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श्रीरामकृष्ण भावधारा के इतिहास पर एक विहंगावलोकन 16 Aug 2024

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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्वधर्म स् अवतार ब कृष्णा अच्छा तो अभी तक हमने स्वामी विवेकानंद का क्रोनोलॉजी देखा बायोग्राफी देखा खास करके इस पूरी क्रोनोलॉजी को मैं आपको एक आउटलाइन बताना चाहता था कि किस तरह से इसको मैंने फेजस में बांट दिया है स्वामी जी के जीवन को फेस पीरियड और चैप्टर तो जिस तरह से मैंने स्वामी जी की लाइफ को इस तरह से एक स्ट्रक्चर्ड क्रोनोलॉजी एक स्ट्रक्चर्ड वे में समझने का प्रयास किया है वैसे ही मैंने अपना पूरा रामकृष्ण संघ का फाउंडेशन है हिस्ट्री है उसको भी इसी तरह से समझने का प्रयास किया है आज कोई भी पूछे कि रामकृष्ण संघ क्या है राम कृष्ण है राम कृष्ण संघ के आइडियाज क्या है तो जैसे कि आप देखिए कि रामकृष्ण संघ में अपने हिंदू धर्म में ही देखिए अपने हिंदू धर्म में क्या होता है कि हम लोग सोचते हैं कि इतनी सारी किताबें है पुराण है स्मृति है फिर ये मने कितने सारे शास्त्र है प्रकरण ग्रंथ है टिकाए है भाष्य है है फिर सूत्र लिटरेचर है और ब्रांचेस इतनी सारी है वैष्णव शास्त्र ही जद आप एक जगह पर कलेक्ट करेंगे तो आपको पता चलेगा कि पूरी लाइब्रेरीज की लाइब्रेरीज भर जाएंगी वेदांत शास्त्र कलेक्ट करेंगे तो पता चलेगा तो कभी कभी मन में एक प्रश्न होता है कि इन सब में जो आपात पर उपल दृष्टि से जो एक विरोधाभास है उसका सोल्यूशन कैसे लाया हम किस चीज को कहे कि हां यही हमारे बताना चाहते हैं यही हमारे शास्त्र का फाइनल यह है उपदेश है और जो विरोधाभास है उसमें समा उसमें एक तरह से जो एक हार्मोनाइजेशन करना है तो ये हार्मोनाइजेशन करने का तरीका क्या है तो यह इसके लिए स्वामी जी कहते हैं कि हमारे शास्त्र में कहा गया है कि जनरली प्रस्थान त्रय प्रस्थान त्रय क्या है कि वो है तीन सबसे इंपॉर्टेंट किताबें वो है उपनिषद ब्रह्मसूत्र और गीता जो उपनिषद ब्रह्मसूत्र और गीता कहेंगे वही है हमारे शास्त्रों का सार क्योंकि यह तीन तरह के प्रस्थान कहे गए हैं श्रुति प्रस्थान स्मृति प्रस्थान और न्याय प्रस्थान श्रुति प्रस्थान अर्थात कि जो कि ईश्वर से डायरेक्ट सुना हुआ है उसमें फिर और किसी ने अपना कोई मत ऐड नहीं किया है डायरेक्ट ईश्वर के साथ साथ में वार्तालाप करके जो सुना जाता है उसको कहते हैं श्रुति प्रस्थान तो श्रुति प्रस्थान कौन से है तो उपनिषद उपनिषदों में भी वैसे तो बहुत सारे उपनिषद है 108 उपनिषद है और कहीं-कहीं इससे भी ज्यादा शायद मिल जाएंगे किंतु शंकराचार्य ने जिसके ऊपर में भाष्य लिखा जो 910 उपनिषद वही उसी को हम प्रमाण प्रमाण भूत उपनिषद के रूप में स्वीकार करते हैं तो यह हो गया श्रुति प्रस्थान दूसरा है स्मृति प्रस्थान वो है भगवत गीता और तीसरा है न्याय प्रस्थान वह है ब्रह्मसूत्र तो यह तीन किताबों में जो लिखा हुआ है वही है हमारे हिंदू धर्म का सार वही है हमारे हिंदू धर्म का फाउंडेशन तो अभी रामकृष्ण संघ में भी कभी-कभी यह प्रश्न हो सकता है कोई कोई कहेगा कि बहुत ज्यादा कर्म करो कोई कहेगा कि अरे यह कर्म करने से क्या होगा जब ध्यान पर ज्यादा भर देना चाहिए कोई कोई कहता है कि हमको एक इंट्रोवर्ट लाइफ करनी चाहिए कोई कहेगा कि अरे नहीं जितना हम समाज में ज्यादा मिक्स होंगे जितना हम लोगों के साथ में ज्यादा वार्तालाप करेंगे उतना ही ठाकुर महा स्वामी जी का भाव ज्यादा फैले कोई कहेगा कि अरे इतना रुपया पैसा धन यह लक्जरी हमारे जीवन में किस काम की है दूसरे लोग कहेंगे कि नहीं अरे चलो जितना ज्यादा हम कंस्ट्रक्शन कर पाए जितना ज्यादा सर्विस एक्टिविटीज बढ़ा पाए इतना ही अच्छा है कर्म योग के लिए तो यह कंफ्लेक्स कभी-कभी हमारे मन में आते हैं तो इसका सोल्यूशन हम कहां पर देखने को जाएंगे बहुत सारे लोगों ने अपने हिसाब से बहुत सारे आर्टिकल लिखे हैं बहुत सारी किताबें लिखी है बहुत सारे प्रवचन दिए गए हैं बहुत सारे इसके ऊपर में चर्चा विचारणा सब हुआ है किंतु हमारे लिए प्रमाण भूत क्या है ऐसा क्या है कि जहां पर जाकर के हम लोग अपने संदेह को 100% रूप से निपटा सके तो वो है ठाकुर मां स्वामी जी और डायरेक्ट डिसाइल का जीवन उनकी वाणी और उनके उपदेश हां अभी इनमें जद विरोधाभास दिखता है तो इसका सोल्यूशन किस तरह से लाना है इसका हार्मोनाइजेशन कैसे करना है वो एक दूसरा प्रश्न है किंतु इतना अभी हमको पता है कि ठाकुर महा स्वामी जी की वाणी डायरेक्ट डिसाइल की वाणी और उनके जीवन के जो प्रसंग है उसको अध्ययन करके उसको समझ कर के हम अपने ज्यादातर संदेह को निरसन कर पाएंगे ज्यादातर संदेह को ट पाएंगे तो मैंने जब इस तरह से सोचना शुरू किया तब मुझे लगा कि इसका अर्थ तो वही हुआ ना कि ठाकुर का जीवन जहां से प्रारंभ हुआ वहां से लेकर के आखिरी डायरेक्ट डिसाइल की महासमाधि हुई वहां तक का जो पीरियड है उतने पीरियड को हम प्रमाण भूत फाउंडेशन फिलोसॉफिकल फाउंडेशन कहो ना कि आध्यात्मिक फाउंडेशन कहो इसके रूप में ले सकते हैं उसके बाद में जो कुछ हुआ उसका महात्म्य नहीं है ऐसा नहीं है सभी का महात्म है किंतु जैसे कि अपने भारतीय शास्त्रों में हमने जिस तरह से स्पष्ट रूप से कह दिया है कि यह प्रस्थान त्रय है उसमें श्रुति प्रस्थान न्याय प्रस्थान स्मृति प्रस्थान उपनिषद ब्रह्मसूत्र और गीता इसी को प्रमाण भूत लेना है इसके बाद में जितने भी शास्त्रों की रचना हुई उसको प्रासंगिक शास्त्र के रूप में लेना है इटरनल शास्त्र के रूप में नहीं लेना मतलब फाउंडेशन शास्त्र के रूप में नहीं लेना अभी एक मिडल एजस था भारत में जिस समय की भारतीय स्त्रियों की रक्षा करनी बड़ी आवश्यक थी तो उस समय के लिए जो पर्दा प्रथा है अंदर महल प्रथा है स्त्रियों को घर से बाहर नहीं जाना है समाज में किसी किसी कार्य में हिस्सा नहीं लेना है तो वह सब एक उस समय के लिए था अभी आज का जो आधुनिक विश्व है यहां पे देखिए कि आज की स्त्रियां किस तरह से इसरो में साइंटिस्ट होकर के इतना सुंदर कार्य भारत के गौरव के लिए कर रही है भारत का गौरव विश्व के पटल पर विश्व के परिपेक्ष में बढ़ा रही है तो वो एक समय था आज का एक समय है उस समय के जो स्त्रियों के लिए जो विधान लिखित हुए हैं किसी किसी शास्त्र में वो आज के समय को शायद इतना वो इतना रिलेवेंट नहीं लगेंगे तो यहां पर भी रामकृष्ण मिशन में भी यदि कोई भी एक साधु कोई भी एक विचारक कोई भी एक साधक ऐसा कुछ हमको इंस्ट्रक्शन देता है कि ऐसा कुछ करना चाहिए तो उसका रिलेवेंट उसी पीरियड तक पूरी उसी परिप्रेक्ष्य में ही वह सीमित है वो हमेशा के लिए नहीं है अपना रामकृष्ण संघ 1500 साल तक चलने वाला है और इस संघ की भावधारानी स्थिति के लिमिटेड ही होता है आज मैं अपने लिए कुछ सोचता हूं कि मुझे इस तरह से साधक जीवन जीना चाहिए और मैं आपके साथ में मेरे विचार शेयर करता हूं तो वो विचारों की सीमा कहां तक है मैंने अपनी परिस्थिति के लिए मैं जिस परिस्थिति में हूं उस परिस्थिति में इस विचारों को सोचा और इस परिस्थिति जिसको अप्लाई होती है जो इस कोंटेक्स्ट या तो फिर जो इस परिप्रेक्ष्य के भीतर में आते हैं उन्हीं को यह विचार अप्लाई होते हैं किंतु 1500 साल तक पूरे विश्व में विभिन्न तरह के विभिन्न परिस्थिति के विभिन्न जियोग्राफी के विभिन्न नेशंस के जो लोग होंगे उन सबको तो वो अप्लाई नहीं होगा तो सबको यूनिवर्सलीस होगा तो ठाकुर महा स्वामी जी के उद्देश और जीवन प्रसंग नहीं कि मैं जो कहता हूं तो ठाकुर मा स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइल ये कितने लोग होते हैं 16 डायरेक्ट डिसाइल प्लस ठाकुर और मां 17 18 ये 18 लोगों का लाइफ और उनके जीवन के जो प्रसंग है वह सब समय के लिए सबको अप्लाई होंगे उसमें जो विरोधाभास है उसका सॉल्यूशन हम कुछ ना कुछ ला सकते हैं किंतु इन 18 लोगों के बाद में जितने भी कोई भी हुए अपने संग में वह चाहे सन्यासी हो ना कि भक्त हो वह चाहे किसी भी क्षेत्र में किसी भी तरह की महारत उन्होंने हासिल की हो किंतु उन्होंने जो कुछ भी किया है जो कुछ भी कहा है वो इस सीमित दायरे तक ही लिमिटेड है कि हां उस समय के लिए उस परिप्रेक्ष्य के लिए उस परिस्थिति के लिए ही वो वैलिड है उससे बाहर में नहीं रामकृष्ण संघ की भीतर में जो डाइवर्सिटी जो स्वामी जी ने कल्पना की है हमने देखता हमने देखा कि किस तरह से इसके बारे में हम और भी ज्यादा डिस्कस करेंगे कि निवेदिता को स्वामी जी किस तरह से गाइड करते हैं और शरद चंद्र चक्रवर्ती को किस तरह से गाइड करते हैं और फिर वो जो तीसरी एक किताब है जिसके बारे में भी मैं बीच-बीच में बात करता रहता हूं कि यह स्टोरी ऑफ एन इपोक अति तेर स्मृति अति तेर स्मृति नासा ही कुछ है वो बंगाली में इंग्लिश में पक्का है स्टोरी ऑफ एन इपोक विरजानंद जी महाराज की किताब है तो विरजानंद जी महाराज को किस तरह से गाइड करते हैं तो फिर वो जो आला सिंगा पेरूमल है वो जो मद्रास के उनके जो यंग डिसाइल है उनको किस तरह से वो गाइड करते हैं फिर अपने गुरु भाई है उनको किस तरह से उनके साथ में किस तरह से बात करते हैं तो स्वामी जी को भी देखिए कि जो जिस परिस्थिति में है उनको उस तरह से उपदेश देना है उनका आध्यात्मिक जीवन उस रास्ते पर ले जा कर के गठित करना है तो अभी जद आला सिं यह सोच ले कि मुझे जो स्वामी जी ने कहा है वही स्वामी जी के गुरु भाइयों को भी करना है मैं जो करूंगा वही राजा महाराज कहेंगे क्योंकि मुझे तो स्वामी जी ने ऐसा कहा तो ये तो गलत हो जाएगा राजा महाराज का जीवन राजा महाराज की जो ट्रेजे क्ट्री है कर्म की वो पूरी डिफरेंट है आला सिंगा से तो स्वामी जी राजा महाराज को एक तरह से ट्रीट करेंगे आला सिंगा को दूसरी तरह से अभी आला सिंगा जद एक किताब लिखता है उसमें वह लिखता है कि स्वामी जी ने मुझे ऐसा ऐसा कहा तो ऐसा नहीं है कि यह किताब लिखो उस की स्वामी जी ने कही है सबको अप्लाई होती है नहीं वो आला सिंगा को अप्लाई होती है उस पार्टिकुलर परिस्थिति के लिए जबकि भारत गुलाम था हमको विदेश में जाकर के उनसे सीख कर के इंडस्ट्रियल इजेशन भारत में इंप्लीमेंट करना था आज रिवर्स हो गया है उस समय स्वामी जी चाहते थे कि भारत में से आध्यात्मिकता विदेश में जाए और विदेश में से ये टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल इजेशन भारत में आए आज कैसा उल्टा हो गया है देखिए कि विदेश में ये इंटरनेशनल योगा डे है वो बेसिकली स्टार्ट हुआ है विदेश में ये जो 21 जून वही डेट है ना शायद 21 जून ये जो समर सोल साइट उस दिन होता है समर सोल साइट तो समर सोल साइट को स्पेसिफिकली असाइन टू योगा ये तो अमेरिका में स्टार्ट हुआ है भारत में ऐसा कहां पे है तो वो वो पूरा जो है वहां का पॉपुलर कल्चर हम इंपोर्ट कर रहे हैं अमेरिका में योगा चल रहा है तो उसको देखा देखी हम लोग एक बोल रहे हैं कि हम भी योगा करेंगे यहां पे हजारों सालों से था तो हम लोग भूल गए थे स्कूलों में रेयरली किसी स्कूल में योगासन वगैरह करवाते होंगे अभी ये जो विदेश में इतना पॉपुलर हो गया है तो हमने इंपोर्ट किया है हमारा ही होगा और अभी अपनी आईआईटी में से इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इसके जो ग्रेजुएट है वो वहां जाकर के वहां की जो बेस्ट कंपनीज है उसमें वे लोग सीईओ होते हैं तो अभी रिवर्स हो गया है हम लोग योगा इंपोर्ट करते हैं और ये जो आईआईटी के ग्रेजुएट को एक्सपोर्ट करते हैं ये रिवर्स हो गया है पूरा तो क्या है कि ये परिस्थिति तो बदलती रहती है उस समय स्वामी जी ने अमेरिका के लिए कहा था कि रजस की चरम सीमा प बैठे हैं अभी इनको थोड़ा सा सत्व चाहिए इसके लिए इनको राजयोग सिखाया जाए और भारत तमस के गड्ढे में डूबा हुआ था तो हमको ऊपर लाने की लिए हमको सबसे पहले तो रजस का उपदेश दिया जाए अभी आज के महानगरों में आप जाकर के देखिए क्या रजस देखने को मिलेगा क्या वो मतलब एक रेस्टस बस देखने को मिलेगा क्या कार्य का एक उद्यम उद्योग महाभारत में है ना उद्योग परव तो क्या कितना उद्योग देखने को मिलेगा तो अभी भारत की परिस्थिति अमेरिका जैसी हो गई है अभी हमको भी रजस में से धीरे-धीरे सत्व में जाना है हमको भी राजयोग की शिक्षा लेनी है तो देखिए कि परिस्थिति थिति बदलती रहती है बदलती परिस्थिति के साथ में जो उपदेश अप्लाई होते हैं वह भी बदलते रहते हैं तो किंतु ठाकुर महा स्वामी जी जो कहे हैं उसके हिसाब से यह सब करना है नहीं कि इन 18 लोगों के अलावा और कोई भी हो कितना ही ग्रेट साधक क्यों ना हो कितना ही ग्रेट वोह फिलोसोफर क्यों ना हो हमारे संघ के साथ में जुड़ा हुआ कोई भी कैपेसिटी में त्यागी की कैपेसिटी में ना कि गृहस्थ की कैपेसिटी में उनका देश उनके मंतव्य उनके ओपिनियन उसी समय तक ही सीमित है जिस समय में वह जीवित है जिस समय उनका कार्यकाल है तो ऐसा मैंने शुरू में सोचा था और ऐसा सोच कर के मैंने सोचा कि जिस तरह से स्वामी जी की लाइफ को मैंने स्ट्रक्चर करने का प्रयास किया है तो वैसे ही रामकृष्ण संघ का ये जो फाउंडेशन पीरियड है उसको मैं क्यों नहीं स्ट्रक्चर करने का प्रयास करूं उसको मैं क्यों नहीं एक सिस्टम में डल करके सोचने का प्रयास करूं कि हां इस तरह से यह शुरू हुआ यहां से यह प्रारंभ हुआ और यहां पर यह अंत आया और यहां पर यह इतने इतने पीरियड से फेज से और चैप्टर्स है ऐसा मैं इस तरह से पूरे संघ को क्यों ना अप्लाई करूं ऐसा सोच कर के मुझे पता चला और रदर मैंने सोचा कि ठाकुर का जन्म हुआ है 1836 में तो यहां से जद प्रारंभ होती है अपनी कहानी तो कहां तक अटके गी ये 18 डायरेक्ट डिसाइल में जो आखिरी डायरेक्ट डिसाइल थे व थे स्वामी जिनका की जिनकी महासमाधि हुई वो थे स्वामी अभेदानंद जी महाराज और अभेदानंद जी की महासमाधि आई थिंक 1939 के आसपास में हुई है तो इस तरह से देखिए कि ऑलमोस्ट 100 ईयर का पीरियड अपने पास में है ठाकुर के जन्म से लेकर के अभेदानंद जी की महासमाधि तक का और यह 100 यर पीरियड को यदि हम किसी स्ट्रक्चर में डाल देते हैं तो इस स्ट्रक्चर के अनुसार अपना इतिहास है अपना जो फाउंडेशन हिस्ट्री है वह समझने में हमको बड़ी सुविधा होगी इसमें दोनों तरह से फिलोसॉफिकली भी और प्रसंग जीवन के प्रसंग अनुसार भी दोनों तरह से हमको सुविधा होगी ऐसा करके यह पूरे पीरियड को आप यहां पर स्क्रीन पर देख सकते हैं कि मैंने सबसे पहले तो तीन फे में बांटा है सबसे पहला फेज है श्री राम कृष्ण दूसरा है श्री राम कृष्ण मठ और तीसरा है श्री राम कृष्ण मिशन अर्थात क्या कि सबसे पहले तो ठाकुर का जीवन है ठाकुर का जीवन ही तो हमारा सबसे बड़ा फाउंडेशन है तो अभी 1775 अर्थात की आप लीला प्रसंग में देखेंगे कि देरे ग्राम में खुदीराम का जो जन्म हुआ वहां पर जो घटनाएं हुई फिर वहां से जो जमींदार के साथ में नाराजगी जमींदार की नाराजगी थी उनके ऊपर में जमींदार उनके ऊपर में नाराज था कि झूठी जुबानी नहीं देना चाहते थे कुदीराम तो अभी जमींदार नाराज हो जाएगा तो कुछ ना कुछ गड़बड़ करेगा तो उसके डर से डर से तो नहीं कहेंगे सत्य रक्षा के लिए वो कामर पुकुर आए तो वो जो खुदीराम की कहानी है वो 1775 से प्रारंभ होती है इसलिए मैंने वो डेट दी है अदर वाइज अपनी जो क्रोनोलॉजी है बेसिकली 1836 से स्टार्ट होती है श्री रामकृष्ण के जन्म से लेकर के तो यह जो बाल्य पर्व है बेसिकली कामर पुकुर में ठाकुर की क्या लीला थी बाल्य लीला जैसे कि वृंदावन में भगवान कृष्ण की जो बाल्य लीला थी इस तरह से तो वो वो पीरियड है इसके बाद में है साधन पर्व अर्थात कि कलकत्ता जब आए तो कलकत्ता में जिस तरह से उन्होंने साधना प्रारंभ की तब से लेकर के मां के कलकत्ता आगमन तक मां के आगमन से क्या हुआ जब मां का जीवन हम डिस्कस कर रहे थे तब भी मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि रामकृष्ण संघ की जद सबसे इंपोर्टेंट घटना कही जाए तो वो कौन सी होगी स्वामी जी कन्याकुमारी में रक अभी आजकल जिसको विवेकानंद रक कहते हैं उसके ऊपर में ध्यान कर रहे थे ठाकुर ने कहा कि जाओ पश्चिम में जाओ वो घटना ना कि वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में खड़े होकर के बोले कि सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका वो घटना न कि रामकृष्ण संध की स्थापना हुई फर्स्ट में 18 96 को 97 को वो घटना कौन सी घटना तो मेरी दृष्टि से सबसे इंपोर्टेंट यहां म मोर इंपोर्टेंट देन ठाकुर की जो निर्विकल्प समाधि थी उससे भी ठाकुर का खुद का जन्म मां का खुद का जन्म इससे भी यदि सबसे इंपोर्टेंट घटना कही जाए तो वोह है व शशी पूजा ठाकुर ने शक्ति को आवाहन किया कि वो पृथ्वी पर अवतरित होकर के पृथ्वी पर मां का अवतरण तो हो चुका किंतु अपने भीतर की जो शक्ति है उसको पहचाने उस अपने भीतर में सुक्त जगदंबा है उसको जागृत करके उसकी सहाय से ठाकुर जगत कल्याण के कार्य के लिए व्यापत हो तो वो घटना है ठाकुर अपने से जो जब ध्यान समाधि वगैरह जो कर रहे थे एक के बाद एक दर्शन कर रहे थे इससे हमको क्या लाभ हुआ ऐसे तो कितने ही महापुरुष है ऐसे कितने ही ब्रह्मज्ञानी है जो कि भारत की भूमि पर विचरण करते हैं कहीं एकांत में रव में साधना करते हैं सिद्धि प्राप्त करते हैं और चुपचाप देह त्याग कर देते हैं किंतु अभी देखिए कि जैसे स्वामी जी ने खुद ने कहा था कि कोई एक महापुरुष एक गुफा में बैठ कर के पांच अच्छे विचार भी करता है तो वो पांच विचार पूरे जगत में फेल करके वो सबकॉन्शियसली अपने माइंड में जाकर के कुछ ना कुछ कार्य तो करेंगे तो ये तो एक बात है कि महापुरुषों के ब्रह्म ज्ञानियों के नीरव साधना नीरव महा समाधि से जगत को फायदा तो होता है किंतु ऐसा एक एक्टिव कोई जद होगा कि घर-घर जाकर के ईश्वर की वाणी सुनाए जैसे कि चैतन्य महाप्रभु नगर कीर्तन करते-करते जितने भी तामसिक है जड़ है भौतिकवादी है यह भोग लोभ में डूबे हुए हैं ऐसे सभी लोगों को ईश्वरीय नाम कीर्तन जिन्होंने सुनाया चैतन्य महाप्रभु ने वैसे ही फिर से आधुनिक युग में किसी की जरूरत थी कि ब्रह्म कुंडलिनी को जागृत करें तो वो कार्य ठाकुर ने किया किंतु वो कार्य प्रारंभ कहां से हुआ तो वही वो शोशी पूजा से तो उसके बाद में ही ठाकुर ने एक के बाद एक कलकाता के जितने भी घण मान्य लोग है उनके घर जाकर के उनके साथ में बात करना शुरू किया ऐसा नहीं हुआ है कि जैसे ही ठाकुर ने शोशी पूजा की हम सब लोग इकट्ठा हो कर के हम सब याने कि हमारे उस समय के जो रिप्रेजेंटेटिव थे ये त्यागी संतान गुरुह स्त भक्त वगैरह उन्होंने इमीडिएट ठाकुर के पास आना शुरू नहीं कर दिया देखिए ठाकुर को भी प्रचार प्रसार कितना करना पड़ है ठाकुर भी यह देवेंद्रनाथ ठाकुर के घर गए थे उसके साथ में बात की थी पूछते हैं कि भाई तुम ईश्वरीय सब बात करते हो साधना करते हो तो मुझे भी बताओ कि किस तरह के ईश्वर की साधना करते हो किस तरह से करते हो किस तरह की वरशिप करते हो ऐसा करके ठाकुर घर-घर जाते थे एक दिन ऐसा हुआ एक साधक का कहीं इसी तरह से तो ठाकुर ईश्वर चंद्र विद्या सागर को मिलने के लिए गए इसी तरह से केशव सेन को मिलने के लिए गए और केशव सेन को जो मिले चच वाज ट्रास फ फॉर्मेटिव इवेंट कि केशव ने उसके बाद में अपनी जो ये है पत्रिकाएं न्यूजपेपर ब्रह्म समाज के उसमें उसने ठाकुर के बारे में लिखना शुरू कर दिया और यह जितने भी त्यागी लड़के थे किसी ना किसी तरह से यह ब्राह्मण समाज से जुड़े हुए थे स्वामी जी हो ना कि ये अपने महापुरुष महाराज हो ना कि राजा महाराज हो या तो फिर ये मास्टर महाशय के विद्यार्थी थे तो मास्टर महाश खुद ब्राह्मण समाज से जुड़े हुए थे तो किसी ना किसी करके ये ब्राह्मण समाज के नेटवर्क के थ्रू ही धीरे-धीरे करके यह सब भक्त त्यागी और गृहस्थ ठाकुर के पास आने लगे इस ऐसी एक फनी एक घटना है कि ऐसा ठाकुर जब किसी के भी घर चले जाते थे ना कि देखने के लिए कि भाई तुम ईश्वर का नाम लेते हो किस तरह से है बताओ तो एक किसी से पता चला कि एक बहुत ही एक सात्विक साधक है वो कहीं पर रहते हैं कामर पुकुर में तो ठाकुर ने कहा मथुर बाबू को कि चलो उसको जाक के देख के आते हैं अभी मथुर बाबू का घमंड भी इतना बड़ा है तो बड़ा जमींदार है वो थोड़ी ना किसी के घर चला जाएगा किंतु अभी बाबा जब कहते हैं मथुर बाबू ठाकुर को बाबा करके पुकारते थे तो बाबा जब कहते हैं तो जाना तो पड़ेगा ही ठीक है वो बड़ी सी एक गाड़ी की और गाड़ी में गए वहां पे उसके घर गाड़ी माने घोड़ा गाड़ी उस समय की तो उस व्यक्ति के घर गए उस साधक के घर पता चला कि छोटा सा घर है बहुत बड़ा कुछ नहीं है बिल्कुल छोटा सा घर है और उसमें भी उसके घर में कुछ प्रसंग चल रहा है शायद उसके लड़के का उपनयन है ना कि ऐसा कुछ प्रसंग चल रहा था तो म मानों से पूरा घर भरती है अभी जैसे ही वो ब्राह्मण ने देखा जिस साधक ने देखा कि इतना बड़ा गाड़ी में बैठ कर के इतना बड़ा व्यक्ति यहां पर आया है मुझे मिलने के लिए तो बेचारा वोह तो परेशान हो गया कि कहां पर इसको बिठाए कैसे उसकी मने आत्ता स्वागता करें कैसे उसको वेलकम करें घर तो भरती है तो कैसे भी करके कहीं प जगह कोने में करके थोड़ा बिठाने को गए तो अभी ये लोगों को तो पता नहीं कि कहां पर जाकर बैठना है तो किसी ओर एक डायरेक्शन में जा रहा तो चिल्ला उठा ये साधक अरे वहां प मत जाइएगा वहां पर तो लेडीज लोग है तो ये लोग माने एक ऐसा एक हो गया था वो ब्राह्मण बेचारा साधक परेशान और यहां पर ये मथुर बाबू भी परेशान नहीं बैठने के लिए जगह और नहीं वो जैसे अभी ऐसे वो देवेंद्रनाथ टैगोर के वहां पर जाएंगे तो एटलीस्ट वो तो ठीक से उनको सम्मान तो दे पाएगा बड़ा आदमी है 10 नौकर चाकर है तो आइए बैठिए क्या खाएंगे क्या पिएंगे ऐसा तो क्या हुक्का हुक्का वाड़ा फेमस था उस समय तो हुक्का देंगे यहां तो उसका स्वागत करने के लिए कोई नहीं सम्मान देने के लिए कोई नहीं और वो जो जिनको मिलने के लिए गए वो भी अपस्तंबा बू बड़े नाराज हो गए बाबा अभी आपके साथ में किसी के घर नहीं जाऊंगा तो ठाकुर देखिए कि जिसके यहां पे संधान मिलता था कि यह साधक है तो सीधा उसके घर चले जाते थे बाद में तो कहीं बाकी सब लोग ठाकुर के पास आना शुरू हुए तो वो साधन पर्व का अंत और आनंद पर्व की शुरुआत यह नाम भी मैंने काफी सोच समझ के दिए हैं कि आनंद पर्व मां के सड़सी पूजा के बाद में ठाकुर जिस तरह से लोगों को आवाहन करते हैं सबको पुकारते हैं और फिर जिस तरह से सबके साथ में मिलकर के कितना आनंद करते हैं जैसे कि आनंदे आनंदर बाजार जैसे की बोलते हैं तो आनंदर हार्ट आनंदर हार्ट जिन बसान होए बांगला से जाके बोले आनंद का बाजार जैसे कि ठाकुर ने खोल कर के रखा था और सब लोग यहां पे आकर के आनंद की गंगा में डुबकी लगा कर के प्रसन्न हो कर के जाते थे बात सिर्फ ये नहीं है कि ठाकुर आध्यात्मिक उपदेश देते थे वो इतने खुद भीतर से इतने ियर फुल थे कि जो जो भी आदमी डिप्रेसो अभी किसी के लड़के का मृत्यु हो गया है ठाकुर के पास में आकर के बैठा है रो भी नहीं पा रहा है इतना सदमे में है तो ठाकुर एक के बाद एक मां काली के भजन गाते जाते हैं गाते जाते हैं तो उसी से उसका मन शांत हो गया कि नहीं मैंने जवान पुत्र की उसका जो मृत्यु हुआ इससे जो भयानक शोक लगता है वो शोक वहां पर जाकर के जैसे कि उनके हृदय को एक यह मिला एक भरोसा मिला एक सांत्वना मिली हृदय जैसे कि थोड़ा सा ठंडा हुआ तो ये सब ठाकुर ने जो आनंद बाजार खोल कर के रखा था आनंदर हार्ट जन खुले लेन खाने तो उससे आकर्षित होकर के कितने ही लोग आ रहे हैं तो यह हो गया पूरा श्री राम कृष्ण देव का जीवन अपना खुद का अपने भक्तों का इसके बाद में किंतु फेस चेंज होता है अभी ठाकुर की जीवन यात्रा का अंतिम समय है तो बात अभी सिर्फ यह नहीं है कि ज्यादा से ज्यादा भक्तों को यहां पर बुलाना है साधकों को बुलाना है अभी यह एक बात है कि ये जितने भी साधक भक्त उनके पास में आए हैं उनमें से किसी को चुनिंदा भक्तों को माने फिल्टरेशन करना है अंतरंग और बहिरंग इस तरह से फिल्टर करना है और जो अंतरंग है उनको प्रेम के सूत्र में बांध कर के संघ की रचना करनी है तो जो सेकंड फेज अपने हिस्ट्री में प्रारंभ होता है वो है रामकृष्ण मठ ठाकुर को कैंसर हुआ और कैंसर की वजह से ठाकुर को जब कलकत्ता लाया गया ट्रीटमेंट के लिए काशीपुर में तो बहुत सारे लोग इस तरह से सोचते थे कि देखिए कि ठाकुर के अंतरंग और बहिरंग इस तरह से विभक्त हो जा रहे हैं भक्त जो अंतरंग है ठाकुर की सेवा के लिए प्रतिदिन जो गृहस्थ है मास्टर महाशय रामचंद्र दत्त सुरेश मित्र बलराम बाबू वे लोग भले चाहे दिन रात के समय घर चले जाए दिन के समय प्रतिदिन वहां पर आकर के कुछ ना कुछ खोज खबर रहते रहेंगे मां खाना बनाती है तो मां के लिए खाना बनाने के लिए पैसा जो मतलब चीजें जो खरीदनी है तो उसके लिए जो पैसा चाहिए उसकी व्यवस्था बाजार करना है डॉक्टर को बुलाना है डॉक्टर सरकार को मास्टर महाशय प्रतिदिन लेकर के आते थे तो वो जो वो पूरा जो बाहर का कार्य है उसका जिम्मा गृहस्थ भक्तों ने संभाल लिया था और वहीं पे काशीपुर में ही रह कर के ठाकुर की सेवा करनी है वो कार्य ये युवा लड़कों ने स्वीकृत कर लिया था जो कि बाद में ऑलमोस्ट सभी त्यागी हुए मने सन्यास ग्रहण करके सभी ने त्याग स्वीकृत किया तो वो हो गया एक अंतरंग और बहिरंग में विभक्त पूरा ठाकुर की ये जो भक्त मंडली है और कुछ-कुछ लोग थे वैसे जो कि दक्षिणेश्वर में तो काफी आते थे किंतु जैसे ही ठाकुर को कैंसर हुआ ठाकुर को यहां पर लाया गया अभी आवश्यकता आ गई कि सब कुछ त्याग करके ठाकुर की सेवा में लग जाओ तो ये लोग फिर कुछ ना कुछ बहाना करके वहां से निकल पड़े उसमें सबसे बड़ा उदाहरण है भवनाथ तो भवनाथ को ठाकुर कितना मतलब मानते थे ईश्वर कोटी बोलकर के कहीं पर उल्लेख है उसका और स्वामी जी के साथ में आता था और फिर आखिर में क्या हुआ कि काशीपुर में एक दिन आया ठाकुर ने खुद कहा कि वर राजा सेजे छलो सेद अर्थात कि शादी की है और फिर वह जो अच्छे से कपड़े पहन के वर राजा की तरह ठाकुर के पास में आया है और पूछता है ठाकुर अभी आप कैसे हैं तो तो ऐसे लोग भी थे क्योंकि दक्षिणेश्वर में तो रेगुलर आते थे ठाकुर के बड़े प्रिय थे किंतु आखिर में वे लोग बहिरंग में चले गए अंतरंग की श्रेणी में नहीं आ पाए तो ये जो फिल्टरेशन था कि अंतरंग का और यह अंतरंग के कंधों पर ही रामकृष्ण संघ की रचना होगी जैसे कि ठाकुर कहते हैं ना कि पौधा जब छोटा होता है तब उसको अच्छे से एक वार्ड के भीतर में इसको बांध के रखते हैं उसके चारों ओर एक प्रोटेक्शन खड़ा करते हैं जिससे कि भेड़ बकरियां आकर के पौधे को नष्ट ना कर दे किंतु पौधा जब विराट वटवृक्ष हो जाता है तब इसके जो इसके साथ में आप हाथी को भी बांध दे साकड़ा पाएगा तो वैसा है सघ जब प्रारंभ होता है संघ का जब फाउंडेशन डालना होता है तो उन्हीं के कंधों पर डाला जा सकता है जो कि टोटली डेडिकेटेड है ठाकुर को जिन्होंने अपने को संपूर्ण रूप से समर्पित किया है वहां पे फिर ये नहीं देखना कि ये सात्विक है यह राजसिक है यह तामसिक है गिरीश घोष भी उस समय अंतरंग की श्रेणी में आ जाता है क्यों क्योंकि यह नहीं कि वो बड़ा ही अच्छा लाइफ लीड किया है बहुत बड़ा साधक है इसलिए नहीं उसने अपना जीवन सर्वस्व श्री राम कृष्ण देव को समर्पित कर दिया है उनके शरणागत हो गया है तो इन्हीं के कंधों पर रामकृष्ण संघ की नीव डाली जाएगी तो वो पूरा कार्य हुआ काशीपुर मठ में और कुछ-कुछ लोग थे इवन अंतरंग में भी उसमें गिरीश घोष भी एक शामिल था कि ठाकुर यह जो है अवतार है और यह सिर्फ एक एक मुखो पहना है बीमारी का कैंसर का क्यों क्योंकि अपने भक्तों को इकट्ठा करने के लिए फिल्टरेशन करने के लिए अंतरंग है यह बहिरंग है जैसे ही यह फिल्टर हो जाएंगे जैसे अंतरंग इकट्ठा हो जाएंगे वैसे ही ठाकुर यह बीमारी को फेंक देंगे और फिर से सुस्त हो जाएंगे ऐसे कुछ लोग अंतरंग में भी मानते थे उस समय स्वामी जी थे स्वामी जी को पता था स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को कहा लीला प्रसंग में सुंदर वर्णन है कि मुझे लगता है कि ठाकुर ने ठीक कर लिया है कि अभी मैं इस देह को नहीं रखने वाला हूं मृत्य लीला की अभी यह समाप्ति की ओर में जा रहा हूं तो अभी हमारे लिए कर्तव्य है कि ठाकुर ने हमको जिस तरह से तपस्या साधन भजन करने को सिखाया है उसमें हम संपूर्ण रूप से डूब जाए तो ये त्यागी लड़के सिर्फ यह नहीं कि ठाकुर की सेवा करते थे किंतु साथ-साथ ही जी जान लगा कर के जप ध्यान साधन भजन उसका प्रवाह काशीपुर मठ में बहा दिया था और स्वामी जी की एक सुंदर घटना है एक दिन उनके ऊपर में महावीर का आवेश हुआ और वो जय श्री राम जय श्री राम बोलते बोलते काशीपुर की ओर जा रहे हैं दक्षिणेश्वर की ओर जा रहे हैं तो ऐसा सोच कर के कि दक्षिणेश्वर में जाकर के जहां पर ठाकुर ने इतनी साधना की पंचवटी के तले में तो मैं भी पंचवटी में जाकर के पूरा रात जब ध्यान करके बिता दूंगा किंतु स्वामी जी का जो भाव था वो देख कर के गुरु भाई थोड़े से डर गए अभी ठाकुर ने भी कहा था नरेंद्र जद अपना सही स्वरूप पहचान लेगा तो शरीर त्याग करके चला जाएगा यानी कि नरेंद्र को साधन भजन भी करना है और इतना साधन भजन नहीं कर लेना है कि अपने सही स्वरूप को पहचान ले हमेशा एक अंगुली दूर रहना है आखिरी आखिरी स्टेप तक नहीं जाना है तो ठाकुर ने कहा कि अरे जाओ कोई जाकर के इसको वापस ले आओ पता नहीं वो वहां पर जाकर क्या कर लेगा उस समय या टको गोपाल या तो निर्मलानंद जी मुझे एजेक्ट यही याद आ रहा है दो में से एक गए और स्वामी जी उस महावीर के भाव में थे स्वामी जी तो पहलवान नहीं वो तो कुश्ती करते थे एकदम स्ट्रांग उनका शरीर था तो जाकर के उनको पीछे से पकड़ लिया और मैंने ये भी पहलवान वो भी पहलवान कैसे भी करके खींच करके उनको काशीपुर मठ में ले आए तब कहीं जाकर के स्वामी जी के भाव का हुआ था तो इस ऐसी इतनी सारी घटनाएं साधन भजन की एक के बाद एक आध्यात्मिक उच्च शक्तियां प्राप्त करने की वह सब काशीपुर में हुई और फिर वहीं पर हमको पता है कि सितंबर अगस्ट 18864 गए हैं किंतु फिर मठ शिफ्ट हुआ आलम बाजार में और फिर वहां से शिफ्ट हुआ बेलूर में बेलूर में सबसे प्रथम तो नीलांबर मुखर्जी गार्डन और फिर वहां से अपना जो आज का बेलर मट है वहां पे तो अभी देखिए कि ये जो क्रोनोलॉजी है रामकृष्ण मठ की मैंने संपूर्ण अपने संघ की दृष्टि से इसका निरूपण किया है यहां पे मैंने स्वामी जी की दृष्टि से नहीं किया स्वामी जी की दृष्टि से यदि करते स्वामी जी के जीवन में हमने देखा कि किस तरह से वरा नगर मठ के बाद में स्वामी जी की प्रव्रज्या जीवन प्रारंभ होता है उसके बाद में उनकी फर्स्ट विजिट टू द वेस्ट फर्स्ट मिशन टू द वेस्ट वो प्रारंभ होता है अभी स्वामी जी की दृष्टि से वो क्रोनोलॉजी ठीक है किंतु समग्र संघ की दृष्टि से देखा जाए तो देखिए कि संघ का जो मठ अर्थात कि साधन भजन तपस्या का यह जो फेज था देखिए कि स्वामी जी भले ही चाहे प्रचार प्रसार कर रहे हो किंतु संघ की दृष्टि से मिशन की शुरुआत तो तभी हुई जबकि राजा महाराज प्रेसिडेंट हुए तब से तो एक पूरा एक स्टैंडर्डाइजेशन एक स्टार्ट हुआ अपने मठ का उससे पहले इतना फ्लक्स था इतना डायनामि जम था कि क्या शेप धारण करेगा अपना यह संघ जीवन वो कोई बता नहीं पाएगा जैसे जैसे मां ने अपना एक ब बाह्य प्रकाश एक प्रकट किया मां के पास में जैसे-जैसे यह सब लड़के जाना शुरू किए मां की महत्ता समझना शुरू किया और राजा महाराज राजा महाराज और मां जो मिशन का जो सही सही में मिशन जिनके जिनकी कृपा से जिनके आशीर्वाद से जिनके गाइडेंस से चला है वो तो राजा महाराज है और मां है स्वामी जी ने जगत घूम कर के फिलोसॉफिकल फाउंडेशन डाल दिया एक एक माहौल खड़ा कर दिया संघ की स्थापना भी कर दी किंतु हमको पता है कि ये 1902 में तो स्वामी जी का देह त्याग हो चुका था महा समाधि हो चुकी थी और संघ ने तो अभी प्रारंभ ही किया है और स्वामी जी की महासमाधि के बाद में कुछ-कुछ लोग ऐसा सोचना शुरू कर दिए थे उसमें स्वामी जी के कुछ वेस्टर्न डिसाइल्स भी थे मैंने निवेदिता तो थी ही थी और भी कुछ लोग थे जो कि ऐसा सोचना शुरू कर दिए कि बस स्वामी जी ही तो सब कुछ थे स्वामी जी की महासमाधि के बाद में अभी वहां पर रहा ही क्या है रामकृष्ण मिशन में रामकृष्ण संघ में तो उन्होंने भी अपना जो सपोर्ट जितना एंथू सियास्ट कली देते थे उतना देना बंद कर दिया था तो ये सब मामला सब चल रहा था उस समय मां और राजा महाराज के गाइडेंस से ही और फिर दूसरा क्या है कि यह पॉलिटिकल मूवमेंट एक फ्रीडम मूवमेंट प्रारंभ हुई तो चारों ओर से यह आवाहन आने लगा यह एक बात उठने लगी कि रामकृष्ण मिशन तो देखिए कि स्वामी जी ने भारत के उत्थान के लिए उसकी स्थापना की है तो यह फ्रीडम मूवमेंट में रामकृष्ण मिशन को सर्वप्रथम स्थान ग्रहण करना चाहिए रामकृष्ण मिशन को ही इसकी लीडरशिप लेनी चाहिए ऐसा बोलने वाले भी काफी थे यहां तक कि अपने यहां पर कुछ-कुछ साथों का भी एक ऐसा मत था कि भारत के स्वातंत्र्य संग्राम के लिए यदि हम कुछ नहीं करेंगे तो फिर हमारे संघ की स्थापना का क्या अर्थ है तो उस समय यह राजा महाराज और मां इन दोनों के गाइडेंस में किंतु हम पॉलिटिक्स से बच कर के रहे अभी फ्रीडम मूवमेंट को पॉलिटिक्स शब्द से ठीक नहीं है पॉलिटिक्स कहना क्योंकि वो तो एक बही पवित्र मूमेंट थी किंतु जो भी है पब्लिक लाइफ एक ऐसी लाइफ है कि जिससे कि जहां पर भी कितने ही अच्छे इंटेंशन से कोई भी धार्मिक संघ उसमें प्रवेश क्यों ना करता हो आखिर में तो उसी धार्मिक संघ का पतन ही होगा इसके बारे में सबसे बड़ा उदाहरण है यह कैथोलिक चर्च देखिए कि जब रोमन साम्राज्य हमको पता है कि जीसस के क्रूसिफिकेशन के बाद में क्रूसिफिकेशन के बाद में जब यह जो प्रारंभिक चर्च था उसका जब फैला वा हो रहा था रोम में सेंट पीटर सेंट पॉल की लीडरशिप के अंडर में तब धीरे-धीरे करके इसके जो ब्रांच सेंटर्स थे जो यूनिट थे जगह-जगह पे लोग जमा होकर के चर्च बना रहे हैं और ये जो ओरिजिनल चर्च फादर्स जिनको कहा जाता है उनका जीवन इतना पवित्र था इतना एम्पल था कि उसको देख कर के ज्यादा से ज्यादा लोग चर्च में इकट्ठा होना शुरू हुए किंतु फिर एक समय अभी क्या है कि कोई भी सोसाइटी कोई भी धार्मिक संघ तभी तो ठीक-ठीक कार्य करेगा जबकि गवर्नमेंट अपना कार्य करती है लॉ एंड ऑर्डर जो है वो गवर्नमेंट अपने नागरिकों की रक्षा करना वो गवर्नमेंट का काम है जब गवर्नमेंट इस कार्य में फेल हो जाएगी और चारों ओर से अपने डिवटी के ऊपर में आक्रमण करना शुरू हो जाएगा तो फिर चर्च कैसे टिकेगा तो यही बात इन लोगों के साथ में हुई जैसे ही ये रोमन एंपरर रोमन साम्राज्य कमजोर होता गया ये जितने भी बर्बेरिस कहे जाते हैं जर्मनी ट्राइब्स वगैरह इन लोगों ने ह जर्मनिक ट्राइब्स वगैरह उन्होंने रोम के ऊपर में आक्रमण करना शुरू किया और किसी भी शहर में जाएंगे तो सबसे ज्यादा शांति पवित्रता संपत्ति वगैरह किसके पास में होगा तो क्रिश्चन लोगों के पास में क्योंकि जो अच्छा जीवन जीता है उसके साथ में सब कुछ अच्छा होता है वो ट्रेड बोलो ना कि फिर वो मर्चेंडाइज बोलो ना कि एक इकोनॉमिक पोजीशन बोलो सबकी काफी भी अच्छी थी तो क्रिश्चन लोगों के ऊपर में आक्रमण होना शुरू हो गए बाहर से भी और भीतर से भी वो नीरो बोलकर के एक पागल राजा था एंपरर था उसने सोचा कि मेरे राज्य में जो कुछ भी गड़बड़ हो रही है उसको उसके लिए जिम्मेदार है ये क्रिश्चन लोग ये मेरे जितने भी अच्छे एफर्ट है गवर्नेंस के उसको ये लोग सेबो टेज कर रहा है तो उसने क्या किया क्रिश्चियन लोगों को पकड़ पकड़ करके स्टेज स्टेक के ऊपर में जिंदा जलाना शुरू किया तो अभी चारों ओर से आकर आक्रमण हो रहा है तो चर्च को तो अपने डिवटी है अपने फॉलोअर्स है अपने को तो बचाना ही है तो धीरे-धीरे उन्होंने पॉलिटिक्स में इंटरवेंशन करना शुरू कर दिया कभी इस काउंट को पकड़ेंगे कभी इस ड्यूक को पकड़ेंगे कभी इस उसको राजा को पकड़ेंगे कहेंगे तो हमारा काम कर दो हम तुमको यह कर देंगे ये जो कंटेंटाइनसेट ये कंटेंटाइनसेट ये सोच कर के अभी उसने देखा कि उसके बहुत सारे सोल्जर क्रिश्चियन है तो अभी ये इतने सारे क्रिश्चियन सोल्जर है उसकी आर्मी में तो क्यों नहीं इनको एंकरेज करने के लिए कि भाई तुम बड़े अच्छे से फाइट करो उसने ये कहा अभ उसने सही सही देखा कि वो नाटक कर रहा है वो तो हम देखने को नहीं गए किंतु उसने देखा कि आकाश में प्रकाश पुंज के भीतर में एक क्रोस है आकाश में उसने देखा अभी यह बात उसने सबको बताई कि मैंने आकाश में क्रॉस देखा है अभी जो जो एंपरर जो थे जो कि क्रिश्चियन लोगों को मार रहे थे वैसा ही एक एंपरर आकर के ऐसा कहता है कि मैंने आकाश में क्रॉस देखा तो सैनिक लोग इतने खुश खुश हो गए फिर इसे इसने कांस्टेंटाइना भी शील्ड थे शील्ड यानी कि वो जो तलवार मारते हैं तो अपने बचाव के लिए जो शील्ड रखते हैं उसके शील्ड के ऊपर में उसने क्रॉस पेंट करवाए अभी क्रॉस की शक्ति से हम लोग फाइट करेंगे तो फाइट में जत भी गए कंटेंटाइनसेट रिलीजन घोषित कर कर दिया तो यह 400 साल की यात्रा है आई थिंक 400 एडी के आसपास में कंटेंटाइनसेट पोल और पीटर के क्रूसिफिकेशन के बाद में और कहां यह स्टेट रिलीजन हो गया और दिन रात पॉलिटिक्स कर रहा है और आखिर में हमको पता चला ये डार्क एजेस इसी की वजह से आए कि चर्च जो था वो जितने भी फ्रीडम था फ्रीडम ऑफ माइंड फ्रीडम ऑफ आइडियाज फ्रीडम ऑफ थॉट यह सबको सप्रे कर दे रहा है बाइबल में जो लिखा है वही सही है 4000 साल पहले जो विश्व की शुरुआत हुई है तो 4000 साल पहले ही हुई है आजकल के जो आर्कियोलॉजिकल एविडेंस मिल रहे हैं जिससे कि पता चलता है कि जीवन तो यहां पर 1 लाख साल पहले था 10 लाख साल पहले था वो सब गलत गलत है तो ये जो फ्रीडम ऑफ थॉट्स को सप्रे किया उसकी वजह से यूरोप पूरा डार्क एजेस में डूब गया और फिर वहां से रेनेसा रिफॉर्मेशन की मदद से य लोग फिर से अंधेरे के युग में से बाहर आए चर्च ने जो एक पूरा एक रखा था गला दबा करके सभी का उसको वह हटा दिए तो यह देखिए कि कितना ही अच्छे इंटेंशन से आप पॉलिटिक्स में जाते क्यों ना हो किंतु पॉलिटिक्स में जाने के बाद में एक भयानक पीरियड एक शुरू होता है आध्यात्मिकता खत्म हो जाती है करप्शन प्रारंभ हो जाता है तो यह मां थी और राजा महाराज थे कि जिसके गाइडेंस में रामकृष्ण संघ पलि से बचा रहा अभी यहां तक कि निवेदिता भी इस तरह से पब्लिक लाइफ में चली गई थी और निवेदिता तो स्वामी जी की इतनी मने डेडिकेटेड डिसाइल है तो यह देख कर के बहुत सारे लोग ऐसा सोचना शुरू कर दिए थे कि रामकृष्ण संघ अपनी पूरी ये गवा बैठा है उसका जो ति है उसकी जो गरिमा है उसकी जो कार्यावटम कि आनंद बाजार पत्रिका जिसका कि नाम एटलीस्ट मैंने तो जब बच्चे थे तो स्कूल की किताबों में पढ़ा था कि ब्रिटिश गवर्नमेंट के सामने आवाज उठा कर के जो कुछ लोग बात करते थे उसमें यह आनंद बाजार पत्रिका भी थी तो यह आनंद बाजार पत्रिका में संघ के विरोध में आए दिन कुछ ना कुछ गड़बड़ ऐसा गलत गलत न्यूज़ फेक न्यूज़ जिसको हम आजकल कहते हैं वह सब आना शुरू हो गया था तो देखिए कि चारों ओर से प्रेशर में है अपना संघ जैसे की वो जो अपना जो वाइस रॉय हां वाइस रोय डिक्लेयर कर देता है कि रामकृष्ण मिशन रेवोल्यूशन यों को पनाह दे रहा है तो ये जैसे ही उसने दरबार में यह अनाउंस किया तो बहुत सारे लोग डर गए सोच रहे हैं कि अभी ब्रिटिश गवर्नमेंट जद साधुओं को अरेस्ट करना शुरू कर देगी साधुओं को डिवटी को तो अपना क्या होगा यह डर के मारे कुछ कुछ डिवटी मठ में आना बंद कर दिए उस समय जोसेफाइन मैक्लाउड थी कि जो कि अमेरिका के एंबेसेडर थे मिस्टर पेटरसन ने कि ऐसा कुछ ना तो उनको लेकर के वाइस रॉय को मिलने के लिए गई और कहा अमेरिका की ओर से प्रेशर डलवाया कि देखिए कि हमको पता है हम रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद को पहचानते हैं वे लोग किसी भी रेवोल्यूशन एक्टिविटी में संलग्न नहीं होंगे इसकी हम गारंटी देते हैं तब कहीं जाकर के इसने अपना बयान जो है अपना स्टेटमेंट वापस लिया वाइस रोय ने तो यह जो एक स्ट्रगल के भीतर में रहना संघ की स्थापना तो हो गई है किंतु चारों ओ से जो प्रेशर आता है उसके में अपने मन को ठंडा रख कर के साधन भजन को पकड़ कर के एक सही डायरेक्शन देना यह कार्य किया था राजा महाराज ने स्वामी ब्रह्मानंद ने और मां ने तो यह पूरा चला मां की महासमाधि हुई 1920 में और राजा महाराज की 1922 में तब तक संघ एक बहुत ही पावरफुल स्ट्रांग फाउंडेशन के ऊपर में लग गया था उसके बाद में महापुरुष महाराज अखंडानंद जी और विज्ञानानंद जी तीन जो प्रेसिडेंट हुए उसमें घटना वली तो बहुत सारी है बहुत इंपॉर्टेंट है किंतु जो संघ का जो नॉन पॉलिटिकल प्योर रिलीजियस एंड सर्विस ऑर्गेनाइजेशन रूपी जो फाउंडेशन था वो उस पीरियड में लग गया था 20 साल में स्वामी जी की महासमाधि से लेकर के राजा महाराज मां और राजा महाराज की महासमाधि तक ये 20 साल है रामकृष्ण मिशन के लिए बड़े ही क्रिटिकल थे उस समय मां और राजा महाराज के अलावा और कोई भी होता तो पता नहीं या तो हम पॉलिटिक्स में चले जाते नहीं ऐसी कोई एक विचित्र डायरेक्शन में चले जाते कि आज संघ इतना पावरफुल फाउंडेशन के ऊपर में खड़ा है संघ की जो प्रेस्टीज है जो सिंसियर साधक है वो यहां पर आते हैं ऐसा नहीं कि बिना मतलब के लोगों को इकट्ठा करना है जो भी आओ मने सभी को वेलकम है ठाकुर की तिथि पूजा सेलिब्रेट हो रही है दक्षिणेश्वर में उस समय स्वामी जी अमेरिका में थे तो किसी ने स्वामी जी को पत्र लिखा कि अभी बहुत पॉपुलर हो गए हैं कलकाता में और उनकी तिथि उनकी जन्म जयंती जब सेलिब्रेट होती है तो जितनी भी महिलाएं जिनका चरित्र अच्छा नहीं है वही सब दक्षिणेश्वर जाकर के उस उत्सव में शामिल होती है इसलिए हम लोग भद्र लोग हैं हम लोग जा नहीं पाते तो स्वामी जी ने पत्र में उत्तर दिया कि ठाकुर की जन्मतिथि और ठाकुर भद्रलोक के लिए है ही नहीं तुम लोगों को जाने की जरूरत ही नहीं है जो पतित है जो जो पद दलित है जो पापी है ता है उनके लिए ठाकुर आए हैं उन सबको वहां पर ठाकुर के उत्सव में जाने दो भद्र लोग अपने घर में ही रहो तो ठाकुर आए हैं सबके लिए किंतु संघ का एक गरिमा है तो संघ एक गरिमामय रूप से अपना एक कार्य करता है जिससे कि समाज में अपनी एक अच्छी प्रेस्टीज है आज कोई एक संघ के ऊपर में उंगली उठा कर के नहीं कहेगा कि यहां पर गड़बड़ हो रही है देखिए इंडिविजुअल केसेस तो हर जगह पर होंगे जहां पर मानव है वहां पे मानव की साथ में ही माया जुड़ी हुई है तो इंडिविजुअल केसेस तो होंगे किंतु ओवरऑल संघ के ऊपर में आज कोई भी उंगली नहीं उठा सकता तो वो जो फाउंडेशन था रामकृष्ण मिशन का वह उस 20 साल में हुआ तो यह है पूरा एक स्ट्रक्चर्ड थिंकिंग ऑफ अवर ऑर्डर और उसमें भी प्रत्येक घटना को प्रत्येक फेज में इतनी सारी घटनाएं है उस सभी का मैंने वो जो मैंने कहा था ना कि एक कंप्रिहेंसिव क्रोनोलॉजी है वो सब इसके में है तो अभी इसके बारे में और ज्यादा डिस्कशन फिर कभी समय मिलेगा तो करेंगे आज दक्षा ही पर स श्री देखिए ठाकुर के जीवन में आनंद साधना और बचपन का तो कभी अभाव नहीं था इवन दक्षिणेश्वर में भी थे हमने कल डिस्कस किया था एक छोटा बच्चा ठाकुर के पास में आता है और ठाकुर अपनी वो जिलेबी की जो कटोरी है जो ये है बास्केट उसको छुपा देते हैं तो बचपना आनंद और साधना यह सब तो ठाकुर के जीवन में कभी भी यहां से शुरू हुआ वहां से समाप्त हुआ ऐसा कह नहीं सकते किंतु बात ये है कि जब हम सोचेंगे तब हम कुछ ना कुछ डिवीजन करेंगे तो इसके लिए एक फॉर्मल डिवीजन मैंने किया है सही सही में देखा जाए तो ठाकुर के जीवन तो एक प्रवाह में ही बह रहा है हम लोग तो अपनी एक सीमित बुद्धि से यह सब डिवीजन करते हैं तो इसी तरह से पलक ही यह सब डिवीजन है इसको कोई इतना सीरियसली नहीं लेना है जो साधक है वो तो ठाकुर तो हमेशा से ही अवतार थे तो उनको फिर साधना की क्या फिर बात हो गई उनके लिए सिद्धि इस दिन को मिली इससे पहले वोह साधन थे ऐसा तो कुछ बोल ही नहीं सकते वो हमेशा के लिए सिद्ध ही थे लोक कल्याण के लिए उन्होंने यह सब अभिनय किया है तो एक अभिनय के रूप में ही यह सब चीजों को लेना है