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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः ठाकुर के प्रेरक प्रसंग रामलाल दादा कथित चेतनानंद जी का एक पुस्तक है श्री राम कृष्ण देव के जय रूप देखिया जी तो उसमें से बहुत सारे चेतनानंद जी का जैसे हैं कि बहुत सारी डायरी इकट्ठा की कहीं से उन्होंने न्यूजपेपर आर्टिकल मैगजीन आर्टिकल्स वगैरह किताबों में से बहुत सारी जगहों पर से उन्होंने बहुत अच्छे अच्छी रेमसन स्मृति कथाएं कलेक्ट की है और उन्होंने सीरीज ऑफ बुक्स पब्लिश की है तो इसमें राजा महाराज की भी है शरद महाराज की भी है वैसे सुबोधनंद जी की भी है बहुत सारी किताबें हैं तो इस तरह से यह ठाकुर के ऊपर में और ऊपर में से उन्होंने मां मां का भी एक जीवन उन्होंने लिखा है जो कि मैं यहां आने से पहले गुजराती में मैंने ट्रांसलेट करवाया था वहां पर एक अच्छे डिवोटा है उन्होंने किया था वह ट्रांसलेट तो चेतनानंद जी का आप देखेंगे कि बड़ा ही सुंदर रूप से उन्होंने यह सब स्मृति कथाएं हमारे लिए संग्रहित की है इनका जैसे-जैसे हम श्रवण करते जाएंगे वैसे ऐसा लगता जाएगा कि हमारा हृदय हमारा मन जैसे कि इन लोगों की अमृतम वाणी और अमृतम प्रेरणादाई प्रसंग इनमें जैसे कि डूबता जाता है और भीतर में से ही एक ऐसा शुद्धीकरण होता है जिसको कि हमको बाहर से पता भी नहीं चलेगा इसी कहानी में आज जो प्रसंग हम कहेंगे उसमें ठाकुर एक जगह पर कहेंगे रामलाल दादा को ठाकुर के ऊपर में एक बत संशय हुआ कि इतने सारे लोग कोलकात्ता के विद्वान धनी लोग गण्य मान्य लोग लब्ध प्रतिष्ठित लोग समाज के सब ठाकुर के पास में आते हैं उनको अवतार करके पुकारते हैं उनको अवतार करके चिह्नित करते हैं तो वह तो मेरे चाचा है रामलाल दादा तो उनके जो ठाकुर के भाई थे उनके तो पुत्र थे तो ठाकुर तो उनके चाचा हुए तो सोचते हैं कि मेरे चाचा इस तरह के कैसे हो सकते हैं हमको भी जद अपने परिवार में यदि किसी के बारे में इस तरह की प्रशंसा सुनेंगे अपने परिवार में यदि इस तरह का कोई भी देखेंगे जिनको कि हम बचपन से देखते आ रहे हैं बचपन से उनके बारे में सुनते आ रहे हैं यदि वह एकाएक उनका उनको प्रसिद्धि मिलना शुरू हो जाए तो हमको थोड़ा तो संशय होगा ही तो तो छोटे बच्चे की तरह उनको हमने देखा था या तो फिर एटलीस्ट उनके बारे में सुना था तो अभी कहां ये इतने बड़े हो गए तो रामलाल दादा को भी एक संशय हो हुआ था और ठाकुर को उन्हों उने पूछा था कि आपको लोग अवतार कहते हैं तो मुझे तो आप अपने चाचा है ऐसे ही दिखाई देते हैं तो ठाकुर ने कहा कि देखो यह जलेबी जैसे होती है जलेबी होती है गोलगोल और ऊपर में से होती है थोड़ी सी सख्त थोड़ा सा क्रंची उसका यह आवरण होता है बाह्य आवरण किंतु जैसे ही उसको तोड़ोगे वैसे ही उसके भीतर में से वो जो मधुमय रस जो है वह आपके मुंह में जाएगा और आपको आनंद प्रदान करेगा तो वैसे ही यह जो अवतार होते हैं और यह अवतार की कहानियां होती है यह सब ऊपर से हमको लगेगा कि यह तो एकदम सामान्य सामान्य कहानियां है इसमें और तो कौन सी बड़ी बात है यदि हम जैसे कि बहुत सारे अवतारों के बारे में सुनेंगे पढ़ेंगे तो जादू चमत्कार राक्षसों का वध किया एक ब्रेड को तोड़ा तो उसमें से हजार ब्रेड बन गई ऐसा वगैरह वगैरह बहुत कुछ अपने को सुनने को मिलता है या तो फिर यह पापियों का दमन किया या तो पापियों का मन परिवर्तन किया वगैरह वगैरह तो ठाकुर के जीवन में यह सब नहीं था वोह नहीं था किंतु इसके साथ-साथ में भी दिन प्रतिदिन की छोटी मोटी घटनाएं इतनी सारी थी कि जो कि हमारे पास में वारसे के रूप में आई है जब शरत महाराज लीला प्रसंग लिखते हैं तो वह कहते हैं कि जैसे कि एक बारे एक बात के बारे में उन्होंने कहा है कि जितने भी अवतार है उतना जिनका कि चरित्र रचना हुआ है जिनका कि जीवन चरित्र की रचना की गई है उनमें देखेंगे कि किसी के साधक भाव की आलोचना हमको देखने को नहीं मिलती पता नहीं इसके पीछे का क्या कारण हो सकता है यह जीसस देखिए ना कि य और कोई भी देखिए जो कि अवतार थे पहले के जमाने के इवन भगवान राम न कि भगवान कृष्ण उन्होंने साधना की तपस्या की ऋषि मुनियों के आश्रम में जाकर के विद्या ग्रहण की वह सब पढ़ने को मिलता है किंतु एज ए साधक जो नियमित रूप से उपासना करता है ईश्वर प्राप्ति के लिए और उस उपासना की परि समाप्ति उसको जो वांछित वस्तु थी उसका जो मनोभाव था उसका वह सफल हो जाना इस तरह का डिटेल वर्णन हमको बहुत ज्यादा नहीं देखने को मिलता है तो जैसे कि यह वर्णन शरद महाराज ने स्वयं ठाकुर के मुंह से सुन करर के रामलाल दादा के पास में सुनकर के या तो फिर हृदय ठाकुर के साथ में उस समय ठाकुर की समा साधना के समय हृदय सब समय वहां पर रहता था तो उनके पास में से वगैरा से सुन कर के शरद महाराज ने अर्थात स्वामी शारदानंद जी महाराज ने श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग ग्रंथ में ठाकुर की साधना हों का जो बड़ा ही विस्तृत वर्णन किया है उस वर्णन से हमको अभी इतना सब कुछ ठाकुर के बारे में जानने को मिलता है किंतु शरद महाराज जब यह प्रश्न करते हैं कि अन्य कोई भी अवतार का इस तरह का विस्तृत साधक जीवन साधक भाव क्यों नहीं जानने को मिलता तो यह इस तर उसके पीछे का एक स्पेक्युलेटिव की चर्चा इसलिए शायद ना की हो कि भक्तों के मन में संदेह प्रकट ना हो जाए कि हम तो जिन अवतार की आराधना करते हैं जिनको कि हमने भवसागर के पार करने वाले के रूप में स्वीकार किया है वह कभी भी अपूर्ण हो ही कैसे सकते हैं वह कभी भी अपूर्ण रहे ही कैसे सकते हैं साधना कौन करेगा जो कि अपूर्ण है साधना कौन करेगा जिसने सिद्धि नहीं प्राप्त की है तो यदि अवतार है तो तो स्वयं सिद्ध स्वयंभू होने चाहिए जन्म से ही परफेक्ट होने चाहिए उनको फिर साधना करके सिद्धि प्राप्त करने का कहां उनको रह गया वह तो हम जैसे मनुष्यों को करना है ईश्वर यदि स्वयं पृथ्वी पर आए तो उनको अपने को खुद को प्राप्त करने के लिए थोड़ी ना साधना करनी होगी तो इस तरह से यह शरत महाराज कहते हैं कि शायद यह एक रीजन हो सकता है कि भक्तों के मन में संदेह जागृत ना हो इसके लिए उनके साधक जीवन की ज्यादा भी विस्तृत रूप से चर्चा अन्य अवतारों के जीवन में शायद ना हुई हो वो तो देखिए कि अन्य अवतार और ठाकुर का जो जीवन है उनके जीवन के जो प्रसंग है उसमें से ऑलरेडी हमको दो डिफरेंस दिखाई देते हैं एक तो है कि अन्य अवतार के बारे में जादू चमत्कार या तो फिर फिलोसोफी इसी कंसंट्रेटेड रूप में भरा हुआ होता है जबकि और उनके साधक जीवन की कोई चर्चा नहीं है ठाकुर के जीवन में देखिए ठाकुर की जिस तरह से जीवन आलोचना की गई है रामकृष्ण संघ के द्वारा उसको देखिए कि पहले तो ठाकुर के साधक जीवन का विस्तृत विवर हमको सिर्फ लीला प्रसंग पुस्तक में ही नहीं श्री श्री रामकृष्ण कथामृत ग्रंथ में भी ठाकुर स्व मुख अपने से जो वर्णन करते हैं अपनी साधना हों का वह भी बड़ा ही विस्तृत भाव से जानने को मिलता है यह एक डिफरेंस है दूसरा कि रामकृष्ण संघ ने जितने भी ठाकुर के बारे में छोटी मोटी जितनी भी स्मृति कथाएं हैं इन सबको बड़ा ही जतन पूर्वक कलेक्ट किया है और उसको प्रकाशित किया है अभी देखिए कि दूसरे संघ में या तो फिर दूसरे अवतारों के बारे में छोटी-मोटी स्मृति कथाएं ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता किंतु या तो फिर उनको नेगलेक्ट किया गया या तो फिर सोच समझ कर के ऐसा डिसीजन लिया गया कि दिन प्रतिदिन की घटनाओं का अवतार के अवतार का जो मुख्य तात्पर्य है पृथ्वी पर अवतरित होने का उसके साथ में कोई पूर्वा पर संबंध नहीं है तो वही घटनाओं को वही उनके वचनों को और वही प्रसंग को हमको कैरी फॉरवर्ड करना चाहिए कलेक्ट करना चाहिए और पब्लिश करना चाहिए जो कि कंसंट्रेटेड फुल फिलोसोफी हो ना कि फुल मिरेकल हो ना कि फुल स्पिरिचुअलिटी हो नथिंग लेस देन दैट यह एक डिफरेंस है अपने संघ ने देखिए कि ठाकुर के बारे में जितनी भी छोटी-मोटी स्मृति कथाएं हैं वह सभी कलेक्ट की है और इसके जिस तरह से इसका जो उन्होंने कहा ना कि ठाक शरत महाराज ने कि लीला प्रसंग में उन्होंने साधक भाव का वर्णन इसलिए किया जिससे कि हमको साधना करने के लिए प्रेरणा मिले हमको यदि ईश्वर को ठाकुर को अपने सिर्फ एक ईश्वर मान कर के अपने सब दुख दर्द उनको लेकर के जो सुना देने है इसके लिए नहीं ठाकुर के भक्तों के दो दल बन गए थे उनकी महासमाधि के बाद में रामचंद्र दत्त वगैरह कहते थे कि ठाकुर के पास में आकर के कल्पतरु ठाकुर के पास में आकर के जो मांगेंगे वह दे देंगे उसके बाद में साधन भजन किस चीज के लिए है जबकि नरेण और जो सन्यासी संतानों का त्यागी संतानों का जो दल था ठाकुर का उन्होंने कहा कि नहीं साधन भजन करना चाहिए ठाकुर ने हमको साधन भजन करने के बाद बारे में कहा है सिर्फ आशीर्वाद मांगने से सिर्फ शरणागत होने से नहीं चलेगा तो यह दो भावधारानी प्रसंग लिखा गया है तो यहां पर भी यदि प्रश्न होगा कि दिन प्रतिदिन के प्रसंगों का वर्णन क्यों इसके पीछे क्या तात्पर्य है तो मेरा पर्सनल एक ऐसा स्पेक्युलेटिव हम वेदांत के बारे में या तो फिर यह शक्ति साधना के बारे में या तो फिर यह भाव साधना हों के बारे में जो वर्णन पढ़ते हैं जो चर्चा सुनते हैं उससे ऐसा लगता है कि जैसे कि अपने दिन प्रतिदिन के जीवन के साथ में इस सब चर्चाओं का इन सब वर्णन का इन सब फिलोसोफी का जैसे कि कोई संबंध नहीं है अब जैसे कि हमने यह आकाश और प्राण की थिरी पढ़ी राजयोग में यदि हम प्राण के ऊपर में नियमन पा ले तो सूर्य चंद्र की गति को हम परिवर्तित कर सकते हैं अभी थिरी सुनक के अच्छा तो लगा किंतु कौन इस तरह से अपने प्राण पर नियमन पा सकता है इतना इजी तो नहीं है दूसरा कि हमने किसी को देखा नहीं है सूर्य चंद्र की गति को परिवर्तित करते हुए तो क्या यह सब प्रैक्टिकल भी है कि नहीं यह संदेह होता है तो उतना हायर फिलोसोफी पढ़ के जो संदेह होगा जिस तरह से ये रामलाल दादा के मन में संदेह प्रकट हुआ कि ठाकुर तो मेरे चाचा है वो तो अपने घर के ही सदस्य है इतने सारे लोग आ कर के उनको जो अवतार अवतार करते हैं यह बात सही है कि गलत है मुझे क्या पता तो इसी तरह से यह राजयोग में आकाश और प्राण का वर्णन पढ़ कर के सुन कर के या तो फिर यह ज्ञान योग में मैक्रो कजम और माइक्रो कजम इस दोनों प्रवचनों की जिस तरह से हमने चर्चा की थी हमारे भीतर में जो आत्मन है या तो फिर यह कॉस्मिक आत्मन है इन दोनों के बीच में एक रिलेशन है वगैरह वगैरह क्या मेरे दिन प्रतिदिन के जीवन में इसका कोई तत् य है क्या कभी इसका साक्षात्कार होगा वी डू नॉट नो हमको पता नहीं है किंतु वह जब हाई फिलोसोफी या जादू चमत्कार वगैरह छोड़ दे जो कि ठाकुर बार-बार समाधि में चले जाते थे वह सब यदि छोड़ दे और दिन प्रतिदिन के प्रसंगों को देखेंगे चाहे वह मां के हो चाहे ठाकुर के चाहे स्वामी जी के या तो फिर अन्यान्य त्यागी संतानों के व जितने ही दिन प्रतिदिन के प्रसंग पढ़ेंगे सुनेंगे चर्चा करें उतना ही हमको लगेगा कि इसमें जो आइडियल है इसमें जो आदर्श है दिन प्रतिदिन का आदर्श दैनंदिन जीवन में आध्यात्मिकता इस तरह से लोग काफी लोग प्रवचन देते हैं काफी लोग इस तरह के प्रवचन सुनते भी है कि दिन प्रतिदिन के जीवन में मुझे किस तरह से आध्यात्मिकता को बुन लेना है तो यह प्रसंग पढ़ कर के इस तरह के दिन प्रतिदिन की घटनाओं का विवरण सुनक के हमको थोड़ा सा तो लगता है कि यदि इन्होंने 10 किया तो हम एटलीस्ट एक तो करें इन्होंने यदि इतना दिन प्रतिदिन के जीवन में इतना किया तो हम भी थोड़ा बहुत आचरण करके दिखाए तो इस तरह के यह सब प्रसंग है रामलाल दादा के और रामलाल दादा ने एक बार कहा कि ठाकुर स्वामी जी अर्थात कि नरेण उस समय का नरेण नरेण को मिलने के लिए कभी-कभी बड़े ही आतुर हो जाते थे बड़े ही व्याकुल हो जाते थे और नरन का ऐसा था कि वह तो अभी कॉलेज में भी पढ़ता था घर का भी जवाबदारी था जिम्मा था सब कुछ था तो अभी वह तो बार-बार तो ठाकुर के पास में नहीं आ पाएगा तो एक दिन ठाकुर ने रामलाल को कहा कि जाओ तुम जाकर के नरेंद्र को मिल कर के आओ क पूछो तुम उसको कि वोह बोला था उस दिन को आएगा तो आया क्यों नहीं तो यह फिर रामलाल दादा ने ठाकुर को प्रश्न किया सामने कि आप उस लड़के के लिए इतने अधीर क्यों होते हैं वो आएगा तो आएगा नहीं आएगा तो नहीं आएगा आपके पास में ऑलरेडी कलकाता के इतने सारे भक्त आते हैं आपको जद अवतार करके पुकारते हैं एक लड़के के लिए क्यों आप इतने आतुर होते हैं इतने अधैर क्यों होते हैं तो ठाकुर ने कहा के ठाकुर कभी-कभी इंग्लिश में बात करते थे ना इंग्लिश शब्द यूज करते थे तो यहां ब भी ठाकुर कहते हैं जमंत और फेरेंड और रसिक रसके अर्थात कि तुम्हारा फ्रेंड जैसे कि ये रसिक है रामलाल दादा को कहते हैं रसिक बोलकर के एक व्यक्ति था ब्राह्मण था जो कि व वहां पे कालीवाड़ा में वह थोड़ा सा हेल्प करता था जितना भी काम होता था कालीवाड़ा का उसमें वो थोड़ा हेल्प करता है रसिक मेहतर वो एक अलग और यह रसिक ब्राह्मण जो है वो तो अलग है तो ठाकुर कहते हैं जैसे कि तुम्हारा फेरेंड है फेरेंड फ्रेंड ठाकुर का इंग्लिश तो इतना बड़ा हाईटेक था ना ठाकुर कहते हैं कि तुम्हारा फेरें हो जैसे कि रोश के रसिक की जगह कहते हैं रोश के रोस के है फिर जैसे कि नरेन का फेरेंड है हाजरा तो वैसे ही मेरा फेरेंड है नरेन अत कि वो नरेन का नरेण और हजरा का तो पता है ना कि हाजरा बड़ा तर्क करता था किसी भी चीज को सहजता से स्वीकार नहीं कर लेता था तो नरन को ये अच्छा लगता था कोई कोई लोग ठाकुर के पास आते इतने भक्ति भाव से भरे हुए कि जो कुछ भी देखते सुनते सब कुछ चुपचाप ने उसको गिल लेते बिना किसी प्रश्न किए जैसे कि ये राजा महाराज फिर ये योगेन महाराज को जैसे कि ठाकुर ने कहा था भक्तो भी बोका भी केनो राजा महाराज ने वहां पर स्वामी जी के साथ में ही ब्राह्मण समाज में साधारण ब्राह्मण समाज में वह सदस्यता पत्र भरा था वहां पर ऐसा एक प्रतिज्ञा पत्र होता था प्रतिज्ञा पत्र जैसा ही कुछ आपको कमिटमेंट करना होता था कि मैं कोई किसी भी तरह की साकार पूजा में या तो साकार ईश्वर में विश्वास नहीं करूंगा तो इस तरह से वह एक फॉर्मल आपके पास में सिग्नेचर करवा ते थे साधारण ब्रह्म समाज वाले तो स्वामी जी ने भी किया था राजा महाराज ने किया था अभी स्वामी जी ने आकर के देखा कि राजा महाराज है बीच-बीच में काली मंदिर में जाते हैं तो स्वामी जी राजा महाराज के ऊपर में बड़े ही नाराज हो गए बोला कि अरे तुमने वहां पर साइन किया है अभी तुम मंदिर में जा रहे हो यह तो मिथ्या कथा हो गई तुमने इस तरह का आचरण दोहला आचरण क्यों कर रहे हो मुंह से एक बात करते हो वास्तव में दूसरी बात करते हो तो राजा महाराज थोड़े से डर गए वो स्वामी जी से तो बड़े प्रभावित थे स्वामी जी के मुंह पर तो कुछ नहीं बोल पाए ठाकुर को पता चल गया कि नरेंद इस तरह से राजा महाराज को धमक दे रहा है तो नरन को बुला कर के कहा कि देखो उसके मन का जो भाव है जिस तरह से विकसित हो रहा है उसको उसके मन का वोह भाव विकसित होने दो तुम उसमें बाधा मत डालो कोई कोई पेपर के ऊपर में साइन करके ना कि इस तरह का प्रतिज्ञा पत्र का पाठ करके थोड़ी ना कोई आध्यात्मिक जीवन में उन्नत हो सकता है उसका मन यदि साकार की ओर जाता है जाने दो अभी तुम उसको कुछ मत कहना तो फिर ठाकुर ने जब ऐसा कहा तो फिर स्वामी जी ने भी छोड़ दिया अच्छा ठीक है चलो उसकी इच्छा है तो वह जाए तो स्वामी जी का किंतु यह था कभी भी आप जद एक कमिटमेंट किए हैं तो फिर आप दूसरी बात को जब आप उसकी ओर जाते हैं तो आप उस प्रश्न तो कीजिए आप आंख बंद करके क्यों स्वीकार कर लेते हैं यदि आपने ब्राह्मण समाज में गए वहां के लोगों से प्रभावित होकर के वहां पर प्रतिज्ञा पत्र प साइन कर लिया कि हां मैं साकार पूजा में मैं विश्वास नहीं करूंगा यहां पर ठाकुर के पास आए तो ठाकुर से प्रभावित होकर के साकार पूजा में विश्वास कर लिया लोगों से प्रभावित होकर के आप क्यों कार्य करते हैं आपका अपना खुद का कोई यह नहीं है भीतर में से एक कमिटमेंट जैसा ना कि एक मेंटल स्ट्रेंथ जैसा क्वेश्चनिंग या क्यूरियस क्यूरियस एटीट्यूड तो यह स्वामी जी का था और यह एटीट्यूड उन्होंने हाजरा में देखा था कि सब चीजों को प्रश्न करेगा सभी चीजों के ऊपर में संदेह प्रकट करेगा फट कर के किसी भी बात को वो स्वीकार नहीं कर लेगा तो इसलिए स्वामी जी को हाजरा पसंद था अभी ठाकुर का हाजरा के बारे में क्या ओपिनियन है वो तो हमको पता है ठाकुर कहते थे कि उसका कुछ लेना देना है माने कुछ ऋण है कुछ रुपयों का वहां गांव में तो अभी यहां शहर में आकर के पीतांबरी पहन के बड़ी माला लेकर के जप करता है ठाकुर के कमरे के बाहर में बैठ कर के और वह नजर रखता है कि कोई धनी आकर के उसका वोह जो हमेशा जप करता है बैठता है वह जो तिलक वगैरह लगाता है तो यह सब देख कर के जद वह प्रभावित होक के उसको धन वगैरह कुछ दे देंगे तो उसका ऋण जो है वो ऋण उसका यह हो जाएगा वो चुकते हो जाएगा तो इसलिए वह यह सब करता है ठाकुर को पता है यह बात किंतु नरेण का एक अलग एटीट्यूड था देखने का और देखिए नरेंद्र का भी यह भी एक सिद्धि है ना कि ठाकुर ने जब ऐसा कहा कि हाजरा के साथ में मत बात करना हाजरा जब संदेह संशय प्रकट करता है तो उसको मत सुनना तो नरेंद्र ठाकुर से यह बात सुन कर के भी हाजरा के साथ में जो अपनी मित्रता है वो छोड़ते नहीं थे यानी कि नरेंद का एक इंडिपेंडेंट थिंकिंग था एक इंडिपेंडेंट एक थॉट प्रोसेस थी जो कि उनको पसंद थी बोलकर के नरेंद का हाजरा के साथ में मित्रता थी तो यहां पे ठाकुर कहते हैं रामलाल दादा को रामलाल दादा ने जब प्रश्न किया कि आप नर के लिए इतने अधैर क्यों हो रहे हैं तो राम ठाकुर कहते हैं कि जैसे तुम्हारा फेरेंड है यह रोश के जिसके साथ में तुम इतना गप लगाते हो फिर यह नरेण का फेरेंड है हाजरा तो वैसे ही मेरा फेरेंड है नरेन और उसको यदि नहीं मिलूंगा नहीं देखूंगा तो मुझे भी उसको देखने की इच्छा होगी फिर ऐसा कह के फिर रामलाल दादा को कहा कि देखो यह मारवाड़ी लोग वगैरह आए थे तो काजू बादाम किसमिस वगैरह लेकर आए हैं और ठाकुर को तो पता है कि जब मारवाड़ी भक्त उनको कुछ यह सब देते थे धन वगैरह तो कुछ ना कुछ कामना करके दे थे उसके पीछे कुछ ना कुछ एक उद्देश्य रहता था कि उनके बिजनेस में उनके संसार में उन्नति प्राप्ति हो उ निष्काम भाव से ठाकुर को नहीं देते थे इसीलिए ठाकुर वह जो मारवाड़ी भक्त है वह जो कुछ भी लाते थे और किसी भक्त को खाने नहीं देते थे क्योंकि कामना या वासना करके दी हुई चीज संकल्प करके दी हुई चीज जदिया ग्रहण करेंगे तो आपका पुण्य उसको चला जाएगा तो ठाकुर यह चीज चीज किंतु और किसी को नहीं खाने को देते थे स्वामी जी को खाने को देते उसके भीतर में ठाकुर कहते हैं नरेंद्र के भीतर में ज्ञाना गिनी है वह इतना प्रचंड रूप से प्रज्वलित है कि यह सब कितनी ही दूसरे लोगों की आशाएं अपेक्षाएं आकांक्षाएं उसके भीतर में डालेंगे सब स्वाहा हो जाएगी तो ठाकुर ने रामलाल दादा को कहा कि यह मारवाड़ी भक्त लोग यह लेकर आए हैं काजू मेवा वगैरह तुम जाओ लेकर के जाकर के नरेंद्र के पास जाओ कलकाता में पूछो कि क्यों नहीं इतने दिनों से तो रामलाल दादा निकले वह कलकाता से कालीवाड़ा पर गाड़ी की अपेक्षा करने लगे वह शेर की गाड़ी वो जो घोड़ा गाड़ी है ना शेर माने अकेले नहीं अकेले घोड़ा गाड़ी करेंगे तो बड़ा ही महंगा पड़ेगा किंतु वो जो वो आती जाती रहती है तीन-चार लोग साथ में मिलकर के बैठते हैं तो जिससे कि सस्ता पड़े तो वह शेर की घोड़ा गाड़ी वो अपेक्षा कर रहे हैं गाड़ी तो खड़ी है किंतु और कोई मिल नहीं रहा है साथ में जाने के लिए तो गाड़ी भी नहीं जाएगी अकेले व्यक्ति को को लेकर के तो नहीं जाएगी अकेले पैसेंजर को तो रामलाल दादा ने सोचा बहुत देरी हो जाएगा पैदल ही चलता हूं पैदल चल कर के स्वामी जी के घर पहुंचे जब स्वामी जी को मिले तो स्वामी जी थोड़े से नाराज हो गए नरेद उस समय का नरेद नाराज हो गया पूछा कि अरे आप पैदल क्यों आए अब गाड़ी में क्यों नहीं आए आपको इतना तकलीफ हुआ इतना कष्ट हुआ उ पैदल जाना तो कोई छोटी बात तो है नहीं बोल कर के फिर फिर रामलाल दादा ने कहा कि देखो मैं तो गाड़ी की अपेक्षा कर रहा था पैसा भी है मेरे पास में किंतु गाड़ी चल नहीं रही थी इसलिए मैं अब पैदल ही चले आया तो फिर स्वामी जी ने उनके पैर धुए उनको बड़ा ही खातिर करके बिठाया फिर रामलाल दादा ने कहा कि ठाकुर अपेक्षा कर रहे हैं तुम आने वाले थे आए क्यों नहीं तो फिर नर ने कहा ठीक है चलो साथ में ही चलते हैं मुझे थोड़ा सा काम आ गया था नहीं आ पाया था किंतु यदि ठाकुर नेभी आपको भेजा ही है तो चलो साथ में चलते हैं बोल कर के व अपने बाल बाल अच्छे से वो सजा वो ब्रश वगैरह कर दिए अच्छे से कपड़े पहने और फिर रामलाल दादा के साथ में निकले दक्षिणेश्वर आने के लिए जैसे ही ठाकुर के पास में आए ठाकुर ने कहा अच्छे से बाल बाल वगैरह सजाए हैं तो ठाकुर ने पूछा अरे तुमको यह सब करने की क्या जरूरत है पहली बार जब स्वामी जी आए थे ठाकुर के पास में तो ठाकुर ने उस वर्णन है वो दक्षिणेश्वर में जब पहली बार स्वामी जी आए थे ठाकुर ने कहा कि सेही दरवाजा थे के प्रथम डुके छलो माने इसी दरवाजे में से वह प्रथम कमरे में प्रवेश किया था देखा कि बाल उसके बिखरे हुए हैं मेली एक चादर अपने बदन पर डाली हुई है किंतु यह सब चीजों की ओर इसकी कोई भी दृष्टि नहीं है उसका कोई भी उसका यह नहीं सब चीजों के प्रति देखा कि उर्ध्व दृष्टि उसकी दृष्टि जो है वो ईश्वर की उर्ध्व दृष्टि को आप लिटरली भी ले सकते हैं ऐसे हवा में देख कर के स्वामी जी का ऐसा था कि ऐसा हवा में देख कर के चलते थे तो स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो उनके जो डिसाइल उनके बारे में जो स्मृति कथा लिखते हैं तो वो लिखते हैं कि स्वामी जी जैसे कि वो जो अ टेली टेलीग्राम का जो यह होता है ना पोल वह जो लंबे-लंबे वह खड़े करते हैं अपने यहां पे इंडिया में देखेंगे कि वह वह सब इलेक्ट्रिसिटी के वायर वह इसके ऊपर में पोल के ऊपर में डाले हैं तो वोह लोग लिखते हैं कि स्वामी जी वह जो टेलीग्राम का जो पोल था उसके नीचे जमीन पे देखते ही नहीं थे सब समय उर्ध्व दृष्टि एक बार ऐसा हुआ कैंप टेलर में कैलिफोर्निया में कैंप टेलर बोलकर के कैंप ग्राउंड है वहां पे कैंपिंग के लिए गए थे तो आडा अनसेल साथ में थी तो आडा अनसेल को वापस आना था तो स्वामी जी ने ने कहा कि मैं तुम्हारे लिए जो ट्रेन है ट्रेन को रोकूंगा वहां पर ट्रेन रुकती नहीं थी किंतु यदि आप वहां पर जाकर के ऐसा इशारा करेंगे ट्रेन आने के समय तो आपका इशारा देख कर के ट्रेन रुक जाएगी उसमें आप बैठ कर के शहर में जा सकते हैं तो जैसे ही स्वामी जी ने ट्रेन देखी तो स्वामी जी ने ऐसा करके इशारा किया हाथ उठा कर के रुक जाने के लिए तो ट्रेन का ड्राइवर स्वामी जी को देख कर के बोलता है हु इज द स्काई पायलट तो आडा आंसर लिखती है कि पहली बार तो मैंने ये एक्सप्रेशन सुना स्काई ट का क्या अर्थ है स्वामी जी हमेशा ऐसा उर्ध्व दृष्टि से उन्नत देह उनका था और चेहरे पर ऐसा उज्जवल एक चमचमा थी कि झगमग हट थी कि उनको देख कर के ही एक नया एक एक्सप्रेशन उसने बोल दिया तो यह थे स्वामी जी तो पहली बार जब ठाकुर ने देखा स्वामी जी को अपने कपड़ों वस्त्रों के ऊपर में अपने बालों के ऊपर में नजर नहीं है किंतु उर्ध्व दृष्टि है दोनों तरीके से एक तो ईश्वर की ओर उनका मन जा रहा है एक हो सकता है लिटरली स्वामी जी हवा में देख के चलते हैं यह भी बात सही है और ठाकुर जब कोलकाता से जाते थे तो कहते थे देखा सबको निम्न दृष्टि सबकी नजर अपने पेट की ओर है यह भी लिटरली और मेटाफोरिकली दोनों दृष्टि से देख सकते हैं लोग नीचा देख कर के चलते हैं वह भी एक बात है दूसरा कि उनके मन के भीतर में रोटी कपड़ा मकान के अलावा और कोई चिंता ही नहीं है तो दोनों ओर से आप दे सकते हैं तो यहां पर भी ठाकुर ने जब इस बार स्वामी जी को देखा कि पपड़े अच्छे से सजा करके पहने हैं बालबाल अच्छे से उन्होंने एक मैनेज किए हैं तो ठाकुर ने कहा कि अरे तुमको यह सब करने की क्या जरूरत है एनीवे अभी किया है तो क्या है फिर आज आज रात को तुम रुकोगे तो तो स्वामी जी ने कहा कि हां आज रुकूंगा तो फिर ठाकुर ने कहा रामलाल दादा को अच्छे से खाना बनाना और नरेण आया है तो अच्छे से उनको रखना और देखिए कि रामलाल दादा स्वयं तो खाना बनाने वाले नहीं थे खाना बनाने वाली थी तो अपनी मां तो मां शारदा वहां नबत में रहती थी तो अभी इस स्मृति कथा में नहीं लिखा किंतु इन जनरल हमको पता है कि किस तरह से स्वामी जी जब वहां पर आते थे काली मंदिर में और मां उनके लिए मोटा-मोटा रोटी और यह गाड़ी दाल यह बना कर के देती थी और नरेण उसको खाता था तो ठाकुर ने कहा कि नरेण के लिए अच्छे से खाना बनाओ वह आज रात को रुकेगा अच्छा तो इस बार तो स्वामी जी रामलाल दादा ने बुलाया तो स्वामी जी वहां पर आए दूसरी एक बार ऐसा हुआ कि स्वामी जी ने ठाकुर को वचन दिया था कि मैं 3:00 बजे आऊंगा एक दिन बुधवार के दिन 3:00 बजे आऊंगा तो अभी ठाकुर अपने कमरे में बैठे हैं दोपहर को 2 बजे का समय है सभी भक्तों के साथ में गप लगा रहे हैं एकाएक उन्होंने वहां से खड़े होकर के जूते पहने और जूते पहन के एकदम सीधे वो मंदिर का काली मंदिर का का जो गेट है फाटक उसके पास में चले गए तो शायद हो सकता है रामलाल दादा भी साथ में गए हो क्योंकि उन्होंने यह वर्णन किया है कि ठाकुर जैसे ही गेट पास गेट के पास में गए देखा कि नरेद वहां पर खड़ा है तो ठाकुर ने पूछा नरेद को अरे तुम यहां पे इस समय क्यों खड़े हो भीतर में क्यों नहीं आ रहे तो नरेंद ने उत्तर दिया कि मैंने आपको कहा था 3:00 बजे आऊंगा अभी तो घड़ी में देख रहा हूं कि 2 ही बजे हैं मैं तो सुबह को अर्ली मॉर्निंग अपने घर से निकल गया था मुझे प नहीं कि मैं किस समय यहां पर आता तो अभी एक 2 बजे है और मैंने वचन दिया है 3:00 बजेगा इसलिए सत्य रक्षा करने के लिए मैं यहां पर खड़ा हूं 3:00 बजे में भीतर में प्रवेश करूंगा तो ठाकुर ने कहा अच्छा वाह बहुत अच्छा बहुत अच्छा ऐसा बोलकर के ठाकुर नरेंद्र के साथ में वहीं पर गप लगा रहे हैं और जब जैसे 3:00 बजे दोनों लोग काली मंदिर के भीतर में आए यहां पे देखिए दो चीजें सर्वप्रथम तो स्वामी जी सत्य रक्षा करने के लिए छोटी-मोटी चीजों में भी अब देखिए सिर्फ स्मी जी नहीं ठाकुर ने उनको सराहा है ठाकुर के पास में से ही तो यह सब सीखा है कि सत्य रक्षा छोटी-छोटी चीजों में भी किस तरह से करते हैं एक चीज दूसरा कि ठाकुर और स्वामी जी का जो अंतर मन किस तरह से मिलित था कि नरेण वहां पर गेट के पास में खड़ा है मन में ठाकुर का चिंतन कर रहा है और नरन के मन की पुकार ठाकुर को अपने कमरे में सुनाई दी यह इसी तरह से ठाकुर ने एक बार कहा था कि यहां इस बार यहां का जो कुछ भी है अपनी ओर इशारा करके यहां का इस बार जो कुछ भी है सब और जन्नो सब कुछ उसके लिए है नरेंद्र की ओर इशारा करके नरेंद्र ने ही ठाकुर को पुकारा जैसे कि और वैसे तो हमको पता है कि ठाकुर ने नरेंद्र को पुकारा था वोह सप्तर्षि में से एक ऋषि थे वो सब ध्यान में मग्न थे ठाकुर ने जाकर के एक ऋषि को कहा आओगे तो फिर तुमको आना है मेरे साथ में तो फिर उन्होंने आंख खोल कर के एक बार हां कह दी थी फिर उसी षि एक बालक के रूप में नरेण के रूप में आए तो एक और देखेंगे कि नर ठाकुर के पुकारने से नरेण का आगमन हुआ है दूसरी ओर देखेंगे कि नरेण की इच्छा से नरेण के पुकारने से भक्त के पुकारने से भगवान का आगमन हुआ है तो इन दोनों के भीतर में जो संबंध था इतना गहरा आध्यात्मिक संबंध कि ठाकुर अपने कमरे में बैठे हैं और पता चल गया कि यहां पर नरेंद खड़ा है और उनके बारे में सोच रहा है तो दौड़ कर के उसके पास में चले गए थे अभी देखिए अ एक बार रामलाल दादा आलम बाजार गए थे वहां पर उन्होंने शिबू आचार्य बोलकर के एक गायक है तो उनका उन्होंने कीर्तन सुना गाय कीर्तन भजन वह सब सुना और सुनकर के आकर के दक्षिणेश्वर में आकर के ठाकुर को कहा कि उन्होंने इतना अच्छा भजन कीर्तन गाया है कि मुझे बहुत अच्छा लगा तो ठाकुर ने कहा अच्छा तो बहुत अच्छी बात बात है कि यहां पर जद आए तो हम लोग सुनेंगे बोलकर के ठाकुर ने कहा एक दिन ऐसा हुआ कि शिबू आचार्य वहां पर काली मंदिर में दर्शन करने के लिए आया जैसे ही आया तो रामलाल दादा ने देखा तो उन्होंने कहा कि इसी कमरे में पास में ही परमहंस महाशय रहते हैं तो आप आइए वहां पर और उन्होंने आपके कीर्तन की बड़ी प्रशंसा सुनी है आपका कीर्तन सुनना चाहते हैं तो शिबु आचार्य भी बड़े ही अच्छे से वह राजी हो गए ठाकुर के पास में आए ठाकुर से प्रभावित हो गए बातें सुनकर के कीर्तन गाया और ठाकुर भी बार-बार ठाकुर का तो पता है कीर्तन जैसे चालू होगा और उनको अच्छा लगेगा तो मुहूर मुहूर समाधि मग्न होते जाएंगे तो यह बड़ा ही सुंदर एक चला लंबे समय तक और फिर ठाकुर ने आखिर में शिबू आचार्य को कहा कि देखो तुम तीन-चार घंटे तक कीर्तन कर सकते हो भजन कर सकते हो और तुम्हारा गला भी खराब नहीं होता आवाज भी तुम्हारी बिगड़ती नहीं ये बहुत बड़ी सिद्धि है तो बहुत अच्छी बात है कि तुम्हारे भीतर में जैसे कि ईश्वर की शक्ति विराज कर रही है जिसके द्वारा 10 लोग आनंद प्राप्त करते हैं जिनका कि 10 लोगों को आकर्षण होता है उनके भीतर में ईश्वरीय शक्ति विराज कर रही है ऐसा ठाकुर ने उनको कहा तो अ ये शिवू आचार्य ने सामने कहा कि महाशय आप एक काम कीजिए ना मेरे ससुर जहां पर रहते हैं भद्रकाली बोलकर करके जहां पे शहर है वहां पर आप आइए आपके पैरों की धूल जदी वहां पर गिरेगी तो हम लोग बड़े ही भाग्यवान महसूस करेंगे अपने को तो ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है चलो जद मौका मिलेगा तो आएंगे फिर एक दिन ऐसा हुआ कि एक दिन सुबह को यही शिबू आचार्य तीन चार नौका लेकर के दक्षिणेश्वर में आकर के उपस्थित हुआ जैसे कि हमने देखा था ना कि यह केशव सेनन बड़ी सी बड़ा सा जहाज लेकर के आ जाता है ठाकुर को लेकर के फिर गंगा के भीतर में कीर्तन करते-करते जाता है तो यहां पर शिवू आचार्य चार नौका लेकर के आया और उन्होंने कहा कि चलिए चलते हैं भद्रकाली और तो ठाकुर भी राजी हो गए और शायद पहले से ही सबको पता होगा तो वहां पे मास्टर महाशय भी थे राखल अर्थात कि राजा महाराज भी थे महिम चक्रवर्ती अक्षय मास्टर अक्षय कुमार सेन जिन्होंने रामकृष्ण पुंथी की रचना की वगैरा वगैरह काफी लोग इकट्ठा हो गए थे सब लोग चार नौका में बैठ बैठ कर के स्वामी जी भी थे रामलाल दादा भी साथ में गए तो सब लोगों ने चार नौका में बैठ कर के भद्रकाली प्रयाण किया नौकाओं के ऊपर में ध्वजा पताका वगैरह सब लगाया हुआ था और नौका में ही खोल करताल करके करके हरिनाम करते करते गए वहां पर और वहां पर तो जैसे कि उत्सव में जब ठाकुर जाते हैं तो चारों ओर कैसा एक इलेक्ट्रिक करंट की तरह आध्यात्मिकता प्रवाहित हो जाती है खोल करताल कीर्तन चलता ही रहेगा चलता ही रहेगा और ठाकुर मुहूर मुहूर समाधि स्थ होते रहेंगे और ठाकुर को देख कर के ठाकुर की समाधि से प्रेरित होकर के आध्यात्मिकता का जो भाव तरंग वो फैले वहां पे उसका वर्णन हमने कथामृत में पाणी हाटी के उस उत्सव के उसमें हमने पाया है मास्टर महाशय उसके बारे में लिखते हैं हालांकि मास्टर महाशय यहां पर भी गए थे और उन्होंने इसका वर्णन किया है बोलकर के तो मुझे याद नहीं आ रहा है तो एक आश्चर्य की बात है मास्टर महाशय की बहुत सारी डायरीज है जो कि संपूर्ण रूप से उन्होंने पुस्तक में परिवर्तित नहीं की है उसमें से कुछ-कुछ डायरियो का सहारा लेकर के बाद में प्रभानंद जी ने श्री श्री रामकृष्ण अंत्य लीला पुस्तक की भी रचना की है दो वॉल्यूम में तो हो सकता है कि इस घटनाओं का वर्णन भी शायद मास्टर महाशय ने डायरी में किया होगा लिपिबद्ध करने का समय नहीं मिला होगा तो जो भी है वो वहां पर इतना सब कीर्तन वगैरह हुआ वहां पर एक एक और कीर्तन चल रहा रहा है दूसरी ओर न्याय शस्त्र की आलोचना हो रही है सब पंडित लोग इकट्ठा होकर के न्याय शस्त्र की आलोचना करते हैं उस समय ठाकुर फिर थोड़ा सा कीर्तन समाप्त हुआ और न्याय शस्त्र की जो आलोचना हो रही थी चर्चा विचारणा हो रही थी तर्क कुतर्क हो रहे थे बैठ कर के ठाकुर ने काफी समय सुने वहां पर ब्रह्म व्रत समाध बोलकर के एक ब्राह्मण था तो एक न्याय का एक विद्वान था वो एक पंडित इस तरह से सबके साथ में तर्क कर रहा है जो कोई भी कुछ भी कहेगा उसको वह तर्क में काट देगा तो अभी ठाकुर ने काफी देर तक उसको सुना फिर उन्होंने रामलाल को कहा चलो थोड़ा सा शो करके आते हैं बाथरूम जाकर के तो ये दोनों लोग निकले अभी ठाकुर वहां पर जाग बैठे हैं एकाएक समाधि में मग्न हो गए भाव में और फिर भाव में से आकर के खड़े होकर के कहा कि अरे वो किस तरह का वो शुष्क पंडित है शही शाला भारी तर्को करे वो साला बहुत तर्क करता है ठाकुर तो गाली देने में एक्सपर्ट है तो ठाकुर ने अपने ही साथ में बात करना शुरू कर दिया वो साला बहुत तर्क करता है किसी की भी बात नहीं सुनता चलो जाकर के उसको मिलते हैं बोल कर के ठाकुर ने आकर के वो जो पंडित तर्क कर रहा था उसका दाया घुटना पकड़ लिया और पकड़ कर के कह रहे हैं जोर से क्या रे क्या किसत तर्क कर रहे हो बताओ बताओ किस तरह का तर्क है यह सब ऐसा बोल कर के जो डाटा उसको तो बेचारा पंडित बिल्कुल एकदम यह हो गया डर के मारे ठाकुर के भीतर में तो मां काली का आवेश होता था तो एक आध्यात्मिक प्रचंड शक्ति और फिर मां काली का आविर्भाव यह सब मिलकर के पंडित को ऐसा डरा दिया तो एकदम हंसते हंसते कहता है एकदम बेचारा होकर के कि अरे मैं तो कुछ भी नहीं कह रहा था मैं तो वैसे ही ठट्ठा तमाशा कर रहा था यह देख रहा था मेरी बात सुन कर के कोई लोग क्या कहता है म मैं मुझे कुछ नहीं कहना कुछ नहीं कहना ऐसा करके ऐसा बेचारे की तरह हो गया कि ठाकुर ने उसको छोड़ा आखिर में कि अच्छा ठीक है बिना मतलब का तर्क मत करना फिर बाकी लोग भी बहुत सारे इकट्ठा हुए और देखा कि ठाकुर ने रुद्र स्वरूप धारण किया है तो फिर बाकी भक्त ने भी आकर के ठाकुर को समझा बुझा करके थोड़ा सा शांत किया और फिर वहां से ले गए देखिए कि ठाकुर के भीतर में जब भी ऐसा हमने बहुत बार देखा है यदि किसी व्यक्ति को मिलना है किसी पंडित को मिलना है गणय मान्य किसी को मिलना है तो ठाकुर शुरू शुरू में तो बड़े शांत रहते थे थोड़े से वो डर के भी रहते थे शायद कि इतना बड़ा आदमी है मैं क्या उसके साथ में बोलूंगा किंतु फिर ठाकुर कहते हैं एक जगह पे कि तार परमार शी अवस्था होलो उसके बाद में मेरी वही अवस्था हुई वही अवस्था अर्थात कि महाकाली का उनके भीतर में आविर्भाव हुआ और फिर डर लज्जा सब लज्जा घृणा भय ठाकुर कहते हैं ना लज्जा घृणा भय तीन थाक ते नोए तो मैंने लोगों के प्रति जो लज्जा है ये जो सब बातें हैं जिसके प्रति घृणा हो सकती है या तो फिर यह भय होता है सभी चीजों का वह सब कहां दूर हो जा करके भीतर में मां काली का आविर्भाव और ठाकुर सामने वाले की कोई भी चिंता नहीं करके वह कुछ भी बोल देंगे तो ठाकुर यहां पर भी उस तरह से ठाकुर का भाव हुआ कि यह पंडित बिल्कुल उनके सामने वोह बेचारा बन कर के रह गया इसके बाद में देखिए अ सिहोड़े हृदय का जन्म हुआ था तो वहां पर एक व्यक्ति था दिगंबर बांडोज व उसकी उम्र थी 1775 साल थी और बड़ा ही गरीब था और किंतु भक्तिमार्ग वाणु जी ने आकर के एक बार ठाकुर का वहां पर आगमन हुआ होगा तो एक जपमाला ली जपमाला के ऊपर में गंगा जल का स्पर्श करवाया और यह माला ठाकुर के श्री चरणों में अर्पित की और ठाकुर से प्रार्थना की तो ठाकुर ने वही जपमाला लेकर के उसको वापस दी कहा कि इसको जप करना इसी माला पर और सुबह शाम खोल करताल लेकर के हरि नाम संकीर्तन करना यह उपदेश ठाकुर दूसरे काफी भक्तों को दे चुके हैं तो इसको भी यही उपदेश दिया कि खोल कर ताल लेकर के हरि नाम करना जिससे कि वो ठाकुर एक जगह पर कहते हैं ना कि लोग देखे कि तुम हरि नाम करते करते नृत्य करते-करते पागल मत्त हो जा रहे हो नशे में मत लोग नशे में मत्त होते हैं तुम हरि नाम कीर्तन करते-करते मत्त हो रहे हो ऐसा लोग देखे इस तरह की अवस्था करो लज्जा मत करो यह सब चीजों में ऐसा ठाकुर विजय कृष्णा गोस्वामी को मोस्ट प्रोबेबली कहते हैं एक जगह पे तो यहां पर भी ठाकुर ने इनको कहा कि खोल करताल लेकर के नृत्य गीत करते-करते हरि नाम संकीर्तन करो और इससे तुम्हारा मंगल होगा कलयुग में हरि नाम सार एक कोरले ध्यान जाग जोग गर फल होवे हरि कलयुग में हरि नाम ही सार है हरि नाम करते-करते ही याग यज्ञ ध्यान इस सबका फल हरि नाम करने से ही मिलेगा और ठाकुर की बात सुन करर के इसने काफी दिनों तक हरि नाम संकीर्तन किया बहुत सारे दल बहुत सारे वैष्णव साधक वगैरह इनके घर में भी आते थे और अपनी परिस्थिति अच्छी नहीं थी फिर भी सबका स्वागत करते थे सबको खिलाते थे और ठाकुर की कृपा से देखिए उनके दिन ऐसे फिर गए कि वह जमींदार हो गया मैंने यह पढ़ कर के भी विश्वास नहीं आता सुन कर के भी दो बार सुनना पड़ता है कि सही में एक गरीब व्यक्ति ठाकुर के आशीर्वाद से जमींदार हो गया क्योंकि देखिए कि जमींदार होना तो कोई सहज बात नहीं है ब्रिटिश साम्राज्य था था ब्रिटिश शासन था वहां जो ज्यादा चमचागिरी करेगा प्रचा पे अत्याचार करके ज्यादा ज्यादा कर वसूली करेगा वही तो जमींदार हो सकता है तो इनको किस तरह से किसने जमींदार बना दिया पता नहीं डिटेल किंतु वह सही में जमींदार हो गए और काफी दिनों तक उन्होंने जब तक जीवित रहे तब तक उन्होंने सब वैष्णव की सेवा की थी और हरिना वो खोल करताल लेकर के हरिनाम कीर्तन किया था ये हरि नाम कीर्तन करने का उपदेश ठाकुर ने विजय कृष्ण गोस्वामी को इसी तरह से दिया था पहले जैसे मैंने कहा कि ठाकुर कहते हैं कि लोग देखे कि तुम नाम कीर्तन करते-करते मत्त हो जा रहे हो ये एक दूसरे प्रसंग पे है दूसरी जगह पे है किंतु यहां पे रामलाल दादा एक दूसरे प्रसंग का वर्णन करते हैं वो कहते हैं कि विजय कृष्ण गोस्वामी ठाकुर के पास में आना जाना करते थे विजय कृष्ण गोस्वामी कौन है वो एक केशव सेन के दल के एक थे एक ब्राह्मण वहां पे वो पाठ वगैरह किया करते थे पूजा वगैरह किया करते थे वह ब्राह्मण समाज में उपासना पूजा शब्द नहीं उपासना यह जैसे कि क्रिश्चन चर्च में वह मास होता है ना तो वैसा ही कुछ यह निराकार वादी थे यह लोग ब्राह्मण समाजी तो एक उपासना पद्धति उन्होंने डेवलप की थी उसमें थोड़ा बहुत चैटिंग भी होगा थोड़ा बहुत कुछ विधि वगैरह भी होगा तो यह सब उनका चलता था विजय कृष्ण गोस्वामी यह सब करवाते थे तो उन्होंने एक बार आकर के ठाकुर के पास में आकर के ठाकुर का दर्शन किया फिर उनको लगा कि यह जो निराकार जो कर रहे हैं यह सब लोग उसमें ज्यादा कुछ दम तो है नहीं हृदय को तृप्ति तो मिलती नहीं है और ठाकुर भी समझ गए कि उसके मन का क्या भाव है तो ठाकुर ने कहा कि एक काम करो तुम एक दिन मेरे पास में आना मैं तुम्हारे साथ में बात करूंगा बोलकर के विजय कृष्णा को बुलाया विजय कृष्णा आया अकेले ठाकुर ने कहा कि देखो तुम तो गोस्वामी वंश के हो अद्वैत वंश के हो तुम तुम्हारे भीतर में जो चैतन्य महाप्रभु के जो यह थे पार्षद थे अद्वित गोस्वामी उनके वंश के यह विजय कृष्ण गोस्वामी थे तो उन्होंने कहा कि तुम अद्वैत वंश के हो तुम्हारे भीतर में तो यह जो साधना उपासना हरि नाम से मत्त होकर के कीर्तन करना यह तो तुम्हारे रक्त के भीतर में है तुम यह सब छोड़कर के यह निराकार निराकार क्या कर रहे हो तुमको देख कर के मुझे बड़ा कष्ट होता है इसलिए मैं तुमको यह बात करता हूं तो विजय कृष्ण गोस्वामी भी ठाकुर की बात सुनक के ठाकुर के पैरों में लेट गए और कहा कि आप बताइए मेरा क्या होगा तो ठाकुर ने कहा कि देखो हरि नामे मतवारा होए तिनी दया कोरबे नहीं कोरबे यदि आप हरि नाम में मत होकर के नाम गुण कीर्तन करेंगे तो हरि ईश्वर तुम पर दया करेंगे ही करेंगे तो यह ठाकुर की बात लेकर के बाद में हमने विजय कृष्ण गोस्वामी का जो फोटोग्राफ देखने को मिलता है पीतांबरी पहन कर के माला और फिर सर के ऊपर में तिलक वगैरह लगा कर के बड़ा मजे से वह कीर्तन करते हैं और इस तरह के वस्त्र भी धारण करते हैं ठाकुर ने ही कहा था कि देखो तुम गले में माला पहनो सर के ऊपर में तिलक करो हरि नाम करो यह सब तो तुमको करना उचित है वो नहीं करके तुम यह क्या निराकार निराकार कर रहे हो तो सही सही में केश विजय कृष्ण गोस्वामी ने अपने वस्त्र अपना ड्रेस भी बदला और हरिनाम कीर्तन करते-करते उन्होंने अपना जीवन सार्थ थक भी किया था एक बार जब ठाकुर के पास में यह सब वस्त्र पहन के आए थे पीतांबरी है माला है सर के ऊपर में तिलक है तो ठाकुर ने बड़े ही खुश होकर के कहा कि देखो अभी तुमको देख कर के लगता है कि तुम्हारे मन में से तुम्हारे भीतर में से हरि नाम स्वतः ही प्रकट हो रहा है जैनो आपनी फूटे बेरू अपने से ही निकल रहा है तुम्हारे भीतर में से हरि नाम तो इस तरह से तोतो दिन चापा छीलो एक बार फूल फूटे छ इतने दिनों तक ढका हुआ था अभी यह पद्म प्रकाशित हुआ है पद्म कमल जैसे कि विकसित हुआ है भक्ति रूपी पद्म विकसित हो रहा है ऐसा बोलकर के ठाकुर ने उसको सराहा और विजय कृष्ण भी ठाकुर के चरणों में सर रख कर के प्रणाम करके कहते हैं कि इस दास को अपने मन में रखिएगा आप मुझे ठुकराएगा मत मैं जानता हूं कि आप ईश्वर भगवान स्वयं है तो ठाकुर ने कहा अरे अरे यह सब क्या बातें कर रहे हो तुम मेरे बारे में थोड़ी ना मैं ईश्वर हूं ऐसा करके उस समय तो उन्होंने टाल दिया देखिए कि यही ये विजय कृष्ण गोस्वामी है वो कलकाता से एक बार निकला था वो तीर्थ यात्रा वगैरह करने के लिए ठाकुर की बात में आकर के ठाकुर ने उसका ब्रेन वॉश कर दिया था यह केशव सेन है ना उसके समाज में ये विजय कृष्ण गोस्वामी ने ही केशव के समाज में वो फूट फाट डाली थी ये उस समाज का ऐसा नियम था कि ये आपकी जो लड़की का विवाह मिनिमम मैरेज एज विवाह की एक मिनिमम एज नक्की ठीक कर दी थी तो केशव ने अपनी बच्ची छोटी थी वो मिनिमम एज के उसके बाद में भी धनी घर देख कर के विवाह कर दिया तो यह केशव सेन और शिवनाथ शास्त्री विजय कृष्ण गोस्वामी और शिवनाथ शास्त्री इन दोनों ने केशव सेन के ब्राह्मण समाज को तोड़ कर के अपना एक दूसरा ब्राह्मण समाज साधारण ब्रह्म समाज चालू किया था जहां पर भी स्वामी जी आते जाते थे तो ये जैसे ही साधारण ब्रह्म समा इन लोगों ने बनाया तो केशव जाकर के ठाकुर को कंप्लेन करता है कि महाशय देखिए मेरा ब्राह्मण समाज तोड़ कर के चले तो गए किंतु साथ-साथ में ही यहां के मेरे जो डिवोटा है उनको भी लेकर गए तो ठाकुर ने उनको कहा था केशव को कि केशव देखो तुम मनुष्य को देख कर के आदमी को देख कर के चेले नहीं बनाते हो इसलिए वे लोग तुम्हारे से दूर चले जाते हैं तो ऐसा हो सकता है कि मैंने केशव सिह यह भी कह सकता है कि यह विजय कृष्ण गोस्वामी जो कि ठाकुर के केशव सेन के पास में से चला गया उसको भड़काने में ठाकुर का भी तो एक हाथ था ठाकुर ने ही कहा था कि यह सब निराकार निराकार क्या कर रहे हो तुम साकार की उपासना करो किंतु देखिए ठाकुर ने इस आशय से नहीं कहा कि केशव का ब्राह्मण समाज टूटे उन्होंने उसके भीतर के संस्कार देख कर के कहा कि तुम्हारे जो संस्कार है उससे साकार उपासना ही तुम्हारे लिए श्रेष्ठ है बोलकर के र ने केश विजय कृष्णा गोस्वामी को यह कहा था बाद में जब विजय कृष्णा गोस्वामी बहुत सारी जगह पर तीर्थ करके आया ठाकुर के पास में तो उसने ठाकुर को कहा था बड़ा ही वह विख्यात प्रसंग है वह ठाकुर को कहता है कि महाशय हम तो सोचते थे कि कलकाता के पास में ही यदि आपके जैसे उर्ध्व चेता इतने आध्यात्मिक परिपूर्ण व्यक्ति जब साधक कलकाता के पास में ही विराजमान है तो जद कोलकात्ता से दूर प के ऊपर में जाएंगे हिमालय है वगैरा तो हमको और भी कैसे एक से बढ़कर एक उच्च से उच्चतर साधकों का सिद्धों का दर्शन होगा किंतु मैं सब जगह पर घूम कर के आया और यहां पर जो आविर्भाव है अर्थात ठाकुर के भीतर में इस तरह का आविर्भाव और कहीं पर नहीं है बोलकर के विजय कृष्ण ने ठाकुर को प्रणाम किया था यह वही विजय कृष्ण और यह वही घटना कि ठाकुर ने पहले उसको कहा कि तुमको यह हरि नाम की हरि नाम करना चाहिए गले में माला पहननी चाहिए पीतांबरी पहननी चाहिए सर के ऊपर में तिलक करना चाहिए तब तो कहीं जाकर के तुम्हारा अद्वैत वंश सार्थक होगा अच्छा तो आज यही तक अभी कल ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु बराबर से कारण के रामकृष्ण संघ मा जद तमारे दीक्षा लेवी होय तो तमारे ठाकुर ने इष्ट रूपे स्वीकार वा पड़े कारण के त ठाकुर न मंत्र लोने ठाकुर ने इष्ट ना रूपमा न स्वीकारो तो पछ तमने न फल नहीं मले ले एमनी वात बराबर से त गौतमानंद जी साथे वात करो जो के महाराज श के जो कहीं खुटे नथी हम सबको क्या है ना कि लंबा जर्नी पार करके ठाकुर के पास में आना पड़ता है मेरा खुद का ऐसा था कि मैं जब अपने घर में था तो मैंने यह रूरल डेवलपमेंट गांधी जी ने जो कहा ना कि यंग लड़कों को गांव में जाना चाहिए यह सब मैंने बहुत पढ़ा था तो मैं जब रामकृष्ण संघ में जवाइन करने के लिए आया तो मैंने देखा कि यहां पर यह सब क्या क्लास वगैरह चल रहे हैं पूजा पाठ चल रहा है मुझे तो यह सब में इंटरेस्ट नहीं है मुझे तो रूरल डेवलपमेंट करना है ट्राइबल डेवलपमेंट करना है तो उस समय सुहितानंद जी महाराज हमारे इंचार्ज थे तो मैंने जाकर के उनको कहा तो महाराज ने कहा तुम एक काम करो तुमको जॉइन करने की जरूरत नहीं तुम रांची चले जाओ रांची में हमारा रूरल डेवलपमेंट का काम चल रहा है तुम वहां पर जाना तो मैं वहां पर जाकर के काफी दिन तक काम किया और फिर साथ-साथ में ठाकुर को स्टडी भी करता था फिर मुझे अकल आई कि देखिए सिर्फ काम करने से तो नहीं चलेगा ठाकुर की आध्यात्मिकता भी हमको चाहिए य आध्यात्मिकता और कर्म दोनों साथ-साथ में चलना चाहिए जब यह अकल आई तो फिर उन्होंने दया करके मुझे वापस ले भी लिया तो देखिए कि मुझे घूमना पड़ा काफी तो यह एक क्या है कि स्पिरिचुअल मैच्योरिटी स्टेज बाय स्टेज चलती है मेरे में कोई कमी है या आप में कोई कमी है वह बात नहीं है समय आने से सब होगा समय आने से ही ठाकुर आपको बता देंगे कि देखिए यह रास्ता है इस रास्ते के अनुसार चलना है