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Swami Vivekananda's Kali the Mother ·

Kali the Mother: Readings from Swami Vivekananda's Poem 29 Oct 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कल हमने देखा कि स्वामी जी कह रहे हैं कि मैंने ठाकुर के साथ में छ साल फाइट की ठाकुर के साथ में 6 साल उनका मतभेद रहा कि काली को कैसे स्वीकार करेंगे और स्वामी जी कहते हैं कि मैं ब्रह्मण में तो विश्वास है मुझे वेदांत तो मुझे समझ में आता है किंतु काली तत्व कैसा है काली तत्व समझ में नहीं आ रहा है तो स्वामी जी कहते हैं कि 6 साल फाइट करने के बाद में आखिर में मेरे साथ में ऐसी घटना परंपराओं का स्वामी जी के सन्मुख ऐसी घटना परंपरा का उदय हुआ कि आखिर में उनको मां काली को स्वीकार करना ही पड़ा तो कल स्वामी जी कह रहे थे कि वह कौन सी घटनाएं थी मैं आपको नहीं बताऊंगा वह सब सीक्रेट मेरे ही साथ में मेरी कबर में ही दफन हो जाएंगे किंतु हमको पता है कि कौन से वह सीक्रेट थे और कौन सी वह घटनाएं थी स्वामी जी का जीवन युग नायक विवेकानंद में इन घटना परंपरा का बड़ा ही विषद रूप से उल्लेख स्वामी गंभीरानंद जी महाराज ने किया है तो युग नायक विवेकानंद में से वह जो पूरे जो तीन-चार पैसेज है जिसमें कि गंभीरानंद जी हमको समझाते हैं कि वह घटनाएं कौन सी थी किस तरह से स्वामी जी के मन में क्या चल रहा था स्वामी जी के ही शब्दों में और यह सब स्वामी जी के ही शब्दों में स्वामी जी ने अपनी जो कहानी बताई है वह ज्यादातर लीला प्रसंग में है लीला प्रसंग में शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी महाराज स्वामी जी अपने मुझसे जो कहते हैं अपने खुद के उस दिनों की बातें तो वह सब लीला प्रसंग में भी वर्णन है देखिए कि स्वामी जी जब इस तरह के अपने बारे में कुछ भी कहते थे तो बार-बार कहते थे कि यह सब बातें और किसी को मत बताना मां को एक स्वप्न मां का एक दर्शन हुआ था कि देखा कि ठाकुर गंगा में से गंगा के जल में प्रवेश किए ठाकुर ने और फिर स्वामी जी वही जल लेकर के सबके सर के ऊपर में डाल रहे हैं जब स्वामी जी को यह दर्शन की बात सुनाई गई तो स्वामी जी ने कहा कि यह बात मुझे नहीं बताते तही तभी अच्छा होता तो स्वामी जी का खुद का स्वरूप क्या था यह स्वामी जी को ना पता चले इसके बारे में ठाकुर भी बड़े सचेत थे क्योंकि यदि उनको अपना सही स्वरूप जानकारी हो गया तो वह पृथ्वी पर नहीं रहेंगे तो इस तरह की स्वामी जी खुद जब अपने बारे में कुछ बताते थे तो जैसे कि कथामृत में वराह नगर मठ वाला जो चैप्टर है उसमें हम देखते हैं कि स्वामी जी अपने बारे में मास्टर महाशय के साथ में बात तो करते हैं किंतु बार-बार कहते हैं कि और किसी को यह मत बताइए और किसी को यह मत बताइए मास्टर महाशय ने यह सब लिखा है किंतु कब जबकि उनका देह त्याग हुआ स्वामी जी की महासमाधि हुई उसके बाद में यह सब पब्लिश हुआ है तो शारदानंद जी महाराज को स्वामी जी ने अपने से जो कुछ बताया होगा अपने बारे में वह उनकी महासमाधि के बाद में ही पब्लिश हुआ है हमको पता है कि शारदानंद जी महाराज ने मां के लिए उद्बोधन भवन का निर्माण प्रारंभ किया और उसके लिए उनको कुछ रुपए उधार लेने पड़े थे तो यह उधार चुकता करने के लिए उन्होंने लीला प्रसंग ग्रंथ की रचना करने का प्रारंभ किया था इसके सेल में से इसको बेच कर के जो रॉयल्टी मिलेगा तो यह मकान का यह जो उधार है वह सब चुकते होगा तो इस तरह से ये बात प्रारंभ हुई थी किंतु यह सब 1905 1909 के बाद की यह सब बातें हैं और स्वामी जी की महासमाधि हुई 1902 तो उन्होंने जो यह कहा था कल हमने सुना कि स्वामी जी कहते हैं कि मैं अपने रहस्य और किसी को बताऊंगा नहीं यह घटना किसी को नहीं बताऊंगा कि क्यों मैंने मां काली के सामने आत्मसमर्पण किया तो कल की बात भी सही है और आज की बात भी सही है आज की घटनाओं को पढ़ कर के कोई यह ना सोच ले कि कल तो स्वामी जी कह रहे थे कि मेरे यह जो सब सीक्रेट है मेरे ही साथ में कबर में जाएंगे किंतु आज यह सब बातें कहां से निकल के आई स्वामी जी ने अपने जीवन के दौरान अपने गुरु भाइयों को बहुत कुछ बताया था वह सब स्वामी जी की महासमाधि के बाद में ही पब्लिश हुआ है तो विथ दिस डिस्क्लेमर हम यह युग नायक विवेकानंद पुस्तक में गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित यह पुस्तक में से हम थोड़ा सा पाठ करते हैं इसके पीछे के जो सोर्सेस है मेनली लीला प्रसंग में से ही यह सब लिया गया है और कुछ-कुछ बातें उन्होंने कथामृत में से और कुछ-कुछ बातें उन्होंने साधु परंपरा से जो चली आ रही है उसमें से यह पूरा चैप्टर उन्होंने लिखा है तो अभी देखिए कि हुआ क्या था आउटलाइन तो हमको पता है एक्चुअली सभी घटनाएं भी हमको पता है हमको सिर्फ यही देखना है कि गंभीरानंद जी महाराज इसका कितना सुंदर रूप से वर्णन करते हैं किस तरह से इसको फिलोसोफी में डालते हैं तो घटना परंपरा तो हमको पता ही है स्वामी जी के अर्थात कि नरेंद्र के पिताजी का देहांत हुआ घर में खाने को कुछ नहीं है जब पिताजी जीवित थे तो वो वकील थे और उनकी अच्छी आई भी थी किंतु उनके देहांत के बाद में पता चला कि ऐसा कुछ भंडो या तो कोई फंड उन्होंने अपने बीवी और बच्चों के लिए रख कर के नहीं गए हैं ऊपर से वह जिस घर में रहते थे उस घर में से भी उनको निकाल दिया गया था तो यह बहुत सारा मिसफॉर्चून यंग नरेण ये युवा नरेन के सर पर एकाएक आकर के उसके सर पर आकर के बैठ गया तो फिर स्वामी जी अभी बेचारे नौकरी के लिए चारों ओर घूम रहे हैं और उस समय उनके मन में एक बात बार-बार आ रही है अपनी सेंट्रल थीम जो है कि मृत्यु रूपा काली य काली का ये जो भयावह स्वरूप है तो ये अशवंथ पूछते हैं कि शिव के संसार में ईश्वर यदि आशीर्वाद देने वाले हैं तो उनके संसार में उनके यह नादान यह जो इनोसेंट बच्चों के लिए इस तरह का कष्ट क्यों यह बात स्वामी जी के मन में घर कर गई और एक समय ऐसा आया कि स्वामी जी नास्तिक वाद की ओर उन्होंने उनका थोड़ा सा झुकाव हो गया कथामृत में है एक बार स्वामी जी कहते हैं कि मैं नास्तिक वाद पढ़ रहा हूं उस समय ठाकुर के कहते हैं दूट आछे दो है अस्ति और नास्ति तो अस्ति को ही लो ना क्यों नास्ति को क्यों लेते हो तो जो भी है नास्ति या तो फिर नास्तिक वाद इसका अध्ययन या तो फिर इसके प्रति स्वामी जी का आकर्षण इसी लिए था क्योंकि वह देख रहे हैं अपनी आंखों से यह कंट्रा कि फिलोसॉफिकली ईश्वर तो आपके ही इज अ गुड पर्सन सभी के कल्याणकारी है किंतु समाज में सभी का कल्याण नहीं होता है जो एक साम्यवाद की विचारधारा उस समय काफी प्रचलित हो रही थी साम्यवाद क्या कहता है कि ये तो कुछ पूंजीपति है अपने समाज में जो कि आम आदमी का शोषण करके उनके पास में से मींस ऑफ प्रोडक्शन अर्थात कि यह धन पैदा करने वाली यह जितनी भी चीजें हैं वो चाहे जमीन हो वो चाहे लाइव स्टॉक हो न कि चाहे फैक्ट्रीज हो ये सब पहले तो जमीन और लाइव स्टॉक आम आदमी से ले लेते हैं छीन कर के दूसरा कि उनको मजदूर बना कर के वर्कर बना कर के फैक्ट्रीज में बेदम उनके पास में काम करवाते हैं और ऐसा काम करवाते हैं जिससे कि उनका पूरा शोषण ही हो देखिए कि यह कैपिट ज्म है यह कैपिट कैपिट ज्म की ब वजह से ये एडवांसमेंट तो बहुत हुआ है सोसाइटी में इंडस्ट्रियल इजेशन यह टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट वगैरह किंतु यही इंडस्ट्रियल इजेशन ने शुरू शुरू में वर्कर्स जो थे उनका इतना भयानक शोषण किया था कि उसके बारे में यदि पढ़ेंगे यह लंडन में या ब्रिटन में जो फैक्ट्रीज चल रही थी उसमें आम आदमी का जो शोषण होता था फिर यही यह कैपिट ज्म इंडस्ट्रियलिज्म जापान में गया स्वामी जी जिसकी बड़ी प्रशंसा करते हैं कि जापान में जाकर के देखो किस तरह से उन्होंने यूरोपियन आइडियाज को लेकर के अपनी सोसाइटी को एडवांस बनाना शुरू किया है तो किंतु यह जो यूरोपियन आइडियाज के साथ में अच्छा भी था बुरा भी था यदि इंडस्ट्रियल इजेशन जदी होगा यूरोपियन आइडियाज के साथ में तो साथ-साथ में वर्कर्स का शोषण भी प्रचंड रूप से होगा यह जापान ने जब चाइना के ऊपर में हमला किया और चाइना को गुलाम बना कर के पूरे चीन को नहीं किंतु चीन का यह जो इट जो पार्ट है पूर्वी कुछ-कुछ प्रांत उसके ऊपर में उन्होंने कब्जा कर लिया और फिर वहां पर फैक्ट्रियां खोली और फिर वहां का कुछ-कुछ वर्णन मैंने पढ़ा है ऐसा भयानक वर्णन कि हम लोग पढ़ ना पाए एक वहां पर छोटे-छोटे बच्चों को जोर जबरदस्ती यह लोग फैक्ट्री में काम करवाते थे यानी कि अभी देखिए आजकल तो यह लेबर लॉ है कि चाइल्ड लेबर आपका इलीगल है वगैरह किंतु हमको पता है हमको हमने क कितनी जगह पर देखा है कि हजार चाइल्ड लेबर लो आप लगाइए वह छोटे-छोटे बच्चे काम करते ही हैं खेत में भी करते हैं लोगों के घर में जाकर के बर्तन वगैरह भी धोते हैं सब कुछ हम तो छोटे बच्चों को करते हुए देखते हैं तो उस समय आज तो फिर भी एटलीस्ट देयर इज अ लिप सर्विस मुझसे तो कहते हैं कि चाइल्ड लेबर इल्लीगल है अन एथिकल है वगैरह वगैरह इम्मोरल है उस समय तो यह इम्मोरलिटी अन एथिक्स यह सब कोई बात ही नहीं थी किसी भी तरह से प्रोडक्शन बढ़ाना है बच्चों को लगाना चाहे तो बच्चों को भी लगाओ तो एक वर्णन मैंने पढ़ा था एक छोटी बच्ची मुश्किल से 11 12 साल की होगी उसको बताया गया कि यह हेवी मशीनरी ऑपरेट करो अभी वह बच्ची को क्या समझ में आएगा गांव से उसको उठा कर के वह गुलाम बना कर के लेक आए थे अभी हेवी मशीनरी वह ऑपरेट करेगी इतना बड़ा मशीन उसको समझ में नहीं आया पता नहीं क्या गड़बड़ कर दी वह मशीन उसके सर पे सीधा आ कर के टकराया और उसकी दोनों आंखें बाहर निकल गई तो अभी वह रो रही है और वह जो जापानीज जो सुपरवाइजर थे उसके सामने देखने की बजाय उसके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने की बजाय उसको कोई ट्रीटमेंट देने की बजाय उसी को डांटना शुरू कर दिया कि तुमने गलती क्यों की तुम्हारी गलती की वजह से ही तुम्हारे साथ में ऐसा हुआ तो यह जो एक भयानक क्रूर हृदय कैपिट इज्म और इंडस्ट्रियलिज्म जो उस समय समाज में फेल रहा था और जिसकी वजह से समाज के कुछ लोग धनपति हो रहे थे और ज्यादातर लोगों का प्रचंड शोषण हो रहा था तो यह सब देखिए स्वामी जी यूरोपियन फिलोसोफी तो अच्छे से पढ़ते थे हिस्ट्री का भी उनको बड़ा अच्छे से ज्ञान भी था तो अभी जब तक उन्होंने किताबों में यह सब चीजें पड़ी थी तब तक तो चलो कि नास्तिक वाद कहो कि ईश्वर का सही स्वरूप गलत स्वरूप जो भी हो यह सब चीजों को इतना सीरियसली नहीं लेते थे जब तक पिताजी थे जब तक घर में खाने पीने की व्यवस्था अच्छी थी तब तक स्वामी जी भी बड़े आनंद से ठाकुर के पास जाते ठाकुर कहते कि उसके मन में जो आता वही वह काली को कहता मां काली को माने अपने जितने भी ओपिनियन है बिना किसी द्विधा के स्वामी जी प्रदर्शित करते किंतु एक बार जब पिताजी का मृत्यु हुआ खाने को खाने के भी वहां पर मुश्किल होने लगी रोटी कपड़ा मकान का जब प्रॉब्लम खड़ा हुआ उनके साथ में तब उन्होंने अच्छे यह जो सब फिलोसॉफिकल अंडरस्टैंडिंग है कि किस तरह से समाज में इतने सारे लोगों का शोषण होता है किस तरह से उनके साथ में अत्याचार होता है और यह सब क्यों विकास के नाम पे इंडस्ट्रियल इजेशन डेवलपमेंट के नाम पे फॉरेन आइडियोस को स्वीकार करने के नाम पे तो यह दोनों मिलकर के एक तो उनका रीडिंग भी बहुत अच्छा था दूसरा कि उनका यह जो खुद का अनुभव था यह दोनों मिलकर के स्वामी जी के मन में एक सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा किया कि शिव के संसार में अशवंथ मंगलमय ईश्वर के संसार में यह भयावह दुर्घटनाएं का किस तरह से खेल रही है किस तरह से लोगों के जीवन को बर्बाद कर रही है ऐसा सोचते सोचते आखिरी में जैसे कुछ-कुछ यूरोपियन थे उस समय के उन लोगों का ऐसा था कि ईश्वर है ही नहीं अभी देखिए कि ईश्वर क्या है ईश्वर अर्थात कि जो एक्चुअल जो ईश्वर है वह नहीं अपनी ईश्वर के बारे में जो अवधारणा है वह उसी को तो हम लेकर के सब कुछ सोचते हैं तो यह कैथोलिक चर्च जिस तरह से ईश्वर को प्रोजेक्ट कर रहा था कि ईश्वर अच्छे हैं ही इज अ गुड एंड इवल या तो सेटन इज बैड तो यह जो स्प्लिट कर दिया था कैथोलिक चर्च ने ईश्वर अच्छे हैं हमारा मंगल चाहते हैं और हमारे साथ में जो कुछ भी बुरा हो रहा है वह जो ईश्वर का जो प्रतिद्वंदी है सैटन या तो फिर शैतान उसकी वजह से यह सब हो रहा है जब तक ईश्वर की विजय होती है तब तक हमारे साथ में अच्छा होगा जब शैतान की विजय होगी या तो फिर शैतान टेंपरली उसका पावर बढ़ता जाएगा तो हमारे साथ में बुरा होगा तो यह सब कैथोलिक या तो फिर यह क्रिश्चियनिटी का एक बेसिक आइडिया है तो इस आइडियाज को लेकर के कुछ कुछ यूरोपियन पंडित के मन में यह प्रश्न हुआ कि आप शैतान को लाते ही क्यों है हमको तो लगता है कि यह जो मंगल रूपी ईश्वर है मंगलमय या तो कल्याणकारी जो ईश्वर है यह अवधारणा ही गलत है ईश्वर ही नहीं है हमको तो ईश्वर है यह बात पे ही विश्वास नहीं आता ईश्वर होगा तो आपको फिर शैतान को खड़ा करना पड़ेगा कि ईश्वर अच्छे है शैतान बुरा है ना ही अच्छा है ना ही बुरा है यह जो सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट जो चार्ल्स डार्विन ने जो इवोल्यूशन की थिरी खोज निकाली थी उस समय में उस का जो डेवलपमेंट हुआ था यह जो इवोल्यूशन का यह जो सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट आइडिया है बहुत विस्तृत रूप से वह व्याप्त हो रहा था बहुत सारे लोगों ने इसी आइडियाज के विभिन्न विभिन्न स्वरूप को अपना कर के कहा कि आपको सशक्त होना है जब तक आप वीक है जब तक आप कमजोर है तब तक ही आपके सर के ऊपर में यह जो आपका शोषण करने वाले लोग आकर के बैठ जाएंगे किंतु जिस दिन हम सशक्त होंगे उसी दिन हम हमारे शोषण कार्यों को खत्म कर देंगे विनाश कर देंगे तो इसी बात को लेकर के यह कम्युनिज्म प्रारंभ हुआ वर्कर्स ऑफ द वर्ल्ड यूनाइट विश्व के जितने भी वर्कर हैं जिनका भी शोषण होता है जितने भी खेत मजदूर है वह सब इकट्ठा हो और इकट्ठा होकर के यू हैव नथिंग टू लज बट योर अ बट योर बेरियर बट योर यह जो अपने हाथों की यह जो जंजीरें हैं ये जंजीरों को छोड़ कर के और कुछ भी आपको खोना नहीं है आप जद इकट्ठा होंगे तो आपकी जंजीरें ही जाएगी और कुछ आपको नुकसान नहीं होने वाला है तो इस तरह से यह जो इंटरनेशनल कम्युनिज्म वह स्टार्ट हुआ और फिर कम्युनिज्म के चलते-चलते यह चाइना और रशिया खास करके इन दोनों में इतना बड़ा परिवर्तन आया तो अभी वह सब तो भविष्य की बातें थी उस समय किंतु यह जो कम्युनिस्ट आइडियाज थे काफी पॉपुलर थे हमने स्वामी जी को कभी भी कम्युनिज्म या सोशलिज्म के बारे में बात करते हुए नहीं देखा है एक दो सिर्फ कोटेशन है स्वामी जी कहते हैं एक जगह पे कि आई फेवर कम्युनि सोशलिज्म इन य्यू ऑफ एनी बेटर थिरी मैं मुझे लगता है कि सोशलिज्म को आजमा देना चाहिए क्योंकि और कोई थिरी जो है मुझे इसके नजदीक आती हुई नहीं दिखती है और कोई पॉलिटिकल थिरी इतनी अच्छी नहीं दिखती है तो इसके लिए उन्होंने यह सोशलिज्म के बारे में इस तरह से कहा अभी इसी बात को बढा करके बाद बाद में बंगोल में कम्युनिज्म सोशलिज्म काफी फैला और यहां तक कि स्वामी जी के जो छोटे भाई थे महेंद्रनाथ गुप्त फिर वो जो दूसरे थे मैं उनका नाम बोल गया और दूसरे जो उनके भाई थे खास करके उन्होंने ऐसा मान लिया कि स्वामी जी कम्युनिस्ट है और उन्होंने वह किताब भी लिखी प्रोफेट पेट्रियट स्वामी विवेकानंदा प्रोफेट पेट्रियट तो इस किताब के रचयिता स्वामी जी के दूसरे भाई उनका नाम भी याद नहीं आ रहा तो जो भी है तो यह जो कम्युनिज्म जो बंगाल में खास करके विकसित हुआ बहुत सारे लोगों ने यह मान भूपेंद्रनाथ यस यस यस भूपेंद्रनाथ दत्त तो काफी लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि स्वामी जी ने कम्युनिज्म को फेवर किया है तो चलो हम लोग यहां पे कम्युनिज्म आजमाते हैं एक्चुअली स्वामी जी डज नॉट फेवर एनी पॉलिटिकल थिरी कोई पार्टिकुलर पॉलिटिकल थिरी को स्वामी जी फेवर नहीं करते उनका बस वही था कि समाज का कल्याण होना चाहिए और आखिर में तो स्वामी जी ने वही कहा कि धर्म के आधार पर ही यह कल्याण होना चाहिए और कम्युनिज्म जैसे-जैसे जितना धर्म विरोधी होता गया उतना ही भारत में उसको स्थान कभी नहीं मिला अदर वाइज बहुत सारे लोग सोचते थे कि जिस तरह से रशिया में और चाइना में कम्युनिज्म फैला क्योंकि रशिया और चाइना में ही सबसे ज्यादा लोगों का शोषण हुआ है तो वैसे ही भारत में भी फैलना चाहिए भारत में भी तो देखिए कॉलोनियलिज्म की वजह से ब्रिटिश शासन की वजह से इतना जो लोगों का शोषण हुआ तो उनको ऊपर आने का एक ही रास्ता है वह है कम्युनिज्म किंतु अभी नो डाउट शरू शरू की गवर्नमेंट आजाद भारत की शरू शरू की गवर्नमेंट ने कुछ-कुछ सोशलिज्म के साथ में एक्सपेरिमेंट कि है किंतु अल्टीमेटली सोशलिज्म भारत में सक्सेस नहीं हुआ है इसका रीजन यही है कि सोशलिज्म या कम्युनिज्म ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता जबकि भारत में ईश्वर के ऊपर में ही सब सब कुछ आधारित है तो यह एक ओवरऑल आईडिया है स्वामी जी के उस समय मन में जो चल रहा था नरेंद्र के मन में कि यदि ईश्वर है तो संसार में अमंगल क्यों है और यदि अमंगल है तो फिर हम ईश्वर के बारे में जो समझते हैं वही गलत है कि वह मंगलमय ईश्वर है अभी इसका सोल्यूशन बाद में स्वामी जी ने यह काली दम मधर जो पोयम जिसका हम अभ्यास कर रहे हैं उसी के भीतर में स्वामी जी ने इसका उसका रेजोल्यूशन दिया है कि जो काली सृष्टि स्थिति प्रलय करती है जो मां काली संसार को ज जन्म देती है वही माहा काली हमारा संहार भी करती है यह पालन पोषण और संहार यह दोनों जो एस्पेक्ट है ईश्वर के मंगलमय और अमंगलम शिव और अशवंथ में विद्यमान है और ये दोनों का प्रयोजन यही है कि अल्टीमेटली हमको संसार में से विराग उत्पन्न करवाए यदि संसार मंगलमय है सब कुछ अच्छे से यहां पर चलता है तो संसार का त्याग करके सन्यास के रास्ते पर कोई नहीं चलेगा कोई भी ईश्वर या तो आत्म साक्षात्कार के लिए प्रयास नहीं करेगा यह जो ऐसी बात हो गई कि वो भगवान राम और मां सीता अपने अटालिया के ऊपर में खड़े हैं मां सीता ने देखा कि बहुत सारे लोग भगवान राम के राज्य में गरीब है तो मां ने कहा आप आप तो बड़े धनी है भगवान राम को कहा कि आपके पास में आपके खजाने में तो बहुत सारी सोना मोहर है आपके राज्य में इस तरह से गरीब लोग कैसे चलेगा यह बात आप अपना खजाना खोल दीजिए सबको खाने पीने का बड़ा अच्छे से बंदोबस्त कर दीजिए तो भगवान राम ने मां सीता को समझाने का प्रयास किया कि इकोनॉमिक्स इस तरह से नहीं चलती किंतु अभी मां सीता की जीत के सामने भगवान राम क्या करेंगे खजाना खोल दिया गया सबको सोना मोहर बांट दी गई उस घटना मा सीता भी बड़ी प्रसन्न हो गई कुछ समय के बाद में देखा कि महल में कुछ दरार हुई है छत के ऊपर में से पानी टपक रहा है तो ऐसा कुछ ना कुछ छोटा मोटा काम मां सीता ने कहा जाओ वो वर्कर्स जो प्लंबर है वो जो भी है उसको लेकर आओ यह सब ठीक करवाओ तो यह जब सैनिक लोग गए बुलाने के लिए तो उन्होंने सीधा बोल दिया अभी हमको काम करने का कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि हम लोगों के पास में खाने पीने के लिए पर्याप्त सामग्री है तो सैनिक लोग बेचारे वापस आए वो मां सीता नाराज हो गई कहा कि अरे मैं तो इनके कल्याण के लिए इतना खजाना खोल कर के उनके लिए सोना मोहर वगैरह दिलवाया और ये लोग काम करना बंद कर दिए आलस की तरह बैठे हैं ले लो सब वापस ऐसा करके जब मां ने कहा तो फिर से ये लोग प्ले जो प्लंबर है वर्कर है सब आकर के काम करना शुरू किए तो देखिए कि जगत में सब कुछ अच्छा होगा तो आध्यात्मिक विकास तो छोड़ ही दीजिए ये इकोनॉमिक डेवलपमेंट भी अटक जाएगा हम कितने लोगों के बारे में हम सुनते हैं कि उन्होंने पीएचडी क्यों किया घर में गरीबी है घर की अवस्था अच्छी नहीं है पढ़ाई लिखाई के अलावा और कोई उपाय ही नहीं है डेवलपमेंट का बोल कर के वह स्टडी कर रहे हैं बोलकर के वह बिजनेस कर रहे हैं बोलकर के वह लोग रिस्क ले रहे हैं बोलकर के वह साथ समुंदर पार ब्रिटिश यह सब लोग भारत में वो ट्रेडिंग करने के लिए भारत के साथ में यह बिजनेस रिलेशन खड़ा करने के लिए भारत में आए और कौन सा समुंदर पार करता यदि घर में सब कुछ ठीक होता तो तो यदि सब जगह पर प्रोस्पेरिटी है तो संसार ही नहीं चलेगा आपको आध्यात्मिकता की तो बहुत दूर की बात है तो यह सृष्टि स्थिति संहार ईश्वर के ही स्वरूप है और ईश्वर ही संसार को चलाने के लिए तीनों का एक के बाद एक इस्तेमाल करते हैं तो यह हो गया अपना हिंदुइज्म का थिरी किंतु जिस समय यह सब स्वामी जी के साथ में हो रहा था दुर्घटनाओं की परंपरा उस समय तो स्वामी जी के मन में नास्तिकता का एक प्रारंभ हुआ था और इसके बारे में फिर क्या हुआ हम लोग पढ़ते हैं देखिए कि स्वामी जी खुद अपने मुंह से जो कहते हैं आमा के तरा एतो दूर हीन भावित पारे जानिया अमियो दारुण अभिमाने सतो होया दंड पाई बार भए ईश्वर विश्वास करा विषम दुर्बलता एक कथा प्रतिप पूर्वक हूम बेन मिल कमते प्रवृति पश्चात दार्शनिक सकल मता मतो उधु तो करिया ईश्वर अस्तित्व प्रमाण नाई बोलिया तहा दिगर शहीद प्रचंड र को जुड़िया दिला ये क लीला प्रसंग में से यह कोटेशन है सब सारे और लीला प्रसंग में शरद महाराज की तो हमको स्टाइल पता है एक एक सेंटेंस एक एक पैराग्राफ जितना बड़ा होता है यहां पर महाराज जी स्वामी जी अपने मुंह से कहते हैं कि भक्तों में एक बार यह बात फैलना शुरू हो गई कि स्वामी जी नास्तिक हो गए हैं बुरे लोगों के संग में पड़ गए हैं वगैरह वगैरह तो उन्होंने आपस में स्वामी जी की निंदा प्रारब्ध कर दी प्रारंभ कर दी तो स्वामी जी कहते हैं कि यह भक्त मुझे इतना हीन सोच सकते हैं बोलकर के मेरे मन में भी बड़ा अभिमान खड़ा हुआ कोई कोई कभी-कभी हमको दुख होता है तो कभी-कभी अभिमान भी होता है अच्छा ये लोग बोलते हैं मैं बुरा हूं तो फिर मैं और ज्यादा बुरा हो करके दिखाऊंगा ऐसा एक अभिमान खड़ा होता है और फिर स्वामी जी कहते हैं कि फिर मैंने क्या किया कि ईश्वर मुझे दंड देंगे बोलकर के मैं अच्छा का करूं इस तरह से यदि मुझे ईश्वर पर विश्वास है तो यह तो कमजोरी का प्रतीक है मुझे ईश्वर पर विश्वास इसलिए क्यों होगा भाई कि मैं पाप करूंगा तो मुझे नरक में जाना पड़ेगा अच्छा काम करूंगा तो मुझे स्वर्ग मिलेगा यह प्रलोभन के वजह से या तो फिर दंड पाने के भय से यदि मुझे ईश्वर पर विश्वास है इसके लिए यदि मैं पुण्य कर्म करता हूं और अ बुरे कर्म नहीं करता हूं यह तो कमजोरी की वजह से हुआ मेंटल वीकनेस की वजह से हुआ ऐसा बोलकर के स्वामी जी जितने भी यह फॉरेन फिलोसोफर थे ह्यूम है बेन है मिल है कमत है प्रवृति यह पाश्चात्य दार्शनिकों के मत को उधत करके कोट करके स्वामी जी कह रहे हैं कि इस तरह के ईश्वर का अस्तित्व है ही नहीं बोलकर के स्वामी जी ने उनके साथ में प्रचंड तर्क करना शुरू कर दिया फले बुझीते पारला आमार अध पतन हया छ एक कथाए विश्वास त्र गरिया तरा विदाय ग्रहण करीले अब जब स्वामी जी ईश्वर है ही नहीं ईश्वर को विश्वास क्यों करेंगे भाई आपको इसलिए ईश्वर पर विश्वास है क्योंकि मुझे डर है बुरा कार्य करने से दंड मिलेगा अच्छा कार्य करने से स्वर्ग मिलेगा प्रलोभन के मारे या तो भाई के मारे मैं ईश्वर पर विश्वास कर रहा हूं यह तो बिल्कुल गलत चीज है और यह ईश्वर है ही नहीं बोलकर के नास्तिक वाद का प्रचार एक बार जब नरेंद ने शुरू किया तो भक्त लोग जो उनकी बात सुनने के लिए इकट्ठा हुए थे उनके मन में यह दृढ़ धारणा हो गई कि नरेंद्र का संपूर्ण रूप से अदह पतन हुआ है कहां वह ठाकुर के पास आता था कहां ठाकुर का प्रिय पात्र था कहां जो पूरा घर भर कर के लोग बैठे हुए हैं रामचंद्र दत ये वगैरह वगैरह उस समाज के गणय मान्य व्यक्ति धनी व्यक्ति तो वो बैठे हैं तो बैठे ही है सबको छोड़ करर के ठाकुर सिर्फ एक छोकरा नरेण कॉलेज में पढ़ता हुआ एक छोकरा उसके सामने देख कर के ही बातें कर रहे हैं तो कहां वो नरेण और कहां आज का नारायण संपूर्ण रूप से उसका अध पतन हुआ है बोलकर के भक्त लोग वहां से विदाय ग्रहण किए बझिया आनंदी तो होई लाम एवं भब ठाकुरो होई तो इहा देर मुखे सुनिया ई रूप विश्वास करीले नरन कहता है कि यह देख कर के मुझे आनंद ही हुआ अच्छा है कि चलो यह सब जो जिनको कहते हैं ना हाइपोक्राइट कहते हैं वो अपने दंभ से भरे हुए दंभी लोग जो है धनी लोग है यह लोग यहां से निकले अच्छा ही है भले चाहे ठाकुर के पास जाए भले चाहे ठाकुर को कंप्लेन करें मुझे इस सब चीजों से अभी कोई परवाह नहीं है लगता है कि यदि ठाकुर भी उनकी बात सुन लेंगे तो ठाकुर भी ये सब बातों पर विश्वास करना शुरू करेंगे तो करने दो ठाकुर यदि छिछोरे होंगे उनको जद यह लगेगा कि मैं अपनी बातों से ही मेरा चरित्र पहचानने में आता है ठाकुर जद यह सोचेंगे तो ठाकुर के साथ में भी मुझे किसी भी तरह का संपर्क नहीं रखना है बोलकर के घम एकदम एक अभिमान से दुख भरे अभिमान से स्वामी जी का अंतर पूर्ण हुआ स्थिर कोरिला और रूप भाबी बा मात्र अर निदो अभिमाने अंतर पूर्ण होइलो जैसे ही ऐसा सुना जैसे ही मुझे ऐसा लगा एक दर्द पूर्ण अभिमान से मेरा अंतर पूर्ण हो गया स्थिर कोरिला ता करु और मैंने सोचा भले चाहे ठाकुर के पास जाए भले चाहे मेरी निंदा करे भले चाहे ठाकुर भी हो सकता है कि मेरी यह सब बातों को विश्वास करके मैं कहता हूं ईश्वर नहीं है नास्तिक हूं वगैरह वगैरह यह सब बातें सुन कर के विश्वास करके मेरे बारे में बुरा सोचना शुरू करे तो सोचने दो डज नॉट मैटर भालो मानुष भालो मंदो मता मते जखन इ तोही अल्प मूल्य खन ताहा ते आश जाय की मनुष्य के अच्छे बुरे मत का जद इतना अल्प मूल्य है इसकी यदि कोई विषत ही नहीं है तो फिर क्या फर्क पड़ता है मेरे अंतर में एक दो एक प्रचंड एक क्यूरियोसिटी मुमुक्षु क्त्व की वजह से ही तो स्वामी जी खोज रहे थे कि जीवन का अंतिम सत्य क्या है तो यह खोजते खोजते यदि मुझे ईश्वर ईश्वर की ईश्वर से दूर भी जाना पड़े नास्तिकता की ओर भी जद जाना पड़े तो डज नॉट मैटर आई विल रिमन ट्रू टू माय सर्च आई विल रिमन ट्रू टू माय क्यूरियोसिटी बहुत सारे लोग ऐसे जैसे कि ठाकुर एक एक जगह पर गए हैं 10 लोग बैठे हुए हैं एक डिवोटा उनको प्रश्न कर रहा बगल में एक दूसरा डिवोटा बैठा है वह बोलता है कि बार-बार प्रश्न क्यों करते हो यह जो कहते हैं मान लो ना तो ठाकुर बड़े नाराज हो गए शेकी सुधु मैंने नेवा माने क्या बोल रहे हो तुम से आंख बंद करके विश्वास कर लेना यह तो बिल्कुल गलत है ठाकुर कभी भी इस तरह से अंध विश्वास को प्राशेयर्स को कभी भी वो सराह नहीं थे तो स्वामी जी के ऊपर में उनको प्रेम इसलिए था भीतर में जो मुमुक्षु तोव था वो सही क्या है गलत क्या है इसको को समझ कर के सही को ही वो लेगा और वह जो गलत है उसको छोड़ देगा इसलिए तो स्वामी जी का नाम विवेकानंद है विवेक क्या है जैसे कि जो परमहंस है मोती और पत्थर ये छोड़ कर के वो दाने और मोती ये वो मोती ही खाएगा दाने नहीं खाएगा तो वो उसको कहते हैं परमहंस तो वैसे ही स्वामी जी के भीतर में क्यूरियोसिटी है मुमुक्षु तोव है सत्यानुसारण करते-करते सत्य को ही ग्रहण करेंगे किसी भी तरह से और यदि असत्य आ भी गया सामने उसके साथ में थोड़ा बहुत उन्होंने थोड़ा बहुत उसके साथ में उन्होंने सोच भी लिया उस असत्य के बारे में किंतु अल्टीमेटली उनके मन में असत्य का पराजय ही होगा तो स्वामी जी सोचते हैं कि मैंने यदि यह नास्तिक वाद के बारे में जो मेरे मत प्रकट किए हैं इसको सही मानकर यदि ठाकुर भी मेरे से नाराज हो जाए तो डज नॉट मैटर तो मुझे यह पता चलेगा कि ठाकुर भी मेरे अंतर में प्रवेश करके देख नहीं पा रहे हैं कि भीतर में क्या सोना पड़ा है बोलकर के स्वामी जी का मन इस तरह के दर्द पूर्ण अभिमान से पूर्ण हो गया परे श्या स्तंभ तो होईला किंतु स्वामी जी कहते हैं कि बाद में मुझे पता चला कि ठाकुर ने इस सब बातों के प्रति क्या रिएक्शन दिया है और यह सुनकर के वह बड़े स्तंभित भी हो गए थे ठाकुर से इतनी बड़ी अपेक्षा शायद उनकी नहीं थी उनको पता है ठाकुर के प्रति स्वामी जी का बड़ा श्रद्धा था किंतु ठाकुर की जो सही सही ग्रेटनेस है वह भी स्वामी जी को पूरे पूरे समझ नहीं पाए थे इसलिए जब यह सब बातें स्वामी जी के बारे में ठाकुर के सामने आई और ठाकुर ने किस तरह से रिएक्ट किया और यह बात जब स्वामी जी को पता चली तो बड़े स्तंभित हो गए थे किस तरह से ठाकुर ने रिएक्ट किया ठाकुर तहा देर मुखे ई कोथा सुनिया प्रथमे हाना किछुई बोले नहीं पहले पहले जब भक्त लोग ठाकुर के पास में जाकर के कंप्लेन करना शुरू किए कि महाशय नरेंद्र का हुआ है यह वो दुराचारी लोगों के संपर्क में आ गया है नास्तिक वाद के बारे में बात कर रहा है तो पहले तो ठाकुर ने उसके बारे में किसी भी तरह का मत प्रदर्शित नहीं किया किंतु परे भवनाथ रोधन करते कोरीते तहा के ई कोथा जाना इया जोखन बोलिया छलो किंतु बाद में भवनाथ ने रोते रोते जब ठाकुर को यह बात कही थी कि महाशय नरेंद्र एमन होई बे एक कोथा सपने गोचर तखन उत्तेज तो होईया तिनी तहा के बोलिया छी लेन पहले तो ठाकुर ने कुछ प्रदर्शित नहीं किया अपना मत किंतु बाद में भवनाथ जो कि नरेंद के साथ में नियमित ठाकुर के पास में आता था नरन का अच्छा मित्र था उसने रोते-रोते जब ठाकुर के सामने कहा कि महाशय हमको क्या पता कि नरेंद्र की ऐसी अवनति होगी यह हमने सपने में भी नहीं सोचा था उस समय फिर ठाकुर के मन का बांध टूट गया और बड़े ही भयानक उत्तेजित होकर के बड़े ही क्रोध पूर्वक उसको बोल दिए चुप कर सालारा चुप करो सालो हां बोलिया छ से कखन रूप होते पारे ना मां अर्थात की मां काली ने कहा है कि नरेण के साथ में कभी भी ऐसा कुछ भी नहीं होगा ऐसा कुछ अर्थात कि यह मोरल अध पतन नैतिक अध पतन नर का कभी ना होगा आर कखन आमा की ई शकल कोथा बोली ले तो देर मुख देख पारी बोना और यदि फिर कभी भी मेरे सामने आकर के इस तरह की उटपटांग बातें की तो मैं तुम्हारा मुख भी नहीं चेहरा भी नहीं देख पाऊंगा देखिए ठाकुर इतना नाराज होकर के इनको डांट दिए अच्छा अभी नरेंद्र को यह जब पता चला नरेण सही में स्तंभित हो गया था अभी नरेण के मन में क्या चल रहा है रूपे अहंकार अभिमाने नास्तिकता और पोषण कोरील होई बे की अभी महाराज लिखते हैं गंभीरानंद जी कि इस तरह एक्चुअली शरत महाराज को ही कोट कर रहे हैं कि इस तरह के अहंकार और अभिमान से मन में अहंकार और अभिमान को मन में पोषण करने से क्या होने वाला है पर खण बाल काल होते विशेष तो ठाकुर साक्षात्कार पर जीवने जे सकल अद्भुत अनुभूति उपस्थित होया छलो सेही सकलर कथा उज्जल ण मने उदय होवा भाबत था किता इस तरह से अहंकार और अभिमान से नास्तिकता का भाव मैं अपने हृदय में पोषण करूंगा उससे क्या फर्क पड़ता है बाद में ही मैंने देखा कि बचपन से और खास करके ठाकुर के साथ में मिलन के बाद में जो अद्भुत दर्शन जो अद्भुत अनुभूतियां हुई है वह आकर के नरेंद्र के मन में प्रभावित होकर के फिर नरेंद्र सोचता है ईश्वर निश्चय आछे एवं तहा के लाभ परिवार पथों निश्चय आचे नतबा ई संसारे प्राण धारण कोनोई आवश्यकता नाए ईश्वर अवश्य है और ईश्वर के दर्शन करने का उपाय भी है उनको लाभ करने का रास्ता भी है यदि ना होता तो इस संसार में प्राण धारण करने की आवश्यकता क्या थी देखिए स्वामी जी किस तरह से आस्तिक और नास्तिकता दोनों के बीच में झोला खा रहे हैं कभी कभी संसार में दुख कष्ट देख कर के अपने साथ में जो हो रहा है उसको देख कर के सोचते है शिव शिव के संसार में अशवंथ के लिए ही किया है वरना तो संसार में जन्म ग्रहण करने का प्रयोजन ही क्या था दुख कष्ट जीवने जोतो ही आसुक ना केनो दुख कष्ट जीवन में कितने ही आए ना सेही पथ खोजिया बाहर कोरीते होई बे ईश्वर प्राप्ति का रास्ता खोज करके निकालना ही पड़ेगा ही रूपे दिनर पर दिन जाते लागी लो इस तरह से दिन के बाद दिन जाने लगे एवं संशय चित्त निरंतर दोला मान होईया शांति सुदूर पसार तो होया रही लो दिन के बाद दिन जाने लगे किंतु चित्त के भीतर में मन के भीतर में संशय संदेह दोला मान एक के बाद एक आकर के उनके मन को विक्षिप्त करते रहे और शांति जो है मन की वो कहां अदृश्य हो गई कभी सोचते हैं ईश्वर है ही नहीं कभी सोचते हैं ईश्वर है कभी सोचते हैं कि मैं नास्तिक हूं कभी सोचते हैं कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता तो खोज के निकालना ही पड़ेगा ऐसा करते-करते स्वामी जी का मन अशांति से पूर्ण हो गया ग्रीष्म पर वर्षा शिलो गर्मी के बाद में बारिश की सीजन का प्रारंभ हुआ एनो पूर्वे न्याय कर्मे अनुसंधान घरिया बड़ाई ते छी अभी भी मैं पहले की तरह ही पिताजी के मृत्यु के बाद में स्वामी जी जो काम जो एक नौकरी खोजते खोजते घूम रहे थे तो स्वामी जी कहते हैं अभी भी मैं पहले की तरह ही नौकरी खोजते खोजते घूम रहा हूं एक दिन समस्त दिवस उपवास और वृष्टि ते भजिया रात्रे अवसन बदे एवं ततो धिक अवसन मने बाटी ते फिरते छी एक दिन ऐसा गया एक दिन की बात है कहानियों में कहते हैं ना कि एक दिन की बात है तो यहां पर भी स्वामी जी कहते हैं एक दिन की बात है पूरा दिन मुझे उपवास करना पड़ा था खाना मिला नहीं था शरीर भी थका है मन भी अवसन है और मैं घर लौट रहा हूं एमन समय शरीरे एतो क्लांत अनुभव करीला जे आर एक पदो अग्रसर ईते ना पारिया पार्श्व स्त बाटी रोके जोड़ो पदार्थ न्याय पड़िया रहीला उस समय ऐसी एक भयानक एक विश्रांत एक भयानक कष्ट कहो ना कि एक भयानक थकान थकावट आकर के मेरे शरीर पर सवार हो गई कि यहां पास में ही एक घर था एक मकान था उसके वहां पर एक रॉक बेंच जैसा कुछ होगा वहां पर मैं जड़ की तरह पड़ा गया पड़ गया जैसे कि मृत हो गए हैं मृत देह पड़ा है इस तरह से उस बेंच के ऊपर में स्वामी जी पड़े रहे किछु खण जन्नो चैतन्य लोप होया छलो कि ना बोली ते पारी ना और यदि कुछ क्षण के लिए कुछ समय के लिए मैं बेहोश भी हो गया था कि नहीं यह मैं कह नहीं पाऊंगा इतने थक गए थे खाना नहीं खाया था दिन भर घूम रहे हैं यदि यहां से नौकरी मिल जाए वहां से नौकरी मिल जाए नौकरी नहीं मिल रही है सब जगह से जैसे कि उनको धुत का करके निकाल दिया जा रहा है शरीर तो थकेगा ही साथ-साथ में मन के ऊपर में भी क्या बीतेगी वह तो हम समझ ही सकते हैं तो वहां पर बेंच था एक एक मकान के साम हमने वहां पर मृत देह की तरह में पड़ा रहा और हो सकता है कि कुछ क्षण के लिए मैंने अपने होश भी गवा दिए हो टा किंतु स्मरण मने नाना वर्ण चिंता और छबी तखन आपना ईते पर पर उदय लय होते छलो किंतु यह बात मुझे पक्का पता है मैं शायद बेहोश हो गया होंगा कुछ क्षण के लिए किंतु मेरे मन में क्या चल रहा था मुझे पक्का पता है एक के बाद एक चित्र विभिन्न चित्र उनके मन के सामने खड़े हो रहे हैं और लय पाम रहे हैं खड़े हो रहे हैं और अदृश्य हो रहे हैं एवं उहा दिग के ताड़ा इया कोनो एक चिंता विशेष मन के आबद्ध राखीव य रूप सामर्थ्य छिलना और यह सब विभिन्न चित्र विभिन्न चिंताएं मन के सामने एक के बाद एक आकर के खड़ी हो रही है कि घर वापस जाएंगे खुद को तो खाना नहीं मिला चलो ये तो एक एक बात है घर वापस जाएंगे मां भूखी है छोटे भाई बहन भूखे हैं वह अपेक्षा करके बैठे हैं कि नरेंद्र जाएगा तो बाहर से कुछ लेकर आएगा तो उनके सामने वह क्या मुंह लेकर के जाएंगे ये एक चित्र खड़ा होता है दूसरा एक खड़ा होता है कि वो भी एक दिन थे पिताजी वकील थे घर में खाने पीने का अभाव नहीं था 20-30 लोग प्रतिदिन घर में खाना खाते थे नौकर चाक थे सब कुछ था मित्र सब इतनी प्रशंसा करते थे और आज ये क्या हो गया मेरे साथ में तो यह एक चित्र खड़ा होगा दूसरा एक चित्र खड़ा होगा ठाकुर मुझे इतना प्रेम कर रहे थे ठाकुर के भक्त जो है मुझे इतनी श्रद्धा की नजर से देख रहे थे आज लगता है कि जैसे ठाकुर ने ही मेरा साथ छोड़ दिया हो जो भक्तों की श्रद्धा मेरे प्रति थी वही भक्त आज मेरी निंदा कर रहे हैं कह रहे हैं कि मैं दुराचार में फंसा हूं दु संग में पड़ा हूं नास्तिक हो गया हूं ऐसे एक के बाद एक चिंताएं आकर के स्वामी जी के मन को खा जा रही है और स्वामी जी कहते हैं कि मेरे मन में उस समय यह शक्ति नहीं थी कि इस दुश्चिंता हों से मुक्ति पा सकू किंतु जैसे महापुरुष और हम में जो डिफरेंस होता है हमारे साथ में ऐसा होगा और ऐसे एक के बाद एक दुश्चिंता आती खड़ी होती जाएगी तो उसी वही दुश्चिंता हमको लेकर डूबेगी किंतु स्वामी जी है शिव स्वयं है स्वामी जी कहते हैं किंतु क्या हुआ शोशा उपलब्धि करि लाम एकाएक मैंने अनुभूति की मैंने अनुभव किया कोई एक देव शक्ति प्रभाव एकर पर अन्न ए रूपे भीतरे अनेक गुली पर्दा जेनो उत् तोलित होलो एवम शिबे संसारे असशब केनो ईश्वर कठोर न्याय परता और अपार करुणा सामंजस्य प्रभृति जे सकल विषय निर्णय करी ते ना पारिया मन एतो दिन नाना संदेह आकुल होया छलो सेही सकल विषय स्थिर मीमांसा अंतरेर नितम प्रदेशे देखीते पाइला एकाएक मैंने उपलब्धि की कि कोई जैसे कि कोई एक दैवी शक्ति के प्रभाव से एक के बाद यह एक दुश्चिंता ं थी भीतर में जो सब चलचित्र चल रहा था जितने भी यह दुश्चिंता रूपी पर्दे थे वह सब पर्दे एक के बाद में एक उठ रहे हैं जैसे कि पहले के पुराने सिनेमा में यदि देखा होगा नाटक देखा होगा तो यदि आप रंग मंच पर जाते हैं तो एक बहुत बड़ा पर्दा होता है रंग मंच के सामने फिर जब नाटक शुरू होना है तो रंगमंच पर से यह पर्दा उठेगा पर्दा क्यों रखा है जैसे कि वोह स्टेज के ऊपर में जो भी अरेंजमेंट करना है वोह अरेंजमेंट होती रहे जब अरेंजमेंट ठीक हो जाएगा रेडी हो जाएगा पर्दा उठेगा तो ऐसा आपने कभी देखा होगा थिएटर में भी पहले शायद ऐसा होता था कि पर्दा उठेगा और चलचित्र प्रारंभ होगा तो स्वामी जी यहां पर वही उपमा देकर के कह रहे हैं यह जो दुष्ट चिंताए एक के बाद एक पर्दे की तरह उनके मन को ढक दे रही थी तो एक के बाद एक पर्दे जैसे कि कोई एक देवी शक्ति के माध्यम से उठना शुरू हुए और फिर यह मन के भीतर में यह जो प्रश्न था कि शिव के संसार में अशवंथ न्याय परायणता और फिर यह अपार करुणा का सामंजस्य कहां पर होता है ईश्वर कभी कठोर है कभी अपार करुणामय है यह विरोधाभास क्यों है ये यह जो प्रश्न थे यह सब प्रश्नों की वजह से मेरा मन संदेहालु हो गया था वो सबकी स्थिर मीमांसा मेरे मन के अंतर में मैंने उसको उदित होते हुए पाया मैंने देखा कि मन में जो भी प्रश्न थे किसी एक दव शक्ति की ब मदद से वजह से एक के बाद एक सबका समाधान हो रहा है और भीतर में एक प्रचंड जैसे कि एक एक कन्विंसेस कि कॉलेज के बाद में मुझे कौन सी नौकरी करनी चाहिए या तो फिर मुझे को बिजनेस में कौन सा डिसीजन लेना चाहिए मैं ठीक नहीं कर पाता हूं तो मैं कब बहुत सोचता हूं किंतु एक बार वो डि मिल गया तो मन में कैसा एक स्थिर निश्चय हो जाता है मन में एक भरोसा आ जाता है कि नहीं अभी मुझे यही करना है तो एक भरोसा स्वामी जी कहते हैं मेरे मन में प्रकट हुआ आनंदे उत् फुलो हुया उठला आनंद से मेरा मन उत् फुल्ल हो गया आनंद से मेरा मन परिपूर्ण हो गया अन बाटी फिरी बार काले देखि लाम शरीरे बिंदु मात्र क्लांत नाई उसके बाद में जब मैं खड़ा होकर के घर घर की ओर बढ़ रहा हूं तब मैंने महसूस किया मेरे शरीर में थोड़ा सा भी थकावट नहीं है थोड़ी भी थकान नहीं है मन अमित बल और शांति ते पूर्ण एवं रजनी अशान होई बार सल्प बिलबो आे मेरा मन एक अनंत बल अनंत शक्ति और शांति से परिपूर्ण हो गया है और देखा कि बस अभी यह जो रात जो है रात का अवसान अर्थात की रात समाप्त होने में बस थोड़ी ही देरी है देखिए जो भगवान बुद्ध कीय कहानी है उनमें वो जब राजमहल में जब रहते थे एक पेड़ के नीचे में बैठे थे वो पेड़ के नीचे में बैठ कर के उनको एक जो एक प्रचंड अनुभूति हुई थी ईश्वरीय अनुभूति देवी अनुभूति उसके माध्यम से ही बाद में उनको जब घर छोड़ा तो उनके मन में था कि मुझे वोह जो अनुभूति हुई है देवी अनुभूति वो मुझे फिर से प्राप्त करनी है सभी ये जो महापुरुष होते हैं उनके मन में उनके ऊपर में जब बहुत ही प्रेशर डाला जाता है उ के ऊपर में बहुत ही जब एक परिस्थिति विकट होकर के खड़ी होती है भीतर में से ही जैसे कि एक दिव्य सत्ता का एक जैसे कि उदय होता है स्वामी जी की जो दिव्यता है वह यहां से देखिए यह प्रथम घटना ऐसी हम कहेंगे स्वामी जी के बारे में कि एक ऐसी दिव्य उनको अनुभूति हुई जिसके माध्यम से फिर उनके भविष्य में उनको क्या करना है यह सब उनको ठीक-ठीक तरह से दिखने लगा इससे पहले यदि हम देखते हैं कि ठाकुर के पास आते हैं ठाकुर को जो हाजरा के साथ में बैठ कर के हंसी मजाक करते हैं कहते हैं घटी भी ब्रह्मण है बाटी भी ब्रह्मण है बोलकर के ये सब हंसी मजाक करते थे ठाकुर ने आया और स्वामी जी को स्पर्श कर दिया और स्वामी जी कहते हैं मुझे ऐसी अनुभूति हुई जैसे कि पूरा ब्रह्मांड जो है पूरा विश्व जो है ब्रह्मण का बना हुआ है उसका बड़ा सुंदर वर्णन करते हैं स्वामी जी कहते हैं मैं घर गया खाना खा रहा हूं तो खाता ही जाता हूं खाता ही जाता हूं मेरी मां कहती पूछती है अरे कितना खाओगे रा मुझे ये एहसास भी नहीं हो रहा है कि मैं बहुत ज्यादा खा रहा हूं खाना खाने के बाद सो गया लेट गया तो लेट ही रहा हूं ज वो मैं रास्ते से जा रहा था वहां पर रेलिंग थी उसके ऊपर मैं अपना सिर पटकता हूं देखता हूं यदि मुझे कोई अनुभूति होती है कि नहीं रास्ते में जा रहा हूं घोड़ा गाड़ी दौड़ी आ रही है तो अपने को बचाने के लिए रास्ते में से जंप लगा कर के निकल जाना चाहिए वो भी होश नहीं है यह जो सब अनुभूतियों का वर्णन जो स्वामी जी करते हैं वो तो ठाकुर के स्पर्श करने से हुआ है उनके भीतर में जो स्वतः प्रेरित होकर के आध्यात्मिकता का उदय हुआ देवी एक अनुभूति उनके मन में आई यह मुझे लगता है हो सकता है इसके पहले भी कोई होगी मुझे याद नहीं आ रही मुझे लगता है कि यही सर्वप्रथम उनके जीवन की वह अपने खुद के द्वारा प्रकट हुई देवी अनुभूति है हां बचपन में उन्होंने भगवान बुद्ध का दर्शन किया था कमरे में बैठे थे वगैरह वगैरह किंतु जद एक फिलोसॉफिकली देखा जाए तो सर के ऊपर में प्रेशर आने से ही ठीक-ठीक वो एक आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ होता है य मृत्यु रूपा काली जब स्पर्श करती है तभी ये ठीक-ठीक हम आध्यात्मिक रास्ते पर चलना शुरू करते हैं तो इस दृष्टि से देखा जाए तो ये शायद हो सकती है उनकी प्रथम अनुभूति हो इसके बाद में स्वामी जी आगे क्या कहते हैं संसारे प्रशंसा और निंदा एकन ईते एक काले उदासीन होयला संसार के लोग यह भक्त लोग है मित्र है मेरी प्रशंसा करें कि निंदा करें इस बात के प्रति संपूर्ण रूप से मैं उदासीन हो गया संपूर्ण रूप से सोचना ही बंद कर दिया कि लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं एवं तन इतर साधारण न्याय अर्थो पार्जन कररिया परिवार बर्गर सेवा भोग सुखे काल जापन करि बार जन्म अमार जन्म होई ई एक कथाए दृढ़ विश्वासी होईया पहले तो संसार में लोग क्या कहते हैं वह सोचना बंद कर दिया दूसरा कि बाकी सब जन साधारण की तरह नौकरी धंधा करके संसार चलाना है घर चलाना है फैमिली खड़ा करना है ये सब चीजों के लिए मेरा जन्म नहीं हुआ इस बात के प्रति दृढ़ विश्वासी होकर के पिता महर न्याय संसार त्यागे जनन गोपने प्रस्तुत होई ते लागला पितामह अर्थात कि ये जो उनकी मां के जो एक चाचा वगैरह थे कोई उनके परिवार में उन्होंने संसार त्याग किया था और साधु हो गए थे तो स्वामी जी ने सोचा कि मैं उनकी तरह संसार त्याग करूंगा एक बार दिन स्थिर होले संवाद पाइला जाई बार दिन स्थिर होले संवाद पाय लाम ठाकुर ई दिन जोन को भक्ते बाटी ते आशिया छन जब मैंने ठीक कर लिया कि बस में इस दिन घर छोड़ कर के निकलूंगा उस दिन मेरे पास में यह समाचार आया कि पास में ही किसी कोई भक्त के घर ठाकुर आने वाले हैं भाबला भलोई होईन मैंने सोचा अच्छा ही हुआ गुरु दर्शन करिया चिर कालेर मतो गुरुह त्या करीब गुरु का दर्शन करके उनके आशीर्वाद लेकर हमेशा के लिए चीर काल के लिए घर छोडूंगा ठाकुरे सही खात होई बा मात्र तीनी धरिया बशी लेन किंतु जैसे ही ठाकुर के दर्शन किए ठाकुर के पास गए तो कुछ बोले नहीं है कि मैं घर छोड़ने वाला हूं किंतु ठाकुर तो है अंतर्यामी उन्होंने इमीडिएट नर को पकड़ लिया और एकदम जीत करने लगे तो के आज अर सही दक्षिणेश्वर जायते होई बे आज तुमको मेरे साथ में दक्षिणेश्वर जाना ही होगा नाना ओजर कोरिला किंतु किछु छड़ी लेना अभी यहां पे बहाना बना रहा है ठाकुर को बताना नहीं चाहता कि मैंने ठीक कर लिया है कि मैं घर छोड़ कर के जा रहा हूं इसलिए विभिन्न तरह के बहाने बनाने लगा किंतु ठाकुर भी तो छोड़ने वाले नहीं ऐसा जीत करके बैठ गए नहीं तुमको आज मेरे साथ आना ही होगा अगत तहर संगे चलीला अभी स्वामी जी भी क्या करेंगे आखिर में वह उन्होंने हां कर दी और ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर आए गाड़ी ते तहर सहित विशेष कोनो कथा होई लोना गाड़ी में में और कोई ज्यादा उनके साथ बात हुई नहीं दक्षिणेश्वर पचिया अन्न श कोलेर शहीद कि चुख ताहर गृहे उपविरल ठाकुर के साथ में बैठा भी है कुछ समय तक एमन समय ठाकुरर भावा वेश होलो उस समय ठाकुर का भावा वेश हुआ उनके ऊपर में भाव भाव का यह हुआ प्रारंभ हुआ देखी देखीते तीनी सहसा निकट आशिया आमा के सस्नेह धारण पूर्वक सोजोल नयने हीते लागले और देखते ही देखते ठाकुर भाव में मत्त होकर के स्वामी जी के पास में आकर के बैठे उनको अपने दोनों हाथों से उनको स्पर्श किया और फिर भाव में आकर के गा रहे हैं कथा कोही ते डोराई ना कहीते वो डरा आई बात कहते कहने में भी मुझे डर लग रहा है ना कहने में भी मुझे डर लग रहा है आमार मने शंद होय बुझी तो माई हराई हराई मेरे मन में संदेह है कि मैं तुमको हमेशा से मैं तुमको हार जाऊंगा अर्थात कि तुम मेरे से बिछड़ जाओगे मेरे से बिछड़ जाओगे मैं तुमको खो दूंगा मैं तुमको खो दूंगा आमरा जानी जे मन तोर दिलामो के श्री मं तोर मुझे पता है कि मन तुम्हारा है अर्थात कि मन ईश्वर का है दिलामो के मन तोर अभी मन तोर और मंतर अर्थात की मंत्र यह ठाकुर समास करके कह रहे हैं या तो फिर जिसने यह कथा य गीत लिखा है मन तोर अर्थात कि मन ईश्वर को अर्पित किया है मंतर अर्थात कि मंत्र मैंने तुम्हारा वह प्राप्त किया है एकन मं तोर अभी यह मन तुम्हारा है जो बंगोली जानते हैं वो अच्छे से समझ पाएंगे इस बात को आमरा मंत्र विपद ते तोरी तराई हम जिस मंत्र के द्वारा यह विपद समुंदर को तेर जाते हैं वह मंत्र प्राप्त हुआ है और अभी मन तुम्हारा है देखिए कितना सुंदर गाना कथा को हीते डरा आई ना कहीते व डरा आई क बात करने में भी मुझे डर लग रहा है बात नहीं करूंगा तो भी मुझे डर लग रहा है अर मने सद होय बुझी तुमाई हारा हारा मुझे मेरे मन में संदेह है कि मैं तुमको खो दूंगा मैं तुमको खो दूंगा ठाकुर के मन में यह संदेह है ठाकुर को मन में पता चल गया है कि नर ने घर त्याग करने के बारे में सोच के रखा है वह अभी घर छोड़ने ही वाला है तो ठाकुर यह गीत गाते हैं कि मुझे मेरे मन में यह संदेह है कि मैं तुमको खो दूंगा अंतरेर भाव राशि यतो खण सजते रुद सोजत ने रुद्ध राखिया छिला में अभी नरेंद कहता है कि मैंने अभी तक इतने दिनों तक मेरे मन की जो भाव है उसको मैंने एकदम दबा करके रखा था किंतु आर बेग संवरण करी ते पारि लाम किंतु और अभी अपने मन को में रोक नहीं पाया ठाकुर न्याय अरो बख नयन धाराए परि पलावी तो होते लागलो ठाकुर की तरह ही मेरे नेत्र भी मेरे नयन भी आंसुओं से लक उठे निश्चय बुझी लाम ठाकुर शकल जानी ते पारिया छन सही सही में समझा कि ठाकुर को सब पता चल गया है आमा दिगर रूप आचरण र श कोले तम भी तो होया रही लो और हम दोनों ठाकुर गा रहे हैं और हम दोनों रो रहे हैं रोते रोते गा रहे हैं मैं भी रो रहा हूं तो बाकी जो लोग बैठे थे बेचारे स्तंभित हो गए आश्चर्य चकित हो गए कि यह हो क्या रहा है प्रकृति स्थ होई बार पर के हो के हो ठाकुर के उभर कारण जिज्ञासा कोराई नी ईत हास्य को बोलेन वो आदर एकटा होए गलो जब ठाकुर प्रकृति स्थ हुए ठाकुर का भाव का उपशम हुआ तो किसी भक्त ने ठाकुर को पूछा क्यों आप रो रहे थे क्यों यह गाना गा रहे थे क्यों नरेंद्र रो रहा था तो ठाकुर थोड़ा सा हंस के कहते हैं कि वो हम दोनों के बीच में एक हो गया उसके बारे में डिटेल में जानने की आपको जरूरत नहीं है परे रात्रे शकोल के सराइया आमा के निकट डाकिया बोली लेन बाद में रात को सबको अपने कमरे में से निकाल कर के मुझे अपने पास में बुलाकर कहा जानि आमी तुम मायर काजर जन्नो आशिया छो मुझे पता है कि तुम मां के कार्य के लिए आए हो संसारे कोखन था कीते पारी बेना संसार में कभी भी रह नहीं पाओगे किंतु आमी जोतो दिन आछी ततो दिन अर जन्नत थाको किंतु जितने दिनों तक मैं हूं तब तक तुम मेरे लिए रुको बोलिया ठाकुर हदय आबे ग रुद्ध कंठे पुनरा अश्रु विसर्जन कोरीते लागले बोल कर के ठाकुर फिर से के कंठ को आद्र होक के फिर से अश्रु विसर्जन करने लगे और इसके बाद में भी बहुत कुछ है तो अभी हम कल देखेंगे आज कीत ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु हा ना चुकता हाते श्यामा ठीक ठीक हां उसका वो जो लास्ट लाइन है जाग धन मान सुख हृदय स्मशान ना चुक त हाते श्यामा और बिल्कुल वह काली द मधर का ही बिल्कुल प्रतिबिंब है उसके बारे में भी हम देखेंगे बाद में वो कविता भी हम देखेंगे विवेक विवेक है तो सत्य लेते हैं असत्य छोड़ देते हैं तो मोती खाता है और वह दाना छोड़ देता है ठाकुर कहते हैं कि देखिए कि अमृत सागर में हम पढने ही बच जाएंगे फिर वो हम अपने से गिरे ना कि कोई धक्का मार के गिरा है वो फर्क नहीं पड़ता जैसे कि व मिश्री की रोटी है मीठी रोटी व सीधी करके खाओ ना कि आड़ी करके खाओ मीठा लगने ही वाला है तो कैसे भी तरह आए आ गए तो बस जीवन यह हो गया तैर गया कैसे भी हो ठाकुर के पास में आने से ही हुआ सभी का मने हम हमारे बीच में और स्वामी जी के बीच में यही फर्क है ना जैसे मैंने कहा कि हमारे सर पर ऐसी जद मने विपत्तियों के बाद में विपत्ति आती तो हम लोग क्या फिर ईश्वर को याद कर पाते घर छोड़ के चले जाना इस विपत्ति के समय में मां-बाप को छोड़ कर के क्या हम कर पाते हैं वो ग्रेटनेस है स्वामी जी की बोलकर के तो वह ठाकुर के इतने प्रिय थे वो रामचंद्र दत्त का कि हमेशा वो स्वामी जी से मात खाते रहे व जब उनके घर में रहते थे तब भी वो अपने पिताजी के तो प्रिय ही होंगे ठाकुर के पास है तो ठाकुर के प्रिय है किंतु आखिरी समय जब स्वामी जी ने उनके जूते निकाल कर के उनके पैरों के सामने रखे तब उनको पता चला इनकी महिमा क्या है तो महिमा है बोलकर के तो ठाकुर के प्रिय थे अभी जैसे देखिए आध्यात्मिक अनुभूति किस प्रयोजन से होती है या किस कारण से होती है इसके बारे में एक्जेक्टली निर्णय करना मुश्किल है हम कभी भी यह नहीं कह पाएंगे यह हुआ उसकी वजह से यह हुआ और बाद में यह हुआ यह जो पूर्वा पर कार्य काण संबंध है आध्यात्मिक अनुभूति में इतना पक्का काम नहीं करता है हो सकता है कि यह टेंपररी स्वामी जी के मन पर यह दुख कष्ट का जो पहाड़ गिर पड़ा है तो वह पहाड़ टेंपररी ही था अदर वाइज उनकी यह जो इटरनल एक प्रकृति थी कि सब समय ईश्वर में ही मग्न रहना सप्तर्षि के ऋषि थे ठाकुर लेकर आए हैं तो वह बात उनको याद आ गई हो व्ट एवर किस कारण से यह हुआ वह हम नहीं बता पाएंगे किंतु इतना पक्का पता है कि वह जो अनुभूति हुई स्वामी जी की जीवन की जो कुछ कुछ अनुभूतियां है वो मैक्रो कजम माइक्रो कजम जिसको लेकर के कि स्वामी जी ने पूरा प्रवचन दे दिया था भविष्य में वो जो कन्याकुमारी के टापू के ऊपर में उनको जो अनुभूति हुई फिर वो जो लेक मिशिगन के किनारे व जो वहां पर उनको जो थाउजेंड आइलैंड पार्क में जो अनुभूति हुई थी ये जो स्वामी जी के जीवन में जो कुछ कुछ अनुभूतियां है कि जिसने स्वामी जी के जीवन को परिवर्तित कर दिया तो उन अनुभूतियों में ये एक है इसको हम ज्यादा पहचानते नहीं है इसके बारे में ज्यादातर लोगों को पता नहीं है किंतु स्वामी जी का जीवन स्टडी करने से ही पता चलेगा कि ये घटना है कि जब से स्वामी जी का जीवन कंप्लीट परिवर्तित हुआ हम लोग कहते हैं कि पिताजी के मृत्यु के पहले स्वामी जी ठाकुर को जो कुछ भी बोला करते थे ठाकुर पागल है ये वो वगैरह सब कुछ बोला कर कि पिताजी के मृत्यु के बाद में किंतु उनकी अकल ठिकाने आई किंतु एगजैक्टली कौन सी घटना थी कि जो कि ये सब कुछ रिकन साइल हो गया सो दैट इज ये घटना कि एकदम उनका मन शांत हो गया जितना भी द्वंद था सब द्वंद मिट गया और भगवान बुद्ध को जिस तीन वो जो जो था ना कि रास्ते से जा रहे हैं एक मृत देह दिखा एक गरीब एक जो वृद्ध व्यक्ति दिखा फिर वो शमन दिखा फिर एक रोगी दिखा तो यह घटना ने बुद्ध के जीवन को संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया कि अरे यदि जीवन का यही लक्ष्य है तो फिर मैं यह क्या कर रहा हूं राजमहल में तो वही यदि स्वामी जी के बारे में कहा जाए कि कौन सी घटना है जिसको कि मदद से आध्यात्मिक जीवन के ऊपर में उनके पहले कदम रखे वो नॉट पहले कदम किंतु जिस बात में उन्होंने जीवन को संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया हो तो मुझे लगता है य यह घटना है किंतु देखिए यह जो आप कह रहे हैं ना कि प्रवचन वाले स्वामी जी डिफरेंट हो रही है अनुभूति वाले स्वामी जी डिफरेंट तो ये जो मैक्रो कजम माइक्रो कजम से तो एटलीस्ट हमको पता है कि स्वामी जी ने प्रवचन को अनुभूति के आधार पर बेस किया है तो यह अनुभूति उनके कौन से प्रवचन में किस तरह से ट्रांसलेट हुई होगी वो कहना मुश्किल है क्योंकि स्वामी जी के प्रवचन में भी देखिए कभी-कभी जैसे कि एक मेरा बड़ा फेवरेट कोटेशन है मेक द हार्ट लाइक एन ओशन अपने हृदय को जैसे कि एक समुंदर बना दो यह जो कोटेशन है स्वामी जी का मुझे इतना प्रिय है मैं बहुत जगह पर इसको कोट करता रहता हूं तो यह कोटेशन आए कहां से कहां से ये सब पोएटिक लैंग्वेज आपके मन में आई ये जो काली द मदर इट सेल्फ ये पोयम है पोयम कहां से आई है ये अनुभूतियों में से ही तो ये पोयम आई होगी कोई एक इंटेलेक्चुअल व्यक्ति बैठ कर के अभी आजकल को एआई भी पोयम जनरेट करता है आप प्रोमट लिख दीजिए राइट मी पोयम न मदर काली तो वो भी पोयम जनरेट कर देगा किंतु व शब्दों की रमत के अलावा और कुछ नहीं है यह जो भाव है वह भाव कहां से आए होंगे तो यह सब अनुभूतियों से ही आए होंगे और यह भी देखिए एआई आज क्यों कर पा रहा है बिकॉज की यह जो मानवीय सभ्यता हजारों सालों से डेवलप हुई हमने यह जो कोष यह जो पूरा शब्दों इतने सारे लाखों लाखों करोड़ों शब्दों की रचना की इसको ग्रहण करके ही तो यह सब ले रहा है यदि यह नहीं होता जीरो से यदि स्टार्ट करता तो पता नहीं क्या होता