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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 22 Jan 2025

Invocation

ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः स्वामी विवेकानंद का प्रवचन भारत में दिए हुए प्रवचनों की एक श्रंखला में से उसका नाम है माय प्लान ऑफ कैंपेन इस प्रवचन का हमने ऑलरेडी आरंभ कर दिया है पढ़ना हम जिस टॉपिक पर पहुंचे हैं उस टॉपिक का नाम है सेकंड नंबर ऑफ टॉपिक है मैंने आपके साथ में इसका टेक्स्ट भी शेयर किया है इस टेक्स्ट को मैंने टॉपिक में बांट दिया है और जिस टॉपिक को अभी हम डिस्कस कर रहे हैं उसका नाम है पर्सीक्यूशन ऑफ स्वामी जी बाय थियोसोफिकल सोसाइटी जब स्वामी जी अमेरिका गए और योग और वेदांत का प्रचार करने की शुरुआत की उस समय उनको कौन-कौन सी बाधाएं सहन करनी पड़ी थी और उस बाधाओं के बारे में स्वामी जी ने किस तरह से रिएक्ट किया वह वैसे तो हमको पता है जब तक स्वामी जी अमेरिका में थे तब तक स्वामी जी इन सब जो लोग उनकी निंदा करते थे जो लोग उनके बारे में कटु वचन का प्रयोग करते थे तो स्वामी जी उस समय तो कुछ बोले नहीं किंतु जब भारत में आए और कुछ भारतीयों के मन में इस तरह की दुविधा प्रवेश की कि आज स्वामी जी की अमेरिका में जो सफलता है वह कुछ-कुछ रिफॉर्म सोसाइट हों की वजह से है जैसे कि थियोसोफिकल सोसाइटी और किसी किसी ने जो स्वामी जी के बारे में निंदा और कटु वचन कहे हैं वह भी शायद सत्य हो सकते हैं यानी कि स्वामी जी की जो अचीवमेंट है अमेरिका में उसको एक तरह से उसका वैल्यू कम करके कुछ लोग देखना शुरू किए थे तो इसके बारे में स्वामी जी को कुछ बो पड़ा था तो स्वामी जी ने बताया सबसे पहले एक के बाद एक बताएंगे कि किस तरह से थियोसोफिकल सोसाइटी ने उनकी निंदा की उनका जो कार्य है उसमें विघ्न खड़ा करने का प्रयास किया उसके बाद में क्रिश्चियन मिशनरीज उसके बाद में यह मजूमदार जो कि ब्राह्मण समाज का सदस्य था इस तरह से जिन जिन लोगों ने उनके कार्य में बाधा डालने का प्रयास किया सबके बारे में स्वामी जी यहां पर कुछ ना कुछ कहते हैं तो अभी इस श्रंखला में मैं थोड़ा सा आगे पढ़ता हूं और एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट टॉपिक आज हम डिस्कस करेंगे स्वामी जी कहते हैं पहले तो थियोसोफिकल सोसाइटी के बारे में थियोसोफिकल सोसाइटी ने उनके कार्य में किस तरह से बाधा खड़ी की थियोसोफिकल सोसाइटी ने किस तरह से उनकी निंदा की उसका एक वर्णन स्वामी जी ने दिया जो कि हम अगले प्रवचनों में देख चुके हैं अभी जो स्वामी जी कहते हैं एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण पॉइंट स्वामी जी यहां पर उत्था पित करते ते हैं पहले उसको पढ़ते हैं फिर उसके बारे में डिस्कस करेंगे स्वामी जी क्या कहते हैं आई वुड नॉट हैव मेंशन दिस नाउ मैं यह सब जो कि मेरे विरोध में किया गया उस सब का मैं उल्लेख नहीं करता किंतु बट एज माय कंट्री मैन वांटेड टू नो इट मस्ट कम आउट किंतु मेरे देश बांधव जानना चाहते थे इसलिए इस सब बातों को मुझे कहना पड़ा है फॉर थ्री इयर्स आई हैव नॉट ओपन माय लिप्स अबाउट दिस थिंग्स 3 साल तक अमेरिका में स्वामी जी ने कार्य किया 93 सिंबर में वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में स्वामी जी ने प्रवचन दिया वहां से लेकर के 96 के आखिरी महीनों तक स्वामी जी ने अमेरिका में जो कार्य किया या तो फिर लंडन में जो कार्य किया उसमें आई हुई बाधाओं के बारे में स्वामी जी खुद तो कुछ बोलते ही नहीं किंतु उनके कुछ देश बांधव जानना चाहते थे कि उनके बारे में जो अप्र चार मिथ्या बाट मिथ्या प्रचार जो भारत में फैल रहा है उसमें सत्य कितना है यह जो उनके देश बांधव जानना चाहते थे इसके लिए स्वामी जी को यह सब करना पड़ा साइलेंस हैज बीन माय मोटो बट टुडे द थिंग हैज कम आउट अभी तक मौन ही मेरा नियम था यह जो कुछ भी मेरे विरोध में किया गया उन सबके बारे में उन सब सबका प्रतिकार मौन से ही करना उनकी उपेक्षा करना ही मेरा आदर्श था मेरा नियम था किंतु आज मैं यह सब बोलने को खड़ा हुआ हूं मेरे देश बांधव की आज्ञा से तो यह सब बातें मेरे मुंह में आज आ जा रही है देखिए यह जो दो-तीन सेंटेंस स्वामी जी यहां पर कहते हैं इसके बाद में फिर स्वामी जी फिर से स्टार्ट करेंगे कि किस तरह से थियो सोफिस्ट किस तरह से यह मजूमदार वगैरह विरोध कर रहे थे वो पूरा बात स्वामी जी इसके बाद में फिर से और कुछ डिटेल में कहेंगे किंतु यह जो दो-तीन सेंटेंस है इसका इंपॉर्टेंस हमको समझने की आवश्यकता है जैसे कि स्वामी जी ने खुद इसी प्रवचन में बाद में कहेंगे कि भारत का यह जो अवनति हुआ भारत की जो यह राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन कोई भी सभ्यता देखिए कभी उसका जन्म होता है कभी उसका राइज होता है अर्थात कि थान होता है प्रगति होता है इवोल्यूशन होता है और धीरे-धीरे कभी एक समय आएगा उसकी अवनति होगी उसका डिक्लाइन होगा और एक समय आएगा उसका विनाश हो जाएगा जैसे कि मनुष्य शरीर जन्म मृत्यु जरा व्याधि की इस साइकल से जो चक्र से जो सब समय गुजरता रहता है इसी तरह सिविलाइजेशंस भी जन्म मृत्यु जरा व्याधि की इस चक्की में पिसती रहती है इस चक्र से निकलती रहती है बहुत सारी सिविलाइजेशंस आप विश्व में देखेंगे कि जिन्होंने जन्म लिया जिन्होंने एक तरह की ग्रेटनेस महानता हासिल की फिर उनमें धीरे-धीरे करके डिक्लाइन आना शुरू हुआ और एक समय हुआ इस तरह की सिविलाइजेशन का विनाश भी हो गया दो-तीन उदाहरण यदि देखें तो एक है माया सिविलाइजेशन साउथ अमेरिका सेंट्रल अमेरिका की फिर यह इंका सिविलाइजेशन वह भी साउथ सेंट्रल अमेरिका की उसके बाद में इजिप्शियन सिविलाइजेशन फेरो की जिन्होंने यह पिरामिड बनाए और एक जद कहे तो यह अ एबोरिजिनल हालांकि वहां पे इतनी कोई बड़ी सिविलाइजेशन नहीं थी ऑस्ट्रेलिया में यह तीन सिविलाइजेशन का हम अवश्य नाम दे सकते हैं इसके बाद में और एक नाम आएगा मेसोपोटामियन सिविलाइजेशन यह चार सिविलाइजेशन ऐसी है जिन का जन्म हुआ प्रगति हुई बड़े ही उच्च शिखर उन्होंने उन्नति के हासिल किए फिर जब डिक्लाइन आया तो ऐसा डिक्लाइन आया कि उनका आखिर में सर्वनाश ही हो गया इंका माया फेरो की इजिप्त सिविलाइजेशन और मेसोपोटामियन सिविलाइजेशन अभी देखिए कि मेसोपोटामियन सिविलाइजेशन इराक जो है आज का उस वहां पर दो नदियां है यूफ्रेट्स इन दोनों के बीच में वह बसी हुई थी तो यह जो इजिप्शियन सिविलाइजेशन है नाइल रिवर वैली सिविलाइजेशन जिसको कहते हैं नाइल रिवर के व प्लेन में जो बसी हुई थी और यह यूफ्रेट्स इन दोनों का विनाश इस्लाम ने किया जैसे ही इस्लामिक सिविलाइजेशन का वहां पर आक्रमण हुआ यह दोनों सिविलाइजेशन नष्ट हो गई वहां पर लोग अभी भी जिंदा है किंतु उन्होंने इस्लामिक सिविलाइजेशन को अपना लिया है जबकि माया और इंका सिविलाइजेशन इन दोनों का विनाश हुआ यह यूरोप से जो सेटलर्स गए थे उनके आक्रमण की वजह से तो ये चार सिविलाइजेशन हम देखते हैं कि जिनका संपूर्ण रूप से विनाश हो गया है किंतु देखिए कि विश्व में एक सिविलाइजेशन ऐसी है अपनी भारतीय सिविलाइजेशन या तो कहेंगे कि वैदिक सिविलाइजेशन जिसके ऊपर में अनेक आक्रमण बार-बार होते रहे हैं किंतु फिर भी सब समय यह सिविलाइजेशन जैसे कि एक रीबर्थ जैसे कि एक नया जन्म प्राप्त करती है जब भी महा मुसीबत इस सिविलाइजेशन के ऊपर में आके खड़ी होती है तभी जैसे कि ईश्वर स्वयं इस भूमि पे इस पवित्र मातृभूमि पर जन्म ग्रहण करते हैं और इस सिविलाइजेशन का फिर से उद्धार करते हैं अभी जैसे कि यूरोप में एक रेनेसा आया था रेनेसा अर्थात कि रीबर्थ ऑफ लर्निंग जिसके बाद में यूरोप में ये साइंस और टेक्नोलॉजी का इतना उत्थान हुआ इतनी प्रगति हुई जो भारत में देखेंगे कि जो इंडियन रेनेसा है वैदिक रेनेसा वह बार-बार आता रहा है अपने यहां पे धार्मिक रेनेसा आया है सब समय वहां पे यूरोप में साइंस एंड लर्निंग का रीबर्थ हुआ है भारत में धर्म का रीबर्थ पुनर्जन्म बार-बार होता रहता है बार-बार अवतार जन्म ग्रहण करते रहते हैं भारती सभ्यता में यह पुनः पुनः ईश्वर का आना और भारतीय सभ्यता का पुनः पुनः जैसे कि विनाश में से उत्थान होना फिर से वह इसके पीछे एक बड़ा रहस्य क्या है पता है देखिए सर्वप्रथम तो हमको यह समझना होगा कि कोई भी सिविलाइजेशन का राइज जब होता है उसके पीछे बहुत सारे लोग बोलेंगे कि मिलिटरी पावर है पॉलिटिकल पावर है इकोनॉमिकल पावर है यह सब पावर है ही है लॉजिकल पावर है यह सब पावर तो है ही है किंतु सबसे फंडामेंटल पावर है रिलीजियस पावर यह हमको हम हिंदुओं को यह बात सुनकर के कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होगा किंतु विदेश में यूरोप में और अमेरिका में इस तरह की बात थोड़ी आश्चर्यजनक उनको महसूस होती है क्योंकि उन्होंने चर्च के साथ में झगड़ा करके स्टेट और चर्च का सेपरेशन करके मॉडर्न वेस्टर्न सिविलाइजेशन चालू की है किंतु देखेंगे कि वहीं पे एक हिस्टोरियन आर्नोल्ड टोयन बी उसने इतिहास का सिविलाइजेशंस का संस्कृतियों का बड़ा ही गहनता से अभ्यास करके यह बात उनको कही है कि रिलीजन इज द फाउंडेशन ऑफ सिविलाइजेशन जब भी धर्म स्ट्रांग होता है तभी तभी सिविलाइजेशन डेवलप होती है और यह बात इवन यूरोप और अमेरिका के लिए भी सही है देखिए कि रिफॉर्मेशन जब आया यूरोप में क्रिश्चियन कैथोलिक चर्च में अवनति जब प्रारंभ हो गई थी धर्म में करप्शन घुस गया था उनके धर्म में यूरोप में उस समय रिफॉर्मेशन मूवमेंट आया और क्रिश्चन धर्म को दो-तीन ब्रांचेस में बांट दिया पुराना कैथोलिक धर्म तो रहा ही साथ में यह प्रोटेस्टेंट है फिर यह इ वांजलि कल है ऐसी बहुत सारी नई ब्रांचे स्टार्ट हुई जिसमें कि धर्म को जैसे कि पुनर्जीवित किया गया था तो यह रिफॉर्मेशन पहले हुआ और उसके बाद में रेनेसा हुआ यह जब रिफॉर्मेशन जैसे कि प्रोटेस्टेंट ब्रांच स्टार्ट हुई उसी समय कुछ-कुछ संतों ने आकर के जैसे कि सेंट इग्नेशिया है इग्नेशिया लोयला या तो फिर सेंट फ्रांसिस इस तरह के सेंट टेरेसा ऑफ एवला इस तरह के संत ने आकर के कैथोलिक धर्म में भी कैथोलिक ब्रांच में भी करेक्शंस किए थे तो यह जब धर्म फिर से जैसे कि पुनर्जीवित हो उठा क्रि कन धर्म यूरोप भी जैसे कि पुनः जीवित हो उठा अभी देखिए कि यही थिरी भारत में भी अप्लाई करती है किंतु यहां पर देखिए कि एक बड़ा ही सूक्ष्म पॉइंट है जिसको कि हमको समझना है यूरोप में एक ही बार इस तरह का रेनेसा हुआ है और अवतार तो एक ही बार आए हैं दूसरी बार अवतार आएंगे कि नहीं पता नहीं किंतु एटलीस्ट कैथोलिक धर्म या तो क्रिश्चन धर्म तो ये स्वीकार नहीं करता भारत में बार-बार अवतार आते रहते हैं हमारा हिंदू धर्म ही यह बात स्वीकार करता है भारत का यह जो पुनः पुनः रहने सा हो रहा है इसके पीछे का कारण क्या है तो यदि हम देखेंगे बड़ा ही गहराई से चिंतन करेंगे तो देखेंगे कि भारत में धर्म को जैसे कि दो हिस्सों में बांट दिया गया है या तो फिर कहेंगे कि भारत में धर्म के दो एस्पेक्ट हैं एक तो है व्यष्टि एस्पेक्ट या तो फिर यह व्यक्तिगत उसका स्वरूप मैं एक साधक हूं और मेरे लिए क्या साधना करनी उचित है जिससे कि मैं ईश्वर प्राप्त करूं यह एक पूरा साइंस अपने उपनिषदों में डेवलप किया गया है कि हां आत्म साक्षात्कार ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है सर्वोत्तम उद्देश्य है और आत्म साक्षात्कार करने के लिए त्याग ही एकमात्र पंथा है ब्रह्मचर्य ही एकमात्र राह है जिसके माध्यम से हम ब्रह्म साक्षात्कार कर पाएंगे और ब्रह्मचर्य का पालन किस तरह से करना उसके लिए चार योग हमको बताए गए हैं कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग और राज योग तो इन चारों योगों के माध्यम से त्याग और ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करना है जिसके अंत में हमको ईश्वर प्राप्ति ईश्वर दर्शन आत्म साक्षात्कार ब्रह्मा भूति होगी यह हो गया मैं एक साधक हूं मेरे लिए एक रास्ता मेरे लिए चुन लिया गया किंतु मैं एक साधक के अलावा समाज का भी एक अंग हूं और समाज में विभिन्न रोल विभिन्न ड्यूटीज मुझे दी गई है यदि मैं राजा हूं तो मेरा एक राज्य धर्म है यदि मैं गृहिणी हूं तो मेरा एक मातृ धर्म है यदि मैं संतान हूं तो मेरा संतान धर्म है यदि मैं पिता हूं तो मेरा पितृ धर्म है यदि मैं नागरिक हूं इस समाज का इस राज्य का तो मेरा एक नागरिक धर्म है यदि मैं वाणिज्य करता हूं तो मेरा वाणिज्य धर्म है यदि मैं वैद्य हूं तो मेरा एक वैद्य धर्म है यानी कि दो तरह के धर्म हुए हिंदू धर्म हमको बताता है दो तरह की राह हुई दो तरह के पंथ हुए हमारे लिए एक तो है कि मैं साधक के रूप में ईश्वर प्राप्ति के लिए मुझे क्या करना होगा मेरा और और ईश्वर का रिलेशन एक हो गया दूसरा है कि इस समाज के साथ में मेरा क्या रिलेशन है एज ए पार्ट ऑफ समष्टि यह जो समाज समग्र है संस्कृति समग्र है उसके भीतर में मेरा क्या रोल है और इस रोल को मुझे किस तरह से अदा करना है इस रोल को मुझे किस तरह से निभाना है यह हो गया मेरा समष्टि धर्म ये व्यष्टि धर्म और समष्टि धर्म वैसे तो दोनों एक ही तरह के फाउंडेशन पर रचे गए हैं फाउंडेशन यदि कहे तो सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रदान ये जो पांच यम पांच नियम है यह सभी धर्मों का फाउंडेशन है किंतु सभी धर्म जहां तक साधक का धर्म है जहां तक मेरा व्यष्टि इंडिविजुअल पाथ है वो तो जैसे कि हमेशा के लिए फिक्स है और एक साधक और दूसरे साधक में कोई भी डिस्क्रिमिनेशन नहीं करता यदि कहेंगे कि यह साधक को ब्रह्मचर्य का पालन करना है इस साधक को अपरिग्रह व्रत का पालन करना है अपरिग्रह व्रत अर्थात कि आवश्यक के चीजों के अलावा और कुछ भी संग्रह ना करें इस साधक को सत्य वचन का पालन करना है जो भी परिस्थिति हो उसमें उसको सत्य पालन ही करना है तो यह सत्य पालन ब्रह्मचर्य अपरिग्रह तप शोज संतोष यह जद एक साधक को यदि उसको निभाना है उसका पालन करना है तो दूसरे साधक को भी वही करना होगा यदि वह एक साधक रहता है जापान में दूसरा रहता है ऑस्ट्रेलिया में तीसरा यदि रहता है यह फ्रांस या जर्मनी में एक साधक राजा है दूसरा रंक है एक सिपाही है तो दूसरा वैद्य है ये सब चीजों को उस साधक के रास्ते के लिए साधक की साधना में कोई फर्क नहीं पड़ता वह चाहे हिंदी हो ना कि चाहे वह बंगाली हो ना कि चाहे वह फ्रेंच हो ना कि वह चाहे जर्मन हो जिस परिस्थिति में जिस युग में जिस देश में आप रहते हैं सभी के लिए एक ही तरह के नियमों का पालन करना होगा हमारी इंडिविजुअल व्यष्टि साधना में यानी कि देश काल और पात्र यह तीनों की सीमाओं को लांघ करके हमारी साधना का रास्ता तैयार हो हुआ है यदि एक राजा भी आज साधक के रूप में ईश्वर प्राप्ति करना चाहता है और उसकी 1000 रानियां भी है तो भी उसको वही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना होगा जो कि एक ऋषि अपनी कुटिया में जंगल में रह कर के अकेले रह कर के तपस्या करता है उसको भी वही ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करना है एक महल में रहते हुए राजा को भी ईश्वर प्राप्ति के लिए वही व्रत का पालन करना होगा यह हो गया ईश्वर के साथ में में अपना रिलेशन किंतु जब राजा का कर्तव्य पालन आता है और यह वन में रहने वाले ऋषि के कर्तव्य का पालन आता है तो वह बिल्कुल भिन्न है यदि राज्य पर आक्रमण होगा तो राजा का कर्तव्य है कि अपनी प्रजा का रक्षण करना जबकि इस ऋषि की कुटिया प आक्रमण होगा तो ऋषि कहेगा कि ना ही यह कुटिया मेरी है ना ही जो वस्त्र मैंने पहने हैं वो मेरे हैं यदि यह चोर डकेट आकर के मेरी टिया जला दे यदि मेरा वध भी कर दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं ब्रह्मण हूं मैं ब्रह्मज्ञानी हूं ऐसा बोलकर के ऋषि यदि अपति का करता है आक्रमण का प्रतिकार नहीं करता है तो भी चलेगा एक्चुअली ऋषि का तो वही कर्तव्य होना चाहिए ऋषि के रूप में क्योंकि वह समाज को आदर्श देने के लिए उसका जीवन है तो राजा का जीवन है समाज की रक्षा करने के लिए राजा का कर्तव्य राजा का धर्म है समाज की रक्षा तो ऋषि का धर्म ऋषि का कर्तव्य है समाज को आदर्श दिखाना कि सर्वोच्च साधक का आदर्श कैसा हो सकता है तो इन ऋषि मुनि को देखिए उनको देख कर के आप सीखिए उस समय कोई यह नहीं कहेगा कि जाओ राजा के पास में जाओ महल में इतने भोग विलास में रह रहा है उसके पास जाकर सीखो कि मनुष्य जीवन का आदर्श क्या होना चाहिए साधक का आदर्श क्या होना चाहिए ऐसा कोई नहीं कहेगा तो ऋषि मुनि का यह समाज के प्रति उनका कर्तव्य समाज के भीतर में उनका जो रोल है वो अलग है राजा का अलग है वैद्य का अलग है सैनिक का अलग है लॉयर का अलग है जो वाणिज्य व्यापार में लगे हुए हैं उनका अलग है एस्ट्रोनॉमिकली का पति का सबका अपना-अपना रोल है इस रोल को हमको निभाना है तो वह हो गया अपना सामाजिक धर्म या तो समष्टि धर्म और यह हो गया अपना व्यष्टि धर्म या तो फिर व्यक्तिगत धर्म अभी यहां पे देखिए कि स्वामी जी के जीवन में यह दोनों चीज कैसे यहां पे इस माय प्लान ऑफ कैंपेन में आकर के इकट्ठा हो जाती है और यदि हम यह डिस्टिंक्शन क्लियर ना समझे कि स्वामी जी कहां पर अपने व्यष्टि या तो व्यक्तिगत धर्म के बारे में बात कर रहे हैं कहां पर वो समष्टि धर्म के बारे में बात कर रहा अभी देखिए कि समाज में भारतीय समाज में स्वामी जी ने अपने लिए कौन सा रोल निकाला था खोज निकाला था वो था युग नायक का जैसे कि स्वामी गंभीरानंद जी ने स्वामी विवेकानंद की जो बायोग्राफी लिखी है उसका नाम ही उन्होंने दिया है युग नायक स्वामी विवेकानंद स्वामी विवेकानंद भारत के उस उत्थान के प्रहरी थे इस उत्थान के वो जैसे कि साम वेद गाने वाले ऋषि थे जिनके आह्वान से जिनकी चुनौती से भारत के युवा एकत्रित हुए इकट्ठा हुए जागृत हुए और भारत को जैसे कि उत्थान और सफलता के एक के बाद एक सोपान सर करवा रहे हैं तो युग नायक का स्वामी जी का रोल है यहां पर भारत में आने के बाद में तो यह दोनों रोल देखिए जब स्वामी जी अमेरिका में थे बहुत हद तक वह व्यक्तिगत की जो साधना थी वह किया करते थे जैसे कि सीखना और सिखाना कोई भी आध्यात्मिक व्यक्ति है अध्ययन अध्यापन यह दो कार्य वह करता है स्वाध्याय और शिक्षा यानी कि वह सीखता भी है और सिखाता भी है किसी भी आध्यात्मिक व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन देखिए यह दोनों बातें आपको देखने को मिलेगी वह शिष्य भी होता है और आखिर में वह गुरु भी होता है गुरु के रूप में जो अध िक रत्न उसने प्राप्त किए समाज में उसको जैसे कि बिखेर देना है जो भी आध्यात्मिक ज्ञान पिपासु आया उनको वह आध्यात्मिक सरा का पान करवाएंगे यह उसका धर्म है व्यक्तिगत साधक का तो यह धर्म स्वामी जी ने अमेरिका में बहुत अच्छे से पालन किया था वह वहां पर उनका व्यष्टि धर्म था व्यक्तिगत धर्म था व्यक्तिगत धर्म के अनुसार आक्रमण होते हैं यदि अपने पे यदि अपनी निंदा होती है तो उसकी उपेक्षा ही करनी है उसको बहुत ज्यादा उसके ऊपर में ध्यान नहीं देना है किंतु यही स्वामी जी जब भारत में पदार्पण किए तब उनका रोल इस यहां पे भारतीय समाज में डिफरेंट हो गया यहां पे वह युग नायक है यहां पे वह सिर्फ एक आध्यात्मिक ज्ञान पिपासु आध्यात्मिक शिक्षक मात्र नहीं है यहां पर पूरे समाज को उनको एकत्र करके एकजुट करके सीकृत करके उनको एक नई दिशा देनी है सबको अपना अपना कार्य बांट करके उनको एक नया मिशन देना है तो जयदिश धर्म का पालन करते करते उनके ऊपर में आक्रमण होते हैं तो एक राजा की तरह उनको इसका डट करके मुकाबला करना होगा यदि नहीं करेंगे तो उन्होंने अपने कर्तव्य पालन ठीक-ठीक नहीं किया ऐसा कहा जाएगा बहुत बार ऐसा होता है कि यदि राजा कायर है तो फिर वह धर्म का सहारा लेकर के धर्म का नाम देकर के कहेगा कि मैं तो त्यागी हूं मैं तो संसार संसार के प्रति मेरी कोई वासना नहीं है इसलिए मैं शत्रुओं का रक्ष शत्रुओं के आक्रमण के सामने प्रतिकार नहीं करूंगा शत्रुओं के सामने मेरी प्रजा का रक्षण नहीं करूंगा किंतु जब कोई भी राजा ऐसा कहता है तो वह अपने धर्म का या तो फिर सद्बुद्धि का नहीं अपनी कायरता का ही परिचय देता है और सबसे बड़ा उदाहरण है यह अर्जुन जिसने कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में ऐसा कहना चालू कर दिया था कि नहीं मुझे युद्ध नहीं करना है क्योंकि युद्ध मेरा कर्तव्य नहीं है मेरे सामने यह चाचा मामा काका भुआ फई ये जो सभी लोग जो खड़े हैं मेरे रिलेटिव्स आचार्य पितामह जो मेरे सामने खड़े हैं उनका वध करके क्या मैं पाप का पाप का भागीदार बनूंगा यह बात यदि व्यक्तिगत धर्म से देखी जाए यदि आज मैं अपने घर में रहता हूं एकाएक में अपने परिवार जनों की हत्या करना शुरू कर दूं तो इमीडिएट पुलिस वाले आ कर के जेल में डाल देंगे और वह तो पृथ्वी पर तो जो सजा होगी पर जन्म में जो सजा होगी इसका जो भार कर्मों का बोझा लेकर के दूसरे जन्म में जाऊंगा वह तो पता नहीं कितना बड़ा होगा किंतु यही व्यक्ति जो कि अपने घर में रहकर के एसे व्यक्तिगत उसके रोल में अपने परिवार जनों की हत्या नहीं कर सकता है करने से बहुत बड़ा पाप का भागीदार बनेगा यही व्यक्ति जद य है युद्ध क्षेत्र में खड़ा है परिवार जन शत्रुओं की सेना में है तो उन परिवार जनों का वध करना उसका कर्तव्य है देखिए कि किस तरह से रोल रिवर्सल होता है किस तरह से धर्म एक दूसरे के जैसे कि अपोजिट दिखते हैं उस समय यदि मैं यदि यह योद्धा शूरवीर होगा तो फिर अभी देखिए कि हत्या करना एक घमंड से भी हत्या होती है यह भी एक चीज देखना है हम यदि अपने कर्तव्य का पालन करते हैं तो कर्तव्य का पालन हम किस दृष्टि से करते हैं घमंड से प्रेरित होकर के मान यश जश प्राप्त करने के लिए लोगों पर अधिकार जमाने के लिए क्या हम धर्म का पालन करते हैं कि फिर हम लोग धर्म की रक्षा करने के लिए धर्म का पालन करते हैं यह भी एक बहुत बड़ी देखने की बात है क्योंकि आखिर में धर्म का डेवलपमेंट क्यों हुआ धर्म को मानव जीवन में स्थान क्यों मिला क्योंकि एक तरह देखा गया कि ज्यादातर लोग बहुत सारे लोग अपनी वासना की पूर्ति के लिए जो चाहे करते हैं जिसके साथ में चाहे युद्ध करते हैं जिसकी चीज चा उनको अच्छी लगती है वह झड़प लेते हैं हड़प लेते हैं चोरी करते हैं डके करते हैं लोगों की हत्या करते हैं क्या-क्या नहीं करते हैं तो चोरी नहीं करना डके द नहीं करना दूसरों की चीज हथिया नहीं लेना यह सब धर्म इसलिए बने हैं किंतु वही धर्म यदि आप जासूस है अपने देश के और अपने देश की रक्षा करने के लिए दुश्मन के देश में जाकर के आप जासूसी कर रहे हैं तो आपको झूठ बोलना पड़ेगा उस समय आपको हत्या करनी पड़ेगी चुपके-चुपके उस समय हो सकता है कि आपको चोरी करनी पड़े उस देश के सीक्रेट छीन लेने के लिए उस समय यदि हो सकता है लोगों को ठगना फुसलाना पड़े हो तो आपके लिए क्योंकि वह जासूस का धर्म है यदि आप वैध है और आप छोटे बच्चे आपके पास में आने से डर कतराते हैं डरते हैं क्योंकि आप हो सकता है उनको सर्जरी करने की सलाह देंगे हो सकता है कड़वी दवाई उसको खिलाएंगे तो फिर यह धर्म काम नहीं करेगा कि छोटे बच्चों को कभी हानि नहीं पहुंचाना है यह धर्म वैद्य के लिए कार्य नहीं करेगा आप जिस रोल इस सोसाइटी में आप आपका जो रोल है इस सोसाइटी में उसको निभाने के लिए जो ध आपको करना पड़े वह धर्म का पालन करना है किंतु धर्म का पालन का अर्थ है अपनी खुद की व्यक्तिगत वासना एं कामनाओं का चरितार्थ करने के लिए नहीं राजा शत्रुओं के आक्रमण का उत्तर देता है उसको इस अर्थ से भी दे सकता है कि मैं जीत जाऊंगा तो मेरा पावर मेरे देश में बहुत सारा बढ़ जाएगा मैं बहुत ज्यादा टैक्सेशन लोगों से निकाल पाऊंगा बहुत ज्यादा लोगों पर शासन कर पाऊंगा इस अर्थ से भी हो सकता सता है कि कोई राजा शत्रुओं के आक्रमण का उत्तर दे और इस अर्थ से भी हो सकता है कि धर्म का पालन करने के लिए राज्य की रक्षा करने के लिए राजा शत्रुओं के आक्रमण का डट कर के सामना करें यानी कि देखिए कि एक चीज दोनों धर्मों में समान है बाकी सब चीजें जैसे कि हत्या नहीं करना झूठ नहीं बोलना चोरी नहीं करना संग्रह नहीं करना यह सब बातें व्यक्तिगत धर्म में और समष्टि गत धर्म में अलग हो सकती है किंतु एक प्रिंसिपल जो है वह व्यष्टि धर्म और समष्टि धर्म दोनों में समान है वह है निस्वार्थ होता जैसे ही आपने अपने कार्य में स्वार्थ को प्रवेश करवाया साथ-साथ में ही ईश्वर की ओर आपकी जो साधक के रूप में प्रगति हो रही थी उसमें भी बाधा आएगी और समाज में आपका जो रोल है यह समष्टि धर्म जिसका आप पालन कर रहे हैं उसमें भी बाधा आएगी तो इवन ब्रह्मचर्य यदि कहे यदि यह कहेंगे सत्य जो कि जनरली कहे जाते हैं सत्य और ब्रह्मचर्य रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा यह दोनों बातों को सर्वश्रेष्ठ आदर्श सबके सबसे फंडामेंटल आदर्श माने गए हैं इस आदर्श को भी यदि आप सन्यास धर्म गृहस्थ धर्म इन दो तरीके से देखें तो आपको दिखेगा कि संपूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य संपूर्ण रूप से सत्य पालन गृहस्थ धर्म में नहीं होगा गृहस्थाश्रम में नहीं होगा वहां पर यथाशक्ति का नियम आएगा तो य इसमें भी आप देखेंगे कि कंप्रोमाइज करने की एक स्कोप रहता है कंप्रोमाइज करने की एक आवश्यकता आन पड़ती है तो किया जाता है किंतु एक धर्म ऐसा है एक वैल्यू ऐसी है एक ऐसा आदर्श है जिसमें कहीं पर भी कंप्रोमाइज नहीं होना चाहिए वो है निस्वार्थ होता यदि स्वार्थ के मारे राजा अपने राज्य की रक्षा करता है स्वार्थ से प्रेरित होकर के शिक्षक शिक्षा देता है स्वार्थ से प्रेरित होकर के वैद्य अपने पेशेंट्स का निराकरण करते हैं उनका निदान करते हैं तो फिर वह धर्म का पालन नहीं करते हैं वह जैसे कि आधा संसार यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि लोभ कामना वासनाओं में जो डूबा हुआ है वे लोग भी उसी में डूबे हुए हैं ऐसा हम कभी नहीं कह पाएंगे कि वोह धर्म के पथ पर चल रहे हैं या धर्म की रक्षा कर रहे हैं किंतु जिस क्षण उन्होंने निस्वार्थ होकर के अपना कार्य किया निस्वार्थ होकर के मैंने अपना व्यक्तिगत धर्म है ईश्वर प्राप्ति का उसका अनुष्ठान किया निस्वार्थ होकर के मैं राजा हूं तो राज्य धर्म का पालन कर रहा हूं निस्वार्थ होकर के मैं बिजनेसमैन हूं तो मैं अपना बिजनेस चला रहा हूं जो कुछ भी है उसमें मैं निस्वार्थ होकर के करूंगा तो कार्य कलाप इमीडिएट कीली धर्म की कैटेगरी में आ जाएंगे और स्वार्थ से प्रेरित होकर के यदि मैं पूजा भी करता हूं स्वार्थ से प्रेरित होकर के मैं यदि जब ध्यान भी करता हूं तो वह भी कभी भी धर्म की कैटेगरी में नहीं आएगा एक ट्रांजैक्शनल रिलेशन हो जाएगा जैसे कि हम स बाजार में जाकर के 50 देकर के 1 किलो टमाटर खरीद लिए जो भी उसका एक किलो का रेट हो आजकल तो ऐसे ही यहां पर मैंने जब ध्यान करके मंदिर में में श्रीफल ऑफर करके ना कि फिर कोई तीर्थ यात्रा करके तपस्या करके ईश्वर के पास से कुछ मांग लिया कि मुझे परीक्षा में पास कर दो मेरी बीमारी ठीक कर दो मेरे घर में यह समस्या है उसको ठीक करवा दो तो फिर मैं आपको बदले में इतना रुपया मिठाई आपको धरा दूंगा मंदिर में जाकर के या तो फिर इतना रुपया का मैं जाकर के किसी को प्रणामी दे दूंगा साधु को यह ट्रांजैक्शनल रिलेशन हो गया यदि हम स्वार्थ के मारे करते हैं तो अभी देखिए यह जो पूरा चक्र है उसको हम फिर से एक आउटलाइन एनालिसिस किस तरह से करेंगे निस्वार्थ होता है धर्म का फाउंडेशन जिस क्षण हम निस्वार्थ होकर के निस्वार्थ से प्रेरित होकर के जो कोई भी कार्य करते हैं वो धर्म में परिणत हो जाएंगे और स्वार्थ से प्रेरित होकर के जो कुछ कार्य करते हैं वो सब अधर्म तो नहीं एटलीस्ट किंतु एटलीस्ट वो धर्म के क्षेत्र में भी धर्म के लेवल पे भी नहीं रहेगा एक ट्रांजैक्शनल रिलेशनशिप हो जाएगा तो यह सबसे बड़ा प्रिंसिपल है कि निस्वार्थ होता दूसरा सबसे बड़ा प्रिंसिपल है कि व्यष्टि धर्म या तो व्यक्तिगत धर्म और समष्टि धर्म या तो फिर सामाजिक धर्म व्यष्टि धर्म अर्थात ईश्वर प्राप्ति के लिए मुझे जो कुछ करना है वह मुझे करना है समष्टि या सामाजिक धर्म अर्थात कि समाज में मेरा एक रोल है और उस रोल का पालन करने के लिए मुझसे जो होना प पड़े वो मुझे करना है तो यहां पे देखिए कि यह दो मेजर प्रिंसिपल एक तो निस्वार्थ का द सेल्फलेस प्रिंसिपल और यह समष्टि व्यष्टि प्रिंसिपल यहां पर देखिए कि स्वामी जी इन लोगों का जो प्रतिकार करते हैं वह समष्टि धर्म से प्रेरित होकर के किया है इसलिए ठाकुर की वह जो बात है कि जब ब्रह्मचारी ने साप को कहा कि तुमको फस तो करनी थी अपनी रक्षा करने के लिए और फिर बाद में जैसे ठाकुर ने कहा कि साधु को तो फस भी नहीं करनी है अर्थात कि अपनी रक्षा करने के लिए किसी को डर भी नहीं दिखाना है अपनी रक्षा की बात ही भूल जानी है ईश्वर के ऊपर में उस हद तक जैसे कि आपको आश्रित होक के रहना है वो जो एक दूसरी सुंदर कहानी है कि एक आदमी जा रहा था रास्ते से कुछ धोबी लोगों ने कपड़े धो कर के सुखाए थे उसके ऊपर पैर पड़ गया तो फिर यह धोबी लोग उसको मारने के लिए आए तो फिर यहां पर भगवान वो बैठे थे शिव ना कि विष्णु में भूल गया जो भी है वो भगवान उठ कर के उसकी रक्षा करने के लिए जा रहे हैं तो देवी ने पूछा भगवान कहां जा रहे हैं तो फिर भगवान ने उत्तर दिया कि मेरे भक्त को लोग मारने के लिए जा रहे हैं इसलिए मैं रक्षा करने के लिए जा रहा हूं फिर दूसरे क्षण भगवान वापस आ गए तो मा मां ने पूछा कि क्यों वापस आ गए तो भगवान ने उत्तर दिया कि उसने अपनी रक्षा करने के लिए अपने ही हाथ में पत्थर उठा लिया तो फिर यदि वह खुद की रक्षा करना चाहता है तो मेरी की आवश्यकता है तो जो असहाय है जो अपनी रक्षा नहीं करते हैं उन की रक्षा ईश्वर करेंगे तो यह देखिए कि व्यष्टि धर्म और समष्टि धर्म यहां पे ठाकुर जी इस बात को बता रहे हैं वह व्यष्टि धर्म हो गया कि व्यक्तिगत धर्म किंतु राजा जद ऐसा कहेगा कि मैं अप राज्य की रक्षा करने के लिए तलवार हाथ में नहीं उठाऊंगा तो तो फिर तो उसके प्रति य कायरता हो गई फिर वह उसका धर्म नहीं रहा यानी कि गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को जो कहते हैं युद्ध करने के लिए समष्टि धर्म है यहां पर ठाकुर जब कहते हैं कि आपको साधु को अपनी रक्षा भी नहीं करनी है वह हो गया व्यष्टि धर्म तो यह क्लेरिटी के साथ में हम इस प्रवचन को फिर और आगे पढ़ते हैं कि स्वामी जी कहते हैं कि मेरे देश बांधव जानना चाहते थे इसके लिए मुझे यह सब बताना पड़ा कि मेरे साथ में किस-किस तरह का विरोध हुआ किस लोगों ने मेरे रास्ते में बाधा स्वरूप हुए जिससे कि क्या है कि हमारे देश बांधव सम दो-तीन चीजें समझे पहले तो यह जो अच्छे लोगों का मुखौटा पहन कर के ये रिफॉर्म सोसाइटी है या तो फिर यह मिशनरी है वगैरह हमको प्रलोभन से प्रलोभन नहीं होकर के हमको यह समझना है कि भारत के सच्चे हितैषी कौन है वो ये लोग नहीं है विदेशी लोग या रिफॉर्म सोसाइटी भारत के सच्चे हित श है स्वामी विवेकानंद किनको हमको फॉलो करना है तो स्वामी जी को करना है नहीं उन लोगों को जो कि देश हित के नाम पर अपनी स्वार्थ सिद्धि करते हैं तो यह बात भारतीयों को बताने के लिए स्वामी जी को प्रतिकार करना पड़ा था समष्टि धर्म के रूप में अच्छा अभी स्वामी जी आगे कहते हैं कि ट वाज नॉट ऑल यह जो इन लोगों ने मेरे साथ में किया अभी तक का जो वर्णन किया यह बस इतना ही नहीं और भी बहुत बातें हैं आई सो सम थियो सोफिस्ट इन द पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन एंड आई वांटेड टू टॉक एंड मिक्स विद देम मैंने कुछ सोफिस्ट लोगों को पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में देखा और मैंने सोचा यह लोग भारत के उत्थान की बातें करते हैं तो चलो जाकर के उनसे गप लगाया जाए आई रिमेंबर द लुक्स ऑफ स्कोन च वच वेर ऑन देयर फेसेस किंतु जैसे ही मैं उनके साथ बात करने के लिए गया उनके चेहरे पर वह जो तुच्छ का भरी नजरों से उन्होंने मेरे सामने जो देखा एज मच टू एज मच एज टू से व्हाट बिजनेस हैज द वम टू बी हियर इन द मिडस्ट ऑफ द गॉड्स इस तरह से तुच्छ होता की दृष्टि से मेरे सामने देखा और जैसे कह रहे हैं आपस में कि यह जो कीड़ा है छोटा सा वह हम भगवान हम देवताओं के बीच में क्या कर रहा है यानी कि अपने को बड़े तिस मार्का समझते हैं और स्वामी जी को एक वेगा बंड समझते हैं आफ्टर आई हैड गोट नेम एंड फेम एट द पार्लिमेंट ऑफ़ रिलीजन देन केम ट्रिमेंडस वर्क फॉर मी बट एट एवरी टर्न द थियो सोफिस्ट ट्राई टू क्राई मी डाउन वह तो पहले की बात हो गई जब उनको पता नहीं था कि स्वामी जी की प्र प्रतिभा कौन से लेवल की है किंतु जब स्वामी जी सफल हो गए और उन्होंने पूरे अमेरिका में जाकर के प्रवचन देना शुरू किया तब उन लोगों को डर लग गया कि अभी हमारी रोजी रोटी यह छीन लेगा और प्रत्येक क्षण प्रत्येक डग के ऊपर में उन्होंने स्वामी जी का विरोध करने का शुरुआत कर दिया थियोसॉफिस्ट वेर एडवाइज नॉट टू कम एंड हियर माय लेक्चर थियोसोफिकल सोसाइटी के जितने मेंबर थे सबको सर्कुलर दे दिया गया कि स्वामी जी के प्रवचन में जाकर के उनको मत सुने फॉर देयर बाय दे वुड लॉज ऑल सिंपैथी ऑफ द सोसाइटी बिकॉज द लॉज ऑफ द एजोटिक सेक्शन डिक्लेयर दैट एनी मैन हु जॉइन द एसोटेस्ट इंस्ट्रक्शन फ्रॉम कुथु मी एंड मोरिया ऑफकोर्स थ्रू देयर विजिबल रिप्रेजेंटेटिव्स मिस्टर जज एंड मिस्टर मिसेस बेसेंट सो दैट टू जॉइन द एजोटिक सेक्शन मींस टू सरेंडर वनस इंडिपेंडेंस क्यों स्वामी जी का प्रवचन नहीं सुनेंगे क्योंकि जिन लोगों ने जो लोग स्वामी जी का प्रवचन सुनेंगे वे लोग सोसाइटी थियोसोफिकल सोसाइटी की सब तरह की सिंपैथी गवा देंगे और इतना ही नहीं जिन लोगों ने थियोसोफिकल सोसाइटी का एसोटेस्ट ब्रांच थी उनकी उसमें जवाइन किया है तो फिर क्या होगा कि ये ब्रांच को जवाइन करने वाले अपनी आध्यात्मिक शिक्षा दो महात्माओं से प्राप्त करेंगे एक का नाम है कुथु मी और एक है मोरया जो कि तिबेट में रहते हैं जिनके पास में सुपर पावर है और उनके वो जो रिप्रेजेंटेटिव है भ भारत में एनी बेसेंट भारत और लंडन में और अमेरिका में मिस्टर जज इन दोनों रिप्रेजेंटेटिव के द्वारा यह तिबेट के जो महात्मा है व सुपर नेचुरल पावर से उनके पास में सब मैसेज पहुंचाते थे तो यदि आपने यह एजोटेमिया नाम के दो कपोल कल्पित तथाकथित महात्मा के अलावा और किसी के पास में से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त नहीं करनी है सर्टेनली आई कुड नॉट डू एनी सच थिंग नॉर कुड आई कॉल एनी मैन अ हिंदू हु डिड एनी सच थिंग जो लोग इस तरह के महात्माओं में विश्वास करते हैं पहले तो स्वामी जी कहते हैं मैं खुद इस तरह के महात्मा में विश्वास नहीं कर सकता दूसरी बात है कि जो लोग इस तरह के महात्मा में विश्वास करते हैं उनको मैं हिंदू ही नहीं कहूंगा आई हैड अ ग्रेट रिस्पेक्ट फॉर मिस्टर जज ही वाज अ वर्धी मैन ओपन फेयर सिंपल एंड ही वाज द बेस्ट रिप्रेजेंटेटिव द थियो सोफिस्ट एवर हेड अभी अमेरिका में स्वामी जी मिस्टर जज को मिले थे अभी इसके बारे में स्वामी जी का अच्छा ओपिनियन है कहते हैं कि ओपन फेयर सिंपल ओपन अर्थात कि वह उसका हृदय अच्छा था व सरल आदमी था स्वामी जी का दुष्प्रचार नहीं करता था जो आध्यात्मिक पिपासु है उसके प्रति उसकी सहानुभूति थी जो कि थियोसोफिकल सोसाइटी के जितने भी अन्य रिप्रेजेंट टिव थे उन सब में यह मिस्टर जज सबसे अच्छे लगे स्वामी जी को आई हैव नो राइट टू क्रिटिसाइज द डिस्प्यूट बिटवीन हिम एंड मिसेस बेटन बेसट वन इच क्लेम दैट हिज और हर महात्मा इज राइट अभी ये मिसेस बेसेंट और यह मिस्टर जज इन दोनों के बीच में झगड़ा चल रहा था दोनों एक ही तरह के महात्मा के पास जाकर कहते थे कि यह महात्मा जो है हमारे अच्छे महात्मा है सच्चे महात्मा है और इस महात्मा से जो हमको मैसेज मिलता है वही सच्चा मैसेज है तो एंड द स्ट्रेंज पार्ट ऑफ इज दैट द सेम महात्मा इज क्लेम बाय बोथ और यह आश्चर्य की बात है जो कुथु मी और मौर्या दो महात्मा जिनकी यह रिप्रेजेंटेटिव थे और वह दोनों कहते हैं कि यह कुथु मी और मौर्या जो मुझे कहते हैं वही सच है और दूसरे को जो कहते हैं वह गलत है देखिए यह जो महात्मा और यह मौर्या और कुथु मी को लेकर के वह जो थियोसोफिकल सोसाइटी का चल रहा था उसके बहुत सारे लोगों का एंटरटेनमेंट भी होता था बहुत सारे लोग इससे प्रभावित भी हो गए थे और यह जो महात्मा शब्द है उसको उस समय फेमस करने वाली यह थियोसोफिकल सोसाइटी ही थे और इसीलिए जब यह मैक्स मलर ने ठाकुर के बारे में श्री रामकृष्ण देव के बारे में जो प्रबंध की रचना की उसका नाम उसने दिया था द रियल महात्मा अर्थात कि सही सही महात्मा वह कुथु मी और मौर्या नहीं जो कि तिबेट में बैठे हुए हैं और वह दूरदर्शन से हिप्नोटिज्म या तो फिर टेलीपैथी के माध्यम से मिस्टर जज और मि मिसेस बेसेंट के पास में मैसेज पहुंचाते हैं वो नहीं यदि कोई सही सही महात्मा है तो वह श्री रामकृष्ण है बोलकर के यह महात्मा शब्द का जो प्रचार उस समय हो रहा था इसके पीछे यह थियोसोफिकल सोसाइटी का हाथ था और इसीलिए जब यह देवेंद्र अपना यह जो टैगोर है रवींद्रनाथ टैगोर राष्ट्र कवि उन्होंने गांधी जी को जो महात्मा की उपमा दी थी उसके पीछे में भी यह महात्मा शब्द फेमस जो हुआ था थियोसोफिकल सोसाइटी की वजह से इसीलिए उस शब्द से प्रेरित होकर के रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधी जी को महात्मा कहा था महात्मा गांधी और यहां पर सच्चे महात्मा द रियल महात्मा श्री राम कृष्णा तो यह महात्मा महात्मा यह बहुत चल रहा था थियोसोफिकल सोसाइटी में एक के महात्मा दूसरे के साथ में झगड़ा कर रहे हैं और स्वामी जी कहते हैं कि पूरे पूरा नाटक है मैं तो इस पर विश्वास नहीं ही करूंगा किंतु जो हिंदू इस तरह के महात्मा पर विश्वास करेगा उसको मैं हिंदू ही नहीं कहूंगा लॉर्ड नोज द ट्रुथ इन दोनों के झगड़े में नहीं जाना चाहता मुझे पता नहीं ईश्वर ही जाने क्या सच है ही इज द जज एंड नो वन हैज द राइट टू पास जजमेंट व्हेन द बैलेंस इज इक्वल ईश्वर ही जैसे कि इन दोनों के बीच में जो सत्य असत्य है उसका निर्णय करेंगे ईश्वर ही जाने कि कौन सही है कौन गलत है दस दे प्रिपेयर्ड द वे फॉर मी ऑल ओवर अमेरिका जैसे कि इस तरह से आपस में झगड़ा करके हिंदू धर्म का नाम बदनाम करके मेरी निंदा करके क्या उन्होंने क्या ऐसा करके मेरे लिए रास्ता वो ठीक किया है क्या मेरे लिए रास्ता क्लियर किया है अमेरिका में बिल्कुल नहीं देखिए स्वामी जी जब लंडन गए थे उस समय स्वामी जी की इच्छा थी कि किस तरह के रिचुअल है या तो किस तरह की पूजा विधि है या किस सोसाइटी इसकी स्थापना करें किंतु इमीडिएट स्वामी जी का जो सलाहकार था इट स्टडी उसने स्वामी जी को साथ-साथ में ही बता दिया कि देखिए यह जो थियोसोफिकल सोसाइटी है उसमें यह महात्मा को लेकर के झगड़ा हो रहा है आपस में इस वजह से थियोसोफिकल सोसाइटी का तो नाम बिगड़ा ही है किंतु साथ में पूरे हिंदू धर्म का नाम बिगड़ गया है वैसे ही तो हिंदू लोग गुलाम है वैसे ही लोग कहते हैं कि उनके पास धर्म नहीं है यह जंगली है इनको क्रिश्चियनिटी सिखानी है ऊपर में से यह हिंदू धर्म से प्रेरित होकर के थियोसोफिकल सोसाइटी आती है और उसके महात्मा आपस में झगड़ते हैं पूरे हिंदू धर्म का नाम बदनाम हुआ है इसके लिए स्वामी जी जब वेदांत का प्रचार करते हैं तो ईटी स्टडी कहता है ना ही कोई सोसाइट बनानी है ऐसा बोलिएगा ना ही आप कोई ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन के रिप्रेजेंटेटिव है ऐसा बोलिएगा ना ही किसी तरह की पूजा विधि का प्रवर्तन कीजिएगा यानी कि थियो सोफिस्ट लोगों ने स्वामी जी पर व्यक्तिगत आक्रमण करके उनके रास्ते में बाधा होना चाहा वह तो किया ही किया किंतु अमेरिका यूरोप में पूरे हिंदू धर्म का नाम बिगाड़ दिया कि हिंदू धर्म में ऐसे महात्मा है जो कि फ्रॉड है जो कि निकम में है जो कि लोगों को ठक हैं तो यह क्या स्वामी जी का रा ठीक रास्ता क्लियर करना हुआ बिल्कुल नहीं तो यहां पर स्वामी जी इस तरह से सियो सोफिक सोसाइटी के बारे में बताते हैं अभी जो पॉइंट है थर्ड पॉइंट है वहां पर स्वामी जी के रास्ते में कौन बाधा स्वरूप बने जिसका विवरण स्वामी जी देते हैं तो क्रिश्चियन मिशनरीज और मजूमदार तो इस पॉइंट के बारे में अभी हम कल देखते हैं आज यही ओम शांति शांति शांति हरि ओम त श्री राम कृष्णर्पण

प्रश्न: निःस्वार्थता के बारे में

मस्तु मेन चीज है कि यदि आप ठीक-ठीक एनालिसिस नहीं करेंगे तब तक आपको निस्वार्थ का रोल भी समझ में नहीं आएगा क्योंकि कोई भी धार्मिक व्यक्ति है उसको यदि अपना लिटरेचर पढ़ेगा तो उसको दो ही चीज समझ में आएगी जो कि मोस्ट फंडामेंटल है ब्रह्मचर्य और सत्य किंतु यदि यूनिवर्सल एक पॉइंट ऑफ व्यू से देखा जाए कि अलग-अलग लोगों का अलग-अलग धर्म है तो इवन ब्रम और सत्य भी यूनिवर्सल नहीं हो सकते हैं आप जद गृहस्थ आश्रम में है यथाशक्ति उसको पालन करना होगा तो यूनिवर्सल प्रिंसिपल कौन सा निकल के आता है तो वही निस्वार्थ का यह अपने लिटरेचर में ही देखिए ना जब निरंजन महाराज ने नौकरी करने की शुरुआत की थी तब ठाकुर ने क्या कहा था कि तुम यदि अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए नौकरी करता तो मैं कहता धिक किंतु अपनी मां की सेवा के लिए कर रहे हो तो तो कुछ नहीं है फिर क्या कहते हैं मेरे निरंजन में थोड़ा सा भी अंजन नहीं है यानी थोड़ा सा भी दाग नहीं है राजा महाराज को ने शादी की थी तो ठाकुर ने उसको घर वापस भेजा था कि कुछ कर्म बाकी रह गए हैं जाओ घर जाओ फिर उनका पुत्र भी हुआ फिर आखिर में वो वापस आए तो वो जो कर्म का फेरा बाकी रह गया था उसको पूरा करके आओ अदर वाइज यहां पर टिक नहीं पाओगे देखिए कि राजा महाराज को ठाकुर के पास से क्यों जाना पड़ा क्योंकि जो लोग वहां पर नए-नए आते थे उनके प्रति उनकी बड़ी इर्षा थी तो ठाकुर खुद कहते थे कि एक जगह पर उन्होंने कहा है कि वो यदि यहां पर रहता ना तो यह नए का आगमन शक्य नहीं होता किंतु फिर माने ही जैसे कि राजा महाराज को वहां से निकाल दिया वोह वृंदावन गए थे मथुर बा बलराम बाबू के साथ में काला बाबू कुंज में रहे थे हृदय परिवर्तन हुआ घर गए पत्नी के साथ में रहे पूरा वोह कर्म का चक्र समाप्त हो गया तब कहीं जाकर के वापस आए तो जो स्वार्थ था बोलकर के ठाकुर के पास में से उनको जाना पड़ा फिर जब राजा महाराज वापस आते हैं तो एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है कि व पागली व बार-बार ठाकुर को परेशान करने के लिए आती है काशीपुर गार्डन में तो निरंजन महाराज वगैरह बड़े नाराज होकर के कहते हैं कि हम तो ये पागली यहां पे आती है उसकी पिटाई करनी पड़ेगी क्यों ठाकुर को परेशान करती है तो राजा महाराज ने कहा कि तुमको शर्म नहीं आती है ठाकुर के सामने इस औरत के बारे में असहाय महिला के बारे में ऐसी बात कर रहे हो तो निरंजन महाराज कहते हैं तुम्हारी औरत है तुम्हारी पत्नी है इसलिए तुमको दया आती है हम लोग चाहे तो उसका बलिदान भी दे सकते हैं राजा महाराज का यदि आप डेवलपमेंट देखेंगे निस्वार्थ कितनी क्लियर दिखती है धीरे-धीरे करके उनका जो हृदय उदार होना शुरू हुआ जो उदारता की वजह से वह संघ के राजा हो पाए ठाकुर ने क्या कहा वह राज्य चला सकता है राज्य कौन चला सकता है जो उदार है वही चला सकता है जिस जो सोचता है कि मैं इसका बलिदान दे दूंगा उसका बलिदान दे दूंगा वो राजा नहीं हो सकता बहुत अच्छा सैनिक हो सकता है राजा नहीं हो सकता बिल्कुल ठीक बिल्कुल ठीक है बहुत अच्छी कहानी है कि वह जिस गरीब के घर में गया उसके पास में खाने का कुछ नहीं था एक रोटी था वह उसको दे दिया नेवले को और फिर वह उसको रोटी देकर खुद तो मर गया किंतु उसकी जो चूल्हे की राख है उसमें लेट करके नेवले का आधा शरीर सोने का हो गया फिर यही नेवला वो उस यज्ञ में जाता राजसूय यज्ञ भगवान युधिष्ठिर कर रहे थे राजस यज्ञ तो वहां की यज्ञ की राख में लेट कर के भी आधा सोने का नहीं होता तब वो यह कहानी कहता है कि सही सही निस्वार्थ क्या है अपना प्राण देकर के दूसरों के प्राण की रक्षा करना यह है सही निस्वार्थ वरना आपके पास करोड़ रुप एक लाख दान दे दिया कौन सी बड़ी बात हुई वो जो कठोपनिषद की बात है ना वो सब दे देने वाला यज्ञ ये नचिकेता के पिताजी कर रहे थे तो क्या-क्या दिया यज्ञ में ऑफर क्या किया तो ऐसी यात याम गतर रसम ऐसी सब गाय जिनका दूध दो लिया गया था जिनका जीवन समाप्त हो लिया गया था जो घास खाना था वो खा लिया गया था दुबली पतली सुखी गाय दान में दी तब कहीं जाकर के नचिकेता को कहना पड़ा कि आप मुझे किसको देंगे दान में ना किंतु इवन देखिए कि सनातन धर्म की

प्रश्न: मान लीजिए कि एक साधु हमारे स्कूल में प्रिंसिपल है। उन्हें स्कूल के अच्छे परिणाम पर गर्व होगा, लेकिन वह अपनी योग्यता पर कभी गर्व नहीं करेंगे।

दृष्टि से भी देखेंगे तो मैं स्कूल चला रहा हूं स्कूल का अच्छा रिजल्ट आया उससे मुझे जो गर्व होता है वह समष्टि धर्म के उसमें आ जाता है व्यष्टि धर्म अर्थात कि मैं इंटेलिजेंट हूं मुझे इतने मार्क आए जो मुझे गर्व होगा वह गलत है क्योंकि मुझे अपनी व्यक्तिगत साधना में गर्व या तो घमंड नहीं चाहिए किंतु गर्व होना समष्टि साधना में वह ठीक है तो यह व्यष्टि समष्टि का डिफरेंशिएबल होता है व्यष्टि और समष्टि को हमने एकाकार कर दिया है मिक्स अप कर दिया है वो बुद्धिज्म से प्रॉब्लम स्टार्ट होता है और इसी माय प्लान ऑफ कैंपेन में स्वामी जी एकदम स्पष्ट रूप से कहेंगे कि भारत की जो अवनति हुई उसमें यह बुद्धिस्ट करप्शन सबसे ज्यादा रिस्पांसिबल था मोर देन इवन यह इस्लाम के आक्रमण या स्टीट इंडिया कंपनी से क्योंकि ये जो भारत की जो मूल जो भित्ति थी व्यष्टि और समष्टि धर्म को प्रॉपर डिस्टिंक्शन उस डिस्टिंक्शन पे ही जैसे कि कुठाराघात आ गया आज हम कहते हैं गर्व नहीं करना क् गर्व नहीं करेंगे हम अपने खुद की अचीवमेंट पे नहीं करेंगे अपने राज्य की अपने स्कूल की अपने परिवार की अचीवमेंट पे मां अपने बच्चे की अचीवमेंट पे गर्व नहीं करेगी यह क्या कभी हो सकता है नहीं करेगी तो वह गलत होगा तो यह व्यष्टि समष्टि डिस्टिंक्शन जो कि अपने हिंदू धर्म में बड़ी ही क्लियर थी उस डिस्टिंक्शन को ही जैसे कि गड़बड़ कर दी आज तक यह गड़बड़ चलती आती है अपने समाज में बोलते हैं कि आपको धार्मिक है ना तो आप अच्छे पॉलिटिशियन नहीं हो सकते धर्मी है तो अच्छा आप राजनेता नहीं हो सकते अच्छे सैनिक नहीं हो सकते क्योंकि धर्म के अनुसार तो हम निर्बलता यानी कि अपना रक्षण नहीं करना यह सब है राजा को रक्षण नहीं करेगा तो कैसे चलेगा तो यह जो कंफ्यूजन जो खड़ा हुआ है कि राजा या तो सैनिक धार्मिक नहीं हो सकता यह बुद्धिज्म की वजह से हुआ

प्रश्न: व्यष्टि धर्म में निःस्वार्थता को दूर करना है - समष्टि धर्म में नहीं

है ना आप जो है ना निरह काता और निस्वार्थ में कंफ्यूजन कर रहे हैं निर अहं काता नहीं होनी चाहिए व व्यक्तिगत लेवल पर और अहंकार यदि समष्टि लेवल पर होता है तो चलेगा यह हम स्वीकार करते हैं किंतु निस्वार्थ इक्वली दोनों को अप्लाई करती है स्वार्थ क्या है देखिए स्वार्थ का डेफिनेशन क्या है मैं ज्यादा पैसे कमाऊं तो मेरे मन में स्वार्थ आ गया मैं झूठ मूठ झूठ बोल कर के चीटिंग करके नियम का भंग करके ज्यादा पैसा कमाऊ यदि मेरे में स्वार्थ है तो व्यक्तिगत लेवल पे यदि स्कूल चलाता हूं मेरा स्वार्थ आ गया तो फिर यह बच्चों से ज्यादा ज्यादा फी इकट्ठा करूंगा देखिए पूरा जो एक स्कम चल रहा है एजुकेशन सिस्टम में आपको मेरी ही जो मैंने अपनी स्कूल है तो मैंने ऐसे-ऐसे मेरे ये यह है मेरे बिजनेस पार्टनर है आपको नोटबुक भी उनके पास में से खरीदना है आपको यूनिफॉर्म भी उसके पास में से ही खरीदना है आपको स्कूल मटेरियल भी उन्हीं के पास में से खरीदना है और व लोग आपसे ज्यादा ज्यादा रुपया चार्ज करेंगे ये पूरा एजुकेशनल स्कैम चल रहा है यह कहां से आता है यह स्वार्थ में से आता है मैं यदि सही सही निस्वार्थ हूं तो तो मैं अपने स्टूडेंट को बताऊंगा कि चीपेस्ट स्कूल यूनिफॉर्म कहां मिलेंगे चीपेस्ट मटेरियल आपको स्कूल मटेरियल कहां से मिलेगा यानी कि निरह काता अलग है निस्वार्थ अलग है मैं अहंकार कर सकता हूं कि मेरी स्कूल बहुत अच्छी चल रही है किंतु जिस क्षण मैंने स्वार्थ करना चालू किया तो मैंने बच्चों का अहित ही करना शुरू कर

प्रश्न: हम केवल व्यक्तिगत स्तर पर स्वार्थी हैं, सामाजिक स्तर पर नहीं?

दिया मैंने जिस तरह से एनालिसिस किया है वो आपके एनालिसिस से थोड़ा सा डिफर होता है आप कहते हैं कि इंडिविजुअल के भीतर में स्वार्थ नहीं होना चाहिए यदि मैं स्कूल में जाता हूं तो एज मेरा नाम है शशिन तो शशिन में स्वार्थ नहीं होना चाहिए किंतु प्रिंसिपल में यदि स्वार्थ होगा तो चलेगा मैं इस तरह से एनालिसिस नहीं किया मैंने एनालिसिस इस तरह से किया है कि हमारी विभिन्न आइडेंटिटी है यहां पे इंडिविजुअल और कलेक्टिव को नहीं छोड़ सोच कर के एक तो एक आइडेंटिटी है जो कि साधक के रूप में है इस आइडेंटिटी में मेरा और ईश्वर के साथ में रिलेशन है जिसको कि मैं व्यष्टि आइडेंटिटी कहता हूं एक मेरी समष्टि आइडेंटिटी है कलेक्टिव आइडेंटिटी जिसमें कि विदिन अ सिस्टम मेरा एक रोल रहता है जैसे कि मैं प्रिंसिपल हूं ये दोनों आइडेंटिटी में स्वार्थ नहीं होना चाहिए यदि मैं साधक की आइडेंटिटी है उसमें स्वार्थ आ गया तो ईश्वर को प्राप्त करने की मेरी साधना रुक जाएगी और यदि प्रिंसिपल की आइडेंटिटी है उसमें स्वार्थ आ गया तो मैं बच्चों का अहित करना शुरू कर दूंगा अभी निस्वार्थ का दोनों में को मन है किंतु गर्व है घमंड है या तो फिर लोगों को नुकसान पहुंचाना है वह यूनिवर्सल नहीं है साधक के रूप में मेरे में नहीं होनी चाहिए किंतु मैं सैनिक हूं तो मैं यदि लोगों को नुकसान नहीं पहुंचा पाऊंगा तो किस बात का सैनिक यदि मैं लोगों को पनिश नहीं कर पाऊंगा तो मैं किस बात का राजा यानी कि निस्वार्थ को छोड़ कर के बाकी जितनी भी वैल्यूज है वो डिपेंड करती है कि आप कहां पर कौन सा रोल कर रहे हैं साधक के रूप में आप नहीं होना चाहिए किंतु समष्टि आइडेंटिटी के रूप में होना चाहिए यह है मेरा एनालिसिस या यहां पर देखिए इसका एक

प्रश्न: एक भक्त द्वारा अपनी रक्षा के लिए पत्थर उठाने की कहानी के बारे में -- यदि हम स्वयं की रक्षा करने के बजाय ईश्वर पर निर्भर रहते हैं, तो क्या यह हमारी ओर से तमस या आलस्य नहीं लगता? क्या यह बेहतर नहीं है कि हम अपनी पूरी क्षमता से लड़ें और फिर अगर हम जीत न पाएं तो भगवान से मदद की गुहार लगाएं?

ना नुआंस क्या है आपने ठीक ही कहा इसका थोड़ा नुआंस देखना होगा अभी देखिए कि ठाकुर ने दो कहानियां और कही है एक तो है कि दो मित्र जंगल से जा रहे हैं शेर आ गया तो एक मित्र कहते हैं चलो भगवान का नाम लेना शुरू करो दूसरा मित्र कहता है पेड़ पर चढ़ जाते हैं एक छोटी चीज के लिए भगवान को क्या हम कष्ट देंगे तो यहां पर देखिए कि जिसको आप पुरुषार्थ कहते हैं वो पुरुषार्थ यहां पर दिखाता है किंतु और और साथ में एक दूसरी कहानी भी देख लेते हैं कि वह हाथी नारायण वो महावत नारायण वाली कि रास्ते से जा रहा था हाथी आ गया तो वह बोल रहा है वो शिष्य सोच रहा है कि गुरु ने कहाय सब नारायण है तो हाथी भी नारायण है स्तव स्तुति करना शुरू कर दिया हाथी ने पटक दिया उसको फिर गुरु आ कर के बोलता है अरे मूरख तुमने महावत नारायण की तो बात सुन ली होती महावत कहता है कि भागो रास्ते से तो तुम भागे क्यों नहीं तो देखिए कि अभी आप नुआंस देखिए यहां पे बड़ा ही सूक्ष्म नुआंस है पुरुषार्थ के बारे में एक पुरुष पुरुषार्थ है कि आप पत्थर उठा कर के प्रति आक्रमण करते हैं यहां पर दूसरा पुरुषार्थ है बाकी की दो कहानी में कि पेड़ पर चढ़ना और रास्ते से भाग जाना इन दोनों पर किंतु आप प्रति आक्रमण नहीं करते हैं आप आत्मरक्षा तो करते हैं प्रति आक्रमण नहीं करते हैं व्हिच इज अ ग्रेट डिस्टिंक्शन बिटवीन ऑल थ्री स्टोरीज के यहां पर वो पत्थर उठाकर प्रति आक्रमण कर रहा था तो इसलिए भगवान ने सोचा कि यदि वह प्रति आक्रमण ही कर रहा है तो उसको करने दो यदि वह अपने को बचाने के लिए भाग खड़ा होता तो वह फिर वह मामला वहीं पर मिट गया होता एक चीज जो नहीं करनी है निष्क्रमण से का जो प्रमाण है तीनों कहानी में यदि धोबी मारने को आ रहा है तो कोई कुछ नहीं करके वहां पर खड़े रहना है जो शेर आ गया तो पेड़ पर नहीं चढ़ के वहीं जमीन पर खड़ा रहना है हाथी आ गया तो वहीं भाग नहीं जाने की बजाय रास्ते पर खड़े रहना है वह निष्क्रमण है किंतु पेड़ पर चढ़ जाना या तो फिर भाग जाना वह एक उचित रिएक्शन है जो कि हमको शक्ति दी है पैर दिए हैं हाथ दिए हैं उसका इस्तेमाल करो चच इज के प्रॉपर रिएक्शन किंतु पत्थर उठा कर के सामने आक्रमण करना यह तो फिर आपने अपना शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू किया सो ट नुआंस इज हियर स्वामी जी कील के दान ना केटलाक लेवल

प्रश्न: भिखारियों को पैसे देने से कोई दीर्घकालिक मदद नहीं मिलती। तो फिर हमें लोगों की मदद के लिए क्या करना चाहिए?

छ सर्वप्रथम छ अन्नदान पछी छ की जीवन दान का तो कहिए कि स्वास्थ्य दान यदि हम अन्न दान कर सकते हैं बहुत अच्छा है यदि उसकी आवश्यकता मिट जाती है तो हेल्थ रूपी जो सेवाएं हैं जैसे कि डिस्पेंसरी वगैरह उसको चलाना है इससे उच्च लेवल का दान है विद्यादान यानी कि एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस और उससे भी उच्च दान है ज्ञानदान यानी कि आध्यात्मिक उपदेश देना तो दान के भी चार लेवल स्वामी जी ने कहे हैं जब अन्नदान की परिस्थिति आ जाती है अन्नदान कर लेना है और अन्नदान वाला परिस्थिति मिट जाता है सबके पास में अन्न की व्यवस्था है तो यह विद्यादान और यह स्वास्थ्य दान यह दोनों तो सभी लोग कर सकते हैं जहां कहीं भी चाहे एनजीओ में वॉटियर होकर के या तो फिर मैंने खुद जो शुरुआत की थी कि एक खुला मैदान में यह सब माइग्रेंट लेबर रह रहे हैं और वोह जैसे जमीन पर ही रह रहे हैं ना ही झोपड़ी या कुछ भी नहीं है तो मेरी स्कूल में वेकेशन था तो जाकर के मैंने थोड़ा बहुत उनको लिखना पढ़ना सिखाया था तो यह और भी लेवल्स है दान के जो कि हम कर सकते हैं [हंसी] देखिए फेस द ब्रूट नॉट अटैक द ब्रूट अगेन सेम डिस्टिंक्शन है पत्थर उठा के उसका उसको मारने को महात्मा ने नहीं कहा स्वामी जी को कहा कि दटके खड़े रहो तुम्हारी निडरता देख के ये लोग भाग जाएंगे ऐसा नहीं कहा लाठी उठा कर के मारना शुरू कर दो प्रति आक्रमण किसी ने नहीं कहा प्रति आक्रमण कहां कहा जाता है जब आप सिर्फ अपनी नहीं अपने परिवार जनों की बंधु बांधव की रक्षा कर रहे हैं तब अपने लड़के को लेकर जा रहे हैं वह मारने को आया जद आप उसको नहीं मारेंगे बच्चे को आप अपने बचने अपने बच्चे को यदि हानि होने देंगे तो किस तरह के पिताजी है तो उस क्षण वह समष्टि धर्म आ जाता है कि मैं अपनी रक्षा सिर्फ नहीं कर रहा मैं दूसरे जो मेरे पर डिपेंडेंट है उनकी रक्षा कर रहा हूं वहां पर समष्टि धर्म आ जाता है फिर वह अर्जुन वाली बात आ जाती है अपने राज्य अपने भाई बहनों की रक्षा करने के लिए अपनी पत्नी का अपमान हुआ उसका बदला नहीं लोगे तो किस तरह के मर्द हो तुम यह तो सीधी सधी बात है किंतु जब आप अकेले खड़े हैं अकेले खड़े हैं और फिर आप यह सब कर रहे हैं तो फिर प्रति आक्रमण नहीं करना उचित है तो डिस्टिंक्शन दोनों तरह से अप्लाई होती है पहली बात तो है कि प्रति आक्रमण नहीं करना और यदि प्रति आक्रमण करना है तो किस स्थिति में करना है यदि आप समष्टि धर्म का पालन कर रहे हैं तब नहीं इट इज गुड एक्चुअली देखिए जितना चिंतन हो चंदन का लकड़ी है ना जितना घिस ना उतना उसमें से खुशबू आएगा सो आप जितना डिस्कस करेंगे उतना मुझे भी सीखने को मिलता

प्रश्न: किस स्थिति में हमें "जानवर का सामना" करना चाहिए और किस स्थिति में हमें भाग जाना चाहिए?

है वो परिस्थिति पर डिपेंड करता है बंदर के सामने जद स्वामी जी भाग जाते हैं ना तो बंदर पीछे पड़ते हैं और हाथी के सामने खड़े रहते तो कोई उपाय नहीं हाथी पूरा पटक देता माने सामने हाथी है बंदर है शेर है देखिए तीन है यहां पर बंदर है सामने खड़े रहना है हाथी है तो भाग जाना है शेर है तो पेड़ पर चढ़ जाना है तो सामने कौन है उसके ऊपर डिपेंड करता है किंतु किंतु मैंने एक जो कांस्टेंट है तीनों में हाथी है बंदर है कि शेर है कांस्टेंट है कि प्रति आक्रमण नहीं करना है वह तीनों में कांस्टेंट है प्रति आक्रमण आप कब करते हैं जबकि आपके ऊपर में डिपेंडेंट दूसरे लोग होते हैं जिनकी आप रक्षा करना चाहते हैं तब आपका समष्टि धर्म अप्लाई हो जाता है तब यष्टि धर्म नहीं चलेगा तब आपको फिर वह प्रति आक्रमण करना ही पड़ेगा अपने आश्रितों की रक्षा करनी ही पड़ेगी बुद्धिज्म में जो गड़बड़ हो गया ये व्यष्टि समष्टि का डिस्टिंक्शन चला गया सबको सोचते हैं कि यह सब हाथी है सब बंदर है सब जैसे कि यह शेर है किंतु फिर राक्षस भी तो है राक्षस जद आ जाएंगे प्रति आक्रमण नहीं करेंगे तो खत्म हो जाएगा राज्य मैटर

प्रश्न: सोमनाथ पर 17 बार हमला हुआ। हमने हमलावरों को जाने दिया। यह गर्व की बात नहीं है, यह शर्म की बात है।

ऑफ शेम मैटर ऑफ शेम हिंदू धर्म में ऐसा कांसेप्ट ही नहीं है यह सब बुद्धिज्म का प्रॉब्लम है जिसने गीता पढ़ी है वो उस तरह का गीता और रामायण महाभारत रामायण दोनों देखिए ना दोनों धर्म ग्रंथ है भगवान राम की पत्नी को उठा कर के ले गया भगवान राम पर आक्रमण किया होता तो भगवान जद रक्षा कर देते पत्नी को उठा मां सीता को उठा अरे ठाकुर का जीवन देखिए ठाकुर हृदय को कहते हैं तुम मेरा अपमान करोगे तो तुम्हारी रक्षा है मां का अपमान करोगे तो तीनों लोक में तुम्हारी रक्षा करने वाला कोई नहीं है ठाकुर जैसे ठाकुर व्यष्टि और समष्टि में डिस्टिंक्शन करते हैं ये शिशुपाल बोला 100 तुम्हारी गलतियां माफ कर दूंगा 101 भी करो फिर देख लेता हूं तुमको