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ओ स्प कायज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः आज हम लीला प्रसंग पुस्तक में से जो एकदम लास्ट चैप्टर है आत्म प्रकाश अभय प्रदान इस चैप्टर का पाठ करेंगे हमको पता है कि शरत महाराज कहते हैं कि रामचंद्र दत्त जिस घटना को कल्पतरू बोलकर के जिसको प्रचार कर रहे हैं उसका वह नाम ठीक नहीं है ठीक ठीक नाम यह होना चाहिए कि ठाकुर ने उस दिन पहली जनवरी को काशीपुर उद्यान भवन में उद्यान गृह में अपने सही स्वरूप है उनका जो सही उनका प्रकाश है वह उस दिन उन्होंने प्रकाशित किया सबके सामने उन्होंने रखा और अपना सही स्वरूप प्रकाशित करके हम सबको अभय दान दिया कि क्या कहा ठाकुर ने तो मादर चैतन्य होक तो यह घटना जो है ठाकुर ने उस दिन की हमारे संघ जीवन की रामकृष्ण भावधारानी घटना शरत महाराज ने वर्णन की है श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग किताब में अभी हमको पता है कि जितने भी अवतार आते हैं उन सबके साथ में उनकी एक प्रामाणिक जीवनी होती है उनके साथ में एक ऐसा ग्रंथ जड़ित है जो कि उनकी लीला और उनके उपदेश और संदेश इन दोनों को बहुत ही सिस्टमैटिक रूप से फिलोसॉफिकली शास्त्र सम्मत रूप से हमारे सामने रखें ठाकुर के नाम पर बहुत सारी किताबें रची गई है और भी भविष्य में उनके बारे में बहुत कुछ लिखा जाएगा किंतु लीला प्रसंग एकमात्र ग्रंथ है जिसको कि हम प्रामाणिक ग्रंथ मानते हैं दूसरे जो भी ग्रंथ की रचना होगी इसके आधार पर ही होनी चाहिए लीला प्रसंग का जो अर्थ घटन है शरत महाराज ने स्वामी शारदानंद जी ने लीला प्रसंग में ठाकुर के जीवन और कर्म का जिस तरह से विश्लेषण किया है जिस तरह से अर्थ घटन किया है जिस तरह से हमारे सामने रखा है उसी ढब में उसी स्टाइल में बाकी सब अर्थ घटन बाकी सब विश्लेषण बाकी सब एनालिसिस होने चाहिए लीला प्रसंग की स्टाइल से या लीला प्रसंग की जो कंक्लूजन है उससे बाहर जाकर के और कुछ कहने का प्रयास किया गया तो मुझे नहीं लगता कि उसका कोई रामकृष्ण संघ में उसका स्वीकार होगा या स्वीकार हो पाएगा तो ऐसा यह एक ग्रंथ जो कि ठाकुर के जीवन और कर्म को पहले से लेकर के आखिर तक हमारे सामने रखता है हमको समझाता है तो इसी ग्रंथ का जो आखिरी चैप्टर है उसका नाम है आत्मप्रकाश अभयदान जो 18864 में जो घटना हुई इस घटना से इस ग्रंथ की समाप्ति शरत महाराज ने की है शारदानंद जी महाराज ने की है तो हम लोग समझ सकते हैं कि उस घटना का महत्व कितना होगा संपूर्ण जीवनी लिखने के बाद में आखिर में किंतु आत्म प्रकाश से अभयदान ठाकुर ने दिया इस घटना पर आकर के उनके जीवन और उनकी लीला की समाप्ति होती है तो इतनी इंपोर्टेंट घटना इतनी महत्त्वपूर्ण घटना हमारे संघ जीवन में ठाकुर के जीवन में हुई है तो इसका शरत महाराज स्वामी शारदानंद जी किस तरह से विवरण देते हैं वह हम पाठ करते हैं शारदानंद जी महाराज लिखते हैं काशी अच्छा इसके पहले की घटना तो हमको पता है कि ठाकुर के गले में एक बार व्याधि प्रवेश हुआ तो शुरू बीच-बीच में ऐसा लगता था कुछ दिन व्याधि ज्यादा बढ़ जाती थी फिर प्रकोप इसका बढ़ जाता था फिर वह धीरे-धीरे करके वह ठीक हो जाता था कुछ दिनों तक ऐसा चला तो भक्तों को ऐसा लगा कि अरे यह तो जो एक सामान्य सर्दी जुकाम जैसा कुछ होता है ऐसा कुछ होगा ठाकुर ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया उन्होंने कहा कि अरे ये तो पंच महाभूत का शरीर है आता रहेगा जाता रहेगा यह सब व्याधि आती रहेगी जाती रहेगी तो ठाकुर तो जहां पर भी जाएंगे एकदम वो ईश्वर कथा व उनके मुंह से निकलती ही जाएगी अनर्गल अंत विहीन उनकी ईश्वर कथा तो चलती ही जाएगी तो अभी जैसे डॉक्टरों ने उन्हो को शुरू में कहा कि आप ज्यादा बातें मत किया कीजिए थोड़ा सा रेस्ट लिया कीजिए यहां तक कि वो कीर्तन फिर वार मुहर मुह भाव समाधि में जाना यह सब भी आप मत कीजिए किंतु ठाकुर तो हमारे कल्याण के लिए जिनका अवतरण हुआ है वो अपने गले के व्याधि के सामने देख कर के हमको जो अमृत बांटने का उनका जो जगत मिशन जो है वर्ल्ड मिशन वो थोड़ी ना वो बंद रख देंगे कोई छोटी सी व्याधि के लिए तो ठाकुर तो जो भी इनके पास आते थे सबके साथ में ईश्वरीय कथा प्रसंग कहते ही जाते थे यहां तक कि डॉक्टर सरकार जो कि उनकी ट्रीटमेंट के लिए आते थे वोह ठाकुर की बातों से इतने मोहित हो गए कि वह ठाकुर को कहते