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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 16 Sep 2025

Prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन 18th पॉइंट जिसका हम डिस्कशन कर रहे थे उसका लास्ट पैराग्राफ वैसे तो हमने पढ़ लिया दिया था कल। किंतु आज फिर से एक बार उसको रिपीट कर लेते हैं क्योंकि इस पैराग्राफ में इतना सारा पावर छुपा हुआ है। यह जो पूरा लेक्चर है माय प्लान ऑफ कैंपेन दिस क्विंट एसेंशियल स्वामी जी कि जब हम कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद तो हमको यह याद नहीं आता कि उन्होंने वहां पर थाउजेंड आइलैंड पार्क में बैठकर के स्पिरिचुअल मिस्ट्रीज जो है वह हमको बताई है या तो फिर यह ज्ञान योग है या तो राजयोग है वह सब भारतीय शास्त्र हमारे सामने उन्होंने रखे हैं। हम जब एक जनसाधारण के सामने जब स्वामी विवेकानंद नाम आता है तो वही सब आइडियाज उनके सामने आते हैं जो कि इस प्रवचन में उन्होंने कहे हैं और सिर्फ यही नहीं यह जो पूरा लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा है उसमें भी खास करके यह चेन्नई लेक्चर्स जो कुछ है उसमें उनके जो आइडियाज इतने पावरफुल रूप से प्रस्फुटित हुए हैं जो कि हमेशा के लिए भारतीय युवाओं के जनमानस पे छा गए हैं। तो यह जो लास्ट पैरा है उसको और एक बार रिपीट कर लेते हैं। गिव अप दिस विकनिंग

Will Power: our true strength

मिस्टिसिज्म एंड बी स्ट्रांग। यह जो हमारे चरित्र को कमजोर करने वाला रहस्यवाद है उससे मुक्ति पाओ और सशक्त हो। यहां पर सशक्त का अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि जिम में जाकर के बॉडी बिल्डिंग करना। यहां पर सशक्त होने का अर्थ यह है कि जब प्रेय और श्रेय यह दोनों ऑप्शन हमारे सामने आते हैं तो हम सतत श्रेय का सिलेक्शन करते जाए। श्रेय को वरण करते जाए। प्रेय को छोड़ते जाए। देखिए कैरेक्टर की स्ट्रेंथ किसको कहते हैं? जीवन में हमेशा प्रत्येक क्षण प्रत्येक मोमेंट हमारे सामने यह टेंप्टेशन आता ही रहेगा। आता ही रहेगा। आज मैं यहां पे स्टडी करने के लिए बैठा हूं और मैंने सोचा कि चलो आधा घंटा स्टडी कर लिया। बहुत हो गया। इससे अभी ज्यादा मुझे बैठने की आवश्यकता नहीं है। किंतु देखिए कि मैं खड़ा होना चाहता हूं। दूर भाग जाना चाहता हूं स्टडी से। यह सब इसके पीछे में ऐसा नहीं है कि मेरी मेंटल कैपेसिटी नहीं है स्टडी करने की। बस मेरा विल पावर कमजोर है। मेरा विल पावर देखिए दो स्टूडेंट को आप लीजिए। एक बड़ा ही ब्रिलियंट स्टूडेंट है जो कि कंसिस्टेंटली थ्रूउ हिस एकेडमिक करियर हायर एंड हायर स्कोर्स करता आ रहा है और एक दूसरे स्टूडेंट को लीजिए जो कि हमेशा वो फेलियर होता फेल होता रहा है। या तो फिर वो माने मिनिमम परसेंटेज लाएगा या तो फिर फेल होगा और फिर ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम वह ड्रॉप आउट हो जाएगा। तो एक ड्रॉप आउट लड़का है और एक ब्रिलियंट लड़का है। आईआईटी जी है या ऐसी कोई कॉम्पिटिटिव एग्जाम पास करके वो बहुत ही अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन प्राप्त करता है। देखिए दोनों में डिफरेंस क्या है? बात यह नहीं है कि एक लड़के में ज्यादा बुद्धि है, एक लड़के में कम अकल है। बात यह है कि एक जो सक्सेसफुल लड़का है जो सक्सेसफुल स्टूडेंट है उसकी जो विल पावर है उसका वो बड़ा ही स्ट्रांग होता है। तो यह विल पावर की वजह से जब भी अपना माइंड एक रेजिस्टेंस फेंकने की शुरुआत करेगा कि प्रत्येक क्षण ऐसा कहेगा कि चलो अभी मोबाइल खोल करके थोड़ा सा देख लेते हैं क्या नोटिफिकेशन आया है मेरे मित्रों ने क्या पोस्ट किया है क्या ट्वीट हुआ है क्या न्यूज़ चल रहा है वो उसको रेजिस्ट करेगा अभी वह कमरे में वो स्टडी करने को बैठा है चारों ओर घर में कुछ ना कुछ तो डिस्टरबेंस होता ही रहेगा तो उसकी मां कुछ काम कर रही उसके पिताजी, भाई-बहन, मित्र आते जाते रहेंगे। तो वे लोग क्या कर रहे हैं? चलो थोड़ा सा उनके साथ में गप लगा देते हैं। वह भीतर में से आएगा। उसको वो रेजिस्ट करेगा। कंटिन्यूस भीतर के ये जो अर्जिस है, भीतर के जो डिजायर है, लोअर लेवल डिजायर जो कि हमेशा देखिए अपने ब्रेन के भीतर में दो शक्तियां हैं। एक तो पावर ऑफ डिस्ट्रैक्शन दूसरा है पावर ऑफ कंसंट्रेशन। यह पावर ऑफ डिस्ट्रैक्शन हमको प्रत्येक क्षण एक माने हमको वहां पर बैठने नहीं देगा। ये अटेंशन डेफिशिएंसी डिसऑर्डर आजकल इसको एडी वो आजकल इसको ना साइकोलॉजिकली स्वीकृत किया गया है कि आप एक चीज पे ज्यादा समय अटेंशन नहीं दे पाते हैं तो यह एक तरह की मानसिक बीमारी है। एक तरह का एक मेंटल डिसऑर्डर है। किंतु अभी क्या है कि डिसऑर्डर के लेवल पे अपना डिस्ट्रैक्शन नहीं भी होगा यदि और इवन जनरल लेवल डिस्ट्रैक्शन भी जो होता है ना वह हमको किसी भी चीज में सक्सेसफुल नहीं होने देता। जबकि यह पावर ऑफ कंसंट्रेशन है उसको यदि हम कल्टीवेट करते हैं। यह पावर ऑफ डिस्ट्रैक्शन के साथ में उसका युद्ध करवा देते हैं। और फिर देखिए यदि यह पावर ऑफ कंसंट्रेशन सतत जीतता जाएगा। सतत सक्सेसफुल होता जाएगा। तो आप अपना स्टडी पे हमेशा हमेशा कंसंट्रेशन बढ़ाते ही जाएंगे। बढ़ाते ही जाएंगे। यहां पर कोई मेमोरी पावर या तो फिर यह इंटेलेक्ट या तो क्रिएटिविटी यह सब चीजें हम बोलते तो हैं कि वह लड़का फेल हो रहा है तो उसमें मेमोरी कम है। याद नहीं रख पाता है। यह लड़का फेल होता है तो उसमें क्रिएटिविटी नहीं है। वह लड़का फेल होता है तो उसमें यह इंटेलेक्ट नहीं है। आईक्यू कम है। उसका अब ये आईक्यू ये क्रिएटिविटी ये इंटेलेक्ट ना कि ये फिर मेमोरी यह सब सेकेंडरी चीजें हैं। प्राइमरी फैक्टर है आपका पावर ऑफ कंसंट्रेशन और पावर ऑफ कंसंट्रेशन के पीछे में पड़ा है विल पावर। हमेशा हमेशा यह प्रेय अर्थात कि यह पावर ऑफ डिस्ट्रैक्शन हमारे सामने आता ही रहेगा। कुछ चीजें हमको बड़ी प्रिय होती है और यदि प्रिय नहीं भी होती अब जैसे कि बार-बार यह मोबाइल का नोटिफिकेशन चेक करना आजकल का जो यह हैबिट हो गया है। ऐसा नहीं है कि मोबाइल में आप कोई बहुत ज्यादा अट्रैक्टिव चीजें देख लेते हैं। किंतु यह बेसिक तमस जो है बेसिक डिस्ट्रैक्शन जो है वो इसके पीछे काम करता है। तो ऑलरेडी एक तो डिस्ट्रैक्शन का एक पावर है हमारे भीतर में। सतत हमारे मन को वो विभाजित करता रहता है। सतत हमारे मन को वो डिफरेंट-डिफरेंट एक्टिविटी में लगाना चाहता है। तो ऑलरेडी एक तो डिस्ट्रैक्शन है। ऊपर में आप इंद्रिय सुख को ऐड कर दीजिए। यह दोनों जब मिलते हैं तब महा विस्फोट होता है। मनुष्य के चरित्र को संपूर्ण रूप से खत्म कर देते हैं। बहुत बार लोग कहते हैं कि इंद्रियों के जो सुख है या तो फिर इंद्रियों की लोलुपता है, यह काम कांचन के प्रति हमारा आकर्षण है, उससे कैसे छुटकारा पाया जाए? उससे कैसे मुक्ति पाई जाए? तो मेरा जो पर्सनल एनालिसिस इसमें रहा है कि बात ऐसी नहीं है कि आप डायरेक्ट जो है इंद्रियों के आकर्षण के साथ में फाइट कीजिए। वह फाइट में ज्यादातर समय तो हमारी पराजय ही होगी। आप इससे जो भी बेसिक फैक्टर है फर्स्ट प्रिंसिपल है जो उससे भी प्रीवियस स्टेप है वहां पे चले आइए। आप डिस्ट्रैक्शन के साथ में फाइट कीजिए। देखिए आप यदि डिस्ट्रैक्शन पर विजय प्राप्त करते हैं तो धीरे-धीरे करके यह इंद्रियों के प्रति अपना आकर्षण जो है वह भी शिथिल होता जाएगा। वह भी डाइल्यूट और माइल्ड होता जाएगा। तो देखिए कि एक और है डिस्ट्रैक्शन जो कि बहुत ज्यादा हम डिस्ट्रैक्ट हो जाएंगे। तो धीरे-धीरे करके इंद्रियों के आकर्षण की ओर ले जाएंगे। इंद्रियों के आकर्षण नहीं इंद्रियों के विषय के प्रति आकर्षण। तो इंद्रियों के विषयों के प्रति आकर्षण की ओर ले जाएंगे और फिर वह है हमको तमस और रजस में ले जाएंगे। रजस में भी कम ज्यादातर तो तमस में ही ले जाएंगे। यहां पे देखिए पावर ऑफ कंसंट्रेशन जितना [गला साफ़ करने की आवाज़] अपना विल पावर स्ट्रांग होता है उतना ही हम अपने मन को इधरउधर जो दौड़ता है वहां से सतत पकड़ पकड़ करके एक जगह पर लाकर के बिठाएंगे। अब जैसे ही अपना विल पावर और यह क्या है? फीडबैक लूप है। यदि मान लीजिए कि मैं एक बार अपने माइंड को कंसंट्रेट करने में सक्सेस हुआ इवन यदि 5 मिनट 10 मिनट के लिए तो फिर यह कंसंट्रेशन जो है सत्व बढ़ाएगा मेरे मन में। और यह सत्व जो है इन टर्न यह विल पावर को स्ट्रेंथन करेगा। और भी बहुत कुछ चीजें लेके आएगा। क्रिएटिविटी लेके आएगा। मेमोरी पावर लेके आएगा। इंटेलिजेंस आईक्यू लेके आएगा और भी बहुत सारे स्किल्स एंड टैलेंट जो है स्पिरिचुअल डेवलपमेंट है सब लेके आएगा किंतु उसका सबसे बड़ा बेनिफिट है कि मेरा विल पावर स्ट्रेंथन होता है। तो यहां पे देखिए यह एक है पॉजिटिव फीडबैक लूप कि जैसा मेरा विल पावर थोड़ा सा स्ट्रांग होता है तो मैं फिर से कंसंट्रेशन बढ़ाऊंगा। कंसंट्रेशन बढ़ता है तो बाकी सब चीजें तो बढ़ेगी ही बढ़ेगी। सत्व बढ़ेगा। आध्यात्मिक चेतना जागृत होगी। क्रिएटिविटी इंटेलिजेंस जागृत होगा। यह जो आजकल के जो कटिंग एज डेवलपमेंट है वो जो एक रिसेंट पेपर का मैंने एग्जांपल दिया था। अटेंशन इज ऑल यू नीड। यह एआई आज का जो टेक्नोलॉजी इसके पीछे में जो एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट रिसर्च पेपर जो पब्लिश हुआ है इसके दो ऑथर इफ आई रिमेंबर करेक्टली इंडियन है और उसका टाइटल क्या है? अटेंशन इज ऑल यू नीड। तो अभी खैर उनका जो टेक्निकल हिसाब से उन्होंने यह टाइटल रखा है। किंतु हम इसको स्पिरिचुअल समझ ही सकते हैं कि किस तरह से वो रिलेवेंट है। यदि हम अटेंशन बढ़ाएंगे तो फिर इस तरह के पेपर हम पब्लिश कर सकते हैं। वो कैपेसिटी उस लेवल तक पहुंच जाएगी कि हम जो कटिंग एज साइंस, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन जो है उसमें अपना कंट्रीब्यूट कर पाएंगे। तो वह सब तो कंट्रीब्यूट है ही है किंतु साथ-साथ में ही विल पावर और बढ़ेगा। यानी देखिए विल पावर बढ़ता है तो हम कंसंट्रेशन बढ़ाएंगे। कंसंट्रेशन बढ़ता है तो यह क्रिएटिविटी वगैरह तो है ही है किंतु साथ में विल पावर और भी बढ़ेगा। यह बढ़े हुए विल पावर से फिर से हम कंसंट्रेशन को बढ़ाएंगे। यानी एक पॉजिटिव फीडबैक लूप स्टार्ट हो जाती है। और जिस स्टूडेंट के माइंड में यह पॉजिटिव फीडबैक लूप स्टार्ट होती है, वे लोग सक्सेसफुल होते हैं। यहां पे एक नेगेटिव फीडबैक लूप लूप है। एक तो अपना विल पावर कमजोर है। फिर यह सतत डिस्ट्रैक्शन जो आते रहते हैं उसके सामने हम उसका सामना नहीं कर पाते हैं। उसके सामने हम कुछ कर नहीं पाते हैं। तो यह नेगेटिव डिस्ट्रैक्शन बढ़ेगा। डिस्ट्रैक्शन जितना बढ़ता जाएगा उतना ही देखिए इंद्रियों के जो विषय है उनके प्रति हमारा आकर्षण बढ़ता ही जाएगा बढ़ता ही जाएगा इस तरह के लोगों का आप एक सामान्य दृष्टि से ऑब्जरर्वेशन करेंगे अभी डायबिटीज हो गया है डॉक्टर ने कहा है मिठाई मत खाओ तो इस तरह के लोग मैंने देखे हैं मेरे परिवार जन्म में ही मैंने देखे हैं किसी किसी को कि मिठाई आ गई है नजर के सामने बिना खाए रह ही नहीं पाते हैं। वो हार्ट में ब्लॉकेज हो गया है। डॉक्टर ने कहा है कि जंक फूड बंद कर दो। किंतु नजर के सामने जंक फूड आ जाता है। बिना खाए यह लोग रह ही नहीं पाते। क्यों? क्योंकि हमेशा के लिए उन्होंने अपने विल पावर को कमजोर करके रख दिया है। विल पावर कमजोर है तो डिस्ट्रैक्शन सतत बढ़ता जा रहा है। सतत बढ़ता जा रहा है। उसकी वजह से तमस बढ़ता है। और यह तमस जो है इन टर्न यह विल पावर को और भी ज्यादा कमजोर बनाता है। यह तमस है एसिड की तरह। विल पावर पे यह तमस गिरता है तो विल पावर पूरा कोरोड़ हो जाता है। रोट हो जाता है भीतर से। तो यह एक नेगेटिव फीडबैक लूप स्टार्ट हो जाता है। ऐसे लोगों का ना ही अपने स्वास्थ्य पर कोई कंट्रोल है, ना ही अपने मन के ऊपर में कोई कंट्रोल है। क्या खाना खाते हैं, ना ही उसके ऊपर में कोई कंट्रोल है। सतत वह महंगी दवाई खाते रहेंगे। क्योंकि डॉक्टर जब यह कहते हैं कि डाइट कंट्रोल करो, एक्सरसाइज करो, मेडिटेशन करो, हो सकता है प्राणायाम करो। तो यह सब चीजें करने की कैपेसिटी ही नहीं रहती। तो फिर यह कंटीन्यूअस मेडिकेशन के ऊपर में यह लोग रहते हैं। तो यह एक है नेगेटिव फीडबैक लूप और यहां पे है पॉजिटिव फीडबैक लूप कि जहां पे हमने शुरू में ही विद्यार्थी जीवन में हमने अपने विल पावर को पॉजिटिवली अप्लाई करना शुरू किया है। जितने भी डिस्ट्रैक्शंस है उससे ऊपर में से मन को बार-बार खींच करके ज्यादा से ज्यादा कंसंट्रेट करने का प्रयास किया है। कंसंट्रेशन बढ़ने की वजह से अपना सत्व बढ़ता है और सत्व जो है अमृत की तरह है। यदि यह तमस जो है वह एसिड की तरह है विल पावर के लिए तो यह सत्व है वह अमृत की तरह है। या तो फिर स्वामी जी की लैंग्वेज में कहेंगे कि सुबह में जो ओस गिरती है गुलाब के ऊपर में तो कैसे गुलाब की जड़ों को स्ट्रेंथन करती है। तो सत्व भी सुबह को गिरने वाली यह ओस की तरह है जो कि यह अपना विल पावर रूपी जो जड़ है गुलाब उसको स्ट्रेंथन करती है। तो देखिए कि अपना जो

मानव-मन की शक्ति को कैसे मापा जाए? -- by will-power

साइकोलॉजी है बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि मनुष्य के माइंड को आप कैसे एनालिस एनालाइज करेंगे। एक मनुष्य का 700 करोड़ लोग हैं इस पृथ्वी के ऊपर में। 700 करोड़ में पूरा आपको एक स्पेक्ट्रम दिखाई देगा। एक और आपको मिलेंगे सबसे निकम्मी तरह के लोग। सबसे घिनौनी तरह की क्रिमिनल माइंडसेट वाले लोग और दूसरी ही ओर आपको मिलेंगे श्री रामकृष्ण, श्री भगवान बुद्ध ये अल्बर्ट आइंस्टाइन, महात्मा गांधी यह बेस्ट ऑफ दी पॉलिटिशियंस, बेस्ट ऑफ दी साइंटिस्ट, बेस्ट ऑफ दी स्पिरिचुअल लीडर्स। तो एक ओर आपको इस तरह के लोग मिलेंगे। दूसरी ओर आपको यह हिटलर है, ये स्टालिन है, यह माओ है, पोलपोट है और दुनिया भर के जो क्रिमिनल है वो लोग मिल जाएंगे। तो यह पूरा स्पेक्ट्रम जो है और बीच में हमारे जैसे कितने ही लोग हैं। पूरा दुनिया भर का टैलेंट है। कोई अच्छे से गाना गा सकता है। कोई अच्छे से प्रोग्रामिंग कर सकता है। कोई अच्छे से क्रिकेट खेल सकता है। कोई अच्छा जिम्नास्ट है। कोई अच्छा रेसलर है। कोई अच्छा टीचर है। कोई अच्छा इंजीनियर है। कोई अच्छा सीईओ है। यह होल वर्ल्ड ऑफ टैलेंट है अपने सामने। तो इतना जो डायवर्स ह्यूमन माइंडसेट है आप कहेंगे कि क्या ऐसा भी कोई साइंस है जो कि ह्यूमन साइकोलॉजी को साइंटिफिकली हम समझ पाए या सोच करके देखिए कि आज कंप्यूटर साइंस है इतना कॉम्प्लेक्स है। इतना कॉम्प्लेक्स है कि कोई भी एक व्यक्ति ऐसा दावा नहीं करेगा कि ये डिजिटल वर्ल्ड में कंप्यूटर के जगत में जो कुछ सीखना है मैंने सब सीख लिया है। यह 10 तरह की लैंग्वेज मुझे आती है। यह 10 तरह की एप्लीकेशनेशंस मुझे आती है। मैं डिजाइनिंग भी कर सकता हूं। मैं सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर भी कर सकता हूं। मैं फ्रंट एंड यूआई भी डेवलप कर सकता हूं। इतना सब कुछ करने की कैपेसिटी बहुत कम लोगों में होती है। सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र में माहिर होते हैं। किंतु इवन आप यदि डिजिटल वर्ल्ड में प्रवेश करेंगे तो ये बेसिक जो कुछ कांसेप्ट है कि ट्रांज ट्रांजिस्टर जो होता है कैसे काम करता है? ये बाइनरी टेक्नोलॉजी जो है जीरो एंड वन वो कैसे काम करती है? कुछ-कुछ बेसिक साइंस कॉमन रहते हैं। उसके बाद में आप बाकी एडवांस होते जाते हैं। तो क्या ये जो स्पिरिचुअल वर्ल्ड है या तो फिर वर्ल्ड ऑफ कॉन्शियसनेस है। यहां पे कोई ऐसे बेसिक कांसेप्ट है जिसको समझ करके हम ये जो पूरा स्पेक्ट्रम ऑफ ये जो डायवर्सिटी है टैलेंट है ह्यूमन वर्ल्ड का उसको समझ पाए। तो वो बेसिक कांसेप्ट है और बेसिक कांसेप्ट सबसे फंडामेंटल बेसिक कांसेप्ट है अपना विल पावर। जैसे ही हमने अपने विल पावर को डेवलप करना शुरू किया कॉन्शियसली जैसे ही हमने अपने विल पावर को कॉन्शियसली अप्लाई करना शुरू किया वैसे ही आप देखेंगे कि यह जो तमस का जो रास्ता है और यह सत्व का रास्ता है यह जो पावर ऑफ डिस्ट्रैक्शन है और यह पावर ऑफ कंसंट्रेशन जो है इन दोनों के बीच में एकदम क्लियर आपको डिफरेंस दिखाई देगा और एक्चुअली होता क्या है कि प्योर कंसंट्रेशन जिसके भीतर में हो इस तरह के लोग बड़े ही अल्पसंख्यक है और प्योर डिस्ट्रैक्शन जिसके भीतर में हो प्योर तमस जिसके भीतर में हो इस तरह के लोग भी बड़े ही अल्पसंख्यक ही होते हैं। ज्यादातर जो लोग होते हैं वो रजस में यह कहीं पे होते हैं। वह उनका जो कैपेसिटी जो मेंटल मेकअप जो है साइकोलॉजिकल जो उनका अह फिंगरप्रिंट जो है या तो साइकोलॉजिकल प्रोफाइल जो है वो बीच में कहीं पे ग्रे स्केल में आता है। थोड़ा सा तमस रहेगा थोड़ा सा रजस रहेगा। थोड़ा सा सत्व रहेगा। हो सकता है किसी में सत्व ज्यादा हो, किसी में रजस ज्यादा हो, किसी में तमस ज्यादा हो। किंतु ये तीनों का मिश्रण ही रहेगा। जबकि आप किंतु यदि प्योर हमने अपने विल पावर को जितना बढ़ाना चाहे बढ़ाने की क्षमता अपने में है उतना बढ़ा पाएंगे। अगेन ये क्षमता वगैरह कोई कांसेप्ट है ही नहीं। आप इवन माने जिसका साइकोलॉजी नॉर्मल है अभी स्क्रिजोफेनिया वगैरह हो गया है जेनेटिक डिसऑर्डर जिसको है ब्रेन डिसीज जिसको है उन लोगों की बात यदि छोड़ दें तो जो एक नॉर्मल कॉन्शियसनेस लेकर के जो बच्चा जन्म लेता है उसको यदि अपने जन्म के साथ-साथ में ही बिल्कुल अर्ली ऑन यह विल पावर डेवलपमेंट की ट्रेनिंग देना शुरू करें तो देखिए देखिए कि उसके सामने स्काई इज द लिमिट। ऐसा कोई कांसेप्ट ही नहीं है कि मेरी क्षमता इतनी है बोलकर के मैं यहां तक जाऊंगा। देखिए संस्कार की बात हम लोग करते हैं कि पूर्व जन्म के संस्कार लेकर के हम इस जन्म में आए हैं तो फिर क्या इस जन्म में मैं ज्यादा कुछ कर पाऊंगा कि नहीं? तो इस मैंने कहा था ना कि एक यहां पर जो स्टूडेंट आते हैं तो एक स्टूडेंट ने मुझे प्रश्न किया कि ये कर्म का सिद्धांत सही है या गलत? तो मैंने कहा कि मैं यह जो तुमने प्रश्न किया यह मैं समझ सकता हूं कि प्रश्न क्यों किया क्योंकि आज की यंग जनरेशन जो है उनको यह सुनना अच्छा नहीं लगता कि आज की आपकी जो दुरावस्था है उसका कारण है पिछले जन्म में किए हुए कर्म का फल। उनको यह लगता है कि यदि मैं इस जन्म में मेहनत करता हूं तो मुझे इस जन्म में परिणाम क्यों नहीं मिलता है? मैंने कहा कि देखो कि यह कर्म का सिद्धांत है। वह आप पॉजिटिवली भी देख सकते हैं, नेगेटिवली भी देख सकते हैं। नेगेटिवली देखें तो आज मेरी जो परिस्थिति है मेरे यस्टरडे कल जो मैंने कर्म किए थे उसके ऊपर में निर्भर है। तो यदि इसको नेगेटिव दृष्टि से देखना हो गया। तो पॉजिटिव दृष्टि से देखिए ना। आज मैं जो कर्म करता हूं यदि शुभ कर्म करूंगा तो मेरा जो आने वाला भविष्य है वह कितना सक्सेसफुल हो जाएगा। मेरा भविष्य तो मेरे कर्म में आज का जो मेरा कर्म है उसके ऊपर में आधारित है ना ही कोई दैव नहीं कोई भूत पिशाच ना ही कोई ग्रह गणना नहीं कोई यह विधि विधान नहीं कोई देवता देवी देवता उन लोगों पर आधारित है ईश्वर है ईश्वर की कृपा प्राप्त होने से हमारा जीवन अच्छा ही होगा किंतु यदि आप प्योर पुरुषार्थ में भी मानते हैं परमार्थ को छोड़ भी देते हैं तो कर्म का सिद्धांत आपको प्योर पुरुषार्थ के माध्यम से अपने जीवन को सक्सेसफुल करवा सकता है। यह पावर है इस विल पावर के कांसेप्ट में कि विल पावर तो मेरे हाथ में है। क्यों नहीं मैं सतत सतत स्टेप बाय स्टेप बाय स्टेप उसको बढ़ाता ही जाऊं। बढ़ाता ही जाऊं। इस जन्म में जहां तक मैं पहुंचा, अगले जन्म से मैं फिर से प्रारंभ कर दूं। उसके अगले जन्म में मैं फिर से प्रारंभ कर दूं। तो ऐसा करते-करते देखेंगे कि एक समय अवश्य आएगा कि हमको सिर्फ जागतिक जगत में सक्सेस मिलेगा। इतना ही नहीं आध्यात्मिक जगत में भी सक्सेस मिलेगा। देखिए विद्या, बुद्धि, टैलेंट,

बाह्य-जगत में सफलता हो, न आतंरिक जगत में -- चाहिए तो सिर्फ will power

नॉलेज, सं ये जो सब चीजें हैं ना वो और आध्यात्मिकता यह सब जुड़ा हुआ है। स्वामी जी ने ठाकुर ने कहा ना कि यदि कोई एक विद्या में आप पारंगत होते हैं तो आप मान लीजिए कि आपके लिए आध्यात्मिक जीवन में सक्सेस बहुत ज्यादा कोई डिफिकल्ट नहीं है। यह बात ठाकुर किसको कहते हैं? एक अच्छा गायक वहां पर आया था। बहुत अच्छे भजन गान गाता था। उसको यह बात ठाकुर कहते हैं। तो देखिए कि आप कोई भी विद्या हो ना कि आध्यात्मिकता हो। विद्या है कि आपको जागतिक जगत में सांसारिक जगत में आपको सक्सेस दिलवाएगी। आपका बिजनेस है, आपका जॉब है, आपका फैमिली लाइफ है। वह सब में विद्या आपको सक्सेस दिलवाएगी। तो ऑन दी अदर हैंड वही विल पावर की ही एप्लीकेशन दो है। बाहर के जगत में वो विद्या की रूप में वो प्रकट होता है और ये आंतरिक जगत में वो आध्यात्मिकता के रूप से प्रकट होता है। तो चाहे बाह्य जगत की एप्लीकेशन हो जो है विद्या और आंतरिक जगत की एप्लीकेशन हो जो है आध्यात्मिकता। ये दोनों के पीछे फैक्टर तो एक ही है और वह है विल पावर। रामकृष्ण मिशन में आपको पता होगा शायद कि यहां पे जॉइ करने के लिए आपको ग्रेजुएट होना पड़ता है। तो आपको प्रश्न होगा कि अभी आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए आपको यह बीकॉम, बीए, एमबीए, बीटेक वो सब करने की क्या जरूरत है? वहां पे तो सब सांसारिक चीजें सिखाते हैं। यहां पे तो हमको जप ध्यान है। ये जो धर्म ग्रंथ पाठ है, पूजा है वगैरह सब सीखना है। तो देखिए एक तो एक तो रीजन यह है कि यहां पे कर्म योग होता है। स्कूल चलानी होती है, हॉस्पिटल चलानी होती है या रूरल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट होते हैं और इसके अलावा भी बहुत सारी एक्टिविटीज होती है। तो टैलेंट की हमेशा आवश्यकता होती है। तो वह तो एक फैक्टर है कि आपको ग्रेजुएट होना ही चाहिए। दूसरा फैक्टर है कि यदि आप ग्रेजुएट हैं तो यह प्रूव करता है कि आपने अपने विल पावर को अप टू एन एक्सटेंट कल्टीवेट कर दिया है। अभी आजकल क्या है? पिछले 10-15 सालों में ग्रेजुएशन की कोई वैल्यू नहीं रह गई। बीए, बीकॉम वगैरह तो आपको वैसे ही मिल जाएंगे। तो किंतु जब रामकृष्ण मिशन प्रारंभ हुआ था। आज से 100 साल पहले की घटना उस समय तो ग्रेजुएशन की कोई वैल्यू थी। आपको सही में मेहनत करके मेहनत करेंगे तभी आपको यह सर्टिफिकेट वगैरह मिलता था। तो उस समय की बात है यह कि यदि आप उस चीज के लिए मेहनत कर सकते हैं तो क्यों नहीं आप उसी मेहनत को आध्यात्मिक जगत में परिणत कर दे। जिस लड़के को एक जगह पर बैठकर के विद्या अभ्यास करने का हैबिट ही नहीं है, वह लड़का क्या एक जगह पर बैठकर के लंबे समय तक जप करता रहेगा? यह समझना कठिन है।

रामकृष्ण मिशन में साधु होने के लिए ग्रेजुएट क्यों होना पड़ता है?

देखिए रामकृष्ण मिशन का जिस तरह से इवोल्यूशन हुआ है ठाकुर जिस तरह से यह त्यागी संतानों को ट्रेन करते थे और जिस तरह से बादबाद में रामकृष्ण मिशन प्र रामकृष्ण मिशन की जो कार्यप्रणाली है देखिए सबसे बड़ा फर्क क्या है पता है जिस जो कि मैंने ऑब्जर्व किया है कि ठाकुर के पास में लड़के जो आते थे बड़ी यंग एज में आते थे। ये 16 साल के अखंडानंद जी 17 18 19 20 ये नरेंद्र आई थिंक 23 साल का था स्वामी जी का जो बर्थ ईयर है 1863 और ये ठाकुर के पास में आए थे 1881 तो ऑलमोस्ट 181 साल की उनकी उम्र होगी तो स्वामी जी ऑलरेडी उम्र में थोड़े से बड़े हो गए थे तो कि देखिए कि और उस समय मास्टर महाशय की उम्र ऑलमोस्ट 26 के आसपास में होगी तो ठाकुर जब हंसी मजाक करते हैं तो यह यंग लड़के सब जोर-जोर से हंसते हैं। किंतु यह मास्टर महाशय गंभीर होकर के बैठे रहते हैं। तो मास्टर महाशय की उम्र 26 के आसपास थी। तो ठाकुर कहते हैं कि उसकी उम्र थोड़ी ज्यादा हो गई है ना इसलिए वह हंसीज़ाक में पार्टिसिपेट नहीं करता। गंभीर होकर बैठा रहता है। तो उस समय यह एज प्रोफाइल था ठाकुर के पास में आने वाले त्यागी संतानों का 16 से 19 20 इस तरह का अद्भु अद्वैतानंद जी को यदि छोड़ दें बूढ़ो गोपाल महाराज को तो बाकी सबका इस तरह का प्रोफाइल था। महापुरुष महाराज आई थिंक थोड़े उम्र में बड़े थे 20 23 साल के थे तो व्हाटएवर एग्जैक्टली मुझे याद नहीं। तो बट दिस वाज़ देयर प्रोफाइल यंग लड़कों का यहां पे आने का ठाकुर के पास में और यह 26 साल जो हो गया है मास्टर महाशय का वह थोड़ा उम्र ज्यादा हो गया है। तो अभी का देखिए वो ठाकुर के समय का और अभी आजकल अभी आजकल ही नहीं इन जनरल में रिसेंट कुछ समय से देख रहा हूं कि 25 26 27 28 29 30 31 32 यहां तक के हम लोगों को लेते हैं। हालांकि क्राइटेरिया यह है कि आपका ग्रेजुएशन किया है तो आपकी उम्र 28 के आसपास होनी चाहिए और फिर हायर एजुकेशन किया है पीएचडी वगैरह कुछ किया है एमटेक पीएचडी तो इवन 30 32 33 तक भी ले लेते हैं। तो देखिए कि ठाकुर ऑलरेडी मास्टर महाशय को कहते थे 26 साल उसकी उम्र बड़ी हो गई है। यहां पे तो ऑलरेडी 28 साल तक तो ईजीली ग्रेजुएट होने से ले लेते हैं। तो क्या है कि अह अभी यहां पे रामकृष्ण मिशन में आने वाले जो लड़के हैं उनका यह जो एकदम बेसिक फॉर्मेटिव पीरियड है 16 17 18 19 वो ऑलरेडी क्रॉस हो चुका है। तो होता क्या है कि जो जिस समय में बैठकर के प्रचंड मेहनत करके जब ध्यान सीख लेना है आपको वो उम्र बीत गई है। ऑलरेडी वह उम्र बीत गई है। आप 25 26 साल के बाद में ऑलरेडी एक तरह का संस्कार अपने मन पर बैठ ही जाता है। उसके बाद में फिर आपको बिल्कुल आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है। तो इसके लिए क्या है कि यदि ग्रेजुएट होता है लड़का आने के लिए जॉइ करने के समय तो यह अस्यूम कर लेते हैं कि बिकॉज़ कि वो ग्रेजुएट है उसके पास में ऑलरेडी एक कैपेसिटी होगी लंबे समय तक बैठकर के स्टडी करने की। तो यह प्रिज्यूम कर लिया जाता है कि यदि वह लंबे समय तक बैठकर के स्टडी कर सकता है उसका विल पावर उतना एडवांस है तो शायद हो सकता है कि वह वही विल पावर को यूज करके आध्यात्मिक जगत में लंबे समय तक बैठकर के जप कर पाए। तो यह एक साइकोलॉजी है। यहां पर देखिए अल्टीमेटली विल पावर का ही पूरा खेल है। और यह विल पावर डेवलप करने की आइडियल जो एज है वो वो एज है जिस ऐज में यह गुरु भाई ठाकुर के पास में आए थे। यह 15 16 17 18 19 20 यह एक उम्र है। अभी होता क्या है? आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के समय ऑलरेडी ज्यादातर लोगों ने यह उम्र क्रॉस कर दी है। मैं खुद यहां पे आया था जबकि मेरी ऐज थी 23 के आसपास में। तो ऑलरेडी यह जो गोल्डन पीरियड जो है मेरा वो समाप्त हो चुका था। बाय द ग्रेस ऑफ ठाकुर मुझे इतना कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा यहां पे आकर के क्योंकि मैं ऑलरेडी पिछले जॉइ करने के चारप साल पहले से ही मैं योगा वगैरह सीख रहा था। मैंने योगा सीखना शुरू किया था। योगासन वगैरह मैं जब हाई स्कूल में पढ़ रहा था 12th के बाद में ही इमीडिएटली उस समय आई थिंक 17 18 मेरी साल की उम्र होगी। सो बाय द ग्रेस ऑफ ठाकुर वो एक मेरा एक फाउंडेशन था बोलकर के मुझे इतना तकलीफ नहीं हुआ। ज्यादातर भक्तों के साथ में क्या होता है कि एक बार आध्यात्मिकता में सीरियसली प्रवेशना शुरू करते हैं तो यह गोल्डन एज जो है हमारा वो कब का बीत चुका है? अभी यह एडवांस एज में संस्कार ऑलरेडी बन गए हैं। हम लोगों को संस्कार के सामने फाइट करना होता है। तो यह संस्कार के सामने फाइट करके हमको धीरे-धीरे करके यह तमस से मुक्ति प्राप्त करनी है। यदि हम तमस से मुक्ति प्राप्त नहीं करेंगे, यदि हम अपने विल पावर को कल्टीवेट नहीं करेंगे, तो देखिए कि हम लोग कभी भी आध्यात्मिक जगत में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे। तो किंतु देखिए कि एक बार आपको साइंस समझ में आ गया है कि इस तरह से सब कुछ है कि विल पावर के ऊपर में ही अल्टीमेटली सब खेल है। जितना आप विल पावर को कल्टीवेट करेंगे उतना ही आप सत्व की ओर कंसंट्रेशन की ओर जाएंगे। जितना कंसंट्रेशन की ओर जाएंगे उतना ही सत्व की ओर जाएंगे। जितना सत्व बढ़ेगा उतना ही इन टर्न यह विल पावर स्ट्रेंथन होता जाएगा।

हमें चाहिए पुरुषार्थ और आत्मविश्वास से भरी आत्मश्रद्धा, न कि कमजोरी पैदा करने वाली भक्ति

तो यह जो है स्वामी जी का यह जो बेसिक कांसेप्ट है गो बैक टू उपनिषद द शाइनिंग स्ट्रेंथनिंग ब्राइट फिलॉसोफी तो यह उपनिषद में आप देखिए कि किस तरह की आत्मश्रद्धा आपको सिखाई जाती है। बाद में यह वैष्णव और शाक्त जो सिस्टम है वह डेवलप हुई। उसमें वैष्णव सिस्टम में शरणागति को प्राधान्य मिला और यह शाक्त सिस्टम है। उसमें देवी पूजा को प्राधान्य मिला। देवी की आराधना को प्राधान्य मिला। किंतु ये दोनों में वैष्णव भगवान विष्णु की उपासना करते हैं। शाक्त है देवी की उपासना करते हैं। अल्टीमेटली दोनों का जो फाउंडेशन है शरणागति के ऊपर में बना है। अभी एक फ्री जो नेशन होता है, एक मुक्त राज्य जो होता है, एक इंडिपेंडेंट नेशन जो होता है, यह इंडिपेंडेंट नेशन के रहवासी निवासी यदि एक यह सब शरणागति की आराधना करें तो उनको कोई बुरा नहीं है उनके लिए। ऑलरेडी एक गुलाम देश है। गुलाम देश वाले शरणागति की आराधना करेंगे। वैसे तो बेचारे मार खाए हुए हैं। ऊपर से उनके सर पर शरणागति बिठा दो। तो वैसे ही तमस में डूबे हैं और ज्यादा डीप तमस में डूब जाएंगे। तो उनको चाहिए यह उपनिषद का संदेश जो कि सीधा आत्म तत्व के बारे में बात करता है। सीधा हमारे भीतर की जो आत्मश्रद्धा है, विल पावर है उसके बारे में बात करता है। देखिए यह जो इस के कुछ-कुछ वीडियोस आते हैं। आपने शायद देखे ही होंगे। वह बहुत सारे यूरोपियन कंट्रीज में इस पॉपुलर है और यह यूरोपियन लोगों को आप कीर्तन करते हुए देखेंगे तो वो एक देखना वो ठीक लगता है। क्यों? क्योंकि यूरोपियन लोगों में ऑलरेडी कैरेक्टर की स्ट्रेंथ है। इस कैरेक्टर की स्ट्रेंथ लेकर के यदि भगवान कृष्ण का वो नाम गुण कीर्तन करते हैं तो कोई बुरा इसमें नहीं लगता। भारत की जो परिस्थिति है वैसे ही जिसकी इच्छा हुई उसने आकर के हमको लात मार दी। फिर हम मंजीरा ले कीर्तन करेंगे ऊपर से तो फिर यह देखने को भी अच्छा नहीं लगता और फिर मन में हमेशा यह होता रहता है कि हम लोग इससे कभी ऊपर उठेंगे कि नहीं उठेंगे तो देखिए कि इसलिए भारत को अभी ये जो स्वामी जी बार-बार कहते हैं वही ये लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में ही कि भारत में ये क्या ये खोल है जो ये जो पखावज है मृदंग है यह सब नहीं बनता है क्या यह खोलकरताल जो है वो सब फेंक दो अभी थोड़ी देर के लिए यह मंजीरा बजा जाना। यह जो करुण भाव के करुण रस के यह जो गीत है, यह मधुर भाव है, वह सब कुछ समय के लिए दूर कर दो और शिव के भाव से आत्मश्रद्धा से और यह विल पावर से अपने को भर दो। तो यह स्वामी जी का मैसेज। इसीलिए स्वामी जी कहते हैं गो बैक टू योर उपनिषद्स द शाइनिंग द स्ट्रेंथनिंग द ब्राइट फिलॉसोफी एंड पार्ट फ्रॉम ऑल दिस मिस्टीरियस थिंग्स ऑल दिस विकनिंग थिंग्स यह जो मिस्टीरियस थिंग्स अर्थात कि यही सब रहस्यवाद रहस्यवाद सब तरह की ये जो शरणागति वाली फिलॉसोफी है उसमें पड़े हुए हैं। भगवान का यह स्वरूप है। स्वामी जी एक जगह पर कहते हैं कि हमने किया क्या है? शंख चक्र गदा पद्म पद्म चक्र शंख गदा ऐसा ही तो सब गोल-गोल घुमाते रहते हैं। तो यह सब छोड़ो अभी फिलहाल ये शंख चक्र गदा पद्म को छोड़ो और फिर वही जो ऋषियों का उपदेश है आत्म साक्षात्कार आत्म तत्व अद्वैत ज्ञान उसको अपनाओ। ऑफ कोर्स यहां पे स्वामी जी कोई भगवान विष्णु की अवगणना करने को नहीं कहते। स्वामी जी को तो पता है वह फेमस घटना वर्ल्ड फेमस घटना कि ठाकुर के अंतिम शैया पे मृत्यु शैया पे अंतिम समय में स्वामी जी उनके सामने बैठकर के सोचते हैं कि इतना जो ठाकुर को कष्ट हो रहा है इस समय यदि यह कह दे कि मैं अवतार हूं मैं अवतार हूं तो मैं यह मानूं। अभी यह स्वामी जी ने सिर्फ सोचा है। ठाकुर ने उनकी मन की बात पकड़ करके बड़े ही क्षीण स्वर से उत्तर दिया। जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण जो थे राम जो थे कृष्ण वही थे श्री रामकृष्ण। यानी कि भगवान विष्णु के ही अवतार श्री रामकृष्ण है। तो स्वामी जी जब ऐसा कुछ स्टेटमेंट देंगे तो उसका आशय बिल्कुल यह नहीं है कि भगवान विष्णु के बारे में कोई मंतव्य कर रहे हैं। वो कहते हैं कि यह जो विष्णु के चतुर्भुज रूप है चार हाथों में यह जो सब विविध आइटम्स है उस सब की चिंता करने के बजाय फिलहाल अपने आत्म तत्व के ऊपर में अपना जो सही स्वरूप है व्हाट इज माय ट्रू नेचर? उसके ऊपर में आप चिंतन कीजिए। बाद में जब हम एक सशक्त अपना पर्सनालिटी हो जाए, एक एक कोहिसिव कम्युनिटी लाइफ हो जाए, एक स्ट्रांग सिविलाइजेशन बन जाए। फिर आप जितना ही शरणागति में जाना चाहे आप जाइए ना। आपको कौन मना करता है? देखिए हमने ऑलरेडी

राष्ट्र निर्माण का आधार है — एक जिम्मेदार और सजग नागरिक समाज

डिस्कस किया था कि श्री रामकृष्ण एग्ेंंपलीफाई द इंडिविजुअल सर्च फॉर हायर ट्रुथ। मां शारदा देवी एग्ेंंपलीफाई आवर कम्युनिटी लाइफ एंड स्वामी विवेकानंदा एग्ेंंपलीफाई आवर सिविलाइजेशनल वैल्यूस सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क। तो क्या है कि यह पूरा स्पेक्ट्रम पे हमको आगे बढ़ना है। हमारी जो आध्यात्मिक जीवन है उसको भी परिपुष्ट करना है। जो कम्युनिटी लाइफ में यह आउटकास्ट है। यह हमारा आदमी है। यह इस कास्ट का है। वह इस कास्ट का है। वह हटा करके सबके प्रति एक समान सहकार से सबके प्रति सहृदयता से हमको बिहेव करना है। वह हो गया कम्युनिटी लाइफ। और यह जो सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क है एक प्रॉपर गवर्निंग सिस्टम हो, एक प्रॉपर जुडिशियरी हो, एक प्रॉपर आर्मी हो, प्रॉपर पुलिस सिस्टम हो, जितने भी इंस्टीटशंस हैं सोसाइटी में सभी इंस्टीट्यूशन अपना-अपना ठीक-ठीक काम करें। रामकृष्ण मिशन को क्यों रिलीफ करने की आवश्यकता पड़ जाती है? रामकृष्ण मिशन को क्यों हॉस्पिटल चलाना पड़ता है? रामकृष्ण मिशन को क्यों स्कूल चलाना पड़ता है? सामाजिक इंस्टीट्यूशन काम नहीं करते। बोल के ही तो हमको यह स्कूल और हॉस्पिटल चलाना है ना। वरना ठाकुर वहां दक्षिणेश्वर में बैठे थे। उन्होंने थोड़ी ना कोई स्कूल और हॉस्पिटल वहां पर खोला था। वह तो यंग लड़कों को वेदांत का उपदेश देते थे जो कि रामकृष्ण मिशन का सही कार्य होना चाहिए। एक के बाद एक धीरे-धीरे करके युवाओं तक पहुंचे और उनको अपना ये जो अमर वारसा है जो इमोर्टल हेरिटेज है वो उनको सिखाए। देखिए रिसेंटली ये जैसे रामकृष्ण भाव प्रचार परिषद है ना वैसे ही एक युवा प्रचार परिषद का एक निर्माण हुआ है। हमारे जो बड़े महाराज हैं यहां पे वो आज बेलूर मठ जा रहे हैं। उनका एक कन्वेंशन जैसा है। तो युवा भाव प्रचार परिषद युवा प्रचार परिषद। तो यह युवा प्रचार परिषद किस तरह से कार्य करेगा? किस तरह से वह सब आउटरीच होगी स्पेसिफिकली टू द यंग पीपल। तो हमारे जो प्रेजेंट जनरल सेक्रेटरी महाराज है उनका यह एक है कि युवाओं के प्रति हमारा ज्यादा से ज्यादा आउटरीच होना चाहिए। युवाओं के लिए रामकृष्ण मिशन को कार्य करना चाहिए। युवाओं को रामकृष्ण मिशन में आना चाहिए। क्योंकि ठाकुर का तो पूरा ये जो अपना जो फाउंडेशन है वो तो युवाओं ने ही डाला है ना। वही 16 साल के 17 साल के ये अखंडानंद जी है काली महाराज है शशि महाराज है शरद महाराज है यही तो सब खोका महाराज है लाटू महाराज है स्वामी जी है यही तो लड़के ठाकुर के पास आए थे ठाकुर ने उनका जीवन परिवर्तित किया योग ध्यान का उपदेश दिया बोलकर के ही तो ये पूरा फाउंडेशन स्टार्ट हुआ है ना तो ये दक्षिणेश्वर एकेडमी तो ये दक्षिणेश्वर एकेडमी दैट इज द मेन जॉब ऑफ रामकृष्ण मिशन नहीं कि ये हम लोग इंजीनियरिंग सिखाए नहीं कि हम लोग उनको बीएड बनाए आए नहीं हम उनको बीए बीकॉम की डिग्री दें नहीं हम उनका यह जो फीवर है डेंगू है यह सब ट्रीट करें इसके लिए तो सिविल सोसाइटी के इंस्टीट्यूशन होने चाहिए अमेरिका में जाकर स्वामी जी ने यह सब नहीं किया कि चलो यहां पे स्कूल चालू करो यहां पे हॉस्पिटल चालू करो यहां पे रूरल डेवलपमेंट का काम चालू करो एक नॉर्मल सोसाइटी होती है वहां पे नॉर्मल इंस्टीट्यूशन काम करते हैं नॉर्मल इंस्टीट्यूशन इस सोसाइटी की नॉर्मल जो नीड्स एंड नेसेसिटीज है फुलफिल करते हैं रिलीजियस इंस्टीट्यूशन जो होते हैं स्पिरिचुअल इंस्टीट्यूशन जो होते हैं उनका काम है एक्सक्लूसिवली इन द फील्ड ऑफ स्पिरिचुअलिटी। हां आप चैरिटी सिखाइए उसमें कोई प्रश्न नहीं है। किंतु हम लोग ये इंस्टीट्यूशन चलाएं। अब जैसे वृंदावन में अपनी हॉस्पिटल है या तो फिर यह नरेंद्रपुर में अपना ये एकेडमिक इंस्टीट्यूशन है। शारदा पीठ में एकेडमिक इंस्टीट्यूशन है। वो तो एक एब्नॉर्मेलिटी का परिणाम है। सिविल सोसाइटी इंस्टीटश ठीक-ठीक काम नहीं करते बोलकर के यह सब हमको करना पड़ता है। आइडियल वर्ल्ड आइडियल भारत में क्या होगा कि यह गवर्नमेंट है। नॉन गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन है। इतना सुंदर रूप से यह एकेडमिक इंस्टीटशंस चलाए। इतना सुंदर रूप से यह हेल्थ इंस्टीटशंस चलाए। हेल्थ एंड वेल बीइंग के इंस्टीटशंस। तो फिर रामकृष्ण मिशन विल फोकस सोनली अपॉन दी एक्टिविटीज अमोंग द यूथ। यह कल्चरल एक्टिविटी है। स्पिरिचुअल एक्टिविटी है। यह लिटररी एक्टिविटीज है। एक के बाद एक अच्छी किताबें पब्लिश करना यह अभी तो आजकल मल्टीमीडिया का युग है। तो ऑडियो वीडियो यह सब पब्लिश करना, मूवीस बनाना इसके ऊपर में थोड़ा सा हम ज्यादा भर दें। ज्यादा क्या उसके ऊपर में ही एक्सक्लूसिवली होना चाहिए। तो एनीवे अ दिस इज द थिंग कि स्वामी जी ने जिस यदि ठाकुर ने जो कहा उसको हम ठीक-ठीक फॉलो करते हैं। वी विल डेवलप आवर ओन पर्सनल इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी। मां ने जिधर जिस तरह से मां का जो लाइफ एंड टीचिंग है उसको ठीक-ठीक फॉलो करेंगे तो अपना जो कम्युनिटी लाइफ है वह कोहिसिव हो जाएगा। एक रूप हो जाएगा। कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं। हां, पैसा जिसके पास में है उसके पास में ज्यादा टैलेंट है। उसको लोग रिस्पेक्ट देंगे। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वो हायर कास्ट है। यह लोअर कास्ट है। उसको सोशल रिस्पेक्ट ज्यादा मिलना चाहिए। इसको लेस सोशल रिस्पेक्ट मिलना चाहिए। वो सब नहीं होना चाहिए। सो दैट इज वन थिंग। और स्वामी जी के कहे अनुसार सिविल सोशल सिविल सोसाइटी के ये इंस्टीटश ठीक-ठीक कार्य करने चाहिए। दैट वे ये तीनों मिलकर के भारत का और सिर्फ भारत का नहीं जगत का उत्थान होगा। तो यह किंतु कब होगा कि कुछ

