मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन वो इस सप्ताह हम देखेंगे यह जो स्वामी जी का लाइफ हम पढ़ रहे हैं वह किसी पर्टिकुलर किताब से नहीं मैंने बहुत सारे सोर्सेज से कंपाइल किया है और मैंने ही स्वामी जी के जीवन को कुछ पीरियड्स में बांट दिया है और उस पीरियड के अनुसार हम स्वामी जी का जीवन देख रहे हैं। स्वामी जी के जीवन का जो प्रथमार्ध है फर्स्ट जो हाफ है स्वामी जी का कि उनके बचपन के दिन उनकी युवानी के कॉलेज के दिन फिर श्री रामकृष्ण के साथ में उनकी तपस्या और साधना वह फिलहाल हम स्किप कर दे रहे हैं। ठाकुर की महासमाधि के बाद से ही डायरेक्ट हम स्वामी जी का जीवन देख रहे हैं।
विरजा-होम के बाद स्वामी विवेकानन्द ने अपने लिए ‘विविदिषानन्द’ नाम क्यों चुना? (1)
तो अभी वराह नगर मठ का यह जो पीरियड हम देख रहे हैं ठाकुर की महासमाधि ऑलरेडी हो चुकी है। महासमाधि के बाद के जो जो घटनावली है ठाकुर ने सबको दर्शन दिया वगैरह वह सब हमने ऑलरेडी देख लिया है। इसके बाद में यह गुरु भाई आठपुर गए थे। वहां पर क्रिसमस ई को ध्वनि प्रज्वलित करके आजीवन श्री रामकृष्ण और श्री रामकृष्ण मिशन इसको अपना जीवन तन मन धन प्राण समस्त कुछ अर्पण करने का उन्होंने व्रत लिया था। वह एक हो गया। इसके बाद में कोलकाता वापस आकर के वराह नगर मठ में वीरजा होम करके जो ट्रेडिशनल विधि है पारंपरिक विधि सन्यास ग्रहण करने की हिंदू शास्त्र में वह विधि उन्होंने वहां पर की और उसके अनुसार सबके सन्यासी गैरिक वस्त्र धारण किए सब ने और सन्यास नाम भी धारण किया। तो इसके अनुसार आज जितने भी हमारे पास में यह 16 गुरु भाई है उनके जितने भी नाम है स्वामी ब्रह्मानंद स्वामी तुरियनंद स्वामी अखंडानंद वगैरह वो उसी दिन को उस दिन को सबका दीक्षा नहीं हुआ था विजा होम अखंडानंद जी गंगाधर महाराज उस समय तिबेट में भ्रमण कर रहे थे तो वह जब वापस आए थे तब उन्होंने सन्यास दीक्षा ली थी। विज्ञान महाराज स्वामी विज्ञानानंद जी उन्होंने आलम बाजार मठ में सन्यास दीक्षा ली थी। जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आ गए उसके बाद की घटना है। तो ऐसे कुछ-कछ गुरु भाइयों को छोड़ दें तो ज्यादातर गुरु भाइयों की सन्यास दीक्षा विरजा होम के समय ही हो चुकी थी और स्वामी जी ने इंटरेस्टिंगली नाम ग्रहण किया था विविधानंद। वि इज सरप्राइजिंग क्योंकि स्वामी माने ठाकुर के जो सन्यासी शिष्य है उसमें सिद्धि प्राप्त करने का यदि कोई दावा कर सकता है सही-सही में तो वह तो स्वामी जी ही तो थे। अदरवाइज राजा महाराज को स्वामी ब्रह्मानंद नाम देना बूढ़ो गोपाल यानी अपने गोपाल दादा को अद्वैतानंद नाम देना हरि महाराज को तुरियनंद तुरीय अवस्था तो वो नाम देना तो यदि उन लोगों त्रिगुणातीनंद तो क्या है कि यदि इन अखंडानंद यदि गुरु भाइयों को यह नाम दे सकते हैं तो फिर इस तरह के अद्वैत अनुभूति वाले कोई नाम पर यदि किसी का दावा हो सकता था तो वह स्वामी जी का ही हो सकता था। पता नहीं उन्होंने विविध नाम क्यों ग्रहण किया। एक रीजन शायद मेरी अब स्वामी जी के मन में क्या हो रहा है वह तो हमको पता नहीं और कहीं पर ऐसा कुछ लिखा भी नहीं गया कि स्वामी जी ने सर्वप्रथम नाम विविध क्यों ग्रहण किया। विविषानंद नाम का अर्थ है कि विविध दिशा दो तरह के सन्यास होते हैं। विध्वत सन्यास और विविध दिशा सन्यास। विध्वत सन्यास अर्थात कि साधक जो है साधना के मार्ग में काफी आगे बढ़ गया है। हो सकता है उसने सिद्धि भी प्राप्त कर ली है। उसके बाद में यदि वह ट्रेडिशनली सन्यास लेता है। जैसे कि श्री रामकृष्ण देव का जो सन्यास था तोतापुरी ने उनको सन्यास की दीक्षा दी थी। वो विधिवत सन्यास हो गया। क्योंकि सन्यास की विधि के अनुसार जो काम कांचन त्याग है, षड रिपु का त्याग है, अष्टपाश का त्याग है, पंच कक्लेश का त्याग है, वह ऑलमोस्ट ठाकुर का हो ही चुका था। बस जो लास्ट माइल जिसको कहते हैं ना लास्ट माइल कनेक्टिविटी आप वो पूरा अमेरिका से इंडिया आ जाइए प्लेन में बैठकर के और दिल्ली के एयरपोर्ट पर आप उतरिए किंतु उतना लंबा जर्नी 10,000 ना 20,000 कि.मी. जितना भी हो हमने कंफर्टेबली पार्क कर दिया। किंतु फिर यह जो आपका दिल्ली एयरपोर्ट से दिल्ली के आपके घर या होटल में जाना है। वह जर्नी हमेशा आपको पसीना निकलवा देगी। वो दिल्ली का ट्रैफिक कैसा आजकल मैं कोलकाता गया था वहां पर भी देखा कोलकाता मेट्रो में मैं बैठा था इस बार जब मैं गया मेरा टिकट था वो कहीं एक दूसरे स्टेशन का तो वहां पर गाड़ी उतरा फिर गाड़ी में से उतर करके यहां पर हावड़ा आने के लिए मेट्रो में बैठा था हे राम वो मेट्रो कहीं पर अटका दी रास्ते में दो घंटा बस वहीं पर आधे रास्ते पर बिठा के रखा तो वो लास्ट माइल कनेक्टिविटी जो है वही एक पसीना निकलवा देती है। तो एनीवे ठाकुर का तो सर्वस्व हो ही चुका था। हो सकता है कि यह लास्ट माइल कनेक्टिविटी वह भी देखिए ठाकुर पूर्ण नहीं थे। पूर्ण होने के लिए साधना करते थे। यह यह एक डिस्कशन हमने यह शब्दों की रमत भी बड़ी विचित्र है। अब अद्वैत या अवतार ऐसे सब हायर कांसेप्ट के साथ में डीएल करेंगे। अवतार अपूर्ण कैसे हो सकता है? पूर्णत्व प्राप्त करने के लिए साधना क्यों करनी है? वगैरह वगैरह लीला प्रसंग में हमने काफी विस्तार से डिस्कस किया है। यहां पर करने की जरूरत नहीं। तो एनीवे जो वो लास्ट माइल कनेक्टिविटी थी उसको कंप्लीट करने के लिए हो सकता है ठाकुर ने जो सन्यास ग्रहण किया था या तो फिर तोतापुरी ने ठाकुर को जो सन्यास दिया था वह था विध्वत सन्यास। तो फिर विद्वत सन्यास पर यदि और किसी का दावा हो सकता है अपने संघ में तो वह तो स्वामी जी का ही हो सकता है। तो किंतु स्वामी जी ने अब विध्वत सन्यास के अधिकारी थे। किंतु उन्होंने अभी जैसे देखिए यह विध्वत सन्यास तो एक मेथड हो गया सन्यास का कि जहां पर साधक ऑलमोस्ट इंद्रियों के विषय से मुक्त हो चुका है। बस वह लास्ट माइल कनेक्टिविटी जो है कि बस वह कपाल पे आज्ञा चक्र है भ्रू मध्य में उसके ऊपर में मन को एकाग्र करें और निर्विकल्प समाधि प्राप्त करें। वो लास्ट माइल कनेक्टिविटी ही बाकी है। तो वो जो विध्वत सन्यास पर किसी का दावा है तो स्वामी जी का विविध दिशा सन्यास अर्थात कि साधक अभी तो साधना का प्रारंभ कर रहा है। साधना के मार्ग पे उसने प्रथम कदम ही रखे हैं। और लंबा रास्ता काटना है। समाधि वगैरह तो दूर की चीज है। यह डरिपु पंच कक्लेश उससे मुक्त होने के लिए तो पहले उसको साधना करनी है। उसको विविध दिशा सन्यास कहते हैं। तो स्वामी जी ने विविध दिशांद अपना जो नाम रखा था खुद ने जो ग्रहण किया था बाकी सब गुरु भाइयों को नाम स्वामी जी ने ही दिए थे अपने लिए उन्होंने और गुरु भाइयों को जो नाम दिए वो पूर्णता प्राप्ति वाले नाम थे। अद्वैतानंद राइट सुबोधानंद निरंजनानंद योगानंद ये सब पूर्णता प्राप्ति वाले नाम थे। जबकि उन्होंने अपना नाम सिलेलेक्ट किया था अपना खुद का कि पूर्णत्व प्राप्ति के लिए अभी भी उनको लंबा रास्ता काटना है। तो यह जो नरेंद्र के मन में स्वामी जी के मन में वो जो कशमकश चल रही होगी इसका हमको एक आईडिया मिलेगा। यह जो मास्टर महाशय जिनका हम विवरण पाठ कर रहे हैं अभी वह वराह नगर मठ में आए हैं और फिर नरेंद्र के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। तो नरेंद्र
रामकृष्ण गुरुकुल से रामकृष्ण संघ तक की हमारी यात्रा
मास्टर महाशय को कहता है आपको सबको शांति मिल गई है। मुझे सब कब शांति मिलेगी पता नहीं क्योंकि क्या है कि नरेंद्र के मन में तो अभी जैसे देखिए गुरु भाई एक तरह से देखें तो पूर्ण काम हो चुके हैं। उनको क्या है कि ठाकुर ने जो उनको ऑलरेडी सिद्धि तो प्राप्त करवा ही दी है। उनकी मुक्ति का मार्ग ऑलरेडी उन्होंने ओपन कर ही दिया है। हो सकता है वह लास्ट माइल कनेक्टिविटी ही किसी किसी का बाकी हो। अदरवाइज समाधि निर्विकल्प समाधि वगैरह वह तो सब उनके हाथों में आ चुका था। ठाकुर की सेवा उन्होंने कर ली थी। किंतु स्वामी जी के कंधे के ऊपर में पूरे विश्व का बर्डन रखकर के ठाकुर गए हैं। सिर्फ गुरु भाइयों की चिंता गुरु भाइयों को एकत्रित करके संघ करके रामकृष्ण संघ उसका फाउंडेशन तैयार करना सिर्फ इतना ही नहीं घर का जो प्रॉब्लम उनका था। पिताजी का देहांत हो चुका था। मां छोटे भाई-बहन है। कभी-कभी उनको घर में खाने की भी व्यवस्था नहीं थी। और फिर ऊपर से उनका घर उनके संबंधियों ने हड़प लिया था। छीन लिया था। तो फिर वह घर वापस लेने के लिए कोर्ट केस वगैरह जो चल रहा था। तो स्वामी जी को वह कोर्ट केस में भी उपस्थित रहना है। घर की भी संभाल लेनी है। रामकृष्ण संघ यह जो फाउंडेशन अभी डला है तो उसके क्या कन्वेंशंस होंगे? क्या रूल्स एंड रेगुलेशंस होंगे? उसकी क्या ट्रेडिशन रहेगी? श्री रामकृष्ण ने जो उपदेश दिए गुरु भाइयों को उन्होंने जो गुरु भाइयों को जो साधना करवाई उस साधना को प्रैक्टिकल संघ जीवन में किस तरह से कन्वर्ट करें एक गुरुकुल को इंस्टिट्यूशन में कैसे कन्वर्ट करें देखिए यह जो भारत में जनरली गुरुकुल प्रथा चली आई है। गुरुकुल का अर्थ क्या है कि एक है आचार्य और आचार्य के साथ में कुछ रहते हैं शिष्य या तो फिर विद्यार्थी या तो फिर उनके चेले। अभी यह विद्यार्थियों का कार्य है गुरु के पास से विद्या ग्रहण करना। और जैसे विद्याभ्यास संपूर्ण हो जाता है तो गुरु को दक्षिणा देकर के वहां से विदाई ले लेना गुरुकुल से। तो यह है अपनी सनातन परंपरा। किंतु एक इंस्टिट्यूशन क्या है? एक संघ क्या है? कि यह जो विद्यार्थी है फिर वह विदाई ले घर नहीं चला जाता। वह वहीं पर रहता है। पूरा जीवन संघ को समर्पित करता है। इंस्टिट्यूशन को समर्पित करता है। अभी आप हमारे खुद के सामने देखिए। हमारा स्कूल में जो बिहेवियर था हमारा स्कूल में जो एक एटीट्यूड क्या था अपना एक लाइफ के सामने अपना पॉइंट ऑफ व्यू क्या था कि जीवन कैसा है किस तरह से हम मित्रों के साथ वार्तालाप करते हैं वगैरह वो क्या था स्टूडेंट अवस्था में अपना एक माइंडसेट रहता है और फिर जब हम एडल्ट हो जाते हैं तो अपना माइंडसेट संपूर्ण रूप से बदल जाता है। एक स्टूडेंट या तो फिर कहेंगे कि एक एडल्ट और एक नॉन एडल्ट या तो फिर एक यंग पर्सन। तो दोनों में डिफरेंस क्या है? एडल्ट जो पर्सन जो होता है उसकी एंबिशन बहुत ही स्ट्रांग होती है। उसको अपनी करियर की सबसे ज्यादा चिंता है। अभी स्टूडेंट को क्या है? करियर वगैरह इतना टेंशन नहीं होता। कुछ-कुछ स्टूडेंट काफी अलर्ट होते हैं। किंतु ज्यादातर स्टूडेंट्स को आप देखेंगे कि दे आर एंजॉयंग द फ्रेंड्स। दे आर एंजॉयंग द लर्निंग। दे आर एंजॉयंग द प्रोटेक्शन ऑफ देयर पेरेंट्स। मां-पिताजी उनको जो प्रोटेक्ट कर रहे हैं। उनको जो सब अच्छी चीजें वो परचेस करके खिलौने हैं, कपड़े हैं, खानापीना है और घर है, सब कुछ उनको प्रोवाइड कर रहे हैं। तो क्या है? एक स्टूडेंट के सर पर रिस्पांसिबिलिटी नहीं होता और रिस्पांसिबिलिटी लेने की उसकी मेंटल कैपेसिटी भी शायद नहीं होती। उसका माइंडसेट भी नहीं होता। किंतु एक एडल्ट पर्सन जो है 18 प्लस 20 प्लस उसको आप घर में बैठने को बोलेंगे उसको यदि यह कहेंगे कि तुम्हारे पिताजी ऐसा कर रहे हैं ऐसा करो तो ही विल रेबेल। क्यों? क्योंकि यह टीनएज एक ऐसी अवस्था है कि जितने भी अपने हॉर्मोन है वह सब एक्टिव हो जाते हैं और रेबेलियस स्पिरिट एक जागृत हो जाता है। मैं इस जगत में अपना रास्ता अपने से बनाऊंगा। मैं क्यों किसी की बात सुनूं? मेरा खुद का एक एंबिशन है। मेरे जो फ्रेंड रिलेटिव्स है, मेरे फादर है, उन्होंने जिस तरह से लाइफ लीड किया है, मुझे कुछ रेवोल्यूशनरी कुछ नया करना है। फिर कुछ समय के बाद में अकल ठिकाने आ जाती है और फिर से वो वो एक क्या कहेंगे कि एक मिडओकर लाइफस्ट में चला आता है। किंतु यह टीनएज अवस्था ऐसी है कि वह सॉलिड उसका एक रिवोल्यूशनरी स्पिरिट एक एंबिशन होता है। तो क्या है कि इस तरह के टीनएजर्स जो है या तो फिर एडल्ट जो है उनको एक जगह पर बांध के रखना स्कूल के भीतर में माने भयानक वो मुश्किल है। आप जस्ट इमेजिन कीजिए। मैं आप स्कूल में पढ़ते थे। मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरी उम्र क्या थी? 12 13 14 15 समथिंग लाइक दैट। 16 17 कॉलेज में जब थे मैंने तो कॉलेज किया नहीं किंतु अब यदि कॉलेज करते हैं तो उम्र क्या होगी 17 18 19 20 21 22 यही तक तो तो कॉलेज तक तो फिर भी वो जो ऐज है 22 23 तक आप एक इंस्टीट्यूशन में इस तरह से जाते हैं सुबह से शाम रहते हैं आपके टीचर प्रोफेसर्स की बात सुनते हैं फ्रेंड्स के साथ में हंसीज़ाक करते हैं तो ठीक है। अब 30 साल की उम्र का व्यक्ति, 40 साल की उम्र का व्यक्ति, 50 साल की, 60 साल की उम्र का व्यक्ति उसको आप कॉलेज में आप ऐसा कॉलेज बनाइए कि जहां पे सब 30 साल के 40 साल के सब लोग रह रहे हैं और उनको स्ट्रिक्टली रूल्स फॉलो करने हैं। तो सोच के देखिए किस तरह का केओस फैलेगा। कोई रूल्स फॉलो नहीं करेगा। बस वह दिखावा ही रहेगा रूल्स फॉलो करने का। भीतर में से दुनिया भर का भ्रष्टाचार चलेगा। क्यों वह भ्रष्टाचार नहीं है एक्चुअली इट इज़ जस्ट ह्यूमन नेचर कि यह जो इंद्रियों का जो सुख प्राप्त करने की वासना वो प्रबल हो जाती है क्योंकि हमारे हॉर्मोन एक्टिव हो जाते हैं। दूसरा की जो भयानक एंबिशन जागृत हो जाती है कि जीवन में कुछ करना है, एडवेंचर करना है, बाहर जाना है, कुछ अचीव करना है। यदि एक हेल्दी नॉर्मल ह्यूमन बीइंग रहेगा तो तो देखिए कि इस तरह के एडल्ट लोगों को आप एक साथ में एक इंस्टीट्यूशन में मोनेस्टिक इंस्टीट्यूशन में इकट्ठा करके देखिए कि किस तरह का केओस फैलने की पॉसिबिलिटीज है। तो देखिए कि ठाकुर के पास जब यह गुरु भाई जाते थे तो जो पावर डिफरेंस था बहुत बड़ा था। यहां पर है ठाकुर अवतार वरिष्ठाय स्वयं जिन्होंने कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर चुकी है और उनकी एज ऑलमोस्ट 50 प्लस थी तो वो है ठाकुर और यहां पे ये 16 17 18 19 20 साल के सब नवयुवक लड़के जो कि ओबेडिएंट एक तरह से थे स्पिरिचुअल मुमुक्षुत्व जो है बड़ा ही स्ट्रांग था ठाकुर के प्रति प्रचंड श्रद्धा थी ठाकुर के पास में से अपना खुद का आध्यात्मिक जीवन ठीक-ठाक कर लेने की एक प्रबल इच्छा थी। तो वह जो कॉम्बिनेशन था कि यहां पे है ठाकुर और यहां पे है गुरु भाई। वो परफेक्ट कॉम्बिनेशन है। यहां पे एक वाइज एल्डर है। यहां पे यह यंग एककोलाइट्स है। तो यह जो यंग शिष्य है उनको एक जो अपने गुरु है उनकी कृपा उनका गाइडेंस उनकी जो बुद्धि शक्ति है उनके जो आशीर्वाद है वह चाहिए। बोलकर के गुरुकुल मॉडल फिर भी काम करता है। ज्यादातर स्कूलें कार्य करती है। टीचर और स्टूडेंट उन दोनों में एज डिफरेंस जो है, बुद्धि का जो डिफरेंस है वह काफी बड़ा होता है। तो लोगों को यदि आपको कंट्रोल में रखना होगा तो एक सेंट्रल पावर चाहिए। यह सेंट्रल पावर जो है बाकी सबको कंट्रोल में रख सकता है। तो गुरुकुल सिस्टम या तो अपनी एजुकेशन आज की सिस्टम है स्कूल वगैरह वो अच्छे से कार्य करती है। किंतु आप यह मल्टीीनेशनल कंपनी वगैरह देखिए वहां पे सब एडल्ट है। अब जैसे जो आज की माने अपर एंड जो ग्लोबल कॉरपोरेशंस है जैसे कि Google है ना कि ओपन एआई है ना कि एंथ्रोपिक है वहां पे हाईली एंबिशियस हाईली टैलेंटेड लोग इकट्ठा होते हैं। तो उन लोगों को एज ए टीम बना करके टीम लीडर कैसे काम करवाएगा? उनको तो आपको एक कॉमन एंबिशन देनी पड़ेगी। एक चीज है और सबसे इंपॉर्टेंट है एक्टी पे पैकेज आपको देना पड़ेगा। सॉलिड उनका वह जो सैलरी है, उनका कंपनसेशन है, स्टॉक ऑप्शन है, वह देना पड़ेगा। तब यह लोग कहीं साथ में मिलके कार्य करेंगे। मोनेस्टिक इंस्टीट्यूशन कैसा है? आप Google की तरह ही सोच लीजिए। बस वही है कि आप मुफ्त में काम करते हैं। आपकी सॉलिड टैलेंट है और आपके जो टीममेट्स हैं हाईली इंटेलेक्चुअल है। हाईली टैलेंटेड है और सभी लोग एक ही प्रोजेक्ट पे काम कर रहे हैं। एआई डेवलप करना है। किंतु मान लीजिए किसी को भी एक पैसे का भी सैलरी नहीं मिलता। पूरा लाइफ वहां पर रहना है ना ही फैमिली हो सकता है ना ही और कोई सुख उपभोग हो सकता है। सिलिकॉन वैली के बारे में शायद सुना होगा कि वर्क हार्ड पार्टी हार्डर। तो यहां पर वर्क हार्ड और वर्क हार्ड और वर्क हार्ड वही एक है। वो पार्टी वाला कोई कांसेप्ट नहीं है। पार्टी की जगह है उपासना साधना। प्रेयर्स, पूजा पाठ, ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग वगैरह-वगैरह। तो देखिए कि इतने हाईली टैलेंटेड, हाईली एंबिशियस एक ग्रुप को एक साथ में इकट्ठा रखना और एज अ टीम लीडर उनके पास में से कार्य करवाना। दैट इज अ कंप्लीटली डिफरेंट प्रपज़िशन फ्रॉम दैट गुरुकुल मॉडल। तो यहां पर गुरुकुल से इंस्टीट्यूशन में रामकृष्ण संघ अभी ग्रेजुएट हो रहा है। और यह ग्रेजुएशन प्रोसेस है। दैट इज फुल ऑफ पेन एंड सफरिंग। यह हर्ट ईगो जिसको कहते हैं ना कि आप 10 युवान लड़के 15 युवान लड़के एक साथ में रहेंगे और ईगो हर्ट ना हो। ईगो क्लेश ना हो। तो यह असंभव है। हमारा हिस्ट्री बहुत बार कुछ-कुछ अनकंफर्टेबल फैक्ट्स है। उसको अंडर द कारपेट स्वीप कर देता है कि यह सब लोगों को बताने की जरूरत नहीं है कि गुरु भाइयों में भी इस तरह से डिफरेंस ऑफ ओपिनियन था। मेरी दृष्टि से दिस इज़ ए डिसर्विस टू द फ्यूचर जनरेशंस। क्योंकि आज हम लोगों के साथ में क्या होता है कि हम लोग भी तो इंपपरफेक्शंस के साथ में यहां पर आए हैं। अभी हमारा इंपपरफेक्शन प्रति कार्य में प्रतिदिन प्रत्येक व्यवहार में वो निकल के आ जाता है। तो हमको ऐसा लगता है कि एक गिल्ट फीलिंग आ जाता है कि आई एम नॉट ए परफेक्ट साधु। मैं एक पूर्ण साधु नहीं हूं। मेरे में बहुत सारी अपूर्णता है। एक गिल्ट फीलिंग आकर ऐसा सवार हो जाता है कि जो कि हमारी साधना को हमारे साधु जीवन को भीतर से खा जाता है। अब बाहर से हम साधु का वेश धारण करके घूम तो रहे हैं किंतु भीतर में से वो जो सतचित आनंद आत्मन का स्वरूप क्या है? सतचित आनंद। तो वह जो आनंद प्रकट होना चाहिए 10 साल 15 साल 20 25 साल के साधु जीवन से वह आनंद प्रकट नहीं होता वो निरनंद ही लगता है सब कुछ तो क्या है कि हमको यदि यह पता चले कि दिस इनकंप्लीटनेस जो है अपूर्णता है वह सिर्फ मेरे में नहीं आज मैं जिनको रिवयर करता हूं जिनके फोटोग्राफ की मंदिर में पूजा होती है उन लोगों के भीतर में भी अप टू एन एक्सटेंट इनकंप्लीटनेस अपूर्णताएं थी और फिर साथ में रहरह करके तपस्या करके करके ठाकुर के आशीर्वाद प्राप्त करके यह अपूर्णताएं ठीक हुई है। पूर्णता में परिणत हुई है। पूर्ण होकर के कोई नहीं आया है। ठाकुर को यदि छोड़ दे, मां को यदि छोड़ दे, स्वामी जी को यदि छोड़ दें तो और किसी के बारे में हम ऐसा दावा नहीं कर सकते। अप टू एन एक्सटेंट हम राजा महाराज को ले सकते हैं। तो इन चारों को छोड़कर के कोई भी ऐसा दावा नहीं कर सकता कि हम लोग पूर्ण होकर के आए हैं। सभी लोग यहां पर पूर्णता प्राप्ति के लिए आए हैं। ठाकुर के साथ में रहकर के एक निजस्व इंडिविजुअल साधक जीवन जो है उसका गठन कैसे करना? कैरेक्टर बिल्डिंग कैसे करना? एक तरह की नीतिमत्ता में यम नियम एथिक्स मोरालिटी में कैसे रहना और वह सब तो उनका एक बिल्ड अप हो चुका है। किंतु फिर कम्युनिटी लेवल पे साथ में कैसे रहना वो अभी वराह नगर मठ में टेस्टिंग होने वाला है। ये देखिए कम्युनिटी लेवल पे एक हमारा जो फ्रेमवर्क है इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी कम्युनिटी लिविंग टुगेदर और फिर सिविलाइजेशनल इवोल्यूशन राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन तो जो तीन हमारा जो फ्रेमवर्क है वो विदिन दिस थ्री फ्रेमवर्क ये ठाकुर के जीवन काल पूरा हम एक इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी को डिवोट कर सकते हैं और फिर यह ठाकुर की महासमाधि से 1886 से प्रारंभ करके रामकृष्ण मिशन की स्थापना दैट इज 1897 वो जो ऑलमोस्ट 10 साल है 10 ईयर प्लस उसको हम एक्सक्लूसिवली कम्युनिटी डेवलपमेंट का पीरियड गिन सकते हैं। यहां पे मां है। मां भी संसार में कैसे रहना सीख रही थी? क्योंकि पहले तो मां ठाकुर के साथ में रही है। तो सेम थिंग जिस तरह से गुरु बाई ठाकुर के साथ में रहे हैं वहां जो पावर डिफरेंस है वहां पर ठाकुर की ग्रेटनेस और गुरु भाइयों की उनके प्रति श्रद्धा और उनको समर्पण जो डिफरेंस है वो डिफरेंस उनको इजीली साथ में रखेगी। सेम थिंग इज मदर एंड ठाकुर। दक्षिणेश्वर काली मंदिर में मां रह रही है। मां का पूरा जीवन ठाकुर को समर्पित है। ठाकुर की सेवा करना, ठाकुर की संभाल रखना, ठाकुर के लिए खाना पका देना, ठाकुर की केयर करना, वो ठाकुर के कमरे में जो कीर्तन वगैरह हो रहा है तो वहां पर खड़ी रहकर के मां का जो नहबत आज आपने देखा होगा तो सेंटर में कमरा है और चारों ओर सर्कुलर वरांडा है। सर्कुलर नहीं किंतु इस तरह से एक वरांडा है। चारों ओर वरांडा है। तो वो वरांडा जो है वो जो वो ये कहते हैं ना चटाई से ढका हुआ है। तो मां क्या करती थी? ठाकुर के कमरे में जब कीर्तन होता था तो ठाकुर कहते थे रामलाल को कि यह जो नहबत की ओर का दरवाजा है खोल दो। ठाकुर कहते हैं वे लोग देखेंगे नहीं। यानी मां थी, लक्ष्मी दीदी थी। वह तो नहबत में रहते थे। शुक सारी ठाकुर की लैंग्वेज में तोता और मैना। तो यह ठाकुर कहते थे कि यह दरवाजा खोल दो। नबत में जो रह रहे हैं उनको यदि यहां का कीर्तन है, गान है वह नहीं सुनेंगे तो उनका डेवलपमेंट कैसे होगा? तो वो दरवाजा खुलवा देते थे ठाकुर उनके कमरे में कीर्तन होता था और मां वो जो चटाई वो उससे वो जो वरांडा ढका हुआ था उसमें से एक छोटा सा छेद था। वो वहां पर खड़ी रह के वो छेद के माध्यम से मां वो जो है वो दर्शन करती थी। कि ठाकुर के कमरे में क्या नृत्य कीर्तन हो रहा है। और फिर एक दिन ठाकुर रामलाल को कहते भी हैं कि देखो वो जो चटाई का वो जो छेद है वो धीरे-धीरे करके बड़ा हो रहा है। एनीवे एक्चुअली क्या है कि दोनों ओर से ठाकुर का डायरेक्ट डिसाइपल अपने वह जो गुरु जो शिष्य है उनके साथ में संबंध ठाकुर का मां के साथ में संबंध दोनों में जो पावर डिफरेंस है विज़डम डिफरेंस है स्पिरिचुअलिटी का अब मां के साथ में ऐसा तो नहीं कहेंगे स्पिरिचुअलिटी का बहुत ज्यादा डिफरेंस है किंतु जागतिक दृष्टि से व्यावहार दृष्टि से आप देखें तो मां को तो ठाकुर के जिस तरह से गुरु भाइयों को ठाकुर के पास में से जीवन गठन करना था। मां को भी तो ठाकुर के पास में उसी तरह से जीवन गठन करना था। जिस तरह से गुरु भाई ठाकुर को अपना गुरु मानते थे। आचार्य के रूप में स्वीकार करते थे। एज का जो डिफरेंस है, विज़डम, स्पिरिचुअलिटी का जो डिफरेंस है, मां के साथ में एग्जैक्टली वही था। विवाह के समय मां की उम्र 5 साल ना छ साल और ठाकुर की 23 साल। तो ऑलरेडी दोनों के बीच में वो डिफरेंस जो है एज और ये प्रैक्टिकिटी का इतना ही है ठाकुर और मां के बीच में जितना कि गुरु भाई और ठाकुर के बीच में है। तो दक्षिणेश्वर जो पूरा था वो गुरुकुल था। ठाकुर आचार्य है और वह गुरु भाइयों को जिस तरह से शिक्षा दे रहे हैं पारमार्थिक एज वेल एस व्यावहारिक कि जगत में कैसे रहना है और साधना कैसे करनी है तो वही पारमार्थिक व्यावहारिक शिक्षा ठाकुर मां को भी दे रहे हैं और वो मां का जीवन हम पाठ कर रहे थे गंभीरानंद जी का तो हमने उसमें देखा भी सही कि किस तरह से ठाकुर मां को सब कुछ समझाते हैं कि नौका में यदि बैठना है तो पहले बैठ जाना है बैठने के समय पहले बैठना है और उतरने के समय पहले आखिर में उतरना है। माने यहां तक की वह शिक्षा ठाकुर मां को देते थे। तो देखिए कि व्यावहारिक एज वेल एज पारमार्थिक एजुकेशन ये गुरु भाइयों का एज वेल एस मां का दक्षिणेश्वर में हुआ। तो हम उस दक्षिणेश्वर के पीरियड को एक्सक्लूसिवली इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी का पीरियड गिन सकते हैं। जबकि यह वराह नगर मठ वाला जो पीरियड है दोनों को गुरु भाइयों को भी ऐसे फैमिली बना के विद्या का संसार राइट ये अविद्या का संसार होता है। विद्या का संसार होता है। तो हम लोगों का जो सब संसार है जनरली हम देखते हैं अविद्या का संसार है। इस अर्थ में कि संसार का उद्देश्य है जीवन के सुख की प्राप्ति करना। जबकि विद्या का संसार है वो है पारमार्थिक सुख की प्राप्ति करना। जीवन मुक्ति सुख प्राप्ति। वो जो तुरियनंद जी की किताब का टाइटल है तो क्या है कि जीवन मुक्ति अनंत सुख की प्राप्ति। तो वह जो है विद्या का संसार। तो यहां पर वराह नगर मठ में गुरु भाई जो है अपना एक विद्या का संसार बनाया है। एक कम्युनिटी लाइफ लीड कर रहे हैं। क्योंकि सबके बीच में पावर डिफरेंस अभी इतना ग्रेट नहीं है। स्वामी जी चाहे कितने भी ग्रेट हो। राजा महाराज के बारे में स्वामी जी ने कहा है स्वयं कि राजा अमारचे राजा आध्यात्मिकताएं अमार चाहिए बड़ो। आध्यात्मिक क्षेत्र में राजा मेरे से बड़ा है। अभी स्वामी जी प्रशंसा के लिए कह रहे थे ना कि एनकरेज करने के लिए कह रहे थे ना कि आउट ऑफ फॉल्स मोडेस्टी कह रहे थे। वी डू नॉट नो। किंतु यह स्टेटमेंट उन्होंने दिया है और फिर वह जो फेमस घटना है कि स्वामी जी जब अमेरिका से वापस लौटे और राजा महाराज के साथ में प्रथम मुलाकात हुई तो स्वामी जी ने राजा महाराज को प्रणाम करके कहा गुरुवत गुरु पुत्रेशु राजा महाराज तो ठाकुर के मानस पुत्र है तो गुरुवत गुरु पुत्र को कैसा है गुरुवत है तो ऐसा बोलकर के स्वामी जी ने राजा महाराज को प्रणाम किया तो राजा महाराज भी तो वो पीछे रहने वाले नहीं है जेष्ठ भ्राता समम पिता ऐसा बोलकर के राजा महाराज ने सामने प्रणाम किया। जष्ठ भ्राता अर्थात कि बड़ा भाई किस तरह का है? समम पिता पिता के जैसा है। यानी दोनों एक दूसरे को ठाकुर के साथ में इक्विवेलेंट करके एक दूसरे को प्रणाम कर रहे हैं। सो देखिए कि हियर स्वामी जी राजा महाराज की जो एक सत्ता है उसको स्वीकार करते हैं। तो क्या है कि दक्षिणेश्वर में जो पावर डिफरेंस ठाकुर और गुरु भाई ठाकुर और मां के बीच में जो था अभी बाद में देखेंगे कि इंस्टीट्यूशनल लेवल पे कम्युनिटी लेवल पर इस तरह का पावर डिफरेंस नहीं होता। स्कूल में टीचर और स्टूडेंट के बीच में जो पावर डिफरेंस होता है इस तरह का डिफरेंस अभी आपको कंपनी में नहीं दिखेगा। टीम जो होती है आजकल की मॉडर्न ऑर्गेनाइजेशन की बात कर रहा हूं। जो टीम होती है टीम में ज्यादातर आजकल लोग फ्लैट स्ट्रक्चर पसंद करते हैं। जितना हायरार्किकल स्ट्रक्चर आप खड़ा करेंगे उतना ही क्या है? ऑर्गेनाइजेशन में तमस घुसता जाएगा। 10-10 साल तक 20 साल तक 30-40 साल तक एक ही प्रोडक्ट चलाएंगे। भारत में याद है तो वो कितने 40 ना 50 साल तक वो Maruti और एंबेसडर चला। फिर जैसे ही यह मार्केट ओपन हुआ दुनिया भर की वो कार की ब्रांड आना शुरू हो गई। तो क्या है कि मूव फास्ट एंड ब्रेक थिंग्स। जैसे वह वह जुकर वर्ग कहता है। तो देखिए कि आपको यदि इफ यू वांट टू मूव फास्ट इफ यू वांट टू ब्रेक थिंग्स यदि आपको एव्री सिक्स मंथ एक नया अपग्रेडेड एलएलएम यदि आपको रिलीज करना है तो फिर क्या है कि आपको फ्लैट स्ट्रक्चर रखना होगा। सो इन दैट सेंस कि वराह नगर मठ का फ्लैट स्ट्रक्चर था। स्वामी जी वैसे लीडर थे किंतु विदिन द टीम जो थी उसमें राजा को राजा महाराज को राखाल को यह लोग राजा कहते थे ठाकुर ने कहा था राखाल एकटा राज्य चलाते पारे राखाल एक राज्य चला सकता है थे वैसे भी जमींदार के संतान थे वो स्थिरता गंभीरता थी ऊपर से आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की थी तो राजा महाराज को सबका लीडर म स्वामी जी ने पहले ही कह दिया था राजा को हम सभी लोग राखाल को हम सभी लोग राचा करके पुकारेंगे। तो वो एक था। फिर एक था कि ईश्वर कोटि बोलकर के एक ठाकुर ने चिन्हित किया था। योगेन महाराज है, निरंजन महाराज है, स्वामी जी है, राजा महाराज है। फिर बाबूराम महाराज है और पूर्ण था वो लड़का जो पूर्ण बाबू तो वो तो गृहस्थ रह गया। किंतु इस तरह से एक दूसरा एक डिवीजन था। टॉप ऊपर आप कहेंगे वैसे तो स्वामी जी और राजा महाराज थे। फिर यह ईश्वर कोटि आएंगे। फिर यह अन्य गुरु भाई आएंगे। किंतु इन प्रैक्टिस आप देखेंगे कि यह सब चीजों को लेकर के इतना कोई टेंशन नहीं था। आपस में श्रद्धा बहुत थी। बाबूराम महाराज की राजा महाराज के ऊपर में स्वामी जी की राजा महाराज की स्वामी जी के ऊपर में शरद महाराज की स्वामी जी के ऊपर में तो वह तो था। उसमें कोई प्रश्न नहीं। किंतु फिर भी मोर और लेस दक्षिणेश्वर में जो पावर डिफरेंस था उस तरह का डिफरेंस अभी वराह नगर मठ में नहीं है। इट इज मोर लाइक एन इंस्टीट्यूशन। इट इज मोर अ कम्युनिटी। तो यहां पर जिस तरह से वह इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी में से कम्युनिटी लेवल पर इंस्टीट्यूशनल लेवल पर ग्रेजुएशन होता है वराह नगर मठ में मां का भी देखिए कि मां जब ये कामार पुकुर और बाद में जयराम भाटी जाकर रहती है तो मां ने कोई अपने आप को जगत धात्री ना कि गुरु पत्नी के रूप में स्थापित नहीं किया है। मां तो सब घर का काम करती थी। झाड़ू लगाना, खाना बनाना, बच्चों की संभाल रखना माने उनके जो त्यागी संतान है, भक्त संतान है जब आते थे मां के दर्शन के लिए तो मां दीक्षा भी देती थी, अन्न भी देती थी। इस तरह के गुरु म मिलना मुश्किल है। आपको आध्यात्मिक अन्न और यह भौतिक अन्न खाद्य अन्न दोनों देंगे। तो इस तरह से मां अपने को कोई ऐसा हायर लेवल पर एस्टैब्लिश नहीं कर दिया था मां ने। वह अपने को एक फ्लैट फैमिली स्ट्रक्चर में ही रखा था। सो वराह नगर मठ वाला जो पीरियड है और फिर माने वराह नगर मठ की स्थापना 1886 से लेकर के बेलूर मठ की स्थापना 1897 यह ऑलमोस्ट 10 साल का यह जो पीरियड है हम इसको कहेंगे कि इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी तो थी ही थी। उसमें तो कोई प्रश्न नहीं। वह तो चली नहीं जाने वाली है। बट एक एक्स्ट्रा डायमेंशन ऐड हुआ है आपका यह कम्युनिटी लाइफ का इंस्टीट्यूशनल लाइफ का। तो स्वामी जी को और फिर इसके बाद में जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आते हैं रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते हैं तो फिर अलोंग विद इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी अलोंग विद लीडिंग ए कम्युनिटी इंस्टीट्यूशनल लाइफ एक थर्ड एलिमेंट ऐड होता है सिविलाइजेशनल इवोल्यूशन। तो देखिए कि
विरजा-होम के बाद स्वामी विवेकानन्द ने अपने लिए ‘विविदिषानन्द’ नाम क्यों चुना? (2)
ठाकुर की महासमाधि के बाद में वीरजा होम के समय स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को जो पूर्णता सूचक सन्यास नाम दिए हैं। अपने को खुद को अपूर्णता सूचक विविध नाम क्यों दिया? इसके पीछे का शायद यह एक रीजन हो सकता है कि स्वामी जी को तो अभी यह सब कुछ एस्टैब्लिश करना है। मां का जीवन तो मां के हाथ में है। वह तो एक पूरा पैरेलल ट्रैक पर चलता है। उसमें स्वामी जी बेचारे कुछ करने नहीं वाले हैं। वो रामलाल दादा ने मां का पेंशन बंद करवा दिया था। स्वामी जी ने विरोध तो किया किंतु वह कर क्या पाएंगे? काली मंदिर के एडमिनिस्ट्रेशन के सामने। तो मां का तो लाइफ वह एक पैरेलल डायरेक्शन में जाने वाला है। किंतु जहां तक यह गुरु भाइयों का लाइफ है। यह सन्यासी शिष्यों का लाइफ है। उनका लीडरशिप स्वामी जी के हाथ में था। और यह वराह नगर मठ और उसके बाद में जो बेलूर मठ है उसके जो पीछे के जो कन्वेंशंस हैं ट्रेडिशंस जो होंगी जो रूल्स एंड रेगुलेशंस होंगे लिविंग टुगेदर एंड वर्किंग टुगेदर। यह पूरा स्वामी जी को अभी एस्टैब्लिश करना बाकी था। तो हो सकता है इस बर्डन जो है अपने सर के ऊपर में इतना बड़ा कि आध्यात्मिक जीवन के यदि तीन एस्पेक्ट को लिया जाए आध्यात्मिक जीवन कहां ह्यूमन लाइफ जो है इन जनरल उसके तीन एस्पेक्ट को यदि लिया जाए इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी कम्युनिटी और इंस्टीट्यूशनल सेटअप और थर्ड है सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग तो सिविलाइजेशनल अंडरटेिंग तो ये तीन एस्पेक्ट में से स्वामी जी को अभी फर्स्ट एस्पेक्ट ठीक कंप्लीट हुआ है। बाकी दो स्वामी जी को कंप्लीट करने हैं। बोल करके उन्होंने अपने को अपूर्णता सूचक नाम दिया होगा। जबकि गुरु भाइयों के जीवन में अभी स्वामी जी काम बहुत करना है किंतु रिस्पांसिबिलिटी जो है विज़ जो है जो बिल्डिंग जो है वो उनको नहीं करना। उनको भी स्वामी जी को फॉलो ही करना है। सो उनको पूर्णता सूचक नाम देकर स्वामी जी ने अपने लिए अपूर्णता सूचक नाम दिया लिया था विविधानंद। तो वो घटना हो चुकी है कि विजा होम हो चुका है। उसके बाद में विजा होम के
वराहनगर मठ में प्रथम शिवरात्रि महोत्सव
कुछ ही समय के बाद में यह महाशिवरात्रि आती है और महाशिवरात्रि के दिन मास्टर महाशय वराह नगर मठ में आए हैं और गुरु भाइयों के साथ में महाशिवरात्रि का उत्सव मना रहे हैं। अपनी नजरों से देखेंगे कि ठाकुर ने जिस संघ की स्थापना की ठाकुर ने गुरु भाइयों को जो स्नेह के सूत्र में बांध करके गए तो किस तरह से गुरु भाई ठाकुर की यह जो शिक्षा है उसको अपने जीवन में रूपांतरित कर रहे हैं। तो वो विवरण जो है हमने पढ़ना शुरू किया था। 21 और 2 फरवरी 1887 का यह विवरण है। कुछ विवरण हमने ऑलरेडी देख लिया। शिव पूजा का आयोजन हो रहा है। यह जो मठ है वराह नगर मठ उसके पीछे में एक मैदान जैसा था। वहां पर एक बिल्व वृक्ष था। बिल्व वृक्ष के नीचे में शिव पूजा का आयोजन था। और फिर जो गुरु भाई थे उनमें से ही कोई एक गुरु भाई पूजा कर रहे थे। पूरी रात जागरण करके चारों प्रहर की पूजा विधिवत होने वाली थी। काली महाराज जो है गीता पाठ कर रहे हैं। सैन्य दर्शन, सांख्य योग, कर्म योग वगैरह-वगैरह और पाठ करते-करते नरेंद्र के साथ में कथा और विचार हो रहा है। कथा अर्थात वार्तालाप विचार अर्थात विवाद। तो विवाद और वार्तालाप दोनों हो रहा है। उसमें काली महाराज ने कहा कि मैं ही सब कुछ हूं। मैं ही सृष्टि स्थिति प्रलय करता हूं। तो नर अभी देखिए यह जो एक स्टेटमेंट है कि मैं ही सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं। यह फिर भी आपका है कि अद्वैत वेदांत के भीतर में आ जाता है शंकराचार्य के मायावाद के भीतर में। और पिछली बार हमने जो थोड़ा सा डिस्कशन हमारा हुआ था उसमें हमने देखा कि इससे भी एक रेडिकल पोजीशन है वो है अजातिवाद कि सृष्टि की रचना ही नहीं हुई है। जिस तरह से हम जागृत अवस्था में स्वप्न को समझते हैं। एक बार हमारी नींद खुल गई तो स्वप्न में हमने क्या किया? क्या नहीं किया? उसका कोई भी कैरी फॉरवर्ड जागृत अवस्था में नहीं जाता। स्वप्न में अच्छा कार्य किया ना कि बुरा कार्य किया। उस कर्म का जो परिणाम है, फल है, प्रारब्ध है, जागृत अवस्था में कैरी फॉरवर्ड नहीं होता। तो वैसे ही जिस तरह से स्वप्न अवस्था का कर्म, प्रारब्ध, पाप, पुण्य जागृत अवस्था में कैरी फॉरवर्ड नहीं होता। इसका अर्थ है कि स्वप्न अवस्था में आप एथिक्स और मोरालिटी की जितनी भी यह बंधन है सबसे मुक्त है। तो वैसे ही जागृत अवस्था में भी हमारे सर पर एथिक्स मोरालिटी का कोई बंधन नहीं। जागृत अवस्था में भी अच्छा कर्म करें कि बुरा कर्म करें। अल्टीमेटली प्रारब्ध या कर्म का प्रवाह, कर्म का फल यह सब इररिलेवेंट कांसेप्ट है। यदि आप पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, इंद्रियों के विषय से अपने को संपूर्ण रूप से विमुख कर देते हैं तो हमारा जो सही स्वरूप है ब्राह्मण वो ब्रह्म स्वरूप को हम प्राप्त हो जाएंगे। तो यह जो गड पादाचार्य का थिंकिंग है उसमें से शंकराचार्य ने सोचा कि यह थोड़ा ज्यादा ही रेडिकल हो जाता है। यदि जगत की व्यवहारू सत्ता हम नहीं स्वीकार करेंगे तो फिर लोग एथिक्स और मोरालिटी को क्यों फॉलो करेंगे? बोल के शंकराचार्य माया का एक कांसेप्ट ले आए। ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स जीव जगत ईश्वर। ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स ईश्वर। फिर ईश्वर जैसे ट्रेडिशनल ईश्वर होते हैं जीव और जगत की रचना करते हैं। तो यह एक हो गया कि शंकराचार्य ने सृष्टि की उत्पत्ति जो है उसके उसका एक व्यवहारू एक दिखाने के लिए स्वरूप दिखाने के लिए माया का आश्रय लिया है। और वह भी हमने थोड़ा सा डिस्कस किया था कि किस तरह से गडपादाचार्य एक मांडूक्य उपनिषद एकमात्र उपनिषद है कि जिसके ऊपर में कारिका लिख सकते थे। क्यों? क्योंकि मांडुक्य ही एकमात्र उपनिषद है जहां पे सिर्फ कॉन्शियसनेस को रिलेटेड ही 12 श्लोक है। मिनिमम छोटा सा उपनिषद और फिर यह 12 श्लोकों में सिर्फ यह जो लेवल्स ऑफ कॉन्शियसनेस है स्वप्न जागृत सुशुप्ति तुरीय बस उसी का डिस्कशन हुआ है। और ओमकार का क्या अर्थ है? ओमकार किस तरह से स्टेट्स के साथ में अटैच होता है वह थोड़ा सा दिखाया है। बस यहीं तक है। सृष्टि का प्रारंभ सृष्टि की रचना वह सब श्लोक यहां पर नहीं है। तो इसलिए मांडूक्य उपनिषद के ऊपर में ही गडपादाचार्य कारिका लिख सकते हैं। बाकी सब उपनिषद में फिर भी एकोहम बहुस्याम भवती मैं एक हूं बहुत होऊंगा। ऐसा बोलकर के जो सृष्टि का जो रचना है उसके रिलेटेड जो कुछ भी श्लोक वगैरह है तो फिर उसको यह अजातिवाद में कैसे फिट बिठाएंगे बोलकर के गडपादाचार्य वो सब में गए ही नहीं है। जबकि शंकराचार्य बिकॉज़ कि व्यवहारू एक एक्सेप्ट करते हैं क्रिएशन उन्होंने अन्य उपनिषद के ऊपर में भी भाष्य लिखा है। एक चीज दूसरा कि गपादाचार्य का रेडिकल अजातिवाद जो है उन्होंने मॉडरेट करने का प्रयास किया है। लोग शंकराचार्य को एक्सट्रीम समझते हैं किंतु हमको समझना होगा। इवन शंकराचार्य इज ट्राइंग टू मेक गॉड पादाचार्य मोर एक्सेप्टेबल। ही इज़ एक्चुअली अ मॉडरेट पर्सन। एक्सट्रीमिस्ट का यदि किसी को खिताब देना ही है तो वह शंकराचार्य के गुरु के गुरु परम गुरु को देना चाहिए। सो यह सब डिस्कशन हमारा हुआ था। यहां पे काली महाराज जब यह कहते हैं मैं ही सब हूं। मैं ही सृष्टि स्थिति प्रलय कर रहा हूं। यह उस अर्थ में कहते हैं कि ब्राह्मण अभी यहां पे देखिए कि किस हिसाब से यह होगा। यह ना ही अद्वैत फिलॉसोफी में भी इसका कोई आएगा। क्योंकि क्या है कि अद्वैत फिलॉसोफी के अनुसार ब्राह्मण अपने से तो कुछ इच्छा नहीं करता। ब्रह्मन के ऊपर में माया का अध्यारोप होता है। तब कहीं जाकर सृष्टि स्थिति प्रलय होता है। ब्रह्मन की खुद की तो कोई इच्छा नहीं है। एक हम बहुस्याम भवती वो तो ब्रह्म तो बोलता नहीं अद्वैत वेदांत में तो यह बोलने वाला फिर कौन है? तो विशिष्ट अद्वैत एक जो है वहां पर सगुण ब्रह्म है। सगुण ब्रह्म इच्छा करता है और सगुण ब्रह्म की इच्छा से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। तो काली महाराज भले ही चाहे अपने को वेदांत कहलाते हो। यह जो पूरा स्टेटमेंट है वो विशिष्ट अद्वैत को बेटर अप्लाई होगा। तो उसके सामने नरेंद्र क्या करता है? मैं सृष्टि कर कहां रहा हूं? और एक शक्ति मेरे पास में करा रही है। यह हो गया प्रॉपर अद्वैत वेदांत कि एक शक्ति है। एक माया है जो कि यह सब करती है। ब्रह्म जो है वह तो निर्गुण निष्क्रिय है। वह एक चीज हो गया। दूसरा कि यदि अहम ये यदि हम बोलने को जाएं तो यह अहम कोई कॉस्मिक अहम नहीं है। यह तो छोटा अहम है जो कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अपने संस्कार और अपने ये जो पुराने ये जो प्रारब्ध है, उससे बंधा हुआ छोटा सा अहम है। यह कहां सृष्टि स्थिति प्रलय करने को जा रहा है। सो, यह यहां पे स्वामी जी का रिप्लाई दो लेवल पर दे सकते हैं। यदि कॉस्मिक लेवल पे अद्वैत निर्गुण निराकार ब्रह्मण की दृष्टि से कहेंगे कि निर्गुण निराकार ब्रह्मण सृष्टि नहीं करता है। एक चीज यह जो छोटा अहम है मन बुद्धि चित्त अहंकार प्रारब्ध से जो बंदा है वह भी सृष्टि स्थिति प्रलय नहीं कर रहा है। एस फार एस अद्वैत वेदांत इज कंसर्न। तो यह सब हो रहा था डिस्कशन। फिर इसके बाद में आज थोड़ा सा हम एक लाइन पढ़ लेते हैं इसी डिस्कशन का कि पूजा समाप्त हुई है। काली महाराज ने गीता का पाठ समाप्त किया है। फिर शांतिवाद कर रहे हैं। शांति ही शांति ही शांति ही और इसके बाद में बड़ा ही सुंदर दृश्य ए बार नरेंद्र आदि भक्तरा शोकोले दंडायमान होया नृत्य गीत कोरते कोरते बिलो मूल बार-बार परिक्रमण करते छे इस बार नरेंद्र आदि भक्त सभी खड़े होकर के नृत्य गीत करतेकरते बिल्व मूल बार-बार परिक्रमण कर रहे है जस्ट इमेजिन कि वह शिवरात्रि की रात है। मध्य रात्रि का समय है। पूरी महानगरी सो रही है। और किंतु जैसे गीता में कहते हैं ना जब जगत सोता है तब योगी जगता है। जब योगी जगता है सोता है जगत जगता है। तो यह जगत सो रहा है। किंतु यह योगी गण जो है वह जागृत है। वो शिव के भूत पिशाच सब जागृत है। और बिल्व मूल की चारों ओर परिक्रमण करते-करते नृत्य गीत कर रहे हैं। एकदम आपको वो कैलाश का दृश्य याद आ जाएगा। श्मशान वासी शिव शिव और फिर उनके चारों ओर यह भूत पिशाच गण उनके और यह तो कहते ही है ना वो जो वराह नगर में जो बैठकखाना जो था ड्राइंग रूम वहां का उसको ये लोग कहते थे दानादेर घर दानवों का कमरा दानवों का घर तो ये अपने को ये भूत पिशाच दानव ही समझते थे ये भगवान शिव के तो सब दंडायमान होकर के खड़े होकर के बिल्व मूल के चारों और नृत्य करतेकरते परिक्रमण कर रहे हैं। माझे माझे शमश्वरे शिव गुरु शिव गुरु ए मंत्र उच्चारण करते छे और बीच-बीच में एक साथ में मिलकर के समस्वरे एक स्वर में समस्वरे एक स्वर में शिव गुरु शिव गुरु इस मंत्र का उच्चारण कर रहे हैं। गंभीर रात्रि गंभीर रात्रि है। कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है चार दी अंधकार चारों ओर अंधकार है जीव जंतु शकले निस्तब्ध जीव जंतु सब जैसे कि निस्तब्ध है गैरीक वस्त्र धारी ए कुमार वैराग्यबान भक्त गुण कंठे उच्चारितो शिव गुरु शिव गुरु ए महामंत्र ध्वनि मेघ गंभीर रवे अनंत आकाशे उठिया अखंड सच्चिदानंद लीन होते लागी लो महाशय का भी एक कैपेसिटी था एक लंबेल लंबे वो संस्कृत बेस डिस्क्रिप्शन लिखने का तो गैरिक वस्त्रधारी गेरुआ वस्त्रधारी कौमार वैराग्यवान अर्थात कि कुमार अवस्था में ही यंग एज में ही जिन्होंने वैराग्य धारण किया है ऐसे कौमार वैराग्यवान भक्तगण के कंठ से उच्चारित शिव गुरु शिव गुरु यह महामंत्र ध्वनि मेघ गंभीर रवे अर्थात कि मेघ गंभीर स्वरे अनंत आकाश में उठकर के अखंड सच्चिदानंद में लीन होने लगा। देखिए इसको ट्रांसलेट करने के लिए आपको एज इट इज कर सकते हैं क्योंकि ज्यादातर शब्द जो है सब संस्कृत है। फिर से मैं पढ़ता हूं। पहले बेंगली जो कि ऑलमोस्ट संस्कृत है फिर से ट्रांसलेशन गैरी को वस्त्र धारी अर्थात कि गेरवा वस्त्रधारी ए कुमार वैराग्यवान यही कोमार वैराग्यवान भक्तगण कंठे उच्चारितो भक्तगण के कंठ से उच्चारित शिव गुरु शिव गुरु ए महामंत्र ध्वनि शिव गुरु शिव गुरु यही महामंत्र ध्वनि मेघ गंभीर रवे मेघ गंभीर रवे रव अर्थात कि स्वर मेघ गंभीर अर्थात कि मेघ की तरह गंभीर स्वर से अनंत आकाशे उठिया अनंत आकाश में उठकर के अखंड सच्चिदानंद अखंड सच्चिदानंद में लीन होइते लागी लीन होने लगा पूजा समाप्त होइलो पूजा समाप्त हुई अरुणोदय होए होए अरुणोदय हो रहा है हो रहा है नरेंद्र आदि भक्तगण ब्रह्म मुहूर्त गंगा स्नान कोले नरेंद्र आदि भक्तगण ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान किए। इसके बाद में 2 फरवरी का डिस्क्रिप्शन होता है प्रारंभ जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम