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ओम आपका यह धर्म स्वरूप ने अवतार समिति पुस्तक का पाठ करेंगे लेखक स्वामी इशानंद जी महाराज इस पुस्तक में से ऑलरेडी हमने बहुत सारे प्रसंग लिए हैं और फिर भी मां के प्रसंग इतने हैं की पाठ करते-करते कभी समाप्त नहीं होंगे तो उसमें से और एक प्रसंग आगे बढ़ते हैं जैसे हमने बात किया था इस पुस्तक से उन्होंने अपने विद्यार्थियों के साथ में कल पड़ा गांव में एक स्वदेशी उसको स्वदेशी का युग था ब्रिटिश लोगों से आजादी अपने की तमन्ना थी भारत वीडियो के हृदय में तो स्वदेशी जितना भी कार्यक्रम कर सके उसके लिए केदार बाबू ने आश्रम की स्थापना की थी और वहां पर चरखा वगैरा बुनकर के चढ़े के द्वारा खड़ी खड्डर का कपड़ बन रहे थे और यह सब चल रहा था वहां पर और उनके लड़के भी बड़े ही निष्ठावान और त्यागी थे जो की उनके साथ में जॉइन करके इस आश्रम को चला रहे थे तभी इन लोगों को पता चला की श्री रामकृष्ण देव की शहद डर्मिणी श्री मां शारदा देवी अभी भी जीवित है और जयरामबाती में वो निवास कर रही है उसे जयरामबाती पास में ही है उन्होंने एक के बाद एक वहां पे जाकर के मां का दर्शन किया और माननीय भी उनको आशीर्वाद दिया और तब से लेकर के मां जब भी कोलकाता जाति थी या तो कोलकाता से जयरामबाती वापस आई थी तो रास्ते में आता है तो वहां पर विश्राम करने के लिए रुकती थी तो मां को लेकर के कल पड़ा में एक बहुत ही सुंदर एक छोटा सा भक्तम मंडल बन गया था जिसमें की यह वर्धा महाराष्ट्र और भी बहुत सारे थे और यह फिर उन्होंने मैन एक बार कहा की मैं जब कल पड़ा आकर के रहना चाहती हूं तो मेरे लिए कुछ जगह का व्यवस्था किया जाए तो मां के लिए फिर एक अलग से जगदंबा आश्रम की भी स्थापना हुई थी और इस जगदंबा आश्रम में मां तीन-चार बार रही थी कुछ लंबे समय तक और उन दोनों की बहुत ही मधुर स्मृतियां ईशान नानजी महाराज बाद में हमको बताएंगे तो ये सब कुछ इस मातृ सेनेटिए पुस्तक में है इसके कुछ प्रश्न हमने देखें आज हम थोड़ा सा आगे देखते हैं इशानंद जी महाराज लिखने हैं जगतद्री पुजार परेश श्री श्री मां राधु प्रभु राधु प्रभु जी कोलकाता ही जय भीम स्थिर हुई है जगतद्री पूजा के बाद में ही श्री मां रघु वगैरा के उनके यह जो रिलेटिव्स थे उनको लेकर के कोलकाता जाएगी यह बात ठीक हुई है मां को कोलकाता ले जाएंगे बोल करके उनको तो साथ में कोई रहेगा कोई साधु मां को ले आने के लिए तो मां को आने में कोई मुश्किल नहीं होगी ये जो महाराज जो है प्रकाश महाराज उनको इसलिए शरद महाराज ने वहां से भेजो तो प्रकाश महाराज ने जगतद्री पूजा के सब समाज वगैरा लेकर के वो जयराम भाटी आए श्री श्री मां 1318 शेलर अग्रोहायन मेजर प्रथम दिखे कोलकाता रावण हुई बहन श्री श्री मां 1318 यह बंगाली साल है अग्रहायन के शुरुआत में ही अग्रहायन महीने की शुरुआत में ही कोलकाता जान के लिए रावण होगी उखाड़ दी कर दिन पूर्व एक शो कल केदार बाबू आमाकेश होंगे लोया मां के दर्शन कारी ते एवं कोकन तहादेव कल पढ़ाई आशा हुई बी इत्यादि विस्तारित खबर जानी थे जयरामबाती उपस्थित मां कोलकाता जान वाली थी उसके दो कर दिन पहले केदार बाबू मुझे लेकर के यानी वर्धा महाराज को लेकर के मां किस किस दिन जाएगी कोलकाता कब जयराम कल पड़ा आएगी कितना विश्राम करेगी मां के लिए क्या व्यवस्था की जाए वो सब पूछने के लिए केदार बाबू वर्धा महाराज को लेकर के ग्वालपाड़ा से जय राम भाटी गए एक दिन श्री श्री ठाकुर पूजा शायरियां हमने जाकर के देखा मैन ठाकुर की पूजा समाप्त कर दी है और अभी बैठ करके पान सजा रही है मां का एक दूसरे से ही गौरी ईश्वर आनंद जी महाराज थे वहां पर रम्मई महाराज तो मां उनको पान खाने को देती थी और पान खाने को देने के बाद कहती थी महाराज का शरीर का वर्णन श्याम वर्णन था थोड़े से कल थे तो मां कहती थी राम मैं जब पान खाता है तो जैसे कल चेहरा और होंठ लाल हो जाते हैं तो जैसे