हैं कि आपको और किसी के साथ बात नहीं करना सिर्फ मेरे साथ बात कीजिए अर्थात कि ठाकुर बात करने पूरा बंद कर देंगे जो कि डॉक्टर को कहना चाहिए कि आप बिल्कुल बात मत कीजिए किंतु अभी वह उनकी बातों से इतने मोहित हो गए हैं कि वोह बोलते हैं कि दूसरों के साथ मत कीजिए किंतु मेरे साथ बात कीजिए और वह ट्रीटमेंट देने के लिए आते थे वह हाउस कोल जिसको हाउस विजिट कहा जाता है वह आते थे फिर वहां पर वह उनकी उनकी जो पथ्य उनके उस दिन का क्या है परिस्थिति वो सब थोड़ी बहुत चर्चा करके जो भी दवाई देना है वो सब देख कर के फिर घंटों भर घंटों बैठे रहते थे और ठाकुर की बातें सुनते रहते थे इतना ठाकुर से प्रभावित हो गए माने डॉक्टर की भी ऐसी परिस्थिति थी कि वो मने सही डॉक्टर कौन है डॉक्टर पेशेंट हो गया है यहां पे भव वैद्य भव रोग के जो वैद्य है उनके पास में आकर के जो अपना जो पंच महाभूत के शरीर का जो जो वैद्य है व भी उनके सामने रोगी होकर के बैठा है तो ऐसा ठाकुर का था जो भी आएंगे वो बातें करते ही जाएंगे तो उस दिनों की यह बात है उनके शिष्यों को लगा ठाकुर के भक्तों को लगा कि जब तक ठाकुर दक्षिणेश्वर में रहेंगे शायद ट्रीटमेंट इतना अच्छे से ना हो पाए कोलकात्ता से अच्छे से अच्छे डॉक्टरों को वहां पर ले जाना भक्तों को वहां पर रुकना यह सब चीजों में शायद दक्षिणेश्वर में ठीक ना हो पाए तो ठाकुर को कलकाता ले आते हैं एक सबर्स में वहां पर उनको रखते हैं और फिर हम लोग सब जो त्यागी संतान है जो यंग लड़के हैं सब वह सब ठाकुर के पास में रहेंगे और जो गृहस्थ है वह दिन में एक दो बार आकर के जो भी पैसा वगैरह व्यवस्था करनी है जो भी बाजार में से सामान खरीदना है वगैरह सब यह लोग देख लेंगे तो ऐसी पूरी व्यवस्था काशीपुर गार्डन हाउस में हुई थी तो वहां की ही यह बात है तो यह हो गई पूर्व भूमिका अभी पूर्व भूमिका तो ग्रंथ पढ़ कर के हमको पता चल ही जाती है अभी आखिरी चैप्टर में शरद महाराज क्या कहते हैं शरद महाराज लिखते हैं काशीपुर उद्याने आशी बार को एक दिन पोरे काशीपुर के उद्यान में आने के कुछ दिनों के बाद ठाकुर ज रूपे एक दिन निजो को खो ईते बहिर्गमन पदो चार कोरिया लेन ताहा आमरा पाठक के इति पूर्वे बोलिया छी काशीपुर के उद्यान में आने के कुछ दिनों के बाद ठाकुर को थोड़ा सा आराम लग रहा था तो उन्होंने अपने कमरे से बाहर आकर के उद्यान में थोड़ा सा भ्रमण किया था और इस घटना की इस भ्रमण की बात हमने पाठकों को इस ग्रंथ के रीडर्स को पहले भी बताई है ऐसा महाराज लिखते हैं उ हाते दुर्बल बोध कराय प्राय एक पख काल तीनी आर रूप करते साहस कोरे नाई किंतु एक दिन उनको थोड़ा सा शरीर में आराम लगा था तो उससे उन्होंने गार्डन हाउस में उद्यान गृह में जो भ्रमण किया था उससे वह इतने दुर्बल हो गए थे कि एटलीस्ट 15 दिन उन्होंने फिर से अपने कमरे में से बाहर निकलने का साहस नहीं किया ई कालेर मध तहर चिकित्स ना होले ओ चिकित्सक परिवर्तन होया छलो यह 15 दिन के दौरान ठाकुर की चिकित्सा में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ किंतु ठाकुर के चिकित्सक में परिवर्तन हुआ था कोलकातार बहु बाजार पल्ली निवासी प्रसिद्ध धनी अक्रूर बंश अक्रूर दत्ते बंश जात राजेंद्र लाल दत्त महाशय होमियोपैथी चिकित्स आलोचना और उहा शहरे प्रचलन इति पूर्वे थेट परिश्रम और अर्थव स्वीकार करया छले कलकत्ता के बहु बाजार नामक एक जगह के निवासी प्रसिद्ध धनी अक्रूर दत्त के वंश में जिनका जन्म हुआ है ऐसे राजेंद्र लाल दत्त महाशय होमियो पथी चिकित्सा की आलोचना और कलकत्ता में उसका बहुल प्रचार करने में काफी उन्होंने अपना धन व्यय और अपनी एनर्जी उन्होंने डाली थी शरत महाराज का सेंटर स्ट्रक्चर है बहुत लंबा लंबा होगा और बड़ा ही पोएटिक होगा यानी जब हम शुरू से जो स्टार्ट करते हैं अंत आते-आते हम लोग खुल जाते हैं कभी-कभी कि अरे महाराज ने शरू में क्या कहना चाहते थे और हम कहां आके अटके महाराज जी कहना चाहते हैं कि कलकता में एक अक्रूर दत्त नामक एक धनी व्यक्ति था इस धनी व्यक्ति में राजेंद्र ना राजेंद्र लाल दत्त नामक एक वैद्य का जन्म हुआ था अभी इन्होंने राजेंद्र लाल ने क्या किया था कि उन्होंने होम्योपैथी की चिकित्सा में दक्षता प्राप्त की थी होम्योपैथी की चिकित्सा में वो एक्सपर्ट हो गए थे और उस समय कलकत्ता में शायद होमियोपैथी का प्रचार इतना ना हो तो कलकत्ता में होम्योपैथी के