Prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा का सीरीज जो है माय प्लान ऑफ कैंपेन उसका हम पाठ कर रहे थे। तो कल हमने देखा कि किस तरह से यह स्लाइड्स जो है मैंने डेवलप किया है एआई में डाल के। सो पूरा जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा के जितने भी लेक्चर है सब एक साथ में मैंने नोटबुक एलएम में डाल दिए हैं। तो उसमें से उसने यह 15 स्लाइड का एक समरी बनाया है। तो ऑलरेडी हमने देखा कि किस तरह से कि सर्वप्रथम तो स्वामी जी को मान पत्र दिया गया। उसका यहां पे वो प्रथम स्लाइड उसके बारे में है और स्वामी जी क्या कहते हैं कि जो मानपत्र के उत्तर में कि मुझे जो सम्मान मिला है देखिए कि विदेश में जिस तरह से एक सेनापति को एक युद्ध ये जो जनरल आजकल की लैंग्वेज में जनरल ना फील्ड मार्शल यह जो सब होते हैं दो नंबरी फील्ड मार्शल हमने देखा रिसेंटली तो इस तरह के किसी को नहीं मिला है। भारत में जो सम्मान मिला है हमारी यह जो आध्यात्मिक परंपरा है उसके अनुसार एक सन्यासी को सम्मान मिला है। तो यह बात स्वामी जी ने कल कही और यह भी कहा कि रिलीजन इज द बैकबोन ऑफ द नेशनल लाइफ इन इंडिया। तो यह कल हमने देख लिया। फिर एक स्लाइड तीन नंबर की स्लाइड हमने क्या देखा? इंडिया इज द पुण्य भूमि द लैंड ऑफ स्पिरिचुअलिटी। भारत जो है वो आध्यात्मिकता की धरती है। यहां पे सर्वप्रथम आध्यात्मिकता भारत में डेवलप हुई है और यहां से ही पूरे विश्व में फैली है। यदि इस पृथ्वी पर और कोई जगह है, कोई देश है जो कि ऐसा दावा कर सके कि वह पुण्य भूमि है तो वह भारत ही है और भारत में ही देखिए कि एक के बाद एक धर्मों का प्रारंभ हुआ है। एक के बाद एक धर्म के संस्थापक है। उन लोगों का यहां पर इस पुण्य भूमि में उदय हुआ है। और इसी पुण्य भूमि से आध्यात्मिक तरंगे एक के बाद एक पूरे विश्व में बही है और पूरे विश्व को आध्यात्मिक रस में आपलुत कर दिया है। तो वो एक हमने देखा और फिर क्या देखा कि
भारतीय विचार विश्व में फैले शांति और आशीर्वाद के साथ, पश्चिमी विचार फैले युद्ध और रक्तपात के साथ
विदेशी आइडियाज जब कहीं जाते हैं। अब जैसे कि यह जो जो इंग्लिश एपोलॉजिस्ट ऐसा कहते हैं। यानी कि ये ब्रिटिश राज की प्रशंसा करने वाले अपने ही कुछ देसी लोग तो वे लोग क्या कहते हैं कि ब्रिटिशर लोग भारत में आए तो हमको रेल रोड मिला। तो रेल अदरवाइज तो इंडिया में रेलवे आता ही नहीं। वे लोग ब्रिटिशर लोग यह है रेलवे है। फिर ये टेलीग्राम है। यह वगैरह इंडिया में लेके आए। तो अच्छा ठीक है। माने मॉडर्न टेक्नोलॉजी तो आनी ही चाहिए। किंतु यह रेलवे लाने में हमको कितने लोगों का कत्लेआम हुआ। कितनी खून की नदियां बही वह भी तो सामने देखना है ना कि मॉडर्न टेक्नोलॉजी ब्रिटेन यहां भारत में लाया तो उसके सामने उसने कत्लेआम अत्याचार भी कितना किया। तो किंतु भारत का देखिए कि यह जीव ब्रह्म ऐक्य यह जो एक रेवोल्यूशनरी आईडिया है वह आईडिया जब पूरे विश्व में फैला है तो सामने शांति और पीछे से आशीर्वाद ही गया है। हमने अपने देवताओं को किसी देश के ऊपर में बिठाने के लिए लोगों का कत्लेआम नहीं किया। ना ही उनको इस तरह का चॉइस दिया कि हमारे ईश्वर को पसंद करो, आराधना करो। वरना तुम्हारा गला काट देंगे। इस तरह का पगलापन जो है हम हिंदुओं ने कभी किया नहीं है। और फिर साथ में ही स्वामी जी ने यह भी कहा कि इसका परिणाम यह है कि हमने लोगों की कत्लेआम नहीं की। इसका परिणाम यह है कि जो यह कातिल प्रजाएं जो सब थी यह मिलिटरिस्टिक रेसिस्ट जो सब थी नेशंस एंड सिविलाइजेशंस जो थे जो कि लोगों को अत्याचार करके अपनी जेब भरते थे अपना यह नेशनल वेल्थ बढ़ाते थे उस देशों की अवस्था देखिए एक के बाद एक राइज एंड फॉल राइज एंड फॉल यह कभी ग्रीस उठा तो ग्रीस पटक गया जमीन के ऊपर में फिर फिर ये रोम उठा कहीं जाकर रोम का भी सफाया हो गया। फिर ये पोर्तगल और स्पेन उठे वो भी गए। फिर यह फ्रांस की बारी आई। ब्रिटेन की बारी आई। अभी देखिए वे लोग भी डाउन है। अभी आज अमेरिका की बारी चल रही है। देखिए कि जब भी आप शोषण के ऊपर में अपनी ये नेशनल ऑथॉरिटी ये नेशनल कल्चर को एस्टैब्लिश करेंगे तो यह कभी भी ज्यादा टिकने वाला नहीं है। आज विश्व में देखिए कि जो सबसे एंशिएंट सिविलाइजेशन एज इट इज चली आ रही है तो वह भारत ही है। इजिप्ट भी बहुत पुराना देश है। किंतु देखिए कि फेरोस के समय का जो कल्चर और ट्रेडिशन और लैंग्वेज वो सब कब का खत्म हो गया जब ये पहले तो ग्रीक लोगों ने अटैक किया और इसके बाद में यह इस्लाम आया। ये चाइना में भी देखिए कि यह क्फशियस कल्चर बुद्धिस्ट कल्चर वैसे है तो बहुत पुराना किंतु अभी ये लोग मार्क्सिज्म ले रह रहे हैं। तो उन लोगों ने भी और ये जो बीच में एक कल्चरल रेवोल्यूशन नामक एक पागलपन चला था वहां पे ये जितने भी नेशनल ट्रेजर्स थे ये नेशनल जितने भी आइकॉन्स थे ये कल्चरल आइकॉन्स सबको जैसे कि डिमोलिश कर दिया था। उनको ऐसा लगा कि यह कल्चर ही जो है हमारा यह हजारों साल पुराना कल्चर जो कि हमको डेवलप नहीं होने देता। अर्थात कि यह कल्चर और कल्चर के जो वहन करने वाले हैं यह साधु संत यह बुद्धिस्ट भिक्षू वगैरह उनकी कत्लेआम करो। यह जितने कन्फशियस स्कॉलर है उन सबको जेल में डाल दो। उन लोगों के ऊपर में टॉर्चर करो। तब कहीं जाकर के पूरा देश को जला दो। पुराने कल्चर को जला दो। और इस राख में से एक नया मॉडर्न कल्चर डेवलप करेंगे। इस तरह का उन्होंने किया है। अभी देखिए कि मटेरियल प्रोस्पेरिटी तो आ गई है किंतु हृदय जितना पहले की तरह ही खाली ही है। तो यह एक उनका प्रॉब्लम है। जापान में भी देखिए कि मेजी रिस्टोरेशन वह वहां पे एक बार हुआ था 18th सेंचुरी में। उसमें भी उन्होंने काफी हद तक पुराने कल्चर को हटा करके मॉडर्नाइज करने का प्रयास किया है। जापान में चाइना की तरह पागलपन कल्चरल रेवोल्यूशन वगैरह नहीं हुआ तो वो एक आप कह सकते हैं कि अभी भी पुरानी सभ्यता है जापान में। किंतु पुरानी बोलकर के कितनी हजार एक साल इससे ज्यादा कहां होगी? जबकि भारत की सभ्यता आप देखिए कि एटलीस्ट 10,000 साल तक तो आप ईजीली ट्रेस कर सकते हैं। तो इतना पुराना सभ्यता होने के बावजूद यह जो सभ्यता के जो मानदंड है, सभ्यता की जो कोर वैल्यूस है, वह अभी तक एज इट इज चली आ रही है। यानी कि इन टर्म्स ऑफ सिविलाइजेशन वी हैव अटेंड नियर इमोर्ट। तो यह जो प्राप्ति हुई है, वह इसीलिए हुई है कि हमने दूसरों के ऊपर में हमारे विचारों को बिठा देने के लिए लोगों पर अत्याचार नहीं किए।
India’s soft power - भारत का मिशन है आध्यात्मिक ज्ञान की रक्षा और प्रसार
इसके बाद का स्लाइड देखते हैं। देखिए कि क्या कहता है। यह जो है यह समरी है। एवरी रेस हिज अ मिशन इंडियास इज द लाइट स्पिरिचुअल। यह जितने भी देश है, जितने भी प्रजातियां है, जितनी भी सिविलाइजेशन है, उन सबका एक मिशन रहता है। अर्थात देखिए एक बहुत ही प्रोफाउंड स्टेटमेंट है इस अर्थ में कि आप देखिए कि हम लोग मनुष्य जन्म का पर्पस क्या है? इस प्रश्न का उत्तर हम उपनिषद में प्राप्त करते हैं कि हां मनुष्य जन्म धारण किया है तो हमको ईश्वर प्राप्ति करनी है या ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना है। ब्रह्म साक्षात्कार करना है। प्राप्त क्या वो तो पहले से ही है। या तो फिर यह आत्मज्ञान उसको हमको साक्षात्कार करना है। तो आप धर्म की दृष्टि से एक इंडिविजुअल जो है उसका तो आप एक पर्पज हमको स्पष्ट रूप से मिल गया है। किंतु यहां पर देखिए कि स्वामी जी एक बिल्कुल ही नया कांसेप्ट हमारे सामने खड़ा करते हैं कि एक सिविलाइजेशन का भी एक मिशन होता है। जिस तरह से एक इंडिविजुअल का मिशन है जो कि हमारे उपनिषदों में दर्शाया गया है वैसे ही एक सिविलाइजेशन का भी मिशन होता है। रेस शब्द जो है वह आजकल थोड़ा सा वह नेगेटिव दृष्टि से देखा जाता है। क्योंकि यह जो हिटलर और यह जो फासिस्ट लोग थे उन्होंने रेशियल प्रोप्यरिटी की बात कही। यानी कि यह जर्मन रेस जो है जर्मन प्रजा जो है वह यहूदियों से ज्यादा श्रेष्ठतर है। बोल कर के यह रेशियल प्योरिटी मेंटेन करने के लिए यहूदियों को खत्म कर दो। बोल के पकड़ पकड़ करके सबको कंसंट्रेशन कैंप में डाल दिया था। तो वह कहानी जग जाहिर है। तो इसीलिए रेस शब्द यदि ना यूज करें आज के मॉडर्न युग में और यदि सिविलाइजेशन शब्द यूज करें तो इट इज मच बेटर। और स्वामी जी जो कहते हैं उसके साथ में परफेक्टली वो मैच हो ही जाता है। तो देखिए कि एव्री सिविलाइजेशन हैज़ ए मिशन। और स्वामी जी हमको कहते हैं बाद में कहेंगे भी सही। क्या कहते हैं? फॉर अदर नेशंस रिलीजन इज वन अमोंग मेनी ऑक्यूपेशंस। दूसरे जो देश है वहां पे धर्म जो है वह बहुत सारे और जो भी एक उनके सामने पड़े हैं उसमें से यह एक धर्म भी है। अब जैसे फ्रांस है तो उनके सामने मिलिट्री एक कॉन्क्वेस्ट जो है वो एक बहुत बड़ा यह था। अभी ब्रिटेन को आप देखेंगे। ब्रिटेन के बारे में कहा जाता है नेशन ऑफ शॉपकीपर्स अर्थात कि ये दुकान चलाने वाले जो लोग होते हैं ना तो ये दुकान चलाने वाले लोगों का देश है। उन लोगों को चाहिए ट्रेडिंग मर्चेंडाइज मर्केंटाइल उनका जो पूरा एक माइंडसेट है। तो पूरे विश्व में वो एक अह परचेस फ्रॉम द चीपेस्ट मार्केट मार्केट एंड दी सेल इन द डियरेस्ट मार्केट। अर्थात कि उन लोगों का फ़ॉलोसोफी क्या है? सबसे स सबसे सस्ता जहां पे जो मिलता है, वहां से परचेस करो और सबसे महंगा जहां पे बिकता है, वहां पे ले जाकर के सेल करो। तो अभी स्पाइस है तो स्पाइस सबसे सस्ता कहां पे मिलेगा? तो यह स्पाइस आइलैंड जावा है, सुमात्रा है, इंडोनेशिया वगैरह-वगैरह जो स्पाइस आइलैंड है, वहां पे सबसे सस्ता स्पाइस मिलेगा, मसाला मिलेगा। तो वहां से खरीद करके यूरोप में मसाला सबसे महंगा बिकता है। क्यों? क्योंकि वहां पर मसाला उत्पन्न नहीं होता। तो वहां पर जाकर स्पाइस को सेल करो और बीच में से प्रॉफिट कमा लो। अभी सिल्क है तो इंडिया है, चाइना है वहां पे बहुत ही सस्ते में बहुत ही हाई क्वालिटी सिल्क मिल जाएगा। तो अभी उसको यूरोप में लाओ। जहां पे सिल्क बनता नहीं है। सिल्क बनाने की ये जो स्किल है वह अभी डेवलप नहीं हुई है। तो वहां पे ले आ करके सिल्क को सेल करो। तो सबसे ज्यादा पैसा मिलेगा और बीच में से प्रॉफिट ले लेना है। तो यह आप कहेंगे कि यह ब्रिटिश लोगों का एक माइंडसेट है। अमेरिकन लोगों का देखिए कि मैन्युफैक्चरिंग के प्रति उन लोगों का बहुत बड़ा है। एक्चुअली यह जो अमेरिकन सिविल वॉर हुई थी। बहुत सारे लोग कहते हैं कि नॉर्दन अमेरिका जो है उन लोगों के हृदय में बहुत बड़ा एक क्या कहेंगे? दया का उद्भव हुआ। और यह सदर्न अमेरिका है। जहां पर यह बड़े-बड़े कॉटन प्लांटेशन थे और जहां पर यह काले गुलामों को रखा गया था। यह ब्लैक स्लेव्स को तो उन लोगों को गुलामी से मुक्त करने के लिए उन्होंने सिविल वॉर किया। किंतु देखिए यह स्कूल में आपको यह सब पढ़ाएंगे। किंतु फैक्ट यदि देखें थोड़ा सा तो क्या है? नॉर्दन अमेरिका जो है वहां पर क्या था कि यह बड़ी-बड़ी फैक्ट्रीज चलती थी और फैक्ट्रीज में आपको स्लेव की जरूरत नहीं है क्योंकि यह मशीन ही काम करेंगे। तो फिर क्या है जहां पर स्लेव होते हैं उस टाइप का इकोनमी और यह जो मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी है इन दोनों के बीच में एक नेचुरल कंपटीशन होता ही होता है। तो यह कंपटीशन ने ही आखिर में युद्ध का स्वरूप धारण कर लिया था कि यदि ये स्लेव्स को हटाया जाए तो हमारा प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन होगा। ऐसा यह नॉर्दन ये जो मैन्युफैक्चरिंग वाले फैक्ट्री वाले सोच के बैठे थे। तो देखिए कि वहां का एक है कि मैन्युफैक्चरिंग हमारा एक मिशन है। यहां पर प्रॉफिट मेकिंग हमारा एक मिशन है। यहां पे पॉलिटिकल कॉन्क्वेस्ट अपना एक मिशन है। तो एव्री सिविलाइजेशन एव्री नेशन हैज़ इट्स ओन मिशन। किंतु भारत का जो मिशन है यहां पे इट इज़ लाइट स्पिरिचुअल। अभी यह लाइट स्पिरिचुअल शब्द एआई ने खोजा है और देखिए कि यहां पे यह पिक्चर भी कितना सुंदर दिया है। तो देखिए कि भारत का जो मिशन है पूरे विश्व में आध्यात्मिकता का फैलावा करना है। और हाउ दिस मैचेस देखिए हम लोगों ने जो ऑलरेडी ये फ्रेमवर्क जो बनाया है कि ठाकुर बेसिकली एग्लीिफाइस हमारी जो आध्यात्मिक साधना जो है एक इंडिविजुअल आध्यात्मिक साधना जो कि ईश्वर प्राप्ति के लिए ब्रह्म साक्षात्कार के लिए जो है उसको एग्ेंंपलीफाई करते हैं ठाकुर और फिर जो अपना एक कम्युनिटी लाइफ है कम्युनिटी लाइफ को एग्ेंंपलीफाई करती है कम्युनिटी लाइफ के आइडियल्स और वैल्यूस जो है उसको एस्टैब्लिश करती है मां शारदा और यह जो सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग है ऑन द लार्ज स्केल ऑफ हिस्ट्री ऑन द ग्लोबल स्केल ऑफ ह्यूमन सिविलाइजेशन क्या वैल्यूस है क्या आइडियाज है क्या अंडरकरेंट्स है? क्या थीम है? क्या विज़डम है? किस तरह से सिविलाइजेशन राइज़ होती है? किस तरह से सिविलाइजेशन का बर्थ होता है। किस तरह से सिविलाइजेशन डेवलप होती है? और किस क्या होता है? कौन सी दुर्घटना होती है कि जिसकी वजह से सिविलाइजेशन जो है उसमें धीरे-धीरे करके डिटेरेशन, करप्शन और आखिर में डिस्ट्रक्शन आकर के खड़ा होता है। यह जो सिविलाइजेशनल डायनेमिक्स है वो हमको स्वामी जी समझाते हैं। तो यहां पे देखिए कि जब हम इतनी सारी सिविलाइजेशंस को देखेंगे तो उसमें और प्रत्येक सिविलाइजेशन का एक एम होना चाहिए। वो एक एम को फुलफिल करनी चाहिए। अब देखिए कि मनुष्य का जीवन भी जो महत जीवन होते हैं उसमें कोई ना कोई एक हायर एंबिशन होता है। अब जैसे कि रविंद्रनाथ टैगोर है तो कवित्वमय उनका जीवन था। जीवन का एक बहुत बड़ा उनका कंट्रीब्यूशन था कि यह पोएटिक्स जो है और यह जो फिलॉसोफी है इस फील्ड में उन्होंने कंट्रीब्यूट किया था। यह अल्बर्ट आइंस्टाइन है उसका इतना बड़ा कंट्रीब्यूशन था। अभी हजारों साइंटिस्ट है इस जगत में। यहां पर मैं आजकल स्कूल कॉलेज में जाना होता है तो मैं बहुत सारी यह अंडर ग्रेजुएट स्टूडेंट को देखता हूं। अभी प्रत्येक कॉलेज में आप देखेंगे कि मिनिमम 1000 2000 स्टूडेंट होंगे। अभी इन लोगों का नाम भी हमने कभी सुना नहीं है ना ही कभी सुनने वाले हैं। क्यों? क्योंकि उनका ऐसा कोई कंट्रीब्यूशन ही नहीं है। एक छोटा सा जीवन है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि। पहले तो पास करो एग्जामिनेशन में। फिर कैसे भी करके छोटा-मोटा नौकरी का जुगाड़ कर लो। फिर शादी करो, बच्चे करो। फिर बच्चे की फिक्र करो। फिर अपना थोड़ा बहुत एंटरटेनमेंट का जुगाड़ करो। बूढ़े हो जाएंगे तो थोड़ा ट्रीटमेंट का जुगाड़ कर लो और फिर मर जाओ। यही तो एक छोटा सा जीवन के भीतर में सब बंदे हैं। किंतु ऐसे लोगों में जब एक आइंस्टाइन खड़ा होता है तो उसका नाम, उसकी कहानियां, उसका कंट्रीब्यूशन सब लोग जानते हैं। सभी लोग उसके कंट्रीब्यूशन से बेनिफिट प्राप्त करते हैं। तो रेसिस जो है या सिविलाइजेशंस जो है, जब वो एक बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन करती है तो वो सिविलाइजेशन महत्व सिविलाइजेशन कही जाती है। और जिस सिविलाइजेशन का ऐसा कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है, वह आई गई, कोई फर्क ही नहीं पड़ा। ना ही कोई उसकी चिंता करता है, ना ही उसके बारे में कोई जानता है। तो, अभी जैसे देखिए कि यह ऑस्ट्रेलिया है। ऑस्ट्रेलिया में ऑलरेडी कुछ लोग रह रहे थे। कुछ ट्राइब्स रह रही थी। फिर यह ब्रिटिश लोग गए। उन्होंने यह ऑस्ट्रेलिया की जितनी भी लोकल ट्राइब्स है उसका सफाया कर दिया और फिर वहां पे पूरे कॉन्टिनेंट को हड़प करके वे लोग अभी आराम से रह रहे हैं। अभी ये जो ऑस्ट्रेलिया के जो एबोरिजनल लोग हैं उनका क्या कल्चर था क्या कंट्रीब्यूशन था किसी को नहीं पता। क्यों? क्योंकि उन्होंने ऐसा हायर लेवल पे कुछ कंट्रीब्यूशन किया ही नहीं। या तो फिर किया होगा और हमको पता पता नहीं है। व्हाटएवर किंतु अभी जैसे देखिए फ्रांस है, जर्मनी है या तो फिर यह रशिया है या तो फिर यह इजिप्ट है ना कि यह टर्की है ना कि यह ईरान है। उस समय का परर्शिया यह सब देश जो है इसके बारे में हमको पता है। उन्होंने क्या कंट्रीब्यूट किया है वह भी हमको पता है। इन सब देशों में किस तरह से आर्ट है, कल्चर है, लिटरेचर है, पोएट्री है, साइंस है। यह सब कैसे डेवलप हुआ, यह सब हमको पता है। थोड़ा बहुत हिस्ट्री पढ़ेंगे तो पता चल जाएगा। तो जो कंट्री जो है जितना ज्यादा कंट्रीब्यूट करता है उतना ही अब जैसे ग्रीस देखिए पूरा आप यूरोप का हिस्ट्री पढ़ेंगे जितने भी आइडियाज है सभी हिस्टोरियन सभी फिलॉसोफर सभी साइंटिस्ट अपने आइडियाज को ग्रीस तक ट्रेस करने का प्रयास करेंगे डेमोक्रेसी कहां से आया तो वो ग्रीस में स्टार्ट हुआ अभी ये जो मॉडर्न फिजिक्स जो है उसका प्रारंभ कहां से हुआ तो यह एरिस्टोटलल के राइटिंग्स में उसका बहुत सारा कुछ हमको आरंभ देखने को मिलता है। यह कोई भी आप मॉडर्न फील्ड ले लीजिए। सभी लोग कहेंगे उसका हिस्ट्री पढ़ने का प्रयास करेंगे तो सभी लोग ग्रीस से प्रारंभ करेंगे। क्यों? क्योंकि ग्रीस इज अ वाटर शेड इन यूरोपियन हिस्ट्री। कि हां यहां से सब कुछ हमारा जो जिसको आज हम यूरोपियन वेस्टर्न सिविलाइजेशन कहते हैं उसका उद्गम स्थान उसकी गंगोत्री वो ग्रीस में है। तो ग्रीस का भले ही चाहे ग्रीस स्वामी जी कहते तो है कि यह वही ग्रीस है जहां पे कि कै केपिटोलाइन हिल के ऊपर में मकड़ियां जो है अपना जाला गूंथ रही है। स्पाइडर जो है अपनी वेव्स बना वेव जो है व्यू कर रहे हैं। किंतु उस ग्रीस का जो फिलॉसोफिकल या तो फिर यह जो साइंटिफिक कंट्रीब्यूशन है, इट इज़ स्टिल एनरचिंग वेस्टर्न सिविलाइज़ेशन। तो, क्या है कि भले ही चाहे देश चला गया किंतु उसका कंट्रीब्यूशन तो हमेशा के लिए रह गया। यानी कि कोई भी कंट्री क्या कंट्रीब्यूट करती है उसके ऊपर में उसकी ग्रेटनेस डिपेंड करती है। बहुत सारे देश आते हैं जाते हैं ना ही उनके बारे में कोई सुनते हैं ना ही उनका ऐसा कोई खास कंट्रीब्यूशन होता है। अभी आजकल आप अफ्रीका के यह जो सुदान है, नाइजीरिया है वगैरह कंट्रीज देख लीजिए। यह तंजानिया है। नाम तो हमने सुना है किंतु इससे ज्यादा और कुछ नहीं। सुदान में जो इतने अभी ये इतने सालों से ये सिविल वॉर चल रही है। इतने सारे लोग मर रहे हैं। वहां पे कौन इसका ज्यादा टेंशन लेता है? अच्छा ठीक है। वो आए गए मरे एक दूसरे को मारे। हम लोगों को क्या है उससे? क्यों? हमको सिंपथी क्यों नहीं होती सुदान के ऊपर में? क्यों? प्रॉब्लम क्या है कि हम लोग सुदान को पहचानते नहीं। वहां के लोगों को हम पहचानते नहीं। आज अभी देखिए कि अमेरिका में एक छोटा सा एक स्कूल में एक शूटिंग भी होता है तो पूरे जगत में यह न्यूज़ फैल जाता है। सूडान में आप देखिए इतने लोगों की हत्या हो गई। कोई फिक्र नहीं कहीं पे कोई न्यूज़ नहीं। क्यों? क्योंकि अमेरिका का जो कंट्रीब्यूशन है इसकी वजह से हम कुछ-कुछ अमेरिकनों को अच्छे से पहचानते हैं जो कि रेगुलर न्यूज़ में रहते हैं। तो फिर क्या है ना एक सिंपथी का एक नाता बन जाता है। तो वहां पर कुछ भी हुआ तो हमको सुनने के जानने की एक आकांक्षा एक इच्छा होती है। अभी किसी भी सुदानिश को मैं तो नहीं पहचानता और हालांकि मैं रेगुलरली न्यूज़ पढ़ता हूं। किसी भी सुदानिश को मैं नहीं पहचानता। तो फिर क्या है प्रॉब्लम कि इन लोगों के साथ में एंपैथिक एक रिलेशन है वह एस्टैब्लिश नहीं होता। देखिए कि भारत को गाली देने वाले लोगों की अमेरिका में कोई कमी नहीं थी। किंतु जिस क्षण स्वामी जी अमेरिका गए और भारत की महत्ता का गुणगान गाए तभी से यह अमेरिका वासियों की उस समय के जो कुछ अमेरिका निवासी थे उन लोगों की भारत के प्रति एक प्रीति का संबंध जन्मा। अभी यहां पर बात यह नहीं है कि भारत का कल्चर और उसकी ग्रेटनेस सुनकर के यह उनको एमैथी या फ्रेंडशिप उनके भीतर में जन्म ली है। भारत की ग्रेटनेस हमेशा से थी। यदि आप कोई भी एक किताब खोल के पढ़ना शुरू करेंगे तो आप सब पता चल जाएगा। बात यह नहीं है कि भारत की ग्रेटनेस बात है कि स्वामी विवेकानंद की जो पर्सनालिटी थी उसकी वजह से स्वामी जी के साथ में उन लोगों का एक स्नेह का रिश्ता बना और यह जो स्नेह का रिश्ता जो है वो उसके प्रति फिर यह एक आकर्षण प्रकट करता है। तो क्या है कि अभी जैसे कि अपना एक मित्र है। अभी जब हम ट्रैवल करते हैं तो फिर रास्ते में बहुत सारे गांव आते हैं जाते हैं। कौन उसका इतना यह लेता है, चिंता करता है कि यह कौन सा गांव है? उसमें कौन सी दुकान है? उसकी क्या स्पेशलिटी है? यहां पे क्या बनता है? कुछ नहीं। किंतु जैसे ही देखिए कि ठाकुर कहते हैं कि एक ये ठाकुर के साथ में ही हुआ ना कि मैं एग्जैक्ट भूल गया। किंतु ठाकुर का ही यह उदाहरण है कि एक गांव गए। पता चला कि यह गांव की जो मिट्टी है, मिट्टी में से खोल बनता है, वह जो बजाने वाला और यह जो खोल होता है ड्रम जैसा उस वो जो चैतन्य महाप्रभु का उत्सव वगैरह जो होता है ना उसमें यह बजाया जाता है। तो जैसे ही यह एसोसिएशन बैठा सीधे ठाकुर समाधि में चले गए। अभी यह ठाकुर के ही साथ में हुआ कि ठाकुर कोई कहानी कहते हैं। मैं एग्जैक्ट भूल गया। किंतु देखिए कि यह एसोसिएशन बैठना चाहिए। अपने प्रियतम के साथ में चैतन्य महाप्रभु की मैं आराधना करता हूं। बोल कर के अभी यह एक जो गांव है जिसके साथ में मेरा कोई रिलेशन नहीं। किंतु जैसे ही पता चला कि इस गांव की मिट्टी से खोल बनता है और वह खोल जो है चैतन्य महाप्रभु के उत्सव में बजता है। फटाक करके मुझे वहां पर जाकर समाधि हो गई। राईट? तो अभी यदि इस तरह का कोई रिलेशन नहीं होता उस गांव के साथ में, तो क्या मुझे कुछ होने वाला था गांव जाकर के? कुछ नहीं तो वैसे ही भारत के बारे में जो सिंपथी प्रकट हुई विदेश में वह स्वामी जी की पर्सनालिटी की वजह से प्रकट हुई थी। प्रत्येक सिविलाइजेशन है उन लोगों को इस तरह के ग्रेट मैन को प्रोड्यूस करना पड़ेगा। अभी आज तक हम देखिए कि जैसे ही फिलॉसोफी डिपार्टमेंट में जाएंगे आपको कोई भी स्कूल कॉलेज की फिलॉसोफी स्ट्रीम में एडमिशन लेंगे सीधा आपको सोक्रेटिस है एरिस्टोटल है ये कांट है हेगेल है वगैरह पढ़ाना शुरू कर देंगे अभी आप कांट हेगेल एरिस्टोटलल सोक्रेटिस वगैरह को पढ़ेंगे तो साथ-साथ में ही वेस्टर्न कंट्रीज के ऊपर में ऑटोमेटिक एक सिंपथी होगी फिर वे लोग यहां पे आके अपना शोषण भी करेंगे ना तो हम लोगों को ज्यादा यह पता नहीं हम लोगों को ज्यादा दुख नहीं होगा। यह कैसा है पता है? वह जो मॉस्किटो है अपना खून चूसता है। किंतु सबसे पहले क्या करता है? उसका यह जो कांटा यह जो होता है ना वह पहले हमारे खून में वह थोड़ा बहुत यह डाल देता है। एनस्थेसिया डाल देता है। तो अभी जैसे ही एनस्थेसिया गया तो हमको अभी पता नहीं चल रहा है कि यह खून चूस रहा है। तो यह वेस्टर्न कल्चर का जो मोह है ना हमारे मन के ऊपर में यह एक एनस्थेसिया की तरह कार्य करता है। अभी यह चाइना वाले थोड़ा बहुत भी कुछ गड़बड़ करने को जाएंगे हमारे साथ में। साथ-साथ में ही सब लोग चिल्लाएंगे। पाकिस्तान कुछ भी करेगा गड़बड़ तो सब लोग चिल्लाएंगे। किंतु यह ट्रंप पगला भारत को इतना गाली भी दे रहा है तो हम लोग चुपचाप सहन कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि पाकिस्तान या चाइना के साथ में ऐसा कोई हृदय का रिश्ता अपना नहीं है। जबकि अमेरिका के साथ में बैठ गया है ऐसा बहुत सारे के मन के भीतर में। तो बोल कर के वे लोग एक्सप्लइट भी करेंगे तो हम उसका उत्तर नहीं देंगे। तो देखिए कि यह जो सिविलाइजेशन का कंट्रीब्यूशन होता है वह सिविलाइजेशन का सॉफ्ट पावर है। यह सॉफ्ट पावर एक बार आपने डेवलप किया तो इस जगत में जय आपका होना ही होना है। तो यहां पे देखिए कि प्रत्येक सिविलाइजेशन का एक कंट्रीब्यूशन है। भारत का कंट्रीब्यूशन है स्पिरिचुअलिटी। और क्या कहता है यह एआई फॉर अदर नेशंस
धर्म भारत की आत्मा है. पर क्या आज यही धर्म हमारी प्रगति में बाधक बन गया है?
रिलीजन इज वन अमोंग मेनी ऑक्यूपेशंस बट अभी कोटेशन मार्क चालू होते हैं। हियर इन इंडिया रिलीजन इज द वन एंड ओनली ऑक्यूपेशन ऑफ लाइफ। अन्य-अ्य्य देशों में देखिए कि और भी बहुत सारी चीजों को ले यह व्यस्त रहते हैं। किंतु भारत में धर्म ही है हमारे जीवन का प्राण। अभी देखिए इस स्टेटमेंट को लेकर के हम आर्गुममेंट करना चाहे तो कर ही सकते हैं। इवन स्वामी जी के समय में भी आप देखिए स्वामी जी ये राजपूताना वगैरह में जो भ्रमण करते थे और वह जो एक राजपूत राजा से मिले थे वह जोधपुर ना कि जयपुर जहां पर भी हो तो वह राजा स्वामी जी को कहता है कि स्वामी जी मुझे तो यह मूर्ति पूजा वगैरह में कोई इंटरेस्ट नहीं है। तो मैं क्या नर्क में जाऊंगा क्या? और राजा पूछता भी है इस तरह से मृदु हास्य करता करता कटाक्ष करता हुआ यानी कि उसने अपने मन में फिट बिठा के रखा है कि जो यह मूर्ति पूजक है सब के सब चोर लुटेरे हैं लोगों को भ्रमित करके अपनी जेब भर रहे हैं। बस यह यूरोपियन सिविलाइजेशन यूरोपियन लर्निंग वेस्टर्न लर्निंग वही सुपीरियर है। किंतु फिर स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया? हमको तो पता है। स्वामी जी ने वो राजा की जो छवि थी वो उसके दीवान को दिखा इसके ऊपर में थूंको। तो दीवान जिस तरह से बेचारा डर गया राजा समझ गया कि यह छवि के भीतर में पिक्चर के भीतर में भी देखिए कि भले ही चाहे असली व्यक्ति उपस्थित ना हो किंतु उसका आईडिया तो उपस्थित है और जितना सम्मान आप जीवित व्यक्ति को करते हैं उतना ही सम्मान उसकी यह जो आईडिया है उसको करना चाहिए। तो इस सिंबॉलिज्म के पीछे का लॉजिक तो वह उसको थोड़ा बहुत अकल आया। किंतु यह तो हमको स्पष्ट रूप से पता है कि ना ही स्वामी जी के समय में ऐसा था कि भारतवासी जितने भी थे दिन रात धर्म को ले रहते थे ना ही आज ऐसा है। थोड़ा बहुत भी आप रिसेंट हिस्ट्री खोल के देखेंगे तो यह स्टेटमेंट जो है स्वामी जी का कि भारत में रिलीजन इज द वन एंड ओनली ऑक्यूपेशन ऑफ लाइफ। इसके बारे में आपको सीरियस डाउट होगा और होना ही चाहिए। एक ओपन डिबेट करना यह तो माने यदि स्वामी जी को पढ़ने के बाद में यदि हम डिबेट आर्गुमेंट क्वेश्चन उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष करना न सीखे तो फिर स्वामी जी को पढ़ने का क्या लाभ है? तो अभी इस बारे में बहुत सारे उत्तर हो सकते हैं। मेरा पर्सनल ऐसा मानना है कि देखिए कि अब जैसे कि मान लीजिए नमक है। आप जो भी खाना खाते हैं सभी खाने में थोड़ा बहुत तो नमक आता ही है। वो चाहे राइस हो ना कि चाहे सब्जी हो ना कि चाहे दाल हो ना कि जैसे यहां साउथ इंडिया में यह रसम बनता है ना कि यह कुछ भी बनता है। जो भी खाना होता है उसमें थोड़ा बहुत तो नमक डाला ही जाता है। तो अभी जो कि ऐसा कहेंगे कि ये लोग सिर्फ नमक खाते हैं या तो फिर कहेंगे कि सभी चीजों में नमक खाते हैं। तो इसका अर्थ यह थोड़ी ना है कि एक्चुअली नमक का इतना बड़ा बाउल भर करके आप चम्मच से नमक खा रहे हैं। नहीं बात ऐसी है कि नमक जो है सभी चीजों में डला है और इतना चपटी भर नमक भी जो होता है ना टेस्ट को पूरा ट्रांसफॉर्म कर देता है। आप सब्जी में बिना नमक की सब्जी खा के देखिए। आपको अरे लगेगा कि अरे इसका टेस्ट बिल्कुल इतना बेकार इतना बुरा टेस्ट क्यों लग रहा है? तो फिर इसका टेस्ट बढ़ाने के लिए क्या पूरा डिब्बा भर के 1 किलो नमक डाल देंगे उसमें? नहीं एक चपटी भर नमक ही उसमें डालना है और देखिए कि टेस्ट ट्रांसफॉर्म हो जाता है। तो भारत में हम जो कुछ भी करते हैं इसमें यह चपटी भर मात्र स्पिरिचुअलिटी ऐड करने से भी देखिए कि हमारा सब कुछ ट्रांसफॉर्म हो जाता है। दूसरे देशों में देखेंगे कि यह माइंडसेट ही ऐसा रहता है कि कब दूसरे देशों पे आक्रमण करें। कब उनको लूटे, कैसे उनको एक्सप्लइट करें, कैसे बड़े से बड़े एंपायर बनाएं? कैसे बड़ा सा बड़ा ये मर्चेंडाइज नेटवर्क यह जो कमर्शियल नेटवर्क बनाए, कैसे बड़ा सा बड़ा प्रोडक्ट बना करके मोनोपोली एस्टैब्लिश करें। अब कि भारत में है कि जीवन निर्वाह के लिए जो कुछ करना है वह करना है और फिर यदि समय प्राप्त होता है तो कोई अन्य चिंता करनी है। यह जगत के बारे में बहुत ज्यादा एंबिशन हम लोगों की नहीं है। अभी ऐसा भी नहीं है। अब अब जैसे कि मैंने कहा कि ये जो मैं इतने सारे स्टूडेंट्स को देख रहा हूं अंडर ग्रेजुएट। ऐसा तो नहीं है कि उन लोगों की मैं आइंस्टाइन हो जाऊं ना कि एक मैं यह निको ये जो ईलॉन मस्क की तरह एक इंडस्ट्रियल इंडस्ट्रियलिस्ट हो जाऊं ना कि मैं स्पेस एक्स एस्टैब्लिश कर दूं। इस तरह की यदि एंबिशन नहीं है तो फिर ये लोग स्पिरिचुअल है ऐसा भी नहीं है। राइट? भारत में प्रॉब्लम क्या हो गया है? अभी आजकल खास करके स्वामी जी के समय से ही देखिए यदि एक्सटर्नल एंबिशन नहीं है तो एटलीस्ट फिर इंटरनल एंबिशन भी नहीं है। यह एंबिशन का अभाव जो है दैट इज वेरी डेंजरस। भारत के साथ में जो पिछले 1000 साल से वही हुआ है। देखिए ठाकुर ठाकुर के भीतर में ठाकुर का ही उदाहरण एक्सटर्नल एंबिशन नहीं थी। ठाकुर ने स्पष्ट कहा चाल कोला बांधा विद्या आमीन वो दरकार नहीं हमारा अर्थात चाल कोला बांधा विद्या अर्थात कि चाल आप यदि पुरोहित थे वह तो ब्राह्मण थे तो किसी कह कर पूजा करने को जाएंगे तो पूजा करके अभी नजर तो वहीं पे है ना कि पूजा जैसे ही जल्दी-जल्दी खत्म करके दक्षिणा लेकर भागूं यहां से दूसरी जगह पूजा करने जाऊं तो वो जो पूजा खत्म करके वो जो क्या मिलता है वो दक्षिणा में तो चाल अर्थात कि चावल और कला अर्थात कि बनाना तो ये बनाना और ये चावल और ये एक दो सिक्का दक्षिणा ये मिलेगा वो पुरोहित को पूजा करने के बाद में दक्षिणा के रूप में तो ठाकुर कहते हैं यह चावल और केला और यह दोनों को मिल दोनों जो प्राप्त कराती है इस तरह की विद्या सीखने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। किंतु यही ठाकुर सामने में यह भी कहते हैं कि मैं भक्तों का राजा होऊंगा। इस तरह की मेरी एंबिशन थी। यानी कि एक्सटर्नल एंबिशन नहीं थी। इंटरनल एंबिशन तो थी। स्वामी जी का ही वह जो स्ट्रगल है काशीपुर के दिनों के समय का कि कैसे भी करके निर्विकल्प समाधि कैसे भी करके जीवन का जो सर्वोच्च तत्व है उसको प्राप्त करने की कामना वासना इच्छा वो तो उनमें इतना स्ट्रांग था बोलकर के ही उन्होंने काशीपुर में ही निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली थी। तो क्या है कि एक्सटर्नल एंबिशन नहीं है तो किंतु एटलीस्ट इंटरनल एंबिशन है। आजकल जो भारत में ज्यादातर लोगों के साथ में जो हो रहा है ना ही एक्सटर्नल एंबिशन इतना स्ट्रांग है ना ही इंटरनल एंबिशन इतना स्ट्रांग। देखिए एंबिशन होता है। ऐसा नहीं है कि कोई यह कहेगा कि नहीं मुझे तो गरीब ही रहना है। मुझे तो मूर्ख ही रहना है। सभी लोग इस तरह के डे ड्रीमिंग करेंगे कि मैं यह इस तरह वो जो किसी सुपरस्टार की तरह पॉपुलर हो जाऊं। ये मैं धोनी की तरह बड़ा क्रिकेटर हो जाऊं ना कि मोदी की तरह बहुत बड़ा राजनेता हो जाऊं, पीएम हो जाऊं। सपने तो दिवा सपना तो सब लोग देखेंगे। किंतु सपनों को साकार करने के लिए जो ग्राउंड वर्क हमको जो फुटवर्क करना पड़ता है वो कितने लोग करते हैं तो वो बहुत ही कम लोग करते हैं। दैट इज अ प्रॉब्लम। भीतर में भी ले मैं भी सोचता हूं कि 12 साल में ठाकुर को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई थी। मुझे भी हो जाए। इस तरह के दिवा स्वप्न मैं भी देखता हूं। किंतु ठाकुर ने जो प्रचंड परिश्रम किया है उस तरह का परिश्रम करने की कैपेसिटी या तो फिर वह जो क्या कहेंगे कैपेबिलिटी वो मेरे में है ही नहीं। राइट? क्या है कि दिवा स्वप्न सब लोग देखते हैं। किंतु उसके लिए जो फुटवर्क करना चाहिए वो फुटवर्क करने की कैपेसिटी बहुत कम लोगों में होती है। वहां पे विदेश में क्या है कि एक्सटर्नल जो ड्रीम्स है उनके जगत के बारे में जो एंबिशन है उसको म उसको सफल बनाने के लिए वे लोग फुट वर्क करते हैं। परिश्रम करते हैं। सफल होते हैं। भारत में क्या है कि सभी चीजों में हमने एक तरह का संयम बढ़ता है। चाहे पॉलिटिकल पावर हो ना कि चाहे मिलिट्री पावर हो ना कि चाहे इकोनॉमिक पावर हो। देखिए यह जो एशियन टाइगर जिसको कहते हैं हम यह कोरिया है ना जापान है ना सिंगापुर है ना कि ताइवान है और अभी लेटेस्ट जो है यह चाइना है। तो पर एनम 20% जीडीपी ग्रोथ उन लोगों का हो रहा था। एक समय था 10 टू 20% और परिणाम आज यह है कि उनका जो पर कैपिटा इनकम है वह यूरोपियन कंट्रीज से भी ज्यादा है चाइना को छोड़कर के बाकी के जो एशियन टाइगर्स हैं उनका और फिर बाद में चाइना ने भी इसी रास्ते पे आगे बढ़ा। भारत में जो है इस तरह का एंबिशन ये नेशनल लेवल पर था ही नहीं। कैसे भी करके एक पागल की तरह एक स्क्रिजोफेनिक सोशलिस्ट स्टेट बना करके रखना है। वहां पर सभी चीजों का लाइसेंस होगा। जस्ट कल ही मैं जा रहा था रास्ते में कहीं पे गाड़ी में बैठ के तो किस हमारे जो एक डिवोटी थे उन्होंने बोला कि महाराज मैं जब स्टूडेंट था तो यह मार्केट था ना पूरा ब्लैक मार्केट था। यहां पे तो ये ये है ना सी पोर्ट है यहां पे। तो बहुत सारी शिप में क्या होता है कि यह विदेश से उस समय की बात है। वो स्टूडेंट है वो अभी तो रिटायर हो गए हैं। वो स्टूडेंट होंगे एटलीस्ट आज से 40 50 साल पहले की बात तो उस समय क्या था कि ये जितना भी इलेक्ट्रॉनिक्स आता है जापान से वो ड्यूटी फ्री अभी आप ड्यूटी कितना था 200% 300% 500% इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम के ऊपर में इतना ड्यूटी था। तो वे लोग क्या करेंगे कि कोस्ट गार्डन की जो भी है उन लोगों के साथ में समझौता करके कि जो भी है वह दो नंबरी स्मगलिंग करके कैसे भी करके यह विशाखापटनम में घुसा देंगे वह मार्केट में सेल करेंगे। अभी जैसे कि देखिए आइटम तो वैसे महंगी है किंतु उसके ऊपर में 500% ना कि इतना ड्यूटी डालेंगे तो कितना और महंगा हो जाएगा। यानी कि ड्यूटी फ्री आइटम दो नंबर स्मगल की हुई उसको लेने के लिए बहुत सारे लोग इस मार्केट में आते थे। अभी म उस समय माइंड सेट ही ऐसा था कि कंजमशन है यह जो ट्रांजैक्शन है माने लेना और देना माने सेल करना परचेस करना मैन्युफैक्चरिंग करना उस सबके ऊपर में सरकार की जैसे कि एक वक्र दृष्टि थी आज हम कहते हैं जितना भी लाना हो लाओ जितना सेल करना हो करो किंतु उस समय इस तरह का परिस्थिति था तो क्या है कि देखिए कि हम लोग इस तरह के एक सोशलिस्ट माइंडसेट में रहे हैं जहां पे भी हमको ये इकोनॉमिक एंबिशन को भी हम लोगों ने बड़े मॉडरेट करके रखा है। आइडियली होना यह चाहिए कि बाह्य जगत में जब भी अपनी एंबिशन मॉडरेट है तो इनर वर्ल्ड में उसको बहुत ही ज्यादा स्कोप मिलना चाहिए। बहुत ही ज्यादा एक्सपंड होनी चाहिए। यह हो नहीं रहा है। यह भरत का दुर्भाग्य है। वह वही हमारा जो यह उदाहरण मैं बार-बार कहता हूं कि यह जो वाटर स्नेक ठाकुर का ही उदाहरण किंतु थोड़ा सा चेंज करके कि यह वाटर स्नेक है। मेंढक को गीला है। ना ही अभी उसको खा पाता है ना ही उसको फेंक पाता है बाहर में और बोल करके ना ही मेंढक मर रहा है ना ही यह वाटर स्नेक है। उसकी यंत्रणा का अंत आ रहा है। तो भारत में भी जैसे कि यह आध्यात्मिकता को पकड़ करके ना ही हम आध्यात्मिकता को डाइजेस्ट करके आध्यात्मिक वर्ल्ड में एक के बाद एक हमारा जो कि आम नागरिक है वो बढ़ पा रहे हैं ना ही फिर यह आध्यात्मिकता गले में घंटी की तरह धर्म जो है इस तरह से बंध गया है कि एक्सटर्नल वर्ल्ड में भी ज्यादा कुछ डेवलपमेंट नहीं कर पाते। यह सुंदर पिचाई वगैरह को यदि अपनी एंबिशन को खुला रास्ता देना है तो वह अमेरिका ही जाना होगा। अभी जस्ट रिसेंटली मैं एआई का हिस्ट्री पढ़ रहा था। तो एक जोफ हिंटन करके एक एक ये है कनेडियन रिसर्चर। तो अभी क्या है कि उसको आजकल मॉडर्न एआई का वन ऑफ द फाउंडर माना जाता है। तो उसने ठीक किया वो प्रोफेसर था। तो उसने यह ठीक किया कि मैं क्या है कि कॉर्पोरेट जॉब करना चाहता हूं। और कॉर्पोरेट जॉब करने के लिए उसने क्या किया? बुद्धि क्या यूज़ की कि उसने कंपनी एस्टैब्लिश की। वह खुद उसका फाउंडर उसके जो दो स्टूडेंट है उसके एंप्लई तीन लोगों ने एक कंपनी एस्टैब्लिश की और अभी कंपनी बना करके वह अपने को सेल कर रहे हैं। ऑक्शन कर रहे हैं। माने फटाक करके कोई कंपनी जॉइ कर लेगा वो प्रोफेसर तो उसको तो इतना सैलरी नहीं मिलेगा। तो वो अपने को ऑक्शन कर रहा है। देखिए उसका भी बुद्धि कैसा है। तो ऑक्शन में कौन और यह जो है माने आजकल का जो मॉडर्न एआई स्टार्ट हुआ है ना उसके पीछे की ये वन ऑफ द इंपॉर्टेंट स्टोरीज ये जोफ हिंटन है। फिर ये जो डेमिस हसाबीस है ये जो फिर ये सेम ओल्टमैन है। इन लोगों का हिस्ट्री ये बता रहा है। तो आई थिंक ये 2012 ना कि 13 की ही बात है। जबकि यह पूरा मूवमेंट ऑन होना था। स्टार्ट हो रहा था उस समय। तो यह अपना ऑक्शन कर रहा है अपनी कंपनी का। ऑक्शन में कौन था? तो एक माइक्रोसॉफ्ट था, Google था और यह डेमिस हसाबिस का डीप माइंड उस समय इंडिपेंडेंट कंपनी था। बाद में वो Google में मर्ज हो गया। और पता है एक और कौन था? तो बायडू चाइना का। अब देखिए कि सभी लोग ये ये कर रहे हैं बीड कर रहे हैं एक के बाद एक। तो यह जो बायडू कंपनी है चाइना की उसका जो बडिंग है वह मिलियन डॉलर माने 30 मिलियन 40 मिलियन ऐसा 10 मिलियन 15 मिलियन 20 मिलियन 25 मिलियन कंपनी खरीदने के लिए जोफ हिंटन की तो वो बडिंग करते ही जा रहे हैं। करते ही जा रहे हैं। और बायडू ने भी ठीक करके रखा है। देखिए कि भविष्य जो है और वो एआई के बेस पे होने वाला है और यह एआई का बहुत ही पावरफुल रिस्चर है। कैसे भी करके उसको अपनी कंपनी में लाना है। तो उसके जो एग्जीक्यूटिव है जो बडिंग कर रहे हैं उसको ऑर्डर हुआ है कि कैसे भी करके जो अपनी जो अमाउंट है वो कम नहीं होनी चाहिए। कैसे भी करके उसको खरीदो उसकी कंपनी को और कनेडियन रिस्चर को अपने यहां पे बुलाओ चाइना में। तो ठीक है। तो आखिर में Microsoft निकल गया फाइनल बडिंग में से 40 मिलियन ना कि ऐसा सब गया तब और उसके बाद में है यह Google है और यह बायडू है। दोनों बीडिंग करते ही जा रहे हैं। करते ही जा रहे हैं। आई थिंक 44 मिलियन पे आके बात अटकी और बायडू तो खत्म नहीं करने वाला है। वो बडिंग में से निकलने नहीं वाला है। ठीक करके रखा है कि इसको लेना ही लेना है। किंतु यह जो रिस्चर है प्रोफेसर उसने सोचा कि मुझे चाइना नहीं जाना है। मुझे अमेरिका में ही रहना है। तो बोल के फिर उसने बडिंग टर्मिनेट कर दिया और फिर यह Google को अपनी कंपनी बेच दी और वह Google में आकर काम कर रहा है। अभी देखिए कि हम लोग भारत के बारे में ऐसा सोच ही नहीं सकते। मैंने अभी कुछ रिसेंट कुछ आर्टिकल पढ़े तो उसमें लिखा है कि देखिए कि भारत में अपनी खुद की प्रोडक्ट बनाए। इस तरह की टैलेंट की कोई कमी नहीं। किंतु हमने हमेशा से अपनी एंबिशन जो है ना उसको इस तरह से काट करके रखा है। अपनी एंबिशन को इस तरह से पंगू बना करके रखा है कि ये वेस्टर्न कंट्रीज के लिए हम लोग बैक ऑफिस का काम करेंगे। यह जो क्लार्क बनाने वाली सिस्टम वो अपने डीएनए में इस तरह से घुस गई है कि वो क्लार्क ही रहना है। हमको अपनी प्रोडक्ट डेवलप करके अपना मार्केट शेयर नहीं डेवलप करना है। पता नहीं यह कहां से यह आया। माने यह हम आज मैकोले को गाली दे रहे हैं तो सिर्फ मैकोले को गाली देने से भी नहीं चलेगा। देखिए भारत में यह जो धर्म है या आध्यात्मिकता है उसने हमेशा से अपनी एंबिशन जो है ना एक्सटर्नल एंबिशन इसको एक तरह से लिमिट करके रखा ही रखा है। इस बात को हम डिनाई नहीं कर सकते। प्रॉब्लम क्या है पता है? जब पहले के युग में भले ही चाहे हमारी एक्सटर्नल एंबिशन लिमिटेड थी। इंटरनल एंबिशन जो थी हमारी बड़ी ही स्ट्रांग थी एग्ेंंपलीफाइड बाय श्री रामकृष्ण कि देखिए कि अंतर जगत में एक के बाद एक सोपान सर करके एक के बाद एक युद्ध में विजय प्राप्त करके हम लोगों ने सर्वोच्च जो प्राप्ति है मनुष्य जीवन की वो प्राप्त की है। तो वो एक हमेशा के लिए हमारा था। किंतु देखिए कि हाउ इज इट पॉसिबल कि हम लोग वह भी हार गए और यह भी हार गए। माया मिली ना राम ऐसा कहते हैं ना आजकल म रिसेंटली भारत के साथ में ऐसा होता आ रहा है। एक्सटर्नल एंबिशन कभी थी ही नहीं और वो होने भी नहीं वाली है इतनी इजीली। किंतु जो इनर एंबिशन थी जो कि एक्सटर्नल जो लेक ऑफ एंबिशन को कंपनसेेट करती थी वह भी जैसे कि अपने हाथ से जाने को बैठी है वि इज वेरी डेंजरस। हमको इनर एंबिशन जो है उसको डेवलप करना ही होगा। और देखिए कि आप यदि कहेंगे कि फायदा क्या है? माने आध्यात्मिक जगत में प्रोग्रेस करने का फायदा क्या है? तो देखिए कि फायदा तो वैसे बहुत सारा है। आप यदि एज ए साइंटिस्ट कोई नई डिस्कवरी करना चाहते हैं तो आप डिस्कवरी कैसे करेंगे? ऐसा तो नहीं है ना कि वह कोई किताब खोल के पढ़ना शुरू कर देंगे। वो तो आपको बहुत ही मेहनत करके नए-नए आइडियाज को खोजना होगा। अभी देखिए कि आप इनर डेवलपमेंट कर रहे हैं तो आपका सुपर कॉन्शियसनेस का दरवाजा खुल जाता है और फिर वहां से जो नए-नए आइडियाज प्रकट होना शुरू होते हैं यू कैन बी अ सुपरस्टार इन फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, मॉडर्न साइंस, मॉडर्न टेक्नोलॉजी ये जो इनोवेशन ये क्रिएटिविटी और इनोवेशन यही तो आज के युग का असल है। देखिए यह जो अमेरिका और सोवियत यूनियन इन दोनों के बीच में जो कोल्ड वॉर चल रही थी अमेरिका आसानी से जीत गया। सोवियत यूनियन हार गया। क्यों? क्योंकि अमेरिकन कॉलेजेस में फ्रीडम है। फ्रीडम ऑफ थिंकिंग, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन, फ्रीडम ऑफ एक्शन। तो यह है बोलकर के यह जो पूरा डिजिटल रेवोल्यूशन वहां पे आया। यह जो सॉफ्टवेयर और कंप्यूटिंग सिस्टम्स वहां पर डेवलप हुई तो उनकी इकोनमी इतना पावरफुली बढ़ना आगे शुरू हुई कि सोवियत यूनियन की जो पुरानी इकोनमी थी 194 के माइंडसेट वाली कि जूते बनाने की फैक्ट्री है तो इस फैक्ट्री को कोटा दे दिया गया है वो पॉलिट ब्यूरो की ओर से वो फाइव फाइव ईयर जो प्लान होता है ना उसकी ओर से कि आपको 1 लाख जूते बनाने हैं। फिर यह नहीं सोचना है कि जूते का कलर क्या होगा? साइज क्या होगी? जूते का कौन सेल कहां पे करेंगे? मार्केटिंग कैसे होगा? किसके पैर में क्या जूता फिट होगा? कुछ नहीं। कोटा फुलफिल करना है। तो ये कोटा फुलफिल वाली जो एक माने एक स्टूपिड इकोनमी उसके बेस पे सोवियत यूनियन खड़ा था। और कहां यह अमेरिका की स्मार्ट इकोनमी एक के बाद एक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज डेवलप हो रही है। एक के बाद एक यह जो माइक्रोपर आर्किटेक्चर डेवलप हो रहा है। एक के बाद एक ये जो कंप्यूटिंग साइंस जो है डेवलपमेंट हो रही है। तो अमेरिका आसानी से वो जीत गया। तो आज देखिए कि भारत के पास में दैट अपॉर्चुनिटी इज देयर। भले ही चाहे हमारी एक्सटर्नल एंबिशन मॉडरेट हो इनर एंबिशन तो हमारी यदि होगी तो फिर यह जो सुपर कॉन्शियसनेस का दरवाजा खुलेगा उसमें से ये जो क्रिएटिविटी और इनोवेशन जो जन्म लेंगे इट विल प्रपेल अस टू द नंबर वन पोजीशन इन द वर्ल्ड इफ वी कैन मैनेज दिस। प्रॉब्लम यहां पर ही है। स्वामी जी ने एक बार कहा है कि देखिए कि बहुत बार आप सोचेंगे कि ये धर्म जो है क्या हमारे गले में एग्जैक्टली इसी तरह की बात स्वामी जी करते हैं कि हमारे गले में एक घंटी का पत्थर बन करके रह गया है कि जो कि हमको डूबाए जा रहा है भवसागर में तो क्या इसको छोड़कर के और कुछ करना आसान माने और कोई जो गोल होता है जीवन का सिविलाइजेशन का क्या उसको हम इस्तेमाल ना करें क्या उसको हम प्राप्ट ना करें किंतु स्वामी जी कहते हैं देखिए कि 10,000 साल से तो धर्म ही हमारा हमारा उद्देश्य रहा है। आप चाहे कुछ भी कर लीजिए। इस बात को इस समय अभी आपको आपकी सिविलाइजेशन जो है उसका मोड़ घुमा के नए रास्ते पर ले जाना संभव नहीं है। आपको धर्म के ही रास्ते पर चलना होगा। हजारों हजारों सालों से हमारे जो पुरखे हैं, हमारे जो पूर्वज हैं, हमारे जो ऋषि मुनि है, उन्होंने यह निर्णय लिया हुआ है और यह निर्णय को आप एकद दिन में, एकद साल में, एकद सेंचुरीज में चेंज नहीं कर सकते हैं। अभी यह जो रास्ता बना है, उसी के ऊपर में आपको चलना है। किंतु फिर वही बात है कि देखिए कि वी कैन मेक दिस पाथ सक्सेसफुल आल्सो। यदि हम यह अपनी इनर गेट जो है इनर गेटवेज जो है उसको ओपन करें और इसके लिए सबसे माने आवश्यक है कि योग और वेदांत दोनों को बचपन से ही स्कूलों में पढ़ाया जाए। तभी कहीं जाकर के यह जो स्टूडेंट है वह ग्रेजुएट होगा। तब कहीं जाकर के उसके हाथ में यह स्पिरिचुअल पावर होगा कि वह जो सुपर कॉन्शियस के दरवाजे ओपन करके यह जो नए-नए आइडियाज है ही कैन मेक इट कम टू लाइफ एंड ही कैन बिल्ड अ कैरियर अपॉन इट। दैट इज द ओनली वे फॉरवर्ड फॉर इंडिया। द वेस्टर्न प्लोगे नोज़ पॉलिटिक्स। द इंडियन प्लॉगमैन नोज़ रिलीजन। यह जो वेस्टर्न किसान है उसको पता है कि पॉलिटिक्स क्या है? यह इंडियन किसान जो है उसको पता है धर्म क्या है? स्वामी जी की फेमस कहानी कि देखिए कि आप भारत में किसी किसान को भी गरीब से गरीब आदमी को भी पूछेंगे धर्म क्या है उसके बारे में तो वह कहेगा कि उसके सर पर जो तिलक लगा है वो तिलक का क्या अर्थ है? तो माने वो धर्म इतना डीपली भारत में प्रवेश किया है। जबकि स्वामी जी कहते हैं कि यह जो वेस्टर्न गरीब लोग होते हैं ना दे आर लाइक डेविल्स। माने भारतीय जो गरीब होता है ना उसमें फिर भी एक दिव्यता की आभा आपको दिख जाएगी। किंतु वेस्टर्न पुअर पीपल आर लाइक डेविल। क्यों? क्योंकि मटेरियल प्रोस्पेरिटी नहीं है तो फिर क्या चीज है जो कि उनको कल्चर देती है। कुछ नहीं। धर्म सिर्फ ऊपर ऊपर से है। क्रिश्चियनिटी का वो ऐसा जो डेप्थ ऐसा कुछ नहीं है। द पुअर पर्सन आर लाइक डेविल इन द वेस्टर्न वर्ल्ड। तो यहां पे स्वामी जी स्वामी जी को पेरेफरेज करके एआई ने यह सेंटेंस बनाया। उसके बाद में यह कोटेशन में स्वामी जी का है। दैट शोज़ द वेयर द विंड ब्लोस वेयर द नेशनल लाइफ इज। इसकी वजह से हमको पता चलता है कि कौन सी दिशा में पवन बह रहा है। कहां पे हमारी नेशनल लाइफ है। इसके बाद में और भी बहुत है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में लेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: आपने हमारी महत्वाकांक्षा की कमी की जो बात कही, वह बिल्कुल सही है—और यह मुझे भीतर तक उदास कर देती है।
यह जो आपने कहा ना लेक ऑफ एंबिशन मैं एक उदाहरण देता हूं। मैं यहां पर लाइब्रेरी है हमारी तो वह तो मेन रोड के ऊपर में ही है। पूरा बीच रोड है। तो ऑटो वाले बहुत सारे खड़े रहते हैं। क्योंकि कोई है कि वो टूरिस्ट लोगों का आना जाना रहता है ना। तो मैं देखता हूं ऑटो वालों को ऑटो ऑन रख के। माने इंजन चल रहा है, पेट्रोल जल रहा है। बढ़िया मजे से बैठे और मोबाइल देख रहा है। तो और सामने इधर-उधर नजर भी नहीं कर रहा है। किसी को आना हो तो आओ, जाना हो तो जाओ और इंजन चल रहा है। मैं देख रहा हूं कि कितनी देर तक ये इंजन चालू रखता है। एटलीस्ट मैंने 20 मिनट तक देखा वो खड़ा है। मोबाइल देख रहा है और इंजन चल रहा है। उसको जैसे कि कोई फिक्र ही नहीं है इस जगत की। ऐसा मैं अपने समय में इस तरह से स्कूटर फुटर चलाता था। मैं स्टूडेंट था। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि मैं इंजन चालू रख के माने 20 मिनट एक जगह पर खड़ा रहूं। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता। अभी आज ऐसा और देखिए हम यूक्रेन रशिया से ऑइल परचेस करते हैं। ये पेट्रोल और उसमें अमेरिका के साथ में झगड़ा हो गया है। तो ऐसा नहीं है कि पेट्रोल हमारे यहां पे कहीं मुफत में मिलता है। तो अभी बढ़िया मजे से 20 मिनट तक इंजन चालू रख के वो खड़ा है। क्या बोलेंगे आप?
प्रश्न: हम अपनी महत्वाकांक्षा कैसे जगाएँ? हम जोखिम उठाने से क्यों डरते हैं?
एक्चुअली यह जो क्वेश्चन है ना कि हमारी एंबिशन कैसे बढ़ाई जाए? तो देखिए कि इसके बारे में अब जैसे कि आर्नोल्ड टोयनबी का जो स्टडी ऑफ हिस्ट्री है उसने कोई 30 प्लस सिविलाइजेशन का स्टडी किया है। जहां से तक का अपने पास में रिकॉर्ड है कि हाउ सिविलाइजेशन राइजेस हाउ हाउ सिविलाइजेशन इज बोर्न, हाउ सिविलाइजेशन डेवलप्स, हाउ सिविलाइजेशन डिटेरेट्स एंड अल्टीमेटली इट इज़ डिस्ट्रॉयड। तो वो उसका स्टडी का कुछ-कुछ पॉइंट्स जो है ना अल्टीमेट कंक्लूजन जो है वो कहता है कि सिविलाइजेशन राइज कब होती है जबकि उसके सामने चैलेंज आती है और चैलेंज दो टाइप की आती है। एक तो मैनेजेबल चैलेंज होती है। एक तो है अनमैनेजेबल चैलेंज होती है। अब जैसे कि अब छोटा सा देश है जैसे कि यह आप ले लीजिए यूक्रेन। अभी यूक्रेन के ऊपर में रशिया ने अटैक किया तो अभी क्या है ना उसके सामने एक अनमैनेजेबल चैलेंज है इस अर्थ में कि यूक्रेन का रिसोर्स और पावर इतना नहीं है कि रशिया का मुकाबला कर पाए ऑन दी अदर हैंड और इससे क्या होगा कि वैसे यूक्रेन वाले जो है वो हार्ड वर्क तो बहुत करेंगे उनकी एंबिशन बढ़ेगी अपनी सोसाइटी को सेव करने के लिए और उनका अभी ये ड्रोन वॉरफेयर जो है पूरा आप कोई भी न्यूज़पेपर आर्टिकल देखिए कि यह जो पूरा पूरा रेवोल्यूशन आया है ड्रोन वॉरफेयर में पूरा यूक्रेन की वजह से आया है क्योंकि अभी उनके पास में इतने तो सोल्जर नहीं है कि वो रशिया के सामने लड़े तो उन्होंने ये पूरा म सच एन एक्सटेंट ये ड्रोन रेवोल्यूशन ये लोग लेके आए हैं कि पेंटागोन भी उनके पास में सीख रहा है। सो दैट इज वन वे कि चैलेंज आनी चाहिए जिसका मुकाबला करने के लिए पूरा देश खड़ा हो जाए। सो दैट इज वन थिंग। किंतु यूक्रेन के सामने जो चैलेंज है ना वह अनमैनेजेबल है। रशिया के सामने वह जीतने नहीं वाले हैं। बोल के उनका डेवलपमेंट होगा नहीं रुक जाएगा। जबकि देखिए कि ब्रिटेन के सामने चैलेंज था स्पेनिश आरमाडा। आज 16th सेंचुरी की बात करें यह क्वीन एलिजाबेथ उस समय थी तो यह स्पेन ने आरमाडा भेजा था। एक बहुत बड़ा युद्ध जहाजों का समूह ब्रिटेन को ब्रिटेन को विजय करने के लिए ब्रिटेन पे राज करने के लिए। तो वो अभी क्या है कि ब्रिटेन के पास में इतना स्ट्रेंथ हालांकि स्पेन उस समय का सुपर पावर था और ब्रिटेन छोटा सा देश था किंतु उनके पास में जो साहस जो था ना वो इतना था कि वो मैनेजेबल चैलेंज था ये जो स्पेनिश आर्माड को जीत करके वे लोग विजय हुए और फिर वो जो परी माने नेविगेशन शिप बिल्डिंग टेक्निक है उसको एक्सपैंड करके फिर पूरे विश्व में वे लोग फैले तो क्या है कि कोई भी सिविलाइजेशन को आगे बढ़ना है ना उसको एक चैलेंज चाहिए। चैलेंज पूरे देश को इकट्ठा करती है और उसको एक गोल देती है। इस गोल को कंप्लीट करने के लिए एक के बाद एक शूरवीर जो है वह प्रकट होना शुरू हो गए। और दूसरा कि यह चैलेंज जो है वो मैनेजेबल होनी चाहिए इस अर्थ में कि हमारा उसमें विजय होना चाहिए। तो यदि यह दो कंडीशन फुलफिल होती है तो वह देश जो है वह भयानक डेवलप होता है और बहुत सारे एंबिशियस हार्ड वर्किंग हार्ड ड्रिवन लोग उसमें पैदा होते हैं। अभी जैसे ये अमेरिका ब्रिटिश कॉलोनी था। यह भारत भी ब्रिटिश कॉलोनी था। किंतु अमेरिका के सामने ब्रिटेन के ऊपर में ब्रिटिश राज को हटाना इट वाज़ अ मैनेजेबल चैलेंज बोलकर के अमेरिका ब्रिटेन को भगा करके इतनी बड़ी महासत्ता बना। जबकि भारत की जो परिस्थिति थी, इतना भयानक तमस में डूबा हुआ था कि ब्रिटिश राज को भगाने की कोई क्षमता नहीं थी। ब्रिटिश लोग गए मेनली बिकॉज़ कि सेकंड वर्ल्ड वॉर में काफी पिटाई हुई है उन लोगों की। बोल कर के वे लोग यहां से निकले। तो अभी भारत के सामने प्रॉब्लम क्या है ना? एक तो है कि हमारे सामने एक मैनेजेबल चैलेंज आनी चाहिए। और यह चैलेंज इस तरह की हो कि सभी भारतवासियों को इकट्ठा करके एक डायरेक्शन में हमारी शक्तियों को वो प्रवाहित करें। सो इफ दिस इज पॉसिबल तो यह कुछ होगा। अदरवाइज देखिए कि हम लोग हमेशा से अपने को इस तरह से एक इंसुलर सबक्टिनेंट है। तो यहां पर दो समुंदर है दोनों ओर और ऊपर में देखिए हिमालय है हिंदू कुश है। बोल के हम लोग अपने को एक इंसुलर समझते हैं। बोलते हैं कि जो विदेश से आते हैं थोड़ा बहुत राज करके चले जाएंगे। अपना सोसाइटी है, अपना कल्चर है। बस एज इट इज चलता रहेगा। हमको ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। तो ये जो इंसुलर माइंडसेट जो है आज बिहार में इलेक्शन हुआ देखा आपने कौन सा माने नाती जाति को छोड़कर के कोई विचार ही नहीं यह पी के बेचारा मेहनत किया इतना कि ये एजुकेशन के ऊपर में इलेक्शन इशू बनाया जाए। ये हेल्थ को इशू बनाया जाए। यह एजुकेशन हेल्थ हमारे लिए इशू ही नहीं है। क्यों? क्योंकि हमारी एंबिशन ही नहीं है। एंबिशन होगी तो यह हेल्थ और एजुकेशन इशू होंगे। आप 10,000 दे दीजिए, नाती जाति के चक्कर में फंसा दीजिए। उसी से हम लोग खुश हो गए हैं। तो इससे खुश क्यों होते हैं? क्योंकि हमारे सामने चैलेंज नहीं है। एंबिशन इज ऑलवेज इन द रिस्पांस ऑफ अ चैलेंज। ये चैलेंज ही हमारे सामने नहीं आता है। बोल के यह जो पीस है ना आखिरी 50 साल की उसने भारत को ना बिल्कुल और देखिए कि ब्रिटेन अब जैसे अमेरिका है। अमेरिका को एक्चुअली ब्रिटिश के साथ में युद्ध करना पड़ा था। अभी हम लोगों ने किसी के साथ में युद्ध ही नहीं किया। पाकिस्तान पाकिस्तान का तो कोई युद्ध थोड़ी ना कहलाया जाता है। वो तो छोटा-मोटा स्कर्मिश था बॉर्डर के ऊपर में। चाइना के साथ में भी ऐसा कुछ नहीं हुआ। अभी ये चैलेंज का अभाव जो है इट इज अनदर फंडामेंटल प्रॉब्लम कि मुझे लगता है कि यह एंबिशन इसके पीछे नहीं है हमारी। यह जो मैं परसों दिन बता रहा था ना कि यह एलियन यदि ये एलियन आ जाते हैं सही में पृथ्वी के ऊपर में अटैक करने के लिए दैट विल बी अ चैलेंज। फिर उस चैलेंज का सामना करने के लिए सबको खड़ा होना होगा। दैट विल फ्लेयर अप आवर एंबिशन। किंतु एस लॉन्ग एज देयर इज नो चैलेंज हम लोग एंबिशन डेवलप कर ही नहीं पाएंगे। सो दैट इज वन थिंग।
प्रश्न: क्या यह सत्य है कि हमारे भीतर ambition इसलिए नहीं है क्योंकि हमारे भीतर faith का अभाव है?
आई डोंट थिंक इफ फेथ इज रिलेटेड टू एंबिशन। चैलेंज इज रिलेटेड टू एंबिशन। विदाउट
प्रश्न: उदाहरण के लिए एलन मस्क में आत्मश्रद्धा है, इसलिए वे सफल हैं। आत्मश्रद्धा का अभाव हमें कायर बना देता है।
ना यहां पर क्या है? दो फ्रेमवर्क है। दो यह है डायमेंशन है। एक तो इंडिविजुअल डायमेंशन। ऑफ कोर्स यहां पे आत्मश्रद्धा होनी ही चाहिए। आत्मश्रद्धा नहीं होने से आप में एंबिशन डेवलप नहीं होगी। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु एक इकोसिस्टम भी होना चाहिए। विद इन व्हिच यू कैन अप्लाई दिस आत्मश्रद्धा योर एंबिशन। अभी यही ईलॉन मस्क साउथ अफ्रीका में कुछ नहीं कर पाएगा। क्योंकि साउथ अफ्रीका में वो इकोसिस्टम ही नहीं है। यह ईलॉन मस्क हो ना कि सुंदर पिचाई हो ना कि यह सत्य नडेला हो। देखिए कि उन सबको वो इकोसिस्टम चाहिए व्हिच रज़ ऑन चैलेंज एंड रिस्पांस जो कि ना ही भारत में है ना ही साउथ अफ्रीका में है। सो अल्टीमेटली तो हमको इकोसिस्टम खड़ी करनी होगी। इकोसिस्टम खड़ी हो जाएगी ना तो कोई भी देश का आप देखें ना आप इस तरह से आप एनालिसिस कर ही सकते हैं कि 10% लोगों में सुपर एंबिशन होगी। फिर यह 20% होंगे वह मॉडरेट एंबिशन होगी। तो इस तरह का वह पिरामिड स्ट्रक्चर आप कोई भी देश में मिलेगा। इवन श्रीलंका में भी मिलेगा, पाकिस्तान अफगानिस्तान में भी मिलेगा। उन लोगों का प्रॉब्लम कहां पे है कि वो उसको नर्चर करने के लिए, डायरेक्ट करने के लिए इकोसिस्टम नहीं है। सो दैट इज द थिंग वी इंडिया नीड टू एस्टैब्लिश। वी हैव टू हैव अ चैलेंज बिफोर अस। एंड इन ऑर्डर टू रिसोंड दिस चैलेंज वी नीड टू एस्टैब्लिश दिस इकोसिस्टम।
प्रश्न: एक तरह से देखे तो यह अच्छा है कि आज हम अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
होना ही चाहिए। देखिए आज मैं पढ़ रहा था न्यूज़पेपर में कि यह लेबर रिफॉर्म इंट्रोड्यूस हो गया है। अभी ये लेबर रिफॉर्म लाने के लिए गवर्नमेंट ने कितना ट्राई किया था। कितना सब यह दंगा हुआ था, फसाद हुआ था। देखिए लैंड, लेबर एंड फार्मिंग तीन रिफॉर्म है। यदि आपकी इकोनमी को चलाना है तो तो गवर्नमेंट ने फटाक करके यह लेबर रिफॉर्म इंट्रोड्यूस भी किया। कोई हल्लागुल्ला भी नहीं हो रहा है। दिस इज़ कि हम लोगों को पता चला है कि भाई वो सोशलिज्म जो है वो नहीं चलेगा। अभी अभी वो जगना होगा नींद से। 93 का वो जो लिबरलाइजेशन क्राइसिस है वो पेमेंट क्राइसिस की वजह से ही आया।
प्रश्न: भारत में संकट हमें एक कर देता है, और शांति का समय हमें फिर विभाजित कर देता है।
देखिए इंडिया का एक प्रॉब्लम क्या है ना हमारा साइज हमारा साइज इतना बड़ा है ना कि हम लोगों को चैलेंज लगता ही नहीं है। अब पंजाब में कुछ हो रहा है तो पंजाब वाले जाने इसको मुझे क्या है नॉर्थ ईस्ट में जो चल रहा है नॉर्थ ईस्ट वाले जाने वो पाकिस्तान की बॉर्डर पर चल रहा है तो वे लोग जाने मुझे कुछ टच ही नहीं करता क्राइसिस मेरे पर्सनल लेवल पे बहुत सारी क्राइसिस है किंतु नेशनल क्राइसिस मुझे टच ही नहीं करती यदि एक मिडिल क्लास एजुकेटेड एक वेल सेटल्ड फैमिली में से मैं आता हूं तो यह क्राइसिस मुझे टच ही नहीं की हमने पूरा इंडिया का मॉडर्न माने इंडिपेंडेंट इंडिया का हिस्ट्री देख लीजिए ऐसा कोई भी क्राइसिस नहीं जो कि हमको टच किया हो माने पर्सनली सो दैट इज़ वन बिगेस्ट चैलेंज फॉर अस। अब जैसे अमेरिका में है यह स्पुटनिक रशिया ने स्पुटनिक छोड़ा फर्स्ट सेटेलाइट तो उसको जो शौक लगा पूरा एजुकेशन सिस्टम को अपसाइड डाउन कर दिया। आप जब स्पुटनिक शॉक बोल के सर्च करेंगे पता चलेगा कि अमेरिका का जो मॉडर्न टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट है वो लगा शौक कि हां वे लोग ऐसा कर रहे हैं तो हमको कुछ करना पड़ेगा। इंडिया का प्रॉब्लम है पाकिस्तान जैसा पागल शत्रु बैठा है। वो हल्ला तो बहुत करेगा तो हमको सीरियस चैलेंज करने की उसकी क्षमता नहीं। चाइना है एक सीरियस चैलेंज है हमारे लिए। किंतु चाइना की बुद्धि भी बहुत है। वो थोड़ा टच करके छोड़ देता है। पता है कि उन लोगों को ज्यादा कुछ करने से फिर एक महारास खड़ा होगा। अभी सोया है सोने दो इसको। ना किंतु देखिए मान लीजिए इंडिविजुअल लाइफ में स्पिरिचुअल एंबिशन हमारी बढ़े ना बढ़े ऐसा हमेशा होगा। देखिए 10% हाईएस्ट एंबिशन वाले होंगे। 20% मॉडरेट और 70% इधर-उधर दैट पिरामिड स्ट्रक्चर इज़ स्टैंडर्ड टू एव्री कंट्री। प्रश्न क्या है? कंट्री डेवलप होता है उसकी इकोसिस्टम से। माने सिविलाइजेशनल स्केल फ्रेमवर्क क्या है? आज वही इंडियन जो कि इंडिया में वह बजाज स्कूटर चलाता है वहां जाके वह सीईओ पीओ हो जाता है मल्टी बिलियनर हो जाता है वह अरविंद श्रीनिवासन ना कि कौन वो परप्लेक्सिटी का वो जो है वो इंडिया में रहता तो थोड़ी हमने सरप्राइजिंगली आज का एआई बूम जो है उसके पीछे में जो फंडामेंटल पेपर है अटेंशन इज़ ऑल यू नीड उसका लीड ऑथर जो है वह तो इंडियन है अभी वो इंडिया में रहता तो क्या कर पाता कुछ नहीं कर पाता वहां पे उसका Google इकोसिस्टम मिला तो उसने इतना सब कुछ करके दिखाया राइट तो कोई भी अरे देखिए ना ईरान ईरान के इंजीनियर अमेरिका में वो कहीं ये बोल दिया कि ईरान से लोगों को इमीग्रेट म एच1 वीजा पे नहीं लेना है। वहां पे हल्ला चालू हो गया कि ईरान की एजुकेशन सिस्टम इतनी अच्छी है कि हमको ईरानियन इंजीनियर के बिना नहीं चलेगा। आज हमको लगता है ईरान तो कंप्लीटली खत्म हो गया देश है। उन्हें वो इकोनमी है। पॉलिटिकल सिस्टम में कंप्लीटली करप्ट हो गई है। इसके बावजूद अमेरिकन कंपनियां ईरानियन इंजीनियर को हायर करने के लिए लाइन लगा के खड़ी है। सो टैलेंट अब कोई भी देश में पिरामिड स्ट्रक्चर सेम ही दिखेगा। वो चाहे अफगानिस्तान, श्रीलंका, पाकिस्तान टेक एनी कंट्रीज। डेवलप देश तभी होता है जब वह इकोसिस्टम और कस्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क वह सब तगड़ा होता है। तब वह और फिर आप देखिए ना कि इमीग्रेशन है। लोग ऐसे ही कंट्री में इमीग्रेट करना पसंद करेंगे। हाईएस्ट टैलेंट जो होती है कि जहां पे आपको ये इकोसिस्टम मिले। सो इंडिया का प्रॉब्लम स्वामी जी का रिलेवेंस कहां पर आता है कि इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी के ऊपर में जो हजारों सालों से अपना फोकस रहा है। तो स्वामी जी ट्रांसेंट्स इट एंड सेस दैट सेम स्पिरिचुअल प्रिंसिपल यू कैन अप्लाई इन ऑर्डर टू डेवलप दिस नेशनल फ्रेमवर्क। दिस इज़ स्वामी जीसस ब्यूटी रियल कंट्रीब्यूशन। आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच। राइट? एनर्जी इक्वल्स मास * स्क्वायर ऑफ़ स्पीड ऑफ लाइट। सो यह इक्वेशन जो है एक और है एनर्जी। दूसरा है मास एंड स्क्वायर ऑफ़ स्पीड ऑफ़ लाइट। तो आत्मनो मोक्षार्थम करेंगे। जगत हितायच जगत हितायच करेंगे तो आत्मनो मोक्षार्थम बोथ आर टू साइड्स ऑफ द सेम कॉइन। सो परफेक्ट इक्वेशन स्वामी जी ने दिया है हमको।
प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द के अनुसार भारत की केंद्रीय धारा धर्म है—तो इस धारा को राष्ट्रीय स्तर पर गतिशील कैसे बनाया जाए?
एजुकेशन सिस्टम में स्पिरिचुअलिटी को एंटर करवाना होगा योग और वेदांत को। दिस इज टू मी अ फंडामेंटल रिक्वायरमेंट फॉर इंडिया। अब मैं जाता हूं ना कॉलेजेस में। मैं देखता हूं ये यंग लोग है ना म सच एंथूजियाज्म सच लाइवलीनेस इट इज देयर हम लोग अभी जैसे कि मैं अब मिडिल एज तो क्रॉस हो गया है अभी क्या है वो एंथूजियाज्म भी नहीं रहा वो लाइवलीनेस भी नहीं रहा किंतु ये स्टूडेंट्स में जो होता है ना सो मुझे ऐसा लगता है कि यदि ये लोग वेदांत को सीखे स्वामी जी को सीखे ठाकुर मां स्वामी जी को समझे तो उनका लाइफ कहां से कहां ट्रांसफॉर्म हो जाएगा बिकॉज़ दे हैव दैट लाइवलीनेस उन लोगों में यह है कि वो लोग फटा अब जो कांसेप्ट समझ समझने में हमको 10 घंटे लगेंगे। मैंने घंटों पे घंटों में स्टडी करता रहूं। ये लोग फटाफट करके उठा लेंगे। बिकॉज़ कि क्या है कि ब्रेन का डेवलपमेंट जो होता है ना अप टू 18 ईयर होता है क्योंकि बच्चे का ब्रेन का साइज छोटा होता है और एक एडल्ट का ब्रेन एक होता है तो वो डेवलपमेंट अप टू 18 इयर्स तक चलता रहता है। उस समय जो ब्रेन का मास जो है वो जब इंक्रीस होता है इट दैट टाइम उसका जो लर्निंग कैपेसिटी होता है ना वो एडल्ट से 10 गुना ज्यादा होता है। सो एट दैट एज हम उनको योग और वेदांत सिखाए ठाकुर मा स्वामी जी सिखाए तो ये लोग मैंने आपको बताया था ना कि लिमड़ी में मैं वो गदाधर प्रोजेक्ट वो चला चलता था हमारा तो मैं एक स्कूल में जाता था तो स्कूल में बच्चे हैं फिफ्थ फर्स्ट स्टैंडर्ड से लेकर के बने फिफ्थ स्टैंडर्ड तक के तो उनको मैं ठाकुर मां स्वामी जी की कहानी बताता था और उन लोगों में जो उत्साह जो एक सीखने की इच्छा मुझे इतना दुख होता था कि यही मैं एक कर पाऊंगा इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं दैट वास द ग्रेटेस्ट रिग्रेट एट दैट टाइम इन माय लाइफ। और मैंने आज एक कहानी बताई है। मैंने उनको कहा एक सप्ताह के बाद में पूछा कि अच्छा बताओ वो कहानी कौन सी थी जो जो बताएगा पूरी कहानी उसको गिफ्ट दूंगा। एक समय ऐसा है कि सभी बच्चे कहानी बता रहे हैं। मुझे गिफ्ट देना बंद कर देना पड़ा। क्योंकि इतना अफोर्ड नहीं कर पाऊंगा। सभी लोग अच्छा उत्तर दे रहे हैं। सभी लोग सच्चा उत्तर दे रहे हैं। जबकि यही कहानी को याद करने में मुझे कितना टाइम लगा? इन लोगों ने एक बार सुनकर के याद कर लिया है। सो दे हैव दैट लाइवलीस जो कि हमको माने सम हाउ वी हैव टू कैप्चर दैट। ओम