कोयल पर आगुंधरा है ऐसा दिखते हैं तो मां का भी ये सब पोएटिक नेचर था और इस तरह से वो ऑब्जर्व भी करती थी और वो मां सबको बड़े ही इनाम और एक बार कहा था की जब भक्तों के लिए पान बनाए जाते हैं तब बड़े ही मेहनत करके बड़े बड़े ही पूर्वक बड़े ही जतन करके पान बनाना है क्योंकि भक्ति लोग तो दुश्मन पराई शब्द मैन एक्जेक्टली नहीं उसे किया मां कहते लोगों को प्रेम से हमको अपना कर लेना है जब किंतु ठाकुर के लिए पान बनाते हैं तो इतना सब जतन करने की जरूर नहीं है वह तो अपने खुद के हैं उनको अपना खुद का बनाने की ऐसी कोई खास जरूर नहीं है आप उनको जान भी देंगे तो भी वो घूम कर के वापस ए जाएंगे तो माना मां का इस तरह से पान को लेकर के बहुत सारे प्रसंग है अमर प्रणाम कोरिया बशीलेश श्री श्री मां कौन दिन कौन समय के के जाइपल इत्यादि बोलियां शीशे बोलियां हमने जाकर के मां को प्रणाम करने से ही मैन हमको बताया की वह किस दिन को पाल पड़े आएगी क्या करेगी क्यों वो सब बता करके फिर आखिर में उन्होंने कहा देखो बाबा तो हमारा जोखन ठाकुर जानो घर ओ आम आधे और विश्राम इक्टू कोरचो तोखों इमरजाबहर समय उखाणे ठाकुर के बोसे दिए जो मैन कहा की देखो बेटा तुमने मेरे लिए रास्ते में विश्राम करने के लिए एक घर की व्यवस्था की है और वहां पर आश्रम की भी स्थापना की है तो इस समय मैं वहां पर जब आऊंगी तब ठाकुर घर में ठाकुर मंदिर में ठाकुर को विधि पूर्वक स्थापित करके जाऊंगी अभी जब हम ठाकुर का सिर्फ को लगाते हैं और ठाकुर की स्थापना करते हैं उसमें फर्क क्या है ठाकुर का फोटो लगाने से आप फोटो को डेली या क्लीन करेंगे कोई अच्छा कपड़े से वस्त्र से लेकर के और वहां पर ठाकुर के सामने पुष्पा वगैरा रख देंगे तो भी चल जाएगा किंतु यदि ठाकुर की विधिवत स्थापना करते हैं तो कम से कम पांच से तो ठाकुर की प्रतिदिन पूजा हनी चाहिए अर्थात ठाकुर की यदि विधिवत स्थापना हुई तो वहां पे एक विधिवत पुजारी भी चाहिए हां कोई एक पुजारी नहीं हो करके वहां आश्रम में जितने लोग र रहे हैं वह सब बारी-बारी से पूजा करें वह चलेगा किंतु वहां पे एक पुजारी अवश्य चाहिए जो की प्रतिदिन पूजा करेगा अभी इन लोगों का बाद में भी केदार महाराज का एक टेंडेंसी पता चलेगा की वो विधि पूजा में वह लोग बहुत ज्यादा नहीं मानते थे जैसे उसे समय के फ्रीडम मूवमेंट के हम जल्दी देखेंगे की विदेशी विचार जी तरह से ए रहे थे के हिंदू धर्म में आ सब करप्शन ए गया हिंदू धर्म में भ्रष्टाचार ए गया बोलकर के ही भारत डब गया ऐसा हम सब युवाओं को उसे समय से ही इस तरह से हमको सिखाया जाता था मैंने भी मेरा बचपन ऐसा ही मां करके बिताया है की धर्म में भ्रष्टाचार की वजह से भारत का अधव पाटन हुआ था बात यह नहीं है की धर्म में भ्रष्टाचार प्रवेश करता है पृष्ठ बात यह है की जो लोग धार्मिक है वे लोग धर्म के नाम पर अनाचार चलते हैं तब लोगों के धर्म के ऊपर में से विश्वास उठ जाता है वरना जितनी भी पद्धतियां हैं जिसको हम साधना साधन पाठ कहेंगे या तो साधना कहेंगे वह सब हमको ईश्वर की और एक ही ईश्वर की और ले जाति है यह एक बात है दूसरी बात है की जीवन का उद्देश्य भी देखो हमने विदेशी हिस्ट्री खासकर के यह वेस्टर्न हिस्ट्री इतना पढ़कर के रखा है की यह पॉलिटिक्स फिर ये इकोनॉमिक्स फिर ये पॉलीटिकल इकोनॉमिक्स यह सब हमारे हम लोग सोचते हैं की जैसे उसे समय ब्रिटिश थे तो वो लोग उनके पास में बड़ी-बड़ी ये गण बोर्ड्स होती थी तो हम लोग इंडियन लोग सोचते थे की हमारे पास में ऐसी कोई गण बोर्ड तो है नहीं की हम लोग कोई इंडस्ट्रियल रिलेशन हो जाएंगे वहां पे मैनचेस्टर में बड़ी-बड़ी मिल है वहां पे स्टीम इंजन चला है वहां पे न्यूटन ने ग्रेविटी के लॉस खोज दिए हैं वहां पे इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन है वो आया है वहां पे साइंटिफिक रिवॉल्यूशन आया है भारत में तो इस सब में से कुछ भी नहीं है तो हमारा जो उद्देश्य है वो एक एक्सटर्नल नेचुरल जो वर्ल्ड है नेचुरल जो लाइफ है उसको एक्सप्लोर करना और उसको एक्सप्लोइट करना दो चीज है आप नेचर को एक्सप्लोर भी कर सकते हैं नेचर को एक्सप्लोइट भी कर सकते हैं यह जो माइंस वगैरा है जहां से हम जमीन में से खुदा की कोयला निकलते हैं जमीन में से खुदाई करके जो विभिन्न तरह की धातु जैसे की सोना जैसे की लोहा जैसे की ब्रोंज वगैरा निकलते हैं तो डायमंड माइंस जैसे की होती है तो ये प्रकृति को हमको उसको एक्सप्लोइट करना है प्रकृति का यह प्रकृति के जो ख़ज़ाने हैं प्रकृति में जो वो धन संपद अपने पास में छुपा के रखा है उसको नष्ट करके ये सब धन संपद हमको उसके पास में से बरामद करना है और यही अपना जीवन है तो यह सब हमारे मां में एक बैठ गया था और आज भी बहुत सारे लोगों के मां में यही बैठा हुआ है की हम ना ही साइंटिफिक अली नेचर को एक्सप्लोइट करते हैं नहीं हम नेचर में से यह जो सब लोहा धातु वगैरा और फिर जंगल जंगल में से भी बहुत सर कुछ हम एक्सट्रैक्ट कर सकते हैं तो एक पॉलिसी ऑफ एक्सट्रैक्शन और पोलेिटेशन एक्सप्लोइटेशन में भी कोई कमजोर देश है उसके ऊपर में हमला करो और फिर उसकी जो धन संपत्ति हड़प लो वहां के नागरिकों को गुलाम बना लो और हमारे लिए उनसे कम करवाओ तो ये एक्सप्लोइटेशन और एक्सप्लोरेशन ये मानव सभ्यता का एक उद्देश्य होना चाहिए इस तरह से एक भ्रमित धरना उसे समय भी हमारे मां में बिताई गई थी आज भी बिताई गई है तो मां जब ऐसा कहती है की आपने स्वदेशी वगैरा करने के लिए जो आश्रम की स्थापना की है वहां पर मैं आकर के ठाकुर की स्थापना करोगी और उसे ठाकुर को तुम लोगों को प्रतिदिन पूजा करनी होगी और जब आप पूजा करते हैं तो साथ में ही यह जो योग ध्यान जब प्रार्थना भजन कीर्तन यह जो हमारी यह जो परंपरागत हिंदू साधन पद्धतियां हैं हिंदू धार्मिक पद्धतियां हैं विधियां हैं उसका भी हमको दो अनुष्ठान करना पड़ेगा अब ठाकुर की स्थापना की है अब प्रतिदिन पूजा कर ही रहे हैं तो फिर अब काली पूजा का दिन ए गया तो कलम काली की प्रतिमा या तो छवि की स्थापना करके उसकी विधिवत पूजा करेंगे दुर्गा पूजा का दिन ए गया तो दुर्गा पूजा की पूजा मां दुर्गा की पूजा करेंगे आवाहन करेंगे वगैरा आखिर दिन फिर वो ये होगा दशहरा के दिन विसर्जन होगा तो यह पुरी जो अपनी विधि है उसके अनुसार एक हिंदू विधि की अनुसार ये आश्रम चलेगा तो ये केदार बाबू के मां में थोड़ी सी दुविधा थी इस बात को लेकर के यह हमको बाद में भी कुछ-कुछ प्रश्न आते हैं इससे पता चला है मां रामेश्वर गई थी रामेश्वर से रामेश्वरम शिवलिंग के फोटो वह उन्होंने अच्छे से फ्रेम में बात करके लेकर आई थी और फिर केदार बाबू को देखकर के कहा की यह फोटो स्मार्ट ठाकुर घर में रखना और इनकी भी प्रतिदिन पूजा करना तो यह बात सुनकर के केदार बाबू कहते हैं मां हम तो ऑलरेडी ठाकुर की पूजा कर रहे हैं फिर यह अब रामेश्वर शिवा की पूजा हम कितनी पूजा करते रहेंगे एक्चुअली यदि आप पूजा करने की शुरुआत करते हैं तो जी तरह से आप ठाकुर को पंचुप कर का भोग डरते हैं वैसे ही यदि यह बाघलिंग या शिवलिंग जल्दी होता है वहां पे श्रेणी में उनको भोग धरना कोई बहुत समय नहीं ले जाता है आपकी श्रद्धा भक्ति हनी चाहिए किंतु यह कहता है बाबू का जो नेचर था उसमें इस तरह का रेजिस्टेंस था की एक तरह से एक सेकुलर लाइफ जो है विच इस बटर दें रिलिजियस लाइफ हां मां के प्रति श्रद्धा भक्ति है किंतु मां तो मां है मां तो जगदंबा है मां को देखकर के ही कोई भी उनके प्रति आस्थावान हो जाएगा किंतु नहीं है जैसे की हम लोग हैं यहां आश्रम में रहते हैं या तो फिर आप लोग एक जैसे की आप लोग मंदिर में नियमित दर्शन करने को जाते हैं हम यह हम लोग यह इसीलिए कर पाते हैं क्योंकि हमारे मां में यह हिंदू धर्म और हिंदू देवी देवताओं के ऊपर में और जीवन का उद्देश्य सिर्फ मटेरियल जेन नहीं है इससे भी ऊपर में जाकर के एक आत्ममन है या तो ईश्वर है और सही सही है और उनका दर्शन प्राप्त करना या तो आत्मा साक्षात्कार प्राप्त करना सही सही उद्देश्य हो सकता है यह हमको विश्वास है चाहे विश्वास 100% नाही हो किंतु विश्वास होने की शुरुआत हुई है तो यह है बोलकर के ही तो हम लोग सब मंदिर में जाते हैं पूजा-पाठ करते हैं जब ध्यान करते हैं ठाकुर का गुणगान करते हैं ठाकुर की किताबें पढ़ने हैं उसके ऊपर चिंतन मनन करते हैं यह विश्वास निष्ठा होने से ही हम यह सब करते हैं तो केदार बाबू का था की निष्ठा हुई क्यों क्योंकि मां जगथत्री जगदंबा तीनों लोगों को धरण करने वाली मां दुर्गा स्वयं वहां पर उपस्थित थे बोल करके जो सात जिसके हृदय में शत-शत गन हैं वो निश्चय श्रद्धावन होगा ही होगा अभी भारत को आजादी दिलवानी है स्वदेशी आंदोलन में भाग लेना है एक निश्चित त्यागी जीवन जीना है इतना तो केदार बाबू के मां में था तो अभी इस तरह से जो की एक निष्ठावान व्यक्ति है वो यदि स्वयं ईश्वर को अपनी नजर के समक्ष पाएगा तो निश्चय उनके ऊपर में श्रद्धा भक्ति होगी ये बात में कोई आश्चर्य की बात नहीं है किंतु फिर भी ये जो उनका एक तरह का जो नेचर है की हिंदू धर्म के हिंदू धर्म में कितना सर है की नहीं है ये उनका एक रेजिस्टेंस मैंने कहानी पे लिखा नहीं है ऐसा किंतु मैंने इतने सारे प्रसंग पढ़कर के पाया है की एक तरह का रेजिस्टेंस उनमें था बाद में भी एक ऐसी घटना होती है की केदार बाबू वो कहते थे की आप लोगों को जब त्यागी है उन्होंने जी बहुत सारे लोगों ने इधर बाबू के शिष्यों ने विद्यार्थियों ने मां के पास में गेरुआ तक वस्त्र लेकर के ग्रहण करके सन्यास लिया था तो केदार बाबू का कहना था की तुम लोग तो साधु हो और वैसे भी तो यह स्वदेशी आंदोलन में जुड़ने के लिए आए थे एक त्याग तपस्या एक कठोरता का भाव आपके जीवन में तो यही है तो आपको दिन भर कम करते रहना चाहिए और सामने कुछ भी अपेक्षा नहीं रखती चाहिए अभी ये बात सुनने में तो ठीक लगती है की यदि कोई हमारे क्रांतिवीर थे उसे समय के जैसे की शाहिद भगत सिंह को देखें ना की ये लाल बाल पाल की त्रिपुटी है उनको देखें ना की फिर ये सरदार वल्लभ भाई पटेल है महात्मा गांधी है इन सबको हम देखते हैं तो जीवन में कठोरता का भाव था यदि हम भोग में डब जाएंगे तो अंग्रेज लोग हमको पकड़ करके हमको मूर्ख बना लेंगे हमारे ही द्वारा भारत का हिट करेंगे ऐसा उनको पता था कठोरता त्याग का भाव हमारे सभी विश्व स्वतंत्रता सेनानियों में था तो यह लोग तो ऊपर से गिरवा धरण किया हैं केदार बाबू की यह सब लड़के यह वर्धा महाराज वगैरा तो आप लोगों को तो सतत कार्य करते रहना चाहिए और कुछ भी अपेक्षा नहीं रखती चाहिए ऐसा उनके मां का भाव था तो अभी क्या है की देखिए की कुछ भी अपेक्षा एन रखना एक फिलोसॉफिकल बात हो गई हम लोग साधु होने को आते हैं तो हम लोग निश्चय कुछ अपेक्षा नहीं रखते किंतु यदि हमारा आध्यात्मिक डेवलपमेंट ना होता होता यहां जब साधु मिलकर के खाने के समय एन की रात्रि रात को खाने के बाद में जो नाइट क्लास होता है उसे समय बैठकर के सब हंसी मजाक नहीं करते एक दूसरों की खबर नहीं लेते कोई बीमा है तो जाकर के उसकी सेवा नहीं करते बीच-बीच में भक्ति लोग अच्छा खाना लेकर आते हैं तो वो नहीं जल्दी खाएंगे बीच-बीच में तीर्थ यात्रा करने के लिए नहीं जाएंगे तो हमारा जीवन इतना शुष्क और खुश हो जाएगा की यहां पर रहना मुश्किल होता है तो इतने सारे भक्ति इकट्ठा होते हैं फिर नृत्य कीर्तन भी होता है बेलूर मठ में जी तरह से वो सुबह को उषा कीर्तन होता है ठाकुर की तिथि पूजा के दिन यहां पे भी स्वराज में भी सुबह को उषा कीर्तन होता है और मंदिर की चारों और प्रदेश ना करते करते भक्ति लोग नृत्य कीर्तन गीत भजन वगैरा करते हैं तो इतना सुंदर पवित्र माहौल होता है तो यह भी तो हमको हम जो यहां पर र रहे हैं तो यह एक इमोशनल यदि कुछ प्राप्त नहीं होता एक पॉजिटिव इमोशन जिसको ओजस कहते हैं ये ओजस या तो फिर यह सत्व हमको यदि नहीं प्राप्त होता तो हम लोग यहां पर र नहीं पाएंगे यहां पर रहना मुश्किल हो जाएगा फिर तो एक मैकेनिकल रेजीमेंट लाइफ हो जाएगा की सुबह को उठो और ऑफिस में जो कम करो और फिर बस कम करके खाना खाकर रूम में चले जो यह इमोशनल बंद जो है साधुओं के भीतर में साधु और भक्तों के भीतर में यह जो पवित्रता का एक संबंध है यहां पर एक आनंद उत्साह और ये हंसी मजाक की लहरें उड़ती है बीच-बीच में तो एक इमोशनल कोरा जो प्राप्त होता है बोलकर के ही हम लोग यहां पे टीके हुए हैं और बोलकर के ही बहुत सारे भक्ति यहां पर आते हैं ऐसा नहीं है की बहुत सारे इतने भक्ति लोग यहां पे ठाकुर को पढ़कर के निक्की मां को पढ़कर के ना की फिर योग साधना करने के लिए आए आते हैं ज्यादातर बहुत सारे भक्ति इसलिए आते हैं की यहां पे एक जो हंसी मजाक एक प्रेम और एक भालोबासा एकता एक एटमॉस्फेयर था के राम कृष्णा सॉन्ग के किसी भी आश्रम में उससे आकर्षित हो करके आते हैं घर में तो संसार में जहां पर जब करते हैं नौकरी करते हैं या तो बिजनेस करते हैं वहां पर स्वार्थ का संबंध होता है यदि आप सक्सेसफुल है तो लोग आपको रिस्पेक्ट करेंगे और यदि आप सक्सेसफुल नहीं है तो लोग तो आपको इग्नोर करेंगे आपका अपमान भी करेंगे यहां पर आपको सक्सेसफुल होने की जरूर नहीं है बस ठाकुर के ऊपर में एक सरल श्रद्धा हो साधुओं के ऊपर में एक सरल विश्वास को तो यहां पे आपके सबके लिए दरवाजे खुला हैं सबको एक जैसा ट्रीटमेंट मिलता है तो इसलिए लोग आते हैं और ये जो इमोशनल आहार मिलता है वो नहीं रहने से यहां पे रहना मुश्किल हो जाता है किंतु केदार बाबू का एक ऐसा था की एक सेकुलर एक कठोरता कठोरता करने वाला जीवन आपको कुछ भी इमोशनल भी प्राप्त नहीं होना चाहिए आप लोग हंसी मजाक क्यों करते हैं बैठ करके चलो सब लोग कम करना शुरू कर दो अच्छा खाना खाने की क्या जरूर है आहार बिल्कुल सरल होना चाहिए सिंपल होना चाहिए तो ऐसा सब उन्होंने नियम वगैरा बनाए थे तो बोल करके केदार बाबू के पास में कोई टिकता नहीं था सब लोग या तो फिर चले जाते थे मां के पास या तो फिर महापुरुष महाराज बेलूर मठ में थे और यहां पर उद्बोधन में शरद महाराष्ट्र तो इनके पास सब लोग चले जाते थे तो ये केदार बाबू आकर के मां को एक दिन कहते हैं की मां आप लोग अच्छा खाना खिलाने हैं और अच्छे से बातें करते हैं बोलकर के मेरे लड़के मेरे पास से भाग करके आपके पास चल जाते हैं आप जब भी मेरे लड़के आपके पास में आते हैं तब उनको तुचकार कीजिए उनको पास में मत रखिए उनको उनको प्रेम मत दीजिए उनको अच्छा खाना मत दीजिए ऐसा आप करेंगे तो यह लोग के पास में और कोई उपाय नहीं रहेगा गोल घूमकर के मेरे पास ए जाएंगे जब मैंने यह बात सनी तो इतनी नाराज हो गई और केदार बाबू को ऐसा दांत करके बोलने लगी की अरे यह तुम क्या बात करते हो भालोबासा ही तो आम आदमी प्रेम और स्नेहा यही तो रामकृष्ण संघ का सही सही फाउंडेशन है रामकृष्ण संघ की इसको ले लोग तो यहां पर रहेगा क्या कुछ बिल्डिंग रहेंगे एक ठाकुर का मंदिर रहेगा वहां पर कुछ फोटोग्राफ रहेंगे इसके अलावा कुछ नहीं रहेगा यदि इस सब चीजों के प्रति जिनके हृदय में भक्ति निष्ठा श्रद्धा नहीं है वैसे लोग चले जाएंगे तो ये सब चीज तो ईट माटी पत्थर और रेट इसके अलावा कुछ नहीं है ये आज है कल ढा जाएगी क्या पता तो अब मैन इस तरह से डांटना से केदार बाबू बड़े ही डर गए और फिर हाथ जोड़कर के मां को खाने लगे मां गलती हो गई मैं फिर से इस तरह की बात नहीं करूंगा किंतु जो भी है एक बार तो इस तरह से मां की दांत सुनकर के ठंडा हो गए थे किंतु उनके स्वभाव का यह एक डाइमेंशन ये एक एस्पेक्ट मैंने बराबर और नंद किया है लक्ष्य किया है और अभी इसके लिए इनकी निंदा करने की बजे हमको इस तरह से सोचना चाहिए की इस तरह का नेचर होने के बावजूद उन्होंने कल पड़ा में जगदंबा आश्रम की स्थापना करने में इतना एक क्रिटिकल रोल निभाया है मां के लिए मां खुद कहती है अमर आराम का निर्माण किया उसके लिए उनको धन्यवाद देना और इनके प्रति हमारी श्रद्धा होना आवश्यक है तो मां कहती है की इस बार में आऊंगी तो तुमने तो इस तरह से हम लोगों के विश्राम के लिए एक आश्रम की स्थापना की है तुमने ठाकुर घर भी बनाया है वहां पर ठाकुर की फोटो वगैरा भी शायद राखी होगी तो वो बहुत अच्छा है इस बार जब मैं आई हूं ठाकुर की विधिवत स्थापना करके जाऊंगी रखो सब आयोजन करके रखना पूजा अनुभव आरती सब नियमित करते तक गए पूजा अनुभव आरती वगैरा सब नियमित करना होगा अभी यह बात सुनकर के केदार बाबू क्या बोले थे पता नहीं किंतु सुदश स्वदेशिक कोर की होने सिर्फ स्वदेशी करके क्या होगा आमदर जा की ऊ शुभार मूल ठाकुर तिमी आदर्श हम लोगों का जो कुछ भी है सबका मूल्य है सबकी नव हते ठाकुर और ठाकुर की हमारे आदर्श हैं जा की ऊ कोरोना किनो ताकि धोरे थकले कोनो बेचाल होने ना जो कुछ भी करो ना किंतु जब तक ठाकुर को पकड़ के रहोगे बेचाल पाडवे ना ठाकुर भी ये बात कहे की आपका पर फिसल नहीं जाएगा क्या ठाकुर ने कहा था की जो जिसने मां का हाथ पकड़ के रखा है या तो फिर एवं बटर मैन जी बच्चे का हाथ पकड़ कर रखा है वह शकर के भी उसका पर नहीं फिश लगा तो यहां पर भी मैन वही बात कहीं हम स्वदेशी आंदोलन करें ना की जैसे हम कुछ भी कार्य करें हमको लगता है की यह भारत देश के किसान के लिए जैसे की यहां पर डिस्पेंसरी है यहां पर पब्लिकेशन डिपार्मेंट है बहुत साड़ी जगह पर हमारे आश्रम में स्कूल है कॉलेज है या तो फिर और डेवलपमेंट का कम हो रहा है रांची में मैं था तो वहां पे दिव्ययन अर्थात की कवि के कृषि विज्ञान केंद्र था और उसमें हम लोगों के 70 17 से ज्यादा गांव हमने दत्तक लिए थे अडॉप्ट किया थे वहां पे इतने सारे सर्विस एक्टिविटीज हमारी चल रही है बंगाल में आप देखेंगे जयरामबाती कम और कुकर शारदा पीठ में पाली मंगल का प्रकल्प चला है उसके अंतर्गत महिलाओं को पापड़ बनाने की फिर अगरबत्ती बनाने की गमछा बनाने की शहर बनाने की मधु बनाने की यह सिर्फ ट्रेनिंग हम लोग देते हैं तो यह सब जितने भी हमारे कोर्स के लिए जगत के कल्याण के लिए जो कुछ भी हम कार्य करते हैं वह सब अच्छा है जब तक हम एक हाथ से ठाकुर को पकड़ करके रहते हैं ठाकुर ही हमारे सभी कार्यों की सभी सेवा कार्यों की नव है मूल है और वही हमारे आदर्श हैं ग्वालपाड़ा आश्रम में तो खून ध्यान जब पूजा पाठ अपेक्षा ताज चरखा ओ स्वदेशी प्रचार प्रभृतिर उपर्युक्त ग्वालपाड़ा आश्रम में उसे समय ध्यान जब पूजा पाठ की बजे यह ताई और चरखा और स्वदेशी प्रचार वगैरा के ऊपर में ही सबका ज्यादा ध्यान था ज्यादा लक्ष्य था कोई जुनून और इसी वजह से पुलिस की दृष्टि भी इन लोगों के ऊपर में बड़ी थी वक्र वक्र नजर वक्र दृष्टि लोगों के ऊपर में थी पुलिस खबर ले लिया जाए तो एवं बाटी नूतन लोग जहां राय आशुतो अक्षर संवाद नाम धाम आशीर्वाद पुलिस के लोग यह प्रतिदिन आश्रम में आते थे और फिर वहां पर कौन र रहा है कब आया कब गया किस कम के लिए आया है यह सब नॉन करके रखते थे श्री श्री माहिर कथा उतारे केदार अब यह सब बैकग्राउंड है की यहां पे स्वदेशी चल रहा है ये चरखा घुटने का चरखा काटने का यह सब प्रचार कार्य चल रहा है यह सब वो वहां का बैकग्राउंड है और जब मैन यह सब कहा की नियमित पूजा फिर ये अनुभव और आर्थिक करनी होगी तब ये सुनकर के केदार बाबू ने कहा अभी देखिए यहां अच्छा केदार बाबू ने उत्तर दिया है ऊपर में मैंने कहा था केदार बाबू ने क्या बोला पता नहीं किंतु केदार बाबू ने उत्तर दिया है के डर बाबू कहते हैं मां स्वामी जी तो डर शेर काई कुर्ते खूब बोले छन एवं निष्काम कमर पत्तों को राशन तो केदार बाबू ने कहा मां स्वामी जी तो अपने देश के युवकों को निष्काम करने पर कर्म करने के लिए बहुत ही उत्साहित कर रहा है किया हैं और निष्काम कर्म करने के लिए संघ का भी स्थापना उन्होंने की है चीनी आज बेचे थकले आज बच्चे रहते वो आजादी जीवित होते तो देश का उन्होंने कितना कम ना किया होता अभी देखिए की केदार बाबू ने सीधा सीधी ऐसा नहीं कहा की अरे मां ये सब पूजा पाठ में भोग आरती में अनुभव में हमको कहां फस्ती हो ऐसा नहीं कर करके थोड़ा सा घुमा करके कहा की यदि स्वामी जी ने तो देश में युवाओं को कहा है की देश के उत्थान के लिए कर्म करो और उसके लिए अपना सब भी सुख और भोग की जितनी भी इच्छा है उसको तिलांजलि दे दो उसको विसर्जित कर दो यहां तक स्वामी जी ने सबको कहा है और फिर यह रामकृष्ण संघर्ष जैसी संस्था का भी उन्होंने स्थापना की है तो यदि स्वामी जी आज बच्चे रहते पूछा था शून्य मां तारा ताड़ी बोली ने यह बात सुनकर के मैन इमीडीएटली कहां है वह बाबा नरेंद्र अमर आज थकले कंपनी की आज तक छेड़ दी तो अरे बेटा नरेंद्र जड़ी आज मेरा जीवित होता तो यह कंपनी अर्थात के ईस्ट इंडिया कंपनी तो खेर चली गई थी ब्रिटिश गवर्नमेंट थी तो ब्रिटिश गवर्नमेंट क्या नरेंद्र को छोड़ देती झेल पूरे रख दो जय में परकर के रखती अनीता देखते पर तुम ना मैं वो जहां नहीं कर पाती नरेंद्र खाप खोल तलवार नरेंद्र जैसे की म्यान में से निकाल हुई तलवार है मिले थे पश्चिम देश में से वापस आकर के मुझे कहा था मां अपना आशीर्वाद दे चुके हैं ना की हम लोग सब ठाकुर के बंदर हैं तो मैं आपके आशीर्वाद से हनुमान जी की तरह समुद्र खुद करके वहां पर नहीं किंतु उन्हें के बनाए हुए जहाज में चढ़कर के स्वर होकर के उसे देश में गया था छींकानियों देखना मां ठाकुरर की महिमा वहां पर भी देखा मां ठाकुर की क्या महिमा है के तो सज्जन अमर कच्चे तार कथा मेट्रो मुखेड़ मातोशुने छे एवं ईभामी अच्छे कितने सज्जन लोग मेरे पास में ठाकुर की बात मंत्रम मुक्त होकर के सुन हैं और कितने लोगों ने ठाकुर का भाव लिया है एक कोठा बोलियां ही मां बार बोली ते छन तारा हो तो अमर केले की बोलो यह बात सुनकर के मैन आखिर में कहा की वो भी तो मेरे लड़के हैं वो भी तो मेरे संतान है क्या कहते हो देखो की यह जो केदार बाबू और मां का यह छोटा सा इंटरेक्शन हुआ उसमें हमको कितना दीप एक अंडरस्टैंडिंग एक मां का आध्यात्मिकता के प्रति हम रामकृष्ण संजक का है यह हमको जन को मिलता है मैं भी जब यंग था स्कूल में पढ़ना था और बाद में भी मैं भी सोचता था की यदि राष्ट्र के कल्याण के लिए कुछ जड़ी किया जाए तो वह सर्वश्रेष्ठ है यह पूजा जब ध्यान वगैरा क्या ये तो सब समय नष्ट करने वाली बात है और जो लोग ये सब करते हैं उनके चरित्र भी पता नहीं कैसे होंगे हम तो सब न्यूज़पेपर में ये सब पढ़ने रहते हैं किंतु फिर देखिए की यही बात जब ये कहते हैं केदार बाबू मां को तो मां किस तरह से उत्तर देती है अब दोनों के पीछे ये जो डिस्कशन है इसके पीछे बैकग्राउंड है की ग्वालपाड़ा आश्रम में ठाकुर की स्थापना करके अनुभव प्रतिनिधित्व पूजा अनुभव और आरती करने से क्या होगा क्या इनका मां क्या देश सेवा से जिला हो जाएगा देश सेवा से वो जो समय दे रहे हैं उसमें से समय चला जाएगा तो देश की ठीक से सेवा नहीं होगी यह जो केदार बाबू की आशंका है और सामने मां समझती है की यदि हमने एक हद से जब ज्ञान आध्यात्मिकता पकड़ कर नहीं राखी तो यह सेवा भी ठीक नहीं होगी तो यह जो डिस्कशन जो चल रहा है बैकग्राउंड वह है किंतु बात को दूसरे तरीके से करते हैं केदार बाबू पूछते हैं की स्वामी जी यदि होते तो कितना कितना ज्यादा सेवा कार्य होता ऐसा नहीं की स्वामी जी यदि होते तो बहुत सारे मंदिरों की स्थापना हो गई होगी मैं बिल्कुल मठ में मंदिर की स्थापना हुई है ठीक है चलिए किंतु बाकी सब जगह पे तो जैसे की वाराणसी में सेवा आश्रम की स्थापना हुई है कनखल में सेवा श्रम की स्थापना हुई है ज्यादातर जगह पे तो स्वामी जी ने सेवा शर्म की ही स्थापना करवाई है अखंडानंद जी को देखकर की ये सब रिलीफ वगैरा करवाया है तो स्वामी जी तो देश सेवा के कार्य पर ही तो ज्यादा जोर देते ना वह थोड़ी ना मंदिर वगैरा बनवेट हैं जहां पे भी जो एक मंदिर बना दो जहां पर भी जो ठाकुर की नित्य पूजा शुरू कर दो जहां पे भी जो अनुभव आरती शुरू कर दो यह सब तो स्वामी जी ने इतना इनकरेज नहीं किया है यहां तक की स्थापना हुई थी शशि महाराज नित्य नियमित पूजा आरंभ कर रहे थे वह भी हमारे पास में वर्णन है की स्वामी जी नाराज हो गए थे अरे तुम प्रतिदिन मतलब ठाकुर स्वामी ठाकुर कर मेरा डर है शशि का वह ठाकुरगढ़ वो फिर एक ट्रेडिशनल वे में हम चले जाएंगे और फिर हम लोगों का एक वेदांत वेदांत इस एन फिलोसॉफिकल हायर फिलोसॉफिकल वे ऑफ लाइफ तो त्याग को अपने जीवन में प्रतिक्षण में उसको हमको ये उसका ये करना है उसको गुट लेना है त्याग को हमारे जीवन की प्रतीक्षा में उसको भून लेना है वो नहीं हो करके हम लोग ये सब पूजा पाठ करेंगे और फिर जैसे ट्रेडिशनल पुजारी होता है वैसे ही दूसरों के पास से सम्मान के अपेक्षा करेंगे अहंकार और घमंड से भरकर के घूमेंगे की हां मैं ही एक हूं एक धार्मिक व्यक्ति तो इस तरह से ना हो जाए और दूसरा की एक समाज कल्याण का अपना एक उद्देश्य है उससे ना भटक जाए बोलकर के मंदिर पूजा पाठ उसको इतना थोड़ा सा दूर रखना है उसको अपनी लिमिट तक रखना है बाकी एक नैतिक जीवन एक एथिकल लाइफ जिसमें हम त्याग संयम और मेडिटेशन यह एकाग्रता यह सब करें और साथ में ये कम करें कार्य करें ये सब पे ज्यादा भर देना है ये सब इन लोगों ने ये कोलंबो तू अल्मोड़ा और लेटर पढ़कर के शिखा है तो मैन क्या उत्तर दिया की यदि नरेंद्र आज मैं राहत तो ये लोग उसको जय में पर देते हैं इस बात को दो तरीके से देखना है एक तो की वो ब्रिटिश गवर्नमेंट अवश्य स्वामी जी से नाराज होती और दूसरी दृष्टि से देखिए की हम यदि आध्यात्मिकता को छोड़कर के बहुत ज्यादा इस एक कार्य क्षेत्र में यदि डब जाएंगे तो माया हमको ग्रसित कर लगी वहां ब्रिटिश गवर्नमेंट स्वामी जी को बंदी बनाकर के रखती तो यहां पे माया अपने माया पांच में माया दाल में हमको बंदी बनाकर के रख दी तो यह भी हमको समझना की बात है जैसे की हमने चीन में देखा जैसे की हमने रसिया में देखा वहां पर कम्युनिस्ट रिवॉल्यूशन आया लोगों को मूली पति या तो पूंजी पति है उनके चंगल में से छुड़ाने के लिए जो की यह जो ड्राइविंग क्लास पीपल है प्रो लेटराइट है उनको उनका उत्थान के लिए पूंजी पत्तियां को मार दो उनकी धन संपत्ति हड़प कर लो और यह जो वर्किंग क्लास पीपल है उसमें बांट दो किंतु हुआ क्या ये पूंजी पति कहो ना किया राजा शाही कहो वे लोग लोगों पर जितना अत्याचार करते थे उससे 100 गुना अत्याचार ये साम्यवादी सरकारें अपने आ अपने नागरिकों के ऊपर में की है बंगाल में तो खास करके लोगों को पता है की किस तरह से गुंडाराज चला था बहुत साड़ी जगह पे चला है ऐसा नहीं है की सिर्फ शामियावादी ऐसे हैं किंतु वो देखने की बात है की जब ये कहेंगे की मेरा उद्देश्य है की लोगों का भलाई करना और फिर साथ में यदि मेरे पास में ईश्वर का आशीर्वाद ईश्वर के प्रसिद्ध नहीं है तो मैं जो कर रहा हूं धीरे-धीरे करके मेरे मां में घमंड और एक तरह का लोगों का एक्सप्लोइट करने की एक भावना मेरे हृदय में ले आएगी मैं माया के माया जो है उसकी मायाजाल में मैं फस जाऊंगा तो इसलिए मां कहती है की नरेंद्र मोदी होता तो ब्रिटिश गवर्नमेंट उसको बंदी बनाकर के रखती और हम लोग जल्दी स्वामी जी का बिना सोच समझकर के अनुकरण करते तो यह महामाया की दाल में फस जाते हैं इसको लेकर के और भी थोड़ा सा डिस्कशन करेंगे किंतु वह कल यह बहुत ही इंपॉर्टेंट डायलॉग है छोटा सा है किंतु अपने संघ का जो फाउंडेशन है मैन यहां पर बताया है की कर्म और ध्यान आत्मानं मोक्ष थम जगत हटाया इन दोनों के बीच में किस तरह से बैलेंस रखना है एक छोटा सा एक घटना से हमको बहुत कुछ इसमें है हम कल और थोड़ा डिस्कस करेंगे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम