मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन भारत में दिए हुए भाषणों में से एक इसका हम पाठ कर रहे रहे थे। इसमें भी खास करके मैंने एक यह डेवलप किया है। मैंने नहीं एआई ने किया है। स्लाइड शो उसको उसको हम देख रहे थे। तो देखिए कि यह जो स्लाइड शो है बेसिकली एआई ने डेवलप किया है। मैंने स्वामी जी जब
गुलाम भारत की धरती पर छिपा वो आध्यात्मिक झरना, जिसे विवेकानंद ने पहचाना
अमेरिका से भारत आए और कोलंबो से प्रारंभ करके पूरे भारत में उन्होंने यात्रा की और साथ में ही उनका जो एक नया मैसेज जो भारत को देना है। आत्मश्रद्धा का आत्म उन्नति का और साथ में ही डीप स्पिरिचुअल रिवाइवल का। तो यह जो स्वामी जी का जो मैसेज है भारत के लिए पूरे भारत में भ्रमण करके उन्होंने दिया। स्वामी जी ने भारत भ्रमण दो बार किया। एक बार तो जब वराह नगर मठ से निकले थे 18 89 के आसपास में उस समय वो नॉर्थ इंडिया से होकर के हिमालय से होकर के फिर यह दिल्ली राजपूताना गुजरात ये कर्नाटक आज का फिर ये आज का केरल आज का तमिलनाडु यह पूरा भ्रमण करके हैदराबाद भी आए थे एक बार और फिर वहां से बॉम्बे गए और बॉम्बे से उन्होंने अमेरिका अमेरिका के लिए यात्रा की। तो यह एक भारत भ्रमण हुआ स्वामी जी का भारत की परिस्थिति को समझने के लिए। और दूसरा भारत भ्रमण हुआ जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आए। इस बार स्वामी जी के पास में तीन अमोग एक्सपीरियंस थे। अमेरिका से भारत वापस आने के समय में। सर्वप्रथम तो ठाकुर के साथ में उनके जो दीन थे एज ए डिसाइपल शिप ठाकुर के शिष्य होकर के उन्होंने ठाकुर के पास में से जो आध्यात्मिक साधना सीखी थी और उस साधना में जो उन्होंने सर्वोच्च सिद्धि निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली थी ठाकुर के रहते-रहते ही काशीपुर गार्डन में ठाकुर के अंतिम दिनों की यह घटना और साथ में हमको यह भी पता है कि ठाकुर ने अपनी समग्र आध्यात्मिक शक्ति स्वामी जी में स्वामी विवेकानंद में ट्रांसफर कर दी थी। क्यों? क्योंकि स्वामी जी को एक बहुत ही महत कार्य करना था। तो यह ठाकुर की महासमाधि के साथ में ही स्वामी जी का यह जो बहुत ही महत्वपूर्ण एक स्टेज है उनके जीवन का एक पीरियड जो है उसका अंत आया। स्वामी जी के पास में अभी सुपर पावर है आज की लैंग्वेज में। किंतु इस सुपर पावर को कहां भी यूटिलाइज करना, कैसे उसको यूज करना जिससे कि भविष्य मनुष्य प्रजा के लिए ह्यूमन स्पीशीज के लिए बेटर हो। यह अभी तक आईडिया इतना क्लियर नहीं है। तो इस जो ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी वराह नगर मठ में अपने गुरु भाइयों के साथ में कुछ समय रहे। इसके बाद में उन्होंने भारत भ्रमण प्रारंभ किया। यह जो भारत भ्रमण है उसमें स्वामी जी को बहुत कुछ भारत के बारे में सीखने को मिला। दो चीज माने बहुत सारा में यदि सबसे इंपॉर्टेंट दो लेसन यदि देखे जाए तो सर्वप्रथम लेसन तो ऑब्वियस है जो कि भारत की सफर उस समय जो कोई भी करेगा उसको स्पष्ट रूप से दिखाई देगा कि कहां ऋषि मुनियों का यह देश आज किस तरह की एक तरह की आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक अध पतन में गिरा है इस देश का ऋषि मुनियों के इस देश का भगवान राम भगवान कृष्ण के श्री चरण जिस धरती पे जिन्होंने विचरण किया है जिन श्री चरणों ने उस देश की ऐसी अवस्था कैसे हुई वह अभी एक लंबा टॉपिक है किंतु और स्वामी जी के कुछ आइडियाज भी है जो कि हमने डिस्कस किए हैं। किंतु वह सब फिलहाल छोड़ दिया जाए तो एक तो बड़ा ही ऑब्वियस फैक्ट है कि भारत एक बर्बादी के एक गहन गड्ढे में गिरा हुआ है। तो वो तो एक ऑब्वियस फैक्ट स्वामी जी को दिखा। किंतु दूसरा एक फैक्ट जो कि बहुत कम लोगों को दिखता था। खास करके यह विदेशी संस्कृति से, विदेशी शिक्षण से, विदेशी आधुनिकता से जिनकी आंखें चकाचौंध हो गई थी। जिनकी आंखें जैसे कि अंधी हो गई थी। यह विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण की वजह से जैसे कि केशवसेन वगैरह तो वो चीज स्वामी जी को देखी। अभी ऑब्वियसली केशव सेन को ठाकुर केशव ठाकुर की पनाह में चला गया तो वह तो बच गया किंतु केशव जैसे और भी बहुत सारे थे उस समय में यंग एंड एनर्जेटिक लोग जिनको कि ठाकुर की शरण प्राप्त नहीं हुई और वे लोग ये विदेशी प्रोपेगेंडा में ही जिनका ब्रेन वाश हो गया कि यह यूरोपियन खास करके यह वेस्टर्न यूरोपियन कल्चर वेस्टर्न यूरोपियन पॉलिटिकल सिस्टम सिस्टम वेस्टर्न यूरोपियन सोशल सिस्टम उनका साइंस टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रियलाइजेशन मिलिट्री माइट यह जो कुछ भी है वो सर्वश्रेष्ठ है और हमारे ऋषि मुनियों ने हमारे अवतार ने हमारे संत सिद्ध पुरुषों ने हमें आज तक जो कुछ भी सिखाया उससे वह किसी काम का नहीं उन्होंने सिर्फ हमारी आंख में धूल झोंकने का ही काम किया है। हमको आज बर्बादी की इस कतार पे लाकर के खड़ा कर दिया है। तो वह जो वेस्टर्न प्रोपेगेंडास है जिन लोगों की आंखें चकाचौंध हो चुकी थी जो लोगों को ठाकुर के शरण प्राप्त होने का सद्भाग्य नहीं मिला था उन लोगों की बात छोड़ दें तो जो लोग ठाकुर के शरणागत हुए थे उसमें दो मुख्यत्व नाम है। एक तो है स्वामी विवेकानंद दूसरा है केशव सेन। देखिए दोनों एक तरह से वेस्टर्नाइज थे। दोनों वेस्टर्न विचार सरणी से प्रभावित थे। दोनों को अंग्रेजी इंग्लिश और इंग्लिश लिटरेचर इंग्लिश फिलॉसोफी ये वेस्टर्न हिस्ट्री वेस्टर्न रिलीजन का काफी अच्छे से ज्ञान था। स्वामी जी की वह फेमस स्मृति कथा है कि अमेरिका गए। एक छोटे से गांव में एक गर्ल्स कॉलेज था। वहां पर स्वामी जी को निमंत्रण दिया गया स्पीच देने के लिए। अभी वहां पे आसपास में जो चर्च वगैरह थे वहां के लोगों को लगा कि अरे यह एक विदेशी काला आदमी आकर के हमारी लड़कियों को इस तरह से उटपटांग पेगेनिज्म ये उटपटांग फिलॉसोफी सिखाता है। ऐसा कैसे चला लेंगे? जाकर के इसके साथ में आर्ग्यू डिबेट करते हैं। उसकी ये जो भीतर की ये जो खोखलापन है उसको एक्सपोज कर देंगे। ऐसा बोलकर के चर्च के कुछ लोग आए स्वामी जी के साथ में डिबेट करने के लिए। हाई थियोसोफिकल पॉइंट क्रिश्चियन थियोसोफिकल फिलॉसोफिकल वेस्टर्न फिलॉसोफिकल आइडियाज को लेके स्वामी जी के साथ में डिबेट करेंगे। उनकी यह जो धूर्तता है सबके सामने खुली कर देंगे कि लोगों का ब्रेन वाश करने के लिए आया है। उसके पास में एक सर्टेन मैग्नेटिक पर्सनालिटी है। एक तरह का एनिमल स्पिरिट जैसा है। इससे ज्यादा और कुछ नहीं। और इसी की वजह से लोगों को वह मूर्ख बनाता है। ऐसा एक आईडिया लेकर के यह लोग आए स्वामी जी को एक्सपोज करने के लिए और उसी कॉलेज की एक जो स्टूडेंट है उसने ये रेमिनेशंस लिखा है। बाद में शी जॉइ आवर वेदांत मूवमेंट बेलूर मठ की भी उसने विजिट की थी तो पिल्गिमेज किया था। तो वो लड़की लिखती है उस समय स्टूडेंट थी के जब ये चर्च वालों के साथ में ये फादर ना पादरी ना बिशप ना जो कोई भी हो जो कि क्रिश्चियन थियोलॉजी वेस्टर्न फिलॉसोफी के मास्टर थे। उनके साथ में कहां यह इंडिया से आया हुआ एक पेगेन ही तो वे लोग सोचते थे कि कहां इन लोगों के साथ में डिबेट करेगा। किंतु ये स्टूडेंट लिखती है कि विद एव्री पॉइंट ऑफ थियोलॉजिकल सर्टेलिटी स्वामी जी रिप्लाई विद इक्वल फोर्स। माने यदि बाइबल में से कोई कोट करना है। यदि ये लोग चर्च वाले कोट करते हैं तो स्वामी जी बाइबल में से ही उससे बेटर कोट उसी पॉइंट के ऊपर में वो इनको निकाल के दे देंगे। पूरा मेमोरी में से। सो यू सी स्वामी जी जब स्टूडेंट थे उस समय ये वेस्टर्न आइडियाज क्या थे बहुत बखूबी समझते थे किंतु बिकॉज़ कि ठाकुर की शरण में आए थे भारतीय आध्यात्मिकता क्या है? भारतीय दर्शनशास्त्र क्या है? भारतीय आर्थिक सामाजिक व्यवस्था कौन से फंडामेंटल प्रिंसिपल्स पे बनी थी? यह सब भी स्वामी जी समझे। देखिए बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि ठाकुर का स्पिरिचुअलिटी के अलावा कोई कंट्रीब्यूशन नहीं था सोशल या तो पॉलिटिकल फील्ड में और अप टू अ लार्ज एक्सटेंट यह बात सही भी है। किंतु देखिए बिकॉज़ कि स्वामी जी के पास में वो कैपेसिटी थी कि छोटे से छोटे पॉइंट को लेकर के भी उसको उसके भीतर की जो डेप्थ है उसको समझ लेना। यानी वो जो फेमस कहानी ठाकुर ने कहा तुम सेवा करने तुम ये करने वाले कौन हो लोगों की सहाय करने वाले तुमको तो शिव ज्ञान है उनकी पूजा करनी है जो दरिद्र है उनकी तो जैसे ही ठाकुर ने यह बात कही स्वामी जी ने ये पॉइंट जो था सिंगल पॉइंट इसके भीतर की डेप्थ को समझ लिया तो वैसे ही ठाकुर के साथ में एक बार कोई डिस्कशन हो रहा है जाति प्रथा के बारे में और यह जो रिफॉर्म सोसाइटी ब्रह्म समाज वगैरह की जाति प्रथा को उठा दो। यह सब भारतीय समाज को सिविलाइज करना है। हम लोग बारबेरिक हो गए वगैरह वगैरह जो बोलने वाले थे उस समय के। तो ठाकुर ने साथ-साथ में ही कहा देखो जाति प्रथा एक उपाय से उठ जा सकती है और वो है भक्ति। चैतन्य देव ने भक्ति के सहारे आ चंडाल को अपने गले से लगाया था। आलिंगन किया था। जिसके भीतर में भक्ति है वो चंडाल नहीं है और जिस वो चंडाल चंडाल नहीं है और जिसके भीतर में भक्ति नहीं है वो ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। तो ठाकुर का ये जो माने स्पार्क्स ऑफ ऑब्जरर्वेशन अदर देन स्पिरिचुअल टॉपिक एवरीथिंग इज स्पिरिचुअलिटी बट दोज़ ऑब्जरर्वेशंस और दोज़ आइडियाज व्हिच कैन अप्लाई टू लार्जर फ्रेमवर्क आल्सो कम्युनिटी स्केल और सिविलाइजेशनल स्केल। तो ये जो स्पार्क्स जो थे ठाकुर के वो स्वामी जी ने बखूबी पकड़ लिए थे। स्वामी जी को उसके भीतर का डेप्थ समझ में आता था। किंतु वो तो एक एजुकेशन हुआ कि फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग स्वामी जी की कि ये वेस्टर्न अंडरस्टैंडिंग वेस्टर्न वर्ल्ड है वेस्टर्न फिलॉसोफी है और वेस्टर्न वे ऑफ लाइफ है और ऑन दी अदर हैंड दिस इज़ अ ईस्टर्न वे ऑफ लाइफ इंडियन वे ऑफ लाइफ तो दोनों थ्योरेटिकली तो स्वामी जी को समझ में आ गए थे ठाकुर के साथ में रहते-रहते किंतु जब स्वामी जी ने ठाकुर की महासमाधि के बाद में पूरे पूरे भारत का भ्रमण किया। उस समय ही वाज एक्सपोज्ड टू रियल इंडिया। ये जो रो डाटा जिसको कहते हैं ना प्रोसेस डेटा और रो डाटा। प्रोसेस डेटा बहुत बार क्या होता है कि हम हमारी जो विश होती है उसके अनुसार उसको कहते हैं ना कि देयर आर लाइम लाइ एंड देन देयर आर स्टैटिस्टिक्स। माने एक तो झूठ है, एक तो सरासर झूठ है और तीसरा है स्टैटिस्टिक्स। स्टैटिस्टिक्स एक ऐसी चीज है कि बिलियंस एंड बिलियंस ऑफ डेटा पॉइंट है, रिकॉर्ड है। अभी उसमें से आप सेंस कैसे बनाएंगे? तो आप उस यदि आपके हाथ में वो ट्रिक है तो वो ट्रिक ऐसे यूज़ कीजिए कि जैसे आपको लगे कि ना यह जो डाटा है वह वही कह रहा है जो कि मैं सुनना चाहता हूं। तो देखिए कि इसी तरह से आप रो डाटा जो है जब तक उसको फेस नहीं करेंगे जब तक उसको आप समझने का डायरेक्ट कांटेक्ट में नहीं आएंगे तब तक आपका जो डेप्थ ऑफ अंडरस्टैंडिंग है इतना डीप में नहीं जाएगा। देखिए मैं अपना खुद का एग्जांपल से बताता हूं। स्वामी जी को अच्छे से पढ़ा था। मैंने एक समय था किंतु जब तक मैं रांची नहीं गया। जब तक मैं रांची जाकर के ट्राइबल विलेज में डे आफ्टर डे सुबह से लेकर के रात तक मैं उन लोगों के साथ में जब तक मैंने काम नहीं किया था तब तक यह आइडियाज आइडियाज के लेवल पे ही थे। मैं जब अपने घर में था तो हिस्ट्री है, सोशियोलॉजी है, यह फिलॉसोफी है। सब कुछ पढ़ना मैंने प्रारंभ कर लिया था। किंतु वो एक थ्योरिटिकल आइडियाज ही थे। जब मैं रांची गया एक रो ह्यूमैनिटी जिसको कहते हैं कि म रियल लाइफ ये रियल लाइफ के कांटेक्ट में जब तक हम नहीं आते हैं तब तक ना ये हिस्ट्री है या तो फिलॉसोफी है ये इट विल नॉट मेक सेंस टू अस स्टैटिस्टिक्स क्या है स्टैटिस्टिक्स कहता है कि भारत में 20% ना 30% लोग अभी गरीब है तो हम लोग सोचेंगे अच्छा बस इतने ही है किंतु यह 20 30% % इवन एक गरीब के साथ में आप एक दिन बिताइए। देखिए जो डिस्पेयर है उसके जीवन में दैट विल मेक दी स्टैटिस्टिक्स कम अलाइव। आप फैसला कर लेंगे कि अरे यदि एक गरीब के साथ में यह परिस्थिति है तो यह जो 20 30% ऑफ इंडियन पपुलेशन का क्या अर्थ हुआ? एटलीस्ट 30 टू 40 करोड़ पीपल यह लोग दिन प्रतिदिन किस तरह से इस परिस्थिति में जी सकते हैं? लेट मी डू एवरीथिंग इन माय पावर टू इंप्रूव देर लॉट रेदर देन के वो कोई बड़ा सा एक मेट्रो सिटी में रहते हैं। दिन रात ये एक म नौकर की तरह गुलाम की तरह नौकरी करते हैं। और फिर नजर के सामने एक ही गोल है कि कैसे अपना बैंक बैलेंस बढ़ाया जाए। कैसे करियर एडवांस की जाए। कैसे भी करके एक बेटर फैमिली लाइफ लीड किया जाए। तो वह एक रेड रेस के भीतर में हम फंस जाते हैं। वह हमारा पूरा प्राण हर लेता है। इसकी वजह जाइए गांव में जाइए रहिए कुछ दिन इन लोगों के साथ में डिसाइड टू गिव योर लाइफ ओवर फॉर द बेटरमेंट। तो क्या है कि ये जब तक हम एक रियल ह्यूमैनिटी के टच में नहीं आएंगे जब तक हम अपना फ्रेंड्स एंड फैमिली सर्कल में ही रहते रहेंगे और बहुत ज्यादा से ज्यादा किसी चैरिटेबल ऑर्गेनाइजेशन में चले गए किसी रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन के साथ में तब तक वी विल नॉट बी एबल टू अंडरस्टैंड व्हाट इज रियल सिविलाइजेशन तो ये जो स्वामी जी का थ्योरिटिकल अंडरस्टैंडिंग ऑलरेडी पक्का था सॉलिड फाउंडेशन पे था। बिकॉज़ कि ठाकुर के साथ में ठाकुर के ठाकुर जैसे टीचर मिलेंगे तो उनका एजुकेशन का तो कोई प्रश्न ही नहीं अधूरा रहने का। किंतु जब स्वामी जी भारत में भ्रमण किए तो दो चीज सबसे पहले तो भारत किस तरह से बर्बादी की कतार पर खड़ा था। वो एक दिखा किंतु साथ में ही देखिए कि भारत के भीतर में जो स्पिरिचुअल डेप्थ है एक के बाद एक संत महापुरुषों ने आकर के इस भूमि को अपनी पुण्य प्रभाव से तपस्या से अपनी साधना उपासना से सिंचा है और इवन जो आम आदमी है गरीब से गरीब भी है उसके भीतर में भी किस तरह से एक तरह का स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ उसके भीतर में है एक स्पिरिचुअल ज्योति जो है आध्यात्मिक ज्योति उसके भीतर में झलमल कर रही है। तो यह भी स्वामी जी ने देखा। आज देखिए कि हम लोग आ यहां पे आने के बाद में ठाकुर महास्वामी जी को समझने के बाद में मुझे समझ में आया कि जो एजुकेशन मैंने स्कूल में लिया है वो किस हद से भारत के साथ में अन्याय है। हमको यह पता है कि एक के बाद एक कौन से मुगल राजा आए। हमको यह पता है कि अकबर ने कौन से धर्म की स्थापना की। हमको यह पता है कि उन्होंने क्या-क्या किया। क्या किस तरह के सब पगलापन किया किंतु हमको यह नहीं पता कि भारत में एक के बाद एक संत महापुरुषों का आगमन हुआ। उन्होंने एक के बाद एक आध्यात्मिक पंथ जो है संप्रदाय है इंस्टीटशंस है उसकी स्थापना की। एक महान लिटरेचर आध्यात्मिक लिटरेचर फिलॉसोफिकल लिटरेचर जो उन्होंने प्रोड्यूस किया। शंकराचार्य और यह जो वेदांत जो संप्रदाय या तो वेदांत पथ है जिसमें इतनी सुंदर-सुंदर किताबें लिखी गई है उसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं था। यह वैष्णव संप्रदाय है। वैष्णव संप्रदाय की शाखा प्रशाखाएं हैं। उनके जो भजन है उनका जो संगीत है, उसमें जो डेप्थ है, भाव की जो डेप्थ है, उसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता था। फिर यह जो शक्ति साधना है उसका कितना पुराना इतिहास है। जितने पुराने वेद है उतनी ही पुरानी भारत में शक्ति साधना है। और इस शक्ति साधना को एक कुछ तांत्रिक व्यभिचार के साथ में जोड़कर के हम लोग उसको एक निम्न दृष्टि से देखते थे। लिटरली मैंने जब पहली बार मुझे पता चला कि ठाकुर ने शक्ति साधना की है उस समय मैं सही में क्या कहूं डिस्टर्ब हो गया था। मैंने कहा कि इन इन लोगों का स्वामी जी का ठाकुर का अभी अभी तक तो सब ठीक-ठीक सुन रहा था। ये एकाएक इस तरह का व्यभचार में ठाकुर क्यों चले गए? मुझे लिटरली कुछ समय लगा कि ये तंत्र साधना या तो फिर बेटर वर्ड है शक्ति साधना उसका सही तात्पर्य क्या है और ठाकुर ने जो किया उसके कितने गंभीर गहन अर्थ है तो क्या है कि एक पूरा ब्रेन वाश होकर के वेस्टर्न सिस्टम से मैं यहां पर आया था। स्वामी जी का भी हालांकि वह वेस्टर्न सिस्टम से प्रभावित थे। इनका सबसे बड़ा ग्रेट गुड फॉर्च्यून था कि ठाकुर का साक्षात उनको शिष्यत्व करने का एक सद्भाग्य हुआ था। मेरे लिए तो किताब पढ़कर के ही समझना है। संघ में आकर के बाकी साधुओं से जो सीखा सुना उसी और उन लोगों का लाइफस्ट देख के ही तो मुझे देख सीखना है। सो दैट इज वन डिसएडवांटेज फॉर अस कि हमारी जो मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम भारत के साथ में किस हद तक का अन्याय करती है। तो यह हो गया स्वामी जी का दूसरा एक उनके जीवन का इंपॉर्टेंट स्टेज। पहले तो ठाकुर के साथ में डिसाइपलशिप उसके बाद में यह भारत भ्रमण भारत को सही-सही समझना उसके
अमेरिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने कैसे खोले विवेकानंद के लिए द्वार
बाद में अमेरिका जाकर के अमेरिका को समझना। देखिए यहां पे एक दूसरा जो बहुत ही इंपॉर्टेंट पॉइंट कि ये जो भारत में एक तरह का जो कल्चरल रहने सा हो रहा है आज बहुत अच्छा है। पिछले 10-15 साल से हम यह देख रहे हैं और मेरा तो हार्ट एंडोर्समेंट है क्योंकि मैंने खुद ने यह तथाकथित सेकुलरिज्म से जो मेरे जो आंखें जो मेरी झुलसा गई थी अंध हो गई थी तो इन लोगों का है कि बचपन से ही भारतीय वैल्यू को प्राधान्य देते हैं सीखते हैं। किंतु जब स्वामी जी अमेरिका गए तो उन्होंने जो एक इंपॉर्टेंट लेसन ग्रहण किया कि जो इंडिविजुअल फ्रीडम जो है इंडिविजुअल इनिशिएटिव लेने की वहां पे वो जो एक एटमॉस्फियर एक लिबरल एटमॉस्फियर बनता है। स्त्रियों को जो फ्रीडम है वहां पे स्त्रियों को वहां पे जो एक तरह का क्या कहेंगे कि एंपावरमेंट है वो स्वामी जी भारत के साथ में कंट्रास्ट करते हैं तो स्वामी जी बड़े दुखित हो जाते हैं। एक ओर भारत में भारतीय वैल्यू किसी काम की नहीं बोलकर के माने भारत के साथ में कल्चरली दगा करने वाले लोगों की कमी नहीं यह भी स्वामी जी ने देखा ऑन दी अदर हैंड प्रत्येक सुपरस्टिशियन को प्रत्येक माने मनुष्य की आत्मा को यह कर देने वाले सफोकेट कर देने वाले यह जो अंधश्रद्धाएं हैं वह भी स्वामी जी ने देखी और फिर वहां से एक बहुत ही इंपॉर्टेंट लेसन स्वामी जी भारत लेके आए कि देखिए कि यह जो इंडिविजुअल फ्रीडम जो है इट इज एन एसेंशियल एस्पेक्ट ऑफ वेदांत। वेदांत सिर्फ यह नहीं कहता कि आत्मन का फ्रीडम यह साथ-साथ में इसका जो सोशल एप्लीकेशन यदि होगा वेदांत का तो एक तो सर्वविद एप्लीकेशन है शिव ज्ञान जीव सेवा किंतु वेदांत का और भी एक बहुत ही सल बहुत ही सूक्ष्म एक्सप्रेशन यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में एक एंपावरमेंट इनिशिएटिव फ्रीडम ऑफ थॉट फ्रीडम ऑफ ऑफ एक्शन उनके हाथ में होना चाहिए। यदि सोसाइटी बहुत ज्यादा लोगों की जो इंडिविजुअल एक्सप्रेशन है उसको सप्रेस कर देगी तो वो सोसाइटी फिर ज्यादा तक टिकेगी नहीं। स्वामी जी ने कहा है द हाईएस्ट सिविलाइजेशन इज द वन व्हिच इन व्हिच यू कैन अप्लाई द हाईएस्ट ट्रुथ। थोड़ा सा पैराफ्रेस कर रहा हूं। किंतु एग्जैक्ट ऐसा ही म उसका मीनिंग ऐसा ही है कि जो हाईएस्ट ट्रुथ है उसको आप जिस सोसाइटी में अप्लाई कर सकते हैं वर्क आउट कर सकते हैं प्रैक्टिकल कर सकते हैं वो हाईएस्ट सिविलाइजेशन है। तो एक ओर जो है यहां पे आत्मन का फ्रीडम आत्मन का जो माने अह ट्रांसेंडेंस ट्रांसेंडेंस बियन स्पीच बॉडी माइंड एंड स्पेस एंड टाइम यह जो आप प्रीच करते हैं कि आत्मन जो है मन वाणी वचन ये समय अवकाश कोजेशन कर्म का सिद्धांत सबसे परे है और फिर यह आत्मन जिसके भीतर में है उसी मनुष्य के स्पिरिट को आप कुचड़ देना चाहते हैं। तो यह कौन सी बात हो गई? और यह देखिए कि यह जो स्वामी जी का जो यह अंडरस्टैंडिंग था इनू द डेप्थ ऑफ वेस्टर्न सिविलाइजेशन उसका एक गोल्डन एग्जांपल है निवेदिता। निवेदिता देखिए कि उसका कितना एक रेबेलियस स्पिरिट था। ऑथॉरिटी को सिर्फ इसीलिए एक्सेप्ट नहीं करेगी कि बिकॉज़ के वो ऑथॉरिटी है वो अपनी जो बुद्धि है अपनी ये जो विचार क्षमता है उसके ऊपर में उस ऑथॉरिटी को नापेगी उसको मेजर करेगी यदि उसका खुद का एक मोरल कंपास है एक फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क है उसमें यदि वह ऑथॉरिटी फिट होता है तभी श्री वो उसको एक्सेप्ट करेगी तो वो जो फेमस डिस्कशन कि निवेदिता जिस तरह से स्वामी जी पे प्रश्नों की बारिश ये जो है माने अटैक वो किए जा रही है किए जा रही है तो फिर स्वामी जी के जो दूसरे अमेरिकन डिसाइपल है वे लोग थोड़े से नाराज हो गए उन्होंने स्वामी जी को कुछ कहा भी होगा कि इतने प्रश्न कर रही है तो स्वामी जी कहते हैं आई नो माय वे एवरी आई नो एव्री ईच ऑफ माय वे मैंने ये जो प्रश्न कर रही है उत्तर देने में मुझे कोई दिक्कत नहीं यह जो उत्तर देने का रास्ता है एव्री ईच ऑफ दिस पाथ आई नो। क्यों? क्योंकि मेरे खुद के गुरु को मैंने इसी तरह से प्रश्नों की बौछार से उनको परेशान किया था। यह देखिए ठाकुर के महासमाधि के दिनों की ही बात है। जबकि ऐसा निर्णय लिया गया कि भक्तों को ठाकुर के पास में नहीं आने दिया जाएगा। इवन रामचंद्र दत्त भी एक बार आए थे तो निरंजन महाराज का पता है ना वह पगड़ी पहन के लाठी ले वहां पर पहरेदार के रूप में खड़े रहते थे। तो इवन रामचंद्र को भी वहां पे ठाकुर के कमरे में नहीं जाने दिया था। इतना वो सक्ताई यह लोग त्यागी संतान है। कर रहे थे कि ठाकुर का आखिरी समय आ गया है। उनकी परिस्थिति तो देखिए झूठमठ का आप अपने संसार का यह सब ले आते उनके पास में सांसारिक माइंडसेट लेकर के और उनका मन है अभी ब्रह्मलोक में विचरण कर रहा है। सो त्यागी संतान भी अपनी जगह ठीक है और गृहस्थ भी कि चलो ठाकुर के आखिरी दिन है तो जितना सत्संग हो सके। तो यह जो डिस्कशन चल रहा था तो वो एक पागली उस समय आई आ रही थी ठाकुर को परेशान करती थी तो यही त्यागी संतानों में से किसी ने कहा कि हम उसकी बलि भी दे सकते हैं। जब राजा महाराज ने पागली के प्रति उस स्त्री के प्रति मधुर भाव उसका था। ठाकुर थोड़े से नाराज थे उस समय उससे तो राजा महाराज ने थोड़ा सा सहानुभूति जताने का प्रयास किया इस पागली के प्रति। तो किसी त्यागी संतान ने कहा कि हम उसको तो बलि भी दे सकते हैं। तुम्हारी बीवी है इसलिए तुम इसके ऊपर में इतने सहानुभूति रखते हो। तो यह जो सब डिस्कशन चल रहा था तो उस समय राजा महाराज ने कहा था देखिए हम लोगों में से कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है यहां पे। आप पागली है या बाकी गृहस्थ भक्तों को आप इस तरह से क्रिटिसाइज करते हैं। यह नरेंद्र फरेन को देखिए ठाकुर को किस तरह से वे लोग परेशान किए हैं। इस अर्थ में कि सब समय डाउट प्रकट करते रहना। सब समय प्रश्न करते रहना सब समय द्विध एक तरह के संदेह करना ठाकुर के ऊपर में योगानंद जी की तो फेमस कहानी संदेह की कि ठाकुर कहां रात को जाते हैं। सो देखिए कि कोई दूध के धुले हुए नहीं है। तो देखिए कि यह जो है एक इंडिविजुअल फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन, फ्रीडम ऑफ एक्शन, फ्रीडम ऑफ इनिशिएटिव यह बात स्वामी जी को इतना अच्छा लगा था वहां पे। ऐसा कोई देश नहीं है जो कि स्वामी जी को इतना खुले हृदय से आवकारता। स्वामी जी को इतना खुले हृदय से खुले हाथों से अपनाता जितना कि अमेरिका था। इवन ब्रिटेन भी, यूरोप भी, फ्रांस भी, रशिया भी, चाइना भी, जापान जितने भी कंट्रीज आप उस समय के महासत्ताएं थी। टर्की भी उस समय का सुपर पावर था। तो ये टर्की, रशिया, फ्रांस, जर्मनी, जापान, फिर ये ब्रिटेन कोई भी देश नहीं था उस जगत उस समय का जो कि स्वामी जी को इतना होल हार्टेडली अपना लेता जितना कि अमेरिका ने किया था। और यह जो ए जो फ्रीडम था इन द एयर ऑफ अमेरिका। स्वामी जी कहते हैं ये आइरिश जो इमीग्रेंट्स है वो यहां पर जब पहली बार आते हैं तो पीठ झुकी हुई है। आंखें बेचारों की एक तरह के डिस्पेयर से भरी हुई है। उनके चेहरे पे एक तरह की उदासीनता मायूसी दिखाई देती है। किंतु कुछ दिन अमेरिका में बिताइए। कमर सीधी हो जाती है। आवाज खुल जाता है। सेल्फ कॉन्फिडेंस फिर वापस आ जाता है। सो, दिस लिबरलिज्म, दैट सेल्फ़ कॉन्फिडेंस, दैट इंडिविजुअल की वैल्यू जो है, वह एक अमेरिका में उन्होंने देखी। और जब भारत वापस आए स्वामी जी और यह जो भारत में यह जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा जिस सीरीज का पार्ट है वो जो भारत में जो उन्होंने प्रवचन देने का प्रारंभ किया उसमें उन्होंने यह दोनों बातों को जैसे कि एक के साथ एक दूसरे के साथ में इंटरवोवन कर दिया है। आज आप लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा पढ़ेंगे जैसे कि मैंने पढ़ा था बहुत साल पहले तो मुझे जो एक सबसे ज्यादा पावरफुल आईडिया लगा था ये शिव ज्ञान जीव सेवा कि देखिए कि भारत की आध्यात्मिकता है। भारत का धर्म है। उस धर्म के आधार पर लोगों की सेवा करनी है। उस समय मैं यह सब सोचता था कि लोगों की सेवा करनी है। किंतु मेरे माइंड में बैठा क्या था कि यदि लोक कल्याण ही करना है तो एकमात्र उपाय है पॉलिटिक्स में जाने का। नहीं तो पॉलिटिक्स में जाना है किंतु मेरा पर्सनालिटी क्या पॉलिटिक्स को अनुकूल होगा कि नहीं वगैरह-वगैरह ये जो मेरे मन में जो चल रहा था युद्ध जैसा एकाएक जब स्वामी जी को पढ़ा सब जो कि प्रॉब्लम थे अदृश्य हो गए। क्योंकि पहले तो मैंने गांधी जी को पढ़ा था। गांधी जी ने कहा कि नवयुवकों को गांव में जाना है। गांव में जाकर सेवा करनी है। तो यह तो कांसेप्ट क्लियर है। किंतु देखिए कि गांधी जी खुद तो पॉलिटिक्स में थे। गांधी जी खुद तो कांग्रेस में थे। तो मैं गांव में जाऊं। गांव में सेवा करूं किंतु मैं अकेले-अकेले यह सब कर पाऊंगा कि नहीं कि मुझे एक पॉलिटिकल पार्टी जॉइ करनी ही पड़ेगी। वगैरह-वगैरह जो मेरे मन में चल रहा था। स्वामी जी के एक ही अटैक से एक ही माने बॉम्ब शेल जैसे जो यह सेंटेंस थे लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में कि धर्म है भारत का प्राण भारत में यदि जो कुछ भी करना है सक्सेसफुल होना है तो धर्म के आधार पर ही सक्सेस मिलेगी और किसी आधार पर नहीं तो यह कॉन्सेप्ट मेरा क्लियर हो गया किंतु देखिए कि विदिन दिस कांसेप्ट ये जो सूक्ष्म ये जो सब थ्रेड्स जो बुने हुए हैं। विद इन दिस स्वामी जीसस लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोडा। उसमें यह एक थ्रेड बड़ा ही इंपॉर्टेंट है कि यह इंडिविजुअल फ्रीडम देखिए स्वामी जी अमेरिका में जब जाते हैं तो वो इंडिविजुअलिटी के ऊपर में बहुत सारे डिस्परेजिंग स्टेटमेंट देते हैं। लोग कहेंगे कि स्वामी जी खुद कहते हैं लोग मेरे पास आकर कहते हैं मेरी इंडिविजुअलिटी का क्या होगा? इफ आई मर्ज मायसेल्फ इनू ब्रह्मा। तो स्वामी जी कहते हैं सोच के देखो तुम्हारी इंडिविजुअलिटी कहां पे है? वो सच सच बताए तो है भी नहीं किंतु साथ में ही स्वामी जी यह भी समझते हैं कि यह जो अपेरेंट इंडिविजुअलिटी जिसको कि ये अमेरिकन लोग इतना प्रज़ करते हैं इसी इंडिविजुअलिटी की वजह से ही उनको इतना वेलकम मिला है। वरना अमेरिका में देखिए बहुत बार ऐसा होगा कि कोई चर्च वाला जाकर के स्वामी जी के जो होस्ट है स्वामी जी के फ्रेंड है जिनके घर में स्वामी जी ऐसे गेस्ट रहते हैं। वह चर्च वाला जाकर के उनको मिशनरी है ना कि ऐसा कोई जाकर कहेगा कि इंडिया से आए हुए काले आदमी को अपने घर में क्यों रखा है? आपके घर में लेडीज वगैरह है उनके साथ में कुछ ना कुछ भ्रष्टाचार करेगा। भगा दीजिए आप उसको। तो वहां के लोगों में जो इंडिविजुअल स्पिरिट था ना इतना स्ट्रांग था। ये चर्च वाले कहते हैं कि इसको निकालना है तो तो और जोर करके इसको रखेंगे स्वामी जी को। पहले उनको लंबा रखने की इच्छा नहीं थी लंबे समय के लिए। किंतु बिकॉज़ के चर्च वाले उनको अपोज कर रहे हैं। अभी तो स्वामी जी को लंबे टाइम तक रखेंगे अपने घर में। यानी कि ये जो रेबेल स्ट्रिक्ट था अमेरिकन के भीतर में कि अथॉरिटीज के सामने खड़ा रहना। ऑथॉरिटीज का यह जो है कि अत्याचार ना कि उनका यह जो डिक्टेट या तो फिर उनका यह जो ऑर्डर उसको नहीं मानना इग्नोर करना। मेरा जो मन कहता है वो मैं करूंगा। और सिर्फ यह नहीं कि आप इस तरह से बिहेव करते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] वहां की सिस्टम आपको अलाउ करती है। वहां का क्स्टिट्यूशन वहां का पॉलिटिकल सोशल फैब्रिक आपको अलाउ करता है टू बी अ रेबेल अगेंस्ट दी अथॉरिटी। अथॉरिटी के सामने आवाज उठाना, उनके जो अन्याय है उसके बारे में विरोध प्रदर्शन करना यह सब वहां की सिस्टम अलाउ करती है। थ्योरेटिकली देखेंगे कि डेमोक्रेसी में हर जगह पे आपको यह फ्रीडम ऑफ स्पीच है। किंतु इन प्रैक्टिस देखेंगे मुश्किल से 10% डेमोक्रेसीज तथाकथित जितनी भी डेमोक्रेसी है जगत में उसमें से मुश्किल से 10% डेमोक्रेसी होगी कि जहां पे आपके पास में रियल फ्रीडम ऑफ स्पीच है। बाकी जगह पर डेमोक्रेसी में भी आप रहते हैं और अपना ओपिनियन प्रकट करने को जाते हैं तो सीधा ऑथॉरिटीज वाले कोई ना कोई झूठ-मूठ के केस में आपको फंसा लेंगे, हेरेस करेंगे लीगली इललीगली सब तरह से। तो ये जो जहां पर फ्रीडम ऑफ वॉइस है, फ्रीडम ऑफ स्पीच है, फ्रीडम ऑफ एक्शन है, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन है, वहां पे ही तो ये वेदांत पनप सकता है। सबसे ज्यादा वेदांत आज जिस जो चीज हम नहीं समझ पाते हैं या तो फिर जो एक अंडरस्टडीड है, स्वामी जी का जो फर्स्ट विजिट ईस्ट कोस्ट के ऊपर में था, तो उसके बारे में काफी कुछ हमको पता है। किंतु यह वेस्ट कोस्ट के ऊपर में स्वामी जी का विजिट स्पेसिफिकली कैलिफोर्निया में इट वाज़ इवन मोर मोन्यूमेंटल। जैसे मुझे ऐसा लग रहा है फर्स्ट विजिट में न्यूयॉर्क वगैरह एरिया में बोस्टन न्यूयॉर्क ईस्ट कोस्ट के ऊपर में स्वामी जी ने जो कार्य किया इससे भी ज्यादाेंस सेकंड विजिट में यह वेस्ट कोस्ट के ऊपर में कैलिफोर्निया वगैरह कैलिफोर्निया में उन्होंने जो कार्य किया इससे इसका सबसे ज्यादाेंस है और यहां पे देखिए कैलिफोर्निया इज वन स्टेट कि जहां पे यह फ्रीडम जो है सबसे ज्यादा है इवन अमेरिका में इवन आज भी आप देखेंगे कि जहां पे सबसे ज्यादा फ्रीडम एक ऐसा कौन सा जगह है वहां पे फ्रीडम हवा में सबसे ज्यादा तैरता है तो वो कैलिफोर्निया है। अभी मैं आजकल की बात नहीं कर रहा। वो ट्रंप के आने से सब उल्टापुल्टा हो गया है। और उससे पहले भी यह जो पगलापन चला था यह जेंडर आईडियोलॉजी वगैरह का। सो अमेरिका के बारे में भी आज के अमेरिका के बारे में कुछ भी बोलना मुश्किल है। किंतु मैं स्वामी जी के अमेरिका की बात कर रहा। स्वामी जी के समय के अमेरिका की बात कर रहा हूं। किंतु यहां मेन और जो हम पॉइंट जहां पे मैं जाना चाहता हूं। स्वामी जी ने देखा कि जहां पे स्पिरिचुअल फ्रीडम आपको अप्लाई होना है वो जगह पे आपको मेंटल फ्रीडम भी चाहिए। ए फ्रीडम ऑफ थिंकिंग एंड एक्टिंग भी चाहिए। और यह आइडियाज लेकर के स्वामी जी इंडिया आए। वेरी सरप्राइजिंगली।
individual freedom vs dictatorship व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम तानाशाही
जो चीज मैं अभी तक ठीक-ठीक से नहीं समझ पाया। स्वामी जी ने जब रामकृष्ण संघ की रचना की तो उन्होंने कहा कि डिक्टेटरशिप यहां पर आवश्यक है। बिना डिक्टेटरशिप के भारत में कोई भी कार्य करना मुश्किल है। क्योंकि गुलाम होने की वजह से ईर्ष्या हमारे मन का एक बहुत ही एक कहेंगे कोर कॉमोनेंट हो गया है। ईर्ष्या हमारे भीतर में इतना स्ट्रांग है कि जिसके भीतर में टैलेंट है उस टैलेंट को हम रिकॉग्नाइज किए बिना या तो फिर यदि हमको पता चलता है इसके भीतर में टैलेंट है तो हम सब लोग मिलकर के उसके साथ में अहित करने का उसका अकल्याण करने का प्रयास करेंगे। यदि भारत में टैलेंट को ऊपर आना है तो एक ही उपाय है कि एक स्ट्रांग डिक्टेटरशिप एस्टैब्लिश की जाए। यह डिक्टेटर ठीक करेगा किसके भीतर में टैलेंट है और किसको प्रमोट करना है। तो यह आईडिया को लेकर के स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ की स्थापना की। अभी देखिए थ्योरेटिकली स्पीकिंग आईडिया तो हमको बड़ा अच्छा लगता है कि अमेरिका में देखिए कि ईर्ष्या नहीं है। स्वामी जी ने खुद ने यह ब्रिटेन के बारे में कहा था कि वे लोग जब डिबेट करेंगे, प्लान करेंगे, सभी लोग अपना-अपना आर्गुमेंट प्रस्तुत करेंगे। किंतु जब एक्शन लेने की बारी आई तो सब लोग अपना-अपना इंडिविजुअल ओपिनियन साइड पर रख के उनके जो लीडर जो है लीडर को फॉलो करने का प्रयास करेंगे। अमेरिका में भी देखिए कि यह लीडरशिप और टैलेंट को रिकॉग्नाइज करने की क्षमता वह काफी थी। अदरवाइज स्वामी जी जैसे एक गुलाम देश से आए हुए काले आदमी को अमेरिका में रेसिज्म कितना स्ट्रांग था। काले लोगों के प्रति गोरे लोगों का कितना द्वेष था। एक तरह से देखा जाए तो तो एक गुलाम देश से आए हुए एक ऑलमोस्ट श्याम वर्ण के एक पुरुष को इतना सपोर्ट करना वो जो अमेरिकन स्त्रियों के द्वारा वो कब संभव है? जबकि वे लोग टैलेंट को रिकॉग्नाइज करते हैं। टैलेंट को प्रमोट करते हैं। आउट ऑफ एडमिरेशन ये जेलसी अभी ऐसा नहीं है कि उन लोगों में जेलसी नहीं। ईर्ष्या, काम, क्रोध, द्वेष, घमंड ये सब तो यूनिवर्सल है। ऐसा कोई भी देश ऐसा क्लेम नहीं करेगा कि हम लोगों में वो नहीं है। किंतु क्या है कि ये दो तरह से है। मेरे भीतर में ईर्ष्या है वो इतनी स्ट्रांग है कि मैं अल्टीमेटली सब कुछ सेबोटेज करने को तैयार हो जाता हूं। जो अच्छा कार्य हो रहा है उसको सेबोटेज करने को तैयार हो जाता हूं। और दूसरा है कि मेरी मेरे भीतर में ईर्ष्या है। किंतु साथ में ही मैं यह भी रिकॉग्नाइज करता हूं कि जब अच्छा कार्य हो रहा है तो फॉर द टाइम बीइंग अपनी ईर्ष्या है, अपना घमंड है, अपना ईगो है उसको साइड पर रखा जाए और कोऑपरेट किया जाए। यदि कोपरेट नहीं करते हैं तो वहां से निकल जाया जाए। तो इतना एक कॉमन सेंस है मेरे में। तो स्वामी जी ने भारत में जो कुछ भी देखा कि एक तो बर्बादी की कतार पे आकर खड़े हैं। दूसरा देखा कि आध्यात्मिक डेप्थ अभी भी जनसाधारण के भीतर में है। और साथ में यह भी देखा कि ये जो बर्बादी की कतार पे आकर खड़े हैं उसके पीछे के जो कारण है उसमें यह द्वेष और ईर्ष्या बहुत बड़े कारण है। वरना सब कुछ विदेशियों के ऊपर में थोप देना कि भारत की ये अधोगति हुई क्योंकि यह लोग वहां से आए सेंट्रल एशिया से आकर के हम पर हमला किया। भारत की यह अधोगति हुई। वेस्टर्न यूरोप से ये लोग आए। भारत का जो इकोनॉमिक शोषण किया। भारत की यह बर्बादी हुई क्योंकि यह हमारे कुछ राजा थे। उन्होंने अपने देश का हित सोचने की वजह यह जो हमलावर थे उनके साथ में मिलकर के देश को दगा दिया। तो ये जो भ्रष्ट राजा है या तो यह विदेशी हमलावर है, विदेशी शोषणकर्ता है उनका तो दोष है ही है। किंतु बहुत बड़ा दोष भारत के भीतर में हमारी आपस में जो ईर्ष्या द्वेष जो है इसका है और इसको काटने के लिए स्वामी जी का जो प्लान था दो तरह से स्पिरिचुअलिटी को मैक्सिमाइज किया जाए और ईर्ष्या द्वेष को मिनिमाइज किया जाए। स्पिरिचुअलिटी को मैक्सिमाइज करके शिव्ञानी जीव सेवा का प्रवर्तन किया जाए। वेदांत का पुनः जागरण पुनः प्रचार किया जाए। दैट इज द पॉजिटिव पार्ट। और यह जो नेगेटिव अर्थात कि जो सप्रेसिव पार्ट है इसको बढ़ावा देना है। इसको सप्रेस करना है। तो बढ़ावा देना है आध्यात्मिकता को शिव ज्ञान जीव सेवा को। यह जो कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान जो चार योग है उसको प्रोपेगेट करना है। उसको नरिश नर्चर करना है। किंतु जिसको सप्रेस करना है वो है हमारा घमंड हमारा ईगो, हमारा द्वेष, हमारी ईर्ष्या। तो विद दिस ड्यूल एम स्वामी जी ने यह रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और रामकृष्ण मिशन के भीतर में डिक्टेटरशिप का उन्होंने प्रचार किया। देखिए आज हम में से कई लोग ऐसा मानते हैं कि इस तरह की डिक्टेटरशिप इतनी इफेक्टिव नहीं है। रशिया का उदाहरण, चाइना का उदाहरण हमारे सामने है। डिक्टेटरशिप काम करती है तो बहुत अच्छा काम करती है और नहीं करती है तो पूरे देश को बर्बाद कर देती है। हिटलर ने जो किया जर्मनी को ग्रेट भी बनाया। से फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद में जर्मनी जो संपूर्ण रूप से बर्बाद हो गया था उससे निकाल करके उसको इंडस्ट्रियल पावर हाउस किया ऑन वन हैंड दूसरे हैंड ऑन द अदर हैंड कि इसी जर्मनी को सेकंड वर्ल्ड वॉर में झोंक दिया जिससे कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के अंत में जर्मनी की जो बर्बादी थी वो फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के अंत से भी 10 गुना ज्यादा थी। तो डिक्टेटरशिप काम जितना करती है उतना ही डिस्ट्रक्शन भी लाती है। उतना ही सेबोटेज भी लाती है। सो इफेक्टिव डिक्टेटरशिप इज अ एक ऐसा एक ड्रीम है जो कि फिलॉसोफर है। पंडित लोग हैं। ये जो थिंकर्स है वे लोग पर्स्यू करते हैं कि राम राज्य होना चाहिए। राम के पास में प्रभु राम के पास में सर्वसत्ता है। वह जो चाहे वह कर सकते हैं। तो यह राम राज्य यदि आएगा तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। वही मां सीता की फेमस कहानी कि मां कहती है भगवान राम को कि देखिए आपके पास में इतना धन है सब में आप धन बांट दीजिए। आपके भंडार में रख के क्या लाभ है? अपने राज्य में लोगों को इतना मेहनत करना पड़ता है। तो भगवान राम कहते हैं देखिए जिसका जो कर्म का प्रवाह है उसके अनुसार होगा। मैं यदि धन भी दे दूंगा तो कर्म का प्रवाह उनको उसका भोग ठीक से नहीं करने देगा। तो मां सीता किंतु छोड़ती नहीं। तो फिर क्या करें? भगवान राम ने कहा चलो खजाना खोल दो जिसको जो चाहिए दे दो। सब तो बड़े खुश हो गए। किंतु पैसा आ गया है तो फिर अभी काम कौन करेगा? सब लोग काम में चोरी का मतलब काम चोरी सीख गए। अभी वहां महल में छत में वह दरार हुई है। पानी भीतर में प्रवेश कर जा रहा है। मां सीता ने कहा वो जो कड़िया काम करने वाले हैं प्लंबर है उनको बुलाओ। जो सैनिक लोग गए बुलाने के लिए तो सब ने मना कर दिया। अभी क्यों काम करेंगे? पैसा है। जिसके पास में पैसा थोड़ी ना काम करने को जाएगा। तो फिर मां सीता नाराज हो गई। कहा अभी कहा अभी वो दरवाजा बंद कर दो। भंडार ग्रोह का खजाने का जो पहले जैसा था वैसा ही हो जाने दो। तो क्या है भगवान राम एक थे। हालांकि उनके पास में सर्वसत्ता भी थी। एट द सेम टाइम करुणा भी थी और किस तरह से राज्य शासन चलाना है उसकी एक बहुत ही इन डेप्थ अंडरस्टैंडिंग थी। किंतु एक भगवान राम आए। उसके बाद में कितने ही इस तरह के राजा आए जिन्होंने कि भोग विलास में डूब कर के यह नृत्य कीर्तन ये नर्तकियों के पीछे में अपनी सब संपत्ति उन्होंने गवा दी और जब आक्रमण प्रारंभ हुए तो उसके सामने अपनी रक्षा नहीं कर पाए। सो देखिए कि एक परफेक्ट डिक्टेटरशिप इज अ ड्रीम ऑफ अ फिलॉसोफर। यह फिलॉसोफर यही सोचेगा डेमोक्रेसी इज़ अ वेरी मैसी अफेयर। 10 लोग मिलकर के डिसाइड करेंगे। 10ों लोग अपना 10 तरह का एजेंडा एस्टैब्लिश करने का प्रयास करेंगे। उससे बेटर है कि एक डिक्टेटरशिप ले ली जाए। वो डिक्टेटर जो है वो जो कहेगा वो सब ठीक चलेगा। अभी देखिए डिक्टेटरशिप अब चाइना का ही उदाहरण पहले जब डिक्टेटरशिप प्रारंभ हुई शुरू-शुर में जबकि ये कम्युनिस्ट रेिवोल्यूशन आया उन्होंने बहुत ही अच्छा कार्य किया कि चाइना जैसे कि ये सेकंड वर्ल्ड वॉर के समय में जिस तरह से बर्बादी की कतार पर खड़ा था उससे तो चाइना को बाहर निकाला किंतु फिर यही जो माओजेदोंग था उसका पगलापन इस तरह से बढ़ने लगा कि यह ग्रेटली फॉरवर्ड ये कल्चरल रेवोल्यूशन ्यूशन यह सब इस तरह के पागल जैसे प्रोजेक्ट चलाए कि करोड़ोंकरोड़ों चाइनीस उनके देशवासी ही उसमें की मर गए। उनकी हत्या हो गई। तो देखिए कि यही डिक्टेटरशिप काम करेगी तो इतना अच्छा करेगी। नहीं करेगी तो यह करोड़ों लोगों को अपने ही बांधवों को मार देगी। देश बांधवों को। फिर से यदि देंशियाओपिंग के बाद में डिक्टेटरशिप ने काम करना शुरू किया तो यही चाइना आज देखिए इकोनॉमिक मिरेकल उसने वो लाया है। अभी फिर से पिछले 10 साल से ना कि 5 साल से हम देख रहे हैं कि जो एक सॉफ्ट इमेज था चाइना का तो एक हार्ड इमेज में बदल गया है। अमेरिका का ही देखिए अभी जो करंट गवर्नमेंट है उसके पास में इस तरह का पावर है। जितने भी ब्रांचेस ऑफ गवर्नमेंट है सभी ब्रांचेस में उसका मेजॉरिटी है। तो अभी वो ऑलमोस्ट डिक्टेटर की तरह वर्तन करता है। और फिर परिणाम यह है कि उसने अमेरिका के साथ में हम तो पढ़ ही रहे हैं न्यूज़पेपर में। नो नीड टू इबोरेट अपॉन इट। तो देखिए कि डिक्टेटरशिप काम करेगा तो बहुत अच्छा करेगा। नहीं करेगा तो महा भयानक बर्बादी की कतार पे लेके आ जाएगा। मैं एक बार सोचता था एक समय कि स्वामी जी ने भले ही चाहे डिक्टेटरशिप का प्रारंभ किया एक एक्सपायरी डेट दे देना था कि हां भारत में 100 साल तक ईर्ष्या द्वेष बड़ा स्ट्रांग रहेगा तब तक यह डिक्टेटरशिप चलेगा उसके बाद में शायद हो सकता है कि भारत में यह जो हमारी नेगेटिव ट्रेट है गुलाम प्रजा की यह जो नेगेटिव जो सब हमने सीख लिया है वह चला जाएगा आध्यात्मिकता विल ट्रायमफ और हम यह जो टैलेंट है उसको रिकॉग्नाइज करेंगे उसके प्रति एडमिरेशन रखेंगे नहीं कि ईर्ष्या रखेंगे तो विद इन 100 ईयर 200 ईयर ऐसा होगा उसके बाद में यदि डिक्टेटरशिप जाए तो अच्छा है किंतु ऐसा तो मैंने कहीं पढ़ा नहीं स्वामी जी के राइटिंग्स में या स्पीचेस में तो माने इट गिव्स अ वेरी डिप्रेसिंग थॉट कि क्या स्वामी जी यही जा सोचते थे कि उनका मिशन 1500 साल चलेगा तो यह 1500 साल तक हमारे भीतर में यह जो गुलाम लक्षण है गुलाम प्रजा के जो लक्षण है वो इतने ही चलते रहेंगे अप टू एन एंड हमारे यहां पे डिक्टेटरशिप ही बना रहेगा दिस इज़ वन कंक्लूजन हु नोस कि कल क्या होगा किंतु देखिए कि दीज़ आर द सम ऑफ दी डीपर आइडियाज अह हिडन विद इन दी स्वामी विवेकानंदास मैसेज टू इंडिया एक और है गहन आध्यात्मिकता। इस तरह की आध्यात्मिकता जो कि श्री रामकृष्ण को प्रोड्यूस कर सकती है। दूसरी ओर है कि इस तरह का महा भयानक गुलाम मानस कि जो कि भारत के जो इवन आज भी देखिए आप कि जो एक तरह का मिडिल क्लास मेंटालिटी है। मेरा खुद का हो गया तो फिर मुझे और किसी की फिक्र करने की जरूरत नहीं है। यह गवर्नमेंट के प्रोजेक्ट चलते हैं। उसी की वजह से गरीब लोगों का कल्याण होगा। मेरा खुद का कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं। एक तरह का इंसुलर माइंडसेट, एक तरह का हार्टलेस माइंडसेट वो भी आज हर जगह पे आपको प्रिवेलेंट देखने को मिलेगा। गाड़ी ले जाएंगे रास्ते में फुटपाथ पे यह जो गरीब बच्चे खेल रहे हैं उसके सामने देखेंगे भी नहीं और देखेंगे तो मन में से गाली ही देंगे कि गवर्नमेंट इस तरह के भिखारियों को अलऊ क्यों करती है तो देखिए कि और यदि बहुत सिंपैथी आ जाएगी तो गाड़ी का दरवाजा खोल के ₹15 इनको दे देंगे। दैट इज द लिमिट ऑफ आवर सिंपैथी। तो दिस ये जो गुलाम प्रजा की मेंटालिटी है कि मेरे ही देश बांधव हैं। इनको इस अवस्था में देखकर के मैं अपना करियर पर्सू कर रहा हूं। किस तरह का यह बात हो गया? व्हाट डस इट से अबाउट मी? तो दीज़ आर दी अंडर करंट्स ऑफ स्वामी विवेकानंदास मैसेज फॉर इंडिया। तो यह है स्लाइड शो। अभी हम कुछ तो स्लाइड्स देखे हैं। बाकी का अभी इस सप्ताह में हम देखेंगे कल से। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: लोकतंत्र और तानाशाही के बीच कोई आदर्श balance नहीं है। कभी लोकतंत्र अच्छा लगता है, कभी बुरा—और यही बात तानाशाही पर भी लागू होती है। तो सबसे बेहतर व्यवस्था कौन-सी है?
यहां पर मैं दो लेवल पर माने दो एस्पेक्ट में इसको डिस्कस कर सकते हैं। फर्स्ट ऑफ ऑल तो हम कहते हैं कि पुराने जमाने में प्रिंस और किंग्स ही हुआ करते थे। सो दिस इज़ ट्रू। किंतु इंडिया में ना फ्यूुडलिज्म नहीं था। देखिए कि यूरोप में जिस तरह से फ्यूडलिज्म था कि एक राजा है राजा के अंडर में जमींदार है और जमींदार जो है वो किसानों को और यह जो बाकी सबको गुलाम की तरह ही ट्रीट करते थे। भारत में इस तरह से फुडलिज्म नहीं था। राजा है किंतु राजा के अंडर में पंचायत है और यह पंचायत जो है माने यह लोकल गवर्नमेंट वहां पे टू ए लार्ज एक्सटेंट फ्रीडम हुआ करता था। सो दैट इज वन थिंग कि अपना ये जो इफ कोर्ट अनकोट डिक्टेटरशिप हम शब्द दे भगवान राम को ना कि बाकी सबको वो लोकल लेवल पे नहीं था। सेंट्रल लेवल पे था जो कि विच इज़ ओके। सेंट्रल लेवल पे आपको आर्मी वगैरह को चलाना है तो मींस ऑफ कम्युनिकेशन तो था नहीं ना आज की तरह कि फटाफट डेमोक्रेटिक लीडर्स डिसीजन ले पाए। उस समय सेंट्रल लेवल पर डिक्टेटरशिप की आवश्यकता थी क्योंकि कम्युनिकेशन स्पीड इतना अच्छा नहीं था। सो दैट इज़ वन वे कि इंडिया में एक तरह से ऑप्टिमाइजेशन था। सेंट्रल लेवल पे आप कहेंगे राज्य राजाशाही और फिर लोकल लेवल पे डेमोक्रेसी। यह जो ब्रिटिश लोगों ने आकर के भारत में जमींदारी प्रथा जो स्टार्ट की उसने जो भारत को तोड़ दिया इतना तो इवन मुगल लोग भी नहीं तोड़ पाए। इतना माने भयानक जो भारत के साथ में जो दुराचार और किसी ने नहीं किया जो कि ये फ्यूुडलिज्म के आने से भारत में हुआ है। सो दैट इज़ वन एस्पेक्ट। सेकंड जो आप कहते हैं वह आई एग्री विथ यू कि यह जो बैक एंड फोर्थ बिटवीन यह जो लिबरलिज्म एंड कंजर्वेटिविज्म है यह क्यों होता है पता है? इसको कहते हैं आउटरीच ओवर रीच। ये जो लिबरलिज्म अमेरिका में परफेक्ट चल रहा था। किंतु ये जो ये जेंडर आईडियोलॉजी एक ऐसा ओवर रीच है कि जिस क्षण एक पुरुष स्त्री के कपड़े पहनेगा उसी क्षण स्त्रियों के लिए जो एक सेफ स्पेस बनाई गई है इतना संघर्ष करके वहां पे उसको सीधा एडमिशन मिल जाएगा। यह इस तरह का स्टूपिड आईडिया है कि दिस इज़ एन ओवर रीच ऑफ लिबरलिज्म। इसके बाद में आप लिबरल जो कुछ भी बोलेंगे ना उनका कोई ऑथॉरिटी ही नहीं रहेगा। उसके बाद में ये जो कंजर्वेटिव जितने भी पागल है वो जितना ही पागलपन चला है वो सब अभी सहन कर लेंगे क्योंकि वो एक जो ओवर रीच हो गया दैट वास टू एक्सट्रीम। इंडिया में देखिए अपीज़मेंट का ओवर रीच हुआ। तो ऐसा एक ओवर रीच हुआ कि वो टेररिस्ट मर गया तो सोनिया गांधी रोने लगी। अरे भाई यहां पर लाखों हिंदू मर जा रहा है। कश्मीर में वगैरह पे उसका आपको कोई गम नहीं। एक पगले को मार दिया तो आपको रोना आ गया। सो दैट वाज़ अ लिबरल ओवररीच कि फिर ये कंजर्वेटिव ज्वार आया। एक समय क्या होगा कि कंजर्वेटिव ओवर रीच होगा। फिर ये म इस हद तक अभी आज ही मैं पढ़ रहा था कि ये जो पार्क में जाकर के लोगों का आईडी कार्ड मांगते हैं कि दो पुरुष और स्त्री साथ में बैठे हैं। आईडी कार्ड दिखाइए। कौन सी जात के कौन से धर्म के हैं। बट दीज़ आर ओवर रीच। अभी इस ओवर रीच की वजह से क्या होगा कि कंजर्वेटिव के जो अच्छे-अच्छे जो कार्य है वो सब जैसे कि मिट्टी में मिल जाएंगे। सो दिस ओवर रीच लिबरल आप देखिए कि लिबरलिज्म अमेरिका के लिए कितना काम किया है। अमेरिका एक समय था आज से 15 20 साल पहले ही कि यूरोप और अमेरिका का इकोनमी इक्वल था। आज अमेरिका का इकॉनमी यूरोप के इकॉनमी से तीन साइज का है। सो इतना वंडरफुल काम किया है। किंतु एक पागलपन जो उन्होंने चलाया। सो उनका पूरा मोरल अथॉरिटी खत्म हो गया। इंडिया में भी आप देखिए कि ये बीजेपी तो लिबरलिज्म के अगेंस्ट में ही था। ये जो नरसिम्हा राव और ये जो था मनमोहन उन्होंने ये लिबरलिज्म लाया। माने इकोनॉमिक लिबरलिज्म। उसके बाद में तो इंडिया का उन्नति हुआ। वरना तो वो लाइसेंस राज ने तो इंडिया को 50 साल से खत्म करके रखा था। बीजेपी का इच्छा ही नहीं था कि इस तरह से हो। ये लोग लेके आए हैं। किंतु फिर वो जो वही अपीज़मेंट वाला ओवर रीच जो कि आज उनको संपूर्ण रूप से मोरल अथॉरिटी उनका खत्म करके रखा है। कंजर्वेटिज्म में भी ऐसा ही होगा। हम अमेरिका में देखिए वो मिनेसोटा में गए हैं जो चाहे वो लोगों को मारते हैं। तो ये कंजर्वेटिव ओवर रीच हो गया। अभी इसका बैकलेश आएगा। इंडिया में भी ये कुछ-कुछ जो पगलापन चालू किया है। दैट विल मोदी लॉस्ट मेजॉरिटी। सी म वो ऑलरेडी एक ओवर रीच हो गया है कंजर्वेटिविज्म का। सो एक ओवर रीच इज़ द वन थिंग कि आपको हमेशा बी केयरफुल अबाउट इट कि आपका जो [गला साफ़ करने की आवाज़] बेनिफिट है वो बेनिफिट एक मिस्टेक की वजह से सब कुछ ना खत्म कर दे। मोदी ने इतना अच्छा 10 साल में काम किया। कुछ-कुछ ओवर रीच की वजह से वो कंस्टिट्यूशन कंस्टिट्यूशन बदल देंगे। फिर ये दलित लोगों का रिजर्वेशन खत्म कर देंगे। जो पागल की तरह बोलना शुरू किया था। [हंसी] सो दैट इज द रीज़न। दूसरा कि ऑप्टिमल पॉइंट कहां पे है? तो स्पिरिचुअलिटी इज़ द ऑप्टिमल पॉइंट। ए इट डजंट मैटर के वेदर यू आर कंजर्वेटिव और लिबरल। राइट? एज लॉन्ग एज यू आर स्पिरिचुअल आपका काम चल जाएगा।
प्रश्न: आध्यात्मिकता एक रूढ़िवादी conservative विचार है, ठीक?
नहीं रिलीजन इज़ कंजर्वेटिव आईडिया। देखिए अमेरिका में जैन बुद्धिज्म क्यों फैला है इतना? बिकॉज़ कि इसका कोई ऑर्गेनाइज्ड चर्च या ऑर्गेनाइज़्ड रिलिजन नहीं है। इसलिए लोगों को यह ऑर्गेनाइज्ड चर्च और या ऑर्गेनाइज़्ड रिलीजन इज़ सपोज़ टू बी कंजर्वेटिव। ये जो इंडिविजुअल स्पिरिचुअल मूवमेंट है वो अमेरिका में हमेशा स्वामी जी को इतना अवकार क्यों मिला? बिकॉज़ ही डजंट रिप्रेजेंट एनी चर्च और डोगमा और एनी थियोलॉजिकल सप्रेसिव आइडियाज।
प्रश्न: एक ओर वेदान्त श्रद्धा, शास्त्र और गुरु के महत्व पर ज़ोर देता है—यह एक तरह से रूढ़िवादी पक्ष लगता है। दूसरी ओर वही वेदान्त आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता की शिक्षा देता है। तो फिर वेदान्त में रूढ़िवाद और उदारता के बीच संतुलन की framework कहाँ है?
यहां पे देखिए फ्रेमवर्क तो है इस अर्थ में पता है मैंने कुछ समय पहले कहा था एक लड़का आया था मेरे पास में उसकी मां लेके आई थी सिक्स्थ ना सेवंथ स्टैंडर्ड में पढ़ रहा था वो इतना सेकुलरिज्म और वेस्टर्न आईडिया से प्रभावित हो गया कि सब इंडियन वैल्यूस को इंडियन आइडियाज को क्वेश्चन कर रहा है और मैं जब उसके साथ बात कर रहा था आई फेल लाइक कि मैं अपनी यंगर वर्जन के साथ बात कर रहा हूं आई आई वाज़ आल्सो द सेम। किंतु उसमें और मेरे में डिफरेंस क्या है कि उसने वो लेकर के बैठ गया है। अभी उसकी मां उसको बार-बार कहती है तुमको कोई भी क्वेश्चन है यू कैन आस्क स्वामी जी। सो वो एक एक मुंह से एक शब्द नहीं निकाला जो आधा घंटा एक घंटा मेरे साथ बैठा था। मुंह से एक शब्द नहीं निकाला। और अगेन आई सिंपथाइज विद हिम कि उस ऐज में मैं भी यही सोचता था साधु बाबा जी जितने भी है वो सब फ्रॉड है। सो दैट इज़ वन थिंग। बट व्हाट अल्टीमेटली सी कि आई पर्स्यूड कि मेरी जो क्यूरियोसिटी थी टू द बेस्ट ऑफ माय एफर्ट आई पर्स्यूड इट और ये जो होते हैं अभी मैं इस लड़के के बारे में इन जनरल बता रहा हूं कि दो टाइप के लोग हो जाएंगे जो कि आपके मन में क्वेश्चन है यू पर्स्यू इट टू इट्स लॉजिकल कंक्लूजन और यदि आप में वो कैपेसिटी नहीं है देन यू हैव सम श्रद्धा फिर यदि मेरे में यह कैपेसिटी नहीं कि शास्त्र जो सच कह रहे हैं कि झूठ कह रहे हैं वो वो डिटरमाइन करने की इन दैट केस इट इज़ नेसेसरी टू हैव श्रद्धा। वरना क्या होगा? वह श्रद्धा नहीं है। आप हमेशा के लिए अश्रद्धालु बन जाएंगे। एट द सेम टाइम आपके भीतर में वो समय, एनर्जी, कैपेसिटी, व्हाटएवर यू कॉल इट। बहुत लोगों के पास में एक कैपेसिटी होता है। समय नहीं होता या डिजायर नहीं होता कि टू रीच इट्स लॉजिकल कंक्लूजन। राइट? अभी ये टेक इंडस्ट्री में आप देखेंगे कि बहुत ज्यादा लोग नास्तिक होते जा रहा है। अभी जो टेक इंडस्ट्री में है उसको इंटेलेक्ट का कोई प्रॉब्लम नहीं। किंतु वो माइंडसेट नहीं है कि ही विल पर्स्यू स्पिरिचुअल ट्रुथ टू फाइंड आउट व्हाट इज राइट एंड व्हाट इज रोंग। तो दो तरह के लोग होंगे। एक है कि जिन लोगों में वो लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचने की क्षमता है। दूसरे में नहीं है। तो जिन लोगों में नहीं है उन लोगों को बेटर है कि श्रद्धा का आश्र लें। अदरवाइज आपका जीवन जो है संपूर्ण रूप से नास्तिकता भोगवाद से भर जाएगा और जिन लोगों में वह कैपेसिटी है दे बेटर क्वेश्चन ठाकुर के जितने भी डिसाइपल है देखिए दो ही लोगों ने ठाकुर को क्वेश्चन किया है एक है गिरीश घोष और दूसरे हैं स्वामी जी और दोनों में वो जो प्रचंड बुद्धिमत्ता बोथ रीच देर लॉजिकल कंक्लूजन और किसी ने ठाकुर को क्वेश्चन नहीं किया ठाकुर बहुत ज्यादा क्वेश्चनिंग एनकरेज भी नहीं करते थे कि जो अभी है अभी वो हरि महाराज वगैरह वो लिख रहे हैं हरि महाराज ना महापुरुष महाराज ठाकुर का उपदेश लिख रहे हैं जैसे मास्टर महाशय लिखते थे तो ठाकुर ने इमीडिएटली कह दिया यह तुम्हारे लिए नहीं है तुम ऐसा मत करो तो जो लिख रहे थे वो गंगा में फेंक दिया राइट सो वो क्वेश्चन करने का एटीट्यूड तभी माने वो जचता है जबकि आप में वो कैपेसिटी है टू टेक इट इज़ लॉजिकल फ्रेम कंक्लूजन सो फ्रेमवर्क इज क्लियर कैपेसिटी है देन क्वेश्चन यदि कैपेसिटी नहीं है देन हैव श्रद्धा
प्रश्न: मुझे नहीं लगता कि उस लड़के का सेक्युलरिज़्म किसी बौद्धिक क्षमता से उपजा है।
सर्वप्रियनंद जी कहते हैं ना हवर्ड के बारे में कि जितने भी इंडियन स्टूडेंट है वो दे वांट टू बी या सर्वप्रिया पता है ना आपको ये बात नहीं वो एक लेक्चर में बोले आई वास वेरी सरप्राइजिंग ही यूजुअली अवॉयड करते हैं इस तरह का किंतु हां हावर्ड में गए थे ना तो देखा कि जितने भी देश से स्टूडेंट आते हैं अपने देश का नीचा नहीं दिखाने देंगे किंतु इंडियन स्टूडेंट्स दे वांट टू बिलोंग टू दिस कूल कूल ग्रुप तो फिर वो व्हाट इज द क्राइटेरिया टू बिलोंग टू दिस कूल ग्रुप अपने देश की निंदा करो म देखिए हावर्ड में यदि ऐसा है म दोस हु आर क्वालिफाइड फॉर हारवर्ड तो फिर [हंसी]
प्रश्न: liberalism needs to be earned. जापान आदि देशों में पहले आर्थिक उन्नति हुई, उसके बाद लोकतंत्र आया।
देखिए चर्चिल ने क्या कहा था इंडिया में डेमोक्रेसी कभी सक्सेसफुल नहीं होगा कुछ ही समय के बाद में लुटेरों के हाथ में ये डेमोक्रेसी चला जाएगा माने ये सत्ता चली जाएगी सो इंडिया के बारे में कहते हैं ना इंडिया डिसपॉइंट्स बोथ एडमायरर्स एज वेल एज क्रिटिक्स। [हंसी] वो चर्चिल को भी डिसपॉइंट करता है हमको भी डिसपॉइंट करता है। [हंसी]
ठाकुर स्वामीजी को बंद कमरे में कई बातें सिखाते थे—ऐसा क्यों?
देखिए मेरा जो मानना है बहुत सारी चीजें ना ठाकुर ने बोल दी थी इन जनरल। अब अब जैसे मैं आपको एक बात बताऊं स्वामी जी का एक रूल बुक है अह जो कि रामकृष्ण मिशन में है और अह सन्यास होने पे ना ब्रह्मचर्य होने पे आपको एक रूल बुक देते हैं व्हिच इज नॉट अ पार्ट ऑफ कंप्लीट वर्क्स। बीच-बीच में डिबेट होता है कि उसको कंप्लीट वर्क्स में रख दिया जाए। स्वामी जी का कंपोज़िशन है। क्यों कंप्लीट वक्स में नहीं है। तो कभी-कभी कहते हैं नहीं नहीं वो तो अपना इंटरनल है। उसको किसी को दिखाना नहीं। अभी उसको पढ़ेंगे ना तो इट इज देयर इज नथिंग कि स्वामी जी जो कंप्लीट वर्स में नहीं कहते हैं वही है कि उस आइडियाज को डिस्टिल करके क्लियरली फॉर्मुलेट करते हैं फॉर सम पार्टिकुलर पर्पस। अब जैसे सूत्र लिटरेचर है। योग योगसूत्र क्या है? सूत्र फॉर्म में क्लियरली डिस्टिल करके एक पार्टिकुलर फॉर्म ऑफ टीचिंग रखा है। प्रोबेबबली अभी हिंदू शास्त्र का मेरा इतना स्टडी नहीं है कि मैं कह पाऊं डेफिनेटली। किंतु प्रोबेब्ली मुझे लगता है कि जो आईडिया सूत्र फॉर्म में है दैट इज़ ऑलरेडी देयर इन अ एक्सपेंडेड फॉर्म। बस वही है कि क्लियरली उसको फ़्टर करके डिफाइन करके यहां पे रखा है। सो वो रूल बुक इज़ नथिंग बट दैट कि एक पर्टिकुलर एस्पेक्ट ऑफ हिज़ टीचिंग कि किस तरह से संघ को चलाया जाए। इस आइडिया को डिस्टिल करके फ़िल्टर करके शार्प टेक्स्ट में यहां पे रखा है। पॉइंट बाय पॉइंट। इतना ही है। अदरवाइज इफ यू स्टडी कंप्लीट वर्क्स वेरी मतलब डिटेल में तो सब कुछ आपको वहीं पे मिल जाएगा। नया कुछ नहीं है। तो सिमिलरली ठाकुर मास्वामी जी देखिए तीनों समग्र लेते हैं तो आपको मुझे ऐसा नहीं लगता कि ठाकुर ने स्वामी जी को जो कुछ कहा व्हिच इज समथिंग कंप्लीटली डिफरेंट फ्रॉम दिस। जो कहा है वह डिस्टिल फॉर्म में कहा होगा फॉर सम पर्टिकुलर पर्पस। नथिंग न्यू नथिंग यूनिक। दिस इज माय अंडरस्टैंडिंग।
प्रश्न: यदि सब कुछ already कहा जा चूका है तो फिर स्वामीजी को सब के सामने क्यों नहीं कहा?
ना द सेम थिंग कि हम लोग क्यों रूल बुक पब्लिश नहीं करते? एक्चुअली क्या है? देखिए क्योंकि क्या है ना कि जब आप किसी टीचिंग को आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट लेते हैं। अब जैसे कि देखिए दोनों है ना कंजर्वेटिविज्म एंड लिबरलिज्म दोनों है। इंडियन सोसाइटी के भीतर में ठाकुरमा स्वामी जी के भीतर में। ऑन वन हैंड मां का खुद का जीवन आप देख लीजिए। निवेदिता स्कूल में लड़कियां पढ़ने को जाए। इसके लिए मां अपने सब लेडी डिवोटी को कहती है। उस समय का जो कंजर्वेटिवज्म था कि 10 साल की उम्र में बच्ची की शादी करवा दो। अभी मां का खुद का शादी छोटी उम्र में हुआ है। मां ने खुद ने नहबत में रहकर के सब कुछ किया है। जो समाज क्या कहेगा उसके प्रति बहुत ही सजा थे। कुछ भी एक भी सामाजिक नियम तोड़ा नहीं है। एट द सेम टाइम मां कहती है कि बच्चियों को स्कूल में भेजना चाहिए। अभी क्या है कि आप एक को आप आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट ले लेंगे कि मां का कहना है कि बाल्य विवाह बंद करके उनको स्कूल में भेजना है देन इट वुड बी रॉन्ग राइट क्योंकि आपने मां को समग्र रूप से देखा नहीं है। यहां पे आप इस तरह से प्रोजेक्ट करेंगे कि मां को जिस तरह से बाकी के कास्ट ब्रेकर्स जो है ना नाम नहीं लेना चाहता। जो लोगों को आज हम बड़ा करके देख रहे हैं कि इन्होंने कास्टिज्म को तोड़ा। इन्होंने कंजर्वेटिज्म को तोड़ा। अब मां को भी इस तरह से प्रोजेक्ट करेंगे क्या कि बिकॉज़ के मां ने कहा कि बच्चियों की शादी बचपन में नहीं करवा के स्कूल में भेजो। विल बी अ रॉन्ग रीडिंग। ऑब्वियसली ठाकुर मां स्वामी जी को तीनों को हमको एक ही साथ में देखना है। तभी हमको ठाकुर का वो प्रॉपर जो अंडर अब जैसे मां के साथ में जो ठाकुर का वार्तालाप हुआ मां को जो सिखाया अगेन मां ने तो कोई रिकॉर्ड नहीं रखा। ना ही यह जो शोडशी पूजा से लेकर के मास्टर महाशय के आने के तक के जो 10 साल है 72 से 73 से लेकर के 81 तक के उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। एट द सेम टाइम एक इंटेंस टीचिंग प्रोसेस चला है। सो वो क्या है? सो हाउ वुड वी अंडरस्टैंड इट? तो मां का जीवन पढ़ पढ़ करके समझ में आ जाएगा कि ठाकुर ने मां को क्या कहा था। जो हृदय की उदारता है सबको साथ में लेने लेकर के चलना है जो स श जो जो सहन करता है वो रहेगा नहीं सहन करेगा नहीं रहेगा अभी ठाकुर के खुद के टीच अब लाइफ में देखिए कहां वो अपने परिवारजनों से त्रस्त हो जाते थे हृदय के जो पगलापन था आत्महत्या करने को जाते थे मां ऐसा करेगी तो मां को रोज आत्महत्या करनी पड़ेगी [हंसी] राधु का जो हृदय से 10 गुना पागलपन राधु का था शी वाज़ लिटरली मेड [हंसी] राइट सो ठाकुर ने मां को जो सिखाया वी कैन रीड इट इन मदर्स लाइफ। तो स्वामी जी को जो कुछ भी कहा होगा वी कैन रीड इट इन कंप्लीट वर्क्स इन स्वामी जीसस लाइफ। सो देयर इज़ नो मिस्ट्री देयर अकॉर्डिंग टू मी। ओनली थिंग इज़ दैट वी नीड टू हैव दैट होलिस्टिक अंडरस्टैंडिंग। देखिए ठाकुर का ना साइकोलॉजी बड़ा क्लियर था। जो ठाकुर जो जिस तरह के लोग आते थे ना उनके साथ में उस तरह की बात करते थे। तो ब्राह्म समाज जी कहते थे ठाकुर तो हमारे ही है क्योंकि वो उसी टाइप के निराकार की बातें करते हैं। जो वैष्णव थे कहते हैं ठाकुर हमारे ही है क्योंकि वैष्णव वो जो पूरा भाव है उस तरह की बात शाक्त वाले उनको क्लेम करते थे। सो ठाकुर को पता था जिसका जो मेंटालिटी है उसको उस तरह से देना है। किंतु जब मास मीडिया का बात आता है ना सब पूरे कैलकुलेशन उलट हो जाते हैं। अब किताब में सब कुछ रख देते हैं। नाउ किसको क्या उपदेश होगा? देखिए बहुत बार मैं ऐसा सोचता हूं ठाकुर के बारे में केशव सेन ने प्रिंट करना सब पब्लिश करना शुरू किया। ठाकुर नाराज हो जाते हैं। किसी ने कहा ठाकुर को कि आपके बारे में न्यूज़ पेपर में छाप दिया है। तो ठाकुर बोलते क्या छाप देना अभी से छाप देना ये सब क्या? तो उसको पढ़ के हमको दो-तीन चीज इनिशियली लगती है कि हां बहुत पब्लिसिटी हो जाएगी तो ठाकुर के देह का समय आ जाएगा त्याग करने का। वो एक लगता है। फिर ऐसा लगता है कि ठाकुर अपने को छुपा करके रखना चाहते थे। बहुत ज्यादा पब्लिसिटी नहीं चाहते थे। दैट इज़ वन क्वेश्चन। तो इस तरह के आइडियाज आते हैं। किंतु गो डीपर इंटू दैट। ठाकुर ने जो कुछ भी कहा वह पर्टिकुलर पर्सन के लिए कहा है। उसको आप जब प्रिंट कर देंगे तब तो नोस तो लॉस्ट हो जाएगा ना। फिर तो एक जनरलाइज हो जाएगा। और इसीलिए द पर्सन हु कैन राइट कीपिंग दिस कॉन्टेक्स्ट फ्री कंटेंट। ठाकुर का जो कंटेंट था कॉन्टेक्स्ट फ्री भी था। जो कि मास्टर महाशय समझते मास्टर महाशय ने लिखा है। बोल के ठाकुर ने और किसी को मना कर दिया। तुम लोग मत लिखना। आप लोगों को समझ में नहीं आएगी कि व्हाट इज अ कॉन्टेक्स्ट फ्री कंटेंट एंड व्हाट इज अ कॉन्टेक्स्चुअल कंटेंट। वो जो मास्टर महाशय ने सॉरी स्वामी जी ने मास्टर महाशय की प्रशंसा करते जो लेटर लिखा है उसमें स्पष्ट लिखा है। सोक्रेटिसिस डायलॉग्स आर प्लेटो ऑल ओवर बट यू हैव केप्ट योरसेल्फ वेल हिडन। राजा महाराज जैसे राजा महाराज ठाकुर का जो उपदेश लिखते हैं तो उसमें ठाकुर ने बोला है। किंतु ठाकुर जो भी बोलते एट्रिब्यूट करते हैं। मैंने उससे सुना। मैंने उससे सुना। सो राजा महाराज एट्रिब्यूट करना भूल गए। तो ठाकुर ने सपने में आकर कहा कि अरे वो जो बात कही है भले ही मैंने कही किंतु मैंने कहा है कि मैंने उससे सुनी है। तो गिव दिस एट्रिब्यूशन।
प्रश्न: लगता है ठाकुर को IP राइट्स की पूरी समझ थी!
ना मोर देन दैट। मोर देन दैट कॉन्टेक्स्ट मैटर्स ना। किस कॉन्टेक्स्ट में कौन सी बात किस पर्पस के लिए की जा रही है। दैट कॉन्टेक्स्ट यदि कॉन्टेक्स्चुअल है देन कॉन्टेक्स्ट शुड बी मेड क्लियर। अब जैसे यह श्री रामकृष्ण जे रूप देख जैसा उन्हें देखा एस वी सो हिम उसमें बहुत सारे डिवोटीज के बहुत सारे रेमिनेशंस है तो एक स्त्री भक्त लिखती है एनोनिमस है रेमिनेशंस कि आजकल जो हम लोग सुनते हैं कि ठाकुर स्त्रियों को घृणा घृणा करते थे कामिनी कांचन वगैरह जो बातें करते थे हमको सुनकर के हंसी आती है। ठाकुर हमारे साथ में इतना फ्रीली बात करते थे। इतना वह हमारे से अपना उनका था। अपनापन था उनका। एट द सेम टाइम ठाकुर खुद कहते हैं कि जो स्त्री यहां पर ज्यादा बैठी रहती है तो मैं कहूंगा आप जाइए बिल्डिंग देख के आइए और यदि वो नहीं जाएगी मैं खुद कोई स्मोकिंग के बहाने खड़ा हो के चला जाऊंगा। सो ऑन वन हैंड ही कीप्स दिस वेरी गुड रिलेशन एट द सेम टाइम समाज को दिखाना है। आपका खुद का बिहेवियर ऐसा नहीं होगा तो लोग क्या सीखेंगे? वो लोग तो वही कहेंगे ना ठाकुर मुंह से ऐसी बातें करते हैं किंतु देखिए औरतों के साथ बैठ के गप लगाते हैं। सो बोथ आर ट्रू राइट
प्रश्न: हां, हम अपनी छोटी बुद्धि से अवतार के कार्यो को समझने का प्रयास करेंगे तो उलटा परिणाम आएगा ही. सखी भाव में ठाकुर माथुर बाबू के घर स्त्रियों के साथ रहते थे, किन्तु अभी उनको पास ज्यादा बैठने नहीं देते
देखिए रामायण के बारे में मैंने एक सुना था कहीं पे कि हनुमान जी वहां पे गए लंका में लंका को जला के भस्मीभूत करके आए तो मां सीता को साथ में क्यों नहीं ले आए किंतु क्यों नहीं ले आए दो चीज एक तो भगवान राम को यह ग्लोरी देना है रावण वध का उसके पर्पस के लिए तो भगवान राम का आगमन हुआ दैट इज एक फेमस आर्गुमेंट है। सेकंड है कि देखिए हनुमान जी के कंधे पे बैठ के यदि मां सीता आती क्योंकि उनको तो ऐसा जंप लगा के क्रॉस करना था। पर पुरुष को स्पर्श करना हो जाएगा व्हिच इज नॉट प्रॉपर। सो इसके लिए भी वो मां सीता को ले नहीं आया। सो सी सो मेनी नंसेस आर देयर।
प्रश्न: स्वामीजी के बारे में बात करते करते पॉलिटिक्स आ ही जाता है बिच में
मेरा स्ट्रगल यह रहता है कि यह जो स्वामी जी वाला पोर्शन ओवरली पॉलिटिकल ना हो जाए। तो उस तरह से बोलना [हंसी] दैट इज माय स्ट्रगल समटाइ्स क्योंकि करंट अफेयर्स आप आ ही जाएंगे। आप जो भी स्वामी जी कहते हैं क्योंकि इट्स अ सिविलाइजेशनल स्केल एंड करंट अफेयर्स आर क्लोजली रिलेटेड विद ईच अदर। सो [हंसी] आप वेदांत के बारे में बोलेंगे तो यू आर वेरी सेफ। बट स्वामी जी के बारे में बोलना इट्स अ रिस्की। [हंसी]