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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

Swami Vivekananda's Cosmos Macrocosm & Microcosm: Summary And Outline : 28 May 2024

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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम तो हम लोग स्वामी जी का जो सीरीज था उसमें अभी जिस तरह से अपना क्लास का स्ट्रक्चर है एक सप्ताह हम मां के बारे में बात करते हैं और एक सप्ताह स्वामी जी के बारे में तो स्वामी जी के बारे में जो ज्ञान योग की सीरीज के दो प्रवचन थे स्वामी जी के कॉस्मो मैक्रो कजम एंड कॉस्मो माइक्रो कजम वह अभी समाप्त हुए हमने सिर्फ नहीं इन दोनों को डिटेल में डिस्कस किया किंतु साथ साथ में ही उसका एक आउटलाइन उसका एक कंक्लूजन भी देखा कि स्वामी जी एक्चुअली इन दोनों के माध्यम से हमको क्या कहना चाहते हैं तो अभी जस्ट एक या दो ही लाइन में इन दोनों प्रवचनों का सारांश यदि मैं कह दूं तो वह इस तरह से होगा कि मैक्रो कजम प्रवचन में स्वामी जी साइंटिफिक मेथड्स जो है आज की उसको आधार लेकर के उसको इल्यूड बाय एलुडिंग द मॉडर्न साइंस लूड वर्ड जो है इंग्लिश शब्द है और इसका ट्रांसलेशन शायद इस तरह से से होगा कि उसको एग्जांपल बना कर के या तो फिर उससे उपमा लेकर के स्वामी जी ईश्वर का अस्तित्व प्रूव करने का प्रयास करते हैं तो एक हो गया कॉस्मो मैक्रो कजम में कि ईश्वर का अस्तित्व प्रूव हुआ है और माइक्रो कजम में जो पूरा प्रवचन है उसके दो कंक्लूजन है एक तो है कि एसिस्टेंसिया है एक कंक्लूजन और दूसरा कंक्लूजन हो गया कि पुनर्जन्म है और पुनर्जन्म वाद के आधार ऊपर हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य का डेस्टिनी मनुष्य के ही हाथ में है आज मेरे साथ में जो कुछ भी हो रहा है वो कल किए हुए कर्मों का परिणाम था तो यही लॉजिक लगाने से यह पता चलेगा कि आगामी काल मेरे साथ में जो होने वाला है उसके लिए जो मैं कर्म करूंगा आज वो मेरे हाथ में है यदि मैं ठीक से साधन भजन करूं तो मेरे मन में इतना विवेक वैराग्य जागृत हो जाएगा विल पावर जागृत हो जाएगा कि जिसकी मदद से मैं वही कर्म करूंगा जो कि शुभ कर्म है मेरी इंद्रियां आकर्षित कुकर्म की ओर आकर्षित ना हो इतना विल पावर मेरा डेवलप हो जाएगा तो ये मैक्रो कजम और माइक्रो कजम इन दोनों प्रवचनों के तीन कंक्लूजन फर्स्ट कि ईश्वर है और ईश्वर के अस्तित्व को प्रूव किया जा सकता है मॉडर्न साइंस के बेसिस पे सेकंड कि हमारे भीतर में आत्मन है और इसी आत्मन का अस्तित्व भी आप मॉडर्न साइंस के आधार पर प्रूव कर सकते हैं और तीसरा एक्चुअली जो तीसरा कंक्लूजन होना चाहिए था कि जीव ब्रह्मण ऐक्य यह जो हमारे भीतर जो आत्मन है और यह जो कॉस्मिक ब्रह्मण या तो ईश्वर कहते हैं उन दोनों के बीच में ऐक्य स्थापित करने वाली बात होनी चाहिए आइडियल स्पीकिंग यदि हमारे उपनिषद की मेथोडोलोग्य कि हां तत्वम असी ये जो महावाक्य हमारे उपनिषद में कहे गए हैं तत त्वम तत अर्थात कि मेरे भीतर में जो आत्मन है त्वम अर्थात कि ये जो वैश्विक आत्मन है या तो ब्रह्मण या तो ईश्वर व्हिच एवर नेम यू गिव इट कौन सा भी नाम आप इसको दे दीजिए इन दोनों के बीच में एक संबंध एक्य स्थापित करना मेरे भीतर में वही आत्मन है जो कि विश्व ब्रह्मांड में ब्रह्मण होकर के छिपा हुआ है तो यह तत्वम असी या तो फिर कहेंगे अहम ब्रह्मास्मि या तो फिर कहेंगे कि शिवो हम या तो फिर कहेंगे कि प्रज्ञान ब्रह्म ये जितने भी महावाक्य है उपनिषद में कहे गए वो सब महावाक्य का का यही अर्थ होता है कि मेरे भीतर में आत्मन है विश्व ब्रह्मांड के भीतर के उसके ऊपर में जो ब्रह्मण है वो ब्रह्मण और आत्मन का ऐक्य यह शायद स्वामी जी को प्रूव करना चाहिए था जद वह उपनिषद की मेथड फॉलो करते हैं कि पहले तो एक ब्रह्मण का अस्तित्व एस्टेब्लिश कर दिया फिर यह आत्मन का अस्तित्व एस्टेब्लिश कर दिया फिर आत्मन और ब्रह्मण का ऐक्य दिखा दिया ऐसा नहीं करके एक हाईली एजोटिक या तो फिर कहेंगे हाईली थियोरेटिकल एक्सरसाइज में नहीं जाकर के स्वामी जी ने क्या किया एक बहुत ही प्रैक्टिकल बात हमको बताई है पुनर्जन्म वाद का सिद्धांत हमारे सामने उन्होंने प्रस्तुत किया है अभी यह पुनर्जन्म वाद के बारे में आप शायद इतना जाने न जाने उपनिषद में इसके बारे में इतना डिटेल डिस्कशन इसके बारे में नहीं है किंतु स्वामी जी ने यह दोनों जो प्रिंसिप है आत्मन का प्रिंसिपल और ब्रह्मण का प्रिंसिपल उससे यह कंक्लूजन निकालने की वजह कि ये जगत ब्रह्मा यह जो जगत है ये जो संसार है जिस संसार के भीतर में हम रह रहे हैं मेरी जो ड्यूटीज है जो कि मैं कर रहा हूं एक विद्यार्थी के रूप में एक पुत्र के रूप में एक पिता के रूप में एक पति या पत्नी के रूप में एक राजा के रूप में या तो एक शिक्षक के रूप में मेरी जो कोई भी ड्यूटीज है मुझे जो कोई भी रिस्पांसिबिलिटीज दे दी गई है वह रिस्पांसिबिलिटीज और यह जो संसार की जिसके भीतर में यह रिस्पांसिबिलिटीज में निभा रहा हूं यह सब एक तरह से देखें तो एक मरुभूमि में जाते-जाते जिस तरह से हमको एक मिराज दिखता है एक आंखों का भ्रम दिखता है कि हां डेजर्ट है डेजर्ट में पूरा रेत है तो रेत की वजह पानी दिखने लगता है क्यों क्योंकि उनको प्यास लगी है तो हमारा माइंड यह सब भ्रम प्रोजेक्ट करता है तो यह संसार एक भ्रम है संसार का त्याग करके ईश्वर सानिध्य में जाने का प्रयास करना चाहिए ये उपनिषद का कंक्लूजन हो गया यदि उपनिषद यह कहेंगे कि हमारे भीतर में यह जो मन बुद्धि चित्त अहंकार यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय पंच महाभूत पंच तन मात्रा पंच वायु ये सत्व रजस तमस ये गुण ये सब कुछ जो हमारे शरीर में दिखता है वह सब एक माया का आवरण है इसके भीतर में आत्मन है और बाहर विश्व में आप देखिए विश्व में आपको क्या दिखता है मैटर एनर्जी स्पेस टाइम एंड फोर्सेस इसका यह विश्व ब्रह्मांड बना हुआ है मैटर एनर्जी अर्थात कि जो कोई भी पदार्थ हमको दिख रहा है एनर्जी यानी कि जो कोई भी जो फोर्स इसके पीछे में काम कर रही है एनर्जी एनर्जी इसका ट्रांसलेशन नहीं है आजकल ये जो मॉडर्न वर्ड इसके बारे में सबको पता है स्पेस टाइम अर्थात कि ये डायमेंशन ये तीन डायमेंशन लेंथ ब्रेड्स एंड विड्थ एंड चौथी डायमेंशन हो गई टाइम की और फोर्थ हो गया फोर्स चार फंडामेंटल फोर्सेस है इस जगत में न्यूक्लियर दो न्यूक्लियर फोर्सेस है वीक एंड स्ट्रांग एक है इलेक्ट्रो मैग्नेटिज्म और फोर्थ है ग्रेविटेशनल फोर्स तो ये चार फोर्सेस एक दूसरा है मैटर एनर्जी तीसरा है स्पेस टाइम इन तीन फंडामेंटल चीजों का यह कॉस्मो बना हुआ है मटेरियल कॉस्मो तो जैसे हम सांख्य है ना सांख्य कैसे गिनती करता है कि ये कर्मेंद्रिय ज्ञानेंद्रिय मन बुद्धि चित्त अहंकार तो ये इंडिविजुअल लेवल प गिनती करता है और ये कॉस्मिक लेवल प काउंट करता है यह पंच महाभूत और पंच तन मात्राए तो ये पंच महाभूत पंच तन मात्रा उस समय का माने वो टर्मिनोलॉजी है मॉडर्न टर्मिनोलॉजी है स्पेस टाइम मैटर एनर्जी एंड फोर फोर्सेस तो यह जो इसका जो यूनिवर्स बना है इसके पीछे में सही सत्ता है ब्रह्मण तो यह ब्रह्मण सही है आत्मन सही है जी आत्मन और ब्रह्मण का ऐक्य है और कंक्लूजन यह है कि संसार का त्याग करके ईश्वर प्राप्ति के लिए या तो फिर ब्रह्म साक्षात्कार के लिए या तो आत्म साक्षात्कार के लिए काम करना चाहिए इसकी वजह स्वामी जी इस उपनिषद में कहे हुए रास्ते को फॉलो कर ने की वजह अपना एक प्रैक्टिकल रास्ता गीता में जो रास्ता दिखाया गया है वह रास्ता स्वामी जी यहां पर फॉलो करते हैं पुनर्जन्म वाद का जिससे कि हमारा डेस्टिनी हमारे खुद के हाथ में है हम जो कार्य करेंगे उस कार्य का परिणाम हमारे ही उस कार्य का परिणाम हमको भुगतना है अर्थात कि अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छा परिणाम बुरे कर्म करेंगे तो बुरा परिणाम तो ये देखिए कि यहां पे कॉस्मो स मैक्रो कजम और क्रो कजम में ऑन वन हैंड स्वामी जी उपनिषद के द्वारा दिखाए गए इस बाह्य जगत या तो फिर यह मटेरियल यूनिवर्स के पीछे में सही जो एक चेतन सत्ता है उसको प्रूव किए हैं और गीता का यह जो कर्मयोग का जो सिद्धांत है पुनर्जन्म वाद और कर्मयोग वो उन्होंने यहां पर लाकर के रख दिया है यानी कि गीता और उपनिषद दोनों का परफेक्ट कॉमिनेशन स्वामी जी ने मैक्रो कजम और माइक्रो कजम प्रव चन में किया है तो यह दोनों प्रवचन का सारांश हो गया ओम शांति शांति शांति हरि ओ तसत श्री राम कृष्णर पर

Questions & Answers

मस्तु मने वो महावाक्य उनका कंक्लूजन महावाक्य में क्यों नहीं आया मेरा खुद का एक सरप्राइज मुझे भी हुआ कि इसको पढ़ कर के इसको एनालाइज करके लॉजिकल कंक्लूजन है यदि मेरे भीतर जड़ देह के भीतर में चेतन आत्मन है जड़ ब्रह्मांड के ऊपर में या तो भीतर में एक चेतन ब्रह्मण है तो फिर कंक्लूजन यह है कि जीव ईश्वर ऐक्य जीव ब्रह्मण ऐक्य यह महावाक्य उपनिषद के अनुसार होना चाहिए उसकी इंस्टेड ऑफ दैट स्वामी जी बिल्कुल ही गीता वाले वो जो एक प्रैक्टिकल एप्लीकेशन में चले गए कि भाई पुनर्जन्म है उसका अर्थ है कि कर्म का फल हमको भुगतना है अच्छे कर्म का अच्छा फल बुरे कर्म का बुला बुरा और साधना करके कर्मों को हम अपने कंट्रोल में कर सकते हैं कर्म के फल को हम नहीं काट सकते ये डिस्कस हमने किया था यदि मैंने दुष्कर्म कल किया है पिछले जन्मों में किया है तो आज मैं उसका फल भुगत रहा हूं साधना से तो मैं इसको नहीं काटने वाला हूं काट पाऊंगा वो तो भुगतना ही भुगतना है किंतु साधना करके इतना विवेक वैराग्य संकल्प शक्ति जागृत होगा कि भाई आज मैं जो कर्म करूंगा वो मैं शुभ कर्म करूंगा अशुभ कर्म नहीं करूंगा इतना मेरे हाथ में कंट्रोल आ जाएगा तो एकदम प्रैक्टिकल में क्यों चले गए वो क्यों वो जीव ब्रह्म ऐक्य वो महावाक्य की डायरेक्शन में नहीं गए तो यह प्रश्न मुझे भी है आई डोंट नो भाई एक्चुअली स्वामी जी को अनुभूति तो हुई थी एकदम वो अल्टीमेट उपनिषद में वर्णित अनुभूति हुई थी किंतु जब डिस्क्रिप्शन देते हैं तो वो अन्य तरह का कंक्लूजन प लाकर वो समाप्त करते हैं मुझे लगता है कि दिस इज मने क्लासिकल स्वामी वि विवेकानंद क्लासिकल विवेकानंद की एकदम हाईएस्ट फिलोसोफी और फिर एकदम प्रैक्टिकल एप्लीकेशन दोनों का व जो पैरेलल जो चलता है स्वामी जी के लाइफ में क्लासिक विवेकानंद स्वामी जी के साथ में यही प्रॉब्लम है ना कि वो एकेडमिक इंस्टिट्यूशन में उनको फिलोसोफर के रूप में नहीं ट्रीट करते वो कहां वो फिलोसॉफिकल फ्लाइट में से कहां वो सीधे गड्ढे में गिरेंगे प्रैक्टिकल रूपी व कुछ ठीक नहीं दिस इ क्लासिकल विवेकानंद यह जो बड़ा ही फेमस इंसिडेंट है आप लोगों ने सुना ही होगा कि शरद चंद्र चक्रवर्ती स्वामी शिष्य संवाद की जिन्होंने रचना की है स्वामी जी के साथ में बैठ करर के वेदा भ्यान कर र है वेदांत का अभ्यास कर रहे है और कहां यह जीव ब्रह्म जीव ब्रह्म ऐक्य माया जगत ये सब चल रहा है और एकाएक गिरीश घोष आकर के बैठ गए अी उन्होंने देखा स्वामी जी बहुत हवा में उ रहा है तो गुब्बारे में थोड़ा सा पंचर मारना चाहिए तो उन्होंने एकदम बात करना शुरू कर दिया कि नरेंद्र तुमको पता है कि यह बहुत अच्छे घर की स्त्रियों के साथ में उनके घर में दारिद्र्य का प्रवेश हुआ और फिर उनके चरित्र का भी हनन किया गया इस घर अच्छे घर के फैमिली में आज इतनी खराब अवस्था है कि वहां पर 10 लोगों के लिए व खाना पकता था वहां पर वही मां अपने बच्चे को खिलाने के लिए दरबदर भटक रही है माने ये जो समाज की जो विभ का है भीषण स्वरूप है गरीबी यह जो पोव इसका ऐसा वर्णन किया गिरीश घोष ने कि स्वामी जी ने सुनते सुनते आंखों में से आंसू आ गए और वह खड़े होकर के दौड़ कर के चले गए क्योंकि अपने हृदय की व्यथा को सबके सामने इस तरह से एक्सपोज नहीं करना चाहते थे तो ये गिरीश और ये जो अपना शरद चंद्र चक्रवर्ती नाराज हो गया बोला कि महाशय कहां हम वेद वेदांत की बातें कर रहे थे कहां पर आपने यह समाज की गरीबी वगैरह की अ वर्णन करके स्वामी जी के मुड को तोड़ दिया उन तो गिरीश घोष कहते हैं पता है देखो मैं तुम्हारे स्वामी जी को क्यों स्वीकार करता हूं क्यों मानता हूं क्योंकि वह सिर्फ एक पंडित जी मात्र नहीं है कि बहुत बौद्धिक चीजें उनको समझ में आती है उनके पास एक भगवान बुद्ध का हृदय भी है जो कि समाज में दूसरे लोगों की आपत्ति को देख कर के दूसरे लोगों की दूरदर्शन देख कर के जिनकी आंखों में आंसू आते हैं वो हृदय भी उनके पास में है इसीलिए मैं तुम्हारे स्वामी जी को मानता हूं इसलिए नहीं कि वो पंडित जी है स्वामी जी स्वामी जी के पास में दोनों था बुद्धि भी थी हृदय भी था और सबसे बढ़कर अनुभूति थी ये बुद्धि हृदय और अनुभूति तीनों का संगम है स्वामी विवेकानंद इलिए वो पकड़ में नहीं आते अभी वो बुद्धि की फ्लाइट वो चला रहे हैं कहां वो अनुभूति के राज्य में चले जाएंगे कहां अनुभूति में से ये प्रैक्टिकल में आ जाएंगे वो कहां से कहां जाते हैं समझ में नहीं आता य स्वामी जी को समझना एक पूरे कितने जन्म जन्मांतर हमको लग जाएंगे समझते समझते स्टडी करते करते m