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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 22 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लाइव इस सप्ताह हम देख रहे हैं। वराह नगर मठ का पीरियड चल रहा है। ठाकुर की महासमाधि के बाद में मठ की स्थापना हो चुकी है। वो जो फेमस घटना 24 दिसंबर क्रिसमस ई आठपुर वह भी हो चुकी है। गुरु भाइयों ने सन्यास भी ले लिया है

युवा विवेकानन्द की भक्तिमय आत्मश्रद्धा

और फिर शिवरात्रि के बाद में मास्टर महाशय एक दिन मठ में आए हैं और नरेंद्र के साथ में स्वामी विवेकानंद के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। तो इसका एक पार्ट हमने कल ऑलरेडी देखा है। स्वामी जी कहते हैं कि मैं जो करता था ठाकुर उसमें कोई बाधा नहीं देते थे। तो इसके बाद में स्वामी जी मास्टर महाशय को पूछते हैं अच्छा आप इतने विनय है विनम्र है। आप मुझे बता सकते हैं मैं विनय और विनम्र कैसे हूं? कैसे हो सकता हूं? तो फिर मास्टर महाशय ने कहा कि देखिए ठाकुर ने तो कहा है कि जो तुम्हारा अहंकार है वह अहंकार किसका है? अहंकार अहंकार किसका है? तो यह ठाकुर का ही अहंकार है। फिर पहले तो नरेंद्र को समझ में नहीं आया कि क्या कहना चाहते हैं? तो पूछा इसका क्या अर्थ है? तो मास्टर महाशय उदाहरण देकर के कहते हैं कि श्रीमती राधा रानी ने भगवान कृष्ण के साथ में अहंकार किया था। तो फिर सभी सखियां आपस में वार्तालाप करती है। एक सखी राधा रानी को कहती है श्रीमती को कि आपने कृष्ण के साथ में अहंकार किया। बोल के कृष्ण चले गए। तो दूसरी सखी साथ-साथ में ही कहती है कि अरे सखी यह अहम किसका है? यह कृष्ण मेरे पति है। मेरे आराध्य देवता है। यही तो मेरा अहंकार का सोर्स है। श्रीमती राधा रानी का अहंकार कहां से उत्पन्न होता है? भगवान कृष्ण के साथ में उनका जो प्रणय है, उनका जो मधुर भाव का जो दिव्य संबंध है, उसी में से तो यह अहम उत्पन्न होता है। तो मास्टर महाशय नरेंद्र को कहते हैं कि ठाकुर ने भी तुम्हारे बारे में यही कहा है कि नरेंद्र कौन है? नरेंद्र का अहंकार कहां से प्रकट होता है? इसलिए नहीं कि वो कोई वकील का बेटा है। इसलिए नहीं कि उसके घर में बहुत सारे नौकर है। इसलिए नहीं कि उसका एक बहुत बड़ा घर है। इसलिए नहीं कि पिताजी के पास में बहुत सारा रुपया है। घोड़ा गाड़ी है। वो वकालत करने को जाते हैं। इसलिए नहीं कि वह बहुत ज्यादा बुद्धिमान है। जनरली किसी भी व्यक्ति को अहम होता है। घमंड होता है। तो ये सांसारिक चीजों को लेकर घमंड होता है कि हां मैं धनी हूं। मैं मानी हूं। मेरे पास में प्रेस्टीज है। मेरे पास में सोशल कैपिटल है। मेरे पास में इन्फ्लुएंस है। आजकल जो इन्फ्लुएंसरर्स सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरर तो मैं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरर हूं। मैं पॉलिटिशियन हूं। मैं मेंबर ऑफ पार्लियामेंट हूं। मैं मिनिस्टर हूं। मैं सीईओ हूं। मैं मिलनेयर बिलियनर हूं। मैं इन्वेंटर हूं। साइंटिस्ट हूं। यह जो सब भौतिक चीजों को लेकर के मटेरियलिस्टिक चीजों का जो अहम होता है वह तो अहम नरेंद्र का नहीं था। नरेंद्र का अहम था। जैसे ठाकुर ने कहा था कि मेरी एक साध थी। साध अर्थात कि मेरी एक इच्छा थी। मेरी एक एंबिशन थी। क्या थी? भक्तों का राजा होना है। तो यह भक्तों का राजा होने की जो एंबिशन थी मां काली का जब दर्शन हुआ तो फिर देखिए कि ठाकुर के मन के भीतर में एक आनंद उत्साह प्रफुल्लता का जो प्रवाह बहा वो क्यों जनरली कौन प्रफुल्ल होता है? कौन उत्साहित होता है? जिसके पास में यह मटेरियलिस्टिक सब चीजें होती है। भोगवाद की चीजें होती है। ऐसे लोग होते हैं कि काफी उत्साही होते हैं। ऐसे लोग होते हैं कि काफी उत्फफुल दिखते हैं। किंतु ठाकुर का जो उत्साह है, ठाकुर की जो चेयरफुलनेस है, मां ने कहा ना कि ठाकुर को मैंने कभी निरानंद नहीं देखा है। पांच साल का बच्चा हो ना कि कोई बूढ़ा हो। सबके साथ में ठाकुर एक समान आनंद से वर्तन करते हैं। तो सबके साथ में आनंद से यह वर्तन करने का भीतर में से जो शक्ति कहां से प्रकट हुआ कि वो मां के संतान है। मां काली स्वयं उनकी मां है। उनकी चारों हाथों से रक्षा कर रही है। यह जो अहम था, ठाकुर का वो अहम था और यहां पे नरेंद्र का अहम क्या है? कि वो ठाकुर के शिष्य हैं। ठाकुर को वो संपूर्ण रूप से शरणागत हुए हैं। भले ही चाहे ठाकुर के साथ में मुंह पर कोई भी कुछ भी बोले ठाकुर को कहते थे कि आपके यह जो दर्शन वगैरह है यह ब्रह्म मात्र है। ठाकुर जब कहते हैं कि तुम चाहो तो तुम अपने हृदय में भगवान कृष्ण का दर्शन कर सकते हो। तो नारायण एकदम मुंह पे बोल देता है कि मैं कैस्टोफेस्टोमा मानता नहीं हूं मैं। तो यह किंतु भले ही चाहे ठाकुर के साथ में इतना स्पष्ट वक्ता के रूप में ठाकुर स्वामी जी बात करते हो किंतु ठाकुर के साथ में जो स्नेह का आदर का हृदय का जो संबंध था वो इतना गहरा था कि यह जो सब मौखिक वाद विवाद मौखिक आर्गुममेंट या तो फिर मुंह पर बोल देना वह सब तो कहां उसके सामने नीचे पड़ा रहेगा। देखिए आप इस तरह से वाद-विवाद भी तो अपने के जो अपना है उसी के साथ में करते हैं ना। परायों के साथ में थोड़ी ना करने को जाएंगे। मां यदि डांटेंगी तो अपने ही बच्चे को डांटेगी। पराए के बच्चे को थोड़ी ना वो डांटने को जाएगी कि क्यों तुमने होमवर्क नहीं किया? क्यों तुम यह हेल्दी फूड नहीं खाते हो? क्या सब यह फालतू का जंक फूड खाते हो? ये मोबाइल बाद बगल में रख दो। पढ़ाई लिखाई करो। ये जो मां डांटेगी अपने ही बच्चे को डांटेगी। वो अपने पड़ोसी के बच्चे को थोड़ी ना डांटने को जाएगी कि होमवर्क करो टीवी बंद करो यह सब तो देखिए कि ठाकुर के साथ में स्वामी जी का इतना गहरा हृदय का रिश्ता था बोलकर के स्वामी जी ठाकुर के सामने स्पष्ट वक्ता होने का साहस कर सकते थे और ठाकुर भी जैसे कि नरेंद्र के इस साहस को एनकरेज करते थे। नरेंद्र का जब जीत होता है वादविवाद में ठाकुर सबसे ज्यादा खुश होते थे। एक बार ठाकुर कहते हैं कि कैप्टन जो कैप्टन उपाध्याय ठाकुर की महासमाधि के बाद में जिनको बुलाया गया था और जिन्होंने ठाकुर के मेरुदंड पे घी का मालिश करने का सलाह दिया था वही वो जो नेपाल के राज प्रतिनिधि तो उसके साथ में कहीं घोड़ा गाड़ी में जा रहा है तो ठाकुर यह पूरा वर्णन करते हैं। ठाकुर कहते हैं कि वह कैप्टन ने नरेंद्र को कहा यहां पे आओ एक अच्छी जगह पे बैठो तो नरेंद्र ने जैसे उसके सामने मुंह करके देखा तक नहीं माने नरेंद्र के भीतर में इतना यह आत्मश्रद्धा कहो ना कि आम सामान्य आदमी कहेंगे कि घमंड बहुत ज्यादा है और ठाकुर कहेंगे कि देखो किंतु यह घमंड किसका है? यह कैप्टन के सामने नजर फिरा करके देख देखा तक नहीं। क्या है इसके पीछे? ऐसा नहीं कि नरेंद्र घमंडी है। बस वही है कि ठाकुर का वह संतान है। ठाकुर उनके पिताजी है। उनके गुरु है। आराध्य है। इष्ट है। यह घमंड है। वो नरेंद्र के भीतर में है। वो सात्विक आप कह सकते हैं अहंकार। वो जो बाकी का होता है तामसिक राजसिक अहंकार। तो ये हमारा थोड़ा सा डिस्कशन हुआ था। इसके बाद में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं कि मास्टर महाशय नरेंद्र के साथ में और क्या वार्तालाप करते हैं। लोकेशन है वही वराह नगर मठ मास्टर महाशय नरेंद्र के साथ में वार्तालाप करने को आए हैं। क्या लिखते हैं

श्रीरामकृष्ण के भक्त विजय कृष्ण गोस्वामी का दिव्य-दर्शन

मास्टर महाशय कथामृत में? ए बार अन्नो अन्नो भक्तों दे कथा पढ़ लो। अभी बाकी सब भक्तों के बारे में वार्तालाप चलने लगा। इससे पहले नरेंद्र अपने बारे में बता रहा था। नरेंद्र मास्टर महाशय को कहता है मैं आपको एक बात बताता हूं। ठाकुर मेरे बारे में क्या कहते हैं? आप और किसी को बताइएगा मत। तो मास्टर महाशय कहते हैं अच्छा अच्छा ठीक है। नहीं बताऊंगा। बताओ तो क्या कहा उन्होंने? तो फिर ऐसा करके वो पूरा वार्तालाप स्टार्ट हुआ था। अभी किंतु नरेंद्र का जो पर्सनल टॉपिक है वह छोड़कर के अभी दूसरे भक्तों के बारे में वार्तालाप स्टार्ट होती है। विजय गोस्वामी प्रभुतिर विजय गोस्वामी वगैरह बाकी सब भक्तों के बारे में बात हो रही है। नरेंद्र क्या कहता है? तीन विजय गोस्वामी कथा बोले छिलेन द्वारे घा नरेंद्र कहता है तीन अर्थात ठाकुर ने विजय गोस्वामी के बारे में कहा था वो दरवाजा खटखटा रहा है अर्थात क्या कि देखिए आध्यात्मिक जीवन में वो जो ठाकुर ने कहा ना कि पहले तो होता है प्रवर्तक फिर होता है साधक फिर होता है सिद्ध और फिर होता है सिद्धों का सिद्ध प्रवर्तक क्या है कि वह देख के जान के सोच करके रखता है कि हां भाई आध्यात्मिकता जैसा कुछ है। हां भाई यह भगवान जैसा कुछ है। हां यदि जीवन में सुख शांति अनंत सुख अनंत शांति चाहिए तो वह हमको ये मटेरियल चीजों से भौतिक चीजों से इंद्रियों के सुख को भोग करके नहीं मिलने वाला। वह इससे परे जाकर के मिलने वाला है। ऐसा कुछ वो सुनकर के जान के रखता है। वह है प्रवर्तक। प्रवर्तक के बारे बाद में आता है साधक। साधक कौन है? जिसने कि गुरु को वरण किया है और फिर गुरु के गुरु के बताई हुई साधन पद्धति से गुरु प्रदत्त मंत्र का वो जप करता है। इसको कहेंगे साधक। और फिर होता है सिद्ध जिसने कि यह जो मंत्र मिला है जो साधन पद्धति मिली है उसमें वह एक ऊंचाई पर चला गया है उसमें उसने सिद्धि प्राप्त की है और जो सिद्धों का सिद्ध होता है वह जैसे कि इस निर्विकल्प समाधि के बाद में जैसे ठाकुर ने कहा ना नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करनी है। फिर इति इति करके जगत में आकर के वापस आकर देखना है कि जो ब्राह्मण जो ईश्वर की वो अपने मन में आराधना कर रहा था मंदिर में जाकर के आराधना कर रहा था वही ईश्वर वही ब्राह्मण पूरे विश्व में व्याप्त है। एक्चुअली ब्राह्मण ही नाम रूप रूपी मुखौटा पहन करके बाकी सब चीजें हुए हैं। तो यह हो गया सिद्धों का सिद्ध। तो यहां पे ठाकुर ने जब यह कहा कि विजय गोस्वामी दरवाजा खटखटा रहा है। अर्थात कि वह प्रवर्तक में से साधक अवस्था में जाने को प्रस्तुत हो रहा है। मास्टर मास्टर महाशय क्या कहते हैं? अर्थात घर भीतर एकनो प्रवेश कोते पारे नहीं अर्थात घर के भीतर में अभी भी प्रवेश नहीं कर पाया है अर्थात कि उसने अभी भी सीरियसली साधन भजन करने का प्रारंभ नहीं किया है किंतु श्याम पुकुर बाटी ते विजय गोस्वामी ठाकुर के बोले छिलेन आमी आपना के ढाकात ते ई आकार दर्शन करे छ किंतु श्याम पुकुर बाटी में विजय गोस्वामी ने ठाकुर ठाकुर को कहा था मैंने आपको ढाका में इसी आकार में दर्शन किया है। यही शरीर है इसी शरीर में मैंने आपका दर्शन किया है। तुम शेखाने उपस्थितो छिले तुम भी तो वहां पर उपस्थित थे। अर्थात कि विजय गोस्वामी ने जब नरेंद्र यह कहता है कि विजय गोस्वामी अभी सिर्फ दरवाजा खटखटा रहा है। अभी तो उसने घर में प्रवेश नहीं किया। तो मास्टर महाशय कहते हैं। पहले तो स्पष्टता करते हैं दरवाजा खटखटा रहा है का अर्थ क्या है? क्योंकि देखिए मास्टर महाशय को तो यह सिर्फ उन दोनों के बीच का वार्तालाप नहीं है। आप यदि कोई अच्छा इंटरव्यूअर देखेंगे ना यह पडकास्ट आजकल बहुत चलता है। तो पडकास्ट पे वो किसी वो टेक कंपनी के सीईओ को बुलाएंगे। फिर वह पूछेंगे अच्छा यह एi करता है यह किस तरह से काम करता है? वगैरह-वगैरह। अभी यह जो पडकास्टर जो है जो कि इंटरव्यू ले रहा है उसको पता है कि उसका जो ऑडियंस है ना सभी कोई इतने टेक सेवी नहीं है। अभी वो सीईओ कोई एकदम टेक्निकल लैंग्वेज में बोलना शुरू करेगा। टेस्ट टाइम कंप्यूट, प्री ट्रेनिंग, ट्रांसफॉर्मर्स ऐसा कुछ वो बड़े-बड़े शब्द वो फेंकना शुरू करेगा। तो फिर यह पडकास्टर क्या करेगा? साथ-साथ में ही इन सब शब्दों की व्याख्या करता जाएगा कि अच्छा भाई ये टेस्ट टाइम कंप्यूट क्या है? यह प्री ट्रेनिंग क्या है? यह ट्रांसफार्मर क्या है? यह पडकास्टर उसकी व्याख्या करता जाएगा जिससे कि उसका ऑडियंस जो कि टेक्निकल है वह लोग भी तो डायरेक्ट वो तो सीईओ को सुनकर के ही समझ सकते हैं और जो टेक्निकल पर्सन नहीं है वे लोग जब पॉडकास्टर जो है या इंटरव्यूअर जो है वह जब टेक्निकल टर्म्स को सिंपलीफाई करके कहता है तो वह सुनकर के वे लोग समझ पाते हैं। जिससे कि क्या है कि सभी टेक्निकल एज वेल एज नॉन टेक्निकल दोनों ऑडियंस बने रहे। तो यहां पे भी मास्टर महाशय वो पहले तो नरेंद्र ने जब यह कहा दरवाजा खटखटा रहा है तो फिर मास्टर महाशय ने पहले तो उसकी व्याख्या कर दी कि दरवाजा खटखटा रहा है का अर्थ क्या है? सभी लोग तो जो है ये जो कथामृत पढ़ रहे हैं पढ़ने वाले हैं भविष्य में सभी लोग तो कोई इतने जो मैंने रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा में इतना गंभीरता से उन्होंने प्रवेश नहीं किया कि सभी शब्द सभी टेक्निकल टर्म्स या तो फिर यह जो रेफरेंस है उसका अर्थ समझ पाए। बोल के मास्टर महाशय ने पहले तो उसकी व्याख्या कर दी। दरवाजा खटखटा रहा है। इसका अर्थ क्या? तो मास्टर महाशय कहते हैं अर्थात घर के भीतर में अभी भी प्रवेश नहीं कर पाया है। इसके बाद में किंतु कहते हैं कि अच्छा तुम तो यह कहते हो कि ठाकुर ने यह तो कहा है कि हां वह घर में प्रवेश नहीं कर पाया किंतु श्याम पुकुर बाटी में ही विजय गोस्वामी ने ठाकुर को आकर के कहा था कि मैंने ढाका में आपका दर्शन किया है। आप जिस शरीर में हैं उसी शरीर में आप जिस आकार में हैं उसी आकार में मैंने आपको ढाका में दर्शन किया। अर्थात ऐसा नहीं कि कोई दिव्य वाणी सुनाई दी, कोई आकाशवाणी सुनाई दी, कोई प्रकाश का पुंज दिखाई दिया, तेज पुंज या तो प्रकाश का गोला दिखाई दिया। ऐसा नहीं ठाकुर का जो फोटोग्राफ में जिस तरह से ठाकुर दिखते हैं वही ठाकुर को जैसे कि विजय गोस्वामी ने अपनी नजरों से ढाका में देखा और ऐसा कहने के बाद में मास्टर महाशय नरेंद्र को कहते हैं कि जब यह वार्तालाप हो रहा था तुम भी तो उपस्थित थे अर्थात तुम भी तो विटनेस हो कि विजय कृष्ण गोस्वामी ने ठाकुर को यह बात कही है। तो इसके उत्तर में नरेंद्र क्या कहता है? देवेंद्र बाबू रामबाबू एरा सब संसार त्याग कोरबे खूब चेष्टा कोर अच्छा किंतु यह जो मामला है ये यहीं पे समाप्त हो गया किंतु इसके बाद में जो है फिर से स्टार्ट होता है इस अर्थ में कि इस तरह से दर्शन होना या तो फिर बाद में जो आएगा यह जो नृत्य गोपाल को लेकर के कि मास्टर महाशय कहते हैं कि यह गोपाल की यह तो अच्छी अवस्था है उसको तो दर्शन वगैरह सब होता है, भाव होता है। तो इस समय फिर नरेंद्र जो है इस मामले को फिर से पकड़ेगा। फिलहाल जब मास्टर महाशय काउंटर आर्गुममेंट करते हैं। देखिए यह जो आर्गुममेंट जो म ये जो

त्याग का आधार न हो तो भाव और दर्शन साधक का पतन कर सकते है 1

वार्तालाप चल रहा है देखिए स्पष्ट दो पक्ष दिखाई देते हैं। यहां पे है मास्टर महाशय। मास्टर महाशय देखते हैं कि किसको क्या दर्शन होता है। किसको क्या भाव होता है। नरेंद्र देखता है कि किसके भीतर में कितना त्याग है। त्याग ही श्रेष्ठ है। भाव और दर्शन तो होते रहेंगे। आते रहेंगे जाते रहेंगे। उससे कोई बहुत बड़ा चिंता करने की जरूरत नहीं है। आज आपको कुछ भाव हो गया। आज आपको कुछ दर्शन हो गया। डजंट मैटर कि आपका जो बाकी का जीवन है एक स्टेबल पाथ पे जाएगा। एक स्टेबल ट्रेजेजरी पर आपका स्पिरिचुअल लाइफ डेवलप होगा ऐसा कोई गारंटी नहीं है। यदि भीतर में से त्याग नहीं प्रकट होता है तो ये भाव या तो ये समाधि वगैरह वो क्या है नशे की तरह है जब जो जिसको नशे का शौक है एडिक्ट जो एडिक्ट है जो कि नशा करता है वो चाहे चरस गांजे का नशा करता हो वो चाहे अल्कोहल हो ना कि चाहे कुछ भी हो नशे की बहुत सारी चीजें हैं तो जैसा ही नशा करेगा उसका मन एकदम एकदम हवा में उड़ने लगेगा सब कुछ माने उसको उन्हें प्रफुल्ल दिखाई देगा। सब कुछ उसको वह चीयरफुल हो जाएगा। किंतु जैसे ही नशा उतरा जैसे ही यह हैंगओवर जिसको कहते हैं नशे की लैंग्वेज में जैसे ही यह हैंगओवर स्टार्ट हुआ वैसे ही देखेंगे कुछ जितना वो हवा में उड़ रहा था उतना ही नीचे में वह पटकेगा। तो फिर देखिए कि यह जो भाव और दर्शन वगैरह भी नशे की तरह है। एक क्षण के लिए तो आपको एकदम हवा में उड़ा देंगे। किंतु फिर यह जो त्याग रूपी एक क्या कहेंगे कि एक फ्लोर नहीं है। त्याग रूपी एक बेस लाइन नहीं है। तो सीधा आप जाकर गड्ढे में गिरेंगे। हैंगओवर जब यह होगा भाव का और दर्शन का देखेंगे कि जब आप नॉर्मल लेवल पर जो आदमी होता है उससे भी कहीं वह नीचे गिर जाता है। तो नरेंद्र यह बात करता है। पहले तो जब मास्टर महाशय ने कहा कि ये भले ही चाहे तुम कह रहे हो भले ही चाहे ठाकुर स्वयं कह रहे हो कि दरवाजा ही खटखटा रहा है। प्रवर्तक ही है। अभी तो उसने साधना तक प्रारंभ नहीं की। किंतु देखना कि ठाकुर ने स्वयं माने विजय कृष्ण ने स्वयं ठाकुर का दर्शन किया था। तो जब मास्टर महाशय पहले यह कहते हैं तो नरेंद्र इसको एक बार छोड़ देता है इसके सामने आर्गुमेंट और दूसरी बात चालू करता है। किंतु बाद में ही यह थ्रेड पकड़ लेगा। बाद में ही यह आर्गुमेंट पकड़ लेगा और फिर काउंटर आर्गुमेंट करना शुरू करेगा कि त्याग ही सर्वस्व है। किंतु देखिए स्वामी जी के जीवन की भी अवस्थाएं थी। जब यह भवनाथ है, भवनाथ के बारे में भी इससे पहले बात हुई थी। यही वरा नगर मठ में ही स्वामी जी ने कहा कि भनाथ वगैरह तो अभी सांसारिक कीट है। वह संसार में डूब गया है वगैरह-वगैरह। यहां पे विजय कृष्ण गोस्वामी के बारे में कहते हैं कि वह तो अभी प्रवर्तक ही है। अभी तो उसने साधना भी प्रारंभ नहीं की। किंतु जब यही स्वामी जी अमेरिका जाते हैं और अमेरिका में जो एक पहले तो भारत में ही कन्याकुमारी में ही जो वो कन्याकुमारी रॉक पे जो बैठे थे उनका एक जो विस्तृत विजन विज़न जो उनको प्राप्त हुआ था जैसे कि पूरे जगत में ठाकुर का भाव प्रचारित करना है। पूरे जगत को जैसे कि ठाकुर के भाव के आंचल में जैसे कि समावृत्त कर देना है। यह जो स्वामी जी का हृदय और दृष्टि दोनों जो खुल गया था वही आबू रोड जंक्शन पे उनके साथ में मुलाकात हुआ राजा महाराज और हरी महाराज के साथ में यही स्वामी जी कहते हैं कि भाई यह साधन भजन में कितना सिद्धि प्राप्त हुआ पता नहीं किंतु हृदय जैसे कि पूरा खुल गया है सभी के लिए प्राण रोता है जो कि अनफॉर्चूनेट है दलित नारायण जो चंडाल नारायण मूर्ख नारायण इन सब दरिद्र नारायण इन सबके लिए मेरा मन हृदय रोता है। तो यह जो स्वामी जी का भले ही चाहे यह वराह नगर मठ वाले पीरियड में एक हार्ड कोर साधक तपस्वी के रूप में होंगे किंतु प्रवृजिया करके भारत भ्रमण करके हृदय ओपन हो गया था। और फिर जब स्वामी जी या तो अमेरिका से वापस आने के बाद की ही यह बात है या तो फिर लेटर में उन्होंने लिखा है जो भी है। भनाथ के बारे में उन्होंने लेटर में लिखा है। यहां पे तो वरा नगर में कह दिया कि भनाथ तो संसारी कीड़ा है। किंतु फिर वहां से लेटर लिखते हैं स्वामी जी अमेरिका से कि देखो भनाथ वगैरह को भी अपने साथ में रखना। सबको समान इज्जत देना। हम मैं सन्यासी हूं। वो गृहस्थ है। इस तरह का अभिमान मत करना। सबको समान रिस्पेक्ट मिलना चाहिए। यह बात स्वामी जी भनाथ के बारे में अमेरिका से कहते हैं और विजय कृष्ण गोस्वामी के बारे में मोस्ट प्रोबेबबली भारत आकर के ही उनका गुरु भाइयों के साथ वार्तालाप होता है। स्वामी जी ने अपने गुरु भाई किसी को पूछा कि अच्छा यह विजय कृष्ण गोस्वामी जो अलग से मठ करके वह रह रहा है तो तुमने क्या अपने मठ में उसको जगह क्यों नहीं दिया? देखिए माने जो अभी दरवाजा खटखटा रहा है वह अभी प्रवर्तक के लेवल पर है। स्वामी जी यहां जो स्पष्ट कहते हैं बाद में भी कहेंगे कि यह जो त्याग नहीं हुआ तो कुछ नहीं हुआ। तो यही स्वामी जी बाद में किंतु अमेरिका से वापस आने के बाद कहते हैं कि विजय कृष्ण गोस्वामी को अपने मठ में जगह क्यों नहीं दी? क्या तुम्हारा आता जाता है एक आदमी को रहने की जगह देने से? तो फिर वो उनके गुरु भाइयों ने कहा कि देखिए अभी विजय कृष्ण गोस्वामी खुद एक गुरु बन के बैठा है और उसके बहुत सारे शिष्य शिष्य आए हैं तो भी सबका तो यहां पे समावेश होगा नहीं इतनी जगह नहीं है। जब ऐसा उत्तर मिला तब कहीं जाकर स्वामी जी शांत हुए। तो माने देखिए कि कितने सारे थ्रेड्स है यह सब कन्वर्सेशंस में। एक और तो है मास्टर महाशय प्रभावित हो जाते हैं दर्शन और भाव से। तो फिर नरेंद्र उनको करेक्ट करता है कि नहीं दर्शन और भाव नशे की तरह है। त्याग का फाउंडेशन नहीं है। साधना का तपस्या का फाउंडेशन नहीं है। तो आपने आध्यात्मिक जीवन में बहुत ज्यादा कुछ उपलब्धि नहीं की। यह तो स्पष्ट रूप से कहता है किंतु फिर यही स्वामी जी अमेरिका भारत भ्रमण करते-करते ही प्रवरज्या के समय ही जैसे कि उनको एक दिव्य तृतीय नेत्र प्राप्त होता है। सबके मन का संताप देख पाते हैं। जो सा अपने जीवन के आखिरी समय में ठाकुर ने जिस तरह से कल्पतरु होकर के सबको यह जो बांटना शुरू कर दिया था। अपनी कृपा का भंडार उन्होंने उन्मुक्त कर दिया था। यहां पे भले ही चाहे निरंजन महाराज सर के ऊपर में पगड़ी पहन करके हाथ में लाठी लेकर के वहां पर सीढ़ी के सामने खड़े रहते हो कि किसी को जाने नहीं देंगे। ठाकुर को कैंसर हो गया है। काशीपुर में है। तो उस समय ठाकुर किंतु जो आता था सबको जैसे कि कृपा अब अबाध रूप से बिना किसी सोच विचार के जो कृपा का वितरण करते थे वही कृपा का जो प्रकाश है स्वामी जी के हृदय में प्रवृजजा के समय प्रकट हुआ था। इसीलिए ये ये जो पूरा जो भारत का जो एक अनफॉर्चूनेट हिस्ट्री है पिछले 1000 साल का कि ये काला पानी है उसको क्रॉस नहीं करना है। समुंदर क्रॉस करके विदेश में नहीं जाना है। विदेशी जो लोग हैं सब म्लेच्छ है उनको हिंदू धर्म से बिल्कुल दूर ही रखना है। यह म्लेच्छ ये काला पानी ये जो सब जो टॉक्सिक जो आइडियाज सब हिंदूइज़्म के भीतर में प्रवेश कर दिए थे। स्वामी जी ने जैसे कि इसको तोड़ा। स्वामी जी कहते हैं हिंदूइज़्म शुड बी अ मिशनरी रिलीजन। अग्रेसिव हिंदूइज़्म। जिस तरह से यह रोम और ग्रीक के रिलीजियंस ने विश्व पर विजय प्राप्त की। भारत धर्म के ध्वज के हेठड़ वेदांत से विश्व विजय करेगा। प्रत्येक व्यक्ति को वेदांत सुनाना है। वेदांत की अमर वाणी सभी को सुनानी है। तो यह जो प्रवरज्या के समय के स्वामी जी और यह जो वराह नगर मठ वाले स्वामी जी देखिए कि हमको किस तरह से कंट्रास्ट दिखता है। तो यहां पर तो जब पहले तो मास्टर महाशय ने कहा कि विजय कृष्ण गोस्वामी ने ठाकुर का दर्शन किया था तो अभी तो फिलहाल तो नरेंद्र उसको जाने देता है। बाद में पकड़ेगा इस थ्री

साधक के लिए संसार त्याग कब

को। फिलहाल नरेंद्र क्या कहता है देवेंद्र बाबू रामबाबू एरा सब संसार त्याग कोरब देवेंद्र बाबू रामबाबू यह लोग सब संसार त्याग करेंगे खूब चेष्टा कोर छे बहुत चेष्टा बहुत प्रयत्न कर रहे हैं प्रयास कर रहे हैं रामबाबू प्राइवेटली बोले छे दुई बोर पर त्याग कर रामबाबू ने मुझे प्राइवेटली अर्थात कि पर्सनली कहा है कि वह 2 साल के बाद में त्याग करेंगे मास्टर दुई बछ पोरे मास्टर महाशय कहते हैं अच्छा दो साल के बाद में छले में देर बंदोबस्त तो होले बुझी अर्थात कि पुत्र पुत्रियों का बंदोबस्त होने के बाद में लगता है देखिए मास्टर महाशय ऐसा क्यों एक प्रश्न करके करते हैं क्योंकि त्याग करना यह तो मास्टर महाशय के मन में भी था ठाकुर ने तो सभी को मन से त्यागी कर ही दिया है। वहीं काशीपुर में एक वार्तालाप है। ठाकुर कहते हैं कि यहां पर जो है सभी तो अभी त्यागी ही है। जिसके मन में जो थोड़ी सी वासना भी थी वह सब अभी चरितार्थ हो गई है। अब जब ठाकुर यह कहते हैं तो ठाकुर की बात सुनकर के मास्टर महाशय और राजा महाराज उस समय का राखाल भविष्य के स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र तो मास्टर महाशय और राजा महाराज दोनों हंसते हैं। क्यों? देखिए राजा महाराज का भी ऐसा थोड़ा सा कर्म का भोग बाकी रह गया था। बोल के ठाकुर ने उनको अपनी पत्नी के उनकी पत्नी के पास में भेजा था और फिर राजा महाराज को एक संतान भी हुआ था। तो मन की जो वासना थी वो मिट गई। अभी वह संपूर्ण रूप से त्याग के रास्ते पर आ गए हैं। और मास्टर महाशय का भी था कि उनको भी संतान हुआ था। ठाकुर को ठाकुर का दर्शन करने के बाद वो तो शादीशुदा थे ही थे। ऑलरेडी उनको पुत्र पुत्रियां थी शायद किंतु ठाकुर का दर्शन करने के बाद में भी संतान का जन्म हुआ था। किंतु बाय दैट टाइम यह काशीपुर लीला अंत्य लीला ठाकुर की प्रारंभ होती है। बाय दैट टाइम राजा महाराज और मास्टर महाशय दोनों के मन की सभी वासनाएं निवृत्त हो चुकी थी। बोलकर के दोनों ये ठाकुर की यह बात सुनकर के हंसते हैं थोड़ा सा। तो यहां पर जब मास्टर महर्षि यह सुनते हैं कि देवेंद्र बाबू और रामबाबू इन लोगों ने अभी ठीक किया है कि संसार त्याग करके वो माने सन्यासी का वेश धारण करेंगे या तो फिर रामबाबू का तो वो काकुड़गाची का था ही था आश्रम वहां पे ही जाकर के परमानेंटली रहेंगे तो फिर मास्टर महाशय सामने प्रश्न करते हैं अपनी खुद की क्लेरिटी के लिए कि अच्छा उन्होंने ऐसा कहा है कि 2 साल के बाद में इसका अर्थ है कि उनके जो बच्चे बच्चे वगैरह है उनका कुछ ठिकाना पड़ जाए बाद में वह जाएंगे क्योंकि हर किसी के मन में अब जैसे नरेंद्र वगैरह तो क्या है कि कोई रिस्पांसिबिलिटी घर की और कुछ अभी ऐसा नहीं है कि नहीं है नरेंद्र जैसी रिस्पांसिबिलिटी किसकी होगी माने मां और भाई बहनों को खानेपीने का भी नहीं मिल रहा है तो वो तो एक नरेंद्र के ऊपर में जिम्मा था किंतु क्या है कि मास्टर महाशय वगैरह थोड़ा सा ज्यादा संसार में फंसे हुए थे और फिर ठाकुर ने भी तो कहा है ना कि अह उम पत्नी का मतलब पति का धर्म क्या है कि पत्नी का एक खानेपीने का अह रहने का मोटा भात का पड़ ठाकुर जैसे कहते हैं अर्थात कि सामान्य कपड़े और सामान्य आहार इसका व्यवस्था ना हो जाए तब तक संसार में रहना चाहिए तब तक पत्नी का केयर करना चाहिए। जब ईश्वर प्रेम रूपी झड़ जब आती है वह जब सब बहा जाती है तब एक अलग बात है। किंतु जब तक उस हाईएस्ट स्पिरिचुअल लेवल पे व्याकुलता के स्पिरिचुअल लेवल पर आप नहीं जाते हैं तब तक क्या है कि पत्नी का यह सामान्य खाने-पीने रोटी कपड़ा मकान का व्यवस्था करना पति का धर्म है। तो मास्टर महाशय भी देखिए धीरे-धीरे करके वो जो अपना स्कूल है उसी में आकर के रहते थे। ज्यादातर समय घर की वजह अपने स्कूल में ही बिताते थे। ज्यादातर समय वह अपनी डायरी में जो नोट्स लिखी थी उसमें से यह कथामृत लेखन में ही बिताते थे। तो धीरे-धीरे करके सभी लोग जो है संसार की ओर से विमुख हो के त्याग की ओर आ रहे थे। भले ही चाहे विधिवत गेरुआ धारण ना किया हो विधिवत विजा होम ना लिया हो किंतु त्याग रूपी जो महा अग्नि है होमा अग्नि है सबके हृदय में प्रज्वलित होना शुरू हो ही गई थी बलराम बाबू बलराम बाबू के आखिरी समय चल रहा है जिस कमरे में वह लेटे हुए हैं बहुत ही बीमार है और किसी को आने नहीं देते थे अपने परिवार जनों में से बस वही वराह नगर मठ के गुरु भाई ही जाकर के उनकी सेवा करते थे। आखिरी समय उन्होंने उन्हीं के साथ में बिताया। तो रामबाबू भी अपने आखिरी समय में वह काकुड़ गाछी आश्रम में ही बिताते थे। तो सबके भीतर में यह त्याग रूपी वैराग्य अग्नि प्रारंभ हो ही चुका था। बस वही है कि मास्टर महाशय इसलिए पूछते हैं कि कौन क्या कर रहा है? ये म उनसे सीखे ना उनसे प्रेरणा ले। बोल करके पूछते हैं नरेंद्र कहता है आरो बाड़ीटा भाड़ा देवे और जो घर है उनका वह भाड़े पे दे देंगे आर एक छोट बाड़ी किनवे म उन उनका जो बड़ा घर है वह भाड़े पे दे देंगे और एक छोटा घर खरीदेंगे मेयर बीए टीए ओरा बुझवे माने उनकी जो लड़कियां है उनका जो विवाह वगैरह करना है वो उनकी पत्नी वगैरह जो घर वाले हैं वे लोग समझे तो अच्छा प्लान है मास्टर

त्याग का आधार न हो तो भाव और दर्शन साधक का पतन कर सकते है 2

गोपाल बेश अवस्था ना अभी देखिए मास्टर वहां गोपाल के ऊपर में आता है। वही जो नृत्य गोपाल नित्य गोपाल नित्य और नृत्य दोनों नाम सुने हैं जो भी है वही नित्य गोपाल जो कि वह भाव में आकर के माने नृत्य कीर्तन के समय उसको भाव होता था। तो अभी उसके बारे में कहते हैं वही मास्टर महाशय भाव और दर्शन से प्रभावित हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने ठाकुर के भीतर में ही इतना भाव और दर्शन का समावेश देखा है। किंतु मास्टर महाशय को पता तो है ही है कि ठाकुर का जो त्याग का फाउंडेशन है उसके ऊपर में यह भाव और दर्शन होते हैं। जबकि नरेंद्र का इससे भी ज्यादा क्लेरिटी है। नरेंद्र कहता है कि देखिए यदि अपनी कैपेसिटी लिमिटेड ही है ठाकुर की तरह नहीं कि पहले पूर्ण त्याग करो फिर पूर्ण भाव में डूब जाओ। ये दोनों यदि नहीं होता है डबल इंपैक्ट यदि नहीं होता है तो डबल इंजन की सरकार है। तो ये दोनों यदि नहीं चलते हैं तो यदि एक ही इंजन चाहिए तो फिर वह भाव की वजह त्याग का होना आवश्यक है। भले ही चाहे हमको त्याग ही हो भाव और दर्शन ना हो किंतु वह एक स्टेबल स्पिरिचुअल लाइफ होगी। यदि आपकी कैपेसिटी लिमिटेड है और आपने त्याग को छोड़कर के भाव और दर्शन में प्रवेश किया तो देखेंगे कि वह आपका जो एक नशे नशेखोर की तरह क्षण दो क्षण के लिए घड़ी भर के लिए भाव का नशा लगा और फिर जब गिरे तो सीधा हैंग ओवर जब प्रारंभ हुआ तो एक सामान्य आदमी जिस लेवल पर रहता है उससे भी कहां नीचे गिर गए तो नरेंद्र का यह व्यू पॉइंट है। मास्टर महाशय कहते हैं गोपाल की बहुत अच्छी अवस्था है ना तो नरेंद्र कहता है क्या अवस्था तो मास्टर महाशय कहते हैं ये तो भाव हरि नाम में अश्रु रोमांचो इतना भाव होता है हरि नाम से अश्रु और रोमांच होता है नरेंद्र भाव होले की बो लोग होए गो भाव होने से ही क्या बड़ा लोग हो गया काली शरद शशि शारदा एरा गोपाल चे कतो बो लोग काली शरद शशि शारदा काली महाराज स्वामी अभेदानंद शरद शारदानंद शशि रामकृष्णानंद शारदा त्रिगुणातीतानंद यह लोग सब गोपाल से कितने बड़े हैं एर त्याग का तो इनका त्याग कितना है देखिए त्याग और भाव दोनों हो तो बहुत अच्छा है ठाकुर की तरह त्याग का सॉलिड फाउंडेशन है सपने में भी कभी स्त्री संभोग नहीं हुआ ठाकुर ने यह बात कही है तो यह जो सॉलिड त्याग का फाउंडेशन है। उसके ऊपर में आप जितना भी भाव रूपी महल बनाना चाहे बनाइए। किंतु यदि आपकी कैपेसिटी लिमिटेड है दोनों में से यदि एक ही आप अपने जीवन में वो अप्लाई कर सकते हैं या तो प्राप्त कर सकते हैं देन ऑलवेज सिलेलेक्ट त्याग। त्याग ही सिलेलेक्ट कीजिए। भाव नहीं। भाव को सिलेलेक्ट करने को जाएंगे तो फिर क्या होगा कि अभी उप अप कभी डाउन। अभी अप कभी डाउन और फिर एक बार ऐसे डाउन हुए तो फिर से कभी अप होंगे ही नहीं। सो इसके बाद में क्यों और इसलिए शरद शशि शारदा देखिए ये कथामृत वगैरह पढ़ेंगे उस समय की जब बातें तो लगेगा यह सब लड़कों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। घटना किन के साथ में होती है जिसका साथ में कुछ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी होता हो। तो नृत्य गोपाल का है कि हां उसको भाव होता है। हां उसको यह अश्रु रोमांच होता है। बहुत अच्छा है। यह सब स्टोरीज में लिखा जाता है। जबकि ये शरद महाराज है। ये शारदा महाराज है। ये हरि महाराज है। ये शशि महाराज वो बेचारे सिर्फ लड़के ही थे। भीतर में त्याग था। इतना ही ऐसा कोई भाव दर्शन नृत्य करते-करते आंखों में से अश्रु पुलक रोमांच यह सब कहां उनको होता था? बोल के उनके ऊपर में स्टोरी भी क्या लिखेंगे? इन सब की स्टोरीज तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में प्रारंभ होती है। जबकि उन्होंने जगत में अपना एक के बाद एक बड़े-बड़े कार्य करना शुरू किया तब इनकी स्टोरीज प्रारंभ होती है। ठाकुर के रहते-रहते तो इनकी कोई स्टोरीज नहीं है। ठाकुर के पास आते हैं। ठाकुर साधना करवाते हैं। मन से सब कुछ त्याग कर दिए हैं। इंद्रियों का संयम करना प्रारंभ कर दिया है। और ठाकुर जो बोलते हैं सुनते हैं बेचारे। इतना ही तो वो कहां नृत्य करते-करते अश्रु पुलक रोमांच कहां इनको होता है? कहां उनकी स्टोरीज लिखी जाने वाली? तो इसीलिए अभी तो फिलहाल यह लोग सामान्य लड़के दिखते हैं। किंतु यह लोग यह नृत्य गोपाल जिसके बारे में ठाकुर के समय ही लिखा जाता था। स्टोरीज लिखी जाती थी। उससे तो कहीं यह बड़े हैं। यह जो नरेंद्र का जो अंतर्दृष्टि कैसा स्ट्रांग है एदेर त्याग तो इनका त्याग कितना है? गोपाल ताके

ठाकुर की सेवा कर के उनके त्यागी संतान तैर गए

माने अच्छा अभी एक और एक नया टॉपिक प्रारंभ होता है। गोपाल ताके माने कई गोपाल ताके अर्थात कि ठाकुर को मानता कहां है? देखिए यह भी हमको पता है कि यह बहिरंग और अंतरंग में सब बटना शुरू हो गए थे। जब ठाकुर को कैंसर हुआ था। उनको ट्रीटमेंट के लिए काशीपुर लाया गया था। और यह अंतरंग और बहिरंग का भी कैसा था। बात यह नहीं कि अपेरेंटली जिसको भाव दर्शन होता है, अश्रु पुलक रोमांच होता है, वह अंतरंग है। नहीं। जिन्होंने घर बार त्याग करके ठाकुर की सेवा को जीवन सर्वस्व अर्पित किया, वे लोग अंतरंग है। सेवा करके यह लोग तैर गए। वे लोग भाव के चक्कर में पड़े रहे। इन लोगों ने सेवा करके तैर लिया। तो यह सेवा जो है रामकृष्ण संघ में देखिए कि सबसे सर्वोच्च साधना है। ठाकुर ने स्वयं जो उनकी आखिरी समय जिन्होंने सेवा की है उन्हीं को गेरवा वस्त्र दिया है। और भले ही चाहे बाकी सबको चैतन्य हो बोलकर के स्पर्श करवा करके क्षण भर के लिए इष्ट दर्शन करवा दिया हो। जैसे कि रामलाल दादा। रामलाल दादा ने कहा कि मैं जब पहले जब ध्यान करता था तो मेरे इष्ट का या तो सर दिखाई देता है या तो हस्त दिखाई देते हैं या तो श्री चरण दिखाई देता है। किंतु ठाकुर ने जैसे ही स्पर्श किया 1 जनवरी 1886 कल्पतरु दिन को वैसे ही मुझे संपूर्ण इष्ट का दर्शन होने लगा। किंतु यह संपूर्ण इष्ट का दर्शन करके रामलाल दादा ने किया क्या? तो मां का पेंशन रुकवा दिया था ठाकुर की महा समाधि के बाद में। तो इष्ट दर्शन का क्या लाभ हुआ? जबकि यही लड़के त्यागी सन्यासी लड़के ठाकुर जब सबको स्पर्श कर रहे थे सबको चैतन्य हो ऐसा आशीर्वाद दिलवा रहे दे रहे थे सबको कोई किसी को दर्शन हो रहा है किसी को अश्रु पुलक रोमांच हो रहा है तब यही लड़के क्या करते थे ठाकुर के बिस्तर को धूप में सुखा रहे थे क्योंकि बहुत दिनों के बाद में ठाकुर बिस्तर छोड़कर के खड़े हुए हैं तो जितना जल्दी यह सब क्लीन हो जाए जो डैंप हो गया है धूप में रखेंगे तो बदबू चली जाए। जितना जल्दी हो इतना सब कुछ सेवा निपटा देना है। तो वे लोग वहां पर धूप पे छत के ऊपर में धूप में बिस्तर सुखा रहे हैं। कोई झाड़ू लगा रहा है। कोई मां को हेल्प कर रहा है। तो वो थे त्यागी संतान। और यह थे सब भाव और दर्शन वाले जो कि वो ठाकुर के आसपास में नृत्य कीर्तन कर रहा है। ठाकुर ने वो जो स्पर्श कर दिया तो इष्ट दर्शन कर रहा है। आखिर में हुआ क्या? हमको पता है ऐसा नहीं है कि रामलाल दादा है या जो बाकी गृहस्थ भक्त वहां पे थे रामबाबू या गिरीश घोष वगैरह उनके जीवन में आध्यात्मिकता नहीं थी वो तो कहां उच्च आध्यात्मिक शिखर पे सवार थे किंतु कंपेयर टू वही शशि शरद लाटू हरि काली शारदा कंपेयर टू धेम वे लोग तो कुछ नहीं है ये त्यागी संतानों ने बादबाद में अपने जीवन में जो आध्यात्मिकता का जो फवारा उनके भीतर में हृदय में जो प्रकटा है उसकी तो बात ही अलग है। क्या सब म जगत को विजय करके उन्होंने काम किया है। शशि महाराज को साउथ इंडिया में भेजा। पूरे साउथ इंडिया में ठाकुर का नाम का प्रचार करना है। शारदा महाराज को हरि महाराज को विदेश में भेजा। कैलिफोर्निया में प्रचार करना है। काली महाराज न्यूयॉर्क में प्रचार करने को गए थे। शरद महाराज लंदन गए थे प्रचार करने को। बाद में अमेरिका गए थे। अखंडानंद जी ने कितनी सेवा की है वो अनाथ बच्चों की दुख दुष्काल जब पड़ता है तब कितनी सेवा की प्लेग के रोगियों की कितनी सेवा की तो इन्होंने तो जगत विजय कर लिया है सेवा करके रामकृष्ण संग में देखिए सेवा और त्याग यही है ठाकुर के अंतरंग होने का सीक्रेट बाकी आपके भीतर में भक्ति हजार हो भीतर में कितना ही दर्शन अश्रु पुलक होता हो घंटे घंटे भर तक दो-ती घंटे बैठ तक ध्यान करते हैं वह सब ठीक है। ठाकुर के प्रति संपूर्ण निष्ठा नहीं है और सेवा भाव यदि नहीं है तो ठाकुर का अंतरंग होना संभव नहीं। तो यह मास्टर महाशय जिस तरह से ठाकुर के पास में सीखते हैं और देखिए मास्टर महाशय का भी विनम्रता कितना है। जितना विनम्र होकर के उन्होंने ठाकुर से सीख प्राप्त की है। अभी ठाकुर तो क्या है स्पष्ट समझ में आता है कि उनसे उम्र में बड़े हैं। गुरु भाव में स्थित हो चुके हैं। और दर्शन भाव जो होता है देखकर के ही पता चलता है कि वह जगत वरेणीय है ऑलरेडी। किंतु नरेंद्र तो अभी लड़का है। मास्टर महाशय से उम्र में छोटा है। मास्टर महाशय से एजुकेशन में कम है। नरेंद्र था बीए। मास्टर महाशय थे एमए। तो पैसा की दृष्टि से भी सोशल उसकी स्टेटस की दृष्टि से भी मास्टर महाशय जो है नरेंद्र से ज्यादा बड़े हैं। इसके बावजूद मास्टर महाशय कितनी विनम्रता से नरेंद्र से भी यह सब कुछ सीखते हैं। तो जब नरेंद्र यह कहता है कि भाव होने से ही क्या बड़ा लोग हो गया। काली, शरद, शशि, शारदा यह सब गोपाल से कितने बड़े लोग हैं। इनका त्याग कितना है? और फिर गोपाल उनको मानता कहां था? ठाकुर को स्वीकार कहां करता था? तो मास्टर महाशय ने साथ-साथ में ही यह बात स्वीकार करके उन्होंने कहा तिन बोले छिलेन बोटे। उन्होंने कहा था ठीक ही है कि उन्होंने कहा भी था। उन्होंने अर्थात ठाकुर ने कि एकानंकार लोक नहीं है। यहां का आदमी नहीं है। ठाकुर बोलते थे तुम ही एकानंकार। किसी किसी को बोलते थे तुम यहां के हो। अर्थात कि ठाकुर के अंतरंग में से हो और किसी किसी को कहते थे कि वो यहां का नहीं है। अर्थात कि अंतरंग में से नहीं है। तब ठाकुर के तो खूब भक्ति को देखे छ। किंतु देखिए अभी मास्टर महाशय का दोनों ओर से एक तो है कि ठाकुर ने कहा भी था कि वह यहां का नहीं है। एट द सेम टाइम नृत्य गोपाल की ठाकुर पे भक्ति थी। यह भी तो है। माने यह डायलेमा जो है ठाकुर पे भक्ति थी एट द सेम टाइम अंतरंग नहीं थे। बहुत सारे लोग ठाकुर को भक्ति करते थे। रामलाल दादा सबसे बड़ा उदाहरण है। ऐसे बहुत सारे उदाहरण है। किंतु वे लोग कहीं ठाकुर के अंतरंग नहीं थे। ठाकुर की जी जान से सेवा करना अपने प्राण समर्पित कर देना उस लेवल का ठाकुर के साथ में इनका नाता नहीं था तो मास्टर महाशय भक्ति करते कहते प्रश्न करते हैं कि ठाकुर को तो खूब भक्ति करता था देखता था तो नरेंद्र पूछता है कि देखे छ आपने क्या देखा तो मास्टर महाशय कहते हैं जोखन प्रथम द जोखन प्रथम प्रथम दक्षिणेश्वर जाई जब मैं पहली पहली बार दक्षिणेश्वर में जा रहा था ठाकुर घरे भक्तों दे दरजार भेंगे गले पर ठाकुर घोरे भक्तों दे दरबार भेंगे गले पर अर्थात कि ठाकुर के घर में जो भक्त लोग इकट्ठा हुए थे ठाकुर के कमरे में जो भक्त लोग इकट्ठा हुए थे वो भक्तों का दरबार वो भक्तों का दरबार जब बिखर गया सब लोग भक्त बाहर जा गए कोई इधर गया कोई उधर गया उसके बाद में घोड़े बाहिरे ऐसे एक दिन देखलाम घर के बाहर आकर करके एक दिन देखा गोपाल हाटू गड़े बागाने लाल सुरकीर पोथे हाथ जोड़ कोरे आ गोपाल अपने घुटनों के बल बागान में जो लाल जो ईंटों का रास्ता है उसके ऊपर में घुटनों के बल ठाकुर के सामने हाथ जोड़ करके बैठा है ठाकुर सेखाने दाढ़ी है ठाकुर उसके सामने ही खड़े हैं खूब चांदेर आलो बहुत चांद का प्रकाश है ठाकुर घरे ठीक उत्तरे जे बारंदाटी आे तारेई ठीक उत्तर गाए लाल सुर की रास्ता ठाकुर के घर के उत्तर के उत्तर दिशा में जो वरांडा है उसके उत्तर दिशा में लाल जो ईंट है उसका रास्ता है लाल रे मिट्टी का रास्ता मिट्टी या तो ईंट जो भी है सुरकी का अर्थ वो रास्ता है सीखा ने आर केऊ छिलोना वहां पे और कोई नहीं था बोध हो जेनो गोपाल शरणागत होए छ और ठाकुर आश्वास दी लग रहा था जैसे कि गोपाल शरणागत हुआ है और ठाकुर आश्वासन दे रहे हैं। देखिए मास्टर महाशय जब चित्र का वर्णन करते हैं ना कोई सीन का वह जैसे कि वह नाट्यकार नाटक लिखता है तो क्या है कि अभिनेताओं को अभिनय करने में सुविधा हो इस तरह से सब वर्णन करता है कौन किस डायरेक्शन में मुंह करके बैठा है कौन किस पोजीशन में बैठा है खड़ा है और फिर यह कौन किस तरह का लाइटिंग है किस तरह का स्टेज सेट करना है जिससे कि डायरेक्टर जो है उसको पता चले कि किस तरह से स्टेज सेट करना है तो मास्टर वहां से भी भविष्य में इसके ऊपर पर में मूवी बने, टीवी सीरीज बने, एनिमेशन बने इस तो परफेक्ट जैसे कि वह बने इस तरह से लिखते भी है उस तरह से वर्णन भी इस तरह से करते हैं। क्या कहते हैं? जब मैं पहली पहली बार दक्षिणेश्वर गया था तब ठाकुर के घर में ठाकुर के कमरे में बहुत सारे भक्तों का समावेश हुआ था। भक्तों का दरबार लगा था। किंतु जैसे ही यह दरबार टूट गया और सब भक्त बिखर गए। तब मैं घर के बाहर आकर के देखा ठाकुर के कमरे के उत्तर दिशा में जो वरांडा है उसके सामने एक लाल लाल रंग का लाल मिट्टी का रास्ता है। उसके ऊपर में यह गोपाल घुटनों के बल बैठा है। हाथ जोड़ करके और ठाकुर सामने खड़े हैं। चांद का प्रकाश है और ठाकुर जैसे कि गोपाल की शरणागति को स्वीकृत करते हैं और गोपाल को आश्वासन देते हैं। नरेंद्र आमी देखी नहीं। नरेंद्र कहता है मैंने तो यह देखा नहीं है और उसके उत्तर में मास्टर वहां से कहते हैं आर माझे माझे बोलते और परमहंस अबोस था और बीच-बीच में बोलते कौन बोलता ठाकुर बोलते हैं कि उसकी परमहंस अवस्था है किसकी यही नृत्य गोपाल की तबे एो बेश म किंतु यह भी स्पष्ट मुझे याद है ठाकुर ताके मे मानुष भक्त दे काछे आना गोना करते बारण करे छ ठाकुर ने गोपाल को स्त्री भक्तों के पास में जाने से यातायात करने से निष निषेध किया था मना किया था अनेक बार सावधान कोरे दी लेन बहुत बार सावधान करके रखा था क्या कहा था ओरे साधु सावधान [गला साफ़ करने की आवाज़] ठाकुर कहते हैं अरे साधु सावधान गोपाल को कहते हैं एक आध बार जावी माने वो ठाकुर पहले तो पूछते हैं गोपाल को अच्छा वो तुम क्या उसके घर जाते हो तो गोपाल बिल्कुल बच्चे की तरह उत्तर देता है जाई निए जाए मैं जाता हूं वह मुझे ले जाती है अर्थात जिस स्त्री भक्त के घर गोपाल जाता था उस त्रिभक्त का गोपाल के ऊपर में मातृभाव था तो ठाकुर कहते हैं साथ-साथ में ही अरे साधु सावधान एक आध बार जावी अरे साधु सावधान एक दो बार जाना यही मातृ भाव बाद में तत्क्षिल्य भाव में परिणत हो जाता है वात्सल्य भाव बाद में त्क्षिल्य भाव हो जाता है तो ठाकुर ने स्पष्ट गोपाल को इस तरह से वार्निंग दी थी। अभी देखिए मास्टर महाशय के मन में दोनों सीन है। एक सीन है बड़ा ही सुंदर सुमधुर जिसका पेंटिंग भी करेंगे तो बहुत सुंदर पेंटिंग होगा। चांद का प्रकाश है। लाल ईंट का रास्ता है। गोपाल ऐसा घुटनों के बल हाथ जोड़ के बैठा है। ऊपर देख रहा है। ठाकुर की ओर ठाकुर समाधि में है। ठाकुर की चारों ओर यह प्रकाश का पुंज वो बिखर रहा है। और ठाकुर आशीर्वाद दे रहा है। पेंटिंग करने को जाएंगे तो कितना सुंदर पेंटिंग होगा। तो यह सीन भी मास्टर महाशय को याद है। किंतु जब यह नरेंद्र यह कहता है कि वह त्याग नहीं है उसके भीतर में दूसरा कि ठाकुर का अंतरंग नहीं है तो फिर साथ-साथ में ही मास्टर महाशय को दूसरा भी सीन याद आ जाता है कि ठाकुर स्पष्ट रूप से गोपाल को चेतावनी देते हैं कि साधु सावधान। तो मास्टर महाशय के मन में सब सीन है। किंतु नरेंद्र जो है नरन इसका तात्पर्य समझाता है। ये जो विभिन्न विभिन्न दृश्य विभिन्न घटनावली विभिन्न वार्तालाप जो मास्टर महाशय ने कलेक्ट किए हैं उसको किस तरह से हाउ टू मेक अ सेंस आउट ऑफ इट। माने यह वार्तालाप से ना ऐसा लगता है कि भविष्य में कथामृत जो लिख लिखने वाले हैं मास्टर महाशय उसका एक सेंस ओवरऑल सेंस नरेंद्र जैसे कि मास्टर महाशय को दे रहा है भले ही चाहे आप ठाकुर के भाव दर्शन सिंह विक्रम से नृत्य करते हैं भावे गोरो मतवारा भावे हाश का दे नाचे गाए ये जो सब वर्णन जो मास्टर महाशय करने वाले हैं एट द सेम टाइम नरेंद्र जैसे कि मास्टर महाशय को समझाता है कि सबके फाउंडेशन के रूप में त्याग है ठाकुर का। यह बात जैसे कि मास्टर महाशय ना भूले। सो इट्स वेरी इंटरेस्टिंग। यह सब वार्ता मुझे लगता है कि मास्टर महाराज ने जानबूझकर ये सब वार्तालाप लिखे हैं, नोट किए हैं जिससे कि भविष्य में हम समझ पाए कि कथामृत जिस तरह से शेप हुआ है, उसमें ठाकुर का जितना हाथ है, नरेंद्र का भी इसमें हाथ है। ठाकुर कुछ बात होती है तो फिर मास्टर महाशय को पूछते हैं। अच्छा तुम ये बात समझे तो? क्या क्या समझे? बताओ। फिर मास्टर महाशय रिपीट करवाते हैं। किसी के साथ में कोई साधक के साथ में हिंदी में वार्तालाप हो रहा है तो ठाकुर उसका बंगाली ट्रांसलेशन करके मास्टर महाशय को कहते हैं जिससे कि मास्टर महाशय कुछ मिस ना कर पाए या तो फिर मिसअंडरस्टैंडिंग ना कर ले। अच्छा इसके बाद जो है वह अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम जय ओम