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Swami Vivekananda Life ·

गीता और गंगा है हिन्दू का हिन्दूपन || स्वामी विवेकानन्द की गंगा भक्ति 27 Nov 2025

prayer

ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः स्वामी जी का जो भारत में दिए गए व्याख्यान जो है उसमें से एक माय प्लान ऑफ कैंपेन यह हमारा टॉपिक चल रहा था उसमें हम देख रहे थे कि किस तरह से ओवरऑल भारत में जो स्वामी जी ने जो अपनी बात रखी उसके मुख्य पॉइंट क्या है? एक मुख्य पॉइंट हमने देखा था कि स्वामी जी कहते हैं कि भारत है एक पुण्य भूमि है और यहां से ही यह भारत है आध्यात्मिकता की धरती है। यहां पे प्रत्येक धुली कण में यहां की यह जो नदियां है, तालाब है, यहां के जो समुंदर है भारत को गिरे हुए प्रत्येक जल बिंदु में जैसे कि ऋषि मुनियों की तपस्या निहित है। और इसी धरती के ऊपर में यह एक के बाद एक ऋषि संत अवतार धर्म के स्थापक प्रकट हुए हैं और उन्होंने आध्यात्मिक तरंग से पूरी पृथ्वी को जैसे कि आपुत कर दिया है। तो भारत की यह जो विशिष्टता है इन कंपेयर टू और जगत में जितने भी देश हैं जितने भी भूमि खंड है उसके साथ में आप भारत की तुलना करेंगे तो स्वामी जी को यह एक विशेषता सबसे आगे दिखाई दी है। देखिए अ इस यदि हम देखें तो धर्म का उद्भव वैसे यह जो जिसको हम आजकल ये ईस्ट एशिया वेस्ट एशिया कहते हैं मिडिल ईस्ट वहां पर भी हुआ है किंतु वहां पर जाकर के आपको जिस तरह का वातावरण है आपके मन को कभी शांति नहीं मिलेगी। ऐसा कभी लगेगा ही नहीं कि यहां से धर्म का उद्भव हुआ है और यहां की भूमि हमारे मन को शीतलता देती है। यह जो मन की शीतलता है वह आपको भारत में ही दिखेगी। देखिए कि मैंने एक आर्टिकल पढ़ा था कि इजराइल में यह जो मिलिट्री ड्राफ्टिंग जो है कंपलसरी है। अर्थात कि वह जो एडल्ट जितने भी लड़के लड़कियां हैं कंपलसरी उनको मिलिट्री सर्विस करनी है। तो अभी क्या है कि वहां पर तो सतत कुछ ना कुछ चलता ही रहता है। ब्लड शेड, यह युद्ध, यह टेररिस्ट अटैक। तो वहां के सोल्जर जो है वो जब अपना यह मिलिट्री टेन्योर समाप्त होता है या तो फिर जब भी छुट्टी मिलती है यह हरिद्वार वगैरह जाकर के अपने मन को शांत करके आते हैं। तो देखिए कि जहां पे कि एक बहुत बड़े दो सबसे बड़े धर्म जो आजकल के जगत के उन दोनों की उद्भव भूमि वैसे तो यह मिडिल ईस्ट है किंतु वहां पर भी यदि उन लोगों को मन की शांति चाहिए तो भारत में यह ऋषिकेश है यह जो उत्तरकाशी है वहां का उनको तीर्थ यात्रा करनी पड़ती है तो यह भारत की विशिष्टता है टू रिलेटेड टू दैट स्वामी जी ने एक एस्स लिखा है। एक निबंध लिखा है। अभी हुआ ऐसा कि जब स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका जा रहे थे तुरियनंद जी और निवेदिता के साथ में तो उस समय तो त्रिगुणातिनंद जी ने उद्बोधन मैगजीीन जो है उसकी स्थापना कर दी थी और उद्बोधन के लिए सब समय अच्छा मटेरियल चाहिए। तो अभी उन्होंने देखा कि यह वेदांत के आर्टिकल है और यह शक्ति ब्रह्म जीव जगत ईश्वर यह माया फिर यह यह जो सब है उसको पढ़ने वाले जो रीडर होते हैं ना वे लोग ज्यादा नहीं है। जबकि कोई इंटरेस्टिंग मैटर हो जैसे कि ट्रेवल लोग है यात्रा का वर्णन है। तो यह जो टॉपिक है ना जो रीडर है बड़े ही आनंद से पढ़ते हैं और यही सब आर्टिकल थोड़े से ज्यादा करेंगे तो क्या होगा कि उद्बोधन का रीडरशिप बढ़ेगा उद्बोधन का व्याप बढ़ेगा। तो इसी लॉजिक को नजर में रखकर के त्रिगुणातीनंद जी ने स्वामी जी को कहा कि आप सेकंड टाइम अमेरिका जा रहे हैं। समुद्र यात्रा वगैरह करेंगे तो आपका एक ट्रेवलक जो है यात्रा वर्णन वो आप हमको उद्बोधन के रीडर्स के लिए नियमित रूप से भेजिए। तो स्वामी जी एग्री तो हो गए किंतु स्वामी जी का ऐसा है कि मूढ़ होने से वह लिखेंगे। मूड नहीं होने से नहीं लिखेंगे। तो जो भी है उनको जबजब भी समय मिला जब भी वह मूड में थे उन्होंने यह परिव्राचक बोल के एक पूरा सीरीज ऑफ आर्टिकल लिखे हैं। उद्बोधन में सीरीज के रूप में पब्लिश हुए थे। तो इसमें से एक बड़ा ही सुंदर वर्णन उन्होंने किया है। देखिए कि क्या माने बैकग्राउंड क्या है? सेटअप क्या है? ऑलरेडी स्वामी जी यह जहाज में बैठकर के विदेश जाने के लिए कोलकाता से निकल चुके हैं। और क्या है कि यह जो पार्टिकुलर विवरण उन्होंने लिखा है वह उस समय लिखा है जबकि उनका जहाज जो है अभी यह गंगा नदी से बाहर निकल कर के जो बे ऑफ बंगाल समुंदर है उसके भीतर में वह प्रवेश करने वाला था। तो क्या होता है कि नदी के भीतर में आपको तो पता ही होगा शायद कि छोटी-छोटी नौकाएं तो आसानी से तैर जाती है। किंतु जो बड़े-बड़े जो जहाज होते हैं, उनको यह एक बहुत बड़ा दिक्कत यह होता है कि नदी की जो ये है फ्लोर है उसका नीचे का जमीन का जो भाग है वहां पे ना कभी-कभी रेती और मिट्टी वगैरह इकट्ठा होकर के कुछ छोटा-मोटा एक ये एक ये बना देते हैं। हिल जैसा बना देते हैं। एक बहुत बड़ा एक अंतराई खड़ा कर देते हैं। तो अभी क्या है कि ऊपर में तो पानी है नदी का किंतु आपको ऊपर से तो दिखेगा नहीं। आपको ऐसा ही लगेगा कि नदी का जो डेप्थ है वो सब जगह एक ही जैसा होगा। किंतु ऐसा नहीं है। बीच-बीच में यह जो है मिट्टी वगैरह जम करके एक बैरियर जैसा बन गया है जो कि आपको ऊपर से नहीं दिखेगा। तो जहाज जा रहा है जा रहा है। एकाएक इस तरह की मिट्टी की बैरियर के साथ में टकराया और टकरा करके उसमें यह छेद हो गया और उसमें से पानी जाने लगा और जहाज टूट के नष्ट हो गया। तो ऐसा बहुत बार होता है। यह जो टाइटेनिक का फेमस है कि वो आइसबर्ग के साथ में टकराया था। तो इस तरह का यह जो गंगा का जो या कोई भी नदी है ज्यादातर क्या होता है बहुत बार अब जैसे कोलकाता जैसे सिटी है वह क्या होते हैं कि नदी के किनारे बनते हैं इस तरह से कि जहां से समुंदर में जाना आसान हो तो यह नदी के किनारे बने हुए सिटी से हार्बर से समुंदर तक की यात्रा काफी डिफिकल्ट रहती है। जो एक्सपर्ट जो कैप्टन होता है वही नेविगेट कर पाता है। तो उन दिनों की यह घटनावली है कि स्वामी जी जब यह जो पैसेज लिपिबद्ध कर रहे थे उसमें सबसे पहले तो उन्होंने जो गंगा नदी है उसका जो क्या महात्म है उसका वर्णन किया है और हम हिंदुओं के लिए गंगा का क्या यह महत्ता है तो देखिए कि गंगा नदी में से गंगा सागर अर्थात कि गंगा सागर तो शायद नहीं कहेंगे कहेंगे कि यह जो बे ऑफ बंगाल है वहां जाकर के यह गंगा नदी मिल रही है। तो वह जो जर्नी है उसके दौरान स्वामी जी ने यह गंगा का वर्णन किया है। तो देखिए कि यह एक तो हो गया कि यह पृष्ठभूमि का यह रंगमंच हो गया कि यह बैकग्राउंड है और इस बैकग्राउंड में स्वामी जी क्या कहते हैं? ऋषिकेश गंगा मने

ऋषिकेश में बहती गंगा — प्रकृति का अनुपम सौंदर्य

आने ऋषिकेश की गंगा याद है तुमको कैसी थी? देखिए यह पूरा निबंध लिखा गया है उद्बोधन के रीडर्स के लिए। यानी कि स्वामी जी अपनी खुद की बेंगोली में इसको लिखते हैं। जो लोगों को बेंगोली आती होंगी उन लोगों को यह जो स्वामी जी की यह जो दो तरह की लैंग्वेज एक तो साहित्यिक यानी कि संस्कृत मिश्रित बंगाली दूसरा कि एकदम चलती बांग्ला जिसको कि यह बंबई या हिंदी कहते हैं ना बंबई या हिंदी यानी वो मूवीज में जिस तरह का हिंदी चलता है। तो यह चलती बांग्ला अर्थात कि कोलकाता की यह जो कुछ स्ट्रीट्स है। ये गलियां वगैरह है। ये लड़के किस तरह से बेंगली बोलते हैं। तो इस एक एक और है चलती बांग्ला और एक और है आपका संस्कृत मिश्रित बेंगली। तो स्वामी जी जब लिखते हैं दोनों का मिश्रण कर देते हैं। तो उनका यह जो लिखने का जो ढंग है जो साहित्यिक शैली है वह भी बड़ी खूबसूरत है। तो स्वामी जी प्रारंभ करते हैं। यह पैसेज मैंने उस परिवराजक आर्टिकल में से लिया है। इस पैसेज का प्रारंभ होता है कि ऋषिकेश की गंगा याद है। अभी क्या है? देखिए और एक बात कि स्वामी जी यह जो आर्टिकल्स लिखते हैं ना वो लिखने का स्टाइल कैसा है? जैसे कि उद्बोधन के एडिटर है उनको संबोधन करके लिख रहे हैं। जैसे त्रिगुणातिनंद जी उद्बोधन के एडिटर थे। तो इस तरह से उनका लिखने का स्टाइल है। जैसे कि उद्बोधन के एडिटर को संबोधन करके लिख रहे हैं। और जब हम पढ़ेंगे तो हमको ऐसा लगेगा कि स्वामी जी जैसे हमको ही संबोधन करके डायरेक्ट सेकंड फर्स्ट पर्सन टू सेकंड पर्सन इस तरह से लिख रहे हैं। तो क्या है कि पढ़ने में हमको बड़ा आनंद आता है। एक बड़ा ही क्या कहेंगे? एक वार्म एंड इंटमेट स्टाइल में लिखा हुआ है। इस तरह से लगता है। तो स्वामी जी कहते हैं कि ऋषिकेश की गंगा याद है? से निर्मल नीलाभ जल वही निर्मल नीलाभ जल नील आभ देखिए सब संस्कृत शब्द शुरू शुरू में निर्मल और नीलाभ अर्थात कि यह जो आकाश है नील रंग का आकाश वह आकाश की छवि उस आकाश का रिफ्लेक्शन जब पानी के ऊपर में गिरता है तो पानी का रंग कैसे कि नीलाब हो जाता है तो स्वामी जी डायरेक्ट जैसे कि त्रिगुणातिनंद जी को उद्देश्य करके कहते हैं। अभी क्या है हमको पता है कि यही पर भाई जो गुरु भाई थे उन्होंने पूरे भारत में भ्रमण किया था। ऋषिकेश वगैरह गए थे। तो वो मेमोरी को याद करके देखिए जनरली हम लोग आर्टिकल लिखते हैं ना तो ऐसा किसी व्यक्ति को या किसी रीडर को उद्देश्य करके नहीं लिखेंगे। हम एक इंपर्सनल स्टाइल में लिखेंगे। हम सीधा लिखना शुरू कर देंगे कि ऋषिकेश की गंगा का विवरण इस तरह से है। उसका पानी है निर्मल और नीलाभ। किंतु वो क्या है ना कि जब हम पढ़ेंगे ना तो हमको एक तरह का क्या है कि एक अपनापन उसमें नहीं आएगा। क्योंकि देखिए मैंने भी आर्टिकल लिखे हैं जब मैं गुजराती मैगज़ीन का एडिटर था उस समय में। तो उस समय मुझे किंतु यह सब स्टाइल्स नहीं पता थी। हालांकि देखिए स्वामी जी को हम पढ़ते रहते हैं। किंतु जब स्टाइल का एनालिसिस जो होता है ना वो एकद दिन में या एकद रीडिंग में नहीं होता। इसको मैं अभी रिसेंटली पढ़ रहा था इस पैसेज को तब मुझे यह स्ट्राइक हुआ। आर्टिकल लिखने का कितना सुंदर स्टाइल है। यदि हम रीडर को या किसी एक माने एक मनकल्पित एक व्यक्ति को उद्देश्य करके लिखेंगे तो दैट वुड बी वेरी ब्यूटीफुल। तो यहां पे स्वामी जी लिखते हैं ऋषिकेश की गंगा याद है तो वही निर्मल और नीलाभ जल जार मध्य दोष हाथ गभीरे माछेर पाखना गोना जाए। इस तरह का निर्मल नीलाब जल कि जिसमें आप देखेंगे तो 10 हाथ गंभीर में गंभीर जल में मछली जो होती है उसका जो फीन होता है पंख जो होते हैं वो आप गिन सकते हैं। देखिए कि ऋषिकेश की गंगा इतनी सुंदर है। इतनी पवित्र और स्वच्छ सलीला है कि उसमें 10 हाथ नीचे अभी एक हाथ का आप यदि मेजरमेंट गिनेंगे ऑलमोस्ट 1 फुट होगा 1ढ़ फुट होगा एक हाथ का डिस्टेंस अर्थात कि यानी कि स्वामी जी कहते हैं 10 हाथ नीचे आप देख सकते हैं। जनरली कोई भी अभी आप बेलूर मठ की ही गंगा देख लीजिए। बेलूर मठ में गंगा में आप दृष्टि डालेंगे तो मुश्किल से आपको मैंने 10 इंच भी आपको नहीं दिखाई देगा कि 10 इंच नीचे क्या है। किंतु वहां और फिर ये कोलकाता की गंगा का वर्णन करेंगे स्वामी जी बड़ा ही सुंदर करेंगे। एग्जैक्टली इसी तरह से करेंगे। तो वहां पर किंतु पानी इतना स्वच्छ और निर्मल है कि 10 हाथ नीचे आप देख सकते हैं। यदि 10 हाथ नीचे मछली तैर रही है पानी की सतह से तो उसके जो फीन होते हैं, पंख जो होते हैं, उसको आप गिन सकते हैं। इतना क्रिस्टल क्लियर वाटर होता है। मैंने कभी-कभी यह अलास्का जो है ना, वहां के कुछ वीडियोस देखे थे। डॉक्यूमेंट्री में कभी-कभी देखता रहता हूं। तो, यह अलास्का है ना कि यह जो इस तरह की प्रिस्टाइन जगह है। जहां पे यह इंडस्ट्रियलाइजेशन ज्यादा नहीं हुआ। वहां का पानी जो होता है ना इतना स्वच्छ होता है एकदम ब्लू कलर का माने आइस ब्लू कलर का पानी उसको देखकर के ही जैसे कि हमको पिपासा लग जाती है प्यास लग जाती है कि अरे इस तरह का पानी तो पीना ही चाहिए इतना क्रिस्टल क्लियर और इतना शार्प और कलर भी इतना सुंदर है तो इस तरह का पानी पीना चाहिए ऐसा हमको लग जाता है प्यास लग जाती है इसी तरह के पानी को देख के तो यहां पे भी यही जो ऋषिकेश की गंगा। इसमें देखिए कि निर्मल नीलाभ जल और इतना क्रिस्टल क्लियर पानी कि 10 हद तक आप मछली को देख सकते हैं और उसके पंख गिन सकते हैं। शई अपूर्व सुस्वादु हीम शीतल गांग्यम वारी मनोहारी वही अपूर्व और सुस्वादु अपूर्व अर्थात कि बहुत ही रमणीय जिसकी शोभा है और सुस्वादु है। इस तरह का पानी कि जिसको पीकर के जैसे कि हमको ऐसा लगेगा कि हमने अमृत पान किया है तो वही अपूर्व सुस्वादु हीम शीतल अर्थात कि यह बर्फ में से तो यह गंगा पसार हो रही है। तो इसलिए उसका जो टेंपरेचर है हीम शीतल है अर्थात शीतल अर्थात कि ठंडा और हीम अर्थात कि बर्फ की तरह ठंडा वही अपूर्व सुस्वादु हीम शीतल गांग्यम वारी मनोहारी यह जो कविता की पंक्ति है उसको स्वामी जी कोट करते हैं। गंगा का पानी है वह मनोहारी है। वही अपूर्व सुस्वादु हीम शीतल गांग्यम वारी मनोहारी आरश अद्भुत हर हर हर तरंगोत ध्वनि और वही अद्भुत हर हर हर तरंग से उत्पन्न हुआ तरंगोत्थ ध्वनि यह सब संस्कृत शब्द ही है। यदि थोड़ा सा भी संस्कृत आपको आता है तो इसमें से 90% आपको बंगाली ही समझ में आ जाएगा। यह जो नदी का जो पानी है जब वह एकदम गति से वह धावित होता है तो उसमें से जो तरंगे उछलती है जो किनारे पर आकर के टकराती है तो उसमें से एक तरह का कल कल शब्द होता है। किंतु देखिए कि ये कल कल शब्द जो हैुर्यमय है। किंतु यह हिमालय की जो गंगा है, वहां से जो पानी की तरंगों का शब्द जो होता है, निनाद जो होता है, वह गुरु गंभीर निनाद हर हर हर अर्थात कि भगवान शिव की आराधना करता हुआ यह निनाद गंगा की तरंगों से हमको सुनने में आता है। शई वही अपूर्व सुस्वादु हीम शीतल गांग्यम वारी मनोहारी और वही अद्भुत हर हर हर तरंगोत्थ ध्वनि सामने गिरिनी निर्झरे हर हर प्रतिध्वनि और सामने यदि यहां पर गंगा बह रही है और गंगा की तरंगों से हर हर हर यह गंभीर निनाद उत्पन्न हो रहा है तो सामने क्या है गिरि निर्झर अर्थात कि गिरी अर्थात कि पर्वत और निर्झर अर्थात कि यह वॉटरफॉल यह जो आप वॉटरफॉल आपने देखे होंगे नायग्रा वॉटरफॉल बहुत फेमस है। भारत में भी देखेंगे बहुत सारे वॉटरफॉल है। मैं जब रांची में था तो वहां पे गांव वो तो पूरा जंगल पहाड़ नदी माने अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य तो वहां पे एक वॉटरफॉल था। अभी उसका नाम मैं भूल गया। इतना कुछ फेमस नहीं था। ये फेमस हो सकता है। वहां पे क्या है टूरिज्म इतना डेवलप नहीं हुआ है माओ ईस्ट एरिया है बोल के किंतु यदि टूरिज्म यदि वहां पे डेवलप होता है तो कुछ-कुछ जगह है इतनी रमणीय है कि आपको ऐसा ही लगेगा कि आप यह उत्तरकाशी ना कि यह कुलू मनाली में आप टहल रहे हैं। इतना सुंदर वातावरण है। तो वहां पे एक वॉटरफॉल था तो क्या था पता है? इस इस तरह से सिकलूडेड था कि यह जो पर्वत था उसके आसपास में हिल जो थी यह अर्धचंद्राकार थी और यानी कि चारों ओर से घिरा हुआ और वहां पे एक छोटा सा पैसेज जैसा है उस पैसेज में से जाकर के आप बैठ जाएंगे ना तो ऐसा लगेगा आपके सामने यह अर्धचंद्राकार ये जो पहाड़ी है चट्टान है वो है चारों ओर सुंदर यह पेड़ पौधे और इतना सुंदर वाता वातावरण ठंडक है और वहां पर जो उसमें से फिर वाटरफॉल होता है। नजर के सामने से ही अर्धचंद्राकार जो पहाड़ी है उसके ऊपर में से वाटरफॉल होता है। तो उसकी चार पांच धाराएं हैं तो वहां पर नीचे जमीन पर गिरती है। नदी के भीतर में और नदी और बहती है। तो मैं कभी-कभी वहां पे नदी के किनारे जाकर के बैठता था। इतना सुंदर सिक्लूडेड जगह कोई नहीं आता था वहां पे और मुझे आश्चर्य होता था कि इसको क्यों नहीं टूरिज्म के रूप में डेवलप हुआ। किंतु जो भी है बहुत ही सुंदर वो दृश्य था। तो यहां पर भी अब जिन लोगों ने भी ट्रैवल किया होगा जिन लोगों को भी यह घूमना फिरना अच्छा लगता है आप सबने वाटरफॉल देखे ही होंगे। उसकी ब्यूटी जो है सौंदर्य है उसका आनंद पाया ही होगा। और हिमालय के जो वॉटरफॉल है उसका सौंदर्य और उसका यह जो भव्यता है उसका तो वर्णन ही हम नहीं कर सकते। तो यहां पर देखिए स्वामी जी कहते हैं कि एक ओर तो गंगा की तरंगे जो है वह तरंगोत्थक ये जो ध्वनि है हर हर हर करके वो प्रतिध्वनि हो रही है निनादित हो रही है और जैसे कि उसके रिस्पांस में उसकी प्रतिध्वनि में यह जो पहाड़ की चट्टाने हैं ऊंची ऊंची पहाड़ की ये जो गिरी श्रृंख है उसके ऊपर में से यह वॉटरफॉल जो है जिसको कि स्वामी जी कहते गिरी निर्झर वाटरफॉल को संस्कृत या ऑलमोस्ट संस्कृत शब्द ही है गिरि निर्झर तो यह वाटरफॉल या तो गिरी निर्झर का जो पानी गिर रहा है उसका जैसे कि हर हर करके प्रतिध्वनि हो रहा है तो देखिए स्वामी जी का जो पोएटिक डिस्क्रिप्शन भी कितना सुंदर है कि यहां पर वही शांत सुंदर जैसे कि निर्मल नीलाब जल गंगा का इतना सुंदर पवित्र स्वच्छ कि 10 हाथ हाथ तक आप देख सकते हैं। मछली के पंख गिन सकते हैं और उसकी तरंगोत्थ तरंगों में से प्रकट हुई जो निनाद है हर हर हर उसको सुनते हैं और सामने ही यह जो गिरिनी निर्झर है उसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है हर हर करके तो इतना सुंदर यह एटमॉस्फियर से बिपिन ने वास वही जैसे कि वन में निवास माधुरी भिक्षा माधुरी भिक्षा अर्थात की गृहस्थ के वहां से इस तरह से भिक्षा लेनी है कि किसी एक गृहस्थ के ऊपर में सब तरह का बर्डन ना आ जाए। तो किसी एक मधुकरी यह जो मधुमक्खी है मधुमक्खी थोड़ा सा मधु एक फूल से पान करती है। फिर थोड़ा सा मधु दूसरे फूल से पान करती है। फिर थोड़ा सा मधु है। मधु अर्थात कि मध अर्थात कि हनी। तो यह थोड़ा सा हनी है, मद है। तीसरे फूल से पान करती है। एक ही फूल में से सब हनी जो है वह पान कर लेगी तो क्या है कि वो फूल जो है शायद वो ये हो जाएगा। माने वो ये म खत्म हो जाएगा। उसका ब्यूटी है। उसका यूथ है वगैरह। तो इसकी वजह प्रत्येक फूल से थोड़ा-थोड़ा मधपान करना है। तो इसको माधुकरी कहते हैं। माधुकरी भिक्षा अर्थात ऐसा नहीं है कि एक ही गृहस्थ के वहां पर जाकर बोला कि हम 10 साधु हैं। 10 को खिलाओ वरना तुमको श्राप लगेगा। बेचारा गृहस्थ परेशान हो जाएगा। इसकी बजाय अच्छा है। एक के घर से दो-तीन रोटी लिया। दूसरे के घर से थोड़ा सा यह सब्जी मिला तो वह ले लिया। तीसरे के घर से थोड़ा सा यह आटा ले लिया। दूसरा रोटी बनाने के लिए चौथे के घर से थोड़ा सा चावल ले लिया। तो ऐसा थोड़ा-थोड़ा करके आपको ग्रहण करना है। तो स्वामी जी एक्चुअली ये देखिए कि त्रिगुणातिनंद जी को अपने गुरु भाई को वह हिमालय के परिव्राजक के दीन याद करवाते हैं कि वही ऋषिकेश की गंगा याद है। तो इतना सुंदर इसका जल था। उसकी तरंगों से यह हर हर हर ध्वनि निकलती थी। ध्वनि निनाद होती थी। वही हम वन में निवास करते थे। वही मधुकरी भिक्षा करते थे। त उसके बाद में गंगा गर्भ खुद्र द्वीपाकार शिलांडे भोजन गंगा गर्भ में अर्थात कि गंगा तो विशाल है उसके मध्य में खुद द्वीपाकार शिलाखंड छोटा सा द्वीप आकार का यह जो आइलैंड होता है ना आइलैंड तो वैसे तो समुंदर में आइलैंड होते हैं। नदी के भीतर में भी आइलैंड होते हैं। यह जैसे ओमकारेश्वर है तो ओमकारेश्वर आप गए होंगे तो उसके बीच में ही एक आइलैंड जैसा है नर्मदा के अपनी जो सफेद कुटिया है उसी आइलैंड के ऊपर में ही है। यह जो शंकराचार्य गुफा है उसी आइलैंड के ऊपर में ही है और उसकी आप परिक्रमा भी कर सकते हैं। मैं वहां पर रहा था डेढ़ महीने ना दो महीने रहा था। तो उस समय प्रतिदिन मैं प्रयास करता था कि पूरी परिक्रमा करूं। हर बार होती नहीं थी। एक दो बार की है पूरी फिर सब समय नहीं की किंतु फिर भी वह इसका सौंदर्य जो है नदी के भीतर में इस तरह के जो आइलैंड होते हैं उसका वह अद्भुत होता है। तो देखिए कि यह तो नर्मदा तो फिर भी मध्य भारत में है। वही जहां पे ऋषिकेश में जहां पे निर्मल पवित्र गंगा का उद्गम स्थान ही एक तरह से कहेंगे। गंगोत्री से तो ऋषिकेश ज्यादा दूर नहीं है। तो उस समय की वहां की गंगा के बीच में जो आइलैंड होगा कितना सुंदर होगा। तो स्वामी जी याद करवाते हैं वही वन में निवास वही माधुरी भिक्षा वही गंगा गर्भ में क्षुद्र जो छोटा सा जो आइलैंड था उसके ऊपर में बैठकर के आहार करना भोजन करना करपटे अंजली अंजली श्री झोलपान करपट अर्थात कि इस तरह से खोबा जिसको कहते हैं कि खो दो हाथ में भर के अंजली अंजली जलपान पानी पीना है देखिए रहना कहां पे है तो वन में रहना है। खाना ग्रहण कलेक्ट कैसे करना है? तो मातुकारी भिक्षा करनी है। खाना कहां पे है? तो वही यह जो एक क्षुद्र जो छोटा सा आइलैंड होता है गंगा गर्भ में उसके ऊपर में बैठकर के खाना खाना है। भोजन खाना है। ग्रहण करना है। और फिर पानी कैसे पीना है? तो वही करपुट यानी कि यह दोनों हाथ इस तरह से करके अंजलि बना अंजलि अंजली जलपान यानी कि इस तरह से आप खो बना करके पानी में डालेंगे। उसमें से पानी लेंगे फिर ऐसा करके पिएंगे तो उसको कहेंगे कर पुटे अंजली अंजली जलपान चार दिके कण प्रत्याशी मत्स्य कुले निर्भय विचरण और चारों ओर है कण प्रत्याशी प्रत्याशी अर्थात कि जो आशा रखता है कण अर्थात कि जो खाने का जो टुकड़े जो चारों ओर गिरे हैं उसको प्राप्त करने के लिए कण प्रत्याशी खाने के टुकड़ों को प्राप्त करने की आशा रखने वाली मत्स्यक कुल अर्थात कि यह जो मछलियां है उनका निर्भय विचरण निर्भय विचरण क्यों बहुत सारी जगहों पे मछली पकड़ी जाती है तो मछुआरा जाल फेंकता है वगैरह करता है तो मछलियों को पहले से ही पता है कि यहां पे आने से डर का माहौल है। कब हम कहीं जाल में फंस जाएंगे ठीक नहीं है। किंतु यहां जो है ऋषिकेश में कोई भी जाल फेंक करके मछली पकड़ता नहीं है। तो यह मत्स्य कुल का निर्भय विचरण देखिए स्वामी ठाकुर की वह कहानी है ना कि मछुआरा जाल फेंकता है तो जाल में से चार तरह की मछली की बात करते हैं ठाकुर एक तो मछली है कि जो कि वो जाल में फंस गई है तो फिर अपना मुंह जो है रेती में छुपा देती है क्यों वो सोचती है कि मछुआरा जो है उसको भूल जाएगा उसको पकड़ करके बाहर में नहीं निकालेगा वो हो गई बद्ध जीव की उपमा उपमा उसके बाद में एक मछली है बाहर निकलने के लिए प्रयास तो बहुत करती है किंतु निकल नहीं पाती वह हो गया मुमुक्षु जीव और तीसरी है कि तीसरी मछली मेहनत करती है निकलने के लिए और जाल में से निकल जाती है तो वो हो गई मुक्त जीव तो बद्ध जीव मुमुक्षु जीव और मुक्त जीव किंतु ठाकुर साथ में ही कहते हैं चौथी मछली की उपमा देते हैं उसको पता है कि यहां पे मछुआरा जाल फेंकने वाला है। वहां पर मैं जाऊंगी ही नहीं। तो इसको कहते हैं नित्य मुक्त। यानी कि जो वासनाओं के जो भी विषय है उसी से दूर रहो। वासना के विषय में फंसेंगे तो फिर आपको फिर मुक्ति की इच्छा करनी होगी। मुक्ति के लिए प्रयास करना होगा। बंधन में ही नहीं पड़ेंगे तो फिर मुक्ति की प्रयास की आवश्यकता क्या है? ठाकुर कहते हैं नित्य मुक्त जीव। तो यहां पर जो है जितनी भी मछलियां गंगा में जो तैरती है ऋषिकेश में वह सब नित्य मुक्त मछलियां हैं। उनको पता है कि यहां पर कोई जाल नहीं फेंकता है। इसलिए यहीं पर विचरण करो और कहीं पर कोलकाता जाने की जरूरत नहीं है। तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि चारों ओर खाना खाने के लिए इकट्ठा हुई मछलियों का निर्भय विचरण। देखिए यह एक्चुअली पूरा एक सिंगल सेंटेंस है। स्वामी जी त्रिगुणांद जी को वही ऋषिकेश की गंगा याद करवाते हैं। किस तरह की गंगा या ऋषिकेश की गंगा याद है? तो वही निर्मल नीलाब जल जिसमें आप 10 हाथ नीचे भी मछली के जो पंख है गिन सकते हैं। वही अपूर्व सुस्वादु हिम शीतल गांग्यम वारी मनोहारी आरशई और वही अद्भुत हर हर हर तरंगोत्थ ध्वनि सामने है गिरिझर का हर हर प्रतिध्वनि वही वन में निवास वही माधुकरी भिक्षा गंगा के गर्भ में छोटे से आइलैंड पर बैठकर के भोजन वही कर पुट खोबे मा भर के अंजली अंजली जलपान और चारों ओर यह निर्भर मछलियों का विचरण वही गंगा याद है तो वह स्वामी जी कहते हैं त्रिगुणातिनंद जी को फिर से श्री गंगाजल प्रीति वही गंगाजल प्रीति गंगार महिमा गंगा की महिमा से गांग्य वारी वैराग्य प्रद स्पर्श वही गांग्यवारी अर्थात कि गंगा की गंगा का जल उसका वैराग्य प्रद स्पर्श कैसा स्पर्श जो कि वैराग्य प्रदान करता है। अब यह वैराग्य प्रद स्पर्श जो है उसका बहुत ही डिटेल विवरण स्वामी जी बाद में करने वाले हैं। इसलिए यहां पर मैं इसको स्किप कर देता हूं। तो वही गंगाजल प्रीति वही गंगा की महिमा वही गंगाजल का वैराग्य प्रद स्पर्श से हिमालय वाहिनी गंगा वही हिमालय वाहिनी गंगा श्रीनगर टिहरी उत्तरकाशी गंगोत्री तोमादेर केऊ केऊ गोमुखी परजन तो देखे छे वही हिमालय वाहिनी गंगा को श्रीनगर टिहरी उत्तरकाशी गंगोत्री और आप में से कोईकोई गोमुख तक आपने जिसको कि देखा है किंतु आमादे करदमाबिला हरगात्र विघर्षण शुभ्रा किंतु अभी देखिए पहले तो उन्होंने हिमालय की गंगा का वर्णन किया। यह उत्तरकाशी की पवित्र सुपवित्र सुस्वादु गंगा है। हिम शीतल गंगा है। पहले तो उसका वर्णन किया और साथ में ही अभी कंट्रास्ट करते हैं कोलकाता की गंगा का। सो क्या कहते हैं? किंतु आमादे करमा करदमाब बिला करदम अर्थात कि की किचड़ कादव तो किंतु हमारी ये कादव से किचड़ से भरी गंगा हरगात्र विघर्षण शुभ्रा हरगात्र हर अर्थात कि भगवान शिव गात्र अर्थात कि विघर्षण अर्थात कि उनके स्पर्श हुई और शुभ्रा अर्थात कि इस शुभ्र अर्थात कि श्वेत या तो सफेद या तो वाइट तो उसकी गंगा का कलर कैसा है? हर गात्र विकर्षण शुभ्रा अर्थात कि भगवान शिव के देह से स्पर्श हुई शुभ्र कलर की। देखिए यहां पे जो कंट्रास्ट स्वामी जी करते हैं वहां पे तो सबसे पहले तो कहा कि निर्मल नीलाभ जल अर्थात कि जिसका जल है ऋषिकेश में निर्मल और नीलाभ अर्थात कि नील रंग का। यह जो भगवान विष्णु का जो रंग है वह नीलाभ रंग उनको वहां पर ऋषिकेश में देखने को मिलता है और निर्मल है। किंतु हमारी जो कोलकाता की जो गंगा है वो कीचड़ से भरी हुई और हरगात्र विघर्षण शुभ्रा अर्थात कि इस तरह का शुभ्र रंग जो कि भगवान शिव के देह के साथ में मिलता है। तो वहां पे वह भगवान नारायण के देह का रंग यहां पे भगवान जो है यह महादेव के रंग अ देह का रंग और वहां पे है पवित्र सुश माने वो निर्मल यहां पे है कीचड़ से परिपूर्ण सहस्त्र पोत बखा ए कोलकातार गंगार की एक सहस्त्र पोत बखा पोत अर्थात कि जहाज सहस्त्र अर्थात कि सैकड़ों जहाज वक्ष वक्ष अर्थात कि सीना अर्थात कि इस तरह की गंगा जिसके सीने पे सहस्त्र जहाज चल रहे हैं। देखिए तीन उपमा दी है। माने ऋषिकेश की गंगा की इतनी सारी जब उपमा दी तो सामने कंट्रास्ट में कोलकाता की गंगा की तीन उपमा दी है। पहले तो कीचड़ से भरपूर है। दूसरा है कि हर गात्र विघर्षण शुभ्रा अर्थात कि महादेव के देह का जो रंग है इस तरह के शुभ्र रंग की है और जिसके सीने पे सहस्त्र जहाज चल रहे हैं तो सहस्त्र पोत बखा ई कोलकाता गंगाई की एक टान आ ता भोलबार नहीं इस तरह की गंगा की इस तरह की कोलकाता की गंगा के प्रति हमारा एक कौन सा आकर्षण है जिसको कि हम भूल नहीं पाते पाते हैं आश्चर्य राइट कि स्वामी जी उसका एक्सप्लेनेशन भी देंगे कि यदि आपको वहां पे हिमालय की इतनी सुंदर गंगा तो उसके सामने यह जो इवन कोलकाता की भी इस तरह की गंगा कादव कीचड़ से भरपूर है जहां पे इतने सारे जहाज चल रहे हैं। इस तरह की गंगा के प्रति भी हमारा इस तरह का आकर्षण है कि जिसको हम भूल नहीं पाते हैं। शे की स्वदेश प्रियता बाल संस्कार के जाने। अभी यह कोलकाता की जो गंगा है उसके प्रति हमारा आकर्षण है। वह क्या है? वह क्या स्वदेश प्रियता है? कोलकाता में बंगाल में जन्म लिया है बोलकर के कोलकाता की गंगा के प्रति प्रीति है। यह स्वदेश प्रियता है कि बाल्य संस्कार कि बचपन से ही वही कोलकाता का दर्शन करकाता की गंगा का दर्शन करते आ रहे हैं। बोल के यह बाल्य संस्कार है। किसको पता हिंदूर शंगे मायर शंगे एक ही संबंध हो। हिंदू के साथ में मां गंगा का यह कौन सा संबंध है? कुसंस्कार की अबे म यह क्या कुसंस्कार है कि क्या किसको पता देखिए यह जो क्रिश्चियनिटी और ये जो वेस्टर्न ये जो रिलीजन है वहां पे नदी है, पहाड़ है, जंगल है, पेड़ ये जो पशुपंखी है उनकी आराधना करना यानी कि यह सब कुसंस्कार से उपस्थित हुआ है। यह जो मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में जो प्रथम वार्तालाप ही जो करते हैं द्वितीय वार्तालाप उसी में वह आता है। उम पौतलिकता अर्थात कि यह मूर्ति पूजा यानी कि मूर्ति पूजा करना यानी कि एक मिट्टी की किसी एक भगवान की आराधना करना इससे बड़ा सुपरस्टिशियन और क्या हो सकता है? तो ठाकुर कहते हैं कि उन्हें वो मृणमय के चिन्मय अर्थात कि मिट्टी की बनी देवी कहां वो तो चिन्मय देवी है वो तो एक सिंबल मात्रा है जिनके माध्यम से हम जो है सही-सही जगत जननी पूरे विश्व ब्रह्मांड को व्याप्त करके प्रत्येक मनुष्य जीव और प्राणियों के हृदय में विराजिता जो है वही जगत जननी का हम आराधना कर रहे हैं। वो मिट्टी की प्रतिमा कहां से हो गई? तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा तो मास्टर वहां से कहते हैं तो तो फिर हमको सबको समझा देना चाहिए कि यह आपको मिट्टी की प्रतिमा की पूजा नहीं कर रहे हैं। यह तो एक सिंबल मात्र है। इसके माध्यम से आप जीवंत जगत धात्री जगत जननी आध्या शक्ति की आराधना कर रहे हैं। तो जैसे ही मास्टर महाशय ने ऐसा कहा ठाकुर नाराज हो गए। क्या कहा तो देर कोलकाता देर लोग ए तुम कलकाता के लोगों का वही एक है बुझिए देवा म ये समझा देना और बता देना कि उपदेश दे देना पहले अपने को कौन समझाए उसका कोई ठीक नहीं है दूसरों को समझाने को चलते हो पूरा जीवन भर तो यहां पे भी ये क्या है कि मास्टर महाशय जैसे ये जो वेस्टर्न एजुकेटेड लोग थे उन सबके मन में यह बैठ गया था कि नदी की पूजा करना ये मूर्ति की पूजा करना यह सब कुसंस्कार है सुपरस्टिशन है। तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं हिंदू हिंदू के साथ में मां गंगा का यह कौन सा संबंध है? यह का कुसंस्कार है क्या? यह सुपरस्टिशन है क्या? किसको पता है? [हंसी]

हिंदुओं की माँ गंगा के प्रति भक्ति

गंगा गंगा कोरे जन्मो काटाए। यह हिंदू क्या करता है? गंगा गंगा करके जन्म बिताता है। पूरा जीवन बिताता है। गंगाजले मोरे गंगा के पानी में उसका मृत्यु होता है। वही रास मणि जब उसका अंतिम समय आया तो उसने कहा कि मुझे गंगा गर्भ में गंगा के किनारे ले चलो। मैं गंगा के पानी में अपना देह त्याग करना चाहती हूं। तो आखिर में आखिरी समय में गंगा के किनारे ले जाएगा उनको। गंगा के पानी का स्पर्श किया और आखिर में एकाएक देखा कि जितने भी दिए थे सब बुझ गए और फिर मां जगत जननी स्वयं ये भवतारिणी स्वयं जिनका कि मंदिर माने वो रानी रासमणि ने बनाया था वही भवतारिणी स्वयं जैसे कि उनको लेने के लिए वहां पर उपस्थित हुई। तो देखिए कि ये हिंदू का जन्म मां की गंगा प्रियता जो है वो तो जग जाहिर है कि और फिर यहां तक कि जयराम भाटी में मां जाती है तो वो दामोदर नदी है तो मां कहती है ये हमारी गंगा है माने जयराम भाटी में तो आपको ये कोलकाता वाली गंगा तो मिलेगी नहीं तो वहां पे ये दामोदर नदी है तो मां कहती है मैं गंगा स्नान करने को जाती हूं अर्थात कि वही दामोदर नदी में स्नान करती है और मां कहती भी है यही तो है हमारी गंगा तो मां की जो गंगा प्रीति है ठाकुर की जो गंगा प्रीति वही वो फेमस घटना कि काली मंदिर का उद्बोधन हुआ क्स क्सिक्रेशन हुआ उस समय जो उनके बड़े भाई थे ठाकुर के रामकुमार तो वहां पर पूजक के रूप में निमंत्रित हुए थे तो यह बालक गदाधर भी वो रंग रस देखने के लिए पहुंच गया किंतु जब भोजन का समय आया तो वहां पर भिक्षा नहीं ग्रहण करेगा क्यों रानी रासमणि तो कई वर्त जाति की है और कई वर्त जाति तथाकथित निम्न जाति की उस समय मानी जाती थी तो कैसे उनका आहार ग्रहण करेंगे यह तो सब आचार निष्ठा में बड़े पक्के थे तो फिर रामकुमार ने समझाया अच्छा तुमको को गंगा के प्रति तो श्रद्धा है। तो तो ठाकुर ने कहा हां गंगा के प्रति तो श्रद्धा है। तो फिर रामकुमार ने कहा तो एक काम करो यहां पे जो अन्नव्रत सदाव्रत है वहां से तुम ये जो सीधा अर्थात कि भिक्षा ले लो। ये जो चावल है आटा है वगैरह ले लो और फिर गंगा के गर्भ माने गंगा के किनारे जाकर के गंगा के पानी से उसको पकाना और उसको खाना तब तो तुमको कोई आपत्ति नहीं होगी। तो फिर जब रामकुमार ने गंगा के प्रति ठाकुर की श्रद्धा को इनवोक किया जागृत किया तब ठाकुर ने स्वीकार कर लिया अच्छा ठीक है वहां से वो भिक्षा ग्रहण की यह सब चीजों की और फिर गंगा के किनारे जाकर के गंगा के पानी से खाना पकाया और उसका भोजन किया वही गंगा के किनारे बैठकर के तो देखिए कि हमारा जो हिंदुओं का है कि गंगा गंगा करके वो जीवन बिताते हैं। गंगा के जल में मृत्यु हम ग्रहण करते हैं। दूर-दूरंतरे लोग गंगाजल लिए जाए। कहां-कहां से दूर-दूर से लोग गंगाजल लेकर जाते हैं। ताम्र पात्रे जत्नो करे राखे। यह ताम्र का पात्र है। उसमें जतन करके मेहनत करके उसको रखते हैं। पाल पारमण बिंदु बिंदु पान करे। जब कोई भी उत्सव होता है, शुभ प्रसंग होता है तो यह ताम्र पात्र में रखी हुई गंगा उसका बिंदु बिंदु पान करते हैं। राजारा घोड़ा पूरे राखे ये जो राजा महाराजा है वो घड़ा भरभर करके अपने महल में गंगा का पानी रखते हैं। कतो अर्थव्यय करे गंगोत्री झोल रामेश्वर ऊपर निगिए चौड़ाए कितना अर्थव्यय करके कितना खर्चा करके गंगोत्री का गंगाजल रामेश्वर ले जाएंगे और वहां पर भगवान शिव के ऊपर में उसको ऑफर करेंगे उससे उनका अभिषेक करेंगे हिंदू विदेश जाए जब हिंदू

