Prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद के भारत में दिए हुए भाषणों में से एक माय प्लान ऑफ कैंपेन इसका हम पाठ कर रहे थे और इसी सिलसिले में यह जो एक स्लाइड शो है वो हम देख रहे थे ये स्लाइड शो ये कोलंबो टू अल्मोड़ा यानी कि भारत में जितने भी भाषण दिए हैं सबको मिला करके उसमें से कुछ मेन टॉपिक सेलेक्ट करके इस स्लाइड शो को बनाया गया है। तो ये जो फोर्थ स्लाइड है वो हम देख रहे थे। ये फर्स्ट स्लाइड ये सेकंड भी देख लिया। ये थर्ड भी देख लिया और ये फोर्थ स्लाइड। तो यह फोर्थ स्लाइड में क्या टॉपिक है कि भारत है यहां से ही जैसे कि प्रत्येक
Vanguard Civilization इतिहास के हर युग में एक सभ्यता मानव प्रगति का नेतृत्व करती रही है. महान देश की नींव होती है—महान संस्थाएँ (institutions)
सिविलाइजेशन का अपना एक मिशन होता है। अपना एक पपस होता है। अपना एक कंट्रीब्यूशन होता है। तो अभी आज का अमेरिका आप देखिए कि उसका कंट्रीब्यूशन जो है बहुत सारे फील्ड में इतना सब कुछ कंट्रीब्यूट कर रहा है। आज लेटेस्ट यदि देखें तो एi टेक्नोलॉजीस तो वि इज अ ग्रेट कंट्रीब्यूशन। हालांकि देखिए कि आज के ग्लोबलाइज्ड युग में होता क्या है कि जो इंडिविजुअल रिसर्चर होते हैं वह बहुत सारे देशों से आते हैं। अब जैसे कि एआई के फाउंडर्स जो कुछ-कछ लोग थे उसमें से जो ऑफ हिंटोन ऐसा एक प्रोफेसर है वो था कनाडा में टोरंटो में। फिर यह जो एआई के जो फंडा वन ऑफ द वेरी इंपॉर्टेंट पेपर ट्रांसफार्मर टेक्नोलॉजी के ऊपर में लिखा गया। इसका दो ऑथर इंडियन है। तो क्या है कि अभी आज आप कोई भी कंपनी देखेंगे अमेरिकन मल्टीीनेशनल कंपनी तो वहां के जो एंप्लाइज है, रिसर्चर है, लीड साइंटिस्ट वगैरह है, पूरे वर्ल्ड में से वे लोग वहां पे जाते हैं और कार्य करते हैं। किंतु देखिए कि प्रॉब्लम यहां पे क्या आता है। जैसे हमने कुछ दिनों पहले ईरान के इंजीनियर्स की बात की थी। जब यह ट्रंप ना कि ऐसा किसी ने कहा कि ईरान से इंजीनियर मंगवाना बंद कर दो, इंपोर्ट करना बंद कर दो। तो वही सब टेक्नोलॉजी कंपनियां कहने लगी कि ईरान में इतना अच्छा एजुकेशन सिस्टम है। वहां के इंजीनियर बहुत ही वो काबिल है। बहुत ही एफिशिएंट है। तो उनको तो लाना ही पड़ेगा। वरना फिर अमेरिकन कंपनियों की टेक्नोलॉजिकल एज कैसे बनी रहेगी? तो क्या है कि यह अमेरिका का खास करके यह और देखिए कि कोई भी यह फ्रंटियर सिविलाइजेशन होती है। देखिए कि जगत में जब हम इतिहास का थोड़ा बहुत स्टडी करते हैं तो हमको पता चलता है कि एक फ्रंटियर सिविलाइजेशन है। एक वानगार्ड सिविलाइजेशन है। अब जैसे कि अब वेस्टर्न हिस्ट्री का ही स्टडी करें तो एक समय था कि ग्रीस था फ्रंटियर सिविलाइज़ेशन। ग्रीस था वानगार्ड सिविलाइजेशन। तो वहां पे जो डेवलपमेंट हुआ फिलॉसोफिकल ये साइंटिफिक इंजीनियरिंग तो उसने पूरे विश्व में उसने यह जो डेवलपमेंट है उसका फायदा हुआ। उसका कंट्रीब्यूशन हुआ। एट द सेम टाइम बात ऐसा नहीं है कि सिर्फ ग्रीक लोग ही यही सब कर रहे हैं। पूरे वर्ल्ड में से जहांजहां पे भी टैलेंट है वे लोग ग्रीस जाएंगे और वहां पे जाके उनको एक मौका मिलता है टैलेंट को मैनिफेस्ट करने का। जो मौका उनको अपने जो घर जो होता है अपना जो खुद का देश होता है वो नहीं मिलता। क्यों? क्योंकि ग्रीस था वह फ्रंटियर सिविलाइजेशन और बाकी सब जो सिविलाइजेशन थी वह थी फॉलो अप सिविलाइजेशन यानी कि आल्सो रनिंग जैसे आप क्रिकेट टीम होती है ना तो 11 खिलाड़ी होते हैं फिर उसमें 12th भी एक होता है। यदि 11 में से कोई इंजर हो जाएगा तो फिर यह 12th प्लेयर है उसका स्थान ले लेगा। किंतु जब तक कोई इंजर नहीं होता है तब तक वह 12थ प्लेयर को बाहर में ही बैठा रहना है। पवेलियन में ही बैठे रहना है। तो क्या है कि इस तरह से जो एक फ्रंट लाइन पे साइंस, टेक्नोलॉजी, कल्चर, डिप्लोमेसी, पॉलिटिक्स, मिलिट्री टेक्नोलॉजीस वगैरह जो फ्रंटियर जो है ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग, ह्यूमन विज़डम, ह्यूमन अचीवमेंट की जो फ्रंट लाइन पे जो स्टेट होते हैं वे लोग फ्रंटियर सिविलाइजेशन या फ्रंटियर स्टेट होते हैं। जहां का और ये फ्रंटियर स्टेट जो होते हैं और जो बाकी के जो सब स्टेट है उन दोनों में डिफरेंस क्या है पता है? बात ऐसा नहीं है कि यह जो फ्रंटियर स्टेट या फ्रंटियर सिविलाइजेशन है वहां के जो सिटीजन बहुत ज्यादा इंटेलिजेंट है। ऐसा नहीं अमेरिका का उदाहरण जग जाहिर है कि देखिए इतने सारे इंडियन एच वन बी वीजा पे अमेरिका जाते हैं। तो बात ऐसा नहीं है कि अमेरिकन लोगों के भीतर में कोई माने एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी अमाउंट ऑफ इंटेलिजेंस है। हमेशा देखिए वह जो पिरामिड की हम बात कर रहे थे कोई भी स्टेट हो, कोई भी सिविलाइजेशन हो, कोई भी कंट्री हो, कोई भी देश हो टॉप 10 टैलेंट जो है इस पिरामिड को आप देखेंगे टॉप 10 टैलेंट वो हाईली इंटेलिजेंट रहेगा। उसके बाद में 30% आएंगे जो कि मीडियम मीडियकर इंटेलिजेंस माने इतना हाईली इंटेलिजेंट नहीं होंगे किंतु फिर भी काफी इंटेलिजेंट होंगे। और यदि आईक्यू में बोले हाइपोथेटिकल एक सिनेरियो हम डिस्क्राइब करते हैं। टॉप 10% होंगे। जैसे हमको पता होगा एक नॉर्मल पर्सन का आईक्यू 1 होता है। यदि 100 से ज्यादा आईक्यू है तो वो इंटेलिजेंट कहा जाता है। 