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Swami Vivekananda Life ·

An Insight into Swami Vivekananda's Life 12 aug 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम तो हमने देखा कि अमेरिका में सर्वप्रथम वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में पार्टिसिपेट करके पूरे अमेरिका में वेदांत का प्रचार करके अमेरिका और लंडन दोनों में वेदा का प्रचार करके स्वामी जी जब भारत आए तो भारत में उन्होंने जो किया उस सर्वप्रथम मैंने फर्स्ट विजिट के बाद की जो भारत की जो उनका जो भारत में उनका जो स्टे है जो वो रहे जनवारी 18971 199 तो यह कितना समय होता है ऑलमोस्ट 97 पूरा 98 पूरा और 99 आधा यानी कि ढाई साल भारत में रुके और इस ढाई साल के दरमियान स्वामी जी ने जो किया उसको हम कितने पीरियड में डिवाइड कर सकते हैं सर्वप्रथम तो ट्रायंफ ऑफ द लॉर्ड ऐसा कहेंगे इसलिए क्योंकि यह एक ऐसा समय था कि जिसमें कि स्वामी जी ने पूरे जिस तरह से अमेरिका में पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन के बाद सदर्न और मिड वेस्टर्न स्टेट्स की मुलाकात करके स्वामी जी ने पूरे गांव-गांव शहर शहर जाकर के वेदांत को वेदांत के बारे में उन्होंने प्रवचन दिए एक एक्जेक्टली वही कार्य उन्होंने भारत में किया जनवरी 97 टू जनवरी 98 ऑलमोस्ट एक साल तक स्वामी जी ने कोलंबो फिर साउथ इंडिया फिर मद्रास फिर कोलकाता दार्जिलिंग कोलकाता अल्मोड़ा भीमताल बरेली अंबाला रावलपिंडी श्रीनगर मुरी फिर वहां से फिर से रावलपिंडी जम्मू सियालकोट लाहौर देहरादून सहरानपुर दिल्ली राजपूताना पूरा फिर खंडवा रतलाम और जबलपुर यदि हम सिर्फ यह काउंट करेंगे अपनी उंगली पर तो उसमें भी हम थक जाते हैं तो उसमें स्वामी जी एक साल में इतना भ्रमण किए वो कितना फिजिकल स्ट्रेन उनके शरीर पर हुआ होगा हम लोग सोच कर के कल्पना भी नहीं कर सकते अभी मैं कुछ ही दिनों पहले राजकोट से यहां पर आया विशाखा पटनम ऑलमोस्ट 24 घंटे का जर्नी था और वो भी एसी गाड़ी में बैठकर तो अभी क्या है कि इतने 24 घंटों में ही मैं इतना थक गया था क्योंकि क्या है एक छोटी सी जगह पर बैठे रहना है तो आपको और फिर वहां पर वो क्या वो सैनिटेशन की क्या परिस्थिति होती है हमको तो पता है अभी रेलवे में तो आज यदि यह परिस्थिति है तो उस समय जो रेलवे जर्नी थी या फिर जर्नी बाय रोड ये कितनी डिफिकल्ट होगी फिजिकली कितनी स्ट्रेन उस होगी वो तो हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते तो उस समय में स्वामी जी गाव गांव शहर चहर घूमे एक साल में ऑलमोस्ट पूरा भारत घूम लिए तो यह और फिर फिर बात यह नहीं है कि जर्नी का जो ट्रेन है उसके बाद में जहां पर डेस्टिनेशन तक जाना है उसके बाद में तो उनको उपदेश देना है प्रवचन देना है और स्वामी जी के प्रवचन तो पता है ना वो कैलिफोर्निया में वोह किसी ने कहा कि स्वामी जी आपका जो समय होता है निर्धारित समय प्रवचन का उससे तो कहीं ज्यादा आप बोल लेते हैं तो इतना समय क्या श्रोता लोग बैठे रहेंगे तो अभी क्या है कि स्वामी जी को तो पता है कि जो श्रेष्ठ वक्ता होते हैं वह जब बात करते हैं तो सामने वाले का मूड समझ लेते हैं सामने वाले का भाव समझ लेते हैं ऑडियंस का वो समझ कर के ही बात करते हैं ऐसा नहीं है कि वहां पर लोग सो रहे हैं या उन्हें यह हो गए हैं बोर हो गए हैं यहां पर स्वामी जी बोलते रहे ऑडियंस के साथ में लाइव कनेक्शन होता है तो स्वामी जी को तो पता है कि वो जो बोलते हैं सब लोग एकदम स्थिर होकर के मन लगा कर के सुनते हैं यह बात उनको पता है किंतु अभी जिसने कहा ऐसा तो मिस्टर एलन ने ऐसा ही को है तो स्वामी जी ने कहा अच्छा ठीक है चलो एक काम करना जब समय समाप्त हो जाता है तुम इस तरह से वो जो उस समय वो जो पॉकेट वो चाती थी ना एक छोटी सी चैन होती है चैन के बाद में एक डायल जैसा होता है वो कोट के पॉकेट में उसको डाल देते हैं तो डायल जो है वो बाहर रहता है और चैन भीतर में होती है तो तो इस तरह से पॉकेट वच आती है तो स्वामी जी ने कहा कि जब समय समाप्त हो जाएगा तो एक काम करना कि इस तरह से वो मिस्टर एलन ही थे मोस्ट प्रोबेबली उनको कहा कि सबसे पीछे में खड़े रहना ऑडियंस के और फिर ये ऐसा वो अपना जो वच है रिस्ट वच जो ऐसा वो चैन वाला उसको ऐसा करके घुमाना मेरे सामने चैन से तो मैं समझ जाऊंगा कि समय समाप्त हो गया प्रवचन का तो अच्छा ठीक है स ठीक हुआ और स्वामी जी तो बोलते ही गए बोलते ही गए जब समय समाप्त हो गया तो मिस्टर एलन ने ऐसा करके वो घड़ी उनके सामने घुमाया वो पीछे से खड़े रह ग तो स्वामी जी ने घड़ी देखा तो स्वामी जी कहते अच्छा अच्छा ठीक है चलो अभी तक तो समय समाप्त हो गया अभी तक तो मैं सिर्फ पूर्व भूमिका बना रहा था अभी तो मैं विषय वस्तु पे आता हूं बोल कर के उन्होंने और एक दो घंटा प्रवचन आगे खींच लिया तो क्या है कि स्वामी जी तो सिर्फ ये नहीं कि 1015 लोगों को इकट्ठा करके उनको समझाए कि हां रामकृष्ण मिशन की स्थापना करनी है और फिर इस तरह से सेवा कार्य करना है जो कि अमेरिकन कार्य में और भारतीय कार्य में यह एक डिफरेंस था अमेरिकन लोगों को विदान सिखाना था उनको साधना की ओर ले जाना था क्योंकि वह रजस की चरम सीमा पर बैठे थे जबकि भारत की जो परिस्थिति थी तम स्वरूपी गड्ढे में गिरा हुआ था हमारा भारतीय युवा धन और इन लोगों को रजस की सीढ़ी देकर के इस गड्डे में से बाहर निकालना था तो सर्व प्रथम तो अपना जो स्वार्थ है अपनी जो भोग वासना है अपना मतलब जो भी रेजेंटमेंट जो बिल्ड अप होता है यंग लोगों के वह सब त्याग करके थोड़ा सा निष्काम सेवा तो करे तब कहीं जाकर के मन की शुद्धि होगी और साधना के उच्च आयाम के लिए वे लोग तैयार होंगे तो वो नहीं और फिर बस वो साधना की बातें आप करेंगे तो यह लोग कहां से सुनने वाले हैं तो स्वामी जी को यहां पर सिर्फ वेदांत का जो सार है शिव ज्ञान जीव सेवा वो सिर्फ प्रस्थापित नहीं करना कि साथ में रामकृष्ण संघ के विभिन्न जो ये शाखा केंद्रों के बीच भी डालने हैं आज हम देखिए कि जहां-जहां स्वामी जी गए हैं जहां जहां पे मलब प्रव्रज्या करने के समय भी और इस तरह से भारत वापस आने के बाद में भी जहां-जहां पर उन्होंने प्रवचन दिए जहां-जहां की उन्होंने मुलाकात ली वहां वहां पे ऑलमोस्ट स प्राय सभी जगहों पे एक ना एक सेंटर बना हुआ है या तो अपना ऑफिशियल सेंटर होगा या तो फिर भाव प्रचार का होगा अभी रिसेंटली ही अहमदाबाद में एक सेंटर फिर से नया शुरू हुआ वहां पर भाव प्रचार का सेंटर बहुत दिनों से था तो वही अहमदाबाद स्वामी जी गए थे लिड़ीं स्वामी जी गए थे तो वहां पर अपना सेंटर है टवान में नहीं है यह मैं गुजरात की बात कर रहा हूं तो मैंने जहां कि मुझे पता है तो उन्हें ऑलमोस्ट देखेंगे कि धीरे-धीरे करके जहां जहां स्वामी जी गए जिस जगह पर रुके जिन लोगों से मिले उनको केंद्रित करके हमारे शाखा केंद्रों की शुरुआत हुई है और हो रही है तो ये तो स्वामी जी को करना था सो और फिर देखिए कि यहां पर दूसरी भी बात है कि मैंने ये जो पार्टिकुलर टाइटल दिया ट्रायंफ ऑफ द लॉर्ड लॉर्ड अर्थात श्री रामकृष्ण देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में हमको पता है कि ये रामचंद्र दत्त वगैरह कहते थे कि भगवान राम कृष्ण ने तो ऐसा तुम लोग घर त्याग करके सन्यास धारण करके तपस्या करो ऐसी तो कोई बात हमको कहीं नहीं है उन्होंने कहा कि कीर्तन करो कीर्तन में अपना सर्वस्व कुछ भूल जाओ कीर्तन करते करते तो वो तो हम नगर कीर्तन करते हैं सुबह को सब गृहस्थ लोगों को इकट्ठा करके चर्चा विचारणा करते हैं ठाकुर के उपदेश के बारे में मास्टर महाशय ने तो ठाकुर के कथामृत पब्लिश करना उस समय शुरू नहीं किया था मैंने वो सब चल रहा था ये रामचंद्र दत्त फिर यह जो कुछ कुछ लोग थे सुरेंद्र सेन इन लोगों ने शुरुआत की थी ठाकुर के उपदेश और जीवनी प्रकाशित कर ने की और अपनी दृष्टि से तो यह सब हम लोग कर रहे हैं तो यह लोग वराह नगर में क्यों इस तरह से ठाकुर की अस्थिया रख कर के उनकी पूजा कर रहे हैं मने यह एक एक तरह का विद्वेष कटाक्ष मय विद्वेष यह सब यंग गुरु भाइयों के प्रति था त्यागी सन्यासियों के प्रति यह कुछ कुछ गृहस्थ का सभी का नहीं था कुछ कुछ का था तो इस समय स्वामी जी का अमेरिका से विश्व विजय होकर के आना दिस इज अ प्रूफ कि ठाकुर ने यह जो त्यागी संतानों को जो कहा था कॉलेज में पढ़ते हुए लड़कों को अलग से बुला करके उनको जो उपदेश दिया था और इन लोगों का और एक था सिर्फ बात यह नहीं है कि संघ बद्ध होकर के तपस्या करनी इन लोगों के पास में और एक महाशक्ति थी श्री श्री मां स्वयं जबकि रामचंद्र दत्त वगैरा मां को रिस्पेक्ट करते थे कि वो गुरु पत्नी है तो उनको तो रिस्पेक्ट करना ही चाहिए किंतु श्री राम कृष्ण जैसे कि अवतार है तो मां शारदा स्वयं महाशक्ति आध्या शक्ति जगदंबा का ही एक किरण है पृथ्वी के ऊपर में इस तरह से तो वो स्वीकार नहीं करते थे मैंने तो एटलीस्ट रामचंद्र के किसी भी बायोग्राफी में या ऐसा मैंने पढ़ा नहीं है कि मां के प्रति उन्होंने कोई विशेष श्रद्धा व्यक्त की को यह सिर्फ स्वामी जी का ही स्वामी जी ने सबसे पहले मां को पहचाना था यहां तक की कुछ कुछ गुरु भाई भी मां को नहीं पहचान पाए थे जैसे कि विज्ञानानंद जी महाराज मां आई है उस समय वो शायद ये बेलून मट के या तो फिर की ही कोई घटना है मां आई है कलकाता में जयराम बाटी से तो स्वामी जी ने कहा विज्ञान महाराज को कि जाओ जाकर के मां को प्रणाम करके आओ तो विज्ञान महाराज गए और फट करके प्रणाम करके वो वापस आ रहे देखा कि पीछे में ही स्वामी जी खड़े हैं बेचारे घबरा गए स्वामी जी पीछे पीछे आ रहे थे देख रहे थे कि विज्ञान महाराज क्या करते हैं फिर बोला कि अरे पेशन साष्टांग प्रणाम करो ने साष्टांग प्रणाम करो माप क्योंकि वो तो जगदंबा मने यदि हम ठाकुर को अवतार मानेंगे तो फिर ठाकुर की जो लीला संगिनी जो होगी वो अध्याशक्ति जगदंबा क्यों नहीं होगी वो क्या कोई सामान्य गांव की नारी थोड़ी ना होगी तो ये जो रिकॉग्निशन था वो सर्वप्रथम स्वामी जी के पास में आया था देखेंगे कि स्वामी जी ने अमेरिका से जितने भी पत्र लिखे हैं अपने गुरु भाइयों को के लिए उद्बोधन मायरवार्ड्स था इन त्यागी संतानों का जो कि बाकी कुछ कुछ गृहस्थ लोग है गृहस्थ भक्त है उन लोगों ने इसको मने इसके बारे में मस्करी हंसी मजाक ऐसा सब करते थे यह तो एक बात है फिर यह जितने भी बाह्य शक्तियां है ब्राह्मण समाज है वगैरा ब्राह्मण समाज वाले अपने अखबार पत्र में न्यूजपेपर में सब जगह पर प्रवचन देकर कहते थे कि अरे राम कृष्ण परमहंस को यह परमहंस महाशय को तो बड़ा हम ही ने किया है वो केशव सेन ने ही उनके बारे में प्रचार किया है वरना श्री राम कृष्ण को कौन पहचानता था अभी केशव सेन खुद ठाकुर के पास में आकर के धन्य हो गया वो नहीं ठाकुर की मह इसलिए है क्योंकि केशव ने उनका प्रचार किया केशव उनको सन्मान देता था तो यह जो सब लोग थे कि रामकृष्ण संघ यानी कि त्यागी सन्यासी और श्री रामकृष्ण स्वयं उनको एक तुच्छ ता शिल्य करते थे उनकी अवगणना करते थे अवहेलना करते थे उनके चेहरे पर एक मने एक चाटा मारने के समान जब स्वामी जी अमेरिका से विश्व विजय होकर के लौटे और जितने भी थे साउथ इंडिया के वगैरह स्वामी जी के रथ के घोड़े को छोड़ कर के उन्होंने अपने हाथों से स्वामी जी के रथ को चलाया राजमार्ग के ऊपर में ये दिस इज अ साइन के हां स्वामी जी ने जो कहा और स्वामी जी का जो इंटरप्रिटेशन था ओम श्री राम कृष्ण ओम श्री मां शारदा देवी ओन इन जनरल सन्यासी मोनेस्ट्री ट्रेडीशन मोनेस्ट्री ऑर्डर ये सब कुछ सही निकला यहां तक कि स्वामी जी के कुछ कुछ गुरु भाई भी वहां पर थोड़ा सा यह आश्चर्य चकित इस बात से हो गए थे कि स्वामी जी क्यों इस तरह से वेदांत की बातें करते हैं या तो फिर यह शिव ज्ञान जीव सेवा यह सब क्या है अखंडानंद जी यह जो सब रिलीफ एक्टिविटी मुर्शिदाबाद उससे पहले काठियावाड़ वगैरह जो उन्होंने प्रारंभ किया था गरीबों के लड़कों को यह पढ़ाई लिखाई करवाने यह सब क्यों करवाते हैं इसका तो हमारे ठाकुर के जीवन से हमारे जीवन से इसका क्या प्रयोजन है क्या संबंध है तो जितना भी क्रिटिसिजम था जितना भी एक तुच्छ ता चल्य एक अवहेलना थी सबके मुंह बंद हो गए क्योंकि स्वामी जी का जो इंटरप्रिटेशन है ओम श्री राम कृष्णा ओम वेदांत ओम मां शारदा वह आखिर में विश्व विजय हुआ तो यह जो फिर सिर्फ विश्व विजय होकर के वापस आना है और फिर आराम से बैठ कर के अपने शिष्यों से गुरु भाइयों से घेर कर के गंगा के किनारे जमीन लेकर फिर अभी बाकी का जीवन शांति से बिठाना बिताना है स्वामी जी के नसीब में यह सब तो था नहीं उनको तो भारत के प्रत्येक गांव शहर और यह जहां पर भी उनको देखा की पोटेंशियल है रामकृष्ण संघ के बीज डालने थे तो इसीलिए यह पूरा एक साल का भ्रमण इतनी सारी कहानियां इस पीरियड में है उसके बाद में मठ में वो रुके फिर जो कि अ यह फर्स्ट जनवरी को उन्होंने रामकृष्ण संघ की रामकृष्ण मिशन एसोसिएशन की स्थापना की बलराम भवन में जो कि आज भी हमारे संग में स्थापना दिवस के रूप में उसको मनाया जाता है फिर दार्जिलिंग गए फिर प्लेंग रिलीफ स्टार्ट हुआ यह जो तब तक यह जो उनके जो वेस्टर्न डिसाइल थे अच्छा स्वामी जी के साथ में वेस्टर्न डिसाइल्स कौन-कौन आए थे सर्वप्रथम मिस्टर एंड मिसेस सेवियर और ये गुडविल और इसके बाद में यह बाकी के तीन लोग आए ये जो मिसेस ओली बोल जोसेफाइन मैक्लाउड और निवेदिता यह तीन लोग बाद में आए तो यह जब प्लेग रिलीफ स्टार्ट हुई थी उस समय निवेदिता थी निवेदिता और स्वामी जी के शिष्य सदानंद इन दोनों ने मिलकर के खास करके प्लेग रिलीफ की नेतृत्व उन्होंने किया था उसके बाद में फिर हिमालय पंजाब काश्मीर पिलग्रिम मेज टू अमरनाथ और फिर से काश्मीर में वापस ये अमरनाथ जो पिलग्रिम है नॉर्थ इंडिया में ट्रेनिंग ऑफ द वेस्टर्न डिसाइल्स यह बहुत ही इंपोर्टेंट पीरियड क्योंकि यहां से निवेदिता की डायरीज शुरू होती है वांडरिंग्स विथ स्वामी विवेकानंद ये किताब है फिर माय मास्टर यह जो दूसरी किताब है मास्टर एज आई सो हिम मास्टर एज आई सोम ये दूसरी किताब है यह सब किताबों में और निवेदिता के पत्रों में हम एक वेस्टर्न डिसा पल की दृष्टि से स्वामी जी को देखते हैं स्वामी जी को देखने के बहुत सारे दृष्टिकोण है एक पक्का भारतीय एक पक्का हिंदू वेदांती शिष्य स्वामी जी को किस तरह से देखता है स्वामी जी की बातों को किस तरह से ग्रहण करता है वो स्वामी जी उस उसको किस तरह का उपदेश देते हैं वो स्वामी शिष्य संवाद में मिलेगा शरद चंद्र चक्रवर्ती को पढ़ कर के और वेस्टर्न डिसाइल को स्वामी जी किस दृष्टि से देखते हैं स्वामी जी उनको किस तरह का उपदेश देते हैं यह निवेदिता को पढ़कर के समझ में आएगा यह जो दो किताब है मास्टर एज आई सो हिम और यह शरद चंद्र चक्रवर्ती का स्वामी शिष्य संवाद यह दोनों साथ-साथ में पढ़ेंगे तो हमको कितना एक बड़ा कंट्रास्ट समझ में आएगा और तीसरा एक है कि यह जो स्वामी जी के जो लेटर्स टू इस गुरु भाई अमेरिका में रहते रहते अपने गुरु भाइयों को बंगाली में जो कुछ लेटर्स लिखे स्वामी जी ने उससे पता चलेगा कि स्वामी जी अपने गुरु भाइयों को किस तरह से शिक्षा देते हैं उनको किस तरह से ट्रेन करते हैं और फिर ये मद्रासी डिसाइल्स ये उन लोगों को स्वामी जी कैसे ट्रेन करते हैं यानी कि सभी के दृष्टिकोण से अब स्वामी जी को देखिए कितने विभिन्न विभिन्न एस्पेक्ट है जैसे कि एक हीरा होता है ना जिसके कि 1000 मतलब 1000 फैसेट होते हैं जो हीरे का वो जो एक ये होता है वो जो पार्ट उसको फैसेट कहते हैं तो थाउ फैसेट माने वो जो बड़े-बड़े हीरे होते हैं उसमें इतने सारे फेसट्स होते हैं जैसा जैसा आप हीरे को गोलगोल घुमाएंगे प्रत्यक फैसेट से डिफरेंट डिफरेंट कलर का वो दिखेगा आपको प्रकाश तो स्वामी जी भी इ लाइक ए सहस्त्र दल पद्म एक एक दल जो है उसमें एक एक नई बात है विभिन्न विभिन्न लोगों के लिए तो इस तरह से कंट्रास्टिंग स्टडी मैंने कुछ कुछ किया है कुछ अच्छे इनसाइट्स भी है एक बार शेयर करेंगे साथ में बैठ के कि निवेदिता को कैसे समझाते हैं और यह शरदचंद्र चक्रवर्ती को शरद चंद्र चक्रवर्ती अर्थात की एक जिसको कहते हैं ना बिल्कुल ऑर्थोडॉक्स ब मीन कुल में उसका जन्म हुआ था और निवेदिता है शी इज अ रेबेल मने किसी भी तरह के नियम कानून में वो बंधित बंधित नहीं है यहां तक कि ब्रिटिश राज को भी वो मने उसके ऊपर में उनके साथ में वो बड़ जाएगी उनके साथ में झगड़ा कर लेगी तो ये जो एक है रिबेलियस नेचर वेस्टर्न एजुकेटेड हाईली टैलेंटेड और यह है कि अपना एक ऑर्थोडॉक्स एक सुंदर एक घटना है कि स्वामी जी दोनों को लेकर के कहीं पर जाते हैं निवेदिता है और शरदचंद्र चक्रवर्ती है देखिए कितना कंट्रास्ट है तो स्वामी जी ने कहा कि इसके साथ में वो जब कुछ किसी ने नाश्ता लाया खाने के लिए तो स्वामी जी ने इसको बोला शरद चंद्र को कि बेठो नाश्ता करो हमारे साथ में तो वो थोड़ा सा ये ये कर रहा है हिच किचा रहा है स्वामी जी तो थे ठीक है स्वामी जी के साथ में नाश्ता करने में कोई आपत्ति नहीं वहां निवेदिता भी बैठी है वो तो विदेशी नहीं है उसके साथ में खाना खा कर के तो फिर वो तो अपनी नात के बाहर हो जाएगा उस समय तो था ना कि नात जात का इतना था ये विदेशी जी बोरे हैं मलेच्छ है काला पानी क्रोस करके आए हैं उनके साथ में खाना खाना मतलब कि पता नहीं क्या फिर वो नाथ वाले बाहर कर देंगे बहिष्कार कर देंगे ये वो सब तो बेचारा वो हिच किचा रहा है तो स्वामी जी ने कहा अरे बैठो खाओ तो फिर अभी क्या करें स्वामी जी का आदेश है तो ठीक है उनके साथ में बैठ कर के खाना नाश्ता किया और पानी भी पिया अभी मठ में वापस जाने के बाद में स्वामी जी ने सबको कहना शुरू किया कि ये जो बामुन है बामुन का लड़का ये ब्राह्मण का लड़का इसने निवेदिता के साथ में बैठ के पानी पिया है ये नाथ बाहर हो गया है अभी अभी इसका कुछ होने वाला नहीं देखो अभी क्या होता है वो घर जाने से तो फिर सब लोग क्योंकि क्या है कि वो शरद चंद्र थे ऐसे थोड़े से हम वैसे तो स्वामी जी के प्रति बड़े ही निष्ठावान थे किंतु क्या है ना कि वो एक फनी नेचर होता है ना सब लोगों को पता है कि ये इस बात का इसको बड़ा सेंसिटिव है इस पार्टिकुलर बात के बारे में तो इसको फिर ये लोग उसी बात को लेकर के उनकी मजाक करेंगे तो सब लोग इनकी मजाक करना शुरू कर दिए तोब ये शरद चंद्र कहता है थोड़ा सा नाराज हो कर के महाशय स्वामी जी को कहता है कि मैंने तो आपने जो कहा वैसा ही किया है अभी यदि नाथ बाहर हो जाता हूं तो हो जाता हूं अभी मैं क्या करू ये दोनों के बीच में जो कंट्रास्ट था वो सिर्फ इस तरह से बाह्य दृष्टि से नहीं स्वामी जी उनको किस तरह से क्या सिखाते हैं क्या समझाते हैं दैट इट सेल्फ इज समथिंग रिली रामकृष्ण मिशन में एक चीज देखिए कि वो है डाइवर्सिटी विभिन्न विभिन्न जगह से विभिन्न विभिन्न तरह के लोग आते हैं हम लोग लोग ये नहीं कहते बहुत सारे संघ संप्रदाय या तो फिर ऑर्डर्स ऐसे होते हैं वहां पे एक पार्टिकुलर तरह की ही विचारधारा चलेगी वहां पे पार्टिकुलर नात से जात से या कास्ट से ही लोग आएंगे अभी जैसे कि कुछ कुछ आपको दिखेंगे कि ऐसे कुछ ऑर्डर है जिनके कि फाउंडर्स जो अमेरिका में यात्रा किए थे तो फिर वहां पे पूरा विदेशी तरह का ही आपको एक सिस्टम देखने को मिलेगा कोई कोई जो फाउंडर्स होते हैं स्थापक संघ के वो भारत में ही रहे हैं काफी ऑर्थोडॉक्स उनका लाइफ रहा है तो उनके जो फॉलोअर्स होते हैं वह भी काफी ऑर्थोडॉक्स होते हैं जबकि स्वामी जी का ठाकुर का देखिए कि लिबरल हो ना कि ऑर्थोडॉक्स हो फॉरेनर्स हो ना कि इंडियन हो नॉर्थ हो ना कि साउथ हो ईस्ट हो ना कि वेस्ट सब तरह से सब तरह की विचार सरणी वाले विभिन्न तरह की ये थिंकिंग प्रोसेस वाले लोग आपको यहां पर मिलेंगे सब समय साथ में सब लोग शांति से रहना ऐसा थोड़ा सा मुश्किल होता है कहीं कहीं पर कुछ ना कुछ प्रॉब्लम भी होता है किंतु ओवरऑल जद देखेंगे इन जनरल जद देखेंगे तो सभी के लिए सभी के लिए द्वार यहां के उन्मुक्त है यहां के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं तो यह जो लिबरलिज्म जो था ये इसको हम लोग खास करके इन दोनों का लाइफ और टीचिंग कंट्रास्ट करके हमको समझ में आता है निवेदिता और शरद चंद्र का तो इसके बाद में माने वो जो पूरा पीरियड था कि अपने वेस्टर्न डिसाइल के साथ में स्वामी जी नॉर्थ इंडिया की मुसा जर्नी किए कश्मीर में रुके उसके बाद में अमरनाथ गए अमरनाथ की कितनी सुंदर कहानियां है निवेदिता स्वामी जी से थोड़ी सी नाराज हो गई थी उस समय स्वामी जी के साथ में फिलोसॉफिकल डिस्कशन जो चल रहा था उसमें वो कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं वो शी वाज डिसेटिस्फाइड आखिर में अमरनाथ गुफा की यात्रा अमरनाथ में स्वामी जी को भगवान शिव का दर्शन हुआ इच्छा मृत्यु का वरदान मिला निवेदिता के साथ में फिर आखिर में एक कुछ दिन ऐसे हुए स्वामी जी ने सोचा कि इन सबसे मैं दूर चला जाता हूं ये जितने भी वेस्टर्न डिसाइल्स है और जितने भी उनके जो साथी थे तो सबसे अलग जाकर के उन्होंने कुछ दिनों के लिए खीर भवानी वगैरह जाकर के तपस्या की खीर भवानी में वो फेमस दर्शन सब बातें जो है इस समय में हुई थी मे 18981 मे टू मे जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्टूबर पांच से छ महीने में ये सब घटनाए हुई उसके बाद में बेलूरमठ कोलकाता वापस आए बेलूरमठ की स्थापना हुई बैधनाथ गए और फिर वापस आकर के कोलकाता वापस आकर के अपने शिष्यों से अपने गुरु भाइयों से और यह अपने एडमाइन साथ में रह कर के स्वामी जी ने अपना उपदेश अपना मैसेज देने की शुरुआत की वह जो था अक्टूबर टू जून 18999 ऑलमोस्ट और दूसरा एक सा का ऑलमोस्ट पीरियड होगा उसके बाद में जो हुआ स्वामी जी का सेहत बिगड़ता ही गया बिगड़ता ही गया उस समय डॉक्टर ने कहा कि चाहिए आप एक काम कीजिए दूसरी बार विदेश यात्रा कर लीजिए शायद ऐसा हो सकता है कि समुंदर की हवा से आपकी स्वास्थ्य उन्नति हो तो उसके लिए स्वामी जी फिर से निकले भारत से साथ में थी निवेदिता और हरि महाराज रयान जी महाराज यह जो सेकंड मिशन टू द वेस्ट है क्योंकि वैसे तो बात थी कि स्वास्थ्य दार के लिए आरोग्य लाभ के लिए ये जर्नी है किंतु स्वामी जी के लिए आरोग्य वगैरह कहां अभी ये जीवन में जो भी है सब तो ठाकुर को समर्पित है अभी अगला जो जीवन होगा शायद उस समय आरोग्य की बात सोची जाएगी तो जो स्वामी जी वैसे निकले तो सही आरोग्य लाभ के लिए किंतु उसके बाद में जो सबसे इंपोर्टेंट फेज था स्वामी जी के जीवन का मेरी दृष्टि से जो कैलिफोर्निया में स्वामी जी ने मैसेज दिया वो अभी उनके सामने था और कैलिफोर्निया जाना भी कैसा हुआ वो भी एक पूरी बात है तो अभी यह जो सेकंड मिशन टू द वेस्ट जून 99 टू नवंबर 1900 ये जो डेट लिखा है गलत है 1890 नहीं होगा 1900 होगा तो जून से ऑलमोस्ट डेढ़ साल की यह सफर रही और यह डेढ़ साल में स्वामी जी ने सबसे पहले तो ओशन वॉयज उसके बाद में लंडन में रुके लंडन में निवेदिता के घर वगैरह गए थे और यहीं पे ईटी स्टडी के साथ में जो सब प्रॉब्लम्स थे यह सब स्टार्ट होते हैं स्टडी स्वामी जी को नहीं मिला और स्वामी जी ने वो जो फिर क्या फर उल्टा पुल्टा बोल कर के स्वामी जी को लेटर लिखे कि आपका तो बड़ा ही लग्जरियस लाइफ स्टाइल है ये वो हिंदू सन्यासियों की तरह आप नहीं रहते तो फिर स्वामी जी ने उसका उत्तर भी दिया वो हमने पहले एक बार डिस्कस किया है इसके बाद में जब स्वामी जी अमेरिका आए तो उनके लिए वहां पे जोसेफाइन मैक्लाउड ये जो मिस्टर एंड मिसेस फ्रांसिस लगेट इन लोगों ने ठीक करके रखा था कि स्वामी जी को विश्राम के लिए रिचली मैनर ले लिया ले जाया जाए तो स्वामी जी जब रिचली मैनर गए ट इज अनदर ग्रेट चैप्टर इन स्वामी जीस लाइफ द ग्रेट समर जोसेफाइन मैक्लाउड इस पूरे जो स्टे था स्वामी जी का अगस्ट सितंबर अक्टूबर नवंबर ये चार महीनों का साढ़े तीन चार महीनों का जो पूरा वहां पे विश्राम का समय था रिजली मैनर में उसको कहते हैं द ग्रेट समर अर्थात कि एक ग्रीष्म और इस समय के दौरान जैसे कि थाउज आइलैंड पार्क में स्वामी जी अपने पश्चिमी शिष्यों से एक एक अंगत रूप में जो वार्तालाप होता है एक तो मैंने एक पब्लिक में लेक्चर देना एक होता है और जो अपने अंतरंग होते हैं उनको एक घरेलू वातावरण में बैठ कर के एक इन जनरल स्पिरिचुअल डिस्कशन होता है इंस्पायरिंग घटनाएं होती है वो सब यहां पर इतनी सुंदर सुंदर घटनाएं है रामकृष्ण ज्योत में मैंने पूरे सीरीज ऑफ आर्टिकल्स इसके बारे में लिखे हैं तो एक सुंदर घटना कि निवेदिता के साथ में स्वामी जी एक दिन शाम को टहलने के लिए निकले थे पूरा गांव जैसा ही था और यह मेनर था जो रिजली बोलकर के गांव था उसमें यह मेनर था तो इसका नाम था रिजली मेनर तो एक बार टहलने के लिए गांव के रास्ते प निकले हैं पूरा शांति है सूर्यास्त हो रहा है वो पेड़ों पेड़ की छाव में यह पूरे टहल रहे हैं उस समय निवेदिता कहती है कि देखिए कि इस समय इतनी शांति है इतनी शांति है स्वामी जी का संग है साथ में तो स्वामी जी को निवेदिता कहती है कि अपने जो पद शेप है अपने चरणों की जो आवाज है पैदल चलने की जो आवाज उससे भी मुझे मने इसका भी एक डिस्टरबेंस इससे भी खले पहुंचते है ये भी एक डिस्टर्ब करने वाला है क्योंकि शांति इतनी है कि पद शेप यानी कि पैरों की आवाज ये भी इतनी बड़ी होकर के सुनाई देती है तो स्वामी जी इसके सामने क्या कहते हैं पता है कि भारत में शेर जब शिकार करने के लिए चलता है जंगल में और जदी उसके जो पैर जो है सूखे प वैसे तो शेर का जो पैर जो होता है सॉफ्ट होता है और इतना सॉफ्टली वो जमीन पे पैर रखेगा कि जब वो आप आप आप जद शिकार है और शेर पीछे में आकर के खड़ा भी रह गया तो आपको पता नहीं चलेगा जब तक शेर अटैक नहीं करता है इतना सॉफ्टली वो जमीन पर चलता है किंतु गलती से भी शेर का पेर कभी सूखे पत्ते पे गिर गया और पत्ते की आवाज से जो शिकार है जिसके पीछे वह चल रहा है वो चौकन्ना हो गया और भाग गया तो शेर क्या करता है पता है अपनी पूंछ जो है अपने मुंह में लेकर के अपने दांतों से उसको ऐसा काटता है कि पूंछ में से खून निकलना शुरू हो जाए क्यों ऐसा करके वो अपने को कंडीशन कर रहा है अपने को ट्रेन कर रहा है छोटी सी गलती से भी तुम्हारा शिकार तुम्हारे हाथ से चला गया इतनी छोटी गलती भी जीवन में नहीं होनी चाहिए वरना तो जो प्राप्त व्य जो है एक लक्षण है वो चला जाएगा देखिए कि एक छोटी सी घटना में साधक को कितना सब कुछ सीखने के लिए है अपना जीवन वैसे तो डेडिकेटेड है कि चलो साधु हो ना कि गृहस्थ हो हमको ठाकुर को प्राप्त करने के लिए ठाकुर के दर्शन प्राप्त करने के लिए उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ ना कुछ साधना अवश्य करनी है नियम बना कर के अभी यह नियम में जयदिश की तरह खास करके मैं अच्छा ठीक है चलो अभी नहीं हुआ तो नहीं हुआ कल देख लिया जाएगा सुबह को मंगलारती से वापस आने के बाद में मैंने ठीक किया है कि ठाकुर की कोई ना कोई किताब में पढ़ूंगा अभी आजकल जैसे कि मैं लीला प्रसंग पढ़ रहा हूं किंतु कभी-कभी ऐसा लगेगा कि अरे अभी इसको छोड़ो चलो कुछ अच्छा सा वो भजन वगैरह सुन लिया जाए या तो फिर थोड़ा सा वॉकिंग कर ले किताब पढ़ना नहीं हुआ जो कि मुझे पढ़ना चाहिए था तो फिर अभी आज नहीं हुगा तो कल होगा कल नहीं होगा तो परसों होगा ऐसा करके जो अपने में जो तमस है आ आध्यात्मिक तमस कितना गहराई से डूबा हुआ है उस समय हम अपने को यह नहीं कहेंगे कि हां चलो आज मैंने ठीक किया था यह किताब पढ़नी है नहीं पढ़ा तो आज का ब्रेकफास्ट में स्किप कर लेता हूं मैं अपने को पनिश करता हूं जिससे कि मेरे माइंड में यह संस्कार बैठ जाए ये इंप्रेशन ठीक ठीक बैठ जाए कि जो भी नियम बनाया है उसका व्यतिक्रम होने से पनिशमेंट किसी ना किसी तरह की होनी ही चाहिए वरना तो इसलिए जन्म जन्मांतर की यह जन्म मृ जरा व्याधि की यात्रा चलती ही रहेगी चलती ही रहेगी इसका अंत ही कहीं नहीं आएगा तो इसके लिए जो अपने को सेल्फ कंडीशन करना चाहिए वो कैपेसिटी अपने में है ही कहा यदि कोई उत्तम गुरु के साथ में सानिध्य में रहते होते और गुरु यदि अपने को पनिश करते हैं कि हां जैसे कि स्वामी जी ने बेल मट में नियम बनाया कि यदि आपने यह नहीं हुआ आपसे मंगलारती में उठना नहीं हुआ मंगलारती अटेंड नहीं कर पाए तो भिक्षा करके आपको खाना खा है तो ऐसा जो नियम बनाने वाले तो अभी तो रहे नहीं है यदि बनाएंगे तो हम लोग सुनेंगे भी नहीं उनको तो ये सेल्फ कंडीशन जो करना है अपने को वो कैपेसिटी भी तो अपने में नहीं है किंतु वो शेर में है तो शेर देखिए कि उसको पता है कि उसके पैरों से थोड़ी सी भी आवाज हुई तो वो उस दिन भूखा रहेगा क्यों क्योंकि आवाज से जो शिकार है चौकन्ना होकर के भाग जाएगा और उसको आहार नहीं मिलेगा और यदि शेरनी है तो उसको तो आहार नहीं ही मिलेगा उस उसके जो बच्चे हैं वो भी बेचारे भूखे रहेंगे यानी कि अपने को इस तरह से ट्रेन करना है कि जिससे कि छोटी से छोटी गलती भी ना हो तो वो यदि हम अपने जीवन में थोड़ा सा भी इस तरह के टीचिंग्स को उतर पाए तो भी कितनी बड़ी बात होगी तो वो एक घटना है और दूसरा है कि स्वामी जी को उस समय आइसक्रीम बड़ा पसंद था तो अभी क्या है कि सब सब लोग एक साथ में खाना खाने के लिए बैठते हैं रिजली मैनर में तो आइसक्रीम अभी क्या है कि स्वामी जी का तो कैसा है अपने मूड पर थे विश्राम लेने के लिए भी आए थे थोड़ा सा तो अभी जब भी इच्छा हुआ खाना खाने के लिए आएंगे इच्छा हुई तो वो टेबल छोड़ कर के डिनर टेबल छोड़ कर के खड़े होकर चले भी जाएंगे अभी जितने भी गेस्ट थे वहां पे उन सबकी इच्छा थी कि स्वामी जी वहां पर बैठे कुछ ना कुछ बात करें और यदि बात नहीं भी करते हैं शांति से बैठते भी हैं तो उनके सानिध्य का जो पावन आनंद जो है वो सब ग्रहण करें तो अभी स्वामी जी खड़े होकर चले जाए तो सभी लोग थोड़ा सा डिसपिटर गट थी वो भी बड़ी चालाक थी वो क्या करती थी ऐसा लगा कि हां अभी स्वामी जी आधे आधा छोड़ कर के खड़े होकर चले जाने वाले हैं तो वो अनाउंस करेगी कि हां अभी क्या है कि खाने के बाद में सबको आइसक्रीम दिया जाएगा तो जैसे ही स्वामी जी अभी खड़े हुए कुर्सी से और आइसक्रीम की बात सुने फिर आराम से बैठ जाएंगे अच्छा आइसक्रीम है तो फिर मैं वेट करता हूं यानी कि देखिए कि बचपना ऐसा नहीं है कि आइसक्रीम खाने का लोभ किंतु एक बचपना है ठाकुर का है ना कि वो बर्फ खाने की एक उनकी एक बड़ी एक हैबिट हो गई थी जो भी कलकाता से आएगा ठाकुर के लिए बर्फ लेकर के आएगा ठाकुर एक और एक दूसरी घटना है एक उसमें बास्केट में ठाकुर जलेबी लेकर के बैठे हैं तो एक पा साल काने कि ऐसा बच्चा एक ठाकुर के कमरे में प्रवेश किया अभी ठाकुर का एकदम बिल्कुल बच्चे जैसा भाव हो गया इमीडिएट और जैसे छोटा बच्चा उसको आप मिठाई दे तो वो कैसा अपने से अकेले खाना चाहेगा अपने मित्रों के साथ में शेयर नहीं करना चाहेगा बिल्कुल वैसे ही बालक भाव में आकर के ठाकुर ने यह जो बास्केट थी वो जो जलेबी की अपने पीछे में छुपा दी और बिल्कुल समाधि में मगना हो गए चेहरे का भाव जैसे कि बिल्कुल 5च साल के परमहंस बच्चे के जैसा तो यह तो सब इन लोगों की एक लीला है एक बचपना है जिसका कि हम लोग इस तरह की लीला का आस्वादन लेते हैं वरना तो सभी लोग यदि सब समय धीर गंभीर रह कर के फिलोसोफी के बारे में बात करेंगे तो आध्यात्मिक जीवन का आनंद कौन लेगा आध्यात्मिक जीवन में सब लोग थोड़ा सा ये होकर के डिप्रेसो रह जाएंगे कोई कोई स्वामी जी को अमेरिका में पूछता था स्वामी जी आप धर्म गुरु है फिर भी आप आपके आपके भीतर भी जोविया इतना आनंद क्यों है इतना उत्साह क्यों है आपके चेहरे पर हस्य की रेखा क्यों सब समय रहती है तो स्वामी जी ने कहा कि मेरे पेट में थोड़ी ना दर्द हो रहा है कि सब समय में मुंह बिगाड़ करके घूमू मैं तो आनंद का संतान हूं अमृतस्य पुत्रा वयं इसीलिए तो मेरे भीतर में इतना उत्साह है इतना जोवियल्टी है इतना एंथू सियाज मयहॉल है हमको कि आध्यात्मिक जीवन इज नॉट सिर्फ के कुछ कुछ बड़े ही सीरियस गंभीर लोग हो कर के बैठ कर के या तो फिर वो माला जपते रहेंगे ना कि ऐसी गंभीर बातें करेंगे ऐसा नहीं है इट्स फुल ऑफ फन एंड एंथू सियाज हालाकि की बात याद रखनी है कि इन सबके भीतर में वैशक आनंद का एक तिनका एक ये भी नहीं है नॉट अ सिंगल ड्रॉप ऑफ वर्ल्डली प्लेजर ये एक याद रखना है क्योंकि ये स्वामी जी का ये आइसक्रीम के प्रति प्रेम हो ना कि ठाकुर का ये जलेबी के प्रति प्रेम हो यह तो इस प्रेम के लिए उन्होंने कोई सांसारिक कार्य किया हो ऐसा तो नहीं है वो जो अपने सहज रूप से जो आता है वो आता है इसको वे लोग ग्रहण करते हैं और साथ में कितना सब कुछ इन रिटर्न देते हैं स्वामी जी को एक छोटे से आइसक्रीम के कप के लोभ में बिठा कर के रख दिया तो उसके सामने जो स्वामी जी ने जो आध्यात्मिक वार्तालाप किया और सिर्फ हंसी मजाक भी किया तो जितने भी लोग डाइनिंग टेबल प बैठे थे उन सभी का जीवन हमेशा के लिए परिवर्तित हो जाएगा यानी य सिर्फ आइसक्रीम के बदले में स्वामी जी ने कितने लोगों का लाइफ ट्रांसफॉर्म किया है वोह भी सामने हमको देखना है तो ये सब घटनाएं हुई रिजली मैनर में द ग्रेट समर उस समय एक एकाक और हम लोग फॉर्चूनेटली है कि उसी समय मिसेस ओली बुल की जो लड़की थी ओलिया वोह बीमार हो गई तो यह जोसेफाइन मैक्लाउड और निवेदिता वहां पर थी प्रतिदिन मिसेस लीबु को पत्र लिखती थी बड़ा ही डिटेल में कि वहां पर स्वामी जी के साथ में क्या वार्तालाप हुआ क्या घटनाएं हुई वगैरह वगैरह तो यह बेनिफिट हमको मिल गया कि ऑन वन हैंड अनफॉर्चूनेटली का एक विस्तृत हमको ये डिस्क्रिप्शन मिलता है उसके बाद में जब ओली बुल वापिस मने ओली बुल रिजली मेनर आप पाई आखिर में उनकी लड़की स्वस्थ हो जाने के बाद में उसी समय एक दूसरा समाचार आया कि मिस जोसेफाइन मैक्लाउड का भाई कैलिफोर्निया में बीमार है तो जोसेफाइन मैक्लाउड कहती है कि अभी तो मुझे वहां प जाना ही पड़ेगा उसकी संभाल रखने वाला पता नहीं कौन है वहां पे तो स्वामी जी को बुलाया वहां पे रखा ड्रिजली मैनर में इतना उसके भीतर में था कि स्वामी जी का पावन सानिध्य प्राप्त होगा वो सब छोड़ कर के किंतु वो एकदम सोल्जर की तरह वो वहां से चली गई स्वामी जी ने कहा भी सही कि देखिए कि हाउ जोसेफाइन जो बोल कर के कहकर पुकारते थे स्वामी जी जो के भीतर में कितना फोर्टीट्यूड है कितना रेसिलियंस है कितना स्ट्रेंथ है तो अभी इसका फायदा हमको यह हुआ कि जोसेफाइन मैक्लाउड जब कैलिफोर्निया गई तो फिर से वो पत्रों का सिलसिला चालू हो गया मिसेस ओली बोल और निवेदिता दिन प्रतिदिन बड़े ही विस्तृत प पत्र लिखती थी जोसेफाइन मैकल को और इसी के दौरा मने ये दोनों पत्रों की सिलसिले से पहले तो मिसेस होली बुल को लिखे हुए उसके बाद में जोसेफ एंड मैकल को लिखे हुए पत्रों की ये पूरी सीरीज से यह जो पूरा स्टे था स्वामी जी का इसके बारे में इतना सब कुछ हमको जानने को मिलता है और फिर आखिर में स्वामी जी व जो आखिरी आखिरी घटना है उस समय मिसेस ओली पल को स्वामी जी ने गिरवा वस्त्र प्रदान किया था वो भी एक बड़ा सुंदर डिस्क्रिप्शन है इसके बारे में फिर आखिर में अभी यहां पे देखिए कि किस तरह से विधि का यह चक्र चलता है जब जोसेफाइन जा रही थी उस समय स्वामी जी ने कहा था जोसेफाइन ने कहा कि स्वामी जी आप भी आइए कैलिफोर्निया वहां पे तो आप जब फर्स्ट टाइम आए थे तो ये ईस्ट कोस्ट और ये वहां पेय मिड मिड ईस्ट वगैरह राज्यों में ही आप घूमे है वेस्टर्न अमेरिका में तो आप कभी आए नहीं है तो मैं जा रही हूं तो आप भी आइए तो स्वामी जी ने कहा कि तुम कुछ क्लासेस को और ऑर्गेनाइज करो अरेंज करो फिर मैं तो आखिर में हुआ वही जोसेफाइन मैक्लाउड जब वहां जा गई और फिर उसने धीरे-धीरे करके स्वामी जी के बारे में बात करना शुरू किया और स्वामी जी को निमंत्रण दिया और स्वामी जी लॉस एंजेलिस पहुंचे दैट इज द वेस्ट कोस्ट ऑफ अमेरिका जिसको कि कैलिफोर्निया राज्य कहा जाता है दिसंबर 99 टू जुलाई 1900 अगेन छ महीने का बिल्कुल ही टूक समय बहुत ही छोटा सा समय किंतु इतने छोटे से समय में भी स्वामी जी ने जो कैलिफोर्निया में किया है जो प्रवचन दिए हैं जो लाइव ट्रांसफॉर्म की है वेदांत के जो बीच डाले हैं उसका फायदा उसका जो वटवृक्ष होकर के ये जो नॉर्दन वेदांत सोसाइटी ऑफ नॉर्दर्न कैलिफोर्निया और वेदांता सोसाइटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया यह तो वेदांत सोसाइटी का जो पूरा भव्य इतिहास है उससे हमको मने पता चलता है कि कितना ही बड़ा वटवृक्ष यहां पर ये प्रकट हुआ है खास कर के ये जो दो ग्रेट स्वामी स्वामी जी को फॉलो किए वैसे तो त्रिगुणा तिता अंद जी आए थे रयान जी आए थे उनका भी एक बड़ा योगदान रहा किंतु जो सेकंड जनरेशन थी उसमें अशोकानंद जी महाराज नॉर्दर्न कैलिफोर्निया में और सधन कैलिफोर्निया में प्रभु आनंद जी महाराज इन दोनों ने एमल वर्क वहां पर किया है जिससे कि आज एक सॉलिड फाउंडेशन वेदांता का वेस्ट कोस्ट के ऊपर में है और वहां पर जितने भी एक नई जनरेट ऑफ थिंकर्स क्रिएटिव आर्टिस्ट साइंटिस्ट फिलोसोफर यह जो थॉट लीडर्स यह जितने भी थे उस एरिया के वो सभी लोग किसी ना किसी तरह से वेदांत से प्रभावित हुए थे यहां तक की हॉलीवुड की मूवीज में भी देखिए कि वेदांत का किस तरह से प्रभाव है यह जो स्टार वर्स बोलकर के जो मूवी है तो इसमें भी देखिए कि वेदांतिका पर वह देखने को मिलेंगे तो यह वेदांत ने सिर्फ लोगों का साधना और थिंकिंग फिलोसोफी ट्रांसफॉर्म नहीं किया पूरा पॉपुलर कल्चर में उसने रूट अपनी जड़ बिठाई है तो यह सब उसके बारे में डिटेल में थोड़ा सा डिस्कस करेंगे वो अभी कल आज तक ह यह अधिकारी भेद की बात आपने बिल्कुल ठीक कही कि जैसे कि गिरीश घोष है तो वो पूरा भैरव जैसा भव था अभी गिरीश घोष का अनुकरण करके और एक भक्त था कि ठाकुर को गाला गाली करने को जा रहा है तो ठाकुर ने उसको ऐसा डांट करके बिठा दिया वो गिरीश थोड़ी ना है गिरीश तो भैरव था सबका जैसा भाव होता है मां के पास में भी देखेंगी जो एक लड़का मां के पास गया बोलता है सन्यास लेना है तो मां ने कहा बेटा देखो जगत में सब कुछ दोदो है चौक दटी हाथ ूटी माने ये दो आंख है दो हाथ है तो वैसे ही पति पत्नी होते हैं संसार में तो तुम जाओ घर जाकर संसार करो और जो गौरी सानंद जी वगैरह राममय महाराज इनको सब अपने हाथों से गिरवा वस्त्र दिया तो जो जिस बात का अधिकारी है और दूसरा क्या है कि इंटरप्रिटेशन भी अपना एक दूसरी बात है कि अबकी अब जैसे योगा क्या है यह त्रिगुण क्या है वेदांत क्या है इन जनरल इतने सारे इंटरप्रिटेशन आपको दिखाई देंगे अपने ही अभी वेदांत को लेकर के ही शंकराचार्य रामानुजाचार्य मधवा चार्य इन सब में आप देखिए कि कितना वाइड वरायटी है इंटरप्रिटेशन का तो ये दो चीज है हमने अधिकारी भेद भी एक है कि फिर आप पार्टिकुलर सिचुएशन किस तरह से इंटरप्रेट करेंगे ठाकुर ने इस तरह से इंटरप्रेट किया हम लोग कभी इस तरह से इंटरप्रेट करते हैं तो ये जो बिलिटी जो है ना अपने शास्त्र में वो भी एक है कि रिजिक डेफिनेशन भी है कि आपको इसी तरह से ही इसको देखना है इट गिव्स यूट फ्रीडम ऑफ आइडियाज तो इसको भी दृष्टि से भी इसको थोड़ा सा देख सकते हैं मैं तो कहता हूं कि सब कुछ ट्राई कर लिया जाए अभी जैसे देखिए यह स्वामी शिष्य संवाद और मास्टर एज सोरी कितना कंट्रास्टिंग दोनों तरह से उसके ऑथर्स की पर्सनालिटी टी भी और जो सब्जेक्ट मैटर है दोनों कितना जबरदस्त कंट्रास्ट है अभी आपको लगेगा कि मुझे कौन सी किताब अच्छी लगती है उसके अनुसार मेरा होगा रास्ता तो मुझे तो दोनों किताब अच्छी लगती है इन स्पाइट ऑफ बीइंग कंपलीटली अपोजिट अभी तो और भी ज्यादा कंफ्यूजन हो गया कि मेरे लिए कौन सा रास्ता है वो जो ऑर्थोडॉक्स हिंदुइज्म वाला ना कि बिल्कुल रिबेलियस वेस्टर्न एटीट्यूड मेरे लिए कंसन है तो मैं तो कहता हूं कि दोनों ट्राई कर लिया आखिर में कौन से चीज में हम सक्सेसफुल होते हैं वो धीरे-धीरे करके स्वामी जी ही हमको बता देंगे यदि मानते हैं कि चलो मारो काटो इस तरह का भाव तो यह भी एक बार एक्सपेरिमेंट कर लिया एक सात्विक जीवन एक जद जीना है वो भी एक्सपेरिमेंट कर लिया देखिए कि हमको किसम सक्सेस मिलती है वो करके वो एक्सपेरिमेंट ही हमको बता देगा कि कौन से रास्ते पर हमको धीरे-धीरे जाना चाहिए ट्राई कर लेना है सब कुछ ट्राई करने में तो ऐसा कोई बुरा कुछ नहीं है आखिर में स्वामी जी ने निवेदिता को हो ना कि शरद चंद्र को हो गलत तो कुछ बताया नहीं है यानी दोनों रास्ते यदि हम अपना भी लेंगे तो गलत तो अपने साथ में कुछ होने वाला नहीं है जो रिजल्ट आएगा उससे पता चलेगा कि मेरा एप्टिट्यूड इसमें ज्यादा है इसमें ज्यादा नहीं है तो फिर वो रिजल्ट से ही हम धीरे-धीरे करके फाइन ट्यून करते जाएंगे हां और कभी-कभी क्या होता है ना कि हमने विभिन्न समय में विभिन्न सोल्यूशन काम करते हैं आज मैं इस तरह के माइंड सेट में हूं राजकोट में था एक तरह का माइंड सेट था यहां पर एक तरह का है बेलून मठ में दूसरे तरह का था तो नॉट नेसेसरी कि एक ही साधन पद्धति सब जगह पर चलेगी तो वैविध्य है इसीलिए क्योंकि विभिन्न समय में विभिन्न माइंडसेट में विभिन्न सिचुएशन में अपने पास में रेंज ऑफ ऑप्शंस अवेलेबल हो और फिर एक के बाद एक ट्राई कर लेना है अहित तो कुछ होने वाला नहीं है वही है कि रिजल्ट किसी का ज्यादा मिलेगा किसी का कम तो जो ज्यादा अच्छा रिजल्ट मिलता है लेट अस कंटिन्यू फॉलोइंग इट फॉर दैट पर्टिकुलर टाइम क्योंकि देखिए एक सदगुरु मिलना और वह आपको बता दे कि हां तुम्हारे लिए यह रास्ता है इसको करो बाकी सब ठीक हो जाएगा स्वामी ठाकुर किसी की किसी को बोलते थे तुम अभी कीर्तन करो तो पता है कि वह त्याग का अधिकारी नहीं है तो कीर्तन करने को बोल दिया तो कीर्तन करते करते अभी केशव सैन है उसको कीर्तन सिखा दिया तो इतना निराकार वादी था आखिर में खोल करताल लेकर के मां का कीर्तन करता था तो जिससे कि उसके बहुत सारे कलीग नाराज हो गए थे किंतु ठाकुर को उसको खुद को पता था कि ये जो मैं कर रहा हूं उससे मुझे रिजल्ट मिल रहा है तो ही कंटिन्यूड डूइंग इट अभी उसको नरेंद्र वाला रास्ता नहीं बताया नरेंद्र का रास्ता केशव सेन का रास्ता हालांकि बहुत र हाईली टैलेंटेड किंतु अलग थे तो अपने पास तो ठाकुर है नहीं कि वो रास्ता बता है कि तुम्हारे लिए ये है तो केशव सेन की तरह खोल करताल से कीर्तन भी कर लिया स्वामी जी की तरह थोड़ा त्याग करने का भी प्रयास कर लिया देखिए कौन ज्यादा सक्सेसफुल होता है फिर गोन कंटिन्यू डूइंग दैट ठाकुर ठाकुर स्वयं जब भी वेदांत साधना का समय आया तो तोतापुरी आ गए तंत्र साधना का समय आया तो भैरवी ब्राह्मणी आ गए अब जैसे कि विरजानंद जी महाराज पहले भी हमने डिस्कस किया था कि उनकी मने वो जो ये थे अपने रामचंद्र दत्त वो क्या करते थे कलकाता में ने दीवाल पर लिख दिया था कि हम लोग नगर कीर्तन करने वाले हैं इस समय पे तो वो पहली पहली जो एक डिजायर प्रकट होता है स्पिरिचुअल तो उनके पास में गए काकड़ गाछ में काकड़ दछ जाकर के ऐसा पता चला कि जैसे कि रामचंद्र दत्त ही ठाकुर के प्रधान सेवक थे शिष्य थे उन्होंने ही ठाकुर को ठीक-ठीक समझा था किंतु फिर वो अपने मास्टर महाशय को भी देख र है और भीतर से एक आकर्षण होता है कि कितना शांत सौम्य स्वभाव है जब छुट्टी होती है या रिसेस होती है तो अपनी छत प जाकर के पता नहीं डायरी में से कुछ पढ़ते हैं अभी मास्टर महाशय तो वो रामचंद्र दत्त की तरह दिवालो प वो जो एडवर्टाइज नहीं करते थे कि हां मेरे पास में आओ मैं तुमको सिखाऊंगा किंतु उनका जो प्रभावशाली व्यक्तित्व था उसी से आकर्षित होकर के उनके पास में गए तब कहीं पता चला कि अरे वहां पर वरा नगर मठ भी है वहां पर त्यागी संतान भी है और ठाकुर के असली जो वो संदेश वाहक है वो तो वही है तो वो मास्टर महाशय और अपने गिरजानंद जी का मिलन वो सही में स्टोरी ऑफ एन ो बोलकर के किताब है उसमें स्टेप बाय स्टेप जो समझाया है कि किस तरह से फिर ऐसा हुआ कि मास्टर महाशय के पास में जाते हैं और बराह नगर मठ में जाते हैं और वहां पर जाना बंद हो गया रामचंद्र दत्त के पास में तो फिर भी बीच बीच में जाएंगे क्यों उनको बुरा ना लगे कि भाई मुझे छोड़ दिया है मेरा त्याग कर दिया है मैंने उसको इतना सिखाया फिर भी अभी मुझे इग्नोर करता है ऐसा ना लगे बोल कर के वहां पर भी जाते थे किंतु ऐसा नहीं कि बताया कि फिर हम लोग वहां जा रहे वो जाते थे बीच-बीच में फिर धीरे धीरे करके संपूर्ण रूप से बंद हो गया तो मास्टर महाशय जिस तरह से लोगों को अट्रैक्ट करते थे कैसा एक मने सुंदर मने कुछ 10 15 पेज भर कर के वो सब है वर्णन वो पढ़ने लायक है स्टोरी ऑफ एन इपोक बाय स्वामी अबाउट स्वामी रजान जी मेरी नजर के सामने ही हुआ मैं ट्रेनिंग सेंटर में था तो हमारे सीनियर ब्रह्मचारी थे उनको संस्कृत और चैटिंग में बड़ा ही इंटरेस्ट था साउथ इंडिया से थे तो उन्होंने सोचा कि देखो रामकृष्ण मिशन में तो यह जो है चैटिंग संस्कृत वगैरह डेवलप करने का मुझे मौका नहीं मिलेगा किसी हॉस्पिटल सेंटर में बेच देंगे तो वही सब एडमिनिस्ट्रेशन में मैं डूब जाऊंगा तो उन्होंने क्या किया छोड़ कर के वोह जो कोई साउथ में कोई बहुत बड़ा एक फेमस इंस्टिट्यूट है वहां पर चल ग वो संस्कृत सीख रहा है उन्होने संस्कृत स बहुत अच्छे से सीखा अभी भी शायद वही पर होंगे तो अभी मुझे प्रश्न हुआ कि उसकी बात एक तरह से सही है कि जद उसको संस्कृत ही बहुत अच्छे से सीखना था या अभी जैसे तो यहां पर तो उसको वो मौका नहीं मिलने वाला था जोक उसको वहां पर मिला तो उसने छोड़ कर के क्या गलत किया क्या सही किया मैं अपना खुद का एग्जांपल देता हूं मैं जब जवाइन करने के लिए बेलूरमठ गया तो स्वामी जी को पढ़ कर के रखा था सोचा कि ट्राइबल डेवलप ट रूरल डेवलपमेंट यह सब करना है कहां बेलूरमठ में पूजा हो रही है क्लास हो रही है और फिर पोस्टिंग होगा तो यही किसी मंदिर में पोस्टिंग होगा तो मैंने सुहितानंद जी को कहा कि मुझे ट्राइबल डेवलपमेंट करना है मब इस तरह से रूरल डेवलपमेंट तो बोला कि जाओ तुम राची चले जाओ ऑर्डर छोड़ दो मलब ब्रह्मचारी के रूप में रहना तो कोई पार्टिकुलर एम जो कि रामकृष्ण मिशन में ना हो फुलफिल उसके लिए छोड़ कर के जाना वैसा तो मैंने खुद किया है नजरों से देखा भी है और रीजन भी बहुत सारे हैं वो ट्राइबल डेवलपमेंट हो ना किय संशु सीखना हो या तो फिर एक ऐसे गुरु की प्रेजेंस लाइव प्रेजेंस इंस्पायरिंग प्रेजेंस जो कि अपने जीवन को एक बल प्रदान करें तो मुझे लगता है कि इसमें गलत कुछ नहीं है क्योंकि श्री राम कृष्ण और श्री राम कृष्ण संघ इन दोनों को हमको इक्वेट नहीं करना चाहिए यदि हम ऐसा बोलेंगे कि रामकृष्ण संघ रिप्रेजेंट्स रामकृष्ण संघ इज द ओनली रिप्रेजेंट ऑफ श्री राम कृष्ण तो हम फिर वही गलती करेंगे जो कि बाकी सब धर्मों ने किया है कि चर्च को फॉलो करो वरना तो आपको फिर हम श्राप देंगे ये करेंगे वो करेंगे वीी आर द मिडल मैन बिटवीन जीसस एंड डिवोटा ऐसा तो नहीं है कि अब भी राम कृष्ण संघ शुड नेवर क्लेम दैट वी आर द मिडल मैन और हमारे थ्रू ही श्री राम कृष्ण के पास जा जाएगा यह मैंने मैं तो बहुत ही पक्का मानता हूं कि हमको ऐसा एक्सक्लूसिविटी का कोई भी दावा नहीं करना चाहिए श्री रामकृष्ण स्टैंड्स ऑन हिज ओन जीवन के कैसे ही क्षेत्रों में ऐसे जगह जहां पर नहीं राम कृष्ण मिशन गया है ना ही हिंदुइज्म गया है वहां पर लोगों को प्रेरणा देते हैं ठाकुर तो किस तरह से प्रेरणा देते हैं और जो प्रेरित होता है और उसका और ठाकुर का सीधा नाता है रामकृष्ण संघ बीच में नहीं आता संघ एक मशीन है जिसकी स्थापना एक पार्टिकुलर पर्पस के लिए हुई है शिव ज्ञान जीव सेवा का आदर्श प्रैक्टिस में लाने के लिए माने वो उसको अप्लाई करने के लिए इफ यू डू नॉट फॉलो विद इन दिस नरो डेफिनेशन देन यू आर परफेक्टली फ्री टू फॉलो श्री राम कृष्ण वे य आर ये मैं तो एकदम पक्का मानता हूं इस कि इफ यू आर कंफर्टेबल देयर इफ यू लाइक देयर इफ इट इज हेल्पफुल फॉर यर साधना देन प्लीज फॉलो दैट पाथ नेवर बिलीव के ठाकुर के पास में ठाकुर के संग के थ्रू ही जाया जाएगा यह जो पासपोर्ट टू हेवन यह जो चर्च ने शुरू शुरू किया था कि आप जितना ही पाप करो वो हमको थोड़ा सा डोनेशन दे दो हम आपको पासपोर्ट दे देंगे यू विल गो टू जीसस तो इस तरह सब करप्शन फैलता है जद संघ को बड़ा चढ़ करके बड़े करेंगे तो करप्शन ही फैले का ट इज वट आई बिलीव