Invocation
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का प्रवचन माय प्लान ऑफ कैंपेन हमने ऑलरेडी कुछ पॉइंट्स देख लिए हैं। 18th पॉइंट चल रहा है। ग्लोरी ऑफ दी आत्मन यदि भारत का पुनः उत्थान करना है। सुप्त भारत माता को फिर से जागृत करना है। हालांकि भारत माता सुप्त नहीं है। हम ही लोग सो गए थे तो जो भी है भारत की एक जनता को यह भारत के जनसाधारण को फिर से जागृत करना है। तो हमको आत्मन की महिमा के बारे में समझना होगा। क्या कहते हैं स्वामी जी?
हमें चाहिए मनुष्य बनाने वाली, चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा-पद्धति
व्हाट वी वांट आर मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टिल। चाहिए फौलाद की मांसपेशियां और चाहिए स्टिल की यह नर्व्स। वी हैव वेप लॉन्ग इनफ। बहुत हो गया रोना धोना। नो मोर विपिंग। और ज्यादा रोने की आवश्यकता नहीं है। और ज्यादा रोना धोना नहीं करना है। बट स्टैंड ऑन योर फीट एंड बी मैन। अपने पैरों पर खड़े हो और मर्द बनो। इट इज अ मैन मेकिंग रिलीजन दैट वी वांट। इट इज मैन मेकिंग थरीज दैट वी वांट। इट इज मैन मेकिंग एजुकेशन ऑल अराउंड दैट वी वांट। मन मनुष्य बनाने वाली थ्यरीज हमको चाहिए। मनुष्य बनाने वाला रिलीजन चाहिए। मनुष्य बनाने वाला एजुकेशन चाहिए। यहां पे मनुष्य बनाने वाले का क्या अर्थ है? एक्चुअली कैरेक्टर बिल्डिंग होना चाहिए। एक आदमी और एक पशु के बीच में यही तो फर्क है ना। कैरेक्टर का फर्क है। तो देखिए कि यह पशु का भाव है। अपने खुद की यह जो देह है, अपना खुद का यह जो इंद्रियों के यह जो स्वार्थ है उसी के लिए उनका यह जीवन है। जबकि यह सैक्रिफाइस जो है, जबकि यह प्रेम जो है, यह सेल्फलेसनेस जो है वह मनुष्य के भीतर में है। यह सेल्फलेसनेस और इंद्रिय संयम यहां से ही हमारा मनुष्य जीवन सही-सही में प्रारंभ होता है। दूसरों के प्रति करुणा नहीं है और यदि इंद्रियों के विषय में हम पूरे फंसे हुए हैं। क्रूरता और लोलुपता यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। जो आदमी क्रूल है वही आदमी वो एक्सट्रीमली उसके ये जो डिजायर्स है वो एक्सट्रीमली स्ट्रांग होंगे। ऑन दी अदर हैंड जिसके ये जो इंद्रियों की ये जो वासनाएं हैं वो धीरे-धीरे करके शिथिल हो जाती है वही आदमी वही मनुष्य करुणा और प्रेम से भरना वह उसका हृदय स्टार्ट हो जाएगा। उसके मन में सभी के प्रति अनुकंपा, कंपैशन, एंपैथी का उदय होगा। तो यहां पर यह ऑन वन हैंड है डिजायर्स ऑफ सेंसेस और क्रूल्टी अर्थात कि इंद्रियों के विषयों के प्रति आकर्षण और दूसरों के प्रति क्रूरता। एक प्रकार का सेल्फिशनेस स्वार्थ परता और दूसरी ओर है इंद्रियों के विषयों के प्रति विमोह उनका त्याग और मन बाकी सबके प्रति मनुष्य जाति समग्र के प्रति प्रेम करुणा और कंपैशन यह है हमारी जर्नी जितने जितने हम पशुत्व की ओर जाते जाएंगे उतना ही हम देखेंगे कि हमारा मन जो है इंद्रियों के विषयों के पीछे में दौड़ता है और इतना ही हम सेल्फिश भी होते जाते हैं और जितना हम मनुष्यत्व की ओर जाएंगे उतना ही हमारे इंद्रियों के विषयों के प्रति त्याग बढ़ता जाएगा और बाकी सबके प्रति प्रेम मैत्री करुणा और मुदिता का उदय होगा। चित्त प्रसाद का उदय होगा। तो यह देखिए कि यह है हमारी जर्नी पशुत्व की ओर से मनुष्यत्व की ओर यह आहार, निद्रा, भय, मैथुन यह चार जो होते हैं जिसमें सबसे ज्यादा स्ट्रांग वो है पशु। और यह जो चित्त प्रसाद जिसमें ज्यादा स्ट्रांग है मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा वो है असली मनुष्य। उसका है सही-सही संस्कार। तो यहां पर जब स्वामी जी यह कहते हैं कि मैन मेकिंग रिलीजन चाहिए, मैन मेकिंग थ्यरीज चाहिए, मैन मेकिंग एजुकेशन चाहिए। उसका अर्थ यह नहीं आप प्रश्न कर ही सकते हैं। मैं तो ऑलरेडी मैन हूं। मैं तो ऑलरेडी एक ह्यूमन हूं। तो फिर और ज्यादा ह्यूमन क्या होना है? तो इसका अर्थ स्वामी जी यहां पर चरित्र की दृढ़ता के बारे में चरित्र का यह जो गठन है उसके बारे में बात कर रहे हैं। कैरेक्टर बिल्डिंग के बारे में बात कर रहे हैं। और यह जो मसल्स ऑफ आयरन एंड
स्वामी विवेकानन्द कहते है सशक्त बनो. इसका अर्थ क्या है? सही शक्ति है ज्ञान और विज्ञान की सीमाओं को लांघना
नर्व्स ऑफ स्टील इसके बारे में भी कल हमने चिंतन किया था। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम लोग दूसरों पर शोषण करें। जिस तरह से ब्रिटिश एंपायर था। जिस तरह से यह नेपोलियन का एंपायर था, जिस तरह से चंगेज खान का एंपायर था, जिस तरह से मुगल एंपायर था, इन लोगों ने दूसरे देशों पर आक्रमण करके उन लोगों का शोषण किया, कत्लेआम किया, धन संपत्ति वैभव लूट लिया। इन लोगों को गुलाम बना दिया। इस तरह का यह नर्व्स ऑफ स्टील और मसल्स ऑफ आयरन नहीं। अपनी खुद की इंद्रियों के आकर्षण जो है उसके सामने दृढ़ता पूर्वक युद्ध कर सके। इस तरह के नर्व्स ऑफ स्टील एंड मसल्स ऑफ आयरन वो एक चीज है और दूसरा है देखिए बाह्य जगत में साहस का आवश्यकता जरूरत तो पड़ता ही है। यह जैसे कि यह एज ऑफ एक्सप्लोरेशन था। यूरोपियन लोगों ने खास करके यह पूरी पृथ्वी पर समुंदर समुंदर के माध्यम से थ्रू द सी लेंस उन्होंने पूरी पृथ्वी को एक्सप्लोर किया। गहरे से गहरे अफ्रीका के जंगलों में प्रवेश किया। ऊंचे से ऊंचे यह हिमालय को सर किया। गहराई से गहराई में यह जो मेरियाना ट्रेंच है आजकल का वो कहते हैं कि पृथ्वी पे जो सबसे गहनतम बिंदु है सो सबसे डीप डीपेस्ट जो पॉइंट है समुंदर की जो आप नीचे चले जाएंगे तो सबसे गहरी जगह है तो वो है मेरियाना ट्रेंच तो पेसिफिक ओशन में है वहां तक हम लोगों ने यह सबमरीन वगैरह भेज दी है अवकाश में हम चांद तक पहुंच गए हैं मार्स यह मंगल ग्रह पर जाने का हम लोग सोच रहे हैं। प्लान कर रहे हैं। सोच के देखिए जो एस्ट्रोनॉट पहली बार चांद पे चले होंगे। यह नेल आर्मस्ट्रांग है। यह बस एल्ड्रिन है वगैरह। उन लोगों ने क्या अनुभव किया होगा? पहली बार मनुष्य पृथ्वी ग्रह छोड़कर के दूसरे ग्रह पर जाता है। मैंने एक जगह पर सुना था। आई डोंट नो कि इसकी वास्तविकता कितनी है। किंतु सुना था आपने किसी डॉक्यूमेंट्री में ही शायद कि यह जो एस्ट्रोनॉट जाते हैं दूसरे ग्रह मतलब चांद के ऊपर में या तो फिर इवन उस समय शुरू-शुर में स्पेस स्टेशन में तो क्या था कि यह जर्नी था। इतना अनसर्टेन था और अपनी टेक्नोलॉजी कोई इतनी पावरफुल नहीं थी। आजकल के मोबाइल में ये जो Appollo 13 जो स्पेसशिपिप हमको चांद तक ले गया आज के मोबाइल में उससे ज्यादा कंप्यूटिंग पावर है। उससे ज्यादा आज का हमारा मोबाइल एडवांस है। तो उस समय की ये जो टेक्नोलॉजी पे भरोसा करके एक स्पेसशिपिप में आदमी चांद तक जाएगा। देयर इज नो गारंटी कि वो वापस आएगा। तो फिर क्या था कि इन एस्ट्रोनॉट्स को साइनाइड्स की एक गोली दी जाती थी। इसका अर्थ क्या है? साइनाइड की एक गोली है। जैसे ही आप खाएंगे आपका इंस्टेंट मृत्यु होगा। अभी यह गोली क्यों दी जाती है? क्योंकि क्या है? मान लीजिए ये आपकी ये इलेक्ट्रिकल सिस्टम फेल हो गई। यह लाइफ सपोर्ट सिस्टम फेल हो गई। ऑक्सीजन रुक गया ना कि अवकाश में आप किसी भी एक्सीडेंट हुआ। स्पेसशिपिप में होल हो गया और अवकाश में आप खींचे चले गए। तो यह चांद पे रह गए। मान लीजिए वो जो चांद पे लैंडिंग किया है ल्यूनर मॉड्यूल जो कि उनको रिटर्न लेकर आना है पृथ्वी पे उसने काम नहीं किया तो फिर क्या करेंगे तो फिर इस तरह की परिस्थिति में आपका जो जीवन है मान लीजिए घंटा दो घंटा दिन 1 दिन 2 दिन एक सप्ताह जितना भी आपका फूड और ऑक्सीजन चले उतना जीवन है उस समय मृत्यु निश्चित है क्योंकि पृथ्वी पर से किसी भी तरह की मदद किसी भी तरह की हेल्प आने वाली नहीं है तो उस समय निश्चित मृत्यु के सामना आप जब कर रहे हैं तो किस तरह की हताशा निराशा आ जाएगी तो बेटर है कि आप सुसाइड कर ले इसलिए यह साइनाइड पिल दी गई थी तो देखिए कि अभी आपके सामने यह जो आजकल के यह सुसाइड बमबर है उनकी बात छोड़ दीजिए तो यह जो एक पराक्रम आपको करना है जहां पर आपका मृत्यु निश्चित है माने 99% कोई ठिकाना नहीं है कि आप पृथ्वी पर वापस आएंगे। अगेन मैंने ये अपोलो मिशंस जो थे चांद पे जाने वाले जो अमेरिकन एस्ट्रोनॉट्स को ले जाने वाले मिशन तो मैंने सुना था उसे एक डॉक्यूमेंट्रीज देखी थी बहुत साल पहले जब मैं स्कूल में पढ़ रहा था उस समय अभी यह सब मुझे ठीक से याद भी नहीं किंतु खैर मैंने एक जगह पर मैंने ऐसा सुना था कि अमेरिका का प्रेसिडेंट आई थिंक प्रेसिडेंट निकन ही था उस समय जबकि यह नील आर्मस्ट्रांग और यह बस एल्ड्रिन चांद पे गए थे तो उसने ने दो तरह का स्पीच प्रिपेयर किया था। एक तो स्पीच था कि यदि ये लोग वापस आते हैं सक्सेसफुल तो उनको वेलकम करने के लिए स्पीच लिखा है और दूसरा कि यदि अवकाश में ही मृत्यु हो जाता है तो यह शोक संदेश कंडोलेंस देने वाली एक स्पीच तैयार की थी। क्योंकि क्या आखिरी घड़ी में नई स्पीच लिखना और स्पीच लिखना यानी कि यह तो सब तो हिस्टोरिकल ओकेजन है ना। सालों सालों तक हजारों सालों तक हो सकता है कि मनुष्य के इतिहास में इस घटना को याद किया जाए कि सर्वप्रथम मनुष्य यह एक दूसरे ग्रह की सतह पर चला है। तो यह स्पीच जो है इसका यह जो वीडियो है वो तो एक हिस्टोरिकलेंस है। फिर पूरा देश सुन रहा है। पूरा विश्व सुन रहा है। सबको एक प्रॉपर मैसेज मिले। एनकरेजिंग इंस्पायरिंग तो वो राइट अप लिखने में तो टाइम लगेगा। आखिरी घड़ी में पता चला यह लोग नहीं आ रहा है तो कंड ऑन स्पीच कैसे लिखना है तो पहले से ही यह सब डिफरेंट डिफरेंट सिनेरियो सोच करके ये डिफरेंट डिफरेंट स्पीच रेडी रखी अभी सक्सेसफुल आ जाएंगे तो यह स्पीच पढ़ेंगे नहीं आएंगे मर जाएंगे आकाश में एक्सीडेंट में तो यह स्पीच पढ़ लेंगे ऐसा करके सो दिस इज अ रियल करेज बाह्य जगत में भी देखिए कि दो तरह के करेज होते हैं। एक तो है कि दूसरों के शोषण करने का, दूसरों पर अत्याचार करने का, दूसरा ये साइंस एक्सप्लोरेशन, ये आर्ट्स, ये म्यूजिक आप देखिए कि कोई भी क्षेत्र में आप नया जाना चाहते हैं, प्रवेश करते हैं। आपके सामने चैलेंजेस तो आएगी ही आएगी। उस समय उस चैलेंज को दृढ़ से दृढ़ता से मुकाबला करना। एकदम अपने हृदय को इस तरह से तैयार करना, मजबूत करना कि कैसा भी स्ट्रेस नजर के सामने आ जाए हम लोग डरेंगे नहीं, हम लोग हारेंगे नहीं। उस समय यह रॉक क्लाइंबिंग जो होता है ना यह माउंटेन क्लाइंबर्स जो वगैरह होते हैं। तो यह डिस्कवरी पे मैं डॉक्यूमेंट्रीज देख रहा था। मैं जब स्कूल में पढ़ता था तो यह डॉक्यूमेंट्रीज देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। तो उस समय मैं देखता था। मुझे खुद को क्या है कि हाइट का थोड़ा सा डर लगता है। हमेशा मैं ऊंची जगहों को अवॉइड करता हूं। यहां पर यह लोग है वह सीधा जो सतह ये जो यह है पहाड़ की यह जो शिखर है वहां पर जाने का जो रास्ता है सीधा जाता है। वो जो एक हैमर होता है ना हैमर और यह जो नेल वाले बूट होते हैं इस तरह के शूज और यह हैमर और एक रस्सी ऐसा लेकर के यह लोग चढ़ना शुरू कर देते हैं और चढ़ते ही जाएंगे। चढ़ते ही जाएंगे। थोड़ा सा आप नीचे देखें तो मैं तो यदि इस तरह से नीचे देखूंगा तो मैं चक्कर आकर के मैं वहीं पर गिर जाऊंगा। वह फिर जो हैमर है हथौड़ी जो है उसको हाथ में पकड़ने का साहस ही नहीं रहेगा। जबकि यह लोग हैं उनका हृदय कितना स्ट्रांग होगा कि इतने में 100 फुट ना इतना ऊपर हवा में उठे हुए नीचे देखते हैं सीधी खाई है गिरेंगे तो मृत्यु फिर भी उनको कोई डर नहीं लगता है और रेदर इनके इंटरव्यू सुनेंगे तो कहेंगे कि हमको डर तो लगता है किंतु डर पर विजय पाने की एक क्षमता भी हमारे में है। कोई-कोई माउंटेन क्लाइंबर्स को आप देखेंगे। ये जो विश्व के जो हाईएस्ट ये जो शिखर है 2000 मीटर्स प्लस ये जितने भी शिखर है सब उन्होंने सर कर दिए हैं। उसमें यह अपना एवरेस्ट भी आता है। यह फिर किलीमांझारो भी एक है। पाकिस्तान का वो नंगा पर्वत है। इस तरह के वो जो साउथ अफ्रीका में साउथ साउथ अमेरिका में एक दो है। इस तरह के 10 ना कि आठ जो हाईएस्ट पिक्स है। हाईएस्ट माउंटेन है विश्व के। तो कोई होते हैं कि सभी के सभी हम क्लाइम करेंगे। इस तरह का उनमें जुनून होता है। यह सर्फिंग करने वाले लोगों को आप देखिए। यहां पर समुंदर है तो मैं कभी-कभी सोचता हूं समुंदर में पानी एक पैर रखने का भी माने 1 इंच पानी में पैर रखने का भी मुझे डर लगता है। अभी लगता है। पहले नहीं लगता था। अभी लगता है। किंतु उस समय मैं सोचता हूं यह लोग जो सर्फिंग करते हैं समुंदर की इतनी बड़ी वेव आएगी। उसमें सर्फ बोर्ड लेकर के यह लोग खुद पड़ेंगे। तो यह कैसे यह लोग साहस जुटा पाते हैं? यह आश्चर्य होता है। किंतु क्या है? देखिए जो प्रजा साहसी है उसी का विजय होता है। हां आप कहेंगे कि साहसी के साथ में क्रूरता भी तो इन लोगों के भीतर में आ जाती है। तो ठीक है। हम लोग ऐसा नहीं कि साहसी होने का अर्थ क्रूर ही होना यह कोई यूनिवर्सल लॉ नहीं है। अनफॉर्चूनेटली इतिहास में ऐसा बहुत बार हुआ है। मोंगोल प्रजा का इतिहास सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ मोंगोल्स बोलकर के एक किताब है। उसको मैंने पढ़ा था तो मैंने देखा कि युद्ध करने का ये स्ट्रेटजी डेवलप करने का ये फाइट करने का ये मोंगोल लोगों में कितना साहस होता है। बचपन से ही यह बच्चा होता है। घोड़े की पीठ के ऊपर में ही उसका पूरा जीवन बीतता है। वो घोड़े में सवार होकर के फुल स्पीड से यह हॉर्स जा रहा है और वहां से वह तीर मारेगा तो ऐसा एक्यूरेट मारेगा सीधा निशान पर लगेगा। तो यह सब ट्रेनिंग बच्चों में होती है। छोटी उम्र से ही इस तरह के सुपर फास्ट घोड़े पर सवारी करना सीखना। आपको तो साहस चाहिए ही चाहिए क्योंकि गिरे तो हाथ पैर टूटना गारंटी है। इसके बावजूद यह लोग यह सब हॉर्स राइडिंग वगैरह करते थे। अभी यह जो करेज है कहां उसको मनुष्य जात के लिए मनुष्य सभ्यता के लिए उसको बेनिफिशियल कोई यूज करना ऐसा नहीं करके उन्होंने अपना एक एंपायर खड़ा किया और एंपायर में भी इतनी क्रूरता इतनी क्रूरता हमारा भारतीयों का तो एक मेमोरी जो है रेशियल मेमोरी जिसको कहते हैं कलेक्टिव मेमोरी नेशनल मेमोरी हमको तो पता है कि यह तैमूर ललंग है चंगेज खान है या तो फिर यह जितने भी यह वेस्ट एशिया से आने वाले यह आक्रमणकारी हैं। यह दिल्ली वगैरह जगह पर जहांजहां आक्रमण किया यह मनुष्यों के सर काट के उसके बड़े-बड़े पहाड़ बना दिए थे। तो यह भी एक आपका एक नेगेटिव यूज़ है आपके साहस का। यदि चाहे तो पॉजिटिव यूज कर सकते हैं। उसको मनुष्य सभ्यता के लिए आशीर्वाद समान बना सकते हैं। जैसे यह जितने एक्सप्लोरर्स है, एस्ट्रोनॉट है वगैरह। तो क्या है कि साहस चाहिए किंतु सात्विक साहस चाहिए। नहीं कि तामसिक साहस। एक राक्षस के भीतर में भी शक्ति है और भगवान कृष्ण भगवान राम के भीतर में भी शक्ति है। भगवान राम और भगवान कृष्ण ने अपनी अपना साहस और शक्ति का इस्तेमाल अपने ये भाई बांधवों की रक्षा करने के लिए किया। अपने राज्य के जो निवासी है उनकी रक्षा करने के लिए किया। और जो रावण में शक्ति थी उसने यह मां सीता का अपहरण करके किया। तो हम शक्ति का क्या इस्तेमाल करते हैं? वह हमको वेदांत सिखाता है। किंतु शक्ति होनी चाहिए। जब तक शक्ति नहीं होगी और सिर्फ वेदांत की बातें करेंगे तो फिर वह भी किसी काम का नहीं है।
आत्मश्रद्धा: भारत के उत्थान में स्वामी विवेकानंद का अद्वितीय योगदान
कल ही जैसे कि हमारी बात हो रही थी कि जब हम ठाकुर और मां को पढ़ते हैं और फिर जब स्वामी जी को पढ़ते हैं हमको कितना बड़ा एक कंट्राडिक्शन दिखता है। खास करके स्वामी जी के यह वेदांत के ऊपर में संदेश है। इंस्पायर टॉक है, ज्ञान योग है, कर्म योग है, भक्ति योग है, राजयोग है वगैरह है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं। किंतु व्हाट इज क्विंट एसेंशियल स्वामी जी? व्हाट इज दिस एसेंस ऑफ स्वामी विवेकानंदास मैसेज दैट इज मैन मेकिंग रिलीजन। दिस इज दिस मैन मेकिंग थरीज। दिस इज मैन मेकिंग एजुकेशन नर्व्स ऑफ स्टिल एंड मसल्स ऑफ आयरन। यह जो एक पैराग्राफ हमने पढ़ा दिस इज क्विंटसेंशियल स्वामी जी। यहां पर स्वामी विवेकानंद हमको जो बात कहते हैं शायद 1000 साल से शायद 10,000 साल से भारत में इसका जयघोष ये मनुष्य के भीतर में जो आत्मश्रद्धा है इसका जयघोष शायद पिछले 10,000 साल में भारत में नहीं हुआ। वैष्णव धर्म ने जो अपना ये जो विकास हुआ या तो इवन अद्वैत वेदांत का जो भारत में विकास हुआ इन दोनों में वैष्णव धर्म ने भक्ति और शरणागति को अपना मुख्य माध्यम बनाया और अद्वैत वेदांत ने त्याग और स्वाध्याय और ज्ञान को मुख्य माध्यम बनाया। किंतु यह आत्मश्रद्धा है। यह उपनिषदों में इसकी महिमा गाई गई थी। भगवान राम भगवान कृष्ण ने इसकी महिमा का गान किया था। किंतु आज के युग में यह स्वामी विवेकानंद ही सर्वप्रथम है। जिन्होंने इस आत्मश्रद्धा का गान किया है। और इस तरह से देखें तो देखिए कि म एक ब्लासफेमस आईडिया ठाकुर की कृपा से हिंदू धर्म में ब्लासफेमी नहीं है। किंतु फिर भी यदि एक ब्लासफेमस आईडिया यदि मुझे फ्लोट करना ही है। देखिए कि ठाकुर ने जो कुछ भी कहा ठाकुर ने जो साधना की ठाकुर और मां के जो उपदेश है सब आपको उपनिषद और बाद की जो हमारी हिंदू धर्म की परंपराएं हैं विभिन्न संप्रदायं हैं वहां पर हमको मिल जाएगा। ठाकुर ने उन सबको समन्वय करने का प्रयास समन्वय किया किंतु वह समन्वय फिर तो श्रीमद्भगवत गीता में भी हो चुका था। भगवान कृष्ण ही तो थे सर्वप्रथम समन्वयाचार्य। उन्हीं की ट्रेडिशन को तो श्री रामकृष्ण देव ने आगे बढ़ाया है। जबकि यह स्वामी जी का आत्मश्रद्धा का जो मैसेज है ये पिछले ये जो जब से कलियुग स्टार्ट हुआ है जब से श्री कृष्ण की महासमाधि हुई है भारत में से जैसे कि ये आत्मश्रद्धा का संदेश जो है आत्मश्रद्धा की जो महिमा है वही जैसे कि हम लोग भूल गए हैं और उसका यही परिणाम आया है कि पहले तो बुद्धिज्म के कुछ उटपटांग विचारों ने हमारे सर पर आक्रमण करके रख दिया और उसके बाद में यह विदेश आक्रमणकारी प्रारंभ हुए तो हम लोगों जैसे कि अपनी आत्मरक्षा करना ही भूल गए। एक बहुत ही ज्यादा अधरवली बहुत ही ज्यादा स्पिरिचुअल होकर रहे। स्वामी जी का एक स्टेटमेंट है। स्वामी जी कहते हैं कि भारत में आध्यात्मिकता होने का एक सबसे बड़ा बेनिफिट यह है कि बार-बार अवतार का जन्म होता रहता है। किंतु साथ में ही प्रॉब्लम यह है कि एक अवतार के आने से दूसरे अवतार के आने तक बीच का जो समय है कोटि-कोटि लोगों को सहन करना पड़ता है। दुख कष्ट वरण करने पड़ते हैं। तो यह कहां का न्याय है कि एक अवतार को प्रकट करने के लिए करोड़ों-करोड़ों लोग भूखे प्यासे दरिंदों के अत्याचारों से ग्रस्त होकर के रहे। ऐसा कैसे चलेगा? यह स्वामी जी कहते हैं। तो यह भारत में एक एक्सेसिव आध्यात्मिकता इट इज लाइक एक्सेसिव आध्यात्मिकता यह कहना कैसा है? पता है कि हमने बहुत ज्यादा मृत का पान कर लिया। जनरली क्या होता है? कि आप शरबत है, चाय है, कॉफी है ना कि आजकल जो चलता है सब यह शराब खराब है। ज्यादा आप पी लेंगे तो आपको अवश्य द बीमारी होगी। यह रसगुल्ला है। एक खाया तो अच्छा लगा, दो खाया तो और भी ज्यादा अच्छा लगा। तीन खाया तो पेट में दर्द हो गया। यानी कि यह जितना खानपीन ये जो है ये खानी पीनी यानी कि ये फूड वगैरह जितना भी है यह जितना आप ज्यादा खाएंगे ना थोड़ा सा अल्प मात्रा में ग्रहण करेंगे तो स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। शरीर को पुष्टि देता है। किंतु जैसे ही एक्सेसिव खाएंगे वैसे ही शरीर में बीमारी प्रकट होगी। किंतु अमृत का ऐसा नहीं है। अमृत का आप जितना भी पान करते रहे वह आपको और ज्यादा से ज्यादा और ज्यादा से ज्यादा संपुष्ट करता जाएगा। यह जो ठाकुर की वो फेमस जो सीमाइल है ये उपमा जो है नरेंद्र को कहते हैं अमृत के सागर का पान करोगे मक्खी होकर के तो कैसे करोगे? तो नारायण कहता है मक्खी होकर के यदि अमृत के सागर का पान करना है तो किनारे पर खड़े रहकर बड़े ही सावधानता पूर्वक अपना मुंह लंबा करके उसमें से मैं थोड़ा सा पान करूंगा कहीं उसमें गिर ना जाओ तो ठाकुर क्या कहते हैं बाबा एटा तो अमृतेर सागर यह तो अमृत का सागर है इसमें गिरोगे तो तुम्हारा मृत्यु नहीं होगा तुम अमर हो जाओगे तो यहां पे भी ऐसा कहना कि भारत में एक्सेसिव स्पिरिचुअलिटी थी यह ऐसे कहने के बराबर है कि हमने बहुत ज्यादा अमृत का पान कर लिया अमृत का पान करने से या बहुत ज्यादा स्पिरिचुअलिटी होने से नुकसान नहीं होगा। बेनिफिट ही होगा। किंतु क्या है कि वह बेनिफिट एक डायरेक्शन में जाता है। इनर वर्ल्ड में हमारा जो यह कॉन्शियसनेस है, यह कॉन्शियसनेस, हमारे संस्कार, हमारा चरित्र, हमारी यह साधना यह सब परिपुष्ट होता है। किंतु बाहर के जगत में उसका मैनिफेस्टेशन आत्मश्रद्धा के माध्यम से ही आएगा। यह ऐसा कहने के बराबर है कि यह दो पहलवान, दो सैनिक आपस में युद्ध कर रहे हैं। एक सैनिक बड़ा ही तगड़ा है। बड़ा ही उसमें शक्ति है। जबकि दूसरा सैनिक है वो इतना तगड़ा या इतना शक्तिमान नहीं किंतु उसके हाथ में तलवार है। और ये तलवार जो है ये दूसरा जो सैनिक है जो सैनिक जो कि स्ट्रांग तो बहुत है किंतु उसके हाथ में कोई हथियार नहीं है। उसके हाथ में ना ही तलवार है ना ही डाल है। और दूसरा सैनिक जो है जो कि कमजोर है उसके हाथ में ढाल और तलवार दोनों है। यह दोनों में यदि फाइट होगी तो कौन ज्यादा कौन जीतेगा? वही जीतेगा जिसके हाथ में शस्त्र है। क्योंकि शस्त्र जो है मनुष्य की शक्ति को मल्टीप्लाई करते हैं। एक्सटेंड करते हैं। मैं सिर्फ एक बेयर हैंडेड खुले म बिना किसी प्रोटेक्शन के बिना किसी शस्त्र के फाइट करूंगा। और सामने वाला जो है तलवार से मेरे पर अटैक करेगा या तो आजकल तो बंदूक आ गया है। बंदूक ले अटैक करेगा तो मेरी कितनी भी शक्ति हो वो किसी काम की नहीं है। मेरा पराजय ही होगा। यह भारत के साथ में यही हुआ। हम लोग थे तो बड़े ही बलवान। भीतर में थे तो था तो बड़ा ही तेज। एक के बाद एक संतों को आप देखिए भारत की भूमि पर उन्होंने जन्म ग्रहण किया है। हम लोगों का इतिहास भी इस तरह से निकम्मा तरह का पढ़ाया जाता है। मैं बहुत लंबे समय तक हालांकि आई लव हिस्ट्री। मैंने हिस्ट्री का बड़ा ही सिस्टमैटिक स्टडी भी किया है। किंतु मैं हमेशा यूरोपियन हिस्ट्री पढ़ता रहता था। क्योंकि स्कूल में भारत का हिस्ट्री पढ़कर के मेरे माइंड में यही एक फिट हो गया था कि भारत में एक राजा था। उसकी पिटाई उस बाहर वाले लोगों ने आकर के की। उसके बाद में दूसरा राजा आया तो उसकी पिटाई उन लोगों ने की। फिर तीसरा राजा आया तो यह मुगल लोग आ गए। उसने उसको मारा। तो यह पढ़कर के मैं इतना डिप्रेस हो गया था भारत के इतिहास के बारे में कि भारत का इतिहास पढ़ना मैं फ्रीडम मूवमेंट से ही स्टार्ट करता था। गांधी जी आए और फिर यह इंडियन नेशनल कांग्रेस का राइज हुआ। भारत को फ्रीडम मिला। वहां से ही मैं पढ़ता था। और फिर थोड़ा सा आगे पढ़ेंगे। 6070ज तक आएंगे फिर से डिप्रेशन चालू हो जाता है। फिर से यह भयानक पॉलिटिक्स पोइजनस पॉलिटिक्स भारत में प्रवेश करता है। यह जो 18 1890 वहां से यदि प्रारंभ करें तो यह 1960 या तो 1970 ये यहां तक का ही इतिहास पढ़ने लायक मुझे लगता था। इसके पहले वाला और बाद का वाला पूरा डिप्रेशन में डाल देता था। किंतु दिस इज अ मिस रीडिंग ऑफ इंडियास हिस्ट्री। भारत का सही इतिहास देखें। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य पढ़ने के बाद में मुझे समझ में आया कि कैसे एक के बाद एक संत महापुरुष उनका प्रागट्य हुआ। कैसे उन्होंने संप्रदायों की स्थापना की। किस तरह से उन्होंने यह अद्वैत वेदांत के आचार्यों के रूप में नए-नए ग्रंथों की रचना की। वैष्णव आचार्यों के रूप में नईनई साधन पद्धति शरणागति भक्ति और भाव की जो पदावलियों की रचना की यही तो भारत का असली इतिहास है। तो क्या है कि एक मिसअंडरस्टैंडिंग अभी दूर हुआ है। तो अभी धीरे-धीरे करके फिर से मैं उस इतिहास को पढ़ रहा हूं जो कि हमारा सही गौरवमय इतिहास है। तो यहां पर हमारे साथ में किंतु देखिए अभी प्रॉब्लम क्या होता है? इतना गौरवमय इतिहास होने के बावजूद इतने सारे साधु संत आचार्यों का आगमन होने के बावजूद यह विदेशी आक्रमणकारियों के सामने हम लोग टिक नहीं पाए। क्यों? क्योंकि विदेशी आक्रमणकारी है तो शरीर शारीरिक रूप से कमजोर किंतु उसके हाथ में यह ढाल तलवार यह कैनन उस समय की ये फायर गन पाउडर ये गन बोट यह सब ले आता है और हम लोग थे तो वैसे हृष्ट पुष्ट यह जो आध्यात्मिक अमृत का पान करके यह शारीरिक या तो मानसिक शक्ति तो वैसे बहुत थी किंतु हथियार हाथ में नहीं थे बोलकर के बार-बार पराजय स्वीकृत करनी पड़ी। यह हथियार क्या है? वह है आत्मश्रद्धा। यह हमारी जो इनर स्पिरिचुअल पावर है, एनर्जी है, स्ट्रेंथ है, उसको यदि एक्सटर्नल वर्ल्ड में प्रोजेक्ट करना है तो हमको आत्मश्रद्धा चाहिए ही चाहिए। बिना आत्मश्रद्धा के हम इस जगत में ज्यादा लंबा समय अपनी डिग्निटी और अपने फ्रीडम को मेंटेन करके नहीं रह पाएंगे। भारत का जो हमेशा होता आ रहा है हमारी आध्यात्मिकता हमको मरने नहीं देती और यह आत्मश्रद्धा का जो अभाव है वह हमको जीतने नहीं देता तो यह परिस्थिति जो है भविष्य में ना हो इसके लिए देखिए कि तीनों पहलुओं को एक साथ में रखकर के रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा का यहां पर प्रादुर्भाव हुआ है। क्यों तीनों को एक साथ में सिर्फ स्वामी जी आते और सिर्फ आत्मश्रद्धा का गान करते तो हम लोग यही मान लेते जो हमारी बदनसीबी है कि यह तो स्वामी जी जो कुछ बोल रहे हैं उसको स्पिरिचुअलिटी के साथ में कोई संबंध नहीं जैसे यह सुभाष चंद्र बोस थे ये जैसे यह अपने यह झांसी की रानी थी जैसे यह सरदार पटेल थे ही इज़ अनदर पेट्रियोट ऐसा करके एक पेट्रियोट की कैटेगरी में बिठा देते उनके ये जो आध्यात्मिक पहलू है उसको हम इग्नोर करते सिर्फ अकेले ठाकुर और मां आते तो उनकी आध्यात्मिकता इट विल बी जस्ट अनदर महापुरुष कि चलो यह चैतन्य महाप्रभु आए हैं यह जो शंकराचार्य आए हैं तो ऐसे ही श्री रामकृष्ण आ गए तो चैतन्य महाप्रभु और शंकराचार्य के आने से भारत में जो यह जो बाह्य आक्रमणकारी है या तो ये बाहर के जो धर्म है विधर्म जो है क्रिश्चियनिटी और इस्लाम इसका तो प्रभाव रुका नहीं है। यदि बहुत सारे लोग कहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु नहीं आते तो पूरा बंगाल हाथ से जाता। अभी आधा ही गया है। उस समय पूरा हाथ से जाता। मैं कहता हूं कि चैतन्य महाप्रभु के आने से तो एक्चुअली पूरा बंगाल हमारे हाथ में होना चाहिए था। आधा भी क्यों गया? यदि वह ईश्वर के अवतार है तो। खैर यह मेरा खुद का विचार है। बड़े कॉम्प्लिकेटेड हिस्टोरिकल रीज़ंस है। लेट अस नो गो इनू दैट। किंतु देखिए कि ठाकुर मां और स्वामी जी तीनों मिलकर के एक साथ में आए हैं। जिससे हमारे मन में किसी भी तरह का कंफ्यूजन ना खड़ा हो कि ये जो इनर स्पिरिचुअलिटी है और आउटर मैनिफेस्टेशन है इन द फॉर्म ऑफ सात्विक आत्मश्रद्धा नहीं कि यह तामसिक एोगेंस या तामसिक ये अस्मिता यहां पे है सात्विक आत्मश्रद्धा इसका जब प्रोजेक्शन होगा मैनिफेस्टेशन होगा तब यह जो बैलेंस है इनर और आउटर वर्ल्ड में वह फिर से बैलेंस आएगा यह वैदिक युग में ऐसा ही था। यह ऋषि मुनि थे, यह क्षत्रिय थे, सभी थे। वो सभी अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। सिविलाइजेशन जो है यह चारों पैरों पर खड़ी थी। ये माने यह धर्म के चार पैरों पर तो खड़ी ही थी। किंतु सामाजिक यह जो एक बैलेंस होना चाहिए। क्षत्रिय अपना कार्य करता है। ब्राह्मण अपना कार्य करता है। वैश्य शूद्र अपने कार्य करते हैं। और यहां पर टैलेंट पाइपलाइन भी था। यदि यह वैश्य या शूद्र का लड़का यदि उसके भीतर में साहस है तो वह क्षत्रिय भी हो सकता है। मेधा है तो ब्राह्मण भी हो सकता है। बाद में जिस तरह से हुआ कि यह जो तथाकथित अपर कास्ट तथाकथित लोअर कास्ट इनमें अपना समाज बट गया। इन दोनों में यह टैलेंट पाइपलाइन टूट गया। जो बेचारा शूद्र का लड़का है साहसी भी होगा। क्षत्रिय नहीं हो पाएगा। राजत्व करने का अपॉर्चुनिटी उसको नहीं मिलेगा और मेधा है तो विद्याभ्यास का अपॉर्चुनिटी नहीं मिलेगा। तो यहां से ही तो भारत का पतन प्रारंभ हुआ। वैदिक सभ्यता का अस्ताचल ही यहां से प्रारंभ हुआ। यह जो लोगों के बीच में अपर कास्ट लोअर कास्ट में यह जो टैलेंट पाइपलाइन का यह जो एक सेतु था वो टूट जाना और यह भीतर में जो आध्यात्मिकता है और बाहर में आत्मश्रद्धा है इन दोनों में दरार पड़ना। यहां से तो भारत का पतन प्रारंभ हुआ। इसलिए यहां पर स्वामी जी जो कहते हैं उसके इतने सारे नंसेस है यहां पर इसको सिर्फ एक एक ही तरह से इसकी व्याख्या करनी या तो फिर ऐसा कहना कि मैं जो कह रहा हूं वही इनफ है वही आखिरी है ऐसा नहीं नंस आफ्टर नंस डेप्थ आफ्टर डेप्थ हम जितना एक्सप्लोर करते जाएंगे इसके लेयर्स आफ्टर लेयर्स ओपन होते जाएंगे यह बाकी आध्यात्मिक विषय विषयों की व्याख्या करनी फिर भी सहज है। स्वामी जी के यह जो मैसेज है पूरे सिविलाइजेशन स्केल पर अप्लाई होते हैं। उसमें कोई भी एक मनुष्य अपनी बुद्धि लगाकर के यह नहीं कह पाएगा कि स्वामी जी के कहने का तात्पर्य यही है। स्वामी जी के कहने का तात्पर्य यह है। किंतु और भी कुछ हो सकता है। और भी हो सकता है। और भी हो सकता है। स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को कहा था ना कि तो ये जो तुम लोगों की ये जो चार दीवारी है तुम लोगों की अंडरस्टैंडिंग की जो चार दीवारी है उससे उसको तोड़ करके मैं ठाकुर को पूरे विश्व में फैला दूंगा। तुम लोग क्या समझते हो कि तुम लोग क्या सोचते हो कि तुमने तुम लोगों ने जिस तरह से ठाकुर को समझा है। ठाकुर क्या उतने ही थे? ठाकुर तो पूरे विश्व मानव थे। पूरी सिविलाइजेशन के लिए कॉस्मिक रिलेवेंस था उनके टीचिंग्स का। प्रत्येक मनुष्य डिफरेंट-डिफरेंट रूप में ठाकुर को समझ सकता है। विविध क्षेत्रों में अपनी आवश्यकता के अनुसार ठाकुर का जो मैसेज है अपने खुद के लिए कस्टमाइज करके वह अप्लाई कर सकता है। यहां पर आप लोग कहोगे शशि महाराज कहेंगे कि मैंने ठाकुर को जिस तरह से समझा है ठाकुर पुजारी थे। मैं भी पुजारी हूं। पूजा करना ही सर्वश्रेष्ठ है। यहां पर बाबूराम महाराज है। वह कहेंगे कि ठाकुर तो प्रेम के अवतार थे। मेरे भीतर में भी राधा रानी का प्रेम है। जितने भी डिवोटीज बेलूर मठ में आते थे सबको बड़ा ही जतन करके खाना खिलाते थे। तो यह लोग कहेंगे कि यही ठाकुर है। बाबूराम महाराज कहेंगे यही ठाकुर है। तो ऐसा नहीं ठाकुर ने उनको इतना सा समझा था अपनी क्षमता के अनुसार। बट ठाकुर हिमसेल्फ इज फार वास्टर। यहां पे भी स्वामी जी को समझने के लिए। खास करके यह जो सब्सेंशियल स्टेटमेंट्स है स्वामी जी के आइकॉनिक स्टेटमेंट यह जितने भी कोटेशन की किताब देखेंगे शक्तिदाई विचार ना कि ये थॉट्स ऑफ पावर और ये जितने भी है अग्नि मंत्र सभी में यह जो कुछ स्टैंडर्ड जो स्वामी जी के कोटेशन है दिखाई देंगे। पोस्टर्स देखिए यह आरएसएस वगैरह की यह जो शिविर होती है वहां पे यह सब कोटेशंस आपको दिखाई देंगे। यह पढ़कर के आपको लगता है कि हां यह जैसे ही यह सब कोटेशन पढ़ेंगे आपके माइंड में सीधे स्वामी जी ही आएंगे और किसी का नाम ही नहीं आएगा। ठाकुर का हालांकि यदि कथामृत पढ़ के कोई स्टेटमेंट ले तो आपको और 10 जगह पर इस तरह के सिमिलर स्टेटमेंट देखने को शायद मिल जाएंगे। किंतु वेद, उपनिषद, गीता, चैतन्य महाप्रभु, शंकराचार्य वगैरह-वगैरह त्याग, तपस्या, भाव, भक्ति यह सब तो अपने वो शास्त्रों में पूरा बिखरा हुआ है। कहां से भी इस तरह का स्टेटमेंट आप ले सकते हैं। किंतु दीज़ आर यूनिक स्वामी जी स्टेटमेंट्स। यह स्टेटमेंट पढ़कर के ही जहां पर भी यह पोस्टर लगा हो, जहां पर भी यह कोट लिखा हो, जहां पर भी इसको मेंशन किया गया हो, जिसको थोड़ा सा भी भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति, हिंदू धर्म का और ये जो ये जो है पेट्रियोटिज्म जो है राष्ट्रभक्ति, राष्ट्र प्रेम जिसमें थोड़ा सा भी है वे लोग कभी भी स्वामी जी के इस स्टेटमेंट को इस तरह के स्टेटमेंट को और किसी के साथ में मिक्स अप नहीं करेंगे। दीज़ आर यूनिक स्वामी जी यूनिक विवेकानंद और आगे क्या कहते हैं?
सत्य हमें सशक्त बनाता है. जो हमें कमजोर बनाता है उसे त्याग करो.
एंड हियर इज द टेस्ट ऑफ ट्रुथ। यहां पे है सत्य की परीक्षा। एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली, इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एज पोइजन। जो कि हमको शारीरिक मानसिक अर्थात कि बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टि से कमजोर करती है। उसको जहर की तरह उसका त्याग कर दो। देयर इज नो लाइफ इन इट। उसमें किसी भी तरह का जीवन नहीं है। इट कैन नॉट बी ट्रू। वह कभी भी सत्य नहीं हो सकती है। ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग। ट्रुथ इज प्योरिटी। ट्रुथ इज ऑल नॉलेज ट्रुथ मस्ट बी स्ट्रेंथनिंग मस्ट बी एनलाइटनिंग मस्ट बी इनविगोरेटिंग सत्य है शक्ति प्रदान शक्ति प्रदान करता हुआ शक्ति प्रदत्त है सत्य सत्य है प्योरिटी पवित्रता सत्य इज ऑल नॉलेज जितना भी नॉलेज है जितनी भी विद्या है सब सत्य के भीतर में छुपी हुई है ट्रुथ मस्ट बी स्ट्रेंथनिंग मस्ट बी एनलाइट लाइटनिंग मस्ट बी इनविगोरेटिंग। सत्य हमको शक्तिशाली ही बनाएगा। हमको एक आध्यात्मिक निर्वाण ही प्राप्त करवाएगा। हमको इनविगोरेट ही करेगा। प्रचंड साहस, अदम्य उत्साह ही प्रकट करेगा, प्रदान करेगा। यह है सत्य की डेफिनेशन। यहां पे सत्य का क्या अर्थ है? यह विभिन्न तरह की फिलॉसोफीस। यह यदि यह महात्मा है जितने भी यह थियोसोफिकल सोसाइटी के वह उनको पढ़ेंगे तो हमको अपने ऊपर में एक तरह से हीन भावना ही आएगी। कहेंगे कि इस महात्मा ने ऐसा किया तो मुझे ऐसा करना चाहिए। तो मेरे में खुद में क्या कोई दम नहीं है? मेरे खुदने में कोई ये सोचने की शक्ति नहीं है। मेरी खुद की कोई विवेक डिस्क्रिमिनेशन नहीं है। वो कुछ मुझे जो कुछ कहेगा वो क्या मैं मान लूंगा? ये जो जितना भी है स्पिरिचुअलिज्म ये मीडियम बनाना ये निरंजनंद जी महाराज वो अभी कुछ समय पहले ही उनकी ये बर्थ एनिवर्सरी गई तो मैं यहां पर पाठ कर रहा था मंदिर में यही सब कि वो मीडियम बनते थे वो घोस्ट जो होता है भूत जो होता है पुरखों के उनके सर पर सवार हो जाता था फिर वो उनके स्वर से बातें करना शुरू करते थे यह सब उस समय अमेरिका यूरोप में और इंडिया का ये जो फैशनेबल सोसाइटी है। बहुत फैलना शुरू हुआ था। इसलिए यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि सत्य का एसिड टेस्ट क्या है? जो हमको शक्ति प्रदान करता है। जो हमको बौद्धिक आध्यात्मिक और दैहिक शक्ति दैहिक बल प्रदान करता है। वो सत्य है। वो फिलॉसोफी है। उसको हमको अपनाना है। नहीं कि यह स्पिरिचुअलिज्म है। नहीं यह महात्मा है। नहीं यह थियोसोफी है। यह सबको त्याग कर दो। और सिर्फ इतना ही नहीं यह तो सरफेस के ऊपर में है। भारत में जो अंधश्रद्धा यह तंत्र मंत्र यज्ञ याग याग और यज्ञ तो फिर फिर खैर फिर भी ठीक है। किंतु ये जो ये जो ज्योतिष शास्त्र है वगैरह अभी स्वामी जी ने पहले ही कहा ना कि ऐसा नहीं है कि इन सब में कोई सत्य या तो इन सब के भीतर में कोई साइंस नहीं। किंतु मनुष्य जब अपनी आत्मश्रद्धा को छोड़कर के जब त्याग तपस्या पवित्रतामय जीवन छोड़कर के अपना शॉर्टकट प्राप्त करने के लिए इन सब चीजों का जब वह सहारा लेता है तब देखिए कि हमको कमजोरी के अलावा और कुछ नहीं देता। यह भारतीय सभ्यता ने पिछले 1000 साल से बहुत अनुभव कर लिया। बहुत मार खा लिया। बहुत ही यह सब देख लिया कि यह जितनी भी अंधश्रद्धा दुनिया भर की सब हम अपने सर पर सवार होकर के घूमते थे। मैंने अपनी नजरों से देखा है यह बात। नहीं देखा होता, नहीं सुना होता तो मैं विश्वास नहीं करता। एक बड़े ही सीनियर साधु इनके प्रति मेरी बड़ी ही श्रद्धा थी। बड़ा ही रिस्पेक्ट था। तो एक दिन गाड़ी में बैठकर के जा रहे हैं तो एक वृद्ध महिला है उनके सामने से जा रही है। अभी वह वृद्ध महिला क्या है? रेगुलरली मंदिर में आती तो थी भक्त तो थी किंतु उसका स्वभाव जो था बड़ा ही कर्कश था और बड़ा ही द्वेषपूर्ण ईर्ष्या पूर्ण इस तरह का था। वो महाराज के पास में जाकर के इस तरह की बहुत सारी बातें करती थी कि यह ऐसा है, वह ऐसा है। तो नेचुरली इस तरह की बातें सुनने को किसी को अच्छा नहीं लगेगा। किंतु यह जो स्वामी जी है उनके मन में ऐसा हो गया कि गाड़ी लेकर जब जा रहे हैं और सामने वह जो वृद्ध महिला आती है तो फिर वो गाड़ी फिरत घुमा देंगे। वो कहेंगे कि फिर से ऑफिस में जाते हैं थोड़ा सा यात्रा बदल के आना। बंगाली में कहते हैं वो जैसे वो मां आई थी ना दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर ने कहा कौन से मुहूर्त में वहां से निकली हो जय राम भाटी से। तो मां बोली बृहस्पतिवार बारबेला तो ठाकुर ने कहा अच्छा इस मुहूर्त में तुम निकली हो इसलिए मैं गिर गया और इसलिए मेरा हाथ टूट गया। तुम जाओ और यात्रा बदल के आओ। तो मां तो बेचारी क्या कहेगी? ठाकुर ने कहा है तो रह भी नहीं सकते। तो मां तो उसी समय जाने को तैयार हो गई। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा एक काम करो अभी रात यहां पर रुक जाओ। कल सुबह को जाना। तो यह जब हम प्रसंग पाठ कर रहे थे मां की जीवन में मां की जीवनी में गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखी उस समय भी मैंने कहा था कि ठाकुर के सामने यह तो अपनी कंप्लेन है कि मां को इस तरह से क्यों वापस भेजा? भाई इस तरह की अंधश्रद्धा आपके मन में क्यों क्यों है जो कि जगत के नियंत्र स्वयं है नारायण स्वयं है नारायणी के साथ में इस तरह का अन्याय पूर्ण वर्तन करेंगे किंतु खैर ठीक है वो वो ठाकुर है और मां है नारायण है नारायण है उनके लिए यह सब ठीक है किंतु हमारे लिए कि इस तरह की स्त्री का चेहरा देखने से मेरी यात्रा अशुभ होगी इसलिए मैं यात्रा बदल करके आता हूं थोड़ी देर ऑफिस में चला गया फिर से मैं गाड़ी लेकर निकला यह मैंने नजरों से देखा है तो मुझे ऐसा लगा कि देखिए यह जो ठाकुर और स्वामी जी ठाकुर और मां खास करके जो कुछ करके गए हैं उसको यदि हम स्वामी जी की यह जो चश्मे से नहीं देखेंगे ना स्वामी जी रूपी मानदंड से हम नहीं देखेंगे ना तो वही जो हजार साल पुरानी अंधश्रद्धा है फिर से हमारे भीतर में आ जाएगी ये ठाकुर जो है ये पंजिका में विश्वास करते थे ये जो ज्योतिष पर विश्वास करते थे ये जिसकी साइन जितनी भी है ठाकुर एक बार कहते हैं सुबह को अमुक आ रहा राखाल आ रहा ऐसा समझ करके मैंने अमुक का चेहरा देख लिया। वो अमुक कौन है वो नहीं लिखा किंतु यह लिखा कि सुबह को उठते ही सबसे पहले उसका मनहूस चेहरा देख लिया। तब से आज का दिन यह गड़बड़ गड़बड़ हो होगा या हो रहा है। आई डू नॉट नो। किंतु इतना तो उन्होंने कहा ठाकुर ने कि राखाल आ रहा है। सोच करके अमुक का चेहरा देख लिया। तो यह सब कि सुबह को उठकर के इसका चेहरा देखने से क्या होगा? इसका चेहरा मुझे देखना है। यह मुझे करना है। यह सब यदि हमारे पास में स्वामी जी यदि ना रहते तो हम यह सब भयानक मिस इंटरप्रिटेशन उठाते। ठाकुर और मां की कहां त्याग और तपस्या लेनी है, कहां पवित्रता लेनी है, कहां इंद्रिय संयम लेना है, कहां वो भैरव की तरह ठाकुर जब ध्यान करते थे, क्या कहते थे? भैरव की मूर्ति दिखा के उसी तरह पत्थर के भैरव होकर के स्थिर होकर के बैठना मन। और जब वह बैठते थे वह एक सन्यासी उन्हीं के जैसा दिखने में त्रिशूल लेकर बैठ जाता था। उनके सामने कहता था कि यदि मन लगा के जप नहीं करोगे तो त्रिशूल मार दूंगा। ठाकुर कहते थे मैं बैठता था तो एक के बाद एक लोक जैसे लगते हैं वैसे ही मेरे संधि ये जितने भी अंग है वो सब लोक हो जाते थे। जब तक जप और ध्यान समाप्त नहीं होता था। फिर से मैं उठने का वहां पर मेरे लिए कोई उपाय नहीं था। जो नाई तो देखिए कि वह सब कहां ठाकुर का लेना और यह नहीं लेकर के यह सब जितनी भी अंधश्रद्धाएं हैं जितना भी यह सब कुछ है वो ले लिया ऐसा होने की पूरी संभावना थी। ऐसा मिसफर्च्यून भारत के साथ में बार-बार होता रहा है। ठाकुर को किसी ने कहा ना कि यह युधिष्ठिर को भी नरक दर्शन करना पड़ा था। तो ठाकुर बड़े ही नाराज होकर के बोले कि युधिष्ठिर की त्याग तपस्या सत्य के प्रति उनकी निष्ठा यह सब लोगे ना कि वह एक झूठ आधा झूठ बोल दिया उनको नरक दर्शन करना पड़ा ये लोगे तुम किस तरह की तुम्हारी यह नीच बुद्धि है तो हम लोगों की भी इस तरह की नीच बुद्धि ना हो जाए ये ठाकुर ने मां को यात्रा बदलने के लिए वापस भेज दिया राखाल आ रहा है बोल कर के अमुक का चेहरा देख लिया यह सब चीजें हम कथामृत में से ना ले और बाकी यह जो जीवन प्रदत्त अमृतमय वाणी है उसको ग्रहण करें। इसके लिए यह जो विवेक रूपी तलवार लेकर के ठाकुर स्वामी जी को साथ में लाए थे और उनका नाम सार्थक करने के लिए भारतीय इतिहास भारतीय संस्कृति हिंदू सनातन धर्म हजारों हजारों सालों से इसका विकास होता आ रहा है। या तो फिर कहेंगे सनातन धर्म तो सनातन धर्म है। उसमें इवोल्यूशन क्या है? जिस दिन अहम ब्रह्मास्मि महावाक्य का उच्चारण हो गया वहीं पे धर्म की चरम शिखर पहुंच गए हम लोग। किंतु उसका जो इंप्लीमेंटेशन है, प्रैक्टिकिटी है, विभिन्न तरह की मानसिकता वाले लोगों के लिए विभिन्न तरह की साधन पद्धतियां है, उसका विकास हजारों सालों तक होता आ रहा है। तो ये हजारों सालों के इवोल्यूशन में यह जब सब चीजें भी बीच-बीच में यह प्रवेश कर गई है। तो हमारा यह जो पाजी मन है, हमारी ये जो नीच बुद्धि है, वो कहीं यह अमृतमय मैसेज को छोड़कर के यह सब गंदे नाली का पानी पीना ना शुरू कर दे। इसके लिए स्वामी जी रूपी विवेक रूपी तलवार लेकर के ठाकुर उनको लेकर आए हैं। इसलिए यहां पर स्वामी जी कहते हैं ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग। ट्रुथ इज प्योरिटी। ट्रुथ इज ऑल नॉलेज। ट्रुथ मस्ट बी स्ट्रेंथनिंग मस्ट बी एनलाइटनिंग। मस्ट बी इनविगोरेटिंग। एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली, इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एस पोइजन। देयर इज़ नो लाइफ इन इट। इट कैन नॉट बी ट्रू। यह स्वामी जी का हमारे लिए एसिड टेस्ट है। यह हमारे लिए एक परीक्षा है। ठाकुर मां भारतीय इतिहास हिंदू सनातन धर्म ये जितने भी वैष्णव संप्रदाय हैं अद्वैत जितने भी ये जो आचार्य हैं उनके ग्रंथ है जब भी स्टडी करते हैं। जब भी उनको हम अभ्यास करते हैं उसी को लो जो कि हमको शक्ति प्रदान करता है। दैहिक शक्ति, मानसिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। उसी को लो और जितनी भी अंधश्रद्धाएं हैं, जो भी हमारे मन को कमजोर करता है, उन सबका त्याग करो। अभी इसके बाद का पैराग्राफ काफी लंबा है। उसको अभी हम कल देखते हैं। आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद की शास्त्रों की व्याख्या सही में अद्वितीय है
यह जो म इंटरेस्टिंगली यह जो क्लेबियम मास्म गम पार्थ वाला जो श्लोक है उसके ऊपर में शंकराचार्य ने भाष्य लिखा ही नहीं है। उनको लगता है आइदर इट स्टैंड ऑन इट्स ओन और अदरवाइज उसकी व्याख्या करने की कोई जरूरत नहीं या तो व्याख्या मुझे समझ में नहीं आ रही है। व्हाटएवर उनका रीजन होगा किंतु उस पे उन्होंने अपने भाषा लिखा ही नहीं है। और जैसा कि कथामृत के कोई भी वचन आप ले लीजिए। आप उसको पैरेलल या तो सिमिलर आप कहीं पर भी ड्रॉ कर सकते हैं। दूसरे इतने साधु संत वेद उपनिषद गीता किंतु स्वामी जी के ये जो क्विंटसेंशियल जो स्टेटमेंट है माने लाइक वज्रपात की तरह उनकी जो वाणी है वो इट इज़ यूनिक स्वामी जी यूनिक विवेकानंद माने इसको पढ़ने के बाद में कोई कंफ्यूजन हो ही नहीं सकता कि यह स्वामी जी नहीं है बोल के वो यहां से लिया होगा वहां से लिया होगा और या तो फिर अब जैसे उपनिषद में है तो किंतु उपनिषद का इस तरह का अर्थ विस्तार भी स्वामी जी ने ही किया है आपने बिल्कुल ठीक कहा शंकराचार्य ने जिस तरह से उपनिषद की व्याख्या की है या तो फिर दूसरे आचार्यों ने की है। अगेन मैंने तो इतनी सारी व्याख्या पढ़ी नहीं है। किंतु एक लिमिटेड जो अंडरस्टैंडिंग है मेरा यह भाष्य टीका व्याख्या ये जो पूरा एक जगत है उसका एक लिमिटेड अंडरस्टैंडिंग के साथ मैं कहता हूं कि स्वामी जी की तरह का यह आत्मश्रद्धा वाला मैसेज उपनिषद में है बोलकर के इंटरप्रिट शायद ही किसी ने किया हो या तो फिर नहीं ही किया होगा। सो स्वामी जी इज यूनिक स्वामी जी ना किंतु इवन अमेरिका में आप कर्म योग पढ़ेंगे ना तो उन्होंने यह जो भारत में ये जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में जिस तरह से तेजस्वी व्याख्यान दिए हैं कि गरीबों की सेवा इस तरह से नहीं कहा। उन्होंने वो ट्रेडिशनल कर्म योग गीता का कर्म योग प्रीच किया है कि निष्काम कर्म करना। तो ये निष्काम कर्म और यह शिव ज्ञान जीव सेवा उसमें काफी डिस्टेंस है। यह बहुत सारे लोग कहते हैं निष्काम कर्म यानी कि क्या है पता है? जमीन में गड्ढा करना और गड्ढे को पूर देना। इसमें आपको कुछ नहीं मिल रहा है। आप कर्म कर रहे हैं। सो ये हो गया निष्काम कर्म। बट इट इज नॉट लाइक दैट एक्चुअली पर बहुत हद तक कि आप क्या कर्म करते हैं वो डज नॉट मैटर कि आप किस भाव से कर्म करते हैं। दैट मैटर्स। जबकि यह शिव ज्ञान जीव सेवा में इट डज नॉट मैटर कि आप किस भाव से कर्म करते हैं। प्रश्न है कि क्या कर्म कर रहा है। व्हिच इज वेरी डिफरेंट। मैं यदि स्वार्थ परता से भी लोगों की सेवा करता हूं तो डज नॉट मैटर। उस सेवा का मुझे फल मिलेगा। वहां पर मैं मेरा भाव शुद्ध होना चाहिए ट्रेडिशनल कर्म योग में। फिर मैं यदि गड्ढा करके गड्ढे को भर भी दूंगा तो फर्क नहीं पड़ता। मुझे वह पुण्य मिलेगा। सो दिस इज वेरी फंडामेंटल डिफरेंस बिटवीन बोथ।
प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द ने भारत में दिए हुए प्रवचन अद्वितीय है. और किसी ने इस तरह से आत्मश्रद्धा की बात नहीं की.
देखिए अ मैं एक टेस्ट बताऊं। अ टेस्ट अब जैसे ये फिजिक्स है ना फिजिक्स उसमें यह प्रोबेबिलिटीज का एक साइंस है। तो प्रोबेबिलिटी साइंस क्या कहता है पता है कि एक करोड़ बंदरों को 1 करोड़ टाइप राइटर देकर के 1 करोड़ साल तक टाइप करने दीजिए। इज इट प्रोबेबल दैट दे विल टाइप दी कंप्लीट वर्क्स ऑफ शेक्सपियर? क्योंकि यहां पे कि देखिए प्रोबेबिलिटी किस तरह से काम करता है कि जितने भी फैक्टर्स हैं जितने भी एलिमेंट्स हैं यू मेक इनफ कॉम्बिनेशन ऑफ़ देम। एंड एट द एंड ऑफ़ इट जितने भी कॉम्बिनेशंस हैं इस जगत में सब प्रोड्यूस हो जाएंगे। यानी शेक्सपियर का वर्क जो है इज इट बियों्ड प्रोबेबिलिटी और इट्स जस्ट स्टैटिस्टिक्स कि एक करोड़ बंदर 1 करोड़ टाइप राइटर पे 1 करोड़ साल टाइप करेंगे तो बहुत कुछ टाइप करेंगे बहुत कुछ टाइप करेंगे विल कंप्लीट वर्क्स ऑफ शेक्सपियर बी वन ऑफ देम वी डू नॉट नो ये तो गडांग केन ये थॉट एक्सपेरिमेंट है सो यहां पे भी लेट अस डू वन थॉट एक्सपेरिमेंट कि आज का बेस्ट एआई को आप बिठा दीजिए जितने भी शास्त्र उपनिषद संप्रदाय के जितने भी ग्रंथ ग्रंथ है वैष्णव वेदांत सब के सब उसमें फीड कर दीजिए और उसको रीजनरेट करने को बोलिए कि अभी एआई क्या करता है जो कि ऑलरेडी फीड हुआ है उसी को तो रिकंबाइन करके एक आंसर प्रोड्यूस करता है इट विल नेवर डू एनीथिंग न्यू क्रिएटिव राइट तो इट इज 99% प्रोबेबिलिटी कि इट विल प्रोड्यूस ठाकुर का कथामृत कि इनफ टाइम यदि वह रिप्रोड्यूस करता है तो उसको कहिए कि एक करोड़ साल तक एआई को कहिए कि जितने भी उपनिषद है जितने भी आजकल हजारों हजारों ग्रंथ होंगे भारतीय आध्यात्मिक इतिहास के सब फीड कर लिए अभी आप तुम इसमें से किताबें बनाना शुरू करो वन ऑफ द बुक माइट बी कंप्लीट वर्कशॉप वन ऑफ द बुक माइट बी कथामृत ओके वन ऑफ द बुक माइट बी राजयोग वन ऑफ द बुक माइट बी भक्ति योग कर्म योग राजयोग किंतु आई डाउट कि यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोडा वह प्रोड्यूस कर पाएगा कि नहीं। बिकॉज़ दिस इज रियली रियली यूनिक। अभी ये आत्मश्रद्धा की ही बात चल रही है। तो मैं बताता हूं मेरा खुद का एक थिंकिंग क्या है? स्वामी जी की आत्मश्रद्धा को मैं कैसे अप्लाई करूंगा अपनी लाइफ में? ठाकुर का कभी भी दर्शन हो गया ना तो पहले तो मैं उनको यह नहीं मांगूंगा कि आशीर्वाद दे दीजिए। जन्म जन्मांतर का सब खत्म कर दीजिए। निर्वाण दे दीजिए। वह सब नहीं मांगूंगा। पहले तो मैं प्रश्न करूंगा मां के साथ में अन्याय क्यों किया बताइए बाकी सब बाद में कुछ चाहिए भी नहीं मां है तब तक कोई चिंता नहीं है
प्रश्न: माँ सारदा स्वामीजी के अभिनव सन्देश को नकार सकती थी किन्तु उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया.
ना किंतु देखिए यही रामकृष्ण गत प्राणा मां श्री रामकृष्ण की महासमाधि के बाद में तो स्वामी जी को रिजेक्ट नहीं ही करती है ठाकुर के रहते रहते बच्चों का पक्ष लेकर के ठाकुर के साथ में झगड़ लेती है ठाकुर जब कहते हैं कम रोटी खिलाओ मां कहती है इनकी चिंता मैं करूंगी। तुमको करने की जरूरत नहीं है। तो वो रामकृष्ण गत प्राणा मां शारदा ठाकुर के रहते-रहते उनके साथ झगड़ सकती है। तो जाने के बाद वो क्या कर सकती है? कुछ ठिकाना नहीं है। बच्चों का पक्ष लेकर के
ठाकुर और माँ का मधुर नाता
ठाकुर के प्रति शरणागति भी और ठाकुर से इंडिपेंडेंस भी। किंतु इंडिपेंडेंस कहां? ओनली इन वन फील्ड। मातृत्व का जो इलाका है वहां पे है। सो दैट इज अ नंस कि मां का इंडिपेंडेंस 100% मां ने बना करके रखा है। बट इन द फील्ड ऑफ हर मदरहुड म जितने भी इंसिडेंट देखिए मां के मातृत्व पर जब बात आ जाती है मां किसी की बात नहीं सुनेंगी वो इस तरह की महिला चरित्र अच्छा नहीं ठाकुर कहते इसके हाथों से क्यों खाना भेजा मां ने स्पष्ट कह दिया मां आकर के बोलेगा तो मैं रह नहीं पाऊंगी मैं उसके हाथों से भी आपको खाना खिला दूंगी कि बच्चों की ही बात है कि इतनी रोटी खानी कितनी रोटी खानी वो सब चिंता मुझे करनी है आपको नहीं करनी है किंतु ऑन दी अदर हैंड देखिए ठाकुर जब मां को खुद को पूछते हैं कि तुम कितनी रोटी खाती हो तो मां बोलने में कितना संकोच करती है कि मैं इतनी ही रोटी खाऊंगी। फिर ठाकुर बार-बार पूछते हैं तब मां कहती है यह तीन ना चार रोटी मैं खाती हूं रात को। तो उसके अनुसार ठाकुर को वो जो फंड रख के जाना है पैसा रख के जाना है। ₹300 400 यह बलराम बाबू की जमींदारी में उन्होंने वो रख के इन्वेस्ट करके गए थे। तो अपनी खुद की रोटी के बारे में इतना संकोच कि बच्चों की रोटी के बारे में बिल्कुल नहीं। किंतु ये इसका प्रश्न इसका उत्तर तो बड़ा स्पष्ट है। जहां पर मां का ये मातृत्व का बात आ जाएगा फिर ठाकुर नहीं कोई नहीं फिर वो है और बच्चे हैं। किंतु ठाकुर का ये जो व्यवहारिक पॉइंट ऑफ व्यू यू भी था ना कि देखिए हम ठाकुर को इतना अधर वर्ल्डली समझते हैं। किंतु मां की कितनी चिंता करते थे। वो इतना रुपया कैलकुलेट करके रख के गए थे। सो वो भी एक ठाकुर का था ना कि अगेन ठाकुर का बाकी सब चीजों में अलगारीपन है। मां के लिए सब तरह की दुनियादारी की चिंता करते हैं। मैं वो जो वो उस दिन हमारा प्रश्न चल रहा था ना डिस्कशन मां के जीवन में कि ठाकुर ने मां के लिए गहने बनाकर के रख के गए। वो हृदय को कहा वो शारदा सरस्वती उसको सजना धजना अच्छा लगता है तो उसके लिए गहने बना दो। तो मुझे बाद में किसी ने प्रश्न किया था कि अच्छा ठाकुर के पास में पैसे थे कहां पे कि उन्होंने गहने बनाया है वह तो मथुर से लेते नहीं थे तो पैसा आए कहां से गहने बनाने के लिए तो मैंने कहा कि अभी मैं अनुमान करके कह रहा हूं कि उनको तो सैलरी जो मिलता था वो सैलरी बचा करके शायद रखा होगा उसमें से ये गहने बनाए होंगे किंतु इसके बाद में तो प्रश्न की परंपरा चालू हो जाती है ठाकुर माटा टाका माटी माटी टाका करके उसको फेंक दिए पैसों को पैसों को बचा करके रखना भविष्य में चिंता करना करना कि मां आएगी तो मां के लिए गहने बनाएंगे। यह सब कहा था ठाकुर में। ठाकुर ने तो स्पष्ट कहा था मैं रजिस्टर पर साइन नहीं करूंगा। तुम लोगों को यह सैलरी रजिस्टर है। पैसा देना हो तो दो ना देना हो तो मत दो। मथुर बाबू से कभी मांगते नहीं थे। तो पैसा आया कहां से मां के लिए गहने बनाने के लिए? किंतु इतनी दुनियादारी ठाकुर ने रखी थी कि मां का जहां तक प्रश्न आता है मां के लिए पैसों की व्यवस्था करना, गहने बना देना, इन्वेस्टमेंट करके जाना। जो चीजें हम अपने परिवार के लिए करते हैं, वह सब ठाकुर ने मां के लिए किया है। यानी कि दोनों का देखिए जहां तक मां का मातृत्व का इलाका है, ठाकुर के प्रति शरणागति, ठाकुर के प्रति समर्पण सब भूल जाती है। ठाकुर का जब मां का प्रश्न आता है तो वो अलगारी पना त्याग तपस्या टाका माटी माटी टाका वो सब भूल जाते हैं। क्योंकि प्रॉब्लम क्या होगा पता है? ठाकुर तो कुछ करने वाले नहीं है। जबकि मां शारदा सरस्वती के रूप में उनका जो पक्ष लेकर बोल रहा है उसकी जीवा पे आकर सवार सवार हो जाएगी। फिर ठाकुर वाला तो हार ही जाएगा। ठाकुर ने ऐसा तो कहा नहीं कि नारायण आकर के जीवा पे सवार हो के बोलते हैं। ना हो सकता है। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि मैं सैलरी नहीं लूंगा। ठाकुर कहता है कि हां मैं सैलरी रजिस्टर पर साइन नहीं करूंगा। आप और ठाकुर स्पष्ट कहते हैं आपको पैसा देना हो तो दो नहीं देना है तो मत दो। ऐसा नहीं कहा कि मत दीजिए। ठाकुर भी बड़े चालाक है। देना हो तो दीजिए। ना देना हो तो मत दीजिए। ठाकुर को पता है मथुर बाबू पैसा देगा ही देगा। बनिया बुद्धि [हंसी]
प्रश्न: ठाकुर और माँ का है अनुभूति realization और स्वामीजी का है बाह्य प्रकाश manifestation
ना ये बहुत अच्छा एनालिसिस है। बिल्कुल ठीक कहा कि ये हिंदू धार्मिक परंपरा जितनी भी देखेंगे अप टू ठाकुर एंड मदर ये रियलाइजेशन पे पूरा भर है। जबकि स्वामी जी का है मैनिफेस्टेशन। इसको थोड़ा सा डीप में जाकर के देखेंगे तो कहेंगे कि यह ब्राह्मी परंपरा है, क्षत्रिय परंपरा है। यह ब्राह्मी परंपरा हमेशा रियलाइजेशन पर फोकस किया है। विद इन दिस परंपरा हम लोग बुद्धिज्म और जैनिज्म को भी गिन लेंगे कि सेल्फ रियलाइजेशन आत्म साक्षात्कार या तो ईश्वर दर्शन व्हिच आर द इनर गोल्स। इसके लिए पूरा यह सब परंपरा बना है। जबकि ये राम और कृष्ण और ये जो क्षत्रिय परंपरा जो थी वि इज यूनिक टू इंडियन स्पिरिचुअलिटी और माने वो परंपरा जैसे भगवान कृष्ण के साथ में समाप्त हो गई और फिर स्वामी जी ने फिर से ऐसी परंपरा को पुनः जागृत किया कि मैनिफेस्टेशन ऑफ रिलीजन यदि हमारे भीतर में यह ब्राह्मण शक्ति ब्रह्मण साक्षात्कार है ब्रह्म शक्ति है तो व्हाई शुड इट नॉट बी यूटिलाइज फॉर द बेटरमेंट अपलिफमेंट ऑफ द सोसाइटी सो दैट मैनिफेस्टेशन इज़ अ राम कृष्ण विवेकानंद
प्रश्न: बेलूर मठ में सबके लिए सामान नियम थे. राजा महाराज मंगल आरती में नहीं गए तो स्वामीजी ने उन्हें भिक्षा कर के खाने के लिए कहा
हम किंतु देखिए इस कहानी का कंक्लूजन कितना सुंदर है। डिसिप्लिन सबके लिए है। इवन राजा महाराज के लिए इवन ठाकुर के जो मानस पुत्र हैं उनको भी सुबह को मंगल आरती में आना होगा। नहीं आएंगे तो डिसिप्लिन उनको भी होगा और उनको भी भिक्षा करके खाना होगा। यह नियम तो स्वामी जी ने बनाया। देखिए नियम बनाना कोई भी बना सकता है। किंतु स्वामी जी स्वामी जी है ना यूनिक है ना वह खुद भी वो ब्रेकफास्ट नहीं किया था। खुद वहां पे वो पेड़ के नीचे राह देख रहे हैं कि कब राजा वापस आता है। जब राजा महाराज वापस आए तो स्वामी जी ने कहा भाई यह भिक्षा का पवित्र अन्न है। लाओ आओ हम सब मिलकर ग्रहण करते हैं। मैंने भी किचन में आज खाना नहीं खाया है। सो देखिए दिस इज स्वामी जी कि सिर्फ लोगों को डिसिप्लिन करना वो नहीं। यह ठाकुर मां स्वामी जी 1 3 एक ऐसा क्यों आप सिर्फ ठाकुर को पढ़ेंगे सिर्फ मां को पढ़ेंगे सिर्फ स्वामी जी को पढ़ेंगे तो आपको एक अंडरस्टैंडिंग नहीं आएगा यह मातृ हृदय स्वामी जी के भीतर में था माने ये जो गुण जिसके जितने भी थे ना तीनों के भीतर में वर्तमान थे। यह स्वामी जी की आत्मश्रद्धा मां के भीतर में नहीं होती तो ठाकुर को सीधा फड़ाक करके मुंह पर नहीं कह देती कि जो मेरी मातृ मां बोल के जो मेरे पास में आएगा उसकी बात मैं सुनूंगी ही सुनूंगी। ऐसा मां ठाकुर को कहने का साहस नहीं करती। वो आत्मश्रद्धा मां के भीतर में भी थी और मां का जो मातृ हृदय है ठाकुर के भीतर में तो था ही था। कोई प्रश्न जग जाहिर है कि ठाकुर अपने जो त्यागी संतानों को गृहस्थ संतानों को कितना प्रेम करते थे। स्वामी जी के भीतर में भी था। सभी डायरेक्ट डिसाइपल के भीतर में था। तीनों के जो यूनिक गुण है तीनों के भीतर में वर्तमान थे। ऐसा वो आइसोलेटेड केस नहीं है। किंतु क्या है कि उसका मैनिफेस्टेशन जो है आज हम स्वामी जी स्वामी विवेकानंद शब्द कहेंगे। कोई भी यह नहीं कहेगा कि मुझे मातृ हृदय की याद आती है। वन वर्ड में आप क्या कहेंगे? तो आत्मश्रद्धा ही कहेंगे। ठाकुर के बारे में वन वर्ड में बताइए। क्या किया उन्होंने? तो उनकी जो प्रचंड तपस्या थी, प्रचंड त्याग था वही हमारे नजर के सामने सबसे पहले आएगा। मां के बारे में वन वर्ड में बताइए। क्या कहेंगे? तो मातृ हृदय मां का जो प्रेम करुणा था हमारे ऊपर में स्नेह था वही सबसे पहले याद आएगा मां ने जो पंचतपा किया या तो फिर नहबत में तपस्या की वो सब बाद की बातें हैं व्हाट इज क्विंटसेंशियल मदर दैट इज मातृ हृदय व्हाट इज क्विंटसेंशियल ठाकुर दैट इज प्रचंड तपस्या एंड व्हाट इज क्विंटसेंशियल स्वामी जी दैट इज़ आत्मश्रद्धा सो एक-एक गुण को उन्होंने एग्जिंपलीफाई किया है किंतु सभी तरह के गुण सभी में वर्तमान थे इसीलिए यदि आपको ओवरऑल अंडरस्टैंडिंग चाहिए तो तीनों का एक साथ में स्टडी करना ही होगा। ये ठाकुर ने दर्शन दिया फिर भी मां की परमिशन ले। अच्छा पॉइंट है। फिर भी विश्वास नहीं हो रहा है। वो मां ने जैसा पत्र लिख दिया। हां बेटा जाओ स्वामी जी कहते हैं कि मां का स्वामी जी लिखते हैं लेटर में कि जैसे ही मां का हुक्म हुआ हनुमान की तरह हनुमान ने तो जंप लगा के वो समुंदर पार किया था। मैं वही ब्रिटिश लोगों के जहाज में बैठकर के वो ब्रिटिश लोगों के देश में पहुंच गया। ऐसा स्वामी जी स्पष्ट लिखते हैं कि मां का आदेश मिलने से वहां पे ऐसा नहीं कहते कि ठाकुर का दर्शन मिला था बोल के मैं गया था। हा हा हा