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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 5 Sep 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद के जीवन का पाठ कर रहे थे। वराह नगर मठ की स्थापना के बाद के जो तपस्यामय वह पवित्र दिन इसका विवरण हमने स्वामी जी के जो छोटे भाई थे महेंद्रनाथ दत्त उनकी कलम से थोड़ा सा पढ़ा और साथ में यह डिस्क्लेमर भी कि अपने ऑर्डर में मोहिन बाबू की जो किताब है उसको इतनी ऑथेंटिक नहीं मानी जाती। कुछ कुछ फक्चुअल एरर्स भी है। कुछ-कुछ शायद फिलोसोफिकल कंफ्यूजन भी है। जो भी है ठाकुर कहते हैं ना लेजा मुड़ो बाद दिए नेवे अर्थात कि मछली होती है वो मछली को खाने के लिए उसकी जब खाते हैं तो उसका सर और उसकी पूंछ वो उसको शायद अखाद्य माना जाता है। सर खाने वाले लोग हैं जो जनरली नहीं खाते। तो ये दोनों को बात करके मछली खानी चाहिए। तो यहां पे भी वह लेजामूडो बात दी है अर्थात कि मछली का सर और उसकी पूछ हटा करके जो कुछ-कछ प्रसंग मुझे अच्छे लगे उनकी किताब में उसको हम पढ़ेंगे। तो कल का

श्री रामकृष्ण के शिष्यों का चरित्र निर्माण

जो प्रसंग हम पाठ कर रहे थे कल ऑलरेडी देखा कि किस तरह से गुरु भाइयों में दो चीज एक तो तपस्या करने की प्रचंड इच्छा वासना मुमुक्षत्व वह उनमें जागृत हो गया था ठाकुर की महासमाधि के बाद में क्योंकि पिछले कुछ महीने तो उन्होंने ठाकुर के साथ में ही बिताए थे दक्षिणेश्वर में जाते थे तो संडे संडे को जाया करते थे जबकि कॉलेज में या अपनी जॉब में छुट्टी होती है उस समय जाने का मौका मिलता था या तो फिर कभी-कभी ठाकुर अपने से जब कोलकाता आते तो जिसके घर जाते वहां आसपास में जितने भी यह त्यागी संतान है उनको बुला भेजते। अभी यह जैसे कि अधर बाबू के वहां पर गए थे ठाकुर तो ठाकुर ने पूछा कि राखाल को बुलाया कि नहीं बुलाया तो अभी राखाल को आमंत्रण तो दिया था शायद अधर बाबू ने किंतु राखाल आया नहीं था। तो अभी ठाकुर की उत्कंठा देखकर के किंतु फिर अधर बाबू ने यह नहीं सोचा कि यह नहीं कहा कि मैंने तो उसको बुला भेजा है। अभी नहीं आया तो मैं क्या करूं ऐसा नहीं। उन्होंने इमीडिएटली अपना खुद का गाड़ी भेज दिया और अपने किसी के साथ में कि जाओ उनको गाड़ी में बिठा करके लेकर आओ। ठाकुर बड़े ही उत्कंठित हो रहे हैं उनके साथ में वार्तालाप करने के लिए। तो इस तरह से यदि यह लड़के शायद दक्षिणेश्वर में जाते तो कभी-कभी ठाकुर खुद कोलकाता आकर के उनके साथ में वार्तालाप करते हैं। तो वह एक ऑकेजनल एक था उन लोगों का संपर्क किंतु और साधना तो वैसे उन्होंने प्रारंभ कर ही दी थी किंतु साधना की इंटेंसिटी और यह गुरु शिष्य इंटरेक्शन जो है उसका यह इंटेंसिटी काशीपुर वहीं पर सबसे ज्यादा आगे बढ़ा और फिर जब से ठाकुर की महासमाधि हुई यह त्यागी संतान वैसे तो घर तो गए थे किंतु हृदय पड़ा हुआ है यह जो ब्रदरहुड का जो बॉन्ड है। यह जो प्रेम के जो सूत्र से ठाकुर ने उनको बांध दिया है। सूत्रे मणि गणा इव जैसे कि गीता में कहते हैं यह ठाकुर के प्रति श्रद्धा और आपस में प्रेम और मां शारदा के प्रति संतान भाव यह जो सूत्र ठाकुर तैयार करके गए थे। इस सूत्र में प्रत्येक गुरु भाई एक मणि की तरह परोया हुआ था। इस धागे में एक मणि या तो एक मुक्ता एक डायमंड की तरह उनको जैसे ठाकुर ने एक सूत्र में बांध दिया था। तो जैसे ही वराह नगर मठ की स्थापना हुई सभी गुरु भाई धीरे-धीरे करके पहले तो चार गुरु भाई कि जिनके पास में घर जाने के लिए कुछ बचा नहीं था। किंतु धीरे-धीरे करके सभी गुरु भाई वहां पर आकर के मोर और लेस परमानेंटली रहना शुरू कर दिए थे। तो उन दिनों की प्रारंभ के दिनों की यह जो पूत पवित्र यादें हैं उसमें से कुछ एक हमने कल देखा था कि किस तरह से शौचागार एक शास्त्र चर्चा करने की पाठशाचा में परिणत हुआ था। स्वामी जी ने कहा कि परमहंस महाशय यदि इतनी कठोरता किए हैं तो क्या हम थोड़ी सी भी कठोरता नहीं कर पाएंगे? यदि उन्होंने 16 आना किया है तो क्या हम एक आना भी नहीं कर पाएंगे? तो इतना प्राण के आवेग से हृदय स्पर्शी भाषा में स्वामी जी ने यह बात कही कि सभी गुरु भाइयों के मन में यह सेवा रूपी साधना करने की बात जैसे कि अग्नि शिखा की तरह उनके हृदय में प्रज्वलित हो गई। और सेवा भी कैसे करनी है? साधन रूपी सेवा कैसे करनी है? जैसे प्रॉपर साधन भजन किया जाता है। ठाकुर कहते हैं तो एक राजसिक साधक है। वो पीतांबरी पहनता है। गले में वो मालाएं पहनता है रुद्राक्ष की और फिर सर के ऊपर में तिलक लगाता है। गले में कंठी है ना कि फिर यह हाथ में वो जप माला की झोली है। फिर वह झोली लेकर के बाजार में जाकर के भावताल भी करता है। वह झोली रूपी जो जिस उंगली में झोली पहनी हुई है। जपमाला की उसी उंगली से दिखा देता है। यह मछली दो, वह सब्जी दो। ऐसा करके करके तो क्या है कि उन लोगों का दिखावा ही एक बहुत ज्यादा रहता है। तो किंतु एक सात्विक भक्त है। ठाकुर कहते हैं कि वह मॉस्किटो नेट लगा करके उसके भीतर में वह जप कर रहा है। घर वाले सोचते हैं कि यह अभी नींद से उठे ही नहीं है। शायद रात को देरी सोने में देरी हो गई होगी। तो अभी भी वे लोग सोए हुए हैं। तो किंतु ऐसा नहीं है सो रहे हैं। मॉस्किटो नेट में ही बैठे-बैठे जप कर रहे हैं। तो साधन भजन अत्यंत गोपनीय रूप से होना चाहिए। यह जो मास्टर महाशय की कहानी योगेंद्र महाराज ना कि किसी के साथ में दक्षिणेश्वर में यही साधन भजन लेकर के वार्तालाप कर रहे थे। तो एकाएक ठाकुर ने आकर के मास्टर महाशय को कहा कि यह सब बातें जितनी गोपन रहे, जितनी सीक्रेट रहे, उतना ही अच्छा है। तो इस तरह से ठाकुर ने उनको सिखाया था साधन भजन का ढंडोरा कभी भी पीटना नहीं है। कभी समाज में जाकर दिखाना नहीं है कि मैं इतना कर रहा हूं। मेरे इतने जप चल रहे हैं। मेरे इतने यह सब मैं कर रहा हूं। इसका एक ड्रॉबैक क्या है? पता है? मैं जब रामकृष्ण मिशन में ज्वॉइ करने को आया था तो मैं एक्सपेक्टेशन ले आया था कि लोग अपनी सिद्धियों के बारे में बताएं। अपनी उपलब्धियों के बारे में बताएं। मैं कभी-कभी यह जो रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज या तो रिवर्ड वाइस प्रेसिडेंट महाराज के सेवक महाराज जो होते थे उनको मैं पूछा करता था। माने इतनी घृष्टता थी मेरे में मूर्खामी थी कि अच्छा महाराज दिन में कितना जप करते हैं? कितने घंटे तक ध्यान करते हैं? उनको कोई उपलब्धि हुई है कि नहीं? तो सेवक महाराज मेरी बात सुनकर के हंसते थे कि अभी यह उसको कुछ पता नहीं है। तो उसका एक गलत अर्थ मैंने यह निकाल लिया था कि इन लोगों को साधन भजन करने की कोई कैपेसिटी ही नहीं है। तो जो भी है कुछ ही समय के बाद में यह भ्रम दूर हो गया ठाकुर की कृपा से। किंतु यह एक ड्रॉबैक है कि कंपेयर टू इस तरह के लोग जो कि बहुत ज्यादा दिखावा करते हैं सोशल मीडिया पे समाज में घूमघूम करके लोगों को कहते हैं कि मैंने यह मुझे यह दर्शन हुआ है। मैं दिन भर जप करता रहता हूं। तो लोग उनसे प्रभावित तो काफी हो जाते हैं और कभी-कभी जो एक जेनुइन स्पिरिचुअलिटी की ओर उनको जाना चाहिए वह नहीं जाकर के एक दिखावे की ओर वे लोग चले जाते हैं। किंतु खैर अभी क्या करें? यह तो ऐसा है ना कि आप यदि ठाकुर खुद कहते हैं ना कि जब पुष्प प्रस्फुटित होता है तो मधुमक्खियां अपने से उसको वो जो सौरभ है मधुमक्खियों को अपने से वह प्राप्त हो जाती है। फिर वह कहीं वह जाकर के डंडेरा पीटने की जरूरत नहीं रहती। वो न्यूज़ पेपर में आर्टिकल लिखने की जरूरत नहीं रहती। या तो रामबाबू जैसे करते थे कोलकाता में वह दीवारों पर लिख देते थे कि इस दिन को नगर कीर्तन होगा। तो वो दीवालों पे उस समय के दीवारों पर एडवर्टाइजमेंट आजकल यह सोशल मीडिया पे एडवर्टाइजमेंट तो यह सब करने की वैसे कोई जरूरत नहीं रहती। तो सौरभ से ही यह अमृत रूपी मधु है। उसकी सौरभ से ही यह मधुमक्खियां यानी कि जेन्युइन साधक है वे लोग वहां पर आकर्षित होकर आ जाएंगे। तो जब स्वामी जी ने यह कहा कि ठाकुर ने इतनी तपस्या की तो हम क्यों नहीं करेंगे? तो तपस्या की जो प्रॉपर ट्रेडिशन थी ठाकुर की उसी को अनुसरण करके गुरु भाइयों ने शौच स्थान टॉयलेट क्लीन करना शुरू किया और वह भी इस तरह से कि किसी को पता ना चले। एक दिन सुबह को सबने उठकर के देखा कि वहां पर फर्स्ट फ्लोर पर जो टॉयलेट था वो पूरा क्लीन हो चुका है और यह लोग तो धूम्रपान करते थे। तो यह हुक्का जो है उसमें वह जो धूम्रपान करने के बाद में कोयले की राख वगैरह जो पड़ी होती है वह सब क्लीन हो गई है। फ्रेश कोयला फ्लैश जो तंबाकू है वो उसमें रख दिया गया है। तो सबको आश्चर्य हुआ। किंतु खैर सब समझ ही रहे हैं कि यह तो सब साधना का यह सब साधना करने के लिए उन्हीं के भीतर में से यह सब किसी ने किया है। और फिर यह तो एक कहानी देखी। दूसरा देखा कि किस तरह से शौचालय जो है एक शास्त्र चर्चा में परिणत हुआ था। वह एक बड़ी अद्भुत कहानी है और कहीं पर मैंने इस तरह की कहानी अपने लिटरेचर में पढ़ी नहीं है कि एक साथ में वो गुरु भाई वहीं पर शौच स्थान करने के लिए जगह पर बैठते थे। एक ही गड्ढा था जिसमें कि शौच करना होता था। तो एक शौच कर रहा है तो बाकी सब घिर करके बैठे हैं। राह देख रहे हैं अपनी बारी का और बीच-बीच में हुक्का पीते-पीते शास्त्र चर्चा कर रहे हैं। बड़ा ही अद्भुत कहानी। इस तरह का आपस में ट्रस्ट होना। इस तरह से लज्जा, घृणा भय से मुक्त होना। अष्टपाश ठाकुर कहते हैं उससे मुक्त होना है। लज्जा, घृणा, भय, जातिशील, कुल, मान और अभिमान इससे हमको मुक्त होना है। तभी हम ईश्वर की ओर आगे जा पाएंगे। तो आपस में इतना ट्रस्ट होना, आपस में इतना प्रेम और श्रद्धा का एक यह होना बंधन और फिर लज्जा, घृणा, भय रूपी इस पाशों से मुक्त होना यह इस तरह का चमत्कार सिर्फ श्री रामकृष्ण ही कर पाएंगे। चमत्कार किसी मां की तिथि पूजा सेलिब्रेट हो रही थी। जय राम भाटी में मां की महासमाधि के बाद की बात है तो एक यूरो एक गोरा एक डिवोटी वहां पर आया हुआ था अमेरिकन ना यूरोपियन जो भी है तो वो अभी ये इन लोगों की तो एक हैबिट होती है ना रिलीजन माने मिरेकल तो वहां पर किसी साधु को पूछा कि अच्छा मां के कोई मिरेकल आपने देखे हैं तो उनको उत्तर मिला कि देखिए आप इतने सात समुंदर पार करके एक गांव की सामान्य स्त्री है उसकी एक जन्मतिथि उपलक्ष में आप यहां पर आए हैं उनका दर्शन करने के लिए। तो यह क्या मां के मिरेकल से कम है क्या? अभी गांव की सामान्य स्त्री का अर्थ यह नहीं कि जगदंबा को कोई नीचा दिखाना है। यहां पे बात वही है कि यूरोपियन तो इसी दृष्टि से हमको देखेंगे ना शुरू शुरू में गोरे लोग। बाद में तो यह श्रद्धा भक्ति बढ़ती जाएगी और मां को जगत जननी के रूप में देखना शुरू करेंगे। किंतु यह यहां पे उस वहां से लेकर के जयराम भाटी आए। वही तो है कि उनकी श्रद्धा तो स्टार्ट हो चुकी है और यह इस तरह के विदेशी लोगों की अनपढ़ मां के ऊपर में श्रद्धा हो इससे बड़ा मिरेकल क्या हो सकता है ठाकुर स्वामी जी पे हो तो तो फिर भी समझ सकते हैं कि मां के ऊपर में श्रद्धा वो भी गोरे लोगों की इस नथिंग लेस देन मिरेकल तो यहां पे भी ठाकुर के मिरेकल का एक यह प्रदर्शन है कि किस तरह से स्वामी जी ने कहा ना कि यूनिवर्सिटी के दाना दैत्य यह सब यूनिवर्सिटी के यह ब्रह्म दैत्य है जो कि ठाकुर के पास में आए थे और फिर यहीं पर हमने यह भी देखा कि यह वराह नगर मठ में जो मुख्य जो कमरा था बैठक खाना जहां पर बैठकर के शास्त्र चर्चा डिबेट यह सब हुआ करता था इसको यह लोग कहते थे दाना देर घर अर्थात कि यह ब्रह्मदैत्य ना कि दानव का घर तो क्योंकि यह सब तो एक के बाद एक भैरव थे ना भगवान शिव के साथ में भैरव के रूप में आए थे। भगवान राम के साथ में यह महावीर बनकर के आए थे। तो इस तरह के लोगों की एक जो प्रचंड एक आत्मश्रद्धा होती है, सेल्फ कॉन्फिडेंस होता है, एक सबलाइन ईगो भी होता है कभी-कभी। तो ऐसे लोगों को आपस में एक साथ में मिला मिलकर के बिठाना वो कितना बड़ा एक उपलब्धि है। आजकल हम देखेंगे कि दो सक्सेसफुल लोग हैं। उसको दोनों आपस में बात भी करेंगे। तो इस तरह से जैसे कि कंटीन्यूसली एक दूसरे को असेस कर रहे हैं कि वो बेटर है ना कि मैं बेटर हूं। इसका वो म नेटवर्थ ज्यादा है ना कि मेरा ज्यादा है। मेरी टैलेंट मेरा पावर मेरा इन्फ्लुएंस उससे ज्यादा है ना कि उसका मेरे से ज्यादा है। तो यह कंटीन्यूअस एक सबलाइन कंपटीशन हम देखते हैं जो हाईली सक्सेसफुल होते हैं इस तरह के लोगों में। अब यह जो वर्ल्ड लीडर मिलते हैं या प्राइम मिनिस्टर होते हैं, प्रेसिडेंट होते हैं। तो देखिए कि किस तरह का एक डिस्प्ले ऑफ पावर होता है कि मेरा देश उसका जीडीपी इतना है, मेरा पपुलेशन इतना है, हमारा आईटी इतना ये है, एडवांस है, मैन्युफैक्चरिंग इतना है। एक कंटीन्यूअस कंपटीशन चलता रहता है। तो इस और ये लोग कम नहीं थे ना। एक-एक गुरु भाई को यदि आप खुला छोड़ दे तो एक-एक देश का प्राइम मिनिस्टर बन जाएगा। इतनी शक्ति थी एक-एक के भीतर में। तो इस तरह के लोग अपना घमंड अपना एोगेंस अपना ईगो संपूर्ण रूप से यह श्री रामकृष्ण रूपी यह महा अग्नि में आहुति देकर के स्वाहा करके एक दूसरे के साथ में रह रहे हैं। यह कोई कम बात नहीं है। हम लोग जो आज यहां पे रामकृष्ण मिशन में रहते हैं। हमको पता है कि किस तरह से एक आश्रम में रहा जाता है। सब तो एक हेल्दी और मेंटली फिट यहां पर आए हैं। आने के पहले ही एक तो मेडिकल चेकअप होता है। मेडिकल चेकअप में यदि आप फिजिकली फिट नहीं है तो वहीं से आपको निकाल देंगे। उसके बाद में ट्रेनिंग सेंटर में 2 साल में आपकी मेंटल फिटनेस कैसी है उसका भी टेस्ट हो जाता है। सुबह को 3:30 से लेकर के जो हमारा दिन स्टार्ट होता है रात को 10:30 को अंत आता है। दोपहर को एक डेढ़ घंटे का यदि विश्राम आपको मिल जाए तो आप बड़े लकी है क्योंकि कुछ ना कुछ चलता रहता है। कहीं से बुलावा आएगा उसको बुलाओ, उसको बुलाओ, यह काम कर दो, वह कर दो और पांच क्लास करने हैं दिन के। और फिर क्या है? एक सोशल पीियर प्रेशर तो होता ही है। इस तरह की आप एनक्लोोज्ड जगह में रहते हैं। 30-40 ब्रह्मचारी वो सभी के सभी कोई इंजीनियर है, कोई डॉक्टर है, कोई ग्रेजुएट करके आया है। एजुकेशन का भी क्राइटेरिया है। यानी इस तरह से लोगों को एक साथ में मिलकर के बिठा के रखना आपस में प्रेम भाईचारे का एक संबंध बने। यह मिरेकल से कम बिल्कुल नहीं है। तो यहां पर भी जिस तरह से यह शौच स्थान की कहानी पढ़ी हमने उससे पता चलता है कि ठाकुर का यह मिरेकल जो है कितना पावरफुल था और हमने यह भी देखा कि इस तरह का गुरु भाइयों में आपस में आकर्षण या तो यह बॉन्ड होने की वजह से ही इसके ऊपर में भविष्य का रामकृष्ण संघ स्थापित हुआ। भविष्य का रामकृष्ण मिशन रूपी जो यह इंस्टट्यूट है वह स्थापित हुआ। ऑलरेडी हमने देखा था कि किस तरह से दक्षिणेश्वर यानी कि एक इंडिविजुअल साधना वहां पर की गई। श्री रामकृष्ण देव की यह गुरु रूपी श्री रामकृष्ण देव के सुपरविजन में। यहां पर काशीपुर में श्री मां शारदा देवी ने लीडरशिप ली और किस तरह से यह कम्युनिटी जो है वह दृढ़ बनी और यहां पे वराह नगर मठ में स्वामी जी की आगेवानी हेठड़ यह संस्था या तो इंस्टीट्यूशन प्रारंभ हुआ। तो यह सब हमने कल देख लिया था। अभी यहां पे यह जो पैराग्राफ है उसमें अभी भी कुछ लाइन बाकी है। वो पढ़ लेते हैं। क्या कहते हैं मोहिन बाबू? शौच स्थल बैठक खाना परिणत हो शौच

