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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

ज्ञान योग स्वामी विवेकानन्द Cosmos Microcosm 26 Jan 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णा यते नमः स्वामी जी के ज्ञान योग का पाठ कर रहे थे देखा कि किस तरह से स्वामी जी आत्मन के स्वरूप की वर्णना करते हैं अभी तक पूरा ब्रह्मांड पूरा यूनिवर्स हमने घूम करके देख लिया कि कहां वह सृष्टि का आदि सृष्टि का अंत सृष्टि का विकास और उसका डेवलपमेंट सब कुछ मने और फिर हमारे देह के भीतर में यह ज्ञानेंद्रिय फिर मन बुद्धि और इसके बाद में मैंने सबका वर्णना कर दिया फिर आखिर में कहीं जाकर के आत्मन का वर्णन प्रारंभ होता है सांख्य में देखेंगे कि किस तरह से 24 तत्त्वों की बात कही गई है पंच प्राण पंच महाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय और चार मन बुद्धि चित्त और अहंकार ये 24 का वर्णन होने के बाद में आखिर में जो चेतन तत्व है इन सबके परे जड़ 24 तत्त्वों के परे जो चेतन तत्व है पुरुष इसका वर्णन सांख्य में आता है तो यहां पर भी स्वामी जी ने आज के मॉडर्न 24 तत्त्वों के हिसाब से यह यूनिवर्स तारे यह बिग बैंग फिर यह बिग क्रंच और यह फिर इवोल्यूशन और फिर यह हमारा इंटेलेक्ट और फिर हमारा माइंड हमारा ब्रेन सब डिस्कस कर लिया आखिर में आते हैं आत्मन के ऊपर में तो स्वामी जी जिस तरह से वर्णन कर रहे हैं हम कल पढ़ रहे थे कि आत्मन सत नहीं है सत स्वरूप है मने जैसे कि कहा जा सकता है कि इस पेंसिल का मेन फैक्चरिंग हुआ है इस पेंसिल को हमने कहीं से जो था ही नहीं एक लकड़ी थी और फिर यह इसके भीतर में ग्रेफाइट जो होते हैं तो लकड़ी और ग्रेफाइट वुड एंड ग्रेफाइट जिसकी और ये उसके ऊपर में पेंट है तो केमिकल पेंट उसको डेकोरेट करने के लिए बनाया गया है तो यह केमिकल पेंट यह वुड यह ग्रेफाइट इन सब में से ही इसको मैन्युफैक्चर किया गया है आत्मन मैन्युफैक्चर नहीं होता ना ही इसका बर्थ होता है ना ही डेथ होता है यह सत स्वरूप है एक्जिस्टेंस उसका स्वरूप है यह नॉलेज नहीं है नॉलेज कहीं से प्राप्त नहीं करता हम लोग स्कूल में जाकर के नॉलेज प्राप्त करते हैं इसके साथ में ऐसा नहीं है यह ज्ञान स्वरूप है और हम लोग कहीं यह जो हमारी हॉबी होती है हम कहीं कोई इवेंट में जाते हैं गेट टुगेदर होता है फेस्टिवल में जाते हैं आनंद प्राप्त करने के लिए आत्मन बाहर से आनंद प्राप्त नहीं करता वह आनंद स्वरूप है आगे में स्वामी जी कहते हैं अगेन इट मे बी आस्क ऐसा पूछा जा सकता है कि वई शल वी टेक दिस फॉर ग्रांटेड जैसे कि हमारे शास्त्र में कहा गया है कि आत्मन है और यह आत्मन सत स्वरूप चित स्वरूप आनंद स्वरूप है तो जो कहा है तो उसको हम मान क्यों ले भाई हम प्रश्न कर सकते हैं कि इसका प्रूफ क्या है शैल वी एडमिट दैट द सोल हैज नॉलेज ब्लेसेडनेस एक्जिस्टेंस एज इट्स एसेंस एंड हैज नॉट बरोड देम हम यह कहां क्यों मान ले कि सत चत और आनंद आत्मन यह सब मय है सत मय है चिमय है आनंदमय है ऐसा हम क्यों मान ले जिस तरह से चांद सूरज का प्रकाश उधार लेता है ऐसे हम तो आर्गुमेंट कर सकते हैं कि प्रकाश भी तो सूरज का भी तो कोई नेचर नहीं है सूरज चांद ने जैसे प्रकाश उधार लिया तो सूरज भी उधर ले सकता है जिस तरह से अपना मन अपना ब्रेन यह आईज यह इयर्स आंख कान नाक जिस तरह से आत्मन के प्रकाश से चलते हैं ऐसा जो हम दावा कर रहे हैं तो हम तो ऐसा भी तो कह सकते हैं कि आत्मन ने खुद ने अपना प्रकाश अपनी चेतना अपनी कॉन्शसनेस और कहीं से उधार ले सकती ले सकी हो जैसे कि मन ने किया है तो यह भी तो हो सकता है इट मे बी आर्गू व्हाई नॉट से दैट द सोल्स लुमिनस द सोल्स ब्लेसेडनेस द सोल्स नॉलेज आर बरोड इन द सेम वे इज द लुमिनोजिटी ऑफ द बॉडी इज बरोड फ्रॉम द माइंड ऐसी आर्गुमेंट कर सकते हैं कि आत्मन की लुमिनोसो अर्थात कि ज्ञान इसी तरह से उधार लिया गया है जिस तरह से अपने शरीर में प्रकाश कहीं से उधार लिया है यह शरीर चेतन है इसके भीतर में इसके भीतर में जीवन है हमको पता चल ही जाता है एक डेड बॉडी और एक जीवंत मनुष्य के भीतर में आप देखेंगे कि डेड बॉडी है उसके हाथ पैर आंख कान नाक सर के बाल इवन उसका हार्ट वगैरह परफेक्टली फंक्शन कर रहा है हो सकता है किंतु उसके भीतर में जीवन नहीं है वो जीवन कहीं से शरीर के जड़ शरीर जो अपना है हाय अस्थियां मज्जा यह मांस वगैरह का बना हुआ मसल्स का बना हुआ यह अपना जीवन और कहीं से उधार लेता है तो हम तो ऐसा भी तो कह सकते हैं कि अभी तक जो आर्गुमेंट हमारे शास्त्र में होती आई है कि आत्मन इसमें जीव दान य जीवन दान देता है इसको प्राण प्रतिष्ठा ये जो मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई तो ये अपने शरीर में प्राण प्रतिष्ठा आत्मन करता है यह जो अपने शास्त्र में कहा गया है तो हम तो सामने में काउंटर आर्गुमेंट कर सकते हैं कि आत्मन के भीतर में भी प्राण या तो फिर जीवन या तो फिर चेतना और कहीं से आई हो जैसे कि ईश्वर ने दी हो यह क्या है द्वैत का कांसेप्ट है यह द्वैत हमको क्या कहता है कि अल्टीमेटली देखा जाए तो ईश्वर ही सब कुछ है इस विश्व में और ईश्वर के आशीर्वाद से चेतना से प्रकाश से सारा जगत प्रकाशमान है तो इसके अगेंस्ट में ये अद्वैत की डेफिनेशन है पहले तो सांख्य ये कहता है कि नहीं हमारे भीतर में जो पुरुष है वही चेतन वंत है वही प्राण वंत है उसी के भीतर में यह चे कॉन्शसनेस है यह पहली आर्गुमेंट तो यह स्टार्टिंग किया था सांख्य ने और बाद में अद्वैत ने उससे भी एक स्टेप ऊपर जाकर के क्या कहा कि जैसे सांख्य योग सांख्य फिलोसोफी या तो सांख्य दर्शन कहता है कि हम सबके के भीतर में एक एक आत्मन है तो ऐसा नहीं हम सबके भीतर में जो आत्मन है वो एक ही है एक ही आत्मन का विभिन्न विभिन्न प्रकाश प्रकाश की अलग-अलग किरण जैसे कि कोई आप लोग कोलकात्ता में बैठे हैं तो आपके घर के ऊपर में भी वही सूरज का प्रकाश आ रहा है जैसे यहां पर राजकोट में बैठ कर के हमारे आश्रम के ऊपर में ऐसा नहीं है कलकाता के ऊपर में प्रकाश करने वाला सूरज कोलकात्ता का है और राजकोट के ऊपर में प्रकाश डालने वाला सूरज राजकोट का है सूरज एक ही है वही एक ही सूरज कोलकाता पर भी प्रकाश डालता है राजकोट के भी ऊपर डालता है बंबई के ऊपर में भी डालेगा न्यूयॉर्क के ऊपर में भी डालेगा टोक्यो के ऊपर में भी डालेगा यानी ऐसा कहने की जरूरत नहीं है कि कहां इतना सुदूर इतना दूर न्यूयॉर्क है कहां वह पूर्व में पश्चिम में यह टोक्यो है पूर्व में तो मने इतने दूर दूर यदि शहर होंगे तो निश्चय इनके ऊपर में डाल प्रकाश डालने वाला सूरज भी तो अलग-अलग होना चाहिए बट वी नो फॉर अ फैक्ट कि सूरज एक ही है तो यहां पे भी ऐसा है कि सर्वप्रथम यह डेवलपमेंट इसको ब्रेक थ्रू कहते हैं आजकल की लैंग्वेज में साइंस की लैंग्वेज में कहते हैं ब्रेकथ्रू एक बिल्कुल नया आइडिया हमने डेवलप किया जैसे आजकल ये एआई में ब्रेक थ्रू हो रहा है जेनेटिक इंजीनियरिंग में ब्रेक थ्रू हो रहा है बिल्कुल नए-नए आइडियाज तो वैसे ही पहले हम मनुष्य सभ्यता हम जब जंगल में रहते थे नोमार्क एक ट्राइबल अपना सोसाइटी था उस समय हम सोचते थे कि कहां भगवान आकाश में रहते हैं उसका नेचर पता नहीं किस तरह का है विचित्र कब कहीं गुस्सा हो जाए कब कहीं खुश हो जाए खुश होने से कुछ भी दे सकता है नाराज होने से जंगल में आग लगा देगा कहीं फ्लड लाएगा फेमिन लाएगा पडेम लाएगा लोकस्ट लाएगा जंगली पशु लाएगा क्या-क्या लाएगा हमको मारने के लिए तो ऐसे ईश्वर को बलिदान दे कर के खुश रखना है कभी बकरे का बलिदान दे दिया या कोई कोई कल्चर होता था वहां पर इंसान को भी बलिदान दिया जाता था मनुष्य बलि की प्रथा थी कोई कोई ट्राइबल सोसाइटीज में तो इस तरह से हमने ईश्वर की कल्पना करते आए हैं कि कहां वो आकाश में सुदूर बैठा हुआ है जैसे एक सूरज है ना आकाश में हमको दिखता है इतने दूर तो सूरज के साथ-साथ में भगवान भी रहते होंगे किंतु यह सांख्य का ब्रेक थ्रू है वो कहता है कि नहीं पूरे विश्व का एनालिसिस कर दिया 24 तत्त्वों के माध्यम से और फिर आखिर में कहा कि चेतन जो है चेतना है कॉन्शसनेस मनुष्य के भीतर में ही है मनुष्य के हृदय में ही है अंग मात्रमो यह जो अपने शास्त्र में कहा गया है कि अपने हृदय के भीतर में ये अंगूठे की साइज का एक पुरुष रहता है ये मेटाफोरिकल काव्य काव्यात्मक डिस्क्रिप्शन है अब शरीर का हार्ट का डिसेक्शन करने से कोई अंगूठे की साइज का पुरुष नहीं दिखने को मिलेगा आत्मन नहीं देखने को मिलेगी ये पूरा हमारे पूरे शरीर के भीतर में आत्मन व्याप्त है किंतु ऐसा ये सांख्य का ब्रेक थ्रू था और इसके ऊपर में जाकर के वेदांत का एक नया ब्रेक थ्रू आया कि जिस आत्मन को आप कहते हैं कि हां एक तो सबसे पहले तो कह दिया कि आत्मन कहो ना कि जीवन कहो ना कि प्रेरणा कहो ना कि ये कॉन्शसनेस कहो वो आकाश में नहीं है वो ईश्वर की ओर से हमारे भीतर में नहीं आती हमारे ही भीतर ही हमारा आत्मन स्वयं प्रकाशित है सेल्फ लुमिनस है ज्ञानम आनंदमय चिमय वही है तो यह तो पहला किंतु बाद में वेदांत कहता है कि आप जैसे यह इमेजिन करते हैं ना कि सबके भीतर में एक एक पुरुष है या तो फिर सबके भीतर में एक एक आत्मन है ऐसा नहीं एक ही आत्मन है जो कि सबके भीतर में विराजमान है जब यह ब्रेक थ्रू अब पहला ब्रेक थ्रू तो फिर भी हम लोग थोड़ा थोड़ा बहुत चलो मान लेते हैं कि हां आप कहते हैं कि मनुष्य के शरीर में प्राण कहां से आता है तो प्राण इसके भीतर में जो आत्मन वही प्राण इस शरीर में जड़ देह में फूंकतायन मान लिया किंतु एक ही आत्मन सभी के हृदय में है ये तो हमको विश्वास करना मुश्किल हो रहा है हम यह स्वीकार करते हैं कि हां एक आकाश में भगवान बैठे हैं वो शायद एक हो सकते हैं और वो सबको जैसे कि एक राजा होता है ना वो यदि कोई बड़ा खुशी का माहौल होता है तो सबको वो अपना राज भंडार खोल देता है जिसको जो चाहे वो ले जाओ वो ठाकुर की कहानी है वो मां सीता की कि मां सीता ने देखा कि अरे राम राज्य में गरीब लोग भी रहते हैं तो उन्होने भगवान राम को कहा कि अरे प्रभु आप तो इतने धनवान है कुबेर की कुबेर स्वयं आपका धन भंडार मैनेज कर रहा है आपका भंडार खोल दीजिए जिसको जो लेना हो ले जाने दीजिए तो भगवान राम ने कहा मैया ऐसा करने से सब केस फैल जाएगा किंतु मां ने तो सुना नहीं मां सीता ने तो भंडार खोल दिया अपना जिसको जो चाहे वो ले जाओ तो सबने इतना धन लेकर के अपने घर में गए दूसरे दिन से सबने काम करना बंद कर दिया किसान ने खेत जोतना बंद कर दिया प्लंबर ने प्लंबिंग बंद कर दिया वह जो मकान जो बनाता है वह कड़ी जो सब लोगों ने अपना काम बंद कर दिया फिर राजमहल में जब वो बारिश के वजह से यह पानी निकलना शुरू हुआ छत में से तो मां ने कहा मां सीता ने कि जाओ बुलाओ किसी को रिपेयर करने के लिए किंतु अभी कौन रिपेयर करने वाला है सबके पास में इतना धन है कि काम करने की जरूरत ही नहीं है इससे फिर नाराज हो कर के मा सीता ने कहा कि कर दो भंडार बंद कर दो लगाओ सबको फिर से काम में ऐसा थोड़ी ना चलेगा जगत तो मान लीजिए कि ऐसा तो हम मान सकते हैं कि एक भगवान है उसके एक बहुत बड़ा रत्न भंडार है बहुत बड़ा एक प्राण का भंडार है उसमें से जिस जो भी आता है हम सबको थोड़ा-थोड़ा हम सबके भीतर में इस जड़ देह के भीतर में प्राण संचार कर दे सकते हैं ये तो हमको दिखता है वो ये सब है किंतु अभी जब कहेंगे कि नहीं वह प्राण संचार करने वाला आत्मन है हमारे शरीर में बैठा हुआ तो हमको थोड़ा सा तो डाउट लगता है किंतु फिर भी ये इलॉजिकल नहीं है माने अपने जो सामान्य डे टू डे काउंटर इंटूटिव नहीं है जिसको आजकल की लैंग्वेज में कहा जाएगा ये क्वांटम डायनेमिक्स इज काउंटर इंटूटिव हमारा डे टू डे एक्सपीरियंस है उससे बिल्कुल विरोधाभास एक्सपीरियंस का रिजल्ट हमको क्वांटम डायनेमिक्स या रिलेटिविटी में दिखता है तो ये जिस तरह से मॉडर्न फिजिक्स काउंटर इंटूटिव है वैसे ही वेदांत भी काउंटर इंटूटिव है यहां तक आपने मान लिया कि चलो भगवान आकाश में बैठे हैं उसकी वजह से अपने हृदय में बिठा दो किंतु सबके हृदय में तो फिर एक-एक भगवान को बिठाना पड़ेगा किंतु ये नहीं वेदांत इसके बाद का नेक्स्ट ब्रेक थ्रू नेक्स्ट स्टेप लाकर के क्या कहता है कि आत्मन एक ही है ब्रह्मनन कहो ना कि आत्मन कहो एक ही है उसी का प्रकाश हमारे ह्रदय के भीतर में है किंतु जब ऐसा कहेंगे तो प्रश्न होगा कि फिर ईश्वर और आत्मन में डिफरेंस क्या है यह तो बताओ भईया तुम पूरा ब्रह्मांड घूम कर के आए फिर वही वही चीज आपने फिर से बता दी हम लोग तो आज तक तो यही कहते थे कि ईश्वर एक ही है एक ही ईश्वर सबके भीतर में प्राण संचार करता है तुमने इतना सारा सांख्य फिलोसोफी डेवलप किया इतना बड़ा वेदांत फिलोसोफी डेवलप किया गोल घुमा कर के तुम वहीं पे आ गए जहां से स्टार्ट किया था कि हां एक ईश्वर एक ईश्वर सबको प्राण सं प्राण दान करता है तो वही तो तुम कह रहे हो ना कि एक ही ब्रह्मण है या एक ही आत्मन है जो कि सबके भीतर में प्राण संचार करता है नया क्या है इसमें नया है जिस तरह से बीच में यह ईश्वर एक है और ब्रह्मण एक है इन दोनों के बीच में जो सांख्य फिलोसोफी है उसका जो ब्रेक थ्रू कांसेप्ट है कि आत्मन अपने शरीर में है अपने हृदय में है हमारे भीतर में ही है हम हमारा सही स्वरूप है वह हम कहीं बाहर से नहीं लेकर आते हमारा ही सही स्वरूप यह सत चत और आनंद है ईश्वर हमको भिक्षा में नहीं देता है जैसे कि राम राज्य में जैसे ये किसान थे नकी कड़िया मजदूरी करने वाले थे जो लोग भी थे इनको भग मा सीता ने भंडार खुलवा करके सबको कुछ ना कुछ धन दक्षिणा दिलवा दी इस तरह से हमको वो नहीं मिलता ये हमारा जैसे कि डेमोक्रेसी है हम गवर्नमेंट के आज में जो संपत्ति है वह तो हमसे टैक्स में ली हुई है ऐसा नहीं है कि राजाशाही है और राजा का भंडार है हमको भिक्षा में देते हैं हमको दान में देते हैं हमको उपकार करके देते हैं डेमोक्रेसी में पीपल ओन द एसेट्स ऑफ गवर्नमेंट गवर्नमेंट की जितनी भी संपत्ति है उसके ऊपर में सही अधिकार तो म हम सिटीजंस का है तो यहां पे भी डेमोक्रेटाइजेशन हो गया ये अपने धर्म के धार्मिक फिलोसोफी का इस सा ख और आत्मा वेदांत के आने से कि हमको हमारा जो स्वरूप है हमारे भीतर में प्राण है चेतना है आनंद है ज्ञान है वह कोई ईश्वर दया करके हमको नहीं देता वह हमारा सही स्वरूप है जैसे ही हमारे सामने से अज्ञान का पर्दा हट जाएगा वैसे ही हमारे सही स्वरूप की प्राप्ति होगी तो अच्छा अभी आपने यह तो कह दिया कि अच्छा एक ईश्वर नहीं आत्मन है और आत्मन हमारा सही स्वरूप है किंतु यह तो सिर्फ एक क्या क क्या कहेंगे कि शब्दों की ही तो यह मारामारी है माने ये तो इ अ ट्रिक ऑफ वर्ड्स ऐसा ही तो कहेंगे आपको डिफरेंस क्या है माने ईश्वर दे आपके भीतर में प्राण संचार करें ईश्वर आपको ज्ञान दे ईश्वर आपको आनंद दे ईश्वर आपको अस्तित्व दे या तो फिर आपके जो आपकी आत्मन है वो देती है शब्दों के अलावा डिफरेंस क्या है यदि आप यह कहे कि एक ही आत्मन है तो सभी के भीतर में अलग-अलग पुरुष है तो फिर भी तो थोड़ा बहुत हम लॉजिकली उसको एक्से कर सकते हैं जैसे हम गाड़ी चलाते हैं तो सभी गाड़ी के भीतर में एक ही एक एक वो पेट्रोल की टंकी रहती है आपकी गाड़ी में आप पेट्रोल भरवाए मेरे पास गाड़ी होगी तो मैं मैं अपनी गाड़ी में अपने से पेट्रोल भरवा हंगा यदि कोई ऐसा कहेगा कि एक ही बड़ी बहुत बड़ी टंकी है उसमें पेट्रोल भरवा दो सभी गाड़ियां चलेगी तो वो कैसे होगा माने वो तो वो ने लॉजिक में फिट नहीं बैठता है तो ये ये कि यह कहना कि अपने अपने अलग-अलग भीतर अपने भीतर में एक-एक चेतन स्वरूप एक सत्ता है यहां तक तो मान सकते हैं किंतु एक चेतन सत्ता है वह भी अपने भीतर में है तो फिर हम बोलेंगे कि अरे भाई ये शब्दों की रमत तो हो गई एक ईश्वर है हम लोग कह रहे हैं तुम कह रहे हो एक ब्रह्मण है डिफरेंस कहां पे है ये तो शब्दों की रमत के अलावा वेरीज द डिफरेंस तो डिफरेंस बहुत बड़ा है क्या डिफरेंस है यदि ईश्वर बाहर में है तो उनको प्राप्त करने के लिए हमको ज्ञान हमको कर्म करना पड़ता है जैसे कि मुझे यहां से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करनी होगी तो मुझे मेहनत करके यहां से जर्नी करके कैलाश मानसरोवर जाना होगा किंतु मान लीजिए कि मैं कैलाश मानसरोवर के वही मानसरोवर के किनारे ही रहता हूं प्रतिदिन उठकर के कैलाश का दर्शन होता है और एक दिन ऐसा हुआ कि सर पर कुछ चोट लगी और एमनेसिया आ गया वो मेरी याददाश्त चली गई अभी मैं अपने मन में जो एक पुरानी एक स्मृति है कि अच्छा कैलाश मान सरोवर जाना है कैलाश मान सरोवर जाना है तो मानसरोवर के चारों ओर में चक्कर लगाते लगाते बोल रहा हूं कहां है मानसरोवर कहां है कैलाश कहां है प्रभु शिव तो ऐसा बोलते सडन कोई साधु वहां पर तपस्या कर रहा होगा मुझे चिल्लाकर बोलेगा अरे पगले तुम यहीं पे हो तुम कैलाश सरोवर ये कैलाश पर्वत के नीचे मानसरोवर के किनारे पे ही हो जैसे ही उसने चिल्ला के कहा मेरी याददाश्त वापस आ गई और हां मैं तो यहीं पे याद आ गया तो दिस इज द क्रुशल डिफरेंस यदि आप ये कहेंगे कि ईश्वर एक है और वह हमारे भीतर में प्राण संचार करते हैं और यह कहेंगे कि ब्रह्मण भी एक है और वह हमारे भीतर प्राण संचार करते हैं तो यह सिर्फ शब्दों की रमत नहीं है हमारी साधना के ऊपर में इसका डायरेक्ट इफेक्ट होता है डायरेक्ट इसका असर होता है ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमको गुरु के द्वारा प्रदत्त महावाक्य सुनकर के ही हमारे भीतर में ज्ञान आ जाएगा कि हां मैं ब्रह्मण स्वरूप हूं मन ही मेरा सही स्वभाव है मेरी सही प्रकृति सत चित आनंदमय है मुझे किसी ईश्वर की दया के ऊपर में बैठ कर के राह देखने की जरूरत नहीं यहां पर रामराज्य में रहते हैं एक दिन मां सीता को मां बड़ी खुश हो गई उन्होंने कहा भंडार खोल दो जिसको जो चाहे वो ले लो दूसरे दिन मां सीता नाराज हो गई और भंडार बंद करवा दिया तो उनकी खुशी या नाराजगी के ऊपर में मेरी इनकम डिपेंडेंट नहीं है मैं सेल्फ एंप्लॉयड हूं यहां पे ऐसा माने ये पूरा एक देखिए कि दर्शन शास्त्र का कैसा एक पूरा स्पेक्ट्रम हमको भारतीय आध्यात्मिकता में देखने को मिलता है पहले की एक ट्राइबल फिलोसोफी उसके बाद में कहेंगे कि सांख्य उसके बाद में कहेंगे कि वेदांत तो यह पूरा जर्नी इंटेलेक्चुअल जर्नी हमारी नजर के सामने से यहां पे निकलता है तो स्वामी जी हमारे सामने सब एक के बाद एक आर्गुमेंट करके कहते हैं स्वामी जी कहते हैं कि जिस तरह से हम यह दावा करते हैं कि यह जड़ शरीर के भीतर में आत्मन ने प्राण संचार किया है तो हम ऐसा दावा क्यों नहीं कर सकते कि यह आत्मन के भीतर में प्राण संचार करने वाला ईश्वर है हम ऐसा दावा क्यों नहीं करेंगे ऐसा स्वामी जी हमको एक आर्गुमेंट करके कहते पूर्व पक्ष उत्तर पक्ष जैसे शंकराचार्य का भाष्य आप पढ़ेंगे उपनिषद के ऊपर में ब्रह्मसूत्र के ऊपर में तो य सब पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष चलता रहता है शंकराचार्य स्वयं आर्ग क्योंकि उन्होंने तो बहुत बहुत सारे लोगों के साथ आर्गुमेंट किया था तो जब टेक्स्ट लिखने को जाएंगे तो पहले तो मूल सिद्धांत समझा दिया उसके बाद में इस सिद्धांत के सामने क्या-क्या उन लोगों को आपत्ति हो सकती है वह एक के बाद एक लिखना शुरू किया क्योंकि उन्होंने ऑलरेडी बहुत सारा डिबेट कर लिए थे वरा नगर मठ का कुछ कुछ बहुत ही सुंदर डिस्क्रिप्शन अपने पास में है उसमें से भी स्वामी जी के जो छोटे भाई थे महेंद्रनाथ दत्त वो उन्हों ने वरा नगर के दिनों के बारे में बहुत ही सुंदर कुछ-कुछ विवरण लिखे हैं हम देखेंगे कि अपना जो ऑफिशियल हिस्ट्री है जो कि हमको लीला प्रसंग या तो युग नायक या वगैरह सब जगह प मिलता है वहां पर देखा है कि एक ब्रेक है वरा नगर के दिनों के बारे में बहुत डिटेल में जानकारी हमने हमको नहीं मिलती क्योंकि क्या है कि जब तक ठाकुर थे तो ठाकुर के पास में इतने सारे डिवोटा आते थे कि सबने अपनी-अपनी स्मृति कथाएं लिख कर के रखी है तो यह सब सब स्मृति कथाओं के आधार पर हमको बहुत कुछ जानने को मिलता है उसके बाद में जब स्वामी जी अमेरिका लौटे तो अमेरिका से लौटने के बाद बेलूरमठ में इतने सारे डिवोटा भक्त यंग लड़के सन्यास लेने के लिए अ साधु बनने के लिए आना शुरू हुए कि उनके बाद में उनकी रेमसंस उनकी स्मृति कथाएं प्राप्त है किंतु भरा नगर मठ का एक ऐसा पीरियड था कि धीरे-धीरे करके ठाकुर के भक्त भी अपने-अपने संसार में बिजी हो गए थे और ये चंद लड़के थे यंग लड़के उनको तो पूरा मने साधना में ऐसे डूबे थे कि रेमसंस लिखे उन दिनों के बारे में बात कहे ऐसा तो कुछ था नहीं ज्यादा मने कहीं कहीं इधर-उधर बाद के दिनों में उन्होंने इधर दो तीन कुछ बातें कही होगी तो एक ब्लैंक पीरियड मोर और लेस अपने बायोग्राफी में रेमन सेंस में मिलता है किंतु देखिए कि ईश्वर की कैसी इच्छा कि स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्रनाथ दत्त उस समय वरा नगर में रेगुलरली आते थे और उन दिन न की उन्होंने बड़ा ही सुंदर डिस्क्रिप्शन लिखा है तो अभी एक्चुअली प्रॉब्लम क्या है महेंद्रनाथ की किताबों में कि उन्होंने कुछ कुछ फैक्टस गलत लिख दिए हैं वो जैसे बहुत मने उन्होंने एडवांस एज में लिखा है ना स्मृति लिखी है वृद्ध होने के बाद में उनके यंग युवानी के दिवसों की बातें उन्होंने वृद्धावस्था में लिखी है तो कहीं कहीं पर उनके फैक्चर एरर्स हो गई है तो यह फेक्चुअल एरर को लेकर के हम लोग ऐसा मान लेते हैं कि अरे एक दो जगह पर गलती है तो बाकी सब जगह पर कितनी गलती होगी क्या पता किंतु मैंने पर्सनली मैं तो उनको पढ़ा हूं और मुझे उनकी किताबें बहुत अच्छी लगती है डिस्काउंट कर दे यदि कुछ कुछ एरर्स तो बाकी सब रेमसंस बहुत सुंदर है तो उन दिनों की घटनाओं के बारे में लिखता है कि स्वामी जी और यह गुरु भाई इतना आर्गुमेंट करते थे आपस में जैसे कि आजकल क्या है ना धर्म के बारे में आपको कुछ भी बोलना है तो आपको 10 बार सोचना पड़ेगा कि लोग इस बात को किस तरह से लेंगे किंतु ये देखिए कि इतना फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन था जद अगेन आज का एक मॉडर्न आइडिया जदी हम उन पुराने दिनों के ऊपर में लगाए कि फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन इतना पावरफुल था यह काली वेदांती काली तपस्वी य जो हमने अभेदानंद जी महाराज स्वामी जी फिर ये शरत महाराज शशि महाराज ये लोग इतना स्टडी भी करते थे तुर्या अंद जी वगैरा और इतना आर्गुमेंट करते थे जैसे कि हद बार माने ऐसा देर इज नो सेक्रेड प्रिंसिपल कि जिसके ऊपर में उन्होंने आघात ना किया हो ऐसा एक भी टॉपिक नहीं है जिसके ऊपर में उन्होंने क्वेश्चन ना किया हो और स्वामी जी खुद ना ही यूज टू प्ले डेविल्स एडवोकेट माने कि वो खुद संशय उभा करते खड़ा करते थे अरे ये जो लिखा है यह तो गलत गलत है ऐसा कैसे हो सकता है तो सब बाकी गुरु भाई एकदम नाराज होकर के डिफेंड शास्त्र को डिफेंड करने के लिए आगे आ जाते थे किंतु स्वामी जी का जो नॉलेज था वो इतना जबरदस्त था कि जो भी आर्गुमेंट आएगी उनको शास्त्र की ही मदद से काट लेंगे फिर जब गुरु भाई लोग बड़े परेशान हो जाएंगे कि अरे नर ऐसी बात क्यों कह रहा है फिर नर खुद सामने आकर के अपने खुद के विरोध में वो आर्गुमेंट करना शुरू करेगा यानी एक आर्गुमेंट काउंटर आर्गुमेंट का इतना सुंदर डिस्क्रिप्शन हमको मिलता है कुछ कुछ डिस्क्रिप्शन के बारे में बात करना भी थोड़ा सा अजीब लगता है वहां पर जैसे कि व एक समय आया था महेंद्रनाथ लिखते हैं कि जब मठ में जाकर देखा तो सभी लोग दिगंबर बनकर बैठे हैं तो थोड़ा परेशान हो गया अरे यह क्या है मने थोड़ा सा तो एक क्या कहेंगे कि मठ में रहते हो सब दिगंबर कोई आएगा तो मुलाकात के लिए क्या तो किंतु क्या है कि उस समय सब ब्रह्म भाव में इतने डूब गए थे कि वस्त्र पहनना है या वस्त्र नहीं पहना है यह जो एक क्या कहेंगे एक लज्जा या शर्म ऐसा कुछ नहीं माने दैहिक भाव से इतना ऊपर उठ गए थे कि वस्त्र नहीं पहन ने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता तो जैसे वोह ठाकुर के जो गुरु थे तोतापुरी वो कैसे वोह दिगंबर रहते थे तो वैसे ही सबने इस तरह से रहना शुरू कर दिया था माने क्या एक के बाद एक वेव्स जो आते हैं ना साधना के दर्शन शास्त्र के विचारों के एक मने आध्यात्मिकता के वो एक के बाद एक वेव्स एक के बाद एक प्रवाह आते गए और जब भी महेंद्रनाथ आते हैं नई नई चीजें देखने को मिलती है कभी देखा कि गुरु भाई आपस में इतना प्रेम है कि ठीक किया कि यह जो टॉयलेट है अभी तो आजकल तो रनिंग वोटर सब जगह पे प्लंबिंग है अपने मॉडर्न अ घर के घर में पहले तो ऐसा रनिंग वाटर नहीं था फर्स्ट फ्लोर प रहते थे टॉयलेट था तो उसको क्लीन करने के लिए बाहर में एक जो खुली जगह है वहां पे एक कुआ था कुए में से पानी लाकर के बाल्टी भर के पानी लाकर टॉयलेट क्लीन करना पड़ता था तो टॉयलेट में भी जो रखा होगा वह माने मल वगैरह जो जमा हुआ होगा उसको बाहर ले जाकर के डंप करना पड़ता है तो मैंने थोड़ा सा एक घृणास्पद कार्य है किंतु उस समय तो प्लंबिंग नहीं था तो करना पड़ेगा तो गुरु भाइयों में कंपटीशन लग गया कौन सबसे पहले उठ करर के टॉयलेट को क्लीन करता है तो ऐसा होने लगा कि जनरली जो मंगलारती के समय का उठने का समय है उससे कितना पहले एक के बाद एक चुपचाप उठ कर के टॉयलेट क्लीन कर देते थे पानी लाकर के सब कुछ ठीक-ठाक कर दे ज टॉयलेट क्लीन करने की साधना जैसे की हो गई थी कौन मने कंपटीशन होती थी कौन पहले उठ कर के उसको क्लीन करेगा तो देखिए कि इन लोगों का एक जीवन वरा नगर मठ में कैसा एक अद्भुत काउंटर इंटूटिव अगेन एक जीवन था जो कि हमको और कहीं पर देखने को नहीं मिलता तो यह जो है स्वामी जी जो आर्गुमेंट करते हैं वो यह सब आर्गुमेंट इस कितनी ही आर्गुमेंट उन्होंने अपने गुरु भाइयों के साथ में कर ली थी इससे फायदा क्या होता है कि सभी का एक पावरफुल स्ट्रांग फिलोसॉफिकल फाउंडेशन लग गया था ठाकुर के साथ में रह कर के सबका साधना का फाउंडेशन तो हो गया था किंतु फिलोसोफी भी तो एक चीज है क्योंकि यह संघ जो है सिर्फ व्यक्तिगत साधना करने के लिए नहीं बना बक ऑफ स्वामी जीस माइंड यह जो ठाकुर सबको घर कमरे में से निकाल करके दरवाजा बंद करके नरेंद्र के साथ बैठ कर के जो उसको एक अलग तरीके से तैयार करते थे एज अ लीडर जो लीडरशिप की ट्रेनिंग ठाकुर ने नरेंद्र को दी थी तो नरेंद्र को पता था कि यही लड़के जो आज इतने सामान्य दिखते हैं वह जगत में एक एक दिशा में जाएंगे एक एक दिशा में वहां में जगतगुरु होकर के खड़े रहेंगे तो देखिए कि शशि महाराज पूरा साउथ इंडिया फिर ये तुर्या नंद जी महाराज है त्रिगुणा तिता नंद जी महाराज या तो काली महाराज है किस तरह से विदेश में प्रचार किया है वेदांत का राम कृष्ण भावधारानी लड़कों को तैयार करना सिर्फ साधना के लिए ही नहीं किंतु जगत में एक नई विचारधारा नए विचार प्रवाह का प्रसार प्रचार करने के लिए तो स्वामी जी यह सब आर्गुमेंट किया करते थे तो यहां पर भी स्वामी जी कहते हैं कि यह क्या कि ईश्वर आपके भीतर में प्राण संचार करता है यह तो बहुत पुरानी मान्यता है तो उसी को पकड़ के रहो ना यह नया क्यों निकाल के लाते हो कि आत्मन प्राण संचार करता है तो स्वामी जी ऐसा कहते हैं बोरो इन द सेम वे एज द लुमिनस ऑफ द बॉडी इ बोरो फ्रॉम द माइंड आत्मन के भीतर में प्राण इसी तरह से उधार लिया हुआ है जैसे कि इस जड़ शरीर में आत्मन के द्वारा प्राण उधार दिया होता है ऐसा नहीं कह सकते क्या तो स्वामी जी कहते हैं द फैले स ऑफ आर्गू इंग इन दिस वे विल बी दैट देयर विल बी नो लिमिट इस तरह से आर्गुमेंट यदि हम करें तो इस आर्गुमेंट का अंत नहीं आएगा क्यों यदि शरीर के भीतर शरीर जड़ है इसको चलाने वाला इंद्रियों को कंट्रोल करने वाला यदि मन है तो मान लीजिए कि हम कहेंगे मन भी जड़ है मन को तो अर्थ देता है बुद्धि अच्छा ठीक है अभी नेक्स्ट स्टेप में कहेंगे बुद्धि भी जड़ है इसके भीतर में प्राण संचार करता है आत्मन ओके अभी इसके भीत बाद में भी तो स्टेप्स हो सकते हैं कि आत्मन भी जड़ है उसके भीतर में प्राण संचार करता है ईश्वर ऐसा यदि हम करते ही जाएंगे तो बाद में प्रश्न होगा भगवान भी तो जड़ है पता नहीं कौन उनके भीतर प्राण संचार करता है यदि कहा जाए एक सुपर गड है है ना एक सामान्य एक जनरल कैटेगरी के ईश्वर है और यह फिर यह हायर कैटेगरी के ईश्वर है जो कि जनरल कैटेगरी के ईश्वर के भीतर में प्राण संचार करता है तो फिर प्रश्न होगा कि जो हायर कैटेगरी के ईश्वर है उनमें कौन प्राण से विचार करता है वो भी और भी हायर कैटेगरी माने ये तो एड इंफिनिटम एक अनंत काल तक य आर्गुमेंट चलता रहेगा कि हां आप जो भगवान को मानते हैं उससे हमारे भगवान बड़े हैं क्यों क्योंकि हमारे भगवान आपके भीतर में प्राण संचार करते हैं वो ठाकुर की बात है ना कि जो शाक्त और वैष्णव दोनों के भीतर में आर्गुमेंट हो रही थी तो वैष्णव क्या करते हैं कहते हैं कि हमारे कृष्ण जो है श्री कृष्ण वो भव सागर के वो कांडी है भवसागर को नौका में बिठा कर के आपको पार करके ले जाएंगे तो शक्त क्या कहता है कि हां वो तो ठीक ही तो है वो हमारी मां तो राज राजेश्वरी है वो थोड़ी ना वो खुद आकर के वो नौका चलाएगी उन्होंने ही श्री कृष्ण को नौकर के रूप में रख दिया है आपकी नौका पार करवाने के लिए तो माने इस तरह से तो आप आर्गुमेंट करते ही रहेंगे भगवान कृष्णा आपकी नौका पार करवाते हैं ना कि मां काली करवाती है तो यहां पे एड इंफिनिटम आर्गुमेंट चलती रहेगी यदि हम इस बात को स्वीकार करें इफ वी से फ्रॉम सम अदर फोर्स द सेम क्वेश्चन विल बी आस्ड अगेन यदि यह कहेंगे कि कोई हायर सत्ता है कोई उच्च सत्ता है जिसके भीतर में से प्राण संचार हुआ है आत्मन के भीतर में तो यही प्रश्न फिर से आएगा कि उस उच्च सत्ता में प्राण संचार किसने कहा किसने किया सो एट लास्ट वी शैल हैव टू कम टू वन हु इज सेल्फ लुमिनस आखिर में तो एक जगह पर तो हमको खड़ा रहना ही होगा कहीं से तो प्राण संचार हुआ है कोई तो प्रकाश का सोर्स है यदि सबने अब उधार लिया है कहीं पर तो आपको खड़ा रहना पड़ेगा यह कह कर के कि हां यह प्राण का सोर्स है ऊर्जा का स्रोत है यह प्रकाश का सोर्स है सो एट लास्ट वी शैल हैव टू कम टू वन हु इज सेल्फ लुमिनस टू मेक मैटर्स शॉर्ट देन द लॉजिकल वे इज टू स्टॉप वयर वी गेट सेल्फ लुमिनोसो सड नो फर्द तो लॉजिकल स्टेप यह है लॉजिकल बा यह है कि वहां पर आकर के रुक जाए जिसके बाद में जाने की हमको जरूरत नहीं है तो आत्मन तक रुक जाते हैं कि हां आत्मन ही प्रकाशमान है स्वयं प्रकाशमान है जिसके की प्रकाश से मन बुद्धि चित्त अहंकार पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय य पंच प्राण पंच महाभूत सब कुछ जिससे प्रकाशमान है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा परम