110 1120 प्लस आईक्यू है तो उसको जीनियस कहा जाता है और 100 से कम आईक्यू है 90 80 70 तो फिर वो मेंटली रिटार्डेड की स्थिति में आ जाता है। तो आप देखिए कि कोई भी देश का यह पिरामिड देखेंगे टॉप 10 जो होंगे वह जीनियस कैटेगरी के होंगे जिनका कि आईक्यू 112030 प्लस होगा। इसके बाद में 30% ऐसे आएंगे जो कि 115 100 प्लस जिनका आईक्यू होगा और फिर 30% ऐसे आएंगे कि जिनका होगा 100 आईक्यू और फिर जो लास्ट बॉटम होगा कि 100 से कम आईक्यू होगा। तो यह जो पिरामिड है यह तो मैंने एक हाइपोथेटिकल कहा। ऐसा कोई नंबर्स कोई फिक्स नहीं है ना ही मैंने कहीं देखा है। किंतु जो मेरा एक बेसिक अंडरस्टैंडिंग जाता है कि ये जो परसेंटेज डिवीजन जो आईक्यू के होते हैं आईक्यू इज नॉट ए प्रॉपर मेजर ऑफ ह्यूमन इंटेलिजेंस। किंतु फिर भी बात को सरल करने के लिए मैं आईक्यू के माध्यम से समझाता हूं। तो ऐसा एक हम एक इमेजिन कर सकते हैं पिरामिड और दिस पिरामिड या तो फिर यह जो प्रोपोर्शन है डिस्ट्रीब्यूशन प्रोपोर्शन आईक्यू का वो सभी देश में एक ही तरह का होता है। डिफरेंस कहां पे आता है? आज अफगानिस्तान और पाकिस्तान या बांग्लादेश या इन तीन देशों को लीजिए और यहां पे अमेरिका को लीजिए, चाइना को लीजिए या तो जापान है। यह कहां पे डिफरेंस आता है? वो देश के जो इंस्टीटशंस होते हैं वो इंस्टीटशंस इतने स्ट्रांग होते हैं कि जो रो टैलेंट होता है उसको शेप कर सकते हैं। वरना देखिए आपने वह जमीन को खोद करके उसमें से हीरा निकाला। किंतु जब आपने पहली बार हीरा निकाला होगा तो वह कोयले जैसा ही होगा। काले पत्थर जैसा ही होगा। उसको तो आपको पूरा पॉलिश करके शेप करके डायमंड का वह शेप देना है। उसको ज यह जो सूरत जो है ना सूरत में यह डायमंड इंडस्ट्री है। वहां पे हीरा जो होता है डायमंड जो होता है उसको फसेट्स दिए जाते हैं। जिससे कि यह ऑर्नामेंट्स में उसका यूज हो सके। तो जब तक आप उसको ऑर्नामेंट में लगाने के लिए शेप नहीं करेंगे, फसेट्स नहीं देंगे, तब तक वह पत्थर की तरह ही पड़ा रहेगा। तो वैसे ही इंस्टिटशंस होते हैं जो कि मनुष्य को शेप करते हैं। मनुष्य की इंटेलिजेंस, उसकी ये जो इमोशंस है, उसकी कैपेबिलिटीज है उसको शेप करते हैं। बोल के फिर वो मनुष्य जो है वो सोसाइटी का एक कंट्रीब्यूटिंग मेंबर बनता है। वरना देखिए कि जिस-जिस देशों में यह इंस्टीटशंस टूट गए हैं या तो फिर यह इंस्टीटशंस जो है परवर्टेड हो गए हैं वो उनके भीतर में एक तरह का राक्षसीपन प्रवेश कर गया है तो फिर क्या होगा कि वहां की जो टैलेंट होगी वो बिल्कुल नेगेटिव डायरेक्शन में जाएगी। यह जितने भी टेररिस्ट है आप देखेंगे कि टेररिस्ट होने के लिए आपको जो नॉर्मल आईक्यू है उससे तो ज्यादा ही चाहिए क्योंकि बहुत ही खतरे का काम है। बहुत ही आपको अपने को बचा करके अपना इंटेलिजेंस यूज करके बच करके रहना है। कोई बहुत बड़े जो अभी जैसे भारत में तो हो ही रहा है। हम देख रहे हैं किस तरह से यह लोग अटैक करते हैं। किंतु क्या है कि उनका यह जो इंटेलिजेंस है वह पूरा ट्विस्टेड हो गया है। क्यों? क्योंकि उनको ऐसे कोई इंस्टीटशंस नहीं मिले जो कि उनको शेप करके एक रिस्पांसिबल सिटीजन बनाए। तो देखिए कि यह इंटेलिजेंस पिरामिड जो है आईक्यू पिरामिड हम इसको कहेंगे हाइपोथेटिकल आईक्यू पिरामिड। तो सभी देशों में एक ही प्रपोर्शन से चलता है। बस वही बात है कि जिस देश के इंस्टीटशंस पावरफुल होते हैं, इफेक्टिव होते हैं, ऑनेस्ट और वर्किंग इंस्टीटशंस होते हैं, वो देश या वो सिविलाइजेशन फ्रंटियर सिविलाइजेशन के रूप में वह डेवलप होती है। और यह जितनी भी फ्रंटियर सिविलाइजेशंस होती है वहां पे पूरे विश्व से यह टैलेंट अट्रैक्ट कर सकते हैं यह लोग। और वे लोग का जो कंट्रीब्यूशन होता है उन लोगों का जो डेवलपमेंट होता है दैट इज द बेस्ट ऑफ द बेस्ट। आज के यह जो अपना यह जो मॉडर्न अभी यह जो आजकल के जो पिछले 50 साल का है समय पिछले 150 साल का स्वामी जी जब से अमेरिका गए हैं अमेरिका इज ए फ्रंटियर नेशन। तो वहां पर सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी डेवलप होती है। सबसे ज्यादा इंस्टीटशंस जो है वह इतने इफेक्टिवली काम करते हैं कि वे लोग टैलेंट को नर्चर कर पाते हैं। कहीं 150 नोबेल प्राइज ना कि इतना अमेरिका को मिले हैं। उसमें से बहुत सारे तो एक्चुअली जो नोबेल प्राइज विनर होते हैं दे आर द सिटीजंस ऑफ अदर कंट्रीज। दूसरे देशों के हैं। फिर वहां पर आकर के रिसर्च करके करके रह गए। ग्रीन कार्ड लिया, सिटीजनशिप ले लिया और फिर वहीं के निवासी हो गए। तो क्या है कि वे लोग अभी जैसे कि इंडिया के कोई अब्दुल सलाम जैसे कि हमने एक बार उसके बारे में बात की थी। वो पाकिस्तान का एक साइंटिस्ट है। किंतु प्रॉब्लम क्या है कि वह अहमदिया है। अभी अहमदिया को वे लोग प्रॉपर मुस्लिम के रूप में रिकॉग्नाइज नहीं करते। यानी कि इतना हाईली टैलेंटेड साइंटिस्ट होने के बावजूद पाकिस्तान में उसके प्रति किसी का गर्व नहीं है कि हां यह अपना साइंटिस्ट है और इसको नोबेल प्राइज मिला है। किसी को उसके प्रति गर्व नहीं है। सभी लोग उसको धिक्कारेंगे। तो क्या है कि पाकिस्तान के जो इंस्टीटशंस है पूरे करप्ट हो गए हैं। मनुष्य मनुष्य को आपस में लड़वाते हैं। टेररिज्म वहां पर पनपता है। वो जो हिलरी क्लिंटन वहां पर गई थी पाकिस्तान में और वो वहां पर सबके सामने बोल रही है। यदि आप अपने पड़ोसी के घर में फेंकने के लिए सांपों को पालेंगे अपने बैकयार्ड में तो एक दिन ऐसा आएगा कि यही सांप आप ही को दस लेगा। तो देखिए कि पाकिस्तान ने अपना जो बेकयार्ड है, अपना जो आंगन है उसमें सांपों को उसने पाला है। अभी वही सांप उसको दस रहे हैं। तो क्या है कि जब इंस्टीटशंस करप्ट हो जाते हैं तो पूरा देश भीतर से करप्ट कर देते हैं। वे लोग देश को भीतर से खा जाते हैं। और जब इंस्टीटशंस बहुत अच्छे से कार्य करते हैं। देखिए एक जो बहुत अच्छे इंस्टीटशंस कार्य जापान का एक एग्जांपल है। जर्मनी का एक एग्जांपल है। आजकल देखिए कि चाइना में भी इंस्टीट्यूशन से काफी अच्छे से कार्य करते हैं। बोल के अभी ये जो एआई में चाइना इतना आगे बढ़ गया है। मतलब अमेरिका से सिर्फ एक ही स्टेप पीछे में है। वो इतना डेवलपमेंट उन्होंने आज कर लिया है। वो जो मैं एआई का वो जो रैंकिंग देखता रहता हूं लीडरबोर्ड जिसको कहते हैं। तो अभी यह जैसे कि यह अह कोडिंग लीडरबोर्ड फिर यह टेक्स्ट टू इमेज लीडरबोर्ड इमेज जनरेशन लीडर बोर्ड यह एलएलएम लीडर बोर्ड तो मैं देखता हूं कि ये जो चाइना के जो मॉडल है वो मुश्किल से दो या तीन स्टेप पीछे होते हैं अमेरिकन मॉडल से और वो भी ओपन सोर्स होते हैं और कोई-कोई केस में तो नंबर वन भी बन जाते हैं। तो देखिए कि अह जहां पे इंस्टीटशंस अच्छे से कार्य करते हैं, वह देश जो है बहुत ही अच्छे से डेवलप होता है। इसीलिए स्वामी जी का यह जो की इनसाइट है स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो वह एक लेडी को कह रहे हैं कि आई हैव फॉर द फर्स्ट टाइम इन माय लाइफ आई हैव ए टेंप्टेशन। मेरे जीवन में प्रथम बार ऐसा हो रहा है कि मैं किसी प्रलोभन में पड़ा हूं। तो वो लेडी वो मजाक करके कहती है स्वामी जी को वो कौन है वो लड़की जिसके प्रलोभन में आप पड़े हैं तो स्वामी जी कहते हैं वो कोई औरत नहीं है कोई स्त्री नहीं है इट इज इंस्टीटशंस जिस तरह से यह वेस्टर्न कंट्रीज इंस्टीट्यूशन इंस्टीट्यूशनलाइज होकर के कार्य करते हैं। एकजुट होकर के इकट्ठा होकर कार्य करते हैं। स्वामी जी कहते हैं भारत में देखिए आप यदि तीन लोगों को साथ में लाएंगे तो तीनों का तीन अलग डायरेक्शन में दिमाग जाएगा। तीनों एक तीसरे के साथ में झगड़ा करेंगे और आखिर में वेर है, ईर्ष्या है, द्वेष है, इतना बढ़ जाएगा कि तीनों बिखर जाएंगे। दो-तीन लोगों को आप इकट्ठा नहीं ला सकते तो पूरे यह 150 उस समय तो एटलीस्ट 30 करोड़ के आसपास की जनसंख्या होगी। 30 करोड़ के आसपास जनसंख्या तो इंडिपेंडेंस के टाइम थी। आई थिंक स्वामी जी के समय में 20 या 15 करोड़ होगा। अंदाज करके कह रहा हूं। तो इतने जो करोड़करोड़ भारतवासी है किस तरह से इकट्ठा होंगे। यह जितने भी राजा है अपने को एक महाराजा समझता है। अपने को एक चक्रवर्ती सम्राट समझता है। एक-एक छोटा सा गांव है। गांव में ना ही कोई प्रोडक्ट है, ना ही गांव वासियों को कोई नॉलेज है, ना ही एजुकेशन सिस्टम है, ना ही प्रॉपर आर्मी है और वह सपना देखता है। सभी जितने भी उसके दूसरे राजा हैं, उनके ऊपर में ज्यादा उसका यह प्रभाव विस्तारित करने का। तो यह कहां से देश इकट्ठा होगा? तो स्वामी जी के हृदय में यह बात सब समय यह म चर्निंग हो रहा था कि किस तरह से एक ऐसा इंस्टीट्यूशन एस्टैब्लिश करें जो कि जितनी ही जो टॉप टैलेंट है यह जो हमारा जो आईक्यू पिरामिड आईक्यू पिरामिड के जो टॉप लेयर को देखिए कि 112030 प्लस जिसका आईक्यू होता है तो इस तरह के टॉप लेवल आईक्यू को अट्रैक्ट करें और उनको धर्म के रास्त रास्ते पे उनको रीडायरेक्ट करें और फिर जब उनका कैरेक्टर बिल्ड अप हो जाता है तो ऐसी टैलेंट को लेकर के एक साथ में लाकर के लोक कल्याण का जनसेवा का कार्य करें। सो दैट वास स्वामी जीसस ड्रीम। अभी देखिए कि
क्या आध्यात्म ने भारत को कमज़ोर बना दिया?
माने यह इंस्टिट्यूशन और यह माने यह लगता है कि स्वामी जी का जो फंडामेंटल आईडिया अभी देखिए कि एक चीज के आज के भारत में यह कहां तक यह सफल हुआ है स्वामी जी का ड्रीम मैं कभी-कभी ऐसा देखता हूं ऑफकोर्स दीज़ आर अर्ली डेज चर्च जो था चर्च का इंस्टीट्यूशन कहो ना कि यह बुद्ध बुद्धिष्ट धम्म कहो। वह जो इंस्टीटशंस थे उनको फैलने में माने एक प्रॉपर शेप लेने में हजारों साल लगे हैं। माने उससे कम में तो होगा ही नहीं। और हमारा मूवमेंट तो अभी बिल्कुल नया है। 150 साल ना कि अब बेलूर मट ठाकुर की जन्मतिथि से यदि देखें तो 200 साल यह 236 यानी कि आई थिंक ऑलमोस्ट 10 साल के बाद में 200 साल हमको कंप्लीट होंगे। तो 200 साल के हिसाब से हमारा जो डेवलपमेंट हुआ है वह कोई बुरा नहीं है। जीसस के जीसस का नाम पूरी पृथ्वी पर भ्रमण करने के लिए 400 साल लगे थे। जीसस के जन्म के 400 साल बाद ऐसा हुआ था कि जीसस का नाम पूरी पृथ्वी का भ्रमण कर पाया था। इस अर्थ में कि पूरी पृथ्वी के जितने भी देश हैं वहां पर जीसस का नाम प्रचार करतेकरते 400 साल लगे थे। तो किंतु यह रामकृष्ण रूपी एक ऐसी महासत्ता का उदय हुआ है। स्वामी जी कहते हैं कि ठाकुर की महासमाधि के 10 साल के भीतर में इस महासत्ता ने पूरी पृथ्वी का भ्रमण कर लिया है। स्वामी जी ने पूरी पृथ्वी का भ्रमण किया था और यूरोप अमेरिका में ठाकुर के नाम का प्रचार किया था। तो इस कॉन्टेक्स्ट में स्वामी जी कहते हैं कि 10 ही साल में हमने ठाकुर के नाम पृथ्वी का भ्रमण कर लिया। किंतु यहां पर देखिए कि मॉडर्न टेक्नोलॉजी का भी बहुत सारा कंट्रीब्यूशन है। आज यदि हम आज से 2000 साल पहले यदि ठाकुर का जन्म होता तो फिर क्या है कि उतने ही टाइम लगता जितना कि बाकी सब धर्मों को उस समय लगा था। तो वह एक एज के हिसाब से टेक्नोलॉजी के हिसाब से सब चलता है। किंतु यदि हम इस तरह से देखें तो हमको बहुत बार अभी जस्ट जैसे हमारा रिसेंट डिस्कशन हो रहा था कि 200 साल हो गए हैं ठाकुर के जन्म को किंतु भारत का प्रगति देखकर के हमको संतोष नहीं होता। एक तरह का डिसअपॉइंटमेंट जैसा हमको लगता है। खास करके जब हम अपने को चाइना के साथ में कंपेयर करते हैं और किसी के साथ में कंपेयर करने से ऐसा दुख नहीं होगा। ब्रिटेन है, अमेरिका है, फ्रांस है। यह सब कंट्रीज क्या है कि फ्रंट लाइन पर काफी लंबा समय रह चुके हैं। यह मिडिल ईस्ट के कंट्री है। उनके पास में एक अनफेयर एडवांटेज है। उनके पास में यह पेट्रोलियम नेचुरल रिसोर्स है जो कि उनको एक अनफेयर एडवांटेज देते हैं। तो चलो उनके साथ में भी अपना कंपैरिजन करने का कोई बनता नहीं है। यह जो साउथ एशिया के जितने कंट्री है उसमें तो हम कंफर्टेबली आगे हैं। हमारे जितने नेबर नेबर हैं, हमारे जितने पड़ोसी हैं, सब करप्शन में डूबे हुए हैं। सबके इंस्टीटशंस खत्म हो चुके हैं। तो उससे हमको कोई हमको अच्छा ही लगता है। जब अपने पड़ोसियों के साथ में अपने को कंपेयर करते हैं। एक गर्व भी महसूस होता है कि चलो हमारे यहां पे डेमोक्रेसी इंटेक है। अपना इकोनमी फिर भी 5 6% के हिसाब से रेगुलरली वो डेवलप हो रहा है वगैरह-वगैरह। और यदि हम यह सिंगापुर वगैरह जो एशियन टाइगर को देखते हैं तो भी इतना दुख नहीं होता। क्यों? रीजन क्या है कि इंडिया है आज 150 करोड़ का कंट्री। और आज से 80ज में ये इकोनॉमिकल मिरेकल हुआ था। तो ये एशियन टाइगर्स का उस समय अपना पॉपुलेशन एटलीस्ट 80 करोड़ के आसपास तो था ही था। तो कहां हमारा 80 90 करोड़ का पपुलेशन और कहां यह छोटे-मोटे यह देश यह साउथ कोरिया है। उसका पपुलेशन यह अपने मुझे नहीं लगता 34 करोड़ से ज्यादा हो। यह जापान है। उसका पपुलेशन नहीं अपना एक-एक स्टेट जो है इंडिया का उससे कम पपुलेशन वाले ये सब कंट्री है। एशियन टाइगर जो कि 80ज में जहां पे इकोनॉमिक मिरेकल हुआ था। सिंगापुर तो इतना सा ही है। ताइवान इतना सा ही है। जापान भी छोटा है। साउथ कोरिया भी छोटा है। तो क्या है कि उनको देखकर के भी कोई बहुत ज्यादा दुख नहीं होता। वो छोटे-छोटे कंट्री है और वहां पे आप इकोनॉमिक जो ये और दूसरा क्या है? पपुलेशन होमोजेनस है। अपने भारत की तरह यह 1000 लैंग्वेज, 1000 जाति, हजार रिलीजन, 1000 स्टेट ऐसा बटा हुआ नहीं है। होमोजेनस पपुलेशन है। तो इस तरह से वो वहां पे काफी कुछ एडवांटेजेस है। बोल के उनको कंपेयर उनके साथ में कंपेयर करके भी दुख नहीं होता। दुख कब होता है? जब हम अपने को चाइना के साथ कंपेयर करते हैं क्योंकि यही चाइना और यही भारत ये भारत इंडिपेंडेंट हुआ 1947 के 47 और चाइना में ये जो कम्युनिस्ट जो गवर्नमेंट है वो एस्टैब्लिश हुई उसके एकद साल के बाद में मोस्ट प्रोबेबबली 4950 के आसपास में तो हम दोनों के पास में भारत इंडिपेंडेंट हुआ वहां पे कम्युनिस्ट गवर्नमेंट आई एक साथ में ही हुआ है और अप टू 18 1980 1980 तक दोनों का इकोनॉमी पैरेलल ही चला है। आप कह सकते हैं कि इंडिया का इकोनॉमी शायद चाइना से अच्छा ही होगा। किंतु फिर 1980 में वह जो देंशओ पिंग वहां का वो जो एक निकला बहुत ही बुद्धिमान आदमी बहुत ही महान लीडर उसने जब चाइना को यह इकोनॉमिक मिरेकल के रास्ते पे जब लेके गया जिस तरह से उसने अमेरिका के साथ में यह स्ट्रेटेजिक अलायंस किया। हम लोग यह सेकुलरिज्म, यह सोशलिज्म वो सब पागलपन में जब पड़े रहे और उसने बड़ा शांति से अमेरिका के साथ में अलायंस करके यह डब्ल्यूटीओ में एंट्री ले लिया। डब्ल्यूटीओ में एंट्री तो बाद में मिला। किंतु वो जो बेसिक रिफॉर्म्स है उसने पहले से ही स्टार्ट कर दिए। उसको पता चल गया कि सोवियत यूनियन जो है वो किसी काम का नहीं है। अमेरिका के साथ में फ्रेंडशिप करो। जबकि इंडिया में पता नहीं यह सोवियत यूनियन और यह बाद में रशिया उसके साथ में हमारा पता नहीं किस तरह का आकर्षण है और अमेरिका के साथ में हमारे यह जो लीडर लोग हैं किस तरह का एक द्वेष रखते हैं अमेरिका के साथ में अलायंस किया नहीं। झूठ-मुठ का यह सोवियत यूनियन और बाद में रशिया को लेकर पड़े रहे। बोल कर के ही सोवियत यूनियन भी डूबा और साथ में इंडिया का इकोनॉमी भी डूबने लगा। जबकि चाइना ने बड़ा बुद्धि लगा के अमेरिका के साथ में अलायंस किया और फिर और बाद में जो हुआ आज तो जग जाहिर है कि उनका इकोनमी 1980 के बाद में कितना डेवलप हुआ है। ऑलमोस्ट 10% पर एनम के हिसाब से 10 इयर्स ना कि इससे ज्यादा उनका इकोनमी डेवलप हुआ है। अभी ऐसा नहीं है कि वहां पे प्रॉब्लम नहीं है। हजार प्रॉब्लम है और ऑथॉरिटेरियन गवर्नमेंट होने की वजह से और भी वहां पर सफरिंग ज्यादा है। किंतु एक जस्ट आप नेशनल पावर या नेशनल प्रेस्टीज की दृष्टि से आप देखिए कि कहां आज चाइना है और कहां इंडिया है। तो क्या है कि उनको देखकर के फिर हमको दुख होता है और फिर हम यह जो जितना भी सीखते हैं स्वामी जी के बारे में या तो फिर भारतीय आध्यात्मिकता के बारे में हमको फिर संदेह होने लगता है कि यह जो भारतीय ऋषि मुनियों ने हजार साल तक तो इंडिया को डूबा के रखा तो यह ठाकुर मां स्वामी जी को फॉलो करके क्या दूसरे 1000 साल तक हम डूबे रहेंगे कि नहीं माने डूबे रहेंगे कि क्या माने यह संदेह हो जाता है क्योंकि यह पावर जो है भारत में उपनिषद की शक्ति है थी पहले अब फिर गीता की शक्ति थी श्रीमद्भगवत गीता की अद्वैत वेदांत की शक्ति ना कि अभी स्वामी विवेकानंद माने मैनिफेस्टेशन ऑफ पावर अभी जैसे कि स्वामी विवेकानंद के कंप्लीट वर्क्स में देखने को मिलता है। यह जो पावर जो है वो नेशनल लाइफ में या तो फिर यह नेशनल लेवल पर कभी हमको फलीभूत हुए ही नहीं है। ऐसा एक भी देश एक भी समय नहीं है कि जब इंडिया का जो माने स्टेट पावर जो है इतना स्ट्रांग था कि जिससे कि सब लोग डरते थे। पिछले 1000 साल में तो ऐसा नहीं हुआ। तो फिर वही हमको यह डर लगता है कि जब स्वामी जी यह कहते हैं कि भारत का जो मिशन है वो है लाइट स्पिरिचुअल। जो पॉलिटिकल ग्रेटनेस और मिलिटरी पावर इज नेवर द मिशन ऑफ आवर रेस। यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि पॉलिटिकल ग्रेटनेस या तो मिलिटरी पावर भारत का मिशन कभी नहीं रहा। बट देयर हैज़ बीन द अदर मिशन गिवन टू अस वि इज टू कंजर्व ऑल द स्पिरिचुअल एनर्जी ऑफ द रेस। किंतु हमको और एक मिशन सुपृत किया गया है जो कि है कि हमारे देश की हमारी प्रजा की संपूर्ण आध्यात्मिक शक्ति को एकीकृत करना एकीत करना एंड दैट कंसंट्रेटेड एनर्जी इज टू पोर फोर्थ इन अ डल्यूज ऑन द वर्ल्ड और यह जो कंसंट्रेटेड एनर्जी है यह एक ही भूत शक्ति है वह जैसे कि महा प्रचंड तरंग की तरह पूरे जगत में छा जाएगी। और यह इसको इलस्ट्रेट करने के लिए देखिए एआई ने ड्राइंग भी इतना सुंदर किया है। तो दिस अब जब हम यह पढ़ते हैं तो हमको यह प्रश्न अवश्य होता है कि पहले भी तो अपने पास में यह उपनिषदों की शक्ति थी। मां भई मां भई यह जो था क्लेब्यम मास्म गम अपार्थ न एतत्व उपपद्यते तो यह सब तो पहले से ही कहा गया था तो फिर भी 1000 साल की गुलामी आन पड़ी और आज भी हम यह पॉलिटिकल पावर और मिलिट्री पावर को छोड़ कर के यह जो आध्यात्मिक पावर की एक अंधी दौड़ के आध्यात्मिक पावर के पीछे में जो पड़े हैं क्या फिर से 1000 साल की गुलामी तो नहीं आ जाएगी तो क्या करेंगे? म यदि आ गई तो यह प्रश्न जो है हमारे मन में होता है और इस प्रश्न का कोई सहज उत्तर नहीं है। देखिए हम सबका यह कर्तव्य है कि यह जो स्वामी जी की भविष्यवाणी कहो कि स्वामी जी का विज़न कहो कि या तो फिर ऐसा भी कह सकते हैं कि भविष्य में ऐसा होने वाला है। स्वामी जी ने देखा है तो उसको चरितार्थ करने में हम लग जाए काम में लग जाए। रेदर देन कि बैठकर के स्पेककुलेट करें। रेदर देन कि बैठकर के अपने नसीब को कोसे कि कहां ऐसे देश में जन्म ले लिया जहां पे यह सब ये जो भूखे नंगे बाबा जी लोग बैठे रहते हैं। वो जो चिरूट पीते रहते हैं। यह वो जो भांग पीते रहते हैं और ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाली बातें करते रहते हैं। वो अपने को भी बचा नहीं सकते। अपने भाई बांधवों को भी बचा नहीं सकते। इस तरह के किस तरह के फकीरों के देश में मैंने जन्म ले लिया। ऐसा बोलकर के हम अपने नसीब को कोस भी सकते हैं और या तो फिर जो हम कर सकते हैं स्वामी जी का यह जो आत्मश्रद्धा और दिव्य शांति को फैलाने का मैसेज है उसको अपने जीवन में उतार सकते
रामकृष्ण मिशन का असली ‘मिशन’: एक के बाद एक संस्थाओं का निर्माण
हैं कि रामकृष्ण मिशन जो है वह कोई सामान्य धार्मिक संस्था नहीं है। अब मैं जैसे राजकोट में था तो यह स्वामी नारायण का बड़ा प्रचार है। स्वामी नारायण एक बहुत बड़ी धार्मिक संस्था है। बड़ा सुंदर कार्य करती है। वहां के मंदिरों में आप जाएंगे तो बड़े-बड़े भव्य मंदिर होंगे। बड़ी ही माने इलेबोरेट पूजा पद्धतियां वहां पे चलती है। वहां पे बड़ी माने बहुत सारे भक्त इकट्ठा होते हैं। फिर वहां पे वो जैसे कि महिला मंडल है। स्त्रियों का ग्रुप तो वे लोग मिलकर के सब एक्टिविटी करेंगे। बाल संस्कार वर्ग चलते हैं। बाल विकास वर्ग इतने हजारों लड़के आएंगे। फिर उनको मां-पिता जी के चरण स्पर्श करने की शिक्षा देते हैं। फिर उनको विनय विनम्रता सिखाते हैं। जप ध्यान पूजा पद्धतियां सिखाते हैं। इतना सुंदर कार्य चलता है स्वामी नारायण का। सही में वे लोग प्रशंसा के पात्र हैं। किंतु देखिए कि रामकृष्ण और फिर क्या है पता है? गुजरात के कुछ कुछ साधुओं के मन में ऐसा आ गया है कि हमको यह स्वामी नारायण हमारा मॉडल है। हमको स्वामी नारायण को फॉलो करना है। उनकी तरह बड़े-बड़े प्रोग्राम करने हैं। उनकी तरह बड़ी-बड़ी पूजाएं करनी है। उनकी तरह बड़े-बड़े उत्सवों का पालन करना है। उनकी तरह हजारों भक्तों को इकट्ठा करना है। उनकी तरह यह तीर्थ यात्राएं करवानी है। हमको पूरा अभी स्वामी नारायण को फॉलो करना है। क्योंकि एक समय था जबकि भारत गरीब था तो हमको रिलीफ एक्टिविटी करने की जरूरत थी। भारत में एजुकेशन सिस्टम नहीं थी। बोल कर के हमको स्कूल चलाने की जरूरत थी। भारत में यह हेल्थ सिस्टम कार्य नहीं कर रही थी। बोल करके हमको यह हॉस्पिटल डिस्पेंसरी, मोबाइल डिस्पेंसरी वगैरह चलाने की जरूरत थी। किंतु अभी क्या है कि भारत में खास करके गुजरात की जो मैं बात कर रहा हूं। मेरा जो अनुभव है उससे कि वहां पर इनफ प्रोस्पेरिटी है कि आपको एक नई स्कूल चलाने की जरूरत नहीं। ऑलरेडी हजारों स्कूलें हैं। कोई नई चैरिटेबल डिस्पेंसरी चलाने की जरूरत नहीं। ऑलरेडी हजारों चैरिटेबल डिस्पेंसरीज है। कोई नया यह जो अन्न सदाव्रत अन्नव्रत चालू करने की जरूरत नहीं। ऑलरेडी हजारों अन्नव्रत सदाव्रत है। अभी बस कल्चरल एक्टिविटीज पे कल्चरल एक्टिविटीज करते जाइए। भक्तों को इकट्ठा करते जाइए। तो यह एक मेंटालिटी मैंने वहां पर देखी है और सिर्फ वहां पर ही नहीं बहुत सारी जगह पर अपने ही ऑर्डर में ऐसे सीनियर साधुओं को भी बोलते सुना है कि अभी वह जो रिलीफ एक्टिविटी या तो सर्विस एक्टिविटी की जरूरत नहीं रही। वी आर प्रोस्पेरस इनफ। अभी हमको करना है यह कल्चरल एक्टिविटीज। यह यंग लड़कों के साथ में काम करना है। यंग जनरेशन को अट्रैक्ट करना है। यंग जनरेशन जो है उनको आध्यात्मिकता के पाठ पढ़ाने हैं। तो आप यह सब कीजिए। मेरा उससे कोई विरोध नहीं है। मैं खुद काफी एक कल्चरल एक्टिविटी में वहां पे भी पार्टिसिपेट किया था। यहां पे भी कर रहा हूं। किंतु मेरा जो बात कहना है देखिए कि रामकृष्ण मिशन जो है ना ही स्वामी नारायण है ना ही ये जैसे अरुणाचलम या जो यहां पे जो इन रमण महर्षि के जो फॉलोअर्स हैं उनकी तरह ना ही कोई फिलॉसोफिकल ऑर्गेनाइजेशन है ना ही यह रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन है इन द सेंस के हम यह रिलीजियस पूजा पाठ पे ज्यादा ध्यान देते हैं। दिस इज अ मिशन स्टार्टेड बाय स्वामी विवेकानंद एंड द सोल पर्पस और लेट मी से कोर पर्पस ऑफ़ रामकृष्ण मिशन इज़ टू बिल्ड अप इंस्टीटशंस व्हिच विल एक्ट एज अ स्काफोल्डिंग स्टिल स्काफोल्डिंग विल प्रोप अप एंटायर कंट्री जो रामकृष्ण मिशन का जो असली उद्देश्य है वो एक तरह का स्टील का स्केलेटोन खड़ा करना है जो कि इस पूरे देश को अपने कंधे पर उठा के चले। तो यह जो इंस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट है वो हमारा असली मिशन है। वह हमारा असली कंट्रीब्यूशन है। आप पूछेंगे इंस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट कैसे होगा? या मैं अपने कमरे में बैठ के 10 बार जोर-जोर से इंस्टीट्यूशन इंस्टीट्यूशन बोल के चिल्लाऊंगा तो क्या इंस्टीट्यूशन डेवलप हो जाएगा? ऐसे नहीं होगा। तो कैसे होगा? देखिए कि जितने भी इंस्टीटशंस है वहां पे हमारा एक-एक एक साइड इंस्टट्यूट अब जैसे कि अपना एक कोर इंस्टीट्यूशन है मोनेस्टिसिज्म। इसके बाद में अभी भारत में कौन से फंडामेंटल इंस्टीटशंस की जरूरत है? तो एक है एजुकेशन सिस्टम। तो अपना एक एजुकेशन सिस्टम होना चाहिए जो कि भले ही चाहे कम स्टूडेंट्स को वह कैटर करता हो भले ही हमारे स्टूडेंट कम हो किंतु वो एक एक मैप खड़ा एक आदर्श खड़ा करें कि हां कि जो भी स्कूल कोई नया आदमी चालू करना चाहता है तो आकर के देख के सीखेगा कि हां रामकृष्ण मिशन की जो स्कूल है वो आइडियल स्कूल है। यहां पे जो प्रैक्टिससेस है, यहां पे जो एजुकेशन फिलॉसोफी है, यहां की जो ये टीचिंग मेथोडोलॉजी है, यहां पे जिस तरह से स्टूडेंट को तैयार किया जाता है, फिजिकली, मेंटली, इमोशनली, स्पिरिचुअली सब तरह से व्हिच इज़ एन आइडियल। तो एक एजुकेशन आइडियल हमको एस्टैब्लिश करना है और इस एजुकेशन आइडियल के आसपास में एक एजुकेशन सिस्टम बिठानी है। भले ही चाहे कम स्टूडेंट हो किंतु बहुत ही एफिशिएंटली इफेक्टिवली पावरफुली यह सिस्टम काम करें और उसको देखकर के बाकी सब लोग इससे सीखें कि हां एजुकेशन सिस्टम हो तो रामकृष्ण मिशन जैसी हो। तो यह हो गया एजुकेशन सिस्टम के बारे में। इसी तरह से एक हेल्थ सिस्टम है। तो एक हेल्थ की एक फ आरोग्य आरोग्य सिर्फ यह नहीं है कि आप एक ऑर्थोपेडिक को लाके बिठा दीजिए। एक आप एमबीबीएस को एमडी को लाके बिठा दीजिए। नहीं हेल्थ की एक पूरी फिलॉसोफी है। आरोग्य है जो माइंड एंड बॉडी कॉम्प्लेक्स जो है हमारा मन में जब विकार प्रकट होते हैं तो उसी की वजह से शरीर पे उसकी असर होती है। तो यह जो आयुर्वेद का जो पूरा शास्त्र है कि कहां किस तरह से माइंड बॉडी कनेक्टेड है और किस तरह से यह जो अल्टरनेट मेडिसिन है आयुर्वेद हो ना कि ये फिर ये योगिक जो सब पंच पंचकरण ये जो है ना वो पंचक्रियान जो भी कहते हैं। तो यह जो मेथड्स है बिना किसी ये केमिकल को भीतर में डाले हुए बिना किसी सर्जरी के किस तरह से लाइफस्ट चेंज करने से आपका आरोग्य जो है वो स्वस्थ रहेगा। वह सब सिस्टम्स जो है अह माने इवन कंप्यूटर साइंस है। इवन मैथमेटिक्स है। देखिए अपने महान महाराज जो है वो टीआईएफआर में रिसर्च कर रहे हैं। ये जो विदेश में आप देखिए यह जो ऑक्सफोर्ड वगैरह क्या था? वो तो क्रिश्चियन सेमिनरीज थी। बाद में तो बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज हुई। यह न्यूटन कौन था? न्यूटन तो वहां पे वो एक एज ए प्रीचर का वो ट्रेनिंग लेने के लिए गया था। उसमें से उसने ये फिजिक्स है। इसके फंडामेंटल ग्रेविटी के लॉस खोज निकाले। तो क्या है जो फ्रंटियर जो साइंस है वो चाहे एआई हो ना कि चाहे मैथमेटिक्स हो ना कि चाहे फिजिक्स हो ना कि चाहे एजुकेशन हो ना कि चाहे आरोग्य हो। माने हेल्थ सिर्फ नहीं आरोग्य संस्कृत वर्ड माने उसके बारे में कहा जाता है हेल्थ इज नॉट नियरली एन एब्सेंस ऑफ डिसीज। हेल्थ इज द हैप्पीनेस ऑफ आवर बॉडी। माने व्हिच इज़ वेरी पावरफुल स्टेटमेंट कि माने मेरे देह में रोग नहीं है। इसका माने मेरा हेल्थी होने का क्या अर्थ है? मेरे देह में रोग नहीं है बोल के मैं हेल्दी हूं। नहीं अपना जो बॉडी है वो एकदम लाइट महसूस होना चाहिए। हम फिजिकली एंड मेंटली फिटनेस हमको महसूस होनी चाहिए। तभी तो कहेंगे कि हम लोग हेल्दी हैं। तो आरोग्य है। ये जितने भी फील्ड है वहां पे फ्रंट लाइन रिसर्च होता हो। वो फ्रंट लाइन रिसर्च के आसपास में एक सिस्टम एक इंस्टीट्यूशन बने हो और वो सिस्टम्स और इंस्टीटशंस बिकम एन आइडियल जो कि बाकी जितने भी आरोग्य हेल्थ के रिलेटेड जितने भी इंस्टीट्यूशन है वे लोग सीखे कि हां रामकृष्ण मिशन जिस तरह से कार्य कर रहा है उसको हमको फॉलो करना है। यह टीआईएफआर जैसा अपना अभी जैसे अपना मैथमेटिक्स डिपार्टमेंट है विवेकानंद यूनिवर्सिटी में बेलूर मठ में स्वामी जी का ड्रीम था कि मैं बेलूर मठ को एक यूनिवर्सिटी के रूप में देखना चाहता हूं। यहां पे एक वेद विद्यालय रहेगा कि जहां पे भारतीय संस्कृति है, भारतीय कल्चर है, संस्कृत भाषा है, उसमें फंडामेंटल रिसर्च होगा और जितनी भी ये लुप्त ब्रांचेस है, वेद की कितनी ब्रांचेस है जो कि लुप्त हो चुकी है। आज वो ठाकुर की वो जो फेमस कहानी है, ठाकुर कहते हैं कि वेद में एक होमा पंखी की कहानी आती है कि ऐसा पंखी जो कि सतत हवा में उड़ता है। फिर वह वहां से उसका अंडा प्रकट होता है तो अंडा जमीन पे गिरता जाता है। किंतु गिरते गिरते ही अंडे में से बच्चा प्रकट होता है। फिर बच्चा जैसे ही देखता है कि जमीन पर गिरूंगा तो मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे तो सीधा वो वहां से हवा में उड़ना शुरू कर देता है। तो फिर कोई कोई पूछता है कि महाराज हमने तो वेद में देखा इस तरह की होमा पंखी की कहानी नहीं है। तो फिर सीनियर साधु आपको उत्तर देंगे कि देखिए वेद की तो बहुत सारी शाखा प्रशाखाएं थी जो कि बहुत सारी लुप्त हो चुकी है इस्लामिक आक्रमण के दरमियान तो फिर यह लुप्त हुई अभी जो लुप्त हो गया है उसको रिजरेक्ट करना फिर से खोज निकालना संभव है नहीं है पता नहीं किंतु ऐसा तो कुछ करो कि जैसे जो बचा है वह भी हाथ से ना चला जाए यानी कि देखिए जिस रेनेसा जिसको कहते हैं वेस्टर्न कंट्रीज में रेनेसा रेनेसा का क्या अर्थ है? रिब्थ ऑफ लर्निंग। वहां पे भी एक अंधेरा युग डार्क एजेस चल रहा था यूरोप में। और इस्लामिक सिविलाइजेशन उस समय काफी वो माने कल्चरली साइंटिफिकली एडवांस थी। किंतु जैसे ही यूरोप में रहने सा प्रारंभ हुआ। एक के बाद एक यूनिवर्सिटी ने जो ग्रीक के समय का रोम के समय का जो लिटरेचर साइंस वगैरह को फिलॉसोफी को स्टडी करना और उसके ऊपर में फर्दर डेवलप करना प्रारंभ किया। तो वहां से ही तो यूरोप की ये जो करंट आज की मॉडर्न प्रोस्पेरिटी है उसका फाउंडेशन ही ये रेनेसा से स्टार्ट हुआ है। तो आप देखिए कि ग्रीक विद्या का पुनरुद्धार करके यूरोप और अमेरिका आज इतना एडवांस हुए हैं तो अपनी जो संस्कृत विद्याएं हैं उसका यदि हम पुनरुद्धार करें तो भारत आज भविष्य का भारत कितना एडवांस नहीं हो सकता। देखिए
भारत की आध्यात्मिकता + अमेरिका का विज्ञान = नई सभ्यता
यहां पे भी दो तरह के माने एक दूसरे तरह के लोग होते हैं। कोई कोई मुझे कहता है। कोई साधु ही मुझे कहते हैं। अच्छा तुमको पता है हमारे पास में पुष्पक विमान था। मैंने कहा महाराज देखिए वो पुष्पक विमान था नहीं था। इसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं है। किंतु ऐसा ना हो जाए कि पुष्पक विमान के चलते-चलते ये जो मॉडर्न एरो डायनेमिक्स टेक्नोलॉजी जो है मॉडर्न जो एयररोनॉटिक्स है एोडायनेमिक्स है एिएशन टेक्नोलॉजीस है उसको कभी हम ना भूल जाए। ऐसा पागलपन ना हो जाए कभी। तो क्या है कि यह बात भी ख्याल में रखनी है। कोई अब जैसे कि कुछ-कुछ मैंने देखे हैं इस तरह के तथाकथित रिसर्च इंस्टीट्यूशन वहां पर काम करने वाले लोगों को आप मिलेंगे तो बोलेंगे हमारे पास ब्रह्मास्त्र था। फिर ये जेनेटिक टेक्नोलॉजी थी। फिर यह प्लास्टिक सर्जरी थी। अच्छा है। होगा नहीं होगा था नहीं था पता नहीं। वर्तमान में तो नहीं दिख रहा। किंतु साथ-साथ में ही वे लोग ऐसा बोलना शुरू कर देते विदेश से जो आया है ना उसको छोड़ देना है। तब मुझे बड़ा डर लग जाता है। अरे भैया म माया मिली ना राम ऐसा ना हो जाए। माने अपना पुराना जो था लुप्त हो चुका वो तो अभी वापस आया नहीं है और विदेश से जो मेहनत करके हम लाए हैं हमारे इंजीनियर आईआईटी के आईआईएससी के आईआईएम के वो जो मेहनत करके जो कुछ लाए हैं उसको कहीं भगा ना दे तो फिर वही वो हजार साल वाली गुलामी कहीं फिर से ना आ जाए। वह एक मुझे बड़ा डर लगता है। यह ट्रेडिशनलिस्ट है, ऑर्थोडॉक्स लोग हैं उन लोगों की बातें सुनकर के। सो यह एक पूरा देखिए स्वामी जी के पास में एकदम परफेक्ट सॉल्यूशन है। टेक द बेस्ट ऑफ द ईस्ट, टेक द बेस्ट ऑफ द वेस्ट एंड कंबाइन इट टू क्रिएट ए न्यू मॉडर्न पावरफुल सिविलाइजेशन। इसमें अभी नहीं समझने वाली बात क्या है? तो कोई पागल होते हैं। वेस्ट का ही सब अच्छा है। इंडिया का सब गलत है और उससे रिवर्स टाइप के पगले होते हैं। वेस्टर्न कंट्रीज को, वेस्टर्न कल्चर को, वेस्टर्न लर्निंग को भगाओ और सब स्वदेशी अपनाओ। यह अंधे स्वदेशी भक्त है। यह अंधे वेस्टर्न भक्त हैं। यह दोनों गलत है। स्वामी जी को समझिए कि देखिए कि किस तरह से भारत के पुनरुद्धार का पुनरुत्थान का स्वामी जी संदेश देते हैं। सो दैट इज अकॉर्डिंग टू
महान राष्ट्र का रहस्य: सशक्त संस्थाएँ
मी। जब स्वामी जी यह कहते हैं कि भारत का मिशन है लाइट स्पिरिचुअल। भारत का मिशन है कि हमारी जो स्पिरिचुअल एनर्जी है उसको कंजर्व करना है और पूरे विश्व में जैसे कि एक प्रकाश की तरंगों की तरह फैल जाना है। उसके पीछे में यह सब फंडामेंटल थिंकिंग पड़ा हुआ है। हमको इंस्टीटशंस बनाने होंगे। बिना इंस्टीट्यूशन के कुछ होने वाला नहीं है। आज अमेरिका के इंस्टीटशंस देखिए माने अभी तक तो इतने स्ट्रांग है कि वो ट्रंप जैसा पगला भी आकर के बैठा है तो भी वहां की जुडिशियल सिस्टम है। वहां की पुलिस सिस्टम लॉ एंड ऑर्डर सिस्टम है। वहां की लेजिसलेटिव सिस्टम है। वह 100% करप्ट नहीं हो गई है। वो फिर भी अपना थोड़ा बहुत मेंटेन करके चलती है। जबकि भारत में या तो जिसको कि तथाकथित को सो कॉल्ड थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज कहते हैं ना वहां के इंस्टीट्यूशन कंप्लीटली करप्ट हो चुके हैं। आज एक डिक्टेटर आ गया सत्ता में पाकिस्तान का ही अगेन उदाहरण वो मिलिट्री डिक्टेटर आ गया सत्ता पे तो उसने कंट्री के जितने भी इंस्टीट्यूशन थे जुडिशियल इंस्टीट्यूशन, लॉ एंड ऑर्डर इंस्टीट्यूशन, लेजिसलेटिव इंस्टीट्यूशन सबको खत्म करके रख दिया। सब अपने खुद की सत्ता प्राप्ति के लिए सभी इंस्टिट्यूशन को उसने कर दिया। तो देखिए ये चेक एंड बैलेंस का कांसेप्ट अगेन अमेरिका का ये कांसेप्ट कि चेक एंड बैलेंस होना चाहिए। लेजिसलेटिव ब्रांच है, जुडिशियल ब्रांच है। ये एग्जीक्यूटिव ब्रांच है। तो वहां पे ऐसा ना हो जाए कि किसी एक ब्रांच के पास में एक्सेसिव पावर आ जाए तो चेक एंड बैलेंस करके रखना है। तो अभी भारत में भी इंस्टीटशंस आफ्टर इंस्टीटशंस बनने चाहिए। कोई एक इंडिविजुअल करप्ट निकल गया तो ऐसा ना हो जाए कि उसकी वजह से इंस्टिट्यूशन करप्ट हो जाए। इंस्टिट्यूशन का इंटीग्रिटी है। अब जैसे आप कैथोलिक चर्च को ही देखिए ना कितना करप्शन कैथोलिक चर्च में नहीं हुआ है। एक ऐसा पूरा पीरियड गया है कि पॉप आफ्टर पॉप आफ्टर पॉप करप्ट के बाद करप्ट निकलते ही गए हैं। किंतु फिर भी देखिए कि कैथोलिक कैथोलिसिज्म और ये जो इंस्टीट्यूशन है कैथोलिक चर्च उसने काफी अच्छा कार्य भी किया है। बहुत सारे देश में ये जो एजुकेशन सिस्टम है, हेल्थ है, ये जो जनरल एक धर्म का संदेश है, वह सब फैलाने का कार्य उन लोगों ने किया है। तो देखिए कि इंस्टीट्यूशन शुड बी स्ट्रांग इनफ, रेिलिएंट इनफ माने विज़नरी इनफ कि 10-15 लोग इधर-उधर करप्ट निकल भी जाए तो अपना ऑर्गेनाइजेशन जो है ये इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क है। उसको कोई हानि ना हो जाए। उसका जो हजार साल लंबा जो मिशन है एज अ स्टेडी एंड स्लो एंड स्टेडी पेस पे वो चलता ही रहे। चलता ही रहे। सो दिस इज हाउ आई थिंक के रामकृष्ण मिशन इज अ स्पेशल टाइप ऑफ ऑर्गेनाइजेशन। अवतार का ऑर्गेनाइजेशन है। वेस्टर्न सिविलाइजेशन के बिल्ड अप में कैथोलिक चर्च का जो अवदान है, किस तरह से कैथोलिक चर्च के प्रभाव से ही यह जो ऑक्सफोर्ड है, कैंब्रिज है, वगैरह यूनिवर्सिटी स्टार्ट हुई। किस तरह से वहां पर यह जो मोनेस्टिक इनफ्लुएंस से प्रभावित होकर के एक इंटेलेक्चुअल जो क्यूरियोसिटी प्रकट हुई उसमें से ही तो यह न्यूटन वगैरह है जिन्होंने ये ग्रेविटी वगैरह जो नियम खोज निकाले हैं। तो क्या है कि आर्ट है, कल्चर है वगैरह सब तो यह कैथोलिक चर्च के पेट्रोनेज के ऊपर में ही तो धीरे-धीरे करके डेवलप हुआ है। तो क्या है कि रामकृष्ण मिशन को भी जिस तरह से फ्रंटियर सिविलाइजेशन होती है इसी तरह से फ्रंटियर इंस्टीटशंस होते हैं। फ्रंटियर इंस्टीट्यूशन या तो फिर ये जो अवतार द्वारा स्थापित इंस्टीट्यूशन होते हैं उनका कार्य होना चाहिए टू अब जैसे ये वेंचर कैपिटल होते हैं ना वेंचर फंड होते हैं। वे लोग क्या करते हैं कि कंपनियों को माने वो ये करते हैं एंटरप्रेन्योरशिप को एनकरेज करते हैं। यह जो इनक्यूबेशन सेल होते हैं बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी में वहां पर आप आईडिया ले जाइए तो वे लोग आपको बताएंगे कि आपके आईडिया को प्रैक्टिकल कैसे करना है। इनक्यूबेट कैसे करना है। किस तरह से आपका स्टार्टअप आपको स्टार्ट करना है। आपको एकाउंटिंग हेल्प चाहिए तो हम करेंगे। मैनेजरियल हेल्प चाहिए तो हम करेंगे। यह सीड कैपिटल चाहिए तो हम लेके आएंगे। वेंचर कैपिटलिस्ट चाहिए तो हम आपको कनेक्शन बिठा देंगे। आई आई थिंक आईआईटी बॉम्बे में भी इस तरह का एक इनक्यूबेशन सेल है जो कि नई-नई कंपनी स्टार्ट करने में हेल्प करता है। सो रामकृष्ण मिशन शुड बी लाइक दिस दैट इनक्यूबेशन सेल कि एक के बाद एक इंस्टीट्यूशन अभी जैसे आरएसएस है आरएसएस वैसे एक सुपर ऑर्गेनाइजेशन है किंतु उसकी जो शाखा प्रशाखाएं हैं। मैं जब रांची में था तो मैंने सिर्फ दो ही इंस्टीट्यूशन को देखा कि ये मैंने नॉन क्रिश्चियन इंस्टीट्यूशन को जो कि ये ट्राइबल लोगों के बीच में काम करते हैं। एक तो रामकृष्ण मिशन है। दूसरा ये आदिवासी कल्याण आश्रम है आरएसएस का। तो देखिए कि आरएसएस ने भी ऐसे बहुत सारे स्टार्टअप्स आज की लैंग्वेज में कहे तो स्टार्टअप्स को इनक्यूबेट किया है। फिर इसी स्टार्टअप सरस्वती शिशु मंदिर है, सरस्वती विद्यालय है। तो क्या है कि एक-एक फील्ड में जाकर के उन्होंने एक-एक स्टार्टअप स्टार्ट कर दिया है। विवेकानंद केंद्र है। तो स्टार्ट कर दिया। फिर वो अपने से पनप रहा है। अपने से चल रहा है। सो रामकृष्ण मिशन शुड बी लाइक दिस इनक्यूबेटिंग फ्रंटियर इंस्टीट्यूशन कि हमको प्रत्येक फील्ड में एक सीड छोड़ देना है। ठाकुर मास्वामी जी का अब आर्ट और कल्चर के बारे में इस तरह का थिंकिंग था। अभी उसके ऊपर में एक इंस्टीट्यूशन ये कला निकेतन है जैसे कि रविंद्रनाथ टैगोर का इस तरह का यह एक इंस्टीट्यूशन हमने इनक्यूबेट करके छोड़ दिया। फिर वो उड़े गिरे जमीन पे जो भी हो वो वो जाना है। तो है ना तो दिस इज व्हाट आई फील आई बिलीव दिस इज द मेन मिशन ऑफ रामकृष्ण मिशन। तो आज यहीं तक अभी इसके बाद में नेक्स्ट क्लास में बात करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: उपनिषद् महान शक्ति की खान कैसे हैं? हमारी आध्यात्मिकता हमें महान कैसे बनाती है?
यहां पे की क्वालिटी क्या है? पता है जब हम मैनिफेस्टेशन की बात करते हैं ना की क्वालिटी इज क्रिएटिविटी बिकॉज़ आज वेस्टर्न कंट्रीज है उनका फाउंडेशन ऑफ स्ट्रेंथ कहां पे है? तो यह नोबेल प्राइज विनर्स एक के बाद आप देखिए एक यह जो मॉडर्न हिस्ट्री में ही आप देखेंगे अभी जैसे ही डेमिस हसाबिस को नोबेल प्राइज मिला। उसने क्या किया? वो अल्फा फोल्ड बोल के कंप्यूटर डेवलप किया है। तो वह जो क्या है प्रोटीन फोल्डिंग जो पैटर्न है उसको प्रिडिक्ट करता है। नाउ समथिंग अराउंड 2 मिल 200 मिलियन प्रोटीन है। अभी उसको फोल्ड करना सीख लेंगे तो आप इसके पीछे में जो ड्रग डिस्कवरी है वो मिलियन टाइम वो एक्सलरेट हो जाएगी। तो अभी जस्ट मैं रिसेंटली पढ़ रहा था कि नियरली 2 मिलियन रिस्चर वर्ल्ड वाइड आर यूजिंग दिस अल्फा फूड मेथड टू एक्सलरेट दी ड्रग डिस्कवरी। तो इट्स अ प्योर क्रिएटिविटी। क्रिएटिविटी इज़ द फाउंडेशन ऑफ देयर स्ट्रेंथ। फिर ये क्रिएटिव आइडियाज जो एक के बाद एक निकलते हैं, उसमें से तो यह फिर टेक्नोलॉजी डेवलप होता है, इंजीनियरिंग डेवलप होता है। वही तो उनकी नेशनल स्ट्रेंथ का आधार है। बट व्हाट इज बिहाइंड द क्रिएटिविटी? दैट इज़ मेडिटेशन। दैट इज़ स्पिरिचुअल लाइफ। यदि इफ यू कैन मेडिटेट प्रॉपर्ली एंड वेल इट विल ओपन द गेटवेज़ ऑफ़ क्रिएटिविटी। ये जो सुपरकॉन्शियस गेटवेज़ जो है ओपन हो जाएंगे। वो आइंस्टाइन के पास में जो एक म वही जो फेमस विचार आइंस्टाइन बैठ के वो थॉट एक्सपेरिमेंट कर रहा है कि व्हाट हैपंस? कि यदि मैं इफ आई फ्लाई एट द स्पीड ऑफ़ लाइट। मैं प्रकाश की स्पीड के साथ में ही यदि मैं उड़ता हूं तो मुझे क्या दिखाई देगा? क्या मुझे प्रकाश का किरण स्थिर दिखाई देगा? नहीं। व्हिच इज़ अ की ब्रेक थ्रू। माने प्रकाश के किरण की गति जो है 3 लाख कि.मी. पर सेकंड मैं खुद यदि 3 लाख कि.मी. पर सेकंड से उड़ता हूं तब भी मुझे प्रकाश का किरण 3 लाख कि.मी. पर सेकंड की दृ स्पीड से ही उड़ता हुआ दिखाई देगा। व्हिच इज़ सच अ काउंटर इंटू इट। अब जैसे आप ट्रेन है, ट्रेन के पैरेलल रास्ता है। ट्रेन की स्पीड है 60 कि.मी. पर आवर। आप स पास के रास्ते में 60 किमी/आवर में कार में मुसाफरी कर रहा है। तो आपको तो ट्रेन आपके साथ में ही चलती दिखेगी ना। आपको तो ट्रेन फिक्स ही दिखेगी। मैं तीन नंबर के डिब्बे के साथ में चल रहा हूं तो वह तीन नंबर का डिब्बे के साथ में ही मैं चलता रहूंगा। बट ऐसा होगा क्या कभी कि ट्रेन भी चल रही है 60 किमी पर आवर आपकी गाड़ी भी चल रही है 60 किमी पर आवर किंतु आप ट्रेन को देखते हैं कि वो फिर भी 60 किमी पर आवर की दृष्टि से चल रही है व्हिच इज सो काउंटर इनटिव कि इसी में से यह मॉडर्न रिलेटिविटी का जन्म हुआ राइट सो ये प्योर क्रिएटिव फ्लैशेस है न्यूटन का वो जो क्रिएटिव फ्लैश कि वो एप्पल जमीन पे ही क्यों गिरता है आकाश में क्यों नहीं जाता सो, दीज़ आर द स्ट्रेंथ ऑफ़ देयर सिविलाइज़ेशन। अभी यदि हम इसी क्रिएटिविटी को एक इंडस्ट्रियलाइज्ड फॉर्म दें, माने एक यदि एक ऐसा फॉर्म दे कि सिर्फ न्यूटन या आइंस्टाइन इस तरह के जो चंद चुनिंदा व्यक्ति है जिन लोगों के पास में इस तरह का फ्लैश ऐसा हुआ। माने ऐसा फ्लश कि जैसे पूरा ह्यूमन सिविलाइजेशन जल माने झलमल हो गया। ऐसा एक फ्लैश ऑफ क्रिएटिविटी वो कैसे फ्लैश ऑफ क्रिएटिविटी होता है किसके दिमाग में आता है? यह सब कंप्लीटली अननोन है उनके लिए। जबकि हम लोग कहते हैं कि दिस फ्लैशेस ऑफ क्रिएटिविटी कैन बी कस्टम मेड। जिसके दिमाग के भीतर में चाहे हम ला सकते हैं। हम जिस प्रोसेस को कहेंगे अष्टांग योग यह राज योग की मेथड जो है फॉलो कीजिए। देखिए यह फ्लशेस ऑफ क्रिएटिविटी बिकम एज रेगुलर एज प्रेडिक्टेबल एंड एज अंडर आवर कंट्रोल एज लाइक ब्रीथिंग है फिर यह जो हमारी जो भी दैहिक क्रियाएं हैं जितना अपने कंट्रोल में है इतना ही कंट्रोल में ये क्रिएटिविटी आ जाएगा। सो दैट वी शुड एम फॉर कि अपने पास में यह प्राण का विज्ञान है। आकाश और प्राण का स्वामी जी का कांसेप्ट है। राजयोग का विज्ञान है। डेवलप इट टू सच एन एक्सटेंट। फ्रंटियर लेवल पर काम करना है ना। एजुकेशन फील्ड में काम कीजिए। गवर्नमेंट की 1000 स्कूल है। किंतु ये 1000 स्कूल में से मुश्कि एक भी आपको साइंटिस्ट बनेगा नहीं उसमें से। वही 1000 स्कूल में जो बच्चे पढ़ते हैं आठवीं नौवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाई माने अपना नाम लिखना नहीं आता। वो जो क्वालिटी है उन लोगों की हमारी एक स्कूल है वो जो कहते हैं ना कि वो सोने की 100 माने सुनार जो होता है गोल्ड स्मिथ वो 100 बार हथौड़ी मारता है और वो जो लुहार होता है वो एक हथौड़ा मारता है। सो अपना एक स्कूल हो किंतु इस तरह से अपने एजुकेशन सिस्टम डेवलप किया है पूरा राजयोग और वेदांत को इकट्ठा करके कि वहां पे क्रिएटिविटी बिकम्स एन इंडस्ट्रियलाइज्ड कस्टमाइज्ड कमोडिटी। हम जब चाहे जिस फील्ड में चाहे जिस डायरेक्शन में चाहे हम क्रिएटिव फ्लैशेस को जन्म दे सकते हैं और उसमें से एक के बाद एक नए साइंस नए रिसर्च पेपर नए ये पैटर्न्स डेवलप होती रहेगी व्हिच विल बिकम द फाउंडेशन ऑफ इंडियास प्रोस्पेरिटी ओम