प्रचार के लिए राजेंद्र लाल ने बहुत ही प्रयास किया था बहुत ही उन्होंने अपना खुद का अर्थ भी दिया था अर्थात कि कहीं पर किसी को औषध की या दवाई की जरूरत है तो थोड़ा सा फ्री में दवाई दे दिया कि चलो होम्योपैथी की दवाई फ्री में लो तो शायद तुमको थोड़ा अच्छा लगेगा तो तुम इसके प्रति निष्ठावान श्रद्धावन होगे ऐसा कर करके अपना खुद का पैसा उन्होंने होम्योपैथी की ट्रीटमेंट और होम्योपैथी के प्रचार में लगाया था तो आप समझ ही सकते हैं कि जो किसी एक विद्या में जिसको इतना इंटरेस्ट है वह उस विद्या में कितना पारंगत होगा बहुत सारे लोग मेडिकल साइंस है या तो फिर कोई भी विज्ञान है कोई भी स्किल है उसमें वह सीखते तो है अभी आपको बोलेंगे हम मैं पब्लिकेशन चलाता हूं यहां पर तो मुझे पता है जद कोई आ कर के बोलेगा कि वह गुजराती भाषा का वो उसमें उसने बैचलर डिग्री है गुजराती भाषा लेकर के उसने ग्रेजुएशन किया है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने गुजराती भाषा से ग्रेजुएशन किया है मैं जद उसको प्रूफ रीडिंग के लिए कुछ दूंगा तो इतनी सारी गलतियां करेगा मुझे लगेगा कि अरे भैया क्या न साल का ग्रेजुएशन कोर्स करके किया वो बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं कि चलो कैसे भी प्रकार किसी भी तरह की एक डिग्री हमारे हाथ में आ जाए तो उसको लेकर के हम लोग अपना अच्छे से जीवन निर्वाह करेंगे वो डिग्री लेकर के उसको कैसे एनकेस किया जाए उसके आधार पर कैसे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जाए वही उन लोगों की इच्छा एक रहता है अपना जो विद्या वह सीख रहे हैं उस विद्या में अपने को डुबा देना और उसमें से पैसा निकालने की तो बात दूर उसमें अपना पैसा और डालना ऐसा जो करेंगे वो लोग सही सही उस विद्या में प्रचंड वह दक्षता प्राप्त कर सकते हैं वह लोग इसमें बहुत सारा एक्सपर्टाइज्ड ग्रेजुएट नहीं हूं 12थ में फेल हुआ था और यहां पर आया तो अभी आप सोचेंगे कि अरे ना ही लैंग्वेज मुझे आती है ना ही कंप्यूटर वगैरह जो कि यहां पर पब्लिकेशन में चलाने के लिए सब कुछ चाहिए तो तो मुझे वो सब कुछ नहीं आता था जब मैं यहां पर आया था धीरे-धीरे करके मैंने सब सीखा तो यह इंटरेस्ट होने से आप किसी भी विद्या में माहिर हो सकते हैं तो दो तरह के लोग होते हैं कोई भी विद्या सीखेंगे तो सीखने के लिए सीखेंगे पैसा कमाने के लिए सीखेंगे और दूसरे तरह के होते हैं उनको उस विद्या में इंटरेस्ट है उनका उसमें रुचि है इसके लिए वे लोग सीखेंगे जो अपनी रुचि के लिए उस विद्या को सीखते हैं वही लोग उस विद्या में सही सही रूप से पारंगत हो सकते हैं तो यह है राजेंद्र लाल के बारे में महाराज ने हमको एक छोटे से पैराग्राफ में बता दिया कि उन्होंने अपने खुद के खर्च से कोलकात्ता में होम्योपैथी का प्रचार किया था इसी से हमको पता चल जाता है कि होम्योपैथी में वह कितने माहिर होंगे होम्योपैथी में वह कितने एक्सपर्ट होंगे सुप्रसिद्ध डॉक्टर महेंद्र लाल सरकार र सहीतो मिली तो हो आई होमियो मते साफ और उपकारिता हृदयम पूर्वक ओई प्रणाली अवलंबन चिकित्सा अग्रसर होया छिल ठाकुर की जो चिकित्सा करते थे वह सुप्रसिद्ध वैद्य सुप्रसिद्ध चिकित्सक महेंद्र लाल सरकार इसी राजेंद्र लाल से ही प्रभावित होकर के इंस्पायर्ड होकर के प्रेरित होकर के होमियोपैथी की उन्होंने विद्या अर्जन की थी और उस विद्या में वह माहिर हो गए थे उपकारिता हृदयम पूर्वक पूरा आधा तो संस्कृत ही चलता है होमियोपैथी की उपकारिता है वह हृदयम की थी अर्थात की अपने हृदय में उनको ठीक-ठीक विश्वास बैठ गया था कि होम्योपैथी की चिकित्सा ही सही चिकित्सा है ठाकुरे बधिर कोथा राजेंद्र बाबू लोको मुखे श्रवण कोरिया एवं तहा के आरोग्य करते पारले होमियोपैथी सुनाम अनेक निकट सुप्रतिप होई बार संभावना बुजिया चिंता और अध्ययना आद सोहाए ओई बधिर औषध निर्वाचन कोरिया राखल राजेंद्र लाल ने लोगों से सुना कि ठाकुर को इस तरह से का व्याधि हुआ है तो उन्होंने यह सोचा कि होम्योपैथी का प्रचार प्रसार तो उनके जीवन का उद्देश्य है और ठाकुर तो कोलकात्ता में अभी इतने ख्यात नाम हो गए हैं तो यदि मैं ठाकुर के रोग की चिकित्सा कर पाऊं ठाकुर को व्याधि मुक्त कर पाऊं तो कोलकात्ता में होम्योपैथी का बड़ा ही सुयश होगा बड़ा ही अच्छा नाम फैले ऐसा सोच कर के उन्होंने ठाकुर के गले के रोग के लिए कौन सा औषध देना वो बड़ी ही लंबी चिंतन करके चिंता करके ठीक करके रखा था गिरीश चंद्रे कनिष्ठ भ्राता अतुल कृष्णर शहीद इनी परिचितों कृष्ण के साथ में परिचित थे आमा देर ज तो दूर स्मरण होए अतुल कृष्ण के एक दिन ए कोन स्थाने देखीते पाया तिनी सहसा ठाकुर शारीरिक असता कथा जिज्ञासा पूर्वक हाहा के चिकित्सा करि बार मनोगत अभिप्राय व्यक्त करे एवं बोलेन महेंद्र के बोलियो आमी अनेक भाभिया चिंत एकटा औषध निर्वाचित करिया राखिया च सेटा प्रयोग करिले विशेष उपकार पाई बार आशा राखी ताहर मत थाकी शटा आमी एक बार दिया देखी उन्होंने अतुल कृष्ण को कहीं पर देखा था एक बार तो अतुल कृष्ण को बताया कि तुम महेंद्र लाल को बोलना महेंद्र लाल सरकार ठाकुर की चिकित्सा कर रहे थे महेंद्र लाल को बोलना कि मैंने बहुत सारा चिंतन करके एक औषध के बारे में सोच करके रखा है तो जदी महेंद्र लाल और बाकी सबको आपत्ति ना हो तो मैं एक बार को देखने को आऊ और वह औसत ठाकुर को दू अतुल कृष्ण भक्तगण के एवं डॉक्टर महेंद्र लाल के ई विषय जाना ले उ हाते कहारो आपत्ति ना हो वाई कोई एक दिन परे राजेंद्र बाबू ठाकुर के देखीते आसेन एवं व्याधि आधो पान तो विवरण श्रवण पूर्वक लाइको पोडियम 200 प्रयोग करे जब यह बात भक्तो को और महेंद्र लाल को पता चली तो उन्होंने सोचा कि अरे यह तो अच्छा ही है राजेंद्र लाल तो बड़े ही सुप्रसिद्ध वैद्य है डॉक्टर है वह यदि सामने से इंटरेस्ट लेकर के ठाकुर की ट्रीटमेंट के लिए आते हैं तो तो बहुत अच्छी बात है यह फिर जब महेंद्र राजेंद्र लाल को पता चला वो आए और ठाकुर की अवस्था का निरीक्षण करके लाइको पोडियम 200 नामक औषध ठाकुर को दिया ठाकुर उ हाते एक पखे रो अधिक काल विशेष उपकार अनुभव करिया लेन इस औषध के प्रयोग से ठाकुर एक पक्ष अर्थात कि 15 दिन से ज्यादा समय बहुत ही उपकार महसूस हुए थे बहुत ही अच्छा उनको शरीर को व्याधि से आराम मिला था भक्तो गणर उ हाते मुने होया छलो तीनी बोध होई बार अल्प दिने पूर्वे न्याय सुस्तो और सबल होया उठी बेन भक्तों को लगा कि इस औषध के प्रयोग से ठाकुर अब बिल्कुल सुस्त और सबल हो जाएंगे क्रम पौष मास अर्धे तीतो होया 1888 क्रिस्टा अब्दर पला जनुअरी उपस्थित होयो होलो समय बीता गया और पौष मास का अर्धे से ज्यादा बीत गया 18864 आराम महसूस हो रहा था इसलिए उन्होंने अपनी इच्छा प्रकट की कि मैं उद्यान गृह में यह उद्यान जो है वहां पर जाकर के थोड़ा सा टहल हूं अबोकाश दन बोलिया सेही दिन गृहस्थ भक्तगण मध्यान अतीत होई बार किछु परे एके एक अथवा दलो बद्ध होया उद्याने आशिया उपस्थित होते लागलो उस दिन छुट्टी का दिन था कोलकात्ता तो ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कैपिटल था तो यह क्रिसमस और न्यू ईयर यह सब तो उनके बड़े त्यौहार है तो उस समय कोलकात्ता में जो लोग नौकरी करते थे जो लोग बिजनेस करते थे सब जगह पर छुट्टी थी तो छुट्टी का दिन है पहली जनवरी न्यू ईयर है तो चलो आज के शुभ दिन का प्रारंभ ठाकुर को प्रणाम करके ठाकुर के आशीर्वाद लेकर किया जाए सोच करके सुबह से ही दोपहर से बाद में भक्त गण एक के बाद एक एक एकक करके या तो दल बद्ध होकर के ग्रुप में मिलकर के आना शुरू हो गए थे ही रूपे अपराहन तीन टार समय ठाकुर जखन उद्याने बेई बार जनन उपर होते नीचे ना मिलेन तखन 30 जनेरो अधिक व्यक्ति म अथवा उद्यान स्थ ृ सकलर तले बसिया परस्पर सहीद बाकला पे नि चुक तो छलो महाराज का एक एक सेंटेंस एक एक पैराग्राफ के जैसा है तो उस दिन छुट्टी का दिन था भक्तो लोग एक के बाद एक आकर के मिलित हो रहे थे काशीपुर उद्यान में उस समय ठाकुर को थोड़ा अच्छा लगा और उन्होंने यदि आप काशीपुर गए होंगे तो आपने देखा होगा बहुत ही एक सुंदर उद्यान है एक गार्डन है और गार्डन के बीच में दो मंजिला मकान है तो उसमें दूसरी मंजिल पर ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर यदि ऐसा कहा जाए तो फर्स्ट फ्लोर पर ठाकुर का कमरा था तो फर्स्ट फ्लोर से ठाकुर नीचे उतरे सीढ़ी से और इतना सुंदर गार्डन है उसमें टहलने लगे ऐसा धीरे-धीरे करके 30 से भी ज्यादा भक्तो लोग उस दिन आए थे जैसे पहले हमको बताया कि छुट्टी था दोपहर के बाद में भक्तों का समागम शुरू हो गया था तो 30 से ज्यादा भक्त लोग मिलित हो गए थे जब ठाकुर उद्यान में टहल रहे थे उस समय ताहा के देखि आई सोकोले शोष भ्रम उत्थ तो होया प्रणाम करी लो एवम तिनी निमर होल घरेर पश्चिम द्वार दिया उद्यान पथे ना दक्षिण मुखे फोटो केर दिके धीरे धीरे अग्रसर होले पश्चात किंचित दूरे थाक तहा के अनुसरण कोरीते लागलो ठाकुर जब फर्स्ट फ्लोर से जब नीचे उतरे सीढ़ी से तो आपको पता होगा कि वहां ग्राउंड फ्लोर पर एक बड़ा सा होल है इस बड़े से बैठक गृह में कुछ कुछ भक्त बैठे थे तो उन्होंने जैसे ही देखा कि ठाकुर सीढ़ी से उतर रहे हैं उन लोगों का मन उन लोगों का हृदय बड़ा ही हर्षत फुलल हो गया और बड़े ही स संभ्रम अर्थात कि ठाकुर की ओर श्रद्धा भक्ति पूर्वक वे लोग खड़े हो गए और ठाकुर को दूर से ही प्रणाम किया पता है कि लोगों के पाप लोगों की कर्म को लेकर के ठाकुर ठाकुर ने ग्रहण कर लिया है अपने शरीर में बोलकर के ठाकुर को इस तरह से कैंसर का रोग हुआ है तो तो ठाकुर के चरण को स्पर्श किए बिना दूर ही खड़े रह कर के दोनों हाथों से ठाकुर को श्रद्धा अभिवादन किया और जैसे ही ठाकुर उद्यान में गार्डन में टहलने के लिए बाहर निकले उनके पीछे पीछे जाना उन्होंने शुरू किया ओय रूपे बसत बाटी ऑ फटो केर मध्य स्थले उपस्थित हुया ठाकुर गिरीश राम अतुल प्रवृति को एक जन के पश्चिम वृ तोले देखीते पाले वैसे ही जैसे ठाकुर आगे बढ़ते गए उन्होंने देखा कि वहां पर गिरीश राम और अतुल जैसे कुछ भक्त वहां पर खड़े हैं वरख तोले देखीते पलेन आम का एक वृक्ष था आम का ही वृक्ष है जहां तक मुझे याद है उसके नीचे उन्होंने देखा कि गिरीश और रामचंद्र जैसे कुछ भक्त वहां पर है ताहा राओ तहा के देखीते पाइया तथा होते प्रणाम करिया नंदे तहर निकट उपस्थित होले भक्तों ने जब ठाकुर को देखा वे लोग भी बड़े आनंदित हो गए कि चलो नए तरह का औषध नए तरह की दवाई ठाकुर को मिली है सामने से ही जैसे कि जगदंबा की ही इच्छा हो कलकत्ता के सुप्र स डॉक्टर ने आकर के सामने से ही ठाकुर की चिकित्सा करने का उन्होंने अपना एक इंटरेस्ट दिखाया है ठाकुर को नई दवाई दी है इससे ठाकुर इतना आराम महसूस कर रहे हैं बीमारी में थोड़ी सी कमी महसूस कर रहे हैं इसलिए वह नीचे आए हैं गार्डन में टहल रहे हैं भक्त लोग भी बड़े आनंदित हो गए देख कर के और ठाकुर के पास जाकर के खड़े रहे उपस्थित हुए के हो कोनो कथा कोही बार पूर्वे ठाकुर सोहोसा गिरीश चंद्र के संबोधन करिया बोली लेन कोई कुछ बोल पाए किसी ने कुछ कहा इससे पहले ही ठाकुर ने एकाएक सोहसा एकाएक गिरीश को संबोधन करके ठाकुर ने ही कहा गिरीश तुम जे शकोल के यतो कथा बोलिया बेड़ा तुम की देखया छ और बुजिया छो ठाकुर ने गिरीश को कहा गिरीश तुम जो लोगों को यह सब कहते घूम रहे हो तुमने क्या देखा है और क्या समझा है अभी जब ठाकुर ऐसा कहेंगे तो हमको प्रश्न होगा कि ठाकुर यह क्या कह रहा है गिरीश क्या लोगों को कहता घूमता है उसने ऐसा तो क्या देखा है तो हमको ठीक ठीक समझ आए इसलिए शरत महाराज ने ब्रैकेट में थोड़ा सा कहा है ठाकुर जब कहते हैं कि तुम जब लोगों को इतनी बातें कहते घूमते हो तो इतनी बातें क्या तो अर्थात ब्रैकेट में शरद महाराज लिखते हैं आमार अवतार त्व संबंध है ठाकुर अवतार है इसके बारे में गिरीश सबको बोलकर घूमता है कि ठाकुर अवतार है ठाकुर अवतार है तो ठाकुर ऐसा तो नहीं कहेंगे कि अरे तुम मैं अवतार हूं ऐसी बातें क्यों कहते हो तुम ऐसा नहीं कहेंगे ठाकुर ये पहली के रूप में कहते हैं लोगों को इतना सब कहते घूमते हो तो तुमने क्या देखा है अभी बोलेंगे हम लगे हमको लगेगा कि क्या देखा है का क्या अर्थ है तो इसमें भी शरत महाराज ब्रैकेट में लिखते हैं अमार संबंध है मेरे बारे में तुमने क्या देखा है क्या समझा है ठाकुर मैं मेरा ऐसा कभी नहीं कहते थे इसी घटना के आखिर में आता है वो यह जो है कि मैं और मेरा कभी नहीं कहते थे किंतु एक बार कहा है वो इस घटना के आखिर में वो है तो जब ऐसा तुम लोगों को क्या कह रहे हो मैं मेरा मैं अवतार हूं यह शब्द प्रयोग बिना यूज किए ठाकुर गिरीश को पूछते हैं कि तुम लोगों को यह सब कहते घूमते हो तो तुमने क्या देखा है गिरीश का ऐसा था कि गिरीश कोई एक पहले तो गिरीश का नेचर कैसा था हम सबको पता है कि बड़ा ही एक क्या कहेंगे एक स्केप्टिक था उसने गिरीश ने लोगों के मनोभाव को समझने की बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि थी तो कोई धर्म का भेक धारण करके धर्म का ये धार्मिक कपड़े पहन कर के लोगों को पटाना लोगों को लोगों को मूर्ख बनाना लोगों को छलना ऐसे लोगों को जब गिरीश देखता था तो उसको उस जो इस तरह के भेक धारी है धर्म का जिसने स्वांग रचा है धर्म का नाम लेकर के लोगों को ठग रहा है उसके हृदय में गिरीश ब बहुत बहुत ही अच्छे से देख पाते थे और गिरीश सोचते थे कि अरे कि ज्यादातर लोगों को मैं देखता हूं धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख ही बनाते हैं तो उसका तो अर्थ क्या हुआ धर्म ही गलत हो गया ना वरना तो धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख क्यों बनाएंगे लोग तो अभी ऐसा है ना धर्म तो एक ऐसी चीज है कि धर्म को आप ठीक से अपने जीवन में इस्तेमाल करें या तो धर्म के नाम पर लोगों को ठगे उससे तो धर्म को तो कुछ आता जाता नहीं है सूरज का प्रकाश है तो वह एक चोर के ऊपर में भी गिर सकता है एक विद्यार्थी के ऊपर में भी गिर सकता है चोर उस सूरज के प्रकाश में चोरी कर सकता है डके डाल सकता है और विद्यार्थी है सूरज के प्रकाश में विद्या अध्ययन कर रहा है तो उसमें सूरज का क्या गलती या तो सूरज का क्या यश है कि वह विद्यार्थी के लिए विद्या अभ्यास में वो हेल्पफुल हो रहा है ना कि चोर को डके की चोरी करने में हेल्पफुल हो रहा सूरज का तो इसमें कोई दोष नहीं है वैसे ही धर्म के नाम पर लोग क्या करें क्या ना करें इससे धर्म का तो कोई दोष नहीं किंतु गिरीश घोष जैसे उस समय के कलकाता के कुछ-कुछ लोग यह वेस्टर्न एजुकेशन लेकर के ऐसा समझने लगे थे कि क्रिश्चियनिटी बहुत ही एक एडवांस्ड रिलीजन है हिंदू धर्म पूरा अंधश्रद्धा में डूबा हुआ है और जो लोग हिंदू धर्म का नाम लेकर के लोगों को उपदेश देते हैं उन लोगों के मन में कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ गड़बड़ है तो ऐसा गिरीश का मानना था उस गिरीश ने जब ठाकुर को देखा तो इतना अभिभूत हो गया ठाकुर से इतना प्रभावित हो गया और वह बहुत ही फेमस घटना कि ठाकुर को एक बार गिरीश ने अपने थिएटर में बुलाया नाटक चैतन्य लीला का अभिनय देखने के लिए चैतन्य लीला ही था शायद तो उसका अभिनय देखने के लिए बुलाया और फिर आकर के ठाकुर को कहा कि मैं चाहता हूं कि आप मेरे पुत्र होकर के मेरे घर में जन्म ग्रहण करें तो मैं आपकी ठीक से सेवा कर पाऊंगा तो ठाकुर ने कहा कि अरे मुझे ऐसी क्या पड़ी है तुम्हारा पुत्र होकर के तुम्हारे घर में जन्म ग्रहण करने की ऐसा ठाकुर ने जब कहा तो गिरीश को तो बड़ा ही गुस्सा आ गया खुद तो मध्य पान किया था शराब पिया था और शराब के नशे में ठाकुर को जो गाली देना शुरू किया है इतने अभद्र इतने गंदे गंदे शब्द ठाकुर को कहना शुरू किया है कि उसको देख कर के लाटू महाराज थे साथ में सेवक के रूप में महावीर के अवतार महावीर के वंशज वो तो खड़े हो गए अभी गिरीश को पिटाई कर देता हूं तब वो जो मनो मोहन बाबू थे साथ में उन्होंने कहा कि अरे भाई ठाकुर चुपचाप सुन रहे हैं ठाकुर क्रोधित नहीं हो रहे तुम क्यों इतना क्रोध प्रदर्शन करते हो शांत हो जाओ ठाकुर कहेंगे इसको पीटो तो पीट देना हालांकि मनो मोहन महा बाबू ने ऐसा नहीं कहा था मैं अपना इंटरप्रिटेशन दे रहा हूं ठाकुर जद बोले किसी को पीट दो तो ये लोग कोई भी पीछे नहीं रहेगा किंतु जब तक ठाकुर नहीं बोलते बोते हैं तब तक तो इस तरह से क्रोध प्रदर्शन करना उचित नहीं है तो इस लाटू महाराज तो बेचारा मन में बड़े ही क्रोधित हो रहे हैं किंतु अभी क्या करें तो इस घटना के बाद जब ठाकुर दक्षिणेश्वर वापस आए सबको कह रहे हैं कि अरे देखो गिरीश ने मेरे साथ में इस तरह का दुर्व्यवहार किया अभी तो सभी लोग बोल रहे हैं कि महाशय आप अभी कभी भी गिरीश के वहां पर वापस मत जाइएगा गिरीश को यहां पर मत आने दीजिएगा गिरीश के साथ में सब प्रकार का संपर्क छिन्न कर दीजिएगा क्या ये तो एक नाटक वाला आदमी है शराबी है वो कुसंस्कार आदमी है अवतार वरिष्ठा है को इस सब बोल दिया ऐसा सब भक्त लोग आपस में बात कर रहे हैं उस समय रामचंद्र दत्त आया ठाकुर को प्रणाम किया ठाकुर ने कहा कि अरे राम देखो गिरीश ने मुझे ऐसा कहा तो राम ने क्या कहा कि महाशय कृष्ण ने कालय नाग को जहर दिया था तो कालय नाग तो जहर ही देगा सामने कृष्ण ने यदि कालि नाग को अमृत दिया होता तो कालिए नाग अमृत देता जहर मिला है वो तो जहर ही देगा आपने जो गिरीश को दिया है वही तो गिरीश आपको प्रदत्त करेगा वही तो गिरीश आपको ऑफर करेगा ये बात सुनकर के ठाकुर मने ठाकुर देखिए ठाकुर के मन में तो ऐसा कोई द्वेष तो है ही नहीं पहले से ही ठीक करके रखे इसको क्षमा करनी है किंतु भक्तों का मनोभाव जानना चाहते हैं कि लोगों के मन में क्या है क्योंकि ठाकुर को तो भक्तों को लेकर के भी रहना है तो सबको साथ में लेकर चलना है वो भी एक बात है की कौन सा ठाकुर परीक्षा कर रहे हैं लीडिंग क्वेश्चन वो मास्टर महाशय वो कथामृत में लिखते हैं ना लीडिंग क्वेश्चन ठाकुर प्रश्न करेंगे यह देखने के लिए कि आपके मन का क्या मनोभाव है तो ठाकुर ने राम का मनोभाव समझा उनको बड़ी खुशी हुई राम को भी आशीर्वाद दिया आए गिरीश के वहां पर गिरीश ने मीनवाइल गिरीश की ऐसी परिस्थिति हुई थी ठाकुर को गाली तो देतो दे तो दी किंतु बाद में जो प्रचंड पश्चाताप हुआ है खाना पीना नींद सब छ छट गया है वैसे ही वो बैठा है अपने घर पर वहां पर किंतु उसके मन में यह बात है कि मैं सामने से ठाकुर को प्रणाम करने के लिए ठाकुर से क्षमा मांगने के लिए नहीं जाऊंगा मेरा भी एक गिरीश का भी एक अहंकार था एक घमंड था कि मैं भी एक हूं तो मैंने तो ठाकुर को अपने मन में मन में क्षमा मांगूंगा किंतु ठाकुर के पास में क्षमा मांगने के लिए मैं नहीं जाऊंगा उसी समय उसने देखा कि अरे वो गाड़ी आई गाड़ी में से ठाकुर उतरे और उतर के ही बोला अरे गिरीश कहां हो यह देख कर के गिरीश का घमंड गिरीश का अहंकार उसके भीतर के जितने भी कुसंस्कार सब अदृश्य हो गए सीधा दंडवत ठाकुर के चरणों में गिरा और दोनों हाथ जोड़ कर के रोते-रोते कहने लगा कि यदि आप वापस नहीं आते तो मैं मानता कि जैसे बाकी सब धुत लोग है बाकी जो ठग लोग है जो कि धर्म के नाम पर लोगों को ठग हैं आप भी ऐसे ही एक ठग है किंतु आप वापस है तो मेरी संपूर्ण श्रद्धा भक्ति आज से आपके श्री चरणों में समर्पित है तो ऐसी घटना हुई है बोल कर के ये गिरीश अभी उसके मन में एकदम एक एक्सट्रीम से दूसरे एक्सट्रीम की ओर कहां वो ठाकुर के बारे में संशय करता था ठाकुर को शराब पी के गाली भी दे दिया अभी किंतु पूरे कोलकाता में जहां ब भी जाता है सबको कहता घूमता है कि ठाकुर अवतार है ठाकुर अवतार है नरेंद्र के साथ में वाद आर्गुमेंट हो गया तो ठाकुर ने नरेंद्र को कहा कि बोलो इसके साथ में आर्गुमेंट करो क्या सब ऐसी उल्टी पुल्टी बातें कर देखो ठाकुर हृदय में बड़ा आनंदित है किंतु वो नहीं चाहते कि अभी से अवतार तोव का प्रचार हो क्योंकि एक बार ठाकुर ने बाद में कहा है कि एक बार इसके भीतर की सत्य सत्ता इसके भीतर का जो सत्य है इसके भीतर कौन है यह बात बाहर आ जाएगी एक बार ऐसे लोगों का ठाकुर के पास में आगमन होगा कि वे लोग कोई आध्यात्मिक जगत में आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए ठाकुर के पास नहीं आते वह तो कोई अपना आधि व्याधि उसको दूर करने के लिए मिन्नत मांगने के लिए ठाकुर के पास आते हैं आकर के ठाकुर को बोलेंगे हमारा यह आदि है हमारी यह व्याधि है इसको दूर कर दीजिए और इसके बदले हम आपको धन देंगे दौलत देंगे पैसा देंगे तो ऐसे लोगों का आगमन हो उनसे पहले ही मने उसी समय से ठाकुर का देह त्याग हो जाना चाहिए ठाकुर तो आए थे सच्चे साधकों को त्याग तपस्या का रास्ता दिखाने के लिए फिर वही त्याग और तपस्या का सर्वोच्च उज्जवल आदर्श देख कर के लोग अपना जीवन परिवर्तन करें समाज में धर्म के बारे में हमारे सनातन हिंदू धर्म के बारे में एक आस्था का प्रचार हो तो इसके लिए ठाकुर का आगमन हुआ था नहीं कि लोगों का इस तरह से मिन्नत व मांगे और इसके सामने कुछ दे दे इसके लिए तो ठाकुर को पता था जैसे ही यह कोलकात्ता में यह बात फैलना शुरू होगी कि यह अवतार है वगैरह तो उस दिन के बाद में ठाकुर का शरीर नहीं रहेगा तो ठाकुर थोड़े से सावधान थे मना किया करते थे कि जाहिर में इस तरह की बात मत करो किंतु यह तो गिरीश घोष है गिरीश को तो मैंने ठाकुर की बात तो सुनने की तो दूर ही रही जो मन में आएगा वह करेगा तो गिरीश सबको जाकर के कह रहा है कि ठाकुर अवतार है यहां तक कि नरेंद्र के साथ में वाद विवाद हो गया तो नरेंद्र को अभी गिरीश आकर के ठाकुर को कहता है कि मैंने नरेंद्र को आर्गुमेंट में हरा दिया अभी नर स्वामी विवेकानंद जगत विख्यात अमेरिका जाकर के अमेरिकन पादरियों अमेरिकन जो चर्च मिशनरी थे उनके घर में जाकर के उनका घर जला करके जो आए ऐसे नरेण को आर्गुमेंट में हराना तो असंभव है किंतु ठाकुर ने क्या कहा कि देखो नरेण का कहना है कि जब गिरीश की यह आस्था इतनी प्रचंड है कि ना ठाकुर अवतार ही है तो नरेंद्र को स्वामी जी को स्वामी विवेकानंद को गिरीश घोष की इस आस्था पर प्रहार करना उचित नहीं लगा ठीक नहीं लगा उसने उचित नहीं समझा इसके लिए गिरीश घोष की आस्था थी उसकी दृढ़ निष्ठा देख कर के नरेंद्र ने फिर आर्गुमेंट करना बंद कर दिया तो देखिए ऐसा ये गिरीश घोष नर का भी मुंह बंद करवा देगा स्वामी विवेकानंद को भी आर्गुमेंट में परास्त कर देगा ऐसा गिरीश सबको जाकर के बोलता है कि हां ठाकुर अवतार ही है तो अभी ठाकुर अब नीचे आए हैं बीमारी में से थोड़े से सुस्त हुए हैं क्या लोगों को और कोई बात करें ना कि ईश्वर के बारे में कुछ पूछे सीधा गिरीश के पास जाकर के बोले गिरीश जब आया सीधा गिरीश को पूछा क्या रे गिरीश तुम क्या सब बातें कर रहे हो लोगों के सामने ऐसा तो तुमने क्या देखा है तुमने क्या समझा है अर्थात कि तुम में अवतार हूं मेरे अवतार क्व के बारे में तुम लोगों में यह जो बात फैला रहे हो तो ऐसा तो तुमने मुझ में क्या देखा है ऐसा तुमने मेरे बारे में क्या समझा है कि तुम इस तरह की बात कर रहे हो गिरीश उ हाते बिंदु मात्र बिचली तो ना होया ताहर पद प्रांत भूमि ते जानु संलग्न कोरिया उपविष्ठा मुखे कर जोड़े गद गद स्व बलि उठ लो गिरीश ने जब ठाकुर एकाएक यह प्रश्न किया उससे बिंदु मात्र विचलित नहीं हुए विचलित होना यानी कि चिंतित हो जाना थोड़े से भी चिंतित नहीं हुए विचलित नहीं हुए तहर पद प्रांत भूते जानु संलग्न करिया उपविरल वैसे ही घुटनों के बल बैठ गए दोनों हाथ जोड़े और ठाकुर को कहा ठाकुर के सामने ऊपर देख कर के गद गद स्वर से कहा व्यास वाल्मीकि जहार इयता कोरीते पारे नाई आमी तहर संबंध अधिक कियार बोली ते पारी व्यास और वाल्मीकि जिनकी गुण गाथा करते करते थक जाते हैं उनके गुणों के बारे में उनकी महत्ता के बारे में उनके देवत्व के बारे में मैं और क्या कहूंगा देखिए गिरीश का विश्वास व्यास और वाल्मीकि भगवान राम और भगवान के गुणों की बात करते-करते बात खत्म नहीं होती जिन ऋषि मुनियों की ऐसे भगवान राम और भगवान कृष्ण फिर से पृथ्वी पर भगवान राम कृष्ण बनकर उपस्थित हुए हैं हमारे सामने खड़े हैं और उनके गुणों की गाथा उनकी महत्व की की व जो अंत मैं कहां से ले आऊंगा मैं उनके महत्व के बारे में उनकी दिव्यता के बारे में मैं कौन से शब्दों में आकलन करूंगा कौन से शब्दों से उनको मैं पूजित करूंगा गिरीश का जो महावीर की तरह भगवान राम के सामने जिस तरह से अपना श्रद्धा भक्ति अर्पण करते हैं वैसे ही गिरी शेर अंतरेर सरोल विश्वास प्रति को थाय व्यक्त य ठाकुर मुगत होलेन गिरीश के अंतर का सरल विश्वास प्रत्येक शब्द में देख कर के ठाकुर मुग्ध हो गए ठाकुर खुश हो गए एवं ताहा के उपलक्ष करिया समवेत भक्त गुण के बोली लेन और गिरीश को उपलक्ष करके सभी भक्त गणों को कहा तो मादर की आर बली बो आशीर्वाद कोरी तो मादर चैतन्य हो मैं तुम लोगों को और अधिक क्या कहूं आशीर्वाद करता हूं कि आप सबको चैतन्य लाभ हो देखिए जो युग धर्म के जो युग धर्म चक्र नव चक्र प्रवर्तन होता है तो नवयुग धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए यह जो आशीर्वाद हमेशा के लिए जो ठाकुर ने उच्चारित की है मैं तुम लोगों को और तो क्या कहूं आशीर्वाद कर हूं तुम सबको चैतन्य हो ठाकुर की इस वाणी की गुंज आज भी आसमान में जमीन में समुंदर में अवकाश में भक्त लोगों के हृदय में गुंज रही है और इसी वाणी के सहारे हम अपना जीवन निर्या पित करते हैं हम अपना जीवन जी रहे हैं भक्तो गणर प्रति प्रेम और करुणा आत्मा हारा होया तिनी ई कथा गुली मात्र बोलिया ई बाबा बिष्ट होया पड़ी लेन भक्त लोगों के प्रति प्रेम और करुणा से आत्मा हारा होकर के अपने को जैसे विस्मृत हो गए गले का व्याधि जैसे विस्मृत हो गए और भगवान राम कृष्ण भावा विष्टि पड़ी लेन समाधि में चले गए स्वार्थ गंध हीन तहर सेही गभीर आशीर्वाद प्रत्येक अंतरे प्रबल आघात प्रदान पूर्वक आनंद स्पंदने उतवेल करिया तु लीलो स्वार्थ गंध हीन उनकी वह गभीर आशीर्वाद प्रत्येक भक्त के हृदय में प्रबल आघात करके उसमें एक इंपैक्ट करके आनंद स्पंदने उनके हृदय को आनंद के उत्तोलन से उसको उनके हृदय को भर दिया आज यहीं तक यह बाकी का जो पैराग्राफ है बाकी का चैप्टर है उसको हम कल पढ़ेंगे अभी तो परसों दिन मां की भी तिथि पूजा है तो आज कल परसों तीनों दिन में मिलकर के इस चैप्टर को हम समाप्त करेंगे कल फिर से मिलते ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण two