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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 11 Aug 2025

Invocation

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः फ्रॉम दिस वीक वी विल बिगिन स्वामी विवेकानंदास माय प्लान ऑफ कैंपेन वी हैव ऑलरेडी हम लोगों ने ऑलरेडी 18 पॉइंट कवर कर दिए हैं। 17 पॉइंट कवर किए हैं। 18वा पॉइंट अभी चल रहा है। तो एक रिकैप कर लेते हैं कि किस तरह से स्वामी जी जब भारत में आए अमेरिका से तो पहले तो देखिए स्वामी जी का

प्रारम्भ से लेकर “My Plan of Campaign” व्याख्यान तक की स्वामी विवेकानन्द के जीवन की एक रुपरेखा के 3 Phases

बैकग्राउंड क्या है? बाय द टाइम यह माय प्लान ऑफ कैंपेन अर्थात कि भारत के नवजागरण की भारत के पुनः उत्थान की पुनरुत्थान की यह कहानी जब स्वामी जी कहते हैं बाय दैट टाइम स्वामी जी के जीवन में तीन मेजर फेजेस वो समाप्त हो चुके हैं।

Phase 1 : दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण के सान्निध्य में साधन में सिद्धि प्राप्त करते हुए स्वामीजी

सर्वप्रथम तो है दक्षिणेश्वर में और फिर बाद में काशीपुर में श्री रामकृष्ण के सानिध्य में रहकर के श्री रामकृष्ण के चरणाश्रय होकर के रहकर के जिस तरह से उन्होंने भारतीय आध्यात्मिकता के मूल मंत्र सीखे बाल भारतीय साधना उन्होंने जितनी भी साधन पद्धतियां है उसमें से जो सबसे इंपॉर्टेंट कुछ है ठाकुर की तरह तो नहीं कि ठाकुर ने जिस तरह से जितनी भी साधन पद्धतियां भारत में उस समय वर्तमान थी सभी का अनुष्ठान किया हो। स्वामी जी का ऐसा तो नहीं किंतु जो सबसे इंपॉर्टेंट थी उसमें भी यह मधुर भाव और यह अद्वैत भाव यह दोनों की साधना स्वामी जी

मधुर भाव का गीत गाते हुए स्वामीजी

ने की है। यह मधुर भाव की बात स्वामी जी के साथ में एसोसिएट करने से हमको शायद आश्चर्य होगा कि स्वामी जी सब समय यह जो शिव के भाव से अपने को भर दो आत्मश्रद्धा ही चाहिए भारत के नवजागरण के लिए युवानों को जागृत होना चाहिए पूरे विश्व में फैलना चाहिए इस तरह से जो एकदम जोश और उत्तेजन उत्तेजनादायक जो स्वामी जी के प्रवचनों को जिसने बाद में सुना है उन लोगों को थोड़ा सा आश्चर्य तो होगा कि किंतु फिर भी देखिए कि इस तरह के इंसिडेंट इस तरह की घटनाएं हमको कथामृत में ही दिखती है कि जब कहीं एक दिन स्वामी जी वो नलिनी दलगत वो जो एक श्लोक है एक शंकराचार्य स्तोत्र जो है अद्वैत भाव का उसका पाठ कर रहे थे। तब ठाकुर ने कहा कि अरे यह तो सब बड़े सामान्य भाव है। तुम गोपी भाव का गीत गाओ। तो फिर स्वामी जी ने उस तरह के भाव का गीत गाया तब ठाकुर प्रसन्न हुए। तो क्या है कि वो उसी समय से स्वामी जी ने जितनी भी मुख्य साधनाएं खास करके मधुर भाव और यह जो अद्वैत भाव वह साधना समाप्त कर दी थी। उसमें सिद्धि भी प्राप्त कर दी थी। तो वह एक फेज स्वामी जी के जीवन का हुआ। इसके अंत में काशीपुर में आखिरी समय में ठाकुर ने स्वामी जी को कहा भी सही उस समय के नरेंद्र को कि सभी गुरु भाइयों को इकट्ठा करके रखना है। एक और दूसरा कि आने वाले भविष्य के लिए रामकृष्ण संघ की क्या भावधारा या तो फिर क्या कार्यप्रणाली होगी। हालांकि यह सब जो टीचिंग्स थे या तो जो सब इंस्ट्रक्शंस थी ठाकुर की स्वामी जी को वह सब सीक्रेट थी। ठाकुर देखते थे कि उस समय और कोई उपस्थित ना हो। माने यहां तक कि कोई गृहस्थ उपस्थित ना हो। वह भी देखते थे और गुरु भाइयों में भी त्यागी संतानों में भी कोई उपस्थित ना हो। इस बात का ठाकुर ख्याल रखते थे। बस ठाकुर रहते थे और नरेंद्र रहता था। तो उस समय यह जो स्वामी जी का जो आज का प्रवचन है मेरी समरनीति या तो माय प्लान ऑफ कैंपेन भारत का नवनिर्माण पुनरुत्थान कैसे करना है उसके जो सीड्स है उसके यह जो बेसिक आइडियाज और कांसेप्ट है हो सकता है कि ठाकुर के साथ में वह सब कुछ डिस्कस हो गए हो यह मेरा अनुमान है श्योर तो हम कुछ कह नहीं पाएंगे तो जो भी है तो यह तो एक फेस स्वामी जी के जीवन का समाप्त हुआ। ठाकुर के सानिध्य में रहकर के साधना करना और भविष्य की रामकृष्ण संघ की स्थापना करना। यह तो एक फेज हो गया। उसके बाद में सेकंड

Phase 2 : परिव्राजक स्वामी विवेकानन्द भारतीय संस्कृति की गहन समझ प्राप्त करते है

मेजर फेज यह जो प्रवचन स्वामी जी ने 1897 में मद्रास में दिया हुआ था। उस समय का मद्रास आज का चेन्नई। तो इस यहां तक आने से पहले स्वामी जी के जीवन की जर्नी के तीन मेजर पहलू पहला वाला ठाकुर के साथ में दूसरा जो मेजर फेस स्वामी जी के जीवन का वो है प्रवृज्या उन्होंने ठाकुर की महासमाधि के बाद में वराह नगर मठ की स्थापना तो की किंतु फिर स्थापना के बाद में जो जिस तरह से फाइनेंशियल क्राइसिस आना प्रारंभ हुआ बलराम बाबू का निधन हुआ और फिर सुरेश मित्र का भी निधन हुआ। यही तो दो थे मठ के मुख्य रसकदार ठाकुर की लैंग्वेज में पृष्ठ पोषक या तो फिर मेजर डोनर्स। तो इन दोनों की महासमाधि के इन दोनों की निधन के बाद में फिर अभी मठ चलाने के लिए जो एक आर्थिक तंगी का जो यह लोग फेस कर रहे थे। तो फिर यह भी एक कारण था मठ छोड़कर के प्रवरज्या प्रारंभ करने का और एक डीपर रीजन था। वह जो रीजन था सरफेस पर था एक डीपर रीजन यह था कि सन्यासी का अंतर सहज रूप से यह खुले मैदान यह पहाड़ वन नदी समुंदर जहां पर एकांत होता है प्रकृति का एक महात्म्य वहां पर प्रकट होता है वहां पर प्रकृति के सानिध्य में रहकर के एकांत में साधना करने का यह इसकी ओर सन्यासी का सहज आकर्षण होता है और इसके अलावा भारत के जो महा है हिमालय है रामेश्वरम है यहां पर द्वारिका है तो यह भी स्वामी जी को आकर्षित कर रहे थे तो फिर स्वामी जी ने इस दोनों रीजन की वजह से वराह नगर मठ त्याग किया और भारत में प्रवृज्या प्रारंभ की भ्रमण प्रारंभ किया और परिवराजक सन्यासी के रूप में भारत की परिस्थिति को अपने फर्स्ट हैंड उसका निरीक्षण किया। अब तक तो यह जो ब्रिटिश कंट्रोल न्यूज़ पेपर और यह ब्रिटिशों के द्वारा रचित हिस्ट्री जो स्कूल कॉलेज में पढ़ रहे थे वह तो एक बड़ा ही बायास्ड एक अंडरस्टैंडिंग देता है। मेरे खुद के साथ में यही हुआ। आज की जो मॉडर्न ये जो वि ये जो आधुनिक शिक्षा प्रणाली है हालांकि आजकल ब्रिटिश लोग चले गए हैं। किंतु यह आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने भारत का यह जो आध्यात्मिक वारसा जो है ये आध्यात्मिक ये वेल्थ जो है आध्यात्मिक ये रिचनेस जो है इसके बारे में मुझे कुछ नहीं समझाया। यह सब तो मुझे यहां पर आकर के रामकृष्ण संघ में आने के बाद में सब पता चला कि किस तरह से भारत में एक के बाद एक आध्यात्मिक महापुरुष संत साधु सिद्ध अवतार इनका जन्म होता गया और किस तरह से उन्होंने भारत की भूमि को समृद्ध किया है। हमारे सनातन हिंदू धर्म की जो नीव है उसको दृढ़ किया है। तो यह सब तो मुझे यहां पर आने के बाद में पता चला। तो जो भी है उस समय स्कूल में पढ़ने के समय भी और जब तक मैं स्कूल के जो शिक्षा से प्रभावित था तब तक मुझे यह सब पता ही नहीं था। मैं यही सोचता था कि यह विज्ञान है। ये फिलॉसोफी है। ये मॉडर्न ये जो क्या कहेंगे? सिविल सोसाइटी है, मॉडर्न गवर्नेंस जो है, मॉडर्न जियोपॉलिटिक्स, नेशन सिस्टम है, वो सब वेस्ट में ही बनी है। और यही लोग सर्वश्रेष्ठ है। हालांकि वेस्ट का कंट्रीब्यूशन है किंतु यदि सिविलाइजेशन के प्रोग्रेस में ओवरऑल देखा जाए तो फिर आपको दो दिखते हैं, पहलू दिखते हैं या तो दो स्ट्रेटम दिखते हैं। एक तो है कि ये आध्यात्मिक फाउंडेशन होता है और इस आध्यात्मिक फाउंडेशन के ऊपर में आप सिविलाइजेशन रूपी एक सुपर स्ट्रक्चर खड़ा करते हैं। यदि आध्यात्मिक फाउंडेशन ही गड़बड़ हो जाए तो यह सिविलाइजेशनल सुपरस्ट्रक्चर फिर ज्यादा काम का नहीं रहेगा। वो पूरा ध्वस्त हो जाएगा। कि यह जो राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन यह टॉपिक को जितना जितना मैं स्टडी करता गया यह आर्नोल्ड टोयन भी वहां का वेस्ट का वन ऑफ द मोस्ट यू कैन से प्रोमिनेंट हिस्टोरियन उसको जैसे ही मैंने स्टडी किया तब तो मुझे पता चला कि अरे रिलीजन का इतनाेंस है। एक वेस्टर्न स्कॉलर से मुझे पता चला कि रिलीजन काेंस क्या है? फिर तो मैं यहां पे यह स्वामी जी ठाकुर मां के पास आया। तो यह अपनी आधुनिक शिक्षा पद्धति की विडंबना है। क्या करेंगे? स्वामी जी ठाकुर की कृपा से स्वामी जी के पास में ठाकुर जैसे महापुरुष का जीवंत संग करने का जो लाभ मिला था उसकी वजह से स्वामी जी की बहुत सारी गलतफहमियां वैसे तो दूर हो गई थी। किंतु जब तक भारतीय परिस्थिति भारत के गांव भारत के निवासी भारत का यह जो प्रचुर वैविध्य जो है यहां पर राजस्थान यहां पर गुजरात यहां पे मलाबार यहां पे यह हैदराबाद यहां पे यह तमिल प्रजा यहां पे ये जो नॉर्दन ये जो सब स्टेट है हिंदी भाषी जो देश है सब हमारे राज्य है ये कितना बड़ा वैविध भारत में है। एक बार मैं दिल्ली आईआईटी में गया हुआ था। उस समय मैं रांची में था। तो वहां पे दिल्ली आईआईटी का एक प्रोजेक्ट है। वह यह जो जिओ यह जो सेटेलाइट्स होते हैं सेटेलाइट्स के माध्यम से यह जो सेटेलाइट पिक्चर लेकर के यह जो नदी है, नाले है, यह वाटर शेड कैसे बनाना है, यह क्रॉप रोटेशन कैसे करना है, वेदर जो इमेज होती है सेटेलाइट की यह सब फार्मर्स के साथ में शेयर करें। तो फार्मर्स को इससे बेनिफिट होगा। तो यह आईआईटी दिल्ली और यह डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी गवर्नमेंट ऑफ इंडिया इन दोनों का जॉइंट वेंचर था और यह लोग सब कुछ एनजीओ खोज रहे थे जिनके साथ में पार्टनरशिप की जाए और जिनके माध्यम से यह लोग सेटेलाइट इमेजरी जो है यह किसानों तक ट्राइबल लोगों तक यह पहुंचाए तो रामकृष्ण मिशन उसमें एक पार्टनर था तो मैं रांची की ओर से मुझे वहां पर कॉन्फ्रेंस में भेजा था तो मैं वहां पर गया आईआईटी दिल्ली में तो वहां पे एक ये था गेस्ट हाउस था सबको रहने को दिया था वहां पे वैसे तो दिल्ली में अपना मिशन है किंतु क्या है कॉन्फ्रेंस वो मॉर्निंग टू नाइट तक चलेगी तो आश्रम में आना जाना मुश्किल होगा तो गेस्ट हाउस में ही रहना पड़ा था मुझे उस समय कुछ दिनों के लिए तो वहां पे मैं गेस्ट हाउस का ये जो ये है डाइनिंग हॉल वहां पे मैं बैठा हुआ था एक दिन तो वहां पे तो आईआईटी दिल्ली तो एक इंटरनेशनल प्लेस है तो वहां पे एक यूरोपियन तीनचार यूरोपियन थे वो डिस्कस कर रहे थे कुछ तो इंग्लिश में कर रहे थे कि यूरोप के बारे में यूरोप की लैंग्वेजेस वगैरह के बारे में तो उन्होंने देखा मैं साधु के कपड़े पहने हुए हूं एक आश्चर्य भी होता है ना आईआईटी दिल्ली जैसी जगह पे एक साधु क्या कर रहा है वैसे मैं ब्रह्मचारी था सफेद कपड़ों में था किंतु वो लोग समझ गए कि यह कोई सिविलियन नहीं है यह कोई साधु टाइप का ही कोई है तो उन्होंने मेरे साथ बात करना प्रारंभ किया वो बात में से बात निकला मैंने उनको कहा कि देखिए आपका यूरोप का जो वैविध्य जो है ना उससे कहीं ज्यादा लैंग्वेज में डायवर्सिटी या तो नंबर ऑफ लैंग्वेज इंडिया इंडिया में ज्यादा है। आप लोग ये जो यूरोपियन यूनियन पे इतना जो आपको गर्व हो रहा है यूरोपियन यूनियन तो फॉर्म हुआ है। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर में जो यूरोप की जो अवस्था हुई थी दुरावस्था हुई थी उसके बाद में यह सोवियत यूनियन का राइज हुआ तो सोवियत यूनियन आप लोगों को खा ना जाए। इस भय के मारे आपको यूरोपियन यूनियन बनाना पड़ा और आपको लगता है कि इतना बड़ा डायवर्सिटी है, इतनी सारी लैंग्वेजेस है तो भारत में देखिए भारत देश का निर्माण इस तरह के किसी भय से नहीं हुआ कि कोई विदेशी शक्ति हमको खा जाएगी बोलकर के हमको इकट्ठा रहना है। भारत देश का निर्माण भीतर से ही भारतीयों की एकता की वजह से हुआ है। भारत में नंबर ऑफ लैंग्वेजेस यूरोप से भी ज्यादा है। आपका लेटिन, ये फ्रेंच, ये जर्मन, ये वो इंग्लिश, ये जितनी भी लैंग्वेज आपका है उससे भी ज्यादा लैंग्वेज भारत में है। आपका जो कल्चरल डायवर्सिटी है यूरोप में, यूरोपियन यूनियन में उससे भी ज्यादा कल्चरल डायवर्सिटी इंडिया में है। और इसके बावजूद कि इंडिया आप लोगों से गरीब है। हम लोग एक सिंगल देश के रूप में यूनाइट हो पाए हैं। जबकि आपका यूरोपियन यूनियन जो है वह भले ही चाहे आज यूनियन बना हो। कल यह यूनियन कब टूट जाएगा उसका कोई भरोसा नहीं। तो देखिए कि यह हुआ भी तो ऐसा आखिर में यह ब्रिटेन चला गया और यह अभी जो लोग हैं उन लोगों में भी मतभेद है कि यह रशिया के साथ में कैसे डीएल किया जाए वगैरह-वगैरह। तो देखिए कि यह जो स्वामी जी को फर्स्ट एंड यह सब समझने की आवश्यकता थी। श्री ठाकुर के पास से उन्होंने आध्यात्मिक जो सबस्ट्रेटम है वह तो ग्रहण कर लिया। उसको तो आत्मसात कर लिया। किंतु यह जो सिविलाइजेशन रूपी जो सुपर स्ट्रक्चर इसके ऊपर में खड़ा हुआ है, वह क्या है? किस तरह से यह फंक्शन करता है? क्या इसके ड्रॉबैक्स है? क्या इसका भविष्य होना चाहिए? आज की जो परिस्थिति है और भविष्य में आने वाले भारत की क्या एक विजन होना चाहिए? यह सब कुछ स्वामी जी को भारत भ्रमण के दरमियान समझ में आया। तो यह सेकंड मेजर फेज स्वामी जी के जीवन का समाप्त हुआ। और इसके बाद में थर्ड मेजर

phase 3 : अमेरिका में स्वामी विवेकानन्द

स्टेप या तो थर्ड मेजर फेज स्वामी जी अमेरिका गए। वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में प्रवचन दिया और फिर उन्होंने सिर्फ अमेरिका ही नहीं यूरोप का भी भ्रमण किया और वेस्टर्न सिविलाइजेशन के ये जो प्लस और माइनस है दोनों उनको समझ में आए। वेस्टर्न सिविलाइजेशन का सबसे बड़ा प्लस क्या है? कि एक तो क्रिश्चियनिटी एक स्ट्रांग रिलीजन के रूप में निकला। प्रकट हुआ जब ये हेलेनिक सिविलाइजेशन का जब डिसइीग्रेशन हो रहा था हेलेनिक सिविलाइजेशन अर्थात कि ग्रीक और बाद में रोम तो ये ग्रीक ग्रीक और रोमन या तो फिर कहेंगे हेलेनिक सिविलाइजेशन उसका जब धीरे-धीरे करके सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा था उस समय यह क्रिश्चियनिटी प्रकट हुआ क्रिश्चियनिटी ने पूरे यूरोप को एकत्रित किया और यही यूरोपियन जब नए-नए देश को जब जाने लगे जैसे कि नॉर्थ अमेरिका नॉर्थ अमेरिका में भी खास करके यूनाइटेड स्टेट तो वहां पे उन्होंने बड़ी ही स्ट्रांग सिविलाइजेशन की स्थापना की तो ये क्यों हो पाई क्योंकि उस समय क्रिश्चियनिटी के भीतर में प्राण था ये ये जो आध्यात्मिक शक्ति क्रिश्चियनिटी के भीतर में जागृत थी। इसीलिए वे लोग यह सब कर पाए। देखिए अमेरिका में रिलीजन बड़ा स्ट्रांग है। उस समय भी था और अभी भी है। यूरोपियन कंट्रीज में फिर भी नास्तिकवाद धीरे-धीरे करके काफी प्रवेश कर चुका है। किंतु अमेरिका में ऐसा नहीं है। अमेरिका में यह क्रिश्चियन फेथ यह अभी भी बड़ा स्ट्रांग है। अमेरिकन लोग बाय नेचर थोड़े से तो रिलीजियस ज्यादा है ही है। तो यह स्वामी जी ने देखा कि इन लोगों का जो सबसे बड़ा प्लस क्या है? उस समय के क्रिश्चियन फेथ का स्ट्रेंथ और दूसरा कि इस फेथ के ऊपर में जो सिविलाइजेशनल सुपरस्ट्रक्चर उन्होंने खड़ा किया है वह और इस

अमेरिका को बेहतर क्या बनाता है और भारत को क्या सीखने की जरूरत है

सिविलाइजेशनल सुपरस्ट्रक्चर का सबसे प्रोमिनेंट कैरेक्टरिस्टिक क्या है? तो वो है आत्मश्रद्धा। स्वामी जी कहते हैं कि यह आयरलैंड से एक एक आदमी वहां पर आता है। यह ओल्ड वर्ल्ड अर्थात कि यूरोप तो उस समय ओल्ड वर्ल्ड हो गया था। पुराना विश्व हो गया था। पुराना जगत हो गया था। तो वहां पे तो यह लैंड लॉर्ड वगैरह जमींदारी प्रथा जैसे भारत में ये सब जमींदारी प्रथा ये ब्रिटिश लोगों ने घुसाई थी तो वहां पे यह सब ओरिजिन ये सब जमींदारी प्रथा का वहां पे ही हुआ था यूरोप में तो जमींदार अपनी ये जो उसके अंडर में जो लोग काम करते हैं सर्फ कहते हैं तो उन लोगों पे अत्याचार शोषण करेगा और कैसे भी करके उनको कभी भी जीवन में आगे नहीं आने देगा तो वहां पर मार खा करके निराश हो के जिसकी कमर झुक गई है जिसकी आंखों में से तेज आंखों का तेज निस्तेज हो गया है। ऐसा एक आदमी आयरलैंड से एक आएगा अमेरिका आकर के यह जो फ्रीडम है जो हवा में वह जब ग्रहण करेगा तो उसकी कमर सीधी हो जाएगी। आंखों में तेज आ जाएगा। आत्मश्रद्धा के साथ में आत्मविश्वास के साथ में बात करना शुरू करेगा। ये आरिश इमीग्रेंट्स जो है अमेरिका में उन लोगों का अमेरिकन नेशन के कंट्रीब्यूशन बहुत ज्यादा है। बहुत सारे लोग हैं इस तरह से प्रोमिनेंट लाइफ में जो पब्लिक लाइफ में ऐसे काफी प्रोमिनेंट आरिश अमेरिकनंस है। तो स्वामी जी उसका उदाहरण देकर कहते हैं कि देखिए यहां की हवा में वो पावर है, एक तेज है, एक आत्मश्रद्धा है। स्वामी जी को स्वयं यह सभी भारतवासियों ने उनको कहा। हालांकि ऐसा नहीं है कि स्वामी जी को भारत में एप्रिशिएट नहीं किया गया था। यह जो नॉर्थ इंडिया या तो बंगाल जो है वहां पर भयानक एक कहेंगे एक तरह का मोरल डिग्रेडेशन प्रवेश कर गया था। बोलकर के स्वामी जी को वहां पर ज्यादा एप्रिशिएट नहीं किया गया। किंतु कंपैरेटिवली जो यह कम अफेक्ट हुए हैं यह मोरल डिग्रेडेशंस है। राजपूताना है, गुजरात है, महाराष्ट्र है, साउथ इंडिया है। वहां पे जैसे स्वामी जी ने प्रवेश किया वैसे ही ये राजा महाराजा दीवान वो वहां के ये जो बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोग सभी लोगों ने स्वामी जी को जैसे कि अपने सर पर बिठा लिया। तो भारत में वो थोड़ा बहुत जो एक मोरल फ्रीडम कहे कि ये मोरल स्ट्रेंथ कहे तो यह वेस्टर्न और सदर्न इंडिया में थी किंतु इट वाज नॉट इनफ। यहीं पर वेस्टर्न इंडिया में ही यही दीवान यही राजा यही लोग जो कि स्वामी जी को इतनी सराहना करते थे उन लोगों ने स्वामी जी को कहा कि स्वामी जी आप अमेरिका जाइए तभी आपका रियल एप्रिशिएशन होगा। क्योंकि यह भले ही चाहे यह रजपूत राजा हो, प्राण जाए पर वचन न जाए, रघुकुल नीति सदा चली आई। यह भले ही चाहे यह लोगों के खून में यह बात हो किंतु अभी तो यह प्रजा गुलाम हो गई है ना। एक ब्रिटिश रेजिडेंस वहां रेजिडेंट वहां पर रहता है। वह जो कहेगा ऐसा आपको करना है। ये कश्मीर के राजा की बात स्वामी जी कश्मीर गए। कश्मीर के राजा ने स्वामी जी को कहा आपको यदि मठ चलाना है तो मैं आपको जमीन दूंगा। तो मठ के लिए जमीन भी दी। स्वामी जी ने मठ की जमीन पर टेंट लगा के वहां पर रहे भी सही। वह फोटोग्राफ भी है वहां पे। ये स्वामी जी है। फिर यह मिज ओलीबुल है। जोसेफाइन मैक्लाउड है, निवेदिता है। वे लोग वहां पे रह रहे थे। फोटो भी है वहां का। किंतु फिर वहां का जो ब्रिटिश रेसिडेंट था उसको यह बात अच्छी नहीं लगी कि एक हिंदू मठ चालू करने के लिए प्रारंभ करने के लिए राजा ने जमीन दी है। तो जैसे ही ब्रिटिश का रेसिडेंट का हुक्म हुआ राजा ने जमीन वापस ले ली। तो स्वामी जी डिसपॉइंटंटेड हो गए थे और समझ भी गए थे कि भारत की परिस्थिति यही है। राजा लोग भले ही चाहे कितना एप्रिशिएट करें वे लोग हे गुलाम एट द एंड ऑफ द डे। यह सब गुलाम है और ज्यादा कुछ कर नहीं पाएंगे। तो यही लोगों ने कहा स्वामी जी को कि अमेरिका जाइए वहां पर आपको ठीक-ठीक एप्रिसिएशन मिलेगा और हुआ भी सही जैसे ही स्वामी जी वो वहां पे वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में बोलने के लिए खड़े हुए वैसे ही पूरे जो वहां का जो ऑडियंस है स्वामी जी को किस तरह से उन्होंने अपना लिया स्वामी जी को किस तरह से उन्होंने एडमायर किया यह तो सब जग जाहिर बातें हैं। स्वामी जी की यह जो देखिए कि हमारी एक्सपेक्टेशन ना 100% कहीं पे भी फुलफिल नहीं होगी। भारत में जो स्वामी जी की एक्सपेक्टेशन साउथ के जो कुछ राजाओं के प्रति थी देखा कि वे लोग प्रॉमिस करके फिर उसको डिलीवर नहीं कर पाते हैं। तो एक बार स्वामी जी ने कहा भी सही कि राजपूताना के राजा ही सही राजा है। यह साउथ इंडिया के राजा में कोई दम नहीं। इस तरह का एक स्वामी जी का स्टेटमेंट भी है। क्यों? क्योंकि यह लोग प्रॉमिस करने के बाद में उसको डिलीवर नहीं करते हैं। तो जो एक डिसपॉइंटमेंट का सामना स्वामी जी को भारत में करना पड़ा था। तो वैसा ही उनको अमेरिका में भी कुछ-कुछ डिसपॉइंटमेंट हुई थी। काफी उनके एडमायर्स थे। किंतु क्या है कि एक नोवेल्टी की तरह स्वामी जी को देखते थे। और अमेरिका है ना कंट्री इज अ नेशन ऑफ नोबेल्टी या तो नेशन ऑफ फेड। अभी एक नया फेड आया। एक नई फैशन चालू हुई। एक नया कुछ वायरल हो गया तो सब लोग उसको अपना लेंगे और कुछ ही समय के बाद में कुछ नई चीज वायरल होगी तो सब लोग उसको डंप करके दूसरी ओर चले जाएंगे। तो यह वायरल पब्लिसिटी का वो प्लस माइनस दोनों है। कंपैरेटिवली इंस्टेंटली स्वामी जी फेमस हो गए और कुछ ही समय के बाद में उनको यह भी समझ में आया कि ये फेम और पॉपुलैरिटी है। इट इज नॉट गोइंग टू ट्रांसलेट इन अ हेल्प फॉर इंडिया जिसके लिए वो एक्चुअली आए थे कि भारत के लिए सहाय चाहिए बोल के अमेरिका वेल्थी कंट्री है। द वेल्थिएस्ट एंड द मोस्ट इंडस्ट्रियल कंट्री इन द वर्ल्ड। वहां से वह भारत के लिए सहाय लेके जाएंगे। और इन टर्न इन लोगों को वेदांत का संदेश सुनाएंगे। किंतु यह एक्सपेक्टेशन इतना इजीली फुलफिल होने वाला नहीं है। अमेरिकन लोग यदि किसी को सर आंखों पर बिठा देते हैं क्विकली तो इतना ही क्विकली उनको भूल भी जाते हैं। तो ये ये जो फेम के जो यह कहते हैं ना कि ये वेगरीज ऑफ फेम ये आज है वो कल नहीं है आपकी पॉपुलैरिटी ये सबका अनुभव स्वामी जी को हो चुका था। किंतु खैर जो भी है वह कुछ-कुछ स्वामी जी के बड़े ही क्लोज डिसाइपल वहां पे हुए थे जो हमको सबको पता है इनकी कहानियां तो एटलीस्ट स्वामी जी का जो एक और फिर वहां पर जाकर स्वामी जी का खुद का एक दृष्टिकोण चेंज हो गया पॉइंट ऑफ व्यू चेंज हो गया स्वामी जी ने देखा कि जिस तरह से भारत में आध्यात्मिकता की अग माने एक्सेसिव आध्यात्मिकता है कंपेयर टू ये मटेरियल वेल बीइंग अमेरिका में बाय दैट टाइम स्वामी जी गए थे क्रिश्चियनिटी का यह जो ज्वार एक आया था एक पूर की तरह वेव्स आफ्टर वेव्स ऑफ क्रिश्चियन फेथ जिसने कि अमेरिका का निर्माण किया बाय द टाइम स्वामी जी वहां पर गए थे उसमें अभी ओठ आना शुरू हो गई थी यह क्रिश्चियनिटी का जो प्रभाव है रिसीड होना शुरू हो गया था अमेरिका वाज रेडी एट दैट टाइम फॉर ए न्यू मैसेज न्यू स्पिरिचुअल आइडियाज तो जैसे ही स्वामी जी ने वेदांत का बारे में वेदांत सिखाना शुरू किया। वैसे ही बहुत सारे लोगों ने स्वामी जी के वेदांत को अपनाना शुरू किया। अभी यह वेदांत को अपनाना इट डजंट एक्चुअली ट्रांसलेट इनू हेल्प फॉर इंडिया। बट एटलीस्ट स्वामी जी का क्या है ना स्वामी जी तो फिर तो यह महापुरुष है ना इन लोगों के लिए भारत क्या अमेरिका क्या ये लोग तो पूरी ह्यूमैनिटी को पूरी पृथ्वी को रिप्रेजेंट करते हैं ये लोग सिर्फ कोई एक देश को थोड़ी ना रिप्रेजेंट करते हैं जहांजहां पे भी उनको यह वांट दिखाई दी जहांजहां पे भी उनको अंधेरा दिखाई दिया वहां वहां पे उन्होंने प्रकाश डाला है तो यहां पे भी स्वामी जी ने बिना किसी सोचे बिना किसी चिंता किए उनकी यह जो आध्यात्मिक एक वेल्थ थी। चारों ओर लुटाना शुरू किया। तो बहुत सारे अमेरिकनंस उससे प्रभावित हुए। वेदांतिक आइडियाज को ग्रहण किया। और यह फिर कुछ-कुछ लोग थे ऐसे जो कि स्वामी जी के काफी अच्छे वो डिसाइपल थे। एडमायरर्स थे, फ्रेंड्स थे। खास करके मिसेज ओलीबुल यह जो फ्रांसिस लेगेट उन्होंने फिर आखिर में यह जो भारत में कार्य प्रारंभ करने के लिए फाइनेंशियल सहाय देना शुरू किया। तो, यह जो सेकंड फेस

देश के उत्थान के लिए चाहिए: आध्यात्मिकता और आत्मश्रद्धा : अद्वैत वेदान्त

था स्वामी जी के जीवन का अह माय प्लान ऑफ कैंपेन प्रवचन प्रारंभ होने से पहले थर्ड फेज प्रथम ठाकुर के साथ में। दूसरा यह प्रवृजिया, तीसरा यह वेस्टर्न मिशन। तो, यह थर्ड फेज में स्वामी जी ने देखा और यह स्वामी जी कंपेयर कर पाए थे अपने जीवन के तीनों फेजेस को। एक और है बेड रॉक स्पिरिचुअलिटी फाउंडेशनल स्पिरिचुअलिटी जो कि उन्होंने ठाकुर के पास में सीखी है। कोई भी सिविलाइजेशन है वह चाहे ईस्टर्न हो ना वेस्टर्न हो स्वामी जी ने जापान की भी तो मुलाकात ली थी योकोहामा शहर की तो स्वामी जी और यह भी एक आईडिया स्वामी जी के माइंड में था और फिर स्वामी जी तो ही वास फॉर्चूनेट इन दैट सेंस कि बॉम्बे से प्रारंभ हुई तो उनकी ट्रिप तो यह श्रीलंका है सिंगापुर है फिर यह मकाऊ है फिर यह हांगकांग है फिर यह योकोहामा है और फिर कनाडा है वहां से सब जगह पे कनाडा का वैंकवर सब जगह से होकर के स्वामी जी आखिर में शिकागो पहुंचे थे। तो काफी एक ओवरऑल आईडिया उनको हो गया था बाय दैट टाइम उस समय के सिविलाइजेशन का। तो स्वामी जी ये पूरा जो स्पेक्ट्रम कंपेयर करते हैं अपने माइंड में। एक बात उनके माइंड में स्पष्ट हो जाती है। दो चीज चाहिए। यदि सिविलाइजेशन को आगे बढ़ना है तो यदि किसी भी देश को या किसी भी प्रजा को प्रोस्पेरस होना है तो एक सबसे फंडामेंटल चीज है बेडरूक स्पिरिचुअलिटी यदि स्पिरिचुअलिटी नहीं है तो इस तरह के देश मोमेंटरीली उनका राइज होगा किंतु फिर यह जो यह होता है ना ये जो फायर फ्लाई ये फायर फ्लाई कैसे वो क्षण में जबुकते हैं क्षण में वो एक प्रकाश का एक फ्लैश होता है और फ्लैश के साथ में ही वह उसका फ्लैश बंद अंधेरे में परिणत हो जाता है। तो यह फ्लैशेस होंगे इस सिविल उनके देश के कि सडन एक ग्लोरी उनको मिल गई और सडन उनका यह ये भी हो गया खात्मा भी हो गया। मोंगोल एंपायर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मोंगोल प्रजा को देखिए वहां पे शमानिज्म जो एक रिलीजन था बेडर्रोक रिलीजन उसका फेथ इतना था चंगेज खान में कि वो उस फेथ के सहारे उसने ये पूरे सेंट्रल एशिया है, ईस्टर्न यूरोप है, यह साउथ एशिया है, यह ईस्ट एशिया है। बहुत सारे जगहों पे उसने कब्जा तो कर लिया। किंतु यह शमानिज्म की स्ट्रेंथ इतनी नहीं है। कंपेयर टू यह जो वर्ल्ड रिलीजन है क्रिश्चियनिटी, इस्लाम, हिंदूइज़्म और बुद्धिज्म इतनी स्ट्रेंथ शमानिज्म में नहीं थी। तो फिर यह जो एंपायर था चंगेज खान का मोंगोल एंपायर वो लाइक ए फ्लैश वो खड़ा भी हुआ और लाइक ए फ्लैश वो अदृश्य भी हो गया। उसका डिसइीग्रेशन भी हो गया। ये इतिहास के पन्नों में से संपूर्ण रूप से गायब हो गया। यह जितने जितने मोंगोल चारों ओर बिखरे पड़े थे जो ईस्ट एशिया ईस्ट एशिया में थे उन्होंने बुद्धिज्म अपना लिया सेंट्रल एशिया ईस्ट एशिया वालों ने और फिर जो यह वेस्ट की ओर गए थे अरेबिया की ओर ये वेस्टर्न एशिया की ओर उन लोगों ने फिर यह इस्लाम अपना लिया शमानिज्म का उतना स्ट्रेंथ नहीं था कि एक इंडिपेंडेंट एंपायर को ज्यादा समय चला करके रखे तो कोई भी सिविलाइजेशन को आगे आगे बढ़ना है तो यह तो एक चाहिए ही चाहिए बेडरॉक स्पिरिचुअलिटी और दूसरा चाहिए प्रचंड आत्मश्रद्धा। यह आत्मश्रद्धा जब तक हमारे में नहीं होगी तब तक आप देखेंगे कि हम लोग गुलाम ही बने रहेंगे। सब समय यह सहमे सहमे मायूस होकर के सर झुका करके एक हीन भावना से पीड़ित मैं क्या कर सकता हूं? आई एम नोबडी। मैं कुछ भी नहीं हूं। मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। मैं दीन हीन साधन हीन भजन हीन भगवान मेरे पर कृपा करो। अभी यह जो बात आध्यात्मिक जीवन में जितनी अच्छी लगती है ठाकुर कहते हैं तुम जंत्रो तुम जंत्री आमी जंत्रो जमन चलाओ तेमनी चल जमन बुलाओ तेम नहीं बोलो तो जमन चलाओ तेमनी चोली जमन बुलाओ तेम नहीं बोली अर्थात कि तुम यंत्री हो मैं यंत्र हूं मैं गाड़ी हूं तुम इंजीनियर हो तुम जैसे चलाओगी वैसे मैं चलूंगा जैसे बुलाओगी वैसे मैं बोलूंगा तो वो आध्यात्मिक क्षेत्र में ठीक है जब नेशनल लेवल पर सिविलाइजेशन ेशनल लेवल पर यह दीनहीन भाव को आप ट्रांसलेट करेंगे तो सामने यह गुलामी के अलावा हमको और कुछ प्राप्त नहीं होगा। तो यह जो एक डीपर अंडरस्टैंडिंग है भारत में ये जो बहुत बार जो कंफ्यूजन होता है हम लोग देश को साधु बनाना चाहते हैं। देश कभी साधु नहीं बनता। देश का अपना कोई भी सिविलाइजेशन है। हां, उसके भीतर में एथिक्स और मोरालिटी होनी चाहिए। बिना एथिक्स और मोरालिटी के कोई भी सिविलाइजेशन लंबी टिकती नहीं है। वह जो रावण का राज्य हो ना कि हिटलर का राज्य हो ना कि यह स्टालिन का राजत्व हो ना कि यह मुसोलिनी हो जितने भी ये सब राक्षस प्रकट हुए हैं उन्होंने अत्याचार ऐसे किए कि वो बाहर से भी डिफिट का सामना करना पड़ा ऐट द एंड ऑफ द डे। और भीतर में भी इतने रेबेलियन स्टार्ट हो गए। तो चाइना में देखिए आधा उनका जो ये आर्म्ड फोर्सेस है चाइना की वो तो आधी आधा से भी ज्यादा वो भीतर में ही कोई रेबेलियन स्टार्ट ना हो इसके लिए लगाई गई है आधे से कम उनकी ये जो मिलिट्री है वो बॉर्डर पर खड़ी है तो उनके इंटरनल प्रॉब्लम्स इतने सारे हैं जहां पे भीतर में एथिक्स और मोरालिटी रहती है रूल ऑफ लॉ रहता है वो क्या है आखिर में एट द एंड ऑफ द डे सिविलाइजेशन को स्ट्रांग बनाता है तो यह एक पूरा एक आईडिया स्वामी जी के माइंड में बैठ गया है। आत्मश्रद्धा एक होनी चाहिए और दूसरी होनी चाहिए आध्यात्मिकता। और यह आत्मश्रद्धा और आध्यात्मिकता को ये जो कनेक्ट करता है वो पॉइंट कहां पे है? यदि हम आध्यात्मिकता के रूप में द्वैत वेदांत को रखते हैं। भक्ति साधना या तो फिर अपने अहम को अपनी अस्मिता को बलि प्रदत्त करने की साधना अपना जो अहम है उसको त्याग करने की सैक्रिफाइस करने की जो साधनाएं हैं वो साधनाओं का प्रॉब्लम क्या है? गलत नहीं है साधना। किंतु उसको ना हम सबकॉन्शियसली नेशनल लाइफ में रिफ्लेक्ट करना चाहते हैं। दो लोगों ने ऐसा प्रयास किया कि धर्म को नेशनल लाइफ में लाया जाए। धर्म अर्थात कि देखिए भगवान राम और भगवान कृष्ण ने भी धर्म को अपने शासन में प्रकट किया है। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि भगवान राम का राज्य या तो भगवान कृष्ण का शासन अधर्म के ऊपर में आधारित था। किंतु वो धर्म क्या था कि धर्म की रियल अंडरस्टैंडिंग थी। यहां पे स्पिरिचुअलिटी या धर्म को मिसअंडरस्टुड करके ये जो पब्लिक लाइफ में लाना ये प्रयास दो लोगों ने किया है। एक तो भगवान बुद्ध दूसरे हैं महात्मा गांधी। भगवान बुद्ध के प्रयास की वजह से आखिर में 1000 साल की गुलामी आ गई और गांधी जी के प्रयास की वजह से भारत के पार्टीशन हो गए। तो यह जो धर्म को बिना समझे आप पब्लिक लाइफ में ले आएंगे तो आपका धर्म का भी हानि होगा। पब्लिक लाइफ में भी हानि होगी। यह बुद्धिज्म भारत में से इसीलिए चला गया। आज महात्मा गांधी का इतना दुरनाम हो गया है। इन सस्पाइट कि गांधी जी ने इतना अच्छा सब कुछ कुछ कार्य किए हैं। इन स्पाइट ऑफ दैट गांधी जी का जो दुरनाम आज चल रहा है। धर्म को बिना समझे पब्लिक लाइफ में यह लोग लाए हैं। जबकि ये भगवान राम और भगवान कृष्ण को देखिए। धर्म को ठीक-ठीक समझे हैं और उसके बाद में उसको पब्लिक लाइफ में ले आए हैं। तो यह जो प्रॉपर अंडरस्टैंडिंग है वो प्रॉपर अंडरस्टैंडिंग स्वामी जी ने डेवलप की और इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि अद्वैत को आप पब्लिक लाइफ में ला सकते हैं। द्वैत को नहीं। यह एकदम क्लेरिटी होनी चाहिए। भगवान के सामने अपने ईगो को शरणागत करना है। भगवान के सामने अपनी अस्मिता का सैक्रिफाइस करना है। भगवान के सामने दीनहीन होना है। तो दीनहीन भगवान के सामने होना है ना। आपके दुश्मन के सामने थोड़ी ना होना है। ये क्लियर अंडरस्टैंडिंग होनी चाहिए। यहां पर तो दुश्मन के सामने वही आत्मश्रद्धा दिखानी है जो कि अद्वैत वेदांत हमको कहता है। जो नचिकेता की आत्मश्रद्धा थी जब यम लोक में जाकर के यमराज के साथ में जितना कॉन्फिडेंस से बात करता था वो वो कॉन्फिडेंस वो आत्मश्रद्धा आपको दुश्मनों के सामने प्रकट करनी है। तो यह स्वामी जी का बड़ा क्लियर अंडरस्टैंडिंग था और इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि भारत का यदि उत्थान करना है तो हमको अद्वैत वेदांत और खास करके आत्मन का महात्म्य है उसको प्रस्फुटित करना पड़ेगा। द्वैत वेदांत या तो शरणागति की साधना इंडिविजुअल लेवल पर ही होती है। उसको कभी भी नेशनल लाइफ में आप रिफ्लेक्ट नहीं कर सकते। नेशनल लाइफ में यदि कुछ रिफ्लेक्ट करना चाहते ही है ऐसा कोई धर्म तो वह अद्वैत वेदांत ही है। इस अर्थ में स्वामी जी ने अद्वैत वेदांत को भारत का एक सेंट्रल पॉइंट बने इसके लिए स्वामी जी ने कहा कि माय प्लान ऑफ कैंपेन उसका अल्टीमेट कंक्लूजन क्या है? अद्वैत वेदांत को आप अपनाइए। साधना जब करते हैं तो इंडिविजुअल साधना भी अद्वैत के बेस पर कीजिए और नेशनल लाइफ में यदि धर्म को प्रवेश करवाना है तो वह भी अद्वैत का करवाइए। द्वैत साधना गलत नहीं है किंतु वह इंडिविजुअल लेवल तक ही रहनी चाहिए। नेशनल पॉलिसी के रूप में आप यदि कोई धर्म को अपनाना चाहते हैं तो वह अद्वैत ही हो सकता है और कोई नहीं। और जो भी धर्म दीन हीन शरणागति वाला धर्म आप पब्लिक लाइफ में ले आएंगे तो यह भगवान बुद्ध का और महात्मा गांधी का जो एक्सपेरिमेंट था किस तरह से फेल हुआ वह हमको समझ में आता है। हालांकि भगवान बुद्ध कोई द्वैतवादी नहीं थे। दीनहीन होने की उन्होंने सलाह नहीं दी थी। किंतु यह अहिंसा यह अधवलीनेस ये इस जगत के साथ में कोई संपर्क नहीं है। सन्यास ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। यह जो अधरवलीनेस जो था बुद्धिज्म का वह हमारे लिए बड़ा ही घातक साबित हुआ। अद्वैत वेदांत ऐसा कहता ही नहीं है कि यह सन्यास ही सर्वश्रेष्ठ है या तो फिर यह आत्म साक्षात्कार या तो निर्वाण ही सर्वश्रेष्ठ है। अद्वैत तो कहता है कि सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन मैं ब्रह्म दर्शन अपने हृदय में क्यों करूं? सिर्फ यह जो बुद्धिज्म का जो मेजर लिमिटेशन आ जाता है। ये मैं सिर्फ क्यों अपने हृदय में मैं आत्म साक्षात्कार करने को या तो निर्वाण प्राप्त करने को जाऊंगा। यह निर्वाण जो है यह विश्व में ये जो प्रत्येक पेड़ के प्रत्येक पत्ते में प्रत्येक चींटी में प्रत्येक मनुष्य के भीतर में वही निर्वाण का अनुभव करना है। किंतु उनकी फिलॉसोफी की लिमिटेशन जो है वो उनको वहां पर जाने से रोकती है। जबकि ये अद्वैत वेदांत की लार्जनेस जो है एक वास्टनेस जो है वो हमको इजीली उस स्टेप तक लेकर जाती है। बहुत बार हम लोग सोचते हैं। बहुत बार कोई कहता भी है कि भगवान बुद्ध का जो निर्वाण था उनका ये जो खास बाकी का जो बाद का जो डेवलपमेंट है शून्यवाद नागार्जुन वगैरह उनको छोड़ दीजिए जैन बुद्धिज्म वगैरह छोड़ दीजिए किंतु ओरिजिनल जो बुद्ध का जो मैसेज था इट कम्स वेरी नियर टू अद्वैत वेदांत ऐसा कहने वाले लोगों की कमी नहीं है। किंतु इन लोगों को प्रॉब्लम कहां पे होता है कि यह जिस तरह से अद्वैत वेदांत निर्वाण के परे का स्टेज हमको दिखाता है। जैसे ठाकुर कहते हैं कि एक बार निर्विकल्प समाधि के बाद जाने के बाद में नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि तक जो पहुंचे हैं तो वैसे ही अब भगवान बुद्ध ने भी बुद्धिज्म जो है वह भी नेति नेति या तो त्याग करके करके निर्वाण तक पहुंचता है। किंतु उनकी दौड़ फिर वहीं पर समाप्त हो जाती है। यहां पर अद्वैत वेदांत में इसके बाद में भी है। ऐसे जैसे ठाकुर ने स्वामी जी को कहा, यह तुम यदि निर्विकल्प समाधि में मग्न होकर के रहना चाहते हो। मैंने तो इस तरह का सेल्फिश कार्य क्यों कर रहे हो? मैंने तो सोचा था तुम बहुत बड़े वटवृक्ष बनोगे जिसकी छांव में कितने लोग आश्रय ग्रहण करेंगे। उनको शीतलता प्राप्त होगी। तब स्वामी जी भी आश्चर्यचकित हो गए कि ये ठाकुर क्या कह रहे हैं। तो अद्वैत वेदांत कहता है कि निर्विकल्प समाधि के बाद में भी आप इति इति करके जगत में वापस आ सकते हैं। उस समय आप विद्या का या तो फिर यह भक्ति का अहम लेकर के जगत कल्याण के कार्य के लिए व्यापृत हो सकते हैं। सो ये अद्वैत वेदांत की ये जो इवन निर्वाण के बाद की जो ये अवस्था निर्वाण के बाद का जो स्टेज है ये विज्ञान जो ठाकुर कहते हैं पहले ज्ञान और उसके बाद में विज्ञान पहले ब्रह्म ज्ञान और फिर इसके बाद में सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन अभी जो हम लीला प्रसंग पढ़ रहे हैं शरद महाराज कहते हैं कि हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति क्या है तो वह है सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन नहीं कि मुझे अपने हृदय में अपने भीतर में ब्रह्म दर्शन या तो फिर मेरा खुद का ब्रह्म साक्षात्कार किंतु सर्वभूत के भीतर में ब्रह्म दर्शन आंख बंद करके भी मैं ब्रह्मन का दर्शन करता हूं या तो फिर ब्रह्म साक्षात्कार करता हूं। ब्रह्मन का दर्शन नहीं हो सकता। दर्शन करने में यह ऑब्जेक्ट सब्जेक्ट और रिलेशनशिप आ जाता है। ब्रह्मन इज प्योर सब्जेक्ट। तो अपनी लैंग्वेज की यहां पर लिमिटेशन है। तो एनीवे ब्रह्म साक्षात्कार या तो फिर ब्राह्मी स्थिति में स्थित होना। तो मैं वह अपने भीतर में भी वो ब्राह्मण अनुभूति कर सकता हूं। और पूरे विश्व में मेरा जो सब्जेक्टिव आई है, कॉन्शियसनेस है, मैं उसको एक्सपैंड करके पूरे विश्व को इसके भीतर में समाहित कर सकता हूं। दैट इज द हाईएस्ट ऑफ अद्वैत वेदा। तो स्वामी जी कहते हैं कि यह यदि कोई एक प्लान भारत के भविष्य के लिए हो तो वह है अद्वैत और वो है आत्मन का महात्म प्रचार करना। हमको एक और एथिकल और मोरल भी होना होगा। वरना ये जितने राक्षसी प्रजाओं का जन्म हुआ है यह मोंगोल एंपायर हो ना कि ये फिर ये मुगल हो ना कि ये फिर जितने भी राक्षस लोगों का यह जन्म हुआ है देखेंगे कि कुछ ही समय में उनका एंपायर वो प्रकट भी होता है वो प्रकाश के वो बिजली की चमकारे की तरह और बिजली के चमकारे की तरह वो अदृश्य भी हो जाता है। तो फिर इस तरह से हमको अपनी सिविलाइजेशन नहीं रखनी। अपनी सिविलाइजेशन हजारों हजारों सालों तक स्टेडीली प्रोग्रेस करती रहनी चाहिए। ऐसी होनी चाहिए। तो इसीलिए हिंदू सिविलाइजेशन या तो फिर यह भारतीय सिविलाइजेशन को प्रकट यदि सर्वश्रेष्ठ होना है। फिर से यदि सर्वश्रेष्ठ होना है तो अद्वैत वेदांत के फाउंडेशन पे ही हो सकता है। एक ओर होगा एथिक्स और मोरालिटी और दूसरी ओर होगा प्रचंड आत्मश्रद्धा। इस तरह की आत्मश्रद्धा कि वह हजार लोग आकर के हमको धमकी दे दे। यह ट्रंप ट्वीट कर ले कि इंडिया का इकोनमी डेड हो गया है वगैरह-वगैरह हमारे पेट में पानी भी नहीं हिलना चाहिए। हमको यह आत्मश्रद्धा होनी चाहिए कि हां ये जितने भी मॉडर्न ये फील्ड है वो चाहे ये स्पेस एक्सप्लोरेशन हो ना कि चाहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हो ना कि चाहे ये नैनो टेक्नोलॉजी हो ना कि ये चिप मैन्युफैक्चरिंग हो ना कि ये क्वांटम कंप्यूटिंग हो ना कि यह एडवांस मटेरियल मैन्युफैक्चरिंग हो जितने भी फील्ड है हम लोग एक ना एक दिन तो टॉप पे पहुंच पहुंच के ही रहेंगे। नंबर वन यदि ना भी हो तो एटलीस्ट नंबर टू मेजर फील्ड्स में तो होंगे ही होंगे। वो जो नचिकेता कहता है ना कि बहुनामे प्रथमो बहुनामे द्वितीय बहुत माने कोईकोई फील्ड है जिसमें कि मैं प्रथम हूं। कोई कोई सब्जेक्ट्स में और कोई कोई सब्जेक्ट ऐसे भी है कि जिसमें मैं द्वितीय हूं। किंतु ऐसा एक भी सब्जेक्ट नहीं। ऐसा एक भी फील्ड नहीं कि मैं पीछे पड़ गया हूं। जिसमें कि मैं निम्न हूं। तो भारत को भी ऐसे ज्यादातर फील्ड जिसमें हम नंबर वन हो और कुछ फील्ड जिसमें नंबर टू हो किंतु ऐसा फील्ड एक भी नहीं होना चाहिए कि नंबर 10 ना नंबर 20 हो तो वो दिन आएगा ही आएगा और इसके लिए कमर कस के हम प्रयास करेंगे ही करेंगे यह विश्वास हम लोगों को होना चाहिए। यह आत्मश्रद्धा हमको होनी चाहिए। यह आत्मन के ऊपर में हमको यह विश्वास होना चाहिए। आत्मन की महिमा हमारे मन में एकदम फिट बैठनी चाहिए। तो यह जो 18th पॉइंट है

आत्मन् की महिमा से भारत का नवजागरण

स्वामी जी के यह माय प्लान ऑफ कैंपेन का इसका टाइटल मैंने दिया है हाउ टू बेटर इंडिया ग्लोरी ऑफ दी आत्मन भारत का नवनिर्माण कैसे करें आत्मन की महिमा का गान करके अभी यह टेक्स्ट पूरा स्वामी जी का है बस पॉइंट मैंने अपने बिठाए हुए हैं जिससे कि हमको पढ़ने में और एनालिसिस करने में सुविधा हो तो स्वामी जी ने जो पहला पैराग्राफ है इस पॉइंट का उसका ऑलरेडी ऑलरेडी पाठ कर लिया है। मैं सिर्फ एक बार इसको रिपीट कर देता हूं। क्या कहते हैं स्वामी जी? फोर सेंचुरीज पीपल हैव बीन टॉट थ्यरीज ऑफ डिग्रेडेशन। हजारों सालों से सैकड़ों सालों से भारतीयों को हमने ये निराशाजनक हताशाजनक थ्यरी ही सब यह उपदेश ही दिए हैं। थ्यरी सिखाई है। दे हैव बीन टोल्ड दैट दे आर नथिंग। उनको कहा गया है कि तुम लोग कुछ नहीं हो। तुम लोग दीन हो हीन हो। द मासेस हैव बीन टोल्ड ऑल ओवर द वर्ल्ड दैट दे आर नॉट ह्यूमन बीइंग्स और सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे जगत में यह जो गरीब प्रजा जो है जो लोग शोषण करते हैं जो लोग स्ट्रांग है जो लोग अपना अधिकार दूसरों की हत्या करके दूसरों का कत्ल करके दूसरों का शोषण करके वह प्राप्त कर लेते हैं ऐसे लोग हमेशा यह जो गरीब है पद दलित है उनको डराते धमकाते रहे हैं उनको यह कहते रहते हैं कि तुम लोग हीन हो तुम्हारा जन्म ही हुआ है जैसे कि गुलाम बनने के लिए। दे हैव बीन सो फ्राइटन फॉर सेंचुरीज टिल दे हैव नियरली बिकम एनिमल्स। नेवर वेयर दे अलाउड टू हियर ऑफ द आत्मन। इतने डराए धमकाए गए हैं इन गरीब लोगों को कि वे लोग पशुत्व को ही प्राप्त हो गए हैं। कभी भी उनको आत्मन की महिमा का गान सुनाया नहीं गया है। कभी भी आत्मन की ग्लोरी के बारे में उनको उपदेश नहीं दिया गया है। देखिए ये भी एक मॉडल है ये गवर्नेंस का सिविलाइजेशन का कि आप सिविलाइजेशन को आप सिविलाइजेशन को किस तरह से एनालिसिस करेंगे कंपेरेटिव एनालिसिस किस तरह से करेंगे जैसे चाइनीस सिविलाइजेशन है इंडियन सिविलाइजेशन है वेस्टर्न सिविलाइजेशन है इस्लामिक सिविलाइजेशन है किस तरह से देश है इतने सारे जापान है कोरिया है इंडोनेशिया है ये ये ताइवान है। फिर यहां पे ये साउथ अफ्रीका के ये सब कंट्रीज है। ब्राजील है, पेरू है, साउथ अफ्रीका है। वगैरह-वगैरह ये इतने सारे देश हैं यूरोप के, मिडिल ईस्ट के। आप कंपेयर कैसे करेंगे कि कौन सा देश हेल्दी है। एक तो कंपैरिजन नो डाउट उनका जीडीपी है। ओवरऑल जीडीपी भी और नेशनल जीडीपी भी और यह पर कैपिटा जीडीपी भी। वो तो एक है। दूसरा एक है कि एक जीनी कोफिशिएंट इंडेक्स आता है। ये जीनी इंडेक्स क्या है? कि आपको यह इनकलिटी बताता है। इनकलिटी क्या है? इनकलिटी है कि मान लीजिए यह एक वेल्थदी आदमी है, अमीर व्यक्ति है। उसके पास में जो टोटल संपत्ति है देश की उसकी टोटल संपत्ति का वो 50% उसके हाथ में है और बाकी का 50% बाकी लोगों के हाथ में है। 1% जो अमीर होते हैं उनके पास में देश की संपत्ति का 50% है और जो 99% गरीब है वे लोग बाकी का 50% शेयर करते हैं। तो यह देश में इनकलिटी बहुत ज्यादा है और ऐसे कोई देश होते हैं जहां पर 1% या 10% जो अमीर होते हैं उन लोगों के पास में देश की संपत्ति का 20 टू 30% है और जो बाकी के 90% है उनके पास में देश की संपत्ति का वो होगा 70% तो यहां पे शायद इनकलिटी थोड़ी कम होती है। यह जीनी कोिशिएंट इंडेक्स जो है, वह बताता है कि कौन से देश की इनकलिटी कितनी ज़्यादा है। भारत में मीडियम तरह की इनकलिटी है। कुछ-कुछ देशों में बहुत ज्यादा इनकलिटी होती है। एक समय मैंने यह सब पढ़ रहा था। अभी मुझे एग्जैक्टली फिगर भी याद नहीं, वो स्टैटिस्टिक भी याद नहीं। किंतु यह कांसेप्ट मुझे याद है कि ये जीनी इंडेक्स जो है उसके बेस पे आपको पता चलता है कि इनकलिटी कितनी है। जितनी इनकलिटी ज्यादा होगी जितना अमीर 1% 10% जो अमीर है उन लोगों को देश की संपत्ति का ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट का जितना ज्यादा परसेंटेज उनके पास में होगा उतना ही इनकलिटी ज्यादा होगी और उतना ही यह सिविलाइजेशन जो है ना वो स्टंट होकर के रह जाएगी। अब जैसे पाकिस्तान है पाकिस्तान में देखेंगे कि ये मिलिट्री है जो धनी लोग हैं वही सब चलाते हैं। भले ही चाहे डेमोक्रेसी नाम की हो किंतु वो इलेक्शन फिलेक्शन सब रिग्ड है। वो जो रूलिंग जो ये ये है कोलीिशन या तो रूलिंग ग्रुप उन लोगों के हाथ में सब कुछ है। देश की ये जो मिनरल वेल्थ है, देश की ये जो फैक्ट्रीज है, आर्मी है, गवर्नमेंट है, जुडिशियल सिस्टम है, पुलिस सिस्टम है, म्युनिसिपालिटी सिस्टम है, सब उनके कंट्रोल में है। बाकी सबको ये लोग शोषण करते हैं। भारत में वैसे तो इनकलिटी है। वैसे धनी और अमीर और पावरफुल लोगों का गठबंधन भी बड़ा स्ट्रांग है। किंतु इस हद तक नहीं कि जितना पाकिस्तान में है। तो यहां पे इनकलिटी थोड़ी सी कम है। तो

Talent pipeline: जिस देश में व्यक्ति प्रतिभा के आधार पर प्रगति कर सकता है, वही देश जीतेगा

इनकलिटी जितनी कम होगी जिस देश में उतना ही यह डेमोक्रेसी ज्यादा पावरफुल होगा। उतना ही यह जो गरीब आदमी है उसके पास में एक चांस रहेगा कि वो आगे बढ़े और उसको एक अब जैसे कि भारत में ही देखिए ना आए दिन न्यूज़ आता है कि रिक्शा चलाने वाले की लड़की है बोर्ड में उसका प्रथम नंबर आया। अभी उसका कैरियर का जितने भी दरवाजे हैं सब खुल गए। अभी जिस देश में यह भयानक इनकलिटी होती है, भयानक अत्याचार होता है, वहां पर रिक्शा वाले की लड़की रिक्शा वाले की लड़की ही रहेगी। उसमें चाहे हजार टैलेंट हो उसका कभी कोई फ्यूचर बेटर नहीं होने वाला है। जबकि अमेरिका है यहां पर सबसे ज्यादा अपॉर्चुनिटी अमेरिका में है। क्यों आज इतने सारे इंडियन है, इतने सारे बाकी देशों से लोग अमेरिका जाना चाहते हैं। क्योंकि वहां पे यदि आपके पास में टैलेंट है तो टैलेंट को आपको मैनिफेस्ट करने का, टैलेंट को नर्चर करने का अपॉर्चुनिटीज सबसे ज्यादा अमेरिका में है। तो जिस देश में यह टैलेंट पाइपलाइन ठीक से काम करता है उस देश का सबसे ज्यादा यह डेवलपमेंट होता है और जिस देश में यह टैलेंट पाइपलाइन सूख जाता है यानी कि यह जो लोअर लेवल पर जितने भी लोग हैं इकोनॉमिकली या तो फिर यह जिन लोगों को कहेंगे सोशली जो लोग बैकवर्ड है उन लोगों के यदि अपॉर्चुनिटी नहीं रहता आगे बढ़ने का तो वह देश हमेशा हमेशा के लिए पछात रहेगा तो भारत अभी मीडियम लेवल पे आता है। इतना भी हमारे पास में बुरा नहीं है देश कि टैलेंट हो तो आपके पास में कोई भी ऑप्शन नहीं टैलेंट का मैनिफेस्ट करने का। और ऑन दी अदर हैंड अमेरिका जैसा भी नहीं है कि टैलेंट है तो फटाक करके रॉकेट की तरह आपको उठा लिया। मैंने ऐसे कितने लोगों की कहानियां सुनी है। मेरे ही रिलेटिव्स इंडिया में थे। तो जैसे एक नॉर्मल मिडिल क्लास लाइफ होता है वे लोग लीड कर रहे हैं। वहां पर गए अमेरिका में और उनके लड़के भी ऐसा कोई परफॉर्मेंस नहीं है एजुकेशन सिस्टम में क्योंकि अपनी एजुकेशन सिस्टम जो है वो रटने पे मेमोराइज करने में स्पिरिट को खत्म कर देने पे ही उसका ज्यादा ये है फोकस है। जबकि अमेरिका की जो एजुकेशन सिस्टम है वह क्यूरियोसिटी के ऊपर में एक्सप्लोरेशन के ऊपर में इंक्वायरी के ऊपर में बनी है। तो ये लोगों का परफॉर्मेंस मेरे कुछ-कुछ रिलेटिव्स के लड़कों को देखा। इंडिया में वैसे मिडिल लेवल का ही परफॉर्मेंस है। 60 70% का इससे ज्यादा भी नहीं आता। इससे कम भी नहीं आता। अभी यही लड़के अमेरिका के स्कूल में भर्ती हुए तो फटाक के रॉकेट की तरह उनके ग्रेड भी ऊपर उठने लगे। उनका ये जो कॉन्फिडेंस है वह भी बढ़ने लगा। सीखने की क्षमता भी बढ़ने लगी। और कितना सुंदर परफॉर्मेंस करते हैं। एकेडमिक लाइफ में भी और बाद में भी। तो क्या है कि ये टैलेंट पाइपलाइन होना चाहिए। कोई भी देश को आगे बढ़ना है तो टैलेंट पाइपलाइन नहीं होगा तो वो देश ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा। आज चाइना की जो गांव का वो सिस्टम है वो क्या है? पूरे देश के जितने भी विद्यार्थी हैं एक ही स्टैंडर्डाइज टेस्ट देंगे। उसमें जो रैंक आएगा उस रैंक के ऊपर में उनको फिर देश की जो बेस्ट यूनिवर्सिटीज से जो फिर धीरे-धीरे करके मिडिल लेवल की यूनिवर्सिटी है उसमें उनको एडमिशन मिलेगा। बेस्ट रैंक जिसको आएगा उसको बेस्ट यूनिवर्सिटी में जो मिडिल रैंक आएगा मिडिल यूनिवर्सिटी में इस तरह से देश भर में एक ही सिस्टम मिनिमम चीटिंग और मैक्सिमम अपॉर्चुनिटी तो दैट इज वेरी गुड इंडिया में भी आईआईटीजी है किंतु अपने यहां पे फिर वो बाकी इतने सारे पॉलिटिकल मामले हैं कि चाइना की तरह अपना ये टैलेंट पाइपलाइन अभी तक नहीं बना है। सो दिस इज व्हाट समथिंग वी नीड टू अंडरस्टैंड। स्वामी जी कहते हैं कि दुनिया भर में गरीब लोगों को इस तरह से दबा करके रखा है कि उनके भीतर की जो आत्मन है उसको मैनिफेस्ट होने का कोई अपॉर्चुनिटी ही नहीं मिलता। वो अपॉर्चुनिटी जैसे अमेरिका में टैलेंट पाइपलाइन होने की वजह से जो एक अपॉर्चुनिटी मिल जाता है तो यह आत्मन का भी मैनिफेस्ट करने का पोटेंशियल जागृत हो जाता है। इसके बाद जो है अभी हम उसको कल से प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णारपणमस्तु

प्रश्न: दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां भी बौद्ध धर्म गया, बौद्ध धर्म ने उन्हें मजबूत बनाया, लेकिन बौद्ध धर्म ने अपने जन्मस्थान भारत को कमजोर बना दिया। यह कैसे संभव है?

ये जो बुद्धिज्म की जो आपने बात कही ना कि भारत में उसने यह सब गड़बड़ कर दिया वहां पे जाकर के दे सीम टू बी डूइंग ओके खास करके चाइना जापान ताइवान ये तीन को देखेंगे तो इन लोगों का कैसा है पता है? जैसे कि क्रिश्चियनिटी के बारे में स्वामी जी ने कहा था कि जीसस कहते हैं कि यह कोई एक तमाचा मारे तो दूसरा गाल अपने सामने कर दो। और कृष्ण कहते हैं कि जो तमाचा मारते हैं तो उसको इसकी पिटाई कर दो। तो अनफॉर्चूनेटली हम लोगों ने जीसस का मैसेज ले लिया है और उन लोगों ने कृष्ण का मैसेज ले लिया है। सो इवन दो नॉमिनली दे आर फॉलोइंग क्रिश्चियनिटी दे आर नॉट फॉलोइंग इट टू द लेटर। तो बुद्धिज्म का भी वैसे ही है। वहां पर लोकल ट्रेडिशन खास करके चाइना में कन्फ कन्फशियनिज्म बड़ा स्ट्रांग है। जापान में देखेंगे द ताओइज्म ये बड़ा स्ट्रांग है। सो लोकल ट्रेडिशन भी है जो कि ये बुद्धिज्म के जो आपने हम कहते हैं ना कि मेडिसिन और इसका एंटीडोट ये एंसिड और एंटीडोट उसकी तरह काम करता है। जब बुद्धिज्म अदर वर्लीनेस सिखाता है तो कन्फ्यूजनिज्म जो है वो दिस वर्ल्डलीनेस सिखाता है। वहां पे जापान में भी सेम थिंग। सो इंडिया में प्रॉब्लम क्या हुआ था ना कि हिंदूइज़्म वैसे तो अपना क्लासिकल वैदिक हिंदूइज़्म जो है उसको एंटीडोट की तरह कार्य करना चाहिए था। किंतु बुद्धिज्म का राइज ही इसलिए हुआ क्योंकि वो क्लासिकल हिंदूइज़्म या तो वैदिक हिंदूइज़्म का डिसइीग्रेशन होना प्रारंभ हो गया था। तो बुद्धिज्म ने जो एक्सपेरिमेंट किया उसका एंटीडोट भारत में उस समय नहीं था। सो दैट इज़ वन प्रॉब्लम विथ बुद्धिज्म। और जैसे आपने कहा कि नेचुरली अभी मैं भी जब न्यूज़ पेपर पढ़ता हूं तो निराशा तो बहुत होती है और होनी ही चाहिए और एस यू ऑलरेडी सेड कि वो 1500 साल का है तो अभी तो 150 ही साल हुए हैं। वन 10थ ही उसका हुआ है। लेट अस सी कि बाकी के वो नाइन 10थ में क्या होता है। तो जब जब आप देखेंगे तो निराश हुए ना आज का आप अमेरिका का हिस्ट्री पढ़ेंगे। आज का अमेरिका का हिस्ट्री पढ़ेंगे तो जब उसमें लिखा जाता है कि ये ब्रिटेन के साथ में उनको फाइट करना पड़ा वो टी पार्टी रेवोल्यूशन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस तो आज है ना उसको हम बड़े ही सिक्योर रूप से देखते हैं। क्या ये तो जीतने ही वाले थे। उसमें क्या है? कौन सी बड़ी बात है? आज जब महाभारत का युद्ध पढ़ते हैं तो भगवान कृष्ण पांडवों के साथ में तो जीतने ही वाले थे। तो व्हाट इज देयर? किंतु जो लोग उस युद्ध में रह रहे होंगे उस समय वो अनसर्टेनिटी कितना बड़ा होगा। देयर इज नो श्योरिटी इधर से उधर एक चीज भी हो गई तो गया पूरा हिस्ट्री बदल गया। सो वि हैंडसाइट वी आर वेरी श्योर। तो आपने ठीक ही कहा कि वि हैंडसाइट ये जो पहले 150 साल 200 साल हमको लगेंगे अरे क्या है? ठाकुर मां स्वामी जी आए हैं तो जितना तो है ही है।

प्रश्न: आज हम अमेरिका में भौतिकवाद को इतना प्रबल देखते हैं। आजकल हम अमेरिका में स्वामीजी का प्रभाव नहीं देखते। क्यों? क्या स्वामीजी अमेरिका में वेदांत का प्रसार करने में असफल रहे?

मैं इससे रिवर्स आर्गुममेंट करूंगा। मैं कहूंगा कि आपकी बात जहां तक एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन का प्रश्न है वह मोर और लेस आप ठीक ही है। इस अर्थ में कि बहुत ज्यादा लोग दीक्षा लेकर के अपने स्टूडेंट्स नहीं हो रहे हैं। एक समय था कि 60 70ज में यह हिप्पी मूवमेंट काउंटर कल्चर वो जब चल रहा था अमेरिकन सोसाइटी में तो काफी लोग वेदांत से प्रभावित थे। यह प्रभवानंद जी है, अशोकानंद जी है। ये जो पायोनियरिंग साधु थे उनका काफी एक इन्फ्लुएंस था अमेरिकन वेस्ट कोस्ट में खास करके। सो वो एक युग किंतु बीत गया। यह काउंटर कल्चर के साथ में ही वो युग भी बीत गया। उस समय जो आज के जो अमेरिकन साधु ज्यादातर उसी टाइम ज्वाइन किए। ये अपने ये आत्मूपानंद जी उसके सबसे बड़े उदाहरण है। उसके बाद में अमेरिकन साधुओं का जॉइनिंग मिनिमम हो गया। अपना इन्फ्लुएंस भी बिल्कुल जैसे कि यह सबकॉन्शियस लेवल पर चला गया है। सबटेरेनियन लेवल पर विद दैट आई विल एग्री। अ किंतु मैं एक लार्जर आर्गुममेंट करूंगा। देखिए कि स्पिरिचुअलिटी का जो स्वामी जी के आइडियाज ऑफ वेदांत है वो बहुत ही डीपली फैले हैं। वेस्ट कोस्ट में खास करके यह जो कैलिफोर्निया है उस राज्य में और इसका मैनिफेस्टेशन क्या है? पता है क्रिएटिविटी। आज अमेरिका जो है वो इट इज बेस्ड ऑन क्रिएटिविटी ओनली प्योर क्रिएटिविटी नॉट बेस्ड ऑन मिलिट्री पावर। देखिए कि जब यह जर्मनी के साथ में अमेरिका जापान और जर्मनी के साथ में फाइट कर रहा था या तो फिर इवन सोवियत यूनियन के साथ में कोल्ड वॉर चल रहा था। सो देयर मिलिट्री वेर मच बेटर देन अमेरिकन मिलिट्री। किंतु फिर भी अमेरिका हैज़ वॉन अगेन एंड अगेन। क्यों? क्योंकि एव्री टाइम अमेरिका हैज़ बीन एबल टू रीइन्वेंट इटसेल्फ। यह लेटेस्ट कुछ उदाहरण देख लेते हैं कि यह 1970 में यह ओपेक जो वो उन लोगों का एक कार्टेल बना और ऑयल प्राइस बढ़ा दिए तो अमेरिका ट्रांसेंडेड दैट ऑयल शॉक बाय डेवलपिंग इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री उसके बाद में जापान ने जब इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री पे इतना कंट्रोल कर लिया कार है इलेक्ट्रॉनिक्स है जापान में बेस्ट बनता है तब अमेरिका ने जो है सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री स्टार्ट किया सो प्योर इनोवेशन प्योर माने एक ट्रांसेंडिंग द लिमिटेशंस ऑफ करंट रियलिटीज। इसके बाद में जापान हार गया तो चाइना प्रारंभ हुआ। अभी चाइना वैसे मैन्युफैक्चरिंग, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स सब में अमेरिका के साथ कंपटीशन कर रहा है। तो अमेरिका ने एआई डेवलप किया। व्हिच इज़ अगेन ट्रांसेंडिंग द लिमिटेशन। अमेरिका हैज़ ट्रांसेंडेड लिमिटेशंस अगेन एंड अगेन। चाहे वो मे इट बी मैन्युफैक्चरिंग हो मे इट बी इलेक्ट्रॉनिक्स हो मे इट बी सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री मे इट बी टुडेेस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सो वेयर डस दिस क्रिएटिविटी कम फ्रॉम और किसी देश में यह क्रिएटिविटी नहीं है अमेरिका में इसके दो सीक्रेट है एक तो ये कि उनका जो ये पाइपलाइन है टैलेंट को प्रमोट करने का इट इज द बेस्ट इन द वर्ल्ड यदि आप में थोड़ा सा भी टैलेंट है तो अमेरिका जैसी जगह और कहीं नहीं है आपकी टैलेंट को मैनिफेस्ट करने की वो जो आपको बेस्ट ऑफ द बेस्ट इंस्टीटशंस, बेस्ट ऑफ द बेस्ट टीचर्स, बेस्ट ऑफ द बेस्ट वेंचर कैपिटल जो वहां पे मिल जाएंगे देयर इज नो अदर प्लेस इन द वर्ल्ड। तो वह एक चीज है कि टैलेंट पाइपलाइन उनका नंबर वन है। सेकंड इज़ कि जो लिबरल है वहां का जो पॉलिटिकल सिस्टम वो लिबरल पॉलिसी पॉलिटिकल सिस्टम की वजह से पूरे देश की टॉप टैलेंट वहां पे अट्रैक्ट होती है। अभी मैंने आपको बताया ना कि यह जीपीटी5 का चैट GPT5 का लाइव स्ट्रीम मैं देख रहा था। इट्स सच अ रेशियल डायवर्सिटी। एक चाइनीस है, एक कोरियन है, एक फ्रेंच है, एक ब्रिटिश है, एक अमेरिकन है, एक इंडियन है। कहां पर दूसरा एक देश है कि जहां पर आपको टॉप टैलेंट अपने से सामने से दौड़ के वो वहां पे आने को प्रयास करते हैं। सो दिस क्रिएटिविटी एंड दिस लिबरलिज्म। वेयर इज़ दिस टू कम फ्रॉम? दे कम फ्रॉम वेदांत। देयर इज़ नो अदर पॉलिटिकल फिलॉसोफिकल सिस्टम जो कि प्योर क्रिएटिविटी और प्योर लिबरल वो आइडियाज को प्रमोट करती हो। क्रिश्चियनिटी में वह दम ही नहीं है। यह पूरा कंट्रीब्यूशन है वेदांत का। अनफॉर्चूनेटली जो स्वामी जी कहते हैं ना हम लोगों का प्रॉब्लम कहां पे है? स्वामी जी कहते हैं वी हैव द बेस्ट ऑफ द फिलॉसोफी बट वर्स्ट ऑफ दी प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ दैट फिलॉसोफी। सो दिस इज इंडियास प्रॉब्लम। नहीं कि बहुत सारे लोग जैसे इस इसी लेक्चर में स्वामी जी कहते हैं बहुत सारे लोग सोचते हैं कि हिंदूइज़्म की वजह से ही भारत की ये अवनति हुई है। स्वामी जी कहते हैं नॉट बिकॉज़ ऑफ हिंदूइज़्म। इंस्पाइट ऑफ हिंदूइज़्म। प्रॉब्लम इज़ कि हमने हिंदूइज़्म के जो बेस्ट फिलॉसोफीज़ हैं उसको प्रैक्टिकल एप्लीकेशन करने का प्रयास ही नहीं किया। अदरवाइज़ हु कैन बी मोर क्रिएटिव देन अ हिंदू। हु कैन बी मोर लिबरल देन अ हिंदू। जो आदमी कहता है कि ये अफ्रीकन काला अफ्रीकन हो। यह पीला चाइनीस हो ना कि ये गोरा यूरोपियन हो ना कि ये ब्राउन इंडियन हो। वी ऑल ब्राह्मण इज ऑल ऑफ देम। सिर्फ इतना ही नहीं। यही ब्रह्म इस पेड़ पौधे में पशु पक्षी में ये आकाश मैंने ये ग्रह नक्षत्र में यह जो एनवायरमेंटलिज्म मूवमेंट जो आज चला है इट इज इनबिल्ट इन आवर वेदांता राइट एक्सप्लइटेशन करने का प्रश्न ही नहीं आता जब दे आर ऑल माय ओन नेचर सो दिस इज़ आवर बिगेस्ट वीकनेस कि अप्लाई वेदांता इन अ प्योर फॉर्म देन सी क्रिएटिविटी विल कम लाइक अ फाउंटेन माने आप ये अब देखिए ना यह जितने भी इंडियन अमेरिका जाते हैं सीधे टॉप लेवल पे पहुंच जाते हैं। क्यों? क्योंकि यह डीएनए है उनका वेदांत का। अनफॉर्चूनेटली वो टैलेंट पाइपलाइन इंडिया में नहीं है जो कि उनको वहां पे मिलता है। ये एआई का जो फाउंडेशनल पेपर है अटेंशन इज ऑल यू नीड। ये फाउंडेशनल पेपर एआई का इसका मेजर मेन ऑथर तो एक इंडियन है। सो आप कैसे कहेंगे कि एआई में हम लोग हार गए हैं। ये Google है जिसका कि नंबर वन कंपनी है आज एआई में वन ऑफ द बेस्ट कंपनी। उसका सीईओ इंडियन है। Microsoft का सीईओ इंडियन है। सो वी कैन नॉट कि कह सकते हैं कि इंडिया का प्रॉब्लम ये फंडामेंटल डीएनए में है। इंडिया का प्रॉब्लम वो टैलेंट पाइपलाइन हम लोग नहीं डेवलप किए हैं। और अगेन द डीपर रूट इज दैट कि वेदांत का प्रैक्टिकल एप्लीकेशन नहीं हुआ। ना इसीलिए मैं बहुत बार इंडिया का कंपैरिजन है ना वो वाटर स्नेक के साथ करता हूं। वो ठाकुर कहते हैं ना उदाहरण देते हैं वाटर स्नेक है। मेंढक को गिला है। अभी वो ना ही उसको गिल पाता है तो मेंढक का वो यातना वहीं पर यंत्रणा खत्म हो जाएगी। नहीं वो निकाल सकता है। यानी मेंढक मरता भी नहीं है। उसकी यंत्रणा भी खत्म नहीं होती। अपने यहां पे भी ये जाति प्रथाएं हमको जी विजेता नहीं होने देती और वेदांत है हमको मरने नहीं देता।

प्रश्न: भारत में हम सदैव केवल अपनी मुक्ति के बारे में ही चिंतित रहे हैं। हम सदैव आध्यात्मिक रूप से स्वार्थी रहे हैं। स्वामीजी पहले संत थे जिन्होंने "जगत हिताय च" का यह नया विचार प्रस्तुत किया।

देखिए यहां पर मैं थोड़ा सा नवांस ऐड करूंगा। पहली बात तो उपनिषद युग की कि तत्वमसी श्वेत केतो अहम ब्रह्मास्मि यह मेरा अंत है मतलब आध्यात्मिक जीवन का इसके बाद में सर्वम खलवम इदम ब्राह्मण की बात तो है किंतु सोसाइटल लेवल पर ऐसा कुछ दिखता नहीं है हमको तो बात ऐसी है ना कि सतयुग में इस तरह की कोई आवश्यकता ही नहीं थी कि एक पदलित प्रजा हो आउटकास्ट प्रजा हो कि जिनको कि मदद की जरूरत है हेल्प की जरूरत है वहां पे यह कास्ट थी तो सही कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य किंतु दे वर ऑल फ्री मैन। इस अर्थ में कि आज मैं शूद्र का लड़का हूं किंतु मेरे पास मेधा शक्ति है तो मेरे पास में वो टैलेंट पाइपलाइन थी उस समय भारत में कि शूद्र का लड़का वो उपनिषद का पाठ कर सकता है। क्षत्रिय के लड़के जो है वो ब्राह्मण की विद्या अर्जन कर सकते हैं। वह टैलेंट पाइपलाइन था उस समय। बोल के अभी जैसे देखिए ना अमेरिका में आज कहेंगे कि हम शिव ज्ञान जीव सेवा तो बात का कोई मीनिंग नहीं है क्योंकि अमेरिका में टैलेंट पाइपलाइन है। आप यदि गरीब भले ही चाहे हो डिसएडवांटेज भले ही चाहे हो काले हो ना कि ये एशियन हो टैलेंट है तो आप ऊपर आ जाएंगे। फिर वह आपको कोई आपको किसी साधु को आकर के आपका हाथ पकड़ने की जरूरत नहीं है। सो एक सिविलाइजेशनल स्केल पर एक सेकुलर टैलेंट लेडर वहां पर अवेलेबल है। तो उपनिषद युग में वो जरूरत नहीं थी पर से कि आप इस तरह का उपदेश दें जो कि स्वामी जी को आज देना पड़ा। स्वामी जी को यह उपदेश देना पड़ा। उस समय भारत में टैलेंट पाइपलाइन जीरो हो गया है। कि आप शूद्र है तो आज जीवन शूद्र ही रहेंगे। देयर इज नो होप फॉर देयर इज़ नो साल्वेशन फॉर यू। इस तरह की परिस्थिति में यह शिव ज्ञान जीव सेवा या तो फिर सर्वभूत में यह ब्रह्म दर्शन वाला कांसेप्ट बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट हो जाता है। सो दैट इज वन नंस। सेकंड नवांस इज़ कि ऐसा नहीं है कि जो साधु संत थे वे लोग सेल्फिश थे। प्रॉब्लम यह था कि भारत में संप्रदाय इतने ज्यादा थे और सभी संप्रदायों की एक यूनिकनेस इतनी स्ट्रांग थी कि द्वैत और अद्वैत में वैसे कोई कहेंगे कि इतना इजीली कम्युनिकेशन नहीं होता था। तो अभी यह अद्वैत आचार्य का जन्म होता है तो वह उनकी ये जो कंपैजन है वह अद्वैत संप्रदाय के भीतर में ही रहेगी। यह राधावल्लभ संप्रदाय के जो संत है वह राधावल्लभ संप्रदाय में ही उनका रहेगा। यह श्री वैष्णविज्म है तो उनका यह करुणा वहीं तक लिमिटेड रहेगा। यह जो आपका चैतन्य मूवमेंट है तो वह जो वे लोगों के तक उनका सीमित रहेगा। यह यूनिवर्सल एक जो अवतार आने चाहिए थे भारत में वो उस समय नहीं आए थे। वि इज कि वो गैप जो है ठाकुर ने फुलफिल किया। किंतु ये जो संप्रदायों का वैविध्य है ना वो भी हमारी एक तरह से वीकनेस है कि हमको यूनिफाई नहीं होने दिया। यह मट गए हम लोग। किंतु साथ में स्ट्रेंथ क्या है कि यह जो संप्रदायों को जोर जबरदस्ती जहां भी यूनाइट किया गया खास करके क्रिश्चियनिटी और इस्लाम में वहां पे क्या है ना स्पिरिचुअल हार्ट ही टूट गया। ये जो स्पिरिचुअल लाइफ जो है ना जीवन प्रवाह एक करंट जो होता है वही वो खत्म हो गया। इसके बाद में सिर्फ एक्सटर्नल फॉर्म रह गया। सबको ट्रिनिटी एक्सेप्ट करनी है। सबको यही डेफिनेशन एक्सेप्ट करनी है। फिर आपका खुद का स्पिरिचुअल डेवलपमेंट अटक गया। यह तो वहां पर देखिए कि क्रिश्चियनिटी और वो जितने भी इस तरह के रिलीजन है जहां पर एक ऊपर से यह एक यूनिफिटी थोप दी गई है वहां पे स्पिरिचुअल हार्ट उनका खत्म हो गया है। जबकि भारत में ये जो संप्रदाय मल्टीप्लाई हुए तो क्योंकि एव्री पर्सन हैज़ हिज ओन अंडरस्टैंडिंग हिज ओन डेवलपमेंट पाथ पाथवे ऑफ़ स्पिरिचुअल एनलाइटनमेंट। सो ऑल पाथवेज़ वेर इक्वली रिप्रेजेंटेड। सो इस इस बात का प्लस भी है, नेगेटिव भी है। नेगेटिव यह है कि इस संप्रदाय के संत का इन्फ्लुएंस उसी संप्रदाय तक ही लिमिट रहा। उससे बाहर नहीं जा पाया और ये माइनस हो गया और प्लस है कि यह संप्रदायों का वैविध्य हमने आखिर में ठाकुर में ठाकुर ने जो विविध संप्रदायों की साधना की। ये जो रिचनेस जो है भारत की आध्यात्मिक थॉट्स की वो हमको स्वामी ठाकुर के जीवन में अल्टीमेटली मैनिफेस्ट होती देखने को मिली। और अल्टीमेटली जब ठाकुर आए सो दिस यूनिटी ऑफ संप्रदाय जो होनी चाहिए थी वो ठाकुर में हमको फलीभूत हुई दिखाई दी। सो दिस इज द नवांस। ओम