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अद्वैत वेदांत और रामकृष्ण संघ में सेवा का आदर्श 25 Dec 2023

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः तीन दिन के बाद हमारी एक छुट्टी लगती है तो बहुत लंबा हो जाता है वैसे ही तो पांच दिन होते क्लास फिर और एक दिन लग गया छुट्टी तो चार दिन अभी क्या करें हमको पता है कि कल रामकृष्ण संघ के इतिहास में एक बड़ा ही स्मरणीय दिवस था 24 दिसंबर को शाम को सब गुरु भाई श्री राम कृष्ण देव की महासमाधि के बाद में सब लोग अपने अपने घर चले गए थे क्या करेंगे काशीपुर गार्डन हाउस रामचंद्र दत्त वगैरह जो कुछ कुछ कुछ लोगों ने उसको भाड़े पर लिया था उन्होंने कहा कि अभी जब भाड़े का ये एक महीना उसका भाड़ा दिया हुआ है वह जब समाप्त हो जाएगा सब लड़के लोग अपने-अपने घर चले जाएंगे और जैसे आपका जीवन जो था ऐसा आप जिएंगे माता-पिता की सेवा करेंगे कुछ रोजगार पैसा करेंगे कुछ पैसा अर्जन करेंगे धन अर्जन करेंगे माता-पिता की सेवा करेंगे जो भी जो संसारी लोग गृहस्थ लोग जो करते हैं वैसा आप करो घर जाकर के तो अभी लड़के लोग भी क्या करेंगे रहने के लिए जगह नहीं है और फिर जद रहने के लिए जगह मिल भी गई तो पैसा तो किसी के पास है नहीं कि वह खाना कहां से खाएंगे और यदि ठाकुर को ठाकुर के अस्थि है तो उसको रख रखेंगे कहां उनकी सेवा किस तरह से पूजा नित्य पूजा ठाकुर का भोग राग वगैरह कैसे होगा ऐसा सोचते सोचते यह सब लोग निकल गए उस समय था कि यह सब अपने अपने घर चले गए थे तो हुटन एक था एक पात्र अपने कथामृत जिसने पढ़ा होगा उन सबको पता होगा कि दो गोपाल ठाकुर के पास आते थे तो दो आते थे तो दोनों का नामकरण स्वामी जी यह सब नामकरण करने में एक्सपर्ट है एक को दिया बूढ़ो गोपाल जोक उम्र में ठाकुर से भी बड़े थे और दूसरो दूसरे को दिया हुडको गोपाल टको अर्थात की जो कि हटात हटात बंगाली शब्द है उसका ट्रांसलेशन होगा सडन एकाएक वो सडन आकर के उपस्थित होगा और सडन वो कहां पर गायब भी हो जाएगा पता नहीं तो उसको नाम दिया था स्वामी जी ने हुडको गोपाल तो ये हुडको गोपाल है ऐसे वो सबके घर जाकर के बोलता था क्या अरे भाई चलो ठाकुर ने हमको इकट्ठा किया है तो आप लोग अपने घर क्यों चले जाते हैं वापस ऐसा करके फिर धीरे-धीरे करके ये लोग इकट्ठा हुए लाटू महाराज थे उस समय लाटू महाराज भी स्वामी जी के घर जाकर के शरत महाराज के घर जाकर के बोलते थे अरे भाई अभी तो चलो हम कहीं पे एक साथ में रहना शुरू करते हैं उस समय सूरे चंद्र से सुरेश चंद्र मित्र को वह स्वपना आया ठाकुर का कि अरे मेरे लड़के इधर उधर भटकते घूमते हैं तो तुम उनके लिए कुछ रहने की व्यवस्था करो तो यह ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह लड़कों का इकट्ठा होना ये धीरे-धीरे करके क्योंकि ऐसा तो देखिए कि भारतीय धर्म साहित्य में भारतीय धर्म समाज में एक यूनिक घटना है कि किस तरह से सन्यासी इकट्ठा साथ में रहेंगे चैतन्य महाप्रभु के जाने के के बाद में महासमाधि के बाद में उनके शिष्यों ने कुछ दल कुछ हरि सभाएं कुछ बैठक वगैरह स्टार्ट किया था किंतु सन्यासी सन्यास दशनामी पद्धति के अनुसार सन्यास ग्रहण करने के बाद में साथ में रहना कोई एक मठ की रचना करना यह भी तो चलो धीरे-धीरे कहीं-कहीं आपको उदाहरण मिल जाएंगे जैसे गुजरात में ही स्वामीनारायण वो सहजानंद स्वामी थे वो इधर-उधर उनका तो जन्म हुआ हुआ था नॉर्थ इंडिया में यूपी में कहीं पे भारत का भ्रमण करते-करते यहां पर आए गुजरात में देखा सन्यासियों का एक संप्रदाय जैसा है वहां पर रह गए और फिर उनकी महासमाधि के बाद में एक साधु संघ प्रारंभ हुआ किंतु क्या है देखिए कि एक प्योर मोनेस्ट्री ऑर्गेनाइजेशन होना वोह तभी तक नहीं हुआ था और वह भी साथ में रहना संघ बद्ध होकर के क्योंकि स्वामीनारायण में देखेंगे कि स्वामीनारायण के जो उनके जो वंशज है उन लोगों का एक बड़ा हाथ उनका एक बड़ा ही क्या कहेंगे कि इन्फ्लुएंस सन्यासी समाज के ऊपर में है बाद में फिर सन्यासी लोगों का एक दल सेपरेट हो गया उन्होंने सोचा कि अरे ये लोग भले ही चाहे स्वामीनारायण के वंशज हो किंतु एक संसारी आखिर में एक सन्यासी के ऊपर में किस तरह से वो उसका अधिकार हो सकता है किस तरह से एक सन्यासी के ऊपर में एक गृहस्थ बैठेगा ऐसा बोलकर के सन्यासियों का एक दल बाद में सेपरेट हो गया किंतु ओरिजिनल तो ऐसा ही था कि