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वाणी प्रहार से तमो नाश 22 Feb 2024

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ओ स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णा यते नम मैं सोच रहा था कि मैं जिस तरह से जिस टॉपिक पर जनरली बोलता हूं तो इस हिसाब से यह जो अपने क्लास है सुबह के उसको क्या कोई पर्टिकुलर यदि नाम दे सकते हैं माने वैसे तो ज्ञान योग पर जब टॉपिक होता है तो ज्ञान योग का नाम दे सकते हैं मां के जीवन का जद टॉपिक होता है तो मां की लाइफ ऐसा नाम दे सकते हैं किंतु इन जनरल कोई भी जब कुछ भी बोलता है तो वह कोई भी प्रेजेंटेशन करता है अकॉर्डिंग टू हिस लीफ एंड अकॉर्डिंग टू हिज अंडरस्टैंडिंग टॉपिक चाहे कोई भी हो हम जब भी बोलेंगे तो हमारा एक बेसिक अंडरस्टैंडिंग है उसके अनुसार सब कुछ एक्सप्लेन करेंगे जैसे कि अब जैसे स्वामी जी का ही एक लेटर है या तो फिर स्वामी जी का ज्ञान योग है इस स्वामी जी का जो वाणी है इसको आप किस परिप्रेक्ष्य से एक्सप्लेन करेंगे एक तो परिप्रेक्ष्य है कि आप वेदांत की दृष्टि से एक्सप्लेन करें एक परिप्रेक्ष्य है कि आप पौराणिक कथाओं के माध्यम से यह सब इसको साथ-साथ में ही एक्सप्लेन करते जाए या तो फिर एक है कि राम कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर का जो इंटरनल स्ट्रक्चर है उसके अनुसार सब कुछ एक्सप्लेन करें यानी कि जो वक्ता होता है या तो जो फिर इस तरह से एक्सप्लेन करता है उसका एक बेसिक अंडरस्टैंडिंग होता है उस अंडरस्टैंडिंग के अनुसार वह जो कुछ भी चीज के बारे में बताएगा एक्सप्लेन करेगा या तो फिर स्वामी जी के पत्र है या तो फिर मां की लाइफ है या तो फिर कथामृत है या तो फिर इवन स्वामी जी के ज्ञान योग लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा टॉपिक चाहे कोई भी हो इवन गीता है या तो फिर उपनिषद है यह सब जितने भी विविध टॉपिक है इस सबके भीतर में इस सबके पीछे में जो वक्ता है या तो जो एक्सप्लेन करता है उसका एक बेसिक अंडरस्टैंडिंग रहता है साधना और साधक जीवन के बारे में जैसे जैसे जैसे फॉर एग्जांपल किसी किसी को मैंने देखा है कि उनका वेदांत का अंदर अंडरस्टैंडिंग इतना अच्छा होता है कि जो कोई भी टॉपिक एक्सप्लेन करेंगे अल्टीमेटली उसको वह वेदांत की दृष्टि से दिखाने का प्रयास करेंगे तो मैं सोच रहा था कि मेरा यह जो अंडरस्टैंडिंग है और मेरा जो एक्सप्लेनेशन है वो इसके भीतर में ऐसा कौन सा थ्रेड है ऐसा कौन सा सूत्र है जो कि सब चीजों को एक साथ में बांधता है सभी एक्सप्लेनेशन को एक सूत्र में जोड़ता है तो मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं जिस दृष्टि से ये ये क्या है कि दिस इज अ प्रोसेस ऑफ सेल्फ डिस्कवरी स प्रोसेस ऑफ सेल्फ एनालिसिस हमको खुद को पता नहीं होता है कि हमारे भीतर में किस तरह से अंडरस्टैंडिंग डेवलप हो रही है जब तक आप इस अंडरस्टैंडिंग को अपनी वाणी से व्यक्त ना करें तो इतने सालों से जो मैं पढ़ता रहता था कि ये पढ़ा वो पढ़ा ये किताब पढ़ी तो ये सब होता क्या है कि जब हम कुछ भी पढ़ते हैं तो हम अपनी एक स्पेशल दृष्टि से इसको देखते हैं तो मेरा जो दृष्टिकोण है अभी तक मुझे नहीं समझ में आ रहा था या तो फिर मैं जिस तरह से समझ रहा था हो सकता है कि वो मैंने इट मे नॉट बी कंप्लीट किंतु आज कल जैसे मैंने कहा कि मैं सोच रहा था कि ऐसा मेरा कौन सा दृष्टिकोण है मैं किस दृष्टिकोण से कोई भी किताब पढ़ता हूं मैं किस दृष्टिकोण से किस पॉइंट ऑफ व्यू से कुछ भी समझाता हूं या एक्सप्लेन करता हूं तो मुझे लगता है कि मेरा जो दृष्टिकोण या तो पॉइंट ऑफ व्यू है उसको यदि मैं नाम दूंगा तो वह कहा जाएगा साध्य साधक और साधना अर्थात कि साधन जीवन है यह जो अपना आध्यात्मिक जीवन है यह आध्यात्मिक जर्नी है उसमें आगे बढ़ने के लिए हमको क्या करना चाहिए बेसिक माने प्रैक्टिकल एस्पेक्ट नहीं कि थियोरेटिकल एस्पेक्ट तो वो प्रैक्टिकल एस्पेक्ट क्या है एक्चुअल साधन जीवन के बारे में मैं जब पढ़ता हूं तो मैं यह समझने का प्रयास करता हूं मैं यह उसमें से उठा लेने का प्रयास करता हूं अब जैसे कि मां की बातें पढ़ते हैं या तो फिर ज्ञान योग पढ़ते हैं तो थियोरेटिकली और प्रसंग की दृष्टि से तो बहुत अच्छा है कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु फिर मेरे खुद के जीवन में इसका इंप्लीमेंटेशन क्या है मैं खुद जो साधन मार्ग में प्रवास करने के समय जो बाधाएं या विपत्तियों का सामना कर रहा हूं उसका समाधान करने के लिए मेरा जो यह रीडिंग है उसमें से मुझे क्या मिल सकता है क्या टूल्स मिल सकते हैं यदि आज की लैंग्वेज यूज करें तो कि क्या मेथड्स मिल सकती है कि जिससे कि मेरी यह यात्रा सहज हो जाए तो यह जो साधन जीवन के बारे में एक प्रैक्टिकल दृष्टिकोण मैंने इस तरह से आज तक नहीं सोचा था मैं पढ़ता हूं तो वैसे ही पढ़ लेता हूं कभी ऐसा सोचता नहीं था कि मैं किस दृष्टिकोण से पढ़ता हूं किंतु आज मुझे ऐसा समझ में आ रहा है कि मेरा जो दृष्टिकोण है मेरा जो पॉइंट ऑफ व्यू है मेरे भीतर में जो एक ब्रेन जिस तरह से काम करता है आप बहुत कुछ पढ़ते हैं सब कुछ आपके मन में एज इट इज नहीं बैठेगा जैसे कि अभी मान लीजिए कि यह स्वामी जी के लेटर्स ही है ये इतनी बड़ी किताब है स्वामी जी के सभी लेटर्स यदि इकट्ठे किए जाए तो स मोर देन आप मान लीजिए कि 800 पेजेस तो ये 800 पेजेस में स्वामी जी के जो पत्रावली सब कुछ पढ़ कर के सब कुछ एज इट इज समझ लेना कि किसी एक साधक के लिए संभव नहीं किसी एक व्यक्ति के लिए संभव नहीं यह किताब पढ़कर मैं क्या समझता हूं अर्थात कि मेरी भीतर में क्या चाह है मेरी क्या इच्छा है मेरी क्या इसको प्रैक्टिकल पॉइंट ऑफ व्यू है समझने का वही हम समझते हैं तो ऐसा मुझे लगता है कि मैं जो कोई भी किताब पढ़ता हूं या तो कोई भी एक्सप्लेनेशन देता हूं इसको मैं साधना की दृष्टि से पढ़ता हूं सोचता हूं और बोलता हूं तो दिस इज सॉर्ट ऑफ रेवलेशन फॉर मी यस्टरडे कि साध्य साधक और साधना यदि हमारी ये जो मॉर्निंग क्लास की सीरीज को कोई एक नाम दिया जाए वैसे तो लेटर्स का लेटर्स के नाम से चलेगा ज्ञान योग ज्ञान योग के नाम से किंतु ओवरऑल सीरीज को तो यह नाम होगा साध्य साधक और साधना अच्छा अभी आगे पढ़ते हैं कि स्वामी जी अपने लेटर में गुरु भाइयों को लिखे हुए लेटर में स्वामी जी क्या कहते हैं तो स्वामी जी ने कल तो एक बार बताया कि बड़े पैमाने पर उत्सव करना है और उत्सव में खाने पीने का बहुत ज्यादा उसके ऊपर में जोर नहीं देना है वैसे आगे में और एक कहीं पर जगह पर स्वामी जी कहते हैं कि भजन कीर्तन वगैरह होने चाहिए प्रवचन होने चाहिए ठाकुर मां स्वामी जी तो अपने खुद ही ये बोल रहे हैं और ठाकुर की मां की भी नहीं उस समय तो मां का प्रकाश नहीं हुआ था तो ठाकुर की वाणी का जितना प्रचार हो सके वो प्रचार करना है तो इसके बारे में आगे पहले तो कह दिया कि खड़े-खड़े रह कर के जो हाथ में प्रसाद दे सकते हैं जैसे खिचड़ी वगैरह वही देना इनफ है और मालसा भोग इससे ज्यादा और कुछ करने की जरूरत नहीं इसके बाद में स्वामी जी क्या कहते हैं सुरेश दत्ते श्री राम कृष्ण जीवनी पाठ करला सुरेश दत्त राम कृष्ण के ऊपर में भगवान श्री राम कृष्ण के ऊपर में एक जीवनी लिखे हैं उसका पाठ स्वामी जी ने किया खूब भालो बहुत अच्छा तबे अभी यहां पर तीन डोट किए हैं तीन डोट का क्या अर्थ है कि क्या स्वामी जी लिखे हैं वह यहां पर नहीं लिखा गया स्वामी जी लिखते हैं यह सब उदाहरण गुली छापी छन केनो प्रवृति उदाहरण गुली छापी छन केनो की महापाप छी छी अर्थात कि यहां पर यह नहीं लिखा कि कौन से उदाहरण की बात कर रहे हैं किंतु लिखा है कि यह वगैरह उदाहरण क्यों छापे हैं क्या महापाप छी छी अभी हमको पता नहीं कि इस तरह से तो कौन सा उदाहरण है जिसको छापना स्वामी जी महापाप गिने गे या तो फिर छी छी ऐसा कहेंगे वो हम अभी अनुमान करके ही देख सकते हैं तो मुझे तो ऐसा लगता है कि या तो फिर ठाकुर ने कोई किसी को गाली दी होगी या तो फिर कोई व्यक्तिगत मंतव्य व किया होगा पता नहीं किंतु अभी तो हमारे लिए अनुमान की ही बात है देखिए कि राम कृष्ण विवेकानंद कुछ कुछ अनुमान कर सकते हैं जैसे कि मास्टर महाशय को कहा था कि जब ठाकुर की जो बात थी वह ठाकुर की बात जब वो तो क्या था कि जैसे सामने पुरुष बैठे हैं तो वह कहेंगे कि स्त्रियों से दूर रहना है और जब स्त्रियां बैठी है तो कहेंगे कि पुरुषों से दूर रहना है तो अभी ऐसा नहीं है कि अभी प्रॉब्लम क्या है कि ठाकुर की बातें ज्यादातर तो पुरुषों ने ही लिखी है तो ठाकुर की जो पुरुषों के द्वारा लिखी हुई बातों सुनकर के ऐसा लगेगा कि ठाकुर जैसे कि स्त्रियों को धिक्कार हैं या तो फिर स्त्रियों को निम्न दृष्टि से देखते हैं किंतु वो बात नहीं है जो सामने जो साधक बैठा है उसकी साधना के अनुसार जो कहना चाहिए वह कहना है इस तरह से ठाकुर उदाहरण देते थे तो क्या था कि मास्टर महाशय वगैरह पुरुष लोग बैठते थे तो ठाकुर इस कभी-कभी कोई एक अभद्र अभद्र अर्थात कि जिस तरह से जिसको कि हम जनरल सबके सामने नहीं बोलेंगे ऐसी भाषा या ऐसी बातों का भी प्रयोग करते थे अभी क्या है कि ठाकुर य जो परमहंस है ना ये बालक वत पिशाच वत जड़ वत ये जो समाज के बंधन है भद्र अभद्र यह सब उनको स्पर्श नहीं होता था उनके हृदय में तो कुछ नहीं था हृदय तो स्वच्छ और निर्मल था उनका क्या था कि बात को इस तरह से करना है जो कि इनके एकदम एक एकदम स्पष्ट रूप से सुनने वाले के हृदय में चली जाए तो कभी-कभी जैसे स्वामी जी ने यहां पर कहा है ना कि ये भारत में मुझे मेहनत तो भारत में भी करनी है और मेहनत तो अमेरिका में भी करनी है वही डिफरेंस है स्वर्ग और नरक का डिफरेंस है यानी कि भारत को नरक के साथ कंपेयर करते हैं क्या नरक जैसा डिफरेंस है स्वर्ग और नरक जैसा कि भारत में मूर्ख लोगों का संघ है और अमेरिका में पंडित लोगों का संघ अभी यह नहीं है कि स्वामी जी भारत को नर के साथ कंपेयर करते हैं या तो फिर भारत में सभी लोग मूर्ख है जब स्वामी जी अमेरिका से लौटे थे कोलंबो में तो वह भारत की मिट्टी में अभी कोलंबो तो मैंने उस समय भारतवर्ष का ही एक हिस्सा था अभी भी आप कह सकते हैं श्रीलंका तो कल्चर अली तो अपना ही हिस्सा है तो वोह मिट्टी में गिर कर के मिट्टी को अपने शरीर पर लगा कर के कहते थे कि मुझे पता था कि अभी तक भारत मेरी जन्मभूमि है किंतु अभी मुझे पता चला कि भारत तो पुण्य भूमि है भारत की इस पुण्य भूमि से बार-बार धर्म का आगमन होगा धर्म प्रकट होगा और पूरे विश्व को अपने प्राण में अपने जैसे अपने स्नेह में यह धर्म पूरे विश्व को यह लपेट लेगा तभी तो कहीं जाकर के विश्व में ये धर्म रहेगा स्वामी जी कहते हैं कि व्हाट हैपेंस इफ इंडिया डाईज एवरीथिंग दैट इज गुड एवरीथिंग दैट इज होली इट विल डाई फ्रॉम द वर्ल्ड यदि भारत देश उसका विनाश हो गया तो इस विश्व में जो कुछ भी पवित्र है जो कुछ भी जो कुछ भी पुण्यवान है सबका विनाश हो जाएगा तो स्वामी जी को पता है कि भारत की भूमि कितनी पवित्र और पुण्य है किंतु साथ-साथ में ही कभी-कभी जब सामने वाले के भीतर में तमस होता है तो उसको चाबुक मार कर के रजस के रास्ते पे और अल्टीमेटली सत्व के रास्ते पे ले जाना है तो यह ले जाने के लिए बड़ी ही स्ट्रांग लैंग्वेज यूज करना यह गुरुओं की परंपरा है जैसे ठाकुर ठाकुर तोतापुरी ठाकुर को समाधि निर्विकल्प समाधि वेदांत वगैरह सिखा रहे हैं अभी बार-बार ठाकुर प्रयास कर रहे हैं किंतु निराकार ध्यान नहीं कर पा रहे जितनी भी बार आंख बंद करते हैं मां की मूर्ति उनकी नजरों के सामने आ जाती है तो तोतापुरी क्या करते हैं नाराज होकर के एक काच का टुकड़ा ठाकुर के सर के ऊपर में दो भ्रमर के बीच में कपाल के ऊपर में लगा देते हैं जोर से भोंक देते हैं इससे क्या होगा दर्द होगा तो अभी तोतापुरी कहते हैं इस दर्द के ऊपर में कंसंट्रेट करो यानी कि देखिए यह ठाकुर कहते हैं ना कि यह मध्यम वैद्य उत्तम वैद्य अर्थात कि यह जो वैध आपको सिर्फ यह कह के चला जाएगा कि अरे आप बीमार है दवा ले लीजिए फिर उससे उच्च कक्षा का वैध कहेगा थोड़ा सा प्रेम से समझाएगा ऐसा थोड़ा सा प्रेम से कहेगा कि अरे भैया दवा ले लो वरना तो तुम बीमार हो जाओगे तुम्हारा भविष्य यह हो जाएगा वगैरह वगैरह एक्सप्लेन करेगा किंतु जो उत्तम वैद्य है वो क्या करेगा पेश को जमीन के ऊपर में पटके का उसके सीने पर अपना पैर रखेगा जोर जबरदस्ती मुंह खोलकर दवाई उसके भीतर में डाल देगा तो यह उत्तम विद्य का लक्षण है कि कैसे भी करके पेशेंट को को दवाई खिलाना है तो यहां पर भी बिकॉज की ठाकुर और स्वामी जी उत्तम वैद्य थे बातें और शब्दों का प्रयोग ऐसा करते थे जैसे कि चाबुक मार करके जैसे कि आपके मन में एक विस्फोट करके आपके मन आपको एक चौका करके ऐसा एक बात करेंगे कि आपके मन के भीतर में हमेशा के लिए यह फिट बैठ जाए जब यह मास्टर महाशय ठाकुर के पास बिल्कुल पहली बार गए थे और कह र थोड़ा सा अहंकार से कह रहे हैं कि मेरी पत्नी ठाकुर पूछा कि तुम्हार परिवार केमन अर्थात कि तुम्हारी पत्नी कैसी है तो मास्टर महाशय ने कहा कि अच्छा वो मैंने अच्छी है किंतु अज्ञानी है तो ठाकुर वैसे ही नाराज होकर के बोल दिए कि अच्छा तो तुम क्या ज्ञानी हो तो ये जो ठाकुर की ना राजगी ठाकुर की उत्तेजना ठाकुर का यह जो एकदम स्ट्रांग रिएक्शन यह सब मास्टर महाशय कभी भी नहीं भूलेंगे कोई भी किसी के साथ में भी आप आप भी अपना मेमोरी एनालिसिस करके देखिए यदि किसी के साथ में किसी कोई स्ट्रांग इंटरेक्शन होता है स्ट्रांग इमोशंस जदी जहां पर प्रकट होता है वह बात हम कभी नहीं भूलते किसी मित्र के साथ में हम वैसे ही बात कर रहे हैं बहुत दिन बातें किए वगैरह किए अच्छा है ठीक है वेरी गुड वो सब कुछ हम को याद नहीं रहेगा किंतु कहीं किसी पिकनिक प गए किसी यात्रा पे गए वहां पे बहुत हंसी मजाक हुआ तो वो इंसिडेंट हमको हमेशा याद रहेगा या तो फिर किसी के साथ झगड़ा हो गया तो वो झगड़ा भी हमको क्योंकि ये स्ट्रांग इमोशन है या तो फिर यह हैप्पीनेस या तो फिर यह क्रोध या तो फिर यह नाराजगी यह कोई भी स्ट्रांग इमोशंस जब प्रकट होती है अपने ब्रेन के ऊपर में अपने मन के ऊपर में एक गंभीर रेखा पात करती है एक गंभीर इंप्रेशन छोड़ती करके जाती है तो ये टीचर्स जो होते हैं वर्ल्ड क्लास टीचर्स होते हैं उनको यह साइकोलॉजी पता होती है हालांकि वो इस बात को साइकोलॉजी के नाम से ना पहचाने वह इस बात को उत्तम विद्या या तो उत्तम गुरु के लक्षण के रूप में गिने किंतु हमको पता है कि यह सब साइकोलॉजिकल ट्रिक्स है और ये लोगों के भीतर में ये लोग साइकोलॉजी के बहुत बड़े एक्सपर्ट होते हैं जो कि अच्छे गुरु होते हैं तो कोई भी बात इतनी जब भी वो सामने वाले के मन में डालनी होती है तो बड़ी ही स्ट्रंग उस बात को कहेंगे तो ठाकुर का ऐसा था मास्टर महाशय ने जब कथामृत का फर्स्ट ड्राफ्ट लिखा था स्वामी जी को भेजा और स्वामी जी ने सामने रिप्लाई दिया कि देखो कुछ-कुछ बातें ठाकुर हमारे मन पे इंप्रेशन गहरी हो इसके लिए इस भाषा में बात किया करते थे जैसे कि कोई भी बात हो तो अभी क्या है कि स्वामी जी मास्टर महाशय को कहते हैं कि देखिए किंतु आप जब वो यह कथामृत लिखेंगे तो सबके घर में जाएगा सब तरह के लोग इसको पढ़ेंगे आबा वृद्ध वनिता सभी लोग बच्चे बूढ़े स्त्री पुरुष सभी लोग पढ़ेंगे तब यह सबके सामने जो बात रखनी होती है तो यह इमोशनल इंटेंसिटी या तो फिर शब्दों का यह जो प्रहार है उसको थोड़ा सा सॉफ्ट कर देना चाहिए उसको थोड़ा सा वीक कर देना चाहिए या तो फिर उसको थोड़ा सा नॉर्मलाइज कर देना चाहिए इसीलिए मास्ट महाशय ने कहा कि यह जो सब शब्द ठाकुर ने यूज किए हैं उसको हटा दो तो मुझे लग रहा है कि यहां पर सुरेश दत्त के साथ में वही बात हुई होगी कि उसने ठाकुर के पास से जो स्ट्रांग लैंग्वेज सुनी है कभी ठाकुर गाली देते हैं कभी किसी की निंदा करते हैं या तो फिर देखिए कि मनुष्य हम पुरुषों का मन यह काम वासना से दूर हो जाए इसके लिए जो सब एक वर्णन वगैरह जो करते हैं वो कुछ उन्होंने किया होगा जो कि अभी स्वामी जी कहते हैं कि वह सब उदाहरण पब्लिक में छापने की जरूरत नहीं है बाद में क्या कहते हैं आमी एकटा इंग्रेजी ते रामकृष्ण जीवनी वेरी शॉर्ट अर्थात की अति संक्षिप्त लिखिया पाटा पाठा इते जी मैं श्री राम कृष्ण देव का एक छोटा सा जीवन लिख करके तुम लोगों को बेचता हूं सेटा छपाईया और बंगाबाद कोरिया महोत्सब बिक्री करी बे त्रण कोरिले लोके पड़े ना उसको छापना मैं जो ठाकुर का जो संक्षिप्त जीवन भेजूंगा उसको छापना और छाप करके महोत्सव में उसको डिस्ट्रीब्यूटर करना स्वामी जी स्पेसिफिकली कहते हैं कि सेल करना डिस्ट्रीब्यूटर में देने से लोग पढ़ेंगे नहीं यह भी एक देखिए कि कैसा साइकोलॉजी है कि मुफत में नहीं देना है सेल देना है सेल करना है स्वामी जी कहते हैं किंचित दाम चाहि थोड़ा सा तो रुपया रखना पड़ेगा भले चाहे बहुत ज्यादा प्रॉफिट मेकिंग अपना उद्देश्य नहीं है किंतु मिनिमम उसका अमाउंट तो कोस्ट तो रखना ही पड़ेगा खूब धूमधाम संगे महोत्सव करीब बहुत धूमधाम के साथ में महोत्सव करना अच्छा यह जो स्वामी जी का स्वामी जी ने ठाकुर के जीवन के बारे में यह जो लिखा इसके बारे में भी एक लंबा बैक स्टोरी है आज हमको पता है कि ठाकुर का सबसे ऑथेंटिक लाइफ को कौन सा है तो शरद महाराज द्वारा लिखा गया लीला प्रसंग किंतु यह लीला प्रसंग जिस तरह से लिखा गया है उसके पीछे में भी एक बिकॉज की स्वामी जी ने यहां पे ठाकुर के जीवन के बारे में कहा है वो थोड़ा सा एक बैक स्टोरी है बात ऐसी थी कि जब स्वामी जी मैक्स मूलर को मिलने के लिए गए ऑक्सफोर्ड जब स्वामी जी ब्रिटेन में थे तो ऑक्सफर्ड में मैक्स मूलर को मिलने के लिए गए बाय दैट टाइम मैक्स मलर ऑलरेडी ठाकुर के साथ में परिचित थे क्योंकि मैक्स मूलर इनको पहचानते थे केशव सेन को और केशव सेन अपने न्यूज़पेपर में बार-बार ठाकुर के बारे में लिखा करता था तो इस हिसाब से वो ऑलरेडी ठाकुर के साथ में परिचित थे और रियल महात्मा ऐसा करके एक आर्टिकल भी उन्होंने लिखा था अभी महात्मा शब्द क्यों प्रयोग किया है वो भी हमको पता है कि यह थियोसोफिकल सोसाइटी वाले दो-तीन तिबेट माने फेक महात्मा को खड़े किए थे और यह फेक महात्मा त्मा को बुला करके लोगों को ठग दे थे अभी यह लोगों को ठगने का भाव भीतर में था ना कि वो लोग जेनुइनली इस तरह से कोई अशरीरी महात्मा पर विश्वास करते थे वह तो पता नहीं किंतु अमेरिका में एटलीस्ट ऐसा हुआ था कि मिस्टर जज बोलकर के यह थियोसोफिकल सोसाइटी का वहां का जो लीडर था वहां का जो नेता था उसने ऐसे मने झूठ मूठ के महात्मा खड़े करके लोगों से पैसे बटोरे थे और बाद में उसकी यह चोरी पकड़ी गई थी और वहीं से यह थियोसोफिकल सोसाइटी के ऊपर में लोगों की अश्राथ यहां तक कि जब स्वामी जी ब्रिटेन गए तो ईटी स्टडी उनको वेलकम करता है किंतु सबसे पहले स्वामी जी को वार्निंग दे देता है कि हम जो आपके बारे में सबसे पहला प्रचार करेंगे उसमें हम स्पष्ट लिखेंगे न्यूज़पेपर में वगैरह में कि स्वामी विवेकानंद इज नॉट एसोसिएटेड विद एनी ऑर्गेनाइजेशन ये स्पष्ट व सबसे पहले क्यों दे देनी है क्योंकि सभी लोग थियोसोफिकल सोसाइटी की यह सब चालाकी यह सब झूठ मूठ के महात्मा यह सब चोरी करना इसके नाम से लोगों से झूठ मूठ के पैसे कले करना यह लोगों में पता चल गया था और यह इटन स्पिरिचुअलिटी है इसके बारे में लोगों के मन में एक तरह का एक क्रोध कहो ना कि एक यह कहो नाराजगी प्रकट हो रही थी तो इसीलिए टी स्टडी ने स्वामी जी को कहा था कि हम लोग आपका जब प्रचार करेंगे स्पष्ट कहे कि यू आर नॉट एसोसिएटेड विद एनी ऑर्गेनाइजेशन तो यह जो मैक्स मलर जो आर्टिकल लिखता है रियल महात्म तो यह रियल नाम इसी कांटेक्ट में देता है कि यह थियोसोफिकल सोसाइटी के झूठ मुठ के महात्मा है किंतु यह एक सही सही जेनुइन महात्मा है कि जिनका जीवन हम सबको पढ़ने की जरूरत है तो यह स्वामी जी मैक्स मलर को मिलने के लिए गए अभी मैक्स मलर की इच्छा थी कि वो एक डिटेल जीवन ठाकुर के ऊपर में लिखे तो उन्होंने कहा स्वामी जी को कि आप मुझे इस तरह का ठाकुर के बारे में ज्यादा जदी मुझे इंफॉर्मेशन देंगे तो मैं ठाकुर के ऊपर में पूरा पुस्तक लिखूंगा वो तो सिर्फ आर्टिकल था अभी मैं एक पूरा पुस्तक लिखना चाहता हूं तो स्वामी जी तो बड़े खुश हो गए कि मैक्स मलर जैसा एक मैंने उस समय का सबसे प्रतिष्ठित संस्कृत और इंडोलॉजी का स्कॉलर वो यदि ठाकुर के ऊपर में पुस्तक लिखता है तो ठाकुर का कितना महात्म प्रचार होगा तो किंतु स्वामी जी करते क्या है वो लेटर लिखते हैं शरत महाराज को स्वामी शारदानंद जी स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई और ठाकुर के दूसरे त्यागी शिष्य तो स्वामी जी शरत महाराज को लेटर लिखते हैं और कहते हैं कि देखो कि मेरे से तो इतना सब कुछ अभी लिखना संभव नहीं होगा प्रवचन वगैरह सब कुछ देना है किंतु तुम ठाकुर के जीवन का यह जो बेसिक फैक्ट्स है और उनके टीचिंग से कैटेगरी वाइज वो कलेक्ट करो और वो रॉ मटेरियल तुम मैक्स मलर को भेजो तो मैक्स मलर उसके आधार पर अपनी किताब लिखेगा तो शरद महाराज थोड़े से डर जाते हैं क्योंकि स्वामी जी ने खुद ने कहा था जब स्वामी जी को पूछा गया था कि आप क्या ठाकुर की जीवनी लिखेंगे तो स्वामी जी का क्या उत्तर था आमी की शिव गोरते बांदर गड़े फेल ना की अर्थात कि मैं शिव की मूर्ति बनाते बनाते बंदर की मूर्ति ना बना बैठू क्योंकि ठाकुर का जीवन इतना उदास इतना भव्य है कि उसको सामान्य भाषा में प्रकाश करना या तो फिर माने मने ठाकुर के ऊपर में कुछ भी लिखना बड़ा ही सोच समझ करके केयरफुली लिखना पड़ता है कहीं क्या कहने को गए और क्या कह डाला स्वामी जी के साथ में यह प्रॉब्लम हमेशा होता था यह जो आज कंप्लीट वर्क्स में माय मास्टर लेक्चर है वो एक्चुअली दो लेक्चर को काट करके इकट्ठा करके माय मास्टर लेक्चर लिखा गया है कंप्लीट वर्क्स में ऐसा क्यों हुआ दो लेक्चर का एक लेक्चर क्यों बनाया गया क्योंकि स्वामी जी जब अमेरिका में अपना जो कार्य समाप्त करके फर्स्ट विजिट का कार्य समाप्त करके ब्रिटेन की ओर जाने वाले थे तब आखिरी दिनों में उन्होंने ठाकुर के ऊपर में एक लेक्चर आयोजित किया था बहुत सारे लोग बैठे थे अभी स्वामी जी ठाकुर के बारे में बोलना शुरू कर दिए किंतु जैसे-जैसे बोलते गए वैसे ही पता है उनको क्या हुआ कि सामने यह जो पूरा ऑडियंस बैठा है हालांकि यह तो स्वामी जी के बड़े ही माने अनुरागी है स्वामी जी को बड़ा ही रिस्पेक्ट करते हैं स्वामी जी को बार-बार सुनने को आते हैं किंतु फिर भी बीइंग एंड अमेरिकन अमेरिकन है तो भारतीय कांसेप्ट ऑफ त्याग तपस्या ब्रह्मचर्य उनको इतना ठीक-ठीक समझ में नहीं आता है उनको ऐसा लगता है कि स्पिरिचुअलिटी क्या है तो एक अच्छे से कपड़े पहन के एक अच्छे से सलोन में बैठो एक अच्छे वक्ता का प्रवचन सुनो और उसके बाद में यह जो टी कॉफी वगैरह उसके ऊपर में वो पीते पीते वो सब उसके अच्छी-अच्छी बातें करो माने मने एक लीडिंग अ गुड लाइफ इज रिलीजन एक्चुअली दिस इज जस्ट अ सर्फेस ऑफ रिलीजन ट्रू रिलीजन ट्रू वेदांता इज त्याग तपस्या ब्रह्मचर्य सत्य और ये पूरा जो एक जीवन को ट्रांसफॉर्म करना है तो स्वामी जी ने जब ठाकुर के बारे में बोल रहे हैं और देखा कि यह जो ऑडियंस उनके सामने बैठा है हालांकि स्वामी जी का अनुरागी है हालांकि ठाकुर के ऊपर में श्रद्धा है किंतु फिर भी ठाकुर का जो त्याग तपस्या ब्रह्मचर्य का कांसेप्ट इनको इतना नहीं समझ में आ रहा है सडन स्वामी जी के भीतर में क्या एक क्रोध एक वीर भाव प्रकट हुआ और अमेरिकन ऑडियंस को जो डांटना उन्होंने शुरू किया है ऐसा जो डांटा है कहा कि अरे तुम लोग जिस तरह से भोगवा द में डूबे हुए हो तुम लोग जिस तरह से मटेरियल जम में डूबे हुए हो तुम लोगों के सामने यह सही सही भारतीय त्याग क्या है वह कभी समझ में नहीं आएगा तुम लोगों को जब तक तुम अपनी इंद्रियों की यह वासना है उसका त्याग ना करो ऐसा बोलक के स्वामी जी ने अमेरिकन को जो डांटा है फर्स्ट टाइम ऐसा क्यों डांटे कोई अपने ऑडियंस को उस उनको नहीं पता है तो हमको तो उनको शिक्षित करना है राइट डांटना तो वो तो ग गलत बात हो गई उनको सब कुछ यदि पता ही होता तो आपकी बात सुनने को क्यों आते है किंतु स्वामी जी ने ये जो एज ए गुड टीचर 2 साल तो उन्होंने तीन साल तो बोले किंतु एक आखिरी लेक्चर ठाकुर के ऊपर में बोलने के समय सडन भीतर से वो जो त्यागी परिव्राजक सन्यासी का जो सही स्वरूप एकदम प्रकट हो गया शिव भगवान शिव जिस तरह से कि वो स्मशान में बैठ कर के साधना कर रहे हैं जगत के साथ में कोई लेना देना नहीं है जगत में कोई उनकी स्तुति करें कि निंदा करें डजन मैटर वो सिर्फ अपनी साधना में निमग्न रहेंगे तपस्या में तो वैसा शिव स्वरूप प्रकट हो गया रुद्र शिव स्वरूप प्रलय कारी और जो मन में आया गाली दे दी अपने ऑडियंस को फिर किंतु जब लेक्चर समाप्त हुआ सब लोग इतने ये हो गए चौकन हो गए ये अगेन मुझे लगता है कि यही स्ट्रांग लैंग्वेज यूज करना जैसे कि चाबुक मार के प्रहार करके त्याग और तपस्या का एक अंश उनके हृदय में डालना शायद स्वामी जी ने ऐसा सोचा भी नहीं होगा किंतु उत्तम गुरु के भीतर में वो प्लान नहीं करता कि क्या बोलना है किस तरह से बोलना है हृदय से ही यह वाणी प्रकट होती है तो स्वामी जी के हृदय में से ही शायद उन्होंने सोचा नहीं होगा कि ठाकुर के बारे में बोल रहे हैं तो वो इतनी स्ट्रांग लैंग्वेज यूज करेंगे वो भीतर से ही आ गया भीतर से ही यह जो आत्मन ये जो परमात्मा विराजित है उनको लगा कि इन लोगों को यदि ईश्वर के मार्ग पर आगे ले जाना होगा तो एक बार ऐसा जोर से प्रहार करना होगा इनका ये जो मूड ये जो तमस है जो कि उनके सर पर बैठ गया है एक बार प्रहार करके इस तमस को तोड़ना होगा ये तोड़ेंगे तभी लोग यह सत्व की ओर जा पाएंगे ऐसा उनके भीतर में जो शिव शक्ति है उसने सोचा होगा और स्वामी जी के मुंह से ये स्ट्रांग लैंग्वेज आ गई और ऐसी स्ट्रांग लैंग्वेज कि स्वामी जी को खुद को पछता हुआ लेक्चर समाप्त होने के बाद में कि अरे इतनी स्ट्रांग लैंग्वेज तो मुझे बोलना उचित नहीं है ये लोग तो बेचारे मेरे पास गाइडेंस की अपेक्षा लेक आए हैं किंतु क्या है कि भीतर की जो शक्ति थी उसने तो जो बोलना है बोल दिया किंतु जब ये लेक्चर प्रगट पब्लिश करने की बात आई तब स्वामी जी ने कहा कि यह जो स्ट्रांग लैंग्वेज वाला भाग है उसको काट दो और उसके बाद में जो ब्रिटेन में उन्होंने जो माय मास्टर लेक्चर दिया था उसके साथ में उसको कनेक्ट कर दो तो इस तरह से माय मास्टर लेक्चर आज हमारे सामने है तो यह देखिए कि मैंने ये स्ट्रांग लैंग्वेज के बारे में सभी लोगों का सेम ओपिनियन है जब सामने ऑडियंस दिखता है जो सामने श्रोता बैठे हैं यदि उनके भीतर में तमस दिखता है तो ऐसा एक प्रहार करना है किस तमस को तोड़ देना है किंतु फिर वो तो एक शिष्य के मने सापेक्ष है ना सबके सामने तो इस तरह की बात करना उचित नहीं है सबको ऐसा लगेगा कि अरे इस तरह से क्यों बात कर रहे हैं इसलिए सबके सामने जो रखना है वो एक सॉफ्ट लैंग्वेज में बात करनी है वो एक सामान्य एक सहज भाषा में बात करनी है तो इसलिए स्वामी जी अभी यह जो मैक्स मुलर के लिए ठाकुर का जीवनी लिखने की बात आई तो स्वामी जी को पता था कि वह ठाकुर के बारे में कुछ भी बोलने को जाएंगे ना भीतर से पता नहीं कौन सी शक्ति प्रकट होगी और क्या बोल देगी कुछ ठीक नहीं तो बेटर है कि शरत महाराज का माछ रक्त स्वामी जी कहते हैं कि शरत महाराज का मछली का रक्त है क्यों कि एक बार बेलूरमठ में इस तरह से अकाउंट को लेकर के कुछ बात हो गई स्वामी जी का था कि अकाउंट में अपने कर्म योग में थोड़ा सा भी इधर उधर नहीं होना चाहिए वरना फाउंडेशन में ही हमारे से इस तरह से हम स्टमल हो जाएंगे गड़बड़ हो जाएगी तो हमेशा के लिए लोगों का अपने पर से विश्वास चला जाएगा तो एक बार शरत महाराज को बिठा कर के डांटना शुरू किया और ये तो भगवान रुद्र की डांट माने जो सुनेगा उसका हार्ट फेल हो जाएगा माने ये स्वामी जी के गुरु भाई को छोड़ कर के स्वामी जी की डांट को सहन करने की शक्ति किसी के पास नहीं और शरत महाराज को तो जो डांटा जो डांटा वो शरत महाराज चुपचाप सब कुछ सुन रहे हैं एकाएक क्या हुआ ठाकुर का एक डिवटी आया वो आकर के तो एकदम स्वामी जी स्वामी जी का जैसे सिद्धांत है सबके सामने इस तरह से बात नहीं करनी तो एकदम अपने को संभाल लिया फिर वो डिवटी बैठा है स्वामी जी भी बैठे हैं एक ही टेबल पे वो शरत महाराज भी बैठे हैं और स्वामी जी ने किसी ब्रह्मचारी को बोला होगा अरे चाय वगैरह ले आओ तो वो चाय ले आया तो फिर स्वामी जी को भी चाय दिया वो भक्त को भी चाय दिया शरद महाराज को भी चाय दिया तो शरद महाराज बढ़िया मजे से चाय पी र है और फिर बढ़िया मजे से हंसी मजाक कर रहे हैं और स्वामी जी भी हसी मजाक कर रहे हैं और फिर जैसे ये भक्त खड़ा होके चला गया तो वैसे ही स्वामी जी ने डांट का सेकंड फेस चालू किया फिर डांटना शुरू किया और शरत मारा चुपचाप मुह ऐसा नीचा करके सुन रहा तब स्वामी जी ने बोला कि अरे इसको कुछ भी बोलने का कोई लाभ नहीं है टा माछ रख दो मछली का रक्त है मछली का रक्त कभी गर्म नहीं होता देखिए कि शरत महाराज का जीवन तो बाद में हम देखेंगे कि कितनी रिस्पांसिबिलिटी लेकर के उन्होंने मठ मिशन को संभाला है एस ए सेक्रेटरी जनरल सेक्रेटरी और मठ मिशन को संभालने से भी सबसे बड़ा दायित्व था मां का केयर करना मां के सेवा मां की सेवा करना मां के सेवक के रूप में रहना वो इतना बड़े-बड़े दो दायित्व उन्होंने अपने कंधों पर उठाए हैं उसका यही मैंने जो जीवन गढ़ तर हुआ इसके पीछे ये स्वामी जी की डांट का एक बहुत बड़ा प्रभाव भी था ठाकुर का भी था स्वामी जी का भी था तो स्वामी जी को पता था कि शरत महाराज जो है उनका ब्रेन इतना ठंडा है कि वो ठीक-ठीक रूप से लोगों के सामने यह बात रख पाएंगे तो स्वामी जी ने शरत महाराज को कहा कि मैं तुमको मैं तुमको एक बेसिक आइडिया दे देता हूं कि स्वा ठाकुर की लाइफ का जनरल रिप्रेजेंटेशन कैसे होना चाहिए इस बेसिक आईडिया को लेकर के तुम ठाकुर का उनके जीवन के जितने भी फैक्ट्स हमारे सामने अवेलेबल है उसका एक आउटलाइन बनाओ और उनके जो टीचिंग्स है उसको कैटेगरी वाइज डिवाइड करो और फिर इसको तुम ये मैक्स मुलर को भेजो तो अभी देखिए यहां पर एक दूसरी भी बात आती है कि हम लोग आज तक जितने भी अवतार का जीवन पढे खास करके तीन अवतार के बारे में एक तो है भगवान राम भगवान कृष्ण और जीसस क्राइस्ट इ तीनों के जीवन में हम देखेंगे कि चमत्कार का बहुत एक बड़ा महात्म्य है कि उन्होंने चमत्कार किए और इस चमत्कार से बहुत सारे लोग प्रभावित हो गए और उनके शिष्य हो गए हालांकि चमत्कार से कोई जीवन परिवर्तित नहीं होता चमत्कार से लोग एक अंजित हो जाते हैं चमत्कार से लोग चौक जाते हैं और उनके मन में एक इच्छा प्रकट होती है कि अच्छा जो चमत्कार करता है जाकर देखूं तो उसने और क्या-क्या कहा है उसके बाद में तो जो सर्मन ऑन द माउंट है ये जो जीसस का या तो फिर ये श्रीमद् भगवत गीता है जो भगवान कृष्ण की इसी को पढ़कर ही सही सही जीवन परिवर्तित होता है इसी को पढ़ के ही साधक सिद्धि प्राप्त करता है किंतु एक जो शुरू में जब बहुत सारे लोग अंधेरे में घूमते रहते हैं तो मैं कहां जाऊं क्या करूं हजार ऑप्शन है अवतारों की महात्माओं की तो कमी नहीं है वो तो गली-गली में कभी-कभी तो अवतार बैठे अपने को अवतार डिक्लेयर करके बैठे हुए तो फिर वोह अवतार और यह राम है ना भगवान कृष्ण है क्या डिफरेंस है तो एक इतना बड़ा चमत्कार कर दिया कि हमको पता चला कि हां उनमें कुछ तो है फिर बाद में डिटेल में जाकर के सही सही जीवन पर परिवर्तित करने वाले तत्वों को सुने किंतु एक अवतार का इस तरह से महात्म है किंतु एक आप देखिए कि भगवान बुद्ध के जीवन में चमत्कार का बिल्कुल नाम उल्लेख नहीं है यहां तक कि भगवान बुद्ध बार-बार अपने शिष्य को कहते हैं कि परिश्रम करके जब ध्यान जब तो नहीं किंतु एटलीस्ट ध्यान करके अपने निर्वाण प्राप्ति करो तो स्वामी जी का मत था कि ऐसा नहीं है कि कोई भी अवतार के जीवन में चमत्कार नहीं होते जिनन अवतार हो चमत्कार तो होंगे ही होंगे भगवान बुद्ध के जीवन में भी थे भगवान राम कृष्ण के जीवन में भी थे किंतु स्वामी जी का यह मानना था कि यदि आज के युग में हम चमत्कार को प्रोजेक्ट करेंगे तो लोगों का मन भटक जाएगा आजकल क्या है कि इंस्टेंट सब कुछ लोगों को चाहिए चमत्कार हो गया तो चलो इनके ऊपर में जैसे कि काशीपुर मैंने कहा बार-बार मैं इसका उदाहरण देता हूं मैं जब नया नया जवाइन किया था बेलल मट में तो हमको काशीपुर ले गए थे तो पहली बार मैंने देखा कि अरे इतने लोग ठाकुर को दर्शन करने के लिए आ रहे हैं मैंने इतना बड़ा भीड़ देखना लाखों लोग कलेक्ट हुए थे मैं तो मैं तो अभिभूत हो गया था किंतु बाद में जब ये सभी लोग चले गए रात को पहली जनवरी का दिन कल्पतरु का दिन तो पहली जनवरी को कल्पतरु को काशीपुर में मठ में तो कितने लोग इकट्ठा होते एक लाख से ज्यादा होंगे तो किंतु जब शाम को सभी लोग चले गए हम ब्रह्मचार्य को कहा गया कि चलो थोड़ा सा क्लीनिंग करने में हेल्प करो तो वहां पर पेड़ों के ऊपर में वहां पर जो वह जो सरोवर है उसके किनारे बहुत सारे भक्तों ने एक छोटी-छोटी चिट्ठियों में अपनी प्रार्थना लिख कर के बांध करके रखी थी तो मैंने थोड़ा सा खोल के पढ़ा तो मैं इतना मतलब यह हो गया कि किसी ने लिखा है कि मेरे पिताजी बीमार है मां बीमार है छोटा भाई इस तरह से वो तकलीफ में है मैं क्या करूं मने वो संसार का जो कष्ट है वो बेचारा लिखते हैं ठाकुर के पास में कि कुछ आशा मिल जाए क्योंकि संसार तो पूरा निराशा और अंधेरे के अलावा कुछ देता नहीं है तो वो पढ़ कर के इस तरह की बात सुनकर के हमको लगता है कि नहीं नहीं ठाकुर को तो सही में इनके ऊपर में थोड़ी सी तो दया करनी चाहिए वरना तो ठाकुर किस काम के तो की भी होंगी वो प्रश्न नहीं है वो बात नहीं है बात ये है कि यदि हम ठाकुर के पास से ऐसा कुछ मांग ले और ठाकुर ने हमको दे भी दिया तो फिर तो हम साधना नहीं करेंगे उसके बाद में जो तपश्चार्य नहीं करेंगे एक नियम रूप से जीवन को एक पुनर एक नया एक आयाम देना है एक नए रास्ते पर ले जाना है वो हम नहीं करेंगे तो बोलकर के स्वामी जी की इच्छा थी कि आज के युग में चमत्कार को प्रोजेक्ट नहीं करके ठाकुर का यह जो चरित्र है उसको प्रोजेक्ट किया जाए तो जिस तरह से भगवान बुद्ध की जीवनी में भगवान बुद्ध के चरित्र को किया गया है और एक चीज ये मेजर कांसेप्ट था और दूसरा मेजर कांसेप्ट था कि ठाकुर की साधना हों को लोगों के सामने रखा जाए इस बात को शरत महाराज ने लीला प्रसंग में बड़े ही विस्तार पूर्वक लिखा है कि बाकी और किसी अवतार के साधना हों के बारे में इतना उल्लेख नहीं है इतना लिखा नहीं गया है क्यों क्योंकि भक्त चाहता है कि अवतार तो संपूर्ण है पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर है तो फिर उनको साधना करके पूर्णता प्राप्त करने की क्या जरूरत है ऐसा एक भक्त के मन में संशय ना हो जाए बोलकर के अवतार की साधना का विषद विवरण डिटेल में डिस्क्रिप्शन जनरली नहीं मिलता किंतु स्वामी जी का और शरद महाराज का आईडिया था कि ठाकुर की साधना हों का विषद विवरण डिटेल में डिस्क्रिप्शन भक्तों के सामने रखा जाए साधकों के सामने रखा जाए क्योंकि ठाकुर ने जो साधना की तो साधना करने की जो उनकी इंटेंसिटी थी वह इंटेंसिटी देख कर के हमको प्रेरणा मिले कि चलो इसका 1 पर तो साधना तो हम करें तो यह सब स्वामी जी के बेसिक आइडियाज थे जो कि उन्होंने शरत महाराज को लिखे शरद महाराज ने इसके ऊपर में यह जो ठाकुर का जीवन कलेक्ट करके मैक्स मूलर को भेजा और मैक्स मलर ने श्री रामकृष्ण एंड हिस डिसाइल्स बोलकर के किताब पब्लिश की हालांकि और बाद में जब शरत महाराज को उद्बोधन भवन बनाने का जो खर्चा हुआ मां बार-बार मां जब भी कलकाता आती थी ज जयराम बाटी से तो मां को रहने के लिए जगह नहीं मिल मिलती थी और क्या करना पड़ता था कहीं भक्त के घर में रहेंगे कहीं पे किसी कोई नया मकान भाड़े करके रहेंगे कुछ पीरियड के लिए तो यह सब चीजों से बड़ा असुविधा होता था तो मां कलकत्ता आए तो मां को रहने के लिए एक परमानेंट भवन बने इसके लिए शरत महाराज ने उद्बोधन का निर्माण किया था उद्बोधन मायरवार्ड्स देने के लिए अभी क्या करें तो उन्होंने लीला प्रसंग पुस्तक लिखने की शुरुआत की और पुस्तक का सेल का जो उसका जो रॉयल्टी मिलता था उसमें से यह जो देना था उधार था वह आप वापस कर सकते थे तो उस समय जब श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग लिखने की बारी आई तब शरत महाराज को पता था कि स्वामी जी क्या चाहते थे ठाकुर के जीवन से किस तरह से ठाकुर का जीवन भक्तों के सामने प्रोजेक्ट कर सके तो उसी के आधार पर शरत महाराज ने लीला प्रसंग लिखा है तो यहां पर जो स्वामी जी यह कहते हैं कि मैं इंग्लिश में एक छोटा सा ठाकुर का जीवन लिख करके भेजता हूं मुझे पता नहीं कि ये ठाकुर का जीवन अभी अवेलेबल है कि नहीं या कंप्लीट वर्ष का ही एक भाग है मुझे पता नहीं थोड़ा सा देखना पड़ेगा कि ये लेटर में जिसका उल्लेख किया है और कंप्लीट वर्क्स में जहां-जहां पर ठाकुर के बारे में स्वामी जी बोले हैं वो अवेलेबल एक ही नहीं किंतु ये जो स्वामी जी के बेसिक जो आइडियाज थे वही लीला प्रसंग के ब्लूप्रिंट में थे वही थे लीला प्रसंग की ब्लूप्रिंट और इसी में से लीला प्रसंग बना और देखिए कि देखने की बात है लीला प्रसंग में कि लीला प्रसंग लिखा गया था पूरा मां के लिए अर्थात कि मां उद्बोधन में आएगी मां रहेगी उसके लिए जो उधार देना है उसके लिए लीला प्रसंग लिखने की शुरुआत तो शरत महाराज ने की किंतु जब लिखते लिखते एक समय ऐसा हुआ कि शरद महाराज काशीपुर तक पहुंच गए हैं कि काशीपुर मने ठाकुर का बचपन का बाल्य लीला उसके बाद में कलकत्ता आए फिर साधक जीवन उसके बाद में यह जो भक्त वगैरह इकट्ठा होना शुरू हुए वो दक्षिणेश्वर के दिन और उसके बाद में आखिर में ठाकुर को कैंसर हुआ और काशीपुर आए तो शरद महाराज ने ये पूरा विवरण तो लिख लिया किंतु काशीपुर के विवरण लिखने की शुरुआत की उसी समय मां की महासमाधि हुई मां महासमाधि में प्रवेश किया 1920 में तो उसके बाद में शरत महाराज इतने हतो उत्साह हो गए थे उनका हृदय इतना मने गमगीन हो गया था कि फिर लीला प्रसंग और लिखना उनसे संभव नहीं हुआ इसीलिए लीला प्रसंग देखिए कि अधूरा है काशीपुर के दिनों की घटनाओं का विषद विवरण अपने पास में नहीं है जितना डिटेल में उन्होंने दक्षिणेश्वर के बारे में लिखा जितना डिटेल में उन्होंने साधक जीवन के बारे में लिखा इतना डिटेल में वह काशीपुर के बारे में नहीं लिख पाए तो यह अपना अनस फॉर्च्यून ही कहा जाएगा कि वह आखिरी आखिरी दिनों की लीला के बारे में यदि लिखते तो हमको कितना कुछ ठाकुर के बारे में और भी जानने को मिलता हालांकि यह एक बात है कि सेम चीज एक्चुअली मास्टर महाशय के साथ में भी हुई थी कि मास्टर महाशय वैसे दक्षिणेश्वर के दिनों का इतना सुंदर विवरण देते हैं किंतु ठाकुर को जब कैंसर हुआ और काशीपुर में आए तो उस दिनों में ठाकुर का कष्ट इतना था कि मास्टर महाशय हालांकि अपनी नोटबुक में जिस तरह से दक्षिणेश्वर के दिनों की जिस तरह से मास्टर महाशय ने दक्षिणेश्वर के दिनों की नोंद अपनी नोटबुक में की है उसी तरह से काशीपुर के दिनों की तो की है किंतु कथामृत में उसका विवरण नहीं लिख पाए इसीलिए मास्टर महाशय की नोटबुक वैसी की वैसी रही बाद में बाद में प्रभानंद जी महाराज ने मास्टर महाशय की नोटबुक का आसरा लेकर के अंत्य लीला श्री राम कृष्ण देव की अंत्य लीला बोलकर के के दो पुस्तकों की रचना की तो आज हमारे पास में ठाकुर के आखिरी दिनों की जो डिटेल विवरण है वो प्रभानंद जी महाराज का यह जो मास्टर महाशय की नोटबुक के ऊपर में रिसर्च किया हुआ अंत्य लीला है उसके ऊपर में से हमको बहुत कुछ जानने को मिलता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु