर रखेंगे तो कैसे काम होगा? तो यह क्या है कि और फिर सब कुछ धर्म के नाम पे यह सब चलता है। यह हमारा धर्म बेटर है। उसका धर्म यह है। सो वी नीड टू स्प्रेड वेदांत इन ऑर्डर टू ब्रिंग दिस कल्चरल रेवोल्यूशन एट द ग्रास रूट। तभी तो यह कहीं जाकर के जो रिस्ट्रिक्टेड माइंड स्पेस है वह ओपन होगा। मैं रांची में काम करता था। मैंने बार-बार यही देखा कि यदि यह गांव वाले ये ट्राइबल लोग हैं हम लोग जो कहते हैं ऐसा ठीक-ठीक करेंगे ना तो उनका पॉवर्टी है, इकोनॉमिक सिचुएशन है। कितना इंप्रूव हो जाएगा। किंतु वही है कि इस तरह की उनकी मेंटालिटी है। इस तरह की बिलीफ सिस्टम है कि हमारी इंस्ट्रक्शन का ठीक से पालन ही नहीं कर पा रहा है। तो फिर मैं एक बार हताश हो गया था क्योंकि इस तरह का कल्चरल चेंज लाना इट गोस फार बिय्ड द स्कोप ऑफ एनी सिंगल ऑर्गेनाइजेशन और एनी सिंगल इंडिविजुअल। सो दैट इज व्हाट इफ भारत का उत्थान होना है तो यह जो अपना जो आत्मन का जो संदेश है उसको फैलाना पड़ेगा।
प्रश्न: शायद स्वामीजी भारत की आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग आर्थिक विकास में करना चाहते थे?
यह जो आपने कहा ना यह जो कांसेप्ट है क्रिएटिव माइनॉरिटी जो आर्नोल्ड टोयन जो हिस्टोरियन है उसने इसको डेवलप किया है। कहता है कि कोई भी सिविलाइजेशन है उसमें ये जो टॉप 10% क्रिएटिव माइनॉरिटी होती है जो कि रियली लीडरशिप क्वालिटी जिनमें होती है रियली जीनियस लेवल इंटेलेक्ट जिनमें होती है और दे ड्रॉ दे ड्राइव द डेवलपमेंट ऑफ दैट सिविलाइजेशन। अब यह क्रिएटिव माइनॉरिटी जिस डायरेक्शन में जाएगी उस डायरेक्शन में डेवलपमेंट होगा। अभी भारत स्वामी जी का कांसेप्ट समझ यदि ले ले अप्लाई करें यहां पे तो इंडिया की जो क्रिएटिव माइनॉरिटी है इट इज ऑलवेज अट्रैक्टेड टुवर्ड्स रिलीजन ऑलवेज अट्रैक्टेड टुवर्ड्स स्पिरिचुअलिटी। ये बुद्धिज्म में जिस तरह से कि एक के बाद एक कितने राजाओं ने भगवान बुद्ध के संदेश को ग्रहण किया। और मैं मैं खुद का अपना उदाहरण देता हूं। आई वास जैसे मैंने कहा था आई एम अ सेकुलर सोशलिस्ट था उस समय में। वहां से ठाकुर जैसे कि ब्रेन वाश करके मुझे यहां पे ले आए। सो दैट इज देयर कि जो लोगों के भीतर में एक कुछ करने की इच्छा होती है, हाइली एंबिशियस होते हैं, हाईली टैलेंटेड होते हैं। परहेप्स दे आर इंस्टिंक्टिवली अट्रैक्टेड टुवर्ड्स स्पिरिचुअलिटी। किंतु होता क्या है? अभी जैसे अमेरिका में एक बार में एक रिपोर्ट पढ़ रहा था। सीआईए का रिक्रूटमेंट ड्राइव चल रहा है। तो वे लोग सोच रहे हैं कि कहां से लोगों को रिक्रूट करें? जो स्पाई एजेंसी है इट इज अ फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस फॉर अमेरिका। तो बेस्ट ऑफ द बेस्ट हमारे पास में होने चाहिए। तो ये हावर्ड है या जितनी भी आईवी लीग यूनिवर्सिटी है वहां पे ये सीआईए वाले जाते हैं। वहां के जो टॉप टैलेंटेड लोग हैं उनको ये लोग अट्रैक्ट करते हैं और वे लोग आ भी जाते हैं कि यार देश सेवा करनी है। देश को डिफेंड करना है अगेंस्ट दी फोर्सेस ऑफ कम्युनिज्म एंड फासिज्म। तो ये जो पेट्रियोटिज्म है वो इतना स्ट्रांग है इन लोगों में कि हाईएस्ट लेवल के जो लोग हैं जो आज यदि बिजनेस सेक्टर में जाएंगे तो मिलियनर तो ईजीली बन जाएंगे तो वो नहीं करके सीआईए में जाकर के वे लोग एक एनोनिमिटी का जीवन जीते हैं क्योंकि एक बार आप सीआईए में चले गए आपका वो आइडेंटिटी ये लोग छुपा करके रख देंगे कौन है वहां पे एजेंट कौन क्या कर रहा है कुछ भी बाहर नहीं आएगा बट पेट्रियोटिज्म इज सो स्ट्रांग ये ब्रिटेन है फ्रांस है जर्मनी है। सेकंड वर्ल्ड वॉर की हीरोइज़्म की स्टोरीज आप पढ़ लीजिए। बेस्ट ऑफ द बेस्ट टैलेंट है उन कंट्रीज की। दे आर पेट्रियोटिक, दे आर बिजनेस ओरिएंटेड वगैरह-वगैरह। भारत में यदि बेस्ट ऑफ द बेस्ट टैलेंट गोज़ टुवर्ड्स रिलीजन। और फिर यदि रिलीजन का इस तरह का कॉनसेप्शन हो जाए कि इस जगत के साथ में कोई लेना देना ही नहीं है तो फिर तो वो पूरा देश का होगा क्या? राइट? तो दिस इज दैट कि ना? मैं
