Invocation
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन इसमें जो पॉइंट हम देख रहे थे पॉइंट नंबर 17 हाउ टू टू बेटर इंडिया रामकृष्ण मिशन। ये पॉइंट्स मैंने दिए हैं वैसे किंतु इसमें जो टेक्स्ट है वो स्वामी जी का ओरिजिनल है। तो अभी हमने पिछली बार जो डिस्कशन किया उसके बारे में मैंने एक चार्ट बनाया है। हमने जो पिछली बार डिस्कस किया था
किसी भी सभ्यता के विकास के पीछे प्रेरक शक्ति होती हैं सामाजिक संस्थाएं (institutions)। संस्थाओं की नींव है धर्म।
इसका यह एक चार्ट। कोई भी एक इंस्टिट्यूशन होता है तो इंस्टिट्यूशन किस तरह से कार्य करता है? इसके पीछे में इंस्टिट्यूशन का कोई भी दो व्यक्ति को दो इंसान को साथ में मिलके काम करना है तो उनको कुछ ना कुछ कंप्रोमाइज कहां पे करना ही होगा। जैसे वह अपने इंडिया में यह गठबंधन बनते हैं पॉलिटिकल पार्टियों के। तो उसमें क्या होता है? कॉमन मिनिमम एजेंडा होता है। अभी आपको बहुमती के लिए मेजॉरिटी के लिए पार्लियामेंट में 270 ना कि इतना जो सीट चाहिए वह एक पार्टी की होती नहीं है। तो वह पांच छह पार्टियों का गठबंधन बनेगा। अभी सभी पार्टियों का अपना-अपना खुद का एक एजेंडा है। किंतु यदि आप दूसरी पार्टी के साथ में काम करेंगे तो हो सकता है कि आपका जो एजेंडा उसमें से कुछ-कुछ चीजें दूसरी पार्टी को ना पसंद हो। अभी दूसरी पार्टी का जो एजेंडा है उसमें से कुछ-कुछ चीजें पहली वाली पार्टी को पसंद ना हो। तो यह दोनों क्या करेंगे? एक कॉमन मिनिमम एजेंडा डेवलप करेंगे कि हमारा यह एजेंडा है। आपका यह है। हम दोनों इसके ऊपर में सहमत होते हैं। यह मिनिमम पॉलिसी मैटर्स के ऊपर में और इस मिनिमम पॉलिसी और एजेंडा के ऊपर में हम गवर्नमेंट चलाएंगे। तो क्या है कि यदि आपको साथ में मिलकर के कार्य करना है तो आपका जो डिजायर है, आपकी जो पॉलिसीज है, आपके जो एजेंडा है उसमें आपको कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ कंप्रोमाइज करना पड़ेगा। यदि मेरा एक मैक्सिमलिस्ट पोजीशन है कि नहीं यह मेरी कामनाएं वासनाएं हैं और इसके ऊपर में मैं सभी वासनाओं को मैं भोग करना चाहता हूं। सभी चीजों को मैं ही खा जाऊंगा तो फिर आप दो लोग साथ में मिलकर कार्य नहीं कर पाएंगे। जैसे कि हम अपने घर का उदाहरण दें तो भाई और बहन दो लोग हैं एक घर में। तो अभी मान लीजिए कि घर में मिठाई है या आम है या ऐसा कुछ अच्छा खाना आया है। अभी एक भाई कहता है कि यह जितनी भी मिठाई है मैं ही अकेला खा जाऊंगा। मेरी बहन के साथ में शेयर नहीं करूंगा तो क्या है भाई और बहन में सतत झगड़ा होता रहेगा किंतु फिर एक भाई कहेगा कि नहीं मेरी बहन को मिठाई ज्यादा पसंद है तो मैं कम खाऊंगा उसको ज्यादा दूंगा तो जैसे ही मैंने अपने खुद के भोगों के ऊपर में खुद की वासनाओं के ऊपर में खुद की तृष्णा के ऊपर में संयमन लाना शुरू किया तभी से यह डोमेस्टिक लाइफ हार्मोनियसली चलेगी वरना तो यह हस्बैंड और वाइफ में झगड़ा यह भाई भाई बहन बहन में झगड़ा और यदि सोसाइटी में रहते हैं तो अभी यह बहुत बार मैंने देखा है यह व्हीकल पार्किंग को लेकर के जगह छोटी सी है और एक घर एक घर है उनके चारप व्हीकल है तो वे लोग पूरी जगह रोक करके पार्किंग कर देते हैं तो बगल वालों का एक व्हीकल है तो वह कहेंगे कि हम तो कम जगह लेते हैं आप भी जगह कम लीजिए एक्स्ट्रा व्हीकल पार्क करना करना है तो कहीं बाहर जाकर करवा दीजिए तो यह दूसरे वाले सुनेंगे नहीं और फिर आपस में झगड़ा होगा तो जहांजहां पे भी आपको साथ में मिलकर के कार्य करना है साथ में मिलकर के रहना है वह चाहे हमारा परिवार हो चाहे वह हमारा सोसाइटी या तो फिर यह अपार्टमेंट हो या तो फिर चाहे यह लोकल म्युनिसिपालिटी ना ही चाहे कि यह स्टेट गवर्नमेंट ना कि यह सेंट्रल गवर्नमेंट फिर ये मान लीजिए आप स्कूल में जाते हैं। आप स्कूल टीचर हैं तो सब टीचरों के बीच में यदि थोड़ा बहुत भी कोऑर्डिनेशन नहीं होगा। एक टीचर कहेगा कि मैं चार क्लास ले रहा हूं। उसको तीन क्लास क्यों दिए हैं? एक दिन के मुझे चार दे दिए। उसको तीन दिए। उसको भी चार दीजिए। वरना तो मैं मैं अपने से एक्स्ट्रा क्लास क्यों करूंगा? ऐसा वो हर जगह पे एक ना एक तरह का क्या कहेंगे कि झगड़ा लगा रहेगा। यदि हम थोड़ा बहुत सैक्रिफाइस करने की यदि हमारे में यह कैपेसिटी नहीं है या तो फिर यह विज़डम नहीं है। तो यह सैक्रिफाइस कब होगा? जब मेरे भीतर में स्पिरिचुअलिटी है। यदि मेरे भीतर में स्पिरिचुअलिटी नहीं है। मुझे भीतर में से यदि कुछ प्राप्त नहीं होता है। आत्मसम्मान आत्मसंतोष या तो फिर यह एक ईश्वर के ऊपर में श्रद्धा भक्ति तो मैं कभी भी किसी भी तरह का सैक्रिफाइस नहीं करूंगा। सैक्रिफाइस के ऊपर में ही मेरा धर्म बना है। धर्म क्या? बुद्धिस्ट अर्थ में नहीं कि रिलीजियस प्रैक्टिसेस धर्म अपने वैदिक अर्थ में कि मेरी रिस्पांसिबिलिटीज क्या है? एक तो है पति धर्म, एक है सती धर्म, एक तो है विद्यार्थी धर्म, राज्य धर्म। आप इस समाज में जहांजहां पे भी हैं आपका सबका अभी जैसे हम साधुओं का धर्म है। साधुओं का धर्म यानी वेदांत नहीं। वेदांत आ गया। स्पिरिचुअलिटी। यह जो मैंने यहां पर तीन बॉक्स बनाए हैं। जो स्पिरिचुअलिटी जो है उसमें मेरी इंडिविजुअल साधना आ गई। वेदांत या तो कर्म योग वगैरह धर्म का अर्थ है कि मैं यदि आश्रम में रह रहा हूं तो आश्रम में मेरी जो ड्यूटीज है उसको मुझे सिंसियरली करना है। वरना तो ऐसा होगा कि एक साधु है वह ज्यादा काम कर रहा है। दूसरे महाराज जो है कम कर रहे हैं काम। फिर यह दोनों फिर महाराज के बड़े महाराज के पास जाकर के वह कहेंगे कि मैं इतना काम कर रहा हूं। वो इतना कम कर रहा है। ड्यूटी तो इक्वली सबके साथ में शेयर होनी चाहिए। तो क्या है कि इस तरह से देखिए कि यदि हम लोग हमेशा थोड़ा बहुत सैक्रिफाइस करने को थोड़ा बहुत इनजस्टिस सहन करने को हमारी कैपेसिटी नहीं रहेगी तो यह अब हम किसी भी तरह के इंस्टिट्यूशन में रह ही नहीं पाएंगे। वो जो धर्म है उसका पालन नहीं कर पाएंगे और धर्म का पालन नहीं होगा तो अल्टीमेटली यह जो इंस्टिट्यूशन है वो इंस्टीट्यूशन नहीं बनेंगे। तो देखिए कि यह ट्रायंगल यहां पे हमको दिख रहा है। धर्म का मुझे पालन करना है तो फिर मुझे किसी ना किसी तरह की स्पिरिचुअल या तो एक विज़डम हमारे भीतर में होना चाहिए। या तो कुछ स्पिरिचुअलिटी होनी चाहिए। विज़डम होना चाहिए। बहुत सारे लोग स्पिरिचुअलिटी को रिकॉग्नाइज ही नहीं करते हैं। किंतु जो भी है यदि आप स्पिरिचुअलिटी या रिलीजन को ईश्वर को आत्मन को रिजेक्ट भी कर दे तो भी ऐसे लोगों के भीतर में काफी विज़डम होता है। और कोई-कोई होता है कि बड़ा दिखावा तो बहुत बड़ा करते हैं कि मैं बड़ा धार्मिक हूं। वगैरह वगैरह वो जो ठाकुर कहते हैं ना पीतांबरी पहनते हैं गले में माला है। सर के ऊपर में तिलक है। यह सब करने के बावजूद देखिए कि उनकी जो नजर है वो कैसी है? ठाकुर क्या कहते हैं? गिद्ध जो है बड़ा हवा में उड़ता तो है बड़ा ऊंचाई पे। किंतु नजर हमेशा रहती है कूड़े के ऊपर में कि जमीन पर कहां कूड़ा पड़ा हुआ है। कहां से वह आकाश में से आएगा कूड़ा खा के चला जाएगा। तो यह कि बातें तो बड़ी-बड़ी होती है किंतु भीतर में सब खाली है। तो धर्म का पालन करना है तो आध्यात्मिकता चाहिए ही चाहिए। और धर्म अर्थात एथिक्स एंड मोरालिटी। अपनी इंद्रियों को थोड़ा संयमित करके सबके साथ में कोऑर्डिनेशन करके कंप्रोमाइज करके रहना। और यदि यह होता है तभी इंस्टीटशंस अच्छे से चलेंगे। और यह इंस्टिट्यूशन है वह कोई भी देश की प्राण है। यदि एक देश में आप देख लीजिए एक देश है। हम दो एक्सट्रीम कंट्रीज का उदाहरण लेते हैं। एक तो है कि अफगानिस्तान। अपने ही नेबरहुड में हम देखते हैं। एक है अफगानिस्तान और यहां पे है चाइना। तो देखिए कि अफगानिस्तान में इंस्टिट्यूशन वाली कोई बात ही नहीं है। वहां पर आप लोग कहेंगे कि हां बड़े धार्मिक है, बड़े धर्म को फॉलो करते हैं। रिलीजन को फॉलो करते हैं। किंतु दो ट्राइबल जो यह है उसके वो ट्राइबल लीडर वो साथ में मिलकर कभी कार्य नहीं करने वाले। क्यों? क्योंकि सदियों पुरानी इनकी राइवलरी, इनकी दुश्मनावट, इनका ब्लड फ्यूड चला आता रहा है। आज से 100 साल पहले आपकी ट्राइब वाले ने हमारी ट्राइब के इस आदमी की हत्या की थी। इसलिए 100 साल तक हम आपके साथ में लड़ते रहेंगे। आप फॉरगिव एंड फॉरगेट वाला कांसेप्ट ही जैसे कि वहां पे नहीं है। तो वहां पे कभी भी कोई स्ट्रांग इंस्टीट्यूशन बने ही नहीं। अनफॉर्चूनेटली और देश की जो हालत है हमारे सामने है। ऑन दी अदर हैंड चाइना में देखिए कि इंस्टीटशंस जो है इतने स्ट्रांग है कि चाइना इकोनॉमिकली मिलिटरीली जियोपॉलिटिकली आज कितना इंपॉर्टेंट कंट्री है इंडस्ट्रियलाइजेशन उसमें कैसा हो रहा है। अभी आप वेस्टर्न
भारत में एक हजार वर्षों तक समर्थ और सक्षम संस्थाओं का अभाव क्यों रहा?
कंट्रीज को देखिए। ये वेस्टर्न कंट्रीज के जो इंस्टीटशंस है इतने स्ट्रांग है। मैं जब छोटा था तो हमारे कोई-कोई रिलेटिव्स अमेरिका से अमेरिका रहते थे तो वापस आके हमको कहते थे कि देखिए म भारत और अमेरिका को कंपेयर करेंगे। ये इंडिया में देखिए आप बस में जाएंगे ट्रेन में जाएंगे तो यहां पर पान फूंक के कोई फेंका हुआ है। यहां पे बस में उठने के लिए आप सब एक साथ में धक्कामुक्की करते हैं। अमेरिका में देखिए एकदम एकदम स्पॉट क्लीन सब कुछ क्लीन है। यदि दो आदमी भी यदि बस में बैठना चाहेंगे, ट्रेन में बैठना चाहेंगे तो यह दो आदमी भी एक साथ में लाइन में खड़े रहेंगे। स्टेमिन डिसिप्लिन के साथ में बस में उठेंगे। ऐसी बहुत सारी बातें मैं बचपन में सुनता था या वहां पे यदि कुछ भी होता है प्रॉब्लम जैसे ही पुलिस में आप फोन करेंगे इमीडिएटली पुलिस वाले आ जाएंगे। बड़े ऑनेस्टली कार्य करेंगे और यहां का तो सबको पता ही है। तो मैं उस समय सोचा करता था कि अच्छा ये भारत की हालत ऐसी क्यों है कि और यदि हम इस थ्यरी को यदि समझे कि स्पिरिचुअलिटी और धर्म होने से इंस्टीटशंस अच्छे चलते हैं तो भारत का भारत में जितना स्पिरिचुअलिटी है, भारत में जितना धर्म है, ऐसा तो शायद ही और किसी देश में होगा। स्वामी जी ने तो कह दिया तो स्वामी जी के बारे में तो बाद में पता चला। किंतु इवन बचपन में भी तो मैं देखता था कि इतने सारे मंदिर है, देरासर है, इतने सारे वो धर्म संस्थाएं हैं, इतने सारे साधु सन्यासी घूम रहे हैं। तो फिर भारत में ऐसा क्यों हो रहा है? तो देखिए कि एक चीज जो शायद हम पिछले 1000 साल में जो एक ट्रेन मिस कर गए हैं। हमने स्पिरिचुअलिटी और एथिक्स और मोरालिटी इसको तो हमने अच्छे से डेवलप कर दिया। किंतु इसको लिवरेज करके जो इंस्टिट्यूशन बिल्ड अप करने हैं वह हम लोग शायद नहीं कर पाए हैं। भारत में सोशल लेवल पर इंस्टीटशंस बड़े ही स्ट्रांग है। किंतु यह सोशल लेवल इंस्टीट्यूशन देखिए कि प्लस भी है माइनस भी है। भारत में जिस तरह से जॉइंट फैमिली है ये संयुक्त कुटुंब प्रथा उसका ये सच में बहुत बड़ा हमारा एक एसेट है क्योंकि मैं खुद जॉइंट फैमिली में बचपन में रहा हूं और मुझे पता है कि उससे जो बच्चों का डेवलपमेंट होता है जॉइंट फैमिली में खास करके जॉइंट फैमिली यदि हारमोनियस होते हैं तो यदि झगड़ा होना शुरू हो जाए तो फिर उससे बुरी जगह और कोई नहीं है। किंतु यदि हारमोनियसली जॉइंट फैमिली चलते हैं तो बच्चों का जो इमोशनल डेवलपमेंट जो होना है बड़ा ही हेल्दी डेवलपमेंट होता है। और अमेरिका में देखिए कि न्यूक्लियर फैमिली न्यूक्लियर फैमिली यानी कि मां पिताजी है और बच्चा है और उसमें भी डिवोर्स यदि डिवोर्स हो गया तो बच्चा सिर्फ मां के साथ में रहता है या सिर्फ पिताजी के साथ में रहता है। इस तरह के बच्चों का इमोशनल डेवलपमेंट बड़ा ही स्टंटेड हो जाता है। क्यों? क्योंकि बच्चे को डेवलप होने के लिए प्रेम चाहिए और प्रेम तभी मिलता है जब कि 4 5 10 15 लोग साथ में रहते हैं और सभी लोग बच्चे को प्रेम करते हैं। यहां पे एक अकेली मां है वो जॉब भी करेगी और फिर बच्चे को क्या करेगी? वह खुद जॉब पे जाएगी तो उसको डे केयर में भेज देगी। अभी डे केयर में ठीक है। वहां पर तो सिस्टम अच्छा ही है। बड़ा अच्छे से बच्चों को केयर किया जाता है। किंतु वो जो मटेरियल जो है चीजें टॉयज है, खिलौने है ये आपको वहां पे गेम्स जो खिलाते हैं वो दिस इज नो सब्स्टट्यूट फॉर मदर्स लव। और रिलेटिव्स लव। नाना नानी, काका, काकी, चाचा, चाची, मामा, मामी ये जो पूरा अपना अमेरिका में वेस्टर्न कंट्रीज में देखिए इतने सारे नाम भी नहीं है रिलेटिव्स के। अंकल और आंटी बस यह यहीं पर खत्म हो जाता है। अपने यहां पे प्रत्येक रिलेशन के लिए एक-एक नाम है। तो यह जो सभी के पास में जो बच्चे को प्रेम मिलता है, इंग्लिश में एक कहावत है। इट टेक्स ए विलेज टू राइज अ चाइल्ड। एक पूरा गांव लगता है एक बच्चे को बड़ा करने के लिए। क्यों? क्योंकि सभी लोग बच्चे को कुछ ना कुछ देते हैं। मुझे याद है मैं जब बचपन में अपनी मां के घर जाया करता था गांव में तो फिर क्या होता था? वहां पे इतने सारे रिलेटिव्स थे। अभी मामा है उनके साथ में एक तरह का रिलेशन है। वो मासी है। उनके साथ में एक दूसरा प्रेम का संबंध है। वो चाची है, चाचा है और नाना नानी है। सबके साथ में एक अलग यूनिक रिलेशन रहता है। और प्रत्येक रिलेशन जैसे कि मेरी इमोशनल हेल्थ के लिए, मेरी इमोशनल स्टेबिलिटी के लिए बड़ा ही आवश्यक है। तो मुझे ऐसा लगता है पर्सनली कि बिकॉज़ कि मैं इतने लविंग एनवायरमेंट में बड़ा हुआ हूं। मैंने तो पहले ही कहा कि मैं तो कोई ऐसा रिलीजियस नहीं था। इवन इवन नाउ मैं अपने को कोई ऐसा ट्रेडिशनल सेंस में रिलीजियस नहीं समझता हूं। मैं वेदांत को फॉलो करता हूं। स्पिरिचुअल प्रैक्टिससेस करता हूं। किंतु जिसको हम ट्रेडिशनली रिलीजियस कहते हैं कि भगवान पर श्रद्धा होना या मंदिर में जाना, विधिविधान करना वह सब चीजों में ऐसा कोई मेरा इंटरेस्ट नहीं है। तो आज भी नहीं है। उस समय भी इतना नहीं था। इनस्पाइट ऑफ दैट यह जो प्रेम जो मिलता है वो इमोशनल डेवलपमेंट में इमोशनल स्टेबिलिटी में इतना आवश्यक है कि यह इमोशनल स्टेबिलिटी एक जब हम में डेवलप होगी तो फिर क्या है? स्पिरिचुअलिटी कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं है। तो यह देखिए कि अपनी यह जो जॉइंट फैमिली प्रथा इट इज अ वेरी पॉजिटिव एस्पेक्ट ऑफ आवर सोसाइटल लेवल जो इंस्टीट्यूशन है उसका और इसका बड़ा भयानक नेगेटिव इंपैक्ट भी हमको पता है यह कास्ट प्रथा जाति प्रथा समाज को इस तरह से इस प्रथा ने डिवाइड करके रखा था कि जब विदेशी आक्रमण स्टार्ट हुए हम ही लोगों को आपस में झगड़ता हुआ देखकर के ब्रिटिश लोगों का जो पॉलिसी है डिवाइड डिवाइड एंड ककर तो उसमें आधा तो हमने ऑलरेडी कर ही दिया था। हमने ऑलरेडी अपने को डिवाइड कर ही दिया था। ब्रिटिश लोगों को सिर्फ अभी हमको ककर ही करना बाकी था। वो डिवीजन जो हमारे थे उसको लिवरेज करके उसी को जैसे कि यूज़ यूटिलाइज करके उन्होंने हमारे पे राज्य किया। यह ब्रिटिश आर्मी जो थी भारत में उसमें ज्यादातर आप सैनिक देखेंगे। हमारे भारतीय ही थे। भारतीय सैनिकों को ही छोटी थोड़ी बहुत सैलरी देकर के भारतवासियों के ऊपर में जुल्म गुजारने के लिए उन्होंने यूटिलाइज किया और भारत में से करोड़ों-करोड़ों हजारों करोड़ों की संपत्ति वे लोग ब्रिटेन लेकर के गए। आज जो यूरोप जो वेस्टर्न सिविलाइजेशन का जो यह मटेरियल फाउंडेशन जो है वेल्थ और उनका यह जो साइंटिफिक इंडस्ट्रियल फाउंडेशन वो तो भारत की वेल्थ पे डला है। भारत से इतना रुपया ये लोग नहीं उठा के जाते तो वहां पे इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन बाद में जिस तरह से चला दो तरह से एक तो भारत में से पैसा उठाया छीना और दूसरा कि वहां की जो इंडस्ट्रियल आउटपुट था जोर जबरदस्ती करके भारत में आकर के सेल करते थे उनको तो फेवरेबल ट्रीटमेंट प्राप्त थी यानी कि लोकल एक भी ट्रेडर कुछ भी सेल नहीं कर पाएगा सब कुछ ब्रिटिश ही चीजें चलेगी तो यह जो विष चक्र ब्रिटेन ने बनाया भारत यहां पे कंगाल हो गया और ब्रिटेन जो है दुनिया की सर्वोच्च सत्ता बन गया। तो ये जो भयानक विष चक्र वे लोग छोटा सा देश है। कैसे करने में कामयाब हुए? क्योंकि हमारे भीतर में भयानक डिवीजन थे। अभी आप कहेंगे
भारतीय समाज में विभाजन का समाधान: एक केंद्रीय संस्था (institution)
कि इसका सॉल्यूशन क्या हो सकता था? उसका एक सॉल्यूशन यह हो सकता था कि सोसाइटल लेवल पर इंस्टिट्यूशन है। उसको बैलेंस करने के लिए उसको कंट्रोल करने के लिए उसमें यह जो आपस में झगड़ा या तो फिर आपस में यह जो यह होता है क्लेश होता है तो आर्बिट्रेच करने के लिए एक सेंट्रल लेवल इंस्टीट्यूशन होना चाहिए था। और यह सेंट्रल लेवल इंस्टीट्यूशन फिर जितने भी सोसाइटल इंस्टीटशंस हैं, लोकल लेवल जितने भी इंस्टीटशंस है, सबके ऊपर में वह एक तरह से बैलेंसिंग करके रखेगा। एक भी इंस्टीट्यूशन या एक भी कास्ट या एक भी ग्रुप दूसरे के ऊपर में अत्याचार नहीं करेगा। दूसरों का शोषण नहीं करेगा। देखिए
एक केंद्रीय संस्था (institution) के लाभ और खतरे: चीन और भारत के बीच तुलना - 1
चीन में खास करके चीन में आज हजारों सालों से यह चीन का एक एपरर होता है। यानी कि चीन में क्या है कि एक सेंट्रल अथॉरिटी है। तो यह सेंट्रल ऑथॉरिटी आप वो आप उनके एपरर का वो लिस्ट बताएंगे ना तो पूरा लंबा उनका एपरर का लिस्ट जाता है कि यह इस समय में इस साल में यह एंपरर था। इस साल में यह एपरर था। इस साल में यह था। भारत में उसका इक्विवेलेंट हमारे पास में ऐसा कुछ नहीं है। यहां पर राजा थे बड़े ही पावरफुल राजा थे। किंतु एक जो पूरे देश को अपने कंट्रोल में ले आकर के प्रत्येक एस्पेक्ट को वे लोग कंट्रोल करें ऐसा कुछ नहीं था। इसका बेनिफिट यह हुआ कि भारत में जिस तरह से स्पिरिचुअलिटी डेवलप हुई है उतना और कहीं पे नहीं हुई। क्योंकि स्पिरिचुअलिटी को डेवलप होने के लिए आपको पॉलिटिकल फ्रीडम चाहिए। यदि एक सेंट्रल अथॉरिटी है तो वह इस तरह से वहां पर वो लॉ ऑर्डर वगैरह तो बनाए रखेगी किंतु पॉलिटिकल जो मेंटल फ्रीडम होना चाहिए वो यह सेंट्रल अथॉरिटी आ जाती है। जैसे कि चाइना में चाइना में एपरर है तो पॉलिटिकल फ्रीडम या तो फिर यह थॉट फ्रीडम, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन, फ्रीडम ऑफ लर्निंग ऐसा ज्यादा कुछ नहीं था। पहले भी नहीं था, आज भी नहीं है। तो चाइना में क्या है कि वैसे डेवलपमेंट तो बहुत हुआ। मटेरियल डेवलपमेंट किंतु वे लोग जो ओरिजिनल ग्राउंड ब्रेकिंग साइंटिफिक कंट्रीब्यूशन है अभी भी नहीं कर पाते हैं और यह स्पिरिचुअल डेवलपमेंट तो उनका हुआ ही नहीं है जितना कंपेयर टू इंडिया कंपेयर टू इंडिया इतना ज्यादा नहीं हुआ है। तो भारत में देखिए कि यह सेंट्रल ऑथॉरिटी नहीं होने के बेनिफिट भी है और उसके डिसएडवांटेज भी हमने देखे हैं।
एक केंद्रीय संस्था institution के रूप में कैथोलिक चर्च: उसके लाभ और नुकसान की चर्चा
वेस्टर्न यूरोप में जाकर के देखेंगे तो हमको पता है कि कैथोलिक चर्च उसका एक सबसे बड़ा बेनिफिट क्या था कि देखिए कि जब यह रोमन एंपायर वो जब डिसइीग्रेट होना शुरू हुआ तो यह कैथोलिक चर्च था जिसने कि एक असेंबलेंस ऑफ सम सॉर्ट ऑफ पॉलिटिकल स्टेबिलिटी किसी एक तरह की पॉलिटिकल स्टेबिलिटी बना करके रखी। किसी एक तरह का सोसाइटी में लॉ एंड ऑर्डर बना करके रखा। दूसरों लोगों को भय दिखा करके पाप का भय दिखा करके नरक का भय दिखा के क्राइम वगैरह जो होता था, राजाओं के अत्याचार होते थे, उसको किसी हद तक संयमित रखा। तो यह चर्च का बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन था और दूसरा उसका जो सबसे बड़ा डेंजर होता है सेंट्रल अथॉरिटी का कि यह लोग जो है इंटेलेक्चुअल फ्रीडम पे बहुत बड़ा आघात करते हैं क्योंकि ये सेंट्रल अथॉरिटी जब भी बनती है उनका एक सबसे बड़ा डर यह रहता है कि यह जो इंडिविजुअल है जो थिंकर्स हैं फिलॉसोफर्स हैं सेंट्स है ये जो करजियस जो लोग होते हैं वे लोग यदि ऐसा कुछ सोचना शुरू कर देंगे जो कि राज्य दद्रोह हो जाएगा या तो हमारी सेंट्रल अथॉरिटी है उस पे अटैक होगा तो यह डर उनको बड़ा सताते रहता है और इसीलिए ऐसे लोग क्या करते हैं जो ओरिजिनल फिलॉसोफर्स होते हैं जो ओरिजिनल थिंकर होते हैं उन पे बड़ा दमन गुजारते हैं। उनके ऊपर में बड़ा ही अत्याचार करते रहते हैं। बोल करके यह कैथोलिक चर्च का जो सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन वेस्टर्न यूरोपियन सिविलाइजेशन में क्या है कि रोमन एंपायर के डिसइीग्रेशन के बाद में जब यह वेस्टर्न यूरोप में चारों ओर से ये वेस्टर्न यूरोप तो नहीं कहेंगे कि यह रोम के ऊपर में चारों ओर से यह बार्बेरियन का हमला होना शुरू हुआ। यह बार्बेरियन में उस समय की यह जो जर्मन ट्राइब्स भी थी। यह फ्रेंच ट्राइब्स भी थी और यहां से एशिया से हुण वगैरह भी गए थे। तो जैसे ही हमला शुरू हुआ तो यूरोप कैथोलिक चर्च ने कैसे भी करके एक स्टेबिलिटी बना करके रखी थी। किंतु उसका जो बहुत नेगेटिव परिणाम क्या आया? डार्क एजेस अंधकार भरा युग। जबकि यह चर्च ने कहना शुरू कर दिया कि बाइबल में लिखा है पृथ्वी 4000 साल पहले बनी है और पृथ्वी ही पूरे यह सोलर सिस्टम का केंद्र है। ब्रह्मांड का केंद्र है। पृथ्वी के आसपास में ही सूरज घूमता है। तो अभी जब यह साइंटिफिक एविडेंस एक्यूमुलेट होना शुरू हुआ। आर्कियोलॉजिकल एविडेंस से पता चला कि यह जो प्राणियों के जो देहावशेष मिल रहे हैं यह जो अस्थियां वगैरह जो मिल रही है वह तो काफी पुरानी लग रही है। तो 4 5000 साल की नहीं यह तो लाखों लाखों साल पुरानी लग रही है। तो उन लोगों को डर लग गया। यहां पर इवोल्यूशन का कांसेप्ट स्टार्ट हुआ। वो चर्च को डर लग गया। फिर यह कोपरनिकस ने गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी सूरज के आसपास घूमती है। नहीं कि सूरज पृथ्वी के आसपास में है। तो वह उनको डर लग गया। तो क्या है कि उन्होंने कैसे भी करके यह जो साइंटिफिक एडवांसमेंट हो रहा था उसको जैसे कि उसको पिंजराबद्ध करने का प्रयास किया। आखिर में सक्सेस नहीं हुए। किंतु देखिए कि वह प्रयास अवश्य हुआ था। तो सेंट्रल ऑथॉरिटी के दो बड़े डेंजर होते हैं। एक तो है कि वो स्टेबिलिटी बना करके रखता है लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम किंतु उसका जो खतरा है किसी भी तरह का माने एक एडवांस लेवल का इंटेलेक्चुअल और ये स्पिरिचुअल जो इवोल्यूशन होता है उसको वो स्टंट कर देता है। उसको वो रोक करके रख देता है। तो देखिए कि अह भारत में
एक केंद्रीय संस्था (institution) के लाभ और खतरे: चीन और भारत के बीच तुलना - 2
अह माने यह दोनों एक्सट्रीम में जा सकते हैं। यहां पे चाइना और यहां पे भारत। चाइना में सेंट्रल ऑथॉरिटी इतनी स्ट्रांग थी कि आखिर में चाइना को जब भी कोई इंटेलेक्चुअल एडवांस करना था। उन्होंने विदेश से उसको इंपोर्ट किया है। वह चाहे धार्मिक एडवांसमेंट है तो बुद्धिज्म को इंपोर्ट किया है। पॉलिटिकल एडवांसमेंट है तो फिर यह मार्क्सिज्म या तो कम्युनिज्म को इंपोर्ट किया है। भारत में उसका रिवर्स है। भारत में सेंट्रल अथॉरिटी के नाम पर ऐसा ज्यादा कुछ नहीं था। तो प्रॉब्लम यह हुआ कि हम लोग हजार साल की गुलामी हमको भुगतनी पड़ी। किंतु साथ-साथ में ही यह जो इंटेलेक्चुअल स्पिरिचुअल एडवांसमेंट होना था वह भारत जैसा भारत में जितना हुआ है उतना और किसी देश में नहीं हुआ। तो देखिए
स्वामी विवेकानंद की इतिहास की गहरी समझ और एक केंद्रीय संस्था institution के लिए उनके विचार और योजना: उदारवादी और गैर-राजनीतिक - 1
कि स्वामी जी का यह जो विजन था हिस्टोरिकल अंडरस्टैंडिंग इतना स्ट्रांग था कि स्वामी जी कहते हैं कि देखिए यदि कोई भी इंस्टीट्यूशन हमको बनाना है तो उसमें सब भूतकाल में जो गलतियां हुई है कि एक तरह का सेंट्रल रिप्रेसिव ऑथॉरिटेरियन इंस्टीट्यूशन यदि बनाएंगे जो कि लोगों के फ्रीडम ऑफ थॉट के ऊपर में आघात करेगा तो यह इंस्टीट्यूशन टेंपरेरी रूप से हमको किसी भी तरह का पॉलिटिकल पावर दिलवा देगा किंतु लॉन्ग टर्म में लॉन्ग टर्म में हमारे पे बहुत बड़ा अत्याचार ही करेगा। तो यह एक उनका इंसाइट था और दूसरा तो ऑब्वियस इंसाइट था ही था कि बिना सेंट्रल अथॉरिटी के बिना एक पावरफुल इंस्टीट्यूशन के भारत का डेवलपमेंट हो ही नहीं सकता। यह अफगानिस्तान जैसा ही कुछ ना कुछ बना रहेगा कि अब जैसे लोकल ट्राइबल इंस्टीटशंस है। अभी यह जब भी विदेशी आक्रमण होता है तो सभी ट्राइब्स अपने-अपने से लड़ती है। उनमें यूनिटी है नहीं बोल के जो कोई भी उन पर आक्रमण करता है बड़े आसानी से कुछ समय के लिए तो वहां पर रह जाते हैं। उनको हरा करके तो क्या है कि यह जितने भी प्लस माइनस है हिस्टोरिकल स्वामी जी को देखने थे और उसके बेस पे उनको इंस्टीट्यूशन बनाना था। तो देखिए कि स्वामी जी का सॉल्यूशन क्या है? स्वामी जी ने कहा कि एक स्पिरिचुअल इंस्टीट्यूशन बनाएंगे जिसका कि एक मेन उद्देश्य होगा कि भारत में जितनी भी ये स्पिरिचुअल स्ट्रीम्स है इतना लार्ज हार्टेड ये स्पिरिचुअल इंस्टीट्यूशन बनेगा कि जितनी भी ये स्पिरिचुअल स्ट्रीम्स है भारत में फिलॉसोफिकल स्कूल्स है सबको यहां पे जैसे एक घर मिलेगा सब लोग इस इंस्टिट्यूशन में आकर के अपनापन महसूस करेंगे ठाकुर के पास में जैसे होता था शाक्त आता था तो कहता था कि यह ठाकुर तो हमारे ही मत के हैं। यह ब्राह्मण समाज वालों ने तो ठाकुर को हमारे ही है मेंबर है। हमारे ही फॉलोअ है बोलकर के प्रचार करना शुरू कर दिया था। और यह वैष्णव है। वे लोग भी मानते थे ठाकुर तो हमारे ही मत के हैं। क्यों? क्योंकि ठाकुर ने सभी मत की, सभी पंथ की, सभी धार्मिक स्कूलों की साधना की थी और उसमें सफल हुए थे और जिसकी जो प्रकृति है उसके अनुसार ठाकुर उपदेश देते थे। कोई ठाकुर के समय में ऐसा कोई नहीं था जो कि ऐसा दावा करें कि ठाकुर के पास में हम गए किंतु हमारी जो अंडरस्टैंडिंग है धर्म की आध्यात्मिकता की उसके अनुसार ठाकुर ने वह हमको उपदेश नहीं दिए। ऐसा हो ही नहीं सकता। तो ठाकुर का ये जो लार्ज हार्टेडनेस है प्रत्येक धर्म को अपने हृदय में स्थान देना वैसा ही लार्ज हार्टेडनेस एक स्पिरिचुअल इंस्टीट्यूशन में होना चाहिए जहां पर सिर्फ भारत की नहीं विश्व की जितनी भी धार्मिक व्यवस्थाएं हैं आध्यात्मिक स्कूल्स हैं आध्यात्मिक प्रथाएं हैं पंथ है सबको यहां पर स्थान मिलेगा। इसीलिए तो ठाकुर ने
श्रीरामकृष्ण की धार्मिक समावेशिता और उदारवाद inclusiveness and liberalism: ईसाई और इस्लाम धर्म की उनकी साधना
सिर्फ भारतीय जितने भी धर्म है उनकी ही नहीं यह इस्लाम और क्रिश्चियनिटी उसकी भी साधना की थी। यानी कि अभी देखिए रामकृष्ण मिशन में बहुत बार लोगों को बड़ी नाराजगी होती है कि हम लोग यहां पे क्रिसमस सेलिब्रेशन करते हैं। मैं एक सेंटर में था तो वहां पे प्रत्येक साल क्रिसमस का अच्छे से सेलिब्रेशन होता था। फोटो-वोटो भी हम लोग लेते थे। भक्त लोग भी काफी आते थे। केरोल्स भी गाए जाते थे। किंतु सडनली कुछ लोगों के मन में एक ऐसा आ गया कि अरे यह तो ज्यादती हो रही है। क्रिश्चियन लोग तो इतना कन्वर्शन कर रहे हैं। यह कर रहे हैं। फिर वे लोग हमारा ही नाम देकर कहेंगे देखिए कि रामकृष्ण मिशन भी तो जीसस का ही तो प्रचार कर रहा है। बोल के उनको जैसे कि फ्यूल देना हो गया। उनको जैसे कि सपोर्ट करने जैसा हो गया। तो फिर वहां पे यह क्रिसमस सेलिब्रेशन को एकदम मिनिमम कर दिया गया। बंद तो नहीं कर सकते। लंबी प्रथा चली आ रही है। किंतु यह सेलिब्रेशन को मिनिमाइज जैसे कि कर दिया गया। तो अभी देखिए कि यह आज के युग में जबकि यह भारत की स्वतंत्रता, भारत का फ्रीडम और भारत में एक जो हिंदू प्राइड है जो कि नहीं था पहले जो कि अभी आजकल वो अच्छे से वो डेवलप हो रहा है। तो हमको ऐसा लगता है कि अरे यह बाकी जितने भी धर्म है उनका प्रचार या तो उनको स्थान हम लोग क्यों दें? कि देखिए कि यह लेजिटमेट क्वेश्चन है और यह प्रश्न होना ही चाहिए। किंतु देखिए कि भारत को यदि बहुत सारे लोग ऐसा कहते हैं भारत को विश्व गुरु होना है। स्वामी जी ने खुद ने कहा कि इंडिया शुड ककर द वर्ल्ड विथ इट स्पिरिचुअलिटी। तो इतना लंबा एम ना भी रखें और सिर्फ हम अपने देश के लेवल पर भी सोें तो देखिए कि 150 करोड़ का यह देश है। यहां पे कितने सारे विभिन्न तरह की साइकोलॉजिस्ट लोगों की होती है। कितने ही तरह की ये मेंटल प्रोफाइल लोगों के होते हैं। कितनी ही तरह की ये लोगों की ये पर्सनालिटीज होती है। ये सभी पर्सनालिटीज को आप कुछ ही दायरों में बंद कर देंगे तो ये भारत का जो ये आज भारत में यूनिटी दिखाई दे रही है वो फिर नहीं दिखाई देगी। ऑलरेडी हम लोग यह लैंग्वेज को लेकर के झगड़ा देख रहे हैं। ऑलरेडी हम लोग यह सब ओल्ड डिवीजन दिख रहा है। भारत में डिवीजन दिखता है ऊपर ऊपर से भीतर में तो बड़ी ही एकता है। किंतु देखिए कि जो सेंट्रल एक इंस्टीट्यूशन आप बनाएंगे उसमें यदि यह लार्ज हार्टेडनेस नहीं होगी तो भारत की ही यूनिटी जो है भारत की जो एकता है उसके ऊपर में सही में खतरा मंडराने लगेगा। क्योंकि
सभ्यता के विकास में केंद्रीय धार्मिक संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका
देखिए कि ये हिस्टोरिकल इंस्टीटशंस होते हैं। आज हम वेस्टर्न यूरोप का स्टडी करें तो पार्टिकुलर किसी एक समय के न्यूज़पेपर खैर उस समय न्यूज़पेपर तो थे नहीं आप यदि हजार साल पहले चले जाएंगे किंतु उस समय में यदि आप रहते होंगे तो आपको लगेगा नहीं कि चर्च का ऐसा कोई रोल है। एक शहर में रह रहे हैं तो शहर के नोबल मैन है, लॉर्ड है, ड्यूक है, नाइट है, वो सोल्जर्स है वहां पे। तो वही लोग सब कुछ चला रहे हैं। मर्चेंट है, ये गिल्ड है। वही लोग सब चला रहे हैं। ऐसा लगेगा। किंतु ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ़ टाइम हिस्टोरिकली देखें तो पता चलेगा कि ये जितने भी लोकल अथॉरिटीज होती है इनका इतना इन्फ्लुएंस नहीं है जितना कि एक सेंट्रल अथॉरिटी चर्च का हुआ करता था।
स्वामी विवेकानंद की इतिहास की गहरी समझ और एक केंद्रीय संस्था institution के लिए उनके विचार और योजना: उदारवादी और गैर-राजनीतिक - 2
तो यदि भारत में भी एक ऐसा इंस्टीट्यूशन स्थापित करें जो कि हिस्टोरिकली एक बहुत ही इंपॉर्टेंट भूमिका वो निभाएगा तो वो इंस्टीट्यूशन को लार्ज हार्टेड होना ही होगा। तो यह स्वामी जी का कांसेप्ट था। एक और इंस्टिट्यूशन बड़ा ही लिबरल होगा। दूसरी और है कि इंस्टीट्यूशन को किसी भी तरह की पॉलिटिकल पार्टी के साथ में पॉलिटिक्स के भीतर में प्रवेश नहीं करना है। क्यों? क्योंकि फिर जैसे कैथोलिसिज्म का जो हाल हुआ कि एक धार्मिक इंस्टीट्यूशन तो है तो सही किंतु क्लेम तो करते हैं कि जैसे भगवान के साथ में हमारा डायरेक्ट रिलेशन है। किंतु फिर दिन प्रतिदिन की घटनाओं में क्या करेंगे? यह राजा क्या कर रहा है? क्या नहीं कर रहा है? किसके साथ शादी करेगा? किसका राज्य अभिषेक होगा? कि क्या उनकी देश की पॉलिसी होगी? सभी चीजों में जैसे कि वह अपनी उंगली डाल रहा है। सभी चीजों में वह इंटरफेयर कर रहा है। तो फिर क्या है? एक बड़ा ही रिप्रेसिव सिस्टम होकर के रह गया था। तो यह प्लस भी हमको मेंटेन करने हैं और माइनस को भीतर में नहीं आना देना है। सेंट्रल इंस्टीट्यूशन का सबसे बड़ा प्लस है। सबसे बड़ा बेनिफिट है कि वो लॉन्ग टर्म स्टेबिलिटी लॉन्ग टर्म एडवांसमेंट हमको देता है। उसका सबसे बड़ा नेगेटिव है कि ये इंटेलेक्चुअल फ्रीडम ये मेंटल फ्रीडम उसको वो शायद रिप्रेस करना शुरू कर देता है एट वन पॉइंट इन टाइम। तो इसका सॉल्यूशन क्या है? लॉन्ग टर्म स्टेबिलिटी के लिए सेंट्रल इंस्टीट्यूशन होगा जो कि बड़ा ही लार्ज हार्टेड होगा। सभी पंथ सभी जाति धर्म उसमें स्थान पाएंगे और दूसरा कि रिप्रेसिव ना हो जाए, शोषणकारी ना हो जाए, अत्याचारी ना हो जाए इसके लिए वह कभी भी पॉलिटिक्स में नहीं जाएगा। तो यह जो कुछ सेंट्रल आइडियाज है, कुछ कोर कांसेप्ट है, उसके ऊपर में स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी। रामकृष्ण मिशन की
रामकृष्ण मिशन का कार्य: आत्मनो मोक्षार्थं जगत हिताय च
स्थापना इस कोर प्रिंसिपल के ऊपर में हुई और उसके बाद में देखिए कि इसका फंक्शनिंग क्या है? इसकी एक्टिविटीज क्या है? एक्टिविटी इज सोली रिलेटेड टू स्पिरिचुअल फील्ड। यहां पे यंग मैन आएंगे और शारदा मठ जहां पे है वहां पे यह यंग गर्ल्स जाएगी और उनको वेदांत और आध्यात्मिकता की प्रैक्टिस करवाई जाएगी। उनको ट्रेनिंग दी जाएगी और इवेंचुअली यही यंग मैन एंड वुमेन गांवगांव शहरश जाकर के वही योग वेदांत और सनातन धर्म और आध्यात्मिकता का संदेश प्रसार करेंगे। तो यह जो है स्वामी जी का कोर कांसेप्ट और किसी भी कीमत पर, किसी भी सिचुएशन में, किसी भी समय में हम लोग पॉलिटिक्स में प्रवेश नहीं करेंगे। क्योंकि यदि टेंपरेरी बेनिफिट आपको पॉलिटिक्स में प्रवेश करके मिल जाएगा। आपको जमीन भी मिल जाएगी, आपको पेट्रोनेज भी मिल जाएगा, आपको यह फंडिंग भी मिल जाएगा, डोनेशन मिल जाएगा, ग्रांट्स मिल जाएगी। फिर आपको रिस्पेक्ट प्रेस्टीज मिल जाएगी। न्यूज़ पेपर वाले सब समय आपके आसपास में घूमते रहेंगे कि स्वामी जी बताइए तो अभी यह बिहार में यह हो रहा है। उसके ऊपर में आपका क्या ओपिनियन है और स्वामी जी बड़े मजे से ओपिनियन भी देते रहेंगे। यह सब कुछ हो जाएगा। किंतु फिर भीतर की स्पिरिचुअलिटी खोखली हो जाएगी और एक समय ऐसा आएगा कि लोग जो सोचते हैं ना लोगों के जो विचार है विचारों से हमको डर लगने लगता है। कभी हमको डर किससे लगना चाहिए? जिसके पास में चाकू है, जो गुनहगार है, जो क्रिमिनल है, जो मर्डरर है, जो दुश्मन है, उससे तो डर लगना चाहिए। किंतु यह सेंट्रल अथॉरिटी को कभी-कभी विचारों से डर लगने लगता है। जो लोग सोचते हैं उनसे डर लगता है। फिर जैसे यह कम्युनिस्ट जो कंट्रीज है वहां पे जैसा होता था क्रिमिनल जो है वो बड़े मजे से घूम रहे हैं। किंतु आपके पास में सोचने की थोड़ी सी भी शक्ति है तो सीधा आपको जेल में डाल देंगे। तो ऐसा भयानक विषम परिस्थिति ना आ जाए उसके लिए किसी भी कीमत पर हमको पॉलिटिक्स में प्रवेश नहीं करना है। तो यह कुछ कांसेप्ट है जिसके ऊपर में स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की है। तो अभी स्वामी जी
भारत का उत्थान: रामकृष्ण मिशन
क्या कहते हैं वो थोड़ा सा हम देखते हैं। यह 17th पॉइंट हाउ टू बेटर इंडिया रामकृष्ण मिशन यह पॉइंट मैंने दिया है। किंतु इसकी जो टेक्स्ट है वो पूरी स्वामी जी की है और ये कंपाइलेशन नहीं है स्वामी जी के लेक्चर की ये एज इट इज यहां पे दिया है। क्या कहते हैं स्वामी जी? देयर फॉर माय फ्रेंड्स माय प्लान इज टू स्टार्ट इंस्टीटशंस इन इंडिया टू ट्रेन आवर यंग मैन एस्पिचर्स ऑफ द ट्रुथ्स ऑफ आवर स्क्रिप्चर्स इन इंडिया एंड आउटसाइड इंडिया। इसलिए मित्रों मेरा प्लान है भारत में इंस्टटशंस का प्रारंभ करना जो कि हमारे यंग मैन जो है उनको प्रीचर्स के रूप में धार्मिक प्रचारक के रूप में ट्रेन करें और जो हमारे शास्त्रों के उपदेश शास्त्रों की अमर वाणी है शास्त्रों के भीतर में यह जो खजाना छुपा हुआ है वो भारत में और विदेश में जाकर के उसको सबके भीतर में उसका प्रचार करें। सबके भीतर में उसको बांटें। मैन मैन दिस आर वांटेड एवरीथिंग एल्स विल बी रेडी बट स्ट्रांग विगरस बिलीविंग यंग मैन सिंसियर टू द बैकबोन आर वांटेड। किंतु यदि आप इंस्टीट्यूशन स्टार्ट करेंगे तो प्रश्न होगा कि व्हाट इज एन इंस्टीट्यूशन? एक ऑर्गेनाइजेशन क्या है? तो ऑर्गेनाइजेशन ना ही उसके अकाउंटिंग सिस्टम है, ना ही यह उसका इंफ्रास्ट्रक्चर है, यह कार है, यह मकान है, यह बिल्डिंग है, उसका बैंक बैलेंस है। यह तो कोई इंस्टीट्यूशन नहीं है। इंस्टीट्यूशन है उसके ये जो मेन पावर तो ये जो ट्रेंड हाइली डडीिकेटेड हाइली इंटीग्रेटेड एथिक्स और मोरालिटी में विश्वास करने वाले स्पिरिचुअल यदि मैन पावर वहां पे नहीं होगा तो इंस्टीट्यूशन ज्यादा चलेगा नहीं इसलिए स्वामी जी इंस्टीट्यूशन के बारे में बात करने के इमीडिएटली बाद में क्या कहते हैं मैन मैन दिस आर वांटेड इंसान चाहिए मनुष्य चाहिए यंग मैन चाहिए यह एवरीथिंग एल्स विल बी रेडी। बाकी सब आ जाएगा। डोनेशन भी आ जाएगा, ग्रांट भी आ जाएगा, स्कूल भी बन जाएगी, हॉस्पिटल भी बन जाएगी, वेद विद्यालय भी बन जाएंगे। यह पब्लिकेशन भी स्टार्ट हो जाएगा, यह बड़ी-बड़ी पॉलीक्लनिक भी बन जाएगी, कॉलेज बन जाएगी, यूनिवर्सिटी बन जाएगी। किंतु जब तक यह स्ट्रांग विगरस बिलीविंग यंग मैन सिंसियर टू द बैकबोन आर वांटेड। जब तक यह स्ट्रांग विगरस और श्रद्धा के भरे हुए श्रद्धावान यंग में नहीं होंगे। सिंसियर टू द बैकबोन। अपनी हड्डी परजंत उनके भीतर में उनकी हड्डियां शुद्ध एकदम ही सिंसियर नहीं होगी तब तक कुछ होने वाला नहीं है। दैट इज व्हाई दे आर वांटेड। इसीलिए यही हमको चाहिए। अ 100 सच एंड द वर्ल्ड बिकम्स
रामकृष्ण मिशन का प्रभाव गुलाब पर गिरने वाली सुबह की ओस की तरह है
रेवोल्यूशन। 100 ऐसे यंग मैन हो तो पूरा विश्व में जैसे कि हम क्रांति ला सकते हैं। अभी यह लास्ट सेंटेंस जो है वो थोड़ा सा देखना है। यह थोड़ा नेचुरली कि इतने हाईली इंटेलेक्चुअल मैन पावर जो है रामकृष्ण मिशन में आप कह सकते हैं कि ऐसा कोई रेवोल्यूशन तो हम लोग लाए नहीं है। हमको तो ऐसा नहीं लग रहा है। किंतु देखिए कि जैसे कि स्वामी जी का ये कोर कांसेप्ट था कि आइडियाज को स्प्रेड करना है नहीं कि ऑर्गेनाइजेशन को। यह बहुत बड़ा डिफरेंस आपको यह कैथोलिक चर्च है और यह रामकृष्ण मिशन है। इसमें आपको समझना है। वहां पे वेस्टर्न कंट्रीज में या तो फिर इवन मिडिल ईस्ट में वगैरह पे क्या वो लोग कहते हैं कि आपको फॉर्मली हमारा धर्म स्वीकार करना है। आपको फॉर्मली हमारी यह जो रिलीजियस सिस्टम है वो चाहे मॉस्क हो ना कि चर्च हो उसका आपको पार्ट होना है। तभी आप हमारे धर्म के कहे जाएंगे। यदि आपने फॉर्मली हमारा धर्म स्वीकार नहीं किया यह बेप्टिज्म या जो भी उनकी सिस्टम है उसके माध्यम से हमारे धर्म में आप फॉर्मली नहीं प्रवेश किए हैं यदि आप हमारे किसी रिलीजियस इंस्टीट्यूशन के साथ में नहीं जुड़े हैं तो आप हमारे धर्म के किस तरह से कहे जाएंगे तो इस तरह का जो एक क्या कहेंगे कि एक फॉर्मल रिक्वायरमेंट है वो रामकृष्ण मिशन में नहीं है हमारे यहां पर दीक्षा होती है किंतु राम रामकृष्ण मिशन के साथ में जुड़ने के लिए ठाकुर मां स्वामी जी की भावधारा को ग्रहण करने के लिए आपको दीक्षा लेनी ही पड़ेगी। ऐसा कंपलसरी कुछ नहीं है। आपको यदि आपके शहर में रामकृष्ण मिशन का आश्रम है तो आपको वहां पर जाकर के अपना नाम रजिस्टर करवाना ही पड़ेगा। अभी यह कल गुरु पूर्णिमा आ रही है तो गुरु पूर्णिमा के उत्सव में आपको पार्टिसिपेट करना ही पड़ेगा। ऐसा कंपलशन कुछ नहीं है। आप यदि ठाकुर मां स्वामी जी के विचारों को भी लेकर के रहे तो भी यहां पे इनफ है। तो यह यहां पे हम पर्सनालिटी को या तो इंस्टीट्यूशन को नहीं प्रोजेक्ट कर रहे हैं। हम लोग प्रोजेक्ट कर रहे हैं आइडियाज को, कांसेप्ट्स को और बेसिक स्पिरिचुअल प्रैक्टिससेस को। इस दृष्टि से यदि देखा जाए तो यह शिव ज्ञान जीवन सेवा का जो आदर्श है जो कि रामकृष्ण मिशन का एक यूनिक आप कहेंगे कि कंट्रीब्यूशन है तो विश्व के बहुत सारी जगहों पे इसको फैला हुआ आप देखेंगे। आज ये जो वेस्टर्न कंट्रीज में फिलेंथ्रोपी का एक जला है एक म एक हवा चल रही है उसके पीछे में भी देखिए कि स्वामी जी का कंट्रीब्यूशन है वो फेमस घटना कि रॉकेफेलर उस समय का आज के जमाने में जैसे ये ईलॉन मस्क ना कि यह जो बिल गेट्स है उस समय का बड़ा धनपति था यह रॉकेलर तो उसने स्वामी जी के बारे में कहीं पर सुना होगा या तो फिर स्वामी जी के बारे में कहीं से उसको पता चला होगा तो एक बार वह स्वामी स्वामी जी को मिलने के लिए आया। तो मिलने के लिए आया तो कुछ डिवोटी बाहर में खड़े थे। एक्चुअल कन्वर्सेशन इन दोनों की क्या हुई वह तो उन्होंने सुना नहीं। किंतु इतना तो सुनने में आया कि स्वामी जी बड़े ही शांत भाव से बात कर रहे हैं और यह रॉकेफेलर जो है वह काफी एक्साइटेड हो गया था और स्वामी जी के साथ में जैसे कि झगड़ रहा था। स्वामी जी के जो कोर कांसेप्ट है कि आप अपने धन के ट्रस्टी हैं। आप उसके ओनर नहीं है। आपको अपनी संपत्ति समाज के कल्याण के लिए उसको यूटिलाइज करना है। नहीं कि अपने बीवी बच्चों को देकर जाना है जिससे कि उनके भोग का मैक्सिमाइजेशन हो। तो स्वामी जी यह शायद समझा रहे थे और यहां पर रॉके फेलर को यह बात जैसे समझ में ही नहीं आ रही थी कि यह एलियन कांसेप्ट कहां से आ गया है तो वह बड़ा एक्साइटेड हो गया था और इसके बाद में ये जो आई विटनेस है उनका कहना है कि वो मीटिंग खत्म करके वह बड़ा नाराजगी के वो भाव से गुस्सा होकर के जैसे कि वह बाहर निकल गया वो रॉकेफेलर और चला गया किंतु हम सबको पता है कि बाद में उसने अपना फाउंडेशन एस्टैब्लिश किया और ज्यादातर संपत्ति जो है उसने उस फाउंडेशन में डाल दी। अभी आजकल यह धनी लोग फाउंडेशन बनाते हैं और यह फाउंडेशन फिलेंथ्रोफी करता है। उसके बहुत सारे उदाहरण आपको विदेशी कंट्रीज में देखने को मिल जाएंगे। अभी यह जो पूरा जो चला कांसेप्ट रॉकेफेलर ने स्वामी जी का उल्लेख कहीं पर नहीं किया है। एटलीस्ट हमारी जानकारी में तो नहीं है। तो अभी हम कह तो सकते हैं कि देखिए कि स्वामी जी के आइडियाज वहां पर पॉपुलर हुए हैं। किंतु स्वामी जी का नाम कहीं पे नहीं है। ये मेरी लुईस न्यू डिस्कवरी में एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पैसेज लिखती है। क्या कहती है कि ये जो आई विटनेस अकाउंट के माध्यम से कि स्वामी जी जब बे एरिया ये बे एरिया अर्थात कि ये कैलिफोर्निया वगैरह कैलिफोर्निया का सान फ्रांसिस्को सिटी तो वहां पे क्या है कि जो अमेरिका का जो कटिंग एज आइडियाज कांसेप्ट जो बादबाद में जो डेवलप हुआ है उसमें कैलिफोर्निया का बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन था। तो यह बे एरिया में जब स्वामी जी प्रवचन देते थे तो इतने सारे थॉट लीडर्स जो होते हैं न्यू एज मूवमेंट्स जो है न्यू थॉट मूवमेंट वाले जितने भी थे प्रीचर्स वहां के होम ऑफ ट्रुथ दिस दैट वो क्रिश्चियन साइंटिस्ट वगैरह-वगैरह जो उस समय के काफी रिवोल्यूशनरी आइडियाज वो रखते थे सब लोग आकर के स्वामी जी के क्लास में शांति से बैठ जाते थे नोटबुक और पेन लेकर के और स्वामी जी जो कहते थे प्रत्येक शब्द यह लोग जैसे कि नोट कर लेते है और बाद में इसी आई विटनेस का कहना है कि जो स्वामी जी के जाने के बाद में यह बे एरिया अर्थात कि यह कैलिफोर्निया में लॉस एंजेलस है ना कि सैन फ्रांसिस्को है ना कि ये सिलिकॉन वैली ना कि ये जितने भी कल्चरल मूवमेंट कटिंग एज एडवांस कल्चरल मूवमेंट प्रारंभ हुई है। उन सबके भीतर में स्वामी जी के आइडियाज का वेदांत के आइडियाज का एक इको है। एक वहां पर प्रकाश दिखाई देता है। भले ही चाहे आप स्वामी जी को पर से एक्सेप्ट ना करें कि स्वामी जी मेरे टीचर है। उनके पास में से मैंने यह सीखा। किंतु ये अभी जितने भी बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बातबाद में देखेंगे कि उन सब अभी ये जो प्रभवानंद जी का उस समय के क्रिस्टोफर ईशरवुड वगैरह के साथ में कैलिफोर्निया में वो म कैलिफोर्निया में जो उनके साथ में एक अच्छा रिलेशन बन गया था। उन सबके पीछे यह स्वामी जी का ही इंपेटस कारणभूत था कि स्वामी जी ने जो इस तरह के रेवोल्यूशनरी इमोर्टल आइडियाज वहां पर स्प्रेड किए बोल के अमेरिका के ये थॉट लीडर्स थे उन्होंने अमेरिकन कल्चर में इसको अपना लिए हैं। तो देखिए कि हम लोग चाहते हैं कि आइडिया स्प्रेड हो। स्वामी जी उस समय ऐसा कर सकते थे। देयर इज अ वेरी इंटरेस्टिंग कन्वर्सेशन बिटवीन स्वामी जी एंड ईटी स्टडी। एक यंग मैन स्वामी जी उस समय लंदन में ही थे। मोस्ट प्रोबेबबली ब्रिटेन में ही थे। तो एक यंग मैन स्वामी जी के पास में आया। कहता है कि स्वामी जी मैं तो आपके प्रवचन वगैरह काफी सुन रहा हूं। एंड आई एम वेरी मच इंटरेस्टेड इनू वेदांत। किंतु आपकी यह जो वेदांत की जो साधनाएं जो है ना सब यह जो स्मरण मनन निधिसन यह राजयोग जो आप सिखा रहे हैं धारणा ध्यान समाधि वगैरह-वगैरह वो तो हमारी जो कैपेसिटी है उससे बाहर है तो आप क्यों नहीं इस तरह के कुछ बेसिक रिचुअल्स खड़े करते जिसको फॉलो करके हम लोग वेदांत में प्रवेश कर पाए तो स्वामी जी को ये आईडिया बड़ा अच्छा लगा क्योंकि ऐसा नहीं है कि हमारी भारतीय सिस्टम में आध्यात्मिक सिस्टम में रिचुअल्स नहीं है इनफ रिचुअल्स है ठाकुर खुद पुजारी थे काली के और विधिवादी ये पूजा तो वह करते थे जब वह कोलकाता में पहली पहली बार आए थे तो अपने बड़े भाई के साथ में मिलकर के घर-घर जाकर पूजा भी करते थे तो वो तो वो झामापुकुर में जब वो उनका टोल था उस समय की बात तो यह वेदांत को विधि के माध्यम से कोई भी एक रिचुअलिस्टिक विधि के माध्यम से एप्रोच करना वह तो हमारे लिए फंडामेंटल हमारे डीएनए में है। तो यह आदमी जो कह रहा है बिल्कुल ठीक कह रहा है। तो स्वामी जी ने इमीडिएटली ये ईटी स्टडी को यह लेटर लिखा। कहा कि इस तरह से एक यंग मैन के साथ में मेरी बात हुई और मुझे लगता है कि उसकी बात ठीक है। हमको कुछ ना कुछ रिचुअल्स डिवाइस कर लेने चाहिए। तो क्या है कि रिचुअल्स के माध्यम से प्रतिदिन संध्या या वगैरह कुछ करके आप आप अच्छे से अब धीरे-धीरे करके आपका माइंड शांत होता जाएगा। तो आप धीरे-धीरे करके धरणा ये जो जप है ध्यान है उसमें प्रवेश कर पाएंगे। तो स्वामी जी ने यह लेटर लिखा सामने ईटी स्टडीज सामने लेटर लिखता है। कहता है कि देखिए स्वामी जी यह थियोसोफिकल सोसाइटी ने जो यहां पर जो सब गड़बड़ की है वो बोलकर के ऑलरेडी हमको पता है कि थियोसोफिक के जो महात्मा वगैरह है वो महात्मा में भी झगड़ा होता था। आपस के उसके जो ऑफिस बियरर्स है उनमें भी झगड़ा होता था। किसी किसी पे पैसा चोरी करने का आक्षेप था वगैरह-वगैरह बोलकर के यह जो हिंदू धर्म का एक अंश जो कि ब्रिटिश सोसाइटी में प्रवेश किया था। थियोसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से वह अभी बेड अभी वो बड़ी ही उसकी प्रेस्टीज बड़ी डाउन हो गई है। वह बड़ा ही उसके ऊपर में लोगों का संदेह हो रहा है। अभी आप ये रिचुअल स्टार्ट करेंगे ना तो ये लोग यही सोचेंगे थियोसोफिकल सोसाइटी जैसा आप कुछ नया कुछ कर रहे हैं और पहले से ही लोग आपको संदेह की दृष्टि से देखें। इसलिए बेटर है लेट अस टिक टू दिस डेवलपमेंट ऑफ आइडियाज। तो उसके रिप्लाई में स्वामी जी ने कहा हां ठीक है तुम जो कह रहे हो वह बात भी सही है। बोल के स्वामी जी ने अमेरिका में ऐसा माने यूरोपियन कंट्रीज में ऐसा कोई स्पेसिफिक रिचुअल स्टार्ट नहीं किया। सो दिस सी ये स्वामी जी के माइंड में भी ये सब डिबेट्स चल रही थी। बेटर है कि हम लोग आइडियाज का प्रचार करें। भले ही आइडियाज चाहे कितने ही नेब्यूलर्स हो। भले ही चाहे आम आदमी इमीडिएटली इस आइडियाज को पकड़ करके वेदांत में प्रवेश ना कर पाए। किंतु ऑलवेज बेटर टू स्प्रेड आइडियाज देन स्प्रेडिंग ऑर्गेनाइजेशन एंड रिचुअल्स एंड ऑथॉरिटी। एंड यह जो पूरी रिप्रेसिव सिस्टम है कि आपको इस विधि करनी है। तभी आप हमारे चर्च के पार्ट हुए। तभी आपको हमेशा यहां पर आना है। तभी आप हमारे धर्म को फॉलो कर रहा है। ऐसा नहीं करके यह जो आइडियाज के लेवल पर ही स्वामी जी ने हमारे इंस्टिट्यूशन को रखा है। भारत में भी देखिए कि भारत की यह जो स्वातंत्र्य संग्राम है भारत का उस समय जितने भी प्रथम पंक्ति के स्वातंत्र्य सेनानी थे यू नेम देम सभी लोग स्वामी जी से प्रभावित थे। वेरी इंटरेस्टिंगली महात्मा गांधी स्वामी जी का दर्शन करने के लिए बेलूर मठ में आए थे। तो उस समय अनफॉर्चूनेटली हुआ ऐसा कि स्वामी जी बीमार थे और बलराम भवन में रह रहे थे। तो बेलूर मठ में उस समय वह थे नहीं। तो स्वामी जी ने महात्मा गांधी ने बेलूर मठ का दर्शन करके वो वहां से फिर चले गए। अब टुडे मैं कभी-कभी सोचता हूं कि गांधी जी और स्वामी जी का मिलन हो जाता और गांधी जी यदि स्वामी जी के आइडियाज म कभी-कभी क्या होता है कि पढ़कर के हमको जितना यह प्रभावित नहीं होते यदि आप उनकी पर्सनालिटी से प्रभावित हो जाते हैं। उनके साथ में पर्सनल कांटेक्ट होने से प्रभावित हो जाते हैं। तो गांधी जी और स्वामी जी का मिलन हो जाता तो पता नहीं ये जो इंडिया की फ्रीडम मूवमेंट है उसमें कितना बड़ा परिवर्तन आ जाता। तो खैर जो भी है तो ये दिस इज यूनिकनेस ऑफ रामकृष्ण मिशन कि आज कहेंगे कि अच्छा रामकृष्ण मिशन कहां पे है? ना ही न्यूज़ पेपर में है ना ही कोई बड़े-बड़े लोग हैं जो कि हमको एंडोर्स करते हैं। ना ही यह स्वामी जी के आइडियाज को हम कहीं पर विजिबली देख पाते हैं। किंतु देखिए कि यह जो स्वामी जी का कांसेप्ट कि सुबह की ओस गुलाब के फूल के ऊपर में गिरती है। गुलाब का फूल परिपुष्ट होता है। किंतु गुलाब के फूल को स्वयं यह नहीं पता है कि उसकी यह शक्ति है, उसकी यह जो ताजगी है, उसकी यह जो एनर्जी है, इसके पीछे में सुबह की ओस कारण भूत है। तो यह जो हमारे आइडियाज बड़ा ही साइलेंटली, बड़ा ही शांति से समाज में फैल रहे हैं। भले ही चाहे कोई हमको एप्रिशिएट करें, ना करें, कोई चाहे हमको रिकॉग्नाइज करें ना करें। कोई चाहे हमको यह एट्रिब्यूट करे ना करे कि यह आइडियाज हमने यहां से लिए हैं। बट स्प्रेडिंग दिस आइडियाज इज द मोस्टेंट थिंग दैट रामकृष्ण मिशन डस। एंड ऑफ कोर्स आइडियाज को स्प्रेड करने के लिए डेडिकेटेड यंग मैन चाहिए। तो जितने ही यंग मैन अपने पास में यह जो हमारा जो पूरा डिस्कशन स्टार्ट हुआ था यहां पे स्वामी जी कहते हैं 100 यंग मैन यदि मिल जाए तो जगत रेवोलशनाइज हो जाएगा। आज देखिए यूनाइटेड नेशंस का चार्टर वैसे बहुत सारे आपको स्वामी जी के ही आइडियाज आपको मिल जाएंगे। सब जगह पे आप देखिए कि फिलथ्रोपी है या लोगों को सहाय करने की बात है। भारत में ही देखिए कि गवर्नमेंट लेवल पे लोगों को सहाय इतनी सारी की जाती है। तो यह क्या है कि सब तरह से सब जगह से कि स्वामी जी के ठाकुर के आइडिया स्प्रेड हो रहे हैं। वी डू नॉट अंडरस्टैंड परहैप्स। हमको ऐसा लगता है कि अरे रामकृष्ण मिशन का कोई इन्फ्लुएंस ही नहीं है। किंतु अल्टीमेटली देखेंगे इन द लॉन्ग रन हजारों सालों की यह जो ये होता है ना रंगमंच वहां पे आपको पता चलेगा कि जिस तरह से आज यूरोप के डेवलपमेंट में हमको कैथोलिक चर्च एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट फैक्टर के रूप में दिखाई देता है। वैसे ही भविष्य की सिविलाइजेशन के डेवलपमेंट में रामकृष्ण मिशन विल कम अप एज वन ऑफ दी मोस्टेंट फैक्टर इन द फ्यूचर। तो आज य तक अभी कल मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।