शौचालय साफ़ करने की साधना

स्थल बैठक खाने में परिणत हुआ शकोले दिगंबरों मध्यम मध्य कौतुक रहस्या आदि योग चलिते छे सब लोग दिगंबर है बीचबीच में हास्य विनोद भी चल रहे हैं क्रमे क्रमे अल्प दिन भीतर विष्ठा परिष्कार एक महा साधना होइया दाड़ाई लो धीरे-धीरे करके कुछ ही दिनों में विष्ठा परिष्कार करना एक महा महा साधना बनकर के प्रारंभ हुआ इहा जेनो ताहा देर एकटा तपस्या होया उठेलो यह जैसे कि उनकी एक तपस्या हो गई एक जनदी भोर रात्रि ते कोरेन पोर दिन अन्न एक जन शेष रात्रि ते उठिया अलख ते परिष्कार कोरिया राखी तेन एवं तत्पर दिन अपर एक जन अर्ध रात्रि उठिया पखाना धत करिया करिया दिया स्वस्थाने शयन कर तेन जैसे जैसे कि यदि कोई एक अर्ली मॉर्निंग को उठकर के कोई शौच स्थान परिष्कार करता तो दूसरा उससे भी आगे उठकर के फिर वो टॉयलेट क्लीन कर देता तो उसके बाद के दिन उससे भी आगे उठकर के कोई टॉयलेट क्लीन कर देता। अर्थात कि सब लोग कंपटीशन कर रहे हैं। कौन कितना जल्दी उठकर के सब लोग जब शयन कर रहे हैं तो वे लोग यह शौच स्थान परिष्कार करेंगे। के जे पखाना धोत करिया राखीते परस्पर का के जानते ना कौन शौचालय क्लीन करते थे एक दूसरे में से किसी को बताते नहीं थे संपूर्ण गोपन रूप से यह साधना करनी है ए रूप अपूर्व भाव जगत खूब कमई देखा गया छ इस तरह का अपूर्व भाव इस जगत में अल्प ही देखने को मिलता है इसके बाद में राजा

स्वामी ब्रह्मानंद की जप करने की विधि

महाराज के बारे में क्या कहते हैं मोहिन बाबू राखाल महाराज बा खुद्रो प्रकोष्ठती ते बश्या अनुण जप कर तेन राजा महाराज बाहर में एक छोटा सा जगह है कमरा या तो फिर वरांडा वहां पर बैठकर के सतत जप करते रहते थे ताहार अति निरीह प्रकृति बालक स्वभाव छिलो उनका बड़ा ही कोमल प्रकृति और बालक स्वभाव था शकली ताहा के विशेष जत्नो कर तेन सब लोग उनको विशेष रूप से आदर यत्न करते थे परे तहार जेू प्रतिभा विकास होइया छिलो तो श रूप किछु ही लखी तो हो ना परे अर्थात कि बाद में जब उन बाद में उनकी प्रतिभा का जिस तरह से विकास हुआ था वो विकास इस समय देखने में बिल्कुल नहीं आया था। देखिए राजा महाराज स्वामी जी स्वयं स्वामी जी जब अमेरिका से वापस लौटे थे तो गुरु भाई लोग आश्चर्यचकित हो गए थे कि वो जो नरेंद्र था और यह जो नरेंद्र है विश्वविजय नरेंद्र वो तो था कि हमारा गुरु भाई हमारा भाई स्वयं जो कि हमारे साथ में एक ही शौच जगह पर बैठकर के वहीं पर शौच कर रहे हैं। शास्त्र चर्चा कर रहे हैं। वो हमारा नरेंद्र कहां और यह विश्वविजय स्वामी विवेकानंद कहां स्वामी जी की पर्सनालिटी जो प्रचंड रूप से जागृत हो गई थी जैसे कि सहस्त्रदल पद्म की तरह प्रस्फुटित हो गई थी वो गुरु भाई ने देखकर के जिस तरह से आश्चर्य हुआ था तो वैसे ही राजा महाराज जब प्रवृज्या करके स्वामी जी बार-बार कहते हैं ना कि राजा महाराज को कि वापस लौटाओ मठ में मठ का कार्यभार ग्रहण करो उस समय मठ था आलम बाजार में तो यह स्वामी जी के बाहर बार बुलावे की वजह से उस स्वामी जी थे अमेरिका लेटर लिखते थे भारत में कहते थे कि राजा को कैसे भी करके मठ में वापस बुलाओ क्योंकि स्वामी जी को पता था कि जैसे ही वह भारत आएंगे वैसे ही यह उद्योग पर्व प्रारंभ होने वाला है। तो राजा महाराज की उस समय अति आवश्यकता थी क्योंकि राजा महाराज ही तो यह पूरे कार्य का भार अपने कंधों पर वहन करने वाले थे। तो स्वामी जी बार-बार कहते हैं राजा महाराज वापस आते हैं तो वह जब राजा महाराज वापस आते हैं तो गुरु भाई लोग देखते हैं कि किस तरह की एक धैर्य किस तरह का एक शांति किस तरह की ईश्वर पर निर्भरता किस तरह की ठाकुर के प्रति भक्ति से उनका मन भर गया था। बात बाद बात राजा महाराज का एक फोटो भी है। कहते हैं कि राजा महाराज जब राजा महाराज को आप पीछे से देखेंगे ना तो बिल्कुल ठाकुर जैसे दिखते थे। एक ऐसा फोटो भी है राजा महाराज का कि पीछे से लिया गया है। ऐसा करके खड़े हैं। धोती पहनी है और खड़े हैं। तो बिल्कुल ऐसे ही लगते हैं जैसे कि ठाकुर तो ठाकुर के भाव का जो उनके भीतर में जो उदय हुआ था जो आध्यात्मिक शक्ति पूरे संघ में फैल करके सभी साधकों को साधुओं को भक्तों को जो शांति देने वाली थी वो शक्ति का परिचय राजा महाराज जब प्रवृज से वापस आए थे सब देखने को मिला था। इसलिए यहां पर मोहिन बाबू लिखते हैं कि बाद में जो राजा महाराज की प्रतिभा का विकास हमको देखने को मिला था वो विकास वराह नगर मठ में उस समय देखने को नहीं मिला था। हालांकि यह बात भी सही है कि सतत जप करते रहते हैं। सभी का उनके प्रति स्नेह है। किसी ने राजा महाराज को बर्तन धोने के लिए दिया था। बहुत बड़ा बर्तन। तो स्वामी जी को पता चला। उन्होंने इमीडिएटली मना कर दिया। तो राजा तो ठाकुर का मानस पुत्र है। इस तरह के बर्तन तुम उनको धोने के लिए मत दो। चाहिए तो मैं धो दूंगा। किंतु राजा महाराज को इस तरह का कार्य मत करने देना। ठाकुर भी यह जो मैनुअल सर्विस है जो सेवा वो राजा महाराज से या स्वामी जी से नहीं ग्रहण करते थे। वो ग्रहण करते थे लाटू महाराज से, शशि महाराज से वगैरह से। तो क्या है कि हमको लगेगा कि इस तरह का डिस्क्रिमिनेशन क्यों है? किंतु इनकी दृष्टि से क्या है ना कि देखिए कि यह सभी के भीतर में अपनी-अपनी एक शक्ति वर्तमान है। रामकृष्ण संघ में सभी का एक-एक स्थान है। मां दुर्गा की जो अष्टभुजाएं हैं। प्रत्येक भुजा में एक-एक विविध रूप का अस्त्र है। तो कई प्रत्येक अस्त्र का अपना-अपना एक कार्य है। तो यदि आप खड़ग को आप तीर धनुष की तरह यूज करना चाहे तो नहीं कर पाएंगे। दूर के दुश्मन है उनको मारने के लिए तीर चाहिए तो पास के दुश्मन को मारने के लिए खड़ग चाहिए और वह जो स्वर्ग में और पाताल में जो पड़े छुपे हुए जो शत्रु हैं उनको मारने के लिए सुदर्शन चक्र चाहिए। तो क्या है कि प्रत्येक शस्त्र का अपना-अपना एक यूटिलिटी है। एक यूज़ है। एक शस्त्र को दूसरे शस्त्र की जगह आप इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। तो यहां पे भी क्या है कि राजा महाराज का एक स्थान था अपने संघ में। स्वामी जी का एक स्थान था अपने संघ में। इस सब स्थानों को समझ करके ठाकुर भी और स्वामी जी भी इनको संचालित करते थे। निरी निर्विवादी युवक राजा महाराज के बारे में कहते हैं निरह और निर्विवादी जो विवाद नहीं करता है सब तरह के विवादों से दूर रहता है इस तरह के वह युवक थे कित दिन परेनी वृंदावन प्रस्थान को लेन कुछ दिनों के बाद में उन्होंने वृंदावन में प्रस्थान किया था शरद महाराज अल्पकाल परे हिमालय प्रवृत्ति स्थान पर्यटन कोरिया चोलिया जा बहुर कथा होई कटिर पर कोटी हया छिलो ठीक स्मरण राखा संभव ना है शरद महाराज भी कुछ समय के बाद में हिमालय वगैरह जगह पे प्रवरज्या करने के लिए चले गए थे बहुत दिनों पहले की बात है बोलकर के कौन सा कुछ सीक्वेंस में घटना हुई वो मुझे याद नहीं देखिए उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार तो कर लिया है क्योंकि यह जो प्रवृद्ध प्रारंभ हुई थी वो 18 89 के बाद में जबकि यह सुरेश बाबू और बलराम बाबू इनके देहांत के बाद में जबकि मठ में आर्थिक संकट बढ़ रहा था उस समय तो एनीवे

नरेन के प्रति शशि महाराज और शरत महाराज की श्रद्धा

अभी शशि महाराज और शरद महाराज की नरेंद्रनाथ के प्रति आगत्य अर्थात कि शशि और शरद महाराज का नरेंद्र के प्रति जो श्रद्धा है उसके बारे में एक प्रसंग ए समय नरेंद्रनाथर आबार बाटिर मुकदमा आरंभ हो उसी समय नरेंद्र के घर में यह जो मुकदमा था कोर्ट केस था वह फिर से प्रारंभ हुआ मुकदमा चालाईते होबे आ घोर वैराग को साधनाओं करते होबे एवं गुरु भाई दिग के एकत्र राखिया सन्यासी कठोर पथ दिखाईते होबे कोर्ट केस चलाना होगा एक ऑन वन हैंड ऑन द अदर हैंड घोर वैराग्य की साधना भी करनी होगी और गुरु भाइयों को एकत्र रखकर के सन्यासियों का कठोर पथ है। उसके ऊपर में उनको चालित करना होगा। कितना बड़ा एक प्रेशर उनके ऊपर में था। एक कोर्ट अर्थात कि यह सांसारिक जितना घोर संसारीपन है सब आपको एक कोर्ट में देखने को मिल जाएगा। क्योंकि वहां पर घोर संसारी लोग ही जाते हैं। क्रिमिनल होते हैं। बाकी जो होते हैं प्रचंड भयानक सांसारिकता वहां पे आपको देखने को मिलेगी। तो कहां यह वराह नगर मठ और कहां यह कोर्ट एक एक जगह से दूसरी जगह जाना माने 1180° आपको अपने माइंडसेट में चेंज करना पड़ेगा। तो यह किस तरह का प्रेशर नरेंद्र के सर पर था उसका तो हम सिर्फ अनुमान ही कर सकते हैं। ए उभय संकटे पिया नरेंद्रनाथ के दुई एक बर शारीरिक और मानसिक जंत्रणा भोग करते होइया छिलो यह उभय संकट में पड़कर के यह धर्म संकट में पड़कर के नरेंद्रनाथ को दो एक साल दो एक बत्सर शारीरिक और मानसिक यंत्रणा का भोग करना पड़ा था महा तेजस्वी ओ वीर पुरुष ना होइले दुटी विपरीत भाव एक संगे राखिया निजे के निरपेक्ष को राखते पारे ना कोई यदि महा तेजस्वी और वीर पुरुष ना होता तो इस तरह के दो विपरीत भावों को एक साथ में अपने भीतर में धारण करके अपने को निरपेक्ष ना रख पाते। जैसे कि म इवन हम भी देखिए ना एक बार यदि कोर्ट में जाने को हुआ किसी भी कोर्ट केस की वजह से तो हम कितने एजिटेटेड हो जाते हैं। कितने रेशलेस हो जाते हैं। भीतर में से किस तरह का एक डिप्रेशन आ जाता है। वहां के लोगों को देखकर के वहां की कार्यप्रणाली को देखकर के वहां का कल्चर देखकर के अभी उसको छोड़कर के वराह नगर मठ में आना है। जहां पे कि अखंड तपस्या की ध्वनि प्रज्वलित हो रही है। श्री रामकृष्ण सदैव वहां पर वर्तमान है गुरु भाइयों के भीतर में। तो कहां श्री रामकृष्ण का भाव और कहां वो कोड ये दोनों भावों को एक साथ में अपने भीतर में रखना और फिर भी पागल ना हो जाना। फिर भी अपना एक मेंटल बैलेंस बनाए रखना। यह महा तेजस्वी वीरवान पुरुष के अलावा और कोई नहीं कर सकता। किंतु इसकी साइड इफेक्ट तो है ही है। इनक्रेडिबल फिजिकल और मेंटल प्रेशर में नरेंद्र उस समय जी रहा था। मुकदमा चाल बार टाकार एतो अनन जे एक दिन शशि महाराज और शरद महाराज नरेंद्रनाथ के अनुनय करिया बोली लेन जे देखो भाई नरेंद्र तोमार टाकार एकन बो दरकार मुकदमा खर्चा बेशी हमरा कोनो दुई जने गिमरा केनो दुई जने गि बाली ते स्कूल मास्टरी को ना किु किु रोजगार करी आर तार मठे ऐसे थाकी ता होले से टाका थेके तो किु उपकार होते पारे यह कोर्ट केस करना है तो पैसा तो यह खा ही जाएगा। हमारा सबका यह तो एक अनुभव है। तो यदि पैसों की इतनी आवश्यकता नरेंद्र को है किंतु घर में तो यह खाने के लिए भी व्यवस्था नहीं है तो कोर्ट केस चलाने के लिए कहां से पैसा आएगा? तो शशि और शरद इन दोनों ने नरेंद्र को विनती करके कहा रिक्वेस्ट करके कहा कि भाई नरेंद्र तुमको तो पैसों की इतनी आवश्यकता है। कोर्ट केस करने में खर्चा भी इतना है तो क्यों नहीं हम दो भाई बाली में बाली एक म्युनिसिपालिटी एक जगह का नाम है। वहां पर किसी स्कूल में हम लोग टीचर की नौकरी कर लेते हैं। उससे जो सैलरी मिलेगी वो सैलरी हम तुमको देंगे और तुम्हारा कोर्ट केस इससे चलेगा। ऐसा करने की तुम हमें अनुमति दो। देखिए वह कितनी बड़ी बात है। दो त्यागी सन्यासी स्वामी जी के लिए स्कूल में नौकरी करने को तैयार है। नरेंद्रनाथ अप्रतीब होइया बोलीलेन आरे शरत आर शोशी कोरिश की नरेंद्रनाथ बड़ा ही अप्रतीब होकर के बड़ा ही आश्चर्यचकित शॉक्ड जिसको कहते हैं इंग्लिश में होकर के कहा कि अरे शरद अरे शशि यह क्या बात कर रहे हो तो राजे आमार्जन ने प्राण दते पारिश तामी जानी तुम लोग मेरे लिए प्राण दे सकते हो प्राण न्योछावर कर सकते हो यह मुझे पता है किंतु ए शो करते होवे ना किंतु यह जो टीचर की नौकरी है इसको करने की कोई जरूरत नहीं है। ए बोलिया तहां दिग के निरस्त को लेन यह कह के उन लोगों को निरस्त किया उन लोगों को नौकरी नहीं करने दी। हालांकि हमको यह बात भी पता है कि कुछ समय क्योंकि मठ में भी तो वही परिस्थिति थी ना। मठ में भी आर्थिक तंगी थी ही थी। तो फिर शशि महाराज ने कुछ समय इस तरह से टीचर की नौकरी अवश्य की थी। किंतु स्वामी जी ने अपने लिए इन लोगों को नौकरी करने से मना कर दिया था। निस्वार्थ भो भाषा कहा के बोले एवं महापुरुष की करिया होई बार जनो ए सामान्य गोलपटी उल्लेख करा हो किसको निस्वार्थ भाो भाषा अर्थात कि निस्वार्थ प्रेम कहते हैं और एक महापुरुष हम कैसे हो सकते हैं यह दिखाने के लिए इस बात का इस कहानी का उल्लेख किया गया है लाटू महाराज के बारे

लाटू महाराज की जप करने की कहानी

में लाटू महाराज की जप करने की प्रथा जप करने की विधि एक दिन शरद महाराज एक अभिमान करे बोलले एक दिन शरद महाराज ने थोड़ा सा अभिमान करते कहा कि देखे छो हे लेटो शाला शलो चे सब चे उड़ी उड़ी ऊंचिए जा और आमरा श पेने पड़े रहो देख रहे हो कि ये लेटो जो है म ये अपभ्रंश है लाटू का लेटो सबसे आगे बढ़ जा रहा है और हम पीछे पड़ गए हैं। आमरा रात्रि घूमिए काटाई आर लेटो साला समस्त रात्रि जप करें। हम लोग रात में सोकर के बिताते हैं और यह लेटो साला समस्त रात्रि जप करता है। शाला आमादिर फांकी दे साला हमको फांकी देता है। हमको मूर्ख बनाता है। तो उपस्थित व्यक्ति जिज्ञासा कर ले की रकम करें। तो किसी ने पूछा कि कैसे करके? तो शरद महाराज ने कहा कि वही वह फेमस कहानी है। हमने इसको काफी बार इसका बारे में बात किया है कि वो लाटू महाराज क्या करते थे? रात को जब सब लोग सो जाते थे तो वह भी ऐसा भान करते थे कि वह सो गए हैं अपने सर पर चादर ढक करके और फिर जैसे ही सब लोग सो जाते हैं तो फिर बैठ जाते हैं अपने बेड पे ही और यह जप माला उससे जप करना प्रारंभ कर देते हैं। अभी शरद महाराज सोच रहे हैं यह खटखट करके आवाज कैसी हो रही है? शायद कोई चूहा भीतर में घुस गया है क्या? तो वह थोड़ा सा उठ करके देखेंगे चारों ओर। तो जैसे ही लाटू महाराज ने देखा कि शरद महाराज उठे तो वैसे फट करके सो जाएंगे, लेट जाएंगे और अपने सर पर चादर ढक देंगे। तो पहली बार तो पहले कुछ समय तो शरद महाराज को पता नहीं चला। किंतु फिर समझ गए कि यह लाटो महाराज जो है यह लेटो शाला शरद महाराज की लैंग्वेज में यह शाला लेटो रात को उठकर के जप करता है और सबसे आगे चला जाता है। तो शरद महाराज कहते हैं कि ठहरो हम लोग भी तुम्हारे साथ में आते हैं। हम लोग भी अर्थात कि मैं भी रात को सोने की वजह तुम्हारे साथ में जप करके बिताऊंगा। तो देखिए कि कंपटीशन भी करनी है तो जप करने में कंपटीशन करनी है। नहीं कि वह फिर वह सांसारिक चीजों में कि किसके पास में ज्यादा धन है। किसके पास में ज्यादा प्रेस्टीज है वगैरह-वगैरह यह कहानी हमने काफी बार इसको देखा है कि यह कहानी का सोर्स है यही अपने मोहिन बाबू। अच्छा अभी

सुरेश मित्र का ठाकुर की पूजा के प्रति विरोध

ठाकुर घर के बारे में। ठाकुर घर अर्थात कि देखिए स्वामी जी ने अपने पत्रों में स्पष्ट लिखा है जो स्वामी जी के पत्रावली का पाठ करेंगे स्वामी जी कहते हैं कि मुझे सबसे बड़ा डर है यह शशि का वो ठाकुर घर अर्थात कि घंटा वो बजाता है भोग देता है वगैरह वगैरह करते-करते ना हम लोग कहीं एक ट्रेडिशनलिस्ट एक साधु संप्रदाय ना हो जाए। इस तरह के संप्रदायों की भारत में कमी नहीं है। इस तरह के साधकों की, ब्राह्मणों की, पंडित की, पुजारी की कमी नहीं है। हमको तो एक उच्च आदर्श के लिए जीना है। अपने जीवन को परिवर्तित करना है। और सिर्फ इतना ही नहीं कि जीवन को परिवर्तित करना है। पूरे समाज को, पूरे देश को, पूरे विश्व को एक नए उजाले की ओर, एक नए दिन की ओर ले जाना है। तो यह स्वामी जी का उद्देश्य था। तो नेचुरली शशि महाराज थे कि ठाकुर की जब आखिरी बीमारी चल रही थी तभी से उन्होंने ठाकुर की सेवा का भार ग्रहण किया था। इतनी यह निष्ठा पूर्वक ठाकुर की सेवा करते थे। अपने संघ में शशि महाराज की यह जो निष्ठा है ठाकुर के प्रति वो बेमिसाल है। माने यहां तक कि रामबाबू स्वयं अपनी किताब में और किसी का इतना यह बड़प्पन नहीं करते हैं। अपना अपने को खुद को स्वामी ठाकुर के प्रधान शिष्य मानते थे। तो किंतु एटलीस्ट अपनी किताब में यह तो लिखा है कि शशि तुमने जो ठाकुर की सेवा का जो आदर्श स्थापित किया है वह हमेशा के लिए एक मिसाल बनकर के वो पूरे विश्व में रहेगा। तो देखिए कि शशि महाराज की ठाकुर के प्रति जो भक्ति थी जो निष्ठा थी जिस तरह से सेवा करते थे जीवंत ठाकुर की उसी निष्ठा से वो ठाकुर के अस्थियों की और ठाकुर के फोटो की अर्थात कि ठाकुर की मूर्ति की भी पूजा किया करते थे तो और माने एकदम निष्ठा के सहित अर्थात कि ठाकुर को सुबह को मुत्सव क्लीन करने के लिए वह ब्रश उस समय तो ब्रश नहीं था यह जो नीम का पेड़ की एक डाल एक काट करके तोड़ करके उसको चिबाया करते थे लोग। तो अभी ठाकुर का देह तो इतना कोमल था। वो एकदम डाल तो सीधी आप उनके नहीं दे सकते। मुंह में डालने से ही मुंह में से रक्त पड़ने लगेगा। तो इसका एक साइड में उसको पत्थर से मार मार करके एकदम उसको इतना सॉफ्ट बना देते थे कि आजकल वो जो सॉफ्ट ब्रश आता है ना वो जैसे आप मुंह में घसते हैं जिसके गम जो है सेंसिटिव होते हैं तो सॉफ्ट वो जो ब्रिसल्स वाला ब्रश यूज करते हैं तो वैसे ही सॉफ्ट ब्रिसल वाला ब्रश है उतना ही कोमल यह डाल का एक साइड कर दे थे ब्रांच का छोटी सी ब्रांच का और ठाकुर को देते थे सुबह को मुंह साफ करने के लिए तो इतनी निष्ठा उनमें थी। किंतु इसको लेकर के खास करके सुरेंद्र मित्र ने जो कुछ कहा वो मोहिन बाबू यहां पर कह रहे हैं। अभी अभी देखिए कि अगेन यह सब बातें हैं कि कितने सारे कंट्रास्टिंग इमेजेस कितने सारे कंट्रास्टिंग भाव है। एक ओर तो सुरेश बाबू ही थे। जैसे कि मठ के पृष्ठ पोषक या तो फिर मठ के अन्नदाता अन्नदाता तो नहीं कहेंगे। वो तो मां है। किंतु जो भी है वो उन्हीं की सहाय से तो वराह नगर मठ चल रहा था। प्रारंभ में प्रारंभ हुआ था। और ऑन दी अदर हैंड इस तरह के जो कुछ स्टेटमेंट देते हैं व्हिच इज सरप्राइजिंग। आप कितना ट्रस्ट करें मोहिन बाबू पे वह भी एक प्रश्न है। और मैं कहता हूं कि इस तरह का जो कंट्रास्टिंग भाव है, इट सिंपली शोज़ आवर ह्यूमैनिटी। कोई भी आदमी परफेक्ट नहीं होता माया के जगत में। इवन हमारे भीतर में भी विपरीत विपरीत भावों का उदय होना स्वाभाविक है। किसी के प्रति हमारी श्रद्धा भी होती है तो कि उसी व्यक्ति के प्रति हम थोड़े से नाराज भी रहते हैं। सो दैट इज नेचुरल क्या कहते हैं? सुरेंद्र मित्र ठाकुर घर करते आपत्ति छिलो। सुरेंद्र मित्र का ठाकुर घर करने के बारे में विरोध था। आपत्ति था तन इहा के दुकानदारी बोलिया मुने करी तेन वो इसको दुकानदारी बोल के मन में सोचते दुकानदारी अर्थात कि जैसे कि दुकान में जाएंगे पैसा देंगे यह चीज ले लेंगे तो यहां पे भी मंदिर में आएंगे पुजारी को दक्षिणा देंगे और आशीर्वाद भगवान का ले लेंगे तो माने एक इनकम करने का एक सोर्स हो गया और कुछ नहीं तठा कोरिया बोली तेन वो मजाक करके कहते हैं शालारा कोरबी की ये साले करेंगे क्या जैमन शीतला ठाकुर बोशाय तेमनी ठाकुर छवि रेखे घंटा बाजाबी और पुजुरी गिरी करवी जिस तरह से शीतला ठाकुर उस समय के पॉपुलर देवता उनकी स्थापना करके वह पुजारी लोग घंटी बजाते हैं तो वैसे ही शीतला ठाकुर बोशाय इसी तरह से ठाकुर की छवि रख के घंटा बजाएंगे और पुजारी गिरी करेंगे तार चाहिए ठाकुर घर ना कराई भालो इससे बेटर है कि ठाकुर घर नहीं करेंगे वही अच्छा है क्या है कि एक दुकानदारी जैसा हो जाता है ना ठाकुर का तो देखिए कि कामकांचन त्यागी थे। वह इवन हृदय कभी-कभी ठाकुर के पास जो लोग आते थे उनसे कुछ ना कुछ बेनिफिट लेने का प्रयास करता था जो कि ठाकुर को बिल्कुल पसंद नहीं था। यह मथुर बाबू ने जब यह कहा कि ठाकुर के नाम पर मैं जमींदारी लिख देता हूं तो हृदय बड़ा खुश हो गया था। क्यों? ठाकुर तो है अधरवली। जमींदारी के साथ में उनका तो कोई लेना देना रहेगा नहीं। ठाकुर के नाम पर वही राज करेगा। वही सब आनंद करेगा। तो क्या है कि ये ठाकुर के नाम पे कोई एक बेनिफिट अपना उठाए। मोनेरी बेनिफिट या पर्सनल वर्ल्डली बेनिफिट ठाकुर को पसंद नहीं था। किसी ने जाकर के ठाकुर को कहा कि राम बाबू ने आपके ऊपर में एक किताब लिखी है। तो ठाकुर ने इमीडिएटली क्या उत्तर दिया पता है कि खूब भो ताले रामेर खूब नाम होवे। अर्थात कि राम का बहुत सारा नाम होगा। ये बहुत बार लोग हम जब इस तरह से किसी महापुरुष पर किताब लिखते हैं तो अपना भी मैंने यह किया साथ-साथ में मैं भी वहां पे था मैं भी यहां पर था ऐसा करके अपना भी गुणगान बीच-बीच में गा लेते हैं तो फिर ऐसा करके रामबाबू का नाम होगा तो अपना खुद का जैसे कि एक क्या कहेंगे अपने को खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए नेम और फेम उसके लिए जैसे कि रामबाबू ने किताब लिखी है यह ठाकुर जैसे कि उनके मन का भाव समझ गए साथ-साथ में ही कहा कि वह तो इसका अर्थ यही हुआ कि रामबाबू का नाम होगा। देखिए यह जो स्वामी जी मास्टर महाशय को कहते हैं, वह पत्र में लिखते हैं कि सोक्रेटिस डायलॉग्स आर प्लेटो ऑल ओवर बट यू हैव केप्ट योरसेल्फ कंप्लीटली हिडन। ये सोक्रेटिस के डायलॉग देखेंगे तो पूरा प्लेटो का ही छाप दिखता है। किंतु आपने कथामृत लिखा है। उसमें अपने को संपूर्ण रूप से छुपा करके रखा है। ट्रेनिंग सेंटर में हमारे आचार्य थे जुष्टानंद जी महाराज। निर्वाणानंद जी के सेवक थे। तो कभी-कभी हम लोग कहते थे महाराज निर्वाणानंद जी की कुछ बातें कीजिए तो बड़े रिलुकेंट है। बात करने की इच्छा है वैसे हम लोग प्रेस करेंगे तो फटाफट बोलना भी शुरू कर देंगे। किंतु साथ-साथ में ये कहते भी थे कि पता ये स्मृति कथा क्या है? ये आत्मकथा है। अर्थात कि आप किसी महापुरुष की स्मृति कथा कह रहे हैं। फिर उसमें अपना क्या रोल है? वह भी आप प्रोजेक्ट कर रहे हैं। जैसे कि मैं उस समय यहां पर प्रेजेंट था। मैं यह कर रहा था। अपने को जैसे प्रोजेक्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। काली महाराज ने एक बार मास्टर महाशय को कहा था अभेदानंद जी ने कि आप जब कथामृत लिखते हैं तो आप सबका नामोल्लेख तो करते हैं कि यह वहां पर उपस्थित था। वो वहां पर उपस्थित था। किंतु आपने मेरे नाम का उल्लेख क्यों नहीं किया है वहां पे? मैं भी तो उस दिन वहां पे था। वहां पे भी मैं था। किंतु उस दिन की आपका जो विवरण पढ़कर के आपने जो इत्यादि लिख दिया है राखाल था, रामलाल था, हरीश था, लाटू था इत्यादि लोग उपस्थित थे। तो मुझे तो आपने इत्यादि की कैटेगरी में ही डाल दिया है। आपने मेरा नाम वहां पर क्यों नहीं लिखा? ऐसा बोल के लिटरली काली महाराज मास्टर महाशय को कंप्लेन करते हैं। तो क्या है कि यह अपने को प्रोजेक्ट करना, पर्सनल नेम, फेम, पावर, प्रेस्टीज, रिस्पेक्ट यह सब अर्जन करना, बड़े लोगों के साथ में अपने को एसोसिएट करके हम करते हैं। तो इसीलिए यहां पे सुरेश बाबू कहते हैं कि इस तरह से ठाकुर की छवि रख के घंटा बजाना और पुजारी गिरी करना यह जब यदि शायद स्टार्ट ना हो जाए यहां पे इसकी वजह ठाकुर घर ना करे वही ठीक है। साथ-साथ में देखिए कि नरेंद्रनाथ भी कहते हैं कि देख आमरा सन्यासी कोथाई खाबो कोथाई थाकोबो ठीक नहीं। देखो हम लोग सन्यासी हैं। कहां पर रहेंगे कहां खाएंगे कुछ ठीक नहीं। ठाकुर घर करे मीछे बिब्रत कोने ठाकुर घर करके बिना मतलब लोगों को परेशान मत करना अभी ठाकुर को यह भोग लगाना है ठाकुर को वो भोग लगाना है आज इस उत्सव का पालन करना है आज ये करना है अभी ये पैसा है नहीं सब सन्यासी कौन कहां पे है किस अवस्था में है कोई दिगंबर घूम रहा है कोई साधन भजन कर रहा है कोई विद्याभ्यास कर रहा कोई पाणिनि ग्रामर पढ़ रहा है कोई वेदांत चर्चा कर रहा है इन सबको पकड़ के ठाकुर का बाल भोग लगाने में ना कि राजभोग लगाने में ना संध्या आरती करने की व्यवस्था करने में लगा दोगे तो क्या होगा कि सन्यास जीवन का जो स्पिरिट है वो शायद हम भूल ना जाए तो कितना सुंदर कहते हैं कि ठाकुर घर करके हमको विवृत मत करना हमको परेशान मत करना ठाकुर घर को ले एकटी के निजस्व थकते होवे आर अनेक चिंताएं ओ थकते होवे ज ठाकुर घर करेंगे मंदिर मंदिर बनाएंगे तो किसी को वहां पर सब समय उपस्थित रहना होगा और बहुत सारी चिंता भी करनी होगी। शशि महाराज का ही रात को सोए हुए हैं। चेन्नई मठ की उस समय के मद्रास की घटना है कि एकाएक नींद से उठ गए। देखा लगा कि वो बारिश हो रही है तो ठाकुर के सर के ऊपर में पानी गिर रहा है। तो बोलकर के वहां छाता लेकर के खड़े हो गए थे। तो क्या है कि इतना सब कुछ सतत आपको ठाकुर की केयर करनी होगी। तो यह सब करना संघ के प्रारंभिक दिनों में यह कितना उचित है पता नहीं तो यह सब न करना ही ठीक है। तार चे ठाकुर आदर्श सामने रख के साधना कराई श्रेय इसकी वजह ठाकुर का आदर्श सामने रख के साधना करना ही श्रेयस्कर है। किंतु शशि महाराज प्रगाढ़ भक्ति सहकार्य समस्त बार निजे लते सम्मत होईले एवं त ठाकुर स्थापन और पूजा विधि प्रणयन कर लेन परंतु शशि महाराज प्रगाढ़ भक्ति के साथ में समस्त भार अपने ही कंधों पर लेने के लिए सहमत हो गए और उन्होंने ही ठाकुर की स्थापना और पूजा की विधि का प्रणायन किया प्रारंभ किया। इसके बाद का जो है अभी हम स्वामी जी का जो नेक्स्ट क्लास होगा उसमें देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम