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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 5 June 2025

Invocation

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का भारत में दिए हुए भाषणों में से एक माय प्लान ऑफ कैंपेन जिस पॉइंट का हम पाठ कर रहे थे जिसके बारे में हम चर्चा कर रहे थे। उसका नाम है ग्लोबल वेदांत। यह पॉइंट सब मैंने दिए हैं। टाइटल्स टेक्स्ट इसमें जो है वह पूरा स्वामी जी का है। यह पॉइंट हमने कल थोड़ा सा देखा था। आज मैं फिर से उसको एक बार पढ़ लेता हूं। क्या बात हुई? स्वामी जी ने पहले तो हमको कहा कि यह जो हमारा भारतवर्ष है यहां पर किसी भी गांव में जहां तक रोटी का एक टुकड़ा भी अवेलेबल है एक भी भिखारी भूखे नहीं मरेगा। कोई भी कांगाल भूखे नहीं मरेगा। तो यह और स्वामी जी का खुद का यह था अनुभव कि पूरे भारतवर्ष में उन्होंने प्रवरज्या करके यह देखा कि जहां पर भी जाते हैं उनको सम्मान मिला है। वह चाहे गरीब की कुटिया ही क्यों ना हो और राजा का महल ही क्यों ना हो। वो दीवान हो ना कि प्राइम मिनिस्टर हो ना कि एक किसान हो ना कि एक गृहिणी हो। सभी ने स्वामी जी को सम्मान दिया है। स्वामी जी के लिए जो भी हो सके मदद की है। तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि यह जो अपना भारतवर्ष है इसमें दान की कोई कमी नहीं। तो आओ हम यह ज्ञान दान यह पूरे विश्व में फैलाए। क्या कहते हैं? इन दिस लैंड ऑफ चैरिटी लेट अस टेक अप द एनर्जी ऑफ द फर्स्ट चैरिटी। द डिफ्यूजन ऑफ स्पिरिचुअल नॉलेज एंड दैट डिफ्यूजन शुड नॉट बी कनफाइंड विद इन द बाउंड्स ऑफ इंडिया। इट मस्ट गो आउट ऑल ओवर द वर्ल्ड। इस भारत दान की पवित्र भूमि में आओ हम ज्ञान दान को पूरा प्रचार करें। और सिर्फ प्रचार भारत में ही नहीं पूरे विश्व में करें। दिस हैज़ बीन द कस्टम। दोज़ दे टेल यू दैट इंडिया थॉट इंडियन थॉट नेवर वेंट आउटसाइड ऑफ इंडिया। दोज़ दे टेल यू दैट आई एम द फर्स्ट सन्यासीन हु वेंट टू फॉरेन लैंड्स टू प्रीच डू नॉट नो द हिस्ट्री ऑफ देयर ओन ड्रेस। यह सनातन काल से चली आई हुई प्रथा है। यदि आपको कोई यह कहता है कि भारतीय विचार, भारतीय सनातन धारा, भारतीय वेदांत और योग, भारतीय धर्म यदि दूसरे विश्व में जाकर के फैले नहीं है तो उनको उनके खुद के देश की अपने खुद की जाति की हिस्ट्री, इतिहास नहीं पता है। यदि कोई ऐसा कहता है कि मैं सबसे पहले सन्यासी सबसे पहला सन्यासी हूं जिसने विदेश में जाकर के हिंदू धर्म का प्रचार किया तो उनको भी नहीं पता है कि भारत का इतिहास क्या है। अगेन एंड अगेन दिस फिनोमिनन हैज़ हैपेंड। बार-बार यह होता आ रहा है व्हेनएवर द वर्ल्ड हैज़ रिक्वायर्ड दिस पेरेनियल फ्लड ऑफ स्पिरिचुअलिटी हैज़ ओवरफ्लोड एंड डल डल्यूज्ड द वर्ल्ड। बार-बार ऐसा आ रहा होता आ रहा है। जबजब कि अधर्म विश्व में फैला है तब तक भारत में से यह धर्म रूपी अमृत की महा तरंगे पूरे विश्व में फैल करके पूरे विश्व को अमृत के सागर में जैसे कि नहा दे रही है। गिफ्ट्स ऑफ स्पिरिचुअल नॉलेज कैन बी मेड वि द ब्लास्ट ऑफ ट्रंप गिफ्ट्स ऑफ पॉलिटिकल नॉलेज कैन बी मेड वि द ब्लास्ट ऑफ ट्रंपेट्स इन द मार्च ऑफ कोहर्ट्स। यदि आपको किसी को पॉलिटिकल नॉलेज देना है कि हमारे पास में डेमोक्रेसी है या हमारे पास में कम्युनिज्म है ना कि हमारे पास में फासिज्म है ना कि हमारे पास में यह इज्म है वो इज्म है यह पॉलिटिकल थ्यरी है जो कि आपको चाहिए आपको लेनी होगी आप लेंगे तो इससे आपका अच्छा होगा तो इस तरह का नॉलेज इस तरह का इन्फ्लुएंस जिसको हम आजकल कहते हैं वह हमेशा एक हार्ड मिलिटरी पावर से ही फैलता है। यह जैसे आजकल की लैंग्वेज में वह कहते हैं ना सॉफ्ट पावर और हार्ड पावर। यह सॉफ्ट पावर क्या है? तो यह अपना कल्चरल इन्फ्लुएंस है। जैसे कि यह हॉलीवुड का कल्चरल इन्फ्लुएंस है। या तो फिर यह बॉलीवुड और क्रिकेट का कल्चरल इन्फ्लुएंस है। बहुत सारे लोग देखेंगे गल्फ कंट्रीज में जाएंगे, सेंट्रल एशिया में जाएंगे, अफ्रीका में जाएंगे। बहुत सारे लोग हमारी बॉलीवुड की मूवीज देखते हैं और फिर मैं एक बार एक आर्टिकल पढ़ा था मैंने पाकिस्तान से किसी ने लिखा था वो एक ऑथर है पाकिस्तान का वो कंप्लेन कर रहा है क्या कि हमारे लड़के यह बॉलीवुड का मूवीस देखदेख कर के यह मंदिर मस्जिद को मंदिर कहते हैं। फिर यह जो नमाज वगैरह जो होता है उसको पूजा और आरती कहना शुरू कर दिया है। यह किस तरह का डेंजरस इन्फ्लुएंस बॉलीवुड यहां पे लेके आता है। तो देखिए कि यह सॉफ्ट पावर जिसको आजकल कहते हैं, वह सॉफ्ट पावर यह कल्चरल इन्फ्लुएंस यह पूरा भारत में अह यदि आपको हार्ड पावर फैलाना है तो हमेशा अभी जैसे कि यह कम्युनिज्म है। कम्युनिज्म हमेशा हार्ड पावर से फैला है। सोवियत यूनियन को अफगानिस्तान पे अटैक करना पड़ा। अफगानिस्तान पे आर्मी अफगानिस्तान में आर्मी भेजनी पड़ी। क्यों? वे लोग चाहते थे कि वहां पे कम्युनिज्म आए। सोवियत यूनियन ने या तो फिर उस समय के रशिया ने जितने भी ईस्ट एशियन कंट्रीज हैं वह पोलैंड हो ना कि जेको जेकोस्लोवाकिया हो ना कि फिर यह आज का यूक्रेन है। ये जितने भी ईस्ट एशियन कंट्रीज है उस ईस्ट जर्मनी उस समय का वहां पे कम्युनिज्म फैलाने के लिए अपनी-अपनी आर्मीज़ भेजी थी। यह हिटलर और स्टालिन इन दोनों में यह पैक्ट हुआ था कि आधा पोलैंड यह ले लेगा, आधा पोलैंड वह ले लेगा। फिर दोनों ने उसके ऊपर में हमला किया और आपस में उसको काट करके खा गए। तो यह यदि आपको अपनी जो पॉलिटिकल विचार सरणी है, पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस है अभी जैसे ये फ्रेंच रिवॉल्यूशन है तो फ्रेंच रिवॉल्यूशन का सेंट्रल आईडिया क्या था? यह जो राजा लोग हैं उसका मर्डर कर दो और ये जो लोगों की ये जो जनता की आवाज है, जनता की सरकार है उसको फैलाओ। तो अभी आपको जनता की सरकार ना कि ये फिर यह इक्वलिटी लिबर्टी यह सब वैल्यूस को फैलाने के लिए आपको मिलिट्री लेकर के दूसरे देशों पे हमला करना होगा। जोर जबरदस्ती करके यह सब नई-नई गवर्नमेंट सिस्टम उनके ऊपर में थोप देनी होगी। तो यह इसीलिए नेपोलियन ने इतना सारा युद्ध किया। जहां पे भी जाएगा वह राजा को हटा के जनता की सरकार बनाने का पहले सपना देखता था। बाद बात बाद में नहीं बाद में वह प्योर पूरा पावर ग्रेबिंग हो गया था उसका तो जो भी है यदि आपको अपनी पॉलिटिकल सिस्टम को फैलाना है कम्युनिज्म फैलाना है ना कि ये फ्रेंच रिवोल्यूशन फैलाना है तो आपको पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस आर्मी के द्वारा हार्ड पावर के द्वारा ही होगा यह स्पिरिचुअल इन्फ्लुएंस है कल्चरल इन्फ्लुएंस है जो कि सॉफ्ट पावर के द्वारा होगा और यह सॉफ्ट पावर के बारे में स्वामी जी क्या कहते हैं स्पिरिचुअल नॉलेज कैन ओनली बी गिवन इन साइलेंस लाइक द ड्यू दैट फॉल्स अनसीन एंड अनहर्ड येट ब्रिंगिंग इनू ब्लूम मासेस ऑफ रोज ये जैसे कि सुबह की ओस गुलाब के ऊपर में गिरती है और कितना शांति से कितना सहजता से कितना सरलता से गुलाब को परिपुष्ट करती है वैसे ही यह सॉफ्ट पावर इन्फ्लुएंस यह कल्चरल इन्फ्लुएंस या तो फिर यह स्पिरिचुअल डिसमिनेशन ऑफ द टू ऑफ द ग्रेटेस्ट आइडियाज ऑफ इंडिया भारत के जो दो सर्वश्रेष्ठ कंट्रीब्यूशन है इस जगत को वेदांत और योग इसका फैलावा इसका प्रचार आपको एक इस तरह से जो सुबह को ओस गिरती है इसी तरह से साइलेंटली करना होगा। दिस हैज़ बीन द गिफ्ट ऑफ इंडिया टू द वर्ल्ड अगेन एंड अगेन। भारत ने यह गिफ्ट पूरे विश्व को बार-बार दी है। यह पहले जो कि उस समय में ग्रीक या एरिस्टोट ग्रीस में ये एरिस्टोटलल प्लेटो वगैरह थे उस समय उन्होंने यह जो उपनिषद है उसका नॉलेज इस वहां तक फैला था। ग्रीस तक गया था। इसके बाद में यह बुद्धिज्म है। तो बुद्धिज्म जैसे स्वामी जी ने कहा ना कि आपने कैसे सोच लिया कि मैं सबसे पहला सन्यासी हूं जिसने विदेश में जाकर प्रचार किया। बौद्ध सन्यासियों ने पूरे विश्व में घूमकर के बुद्धिज्म का प्रचार किया था। हमको पता है कि अफगानिस्तान में भी बुद्धिज्म था। वहां पर भगवान बुद्ध की कितनी सारी मूर्तियां है और फिर यह ईस्ट एशिया में भी बुद्धिज्म फैला और यह पूरे विश्व में माने जहां तक वो अपनी अंडरस्टैंडिंग थी। यह नॉर्थ अमेरिका, साउथ अमेरिका उस समय खोजे नहीं गए थे। यह एशिया और यूरोप और यह नॉर्थ अफ्रीका इतना कनेक्टेड था तो सब जगह पर बुद्धिज्म फैला था। व्हेनएवर देयर हैज़ बीन

जब भी विश्व जुड़ा, भारत ने आध्यात्मिकता का प्रकाश फैलाया

अ ग्रेट कॉनकरिंग रेस ब्रिंगिंग द नेशंस ऑफ द वर्ल्ड टुगेदर मेकिंग रोड्स एंड ट्रांजिट पॉसिबल इमीडिएटली इंडिया अरोज़ एंड गव हर कोटा ऑफ स्पिरिचुअल पावर टू द सम टोटल ऑफ द प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड। यह बड़ा ही पावरफुल स्टेटमेंट है। जबजब कि कोई एक महान विजेता प्रजा महान विजेता रेस जिसका कि उदय होता है जो कि पूरे विश्व को अपनी आर्मी के द्वारा कंकर करके जीत करके विश्व के देशों को साथ में ले आती है और विश्व के देशों के बीच में रोड्स एंड ट्रांजिट यह ट्रांसपोर्टेशन के साधन उपलब्ध करवाती है। साथ-साथ में ही भारत का उदय होता है और इसी रोड्स और इसी लेंस और इसी कम्युनिकेशन के माध्यम के द्वारा वो अपनी स्पिरिचुअलिटी अपनी आध्यात्मिक शक्ति को पूरे जगत में प्रसार करता है। पूरे जगत का जो विकास है उसमें यह अपना कंट्रीब्यूशन करता है। देखिए कितना पावरफुल इंसाइट है यह हिस्ट्री के बारे में। यह जो स्वामी जी को मैं पहली पहली बार पढ़ रहा था और जिसजिस स्वामी जी की इंसाइट ने मुझे एकदम जैसे कि उनका फॉलोअ बना दिया उसमें से यह एक ग्रेट इंसाइट है। देखिए कि उस समय में आप बुद्धिज्म के समय में देखेंगे तो ईस्ट एशिया और यूरोप इन दोनों के बीच में यह ट्रेड रूट था जिसको कि आजकल हम सिल्क रूट कहते हैं। यह चाइना से या तो फिर नॉर्थ इंडिया से यह सिल्क के वस्त्र है। वह सब ऊंट के ऊपर में कैमल के ऊपर में बिठा करके बड़े-बड़े कारावान जो होते हैं वो ईस्ट एशिया से पूरे सेंट्रल एशिया क्रॉस करके फिर यह मिडिल ईस्ट क्रॉस करके एशिया माइनर उस समय जिसको कि कहते थे मिडिल ईस्ट को। उसको क्रॉस करके यह ग्रीस है या फिर रोम है या तो फिर यह इवन वेस्टर्न यूरोप है वहां तक जाते थे। तो यह पूरा जो सिल्क रूट था ये सिल्क अभी वेस्टर्न यूरोप उस समय कोई इतना डेवलप नहीं था। वहां पे इसका खरीदने वाले भी इतने ज्यादा नहीं होंगे। उस समय एशिया माइनोर वो खिलाफत यानी कि मुस्लिम राजाओं का खैर उस समय इस्लाम भी नहीं था। तो किंतु ये जो वहां के राजा जो थे खास करके मेसोपोटेमियन सिविलाइजेशन है ये आज का इराक है या तो फिर ये पर्शियन एंपायर था उस समय जो कि आज का ईरान है तो ये सब बड़े ही वेल्थी कंट्रीज थे वेल्थी सिविलाइजेशंस थी तो वे लोग ये सब खरीदते थे तो ये जो पूरा ईस्ट एशिया को एशिया माइनर तक जो लिंक करता है वो रूट स्पाइस रूट उस स्पाइस रूट के माध्यम सिल्क रूट उस सिल्क सिल्क रूट के माध्यम से यह पूरा बुद्धिज्म फैला था। यह बौद्धि धर्म जिसने कि चाइना में बुद्ध धर्म का प्रचार किया और यह फिर इतने कितने सारे जो कि नागार्जुन वगैरह जो कि भारत में जिनका जन्म हुआ है ब्राह्मण शरीर था। उसके बाद में भी उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया। बौद्ध धर्म के जो सिद्धांत है बेसिक थ्यरीज एंड प्रिंसिपल्स है उसका डेवलपमेंट किया। थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क डेवलप की और फिर वही थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क कितने सारे मिशनरी साधुओं ने भिक्षुओं ने सिल्क रूट के माध्यम से ईस्ट एशिया यानी कि चाइना है, मंगोलिया है। वहां से लेकर के यह सेंट्रल एशिया और एशिया माइनर तक इसको फैलाया। तो यह भारत का सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन था। नॉर्थ यानी कि या तो फिर कहेंगे कि सेंट्रल एशिया में यदि सिल्क रूट था तो फिर यह साउथ एशिया में एक सी लेन था जिसको कि स्पाइस रूट कहते हैं। यह जो मलेशिया है, इंडोनेशिया है, जावा है, सुमात्रा है, यह थाईलैंड है, म्यांमार है। वहां पे जो स्पाइस प्रोडक्शन होता था उस स्पाइस प्रोडक्शन को जहाज में बिठा करके यह लोग भारत होते हुए फिर यह वही परशिया है या तो फिर यह वही ये एशिया माइनोर है या तो फिर उस समय की ये जो ग्रीक और रोमन सिविलाइजेशन थी नॉर्थ अफ्रीकन सिविल स्टेट्स जो सब थे देश थे वहां तक ये पूरा इन्फ्लुएंस बुद्धिज्म का फैला था। यानी कि बुद्धिज्म था सर्वप्रथम मिशनरी रिलीजन जिसका कि भारत के बाहर में इसको कि सिस्टमैटिक प्रचार हुआ था। इसके पहले की वैदिक सिविलाइजेशन देखें तो देखिए आज भी हमको पता चलता है कि यही साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज है जिनमें कि ये वैदिक सिविलाइजेशन का प्रचार हुआ था। किंतु जो अपनी वैदिक सिविलाइजेशन थी उन उसने यह कॉन्शियसली यह मिशनरी एप्रोच शायद नहीं अपनाया था। जैसे कि रामायण में हमको देखने को मिलता है कि भगवान राम साउथ इंडिया आते तो हैं किंतु उनका एक दूसरा मकसद था कि अपनी मां सीता का उद्धार करने के लिए रावण के हाथों से तो वो एक मकसद था कोई स्पेसिफिक एक नहीं था कि वो साउथ इंडिया जाकर के वैदिक सिविलाइजेशन या तो फिर यह वेदा का वेद का प्रचार करेंगे। शायद यह सब ऑटो ऑर्गेनिक आजकल जिसको कहते हैं ना कि ऑर्गेनिक और प्रमोशनल और ऑर्गेनिक दो तरह की आपकी पोस्ट फैलती है। यदि आप पैसा देकर के आप ऐड देकर के अपना वो पोस्ट है सोशल मीडिया पे उसको फैलाना चाहे और ऑर्गेनिकली यानी कि उसके भीतर में इतनी शक्ति है कि वो ऑटोमेटिक अपने से फैलेगी। तो यह ऑर्गेनिक डेवलपमेंट हुआ प्रचार हुआ था वैदिक सिविलाइजेशन का। ये जो भारत से बाहर भी जो गई वो सब ऑर्गेनिक डेवलपमेंट था। मुझे ऐसा नहीं लगता हिस्टोरिकल एनालिसिस करके देखना पड़ेगा। अनफॉर्चूनेटली भारत का जो वैदिक पीरियड है उसके बारे में स्कॉलरली जो रिसर्च है बड़ा ही रेयर और इनफ्रीक्वेंट है। म सब आइडियोलॉजिकल रिसर्च है जो कि भारत वैदिक प्रथा में ज्यादा मानते हैं। वे लोग कहेंगे सत्ययुग था। उस समय जो कुछ था सब कुछ अच्छा था। फिर ये एक वेस्टर्न लेफ्ट कम्युनिस्ट एक व्यू पॉइंट है। वे लोग कहेंगे कि भारत में वो सब ट्राइब्स वगैरह रहती थी और ट्राइब लोग आपस में झगड़ते थे। इसमें से ये महाभारत युद्ध लिखा गया है। तो यह एक्सट्रीम व्यू पॉइंट है अपने वैदिक सिविलाइजेशन के बारे में। एक प्रॉपर सिस्टमेटिक स्टडी हो एक बैलेंस एप्रोच लेकर के यह बड़ा ही आवश्यक है। तो जो भी है अभी भविष्य में कभी होगा। तो मेरा जो अभी का अंडरस्टैंडिंग है एडमिटेडली लिमिटेड मेरा जो अंडरस्टैंडिंग है वैदिक सिविलाइजेशन के बारे में तो मेरा मेरा ऐसा मानना है कि वह सब ऑर्गेनिक ग्रोथ था कोई एक सेंट्रल अथॉरिटी जिसने कि यह ठान लिया हो कि भारतीय संस्कृति का हिंदू संस्कृति वैदिक संस्कृति का प्रचार पूरे विश्व में करना है। जहां-जहां यह जहाज जाते हैं, जहां-जहां यह कारावांश जाते हैं, वह सब जगह पर हमको अपने प्रीचर्स भेजने हैं। कि मुझे ऐसा नहीं लगता कि ऐसा कोई कॉन्शियसली सोच के हुआ होगा। किंतु बुद्धिज्म जो है वो एकदम पक्का था कि ये अशोक और अशोक के बाद में भी जो कि ये पैटर्न्स थे क्षत्रिय पैटर्न्स थे बुद्धिज्म के उन्होंने इसका बड़ा कॉन्शियस प्रचार किया था। जिस तरह से क्रिश्चियनिटी का बड़ा कॉन्शियस सिस्टमेटिक प्रचार हुआ। यह जो वहां के जो एपररर्स ने किया था कॉनस्टेंटाइन से स्टार्ट हो के जिस तरह से इस्लाम का सिस्टमेटिक प्रचार हुआ था खलीफा वगैरह ने किया था इस तरह से अपना जो हिंदू धर्म है इसका इस तरह से कॉन्शियस प्रचार नहीं हुआ था एस फार एस आई नो किंतु जो ऑर्गेनिक प्रचार जो होना था ऑटोमेटिकली यह जो गुलाब दो तरह से यहां पे स्वामी जी कहते हैं एक तो जो ओस गिरती है गुलाब के ऊपर में तो गुलाब कैसे खिलता है किंतु एक बार गुलाब खिलता है तो जैसे ठाकुर कहते हैं ना मधुमक्खियां अपने से आकर के उसके ऊपर में मधुपान करने के लिए आ जाती है तो वैसे ही यह वैदिक संस्कृति रूपी गुलाब अपनी जो सुगंध है जो अपनी सुवास है फोरम है उसका जैसे ही प्रचार होना शुरू हुआ कितने ही लोगों ने वैदिक संस्कृति को अपनाया होगा तो वो जितनी ही बार यह विश्व को एक दूसरे कोने से एक कोने से दूसरे कोने के साथ में जोड़ा गया साथ-साथ में ही भारत ने जैसे कि अनकॉन्शियसली या कॉन्शियसली उसके भीतर में आध्यात्मिकता है उसका उदय होकर के पूरे विश्व में फैली। तो वह वैदिक संस्कृति का भी प्रचार इस तरह से हुआ, बुद्धिज्म का भी प्रचार इस तरह से हुआ और मॉडर्न एज में स्वामी विवेकानंद खुद स्वयं इसके बड़े एग्जांपल है कि जिस गनब्स जिसने कि पूरे सात समुंदर को ऊपर में विजय प्राप्त किया ब्रिटेन की उसी ब्रिटेन की यह जो मर्चेंटशिप में बैठकर के ना कि यह पैसेंजरशिप में बैठकर के स्वामी जी उसी ब्रिटेन में गए। उसी अमेरिका में गए और यही योग और वेदांत हिंदू सनातन संस्कृति का प्रचार उन्होंने विदेश में भी किया। तभी एक बात है जैसे स्वामी जी कहते हैं आप विदेश में प्रचार करने के लिए जाते हैं तो हमारी जितनी घरघर में जितनी भी सुपरस्टिशन है वह कलेक्ट करके नहीं जाना है। वहां पर प्रचार नहीं करना है। उनकी खुद की हजार सुपरस्टिशन है उसमें हमको बढ़ोतरी नहीं करनी है। हमारे जो सनातन ये जो फर्स्ट प्रिंसिपल है ये आत्मनो मोक्षार्थम या तो फिर कहेंगे महावाक्य देखिए अहम ब्रह्मास्मि उस वो महावाक्य का प्रचार आपको विश्व में करना है कि आत्मन का अमरत्व वो एक बहुत ही बड़ा एक मैसेज है जिसको कि हमको विश्व में फैलाना है। तो ये स्वामी जी ने इस तरह से अपने खुद ने ये इस तरह से मैसेज फैलाया और आज का मॉडर्न कॉन्टेक्स्ट में देखिए कि आज तो मींस ऑफ कम्युनिकेशन जिसको कहते हैं सबसे बड़ा यह कम्युनिकेशन का माध्यम क्या है? तो वो है इंटरनेट और इंटरनेट में भी आजकल है सोशल मीडिया और सोशल मीडिया में भी देखिए कि ये है YouTube है, Facebook है वगैरह जो कि सबसे ज्यादा पॉपुलर है तो आप आज फिर से वही इसी सोशल मीडिया पे इसी YouTube और Facebook पे हमारे जो साधु हैं और सिर्फ रामकृष्ण संघ के ही साधु नहीं किंतु और भी कितने ऑर्गेनाइजेशन है और भी कितने इंडिपेंडेंट स्पिरिचुअल टीचर्स हैं जो कि अपना मैसेज इस मॉडर्न जो माध्यम है उसके द्वारा फैलाते हैं। आज यह जो मोबाइल फोन, यह सोशल मीडिया, YouTube और Facebook और भी कितने जो सोशल मीडिया है आप देखिए कि सब जगह पे आपको हिंदू धर्म सर्च करने से या आपका इंटरेस्ट यदि थोड़ा सा भी होगा तो यह जो एल्गोरिदम है जो कि आपको रिकमेंड करता है बेस्ड ऑन योर टेस्ट। तो जो कंटेंट रिकमेंड करता है तो यह कंटेंट रिकमेंडेशन में आपको सीधा बहुत सारा हिंदू धर्म के बारे में हमारे वेदांत के बारे में प्रवचन ये जो योग के बारे में या तो फिर यह कथाएं जो चलती है राम कथा है ना कि भागवत कथा है सत्यनारायण की कथा है। कितना सब कुछ आपको मटेरियल देखने को मिल जाएगा। यानी कि जबजब भी यह मॉडर्न कम्युनिकेशन की मेथड्स ने पूरे विश्व को अपनी जाल में बुना है। पूरे विश्व में अपना पैर पसारा है। तो इसी कम्युनिकेशन के माध्यम से भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति या तो फिर यह उपनिषद और वेद की आध्यात्मिकता या तो फिर श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद साहित्य इसी माध्यमों से पूरे विश्व में फैला है।

पश्चिमी सभ्यता: भारतीय अध्यात्म के सैलाब का एक अवशेष!

दिस हैपेंड एजेस बिफोर बुद्धा वाज बोर्न एंड रेमिनेंट्स ऑफ इट स्टिल आर स्टिल लेफ्ट इन चाइना। ये बुद्ध के भगवान बुद्ध के जन्म के कितने सालों पहले भी युगों युगों पहले भी हुआ था। और यदि आप जाकर के देखेंगे चीन, जापान वगैरह में या तो फिर खास करके साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज में देखेंगे कि रामायण की कहानियों का कितना प्रचलन है। इन एशिया माइनोर एंड इन द हार्ट ऑफ मलेशियन आर्किपेलागो एशिया माइनोर यानी कि आज का मिडिल ईस्ट और यदि ये मलेशियन आर्किपेलागो यानी कि ये इंडोनेशिया मलेशिया वगैरह जो वो आइलैंड नेशंस है वो सब। दिस वास द केस व्हेन द ग्रेट ग्रीक कंकरर यूनाइटेड द फोर कॉर्नर्स ऑफ द देन नोन वर्ल्ड देन रस्ट आउट इंडियन स्पिरिचुअलिटी एंड द बोस्टेड सिविलाइजेशन ऑफ द वेस्ट इज बट द रेमिनेंट ऑफ दैट डल्यूज एक समय ये वही समय की बात है जबकि वो जो महान ग्रीक कॉनकरर था कौन था वो महान ग्रीक कंकरर तो वो था यह सिकंदर एलेग्जेंडर ये एलेग्जेंडर ने जैसे ही पूरे उस समय के ग्रीस से या तो फिर वहां से निकल कर के जैसे यह परर्शिया है उस समय का यह परर्शियन एंपायर आज का ईरान फिर यह अफगानिस्तान है फिर आज का जो पाकिस्तान है और फिर भारत है भारत की बॉर्डर्स तक वो आ गया था तो यह उस समय का जो नॉन वर्ल्ड कहते हैं उस जैसे ही उसने यह सब कम्युनिक रास्ते बनाए जिस तरह से उसने यह मींस ऑफ कम्युनिकेशन एस्टैब्लिश किए उसी रास्तों के माध्यम से बुद्धिज्म का प्रचार ग्री ग्रीस और रोम तक हुआ था। एंड देन रड आउट इंडियन स्पिरिचुअलिटी एंड द बोस्टेड सिविलाइजेशन ऑफ द वेस्ट इज बट द रेमिनेंट ऑफ द डल्यूज। उसी रास्तों से भारतीय हिंदू संस्कृति आध्यात्मिकता उसी रास्तों से वहां पर गई और आज की ये जो वेस्ट की जो सिविलाइजेशन है जिसको कि हम वेस्टर्न सिविलाइजेशन कहते हैं वो वही जो महा तरंग आध्यात्मिकता की स्पिरिचुअलिटी की महात तरंग भारत से निकली थी। उसी तरंग से परिपुष्ट होकर के आज की वेस्टर्न सिविलाइजेशन बनी है। देखिए यह एक बहुत बड़ा स्टेटमेंट स्वामी जी कहते हैं बोस्टेड यानी कि जिसको कि ऊपर में आपका बड़ा गर्व है कि हमारी वेस्टर्न सिविलाइजेशन आज की तो यह आज की वेस्टर्न सिविलाइजेशन और कुछ नहीं है। किंतु ये जो भारत की जो आध्यात्मिक धार्मिक तरंग थी उसी का एक जो एक रेमिनेंट यानी कि उसका एक अंश जो बचा हुआ था उसी अंश का यह परिणाम वेस्टर्न सिविलाइजेशन है। किस तरह से ये थोड़ा सा देखना होगा। देखिए कि वेस्ट में इस बात को कोई इतना एक्सेप्ट नहीं करेगा कि भारत से जो आध्यात्मिकता आई उस आध्यात्मिकता से परिपुष्ट होकर के आज की वेस्टर्न सिविलाइजेशन या तो फिर आज के ये फ्रांस जर्मनी ब्रिटेन या तो फिर ये रोम वगैरह-वगैरह ग्रीस उस समय के रोम और ग्रीस ये सब उस उसकी वजह से डेवलप हुए किंतु डायरेक्टली कोई एक्सेप्ट नहीं करेगा। स्पिरिचुअल इन्फ्लुएंस को भी शायद कोई एक्सेप्ट नहीं करेगा। किंतु जिसको कि जिस ब्रांच ऑफ नॉलेज है जिसको कि कहते हैं हिस्ट्री ऑफ साइंस। ये हिस्ट्री ऑफ साइंस कोई भी स्टैंडर्ड किताब आप पढ़ लीजिए तो ये सभी लोग एक्सेप्ट करते हैं कि इनिशियल जो आजकल हम देखते हैं कि विज्ञान का प्रारंभ कहां से हुआ? तो हम सभी लोग ग्रीस और रोम को क्रेडिट देंगे। जिसका कि हिस्टोरिकल नॉलेज इतना नहीं है। ग्रीस और रोम में सर्वप्रथम जैसे कि साइंस डेवलप हुआ मॉडर्न साइंस, फिलॉसोफी, थियोलॉजी, सुपरस्टिशियन ये सब सेपरेट होकर के एंपेरिकल वेरिफायबल साइंस है जो कि रैशनलिटी के बेस पे बना है जो कि मैथमेटिक्स के फाउंडेशन पे खड़ा है और प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट के माध्यम से जिसको कि प्रूव किया जाता है। यह एंपेरिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी का उद्भव उस समय ग्रीस और रोम में हुआ था। उसमें बीच में यह क्रिश्चियन जो एक डार्क एजेस आया मिडल एजेस उसमें इसका डेवलपमेंट थोड़ा सा रुक गया था और फिर जैसे कि गैलीलियो से फिर से जो प्रारंभ हुआ रेनेसा जिसको कहते हैं ये रेनेसा से प्रारंभ हो के यह पूरे वेस्टर्न यूरोप में फिर से वही ग्रीस और रोमन साइंस पूरे यूरोप में फैला और यूरोप ने अल्टीमेटली उसको डेवलप किया। तो यह थिंकिंग आजकल बड़ा प्रिवेलेंट है। किंतु कोई भी स्टैंडर्ड हिस्ट्री ऑफ साइंस की किताब खोल करके देख लीजिए। सभी लोग एक्सेप्ट करते हैं कि ये जो ग्रीस में ये आइडियाज कहां से आए? तो वो सब ग्रीस में आइडियाज आए हैं भारत से या तो फिर इजिप्ट से। इजिप्ट भी तो उस समय की पुरानी सिविलाइजेशन थी। ये जबकि हमारी ये गंजेटिक वैली सिविलाइजेशन या तो फिर ये सिंधु रिवर वैली सिविलाइजेशन थी हमारी। उस समय की यह इजिपशियन सिविलाइजेशन भी थी, मोसे मेसोपोटेमियन सिविलाइजेशन भी थी और यह हुवांगो रिवर वैली सिविलाइजेशन भी थी चाइना की। तो ये जो चार सिविलाइजेशन है जिसको कि सबसे पुरातन संस्कृति माना जाता है पृथ्वी पे। यानी जिसका कि आर्कियोलॉजिकल एविडेंस अवेलेबल है। तो उसमें से यह ग्रीस और रोम में जो साइंस और फिलॉसोफी का डेवलपमेंट हुआ यह स्टैंडर्ड कोई भी हिस्ट्री अह साइंस की किताब खोलेंगे तो वे लोग एक्सेप्ट करेंगे कि ये रोमन जो डेवलप ये जो इजिपशियन जो डेवलपमेंट था एस्ट्रोनॉमी में या तो फिर ये जो मेसोपोटेमिया का जो डेवलपमेंट था ये भारत का जो डेवलपमेंट था और चीन का जो था ये चारों जगह से नॉलेज इकट्ठा होकर के ग्रीस में इकट्ठा हुआ था। फिर वहां पर ऐसी सिचुएशन खड़ी हुई कि फिर वहां से यह साइंस का डेवलपमेंट ज्यादा हुआ। अभी देखिए हमको ग्रीस और रोम को खास करके ग्रीस को ग्रीस को हमको ये तो क्रेडिट तो देनी ही होगी कि चारों पूरे अब ये चार सिविलाइजेशन का नॉलेज है। उसको एक्सेप्ट करके कोई भी उसको डेवलप कर सकता था। किंतु और कहीं पे नहीं हो के खास करके ग्रीस में ही हुआ। तो वह तो उनको क्रेडिट जाता है क्योंकि जैसे हमने पहले भी डिस्कस किया ठाकुर खुद कहते हैं कि वो पंजीिका है यानी कि एक वो एक पंथ एक किताब है उसमें लिखा है प्रेडिक्शन कि ज्योतिष की किताब होती है ना तो उसमें लिखा है कि आज इतनी बारिश होगी किंतु किताब को आप कितना ही स्क्वीज़ कीजिए किताब को कितना ही तोड़ मरोड़ कीजिए उसमें से एक बूंद भी पानी नहीं गिरने वाली है। पानी तो गिरेगा आकाश से नहीं कि किताब से। तो यहां पर भी ऐसा है साइंस है, फिलॉसोफी है, स्पिरिचुअलिटी है। वह सब तो रहता है मनुष्य के भीतर में। किताब में आप हजार उसको लिख दीजिए। उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। तो जो नॉलेज था इसको इकट्ठा करके उसको कंबाइन करके उसको रिशेप करना। मॉडर्न नेसेसिटी के अनुसार नए मॉडर्न आइडियाज को डेवलप करना। दैट क्रेडिट गोज़ टू द ग्रेस। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु उसका जो इनिशियल जो किक स्टार्ट जो हुआ था, इनिशियल पॉइंट ऑफ इग्निशन था, इनिशियल जो स्पार्क मिला था, वो सब ये एंशिएंट सिविलाइजेशन के माध्यम से ही मिला था। तो यहां तक तो यह प्रूवेबल है कि जहां तक साइंस का प्रश्न है जिसको कि आज का यूरोप आज के जितने भी देखेंगे कि मैक्सिमम ये नोबेल प्राइज है फंडामेंटल साइंटिफिक डिस्कवरीज के वो सब यूरोप या अमेरिका को सबसे ज्यादा जाते हैं। वेस्टर्न सिविलाइजेशन को सबसे ज्यादा जाते हैं। उसके बाद में ये जापान है, कोरिया है वगैरह-वगैरह थोड़ा बहुत उनका नंबर आता होगा। किंतु ज्यादातर जाता है यूरोप और नॉर्थ अमेरिका को। तो यह उनका एक बहुत बड़ा एक मैटर ऑफ़ प्राइड है। मैटर ऑफ़ गर्व की बात है उन लोगों के लिए कि साइंस के सबसे बड़ी जो फ्रंट लाइन पे हम लोग खड़े हैं। अभी हालांकि चाइना का बड़ा रोल बढ़ रहा है धीरे-धीरे। किंतु अभी तक नोबेल प्राइज के लेवल तक उन्होंने इतना डेवलपमेंट नहीं किया है। जो जिसको कि रिसर्च पेपर है रे रेफरल जर्नल्स जो होती है जगत की खास करके ये नेचर है वगैरह जो स्टैंडर्ड रेफरल जर्नल्स है उसमें चाइना का जो ये जो है कंट्रीब्यूशन बहुत ज्यादा बढ़ गया है। किंतु जो फंडामेंटल रिसर्च जिसको कहते हैं जिसको जहां पे कि नोबेल प्राइज मिलता है उतना चाइना अभी तक वहां तक नहीं पहुंचा है। सो व्हाटएवर ये खास करके इट्स अ मैटर ऑफ प्राइड। यह बड़े वेस्टर्न यूरोप और नॉर्थ अमेरिका दोनों के लिए कि साइंस के सही-सही रखवाले हम ही लोग हैं। फंडामेंटल रिसर्च हम ही लोग करते हैं। फंडामेंटल अंडरस्टैंडिंग अबाउट द कॉस्मोस एंड नेचर हमारा ही सिर्फ है। तो किंतु वे लोग यह भी एक्सेप्ट करते हैं कि इनिशियल स्पार्क जो मिला था वेस्टर्न सिविलाइजेशन को ग्रीस में जो मिला था वो इस एंशिएंट सिविलाइजेशन की मदद से हुआ था। उन्होंने अपने आप यह सब कुछ जो ओरिजिनल जो स्टेट था अपने आप उन्होंने नहीं खोज निकाला। तो यह तो एक ट्रेसेबल बात है। किंतु यहां पर स्वामी जी एक दूसरा बड़ा क्लेम करते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि जैसे हमने कल देखा था कि कोई भी एक सिविलाइजेशन है या तो फिर कोई भी एक स्पीशीज है उसके सर्वाइवल के लिए उसके डेवलपमेंट के लिए तीन एस्पेक्ट होने जरूरी है। एक तो एस्पेक्ट है इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी यानी कि इंडिविजुअल मनुष्य का ईश्वर के साथ में या तो आत्मन के साथ में रिलेशन व्हाटएवर इज योर बिलीफ। तो वो एक इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी हो गई। दूसरा है कि सोशल लाइफ होती है, एंपैथी होती है, प्रेम होता है, भलोभाषा होता है। तो वह एक सोशल लाइफ एक दूसरा एस्पेक्ट है। और तीसरा एस्पेक्ट नो डाउट इज अ सिविलाइजेशनल स्टडीज जिसमें साइंस, आर्ट, फिलॉसोफी, स्पोर्ट, एथिक्स वगैरह सब कुछ इसमें आ जाता है। तो अभी सिविलाइजेशनल स्टडीज का रूट हमको पता है। ये यूरोप और अमेरिका माने वेस्टर्न सिविलाइजेशन इजीली एक्सेप्ट करता है कि हां वो ये जो चार ओरिजिनल सिविलाइजेशन थी उसमें से आया है। किंतु ये जो इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी है उसका इन्फ्लुएंस ये लोग और कहीं से स्वीकार नहीं करते। यह लोग कहते हैं कि ग्रीक में वो जो पैगनिनिज्म था यह पैंथेज्म था। यानी कि बहुत सारे गॉड्स एंड गॉडेसेस थे उनके जुपिटर यह वो वगैरह-वगैरह वो ओरिजिनल उनका था धर्म। उसके बाद में से कुछ-कुछ एलिमेंट्स वो इजिप्ट के आए थे। इजिप्ट की ये जो गॉडेस है आइसिस उसका थोड़ा बहुत इन्फ्लुएंस था। किंतु यह लोग सभी कहते हैं कि क्रिश्चियनिटी का रूट है जुडाइस्म में। और जुडाइज्म उसका बहुत पुराना इतिहास है। वह अपने आप में सफिशिएंट है। जुडाइज्म पहले कुछ-कुछ एलिमेंट्स इजिप्ट के आए हैं। क्योंकि कुछ जस लोगों को इजिप्ट में बंदी बना करके रखा गया था। तो इजिप्ट से वो वहां से निकल कर के ये प्रॉमिस्ड लैंड यानी कि आज का पेलेस्टाइन। ये वहां पे ये लोग आए इजराइल। तो वहां पे ये लोग आए। वहां पे उन्होंने अपने देश की स्थापना की। उन्होंने वहीं पर अपना धर्म डेवलप किया और फिर उसी में से जुडाइज्म में से आज का मॉडर्न क्रिश्चियनिटी का जन्म हुआ क्योंकि जीसस खुद और उनके जो ओरिजिनल एपोस्टल थे 12 और 13 वो सभी लोग तो जत थे और फिर उन्होंने धीरे-धीरे करके क्रिश्चियनिटी का फैलावा किया। तो यह उनका धर्म के बारे में मानना है। यहां पर स्वामी जी इतना बड़ा क्लेम करते हैं। कहते हैं कि यह जो ओरिजिनेशन था उनका जुडाइज्म का और या तो फिर यह ग्रीक पैंथेज्म का पेगनिज्म जिसको यह भी कहते हैं तो उसका ओरिजिन भी अपने उपनिषद में से भारतीय आध्यात्मिकता में से आया है। अभी इस तरह का कोई भी क्लेम यह लोग ऑफिशियली अनऑफिशियली स्वीकार नहीं करेंगे। मुझे याद नहीं आ रहा है कि मैंने ऐसा कोई स्टडीज पढ़ा हो कि जिसमें इस तरह का क्लेम किया गया हो। यह मॉडर्न वेदांतिक या तो उपनिषदिक इन्फ्लुएंस है। उसको मॉडर्न एज में एक्सेप्ट करने वाले आपको बहुत सारे लोग मिल जाएंगे कि हां वी आर इन्फ्लुएंस बाय योगा, वी आर इन्फ्लुएंस बाय वेदांता, वी आर इन्फ्लुएंस बाय उपनिषद। आज के युग में इसको एक्सेप्ट करने वाले बहुत मिल जाएंगे। किंतु यह लोग भी शायद यह क्लेम नहीं करेंगे कि अपने उपनिषद ने ओरिजिनल जुडाइज्म को या तो फिर ओरिजिनल पैंथेज्म को इन्फ्लुएंस किया हो। दैट इज अ मैटर ऑफ स्टडी एंड दैट इज अ मैटर ऑफ रिसर्च जो कि भारत को करना चाहिए। हमारे हम नहीं करेंगे तो हमारे अलावा और कौन करेगा? बुद्धिज्म का इन्फ्लुएंस तो जग जाहिर है कि आज जितने भी ईस्ट एशियन साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज है सब जगह पर बुद्धिज्म गया। भगवान बुद्ध को उन्होंने स्वीकार किया और फिर इसके माध्यम से ही उन्होंने अपना जो स्पिरिचुअल डेवलपमेंट है वह किया। अभी जापान में या तो चाइना में जो टेोज़्म या तो फिर ये शंटोइज़्म ये वगैरह जो था वो था वो ओरिजिनल था। किंतु ये लोगों को यह बात स्वीकार करने में बिल्कुल झिझक नहीं है कि बुद्धिज्म ही है जो कि उनके आध्यात्मिक जीवन की नींव है। बाकी सब जितने भी लोकल धर्म थे लोकल प्रैक्टिससेस थी। बुद्धिज्म सबको खा गया सबको कि जैसे कि अपने भीतर में एकीभूत कर दिया और फिर यह इंडीजीनियस बुद्धिज्म का वहां पर डेवलपमेंट हुआ। तो ये तो बुद्धिज्म का इन्फ्लुएंस जहां तक जाता है एवरीवन इज वेरी क्लियर कि हां ईस्ट एशिया साउथ ईस्ट एशिया खास करके कि हम लोग इससे इन्फ्लुएंस हुए हैं। किंतु उपनिषद या तो वेदांत ने पैंथेज्म या तो जुडाइज्म को इन्फ्लुएंस किया हो। इस तरह का स्टडी आई डू नॉट रिमेंबर दैट आई हैव रेड या तो फिर मैंने पढ़ा होगा तो मुझे याद नहीं व्हाटएवर तो वह एक बहुत बड़ा डिबेट का मैटर है ये बड़ा बहुत बड़ा इनफ स्टेटमेंट यहां पे स्वामी जी देते हैं कि दिस वाज़ द केस व्हेन द ग्रेट ग्रीक कॉनकरर यूनाइटेड द फोर कॉर्नर्स ऑफ द धेन नोन वर्ल्ड धेन रश आउट इंडियन स्पिरिचुअलिटी एंड द बोस्टेड सिविलाइजेशन ऑफ द वेस्ट इज़ बट द रेमिनेंट ऑफ द डल्यूज। जब भी यह एलेग्जेंडर ने ग्रीक को भारत के साथ जोड़ा, तो इसी रास्ते के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिकता वहां पे गई और आज की जो मॉडर्न वेस्टर्न सिविलाइजेशन है वो इसका अंश मात्र है। अच्छा देखिए यदि वैदिक इन्फ्लुएंस वे लोग स्वीकार नहीं करेंगे। बुद्धिस्ट इन्फ्लुएंस तो शायद उनको थोड़ा-बहत स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि यह एलेक्स एलेक्जेंडर के आने के समय तक यह भगवान बुद्ध का जो धर्म है वह अच्छे से वहां तक फैल गया था। एक्चुअली हमको वह विज़न भी स्वामी जी को हुआ था कि क्रीट वह जो यूरोप से भारत आ रहे थे जहाज में बैठ के तो मेडिटेरेनियन सी जो है वहां पर क्रीट बोल के एक आइलैंड है टापू है वहां पे शायद एक बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री हुआ करती होगी। तो स्वामी जी ने जब उनका जो जहाज है वहां से जा रहा था तो एकाएक उनको यह विज़न आया कि जीसस खुद वो बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री में स्टडी करने को गए हैं। तो यह स्वामी जी का विज़न था। तो इन दैट सेंस कि जीसस अभी देखिए कि बहुत सारे लोग जीसस के बारे में बहुत सारे क्लेम करते हैं। अब कुछ-कुछ क्लेम्स को स्वामी जी खुद रिजेक्ट कर देते हैं। जैसे कि एक रशियन एक्सप्लोरर था। वो कहता है कि जीसस आया था वहां पर हिमालय में किसी मोनेस्ट्री में स्टडी करने के लिए। या तो फिर तिबेट गया था और वहां की कोई मोनेस्ट्री में जीसस का चित्र भी है। तो यह त्रिगुणातिनंद जी ने ही मोस्ट प्रोबेबबली स्वामी जी को लिखा कि मैंने जीसस का चित्र इस मोनेस्ट्री में देखा है। तो स्वामी जी ने जो उसका रिप्लाई दिया वो बड़ा ही देखिए कि इट इज अ लेसन फॉर एवरीवन ऑफ अस जो कि इंडोलॉजी आजकल आजकल जिसको कहते हैं भारतीय इतिहास का स्टडी इंडोलॉजी जो लोग इंडोलॉजी को स्टडी करते हैं उन सबके लिए स्वामी जी का यह स्टेटमेंट जो है बड़ा ही इंपॉर्टेंट है। स्वामी जी ने उत्तर दिया जब ये त्रिगुणातिनंद जी मोस्ट प्रोबेबबली उनका जो लेटर था उसमें लिखा कि ये जीसस का चित्र उन्होंने देखा वहां की मोनेस्ट्री में तो स्वामी जी का उत्तर था कि तुम्हारी बुद्धि पर मुझे हताशा हो गई है। तुमने किस तरह से जाना कि वो घी का चित्र है। घिशु का नहीं है। माने घिशु माने कोई अदर पर्सन एनीवन ए बी सी डी आजकल जिसको कि टॉम डिकन हेरी कहते हैं इंग्लिश में। कोई भी एक अदर पर्सन का चित्र है। वो तुमको कैसे पता चला कि उसका नहीं है? कैसे तुमने मान लिया कि वो जीसस का ही चित्र है? तो दिस इज वेरीेंट। स्वामी जी कोई भी इस तरह से क्लेम करे कि हां जीसस यहां पे आया था। बुद्धिज्म या हिंदूइज़्म का स्टडी किया तो हम लोगों को बड़ा खुश होता। हम लोग बड़े खुश हो जाते हैं। अच्छा देखिए विदेशी लोग ऐसा कह रहे हैं। किंतु इफ यू आर ट्रूली अ स्टूडेंट ऑफ इंडोलॉजी इंडियन हिस्ट्री एंड ट्रेडिशन एंड कल्चर तो यह सब क्लेम्स को बड़ा ही क्रिटिकली इवैल्यूएट करना चाहिए। वेस्टर्न किसी भी लिटरेचर में यह प्रूफ नहीं है कि जीसस ने कभी भी यह पेलेस्टाइन से बाहर और कहीं पर गया होगा। तो हां उनका यह जो बचपन का जो दिन है या तो युवावस्था के दिन है उसके बारे में कुछ भी रिकॉर्ड नहीं है। यह बात एक्सेप्टेबल है किंतु साथ में यह भी रिकॉर्ड नहीं है कि वह एशिया माइनोर होकर के भारत तक आए थे या तिबेट तक गए थे। वो सब ऑल आर मैटर ऑफ स्पेककुलेशन। सो स्पेककुलेशन है उसको स्पेककुलेशन की दृष्टि से लेने हैं। वी आर फ्री टू क्लेम व्हाटएवर वी वांट टु क्लेम बट वी हैव टु बी वेरी रैशन अबाउट दैट आल्सो तो वह एक था कि स्वामी जी जैसे कि स्वामी जी का विज़न था कि यहां ग्रीक ग्रीट आइलैंड पे वो बुद्धिस्ट मुनेश्री में जीसस गए थे तो साथ-साथ में ही स्वामी जी इस वेरी क्लियर कि हां इस तरह से जो क्लेम करते हैं वो सब क्लेम गलत है या तो फिर उसको बड़ा ही क्लियर रैशनलिस्टिक दृष्टि से देखना चाहिए और एक क्लेम था उस समय का कि जीसस जगन्नाथ मंदिर में गए थे और वहां पे आइडोलेटरी देख के बड़े ही वो हताश हो गए। फिर तिबेटन मोनेस्ट्री में जाकर के बुद्धिज्म का स्टडी किया। तब उनको बड़ा अच्छा लगा। तो यह क्लेम के बारे में भी स्वामी जी कहते हैं कि इस तरह का जो क्लेम करता है उसको भारत का हिस्ट्री ही नहीं पता है। क्यों? क्योंकि उस समय तो यह जगन्नाथ का टेंपल हिंदू मंदिर था। बाद में इसको बौद्ध मंदिर था और बौद्ध टेंपल था। बौद्ध मठ था। और फिर बाद में इसको हिंदू लोगों ने अपना करके इसको जगन्नाथ का मंदिर बनाया था। तो आप ऐसा कैसे कह सकते हैं वो बुद्धिज्म में तो आइडोलेटरी नहीं है। नहीं होनी चाहिए आइडियली स्पीकिंग। तो आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि वो उस वो हिंदू मंदिर था वहां पे आइडोलेटरी थी। उससे निराश होकर के वो तिबेट चले गए। यह सब हिस्टोरिकली रैशनली प्रूफ नहीं होता है। तो स्वामी जी का यह जो रैशनलिटी की तलवार है दैट वी हैव टू कीप इन माइंड। जबकि हम यह इंडोलॉजी स्टडी करते हैं तो तो दैट इज वेरीेंट। यह स्वामी जी का स्टेटमेंट है कि हां भारतीय हिंदू आध्यात्मिकता ने यह वेस्टर्न सिविलाइजेशन को बड़ा ही डीपली इन्फ्लुएंस किया है। बट इस तरह के क्लेम्स के लिए आपको बड़ा ही रैशन रिसर्च और डेवलपमेंट करना पड़ेगा।

अंग्रेजों ने दुनिया को जोड़ा और स्वामीजी ने वेदांत का प्रसार किया

नाउ द सेम अपॉर्चुनिटी हैज़ अगेन कम। अभी यह फिर से यही अपॉर्चुनिटी भारत विश्व के सामने भारत के सामने आन खड़ी हुई है। द पावर ऑफ इंग्लैंड हैज़ लिंक द नेशंस ऑफ द वर्ल्ड टुगेदर एज वाज़ नेवर डन बिफोर। भारत का यह जो इंग्लैंड की जो शक्ति है, इंग्लैंड का नेवल पावर है, इंग्लैंड की टेक्नोलॉजी है, उसने इस जगत को इस तरह से जोड़ा है जो कि पहले कभी नहीं हुआ। इंग्लिश रोड्स एंड चैनल्स ऑफ कम्युनिकेशन रश फ्रॉम वन एंड ऑफ द वर्ल्ड टू द अदर। ये इंग्लिश रोड्स और चैनल्स ऑफ कम्युनिकेशन यानी कि टेलीग्राम है वगैरह-वगैरह टेलीग्राफ टेलीग्राफ है वगैरह-वगैरह वो विश्व के एक कोने से दूसरे कोने की तरफ ओर धंसता चला जा रहा है दौड़ा चला जा रहा है ओइंग टू इंग्लिश जीनियस द वर्ल्ड टुडे हैज़ बीन लिंक्ड इन सच अ फैशन एस हैज़ नेवर बिफोर बीन डन इस ये जो इंग्लिश जीनियस है इंग्लिश बुद्धि है इंग्लिश मेदा है उसकी वजह से आज का विश्व इस तरह से एकीकृत हो गया है। एक लिंक में जुड़ गया है जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ। टुडे ट्रेड सेंटर्स हैव बीन फॉर्म सच एज हैव नेवर बीन बिफोर इन द हिस्ट्री ऑफ मैनकाइंड। आजकल जिस तरह के ट्रेड सेंटर बने हैं, इस तरह के ट्रेड सेंटर्स मनुष्य जीवन के इतिहास में मानवता के इतिहास में पहले कभी बने नहीं थे। एंड इमीडिएटली कॉन्शियसली और अनकॉन्शियसली इंडिया राइजज़ एंड पोर्स फोर्थ हर गिफ्ट्स ऑफ स्पिरिचुअलिटी। और साथ-साथ में ही जानबूझकर के या अजानता वशतः भारत की आध्यात्मिकता है। उसने जागृत होकर के अपनी यह जो ज्ञान दान है पूरे विश्व में फैलाया है। एंड दे विल रश थ्रू दिस रोड्स टिल दे हैव रीच द वेरी एंड्स ऑफ दिस वर्ल्ड। और यह जो इंग्लिश चैनल्स ऑफ कम्युनिकेशन है इसके माध्यम से पूरे विश्व में फैल जाएंगे। स्वामी जी का जो वही फेमस स्टेटमेंट कि क्रिश्चियनिटी को फैलते हुए 300 400 साल लगे पूरे विश्व में किंतु यह रामकृष्ण रूपी महाशक्ति जो है श्री रामकृष्ण रूपी उसने ठाकुर की महासमाधि के 10 साल में ही पूरे विश्व में घूम गई है। किंतु यह जो श्री रामकृष्ण रूपी महाशक्ति जो है वो पूरे विश्व में जो फैली उसमें मीडियम क्या था? तो मीडियम था वही वो विश्व के द्वारा यानी कि ब्रिटेन के द्वारा जो कंस्ट्रक्ट की गई हुई यह जो सब टेलीग्राम की फैसिलिटी है या तो फिर यह मर्चेंटशिप है सी लेंस है ये सी लेंस के माध्यम से ही श्री रामकृष्ण रूपी महाशक्ति फैली है इस विश्व में तो और विदिन 10 इयर्स स्वामी जी ने पूरे विश्व का भ्रमण कर लिया था एंड लिटरली ट्रू कि ठाकुर की महासमाधि हुई 189 1886 में और स्वामी स्वामी जी जापान के माध्यम से अमेरिका गए। यानी कि सीधा वो तो पृथ्वी घूम ही लिया। तो वो वो हुआ था 1892 1893 में। तो देखिए कि विदिन 10 साल भी नहीं हां यानी कि यूरोप जाना बाकी था स्वामी जी के लिए जो कि वो गए थे 1895 90 उसके आसपास में। तो मोर और लेस एग्जैक्ट उनका जो यह स्टेटमेंट है परफेक्टली ट्रू है कि विदिन 10 इयर्स स्वामी जी ने यह ईस्ट एशिया है, जापान है, फिर वहां से लेकर के कनाडा है, अमेरिका है और यूरोप की यात्रा कर ली थी। बट यह संभव कैसे हुआ? क्योंकि यह सी लेंस जो है जिसका कि प्रोटेक्शन यह ब्रिटिश गवर्नमेंट करती थी। तो क्योंकि देखिए कि सिर्फ आप कहेंगे कि अच्छा इसमें कौन सी बड़ी बात है कि आपने जहाज बनाए हैं। जहाज में बैठकर के आप एक देश से दूसरे देश जा रहे हैं। कौन सी बड़ी बात है? वो तो पहले ये जो मुगल राजा थे या तो फिर ये जो ये परर्शियन एंपायर था वे लोग भी करते थे। उस समय भी तो जहाज चलते थे। उस समय भी ये अरेबिया या तो परर्शिया से भारत का ट्रेड लिंक था। तो ब्रिटेन ने ऐसा नया क्या कुछ कर दिया है? तो देखिए कि हिस्ट्री थोड़ा सा पढ़ेंगे तो समझ में आएगा कि यह जो जिसको कि पायरेट्स कहते हैं। आजकल पायरेट्स का इतना जोर नहीं है। अभी आजकल पायरेट्स आपको मूवी में ही दिखने को मिलेंगे। किंतु उस समय पायरेट्स का बड़ा जोर था और वे लोग जो भी जहाज आते जाते थे उस पर हमला करके लूटफाट करते थे। यात्रियों का मर्डर करते थे। तो ब्रिटेन ने वो जहाज जो जिसको ये जो समुंदर है उसकी रखवाली करने के लिए बहुत सारी ये जो गन बोट्स को डिप्लॉय किया था कि इसी वजह से यह जो कंटीन्यूअस फ्लो ऑफ ट्रेड कॉमर्स एंड पैसेंजर्स यह जो संभव हो पाया क्योंकि यह सी लेंस है उसको कि ब्रिटेन ने सेफ रखा था। आज के युग में भी आप देखिए कि पायरेसी वगैरह का यह जो प्रॉब्लम है तो बहुत सारे देशों ने इकट्ठा होकर के वो जो मेरिटाइम एग्रीमेंट्स है वो बनाए हैं। भारत की भी गन अपनी जो नेवल शिप्स है, चाइना की है, अमेरिका की है, बहुत सारे देशों की नेवल शिप्स वो अपने-अपने एरिया में इस तरह से सी लेन को प्रोटेक्ट करती है। तभी तो यह कॉमर्स संभव है। यह कॉमर्स जब तक यह प्रोटेक्शन नहीं रहता है तब तक कॉमर्स संभव नहीं। तब तक यह फ्री फ्लो ऑफ पैसेंजर्स संभव नहीं। तो यह ब्रिटेन का कंट्रीब्यूशन था और इसी कंट्रीब्यूशन और वही जो सी लेंस ब्रिटेन ने सेफ करके रखी थी उसी सी लेंस के माध्यम से स्वामी जी ने पूरे विश्व में योग और वेदांत का प्रचार किया। दैट आई वेंट टू अमेरिका वाज़ नॉट माय डूइंग और योर डूइंग बट द गॉड ऑफ इंडिया हु इज गाइडिंग हर डेस्टिनी सेंट मी एंड विल सेंड 100्स ऑफ सच टू ऑल द नेशंस ऑफ द वर्ल्ड। मैं अमेरिका गया उसमें मेरा कोई कर्तृत्व नहीं है ना ही आपका है कि आपने पैसा दिया तो मैं वहां पर गया। यह जो भारत के विधाता जो है उन्होंने मेरी डेस्टिनी यानी कि मेरा भविष्य उन्होंने मार्गदर्शित किया है। उन्होंने दोहरा है और उन्होंने मुझे भी भेजा। भारत के विधाता ने वैसे ही साथ में हजारों लोगों को सैकड़ों इस तरह के प्रीचर को पूरे विश्व में भेजेंगे। नो पावर और ऑन अर्थ कैन रेजिस्ट इट। विश्व में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो कि भारत से प्रकट हुई आध्यात्मिक तरंग को रोध सके। दिस आल्सो हैज़ टू बी डन। इसको करने की भी आवश्यकता है। यू मस्ट गो आउट टू प्रीच योर रिलीजन। प्रीच इट टू एव्री नेशन अंडर द सन। प्रीच इट टू एव्री पीपल। दिस इज द फर्स्ट थिंग टू डू। आपको बाहर जाना होगा। विदेश में जाना होगा। अपने धर्म का प्रचार करना होगा। इस जगत में जितने भी देश हैं, सूर्य के नीचे में जितने भी देश हैं, सभी देशों में सभी प्रजातियों में आपको भारतीय आध्यात्मिकता का प्रचार करना होगा। और यह सबसे पहली पहला कार्य है जो कि हमको करना है। एंड आफ्टर प्रीचिंग स्पिरिचुअल नॉलेज अलोंग विद इट कम दैट सेकुलर नॉलेज एंड एव्री अदर नॉलेज दैट यू वांट। और एक बार जब आपने आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार किया उसके बाद में यह साइंस, टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्रियलाइजेशन, मैन्युफैक्चरिंग जो कुछ भी कहो इंजीनियरिंग सब कुछ आ जाएगा। बट इफ यू अटेम्प्ट टू गेट द सेकुलर नॉलेज विदाउट रिलीजन आई टेल यू प्लेनली व्हेन इज योर अटेम्प्ट इन इंडिया। किंतु यदि आप यह सेुलर नॉलेज है जिस धर्म के बिना आप सेुलर नॉलेज लाने का प्रयास करेंगे तो मैं आपको स्पष्ट रूप से कहता हूं कि भारत में यह संभव नहीं है। इट विल नेवर हैव अ होल्ड ऑन पीपल। लोगों के ऊपर में इसकी इसका कोई भी असर नहीं होगा। लोगों में यह फैलेगा ही नहीं। इवन द ग्रेट बुद्धिस्टिक मूवमेंट वाज़ अ फेलियर पार्शियली ऑन अकाउंट ऑफ दैट। इवन यह जो ग्रेट बुद्धिस्टिक मूवमेंट है उसका वह भी इसी कारण की वजह से असफल हुई। अभी यह जो आखिरी स्टेटमेंट है वह थोड़ा समझना हमको देखना पड़ेगा कि स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं क्योंकि एक बात तो स्वामी जी की बड़ी स्पष्ट है कि दो चीज

पहले अध्यात्म फिर साइंस और टेक्नोलॉजी

यहां पर स्वामी जी कहते हैं। यह जो पूरा टॉपिक है ग्लोबल वेदांत वाला इसमें स्वामी जी दो बात कहते हैं। सर्वप्रथम तो यह है कि भारत का यदि उत्थान होना है तो भारत को आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करना होगा। तभी यह जो सेुलर नॉलेज है अमेरिका यूरोप से आएगा और इसमें हम भारत में उसको डेवलप कर पाएंगे। दैट इज वेरीेंट। दूसरा स्वामी जी कहते हैं कि जब तक हम भारत के भीतर में धर्म का पुनः जागरण नहीं करेंगे। भारत में धर्म है जष्ठ है। किंतु यह सुपरस्टिशियन अंधश्रद्धा से जो घिरा हुआ जो धर्म है गांव-गांव की शहर-शहर की गली-गली की ये जो सब रूढ़िच चुस्त मान्यताएं जिसको कि वेदांत के ऊपर में थोपा गया है उसको हटा करके वेदांत का जो पृष्ठाइन स्वरूप है उसको फिर से चमकित करना पड़ेगा। उसको फिर से उसका प्रचार करना पड़ेगा। तभी यह भारत में यह बाकी जो जितना नॉलेज है वो होल्ड करेगा। यानी कि कहना क्या चाहते हैं कि अब जैसे कि खेत है, खेत में यदि आप फसल उगाना चाहते हैं तो आपको क्या करना पड़ेगा? पहले तो जमीन को खेड़ना पड़ेगा। फिर उसके भीतर में फर्टिलाइजर है वो डालना पड़ेगा। जब यह जमीन जो है वो फलद्रूप होगी, फर्टाइल होगी। उसके बाद में ही आप जो बीज डालेंगे वो बीज उसमें निकलेंगे। पौधा बनेगा, वृक्ष बनेगा, फसल बनेगी। किंतु कैसी जंगली जमीन है वो जहां पर ना ही उसको टिल किया गया है, खेड़ा गया है, ना ही उसको फर्टिलाइज किया गया है, फर्टाइल किया गया है। उस जमीन पर आप बीज छोड़ देंगे तो वो जमीन में से ये बीज जो है जमीन में जाएंगे ही नहीं। बीज अंकुरित होकर के पौधा या वृक्ष या तो फसल बनेगी ही नहीं। तो पहले तो जमीन को फर्टाइल करना है। जमीन को फर्टाइल करने के बाद में ये आध्यात्मिकता से जमीन को फर्टाइल करना है। फिर इस फर्टाइल जमीन में आप साइंस टेक्नोलॉजी के जितने भी बीज रोप है वो चल जाएंगे। वो उग जाएंगे। फर्टिलाइज अंकुरित हो जाएंगे। किंतु इसके पहले यह नहीं होगा। यह जो बुद्धिस्टिक मूवमेंट है वह फेल हुआ। स्वामी जी कहते हैं इसका क्या है इसके पीछे का वो थोड़ा सा हमको डिटेल में देखना पड़ेगा और साथ-साथ में ही आज के युग के साथ में इसका क्या संबंध है। अभी कुछ समय पहले ही मैं एक रिपोर्ट पढ़ रहा था कि किस तरह से चाइना में यह जो मैन्युफैक्चरिंग बूम हुआ उसने किस तरह से अमेरिका में इकोनॉमिक बेहाली जो है आज की वो लाके खड़ी की है। हालांकि ये लोग कहते हैं इकोनॉमिक बेहाली मुझे लगता नहीं है कि किस हिसाब से कहते हैं। उनका पर कैपिटा जीडीपी है 89000 पर पर हेड। किंतु ये लोग कहते हैं कि उनकी ये जो मैन्युफैक्चरिंग पावर है वो सब धीरे-धीरे करके खत्म हो गई है। वे लोग सर्विस और ये वही सर्विस इंडस्ट्री में आ गए हैं। मैन्युफैक्चरिंग पूरा चला गया है। तो यह जो सब इंटरलिंक टॉपिक है उसके बारे में हमको थोड़ा सा विशेष रूप से चर्चा करनी होगी जो कि अभी हम कल करेंगे। आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: स्वामीजी का विज़न था जगतगुरु भारत का। फिर भी हम अभी तक कुछ हासिल क्यों नहीं कर पाए हैं?

इस हमको तो है ना थोड़ा सा लॉन्ग टर्म व्यू रखना पड़ेगा यहां पे। अब जैसे कि आप किसी को ना ट्रेड स्कूल में भेज के उसको कुछ स्किल सिखा सकते हैं। वह इमीडिएटली अपना वो थोड़ा बहुत काम चालू कर देगा। मैं लिमड़ी में था तो एक इलेक्ट्रिशियन वहां पे आता था। तो ऐसा कोई पढ़ा लिखा कुछ नहीं था। किंतु ये बल्ब बिठाना है या कोई भी इलेक्ट्रिकल वर्क करना है। बिजली का फिटिंग, पंखे का फिटिंग ये वो सब बढ़िया सा कर लेता था। वो बड़ा बिजी रहता था। और एक दो लोगों ने मुझे कहा भी था उस समय कि महाराज हम लोगों ने बीएससी किया बीटेक किया किंतु हमारे से ज्यादा तो वह कमा रहा है। तो अभी क्या है कि देखिए आप कोई एक स्किल सीख लेंगे ना तो जगत में आप सक्सेसफुल हो जाएंगे। वो माने वो विज़िबल सक्सेसफुल हो जाएंगे। किंतु जिसको कि फंडामेंटल साइंस कहते हैं। आपको बीएससी करना। अभी यहां पे आजकल इंडिया में क्या है? ये साइंस फाइंस ये कोई यह सब एक नौकरी लेने के लिए एक मींस बन गया है। बट अदरवाइज़ इफ यू आर अ बैचलर ऑफ़ साइंस दैट मींस व्हाट? माने यदि आपको आइडियली स्पीकिंग कि आपको उस पर्टिकुलर स्ट्रीम में इंटरेस्ट है। इफ यू आर बैचलर ऑफ़ साइंस इन फिजिक्स, दैट मींस यू आर डीपली इंटरेस्टेड इन द फिनोमिना ऑफ़ फिजिक्स। यह किस तरह से इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस होती है? यह किस तरह से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स चलते हैं? न्यूक्लियर फ्यूज़ क्या है? ये फोर जो फंडामेंटल फोर्सेस ऑफ नेचर है ये क्या है? मैथमेटिक्स किस तरह से यूनिवर्स को डिस्क्राइब करता है? इट्स अ क्यूर जर्नी ऑफ़ क्यूरियोसिटी जो कि इट टेक्स यू एन एंटायर लाइफ टाइम टू लर्न एंड इंबाइब एंड इट इट एनरचेस यू फ्रॉम विद इन। दैट इज़ व्हाट अ बैचलर ऑफ़ साइंस शुड डू। किंतु अभी बीएससी एक डिग्री है जिसके बेस पे हमको जॉब खोजनी है। किंतु इतना अच्छा जॉब शायद आपको ना मिले जिस कि एक इलेक्ट्रिकल जो टेक्नशियन है वो आपको वो ले जाए। क्यों? बिकॉज़ के दिस इज़ अ फंडामेंटल प्रोसेस। इट्स अ लाइफ ऑल्टरिंग, लाइफ एनरचिंग प्रोसेस। जबकि वह एक सिर्फ मींस ऑफ़ अर्निंग मनी। राइट? तो अभी भारत में ऐसा है कि हमने स्पिरिचुअलिटी का माध्यम यदि पसंद किया ही है तो इट इज़ अ लाइफ एनरचिंग एक्सपीरियंस। इट विल टेक अस अ लॉन्ग टाइम टू एनकेश। यू कैन एनकैश योर बैचलर्स डिग्री ऑफ़ साइंस। बट फॉर दैट यू विल हैव टू अर्न अ लॉट ऑफ़ नॉलेज। एंड देन यू कैन कंट्रीब्यूट इन सम फंडामेंटल वे। आई विल टुमारो आई विल वर्क ऑन अ न्यूक्लियर रिएक्टर व्हिच इज़ वेरी पावरफुल थिंग। और शायद मुझे पैसा भी इसका बहुत ज्यादा मिलेगा। टुमारो हो सकता है कि मैंने ट्रांजिस्टर इन इन्वेंट कर दिया तो उसका जो पेटेंट का पैसा मिलेगा इट विल चेंज द वर्ल्ड। बट दीज़ आर फंडामेंटल लर्निंग प्रोसेससेस एंड दिस प्रोसेससेस हैव फंडामेंटल कंट्रीबशंस जिसको कि आप शॉर्ट टर्म में वो जो अब नहीं मेजर कर पाएंगे। राइट? सो दिस इज द पाथ इंडिया हैज़ चूजन। अभी चाइना का देखिए यह जो मैं कल जो डिस्कस करने वाला था हूं ना वो बेसिकली यही है। चाइना और इंडिया का कंट्रास्ट देखिए। चाइना ने अपने को फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड बना लिया। वो चीप मैन्युफैक्चरिंग कर रहा है। तो विद इन 40 इयर्स उसका जीडीपी भारत का जीडीपी से पांच गुना हो गया। दिस इज़ अ वेरी इमीडिएट विज़िबल सक्सेस। और इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके चाइना अभी यह स्टिल्थ बमबर बना रहा है। स्टिल्थ फाइटर प्लेन बना रहा है। यह रोबोटिक्स डेवलप कर रहा है। एआई डेवलप कर दिया है। जबकि आप बोलेंगे कि भारत में इसमें से कुछ भी नहीं होता। सो वेरी गुड। अभी मैं भारत को डिफेंड नहीं कर रहा हूं। में यह पॉलिटिक्स पॉलिटिकल पार्टीज जो है भारत की उन्होंने हमको पूरा माने खत्म कर दिया है। पिछले उस समय पे जो 1980 और 1990 ये जो 10 20 साल थे भारत की पॉलिटिक्स हमको बिल्कुल बेहाली की दशा में लेके गई थी। सो आई एम नॉट डिफेंडिंग दैट। किंतु ये जो बेसिक प्लान ऑफ डेवलपमेंट है स्वामी जी का इट गिव्स अस अ फार डीपर डेप्थ जो कि हमको ना भविष्य में काम में लगेगी। क्योंकि वी आर डेवलपिंग इसको कैसे कहेंगे? जैसे कि मैंने वह बॉडी बिल्डिंग का एक एग्जांपल दिया था ना कि यदि आपको सही-सही में मसल बनाने हैं आपको लाइफ टाइम ऑफ फिटनेस और डिसिप्लिन रिजीम आपको करना पड़ेगा अप्लाई। किंतु आप वो जो हॉर्मोन इंजेक्शन है वो ले लेंगे तो आपके मसल इमीडिएटली डेवलप हो जाएंगे। बट इट विल नॉट गिव यू इनर स्ट्रेंथ। राइट? वह एक समय आपको डिसीज रिडन कर देंगे। तो वो विजिबल सक्सेस दिखती है। बट इट इसका जो फाउंडेशन है ना वो शैलो है और अपना जो फाउंडेशन है इट्स अ वेरी डीप फाउंडेशन। इसको विज़िबल होने में समय लगेगा। बट फाउंडेशन इज़ वेरी स्ट्रांग एंड डीप डीप।

प्रश्न: हिन्दू सभ्यता कभी विलुप्त नहीं होगी क्योंकि हम आध्यात्मिक हैं।

ना खास करके चाइना के साथ कंपेयर करने से हमको लगेगा चाइना का 10 साल ग्रोथ हुआ 10% पर एनम। उस वो जो एकदम मिरेकुलस ग्रोथ था वैसा तो हमारा कभी नहीं होने वाला है। बीइंग ए डेमोक्रेसी अपना जो ग्रोथ है प्लेटो हो जाता है 67% पर एनम पे कभी-कभी 89 पे चला जाता है बट सस्टेन लेवल पे नहीं जाता है। सो वी विल नेवर बी ग्रोइंग एज मिरेकुलसली एज चाइना। तो वह एक बात है और दूसरा देखिए कि चाइना का म विज़िबल है कि उनका जो कल्चर है उसने यह फॉरेन इन्फ्लुएंस को बार-बार एक्सेप्ट कर लिया है। जैसे कि यह बुद्धिज्म गया तो उनका जो नेटिव कल्चर था वो कन्फ्यूशियनिज्म है ना कि टैवोइज्म है उसकी वजह उन्होंने यह बुद्धिज्म को अपना लिया। बाद में उन्होंने कम्युनिज्म को अपना लिया। होलसेल फॉरेन फिलॉसोफी को बुद्धिज्म को हटा करके आया। वो कल्चरल रेवोल्यूशन आप यदि पढ़ेंगे कि जितने भी पुराने इन्फ्लुएंस थे सबको हटाओ होलसेल हमको कम्युनिज्म को लेके आओ। भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि हमने होलसेल फॉरेन आईडियोलॉजी को अपनाया हो। हमारी जितनी भी फिलॉसोफी आईडियोलॉजी रिलीजन है ऑल आर होम ग्रोन। सो दैट इज समथिंग कि डिफरेंट इट्स अ डिफरेंस बिटवीन चाइना एंड अस। अपने गुजराती माय माना घर हो मा पड़े हो पर ठाकुर कहते हैं ना जो गिन्नी यानी कि जो हाउस वाइफ है गहिणी है उसके पास में एक वो हांडी होती है हांडी में वो बहुत कुछ जमा करके रखती है वो इसी तरह से

प्रश्न: हिंदुओं में दूसरों को अपने धर्म में परिवर्तित करने का उत्साह क्यों नहीं है?

देखिए इसके बारे में ना मैंने भी काफी सोचा है यह जो ठाकुर का जो कांसेप्ट है मने वने और कोणे जो साधना करनी है मन में करनी है घर के कोने में करनी है और रिट्रीट में फॉरेस्ट ट्रीट में जाकर करनी है। तो अभी खास करके यह बात मुझे कब सबसे ज्यादा महसूस होती थी जब मैं रांची में वो गांवगांव जाता था कि क्रिश्चियंस लोग आर वेरी शेमलेस कि आपको कन्वर्ट करना है। कन्वर्ट करने के लिए ही हम यहां पे बैठे हैं। जबकि हमारा था कि गांव का कल्याण करना है। हमको बैकग्राउंड में रखना है। यह जाकर के बड़ा अपनी खुद आम हम बड़ा हम बड़ा जो बांग्ला बोले कि अपना खुद का वो आत्मप्रशंसा नहीं करनी कि मैंने यह कर दिया मैंने वह कर दिया। हमने ट्रेनर्स को लेके गए वो गांव में वह सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाया फिर यह कोटेज इंडस्ट्री स्टार्ट किया और फिर हम लोग वहां से निकल गए लेट देम बी इंडिपेंडेंट लेट देम स्टैंड ऑन देयर ओन फीट फिर ऐसा कितनी बार मेरे पास में कंप्लेन आया है कि महाराज आप लोग तो यह बना करके चले गए सेल्फ हेल्प ग्रुप फिर यह वो एनजीओ है दूसरा एनजीओ है उन लोगों ने आकर के वहां पे अपना बैनर लगा करके क्रेडिट ले रहे हैं तो आप वापस आकर कुछ कीजिए मैंने कहा क्रेडिट लेने दो ना क्या फर्क पड़ता है हम लोग तो रामकृष्ण मिशन है हमको तो कुछ चाहिए नहीं गांव वालों से वह गांव वालों का कल्याण हो वही हमको चाहिए इससे ज्यादा और कुछ नहीं यह दिस इवन रामकृष्ण मिशन कंसीडर्ड टू बी द मोस्ट रेडिकल मिशनरी ऑर्गेनाइजेशन इसमें मैं खुद इतना रेडिकल था उस समय कि गांव का कल्याण करना है किंतु ये क्रेडिट लेने का जब मामला आता है मैं खुद डर जाता था मैं मुझे बिल्कुल आई आई हैड अ स्ट्रांग एवर्जन टुवर्ड्स इट मैं जब भी गांव में ये इनिशियल स्टार्ट होता है प्रोजेक्ट तो मैं एकदम रेगुलर जाता था हमारे ट्रेनर्स को लेकर के वगैरह-वगैरह किंतु कंक्लूजन आता है कोई एक प्रोग्राम होना है प्रोग्राम में आपको सब वीआईपीस को इकट्ठा करके आपका सक्सेस स्टोरी दिखाना है तो उसमें मैं कभी नहीं जाता था आई डोंट वांट दैट मुझे वो क्रेडिट नहीं चाहिए इतना स्ट्रांग मेरा एवर्जन था। सो उस समय मैं सोचता था कि यह जो अपने डीएनए में है इस हार्मफुल है ना कि क्या क्योंकि दूसरे लोग अपना प्रचार कर दे रहे हैं। थिंग इज दैट यह मने वने कोने यह सिर्फ ठाकुर की बात नहीं ये तो सनातन धर्म की बात है। तो इज दिस समथिंग हार्मफुल ट्रेट जो कि हमारे भीतर में है। सेल्फ डिस्ट्रक्टिव ट्रेट हम कहेंगे। ऐसा कुछ है क्या? तो मैंने भी सोचा है इसके बारे में। आई डू नॉट नो दिस इज़ एन ओपन डिबेट। बोथ साइड्स हम कह सकते हैं कि भारत में बिकॉज़ ऑफ़ दिस आईडिया स्पिरिचुअलिटी हैज़ बिकम रियली डीप। हम लोग दिखावा नहीं करते बोल के हम यदि आप किसको एक जेन्युइन साधु को आप मिल लेंगे जो कि दिखावा नहीं करता है और इसमें जो इन डेप्थ स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस आपको मिलेगा ऐसा और जगत में किसी धर्म में नहीं मिलेगा। यह आई हैव एक्सपीरियंस्ड इट मायसेल्फ। सो वो एक आर्गुमेंट है ऑन दी अदर हैंड ये जिओपॉलिटिकल आर्गुमेंट है कि जिस धर्म के फॉलोअर्स ज्यादा है वे लोग अपना जो भी चाहे वो करवाते हैं अपनी इच्छा से अनुसार और भारत पे 1000 साल तक राज भी किए तो अभी इस तरह इस तरह की आध्यात्मिकता किस काम की कि दिन प्रतिदिन हमारी पिटाई हो जो भी आए विदेशी आक्रमणखोर वो हमारे हमको हम लूट करके चले जाए हत्या करके चले जाए व्हाट इज द मीनिंग ऑफ दिस स्पिरिचुअलिटी सो दीज़ आर ओपन डिबेट स्वामी जी कहते हैं कि यह 10,000 साल पहले चॉइस हमने कर ली है। टुडे वी हैव नथिंग नो ऑप्शन बट टू फॉलो इट।

प्रश्न: हिंदू धर्म में भी कुछ धार्मिक संगठन हैं जहां कई भक्त जाते हैं, वहां मेले जैसा माहौल होता है और वे कहते हैं कि उन्होंने बहुत आनंद लिया। जब भी कोई त्यौहार होता है तो वहां खाने-पीने के स्टॉल आदि लगते हैं।

यह जो पॉपुलर मैनिफेस्टेशन के बारे में आपने कहा ना कि वो फूड स्टॉल वगैरह वो आप क्यों अपने यहां पर इमेजिन नहीं करेंगे? आप वो बंगाल में जाइए। ठाकुर का पब्लिक सेलिब्रेशन बेलून मठ में देखिए। पूरा मेला लगता है। वो वो जितने भी फूड स्टॉल है सब वहां पर लग जाते हैं। पानी पूरी यह वो आइसक्रीम टइसक्रीम पूरे लाख 1 लाख से ज्यादा लोग वहां पे आते होंगे। जस्ट जो कि आपने कहा यहां पे एग्जैक्टली ऐसा वहां पे देखने को मिलेगा। दूसरा आपको में मैनिफेस्टेशन दिखेगा कल्पतरु दिन को काशीपुर में। और तीसरा मेनिफेस्टेशन दिखेगा बेलूर मठ में कुमारी पूजा के दिन। माने लेस देन 1 लाख तो होंगे ही नहीं। मोर 1 लाख प्लस होंगे। तो दैट इज देयर मेनी पॉपुलर मैनिफेस्टेशन बट यह बात सही है कि हमने अपना फाउंडेशन इस पे नहीं बनाया है। दैट इज इंसिडेंटल नॉट इंटेंशनल। सो दैट इज वन थिंग और दूसरा कि आपने जैसे ठीक ही कहा

प्रश्न: भारत बहुत अधिक आध्यात्मिक है। हमारे आर्थिक या तकनीकी विकास की उपेक्षा की गई है।

कि व्हाई शुड वी प्रीच स्पिरिचुअलिटी? देखिए ये जो टॉपिक जिसको कि मुझे थोड़ा डिटेल में डिस्कस करना है कल। अभी देखिए अमेरिका ने चाइना में अमेरिका ने चाइना को यह दिया कि डब्ल्यूटीओ में एंट्री दी और टेरिफ फ्री ये सब ट्रेड करने को कहा। इसका परिणाम क्या आया कि यह जो हायर थिंकिंग वाली जितनी भी जॉब है ना वो अमेरिका में रह गई। किंतु जो भी जिसमें कि आपको लेबर लेवल पर करनी है वो मैन्युफैक्चरिंग वो सब चाइना में चली गई। अभी देखिए कि सर्विस सेक्टर जिसको कहते हैं सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट है ना कि ये लो फर्म्स है ना कि मेडिकल प्रोफेशन है जो कि आपका इंटेलेक्चुअल कंट्रीब्यूशन होता है आउटपुट इज इंटेलेक्चुअल प्रोडक्ट इज इंटेलेक्चुअल वो अमेरिका में बहुत ज्यादा डेवलप हुआ उसका अभी और इसका जो मैन्युफैक्चरिंग है व्हिच इज़ मोर ऑफ ए प्रोडक्ट ओरिएंटेड मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट वो चाइना चला गया। अभी देखिए कि उसका एग्जांपल Apple है। iPhone डिजाइन होता है। डेवलप होता है अमेरिका में। मैन्युफैक्चर होता है चाइना में। तो यह लंबे एटलीस्ट 10 15 20 साल तक चला। अभी देखिए कि बिकॉज़ कि सर्विस सेक्टर इतना पावरफुल है। वहां पे इतनी प्रचंड वेल्थ जनरेट हुई। किंतु कितने लोग यह सर्विस सेक्टर में रह पाएंगे। आप पपुलेशन को जनरली एक देखिए कि 1% पपुलेशन है उसमें 20-30% हाईली इंटेलेक्चुअल में प्रोडक्शन कर पाएंगे। 30 40 50% 7 एटलीस्ट अप टू 60% लोग होंगे जो कि उस लेवल का इंटेलेक्चुअल आउटपुट नहीं दे पाएंगे। उनको जीवन धारण करने के लिए मैन्युफैक्चरिंग चाहिए ही चाहिए। तो अभी हुआ ऐसा कि मैन्युफैक्चरिंग आपने हटा दिया। अ सर्विस सेक्टर पे ही पूरा फोकस कर दिया। तो जो लोग इंटेलेक्चुअली प्रोड्यूस कर सकते हैं वे लोग वेल्थी हो गए। जो लोग इंटेलेक्चुअल प्रोडक्शन नहीं कर सकते वे लोग रह गए। राइट? तो अभी देखिए कि इंडिया में आप यह कहते हैं कि भारत का काम है कि स्पिरिचुअल प्रोडक्शन करना। तो यह तो और भी ज्यादा डेंजरस है। आप कितने लोग स्पिरिचुअल प्रोडक्शन कर पाएंगे? हाउ मेनी कैन प्रोड्यूस स्पिरिचुअल गुड्स जिसको कहते हैं। तो वो तो मुश्किल से 1% 2% हो गए। हु कैन बी ए रियल गुड्स प्रीचर्स। बाकी के जो 80 90% थे उन लोगों के लिए क्या? यानी कि ये जो हमने अमेरिका ने जो गलती की कि मैन्युफैक्चरिंग आउटसोर्स करके उनकी पपुलेशन के 50 60% लोगों के पास में अभी डेवलपमेंट का कोई माध्यम नहीं रहा। जो 30- 40% हाईली इंटेलेक्चुअल है उन लोगों के लिए अभी सब कुछ है कि जॉब भी मिलेगा, डेवलपमेंट भी होगा, फ्यूचर प्रोस्पेक्ट भी होगा। तो अमेरिका में जो स्मॉल स्केल पे हुआ है इंडिया में वो बड़े ही लार्ज स्केल पे हुआ है। 1 टू 5% है जो कि स्पिरिचुअल गुड्स प्रोड्यूस कर सकते हैं। तो उनके लिए इनफाइनाइट स्कोप है डेवलपमेंट होने का। किंतु जो 70-80% है दे कैन नॉट मैन प्रोड्यूस स्पिरिचुअल गुड्स। उनका क्या? तो यह जो जिसको कि हम मटेरियलिस्टिक डेवलपमेंट कहते हैं, वर्ल्डली डेवलपमेंट कहते हैं। यह सबको हमने क्या है ना एक तरह से नजरअंदाज किया है। तो वि इज उसका जो परिणाम है हमको 1000 साल की गुलामी की वजह से भुगतना पड़ा। आज आप यूरोप में अभी मैं कुछ-कुछ स्टडीज कर रहा था रिसेंटली। उसमें यूरोप के चर्च के बारे में एक मेरा स्टडी था। उसमें मैंने देखा कि क्या ब्यूटीफुल आर्किटेक्चर है उनका। माने हम लोग क्रिश्चियनिटी कन्वर्शन ऐसा सब इक्वेशन लेकर के उनके बारे में स्टडी नहीं करते ज्यादा किंतु आप सीरियसली स्टडी करेंगे तो अदर देन फिलॉसोफी अदर देन थियोलॉजी जो मटेरियल मैनिफेस्टेशन है चर्च आर्किटेक्चर वंडरफुल माने एक के बाद एक पुराने-पुराने जो यूरोप के चर्च है उसको देखेंगे तो हम लगेगा कि भारत के किसी भी टेंपल में इस तरह का आपको वैभव है ब्यूटी है आर्किटेक्चरल जो स्किल है नहीं देखने को मिलेगा सो वहां पर क्या हुआ ना कि उन्होंने धर्म को जो एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन है वह किया तो फायदा क्या हुआ कि एवरीवन कैन गेट एंप्लॉयमेंट जो कि धार्मिक है जो कि साधु है जो कि प्रीचर है उसको भी एंप्लॉयमेंट मिलता है किंतु ये लोग 10-15% होंगे। फिर आर्किटेक्चर है उसको भी एंप्लॉयमेंट मिलता है। जो राजा है या तो क्षत्रिय है उनको भी एंप्लॉयमेंट मिलता है। यानी कि समाज के जितने भी डिफरेंट-डिफरेंट माइंडसेट है एवरीवन कैन गेट एंप्लॉयमेंट आउट ऑफ क्रिश्चियनिटी जो कि हम लोग जो है इसको कि नेगलेक्ट कर रहे हैं। हिंदू धर्म वेदांत इंडिविजुअल लेवल पे बहुत ही ज्यादा डेवलप हुआ। बट दिस डेवलपमेंट इज पॉसिबल फॉर ओनली 1% 2% 5% ऑफ पीपल। हमने विदिन हिंदू फोल्ड ऐसा तो दूसरे मींस क्या है कि 80% पपुलेशन है। इसका स्किल है कि मैन्युफैक्चरिंग कर सकता है। इसका स्किल है कि यह फार्मिंग कर सकता है। इसका स्किल है कि यह इलेक्ट्रिकल वर्क कर सकता है। इसका स्किल है कि प्लंबिंग कर सकता है। सबको विदिन द हिंदू फोल्ड एंप्लॉयमेंट मिले। ऐसा हमने नहीं किया। एक समय था कि हम करते ये वर्णाश्रम प्रथा उसी का ये है कि यह शूद्र है, यह क्षत्रिय है, यह ब्राह्मण है, यह वैश्य है। और विदिन दैट जो सबकास्ट है जो कि अपना-अपना काम करती है, इट इज विद इन द हिंदू फौ्ट। किंतु बुद्धिज्म के आने के बाद में धर्म को प्योर स्पिरिचुअल बना दिया गया। उसका मटेरियल एक्सप्रेशन जैसे कि हमने जीरो कर दिया। अभी ये बुद्धिज्म का फौल्ट था कि डिग्रेडेड हिंदूइज़्म का फौ्ट था? व्हाटएवर द हिस्टोरिकल एनालिसिस छोड़े तो एटलीस्ट पिछले 1000 साल से हम देख रहे हैं कि स्पिरिचुअलिटी का जो मटेरियल जो मैनिफेस्टेशन है वो बड़ा ही लिमिटेड है अपने यहां पे कुंभ मेला कर लेते हैं चलो मंदिर नया बना दिया चलो दैट इज गुड किंतु आपको 80% पपुलेशन को इससे एंप्लॉयमेंट नहीं मिलेगा। सो आइदर कि आप यह कीजिए कि हमारा आध्यात्मिकता एक छोटी सी दायरे में लिमिटेड है। बाकी सब में हम मटेरियलिज्म एक्सेप्ट करेंगे। वह बट दिस इज नॉट अ प्रॉपर सॉल्यूशन। आपको स्पिरिचुअलिटी इटसेल्फ विल हैव टू बी एक्सपेंडेड इन सच अ वे दैट एव्री टाइप ऑफ माइंडसेट एव्री टाइप ऑफ स्किल सेट कैन गेट गेनफुल एंप्लॉयमेंट विद इन दैट सिस्टम। ना उसको थोड़ा सा डिटेल डिस्कशन इसलिए करेंगे कि यह जो अमेरिका का जो डायलेमा जो है ना उसको मेज उसको मल्टीपल करके भारत को फेस करना पड़ा है। यदि आप कहेंगे कि वी आर एम अह सर्विस इंड अह सर्विस इकोनमी तो जो मैन्युफैक्चर के लिए एलिजिबल है उनका तो बेचारे का जॉब चला गया और ये इसका परिणाम है ये ट्रंप तो भारत में यदि आप कहेंगे वी आर अ स्पिरिचुअल इकोनमी तो तो इस ये जो प्रॉब्लम है अमेरिका का वो थाउजेंड टाइम होकर के इंडिया को अप्लाई होगा क्योंकि स्पिरिचुअल गुड्स कैन बी डेवलप्ड प्रोड्यूस बाय ओनली 5% पपुलेशन व्हाट विल द रेस्ट ऑफ द पपुलेशन विल डू तो आपको एक स्प्लिट हो जाएगा कि धर्म एक है और बाकी का सब कुछ है क्या जो कि भारत में संभव ही नहीं है। सब कुछ यदि धर्म के आधार पे है। यदि धर्म फाउंडेशन है तो धर्म को इटसेल्फ विल हैव टू प्रोवाइड अ मीनिंगफुल गेनफुल एंप्लॉयमेंट टू एवरीवन एल्स। सो हाउ इज दैट पॉसिबल? वो एक बहुत बड़ा डलेमा वी आर फेसिंग।