गीता और गंगा है हिन्दू का हिन्दूपन -- स्वामी विवेकानन्द की गंगा भक्ति

विदेश में जाता है कहां-कहां जाता है रेंगून जावा हांगकांग झांझिबार मडागस्कार सुसज एडन माल्टा ये जितने भी देश है जहांजहां हिंदू जाता है शंगे गंगाजल शंगे गीता साथ में गंगाजल साथ में गीता गीता गंगा हिंदू हिंदुानी गीता और गंगा है हिंदू का हिंदूपन या तो हिंदू का यह हिंदू धर्म देखिए कितना बड़ा स्टेटमेंट स्वामी जी ने यहां पर दिया है गीता और गंगा यह दो है जो कि हिंदू का धर्म जो है उसका यह जो बाह्य एक्सप्रेशन है देखिए हिंदू धर्म का जो आंतरिक एक्सप्रेशन है जीव ब्रह्म ऐक्य वो तो एकदम स्पष्ट है किंतु उसका जो बाह्य एक्सप्रेशन है कल्चरल सोशल एक्सप्रेशन जो है वो है गीता और गंगा गीता गंगा हिंदू हिंदूयानी गीता और गंगा है हिंदू का हिंदूपन हिंदूयानी का क्या अर्थ करेंगे हिंदूपन या तो फिर हिंदू धर्म का हृदय ना कि हिंदू पना जो भी कहे उसको तो गीता और गंगा है हिंदू का हिंदूपन गले बारे आियो एक निग छिल पिछली बार मैं भी थोड़ा ले गया था देखिए दिस इज द की पैसेज जो मैंने इतना पूर्व भूमिका किया उसका यह जो की पैसेज जो है वह अभी स्टार्ट हो रहा है। पिछली बार मैं भी थोड़ी सी थोड़ा सा गंगाजल ले गया था। कहां विदेश में? देखिए हमको पता है कि स्वामी जी जब भारत का भ्रमण करते थे तो उनके हाथ में गीता थी और यह जो आई थिंक वो था वो इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट। किंतु हमको यह नहीं पता। बहुत कम लोगों को शायद यह पता होगा कि स्वामी जी गंगाजल की यह जो बोतल है वह भी साथ में रखते थे। तो देखिए उनका यह जो कनफेशन जो है स्वामी जी का अपने खुद के मुंह से उन्होंने अपनी गंगा प्रीति जो है उसका वर्णन किया है। इतना सुंदर वर्णन गले बारे आमियो एकुनिए गए छिलुम पिछली बार मैं भी थोड़ा सा लेके गया था की जानी किसको पता माने विदेश में यदि मरना होगा तो ऐसा तो ना हो कि मैं बिना गंगा के पानी का गंगाहीन देश में मरूं मरूंगा तो एटलीस्ट मैं गंगा का जल तो अपने पे छिटक सकता हूं किसको पता तो कहते हैं पिछली बार मैं भी थोड़ा सा गंगाजल लेकर गया था किसको पता क्या हो जाए बाघ पेले ही बागे पेले अर्थात कि अपॉर्चुनिटी मिलने से ही मौका मिलने से ही एक आध बिंदु पान करता एक दो बिंदु पान करता अभी बहुत ही रेशन करके उसको रखना है तो इतना सा बोतल है वो विदेश में घूम रहे चार साल तो घूमे थे तो हो सकता है शायद बीच में एक आध दो बार गंगा का पानी मंगवाया हो वो जो आचार वगैरह मंगवाते थे ना कारपेट वगैरह मंगवाया था ये मिसेज हेल वगैरह के लिए हो सकता है कि उस समय कहीं पे गंगा का पानी भी मंगवा दिया हो किंतु एटलीस्ट उस समय स्वामी जी को पता नहीं था कि कितना टाइम इसको मैनेज करना है तो कहते है कि जब भी मौका मिलता एक एक बिंदु या आधा बिंदु पान करता पान कर ले किंतु से पाश्चात्य जन स्रोत मध्य सभ्यता क्लोलेर मध्य पान करने से ही किंतु वही पाश्चात्य जन स्रोत के बीच में यह वेस्टर्न जो लोगों का प्रवाह है जन स्रोत स्रोत का अर्थ एक्चुअली लिटरली होता है पानी का प्रवाह किंतु जल स्रोत की वजह उसको जन स्रोत कर दिया है। अर्थात कि अब न्यूयॉर्क लंदन वगैरह में जाएंगे कितना भीड़ होता है लोगों का कोलकाता की तरह ही महानगर की गलियों में जो शहरों में गलियों में आप घूमेंगे हजारों हजारों लोग आपको जाते हुए टहलते हुए पैदल चलते हुए घोड़ा गाड़ी में जाते हुए मिल जाएंगे। तो इसको जन स्रोत ही तो कहेंगे ना। एक तरह की लोगों की नदी ही तो है। तो स्वामी जी कहते हैं कि जब भी मैं पान करता था साथ-साथ में ही वह पाश्चात्य लोगों का जो प्रवाह है उसके बीच में सभ्यता और कल्लोर मध्य सभ्यता के कल्लोल के बीच में सभ्यता का कल्लोल क्या है? कोई भी शहर में जाएंगे आपको हजार तरह का हल्लागुल्ला सुनने को मिलेगा। तो इसको कहेंगे सभ्यता का कल्लोल। तो शहर का हल्लागुल्ला से कोटि-कोटि मानबेर उन्मत्त प्राय ध्रुत पद संचार मध्य यह जो कोटि-कोटि मनुष्य है उनके उन्मत्त उन्मत्त अर्थात कि यानी पागलपन वाले ना कि एक्साइटेड इस तरह के ध्रुत पद संचार ध्रुत पद संचार ध्रुत पद अर्थात कि बहुत स्पीड से चलने वाले उनके जो स्टेप्स होते हैं ध्रुत पद संचार बहुत से बहुत स्पीड में चलने वाले उनके फुटस्टेप के बीच में मन जेो स्थिर होए जे तो मन जैसे कि स्थिर हो जाता कहां पर स्थिर हो जाता कैसे स्थिर हो जाता जैसे ही मौका मिलता वैसे ही एक या आधा बिंदु वही गंगाजल का पान करता तो यह जो वेस्टर्न सिविलाइजेशन है यह वेस्टर्न एक्साइटमेंट है वेस्टर्न जनप्रवाह है वहां पर दुनिया भर का हल्लागुल्ला हो रहा है लोगों के पास में एक सेकंड का टाइम नहीं है दूसरे व्यक्ति के सामने देखने का। ऐसा सब जैसे कि अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं। जैसे कि अपना खुद का जीवन और उद्देश्य देखकर के कोई हायर मोटिव हायर जैसे कि होल जीवन में है ही नहीं। इस तरह के लोगों के बीच में भी यदि एक आधा बिंदु पान करने से ही गंगाजल का मन स्थिर हो जाता। मन स्थिर होए जे तो से जन स्रोत वही जन प्रवाह से रजोगुण आशलन वह रजोगुण की तरंग महात तरंग से पदे पदे प्रतिध्वंधि संघर्ष वही पद पद स्टेप स्टेप पे प्रतिध्वंधि संघर्ष प्रतिध्वंधि अर्थात कि कॉम्पिटिटिव रेट्रेस यानी लिटरल ट्रांसलेशन करें प्रतिद्वंदी संघर्ष संघर्ष अर्थात कि स्ट्रगल और यह कॉम्पिटिटिव न्यू स्ट्रगल वहां पे तो यह कंपटीशन ही तो है। हायर फायर की पॉलिसी यहां वो गवर्नमेंट आपको गारंटी है कि आपका वो जब से नौकरी मिली तो आपका वो 50 60 साल तो गारंटी से निकल ही जाएगा। बाद में पेंशन पेंशन मिलेगा। शांति से जिएंगे। वहां है हायर एंड फायर। अभी आज इसको लिया दोपहर को बोल दिया भागो यहां से। नहीं भागोगे तो अभी शूट कर देंगे। वहां तो स्कूल में भी शूटिंग होते हैं। अभी पता नहीं उस समय होते थे कि नहीं। किंतु देखिए कि वहां पर कंटीन्यूअस एक कॉम्पिटिटिव स्ट्रगल लगी रहती है। तो वहां पे इसके बीच में भी वह जनप्रवाह वह रजोगुण की प्रचंड तरंगे वह प स्टेप स्टेप पे प्रतिद्वंदी संघर्ष कॉम्पिटिटिव स्ट्रगल शैई विलास क्षेत्र वह विलास क्षेत्र ये वेस्टर्न सिविलाइजेशन क्या है? ये न्यूयॉर्क, लंदन वगैरह सिटी आप देखेंगे विलास के क्षेत्र है। सब तरह की भोग्य वस्तुएं मिल जाती है। अमरावती शम अमरावती की तरह समृद्ध अमरावती सम अमरावती क्या थी? तो इंद्र की नगरी थी तो या इंद्र की नगरी में किस तरह की शोभा होती है? तो उस तरह की शोभा किस तरह का वैविध्य किस तरह का यह वेल्थ होता है? किस तरह की ब्यूटी होती है? किस तरह का वैभव होता है तो वही अमरावती सम पेरिस अमरावती की तरह का पेरिस लंदन न्यूयॉर्क बर्लिन रोम यह अमरावती की तरह का पेरिस लंदन न्यूयॉर्क बर्लिन रोम सब लोप होए जे तो सब लोप हो जाता सब अदृश्य हो जाता आर सुनताम और सुनता से हर हर हर और फिर सुनता वही हर हर हर कब कब? जबकि ये थोड़ा सा भी मौका प्राप्त होने से एक या आधा बिंदु गंगाजल का पान करेंगे तब ऐसा होता। क्या होता देखता श्री हिमालय क्रोडस्थ बीजन बिपिन देखता वही हिमालय क्रोडस्थ क्रोड अर्थात कि गोद हिमालय की गोद में बसा हुआ बिजन विपिन यानी कि माने वो जन मानव शून्य जहां पे कोई नहीं रहता है डेजर्टेड है जो कि पूरा एकांत है एकांत वन आर कलोलिनी सूर तरंगिणी और वही कलो क्लोलिनी सूर तरंगिणी जो कल कल करके निनाद करते हैं उसको कहते हैं कल्लोलिनी सूर तरंगिणी जिसकी तरंगों में से सूर प्रकट होते हैं वो है सूर तरंगिणी यानी गंगा की उपमाएं वही कल्लोलिनी सूर तरंगिणी जिनो हृदय मस्तके शिराए शिराए संचार कोर चैन जैसे कि हृदय में मस्तक में मेरी नस नस में शिराए शिराए नस नस में जैसे कि संचार कर रही है आर गरजे गरजे डाक छ और गर्जन करतेकर करते गर्जन करती करती पुकार रही है हर हर हर देखिए इतना सुंदर पैसेज कि मैं भी पिछली बार मेरे साथ में गंगा का पानी थोड़ा सा ले गया था जब भी मौका मिलता था एक आधा बिंदु पान करता था और जैसे ही पान करता था साथ-साथ में ही वह पश्चिमी जन स्रोत जनप्रवाह के बीच में सभ्यता के कलोल के बीच में कोटि-कोटि मनुष्यों के उन्मत्त प्राय जो ध्रुत पद संचार है उसके बीच में मन जैसे कि स्थिर हो जाता वह जनप्रवाह वह रजोगुण का तरंग वह पति पद पदक्षेप प्रतिध्वंदी संघर्ष वह विलास क्षेत्र वही अमरावती सम पेरिस लंदन न्यूयॉर्क बर्लिन रोम सब लोप हो जाता अदृश्य हो जाता और सुनता वही ही हर हर हर देखता वही हिमालय क्रोडस्थ विजन विपिन और कलोलिनी सुर तरंगिणी जैसे कि मस्तक मस्तक में शिराय शिराय हृदय में संचार हो रही है और गर्जन करती करती पुकार रही है हर हर हर तो देखिए यह है कि हमारी जो गंगा नदी उसकी पवित्रता का सुंदर वर्णन तो जो स्वामी जी कहते हैं ना कि यह जो हमारी पुण्य भूमि है यहां पे ऋषि मुनियों का प्रादुर्भाव हुआ है। तो यहां की यह जो नदी है गंगा उसका भी यह एक महात्म है। तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द साहित्य की गहराई कितनी है!

देखिए स्वामी जी का जो बंगाली वक्स है ना मेरी बहुत इच्छा होती है इसको स्टार्ट करें किंतु प्रॉब्लम कहां है एक स्टार्ट आधुनिक भारत है या तो ये परिवराजक है ये इस तरह के जो निबंध है ना उसमें इतना पावर है इतना डेप्थ है एक बार चालू करें तो कभी अंत नहीं आएगा मुझे वह डर लगता है [हंसी] प्रत्येक पैसेज में आप इतना सब चिंतन कर सकते हैं पर सही में ना देखिए स्वामी जी के कितने एस्पेक्ट हैं। हम वही अराइज़ अवेक वाले स्वामी जी को पहचानते हैं। अब कल जैसे हमारा डिस्कशन हुआ। अभी कल का डिस्कशन और आज का आप कंट्रास्ट कीजिए। आपको लगेगा ही नहीं कि वी आर टॉकिंग अबाउट द सेम पर्सन। मने वही देखिए ना वही मायावती और वही वो हरिद्वार की गंगा। म मायावती आश्रम में ठाकुर की पूजा बंद कर और वही गंगा का पानी लेकर स्वामी जी इस तरह से पागल हो जाते हैं। और देखिए यह वर्णन आपको ना इवन मुझे नहीं लगता कि स्वामी जी की बायोग्राफी में भी होगा। वो देखना पड़ेगा। मुझे नहीं लगता कि यह कोई जानता है इस सब सीक्रेट्स को स्वामी जी के

प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द गंगा के बारे में इतना सब कुछ कह कर आखिर में क्या प्रूव करना चाहते है?

एक्चुअली क्या है मैंने तो सिर्फ इतना ही पैसेज लिया है फॉर आवर डिस्कशन किंतु स्वामी जी क्या है यहां पे जो गंगा का महिमा है ना वो प्रतिपादित करना चाहते हैं क्योंकि स्वामी जी जा रहे हैं विदेश में तो एक्चुअली विदेश की धरती का हम सबको आकर्षण है स्वामी जी कहते ही है कि वो एक्साइटमेंट वहां का वहां का जो वैभव अमरावती की तरह का रोम बर्लिन राइट तो हम लोगों का एक नेचुरल अट्रैक्शन है तो कंपेयर टू दैट भारत की महिमा क्या है? भारत में आपको अमरावती की तरह नगरियां नहीं देखने को मिलेगी। तो वो एक बात है। किंतु हमारी जो भव्यता या तो हमारी महत्ता है वो आध्यात्मिक है। सो दैट इज व्हाट स्वामी जी वांट्स टू कंपेयर ए मटेरियलिस्टिक वेस्ट एंड ये स्पिरिचुअल इंडिया। और और म प्रेसेंटली माने स्वामी जी का ये धुरंदेशी देखिए यह जो पूरा पैसेज है ना एंड कहां पे होता है पता है स्वामी जी इसी तरह गंगा का बहुत वर्णन करते हैं बाद में भी यह कोलकाता की गंगा का सुंदर वर्णन आएगा और फिर यह पूरा वर्णन करने के बाद में ना स्वामी जी क्या कहते हैं पता है कि आप अभी यह जो सौंदर्य है ना गंगा का आज आप आंख भर के देख लीजिए अभी कुछ ही समय जाएगा ना फिर यह पूरा सौंदर्य नष्ट हो जाएगा यहां पे ये फैक्ट्रियां लगेगी फैक्ट्रियों का जो धुआं है वह धुआं निकलेगा उसमें उसमें से ये चिमनियां बैठेगी और यह फिर उसमें से यह टॉक्सिक वेस्ट मटेरियल निकलेंगे। सब सौंदर्य संपूर्ण खत्म हो जाएगा। आज आप इसको आंख भर के देख लीजिए। तो वो जो स्वामी जी का जो म भविष्यवाणी वो सो म एक्यूरेट। आज आप गंगा का आप जो बेलूर मठ के सामने जो गंगा है वो आप देखिए इट सो पोल्यूटेड। सो स्वामी जी का वो दूरेंद्र दृष्टि भी था इतना ही। देखिए स्वामी जी इसकी निंदा नहीं करते। स्वामी जी ने पूरा पैसेज मैंने ध्यान से पढ़ा ना। स्वामी जी ऐसा नहीं कहते कि ऐसा नहीं होना चाहिए या तो फिर यह मटेरियलिज्म नहीं आना चाहिए। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा है कि इसको आप मन भर के देख लीजिए। यानी कि एक तरह से देखें तो बहुत सारे लोग जैसे आजकल के वो जो वक वोकिज्म जो है ना कि ये लिबरल फिलॉसोफी आपको डेवलपमेंट नहीं होना देना। आपको गुजराती है आपको तो पता ही है वो जो नर्मदा के जो ये था डैम उसके कितना सब विरोध हुआ। आज नर्मदा के डैम से मैं तो वहां राजकोट लिमड़ी में था। मुझे पता है कि वहां के लोगों को कितना फायदा हुआ है। किंतु वो डैम नहीं होने देंगे। क्यों? क्योंकि एनवायरमेंटल डिजास्टर ये जो फिर यह वनवासी है उन लोगों की रहने की जगह। आप आपको ऐसा लगेगा कि चलो हम स्वामी जी को भी यहां पे उठाते हैं हमारा पक्ष रखने के लिए। बट स्वामी जी वाज़ नॉट एंटायर डेवलपमेंट। स्वामी जी का ऐसा कहना था डेवलपमेंट करो किंतु स्पिरिचुअलिटी को मेंटेन करके करो। सो दैट इज वेयर स्वामी जी इस डिस्टिंक्ट फ्रॉम दिस वोकिस्ट फिलॉसफी परफेक्ट बैठ जाता है। परफेक्ट बैठ जाता है। अपना जो रंगनाथानंद जी का जो फेवरेट जो स्टेटमेंट था काम इन द मिडस्ट ऑफ स्टॉर्म। देखिए भगवान कृष्ण का चरित्र को पकड़ना कितना कठिन है। राम को आप समझ लेंगे। भगवान राम को समझ लें। मर्यादा पुरुषोत्तम सब स्ट्रेट फॉरवर्ड चल रहा है। कोई कॉम्प्लिकेशंस नहीं, कोई गड़बड़ घोटाला नहीं। किंतु भगवान कृष्ण का चरित्र जब सामने आता है तो उनके अच्छे-अच्छे भक्त भी बेचारे गड़बड़ घोटाल में पड़ जाते हैं। अभी कहां पे क्या ये गोपियों के साथ में अभी लीला कर रहे हैं। अभी ये ब्रह्मचर्य का उपदेश दे रहे हैं। ये कहां पे दोनों का मेल आता है? [हंसी] तो ये देखिए कुरुक्षेत्र के भी कृष्ण है। फिर ये वृंदावन के भी कृष्ण है। ये मथुरा के भी कृष्ण है। सो मेनी पर्सनालिटीज। तो सिमिलरली विद स्वामी जी सो मेनी पर्सनालिटी एस्पेक्ट्स आर देयर। वो काशी की घटना मैंने एक बार बताई थी ना काशी गए हैं मां साथ में है पागली मामी अब पागली मामी का वह पता नहीं दिमाग वो कहां क्या गड़बड़ हो गया पूरी रात भर मां को गाली दी है मां तुम मरो तुम मरो तुम मरो ऐसा पूरी रात गाली दी है सुबह को मां जप कर रही है फिर वह हल्के से कहती है कि वो छोटू बहू ना वो छोटी बहू है ना उसको पता नहीं है मैं मृत्युंजय हूं मां काशी में यह बात कहती है [हंसी] माने देखिए कि इस तरह से ठंडे दिमाग से इतना डिक्लेअ करना इतना मतलब इससे ज्यादा कोई हमको एक गाली देगा तो हम कितने अपसेट हो जाएंगे और यह तो पागली थी उसका तो मुंह पे कोई कंट्रोल ही नहीं था। उसके बीच में ऐसा ठंडक से कह देना कि मैं मृत्युंजय हूं। माने इट्स अ परफेक्ट कंट्रास्ट। और काशी में कहना कि मैं मृत्युंजय हूं। माने इससे बड़ा डिक्लेरेशन क्या हो सकता है? माने वहां के देवता मृत्युंजय। मृत्युंजय शिव का नाम है।

प्रश्न: यह जहां रहते है वहां गंगा नहीं है, तो गंगा जल पान किस तरह करे?

देखिए गंगा पान करने का सबसे आसान तरीका है ना यदि अपना आश्रम पास में मंदिर में जाते हैं ना वो चरणामृत होता है ना उसको पान कर लेना है। वो गंगा का ही बना है। प्रत्येक आश्रम में गंगा का पानी रहता है और वो जो जब हम पूजा करते हैं ना तो गंगा का पानी का एक दो ड्रॉप उसमें डाल देते हैं। फिर वह चरणामृत बनता है। तो चरणामृत जो होता है वह गंगा का पानी और पूजा माने ठाकुर का पूजा का पानी और परफेक्ट वो आपका वह पवित्र जल हो जाता है। हां हां हां प्रत्येक आश्रम में प्रत्येक आश्रम में गंगाजल रहता है वो गंगा के पानी से ही पूजा होनी चाहिए। एकदम पक्का नियम है। माने ऐसा कहना चाहते थे कि ईश्वर का दर्शन करना और अवतार का दर्शन करना एक ही है। माने अब जैसे कि गाय है तो गाय की पूंछ भी स्पर्श कर सकते हैं। उसका पैर भी स्पर्श कर सकते हैं। मस्तक भी स्पर्श कर सकते हैं। किंतु गाय का जो आंचल है जहां से दूध मिलता है वो तो उसका सार भाग है ना। तो गाय का आंचल को स्पर्श किया। वह जहां से वो सार भाग दूध मिलता है तो पूरी गाय को स्पर्श करने जैसा हो गया। तो यह अवतार का दर्शन करते तो ईश्वर का दर्शन करने जैसा हो गया। तो इसी सिलसिले में यह उदाहरण देते हैं कि यदि कोलकाता में गंगा का स्पर्श किया तो ऐसा नहीं है कि आपको ऋषिकेश से या गंगोत्री से लेकर के गंगा सागर की गंगा का स्पर्श करना है। कहां एक जगह कर दिया तो फिर सार भाग अवतार का दर्शन हो गया। पूरे ईश्वर का दर्शन हो गया। माने आप गाय पूजा करेंगे तो अब जैसे गंगा आरती करते हैं तो गंगा आरती तो ऐसा नहीं है कि आप वह गंगोत्री से चालू करके गंगा सागर तक वो नौका में बैठते-बैठते करेंगे वो जो ऋषिकेश माने वो जो काशी में जो होती है गंगा पूजा आरती वही वही पूरी गंगा की ही आरती हो गई तो ये पूरी गंगा की ही आरती हो गई वो एक जगह पर करने से ही पूरी गंगा की आरती हो गई शक्ति का लोकलाइजेशन इस अर्थ में ठाकुर कहते हैं ना कि एक सेठ जी का बागान है बगीचा है तो पूरा बगीचा सेठ जी का ही है। वह कहीं पर भी रह सकते हैं। किंतु जनरली आपको उनके बैठक खाने में बैठे हुए देखने को मिलेंगे। तो भक्त का हृदय है भगवान का बैठक खाना। इस इस उदाहरण में कहेंगे शक्ति का लोकलाइजेशन। माने जो सार भाग है वहां पर शक्ति का ज्यादा वो है प्रादुर्भाव। ये इसी उदा इसी सिलसिले में ठाकुर वो मास्टर महाशय को पूछते हैं छाता लेके आए। तो मास्टर महाशय बोलते हैं। बोलते हैं नहीं छाता तो मैं पंचवटी में छोड़ दिया। ठाकुर बोलते हैं मेरी धोती ठीक नहीं रहती फिर भी मैं छाता नहीं भूलता और तुम लोग संसार करके बैठे हो फिर भी छाता भूल जाते हो वो मां मां की जो हमने कहानी देखी थी ना चंद्रबाबू की वो ऐसा ही देखिए चंद्रबाबू गया था मां के पास में मतलब उद्बोधन में गया था नौकरी मांगने के लिए तो उस बात से उसने कभी ये छुपाया नहीं है बाद में बहुत बड़ा भक्त हो गया किंतु जब वो रेमिनेशंस लिखता है तो छुपाता नहीं है कि मैं नौकरी मांगने को गया था छुपाता नहीं है स्पष्ट लिखता है नौकरी मांगने के लिए गया था मां ने दया करके नौकरी दे दी और फिर वह नौकर कर में से भक्त ये जो जर्नी है उसका वो पूरा उसने लिखा है बिना कुछ छुपाए हुए है दैट इज सच अ ब्यूटी ऑफ दिस हां क्योंकि देखिए आज हम किसी भी प्रतिष्ठित व्यक्ति को देखते हैं बोलते हैं आपकी रेमिनेशंस लिखिए तो वो शुरू शुरू का सब छुपा देगा राइट छुपा सकता है पहले से ही मैं महान था पहले से ही डिवोटी हो के ही आया था वो लिखेगा तो उसको कंट्राडिक्ट करने वाला कौन है वो नौकरी करने के लिए आया था यह बात किसको पता थी मां को पता थी शरद महाराज को पता थी दोनों तो चल बसे थे बाय द टाइम वो लिख रहा है तो सब कुछ छुपा सकता था। किंतु फिर भी वह स्पष्ट लिखा दैट इज द ग्रेटनेस कि सत्य पालन वो ठाकुर के भावधारा में आप जुड़े हैं तो वह तो एक प्रमाण है ना सब सत्यपालन कर रहे हैं। ओम