भले चाहे सन्यासी थे किंतु फिर उनका संचालन स्वामीनारायण के गृहस्थ उनके वंशज ही किया करते थे तो एक प्योर मोनेस्ट्री ट्रेडिशनल होकर के रहना ऐसे अमेरिका में वेस्टर्न यूरोप में हुआ था क्योंकि यह क्रिश्चियन मोनेस्ट्री सिस्टम जो है वह स्टार्ट हुई थी बहुत पहले स्टार्ट हुई थी 14 15 सेंचुरी में उससे भी पहले मोनेस्ट्री ऑर्डर्स वहां पे थे भारत में भी मोनेस्ट्री ऑर्डर्स थे नागा संप्रदाय के बारे में हमको पता है कि किस तरह से उसका प्रारंभ हुआ मधुसूदन सरस्वती ने किस तरह से किया था किंतु शंकराचार्य ने भी मठ की स्थापना की थी किंतु शंकराचार्य के मठ में देखेंगे कि एक ही साधु रहता है और बाकी सब सन्यासी एक रहेगा बाकी सब ब्रह्मचारी रहेंगे या तो फिर उनके शिष्य रहेंगे गुरु और शिष्य माने फुल मोनेस्ट्री दो साथ में जनरली बहुत कम जगह पर रहते हैं तो एक एक तो दूसरा है कि भारत में एक ऐसा है कि देखिए कि अपने यहां पर वर्णाश्रम का जो एक था कांसेप्ट कि ब्राह्मण जो है तो ब्राह्मण का क्या उसका कर्तव्य है तो यजन याज अने और अध्यापन अर्थात कि वह भिक्षा लेकर के समाज की जो दुआ है या तो समाज का जो यह कंट्रीब्यूशन है उसके ऊपर में वह रहेगा और इन टर्न वह साधन भजन करेगा और अपनी विद्या का वह नए आए हुए विद्यार्थियों को उसका लाभ देगा नए आए हुए शिष्यों को वो विद्या सिखाएगा यह ब्राह्मण का कर्तव्य था क्षत्रिय का कर्तव्य है कि पूरे समाज को पूरी सोसाइटी को रा अपने अपना जो राज्य है उसमें सबकी केयर करना सबकी संभाल रखना यदि कोई गरीब है तो उसके लिए यदि कुछ रोजगार कुछ पैसा कुछ दान वगैरह की व्यवस्था था वो करेगा और यदि कोई दुश्मन आक्रमण करेगा तो अपने राज्य के निवासियों की वह रक्षा करेगा यानी कि सबका एक प्रॉपर एक यह था रोल था सोसाइटी में अभी एक सन्यासी का रोल भारत में ट्रेडिशनल देखा जाए तो कहीं-कहीं मठ में वे लोग संबद्ध होकर के या तो मिलकर के रहते थे जिससे कि सुविधा होती है बौद्ध विहार को देखिए बुद्धिज्म में अभी कल ही मैं एक स्टोरी पढ़ रहा था जैसे नालंदा वगैरह बड़े ही फेमस बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री और यूनिवर्सिटी सिस्टम है किंतु श्रीलंका में वो जो मैं पढ़ रहा था एक इतना बड़ा संघ भी थे एक तरह से देखा जाए तो किंतु हिंदू समाज के भीतर में जिस तरह से हमने वर्णाश्रम और वर्ण व्यवस्था बना कर के रखी थी ट्रेडिशनल हिंदुइज्म के भीतर में इसमें क्या सन्यासियों का ऑर्डर यह किस किस हद तक उचित है तो यह सब जो चिंतन जो है वह तो उस लड़कों के दिमाग में उस समय शायद स्टार्ट भी नहीं हुआ होगा कि कहां ठाकुर की महासमाधि हुई है बेचारे इतने अभी दुखित है इतने ही बेचारे यह है कि क्या करेंगे कैसे रहेंगे क्या हमारा भविष्य है ठाकुर ने जो साधन पद्धति जो बताई है उस परे हम अपना पूरा जीवन चला उसको पालन फेथ फुली हम फॉलो कर पाएंगे कि नहीं यही तो सब उनके मन में था उस समय वह मातंगिनी देवी बाबूराम महाराज की मां ने उनको निमंत्रण दिया कि सब अठपुर आइए यह सब लोग गए रास्ते में ये जो खोल करताल मृदंग वगैरह बजाते बजाते वो भजन वगैरह करते करते कीर्तन करते करते गए और वहां पर रुके वो मातंगिनी देवी ने उनको बड़े ही प्रेम से रखा खाना खिलाया बड़े ही अच्छे से उनका आदर सत्कार किया एक दिन रात को इन्होंने ठीक किया कि धुनि जलाएंगे और उसके सामने बैठेंगे जब ध्यान करेंगे तो धुनि के सामने जब ध्यान करते करते फिर आखिर में सडन एक ऐसा विचार आया कि ठाकुर ने तो हमको एक स्नेह के पाश में आबद्ध करके गए हैं एक स्नेह के एक इस तरह का एक हमको बनाया है सघ के रूप में एक मित्रता का भाव एक बंधुत्व का भाव हम लोगों के भीतर में डाला है कि हम क्यों इससे फिर खुटा हो जाए हम लोग क्यों अब एक दूसरे से बिछड़ जाए हम लोग क्यों एक दूसरे से अलग हो जाए हम लोग साथ में ही संग बद्ध होकर के ही रहेंगे ऐसा उन्होंने सोचा और फिर दूसरे दिन पता चला कि वो क्रिसमस की व क्रिसमस ईव थी क्रिसमस के आगे का दिन 24 दिसंबर तो देखिए कि किस तरह से यह एक योगायोग हुआ है अभी हमको प्रश्न होगा कि रामकृष्ण संघ जिस तरह से गठित हुआ है उसमें यह क्रिश्चियनिटी का या तो फिर क्रिश्चियन ऑर्डर जिस तरह से मोनिस्टिक ऑर्डर है उसका कितना इन्फ्लुएंस है वह फेमस घटना हम सबको पता है कि स्वामी जी कहते हैं कि आई हैव फॉलन आई हैव फॉलन इन लव और रदर और एक जो उनकी लेडी डिसाइल है अमेरिका में पूछती है ओ हु इज शी तो स्वामी जी कहते हैं कि इट इज एन ऑर्गेनाइजेशन नॉट अ पर्सन नॉट ए वुमन बट ऑर्गेनाइजेशन तो ये ऑर्गेनाइज होकर के क्रिश्चियनिटी जिस तरह से कार्य कर रही थी तो हमारे संघ के ऊपर में क्या हम हिंदू ट्रेडिशनल एंस होकर के हमारे ऑर्डर की रचना की है अपना संघ क्या क्रिश्चियन आइडियल के अनुसार चलता है एक प्रश्न और दूसरा प्रश्न कि ट्रेडिशनल जद देखा जाए तो सन्यासियों का कर्तव्य है ईश्वर प्राप्ति या तो फिर आत्म साक्षात्कार यहां पर लोगों का कल्याण करने की बात कहां आती है क्योंकि दशनामी पद्धति के अनुसार जब आप सन्यास ग्रहण करते हैं तब तो ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या इस तरह से तो आप महावाक्य एक आपको प्राप्त होता है गुरु आपको आपके सन्यास गुरु आपको महावाक्य देते हैं महावाक्य का तात्पर्य ही है कि यह जगत जो हम चारों ओर देख रहे हैं जो वैविध्य है ये और कुछ नहीं है मेरा ये मेरा खुद का अहंकार मेरा नाम रूप मेरा संस्कार मेरे कर्म जिसको कि मैं मैं करके पुकारता हूं मेरे रिलेटिव्स मेरे मित्र ये पूरा समाज ये सब कुछ मेरा जो सही स्वभाव है उसके ऊपर में एक छाया की समान है मेरा इस सबको इस सबसे दूर होकर के अपने इंद्रियों का संपूर्ण रूप से निग्रह करके इसके पीछे जो मेरा सही स्वरूप है इसको मुझे प्राप्त होना है तो यह तो हो गया सन्यासी का कर्तव्य कहां यह जो जगत के उद्धार के लिए जगत के हित के लिए यह जो एक गरीब लड़का बेचारा उसको वो बीमार पड़ा है रास्ते के कोने में तो उसके लिए अपनी आंखों से अश्रु पात करें अपना कंबल जो उसने बड़ी मेहनत से भिक्षा करके उसको मिला है उस लड़के को पहना दे ये अच्छा एक इंडिविजुअल कंपेरिजन हो सकता है ऐसी तो बहुत सारी कहानियां अपने भारत में है कि किसी सन्यासी ने किसी गरीब दुखी व्यक्ति को देखा तो अपने पास जो कुछ भी था जो एक मिगर एक सामान्य कुछ था उसका जीवन निर्वाह करने के लिए वह उसने उसको दे दिया तो यह तो एक इंडिविजुअल लेवल पे कंपेज करुणा हुई किंतु जीवन का उद्देश्य तो वह नहीं हो सकता ठाकुर को खुद को ही देखिए कि कहां वह जा रहे थे नॉर्थ इंडिया में देवघर की ओर उनको एक गांव मिला देखा कि बेचारे लोग बड़े ही गरीब है तो ठाकुर ने कह दिया मथुर बाबू को कि यहां से अभी मैं आगे नहीं जाऊंगा जब तक तुम सबको अपने उनके सर पर डालने के लिए तेल एक वस्त्र और पेट भर कर के आहार की व्यवस्था ना करो मथुर बाबू बेचारे बड़े समझाते हैं कि अरे हम लोग तो तीर्थ यात्रा के लिए जा रहे हैं पता नहीं कितना खर्चा होगा और पैसा तो कोई अनंत नहीं है मेरे पास में कि इतना मैं खर्चा करूं रास्ते में और फिर पूरी यात्रा हमारी सुख स्वरूप हो जाए तो फिर भी ठाकुर ने जीद की तो सबको खाना खिलाया गया एक वस्त्र दिया गया अभी हमको प्रश्न होता है कि अच्छा चलो दिस इज एन एक्ट ऑफ कंपेज करुणा की वजह से ठाकुर ने किया अभी जिस दिन ये लोग चले गए तो दूसरे ही दिन वो वस्त्र भी फट जाएगा पेट भी खाली हो जाएगा सर भी बाल भी फिर रूखे सूखे हो जाएंगे इससे तो क्या अर्थ हुआ आप आपके मन में दया हुई तो आपने इस तरह से एक करके दिखाया अदर वाइज ठाकुर के जीवन का तो ये उद्देश्य नहीं था वरना तो ठाकुर वहीं पे उतर जाते उन्हीं लोगों के बीच में रहते कहते कि ये पूरी जो बस्ती है उसका पूरा मैं इकोनॉमिकल फाइनेंशियल उद्धार करूंगा फिर मैं यहां से जाऊंगा ऐसा तो ठाकुर ने अपना जीवन का उद्देश्य नहीं बनाया है एक इंडिविजुअल लेवल पर कंपेज दया करुणा होती है साधु लोगों में तो ज्यादा होती है होनी ही चाहिए अब तो वरना तो पशु के समान हो जाएगा इंद्रियों के भोग का निग्रह करना इसका यह अर्थ नहीं कि पशुवैद्यकीय है या तो त्यागी है वह कठोर भी होगा उसका स्वभाव एकदम दया हीन माया हीन कठोर रुक्ष ऐसा हो जाएगा किंतु यह बिल्कुल गलत बात है जो त्यागी है सही सही त्यागी है उसका मन दया और करुणा से भर जाना चाहिए क्योंकि जितनी जितनी आप नेगेटिव इमोशन हटाते जाएंगे उतनी ही पॉजिटिव इमोशन आपके मन का अधिकार करती जाएगी बा बाद में आखिर में ऐसा होगा कि जैसे लोहे की जंजीर को तोड़ कर के सोने की जंजीर पहनी फिर सोने की जंजीर को तोड़ कर के जंजीर से मुक्त हुए किंतु यह जो सोने की जंजीर वाला फेस जो है वह पूरा चला नहीं जाएगा ऐसा कभी नहीं होगा कि तमस या रजस में से सीधे आप गुणात अवस्था में चले जाए आपको सत्व में जाना होगा सत्व में से त्रिगुणा त अवस्था प्राप्त होगी तो यह जो दया माया करुणा यह प्रेम स्नेह भालोबासा यह तो आपके हृदय में जो सही सही सन्यासी है जो सही सही के रास्ते पर चलता है उसके हृदय में तो प्रकट होगा ही होगा किंतु अपने जीवन का उद्देश्य क्या वह हो जाना चाहिए कि हां मैं संन्यास के संन्यास ग्रहण करके मेरे गुरु ने मुझे महावाक्य दिया है वो महावाक्य का स्मरण मनन निदिद्यासन में कर रहा हूं सडन मैं गांव और तीन जगह तीन दिन रुकना है एक सन्यासी को कहीं पर व मैं रास्ते से जा रहा हूं एक गांव देखा अकाल पड़ा है और इतनी बुरी परिस्थिति है क्या करूं मैंने अपना वो महावाक्य व संकल्प वगैरह सब त्याग करके उनके उद्धार के लिए लग गया यदि ऐसा करूंगा तो सन्यास का व्रत कहां रहेगा एक चीज दूसरा की तो सोसाइटी बैंकर पट हो गई है बोलकर के ही तो इतने गरीब लोग हैं वरना यदि क्षत्रिय अपना काम ठीक से करेगा ब्राह्मण अपना काम ठीक से करेगा तो फिर वोह जो शुद्र जो है या तो फिर जिनको कि आप समाज से बाहर कर दिए हैं अछूत जिनको बना दिया है अनटचेबल जिनको बना दिया है जिनको आज ये लोग दलित कहते हैं तो ऐसे लोगों का समाज में होना वो तो समाज के ऊपर में बहुत बड़ा एक धिक्कार की बात है समाज के लिए समाज के ऊपर में बहुत बड़ा काला दाग है ब्राह्मण और क्षत्रिय अपना काम ठीक-ठीक करेंगे तो इतनी एक डेस्प्रिंग क्योंकि एक जो है ब्राह्मण व विद्यादान करता है और क्षत्रिय जो है वो एक सोशल सिस्टम सेफ्टी सिक्योरिटी नेट बनाता है सोशल सिक्योरिटी तो अभी विद्या प्राप्त होगी और सोशल सिक्योरिटी की वजह से आप अपना कार्य ठीक से बड़े होकर के कर पाएंगे यह दोनों यदि ठीक रहेगा तो फिर आप सन्यासी को अपना सन्यास व्रत छोड़ कर के किसी की सेवा करना यह सब करने की जरूरत कहां पड़ेगी यानी कि एक इंडिविजुअल लेवल पे एक करुणा का कोई भी आप करुणा का प्रदर्शन हो सकता है किंतु जीवन का उद्देश्य ही लोगों की सेवा करने के लिए डाल देना यह कहां तक उचित है हमारे लिए एक चीज दूसरा है कि बंगोल में खास करके इवन स्वामी जी के भाई वे लोग यहां तक सोचना शुरू कर दिए थे कि स्वामी जी साम्यवाद से प्रेरित है स्वामी जी के ऊपर में साम्यवाद का इन्फ्लुएंस है उस समय की यूरोप की वर्किंग क्लास की जो परिस्थिति थी उनकी जो पोजीशन थी तो यह कार्ल मार्क्स एंजल्स य फिर यह जो लेनिन यह लोग जो उस समय के थियोरेटिशियन थे एकेडमिका कि पूरी समाज व्यवस्था को इस तरह से पुनर्गठित किया जाए जिससे कि ये जो डिस्पेस से अपना समाज बच जाए ये जो ब्लैक होल है सोसाइटी में डिस्पेरटनेस सके तो यह साम्यवाद का जो पूरा थिंकिंग था कि ये जो अमीर लोग है या तो माने दो एक्सट्रीम उनका जो स्पेक्ट्रम था एक स्पेक्ट्रम पे था कि जितने भी पूंजीपति है मुड़वादी है उन सबका उन सबकी हत्या कर दो और उनकी जी उनका धन हम लोग छीन लेते हैं गरीब लोगों में बांट देते हैं यह एक एक्स्ट्रीम पोजीशन थी दूसरी थी गांधी जी की पोजीशन कि जो धनी है वह अपने धन का ट्रस्टी है वह अपने धन का मालिक नहीं ट्रस्टी है व समाज का ट्रस्ट उसके हाथ में है वह फिर वह ट्रस्ट अपने धन में से समाज की सेवा करेगा यानी कि यह साम्यवाद का एक पूरा स्पेक्ट्रम था किंतु उस उन लोगों की मेथोडोलोग्य किंतु जो एक बेसिक आइडिया था कि 18th सेंचुरी में रैपिड इंडस्ट्रियल होने के बाद में एक पूरा एक एक पूरा एक सेक्टर ऑफ सोसाइटी सोसाइटी का एक पूरा ग्रुप जिनके पास में धन उपार्जन के कोई भी साधन नहीं होने की वजह से यह पूंजीपति उनको बिल्कुल गुलाम बन कर के रखे थे उनके पास में काम करवा रहे थे तो यह जो परिस्थिति थी इसका स उससे द्रवित होकर के इसका सोल्यूशन लाने के लिए साम्यवाद का जन्म हुआ था भारत में थोड़ा सा डिफरेंट तरीके से इस परिस्थिति का वो आकार ले रही थी यहां पे तो इस तरह से इंडस्ट्रियल इजेशन नहीं था भारत की सोसाइटी भारत का देश मेनली अग्रेन आर्टिजन जिसको कहते हैं ज्यादातर लोग खेती का काम करते थे या तो आर्टिजन यानी कि वह जो कॉटन के कपड़े बनाना वगैरह कोई किसी ना किसी तरह का वो रोजगार करते थे इंडस्ट्री तो तो भारत में डेवलप हुई ही नहीं थी किंतु भारत की जो परिस्थिति थी एक तो जमींदारी प्रथा जो कि ब्रिटिश लोगों ने लाए थे इसकी वजह से ज्यादातर लोगों के पास में अबकी खुद की जमीन नहीं थी वो जो भी जमीन प वह उपज होगी उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा जमींदार आकर के छीन के ले जाएगा एक चीज दूसरा कि एक ये जो कास्ट सिस्टम थी इसमें जो आउटकास्ट करने की ये जो बात थी वो एक बड़ा ही भयानक आकार धारण कर रही थी ऐसे बहुत सारे लोग थे कि जिनको वर्णाश्रम में स्थान नहीं था वर्णाश्रम के बाहर थे तो भारत में यही डेस्प्रिंग धारण कर रही थी तो वोह यूरोप का साम्यवाद कहो ना कि ये भारत में की जो परिस्थिति है अभी जो स्वामी जी को ऊपर ऊपर से जो पढ़ते हैं स्वामी जी को ऊपर ऊपर से समझते हैं वे लोग क्या सोचते हैं कि स्वामी जी ये साम्यवाद से इन्फ्लुएंस हुए हैं स्वामी जी ने खुद ने एक बार कहा है चलो और सब कुछ ट्राई कर लिया अभी वाद को सोशलिज्म को भी ट्राई कर ले देखते हैं कि यह क्या रिजल्ट देता है किंतु स्वामी जी तो यह प्योर पॉलिटिकल दृष्टि से कहते थे भारत के ऊपर में यह जो ब्रिटिश गवर्नर ब्रिटिश वाइस रोय राज करता था उसकी बजाय चलो थोड़ा सा साम्यवाद को आजमा लिया जाए ही वास थिंकिंग अबाउट पॉलिटिकल सिस्टम पोरली पॉलिटिकल सिस्टम किंतु उन्होंने जो मोनेट आइडियल को उसके भीतर में जो आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय इसके भीतर में कोई साम्यवाद की बात नहीं है इसके भीतर में तो प्योर करुणा की बात है तो अभी यह कुछ कुछ प्रश्न कुछ कुछ पैराडॉक्सेस हमारे सामने प्रकट होते हैं सबसे बड़ा पैराडॉक्स है कि यह जो हम लोग लोगों के लिए हित के लिए जो कार्य कर रहे हैं वो क्या इंडिविजुअल लेवल पर करुणा की वजह से जैसे कि ठाकुर ने देवघर के पास के जो एक ग्राव में किया था एक ग्राम में किया था उसकी वजह से या तो फिर एक एक पॉलिसी है मोनेट जम की कि नहीं लोगों का क कल्याण होगा तभी मेरा कल्याण होगा यह पॉलिसी के लेवल पर है ना कि एक इंडिविजुअल एक्ट ऑफ कंपेज है यह एक प्रश्न हो सकता है दूसरा एक प्रश्न है कि स्वामी जी पोरली कंपेज की वजह से वह मोटिवेट हुए थे यह सब करने के लिए ना कि साम्यवाद का उनके ऊपर में प्रभाव था एक दूसरा प्रश्न है तीसरा एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है कि कर्मयोग कि हां गीता में कर्मयोग के बारे में कहा गया भारत में कर्मयोग एक आदि योग है जैसे राज योग आदि योग है ज्ञान योग आदि योग है कर्म योग भी आदि योगय कोई आजकल का नहीं है हमारे वेद उपनिषद में संहिता हों में यह कर्म विधि करने की बात बताई है एक्चुअली यह विधि के सामने विरोध करके ही बुद्धिज्म बना था किंतु वो एक अलग कहानी है किंतु यह जो विधि विधान कर कर के एक कर्म कर कर के आप अपने संस्कारों को परिशुद्ध कर सकते हैं यह तो बड़े ही आदि समय से चला आ रहा है अभी उसी विधि विधान संस्कार को कर्मों को स्वामी जी ने थोड़ा सा एक उसकी डायरेक्शन चेंज कर दी कहा कि जिस तरह से वो मान मधुरा में साउथ इंडिया में प्रवचन दे रहे थे तो स्वामी जी ने कहा कि सही शिव पूजा कौन सी है तो शिवलिंग की जो पूजा करते हैं तो वैसे ही मनुष्य के भीतर में शिव का दर्शन करके मनुष्य की सहाय के लिए जो किया जाता है वह सही शिव पूजा है ऐसा स्वामी जी ने भारत में आकर के अपने नए गोस्पेल न्यू टेस्टामेंट का प्रारंभ किया था तो अभी यह प्रश्न होगा कि यह जो एक्ट ऑफ कंपेज जो है हमारा इन लोगों के प्रति क्या यह सही सही में स्वार्थ की बात तो नहीं है कि मैं अपने खुद की आत्मा के उद्धार के लिए आत्म साक्षात्कार के लिए मैं दूसरों को सहाय कर रहा हूं माने पता है ना यह तो बड़ा ही एक छिछोरा एक विचार हो गया कि मुझे ईश्वर का दर्शन करना है और ईश्वर का दर्शन कैसे होगा तो तो चलो मैं दो तीन पेशेंट की सेवा कर लूं कुछ किसान है उन लोगों के लिए अच्छी नस्ल के यह जो खेती के जो उपाय है वो उसको दे दूं तो मेरा खुद का एक कर्म का संस्करण होना है कर्म की शुद्धता होनी है वो हो जाएगा ये तो और भी बड़ा छिछोरा एक तरह से हुआ मने आ बहुत ही एक शैलो बोलो ब बड़ा ही एक क्या कहेंगे कि एक दुष्ट तरह का एक विचार हुआ कि मैं अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को हेल्प कर रहा हूं हालांकि अद्वैत वेदांत एगजैक्टली यही कहता है किंतु अगेन स्वामी जी इस इसी टॉपिक को थोड़ा ज्यादा डेवलप करते हैं अद्वैत वेदांत की दृष्टि से किंतु वो अद्वैत वदन की दृष्टि मेरा सही स्वरूप है अद्वैत या तो फिर हम सबके भीतर में वही आत्मन है मैं आपको सहाय कर रहा हूं तो एक्चुअली में अपने ही आत्मन की सहाय कर रहा हूं मुक्त होने के लिए किंतु वो अद्वेता वेदांत की दृष्टि से हो गया एक सामान्य दृष्टि से यदि कहे कि मुझे ठाकुर का दर्शन करना है तो चलो इसके लिए मुझे थोड़ा बहुत दान दक्षिणा करना पड़े तो मैं कर देता हूं मेरा हेतु ये हो जाएगा वो फुलफिल हो जाएगा तो यह तो बड़ी ही सेल्फिश बात हुई इसमें तो आपका वो जो कहते हैं ना कि त्यागी जो होता है बड़ा ही कठोर होता है रुक्ष होता है तो वही बात की परि पुष्टि होती है तो अभी ये एक दूसरे प्रश्न हो जाता है कि सेवा करते हैं तो हम किस प्रयोजन से करते हैं हम इसके लिए करते हैं कि जैसे कि मेरा एक सेल्फिश एक एम है वो फुलफिल हो ना कि सेवा के पीछे में एक हायर एम है एक एम है स्वामी जी हमको अद्वैत विदान की दृष्टि से समझाते हैं किंतु उसको थोड़ा सा बाद में डिस्कस करें थोड़ा सा हम एक कॉमन मेन की दृष्टि से ग्रास रूट लेवल पर रह करर के डिस्कस करें कि सेवा जो हम कर रहे हैं यह जो हम संग बद्ध जो हुए हैं इसके पीछे का प्रयोजन क्या है तो यह जो कुछ कुछ पैराडॉक्स हमारे सामने आते हैं कि कर्मयोग कर्मयोग का फाइनल यह क्या है कि मैं इतना सेल्फिश पर्सन हूं मेरा खुद का एक इतना एक मेरे खुद के उद्धार के बारे में मैं अंध सा हो गया हूं तो भले इसके लिए मुझे दूसरों को हेल्प करना पड़े तो हेल्प करके मैं निकल जाऊंगा एक चीज है दूसरा कि ये कंपेज जो है इस इंडिविजुअल एक्ट ऑफ कंपेज है ना कि एक पॉलिसी के लेवल पर हम इसको ले आए हैं तीसरा है कि यह साम्यवाद का जो विचारधारा आज आजकल और भी ज्यादा जितना जितना समय बढ़ता जाता है वो अमेरिका यूरोप में देखेंगे कि साम्यवादी थिंकिंग थोड़ा डिफरेंट तरीके से यह लिबरल लेफ्ट यह जो थिंकिंग है वह नए-नए तरीके से वह अपना पुनर्जीवन धारण करता रहता है हम लोगों ने सोचा था जो लोग पुराने ज समय के हैं थोड़ा बहुत हिस्ट्री पढ़ते हैं कि कोल्ड वॉर के अंत के साथ में और चाइना के कैपिट इज्म को ओपन आर्म ओपन हार्टेड एक्सेप्टेंस करने के बाद में यह लेफ्ट इको सिस्टम पूरा अपने से ही समाप्त हो जाएगा यह नहीं किंतु उसने जितने भी बड़े एडवांस इंडस्ट्रियलिस्ट कंट्रीज है उसमें उसने पुनर्जन्म धारण किया है और कुछ विचित्र प्रकार की बातें वो करता रहता है तो अभी यह पूरा जो पैराडॉक्स है इसका सोल्यूशन क्या है तो सॉल्यूशन है अद्वैत वेदांत देखिए कि ऐसा होता है जबी हम ये प्रश्नों का सलूशन निकालने का प्रयास करेंगे तो हमको ऐसा लगेगा कि हम लोग ये बुद्धि लगा कर के एक इंटेलिजेंस ल लॉजिक लगा कर के तर्क करके हम लोग इस तरह का एक आंसर खोज रहे हैं जो कि सभी जो प्रश्न है उसका सॉल्यूशन दे दे क्योंकि इसका और तो कोई सोल्यूशन नहीं हो सकता अलग-अलग समय में विछिया हुई है अलग-अलग घटनाएं हुई इन सब में एक जो एक कॉमन थ्रेड जो है वो कॉमन थ्रेड जैसा कुछ नहीं है हमने एक तर्क करके ऐसा कुछ सोच निकाला है कि ये जितने भी विछिया बिन सुलझाए यह सब पहेलियां है यह सबको इकट्ठा करके यह सोल्यूशन होगा तो यह तर्कशास्त्र की मदद से हमने यह सोल्यूशन खोजा है यह तो एक थिंकिंग है एक सोचने का दूसरा है कि देखिए अपनी महासमाधि के कुछ समय पहले से ही ठाकुर ने नरेण को अपने कमरे में बुला करके दरवाजा बंद करके नरेंद्र को बहुत कुछ बताना शुरू किया था अभी ठ ने नरेंद्र को क्या समझाया क्या बताया अपने पूरे 10 स्वामी जी कहते है ना कि ठाकुर इज दी कंक्रीट फॉर्म ऑफ 10000 इयर्स ऑफ इंडियन स्पिरिचुअलिटी माने 10000 साल की जो इंडियन आध्यात्मिक भारतीय आध्यात्मिक साधना है इसका मूर्त स्वरूप श्री राम कृष्ण है तो हजारों हजारों सालों की हमारी आध्यात्मिक साधना उपलब्धि दर्शन और हमारी अंडरस्टैंडिंग हमारा विजडम यह सब कुछ स्वामी ठाकुर ने नरेंद्र को देने की शुरुआत की थी तो अभी नरेंद्र ने ठाकुर को किस तरह से समझा नरेंद्र का जो स्वामी विवेकानंद में जो एक परिणति हुई वह किस तरह से हुई यह घटनाएं हमको बाहर बाहर से पता है किंतु स्वामी जी के हृदय में एक्चुअली क्या चलता होगा स्वामी जी ने खुद ने ना ही इसका उल्लेख किया है ना ही उनके गुरु भाई इसके बारे में ज्यादा कुछ कहते हैं विछिया है ठाकुर ने एक बार कह दिया कि लोगों की सेवा कर ने वाले लोगों को दान देने वाले तुम कौन होते हो तुम तो इन लोगों को ईश्वर के रूप में पूजो ग तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा नरें ने बाहर आकर के सबको बोला कि अरे तो ठाकुर के पास से बहुत बड़ी बात सीख ली समय आएगा तो मैं इस बात का पूरे विश्व में प्रचार करूंगा तो शरत महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं कहते हैं कि ठाकुर की ऐसी हजारों बातें हम लोग भी सुनते हैं किंतु इसका एक जो स्पेशल सिग्निफिकेंट है इसको एक दूसरे तरीके से देखा जा सकता है वो हम लोगों के माइंड में कभी नहीं हुआ जो कि स्वामी जी के में होता था ऐसा करके यह घटना का बड़ा ही सुंदर तात्विक विवरण शरत महाराज लीला प्रसंग में करते हैं तो ऐसे सब घटनाएं है किंतु एज ए मैटर ऑफ पॉलिसी एज ए मैटर ऑफ मोनेस्ट्री जी को क्या बताया या तो फिर स्वामी जी ने अपने पूरे भारत के भ्रमण करने के बाद में निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में उन्होंने स्वामी जी ने सब पूरी चीज को कैसे समझा यह तो अभी हमारे लिए अनुमान का ही विषय है किंतु यदि हम आज अनुमान करने को बैठे ही है तो मेरा खुद का जो स्वामी जी को पढ़ कर के जो मुझे एक सोल्यूशन मिला है वो है कि यदि हम अद्वैत वेदांत को एक्सेप्ट करते हैं तो मेरे भीतर में वही आत्मन है जो कि एक जो एक भिक्षा एक आदमी है जिसके पास में जिसका सब कुछ लूट चुका है जिसको भिक्षा करने के अलावा उसका गुजरान करने का उसका जीवन धारण करने का और कोई उपाय नहीं है ऐसा एक भिक्षुक इसके भीतर में भी वही आत्मन है और जब तक उसका उद्धार नहीं होगा मेरा भी उद्धार नहीं होगा स्वामी जी कहते हैं कि यह जो अद्वैत रियलाइक्स इट शुड बी इंडिविजुअल लेवल पे एक अद्वैत का जागरण या तो फिर अद्वैत अनुभूति नहीं आ सकती आपको पूरे विश्व ब्रह्मांड के साथ में तादात में होना चाहिए तभी कहीं जाकर एक अद्वैत अनुभूति होगी और इसका हमको एक इको या तो फिर इसका एक प्रमाण ठाकुर के जीवन में दिखता है कि हां वो किसी ने एक आदमी ने दूसरे आदमी के पीठ में जोर से चाटा मारा वो गंगा में एक नौका जा रही थी दो लोग झगड़ा कर रहे थे एक ने दूसरे को मार दिया तो उसका जो निशान है ठाकुर की पीठ के ऊपर में दिखना शुरू हो गए तो बाकी सभी लोगों को आश्चर्य हो गया कि देखिए कि जगत के साथ में ठाकुर का किस तरह से तादात में हो गया है तो यदि मान लीजिए कि मेरे आसपास में जितने भी लोग रहते हैं विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वो सबके साथ में मुझे एकीकृत होना है तो सबकी खुशी भी मैं मुझे उसका उपभोग करने को मिलेगा और उनका दुख भी मेरे सर पर आ जाएगा तो क्या मेरे में वह कैपेसिटी है कि उनका पेन और उनका सफरिंग मैं सहन कर पाऊं ठाकुर की जो इंफाइटिंग थी पेन और सफरिंग को धारण करने की वह हम सोच भी नहीं सकते आज हमको थोड़ी सी भी अद्वैद अनुभूति हो जाए मेरे आसपास में जितने भी लोग हैं उनके खुशी उनके गम उनकी हैप्पीनेस उनकी मिज एकाएक मेरे सर पर आकर खड़ी हो जाए तो मैं तो पूरा टूट ही जाऊंगा यह संभव ही नहीं है मेरा खुद का मेरा सफरिंग जो है नहीं संभाल पाता 10 लोगों के आकर के मेरे सर पर सवार हो जाएंगे तो मैं तो पागल ही हो जाऊंगा अर्थात कि सही सही आपको अद्वैद के लेवल पर स्था होना है पूरे विश्व ब्रह्मांड के साथ में तादात में आपको एक एस्टेब्लिश करना है तो आपको लोगों का दुख दूर करना ही पड़ेगा आपके पास में और कोई उपाय ही नहीं है यह अद्वैद की दृष्टि से एक सोल्यूशन है दिस इज नॉट ए मैटर ऑफ पॉलिसी दिस इज नॉट एन एक्ट ऑफ इंडिविजुअल कंपेज यह साधना का ही एक स्वरूप है यह शिव ज्ञान से जीव सेवा एक नई बात नहीं स्टार्ट कर दी गई है अभी हमको प्रश्न होगा कि अच्छा पुराने समय में ऋषि मुनियों के समय में क्यों इस तरह से जीव सेवा का एक बहुत ही बड़े रूप में प्रचार नहीं हुआ तो प्रश्न यह है कि उसका सिंपल आंसर यह है कि उस समय का जो सोसाइटी ऑलरेडी इतना सेफ और सिक्योर था कि जब आपको अद्वैत अनुभूति होती है 10 लोगों के खुशी और गम आपके सर पे आके सवार हो जाते हैं तो वैसे ही समाज में इतनी शांति थी कि आप इससे बहुत ज्यादा परेशान ना हो जाए किंतु ये 18th सेंचुरी 19th सेंचुरी प पोस्ट इंडस्ट्रियल वर्ल्ड एक इस तरह का एक जानवर जैसा एक जगत है कि बहुत बड़े एक हिस्से को समाज को अपने अधिकारों से वंचित कर दिया गया है और इतना बड़ा हिस्सा समाज का जब इतना भयानक कष्ट में दिन गुजार रहा हो उस समय यदि हम लोगों को किसी भी तरह की अद्वैद अनुभूति हो जाए तो उनका कष्ट हमारे सर पर आकर के ऐसा बैठ जाएगा कि हम लोग संपूर्ण रूप से पागल हो जाएंगे तो यह अद्वैत अनुभूत भी यदि हमको करनी है तो हमको ध्यान में रखना है कि समाज में सुख और शांति हो क्योंकि उनके जितने भी एक्सपीरियंस से वह मेरे सर पर आकर के बैठने ही वाले हैं तो देखिए कि ये साधना की दृष्टि से प्योर साधना की दृष्टि से भी आपको लोगों के कल्याण के बारे में सोचना खास करके यह पोस्ट इंडस्ट्रियल मॉडर्न वर्ल्ड में पहले एक समाज वर्ण व्यवस्था ही इस तरह से आश्रम व्यवस्था ही इतना सुंदर रूप से हमने लगा करके किया था कि सभी लोगों को अपना जो जीवन धारण करने के लिए जो कुछ चाहिए वो मिल जाता था आज ऐसा नहीं है आज एक वेलफेयर स्टेट आपको बनाना ही पड़ेगा एक तो स्पेशलाइजेशन ऐसा हो गया है इकोनॉमिक अप्स एंड डाउन की ये जो साइकल है बूम एंड बस्ट की ऐसी पागल की तरह यह फैल जाती है कभी-कभी यह पेंडम कोरोना की तरह आएगा तो सब कुछ तबाह कर देगा पूरे विश्व की इकोनॉमी को शट डाउन कर देगा पूरे साल भर के लिए उस समय यदि हम लोगों जद मदद करने के लिए आगे नहीं आएंगे और उस समय यदि अद्वैद अनुभूति हो गई तो क्या परिस्थिति होगी उस साधक की आप इमेजिन करके देख सकते हैं तो यह अद्वैद की दृष्टि से हमको इसको देखना है नहीं कि स्वामी जी ने क्रिश्चियनिटी से कुछ आइडियाज ग्रहण किए नहीं कि हां स्वामी जी के ऊपर में साम्यवाद का कुछ प्रभाव था नहीं कि हां ठाकुर एक जगह पर गए लोगों को देख कर के उनके मन में कर णा इतनी आ गई कि उन्होंने बोल दिया उनको एक दिन का खाना दे दो फिर दूसरे दिन से जो होगा सो वो लोग देख लेंगे उससे मुझे कोई लेना देना नहीं है या तो फिर हमको हां भारत की ऐसी परिस्थिति है कि रामकृष्ण मिशन यदि हेल्प नहीं करेगा रिलीफ नहीं करेगा तो कौन करेगा एक मैटर ऑफ पॉलिसी है एक इंडिपेंडेंस का मूवमेंट स्टार्ट हो रहा था तो उसमें भी बहुत सारे जो लड़के रामकृष्ण मिशन में आ रहे थे वह राष्ट्र भाव से प्रेरित थे तो ऐसा कहीं स्वामी जी ने सोच लिया कि ऐसे लड़कों को मोहित करके यहां पे लेला ले आया जाए तो इसके लिए चलो एक सोशल कंपोनेंट ऐड कर दो तो बहुत सारे लड़के आएंगे मैं खुद इस तरह से यहां पे आया हूं मैं खुद सोचता था कि रूरल डेवलपमेंट करूंगा गांव में जाकर के रहता था और फिर आखिर में ठाकुर महा स्वामी जी को पढ़ते पढ़ते मैं यहां पर आया हूं अभी एक सोशल इंक्लिनेशन आजकल के लड़कों का होता ही होता है क्योंकि वे लोग यह सब देखते हैं तो ऐसे लड़कों का ब्रेन वश करके यहां पर ले आया जाए ऐसा कुछ कोई एक विचित्र पॉलिसी क्या स्वामी जी ने बनाई थी नहीं यह सभी का उत्तर है ना अद्वैद के अनुभूति के आधार पर यह हमारा संघ और शिव शिव ज्ञान से जीव सेवा का जो आदर्श है इसका गठन हुआ है प्योर अद्वैत अनुभूति के आधार से बाकी सो जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह सब मिस इंटरप्रिटेशन है यहां तक कि स्वामी जी के जो छोटे भाई थे उन्होंने प्रोफेट पेट्रियट किताब लिखी है और वेस्ट बंगाल में जितने भी साम्यवादी है वह करते हैं कि स्वामी जी हमारे आदि गुरु है तोय भले ऐसा नहीं है कि हम लोग उनकी बात का खंडन करते हैं वह अपनी जगह पर सही होंगे हमको उनकी बात से कोई लेना देना नहीं है मैं एज रामकृष्ण संघ के साधु के रूप में जिसका कि उद्देश्य जिसका कि जीवन का एक अर्थ जीवन का एक मूल जिसका अंत अद्वैत वेदांत की ओर जा रहा है मैं इस चीज को किस तरह से देखूंगा मैं मेरा क्या सोल्यूशन है मैं रामकृष्ण संघ का विकास उसका गठन उसका भविष्य इसको मैं खुद किस दृष्टि से देख रहा हूं यह प्रश्न का यह उत्तर है यदि सही सही अद्वैत अनुभूति अद्वैत एक्सपीरियंस आज मुझे हो हो जाए ठाकुर की कृपा से तो जो आसपास के जितने भी लोग हैं उन सबका कष्ट मेरे सर के ऊपर में ऐसा आकर के बैठ जाएगा कि मैं पागल हो जाऊंगा और इस अद्वैत तत्व को ठीक ठीक में जद धारण कर पाऊं इसीलिए हमको शिव ज्ञान से लोगों की सेवा करनी है मेरा ही दूसरा स्वरूप उसका कष्ट आज मैं नहीं भुगत रहा हूं किंतु अद्वैत साधना में जितना आगे बढ़ता जाऊंगा उतना ही मैं भुग दूंगा तो यदि मुझे अद्वैत साधना के पथ पर आगे जाना है तो लॉजिकली इट फॉलोज के बाकी के सबके कष्ट के निवारण के लिए मैं थोड़ा बहुत प्रयत्न अपनी साध के रूप में अवश्य कर यह मेरा खुद का एक सलूशन है तो आज यही तक कल फिर से मिते ओ शांति शांति हरि ओम त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु