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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 1 Jan 2025

Invocation

ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम तो आज स्वामी विवेकानंद का टॉपिक स्टार्ट करते हैं हमने ज्ञान योग के भी प्रवचन देखे उसके बाद में राजयोग के भी देखे और स्वामी जी के एक लेटर का भी पाठ किया था हमने अभी जो सीरीज में से हम स्वामी जी का आज का टॉपिक ले रहे हैं उस सीरीज का नाम है लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा अभी इसकी एक पूर्व भूमिका जो हमको सबको पता है कि वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में पार्टिसिपेट करने के लिए स्वामी जी जब अमेरिका गए और अमेरिका में उन्होंने जो अमेरिका का जिस तरह से आकलन किया असेसमेंट किया अमेरिकन लाइफ का किस तरह से इनका इंडस्ट्री इनका टेक्नोलॉजी साइंस मॉडर्न इकोनॉमी मॉडर्न पॉलिटिक्स यह सब काम करता है और जब स्वामी जी अमेरिका को भारत के साथ में कंट्रास्ट करते हैं तब उनके हृदय में एक बड़ा ही दुख प्रकट हुआ उन्होंने देखा उन्होंने सोचा कि मेरे भारतवासी करोड़ों करोड़ों भाई बहन बेचारे ऐसी दुरावस्था में जीते हैं और भारत की परिस्थिति का निरीक्षण स्वामी जी ने कैसे किया था वो भी तो हमको पता है कि स्वामी जी गए थे वराह नगर मठ से निकले थे अलम

varahnagar math

सोचेंगे कि मैं हिमालय जाकर के तपस्या करूंगा और तपस्या करके अपने को जैसे कि संपूर्ण रूप से ब्रह्मण में विलीन कर दूंगा अभी स्वामी जी की यह जो सोच थी जिस सोच को लेकर के वह वराह नगर मठ से उन्होंने प्रस्थान किया था उसके पीछे का भी एक लंबा बैक स्टोरी है वो बैक स्टोरी कहां से स्टार्ट होता है कि ठाकुर ने जब

Sri Ramakrishna

यह कहा कि जीव के ऊपर में दया करने वाले तुम कौन होते हो जीव नहीं शिव है उनकी तो पूजा करनी है अर्थात कि जब किसी को आप कुछ हेल्प करते हैं किसी को सहाय करते हैं तो यह सोच कर के मत सहाय कीजिए कि आप उससे

Dakshineshwar Kali Temple

बड़े हैं वह आपसे छोटा है और आप उसके ऊपर में दया कर रहे हैं उल्टा रिवर्स कनेक्शन होना चाहिए वह हमारे से बड़ा है हम उनसे छोटे हैं और हम उनकी पूजा कर रहे हैं जिनकी आप सेवा कर रहे हैं उनके भीतर में साक्षात नारायण का दर्शन करना है जब ठाकुर ने ऐसा कहा तब स्वामी जी ने कहा था उसी क्षण जब ठाकुर के कमरे में से बाहर आए उसी क्षण स्वामी जी ने कहा था कि यदि मुझे मौका मिला ईश्वर की इच्छा रहेगी तो ठाकुर का यह भूत संदेश में गांव-गांव शहर शहर घर-घर जाकर के इसका प्रचार करूंगा तो अभी स्वामी जी ने यह बात कह तो दी किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर की वह बात भी तो थी देखिए ठाकुर की बातों में किस तरह का कंट्रास्ट हमको कभी-कभी दिखता है ठाकुर की दूसरी बात भी थी ठाकुर ने कहा था जब आप कालीघाट जाते हैं कलकाता का विख्यात काली मंदिर तो आपका सर्वप्रथम कर्तव्य क्या है क्या आप बाहर में जो भिखारी लोग है भिक्षुक है उनको पैसा देने में दक्षिणा देने में ही आपका समय गवा देंगे ना कि आपका सबसे पहला कर्तव्य है कि आप पहले मंदिर में जाइए भले ही चाहे जितनी भी भीड़ हो धक्का मुखी करके आप मां काली का दर्शन कर लीजिए उसके बाद में आप बाहर आकर के जितना आपको दान दक्षिणा बटोर नहीं हो आप बटोर रहिए तो ठाकुर के ये दो टीचिंग थे अभी ठाकुर ने यह तो नहीं कहा कि ये दोनों म्यूचुअल एक्सक्लूसिव है या तो फिर ये विरोधाभासी है ठाकुर के कथामृत को पढ़ कर के हमको ये दो टीचिंग में कभी भी किसी भी तरह का कंट्रास्ट नहीं दिखता है वो कंट्रास्ट सब बाद में स्वामी जी खड़ा करेंगे ठाकुर ये सब कंट्रास्ट नहीं ही खड़ा करते हैं तो जब ठाकुर की महासमाधि हुई वराह नगर मठ की स्थापना हुई और जब स्वामी जी ने सिर्फ स्वामी जी नहीं सभी गुरु भाइयों ने मिलकर के जो प्रचंड जप ध्यान की धुनि प्रज्वलित की वही अपना ओरिजिनल वराह नगर मठ में वही भूतड़े मकान वही वही भूतिया वो जो भूत का खंडहर जहां पे कोई रहने को नहीं आता था वहां पे ही इन लोगों ने जैसे कि एक धुनि प्रज्वलित की जब ध्यान साधन भजन की और योग साधना की एक इंटरेस्टिंग बात सुहितानंद जी आए थे तो वो बता रहे थे उनके पास में यह सब घटनाओं का बड़ा एक ट्रेजर हाउस है छोटी-छोटी घटनाओं का तो वह बता रहे थे कि किसी ने वराह नगर मठ में देखा कि एक आदमी सीढ़ी पर उठ रहा है अपने ही किसी गुरु भाई ने देखा होगा तो उसने सोचा कि इस समय में ये ऐसा समय था दोपहर का ना कि ऐसा कुछ कि जबक जनरली कोई भी विजिटर मठ में नहीं आता है तो इस समय यह आदमी कौन है कहां से आया है कैसे सीढ़ी पर चढ़ रहा है तो वो गुरु भाई तपास करने को गए पीछे में देखा तो जैसे ही सीढ़ी का मोड़ फिरा तो आदमी अदृश्य हो गया तो अभी वो सोच रहे है कि कौन था कहां से आया था फिर उनको पता याद आया कि ये तो भूतड़े बागन तो मने भूतड़े बाड़ी तो मने भूत का ये घर है इसलिए भूत तो यहां प इधर उधर आते ही रहेंगे तो जो भी है गुरु भाइयों को भूत का डर किस चीज का ये लोग तो खुद भैरव थे तो जो तोतापुरी की कहानी है कि वहां दक्षिणेश्वर में बैठे हुए हैं पंचवटी में पंचवटी तले पूरी रात उनका तो जब ध्यान जब

Panchvati

ध्यान तो नहीं कहेंगे वो तो निराकार वादी थे स्मरण मनन निधि ध्यास या तो फिर कहेंगे कि ब्रह्म में एकाकार होना तो वो तोतापुरी गुरु का हमारा चल रहा था वही ब्रह्म साधना या तो फिर ब्रह्म में एकाकार वृत्ति होना और एकाएक देखा कि पंचवटी के ऊपर में से डाल के ऊपर में से एक बड़ा ही कदा व एक बड़ा ही एक भयावह दिखने वाला एक आदमी ऊपर से जंप लगा कर के जमीन पर आ और उनके सामने बैठ गया अभी धुनि प्रज्वलित है रात को मध्यरात्रि का समय है और आज की तरह स्ट्रीट लाइट वगैरह तो कुछ था नहीं बस वो सितारों के वो जो उजाला है वो चांद का उजाला है और धुनि का उस धुनि के और चांद के उजाले में यह आदमी ऐसा भयावह दिख रहा था और कोई कच्चा पचा होता तो उसका तो हार्ट फेल हो जाता किंतु यह तो तोतापुरी जीत है उन्होंने बोला कि कौन हो तुम तो वो बोला कि मैं भैरव हूं यहां पर मंदिर की रक्षा करने के लिए रहता हूं तो तोतापुरी जी ने इमीडिएट कहा अच्छा ठीक है जो तुम हो वो भी मैं हूं हम दोनों एक ही ब्रह्मण के तो विभिन्न प्रकाश है प्रकाश की किरण है आओ बैठ कर के तुम भी मेरे साथ में साधना करो तुम भी ब्रह्म ज्ञान में एकाकार हो जाओ ब्रह्मण में विलीन हो जाओ तो जैसे ही तोतापुरी जी ने ऐसा कहा तो वो भैरव समझ गया कि यह बंदा डरने वाला नहीं है तो फिर वो हंस कर के अदृश्य हो गए जैसे कि हवा में विलीन हो गए तो जैसे तोतापुरी थे वो खुद जैसे एक भैरव थे और यह गुरु भाई भी जैसे ही भैरव थे भैरव की कहानी से वो ठाकुर की एक छोटी सी घटना है कि जब भी ठाकुर यहां पर जाते थे काली जब ध्यान करने को बैठते थे जब भी वो काली मंदिर में मां का दर्शन करने को जाते थे तब हमको पता है यदि आपने दक्षिणेश्वर का दर्शन किया होगा काली मंदिर का तो जहां से मां काली के गर्भगृह में जाया जाता है वहां पीछे में

Kali in Dakshineshwar temple

ही नाट मंदिर है और नाट मंदिर की छत के ऊपर में एक भैरव की आकृति है एक भैरव की

Bhairav on nat mandir

मूर्ति है तो ठाकुर भैरव को प्रणाम करके फिर भैरव की अनुमति लेकर के क्योंकि भैरव होता है मां काली का रक्षक उ द्वारपाल फिर मां के दर्शन करने के लिए मंदिर में प्रवेश करते थे तो ठाकुर जब भी जब ध्यान करने को बैठते थे साधन ध्यान करने को बैठते थे तब अपने मन को आदेश देते थे कि वह जैसे पत्थर की भैरव की मूर्ति है सालों साल काल युग के बाद युग एक ही जैसे की अवस्था में है एक ही स्थिति में स्थिर होकर के बैठ कर के वह जैसे की मां के ध्यान में मग्न है तो मेरा ही शरीर देह मन इस तरह से स्थिर हो जाए ऐसा करके ठाकुर अपने को आदेश देते थे वो भैरव की मूर्ति का भाव अपने पर जैसे कि आरोपित करके और जैसे ही ठाकुर अपने को इस तरह का आदेश देते थे वैसे ही उनका शरीर पूरा स्थिर हो जाता था और स्थिर होकर के फिर वो साधन भजन करते थे या तो फिर मां काली के चिंतन में मनन में मग्न हो जाते थे स्वामी जी की भी ऐसी ही कहानी है वो स्वामी जी और गिरीश घोष वहां पर तो उस समय ठाकुर वहां पर थे काशीपुर में ठाकुर को कैंसर की ट्रीटमेंट के लिए काशीपुर में लाया गया और यह गिरीश घोष और यह नरेद उन दोनों ने सोच लिया नरेन

Girish Ghosh

भविष्य के स्वामी विवेकानंद दोनों ने सोच लिया कि चलो दक्षिणेश्वर चलते हैं वहां पर बैठ कर के ध्यान करेंगे पूरी रात तो दोनों वैसे ये दोनों ही भैरव है ये दोनों आकर के वहां पर बैठ गए दक्षिणेश्वर में पंचवटी के नीचे में कि कहां पर बैठे हैं ध्यान कर रहे हैं फिर थोड़ी देर के बाद में गिरीश का ध्यान भंग हो गया क्योंकि वहां पर मच्छर बहुत सारे थे तो फिर उसने आंख खोल कर के देखा तो एक अद्भुत दृश्य स्वामी जी

Naren, Swami Vivekananda

के शरीर पर इतने सारे मच्छर बैठे हुए थे जैसे कि लगा कि काले कंबल उनके पूरे देह के ऊपर में उन्होंने आवृत करके रखा हो तो गिरीश थोड़ा तो एकदम डर गया कि नरेंद्र ने क्या शरीर त्याग दिया ना कि क्या क्योंकि इस तरह से इतने सारे मच्छर काट रहे हैं आपकी आंखों के ऊपर में नाक के भीतर में मुंह के ऊपर में बैठे हुए हैं और आपको कोई आपको कोई रिएक्शन ही नहीं है और कोई आदमी तो एक सेकंड के लिए मच्छर काटेगा तो एकदम परेशान हो जाएगा तो यह स्वामी जी जैसे कि ब्लैंकेट की तरह मच्छर उनको आवृत किए हुए हैं कोई रिएक्शन नहीं तो गिरीश को लगा कि स्वामी जी ने दे हत्या कर दिया है तो गिरीश जोर-जोर से चिल्लाने लगा अरे नरेद नरेद क्या कर रहे हो तुम जिंदा हो कि मर गए ये मैंने थोड़ा सा जोड़ दिया है ऐसा तो गिरीश ने कहा नहीं था जिंदा हो या मर गए तो जो भी है चिल्लाए थोड़ी देर नरेंद्र ने कोई आवाज क्या कोई रिएक्शन नहीं दिया तो फिर गिरीश खड़ा होकर के नरेंद्र को धक्का मारता है जोर से तो जिस अवस्था में नरेंद्र बैठा था ध्यान मुद्रा में वैसी ही अवस्था में वो पीछे गिरा जैसे कि वो पत्थर की मूर्ति को आप गिराए तो वो जो ध्यान मुद्रा जो रहेगी पैरों की और हाथ की स्थिति ऐसी ही स्थिति में जैसे वो मूर्ति गिरती है नरन भी ऐसे ही गिरा जैसे कि वही ध्यान मुद्रा पैरों की और हाथों की वही स्थिति जैसे कि पत्थर का बना हुआ है तो यह थे हमारे जो गुरु भाई और ये थे हमारे गुरु तो यह जो कहानी है नरेंद्र की हमारी हमारा जो थ्रेड था टॉपिक था लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा या तो फिर कहे कि भारत को दिया हुआ स्वामी जी का उपदेश और उसकी पूर्व भूमिका तो यह दो मेन इंसिडेंट है हमारी पूर्व भूमिका के पीछे में सर्वप्रथम तो ठाकुर ने कहा कि जीव के ऊपर में दया करने वाले तुम कौन हो तुमको तो उनकी शिव के रूप में आराधना करनी है तो वो एक पॉइंट और दूसरा ही पॉइंट साथ-साथ में ठाकुर ने कहा था काली मंदिर में जाने से सर्वप्रथम मां काली का दर्शन करो फिर बाद में बाहर आकर के आपको जो भी दक्षिणा दान देना है वह देते रहो तो यह दो ठाकुर के उपदेश जो कि जब वराह नगर मठ की स्थापना हुई और जब स्वामी जी और गुरु भाई जब ध्यान साधन भजन का जो प्रचंड प्रवाह है वह उनका वहां पर बहने लगा तो वोह जो ठाकुर की वो जो पुरानी शिक्षा थी कि हां जीव के शिव के रूप में नर नारायण की सेवा करनी है वो सब तो कहां पर गए थे ये गुरु भाई और फिर आखिर में जब वराह नगर मठ में आर्थिक एक दुरावस्था का प्रारंभ हुआ क्योंकि वराह नगर मठ के पोषक थे दो रसदार थे वराह नगर मठ के मुख्यत वे एक तो थे बलराम बाबू दूसरे थे ये सुरेश तो जिनको कि ठाकुर सुरेन सुरेन बोल कर के बुलाया करते थे तो ये इन दोनों का जब देहांत हुआ उसके बाद में मठ में पैसा देने वाला तो ऐसा कोई था नहीं मास्टर महाशय गिरीश घोष ये लोग तो छोटा-मोटा थोड़ा बहुत देते रहेंगे ये लोगों की खुद की आर्थिक अवस्था ऐसी नहीं थी कि मठ को अच्छे से संपूर्ण रूप से सहाय करें तो और उस समय आर्थिक अवस्था ऐसी थी कि शशि महाराज को मैं टीचर की नौकरी करनी पड़ी थी कुछ दिनों तक वहां पास में एक स्कूल होगी वहां पे एज ए टीचर उन्होंने कार्य किया कुछ समय और वहां से उनकी जो सैलरी आती थी उसमें से वह मठ चलाते थे तो ऐसी परिस्थिति तो यह तो मठ की आर्थिक परिस्थिति इस तरह से थी ऊपर में से देखिए कि सन्यासी के हृदय में जो अंतरात्मा की आहवान होता है होती है कि खुला आसमान है नदी है जंगल है पहाड़ है यह जैसे कि सन्यासी को पुकारते हैं और सन्यासी भी यह लोकाल है जहां पर जंगल यहां पर जो मानव वस्ती है यहां पर जो मनुष्य का संग है व सब छोड़ कर के जैसे कि वो है और परमात्मा है बस दोनों है और चारों ओर यह प्रकृति का सौंदर्य विराजमान है ऐसी जगह पर जाने का जैसे कि सन्यासी के हृदय में से भी यह पुकार सब समय उठती रहती है तो ये दोनों ने मिलकर के फिर स्वामी जी के मन में ऐसा एक भाव खड़ा हुआ कि चलो मैं भी प्रव्रज्या प्रारंभ करता हूं और वो फिर वहां से प्रारंभ होकर के पहले तो उन्होंने सोचा नहीं मैं हिमालय जाकर के जब ध्यान करूंगा जैसे मैं पूरा ब्रह्मवर्त में डूब जाऊंगा किंतु देखिए कि यहां पर भी ठाकुर का एक दूसरा इंसिडेंट यह सब वर्ल्ड फेमस इंसिडेंट है जिसने भी ठाकुर की स्वामी जी की कहानियां पढ़ी है उन सबको यह इंसीडेंट्स के बारे में पता है कि वहां पर ही काशीपुर में ही स्वामी जी को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई थी और किंतु उसके बाद में ही ठाकुर ने क्या कहा कि मैंने इस तुम्हारी निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति है उसके ऊपर में चाबी मारक ताला लगा करके चाबी मार दी है और यह चाबी अभी ताले की मेरे पास में है तो स्वा स्वामी जी का एक तो था कि कब यह ताला खुलेगा और फिर कब यह ब्रह्म भाव में लीन हो जाएंगे शरीर त्याग देंगे वो तो एक था बात का एक उनका चिंतन दूसरा क्या था कि स्वामी जी ने खुद जब ठाकुर को कहा था कि मैं चाहता हूं कि सब समय में निर्विकल्प समाधि में डूबा हुआ रहूं और फिर बीच-बीच में आकर के शरीर रक्षा के लिए जो आहार करना है पानी पीना है वो मैं करता रहूं अभी देखिए कि ये शरीर रक्षा तो करनी होगी यदि लंबे समय तक आपको यह नि विकल्प समाधि के आनंद में मगन रहना है तो ठाकुर के साथ में कैसा हुआ था ठाकुर जब निर्विकल्प जब तोतापुरी जी का जब वहां से प्रस्थान हुआ तोतापुरी जी ने ठाकुर को निर्विकल्प समाधि प्राप्त करवा दी किंतु फिर जब तोतापुरी जी का वहां से प्रस्थान हुआ था दक्षिणेश्वर से उस समय ठाकुर ने ठीक किया था कि बस अभी मैं पूरा समय जितना भी समय हो सके निर्विकल्प समाधि में ही बिताऊ फिर यह चिंता नहीं करनी है कि निर्विकल्प समाधि में शरीर त्याग हो जाएगा यह सब कैलकुलेशन तो ठाकुर का था नहीं उनका मन तो सब समय उर्ध्व गति की ओर ही चल रहा था तो ठाकुर वैसे तो निर्विकल्प समाधि में पूरा समय निमग्न रहने लगे उस समय किंतु शरीर की रक्षा कौन करेगा और ये एक उच्च ऐसी अवस्था है क्योंकि ठाकुर ने खुद ने यहां पर हृदय का नाम नहीं लिया यानी कि

Hriday

हृदय ने वैसे तो ठाकुर की बहुत सेवा की किंतु निर्विकल्प समाधि में ठाकुर के शरीर को टिका के रखना वो जो समाधि और साधना का उच्च कक्षा का जो एक्सपर्ट होगा वही ये शायद कर पाएगा तो उस समय एक साधु वहां पर जैसे ठाकुर के साथ में होता है जब जिस चीज की आवश्यकता होती है उनके सामने आन खड़ी होती है तो उसी समय एक साधु वहां पर दक्षिणेश्वर में उसने आगमन किया देखा कि या तो फिर उसके मन में जैसे कि जगदंबा ने ही एक आदेश दिया होगा जो भी है उसने सोचा या तो जगदंबा ने आदेश दिया कि ठाकुर का शरीर लोकहित के लिए टिका के रखना आवश्यक है तो फिर वह क्या करता था ठाकुर निर्विकल्प समाधि में रहते थे तो उनको मार मार करके कैसे भी करके हश में लाता था और जैसे ही ठाकुर हश में आते थे तो थोड़ा बहुत अन्न थोड़ा बहुत आहार उनके मुंह में डाल देता था ठाकुर थोड़ा आहार करके शरीर रक्षा के लिए जो एनर्जी चाहिए उसको प्राप्त करके फिर से जैसे कि समाधि में निमग्न हो जाते थे तो छ महीने तक ठाकुर की ये अवस्था थी छ महीने तक आज पूरी पृथ्वी पूरा मानव समाज यह जो साधु अननोन साधु अनजाना साधु जिसने कि ठाकुर के शरीर की रक्षा की उसके कृतज्ञ है क्योंकि उसी की वजह से निर्विकल्प समाधि में ठाकुर के शरीर की रक्षा हुई ऐसे कितने साधु महात्मा संत जिन्होंने ठाकुर के जीवन में महत्व की भूमिका निभाई है जिनके बारे में हमको कुछ पता नहीं है इसका नाम भी हमको पता नहीं कि कौन यह साधु था जिसने ये छ महीना ठाकुर के देह को टिकाने में मदद की हो तो जो भी है तो यह है निर्विकल्प समाधि यहां पर नरेंद्र कहता है ठाकुर को कि मैं भी निर्विकल्प समाधि में रहूंगा और बीच-बीच में पृथ्वी पर आकर इस लौकिक जगत में आकर थोड़ा आहार करके शरीर को टिकाने का जितना भी आवश्यक है और फिर मैं निर्विकल्प समाधि में चला जाऊंगा उस समय ठाकुर ने क्या कहा कि तू तो बड़ी हीन बुद्धि की बातें करता है मैं तो सोचा था मैंने तो सोचा था कि तुम एक विशाल विराट वटवृक्ष की तरह होंगे जिसके तले में कितने ही लोग य शीतल छाव वो प्राप्त करेंगे किंतु यह तुम क्या बात कर रहे हो तुम जगत को छोड़ कर के निर्विकल्प समाधि में रहने वाले हो जगत को छोड़ के ऐसा तो नहीं कहा ऐसा कहा कि क्यों तुम निर्विकल्प समाधि की बात कर रहे हो इससे भी एक उच्च अवस्था है तब नरेंद्र सोच में पड़ गया कि अरे यह ऐसी उच्च अवस्था निर्विकल्प समाधि से भी बड़ी है यह क्या हो सकती है ने शास्त्र तो कहते हैं कि समाधि प्राप्त करना ब्रह्मा ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना या ब्रह्म में स्थित होना वही तो है मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य किंतु ठाकुर ने खुद ने कहा था जो कि जब आप नेति नेति करके जगत का त्याग करके या तो फिर जगत का त्याग तो आप नहीं कर सकते जो वासना है वितृष्णा है अपने मन का जो लोभ है जो ये जब ग्रीड जिसको कहते हैं काम कांचन के प्रति अपना आकर्षण उसको त्याग करके मन को एकाग्र करके ब्रह्म वृत्ति में मन को एकाकार करके जब साधन भजन करते करते निर्विकल्प समाधि या प्राप्त होगी उसके बाद में इति जब जद जगदंबा की इच्छा होगी ऐसे लोगों को इस लोक में हिक लोक में वापस लेकर आएंगी कि जिनके द्वारा जगत का कल्याण होने वाला है तो ठाकुर ने खुद ने कहा था समाधि के बाद में देव को जैसे कि अभी ये जो भक्ति का अहम दे दिया था मां ने जिससे कि वो भक्ति का प्रचार करे शंकराचार्य को ज्ञान का अहम दे दिया था जिससे कि शंकराचार्य समाज में ज्ञान का प्रचार करें तो वैसे ही ठाकुर को यह भक्ति भक्त लेकर के रहने की एक इच्छा थी ठाकुर के मन में वो एक अहम दे दिया था जिसका सहारा लेकर के ठाकुर इती इती करके जगत में वापस आए किंतु जब वापस आते हैं तब देखेंगे कि जैसे कि अनंत प्रेम उनके हृदय में प्रस्फुटित हो रहा है जितने भी नर नारी पशु पक्षी गास ये जो पेड़ पौधे समुंदर आकाश पहाड़ नदी पर्वत जो कुछ भी है वही जैसे कि अपने ही एक्सटेंशन है ये जड़ ना चेतन ऐसा जो भेद हमको जो दिखता है वो जड़ और चेतन का भेद जैसे कि निर्विकल्प समाधि के बाद में जैसे कि अदृश्य हो जाता है दो घटना है वो जो गंगा के ऊपर में से नौका जा रही है एक किसी को एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति ने जोर से मारा तो ठाकुर देख रहे हैं और जो ऐसा ही एकाकार हो गए थे उस लोगों के साथ में तो जैसे ही उसको मारा तो ठाकुर के श्री अंग के ऊपर में वो आघात के चिन्न दिखाई दिए तो ये चेतन के साथ में एकाकार और फिर वही वो पे वहां पे वो बारिश के बाद में सुंदर वो लोन जिसको कहते हैं घास उगा हुआ था ग्रीन एकदम ग्रीनरी थी ठाकुर देख रहे थे और किसी ने वो घास के ऊपर में से चला पैर रख कर के कोई जा रहा है तो जो एकाकार हो गए थे घास के साथ में तो ठाकुर के पीठ के ऊपर में ऐसे दाग हो गए ऐसे घाव के चिन्ह हो गए जैसे कि कोई उनकी पीठ प पैर रख के जा रहा है तो ये पूरे जगत के साथ में आपका एकाकार हो जाता है सबके प्रति अनंत प्रेम प्रकट होता है तो ये है एक ट्रेजे क्टर ठाकुर ने हमको बताई है कि निर्विकल्प समाधि सबसे पहले तो कामना वासनाओं का त्याग करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करें और फिर ये पूरे जब वापस आए तो पूरा जगत जो है जैसे कि अपना ही एक एक्सटेंशन है इनफाइनों क्षण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गए उसी के बाद में तो 21 दिन के बाद में मृत्यु आवश्यक है किंतु जद ब्रह्मज्ञान के बाद में भी वह जीवित है अपना दैनंदिन कार्य कर रहा है यानी कि जगन माता ने कृपा करके इसको वापस भेजा है और फिर यह जो साइन है लक्षण है वह है अनंत प्रेम उसके मन में किसी के प्रति भी किसी भी तरह का विद्वेष भाव नहीं रहेगा तो ये थी ठाकुर की शिक्षा और यह शिक्षा स्वामी जी के मन के भीतर में थी और इसी शिक्षा के परिणाम से स्वामी जी सोच रहे हैं कि अभी निर्विकल्प समाधि को तो ठाकुर ने ताला लगा दिया है चाबी उनके पास में है तो कैसे भी करके फिर से साधन भजन करके चाबी उनसे छीन ली जाए और फिर से निर्विकल्प समाधि में स्थित हुआ जाए तो यह सोच कर के स्वामी जी हिमालय के लिए प्रस्थान किए साथ में थे ये अखंडानंद जी और फिर ये उस समय उनके दूसरे भी कोई कोई गुरु भाई उनके साथ में थे उसमें से एक शरत महाराज भी थे जब वह अल्मोड़ा गुफा में जब ध्यान कर रहे थे साधना कर रहे थे उस समय किंतु वही महा भयावह घटना स्वामी जी के जीवन में घटी स्वामी जी की बहन ने आत्महत्या की और यह समाचार स्वामी जी को अल्मोड़ा की गुफा में मिला अभी जैसे ही स्वामी जी को यह समाचार मिला स्वामी जी के मन में क्या परिस्थिति प्रकट हुई होगी यह तो हम समझ ही सकते हैं अनुमान कर ही सकते हैं लाडली बहना का जब इस तरह से अकस्मात अपघात मृत्यु हो तो अपने हृदय पे क्या बीतेगी किंतु साथ-साथ में ही देखिए हम लोगों के बीच में हमने हमें और स्वामी जी में यह डिफरेंस एक है कि हम लोग सोचेंगे कि अरे मेरी बहन की मृत्यु हुई मेरी बहन को इस तरह से दुख कष्ट सहन करना पड़ा स्वामी जी ने सोचा कि यदि मेरी बहन के साथ में ऐसा होता है तो यह पूरी करोड़ों करोड़ों बहना हैं मेरी लाडली बहना है पूरे भारत में तो इनके साथ में क्या होता होगा तो यह सोच कर के स्वामी जी अल्मोड़ा की गुफा में से उसी हिमालय की टोच के ऊपर में से जमीन पे वापस आए लिटरली और मेटाफोरिकली दोनों हिमालय से वो पृथ्वी इस गंगा के इस प्रदेश में वापस आए नीचे उतर करके और उन्होंने सोचा भारत का भ्रमण किया जाए भारत की परिस्थिति का निरीक्षण किया जाए और उन्होंने भारत भ्रमण करके जो परिस्थिति

Parivrajak swami vivekananda

देखी उनका हृदय जैसे कि वो कष्ट और दुख के मारे विदीर्ण हो गया उन्होंने सोचा कि इस तरह का यह भारत देश इस तरह के ऋषि मुनियों के संतान इतने कोटि कोटि सालों की अपनी तपस्या अपना यह जो आध्यात्मिक वारसा है योग और वेदांत रूपी जो ट्रेजर हाउस अपने पास में है अपने वेद पुराण उपनिषद में यह जो पड़ा हुआ है क्या इसका कोई भी बेनिफिट यह भारत की जनता को नहीं होगा यही ऋषि मुनियों के संतान यह एक दरिद्रता और ये एक पैशा चिक वृत्ति के शिकार होकर के ही क्या रह जाएंगे तो यह सब स्वामी जी सोच रहे थे सोचते सोचते वो कन्याकुमारी गए वहां पे वो रोक जो था जब जहां पे कि आज विवेकानंद

Vivekananda Rock Memorial

मेमोरियल है उस रोक के ऊपर में बैठ कर के चारों ओर से समुंदर से घिरे हुए स्वामी जी जिस तरह से पूरे भारत के ऊपर में ध्यान कर

Swamiji on the Rock

रहे हैं निवेदिता बड़ा सुंदर रूप से लिखती है कि है कि आत्मन या तो ईश्वर या तो ब्रह्मण के ऊपर में ध्यान करने वाले कोटि

Nivedita

कोटि ऋषि भारत में हो गए होंगे किंतु भारत की यह जो भूमि है भारत की धरती है यह जो भारतीय है उनके ऊपर में ध्यान करने वाला शायद यह प्रथम ऋषि भारत में प्रकट हुए होंगे तो इस ध्यान के भारत ध्यान के परिणाम से वहां पर ठाकुर का आविर्भाव हुआ स्वामी जी को इशारा करके पश्चिम की ओर जाने को कहा बाय दैट टाइम स्वामी जी को ऑलरेडी पता था गुजरात में और बाद में भी वहां पर स्वामी जी को यह समाचार मिल चुका था कि वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन शिकागो में मिल रही है और वहां पर वो जा सकते हैं एज ए जेनुइन रिप्रेजेंटेटिव ऑफ हिंदुइज्म और वहां पर जाकर के वह जब भारतीय संस्कृति वेदांत और योग का प्रचार करेंगे तो उनसे आकर्षित होकर के शायद कुछ धनी लोग उनके शिष्य हो जाए और उन धनी लोगों के धन से स्वामी जी भारत के उत्थान का कार्य कर पाए यह एक वेग एक ऊपर ऊपर से बना हुआ प्लान उनके मन में उस समय था तो ठाकुर ने जब आदेश दिया कि जाओ पश्चिम की ओर तो स्वामी जी ने ठान लिया कि जाया जाए किंतु किस तरह से जाया जाए क्या मैकेनिज्म होगा क्या सिस्टम होगी वो फट कर के तो जहाज में बैठ के चले जाए ऐसा तो शायद नहीं हो पाएगा तो वो वहां से उन्होंने फिर से प्रस्थान किया भारत की भूमि पर वापस आए वो रोक जहां प था आलैंड छोटा सा वहां से और फिर से भ्रमण करते-करते मद्रास आए मद्रास में उनके इर्दगिर्द एक ग्रुप का गठन हुआ वो जो ट्रिपली केट लिटरेरी सोसाइटी के जो सब लड़के थे जिसमें कि मुख्यत था आला सिंगा इन लोगों ने स्वामी जी को इनकरेज किया कि नहीं स्वामी जी आप जाइए ही अमेरिका हिंदू धर्म का प्रचार कीजिए सनातन धर्म के यह जो अपने यह जो ये रत्न है मणि माणिक है उसका विदेश में उसको उनको बटोर है तो फिर वो जाकर के स्वामी जी अमेरिका आए वहां वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में प्रवचन दिया विश्व विख्यात हो गए और फिर किंतु बात सिर्फ यह नहीं है अमेरिका आकर के स्वामी जी की एक नई होराइजन एक नया एक उद्देश्य वो प्रारंभ हुआ जब वो अमेरिका आ रहे थे तब तक तो ऐसा ही था कि कैसे भी करके अमेरिका का धन का एक अंश जद मिले तो भारत के कल्याण के लिए व कार्यरत करें किंतु अमेरिका आ कर के उन्होंने दो नए निरीक्षण किए दो नए निरीक्षण क्या थे सर्वप्रथम तो था कि यहां पे अब अतुल अभाव निय विपुल ऐश्वर्य है ऐसी धन दौलत जैसे कि वो कुबेर का खजाना भी जिसके सामने वो ये हो जाए इस तरह की धन दौलत इस तरह की ये जो टेक्नोलॉजिकल साइंटिफिक प्रोग्रेस अमेरिका में हो रहा है स्वामी जी कहते हैं घोड़ा जो है घोड़ा गाड़ी जैसे एक बड़ा-बड़ा घर जो होता है इस साइज के तो ये घोड़ा की गाड़ियां है और मैंने इतना वो उन्होंने जो अतुल य वैभव देखा और किंतु साथ ये तो स्वामी जी ने एक चीज देखी कि किस तरह से मॉडर्निटी जिसको कहते हैं वो आगे अमेरिका को किस तरह से वो विकसित होने में सहाय कर रही है ये एक उनका निरीक्षण था दूसरा ही निरीक्षण था कि यह लोग भले ही चाहे कितने ही बड़े धन के ढग के ऊपर में निवास कर रहे हो उनके हृदय अभी भी इतने ही जैसे कि अशांत है जितने कि भारत में बहुत सारे लोगों के है और इनको भी वही योग और वेदांत चाहिए जो कि भारतवासियों को चाहिए तो फिर वह भारत को सहाय पहुंचाने वाली बात को स्वामी जी ने कुछ समय तक कुछ दिनों तक स्थगित करके वहीं पर रुक गए योग और वेदांत का प्रचार किया कुछ अपने चुनंबू जिसका नाम था स्वामी अभयानंद और दूसरा था लियोन लड्स ब जिसको कि उन्होंने नाम दिया स्वामी कृपानंद क्या तो यह विदेश की भूमि पर वेदांत का जैसे कि विजय ध्वज उन्होंने सन्यास दीक्षा देकर के स्थापित किया अभी जब स्वामी जी भारत आए जो व भारत में जब कोलंबो की धरती पर उन्होंने अवतरण

Colombo

किया तब उनके मन में जो था उनके जो विचार कि भारत को उनको क्या संदेश देने हैं यह संदेश स्वामी जी ने यह भारत की भूमि पर एक साल से ज्यादा प्रचार करते हुए भारत को यह संदेश दिया कोलंबो से प्रारंभ करके

Lecture tour in India

श्रीलंका आज का जो है उस समय कोलंबो कहा जाता था वहां से यह रामनाथ रामनाथ से ये चेन्नई आज का चेन्नई उस समय का मद्रास फिर वहां से यह बंगोल बंगोल में प्रवचन देने के बाद में फिर यह अल्मोड़ा हिमालय फिर वहां से वह भारत उत्तर भारत का भ्रमण करते करते लाहौर तक ग थे तो यह जो स्वामी जी की भारत की भूमि पर यह जो यात्रा थी दो यात्राएं स्वामी जी ने भारत की भूमि पर की थी एक तो उन्होंने सर्वप्रथम प्रव परिव्राजक के रूप में प्रव्रज्या करते करते जो यात्रा की थी भारत की भूमिका

Parivrajak Itinerary

दर्शन स्पर्श निरीक्षण और भारतीय लोगों की जो दुरावस्था की कहानी के ऊपर में स्मरण मनन निदिद्यासन वो एक उनकी यात्रा थी और यह दूसरी यात्रा कि इस यात्रा के दौरान स्वामी जी ने उन्होंने जो अपना आज तक का

Swamiji in Chennai

चिंतन है उस चिंतन को उन्होंने भारतीय समाज के साथ में उन्होंने बटोरा उन्होंने शेयर किया तो यह जो भारत में उन्होंने प्रवचन माला जो उन्होंने दी इस प्रवचन माला को भारतीय व्याख्यान हिंदी में पुस्तक का नाम है भारतीय व्याख्यान और

Book names

इंग्लिश में उस पुस्तक का नाम है लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा इस दोनों पुस्तक में हिंदी और इंग्लिश के दोनों पुस्तक में यह पूरी उनकी यह जो भारत को देने वाला मैसेज है उसको समाहित किया गया है अभी यह जो प्रवचन माला है उसके जो मुख्य पॉइंट्स क्या है वह हम सबसे पहले देख लेते हैं और ठाकुर के जो उपदेश है उसके साथ में स्वामी जी के उपदेश का किस तरह से कंट्रास्ट होता है सबसे पहले तो स्वामी जी एक आश्चर्यजनक जो सबसे स्टार्टिंग जो आईडिया है स्वामी जी का जिन्होंने उन्होंने भारतवासियों के साथ में शेयर किया उन्होंने कहा कि मुक्ति है भक्ति है सब भूल जाओ यह जो गरीब गुर्ब हैं यह जो अपने असहाय बंधु है बांधव ये जो अपने भाई बहन है उनके साथ में आप अपने यह जो आध्यात्मिक रत्न है वह शेयर कीजिए उनको खाने के लिए अन्न दीजिए स्वामी जी किस तरह से कैटेगरी इज करते हैं जिस कौन सी सेवा कर सकते हैं तो जैसे कि अन्नदान है सर्वप्रथम कैटेगरी उस से उच्च है जैसे कि स्वास्थ्य का दान जीवन दान अर्थात कि मेडिकल जो भी सहाय उनको कर सकते हैं स्वास्थ्य के रूप में उससे भी उच्च दान है विद्या का दान अर्थात कि एजुकेशन और इससे भी उच्चतर दान है ज्ञान दान अर्थात की स्पिरिचुअलिटी को बटोर तो स्वामी जी कहते हैं ये चार कैटेगरी है चारों कैटेगरी में आप अपने भारतवासियों को सहाय करने के लिए लग जाइए तो यह था स्वामी जी का भारत को उपदेश अभी यह प्रश्न होगा कि ठाकुर का जो मुख्य उपदेश था कि कैसे भी करके काली घट में जाकर के पहले तो मां काली का दर्शन कर लीजिए फिर भिक्षुक लोगों को आपको जितनी

Swamiji in Kolkata

भिक्षा बाटनी है वो बाटिए तो यहां पर स्वामी जी ऐसा क्यों कहते हैं कि सर्वप्रथम लोगों को सहाय कीजिए और लोगों को सहाय करते जाइए भक्ति है मुक्ति है सब भूल जाइए लोगों को सहाय करते-करते ही जैसे कि आपको ईश्वर प्राप्त भी होगी लोगों को मदद कर लोगों की सेवा करते करते सहाय क्या सेवा करते करते यही नर रूपी नारायण की सेवा करते करते ही आपको जो है मुक्ति भी प्राप्त हो जाएगी भक्ति भी प्राप्त हो जाएगी क्या इन दोनों में ऐसा कोई कंट्रास्ट नहीं दिख रहा है तो देखिए कि कंट्रास्ट हमको तभी दिखेगा जब तक हम धत के लेवल पे है जब तक हम यह सोचते हैं कि एक मनुष्य एक है ईश्वर एक है और जगत एक है ये तीनों सेपरेट है है किंतु जिस क्षण हम यह सोचना शुरू कर देंगे कि मनुष्य जीव जगत और ईश्वर ये तीनों एक है वही अद्वैतवाद की भूमि पर हम चले जाएंगे तब हमको पता चलेगा कि जो ठाकुर जो कह रहे हैं और स्वामी जी जो कह रहे हैं उन दोनों में थोड़ा सा भी पार्थ क्य नहीं है ठाकुर कहते हैं पहले कैसे भी करके धक्का मुखी करके मां काली का दर्शन कर लीजिए और यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि कैसे भी करके अपना सब कुछ छोड़ कर के बाकी सब कुछ को भूल जा करके नर रूपी नारायण की सेवा कर लीजिए यानी कि जिस काली को ठाकुर एक मूर्ति के रूप में कल्पना करके हमको बताते हैं वही मां काली को वही नारायण को वही व जो जगत के पिता जो है उनका दर्शन करने को स्वामी जी कहते हैं इसी मूर्ख नारायण चंडाल नारायण दरिद्र नारायण इनके भीतर में नारायण का दर्शन करने को कह रहे हैं और जिस शरणागति से हम मां काली की आराधना करेंगे जिस शरणागति से भगवान शिव की पूजा करेंगे वही शरणागति से हमको लोगों को मदद करनी है लोगों की सेवा करनी है तो यदि हम अद्वैत भूमि से देखें तो ठाकुर जिस तरह से महाकाली की भगवान शिव की पूजा करने को कहते हैं और स्वामी जी जिस तरह से नर रूपी नारायण की सेवा करने को कहते हैं इन दोनों में कोई भी प्रभेद नहीं है ये डिफरेंस तभी स्टार्ट होगा जब हम द्वैत भूमि पर आ जाएंगे जब हम यह सोचना शुरू करेंगे कि नहीं मैं तो हूं अलग ईश्वर से और तुम भी अलग हो तुम भी अलग हो ये सब एक विभिन्न विभिन्न जगत है तो ये तो हो गया एक थियोरेटिकल सॉल्यूशन कि स्वामी जी और ठाकुर की ये जो अपेरेंटली जो कंट्रास्टिंग आइडियाज दिखते हैं उसके पीछे में थोरेट्स क्या है तो वो है अद्वैत किंतु यहां पे एक दूसरा भी प्रश्न होगा और वो प्रश्न बड़ा ही सीरियस है चलो थियोरेटिकल फ्रेमवर्क तो हमने समझ ली ठाकुर ने कहा पहले कैसे भी कर के धक्का मुखी करके महाकाली का दर्शन कर लीजिए पूजा कर लीजिए प्रार्थना कर लीजिए यहां पर स्वामी जी कहते हैं सब कुछ भूल जा कर के नर रूपी नारायण की सेवा आप कर लीजिए ये तो चलो हमने अद्वैत वेदांत पर विश्वास करके वही माहाकाली मूर्ति के भीतर में भी है और यही माहाकाली अपने ये चंडाल नारायण दरिद्र नारायण मूर्ख नारायण के भीतर में भी है यह तो हमने थियोरेटिकल स्वीकार कर लिया किंतु जो प्रैक्टिकल प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है उसका सोल्यूशन सहज नहीं है और वो प्रैक्टिकल प्रॉब्लम क्या है ठाकुर कहते हैं कि आपको नेती नेती करके कामना वासना का त्याग करना है और उसके बाद में ही आपकी आराधना जो है साधना जो है वो ठीक ठीक होना शुरू होगी यहां पे जद आपको ठीक-ठीक त्याग करना है तो आपको लोगों से दूर जाना होगा स्त्री पुरुषों से आपको दूर जाना होगा निर्जन जगह पर आपको साधना करनी होगी तभी ये जो कामना वासना धन दौलत के प्रति अपना ना जो आकर्षण है वो धीरे-धीरे करके उसका जो है क्षय होना प्रारंभ होगा वो क्षीण होता चलेगा अदर वाइज देखेंगे कि आप अपने को इसी वो काजल की कोटरी में रखते हैं ठाकुर क्या कहते हैं काजल की कोटरी में रहेंगे और शरीर पर दाग नहीं लगेगा ऐसा कैसे हो सकता है यदि आप लोगों की सेवा करते करते लोगों के बीच में रहे तो ये प्रलोभन कब अपने मन में आ जाएगा कब अपने मन में घर बसा लेगा और कब अपना मन सेवा का जो शुद्ध भाव है उसको छोड़ कर के दूसरी चीजों के पीछे दौड़ना ना शुरू हो यह कौन कह सकता है और इसका जो मैंने एक उदाहरण भी पहले दिया था मैं उस समय रांची में था और रांची में मैंने एक डॉक्टर के बारे में सुना था वो डॉक्टर हमारा बड़ा ही अच्छा एक वॉलंटस ग्रेजुएशन करने के बाद में सीधा वो रांची चलाया बोला वहां पर जो बड़े महाराज थे कि मुझे ये जो नौकरी वगैरह नहीं करनी पैसा नहीं कमाना यह जो मेरे कलीग जो है उनका एक ही एक रहता है कि कैसे भी करके जितना पैसा हो सके इतना बटोरी है दर्दियो को मूर्ख बना कर के और यूरोप अमेरिका में वेकेशन के लिए जाइए आजकल तो ये थाईलैंड वगैरह हो गया नया नया तो यह सब विदेश में वेकेशन के लिए जाना एक स्टेटस सिंबल है डॉक्टरों के भीतर में तो मुझे वो सब कुछ नहीं करना है मुझे तो सिर्फ गरीब लोगों की सेवा करनी है क्योंकि स्वामी जी से मैं प्रभावित हूं तो तो वहां के बड़े महाराष्ट्र बड़े खुश हो गए वहां पर वो प्रतिदिन वो मेडिकल कैंप वो जो मोबाइल वान है उसको लेकर के ये डॉक्टर रेगुलर जाता था गांव में और ये ट्राइबल लोगों के जैसे ही मेडिकल वान आएगी मैं गया हूं वान के साथ में आप विश्वास नहीं करेंगे हजार लोग तो ऐसा करके इकट्ठे हो जाएंगे क्यों क्योंकि आसपास में ट्राइबल विलेजेस में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्कुल जीरो है जो है वो करप्शन से भरा हुआ उस समय की मैं बात कर रहा हूं आज की नहीं आज का मुझे नहीं पता एक समय था कि जब ऐसा था तो अब रामकृष्ण मिशन से मोबाइल वन आएगी रामकृष्ण मिशन से डॉक्टर आएंगे रामकृष्ण मिशन से फ्री मेडिसिन आना शुरू होगी उसके ऊपर में लोगों का इतना भरोसा कि 1000 लोगों की भीड़ तो ऐसे देखते देखते इकट्ठा हो जाएगी फिर तो लोगों को धक्का मार के वहां से निकालना होगा क्योंकि रात हो गई है इन लोगों को तो वापस जाना है शाम को डॉक्टरों को रांची जाने का रास्ता तो बड़ा कठिन है मुश्किल है तो इतनी उसने डॉक्टर ने सेवा की कितने साल उसने सेवा की 10 12 साल उससे भी ज्यादा उसने सेवा की आखिर में पता नहीं उसके मन में एक ऐसा भाव आया कि अरे सेवा करके तो मुझे कुछ मिल नहीं रहा है तो अभी मैं क्या करूं तो वहां पे एक दूसरा एनजीओ था अ क्या हजार एनजीओ आजकल चलते हैं आप थोड़ा बहुत फोटो लेकर के आप अपना एक सुंदर ब्रोशर बना दीजिए आजकल वेबसाइट बना दीजिए बोलिए कि हम लोग यह सेवा कर रहे हैं तो फटाफट करके सीएसआर और इधर-उधर से फंड आना शुरू हो जाएगा तो एक ऐसे हजार एनजीओ ये मशरूम की तरह बारिश में जैसे चारों और मशरूम निकलते हैं वैसे ही हजार एनजीओ आजकल खड़े हो गए हैं तो एक ऐसा एनजीओ उन्होंने कहा इस डॉक्टर को कि आपका तो एक गांव में बड़ा अच्छा पहचान है बड़ा रिस्पेक्ट है आप हमारे यहां आ जाइए डायरेक्टर बन जाइए तो आपका एक स्टेटस है तो स्टेटस की वजह से इन लोगों को डोनेशन भी अच्छा मिलेगा और थोड़ा बहुत सेवा करके डॉक्टर को अच्छा सा सैलरी भी दे देंगे तो इस सैलरी के लोभ में डायरेक्टरशिप के लोभ में यह डॉक्टर रामकृष्ण मिशन छोड़ कर के वहां चला गया और मतलब क्या है कि देखिए पूरा जीवन उसने सेवा करने के लिए बिताना चाहा था आखिर में वो सेवा भाव ईश्वर राम कृष्ण मिशन सबके प्रति जैसे कि उसके मन में एक तरह का एक वितृष्णा प्रकट हो गई तो यह यदि आप सेवा करते हैं तो सेवा करते करते यह काजल की कोटरी में रह कर के यह जो पंच महाभूत का माया का जगत है उसमें रह कर के सेवा करते करते यह जो सब दुर्गुण है अपने में प्रवेश ना करें ऐसा कौन कह स सकता है तो यह बड़ा प्रैक्टिकल प्रॉब्लम है आप आपके सामने एक साधु जो है आजकल जो रामकृष्ण भावधारानी यह प्रैक्टिकल कंसीडरेशन सबसे बड़ा आकर के खड़ा होता है अब थियोरेटिकल फ्रेमवर्क तो हमने समझ लिया कि यदि आप शुद्ध भाव से मनुष्य की सेवा करते हैं नर रूपी नारायण की सेवा करते हैं तो आपको वही भक्ति प्राप्त होगी वही मुक्ति प्राप्त होगी जो कि यही सेवा यही आराधना एक मूर्ति के भीतर में कर रहा है ये थियोरेटिकली तो अपना क्लियर हो गया अद्वैत वेदांत की दृष्टि से किंतु ये जो प्रैक्टिकल कंसीडरेशन है जगत में रह कर के जगत वासियों की सेवा करने से जगत की यह जो दुर्गुण है वह हमारे में ना प्रवेश कर दे इसके बारे में गारंटी क्या है तो यह प्रैक्टिकल जो है एक क्वेश्चन इसका उत्तर इजी नहीं है क्योंकि फिर हमको तो स्वामी जी ने चार तरह के योग सिखाए हैं कर्म योग है ज्ञान योग है भक्ति योग है और राज योग है और हमारे संघ में इस तरह से कहा जाता है कि चारों योगों का समन्वय होना चाहिए एक हार्मोनी होनी चाहिए इंटीग्रेटेड वे ऑफ लाइफ होना चाहिए तो हम इस सब चीजों से बच पाएंगे आप सुबह शाम आप ईश्वर की आराधना कीजिए मंदिर में बैठ कर के ठाकुर के गुणगान गाइए भजन साधन कीजिए और फिर उनके उनका नाम गुरु से दीक्षा प्राप्त करके जब ध्यान कीजिए वो एक ट्रेडिशनल वे ऑफ स्पिरिचुअल जो है उसको आप मेंटेन कीजिए उसको छोड़ देना तो कोई कहता नहीं है स्वामी जी तक भी तो ऐसा नहीं कहते कि आपको यह ट्रेडिशनल वे ऑफ लाइफ को छोड़ देना है स्पिरिचुअल पाथ को छोड़ देना है वही है कि उसके ऊपर में एक एडेड वैल्यू एडिशन जिसको कहते हैं वैल्यू एडिशन टेक्सटी तो वैसे ही यहां पे जैसे कि एक प्लगइन एक दूसरा आज का जो मॉडर्न वर्ड है तो आपको एक लेयर ऐड करना है यह जो नर रूपी नारायण की सेवा का तो एक बड़ा ही एक लगता है कि हां चलो एक इस मैच्योर आइडिया है ये एक बड़ा ही एक जो एक वर्ल्डली वाइज पर्सन होगा ना जो जिसको कि हम लोग कहते हैं दुनियादारी वाला जो पर्सन जो कि पूरा एक सब तरह से विचार करके आपको तो ये आपको ऐसा कहेगा दुनियादारी और वर्ल्डली वाइ शब्द वैसे ठीक नहीं है किंतु ये एक वाइस कंसीडरेशन है ये राजा महाराज का ही ये थिंकिंग है बहुत लोग कहते हैं कि स्वामी जी और राजा महाराज के आइडियाज में कंट्रास्ट था और स्वामी जी के जाने के बाद में जैसे कि राजा महाराज का यह जो विचार था उसने जैसे कि अपने संघ को एक दूसरी डायरेक्शन में लेकर गया है राजा महाराज क्या कहते हैं राजा महाराज कहते हैं कि स्वामी जी का कहना है कि वर्क इज वरशिप और

Swami Brahmananda

मैं कहता हूं वर्क एंड वशिप देखिए कितना छोटे से दो वाक्य में उन्होंने इसको एनालाइज किया है वर्क इज वशिप यानी कि नर रूपी नारायण की सेवा करना ही आपकी साधना है उसी के पीछे में आपके जी जान डाल दीजिए उसी में आपका समस्त मन प्राण देह आप समर्पित कर दीजिए तो यह है वर्क इज वशिप यह हो गया स्वामी जी का आइडिया किंतु मैं कहता हूं वर्क एंड वरशिप यानी कि आप ये ट्रेडिशनल वे ऑफ स्पिरिचुअलिटी है उसको भी आप मेंटेन कीजिए मंदिर में जाइए जब ध्यान कीजिए सद ग्रंथ का पाठ कीजिए यात्रा कीजिए ये जो धार्मिक अपने स्थल है उनकी साधु संग कीजिए सब करते रहिए जो कि अपने ट्रेडिशनल वे ऑफ स्पिरिचुअलिटी में प्रदर्शित है साथ-साथ में ही स्वामी जी प्रदर्शित ये सेवा योग है उसका भी अनुष्ठान कीजिए तो ये एक एक वाइस आइडिया हो गया क्योंकि क्या है कि आपका मन कच्चा है मन अभी भी सांसारिक में लिप्त है और फिर आप सेवा क्षेत्र में जाएंगे तो ये डॉक्टर की तरह ना हो जाए कि यह जो प्रतिदिन तो वो गांव में जा रहा है प्रतिदिन तो देख रहा है कि ये जो सेवक है जो लोग बेचारे होकर के गांव वालों की सेवा करने को आते हैं ऐसा नहीं है कि गांव वाले ये ट्राइबल लोग उनको सन्मान नहीं देते हैं ये मेरा खुद का अनुभव में आपको बता रहा हूं ऐसा नहीं है कि वे लोग हमको सम्मान नहीं देते हैं मैं जब भी गांव में जाता हूं गांव वासी ये ट्राइबल जितने भी है वो बड़े ही वो आनंद से हमको अकार करेंगे हमको वेलकम करेंगे बिठाए खिलाएंगे बात करेंगे सब कुछ है किंतु जब भी कोई पॉलिटिशियन है या गवर्नमेंट ऑफिसर है जिनको कि हम एज ए गेस्ट लेके जाएंगे तो वे लोग इमीडिएट समझ लेते हैं कि किसको ज्यादा अटेंशन देना है किसको ज्यादा वेलकम करने से हमको ज्यादा फायदा होगा ये साधू लोग हैं ये सेवक लोग ये तो आते रहेंगे जाते रहेंगे उनका तो काम ही यही है हमारी सेवा करना तो उनको अभी छोड़ो यह जो बैंक का एक ऑफिसर आया है उसको यदि कल्ट वेट करेंगे उसके साथ में अच्छा कनेक्शन एस्टेब्लिश कर देंगे तो हमको बड़ा फायदा भविष्य में होगा तो वे लोग इमीडिएट अपना अटेंशन है ये ऑफिसर के ऊपर में वो लगा देंगे वहां पे क्या था रांची में कि नाबार्ड बोलकर के जो बैंक है नेशनल बैंक ऑफ एग्रीकल्चर रूरल डेवलपमेंट तो हमारे जो बड़े महाराष्ट्र थे रांची के उनको कि नाबार्ड का एक डायरेक्टर बनाया गया था नाबार्ड का ये जो कांस्टिट्यूशन है गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का उसमें एक ऐसा है कि नॉन गवर्नमेंटल सेक्टर से जो एनजीओ जो सर्विस सेक्टर है वहां से किसी को एक डायरेक्टर बनाया जाए तो नाबार्ड का जो ये जो गवर्निंग है उसमें एक एक्स्ट्रा एडेड पर्सपेक्टिव हमको मिलेगा तो हमारे बड़े महाराज वहां पर डायरेक्टर थे नाबार्ड हमको फंड करता था अपने आश्रम को और जब प्रोजेक्ट चल रहा होता है तो उन लोगों को इंस्पेक्शन के लिए ले जाना होता है वो रिपोर्ट वगैरह लिखने होते हैं तो ये लोग इंस्पेक्शन के लिए आते मैं उनको लेकर के ऑफिसर्स जो है नाबार्ड के उनको लेकर के गांव में जाता तो ये मैंने कितनी बार ऑब्जर्व किया है जैसे ही इन लोगों को पता चला वैसे मैं अकेला जाऊंगा अरे महाराज आइए आइए बैठिए बैठिए ये वो वो सब मेरे लिए वो पूरा टेंशन देंगे जब भी किंतु ये ऑफिसर को लेकर जाऊंगा उनको लगा कि ये बैंक का ऑफिसर है लोन दे देगा ना कुछ प्रोजेक्ट सक्शन कर देगा यह वो इमीडिएट मुझे छोड़ के उसके ऊपर में टेंशन देना शुरू करेंगे अभी देखिए यह डॉक्टर भी ये सालों तक यह सब देखता होगा कि वो सेवक है तो जैसे कि उसकी सेवा का ना मूल्य एक समय के बाद में जैसे कि जीरो हो जाता है लोगों की आंख में लोग सोचते हैं कि अच्छा यह तो आएगा ही इसका तो काम ही यही है तो अभी बहुत ज्यादा सेवा करने से यह सेवा का का भी एक जैसे कि मार्केट डाउन हो जाता है और जिनके पास में पावर है रियल पावर है इन लोगों के पीछे लोग सब समय दौड़ते रहते हैं तो फिर मैं भी य क्यों बिना मतलब सेवा करके अपना समय बिताऊ मैं भी क्यों नहीं इस तरह का पावर इकट्ठा करूं जैसे कि मैं भी जब भी गांव में आऊंगा लोग सबसे पहले अटेंशन मुझे देंगे तो मैं प्रोजेक्ट सक्शन करवा सकता हूं लोगों को हेल्प करवा सकता हूं बियोंड व्हाट आई एम डूइंग यूजुअली इससे आर आगे चल कर के मैं कुछ कर सकता हूं ऐसा ये डॉक्टर के मन में आ गया होगा और और फिर ये उसका ये जो मानसिक पतन का जो प्रारंभ हुआ वो वहां से हुआ होगा यह मैं अपने एक्सपीरियंस से कह रहा हूं मुझे पता नहीं कि उसके माइंड में क्या चलता होगा किंतु ये मैंने खुद के ये जो मेरा जो दो ढाई साल का जो राची का एक्सपीरियंस था उसमें या मैंने बार-बार ये अनुभव किया है कि गांव वाले जो है इंस्टिंक्टिवली उनके सामने सबसे ज्यादा अटेंशन देंगे जिनके पास में रियल पावर है तो ये हम जब जगत में रहेंगे और जगत में जिनकी सेवा कर रहे हैं उ उनका जब एटीट्यूड हमारे भीतर में संक्रमित ना हो चले हम चलो मैं नाबार्ड की मीटिंग में जाता था बैंक में तो वहां पे मुझे कुछ स्पर्श नहीं करता है वो बड़े-बड़े ऑफिसर हैं बड़ी गाड़ी में आ रहे हैं इतना लग्जरियस उनका मीटिंग रूम है वहां पे जो जो स्नेक वगैरह दिया जाता है वह किसी होटल में जाएंगे तो हजारों रुपए का उसका बिल बन जाएगा तो यह सब चीजें मुझे स्पर्श नहीं करती क्योंकि मुझे पता है कि जगत में यह है मैं छोड़ कर के इसको आया हूं डजन मैटर ये लोग लग्जरी में रहते हैं मैं जब अपने कमरे में वापस आ जा जाऊंगा रांची अपने आश्रम में तो खाली कमरा है वहां पे कोर्ट है और वहां पे एक स्टैंड है जिसमें कि मैं अपने कपड़े वस्त्र रखता हूं दूसरे दिन पहनने के और एक कपबोर्ड है जिसमें मेरी कुछ किताबें हैं ये है दिस इज ऑल ऑफ माय पोजीशन आज यदि मुझे रांची आश्रम से निकाल दिया जाए तो ये पहने हुए कपड़े और जो 1015 किताब जो मैंने बटोरी है इसके अलावा मेरे पास में कुछ नहीं होगा मैं सीधा रास्ते पे आ जाऊंगा बट ट डजन अफेक्ट मी क्योंकि मैंने ये कॉन्शियसली डिसाइड किया है कि कुछ नहीं चाहिए बस यही सेवा करनी है तो वहां तक तो ठीक है किंतु आप जिनकी सेवा करते हैं उनका जब ये एटीट्यूड है कि हां ये तो एक फकीर आदमी है इसके पास में कुछ नहीं उसका काम ही यही है आ कर के प्रतिदिन आ कर के हमको यह सब हेल्प करता है डजन मैटर हम उसको अटेंड नहीं भी करेंगे अटेंशन नहीं भी देंगे वो आता रहेगा जाता रहेगा उससे कोई टेंशन लेने की बात नहीं किंतु ये बैंक का जो गवर्नर ये जो है ऑफिसर है या तो फिर उस समय कभी-कभी हम ये जो गवर्नमेंट ऑफिसर है आईएएस ऑफिसर उनको लेकर के गांव में जा ते थे जब बड़े-बड़े प्रोग्राम होते थे तो इन गवर्नमेंट ऑफिसर वगैरह के साथ में एकदम अच्छा रखना है जिससे कि भविष्य में यह लोग हमको हेल्प कर पाए यह एटीट्यूड जब हम उन लोगों में देखते हैं तो वो एटीट्यूड रिवर्स होकर के रिबाउंड होकर के अपने में ना आए उस समय अपने मन में यह वासना जागृत ना हो जाए कि इनके पास में जो पावर है वो पावर मुझे चाहिए दैट वे आई कैन सर्व बेटर माने वही आइडिया है कि टू सर्व बट हाउ टू सर्व बेटर तो नॉट बाय अटेनिंग गॉड बट बाय अटेनिंग मोर पावर ये जो तलवार की धार पे जो चलने वाला है रस्य धारा निशिता कवियो वदंती ये जो कहते हैं जो अपने कवि लोग ऋषि लोग कि ये साधन का भजन का जो रास्ता है तलवार की धार पर चलने वाला है कभी इस ओर गिरेंगे कभी उस ओर गिरेंगे कभी तलवार ही हमको लग जाएगी तो यह सेवा का रास्ता भी इतना डेंजरस है और इसीलिए जो अपने मन में कंफ्यूजन खड़ा होता है कि जगत का त्याग करके साधन भजन पहले कर ले या तो फिर जैसे स्वामी जी ने कहा है सब कुछ छोड़ कर के यह सेवा के ही रास्ते में चले जाए नहीं कि फिर जैसे ब्रह्मानंद जी महाराज ने अपने को मिडल वे जो दिया है वर्क एंड वरशिप दोनों साथ में चला के रखो एक वाइज आईडिया है तो क्या किया जाए ओवरऑल आज जो रामकृष्ण मिशन की ये जो पोजीशन है वर्क एंड वरशिप वाली है सुबह शाम आप अपना जब ध्यान है साधन भजन है करते रहिए और जहां तक हो सके आप साथ में सेवा भी कीजिए स्वामी जी का जो रेडिकल आईडिया कि पूरे भारतवर्ष में अग्नि की तरह अग्नि ये जो जंगल में जो दावा नल किस तरह से फैलता है वैसे 100000 मेन एंड विमेन फायर विद द जल ऑफ होलीनेस तो ये जो भीतर में ये जो प्रचंड विश्वास की ज्वाला लेकर के लोगों को सहाय करने की लोगों की नर रूपी नारायण की सेवा करने की ये जो प्रचंड उत्साह लेकर के लाखों नर नारी पूरे भारत में फैल जाएंगे पूरे भारत का नक्शा परिवर्तित कर देंगे ये रेडिकल आईडिया टुडे इट इज नॉट देयर इन अवर एटीट्यूड इन अवर वे ऑफ वर्किंग तो क्या स्वामी जी का ये जो रेडिकल आइडिया है इट इज आउट ऑफ हिज टाइम क्या एक स्वामी जी ने एक पता है ना वो नरें शरत महाराज और उनकी बात हो रही थी योगेन महाराज की शरद महाराज कहते हैं नरन बड़ा कन्फ्यूजिंग है जब जो बात करता है इतना बड़ी करके करता है भक्ति की बात करेगा तो ऐसा लगेगा कि जगत में भक्ति के अलावा कुछ नहीं है कर्म की बात करेगा तो लगेगा कि जगत में कर्म के अलावा कुछ नहीं है है तो मैं क्या करूं क्या ना करूं समझ में नहीं आता है योगेंद्र महाराज ने कहा तुम जाके मां को पकड़ो मां जो निष्ठा सिद्धांत देगी वो ठीक-ठीक सिद्धांत देगी तो हमको भी ऐसा लगता है कि ये स्वामी जी ने उत्साह में आकर के एकदम प्रचंड उसमें आकर के क्या उन्होंने एक बार बोल दिया लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू लम भारत में ये बात प्रसारित कर दी किंतु क्या स्वामी जी के मन का ये सही सही भाव नहीं था बाद बाद में क्या स्वामी जी ने अपने आईडियाज को मॉडरेट किए हैं बाद बाद में क्या स्वामी जी ने ऐसा कहा है कि नहीं कुछ क्षण के लिए यह वैलिड है यह जो भारतीय व्याख्यान का सेंट्रल आइडिया कुछ क्षण के लिए वैलिड है कुछ लोगों के लिए वैलिड है काल और समय और व्यक्ति इन तीनों की सीमाओं के बंधन में यह बंधा हुआ है कि ये काल व्यक्ति और समय इन सबकी सीमाओं के परे एक इटरनल उद्देश है जैसे कि एक नया योग स्वामी जी ने ऐड किया है बियोंड अवर ट्रेडिशनल कर्म ज्ञान भक्ति एंड राजयोग स्वामी जी ने हमको एक नया योग दिया है सेवा योग नर रूपी नारायण की पूजा का ये योग ये कंपलीटली न्यू कंट्रीब्यूशन ऑफ स्वामी जी व्हिच गोज बियोंड द व्हाट इज द टीचिंग ऑफ गीता एंड अवर शास्त्रास यह प्रश्न अपने मन में खड़े होते हैं और इन प्रश्नों का कोई सहज उत्तर नहीं है यह सब वो क्वान की तरह है कि एक हाथ से ताली कैसे बचती है उसका उत्तर आप दीजिए जिस दिन उत्तर मिल गया उसी दिन आपको इनलाइटनमेंट मिल जाएगा सो दिस इज अनदर ऑफ दैट क्वान अपने ऑर्डर के जिस दिन इसका उत्तर हमको मिलेगा निश्चय हमको इनलाइटनमेंट मिल जाएगी तो इसका उत्तर क्या होगा इतनी चिंता करने के वजह हम जो यह जो प्रवचन मैंने सिलेक्ट किया है माय प्लान ऑफ कैंपेन स्वामी जी के आइडियाज क्या है उनका जो चेन ऑफ रीजनिंग क्या है इसको हम बड़ा ही नजदीक से बड़ा ही क्लोजल एग्जामिन करेंगे निरीक्षण करेंगे स्वामी जी के आइडियाज के पीछे का जो उनका माइंड सेट है उसका डिस्कशन करेंगे अंत में जो कंक्लूजन आना है वो सब अपने अपने इंडिविजुअल कंक्लूजन होंगे तो आज यही त अभी कल से माय प्लान ऑफ कैंपेन हम प्रारंभ कर ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्स श्री राम कृष मने ये जो ट्रेडिशनल वर्च्यू है की

प्रश्न: आप सही कह रहे हैं, पावर के पीछे भागने का प्रलोभन बहुत अधिक है, क्योंकि हम सोचते हैं कि अधिक शक्ति मिलने से हम बेहतर सेवा कर सकते हैं।

वैराग्य है शरणागति है ये प्योरिटी ऑफ माइंड है सत्य निष्ठा है ये ट्रेडिशनल वर्च को बढ़ाऊ ना कि और ज्यादा से ज्यादा मैं इन्फ्लुएंस इकट्ठा करूं कि ये प्रोजेक्ट सक्शन करवा दूंगा यह रिसोर्स आपके लिए खड़ा कर दूंगा यह मैंने आपके लिए आउटलेट खड़ा कर दूंगा डिस्ट्रीब्यूशन का मने इसको जद तीन स्टेज में यदि

प्रश्न: रांची वाले डॉक्टर के बारे में

एनालिसिस करने के लिए यदि तीन कहा जाए थ्री आइडियाज फर्स्ट इ राजा महाराज के ही शब्दों में वशिप इज वशिप मैंने बो ट्रेडिशनल आइडिया हो गया वशिप इज वशिप और एक 180 डिग्री स्वामी जी का रेडिकल आइडिया है वर्क इज वशिप सो राजा महाराज का इ इन मिडल वर्क एंड वशिप सो तीन अपने सामने पाथ है ज ट्रेडिशनल पाथ वशिप इज वशिप रेडिकल पाथ है वर्क इज वशिप एंड फिर एक मिडल वे है मध्यम मार्ग है मध्यम पंथा वर्क एंड वशिप किंतु देखिए अभी ऐसा भी तो है ना कि वट इफ हम लोग कल्पना कर सकते हैं कि जद ये डॉक्टर ने अपने मन को संभाल के रखा होता फ संसार में रहकर भी वो शायद ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता था बात यहां पर प्रश्न क्या है कि आप वरशिप इज वरशिप वो पात है ट्रेडिशनल साधना का या तो फिर यह रेडिकल पाथ है स्वामी जी वाला दोनों के पीछे आपको चाहिए विल पावर यदि विल पावर नहीं होगा तो वहां पर आप तमस के चंगुल में से नहीं बच पाएंगे और यहां पर विल पावर नहीं होगा तो यह नेम एंड फेम के चंगुल से नहीं बच पाए यदि आपके पास में विल पावर है तो ट्रेडिशनल वे में साधना करके करके स्वामी जी ने य माय प्लान ऑफ कैंपेन में आगे ही कहा है कि यदि आप कहते हैं कि मूर्ति पूजा गलत है तो मूर्ति पूजा करके राम कृष्ण परमहंस का जन्म कैसे हुआ यदि मूर्ति पूजा करके एक राम कृष्ण परमहंस यदि प्रकट हो सकता है तो मैं कहता हूं चलाओ ऐसी मूर्ति पूजा को क्यों आप मूर्ति पूजा की निंदा करते हो सो ट्रेडिशनल वे ऑफ स्पिरिचुअलिटी में भी आपको सॉलिड विल पावर चाहिए एंड हियर आल्सो ये जो आपको चारों ओर से बफेट करता है ये जो ऑफ वर्नेस उसके सामने टिकने के लिए भी विल पावर चाहिए सो विल पावर इज अ कॉमन थड इन बोथ साधनास इफ यू हैव देम यू कैन सक्ड इन बोथ इफ यू डोंट हैव देम यू आर गोइंग टू फेल इन बोथ बट देखिए विल पावर नहीं है ना तो बेटर की सेवा करते करते मरे रदर देन कि वो झूठ मूठ का तमस में डूब के मरे ट इज ऑलवेज बेटर आपको थोड़ा तो पुण्य मिला सेवा करने का वहां जो आप अपने ही देह के भीतर में चले जाएंगे लोगों का देह न इतना स्ट्रांग हो जाता है कभी-कभी अकेले रहेंगे ना क्रूर हो जाते हैं मैं ये खाना खाना है आज यह करना है आज यह व्रत है पूरा अपने सेल्फिश उनकी इतनी बढ़ जाती है कि सेल्फिश के आगे कुछ देखेंगे ही नहीं पूरे तामसिक हो जाएंगे तो बेटर है कि पतन होना है तो सेवा करके पतन हो 10 लोगों को बेनिफिट तो दिया इस डॉक्टर ने नेक्स्ट जन्म जब प्रारंभ करेगा तो कहां वो उच्च साधना से प्रारंभ करेगा दो जद एग्जांपल देखते हैं हाइपोथेटिकल एक साधक है जो कि तमस में डूबा हुआ है और यह हाइपोथेटिकल एक डॉक्टर है जो कि सेवा करके करके डूबा है तो जब नेक्स्ट जन्म होगा वो साधु तो जीरो से ही स्टार्ट करेगा साधक य किंट डॉक्टर जो है जितने लोगों को उसने हेल्प किया उतना पुण्य उसने बटोरा है ही विल स्टार्ट फ्रॉम हायर पोजीशन नेक्स्ट टाइम यानी हां रजस इज ऑलवेज बेटर देन तमस दैट वाज स्वामी जीज मने मेन कंसीडरेशन और फिर यदि विल पावर है तो यू कैन आल्सो जंप फ्रॉम रजस तु सत्व यानी कि प्रॉब्लम ये है ना जो राजा महाराज जो हमको बड़ा प्रैक्टिकल लगता है ना वर्क एंड वरशिप उसमें भी यह तमस में डूबने वाला तो मामला यही है यदि आप यह कहेंगे कि अच्छा ठीक है यह वर्क जो है उसको फिलहाल छोड़ देते हैं थोड़ा समय के लिए ज्यादातर मुझे ध्यान देने दो वरशिप के ऊपर में या तो फिर मुझे अपने दिन को स्प्लिट करने दो छ घंटा में कार्य कर्म करूंगा छ घंटा में साधना करूंगा वहां पे भी तो ये सेल्फिश स आ सकता है कि हां अभी मेरा टाइम हो गया अभी मैंने दूसरों का काम किया अभी मैं अपना काम करता हूं य जैसे ही दूसरों से मैं आपसे मैं जैसे ही य आया वैसे ही आप तो गड्ढे में गिरना शुरू हो गया फिर मैं मैं करके करके आप जितना भी कुछ कर ले कोई फर्क नहीं पड़ने वाला यानी पिट फुल इ एवरी वेर यह जो माया जो है वो तीनों रास्ते पर वो कराल मुख खोल कर के अपना वो रात देख कर के बैठी है कहां फिसले कहां खा जाए इसको तो जद ऐसा होना ही बेटर की सामी जीी है ना ही है मरना ही है तो सेवा करके मरते हैं उतना तो पुण्य बटोर

प्रश्न: अमेरिका में सफलता के बाद ही स्वामीजी भारत में अपना कार्य शुरू करने में सक्षम हुए

लिया ट इज वन पॉइंट ऑफ लुकिंग एट इट दूसरा है कि मैकेनिज्म एक्सटर्नल सिचुएशन को देखना होगा स्वामी जी जब घूम रहे थे ए परिवल उनको सम्मान देते थे किंतु स्वामी जी के जो आइडियाज वर्क आउट करने की बात है ऑर्गेनाइज होईए या तो फिर लोगों को सहाय कीजिए उसमें कोई भी आगे नहीं आ रहा था अखंडानंद जी का जो एक्सपीरियंस हमने देखा है वो जो खेतड़ी के राजा या तो फिर ये जो वहां लीमड़ी में जहां पर भी उन्होंने लोगों को हेल्प करने की बात की खेतड़ी में सॉरी लिड़ीं नहीं खेतड़ी में और राज वहां पे काठियावाड़ में जहां पे भी उन्होंने ये राजा है या बड़ा आदमी है धनी उसको कहा कि आप हेल्प कीजिए इमीडिएट ये लोग पीछे हट जाते हैं तो स्वामी जी ने क्या सोचा कि इन लोगों को मैं कितना ही बताता रहूंगा ना धनी लोगों को राजाओं को जिनके पास में मींस है सेवा करने का वो कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है और जब स्वामी जी अमेरिका गए तो वो जो इंपैक्ट हुआ भारत के ऊपर में तो पहले तो एक जागृति आई सेकंड की एक न्यू क्लास ऑफ पीपल स्टार्टेड कमिंग टू स्वामी जी जैसे कि ठाकुर के पास में ट्रेडिशनल साधक आते थे किंतु उसमें से ठाकुर का डिसाइल ए सच बाद में कोई नहीं बना या तो डिसाइल होक के अपने से निकल गए हैं ऑर्गेनाइज वही हुए जो कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़े हुए मिडल क्लास के लड़के तो ये जो मिडल क्लास एजुकेटेड यूथ दिस इज द की डेमोग्राफी जो कि स्वामी जी को अट्रैक्ट करना था वो उन्होंने चेन्नई में किया भी सही मने अप टू एन एक्सटेंट किंतु जो अमेरिका का जो असर भारत पे हुआ और ये जो की डेमोग्राफी स्वामी जी के के पास में आया मिडिल क्लास एजुकेटेड यूथ दे वेर द वन टू कैरी फॉरवर्ड स्वामीजी मैसेज तो ये मैकेनिज्म का भी एक प्रॉब्लम था राजाओं को आप जितना भी कह ले ये शेठ है धनी है कितना भी कह ले पता है कि ये लोग करप्शन में डूबे हुए हैं मतलब मोरल करप्शन में मोरल करप्शन इतना गहरा है कि ब्रिटिश लोग आराम से अपने पर राज कर लेते हैं उनके पर भरोसा करने से कुछ होने वाला नहीं है सो टू टू कैप्चर दिस की डेमोग्राफी ट सक्सेस इन अमेरिका वास एसेंशियल एटीट्यूड का डिफरेंस है फंडामेंटल

प्रश्न: साधक और अधिकारी की सेवा में क्या अंतर है?

डिफरेंसेस ऑफ एटीट्यूड आप लोगों पर दया कर रहे हैं आपको एक सम्मान मिल रहा है लोग कहेंगे कि य एक बड़ा दाता है तो यू क्रेव ट रिकॉग्निशन एंड हियर वी डू नॉट क्रेव ट रिकॉग्निशन जैसे कि अभी मैं यह नाबार्ड के ऑफिसर्स को लेकर गांव में जाता था मैं क्या देखता था कि दे दे लव अटेंशन कि लोग गांव वाले आते हैं उनको साहब साहब करके चारों और घिर लेते हैं साहब यह देख लीजिए वो हम करवा दीजिए दे लव दिस अटेंशन ऐसा नहीं है कि वो मेरे दे हेल्प देम मोर देन आई डू मेरे पास तो कुछ नहीं है देने के लिए उनके पास में तो पूरा गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का हजारों करोड़ का बजेट है दे कैन डिस्ट्रीब्यूटर सोर्सेस लाइक एनीथिंग सो दे हैव बेटर मींस ऑफ गिविंग द प्रॉब्लम इज दैट दे क्रेव दिस रिकॉग्निशन दे क्रेव दिस क्या एड्यूलेशन जिसको कहते हैं वो दे क्रेव इट एंड आई एम सपोज टू नॉट क्रेव एनीथिंग बट ट्स अनदर मैटर बट दिस इज द मेन डिफरेंस कि आप रिटर्न में क्या चाहते हैं एक चाहता है रिटर्न मैंने आप इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं सामने मुझे रिटर्न मिल रहा है वो रिटर्न मटेरियल फॉर्म में भी है या तो फिर ये समाज में प्रतिष्ठा के रूप में भी हो बट आई वांट सम रिटर्न दे ट्रीट इट एज एन इन्वेस्टमेंट देन द साधक ट्रीट्स इट एज अ एक्चुअल सर्विस एज अ वशिप इट डंट नीड एनीथिंग ये जो अपनी ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी में भी ये शुद्ध भक्ति किसको कहते हैं कि गोपी गोपियों की भक्ति और बाकियों की बाकी भक्तों की भक्ति कृष्णा के ऊपर में वो जो ठाकुर का फेमस उदाहरण है कि वो चरण की धूल लेने से भगवान कृष्ण की बीमारी ठीक हो जाएगी वो भगवान कृष्ण को अपने चरण की धूल क्यों देगा आप तो कृष्णा में इन्वेस्ट कर रहे हैं मैं उनकी आराधना करूंगा तो मुझे भक्ति मिलेगी चरण की धूल देंगे तो झपट मिलेगी वो आप तो और नरक में जाएंगे वई वुड आई मैं अपने उनको भक्ति करूं कि चरण की रज दूं मैं तो ये इन्वेस्टमेंट के ऊपर में रिटर्न चाहता हूं जबकि गोपियों का है जैसे ही पता चला कि चरणों की धूल देने से उनका ठीक हो जाएगा तो हम भले चाहे नरक में जाए भगवान कृष्ण ठीक रहने चाहिए जो शुद्ध भक्ति है ट इ द हास्ट ऑफ कर्मयोग कि आईम सर्विंग एस वशिप आई डोंट वांट एनीथिंग इन रिटन उनका भला देखि प्रॉब्लम थरी में नहीं आता है थियोरेटिकली हम बड़ा इली रिकन साइल कर पाएंगे शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान शुद्ध कर्म दे ल रीच द सेमलेस प्रॉब्लम आता है प्रैक्टिकल कंसीडरेशन में ट की आप कैसे ल करेंगे आपकी प्रैक्टिकल एक्टिविटी को वहां पर सब प्रश्न खड़े होते हैं वही तो वही तो साधना का डेफिनेशन है यदि आप भक्ति भी करेंगे तो फिर आप आपके मन में जोने रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट वो कितना है वो भाव कि मैं इतना जब ध्यान कर रहा हूं मुझे सामने इतना मिलना चाहिए यह भाव नहीं होगा वो कौन कह सकता है वी लवेज वांट समथिंग इन रिटन कुछ दिया कुछ चाहिए सामने तो वह यहां पर भी है ट्रेडिशनल वे ऑफ स्पिरिचुअलिटी में यहां पर भी है पिट फॉल आर इक्वल एट बोथ प्लेसेस यहीं प एक भी बेनिफिट है कि आपने मर भी गए तो 10 लोगों को आपने वो हेल्प करके गए च विल बी नेक्स्ट जन्म में वहां से मैं स्टार्ट करूंगा