प्रश्न: चीन ने पश्चिम की नकल किये बिना, स्वयं ही विकास किया। क्या यह अच्छी बात नहीं है?
यहां पे आपको यह करेक्ट करूंगा कि कम्युनिज्म तो उन्होंने होलसेल लिया है वेस्ट से। उनका जो इंस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट है वो इट्स प्योरली कम्युनिस्ट। ये जो आप रशिया और चाइना शुरू-शुर में इन दोनों का काफी फ्रेंडशिप था। क्योंकि रशिया में पहले ये कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन आया। बाद में चाइना में आया। तो उस समय रशिया में से ये जो चाइनीस जितने भी माओ ज़हदोंग वगैरह के समय में चाइना से नियमित बड़े-बड़े डेलीगेशन सोवियत यूनियन जाते थे। वहां की फैक्ट्री सिस्टम है, गवर्निंग सिस्टम है, सोवियत सिस्टम है। यानी कि कलेक्टिवाइजेशन है, फार्मिंग है। सब कुछ उन्होंने वहां से डिट्टो टू डिट्टो कॉपी किया है। तो पहले सोवियत यूनियन में से सीधा कॉपी किया। बाकी अमेरिका में से उन्होंने जब ये कैपिटलिस्ट हो गए तो ये अमेरिका से बहुत कुछ कॉपी किया और वहां पे जो माओजेदोंग उसने जो कल्चरल रेवोल्यूशन लाया उसमें यह जो इंडीजीनियस जो कल्चर था उसका पूरा खात्मा कर दिया था। सो मॉडर्न चाइना इज वेरी मच अ बेस्ड ऑन सोवियट एंड लेटर अमेरिकन इंस्टीटशंस एंड नो हाउ ये जो
प्रश्न: हमने पश्चिमी संस्थाओं की कॉपी /पेस्ट की है। आधुनिक भारत के निर्माण में हमने अपनी आध्यात्मिक विरासत को नजरअंदाज कर दिया है।
ठाकुर का उदाहरण है ना कि वो जो वाटर स्नेक होता है वो एक मेंढक को गिलने का प्रयास करता है। वो मेंढक को गिल नहीं पाएगा। तो मेंढक आधा फंसा हुआ है। उसका भी यातना का अंत नहीं है। मेंढक भी चिल्ला रहा है और सांप भी अभी उसके गले में फंस गया। वह भी चिल्ला रहा है। ना ही मरते हैं ना ही यातना का अंत होता है। चाइना का क्या है? ये जैसे आपने कहा ना विद चाइनीस कैरेक्टरिस्टिक वो इतने प्रैक्टिकल है। वो जो देंशियाओ पिंग था उसका बड़ा फेमस उसका ऑब्जरवेशन है। बिल्ली काली हो ना कि गोरी उसको चूहा पकड़ना है। हम लोग जो है यह आइडियलिज्म में ऐसा फंस गए हैं कि यह बिल्ली को गोरी ही होना चाहिए। काली नहीं होना चाहिए। भले ही चाहे चूहा पकड़े ना पकड़े डज नॉट मैटर। आईडियोलॉजिकली प्योर होना है। यह आपने बिल्कुल ठीक कहा। यह मैं भी अनुभव कर रहा हूं इसको। खास करके ये जो देखिए स्पेशली अप टू 1970 वो तो फिर भी ठीक था। ये 1980 1990 और ये जो दो 2025 साल जो गए हैं ना उसने जैसे कि पूरी हमारी इंडियन थिंकिंग को ना रिवर्स करके रख दिया है। और यही जो 20-25 साल है जबकि चाइना उठ गया तो दैट इज़ समथिंग रियली नीड टू बी थिंक अबाउट। अभी आज देयर इज नो कोई लाभ नहीं है टू जो ढल गया है दूध नो नीड टू क्राई ऑन स्पिल्ड मिल्क किंतु भविष्य में अपने को फिर से यह सोचना है बी मोर प्रैक्टिकल लाइक चाइनीस
प्रश्न: कृषि क्षेत्र में बेरोजगारी को कम करने के लिए हमें शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या को स्थानांतरित करने की आवश्यकता है। लेकिन क्या शहरीकरण से पर्यावरण का विनाश आदि समस्याएं उत्पन्न नहीं होंगी?
देखिए अर्बनाइजेशन मैं उसको कोई बहुत ज्यादा रिकमेंड नहीं करता। मेरे भीतर में अभी भी वह आइडियलिज्म है कि गांव में जाएंगे शुद्ध हवा पानी में रहेंगे। प्रॉब्लम क्या है? एज ऑफ टुडे जो इकोनॉमिक थ्यरी है, वह हमको कहती है कि आपका मेजॉरिटी ऑफ़ एंप्लॉयमेंट है सर्विस सेक्टर और इंडस्ट्रियल सेक्टर में होना चाहिए। रूरल सेक्टर जो है ना वो 510% से ज्यादा एंप्लॉयमेंट अब्सॉर्ब ही नहीं कर पाएगा। क्यों? क्योंकि अभी एक फादर के पास में एक एकड़ जमीन है। उसके चार लड़के हैं। तो एक एकड़ को चार लड़कों में बांटा 1/4 क्वार्टर एकड़। तो उसका जो प्रोडक्टिविटी है ना जमीन का बिल्कुल बैठ जाएगा। मैं रांची में था ना तो पॉकेट साइज के वो प्लॉट है। एक घर की साइज जितनी है उतना प्लॉट में ये लोग खेती कर रहे हैं। इसमें प्रोडक्शन होगा ही नहीं। अभी अमेरिका में जाइए 100-100 एकड़ के प्लॉट है तो वहां पर आप मशीन टूल लगा करके इसको आप मैकेनाइज करके आप ठीक प्रोडक्शन कर सकते हैं। यानी कि अब कहते हैं कि प्रॉपर आपको प्रोडक्शन लेना है तो जमीन की साइज 10 एकड़ 20 एकड़ 30 एकड़ से ज्यादा ही होनी चाहिए जो कि भारत में जमीन पर जो कैपिटा है पर हेड बड़ी छोटी-छोटी है। तो ज्यादातर अभी जो 45% में से आप 15% ना 10% को वहां पे रखिए। बाकी सबको एग्रीकल्चर सेक्टर से निकालिए। जमीन के जो छोटे-छोटे टुकड़े हो गए हैं उसको बड़ी-बड़ी जमीन कीजिए। मैकेनाइजेशन कीजिए। यह जो हवा में से वो एरोप्लेन में से वो ये करते हैं ना फर्टिलाइजर डालते हैं। ये सब आपको करना पड़ेगा। इन ऑर्डर टू मेक एग्रीकल्चर सेक्टर प्रोडक्टिव। तो अभी यह प्रश्न है कि आप नियरली 50 करोड़ लोगों को एग्रीकल्चर सेक्टर में से निकालेंगे तो उनको कहां ले जाएंगे? अर्बन सेंटर्स नए बनाएंगे। इंडस्ट्रियलाइजेशन करेंगे नहीं कि क्या करेंगे? आई डू नॉट बिलीव के इंडिया के लिए अर्बनाइजेशन कोई इतना बड़ा ये है फैक्टर सर्विस सेक्टर में ये लोगों को हम अपग्रेड कर सकते हैं और आजकल का खास करके ये जो मॉडर्न टेक्नोलॉजी का युग है ना वर्क फ्रॉम होम या तो फिर ये रिमोट वर्किंग अमेरिका में भी यह ट्रेंड चला है कि जो हाइली एजुकेटेड वर्क फ़ोर्स होती है जो कि ऑनलाइन यह सब काम कर सकते हैं। वे लोग अभी न्यूयॉर्क जैसे बड़े मेगा सिटीज को छोड़कर के सबब में जाके रहते हैं। वह हाई लिंक कंप्यूटर यह जो इंटरनेट कनेक्शन होते हैं एन उसके थ्रू काम करते हैं। सो इट इज़ अ रिवर्स अर्बनाइजेशन ट्रेंड चल रहा है। सो दैट वी कैन अप टू एन एक्सटेंट ब्रिंग हियर कि सर्विस सेक्टर में जाए देन नो नीड फॉर सर्विस सेक्टर जो अर्बनाइजेशन है ना इट इज़ बेसिकली अ स्पेशलिटी ऑफ़ इंडस्ट्रियल सेक्टर। तो आप इंडस्ट्रियल सेक्टर का ऑलरेडी हमारा जो है अब्सॉर्प्शन हो गया है। सर्विस सेक्टर में आप जाइए। इन दैट केस यू यू कैन स्किप अर्बनाइजेशन प्रोसेस। यू कैन स्टिल लिव इन सबर्ब्स। यू कैन स्टिल लिव इन द विलेजेस एंड यू कैन स्टिल राइट कंप्यूटर कोड। सो देखिए ये सब सपने हैं ना। अब 50 करोड़ को इधर-उधर करना वो कोई इजी बात तो है नहीं। अमेरिका की पपुलेशन है 2530 करोड़। और उसी में ये लोग फंस जाते हैं। तो अपना
प्रश्न: मैंने सुना है कि चीन हमारे आश्रम और साधुओं को अपने यहाँ पे चाहता है। यानि की वे हमारा वेदांत और योग भी सीखना चाहते हैं।
देखिए ये जो रिक्वेस्ट है चाइना से जो आई है उसको कोई बहुत सीरियसली लेने की जरूरत नहीं है। ये लोग सवा5 करोड़ का चाइना है और बहुत ही कॉम्प्लेक्स कंट्री है और हार्ड कोर मटेरियलिस्ट है वे लोग अभी आजकल। ये जो सब बोलते हैं रामकृष्ण मिशन से भेजो तो एक माइंड से एक पॉइंट ऑफ व्यू उनका ऐसा भी रहेगा कि इनको स्टडी करते हैं। फिर स्टडी करके फिर वहां पे जाकर के क्या हम गड़बड़ कर सकते हैं। सो सो डोंट टेक चाइना इन दैट वे कि वे लोग हमसे स्पिरिचुअलिटी सीखना चाहते हैं। उनका मोटिवेशंस जो होते हैं बड़े ही कॉम्प्लेक्स होते हैं। इतना सरफेस पे जो दिखता है ऐसा सब कुछ वहां पे नहीं है। दैट वी हैव टू रिमेंबर। और देखिए चाइना वाले इवन उन लोगों का है। कैथोलिक चर्च के साथ में उन लोगों का ये है। को ये कोलैबोरेशन है। तो कैथोलिक चर्च का वेटिकन का रूल ऐसा है कि वे लोग अपॉइंट करेंगे। बिशप कौन होगा? आर्च बिशप कौन होगा? वगैरह-वगैरह किंतु चाइना ने ऐसा उनके साथ में कोलैबोरेशन किया है कि देखिए आपको क्रिश्चियनिटी को चाइना में फैलाना होगा तो आपके बिशप आर्च बिशप जो कि लोकल बॉडी है आपकी पूरी हम अपॉइंट करेंगे यानी कि ये लोग कम्युनिस्ट पार्टी के अंडर में रहेंगे। अभी प्रश्न होगा कि कम्युनिस्ट पार्टी कैथोलिसिज्म को अलऊ करती ही क्यों है? यदि आपको इतना कंट्रोल चाहिए किंतु उन लोगों का थिंकिंग बड़ा ही शार्प है। वे लोग कहते हैं लोगों के ऊपर में जनता के ऊपर में कंट्रोल रखना है। डेमोक्रेसी तो है नहीं। जनता नाराज हो जाएगी तो सीधा रिवॉल्यूशन ही आ जाएगा। तो बेटर है कि कैथोलिसिज्म का प्रचार होता है। लोग यदि कैथोलिक क्लर्जी को सुनते हैं तो उनको हम कंट्रोल में रखेंगे और उनके थ्रू जनता को कंट्रोल में रखेंगे। ये जो तिब्बेटन बुद्धिज्म है एक समय तो था कि उसको पूरा खत्म ही कर दिया। फिर उन्होंने नया चालाकी किया कि ऐसा नहीं खत्म नहीं करना है। हम लोग बदनाम हो जाएंगे। यह जितने भी लामा है उसका अपॉइंटमेंट हम करेंगे। यानी कि हमारे कंट्रोल में रहेंगे। फिर लामा के थ्रू हम लोगों को कंट्रोल में रखेंगे। तो यह उन लोगों का जो थिंकिंग प्रोसेस है ना वह बड़ा कॉम्प्लेक्स है। डोंट टेक इट फ्रॉम सरफेस।