Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 30 Jan 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः

पश्चिमी विज्ञान से श्रीरामकृष्ण-वेदान्त तक — मेरी सत्य की खोज

अभी कल मैं एक न्यूज़ रिपोर्ट पढ़ रहा था। अह मार्क टली बोल करके एक बीबीसी जर्नलिस्ट था। इंडिया में पोस्टेड था तो उसका डेथ हो गया। तो अभी उसको तो मैं नहीं पहचानता किंतु इसके ऊपर में एक आर्टिकल लिखा गया वह मैं पढ़ रहा था और उसमें सम सरप्राइजिंग थिंग्स आर देयर कि उस समय का जो भारत का इंग्लिश स्पीकिंग जो एलिट था ये इंग्लिश न्यूज़ पेपर इंग्लिश मीडिया ये अंग्रेजी स्कूल में पढ़े हुए यह जो ये जो था ना राजीव गांधी और उसका दून स्कूल उसका यह पूरा ग्रुप उन लोगों का यह भारतीय सभ्यता भारतीय संस्कृति भारतीय धर्म उसके प्रति एक इस तरह का घृणा का भाव था कि कोई भी भारतीय फेस्टिवल होगा हमारे हिंदू लोगों का कोई भी त्यौहार होगा उसके प्रति हमेशा कोई ना कोई नेगेटिव कमेंट करेंगे। उसको हमेशा निम्न दृष्टि से देखेंगे। उस समय यह कुंभ मेला हुआ था। तो कुंभ मेला क्या है? तो जितने भी इंग्लिश न्यूज़ पेपर पढ़ेंगे टाइम्स ऑफ इंडिया वगैरह तो उसमें बस यही लिखा है कि कुंभ मेला है हिंदुओं की अंधश्रद्धा का मैनिफेस्टेशन। हिंदू लोगों के भीतर में ना ही सभ्यता है ना ही संस्कृति है ना ही उन लोगों के भीतर में यह कॉमन सेंस है। बोल के इतना बड़ा मेला करते हैं। जहां पे यह नंगे साधु इकट्ठा होते हैं। पता नहीं क्या व्याभचार होता होगा। यह एक पूरा इंग्लिश मीडिया का व्यू था। तो यह बीबीसी का जर्नालिस्ट है, ब्रिटिश आदमी है, गोरा आदमी है। उसने एक सिंपैथेटिक व्यू रख के हिंदुओं के त्यौहार है, हिंदुओं के कल्चर है, हिंदुओं की सभ्यता है। इसके बारे में सिंपैथेटिक दृष्टि से बात करना शुरू किया। और उसी समय कुछ-कुछ लोगों को यह एक एहसास हो गया था कि ये इंग्लिश स्पीकिंग एलिट है जो कुछ इंडियन एलट और ये जो जन असाधारण है भारतीय जनसाधारण खास करके ये हिंदू समाज उसके बीच में एक बहुत बड़ा गैप क्रिएट हो गया है। अब ये इंग्लिश एलिट है। वे लोग ज्यादातर कांग्रेस में थे और ये जो भारतीय हिंदू जनसाधारण मानव समाज है वे लोग धीरे-धीरे करके बीजेपी के साथ में जुड़ने लगे। बोल कर के ये जो हिंदुत्व और ये बीजेपी इन दोनों का जो राइज होना शुरू हुआ था। खास करके ये रथ यात्रा वगैरह के बाद में अयोध्या मूवमेंट जो हुआ। तो यह जो इंग्लिश स्पीकिंग एलिट है उन लोगों को समझ में ही नहीं आ रहा है कि भारत और यह हिंदू समाज किस दिशा में जा रहा है। सो यह जो ब्रिटिश जर्नलिस्ट था ही इज़ वन ऑफ दोस सिंपैथेटिक पर्सन के हिंदू लोग सुपरस्टिशियन है। ऐसा कुछ कहने की बजाय एक सिंपैथेटिकली हिंदू धर्म क्या है? हिंदू संस्कृति क्या है? वो समझने का प्रयास किया। यह तो आर्टिकल मैंने पढ़ा। फिर देखिए एक्चुअली मेरा भी जो कॉन्शियस मेरा जो यह अवेकनिंग कहेंगे इंटेलेक्चुअल अवेकनिंग ये उसी पीरियड में एक्चुअली हुआ है। 1990 उसी के आसपास में मैं फर्स्ट टाइम ये जो न्यूज़पेपर सीरियसली पढ़ना शुरू किया था। यह क्या हो रहा है भारत में? ये क्या हो रहा है विश्व में? यह सब कुछ देखना शुरू किया था। तो मेरा भी देखिए मेरा भी अपब्रिंगिंग जो है एक तरह से ये इंग्लिश स्पीकिंग एलिट वाला ही है। ऐसा नहीं है कि मेरा फैमिली कोई धनी फैमिली है। वो मिडिल क्लास सामान्य फैमिली ही है। किंतु मैंने बहुत पहले से ही एक रैशनलिस्टिक एप्रोच जो कि मेरे फादर में था, मेरे ग्रैंडफादर में था वो मेरे में है कि एक रैशनलिस्टिक एप्रोच रख के सब कुछ देखना है। अंधश्रद्धा को बिल्कुल ही सहारा नहीं देना है। धर्म को लेकर के पागल बिल्कुल नहीं होना है। और जितना एक कॉमन सेंस यूज़ कर सके उतना कॉमन सेंस यूज़ करना है। तो यह मेरा एक अपब्रिंगिंग था। तो मैं जब न्यूज़पेपर पढ़ना शुरू किया इनिशियली मेरा भी एक तरह से ये इंग्लिश एलिट ये जो शब्द यूज करते हैं लिबरल एलिट यह मेरा भी एक तरह इसी तरह का व्यू था कि यह हिंदू समाज में बहुत सारी अंधश्रद्धा है। यह कुंभ मेला वगैरह जो उत्सव है वो एक तरह से कहें तो हमारे भीतर में जो कुछ-कुछ विकृतियां पड़ी है उसी का यह मैनिफेस्टेशन है। वगैरह-वगैरह मेरे भी व्यूज थे। किंतु देखिए जब आप एक रैशनलिटी को एक ठीक-ठीक समझते हैं। अभी क्या है? पता है बहुत बार क्या होता है? कोई आदमी वेस्टर्नाइज होता है ना तो वेस्ट अर्थात कि पश्चिमी सभ्यता के अर्थात कि यूरोप और अमेरिका के दुर्गुण ही वह ग्रहण करता है। वहां के दुर्गुण क्या है? तो गौ मांस खाना, मध्यपान करना, ये एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स रखना। बहुत बार ऐसा होता है। कोई आदमी वेस्टर्नाइज हो रहा है तो उसने मीट ईटिंग स्टार्ट कर दिया। उसने यह वाइन और यह बियर वगैरह पीना शुरू कर दिया। अल्कोहल लेना शुरू कर दिया। स्मोकिंग स्टार्ट कर दिया। जितने भी एडिक्टिव सब्सटेंस है उसमें वह जाने लगा। ड्रग्स लेना कोई शुरू कर देता है। फिर यह ये जो एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स है उसमें जाते हैं। यह एक पश्चिम का एक आकर्षण है लोगों को। किंतु देखिए कि इफ यू आर रियली वेस्टर्नाइज इन अ स्पिरिट नॉट जस्ट इन मैनिफेस्टेशन बट ट्रूली इन द स्पिरिट तो होगा क्या पता है आज की जो वेस्टर्न प्रोस्पेरिटी है वो किस पे बनी है? वह कोई युद्ध जहाज के ऊपर में या तो फिर यह जो लूज लाइफस्टाइल जिसको कहते हैं, लूज मोरल जिसको कहते हैं, उस पे नहीं बनी। वेस्टर्न प्रोस्पेरिटी या तो वेस्टर्न एसेंडेंस बना है। यह साइंटिफिक डिस्कवरी ईयर आफ्टर ईयर आफ्टर ईयर। यह सेंचुरीज़ आफ्टर सेंचुरीज़ अस होल गैलेक्सी ऑफ़ साइंटिफिक लुमिनरीज़। एक के बाद एक ग्रेट साइंटिफिक माइंड्स का जन्म हुआ। जिन्होंने साइंस और ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग की जो बॉर्डर्स थी जो सीमाएं थी उसको लांघ करके न्यू एक्सप्लोरेशंस न्यू डिस्कवरी किया। ये साइंटिफिक एडवेंचर जो है दैट इज द ट्रू स्पिरिट ऑफ वेस्ट। तो सम हाउ मेरे भीतर में भी ये साइंटिफिक क्यूरियोसिटी इतना स्ट्रांग था कि मैं सब समय कौन सा साइंटिफिक डिस्कवरी कौन से युग में हुआ। हिस्ट्री ऑफ साइंस यह एक टॉपिक मुझे उस समय मिल गया था और मैंने उसको काफी एक्सप्लोर किया था कि किस तरह से एरिस्टोटलल से सोक्रेटिस से लेकर के एरिस्टोटल से लेकर के फिर ये जो ये मिडिल एजेस है वहां से फिर कोपरनिकस गैलीलियो न्यूटन ये जो मॉडर्न फिजिकल फिजिसिस्ट है किस तरह से एक के बाद एक उन्होंने कांसेप्ट को डेवलप किया सोलर सिस्टम का क्या व्यू था। कॉस्मोलॉजी के बारे में क्या मानते थे? फिजिक्स किस तरह से डेवलप हुआ है? उसके बाद का आज का मॉडर्न डिस्कवरीज़ मॉडर्न एज न्यूटन आइंस्टाइन का रिलेटिविटी और ये जो यूरोप का यूरोपियन साइंटिस्ट के द्वारा डेवलप किया हुआ स्पेसिफिकली कोपन हेगन इंटरप्रिटेशन जिसको कहते हैं क्वांटम डायनेमिक्स। तो ये जो एक पूरा एक देयर इज़ वेरी ब्रिलियंट एक प्रवाह चला आ रहा है साइंटिफिक डिस्कवरी का। दिस इज द ट्रू हार्ट एंड ट्रू स्पिरिट ऑफ द वेस्टर्न वर्ल्ड वेस्टर्न कल्चर। देखिए यह मैं जब समझने का प्रयास करता था उस समय एकाएक मेरे पास में स्वामी विवेकानंद का किताब आ गया लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा। एंड इट कंप्लीटली चेंज माय व्यू कि हिंदू धर्म उसको आप मॉडर्न साइंटिफिक लैंग्वेज में किस तरह से एक्सप्रेस करेंगे। देखिए कहां मैं एक्सट्रीम वेस्टर्न आइडियाज उसको मैं उसके भीतर में मैं जा रहा था और एट द एंड ऑफ दिस एक बेस्ट ऑफ द बेस्ट वेस्टर्न आइडियाज जब आप टू द लिमिट आप एक्सप्लोर करेंगे तो वहां पे स्वामी जी खड़े हैं। वहां पे स्वामी विवेकानंद खड़े हैं। और जैसे स्वामी जी को पढ़ा आई आई फेल इन लव वि हि आइडियाज। ऐसा लगा कि अरे इसी को तो मैं खोज रहा था जीवन भर। जैसे कि मेरे मन के भीतर में यह जो चक्रवात चल रहा है, साइक्लोन चल रहा है कि क्या है? व्हाट इज द मीनिंग ऑफ लाइफ? व्हाट इज द मीनिंग ऑफ कल्चर, व्हाट इज द मीनिंग ऑफ सिविलाइजेशन? व्हाट इज द मीनिंग ऑफ ह्यूमन लाइफ? यह जो प्रश्न चल रहे हैं परफेक्ट सॉल्यूशन जैसे कि स्वामी जी देते हैं। तो देखिए कि वेस्ट जो है आप प्रॉपर्ली वेस्टर्न स्पिरिट को फॉलो करेंगे तो आप स्वामी जी तक पहुंचेंगे। यहां पे देखिए हम लोगों में किस तरह से यह ईस्ट और वेस्ट में यह गैप था। यह वेस्टर्न एजुकेटेड एलट हमेशा यह उटपटांग वेस्टर्न आइडियाज को लेकर के हम हिंदुओं को गाली देता है। किंतु यदि आप ठीक-ठीक वेस्टर्न आइडियाज को वेस्टर्न साइंटिफिक स्पिरिट को समझेंगे तो आपको स्वामी जी तक पहुंचना ही पहुंचना है। और स्वामी जी फिर आपका कान पकड़ कर के हिंदू संस्कृति की ओर लाने ही वाले हैं। माने ये जो सीधा कान पकड़ना होता था भारत में जन्मे हैं। भारतीय संस्कृति को अपनाना है। ऐसा नहीं करके भारत में जन्म लेकर के यह उल्टा कान पकड़ा। वेस्टर्न संस्कृति को अपनाया। किंतु यदि वेस्टर्न संस्कृति को ठीक-ठीक समझेंगे तो यह पूरा उल्टा घुमा करके फिर से यही कान अपना पकड़ने वाला है। माने स्वामी जी आपको यदि एक्सट्रीम वेस्टर्न स्पिरिट को आप समझने का प्रयास करेंगे। आपके हाथ में स्वामी जी आने ही वाले हैं और यही स्वामी जी आपको फिर से वही भारतीय हिंदू संस्कृति धर्म और सभ्यता की ओर ले आएंगे। सो देखिए मैं यह जब आर्टिकल पढ़ रहा था तो आई कैन सो क्लोजली आइडेंटिफाई मसेल्फ विद इट कि हां मेरा भी यही व्यू था। यह हिंदू मंदिर है। वहां पर गंदगी के अलावा और कुछ नहीं है। हिंदू धर्म स्थान है। वहां पर देखिए कितना वो बदबू आता है। कितना कूड़ा कचरा पड़ा है। मंदिर के सामने भिखारी लोग ही बैठे रहते हैं। या फिर ये उन लोगों का पूरा एक रैकेट रहता है। यात्रालुओं को लूटने का वगैरह-वगैरह वही जो उटपटांग जो हिंदू धर्म के बारे में जितना बुरा आप सोच सके सब मेरे माइंड में भरा था। किंतु जस्ट बिकॉज़ कि वेस्टर्न स्पिरिट को मैंने ठीक-ठीक समझने का प्रयास किया। मुझे स्वामी जी मिल गए और स्वामी जी फिर वही उल्टा कान पकड़ करके यह हिंदू और भारतीय संस्कृति की ओर ले आए। और आई फील अ बिट सेड कि आज जो लोग हैं वह वेस्टर्नाइज होने का प्रयास करते हैं। वह लोग वेस्ट का स्पिरिट ठीक से पकड़ते ही नहीं। वो वेस्ट के जितने दुर्गुण है वही सब पकड़ते हैं। वेस्टनाइज होना का क्या अर्थ है? खानेपीने में स्वच्छंदता जो हाथ में आए वो खाना पूरा लाइफस्ट लूज कर देना लूज मोरल हो जाना एडिक्टिव सब्सटेंस में फंस जाना इसी को लोग कहते हैं वेस्टर्नाइज होना आज के कॉलेज कैंपस में जाएंगे लड़के को देखेंगे जो वेस्टर्नाइज लड़के होंगे देखेंगे यही सब करते रहेंगे लूज मोरल एडिक्टिव सब्सटेंस और यह लूज लाइफस्टाइल इसी को ये लोग कहते हैं वेस्टर्नाइज होना बट दिस इज नॉट अ प्रॉपर स्पिरिट ऑफ वेस्टर्न ाइज वेस्टर्न स्पिरिट वेस्टर्न स्पिरिट इज अ गैलेक्सी ऑफ्स ब्रिलियंट साइंटिफिक माइंड्स एजेस आफ्टर एजेस एक के बाद एक आकर के उन्होंने ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग को एक्सपैंड किया है। तो वो एक ठीक-ठीक आप पकड़ेंगे तो आपको हिंदू संस्कृति की ओर आना ही आना है। तो यह एक थॉट है। दूसरा देखिए मैंने एक बार यदि स्वामी जी को पकड़ा उसके बाद में परिस्थिति क्या हुई है? स्वामी जी को समझने के बाद में कथामृत पढ़ना शुरू किया। ठाकुर को समझना शुरू किया। अभी ठाकुर का तो ऐसा है ना कि हिंदू धर्म के जितने भी जो कुछ भी है सब कुछ उन्होंने स्वीकार कर लिया है। मां ने कहा है ठाकुर के बारे में टिक टिकी पर्जन तो मैनेज है। अर्थात कि छिपकली से जुड़ी हुई जो मान्यताएं हैं वहां तक उन्होंने स्वीकार कर लिया है। क्यों? ठाकुर गढ़ते ऐसे भांगते नहीं। ठाकुर कंस्ट्रक्ट करने को आए हैं। डिस्ट्रक्ट करने को नहीं। अर्थात कि देखिए कि यह जो हिंदू धर्म का जो हार्ट है हिंदू धर्म की यह जो पूरी विरासत है संपूर्ण रूप से ठाकुर ने ग्रहण की है। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि इसको छोड़ो इसको लो। नहीं ठाकुर ने क्या कहा है कि दिस इज द स्पिरिट ऑफ हिंदूइज़्म। काम कांचन त्याग सत्य और ब्रह्मचर्य ये है हिंदू धर्म का फाउंडेशन। अ ब्रह्म ज्ञान जीव ब्रह्म ऐक्य अहम ब्रह्मास्मि ये जो है वो है हिंदू धर्म का हार्ट स्वामी जी क्या कहते हैं प्रस्थानत्रय है जो कि हमारा धर्म का फाउंडेशन है बाकी जितने भी गांव की जितनी भी सुपरस्टिशन है स्मृति और श्रुति ऐसा करके डिवाइड कर दीजिए जो इटरनल प्रिंसिपल है वह श्रुति में है उपनिषद में है और बाकी जो कुछ भी है वह स्मृति है सामयिक समय के अनुसार चलता रहता है। आज आप सती प्रथा को गाली देंगे किंतु देखिए उस समय स्त्रियों के भीतर में कितना यह करेज होता था कि युद्ध मैदान में अपना रजपूत पति गया है। जैसे ही समाचार मिला कि युद्ध के मैदान में उसका वध हो गया है और यह मुगल राजा सब आ रहे हैं आक्रमण करने के लिए शहर के ऊपर में किले के ऊपर में तो कितना करेज चाहिए कि मैं अपना जो सम्मान है वो इस लुटेरों के सामने नहीं गवाऊंगी। इससे बेटर है कि मैं चिता में जलती हुई अग्नि में अपने देह का बलिदान दे दूं। वो जो जोहर प्रथा थी वो कितनी भव्य प्रथा थी। कितना करेज चाहिए था। किंतु वो युग बीत गया। मुगल भी चले गए। वो जोहर प्रथा का भी ऐसा कोई आवश्यकता नहीं रहा। अब गांव में एक आदमी मर जाता है तो उसकी बीवी को जबरदस्ती उसकी चिता पर उठा के उसको जला दे। यह कहां तक योग्य है? तो फिर अभी क्या है कि आप कहेंगे कि बिकॉज़ के स्त्रियों को पति की चिता पे जिंदा जलाया जाता है। यह भारतीय धर्म पूरा गलत है। ऐसा नहीं है। वह एक युग था जिस समय यह सब चीजों की आवश्यकता थी और यह युग है। जबकि उसकी आवश्यकता नहीं है। युग के अनुसार आवश्यकताएं परिवर्तित होती है। तो यह एक क्लियर समझ करके हमको अपना जो धर्म है उसको समझना है। हमारे धर्म के इटरनल प्रिंसिपल है वही वेद उपनिषद ब्रह्मसूत्र और श्रीमद भगवत गीता जिसको कि प्रस्थानत्रय कहते हैं। प्रस्थानत्रय के भीतर में ही श्रुति प्रस्थान अर्थात कि उपनिषद स्मृति प्रस्थान अर्थात कि गीता और न्याय प्रस्थान अर्थात कि ब्रह्मसूत्र। तो यह है हमारे हिंदू धर्म का फाउंडेशन। इसको स्वीकार करो। बाकी का आता है जाता है। उसको ले टेंशन मत करो। ठाकुर को किसी ने कहा कि जाति प्रथा को कैसे उठाया जाए? कैसे उसको हटाया जाए? तो ठाकुर कहते हैं देखो एक उपाय है जाति प्रथा हटाने का भक्ति। सबको ईश्वर के रंग में रंग दो। सब सबको भक्ति के रंग में रंग दो। एक बार भक्ति का रंग लगा तो कौन शूद्र कौन ब्राह्मीण कौन क्षत्रिय यह सब भूल जाएंगे। जैसे कि यह चैतन्य महाप्रभु ने हरि का नाम सुना के आ चंडाल को आलिंगन किया है। इसी तरह से भक्ति के माध्यम से आप बाकी सब प्रथाएं हैं कुप्रथाएं उसको हटाओ। सो दिस इज ठाकुर सॉल्यूशन। एक बार स्वामी जी को समझा वेस्टर्न पहले समझा क्या है वेस्टर्न साइंटिफिक स्पिरिट। वो वेस्टर्न साइंटिफिक स्पिरिट ले गया मुझे स्वामी जी के पास में। क्या है हिंदू धर्म? क्या है सिविलाइजेशन? क्या है ये? राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन। ये इतना बड़ा टॉपिक है। राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन। कैसे होता है? क्यों होता है? वो फिर वहां से आए ठाकुर के पास में कि हां हिंदू धर्म का हार्ट क्या है? और फिर ठाकुर को समझने के बाद में आखिर में मुझे समझ में आई मां शारदा का जीवन और संदेश और उनकी कृपा। और देखिए कि एज इफ आई हैव कम द फुल सर्कल। वो जितनी भी सुपरस्टिशियन थी जिससे मैंने थोड़ा सा नाराज होकर के मैं थोड़ा वेस्टनाइज होना शुरू किया तो मेरे मेरे आइडियाज वेस्टनाइज हुए थे वो जितने भी सुपरस्टिशियन है जैसे कि मां के जीवन में दिखाई देती है अपेरेंटली ऊपर ऊपर से वो राधु बीमार है कोलपाड़ा में किसी ने कहा वो एक एक तांत्रिक है वो चंड नामाता है तो उसको बुला के लाओ तो मां ने भेजा अपने त्यागी संतान को जाओ तांत्रिक को बुला के लाओ। तो त्यागी संतान को पता है कि वह एक नंबर का धुतारा है। किंतु क्या करें? मां का आदेश है तो गया तो वो तांत्रिक भी समझ गया कि अच्छे मूर्ख लोग आए हैं पकड़ में। दुनिया भर का नाटक करना शुरू किया कि हां मुझे पहले से ही पता था आप लोग आने वाले हैं। मैं आऊंगा कल वहां पे कोलपाड़ा और सब भूतों को भगा दूंगा। ऐसा करके नाटक करके दूसरे दिन आया। वहां पे मां बेचारी वह सर पर वस्त्र ढक करके दो हाथ जोड़ के ऐसी दयनीय अवस्था में आकर के उसके साथ बात कर रही है। जैसे कि तांत्रिक यदि मां की राधु की रक्षा नहीं करेगा तो मां के पास में जैसे और कोई उपाय ही नहीं है। तो ये त्यागी संतान भी सोच रहा है यह महामाया की कैसी माया है। आध्या शक्ति होकर के एक दो टके के धुतारे तांत्रिक के सामने इस तरह से बात कर रही है। किंतु क्या है यह लीला है तो तांत्रिक ने सब उटपटांग सब उपाय बताए कहां-कहां से दुष्प्राप्य चीजें लेके आना है दुर्गम्य जगह पे जाना है वगैरह-वगैरह जो कि संभव ही नहीं तो ऐसा एक उपाय बता करके वो तो पैसा ले चला गया कुछ दिन तो मां ने बड़ा उत्साह बताया जताया कि अरे वहां से यह लेके आओ वहां से यह ले आओ कुछ ही दिन में किंतु पता चल गया यह जो सब चीजें प्रिस्रिप्शन तांत्रिक ने दिया है। वह कभी फुलफिल नहीं होने वाला है। तो देखिए वहां पे एक घटना का अंत आया। किंतु सी मैं यह सब सोच रहा था कि सच ए सर्कुलर पाथ आई हैव टेकन कि हो सकता था कि मैं हिंदू धर्म के भीतर में प्रारंभ से ही चला जाता। उसका गुड प्लस बेड उसको संपूर्ण रूप से एक्सेप्ट कर देता। किंतु उससे होता क्या कि बेड ही ज्यादा मुझे दिखता या तो मैं ग्रहण करता उसका जो एसेंशियल हिंदू धर्म का जो स्पिरिट है वो शायद मुझे समझ में ही नहीं आता। हिंदू धर्म का स्पिरिट प्रस्थान त्रय में है। हिंदू धर्म का स्पिरिट है महावाक्य उपनिषद के जीव ब्रह्म ऐक्य और फिर यह तो एक है। दूसरा है कि यही आध्या शक्ति वही नारायण मानव देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। और उनकी कृपा प्राप्त करना ये जीव ब्रह्म ऐक्य वाला जो आईडिया है उसको समझने के लिए सबसे सहज रास्ता है कि ये अवतार की कृपा प्राप्त करना। ये जो क्लेरिटी है जो कि आज मेरे माइंड में है। मैं सीधा-सीधी हिंदू धर्म को अपना लेता तो मेरे माइंड में इस तरह का क्लेरिटी कभी नहीं आता। आज देखिए मैं दोनों ओर से देखता हूं जो कि वेस्टर्नाइज्ड लिबरल एलिट है तथाकथित लिबरल एलिट उन लोगों के माइंड में वेस्ट के बारे में भी उटपटांग धारणाएं भरी है। हिंदू धर्म के बारे में भी उटपटांग धारणाएं भरी है। जो लोग हिंदू मैं हिंदू हूं मैं हिंदू हूं बोल करके जा बहुत ज्यादा चिल्लाते हैं वे लोग भी देखता हूं कि ये जो हिंदू धर्म का जो मूलभूत फाउंडेशन है उसको नहीं लेकर के जितना ही एक्सटर्नलिटीज है जितना भी ये बाह्य आवरण है उसी को लेकर के ये लोग बिजी रहते हैं। उसी को लेकर के ये लोग रहते हैं। सो दोनों ओर से मैं देखता हूं कि वेस्टर्नाइज यदि आपको होना है देन अंडरस्टैंड द प्रॉपर साइंटिफिक स्पिरिट दैट क्यूरियोसिटी कि जिसने यह एक के बाद एक साइंटिफिक जीनियस को एेट किया दैट इज प्रॉपर वेस्टर्न स्पिरिट और यहां पे है ईस्टर्न स्पिरिट या तो प्रॉपर इंडियन स्पिरिट एज इज़ रिप्रेजेंटेड बाय ठाकुर महास्वामी जी कि आध्यात्मिक जगत में एक के बाद एक मंजिल सर करते हुए एक के बाद एक सोपान सर करके आध्यात्मिक जीवन का जो सर्वोच्च शिखर है जीव ब्रह्म ऐक्य अहम ब्रह्मास्मि तत्वमसी प्रज्ञानम ब्रह्म वही को उसी को प्राप्त करना दैट इज अ प्रॉपर इंडियन स्पिरिट एंड दिस इज प्रॉपर वेस्टर्न स्पिरिट और देखिए मैं स्वामी जी को क्यों इतना रिवियर करता हूं क्यों मैं स्वामी जी को इतना रिस्पेक्ट करता हूं कि स्वामी जी हैज़ अंडरस्टुड बोथ ऑफ दिस। यह वेस्टर्न स्पिरिट को भी समझे हैं, इंडियन स्पिरिट को भी समझे हैं। हिंदू स्पिरिट को भी समझे हैं। इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि बेस्ट सिविलाइजेशन विल बी कॉम्बिनेशन ऑफ बोथ ईस्टर्न एंड इंडियन स्पिरिट्स। जो कि श्रेष्ठ सभ्यता है वो कैसी होगी? भविष्य की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता। एक ओर से भारत का वेदांत लीजिए और दूसरी ओर से यह यूरोप और अमेरिका का साइंस लीजिए और यह साइंस और वेदांत को कंबाइन कीजिए। दैट विल बी द बेस्ट सिविलाइजेशन ऑफ द फ्यूचर। यह कॉनसेप्चुअल क्लेरिटी मैंने स्वामी जी को छोड़कर के और किसी के भीतर में नहीं देखी। थिंकर्स जो होते हैं ना वो कुछ-कछ ग्रुप्स में बट जाते हैं। जो कि मैं देखता हूं। पहले मैं न्यूज़ बहुत पढ़ता था। अभी आजकल इतना नहीं पढ़ता। पिछले चारप साल से बहुत कम कर दिया है मैंने न्यूज़ में इंटरेस्ट रखना। साइंटिफिक न्यूज़ पे ज्यादा इंटरेस्ट है। पॉलिटिकल न्यूज़ में इतना नहीं। किंतु फिर भी जो मेरा एक अंडरस्टैंडिंग जाता है ये जो इंडियन या तो यूरोपियन इंटेलेक्चुअल्स का एक टाइप के इंटेलेक्चुअल है। इंडिया का सब कुछ गलत है। हिंदू धर्म का अर्थ ही है अंधश्रद्धा। ये एक टाइप के इंटेलेक्चुअल है जो कि वेस्टर्न जो कुछ भी है सब अच्छा इंडियन या हिंदू जो कुछ भी है सब बुरा ये एक टाइप के है दूसरे हैं कि हिंदू जो कुछ भी है सब अच्छा और वेस्टर्न जो कुछ भी है सब बुरा ऐसे भी लोग हैं जो कि प्रत्येक गांव की छोटी-छोटी सुपरस्टिशन के ऊपर में आपको लंबी लंबी व्याख्या करते दिख जाएंगे वो पढ़ा ही होगा आपने न्यूज़पेपर में मुझे कोई बोलने की आवश्यकता नहीं है कि वैदिक युग में ऐसा होता था। इसके पीछे का यह कारण है। आज के युग में ऐसा होता है। उन्होंने वो सब कुछ उनके पास में एट देयर फिंगर टिप सब तरह की व्याख्याएं उनके पास में रहती है। प्रत्येक सुपरस्टिशन की प्रत्येक जैसे बेड हैबिट्स की वो उनके पास में व्याख्याएं हैं। तो या तो फिर हिंदू धर्म को धिक्कारेंगे। वेस्ट के जितने भी दुर्गुण है सब स्वीकार कर लेंगे या तो फिर यह वेस्ट को धिक्कारेंगे और हिंदू धर्म के जितने भी दुर्गुण है वो स्वीकार कर लेंगे। ऐसे दो टाइप के इंटेलेक्चुअल देखे हैं। बट देखिए कि मेरा जो अंडरस्टैंडिंग है स्वामी जी इज द बेस्ट गाइड इन दिस। टेक द बेस्ट ऑफ द वेस्ट। वेस्ट का बेस्ट क्या है? तो वो है यह साइंटिफिक स्पिरिट। और इष्ट का बेस्ट क्या है? तो वो है वेदांत। वेदांत यानी सिर्फ यह ज्ञान मार्ग नहीं ज्ञान, कर्म, भक्ति, ध्यान ये चारों योगों का समन्वय जो कि वेदांत रूपी एक म एक कंटेनर लार्ज कंटेनर के भीतर में हम यह सब कुछ रख सकते हैं। एक शब्द यदि चाहिए हिंदू फिलॉसोफी के लिए तो वो है वेदांत। व्हाट इज वेदांत? वेदांत रिप्रेजेंट्स द बेस्ट ऑफ एव्री ब्रांचेस ऑफ इंडियन फिलॉसोफी हिंदू आध्यात्मिक साधना। ना दैट इज़ वेदांत। तो इस अर्थ में एक लार्जर इंटरप्रिटेशन करेंगे वेदांत का। तो टेक द बेस्ट ऑफ़ इंडिया दैट इज़ वेदांत एंड टेक द बेस्ट ऑफ द वेस्ट दैट इज साइंस एंड कंबाइन देम टुगेदर। दैट इज द वे फॉरवर्ड फॉर ए न्यू सिविलाइजेशन। सो ये जो क्लेरिटी है थैंक्स टू स्वामी जी कि स्वामी जी इज़ अ ब्रिज बिटवीन ईस्ट एंड वेस्ट। मैं यदि डायरेक्ट ठाकुर और मां को पढ़ता तो मैं कभी भी उनको एप्रिशिएट नहीं करने वाला था। क्योंकि मेरे भीतर में इतना स्ट्रांग रैशनलिटी था कि जैसे ही मैं कुछ भी आउट ऑफ रैशन रैशनलिटी कुछ भी इररेशनल पढूंगा इमीडिएटली मैं रेबेल करूंगा। अरे ये तो सब क्या है? म लोगों को मूर्ख बनाने वाली बात है। इसके लिए मुझे स्वामी जी चाहिए थे। स्वामी जी एक्टेड एज अ ब्रिज बिटवीन ईस्ट एंड द वेस्ट। स्वामी जी एक्टेड ऐज़ अ ब्रिज बिटवीन द बेस्ट ऑफ द वेस्ट एंड द बेस्ट ऑफ़ द ईस्ट। सो, बिकॉज़ ऑफ़ दैट आई हैव बीन एबल टू अंडरस्टैंड दिस एंटायर थिंग। सो, आई थॉट के लेट मी शेयर दिस विद यू। ओके? अह

रामकृष्ण संघ में मनाई गई पहली शिवरात्रि

स्वामी जी का ही लाइफ पढ़ रहे हैं। मास्टर महाशय आए हुए हैं काशी वराह नगर मठ में। 21 फरवरी 1887 का दिन है। शिव पूजा शिवरात्रि का दिन है। तो शिवरात्रि के दिन का यह वर्णन मास्टर महाशय हमको कर रहे हैं। क्या लिखते हैं? कथामृत में से ही लिया है। यह पोर्शन कथामृत आपने पाठ किया होगा तो आपको पता ही होगा कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में कुछ दिन मास्टर महाशय वराह नगर आए थे और बड़ा ही सुंदर विवरण और डिस्क्रिप्शन उन्होंने लिखा है। कथामृत में ही है। तो वहां से ही यह पाठ कर रहा हूं। क्या कहते हैं मास्टर महाशय? मठेर बेलतलाय शिव पूजा आयोजन मठ के बेलतला में बेल अर्थात कि बिल्व वृक्ष तला अर्थात कि उसके नीचे तो मठ यानी कि ये बेलूर मठ नहीं। यूजुअली हम आजकल मठ कहते हैं। तो बेलूर मठ ही दिखता है। तो यह ओरिजिनल मठ था। वराह नगर मठ। तो मठ के पीछे में एक गार्डन है। ये गार्डन की कहानी तो हमने सुनी ही थी। जब हम ये देख रहे थे कि वहां पे ये लौकी है, कुमड़ो है वगैरह सब्जी होती थी। तो जब मठ में कुछ और कोई उपाय नहीं था खाने का। तो यह शशि महाराज जाते बड़ा सा चाकू लेके और वो काट करके ले चले आते। वहां पे एक उड़े उड़िया माली था। वो जोर-जोर से चिल्लाता। अरे क्या कर रहे हो? क्या कर रहे हो? यहां का सब ले लिया, सब ले लिया। किंतु उसकी ओर दृष्टिपात किए बिना उसको पत्ता दिए बिना शशि महाराज हूं करते चले आते। और इसको देखकर के मठ के सभी गुरु भाई बड़ा आनंद करते। तभी वो उड़िया माली जो था उसका हमारे साथ में अच्छा रिलेशन था। जब भी मठ में मिठाई वगैरह आता था। ठाकुर को ऑफर किया जाता था तो उसको भी प्रसाद के रूप में देते थे। सो वही वो गार्डन था मठ के पीछे में। तो यहां पे लिखा है कि वहां पे एक बिल वृक्ष है। उसके नीचे शिव पूजा का आयोजन हुआ है। रात्रि नोएटा रात को 9 बजे है। ए बार पूजा होबे अभी पूजा होगी। 11:30 टार समय द्वितीय पूजा 11:30 को दूसरे प्रहर की पूजा होगी। चार प्रहरे चार पूजा चार प्रहर में चार पूजा नरेंद्रो राखाल शरद काली सिंथिर गोपाल प्रवृति मठेर भरा शकोली बेल तोलाई उपस्थितो नरेंद्र राखाल शरद काली सिंधिका गोपाल वगैरह मठ के भाई सभी बेलतला के बिल्व वृक्ष के नीचे उपस्थित है भूपति ओ मास्टर रोवा छ भूपति और मास्टर भी है मास्टर महाशय कथामृत के लेखक मठेर भाई दे मध्य एक जन पूजा करते छे मठ के भाइयों के भीतर में से एक भाई पूजा कर रहा है देखिए ये सुंदर डिस्क्रिप्शन मुझे याद है मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था पहली बार शिव पूजा शिवरात्रि की देखी थी पूरी रात जागरण करना था और मंदिर के भीतर में चार प्रहर हर की चार पूजा हो रही थी। तो मैं कभी-कभी क्या करता कि मंदिर में बैठेंगे ठाकुर का मेन टेंपल बेलूर मठ का यदि आपने देखा होगा वहां पे वो शिवरात्रि की पूजा होती है तो यदि मंदिर में बैठेंगे तो वहां पर भजन गान तो चलते ही रहते हैं और बीच-बीच में शिव तांडव नृत्य भी होता है। वो ब्रह्मचारी जो होते हैं ट्रेनिंग सेंटर के उसमें से किसी को शिव सजा करके और एक ब्रह्मचारी को शिव सजाते हैं। दूसरे दो ब्रह्मचारियों को नंदी और भृंगी का साज सजाते हैं। फिर वे तीनों वो तांडव नृत्य करते हैं। शिव नृत्य वो बीच-बीच में होता है। मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था मुझे पता है यह जो पूरा प्रोसेस है ना ट्रेनिंग का शिव का और नंदी भ्रुंगी का बड़ा ही डिफिकल्ट है। क्योंकि आपको जिस तरह से नृत्य करना है शिव नृत्य बड़ा ही डिफिकल्ट है। तो पूरा एक महीने से एक महीने पहले तीन ब्रह्मचारियों का सिलेक्शन हो जाता है। फिजिकली फिट होने चाहिए। मेंटली अलर्ट होने चाहिए। ऐसे तीन ब्रह्मचारी का सिलेक्शन 1 महीने पहले हो जाता है। फिर उन लोगों को ट्रेनिंग दी जाती है नृत्य करने की। क्योंकि वो जो शिव शिव तांडव नृत्य आपने यदि देखा होगा बेलून मठ के आई थिंक YouTube चैनल पे आप यदि देखेंगे ना शिव शिवरात्रि में शिव नृत्य करके आपको मिल जाएगा। पैर उठाउ उठा करके आपको नृत्य करना है। व्हिच इज वेरी फिजिकली स्ट्रेनस। तो क्या है एक महीने पहले से उनको ट्रेनिंग दी जाती है। फिर जब ट्रेनिंग समाप्त होती है वो वो नृत्य का उस दिन का ट्रेनिंग कंप्लीट होगा। फिर ये जो न्यूट्रिशियस फूड है वो उनको दिया जाता है। पूरे एक महीने तक वे लोग ट्रेन होंगे। पूरा न्यूट्रिशियस फूड लेंगे क्योंकि टीसी में वगैरह देखेंगे कि खाना पीना बड़ा सिंपल होता है। तो न्यूट्रिशियस उनको कुछ ना कुछ बाद में दिया जाता है। पूरा एक टीम बनता है नृत्य प्रैक्टिस करने के लिए और एक महीने का स्ट्रेनस प्रैक्टिस के बाद में शिवरात्रि के दिन रात को यह होता है। सो उसके पीछे पूरा काफी आयोजन रहता है। तो मेरी मुझे तो सिलेलेक्ट करने का कोई प्रश्न ही नहीं था। वो मेरा वेट बेलूर मठ में ट्रेनिंग सेंटर में था। उस समय बेयरली 48 केजी के आसपास था। मैं बहुत ही दुबला पतला था। तो मुझे सिलेलेक्ट करने का कोई प्रश्न ही नहीं था। वो तीन ब्रह्मचारियों को किया था। एनीवे उस दिन रात को मैं क्या करता था? या तो मंदिर में बैठूंगा। नृत्य जब चल रहा है शिव नृत्य तब मैं मंदिर में बैठ के देखूंगा। वो फिर वो जो चारों प्रहर की पूजा के अंत के समय नृत्य होता है। फिर वो उनको पुष्पांजलि ऑफर की जाती है शिवलिंग के ऊपर में। उसके बाद में वहां पर गंगा के किनारे जाकर बैठ जाता था। बिल्कुल अकेले में अंधेरा है और मंदिर में जो भजन चल रहे हैं उसका आवाज तो आ रहा है। दूर-दूर से जैसा आवाज सुनाई देता है। पवित्र सुंदर गंगा का किनारा है और एकदम शांति है और कुछ नहीं है। सो इट इज अ वेरी ब्यूटीफुल प्लेस टू बी। तो कभी मैं मंदिर में बैठता था, कभी गंगा के किनारे बैठता था। वन ऑफ द बेस्ट नाइट इन माय लाइफ। वो मेरा जो पहला शिवरात्रि था बेलूर मठ में। सो वेरी गुड मेमोरीज आई हैव। यहां पे भी देखिए कि अपने संघ की सर्वप्रथम शिव पूजा। नो डाउट दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में तो ठाकुर क्या है? ऐसा पूजा वगैरह जो कुछ भी होता है उस तो पावस्त ही रहते हैं। पूरा रात वो समाधि में ही बिताते हैं। तो दैट इज वन थिंग। किंतु एक इंस्टीट्यूशनल इंस्टीट्यूशन स्टार्ट करने के बाद में फर्स्ट इंस्टीट्यूशनल पूजा तो यह है वो शिवरात्रि सुंदर डिस्क्रिप्शन कि वो सभी लोग वहां पर बिल्व वृक्ष के नीचे में उपस्थित है। मठ के ही एक महाराज पूजा कर रहे हैं। काली गीता पाठ कोते छ काली

‘सोऽहम्’ का ‘मैं’ यह सामान्य अहं नहीं है

महाराज स्वामी भविष्य के भविष्य के कहां बाय दिस टाइम तो विजा होम हो चुका है। तो अभेदानंद जी गीता पाठ कर रहे हैं। सैन्य दर्शन सांख्य योग कर्म योग पाठर मध्यम मध्य नरेंद्र सहित कथाओं विचार होते छे पाठ करतेकरते बीच-बीच में नरेंद्र के साथ में वार्तालाप और हो रहा है वार्ता कथा अर्थात वार्तालाप विचार अर्थात कि आर्गुममेंट वार्तालाप और विवाद दोनों हो रहे हैं काली आमीश काली महाराज कहते हैं मैं ही सब कुछ हूं आमी सृष्टि स्थिति प्रलय को छी मैं ही सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं। देखिए वह जो स्वामी जी को स्पर्श कर दिए थे ना वहां काशीपुर गार्डन में इसका परिणाम ये किस तरह से दिख रहा है। मैं ही सब कुछ हूं। मैं ही सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं। अभी ऑब्वियसली इस सेंटेंस के पीछे में दोनों भाव है। दोनों तरह से आप इंटरप्रिट कर सकते हैं। यदि मैं कहूंगा कि मैं जिसके दो हाथ है, दो पैर एक सर है। ये मैं थोड़ी ना सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं। किस तरह की बेतुकी बात है। किंतु जो सही मैं हूं इस छोटे में का आवरण भेद करके जो मेरा कॉस्मिक आई है, कॉस्मिक आइडेंटिटी है उसके साथ में मैं मर्ज हो जाऊंगा। तो ऑफकोर्स मैं ही सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं। या तो फिर कहेंगे कि मैं तो अकर्ता हूं। मेरे साथ में एसोसिएटेड जो शक्ति है वो सृष्टि स्थिति प्रलय कर रही है। किंतु क्या है? पता है यह मैं यह कर रहा हूं। यह कहने का अधिकार किसी को नहीं है। क्यों पता है क्या? जब तक हम माया के क्षेत्र में है तब तक तो हम ब्रह्म से हमारा दूरत्व बना ही हुआ है। अर्थात कि जब तक हम निर्विकल्प समाधि में नहीं पहुंचेंगे हम लोगों का आइडेंटिटी ब्रह्मण से सेपरेट ही है। सिर्फ और सिर्फ निर्विकल्प समाधि में ही हम प्रॉपर्ली कह सकते हैं कि अहम ब्रह्मास्म। किंतु प्रॉब्लम क्या है निर्विकल्प समाधि में कि वाणी और मन के परे की अवस्था है। अर्थात कि जब तक मैं यह कहता हूं अहम ब्रह्मास्मि तब तक यह सेंटेंस मिथ्या है क्योंकि मैं ब्रह्मन नहीं हूं। मैं अभी भी वाणी और विचार और मन के राज्य में हूं। वाणी और मन के राज्य में जो कुछ भी कहा जाता है ब्रह्मन के बारे में वो एप्रोक्सीमेशन मात्र है। तो मैं जब आज कहूंगा अहम ब्रह्मास्मि या मैं ब्राह्मण हूं वो तो गलत ही हो गया क्योंकि मैं ब्राह्मण नहीं हूं बोलकर के ही मैं यह बोल रहा हूं। सिर्फ कंट्राडिक्शन सी पैराडॉक्स यदि मैं सही में ब्राह्मण हो जाऊंगा। मैं निर्विकल्प समाधि में मग्न हो जाऊंगा तो मैं ब्राह्मण हूं बोलने वाला कोई नहीं मिलेगा। क्योंकि बोलेंगे आप कब जब मैं और आप दो होते हैं तभी तो मैं आपको कुछ कहूंगा जब एक ही है कौन किसको क्या कहेगा राइट आप मूवी बनाते हैं तो अब आप अपेक्षा रखेंगे कि ऑडियंस देखेगा ऑडियंस ही नहीं है तो मूवी आप किसके लिए बनाएंगे यदि आपके पास में बात करने के लिए कोई नहीं आप किसके साथ में बात करेंगे एक ही है तो कौन क्या कौन किसको कहेगा कि अहम और ब्रह्मा एक है यह कहां से आ गया। सो दिस इज कंट्राडिक्शन। निर्विकल्प समाधि में अहम ब्रह्मास्म कहने वाला कोई नहीं है। और फिर जब इति इति करके वापस आते हैं इस सात्विक अहम को लेकर के तब भी तो आप नहीं कह सकते कि अहम ब्रह्मास्म क्योंकि अगेन आप तो ब्रह्म नहीं है। आपके भीतर में ईगो है। एक सेपरेट आई है। भले ही चाहे जितना भी सात्विक हो वो है तो सही। यानी कि अहम ब्रह्मास्मि स्मरण मनन निदि्यासन करने के लिए साधना करने के लिए ठीक है। इट इज़ नॉट अ स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट। इट इज़ नेवर अ स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट। इट इज़ ऑलवेज अ स्मरण मनन निध्यासन। उसकी साधना करने के लिए है। स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट वो तभी होगा जब हम निर्विकल्प समाधि में होंगे। और निर्विकल्प समाधि में कौन किसको ये स्टेटमेंट ऑफ फैक्ट सुनाने को जाएगा? इज दैट इज व्हाई जब काली महाराज जी ये कहते हैं आमीश मैं ही सब हूं। आ सृष्टि स्थिति प्रलय को छची मैं सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं तो देखिए नरेंद्र क्या उत्तर देता है आ सृष्टि कोची कोई मैं कहां सृष्टि कर रहा हूं आर एक शक्ति ते को छे और एक शक्ति है जो मेरे पास में करवाती है ए नानाकार जो चिंता परजन तो त को छे यह जो विविध कार्य है यह मैं चिंतन जो कर रहा हूं वह भी वही करवाती है देखिए स्वामी जी इस बात का थोड़ा थोड़ा सा एक डिफरेंट तरीके से उत्तर देते हैं। सृष्टि करना इसके बारे में तो नहीं किंतु जो कुछ भी कार्य वो कर रहा है मनुष्य वो कार्य कौन करवा रहा है तो हमारे भीतर में यह जो कामना वासनाएं हैं वह कार्य करवा रही है। देखिए ब्राह्मण जब कार्य करता है या तो फिर ब्रह्मण के आसपास में जो कार्य होता है वो शक्ति करवाती है या तो फिर शक्ति करती है। जैसे वो कुछ दिन पहले हमने वो इनफोग्राफिक्स देखा था। एक है ब्रह्मन जो कि स्थिर अच अटल अचल निष्क्रिय है और वही जब कार्य करता है तो शक्ति के रूप में वह कार्य करता है। ठाकुर कहते हैं ना ब्रह्म शक्ति अभेद सांप जब कुंडली मार के पड़ा है तो वह सांप तो भी वही सांप है और तिर्यक गति से सर्पाकार गति से वह चलता है तो भी वही सांप है। तो देखिए कि बाबू बाबू जब बैठे हैं तो भी वही बाबू है और जब वह कार्य करते हैं तो भी वही बाबू है। रियलिटी एक ही है किंतु रियलिटी के वो जो गियर शिफ्ट होता रहता है जब न्यूट्रल गियर में होता है रियलिटी तो इट इज अ ब्राह्मण और जो टॉप गियर में चलता है तब वो हो जाता है शक्ति बट यह गियर चेंज होना है। दैट इज अ वेरी फैक्ट फंडामेंटल फैक्ट। यहां पे स्वामी जी और एक दृष्टि से कहते हैं वो ब्रह्मा शक्ति ऐसा करके नहीं किंतु ये इंडिविजुअल लेवल पे वो तो कॉस्मिक लेवल पर हो गया। इंडिविजुअल लेवल पे कौन करवाता है मुझे कार्य? तो मेरे भीतर में यह जो कामना वासनाएं हैं वो कार्य करवाती है। देखिए जैसे कि ब्रह्मन का रिफ्लेक्शन यह कॉन्शियसनेस है हमारे भीतर में चिदा चिदाभास ये जो ब्रह्मन का जो रिफ्लेक्शन वैसे ही शक्ति का भी एक रिफ्लेक्शन हमारे भीतर में है। और वह शक्ति का रिफ्लेक्शन ही यह काम और कांचन के प्रति हमारा आकर्षण। इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि यह शक्ति का रिफ्लेक्शन मेरे भीतर में है। कॉस्मिक लेवल पर शक्ति सृष्टि स्थिति प्रलय करती है। तो यह व्यष्टि लेवल पर इंडिविजुअल लेवल पर यही शक्ति मेरे पास में यह संसार का सर्व कार्य करवाती है। यदि यह शक्ति नहीं रहती तो यह कार्य करने की इच्छा ही मेरे मन में प्रकट नहीं होती। इसका यह अर्थ नहीं है कि शक्ति नहीं है मेरे भीतर में तो मैं ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लूंगा। नहीं मैं तमस में डूब जाऊंगा। शक्ति है कि तमस से हमको सत्व में लेकर जाती है। शक्ति यह रजस का कार्य करती है। तो इसलिए देखिए स्वामी जी कहते हैं और एक शक्ति मेरे पास में सब कुछ करवाती है। यह जितना भी विभिन्न कार्य है यह मैं चिंता जो कर रहा हूं जो विचार कर रहा हूं यहां ये तक वही शक्ति करवाती है। मास्टर शोगत मास्टर अपने मन में ही सोचते हैं। ठाकुर बोलेन ठाकुर कहते हैं जतो क्षण आमी ध्यान करची ए बोध ततो क्षण ओ आध्या शक्ति ऐलाका जब तक मैं ध्यान कर रहा हूं यह आभास भी मेरे मन में रहेगा यह बोध भी जब तक मेरे मन में रहेगा तब तक मैं आध्या शक्ति के इलाके में हूं आध्या शक्ति के राज्य में हूं। शक्ति मानते ही होबे। शक्ति को स्वीकार करना ही होगा। देखिए यदि मेरे भीतर में यह शक्ति नहीं है तो फिर मैं तो तमस में ही डूब जाऊंगा। शक्ति है तो यह शक्ति के माध्यम से मेरी सत और असत इच्छाएं प्रकट होती है। यदि मेरे में इतना विवेक है कि मैं सत इच्छा को फॉलो करूं तो मैं साधन भजन करूंगा। यदि मेरे में अविवेक है या तो विवेक का अभाव है तो मैं असत इच्छा को पूर्ण करने के लिए काम कांचन में डूब जाऊंगा। तो जब तक मैं यह इच्छा करता हूं सत या असत जब तक मैं काम कांचन को फॉलो करता हूं या तो साधना उपासना करता हूं तब तक मैं शक्ति के ही राज्य में हूं। बिना शक्ति के मैं तमस में डूबा रहूंगा। कुछ भी नहीं करूंगा। जड़ पत्थर की तरह हो जाऊंगा। शक्ति मुझे रजस प्रदान करती है। कार्य करने की प्रेरणा देती है। कार्य करने के लिए सत्य या असत अच्छे या गलत उद्देश्य देती है। अच्छा क्या है? गलत क्या है? वो हमारे विवेक पे डिपेंड करता है। किंतु शक्ति हमारे सामने पूरा एक मेन्यू ओपन करके रख देती है। रेस्टोरेंट में जाते हैं वो मेन्यू देते हैं। अभी इसमें से क्या-क्या चाहिए? वेज, नॉनवेज, साउथ इंडियन, नॉर्थ इंडियन, चाइनीस कॉन्टिनेंटल, पंजाबी, बंगाली क्या चाहिए अभी आपको? तो वैसे ही यह महामाया हमारे सामने सभी इच्छाओं का यह मेन्यू ओपन करके रख देती है। सत इच्छा भी है, असत इच्छा भी है। कोई भी इच्छा पे आप कार्य कीजिए। किंतु यह कार्य आपको करना होगा। कर्म करना होगा। साधना उपासना भी कर्म ही है। ये काम कांचन के पीछे दौड़ना जैसे कर्म है वो असतर्म है तो साधना करना उपासना करना सत्कर्म है। कर्म योग है। तो आइदर कर्म कीजिए माने सांसारिक कर्म या तो फिर यह आध्यात्मिक कर्म योग कीजिए किंतु वो कर्म करना पड़ेगा। तमस में से सत में जाना पड़ेगा। शक्ति का यह कार्य है। शक्ति का यह पर्पस है। हमारे भीतर में जिस तरह से ब्रह्मन का रिफ्लेक्शन है जो कि हमको चेतना प्रदान करता है। चेतन प्रदान करता है। वैसे ही शक्ति का रिफ्लेक्शन है जो कि हमको रजस प्रदान करता है। तो देखिए मास्टर महाशय कहते हैं कि ठाकुर का कहना था जब तक मैं ध्यान कर रहा हूं यह बोध भी जब तक रहता है तब तक हम आध्या शक्ति के इलाके में शक्ति को तो मानना ही पड़ेगा काली निस्तब्ध होया कित खण चिंता करेते छ जब स्वामी जी ने ऐसा कहा तो काली चुप होकर के निस्तब्ध होकर के कुछ क्षण तक चिंता कर रहा है तार पर बोलते उसके बाद में कहता है कार जा बोल ले वह सब मिथ्या ये कार्य के बारे में जो कहा वह सब मिथ्या है चिंता आदप ही हो ना चिंता थोड़ी सी भी होती नहीं है वो सब मने कर ले हांशी पाए वो सब सोच करके ही मुझे हंसी आती है अर्थात कि काली महाराज शायद अपने ही बारे में कहते हैं कि यह जो कर्म करना है यह जो सब चिंता करनी है मुझे तो ना ही कर्म करने का मेरे मेरे भीतर में कोई ये होता है, प्रयोजन महसूस होता है, ना ही मेरे मन में चिंता होती है। किसी भी तरह के विचार आते हैं। ना ही कि मेरे मन में किसी भी तरह के विकार आते हैं। मैं चिंतन से भी मुक्त हूं। विकारों से भी मुक्त हूं। कर्म से भी मुक्त हूं। जैसे वो वेदांत में कहते हैं ना कि जब तक आपके मन के भीतर में योगस चित्तवृत्ति निरोध जैसे योग की डेफिनेशन है। जब तक मन में चित्त की वृत्ति है तब तक आप बंधन में फंसे हुए हैं। यदि आपको योग करना है तो चित्त की वृत्तियों से आपको मुक्ति प्राप्त करनी होगी। तो यहां पर काली महाराज कहते हैं मेरा चित्तवृत्ति निरोध हो चुका है। ना ही मेरे भीतर में कोई विचार है, ना ही कोई कर्म है, कुछ है ही नहीं। और वो सब मैं यदि सोचता भी हूं तो मुझे हंसी आती है कि मैं थोड़ी ना कर्म करने वाला हूं। मैं थोड़ी ना चिंतन करने वाला हूं। मेरे भीतर में थोड़ी ना चित्तवृत्ति खड़ी होने वाली है। मैं चित्तवृत्ति निरोध हो चुका है। मैं योग में स्थित हो चुका हूं। तो नरेंद्र क्या कहता है? सोहम बोलले जे आमी बोझाए से एमी नोए सोहम कहते कहते जो अहम जिस अहम के बारे में सोहम में उल्लेख किया गया है से वो अहम यह अहम नहीं है। मन देह ए सब बाद ले जा के शयामी मन और देह इसको बाद देकर के जो रहता है वही आमी वही अह एक अहम है जो कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के साथ में जड़ित होकर के वो वो एक अहम है कि जिसके साथ में क्या-क्या एसोसिएटेड है। मन एसोसिएटेड है इस अहम के साथ में अर्थात कि मैं संकल्प विकल्प करता रहता हूं। मेरे भीतर में ये चित्त अर्थात कि ये जो मेमोरीज है जितनी भी मेमोरीज है वो सब मेरे भूतकाल की मेमोरीज सब बनी हुई है। सब संस्कार बने हुए हैं। तो यह संस्कार है। संकल्प विकल्प है। देह में हूं। यह भावना जिसमें है। यह जो मिलाकर के जो अहम होता है उस अहम के बारे में सोहम में नहीं बताया गया। सोहम अर्थात कि सह अहम तत्वमसी अहम ब्रह्मास्मि वो जो अहम है ब्रह्मा रूपी अहम जो है वो वो अहम इस देह और बुद्धि के परे है वो अमेरिका में जो स्वामी जी वो फेमस इंसिडेंट है कि स्वामी जी कहते हैं ऑल इज ब्रह्मन ओनली ब्रह्मन इज नथिंग एल्स इज देयर सो ब्रह्मन ही है और कुछ नहीं है तो उनके क्लास क्लास में एक थोड़ा एक बूढ़ा आदमी आता था। वो थोड़ा मजाकिया स्वभाव का था। तो कहता है स्वामी जी इफ एवरीथिंग इज ब्रह्मन व्हाट इज अ डिफरेंस बिटवीन मी एंड दिस कैबेज। कैबेज अर्थात कि ये आलू पत्ता गोभी। यह पत्ता गोभी है और यह मैं हूं। तो फर्क क्या है यदि सब कुछ ब्रह्मन है तो स्वामी जी कहते हैं अपने पैर में चाकू मार के देखो पता चल जाएगा क्या फर्क है तो क्या है कि जब तक ये मैं यह देह हूं ये जो जब तक ये अनुभूति रहेगी तब तक मैं कोई ब्राह्मण नहीं हो गया देखिए ठाकुर का ये जो कॉस्मिक आइडेंटिफिकेशन किस तरह से था वो जो हमको फेमस कहानियां पता है कि गंगा के किनारे नौ गंगा में नौका जा रही है दो नाविक झगड़ा कर रहे हैं एक ने दूसरे को जोर से मार दिया तो तो जो मारा उसकी पीठ पे आघात किया तो ठाकुर देख रहे थे उनकी खुद की पीठ पे ऐसा जोर से आघात हुआ जैसे पूरा उनका पीठ लाल हो गया वो कच्चा घास जो होता है ग्रीन ग्रास जमीन पर उगा हुआ उसको देख रहे थे उसके साथ में आइडेंटिफिकेशन हो गया तो कोई आदमी घास पे चल रहा था तो ठाकुर ऐसे चित्कार कर उठे जैसे कि कोई उनके देह पे पैर रख के जा रहा है तो वो जो अपने देह के ऊपर में जो अपना एसोसिएशन है वो एसोसिएशन टूट जाना चाहिए। पूरे कॉस्मोस के साथ में अपना एसोसिएशन हो जाना चाहिए। तभी तो मैं कहूंगा अहम ब्रह्मास्म। जब तक इस देह के साथ में एसोसिएशन है, इस मन और बुद्धि के साथ में एसोसिएशन है, तब तक मैं कैसे कहूंगा कि अहम ब्रह्मास्मि तो ये दोनों के बीच में देखिए कितना सुंदर वार्तालाप हो रहा है। गीता पाठते काली शांतिवादो करीते छ शांति ही शांति ही शांति ही गीता पाठ के अंत में काली शांतिवाद कर रहा है। कर रहे हैं। शांति ही शांति ही शांति। ओके तो अभी इसके बाद का क्लास इसके बाद का जब है नेक्स्ट क्लास में देखेंगे जब स्वामी जी का लाइफ होगा तब ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु