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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 30 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन इस सप्ताह हम देखेंगे ये एक स्लाइड शो शो जो कि मैंने बनाया है। इसको हम देख रहे थे। तो यह 11वां नंबर का स्लाइड है। 11th स्लाइड। इसके पहले वाले जो भी थे वह हमने ऑलरेडी देख लिए हैं कि किस तरह से स्वामी जी सर्वप्रथम तो एक फाउंडेशन बिठाते हैं। स्वामी जी के समय के

भारत की अवनति का कारण है ब्राह्मण की मेधा और बौद्ध की करुणा - इन दोनों में विच्छेद

भारत की अवस्था तो हम सबको पता ही है कि किस तरह से ब्रिटिश राज और उसके पहले ये इस्लामिक आक्रमण इन दोनों की वजह से हम हिंदू लोगों का धीरे-धीरे करके राजनैतिक पतन होना शुरू हुआ था और इससे भी पहले थोड़ा सा देखें तो किस तरह से बुद्धिज्म की आगमन की वजह से एक एक्चुअली ुअली बुद्धिज्म क्या है? हमको पता ही है कि वैदिक धर्म के सामने एक तरह का रेबेलियन वैदिक धर्म जब बहुत ज्यादा क्रियाकांड में डूब गया, बहुत ज्यादा यह बलि प्रथा है या तो फिर यह नात जात वगैरह में बटना शुरू हो गया। उस समय एक रेबेलियन के रूप में क्षत्रिय लोगों ने बुद्धिज्म को अपनाया था। स्वामी जी ने कहा है एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट भारत के इतिहास के बारे में स्वामी जी का कि स्प्लिट बिटवीन बुद्धिस्ट हार्ट एंड ब्राह्मणिक ब्रेन दैट इज द रीजन ऑफ इंडियास डाउनफॉल यह बुद्ध लोगों का हार्ट और यह ब्राह्मण लोगों का ब्रेन इन दोनों के बीच में जो स्प्लिट हुआ एक जो डिफरेंस खड़ा हो गया यह कारण है कि भारत का पतन उस समय से प्रारंभ हुआ था। क्या कहना चाहते हैं स्वामी जी? यह तो एक और है क्षत्रिय जो कि हमेशा आत्मन या तो फिर एक कहेंगे कि नात, जात, जाति, वर्ण, लिंग इन सब से परे एक सुप्रीम रियलिटी है। उसका वे लोग गान करते थे। उसका वे लोग उपदेश देते थे। क्षत्रिय और जो ब्राह्मण है हमेशा एक तरह से यह जो वेद का यह जो संहिता पोर्शन है विधि विधान कर्मकांड पोर्शन है उसमें हमको बांध करके रखना चाहते थे। तो यह दो फोर्सेस भारत में उस समय ऑलरेडी उपस्थित थी। ब्राह्मण धर्म जो है या तो ब्राह्मी स्ट्रीम जो है उसका एक सातत्य है कि ब्राह्मण कौन है जो कि उसका हृदय स्वच्छ है जो कि धार्मिक नीति नियमों का पालन करता है जो कि अपने जीवन को ईश्वर समर्पित करता है तो वह यदि उसके सद्गुण है तो सामने में इस प्रथा के प्रॉब्लम के साथ में क्या था कि जाति प्रथा को बहुत ही ज्यादा रिस्ट्रिक्टेड करना करना उन्होंने शुरू किया था। क्षत्रिय लोगों का था कि हां इतना ज्यादा नीति नियम धर्म वगैरह का पालन ना करें शायद किंतु हृदय उदार था और जो अनफॉर्चूनेट है कुचड़े हुए हैं पदलित है उनके प्रति उनकी सहानुभूति थी। तो उन्होंने खास करके क्षत्रिय लोगों ने यह ब्रह्म ज्ञान का ज्यादा से ज्यादा फैलावा किया और ब्राह्मण लोगों ने यह एक तरह से नैतिकता है। वेद के प्रति निष्ठा है। एक सदाचार एक संयम युक्त जीवन है। उसका प्रचार किया। यह दोनों यदि साथ में रहते तो कितना अच्छा होता कि यहां पर एक ब्राह्मण का लाइफ स्टाइल है। सुबह से उठकर के ही एक के बाद एक जो क्रियाएं प्रक्रियाएं वो करता है। सब कुछ ईश्वर को समर्पित है। वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर के वह संध्या या तो फिर ईश्वर का नाम गुणगान करना फिर दिन भर जैसे-जैसे जाता है वेद का अध्ययन करना यजन याजन अध्यापन ये तीन थे ब्राह्मण के कार्य यजन याजन अध्यापन अर्थात कि यज्ञ करना यानी कि धार्मिक विधियां करना और फिर अह यजमान के घर जाकर के उनको उपदेश देना उनसे सीधा प्राप्त करना, भिक्षा प्राप्त करना और अध्ययन करना वेद का, संस्कृत का, संस्कृति का वगैरह तो वो एक ब्राह्मण लाइफस्ट यदि सबको मिलता और यहां पे क्षत्रिय का हृदय यदि सबको मिलता तो वह कितना अच्छा होता। आप ठाकुर के पिताजी को देखिए वो ब्राह्मण के उनको आप कह सकते हैं कि माने ही इज़ अ क्विंटसेंशियल ब्राह्मण। माने एक ब्राह्मण कैसा होना चाहिए। उसके आदर्श स्वरूप खुदीराम थे। किंतु उनका था कि फिर शूद्र के पास से वह भिक्षा ग्रहण नहीं करेंगे। तो यह एक माने टिपिकल ब्राह्मण के रूप में हम खुदराम को देख सकते हैं। अभी ऐसा नहीं कि खुदराम क्रूर है या तो खुदीराम कहीं जानबूझकर के लोगों का अपमान या तो लोगों को छोटा दिखाना चाहते हैं। वो परंपरा जो आ रही है उसी परंपरा में वह बड़े हुए हैं। और जैसे मां के पिताजी थे राम मुखोपाध्याय तो उनको तो आप देखिए कि जब वो अकाल पड़ा है तो सबके लिए वो अपने घर का अन्न भंडार खोल दिया है। खिचड़ी बना के गरम-गरम सबको खिलाते हैं। तो अभी वह भी तो एक निष्ठावान ब्राह्मण थे। तो ऐसा नहीं है कि निष्ठावान ब्राह्मण है तो आप दयालु या तो फिर कंपैजनेट नहीं हो सकते। बस वही बात है कि जिस नियम के भीतर में वो रहते हैं वो नियम जो है जाति प्रथा को बहुत ही ज्यादा पोषण देता है। जाति प्रथा को पोषक करता है। तो वो एक स्ट्रीम है। यहां पर देखिए कि क्षत्रिय वंश में भारत के तीन सर्वश्रेष्ठ महापुरुषों का आगमन हुआ है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान बुद्ध तीनों का हृदय देखिए कि आ चंडाल सभी को उन्होंने आलिंगनबद्ध किया है। सभी को जैसे कि उन्होंने ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया है। यह जो भी हायरार्की है हायरार्की को तोड़ देना है। यह जो ईश्वर की यह जो अमोग अमृतमय वाणी है वो खुले भर बाजार में सबके सामने वो उसको वितरण कर देना है। सबके सामने बिखेर देना है जो हरि लूट सबके सामने फेंको हरि का नाम सबके सामने फेंको यह आत्मज्ञान का संदेश और सबको इससे समृद्ध होने दो ब्राह्मण का है कि आपका ब्राह्मण कुल में जन्म होना चाहिए फिर यह जो उपनयन वगैरह सेरेमोनी की जानी चाहिए फिर तभी आप कहीं जाकर के ब्रह्म विद्या के अधिकारी होते हैं। तो इस तरह से उन्होंने और ऐसा नहीं है कि वे लोग इंटेंशनली क्रूर थे। बस वह जो सिस्टम को रिप्रेजेंट करते थे वह सिस्टम इटसेल्फ इनवाइटेड स्ट्रेटिफिकेशन इन इंडियन सोसाइटी। जिस सिस्टम के भीतर में ब्राह्मण रहते थे, वो सिस्टम ही भारत के भीतर में एक तरह से नाथ जात का यह जो डिफरेंशिएशन है उसको मजबूत किए जा रही थी। तो यहां पे है ब्राह्मण, यहां पे है क्षत्रिय। बहुत अच्छा होता कि ब्राह्मण का ब्रेन अर्थात कि ब्राह्मण का लाइफस्टाइल, ब्राह्मण का डिसिप्लिन, उनका ब्रह्मविद्या के प्रति निष्ठा सांसारिक चीजों के प्रति वितृष्णा यह सब कुछ किसी एक पर्सन में होता और साथ में ही क्षत्रिय का हृदय, क्षत्रिय की उदारता, क्षत्रिय की दुरंदेशी और क्षत्रिय की आत्मश्रद्धा उसमें होती। तो वो परफेक्ट एक कहेंगे कि वो धार्मिक लीडर बन सकता है। तो ऑफ कोर्स हमको तो पता है कि यह ब्राह्मण का ब्रेन और क्षत्रिय के हृदय की उदारता और आत्मश्रद्धा यह दोनों का संगम भगवान श्री रामकृष्ण में हुआ और यही संगम हमको उनके प्राइमरी डिसाइपल स्वामी विवेकानंद के भीतर में देखने को मिलता है। तो यह जो पूरा एनालिसिस है स्वामी जी का स्वामी जी कहते हैं कि बिकॉज़ ऑफ दिस स्प्लिट हो गया दोनों के बीच में। इसकी वजह से ही भारत का अधः पतन प्रारंभ हुआ। लंबे समय तक यह अधः पतन चलता रहा। किंतु अभी फिर से भारत को नींद से जगाने की जरूरत है। तमस का यह आवरण है उसको छिन्नभिन्न कर देना है। और इसके परे जो शाश्वत आत्म तत्व है जो कि हमारे पुरखों ने हमारे लिए वारसा में छोड़कर के गए हैं उसको फिर से अपनाने की जरूरत है। तो यह स्वामी जी का बेसिक एनालिसिस है। उस

साधक को आत्मज्ञान के साथ जगत कल्याण को भी स्वीकारना है

समय ऑलरेडी भारत का नवजागरण कैसे हो उसको लेकर के काफ़ी कुछ चिंतन चल रहा था। उसमें यह भी एक था कि भारतीय संस्कृति अभी इस हद तक वह मिट्टी में मिल गई है। जिस हद तक वो हमको हताशा निराशा की ओर उसने ले गया है कि यह संस्कृति के भीतर में अभी पुनः जागरण का कोई भी संभावना नहीं बोलकर के इसका त्याग करो और होलसेल विदेशी संस्कृति को खास करके यह वेस्टर्न कल्चर और वेस्टर्न क्रिश्चियनिटी इन दोनों को इंडिया में इंपोर्ट करो। ऐसा एक बहुत बड़ा दल उस समय भी था। आज भी है। बहुत सारे लोग कहते हैं कि हमको स्ट्रिक्टली सेुलर रहना है। थोड़ा सा भी हिंदू धर्म को फिर से पनपने देंगे। तो वो जो हजार साल की गुलामी जिस वजह से आन पड़ी थी वही सामाजिक जिसको कहते हैं कि सोशल स्ट्रेटिफिकेशन सामाजिक अन उदारता समाज में फिर से यह डिवीजन होना शुरू हो जाएंगे। यह इस कास्ट का है। यह इस कास्ट का है। वगैरह-वगैरह। तो देखिए कि अभी भी यह कशमकश जो है भारत का यह जो बुद्धिजीवी वर्ग है उसके मन के भीतर में चल रहा है। यह वेस्टर्न एजुकेटेड एलिट जो है आज भी यही सोचते हैं कि मॉडर्न भारत की आधुनिक भारत की जो कोई भी उपलब्धि है वो इसीलिए है कि हमने होलसेल ये वेस्टर्न सेकुलरिज्म वेस्टर्न एजुकेशन सिस्टम वेस्टर्न पॉलिटिकल सिस्टम वेस्टर्न गवर्नेंस वेस्टर्न आर्मी स्ट्रक्चर वेस्टर्न जुडिशियल स्ट्रक्चर ये हमने होलसेल जो अपना लिया है ये ब्रिटिश लोग भारत में यह जो आईसी सीएस उस समय का इंडियन सिविल सर्विस और आज का ये आईएएस इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन सर्विस ये जो स्टील स्ट्रक्चर खड़ा करके गए हैं इसी की वजह से भारत चल रहा है। इसी की वजह से भारत यूनाइटेड है। ये स्टील स्ट्रक्चर ये जो स्केलेटल जो कि ये ब्रिटिश लोग खड़ा करके गए थे इसको हटाओ। देखो दो दिन में भारत फिर से हजार टुकड़ों में बट जाएगा। तो देखिए कि जब यह लोग इस तरह की बातें करते हैं तो हमारे मन में जो कि रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद के फॉलोअ है हमारे मन में दो तरह की प्रतिक्रिया होती है। सर्वप्रथम तो यह है कि देखिए हमको यह पता है कि भारत का जो अमर वारसा जो कि भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान बुद्ध और यह जो उपनिषदों के ऋषि मुनि हमारे लिए रखकर के गए हैं। यह प्रस्थान त्रय के भीतर में उपनिषद है, ब्रह्मसूत्र है, श्रीमद्भगवत गीता है। और भी यह जो परंपरा जो चली आ रही है, यहां पर वेदांत परंपरा है। यहां पर वैष्णव परंपरा है। यहां पे शाक्त परंपरा है। यह जो तीन मेजर परंपराएं जो भारत में चली आ रही है, उसका रिचनेस तो हम लोग देखते हैं। उसका ये जो भारत की मिट्टी में उन्होंने जो कंट्रीब्यूट किया है वो तो हम देखते हैं तो हम ये भी देखते हैं और साथ में यह डर भी लगता है कि आधुनिक युग में हमको ऐसा कोई उदाहरण नहीं देखने को मिलता कि जहां पे हिंदू धर्म के सिद्धांत के अनुसार राज्य शासन चलाया गया हो और वह लंबे समय तक सक्सेसफुल हुआ हो। कुछ-कुछ प्रयास किए गए हैं। रजपुत राजाओं ने कुछ प्रयास किए थे। मराठी राजा खास करके यह शिवाजी ने कुछ प्रयास किए। यहां पे अहिल्याबाई है वगैरह आपको कुछ-कुछ प्रयास दिखते हैं। किंतु अल्टीमेटली यह सभी प्रयास ब्रिटिश शक्ति के सामने विफल हो चुके थे। और आज भी हम उसी चीज को फिर से देखते हैं। यहां पर हम देख तो रहे हैं पिछले 1015 साल से कि हिंदू धर्म का एक फिर से समाज में धर्म के प्रति उत्साह बढ़ रहा है। किंतु साथ में ही जो एक इंटरनेशनल परिस्थिति में हम अपने को पाते हैं। वह देखकर के फिर वही पुराना डर हमको लगने लगता है। हिंदू धर्म के आधार पर राज्य शासन चलाइए। देखिए हिंदू हमेशा हारता है जगत में तो और इसमें फिर हिंदू धर्म के अनुसार यह कुछ गलत भी तो नहीं है। माने धर्म अपने आप से कहता है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ये संसार में जो कुछ भी आप देख रहे हैं वह सब एक तरह के स्वप्न के अलावा और कुछ नहीं है। इसका त्याग करके अपने मन को ईश्वर अभिमुख करना है। तो यह एक हमारे मन में जो बैठ गया है कि हिंदू धर्म इज़ अधर वर्ल्डली रिलीजन। हिंदू धर्म है कि फ हिंदू लोग जो है वे लोग फेटलिस्ट है जो ब्रिटिश लोग यह उस समय प्रचार करते थे। हिंदू इज अ फेटलिस्ट पर्सन। फेटालिस्ट अर्थात कि कर्म के सिद्धांत में मानता है। यदि उसके साथ में कुछ बुरा भी होता है तो अपने को डिफेंड करने की बजाय अपने पारिपार्श्विक परिस्थिति को इंप्रूव करने की बजाय वो यह सोच करके बैठा रहता है कि हां यह मेरे कर्म का ही परिणाम है। ईश्वर की ही इच्छा है कि मेरे पापों के फल के रूप में प्रायश्चित के रूप में मेरे साथ में यह सब बुरी घटनाएं चल रही है। तो इसका प्रतिकार करने की वजह है ईश्वर पर भरोसा रख के बैठे रहो। ईश्वर पर भरोसा रख के बैठे रहो। करते-करते हम लोग हजार साल बैठे रहे। हजार साल विदेशी शासक आकर के हमारा शोषण करते रहे। तो यह दोनों जो है अपने मन के भीतर में खास करके रामकृष्ण विवेकानंद परंपरा को जो लोग फॉलो करते हैं हम लोग इन दोनों के साथ में जीते हैं। देखिए जो लोग कभी-कभी एक हिंदू धर्म के भीतर में भी एक तरह के फेनेटिक लोग होते हैं। वे लोग कहते हैं कि हिंदू धर्म का जो कुछ भी है वो जाति प्रथा हो ना कि वो जितने भी दुनिया भर के कुसंस्कार अंधश्रद्धाएं हो सबको फिर से ले आओ। फिर से हम भारत को 1000 साल पीछे फेंक दो। तो अभी उन लोगों को सुनकर के फिर और उन लोगों का प्रॉब्लम क्या है? वे लोग वास्तविकता को देखते नहीं है। वह जो समय को पीछे घुमाना 1000 साल फिर से वही युग में ले जाना तो उसी युग का तो परिणाम था ना कि भारत का आर्थिक और यह राजनैतिक पतन हुआ था। विदेशी आक्रमकों के सामने हम हार गए थे। तो यह लोग वे नहीं देखते हैं कि उस युग का अल्टीमेट परिणाम क्या था? वे लोग चाहते हैं कि 1000 साल पीछे ले जाओ भारत को। तो यह भी गलत है हमारी दृष्टि से क्योंकि हमको तो स्पष्ट रूप से इतिहास दिखता है। स्वामी जी इतिहास के बहुत बड़े स्टूडेंट हैं। मैं जब नागपुर में मेरा पोस्टिंग हुआ था पीपीटीसी के बाद में 2006 2006 के हां 2006 में ही तो मैं वहां पर लाइब्रेरी में गया। तो जो लाइब्रेरियन महाराज थे मुझे स्वामी जी का एक किताब दिखाया। एक किताब है हिस्ट्री का किताब मैं उसका नाम भूल गया। वह भारत का इतिहास है। तो भारत का इतिहास यह टेता स्वामी जी के पास में थी और स्वामी जी ने इसको पढ़कर के अपने हाथों से उसमें नोट्स लिखी है कि अच्छा ये मुगल राज में जो कुछ हुआ उसका जो वर्णन है तो उसमें स्वामी जी ने एक दो नोट्स लिखी है। कुछ अंडरलाइन किया है। यानी कि फिर बाद में ऐसा हुआ कि यह जो किताब है वो बेलमठ म्यूजियम में दे दी गई और उसका जो फोटोकपी है वो वहां पर रखा था। तो देखिए कि ऑलरेडी मुझे पता ही है। आप लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा पढ़ेंगे। स्वामी जी के उपदेशों को पढ़ेंगे। स्पष्ट रूप से आपको दिखाई देगा कि स्वामी जी का इतिहास का अंडरस्टैंडिंग कितना डीप है। वही फेमस घटना जो कि मैं बार-बार कहता हूं कि स्वामी जी अपने वेस्टर्न डिसाइपल्स के साथ में वेटिकन गए घूमने के लिए और वहां पे प्रत्येक मोन्यूमेंट जो है उसका इतिहास स्वामी जी वेस्टर्न डिसाइपल को बता रहा है। और वे लोग लिखते हैं कि हमारे से ज्यादा वेस्टर्न हिस्ट्री क्रिश्चियनिटी कैथोलिसिज्म हिस्ट्री ऑफ वेटिकन इसका नॉलेज हमारे से ज्यादा स्वामी जी का है। कुछ-कुछ केसेस में तो वहां के जो लोकल जो पर्सन थे उससे भी ज्यादा नॉलेज स्वामी जी का है। तो स्वामी जी हैज़ अ वेरी गुड ग्रेस ऑफ हिस्ट्री। यह राइज़ एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन। यह जो कांसेप्ट है स्वामी जी बड़ी ही बखूबी से समझते थे। हम लोग कभी-कभी धर्म के नाम पर अपने को समाज से इंसुलर कर देते हैं। हम लोग सोचते हैं कि कैसे भी करके धर्म को पकड़ के रहेंगे तो समाज जो है वो अपना ठीक चलेगा। अभी थ्योरेटिकली यह ठीक दिखता है। किंतु यहां पे प्रॉब्लम क्या आता है कि धर्म में इटसेल्फ जब करप्शन प्रवेश करना प्रारंभ हो तो हमको दिखता नहीं है। हम अंधे हो जाते हैं। उस समय समाज के साथ में सोसाइटी के साथ में अपना कनेक्ट रहने से हमको अर्ली वार्निंग सिग्नल मिलना शुरू हो जाता है। ये जो वॉर चल रही है तो आज वो जो आप एक तरह का प्लेन देखते होंगे एक बोइंग जंबो जेट जैसा प्लेन है उसके ऊपर में एक छतरी बिठाई हुई है छाते की तरह एक वो रेडार बिठाया हुआ है इसको ये लोग बोलते हैं एवेक्स अर्ली वार्निंग एंड इंटेलिजेंस सिस्टम ने ऐसा कुछ उसका फुल फॉर्म है तो बैटल फील्ड में इस तरह के एवेक्स प्लेन जो है उनको घुमाया जाता है वो जो रडार है चारों ओर से सिग्नल इकट्ठा करके के फिर वह कमांडर को पहुंचाता है कि कहां पे क्या चल रहा है। तो यह जो अर्ली वार्निंग सिस्टम जो होती है सोसाइटी के साथ में यदि हम टच में रहते हैं तो हमको यह अर्ली वार्निंग सिस्टम अर्ली वार्निंग मिलना शुरू हो जाता है कि हां हम लोग जिस तरह से धर्म का पालन कर रहे हैं कुछ ना कुछ गड़बड़ है और उसकी सर्वप्रथम साइन हमको सोसाइटी में देखने को मिलेगी। सोसाइटी में जैसे स्प्लिट होना शुरू होता है साथ-साथ में ही समझ लीजिए कि मैं जिस तरह से मेरी पर्सनल स्पिरिचुअलिटी को फॉलो करता हूं उसमें कुछ ना कुछ गड़बड़ है। आध्यात्मिकता का अर्थ क्या है? फंडामेंटली देखें तो पंचक्लेश है, षडरिपु है, कामकांचन है, अष्टपाश है उससे मुक्ति और यह जो मैत्री, करुणा मुदिता उपेक्षा जो चित्त प्रसाद है, यम, नियम, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोच, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर, प्रणिधान उसका अनुष्ठान। राइट? नेगेटिव चीजों को छोड़ना है। पॉजिटिव चीजों को अपनाना है। दिस इज़ बेसिकली धर्म। प्रेय और श्रेय हमारे सामने सतत आता रहता है। प्रेय को हटाना है। श्रेय को अपनाना है। यही तो है धर्म। क्षण क्षण प्रत्येक फुटस्टेप पे हमको डिसीजन मेकिंग करना है। प्रत्येक फुटस्ट पे डिसीजन मेकिंग करने का एक प्रॉब्लम क्या है कि इसका जो क्सकुएंस है ना वह बड़े लॉन्ग टर्म होते हैं। आज मैंने सुबह को उठ के मेरे पास में दो ऑप्शन है। मैं मंदिर में जाता हूं। फिर अपने कमरे में आता हूं। तो मेरे पास में दो ऑप्शन है। एक तो साधना का समय है साधु के लिए। मैं साधु हूं तो मुझे तो सुबह के 5:00 बजे हैं। साधना करने के लिए मुझे बैठना है। भले चाहे मैं कथामृत पढ़ूं ना कि मैं जप करूं ना कि मैं ध्यान करूं ना कि मैं योगासन करूं ना कि कुछ भी करूं किंतु साधना होनी चाहिए। और दूसरा एक ऑप्शन है। मैं बैठकर के मोबाइल पर न्यूज़ देखूं। मेरा न्यूज़ देखने का एक बड़ा ऑब्सेशन है न्यूज़ पढ़ने का। तो यह एक टेंपटेशन खड़ा होता है। सुबह को मैं जैसे ही मंदिर से आता हूं। यहां पर मोबाइल पड़ा है। यहां पर जप की माला पड़ी है। मैं किसको चुनूंगा? जैसे ही मैंने अपने हाथ में मोबाइल लिया। मैं यह जो प्रेय है उसको मैंने स्वीकार किया। और जैसे जपमाला है और कथामृत है उसको मैंने स्वीकारा। तो मैं श्रेय के रास्ते पर चला। अभी मैं यह जो डिसीजन लेता हूं प्रेय और श्रेय का कि सुबह को 5:00 बजे मैं अपने हाथ में क्या लेता हूं? मोबाइल लेता हूं ना कि जपमाला और कथामृत लेता हूं। इसका रिजल्ट जो है ना कंसक्यूस जो है मैं जब आरोग्य भवन जाऊंगा तब पता चलेगा। आज नहीं पता चलने वाला है। आरोग्य भवन आपको पता होगा कि रिटायर्ड साधुओं के लिए रहने की जगह है बेलूर मठ में। अभी इस टाइम मैं जो बेलून मठ गया था तो मैं गया था आरोग्य भवन सभी जिनकी उम्र 70 80 माने 70 ईयर पे तो कोई रेयरली कोई हमारे यहां पे रिटायरमेंट का ऐसा है कि जितना अवॉयड करना चाहते हैं कर करना कर सकते हैं कीजिए शरीर काम नहीं कर रहा है तो आप रिटायरमेंट लीजिए ऐसा है यहां पे तो सब 80 80 90 इस तरह की ऐज वाले सब सीनियर साधु वहां पे थे तो सबको प्रणाम किया थोड़ा गप लगाया बहुत अच्छा लगा कि इन्होंने पूरा साधु जीवन समाप्त कर दिया है। अभी मृत्यु के समीप खड़े हैं। तो उस समय जो उनके भीतर में जो एक प्रशांति दिखती है तो पता चलता है कि हां इनका साधु जीवन सक्सेसफुल हुआ है। उन्होंने मोबाइल नहीं जपमाला और कथामृत को वरण किया है। तो आज मैं जो सिलेलेक्ट करूंगा सुबह को मोबाइल उस उनके जीवन में तो मोबाइल नहीं था किंतु मोबाइल का इक्विवेलेंट और कोई प्रेय होगा। आज के जीवन में मोबाइल इज एक म एक बहुत बड़ा टार इजी टारगेट है। आज जो भी आज के समाज की यह दूषण है सभी आप इजीली मोबाइल के आप सामने उसके लिए मोबाइल को दाई ठहरा सकते हैं। तो आज मैं मोबाइल सेलेक्ट करता हूं। अर्ली मॉर्निंग को ना कि अपने हाथ में जपमाला और कथामृत लेता हूं। इसका कंजकुएंस जो है उसका जो परिणाम है वह मुझे आज नहीं देखने को मिलेगा। वह मैं जब आरोग्य भवन जाऊंगा और यदि आप कोई मुझे मिलने को आएंगे उस समय तो उस समय आपको देखने को मिलेगा कि मैंने अपने पूरे जीवन में क्या किया है। किंतु प्रॉब्लम क्या है कि हम यदि क्सिकुंस नजर के सामने एग्जजेक्टली नहीं रहते हैं तो प्रॉब्लम क्या है कि हम यह जो प्रेय है उसका वरण करते ही जाएंगे। करते ही जाएंगे। बैड डिसीजन मेकिंग हम कहते हैं ना जिसको वह करते ही जाएंगे। करते ही जाएंगे। फिर जब हम एक ऐसी परिस्थिति पर आ खड़े होंगे कि जब यह जो हमारे जो दुष्कर्म है जो हमने मिस स्टेप्स लिए हैं जीवन में जो गलत डिसीजन लिए हैं उसका परिणाम नजर के सामने ऐसा आकर के खड़ा होता है। हम डर जाते हैं। चारों ओर दौड़ते हैं इसका उत्तर माने इसका सॉल्यूशन इससे बचने का उपाय खोजने के लिए। किंतु लाइफस्टाइल लाइफ टाइम ऑफ मिस्टेक्स जो है वो कैसे एक दिन में आप रिवर्स कर देंगे, अनडू कर देंगे। यह थोड़ी ना कंप्यूटर प्रोग्राम है। तो रीडू और अनडू ये सब हो सकता है। यहां पे अनडू का कोई कांसेप्ट नहीं है। आपको उसको भुगत लेना होगा। जो मिस्टेप्स आपने लिए हैं, रॉन्ग डिसीजंस आपने लिए हैं, यू हैव टू फेस द क्सकुएंस ऑफ इट। तो यहां पे क्या है? धर्म के रास्ते पे चलने से प्योर धर्म के रास्ते पर यदि मैं चलूंगा, तो क्या है? मैं ये जो मिस स्टेप्स जो लेता हूं ना, उसका जो कंजकुएंस है, उसका जो परिणाम है, मुझे बहुत लंबे समय के बाद में पता चलेगा। जबकि मेरा सोसाइटी के साथ में कनेक्ट है तो होगा क्या? आज मुझे आज मैंने सुबह को मोबाइल लिया और कथामृत और जप माला को छोड़ा। ठीक है? उसका आध्यात्मिक परिणाम तो मुझे आरोग्य भवन में मिलेगा। जब मैं रिटायर हो के वहां पे बिलूर मठ जाऊंगा तब दिखेगा। वो तो एक चीज हो गया। आध्यात्मिक परिणाम तब दिखेगा। किंतु यह जो सामाजिक परिणाम जो है सोशल परिणाम मैं अपने कमरे के बाहर निकल के ही मुझे दिखना शुरू हो जाएंगे। सामने जैसे ही कोई दिखेगा दूसरा साधु है या दूसरा कोई स्टाफ है वालंटियर है डिवोटी है हर छोटी-छोटी उसकी गलती है या तो मुझे लगता है कि उसकी गलती है मैं उसके ऊपर में नाराज हो जाऊंगा यदि उसकी सक्सेस है तो मैं उससे ईर्षान्वित हो जाऊंगा यदि वह मुझसे छोटा है तो मैं उसका शोषण करने का प्रयास करूंगा यदि मुझसे बड़ा है तो मैं उससे डर करके रहूंगा तो यह जो है कि उससे डरना उससे ईर्षान्वित होना उसके प्रति द्वेष रखना, उसका अहित करने को सोचना। यह जैसे ही मैं अपने कमरे से निकलूूंगा, इमीडिएटली यह सब मेरे माइंड में स्टार्ट होगा और तभी मुझे अलर्ट हो जाना है। दिस इज अर्ली वार्निंग साइन कि आज सुबह को मैंने जो किया वह गलत किया। कल सुबह से मुझे फिर से ठीक-ठीक डिसीजन लेना है। प्रेय को छोड़कर के श्रेय को वरण करना है। यदि यह मैं आज ये सोसाइटी के साथ में, कम्युनिटी के साथ में, सिविलाइजेशन के साथ में मेरा कनेक्ट रहने से यह अर्ली वार्निंग सिस्टम जो है वो इमीडिएटली इट कम्स इनू इफेक्ट। मुझे इमीडिएटली पता चलना शुरू होता है कि मैं जो ये आध्यात्मिक जीवन में डिसीजन ले रहा हूं वो सही है ना कि गलत है। तो ये देखिए कि भारत का एक जो उस समय का जो एक प्रॉब्लम हमारे सामने खड़ा हुआ था कि सोसाइटी के साथ में कम्युनिटी और सिविलाइजेशन इन दोनों को हमने साइड स्टेप कर दिया। धर्म ही जैसे कि सब कुछ है बोलकर के हमने जीना शुरू किया। प्रॉब्लम यही है कि धर्म में यदि हम मिस स्टेप लेते हैं तो उसका क्सकुएंस हमको लंबे समय के बाद में पता चला और बाय दैट टाइम हमको पता चला नाउ इट इज टू लेट टू रेमेडी आवर टू रिफॉर्म आवरसेल्फ। अभी तो जो हमने मिस स्टेप्स ले लिए थे उसका परिणाम भुगतना ही होगा और हजार साल की गुलामी हमने भुगती है। सो नाउ अगेन भारत आजाद है। किंतु रामकृष्ण विवेकानंद परंपरा को जो लोग फॉलो कर रहे हैं, हम सबको यह सब कुछ चीजें स्पष्ट रूप से दिखती है। एक तो है आध्यात्म। दूसरा है कम्युनिटी और तीसरा है सिविलाइजेशन। हम आध्यात्मिक जगत में आध्यात्मिक राज्य में ठीक चल रहे हैं कि नहीं? उसका कंसिक्वेंस हमको कम्युनिटी लाइफ में और सिविलाइजेशनल लेवल पर देखने को मिलता है। इमीडिएटली देखने को मिलता है। आध्यात्मिक मिस्टेप हमने लेना शुरू किया तो आध्यात्मिक जगत में उसका क्सकुएंस पता नहीं कब देखने को मिलेगा। किंतु कम्युनिटी और सिविलाइजेशनल लेवल पे इमीडिएटली हमको क्सक्यूएंसेस देखते हैं। मिस स्टेप लिए ना कि राइट स्टेप लिए जो भी हो सही किया कि गलत किया। गलत किया तो उसका जो नेगेटिव इफ़ेक्ट है कम्युनिटी और सिविलाइज़ेशनल लेवल पे इमीडिएटली देखने को मिलेगा। सही भी कर रहे हैं तो पॉजिटिव इफेक्ट जो है कम्युनिटी लेवल पर सिविलाइजेशनल लेवल पर हमको इमीडिएटली देखने को मिलने वाला है। और इसीलिए देखिए कि यह जो अह ब्रह्म शक्ति अभेद यह जो ठाकुर का कॉन्सेप्ट है व्हिच इज अ कोर टेनेट ऑफ रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा यह जो ट्रेडिशनल वेदांत है एक्चुअली ट्रेडिशनल वेदांत भी तो गौडपादाचार्य के अजातिवाद के ऊपर का एक मॉडरेशन है किंतु फिर भी माने शंकराचार्य का जो वेदांत है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या उससे हमको बाहर आकर करके ब्रह्म शक्ति अभेद इस कांसेप्ट को सिलेलेक्ट करना है और इस कांसेप्ट के बेस के ऊपर में अपना आध्यात्मिक जीवन कम्युनिटी लाइफ और यह सिविलाइजेशनल डायमेंशन तीनों को ठीक रखना है। इंटरेस्टिंगली आज सुबह को मैं धुरंधर मूवी का रिव्यू पढ़ रहा था। मैं मूवीस तो मैं कभी देखता नहीं किंतु बिकॉज़ कि आई एम वेरी ऑब्सेस वि न्यूज़। ये मैं कभी-कभी ये रिव्यू वगैरह देख लेता हूं। देखिए कि ये रिव्यू इकोनॉमिस्ट में पब्लिश हुआ है। अ उसका जो कहना है अभी देखिए इकोनॉमिस्ट बेसिकली एंटी इंडिया मैगज़ीन। राइट? तो वो लोग जो कहते हैं वी हैव टू टेक इट विथ अ बिट ऑफ साल्ट। किंतु फिर भी मुझे थोड़ा आर्गुमेंट में लॉजिक लगा कि भारतीय लोगों को इतना सप्रेस किया गया है। इतना सप्रेस किया गया है और एक हवा एक खड़ी कर दी गई है कि एक माइल्ड हिंदू। स्वामी जी खुद कहते हैं ना कि वे विदेश में गया तो लोग हम हमारे हमारा तिरस्कार करते हैं यह कह

हमें चाहिए लोहे जैसी मांसपेशियाँ और फौलाद जैसी नसें

के कि हिंदू इज अ माइल्ड हिंदू। तो स्वामी जी कहते हैं मैं उसको कोई अपमान के रूप में नहीं लेता। मैं तो उसको प्रशंसा के रूप में लेता हूं कि हिंदू एक माइल्ड है इस अर्थ में कि दूसरों का शोषण करके दूसरों के देश पे आर्मी भेज के दूसरों के देश में टेररिस्ट भेज के उन लोगों का अहित करके उनको लूट करके संपत्ति नहीं इकट्ठा करता। आई एम प्राउड टू बी कॉल्ड माइल्ड हिंदू। हालांकि माइल्ड हिंदू और स्वामी जी ये दोनों शब्द का के कहीं पे कोई मेल नहीं दिखता है। साइक्लोनिक मोंक यदि स्वामी जी के बारे में कोई साइक्लोनिक हिंदू यदि स्वामी जी के बारे में कोई शब्द प्रयोग करना है। माइल्ड हिंदू और स्वामी विवेकानंद ये दोनों का कहीं पर कोई मेल नहीं। किंतु फिर भी स्वामी जी ऐसा कहते हैं कि यदि कोई माइल्ड हिंदू यह शब्द प्रयोग हमारे लिए करता है तो आई फील प्राउड नॉट आई डोंट फील एंग्री और इरिटेटेड। तो यह एक है किंतु क्या है कि यह हमारा इस तरह से हमको दबाया गया है कि आखिर में एटलीस्ट फेंटसी में भी मूवी में भी यदि एक ऐसा आदमी निकलता है खड़ा होता है कि दुश्मनों के देश में जाकर के उनकी पिटाई करता है तो हमको बड़ा आनंद आता है कि चलो एक तो हिंदू निकला जो कि शेर की तरह दुश्मन की पिटाई कर सकता है। तो यह अपनी जो सप्रेस्ड यह जो नेशनलिस्टिक फीलिंग है यह सप्रेस्ड जो मैनहुड है हमारा मदानगी जो है उसको जैसे कि गला घोट करके हमने दबा करके रख दिया है। मेनलीनेस है, मदानगी है, स्ट्रेंथ है। यह सब जो है उसको आपको कैसे भी करके काट करके फेंक देना है। आपके भीतर में एक एफेमिनेट या तो फेमिनाइन गुण होने चाहिए। डिवोशन होने चाहिए, सरेंडर होना चाहिए, शरणागति होनी चाहिए, एक तरह का फेटलिज्म होना चाहिए। यह जो सब हमको सिखाया गया है उस समय यदि मेनलीनेस, मर्दानगी, दुश्मनों की पिटाई यह सब देखता है यदि एक हिंदू तो वो बड़ा ही खुश हो जाता है। तो यह मूवी का रिव्यु मैं पढ़ रहा था कि यहां से इंडिया से जाकर के कोई विदेशी दुश्मन देश में जाके उनकी पिटाई करता है तो यह लोगों को देखना हिंदुओं को देखना बड़ा अच्छा लगता है। दैट इज व्हाई दिस इज अ हिट मूवी। देखिए व्हाई वुड यू गो टू अ मूवी एट ऑल? यहां पर स्वामी जी स्वयं खड़े हैं। क्या कहते हैं कि व्हाट आवर कंट्री नाउ वांट्स आर मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील? हमारे देश को क्या जरूरत है? लोहे के मसल चाहिए और स्टील की नर्व्स चाहिए। जाइगेंटिक विल्स व्हिच नथिंग कैन रेजिस्ट। इस तरह का विल पावर कि जो कि पहाड़ों के टुकड़े-टुकड़े करते। समुंदर को घोल के पी जाए। दैट कैन ओनली बी क्रिएटेड बाय अंडरस्टैंडिंग एंड रियलाइजिंग द आइडियल ऑफ अद्वैत दैट आइडियल ऑफ द वननेस ऑफ ऑल समग्र विश्व एक है। यह रियलाइजेशन यह अद्वैत दिस गिव्स यू अ माइंड ऑफ स्ट्रेंथ। यह जो ठाकुर का फंडामेंटल कांसेप्ट ब्रह्म शक्ति अभेद यह है एक्चुअल अद्वैत नहीं कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जगत मिथ्या आप जैसे ही बोल देंगे साथ-साथ में ही आपने अपना एक अभिन्न अंग जो है आपका वो काट करके फेंक दिया है। आपका यह जो भारतवासी जो भाई-बहन है, दरिद्र नारायण है, चंडाल नारायण है, मूर्ख नारायण है, यह जो अध पतित नारायण जो है उनको आप इग्नोर करके सिर्फ आप अपनी खुद की आध्यात्म आध्यात्मिकता के बारे में सोचेंगे। यह क्या आप सक्सेसफुल हो सकते हैं? देखिए ये जो वेदांत का ये जो मांडूक्य उपनिषद का यदि आप इसको थोड़ा सा भी लिटरली रे सैटरडे को हमारा क्लास होता है यहां पे मेडिटेशन का तो मेरा किसी के साथ में चर्चा हो रहा था कि मांडूक्य इतना म पावरफुल उपनिषद है वगैरह वगैरह मैंने कहा ये आप बिल्कुल आई एग्री विथ यू 100% प्रॉब्लम कहां पे आता है पता है इसको यदि आप लिटरली लेते हैं ना तो मिस इंटरप्रिटेशन करने का चांसेस बहुत ज्यादा है। जिस तरह से स्वप्न में आपने जो किया वह जागृत अवस्था में रिलेवेंट नहीं है। साथ में ही जागृत अवस्था में जो किया तुरीय अवस्था के लिए रिलेवेंट नहीं है। मैं यदि स्वप्न देख रहा हूं और मैं खाना खा रहा हूं। पास में एक भूखा लड़का बैठा है तो मैं क्या थोड़ी ना उसको रोटी देने को जाऊंगा। स्वप्न में उसको रोटी खिलाना। यदि मान लीजिए कि मेरे पास में वो एक विल माने क्या कहेंगे? स्वप्न को चालित करने की मेरे में क्षमता है। यूजुअली स्वप्न ऐसे आते हैं कि हमारा कोई कंट्रोल नहीं रहता उसके ऊपर में। किंतु मान लीजिए कि मेरे पास में वो एक सेल्फ कॉन्शियसनेस जागृत हो जाए स्वप्न के भीतर में। मैं खाना खा रहा हूं। एक भूखा लड़का बैठा है तो मेरी सेल्फ कॉन्शियसनेस जागृत है कि तो मैं क्या उसको खाना खिलाऊंगा? क्योंकि यदि मैं इस बात के बारे में कॉन्शियस हूं कि मैं अकेले सामने एक भूखा लड़का दरिद्र बच्चा बैठा है। उसके उसको देखते माने वो देख रहा है और मैं अच्छा भोजन कर रहा हूं। जैसे यह ठीक नहीं है। यह उचित नहीं है। साथ में ही यह स्वप्न है। यदि मैं उसको खिलाऊंगा भी तो उसका कोई मीनिंग नहीं है। सपना के भीतर में किसी की हेल्प करना, किसी पर दया करना, किसी का भला करना ये सब चीजों का कोई मीनिंग नहीं है। साथ में ही सपना के भीतर में यदि किसी का अहित भी करते हैं तो उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इस बात को आप यदि जागृत अवस्था में ले आएंगे कि कर्म का सिद्धांत है ही नहीं। और मैं सही करूं कि गलत करूं, अच्छा करूं कि बुरा करूं। अल्टीमेटली जैसे स्वप्न हवा में विलीन हो जाता है, जागृत होने के साथ में वैसे ही जागृत अवस्था में जो किया, तुरीय अवस्था में पहुंचने से सब हवा में विलीन हो जाएगा। प्रारब्ध कर्म को भी भुगतने की जरूरत नहीं है। कर्म का फेरा संपूर्ण रूप से अदृश्य हो जाएगा। व्हिच इज वेरी डेंजरस टाइप ऑफ थिंकिंग। अभी जो लोग उस लेवल पर रहते हैं परमहंस जो होते हैं ठाकुर कहते हैं ना परमहंस बेचाले पाड़ेना अर्थात कि गलती से भी उसका जो पैर है वो गलत जगह पर नहीं जाएगा गलती से भी वो मिस्टेप नहीं लेगा परमहंस तो हम उस लेवल पर तो नहीं है। परमहंस लेवल पे तो नहीं है कि गलती से भी गलती ना करें। सो प्रॉब्लम यहां पे यही है कि एकदम हाई फ्लाइट्स ऑफ वेदांत जो है वो ज्यादातर लोगों के लिए किसी काम का नहीं 1% 2% लोगों के लिए है। अदरवाइज मैं तो कहता हूं कि ब्रह्म शक्ति अभेद यही है प्रॉपर अद्वैत वेदांत। यह जो स्वामी जी कहते हैं कि बाय अंडरस्टैंडिंग एंड रियलाइजिंग द आइडियल ऑफ अद्वैत दैट आइडियल ऑफ वननेस ऑफ ऑल वी कैन हैव दिस मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील। उसके लिए आपको यह धुरंधर जैसा कुछ करने की जरूरत नहीं है। वह भी कीजिए। अल्टीमेटली देश को चलाना है तो आपको सब करना पड़ेगा। किंतु यदि लॉन्ग टर्म कोई स्ट्रेटजी अपनी होनी चाहिए। ये देखिए ट्रंप पगला क्या कर रहा है। वो कहता है कि अमेरिका का मिलिट्री सबसे पावरफुल है। सबसे पावरफुल है। ये वेनेजुएला है या क्यूबा है। ऐसे छोटे-मोटे देशों को तो जैसे ही वो जो चाहे कर सकता है, डरा सकता है, धमका सकता है। किंतु यह जो जैसे ही ईरान के सामने ये सब नाटक करने को गया। देखिए उस बेचारे की क्या हालत हो गई है। और ईरान तो फिर भी छोटा-मोटा देश है। यहां पे चाइना बैठा है। यहां पे रशिया बैठा है। यह रशिया और चाइना के सामने कुछ बोल करके तो दिखा है। उसका साहस नहीं है। उसके सामने इतना मतलब अमेरिका का अहित करते हैं यह दोनों देश। इसके बावजूद माने कंपेयर टू वेनेजुएला या क्यूबा या ईरान सबसे ज्यादा अहित यदि अमेरिका का किसी ने किया होगा तो आज चाइना है तो चाइना के सामने एक शब्द बोलने का उसका साहस नहीं है ऑलरेडी चाइना फिर भी उसका इकोनमी जो है अमेरिका से वन हाफ ना कि ऐसा कुछ है अमेरिका के लेवल का इकोनमी हो जाएगा तो आप सोचिए क्या होगा तो क्या है यह जो आपकी मर्दानगी वगैरह छाती पीट करके दिखाना मिलिट्री पावर पावर वो ठीक है। उसका एक स्थान है। नहीं है ऐसा नहीं। किंतु बियों्ड दैट वो है अद्वैत ब्रह्म शक्ति अभेद जो कि हमको सही-सही मर्दानगी देता है। यह भीतर से आत्मविश्वास नहीं होगा। हमारे ही भाई बांधवों के प्रति हमारी करुणा नहीं होगी। राइज एंड फॉलो ऑफ सिविलाइजेशन कैसे होता है? यह अंडरस्टैंडिंग इंटिव अंडरस्टैंडिंग यदि हमारी नहीं रहेगी तो फिर देखिए इस तरह का देश ज्यादा नहीं चल सकता है। स्वामी जी ने ही कहा कि आप आज बोलते हैं कि भारत का अधपतन हुआ है वगैरह। आप लोग जब आपके पुरखे जब अपने शरीर पे लाल काले कलर का रंग लगा के जंगल में घूमते फिरते थे। तब से भारत एक भव्य सिविलाइजेशन रहा है। भव्य सिविलाइजेशन के इतिहास में ये जो ये जो काल का चक्र जो है वो उठता है गिरता है। उसकी तरह राइज एंड फॉल होता रहता है। हमारा तो पतन कभी मारा डिस्ट्रक्शन तो कभी नहीं हुआ। कंपेयर टू अदर सिविलाइजेशन आप देखिए ये जो इजिपशियन सिविलाइजेशन फेरोस की सिविलाइजेशन इतने बड़े-बड़े पिरामिड बना दिए। किंतु जब इस्लाम जब आया तो फेरो की जो ओरिजिनल सिविलाइजेशन थी संपूर्ण नष्ट हो गई। सिमिलरली ये मेसोपोटेमिया ये जो इफेटिस और टाइग्रिस रिवर रिवर वैली सिविलाइजेशन है बड़ी भव्य सिविलाइजेशन थी। हमारी ये जो ओरिजिनल वैदिक सिविलाइजेशन के ही समय की वो भी इस्लाम के आने से उसका संपूर्ण रूप से खात्मा हो गया। यह जो अमेरिका या तो ऑस्ट्रेलिया वहां की जो एबोरिजिनल सिविलाइजेशन थी जैसे ही ये क्रिश्चियन यूरोपियंस वहां पे गए वहां पे उन्होंने ओरिजिनल सिविलाइजेशन का खात्मा कर दिया वरना ये माया ये जो इनका ये जो सब है उन्होंने भव्य टेंपल बनाए लाखों लाखों का उनका सोनों का सोने का उनका यह खजाना था सब कुछ तहस-नहस कर दिया ये यूरोपियन सेटलर्स ने जाके तो ऐसा तो भारत के साथ में नहीं हुआ भारत के ऊपर में यह इस्लामिक आक्रमण भी हुए। यह यूरोपियन गनबोट भी हमारे पे आक्रमण करने को आई। फिर भी हम तो टिके रहे हैं। एंड नॉट ओनली दैट हम लोगों ने फिर से हमारा उत्थान हुआ है। सो यह जो अंडरस्टैंडिंग है कि राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन कुछ-कुछ सिविलाइजेशन है जो कि अभी नई है विगरस है। स्ट्रांग है बोलकर के जगत में पूरी दादागिरी करती घूमती है। कुछ जो पुरानी सिविलाइजेशन है नई सिविलाइजेशन के सामने नहीं टिक पाई तो उनका संपूर्ण रूप से खात्मा हो गया है। जबकि भारत एक ऐसी सिविलाइजेशन है कि हां हमने बीच-बीच में मिस्टेप्स लिए हैं। किंतु एवरी टाइम हम जैसे कि राख में से फिर से प्रकट होने वाले ये फिनिक्स पक्षी की तरह फिर से हमारा अभ्युदय हुआ है। फिर से हमारा नवजागरण हुआ है। सो दैट अंडरस्टैंडिंग इज द हार्ट ऑफ आवर रामकृष्ण विवेकानंद अद्वैत। और फिर देखिए क्या कहते हैं स्वामी जी द टेस्ट ऑफ ट्रुथ एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एस पोइजन देयर इज नो लाइफ इन इट इट कैन नॉट बी ट्रू ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग स्वामी जी एक जगह पे कहते हैं द हाईएस्ट सिविलाइजेशन इज दैट इन व्हिच यू कैन इंप्लीमेंट हाईएस्ट ट्रुथ अर्थात कि जो हाईएस्ट लेवल की सिविलाइजेशन है उसमें आप हाईएस्ट ट्रुथ को इंप्लीमेंट कर सकके हाईएस्ट ट्रुथ इज अद्वैत जिस सिविलाइजेशन में आप जिस सिविलाइजेशन को आप अद्वैत के सिद्धांत पे गठित कर सके वो हाईएस्ट सिविलाइजेशन है। हमारे साथ में अनफॉर्चूनेटली क्या हुआ है? अद्वैत को हमने आध्यात्मिक जगत तक लिमिटेड रखा है। यह जो कम्युनिटी है और सिविलाइजेशनल हमारा जो फ्रेमवर्क है उसको हमने द्वैत के ऊपर

सत्य है शक्ति

ही बनाया है। तो आओ यह समय आ चुका है कि अपनी कम्युनिटी लाइफ और यह सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क इन दोनों को भी हम रामकृष्ण विवेकानंद का जो अद्वैत है ब्रह्मशक्ति अभेद इस अद्वैत के फाउंडेशन पे हम अपना कम्युनिटी लाइफ और सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क को बनाएं। कम्युनिटी लाइफ में किस तरह से प्रैक्टिकल होगा? तो मां का देखिए मां का उदाहरण है नजर के सामने है एक महाराज अपूर्वानंद जी अपूर्वानंद जी बेलूर मठ जॉइ करने को गए थे किसी कारण सर उनको घर वापस जाना पड़ा फिर वहां से उन्होंने महापुरुष महाराज को लेटर लिखा कि मैं साधु होना चाहता हूं आप क्या आप बताइए क्या करूं तो महाराज कहते हैं कि देखो वहां रिलीफ वर्क चल रहा है हमारा तो जाकर के थोड़ा सा वलंटियर करो फिर बाद में आना तुम तो यह अपूर्वानंद जी पहले तो कहीं पर रिलीफ के लिए गए बाद में फिर बांककोड़ा जिला में रिलीफ चल रही थी तो उनको वहां पे भेजा गया तो बांकुड़ा गए हैं अभी बांकुड़ा जिला बेंगली होंगे तो पता है कि वहां पे ही जय राम भाटी है मां का गांव है तो बांकुड़ा में ही रिलीफ कर रहे हैं। बांकुड़ा जिला के भीतर में ही जय राम भाटी ग्राम वहां पे मां रह रही है। तो अपूर्वानंद जी ने लेटर लिखा महापुरुष महाराज को कि क्या मैं जय राम भाटी जाके मां से दीक्षा ले सकता हूं क्या? तो महापुरुष महाराज ने बड़ा ही उत्साह पूर्वक लेटर रिप्लाई दिया कि हां हां बेटा जाओ और तुम्हारा जीवन धन्य हो जाएगा। तो अपूर्वानंद जी गए पहले तो बांकुड़ा आश्रम में वहां पर वैुंठ डॉक्टर और जो रहते थे तो उन्होंने मां का आम बात हुआ है तो उसके लिए एक तो मेडिसिन दिया ऑयल जैसा कुछ फिर उसको लेकर के वहां पे गए क्वालपाड़ा अपूर्वानंद जी फिर क्वालपाड़ा से जयराम भाटी जा रहे हैं रास्ता कादव कीचड़ से भरा हुआ कोई शेल्टर नहीं बारिश हो रहा है भीगते भीगते बेचारे गए हैं जय राम भाटी गांव और जैसे ही प्रवेश किया तो छोटे-छोटे घर है रास्ते के दोनों ओर और रास्ता तो कुछ है ही नहीं वह पूरा कीचड़ का ही सब बना हुआ है तो वहां पर जाकर के देख रहे हैं कि कहां है मां का घर तो जैसे ही दूर से ही देखा एक घर है उसके सामने मां स्वयं जैसे खड़ी है तो वह देखकर के और ऐसा नहीं है गांव की स्त्रियां तो ऐसी कितनी होगी किंतु जैसे ही मां को देखा समझ गए कि यह मां हालांकि मां का दर्शन हुआ है उनको पहले कोलकाता मां का दर्शन किया था उन्होंने तो मां को जैसे ही देखा पहचान गए तो फिर सीधा उस घर की ओर गए देखा तो मां भीतर में चली गई थी बाय दैट टाइम किंतु ब्रह्मचारी महाराज थे तो महाराज ने कहा कि मां ने कहा है स्नान बान करके खाना खा लो फिर मां का दर्शन करना तो इस तरह से खानावाना खा के मां का दर्शन किया मां को रिक्वेस्ट किया कि मां दीक्षा लेने को आया हूं तो मां ने कहा ठीक है बेटा कल सुबह दीक्षा देती हूं तो सुबह को फिर मां ने ही उनको बुला दिया। उपवास किया था उस दिन सुबह को। मां ने बुलाया। मां ने दीक्षा दी। सब कुछ हो गया। उसके बाद में मां प्रश्न कर रही है उस दिन शाम को कि अच्छा बेटा तुम क्या कर रहे हो? क्या कहां से आए वगैरह? तो यह बता रहे हैं कि मैं यहां पर रिलीफ कर रहा हूं। और एक घटना महाराज ने मां को कही। अपूर्वानंद जी ने कहा कि उनका काम क्या है? रिलीफ के समय घरघर जाकर के टिकट बांटना। यह रामकृष्ण मिशन का स्टैंडर्ड रिलीफ फार्मूला है। अब जब रिलीफ करना है उसका अर्थ क्या है? चावल बांटेंगे, किसी किसी को साड़ी देंगे, वस्त्र देंगे। तो यह देना ही तो है ना। किंतु ऐसा नहीं कि जैसे ही बांटना शुरू हुआ जे जो कोई भी आया लाइन में खड़ा रहा उसको दे दिया। ऐसा नहीं। पहले तो रामकृष्ण मिशन के साधु घर-घर जाकर के सर्वे करेंगे। घर की अवस्था देखेंगे। घर में प्रवेश करके देखेंगे कि उनको सही में खाने की चावल की वस्त्र की जरूरत है कि नहीं। जेनुइन जो केस होगा उनको टिकट देंगे कि यह टिकट लेकर के इसमें लिखा है इतना चावल इतना वस्त्र देना है। इतनी साड़ी देनी है। लिखा है टिकट में यह टिकट लेकर के इस दिन इस जगह पे इस समय को आ जाइए। तो ऐसा टिकट बांटेंगे। फिर यह टिकट ले जो आएगा उसी को टिकट में जितना लिखा है उतना ही बांटा जाएगा। यानी कि जो जरूरियतमंद है उसी को जो आवश्यकता है उतना ही मटेरियल जाएगा। तो ये परफेक्ट सिस्टम रामकृष्ण मिशन ने बनाया है। तो अपूर्वानंद जी कहते हैं कि इस तरह से मैं घर-घर सर्वे करने को निकला था टिकट बांटने के लिए। तो एक गांव में जाकर मुझे पता है कि उस गांव में बहुत ही ज्यादा गरीबी है। तो ऑलरेडी उस एक बार तो टिकट बांट लिया है। दूसरी बार टिकट बांटने को गए हैं। तो गांव में जाकर देखा तो कुछ-कुछ घर खाली थे। उसका अर्थ यही है कि उस घर वालों को कहीं पर काम मजदूरी का काम मिला होगा तो इसलिए गए होंगे तो पूछते-पूछते चले गए कि कहां ये लोग मजदूरी का काम कर रहे हैं तो पास में ही एक जगह थी खेत ही था खेत में यह जो धान निकालना है यह काम कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक स्त्री महाराज को जैसे ही देखा उस स्त्री ने तो वहां पे वो जो घास का ये जो ये था ढग उसके पीछे में जाकर के छुप रही है महाराज महाराज ने देख लिया कि वह जो स्त्री है वह उसके पीछे में जाकर छुप गई है। तो महाराज ने जाकर के उसको देख पीछे में जाकर के वो ढग के पीछे में जाकर के जहां पे ये स्त्री छुपी हुई थी बोला अरे तुम यहां पर छुप क्यों गई हो मुझे देख के? तो यह स्त्री बेचारी बड़ी ही दुख के साथ में कहती है कि देखिए कल रात को ही मेरे बच्चे का जन्म हुआ और आज सुबह को मेरे पास में क्योंकि खाने के लिए कुछ नहीं है। मैं इस बच्चे को लेकर के काम करने के लिए यहां पर आई हूं। यदि आप यह देख लेते कि मुझे काम मिला है तो आप मुझे टिकट देते नहीं तो मुझे आपके द्वारा जो राशन डिस्ट्रीब्यूट हो रहा है वो मिलता नहीं। तो यह बात सुनकर के महाराज इतने व्यथित हो गए। देखा कि वह जो कल रात को ही जिस शिशु का जन्म हुआ है, उस शिशु को कपड़े में वस्त्र में बांध करके किनारे पर रखा है और यह कल रात जन्म देने के बाद में यह स्त्री सुबह को खेत में काम कर रही है। हार्ड बैक ब्रेकिंग लेबर भयानक लेबर यह कर रही है। तो यह देखकर के महाराज इतने विचलित हो गए और फिर महाराज ने यही बात मां को कही कि देखिए मां आप पूछ रही है ना कि किस तरह से रिलीफ का काम होता है तो मैं यह सब करता हूं। यह सब मेरे अनुभव है। यह स्त्री को रात को जन्म देकर के दूसरे दिन सुबह को बच्चे को वस्त्र में लपेट करके साइड पर रख के काम करते मैंने देखा है। तो जैसे ही मां ने यह सुना मां की आंखों में से आंसू आना शुरू हो गए। मां रो रही है, रो रही है। ठाकुर को प्रार्थना कर रही है कि ठाकुर देखो कि तुम्हारे देश की यह अवस्था है। तुम्हारे रहते रहते लोगों का यह भयानक लाइफ लोगों को लीड करनी पड़ती है। इस हद तक इस हद तक लोगों के भीतर में सफरिंग है। आप इनका कुछ कल्याण कीजिए। कुछ कल्याण कीजिए। ऐसा बोलकर के मां रो रही है और ठाकुर को बार-बार प्रार्थना कर रही है। देखिए ये शिव ज्ञान जीव सेवा किसको कहते हैं? इसी को कहते हैं मां को हम जनरली इस इस तरह से शिव ज्ञान जीव सेवा के साथ एसोसिएट नहीं करते किंतु मां का जो हृदय है कितना इंस्टिंक्टिवली जो लोग गरीब है जो लोग सफरिंग कर रहे हैं उनके लिए रोता है तो देखिए कि दिस एप्लीकेशन ऑफ ब्रह्मशक्ति अभेद कम्युनिटी लाइफ में और सिविलाइजेशनल लाइफ में किस तरह से अप्लाई होता है इन तीनों को इकट्ठा करके हमको अद्वैत बनाना अद्वैत सिर्फ आध्यात्मिक जीवन नहीं यह अपना कम्युनिटी लाइफ भी सही अपना सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क भी सही तीनों को परिपुष्ट करना है तीनों को पोषक करना है तीनों को स्ट्रेंथन करना है तभी का ये मसल्स ऑफ आयरन नर्व्स ऑफ स्टील यानी कि ये मेरे अकेले के मसल्स नहीं पूरे समाज के पूरे देश के मसल्स और नर्व्स को स्ट्रेंथन करना है। दैट इज रामकृष्ण विवेकानंद मां शारदा देवी का अद्वैत इसके बाद का जो स्लाइड है अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु माने मोबाइल के मिसयज के साथ में फिट बैठता है क्योंकि मोबाइल के द्वारा तो हमारा क्लास भी हो रहा है। [हंसी] ये जो अभी अमेरिका में हुआ ना वो सुप्रीम कोर्ट ने वो ये दिया है वर्डिक्ट दिया है कि ये हैबिट मेकिंग है आपका ये जो Facebook और Google दोनों को कहा आपका जो यह रील फीचर जो है ना हैबिट मेकिंग है तो आपका वो जो है लड़का उसने सुसाइड किया ना क्या किया उसको आपको इतना रुपया कुछ देना होगा यह अभी जस्ट वर्डिक्ट आया है दिस इज़ अ वेरी लैंड लैंडमार्क वर्डिक्ट यह सोशल मीडिया कंपनी को यदि आप ऐसा कहेंगे जैसे टोबेको है। टोबेको में कैसे आपको स्टचटरी वार्निंग देना पड़ता है। दिस इज़ इंजरियस टू हेल्थ। तो यदि ऐसा कुछ हुआ तो इनको भी

प्रश्न: मोबाइल वाकई खतरनाक है। हम इससे बहुत सारे काम करते हैं, लेकिन इसकी लत भी लग जाती है।

उनको इस तरह का वार्निंग देना होगा कि एक्सेसिव यूज़ ऑफ सोशल मीडिया इज इंजरियस टू योर हेल्थ। ना इसीलिए आपको यह एक देखिए आज मोबाइल है। चाइना के साथ में ओपीएम था। ये चाइना जो था उस समय का इंपीरियल चाइना अपने मार्केट को ओपन ही नहीं कर रहा था। ब्रिटिश लोगों का या यूरोप का जो ट्रेड चल रहा है वो डेफिशिएंट माने वो माने वो पूरा डेफिसिट में चल रहा है क्योंकि चाइना से सिल्क लेते हैं तो चाइना सामने कुछ लेता नहीं है तो कैसे वो मार्केट को ओपन किया जाए तो उन्होंने वहां पे इललीगल ओपीएम ट्रेड स्टार्ट किया और ओपीएम ऐसा स्प्रेड हो गया कि अभी वो भयानक रूप से ओपीएम ले रहे हैं। सोसाइटी भीतर से पूरी रोट हो गई है और यह इन लोगों का ट्रेड जो है अभी वह प्रॉफिट में चल रहा है चाइना के साथ में क्योंकि चाइना से जितना सिल्क लेते हैं उससे कहीं ज्यादा ये लोग ओपीएम लेते हैं। तो ओपीएम स्प्रेड इतना रेपिडली हुआ क्यों? साइकेट्रिस्ट या जो लोग हिस्ट्री स्टडी करते हैं वो लोग कहते हैं कि उस समय चीन में क्या है? निराशा का वातावरण था। वैसे डेवलपमेंट हो नहीं रहा है। तो ह्यूमन स्पिरिट क्या है? वो तो आप बिठा करके रखेंगे तो विकृतियां आने वाली है। इस सिचुएशन में यदि सामने एडिक्शन दे दिया जाए तो फट करके एडिक्शन को ले लेते हैं और लाइफ खत्म कर देते हैं। तो एडिक्शन हुआ क्यों? क्योंकि जीवन में गोल नहीं है। जीवन में पर्पस नहीं है। सो हैव पर्पस इन लाइफ। तो एडिक्शन आपको पकड़ नहीं पाएगा। ये मोबाइल का प्रॉब्लम हमारी यंग जनरेशन के साथ में क्या है? ये यहां पे मैं लाइब्रेरी में बैठता हूं ना। सब गवर्नमेंट एग्जाम की तैयारी करते हैं। अभी गवर्नमेंट एग्जाम का प्रॉब्लम क्या है? आपको 1 लाख बैठेंगे तो 10 को मिलेगा, 20 को मिलेगा, 100 को मिलेगा। बाकी लोगों का कुछ नहीं। तो उनका लाइफ ऐसा है ना कि बस गवर्नमेंट जॉब, गवर्नमेंट जॉब करते-करते और पता है कि चांसेस बड़े कम है। तो जो निराशा जो है ना उसकी वजह से दुनिया भर के एडिकशंस यह लोग लगा देते हैं। लाइफ में पर्पस ही नहीं है। गिव पर्पस और एडिक्शन भाग जाएगा। देख लीजिए। नहीं अब मुझे देखिए मेरी लाइफ में इतना पर्पस है। मुझे क्लास लेने हैं। मैं किताब लिखता हूं। म यदि देखूं तो मेरे पास में एक सेकंड का भी फ्री टाइम नहीं। इनस्पाइट ऑफ दैट कभी-कभी मैं मोबाइल के साथ में स्ट्रगल होता है कि आई हैव टू बी केयरफुल कि बियों्ड क्योंकि मेरा यह न्यूज़ का एक ऑब्सेशन है कि न्यूज़ देखना है। जैसा आपने कहा कि अभी क्या हुआ? अभी नेक्स्ट क्या है? तो इसकी वजह से मुझे थोड़ा केयरफुल रहना पड़ता है। किंतु दिस इज इंस्पाइट कि मेरा इतना पर्पस है मेरा स्ट्रांग लाइफ में। थोड़ा सा भी पर्पस मेरा डाउन हो जाए तो सोच के देखिए मेरे साथ में क्या होगा। अब जैसे आप देखिए अ

प्रश्न: ये purpose और addiction के बिच का connection पता नहीं था

मैं रिसेंटली एक डॉक्यूमेंट्री देख रहा था चाइना के ऊपर में। तो वहां का एक प्रोविंशियल कैपिटल है छोटा सा ही है। तो सिक्स लिटिल ड्रैगन ऐसा एक है कि व्हाट आर सिक्स लिटल ड्रैगन? तो छह कंपनी है एट द फ्रंट लाइन ऑफ एi रोबोटिक्स एंड स्पेशल इंटेलिजेंस फ्रंट लाइन पे है ऐसी यूनिकॉर्न माने बिलियन प्लस जिसका वैल्यू्यूएशन है ऐसी छह कंपनी इस छोटे से सिटी में है तो उसका उसके ऊपर में था ये डॉक्यूमेंट्री कि किस तरह से सिटी ये सब चल रहा है वगैरह-वगैरह

प्रश्न: मैंने ऐसे युवाओ को देखा है जो की 7 - 8 साल तक गवर्नमेंट जॉब के लिए तयारी करते है, और जब जॉब नहीं मिलता तब पुरे हताश हो जाते है. सही में भारतीय युवाओ की क्या अवनति हो रही है.

तो मैंने सोचा कि देखिए कि कहां ये लोग पहुंच गए हैं आज चाइना और कहां वहां पे हम लोग पड़े हुए हैं। म उन उन लोगों का जो एडवांसमेंट है अभी जस्ट इकोनॉमिस्ट में ही मैं एक आर्टिकल पढ़ रहा था कि चाइना हैज़ ऑलरेडी वॉन द रेस ऑफ़ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। व्हाई कि मैक्सिमम जो रिस्चर है ना दे है दे आर बेस्ड ऑन चाइना। चाइना से फिर वो विदेश में जाकर के काम करते हैं वगैरह-वगैरह। बट दे आर फ्रॉम चाइनीज़ ओरिजिन। यह जो मैक्सिमम नंबर ऑफ़ रिसर्चरर्स दे आर एआई पेपर जो पब्लिश होते हैं, रिस्चर जहां से आते हैं, रिसर्च में जिन यूनिवर्स यूनिवर्सिटीज का लीड है, नाउ इट इज़ फ्रॉम चाइना। तो अमेरिका जैसा अमेरिका अभी सेकंड स्टेप में है। जहां तक ये मेन पावर प्रोड्यूस करने की बात है। तो हमको लगता है कि हम लोग कहां पे है इस रेस में? हम लोग हिस्ट्री का लेसन सीखे ही नहीं है। ये जो टेक्नोलॉजिकल गैप हमने अपने और यूरोप के बीच में होने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि जब यूरोपियन लोग मुट्ठी भर लोग आए पूरा इतना बड़ा भारत उसके सामने कुछ नहीं कर पाया। सेम टेक्नोलॉजिकल इकोनॉमिकल गैप आज हम चाइना के साथ में कर रहे हैं और इस हमारी नींद नहीं खुल रही है कि सेम और चाइना फिर भी यूरोप तो बात करता है जस्टिस और ह्यूमन राइट्स की। चाइना का तो वह कांसेप्ट ही नहीं है। बढ़ता ही जा रहा है। बढ़ता ही जा रहा है। ईस्ट इंडिया कंपनी जितना आज भारत में से उठा के जाती थी, इतना चाइना आज लीगली उठा के जा रहा है। ओम