आत्मविश्वास के बिना भक्ति अधूरी है; आत्मश्रद्धा ही उसकी आत्मा है

समय के लिए जब तक हम एक मिनिमम फाउंडेशन पर नहीं पहुंच जाते हैं तब तक तो हमको उपनिषद के संदेश को अपनाना होगा। यह शाइनिंग स्ट्रेंथनिंग ब्राइट फिलॉसोफी ये जो कितना सुंदर स्टेटमेंट है स्वामी जी का उसको हमको अपनाना होगा। और देखिए जो लोग अब जैसे हमारा खुद का क्लास में क्या होता है कि एक सप्ताह हम स्वामी जी को स्टडी करते हैं। फिर एक सप्ताह मां और फिर एक सप्ताह ठाकुर तो ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को हम स्टडी करते हैं। और कभी-कभी ऐसा लगता है कि ठाकुर जिस तरह से शरणागति का उपदेश देते हैं। मां जिस तरह से वो मातृभाव के बारे में जो मां का जीवन और कहानियां है तो फिर स्वामी जी का यह जो शाइनिंग स्ट्रेंथनिंग ब्राइट फिलॉसोफी है वो कहां पे मैच होता है? क्या कंट्राडिक्शन नहीं है ठाकुर की शरणागति और यहां पे शाइनिंग स्ट्रेंथनिंग ब्राइट फिलॉसोफी में तो मैं कहूंगा कि कंट्राडिक्शन अपेरेंटली है। हम किस लेवल पे हैं? अधिकारित्व अधिकारीवाद जिसको कहते हैं मैं यदि तमस में डूबा हूं तो मुझे सबसे पहले तो स्वामी जी के कहे अनुसार अपने विल पावर को अपने कैरेक्टर को अपने कंसंट्रेशन को स्ट्रेंथन करना होगा। उसके बाद में जब मैं मध्यम या तो उच्च अधिकारी हो जाऊं उच्च अधिकारी होने की जरूरत नहीं है। इवन यदि मैं मध्यम अधिकारी भी हो जाऊं तो फिर मैं दो पैरेलल ट्रैक पर चल सकता हूं। एक ओर स्वामी जी का शाइनिंग स्ट्रेंथनिंग फिलॉसोफी ऑफ वेदांत। दूसरी ओर ठाकुर का यह संपूर्ण शरणागति वाला मार्ग। किंतु देखिए कि ठाकुर की जो शरणागति है वो वेदांत की शरणागति है। इस तरह की शरणागति नहीं कि मैं दीन हूं। अधम हूं। मैं आपकी कृपा के बिना मेरा सत्यानाश हो जाएगा। इस तरह का नहीं। ठाकुर का है कि मैं तो मां का संतान हूं। मैं तो मां का प्रिय शिष्य हूं। मां को मुझ पर कृपा करनी ही होंगी। मैं यह प्रार्थना नहीं कर रहा हूं। मैं डिमांड कर रहा हूं। देखिए एक गरीब आदमी राजा के पास जाएगा तो बेचारा भीख मांगेगा, भिक्षा मांगेगा। जबकि एक छोटा बच्चा अपनी मां से कुछ खाना मांगता है तो वो डिमांड करेगा कि मां मुझे दो। मुझे भूख लगी है। मां को सब काम छोड़ के मुझे खाना खिलाना ही होगा। क्यों? क्योंकि मैं तो मां का प्रिय संतान हूं। तो वह उस तरह का ठाकुर का यह शरणागति है नहीं कि वह दीन हीन अधम भिक्षुक वाला शरणागति है। सो दैट थिंग ये जो कांसेप्ट है कॉनसेप्चुअल क्लेरिटी वो हमको रखनी है। टेक अप दिस फिलॉसोफी द ग्रेटेस्ट ट्रुथ आर द सिंपलेस्ट थिंग्स इन द वर्ल्ड सिंपल एस योर ओन एकिस्टेंस। ये वेदांत की फिलॉसोफी आत्मज्ञान आत्मश्रद्धा ब्रह्म ज्ञान की फिलॉसोफी को एक्सेप्ट करो। जीवन में जो सर्वोच्च सत्य होते हैं, वह सहज सरल होते हैं। इवन एक बच्चा भी उसको समझ जाता है, समझ सकता है। उसके लिए कोई आपको पीएचडी पीएचडी करने की कोई जरूरत नहीं है। सिंपल एज योर ओन एग्जिस्टेंस। यदि मैं जीवित हूं। इतना तो मुझे समझ में आता है। तो फिर क्यों नहीं मुझे यह वेदांत का जो बेसिक सत्य है कि मैं जीवित हूं। एक ऑन वन हैंड ऑन द अदर हैंड कि मैं आत्मन हूं। यह दोनों बातें मुझे सहज सरल रूप से समझ में आ जानी चाहिए। द ट्रुथ्स ऑफ द उपनिषद्स आर बिफोर यू टेक देम अप लिव अप टू देम एंड द सेल्वेशन ऑफ इंडिया विल बी एट हैंड। उपनिषद के जो सत्य है उपनिषद के यह जो संदेश है आपकी नजर के सामने है। उनको ग्रहण करो। उनके अनुसार अपना जीवन ढालो और यदि ऐसा करेंगे तो देखिए कि भारत का जो नवनिर्माण है, भारत का जो उज्जवल भविष्य है वो एकदम हमारी नजर के सामने प्रकट हो जाएगा। देखिए ये उपनिषद का पाठ हम करना शुरू करते हैं तो बहुत बार हम हमारे मन में एक ऐसा होता है कि चलो हम शंकराचार्य से शुरू करते हैं शंकर भाष्य से कि हम लोग उपनिषद का पाठ शुरू करते हैं और फिर एक बार शंकर भाष्य में प्रवेश करेंगे तो इस तरह से वाद प्रतिवाद आर्गुममेंट की मायाजाल में फंस जाएंगे कि उसमें से यह लोग कभी निकलेंगे ही नहीं तो इस तरह से भी उपनिषद का पाठ नहीं करने देखिए उस तरह से पाठ करने की जरूरत है किंतु उन लोगों के लिए जो कि उच्च अधिकारी है यदि हम आम आदमी के लेवल पर है सामान्य अधिकारित्व के लेवल पर है तो स्वामी जी के जो उपदेश है उसके माध्यम से ही हमको उपनिषद पढ़ना है और वो उपदेश है स्वामी जी के जो चार योग है प्लस लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा प्लस लेटर्स ये जो फोर प्लस टू ये सिक्स जो किताबें हैं उसके भीतर में जो स्वामी जी का संदेश है वि इज यह जो उपनिषद का जो संदेश है उसको डिस्टिल करके इस चार योग और यह लेटर्स और लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा उसमें दिए हुए हैं। इसको पहले स्टडी कीजिए। पहले अपना कैरेक्टर स्ट्रेंथन कर लीजिए और उसके बाद में शां भाष्य है ना कि यह भाव साधना है जो कुछ भी करना है वह बाद में करते रहिए। मेरे खुद के जीवन में मैंने अनुभव किया है कि स्वामी जी को पढ़ने के बाद में और पहले से ही एक तो मेरे माइंड में था ही कि मैं गरीब लोगों की सेवा करूंगा और फिर मैंने स्वामी जी को पढ़ा और फिर बाद में मैं रांची गया। रांची में ट्राइबल डेवलपमेंट मैंने किया। तो वो ट्राइबल डेवलपमेंट करते-करते मेरा जो फाउंडेशन है वो इस तरह से बन गया कि अभी जब मैं रामकृष्ण मिशन में वापस आया तो ठाकुर और मां का संदेश समझना मेरे लिए बहुत ही सहज हो गया था। इनफैक्ट मैं वापस आने के बाद में ही मुझे यह मां का संदेश समझ में आया है। उससे पहले मैंने मां को पढ़ा था तो बड़ा ही बोरिंग लगता था। ना ही फिलॉसोफिकल डेप्थ दिखती थी ना ही कोई वो रियलाइजेशन के कोई स्पार्क दिखते थे। तो मैंने सोचा मां के जीवन में है क्या? तो वो रांची जाने से पहले किंतु जब मैं रांची से वापस आया ट्राइबल डेवलपमेंट करके जो एक लेवल पर आ गया मेरा संस्कारों का एक लेवल तो उसके बाद में जब मैंने मां को पढ़ना शुरू किया इमीडिएटली फटाफट फटाफट करके जैसे कि वो बंद दरवाजे खुलना कैसे शुरू होते हैं? इस तरह से खुलना शुरू हुआ और फिर मां के प्रति मेरी शरणागति इतनी बढ़ गई। किंतु वह पहले नहीं हुई थी। यह रांची के बाद में ऐसा हुआ। तो क्या है कि यह जो अपने आध्यात्मिक जीवन के यह जो उच्च सत्य है आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च साधनाएं हैं दास्य भाव साधना सख्य भाव साधना या तो फिर यह मधुर भाव साधना यह संतान भाव मातृ भाव वह सब हमको तभी समझ में आएगा जबकि एक बार स्वामी जी के कहे अनुसार हम लोग एक तो उपनिषद में उपनिषद की ये स्ट्रेंथनिंग फिलॉसोफी में विश्वास करें और फिर उसका जो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है प्रैक्टिकल वेदांत की सेवा करके अपने संस्कारों को शुद्ध करें। यह जब तक नहीं करेंगे और सीधा हम यह सब हायर डायमेंशन में प्रवेशने का प्रयास करेंगे तो होगा क्या? पता है अपना फाउंडेशन है ना हमेशा के लिए कच्चा रह जाएगा। तो मैं यह ठाकुर ने वो जो उदाहरण दिया ना स्क्विरल का कि वो दीवार पर चढ़ने का प्रयास तो करती है किंतु उसकी पूंछ के ऊपर में एक पत्थर बांधा हुआ है। तो जितना थोड़ा सा भी ऊपर उठती है तो फटाक करके पत्थर उसको नीचे खींच लेता है। तो वैसे ही यह सेवा योग का फाउंडेशन ठीक-ठीक आप डालेंगे। यह जो स्वामी जी के आदर्श का स्वामी जी के प्रैक्टिकल वेदांश का आदर्श वो ठीक-ठीक अपने जीवन में डालेंगे। तो फटाफट फटाफट करके वो स्क्विरल की तरह आप ऊपर उठ जाएंगे। और यदि नहीं डालेंगे तो स्क्विरल की पीठ पर वो पूंछ पर जो पत्थर बंधा है तो वैसे ही फटा बार-बार हम नीचे गिरते आएंगे। सो दैट इज मेरा जो एक अंडरस्टैंडिंग है अबाउट रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर ये क्योंकि हम लोग तीनों को स्टडी साथ में करते हैं। मैं हमेशा यह प्रेफर करता हूं कि सिर्फ स्वामी जी को स्टडी मत करो। सिर्फ ठाकुर को स्टडी मत करो। सिर्फ मां को स्टडी मत करो। इस ऐसा आप करेंगे ना तो आपको एक बायास्ड व्यू पॉइंट एक आपका डेवलप हो जाएगा। आपके माइंड में जो एक प्रॉपर एक स्पेक्ट्रम डेवलप होना है। एक जो एक होल होलिस्टिक पर्सनालिटी आजकल जिसको कहते हैं फ्रेगमेंटेड पर्सनालिटी और होलिस्टिक पर्सनालिटी। फ्रेगमेंटेड पर्सनालिटी में कुछ-कुछ चीजों में वो काफी टैलेंटेड है। बाकी सब चीजों में उसका बड़ा डेफिशिएंसी है। कोई यदि आदमी बहुत टैलेंटेड है तो उसका पर्सनल लाइफ बड़ा ही डिसोल्यूट है। किसी का पर्सनल लाइफ बड़ा अच्छा है तो उसमें ज्यादा स्किल वगैरह कुछ नहीं है। तो हमको फ्रेगमेंटेड अपनी साधना ना हो जाए। एक होलिस्टिक साधना रहे। इसके लिए ठाकुर मां स्वामी जी तीन को एक साथ में पढ़ना है। तीनों का क्या प्रयोजन है? कहां पर कैसे अप्लाई करना है? एक साथ में देखना है। जिससे क्या होगा कि अपना आध्यात्मिक जीवन अच्छे से डेवलप होगा। तो आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। ओम