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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 9 Jan 2025

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाय नमः स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रणित भारत में दिए हुए भाषणों का एक स्लाइड शो हम देख रहे थे। मैं अपना विंडो आपके साथ में शेयर करता हूं। तो यह स्लाइड

Slide show revision

शो यह फर्स्ट स्लाइड है कि किस तरह से स्वामी जी भारत को एक नया संदेश देते हैं। यह सेकंड स्लाइड है जिसमें कि क्योंकि यह भारत में दिए हुए सभी भाषणों का कंसंट्रेटेड एसेंस इसमें है। तो आप देखेंगे कि जनरली सभी भाषण के प्रारंभ में स्वामी जी को एक मानपत्र दिया जाता है। तो मानपत्र देकर के स्वामी जी का सम्मान करना। फिर है स्वामी जी प्रारंभ करते हैं कि भारत है पुण्य भूमि और इसी पुण्य भूमि से बार-बार तरंगों की तरह लहरों की तरह आध्यात्मिकता पूरे विश्व में छाई हुई है। और फिर कहते हैं यह स्लाइड में कि प्रत्येक देश का प्रत्येक सिविलाइजेशन का एक मिशन होता है। भारत का मिशन है लाइट स्पिरिचुअल। भारत की आध्यात्मिक शक्ति को कंजर्व करना और फिर चैनलाइज करना। जैसे कि डैम होता है गुजरात में जैसे कि नर्मदा नदी पर डैम बनाया गया है तो एक बहुत बड़ा रिजवायर है जिसका नाम दिया है सरदार सरोवर सरदार पटेल के नाम से। तो यह सरदार सरोवर में पूरा पानी इकट्ठा होता है। अदरवाइज क्या होता कि नर्मदा का पानी बह के सीधा समुंदर में मिल जाता। तो ऐसा नहीं हो के वह जो मीठा पानी है नदी का उसको सरदार सरोवर में कलेक्ट करते हैं और फिर वहां से ही नहर बना करके जहांजहां पानी नहीं होता है जैसे कि यह राजकोट आश्रम है अपना वो कच्छ ये सौराष्ट्र इस नाम के एरिया में है तो सौराष्ट्र में रेनफॉल भी कम है और नदी वगैरह पानी का इतना सुविधा भी नहीं तो वहां पर ईजीली पानी की लहर नहर जाती है। मुझे याद है मैं पहली बार जब मेरा लिमड़ी में पोस्टिंग हुआ था। लिमड़ी सेंटर अपना इसी सौराष्ट्र एरिया में ही है। तो वहां पे हर समर सीजन में हर सप्ताह में दो-तीन बार तो हमको पानी के टैंकर मंगवाने पड़ते हैं। क्योंकि आश्रम में तो सब समय जरूरत पड़ती है। उत्सव है, मंदिर का काम है, डिवोटी आए हैं, कुछ भी है। बिना पानी के तो कैसे चलेगा? और समर सीजन में बहुत दिक्कत पानी की। तो दो-तीन टैंकर हर दो-तीन दिन पर मंगवाने पड़ते हैं। किंतु यह तो पहली बार जब मेरा गुजरात पोस्टिंग हुआ। सेकंड टाइम जाकर देखा तो देखा कि अभी वह टैंकर मंगवाने की कोई जरूरत नहीं। रेगुलर वाटर फ्लो वहां पे चालू हो गया है। तो देखिए कि इस तरह से भारत का भी वही मिशन है कि अपना एक जो विराट रिजर्व है आध्यात्मिकता का उसमें भारत की सब आध्यात्मिकता एकत्र करें और फिर विश्व में जहांजहां पे भौतिकवाद का तांडव नृत्य चल रहा है वहांवहां पे आध्यात्मिकता चैनलाइज करें। तो और फिर यह यह एक स्लाइड और देखा

सर्वभूत में ईश्वर-दर्शन के साथ ही आत्म-रक्षा करना आवश्यक है

हमने कि भारत का जो धर्म है वह है बेसिकली ज्ञान कांड के भीतर में सीमित है। वैसे तो वेद को कहेंगे भारत का जो असली धार्मिक पुस्तक है। किंतु वेद के भी दो भाग है। एक तो कर्मकांड है। दूसरा है ज्ञानकांड। यह जो ज्ञान कांड या तो फिर यह नॉलेज पोर्शन है वही इटरनल है वही सब समय के लिए है। तो वह तो एक कांसेप्ट है हिंदू धर्म को समझने का कि वेद के दो पार्ट कर्मकांड ज्ञान कांड। फिर और एक कांसेप्ट है श्रुति और स्मृति। यह एक बड़ा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है। देखिए, उस दिन भी हमारा यह डिस्कशन जब हो रहा था, तब यह प्रश्न हुआ था कि क्यों भारत में हम लोग इतने हाईली स्पिरिचुअल है कि जब हम अपने धर्म को डिफेंड करने की बात आती है, पीछे पड़ जाते हैं। हम लिबरल है। हमको लिबरलिज्म स्प्रेड करना है। किंतु सामने ऐसा कोई हो जो कि बहुत ही इलबरल हो। बहुत ही मर्डरस जिसका मेंटालिटी हो इस तरह के किसी के संपर्क में आएंगे तो यह अपना लिबरल रिलीजन है सर्वव्यापी वसुदैव कुटुंबकम यह जो अपनी भावना है इसको हम फिर किस तरह से डीएल करें तो फिर देखिए कि श्रुति के भीतर में तो तीनों आ जाते हैं ना यह जिस तरह से उपनिषद आते हैं जिस तरह से ब्रह्मसूत्र आता है श्रुति प्रस्थान स्थान और यह न्याय प्रस्थान तो साथ में एक स्मृति प्रस्थान भी है। यह जिसको हम प्रस्थान त्रय कहते हैं उसमें यह प्रस्थान त्रय के भीतर में गीता भी है श्रीमद्भगवत गीता। तो देखिए कि यहां पे एक तीसरा भी कांसेप्ट इंपॉर्टेंट है प्रस्थान त्रय का। यानी कि तीन कांसेप्ट हो गए। एक तो है हमारे हिंदू धर्म को समझने के लिए वेद के दो पार्ट है। ज्ञानकांड कर्मकांड ज्ञानकांड लेना है। हमेशा के लिए इटरनल वो मैसेज है। दूसरा कांसेप्ट है कि श्रुति और स्मृति का कि श्रुति इटरनल है। स्मृति समय के साथ में चेंज होती है। तीसरा कांसेप्ट लेना है प्रस्थान त्रय का। प्रस्थान त्रय के भीतर में स्मृति प्रस्थान भी है और वह है श्रीमद्भगवत गीता। यानी कि आज के युग के लिए हमारे लिए यह प्रस्थानत्रय का कांसेप्ट सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट है। श्रुति प्रस्थान अर्थात उपनिषद और उसमें भी वही उपनिषद जिसके ऊपर में श्रीमद् शंकराचार्य ने भाष्य की रचना की है। उसके बाद में स्मृति प्रस्थान श्रीमद् भगवत गीता और न्याय प्रस्थान ब्रह्मसूत्र। तो यह देखिए कि गीता में तो स्पष्ट लिखा है कि जो हमारे पर आक्रमण करना चाहते हैं, जो हमारा जो अधिकार है उसको छीनना चाहते हैं, उसके अगेंस्ट में धर्म युद्ध करना अपना कर्तव्य है। तो देखिए कि हमारा वैसे तो लिबरल रिलीजन है। कि जिसने भी यह शंकराचार्य ने ही देखिए शंकराचार्य से बड़ा ज्ञानी और कोई नहीं भारत में माने एटलीस्ट रिसेंट हिस्ट्री में तो देखिए कि वही शंकराचार्य ने श्रीमद् भगवत गीता को भी प्रस्थानत्रय में स्थान दिया है। इसका अर्थ क्या है कि इवन शंकराचार्य भी समझते थे कि ब्रह्मज्ञान जो है ब्रह्मज्ञान वैसे तो नो डाउट वही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए किंतु नॉट एट द कॉस्ट ऑफ द फ्रीडम नॉट एट द कॉस्ट ऑफ पॉलिटिकल एंड सोशल फ्रीडम। ऐसा हम सोचे कि मुझे यह धर्म आध्यात्मिक मुक्ति चाहिए। भले ही चाहे मैं राजनैतिक मुक्ति ना हो। आर्थिक सामाजिक मुक्ति ना हो तो चलेगा। ऐसा नहीं है श्रीमद्भगवत गीता में तो माने लिटरली इट इज सेइंग ऑन द बैटल फील्ड लिटरली इट इज सेइंग इन ऑर्डर टू एग्जॉर्ट अ वॉरियर टू फाइट बैटल ऑफ राइटियसनेस तो देखिए कि युद्ध क्षेत्र पे ही गीता का गान किया गया है। क्षत्रिय को क्षात्र धर्म याद करवाने के लिए ही गीता का गान किया गया है। और गीता का जो गान करने वाले जो अवतार पुरुष है भगवान कृष्ण वह स्वयं तो सुदर्शन चक्रधारी थे। वह स्वयं तो क्षत्रिय थे। तो यह क्षात्र धर्म जो था अपना अनफॉर्चूनेटली भारत में से लुप्त हो गया। पिछले 1000 साल में बोलकर के हमारे साथ में इतना ट्रेजडी हुआ है। तो इसके बारे में भी मेरा एक

भारत की एक हज़ार साल की गुलामी नहीं, एक हज़ार साल की तपस्या — उसी अग्नितप से अवतरित हुए श्री रामकृष्ण

थ्यरी जैसे मैंने कहा था कि क्षात्र धर्म भारत में लुप्त हुआ। भारत जो गुलाम बना उसका पीछे का यह भी एक इवोल्यूशनरी लॉजिक है कि भारत की जितनी भी शक्ति है सभी शक्ति को लगा के एक ऐसी आध्यात्मिक महासत्ता प्रकट की जाए जो कि पूरे मनुष्य समाज को मानव सभ्यता को ह्यूमन स्पीशीज को यह जो फिल्टर होते हैं ना बीच-बीच में जो क्राइसिस आती है मास एक्सटिंशन होता है उसके परे ले जाए। तो ठाकुर का आविर्भाव हुआ। यह 1000 साल की गुलामी नहीं कह के मैं कहूंगा 1000 साल की तपस्या। 1000 साल की तपस्या में सहन तो बहुत कुछ करना पड़ा है। सफर तो बहुत कुछ करना पड़ा है। बट दैट सफरिंग वाज वर्थ इट। कि ठाकुर का आविर्भाव हुआ है। तपस्या के परिणाम से सिद्धि हमको प्राप्त हुई है। इस दृष्टि से यदि देखें तो ठाकुर की तपस्या सिर्फ वो 12 साल तक लिमिटेड नहीं थी। भारतवर्ष की भारतीय प्रजा ने पिछले 1000 साल जो तपस्या की उसका परिणाम श्री रामकृष्ण देव के आविर्भाव से हुआ है। आविर्भाव में वह परिणत हुई है हमारी तपस्या। तो इस तरह से मुझे लगता है कि हमारा इतिहास देखना ज्यादा उचित है। देखिए कि दूसरे देशों ने भी कष्ट सहन किया है। अभी आप चाहे चाइना को देख लीजिए या तो फिर यह इजिप्ट है या तो फिर यह रशिया है। ये जितने भी कॉलोनाइज कंट्री थे अ उन सभी कॉलोनाइज कंट्री में और माने इस्लाम के द्वारा भी कॉलोनाइज किए गए और यह यूरोप के द्वारा भी कॉलोनाइज किए गए। दोनों तरह के कंट्रीज को आप देखिए कष्ट तो यथेष्ठ सहन करना पड़ा है। किंतु उनका कष्ट जो था ना वह रियली स्लेवरी ही थी। सफरिंग ही था। उसके आखिर में ऐसा कोई महापुरुष नहीं प्रकट हुआ कि जिसने मानव सभ्यता को बूस्ट करने में कोई सहाय की हो। जबकि भारत का जो सफरिंग है उसके पीछे एक पपस है। भारत की जो गुलामी थी उसके पीछे एक लॉजिक था कि ठाकुर को प्रकट करना, ठाकुर को जन्म देना। तो इसीलिए हमारी गुलामी या हमारा सफरिंग सिर्फ सफरिंग नहीं कहा जाएगा। सिर्फ कष्ट सहन करना नहीं कहा जाएगा। इसको हम कहेंगे कि हमारी प्रजा ने तपस्या की है। और इस तपस्या के परिणाम से हमको श्री रामकृष्ण देव जैसे अवतार का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। तो यह एक पीरियड समाप्त हो गया। अभी नेक्स्ट हमको क्या करना है? तो नेक्स्ट वही है हमारे जीवन में कि देखिए कि ठाकुर मां स्वामी जी का यह जो संदेश है उसको हमको घरघर तक पहुंचाना है। एक तो अपने जीवन में उसको इंप्लीमेंट करना है। हमको उसको प्रैक्टिकल करना है अपनी लाइफ में और साथ में ही उसको स्प्रेड करना है। साथ में ही उसको घर-घर ले जाना है। तभी तो अपनी यह जो तपस्या है वह वर्थ तपस्या का माने वह वर्थ इट कही जाएगी कि हां हमारी तपस्या जो है आखिर में वो काम में लगी है। अदरवाइज वो क्या है? विफल हो जाएगी तपस्या। यदि हम ठाकुर का नाम है, ठाकुर का संदेश है, उसको अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, उसको स्प्रेड नहीं करेंगे, तो यह पिछले 1000 साल की तपस्या विफल हो जाएगी। तो, यह है कि अभी तक का हमारा हुआ है। हमने यहां तक कैचअप किया है। इसके बाद का यह एक बड़ा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट भी हमने देख लिया कि एकम सद विप्रा बहुदा वदंती। कि दूसरे दूसरे धर्मों में यह जो झगड़े होते हैं कि मेरे अवतार सर्वश्रेष्ठ है, मेरे ईश्वर सर्वश्रेष्ठ है। वह सभी झगड़ों का जैसे कि कलम के एक स्ट्रोक से ही निराकरण आ गया कि अंतिम आध्यात्मिक सत्ता है। वह तो एक ही है। किंतु सिद्ध ज्ञानी महापुरुष ऋषि मुनिगण प्रोफेट मसाया वह सब योगीग अपनेप अनुभव के अनुसार अपनी-अपनी भाषा में उसको व्यक्त करते हैं। वरना देखिए ना इवन आज मॉडर्न साइंस की दृष्टि से देखिए इतना बड़ा कॉस्मोस है। इतना बड़ा यूनिवर्स है। उसमें करोड़ोंकरोड़ों गैलेक्सियां है। उसमें से एक सामान्य गैलेक्सी है अपनी मिल्की वे गैलेक्सी। इस मिल्की वे गैलेक्सी में बिलियंस अपॉर बिलियंस करोड़ोंकरोड़ों तारे हैं। उसमें से एक सामान्य तारा है यह सन अर्थात कि अपना सूर्य। इस तारे के आसपास में नौ प्लेनेट घूमती है। उसमें से एक है पृथ्वी। यह छोटे से पृथ्वी ग्रह के ऊपर में कीट की तरह हम लोग रेंग रहे और हम सोच रहे हैं कि मैं मेरा एक छोटा सा ये जियोलॉजिकल एरिया है जिसको मैं अपना देश कहता हूं मेरे भगवान अलग है और तुम्हारा जो देश है तुम्हारा धर्म है तुम्हारे भगवान अलग ये क्या कोई माने मूढ़ता की भी तो कोई सीमा होती है कि प्रत्येक धर्म का अपना-अपना भगवान थोड़ा सा आप कॉस्मिक दृष्टि से पृथ्वी पर नजर डालिए। कोई एलियन सिविलाइजेशन होगी। हाईली इवोल्वड, हाईली इंटेलिजेंट, हाईली एडवांस्ड, मोरली, एथिकली, टेक्नोलॉजिकली, स्पिरिचुअली। वह यदि पृथ्वी को अपने दूरबीन से देखती होगी तो वे लोगों को कैसी हंसी आती होगी कि यह है चींटी की तरह जमीन पर रेंगते हैं और अपना ग्रुप बना करके झगड़ते हैं कि यह मेरे भगवान है, वह मेरे भगवान। तो इतना बड़ा ब्रह्मांड जिसने रचना किया है वह क्या एक ग्रुप के लिए एक को रचना करेंगे भगवान की दूसरे ग्रुप के लिए दूसरे की रचना करेंगे ऐसा थोड़ी ना है आध्यात्मिक अंतिम सत्ता या तो फिर जिसको हम कहेंगे कॉस्मिक इंटेलिजेंस या तो फिर यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस वह तो एक ही है बस उसका मैनिफेस्टेशन समय और काल के अनुसार भाषा परिवेश संस्कृति, ट्रेडिशन, बिलीफ उसके अनुसार अलग-अलग होता है। तो यह एकम सद विप्रा बहुधा वदती। इसके बाद का जो स्लाइड है स्वामी जी क्या कहते हैं? द साइंस ऑफ द सोल, द आत्मन इज इनफाइनाइट, परफेक्ट एंड प्रेजेंट इन ऑल। तो यदि देखिए कि आप एक और यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस का कांसेप्ट एक्सप्लोर करते हैं। अ साइंस में एक आईडिया है उसको कहते हैं एंथ्रोपोमॉर्फिज्म अर्थात कि मनुष्य की तरह का सब कुछ क्योंकि मैं मनुष्य हूं। मैं इमेजिन करूंगा कि भगवान भी मनुष्य की तरह है। दो हाथ है, दो पैर है। ज्यादा से ज्यादा चार हाथ होंगे। किंतु ज्यादा से ज्यादा चार मस्तक होंगे। किंतु वह मस्तक है मनुष्य की ही तरह या तो फिर वही पशुओं की तरह के मस्तक होंगे जो कि पृथ्वी पर पाए जाते हैं। तो यह वराह अवतार या तो फिर यह मीन अवतार वही तरह के अवतार होंगे जिसको कि हम अपनी मनुष्य की दृष्टि से समझ सकते हैं। मनुष्य की बुद्धि से उसको हम असेस कर सकते हैं। तो इसको कहते हैं एंथ्रोपोमॉर्फिज्म। किंतु मान लीजिए कि दूसरे ग्रह पर दूसरी तरह के जीव रहते हैं जो कि कंप्लीटली डिफरेंट फ्रॉम अस। थोड़ा बहुत आपने साइंस फिक्शन देखे होंगे या साइंस फिक्शन स्टोरीज पढ़ी होगी तो आपको पता होगा कि यह लाइफ कितने डिफरेंट-डिफरेंट आकार धारण कर सकती है। अभी हमारे लिए तो सब इमेजिनेशन ही है। किसको पता क्या है वहां पे दूसरे ग्रह पे जीवन। किंतु मान लीजिए है भी यदि और ऑक्टोपस जैसे लोग रहते हैं वहां पर तो वह भगवान की कल्पना करेंगे ऑक्टोपस की तरह। तो देखिए कि यह जो एंथ्रोपोमॉर्फिज्म यानी कि एक मनुष्य की तरह का एक अवतार या तो साकार जिसको हम कहते हैं यह साकार ईश्वर के परे भी एक निराकार सत्ता है। और इस निराकार सत्ता को कहते हैं आत्मन। ये जिन लोगों ने आध्यात्मिक जगत में एक के बाद एक स्ट्राइड्स एक के बाद एक आगे कदम की है आगे कुछ की है उन लोगों को पता है कि अंतिम आखिरी पोजीशन आखिरा जो आपका स्टेटस है लास्ट माइलस्टोन है वो है निर्विकल्प समाधि। यह बाह्य जगत के साथ में भौतिक मटेरियलिस्टिक जगत के साथ में संपूर्ण विच्छेद और वही सत चित आनंद रूपी अंतिम सत्ता का साक्षात्कार दिव्य सत्ता का साक्षात्कार तो वो है कि आत्मन वि इज सत यानी कि जो कि ट्रू एग्जिस्टेंस है मटेरियल एग्जिस्टेंस नहीं किंतु यह स्पिरिचुअल एग्जिस्टेंस फिर चित यह मटेरियल नहीं है। कॉन्शियसनेस है और आनंद आनंदमय है। स्पेस, टाइम, समय, अवकाश, चैन ऑफ कोजेशन यह जो कर्म का सिद्धांत है, उस सबके परे यह आत्मन है। उपनिषदों में आत्मन के बारे में काफी विस्तार से बताया गया है। यहां पे चार पॉइंट आत्मन के बारे में स्वामी जी कहते हैं जो कि एआई हमारे लिए समराइज करता है। क्या कहता है? आत्मन इज इटरनल एंड इमोर्टल। अभी यह इटरनल और इमोर्टल शब्द भी जैसे कि आत्मन के सामने छोटे पड़ जाते हैं। क्योंकि इटरनल और इमोर्टल क्या है? जो कि समय के भीतर में जो वह टाइमलाइन के भीतर में है किंतु आत्मन इज बिय्ड टाइमलाइन। तो फिर कौन से शब्द यूज करें? इस असमंजस में हम लोग यह कॉमन वर्ड्स यूज करते हैं। सोल्स आर विदाउट बिगिनिंग एंड विदाउट एंड। अभी यहां पे इआई ने गड़बड़ कर दी है। सोल कभी प्लूरल नहीं होगा। सोल सिंगुलर ही होगा। क्योंकि आत्मन एक ही है। देखिए इनफाइनाइट एक ही हो सकता है। मल्टीपल इनफाइनाइट नहीं हो सकते हैं। वि इज अ कॉमन सेंस। तो यह तो एआई ने किया है। सो दिस इज वन ऑफ दिस एरर।

Happiness Meditation: अपनी सफलता के आनंद से अपनी आत्मा को समृद्ध कीजिए

एनीवे यूनिवर्सल इन एव्री मैन एंड इन एव्री एनिमल रिसाइड्स द सेम ओमनी प्रेजेंट ओमनी सीएंट सोल। द डिफरेंस इज नॉट इन द सोल बट इन द मैनिफेस्टेशन। सभी के भीतर में वही आत्मन है। बस वही है कि आत्मन का वही प्रकाश मटेरियल रियलिटी के अनुसार अलग-अलग है। यहां पर कोटेशन मार्क दिया है। अर्थात कि स्वामी जी का जो टेक्स्ट है डायरेक्ट कोट किया है। यहां पे उसने अपने से बनाया है। बोल के यह गड़बड़ कर दिया है। इनफाइनाइट का सिंबल अच्छा है। किंतु टेक्स्ट कंप्लीटली रॉन्ग है। तो यह उसके बाद में इनहरेंटली परफेक्ट ऑल पावर्स ब्लेसिंग पोरिटी ओमनी प्रेजेंस ओमनीिसियंस आर बरी इन ईच सोल अभी यह ईच सोल स्वामी जी ने जब यूज किया है तो मुझे लगता है कि उसका सोल्स प्लूरल जो है लॉजिकल लगेगा उसको तो एनीवे बरीड इन ईच पर्संस सोल ऐसा यदि कहेंगे तो बेटर रहेगा तो एनीवे शब्दों की जो प्रॉब्लम्स है अद्वैत वेदांत के साथ में वह तो रहने ही वाला है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर में आत्मन का प्रकाश है। जिस तरह से यह घट घट के भीतर में भरा है पानी और यह पानी में वही सूरज प्रकाशित हो रहा है। तो हजार घट है तो हजार प्रतिबिंबित सूर्य देखने को मिलेंगे। किंतु असली सूर्य तो एक ही है। इस दृष्टि में हम कह सकते हैं कि मल्टीपल सूर्य है या तो फिर बेटर रहेगा कहना सूर्य के मल्टीपल रिफ्लेक्शन है जिसको कि हम जीवात्मन कहते हैं वेदांत की भाषा में वो है आत्मन अर्थात कि सूर्य और जीवात्मन अर्थात कि यह घट के भीतर में प्रकाशित सूर्य। तो यह जीवात्मन जो है यह है एक और वह अपना अंतःकरण मन बुद्धि चित्त अहंकार और दूसरा है यह सूरज का रिफ्लेक्शन जो कि हम प्रतिबिंबित चैतन्य कहेंगे। तो यह मन बुद्धि चित्त अहंकार और यह प्रतिबिंबित चैतन्य दोनों मिलकर के जो बनता है वह होता है जीवात्मन। इंटरेस्टिंगली अभी कुछ समय पहले एक डिवोटी के साथ में मेरा वार्तालाप हो रहा था। तो मुझे उन्होंने प्रश्न किया कि यह कर्तृत्व और भक्तृत्व यह जो है उससे हम मुक्त कैसे हो? क्योंकि क्या है कि आप कोई अच्छा कार्य करते हैं तो आपको प्रज़ मिलेगा। आपको प्रशंसा मिलेगी कि हां आपने अच्छा कार्य किया। तो इससे क्या होगा? मेरा घमंड जो है अहंकार है बढ़ जाएगा। और फिर यदि हमने कुछ गड़बड़ कर दी या दूसरों को ऐसा लगता है कि इसने कुछ गड़बड़ की है तो वह हमको डांटेगा या हमारी निंदा करेगा या तो फिर हमको क्रिटिसाइज करेगा। इससे हम लोग डिप्रेस हो जाएंगे। तो प्रशंसा मिलती है तो घमंड बढ़ जाता है और निंदा मिलती है तो डिप्रेस हो जाते हैं। तो ये कर्तृत्व और भोक्तृत्व इससे मुक्त कैसे हुआ जाए? यह प्रश्न उन्होंने मुझे किया तो मैंने क्या उत्तर दिया? मैंने कहा देखिए कि यह जो हमारा इन कॉन्शियसनेस है हमारे भीतर का कॉन्शियसनेस यह दो पदार्थ का बना है। कॉम्बिनेशन है। एक है जड़ पार्ट। दूसरा है चेतन पार्ट। जड़ पार्ट है। मन बुद्धि चित्त अहंकार चेतन है। यह रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस। रिफ्लेक्टेड आत्मन। आत्मन का प्रकाश की एक किरण। यह दोनों मिलकर के एक बनता है अपना कॉन्शियसनेस। अभी क्या है? देखिए आप जो भी कार्य करते हैं आप यह सोचिए कि यह किसको नरिश करते हैं। अच्छा यह जो प्रश्न उन्होंने किया कि कर्तृत्व भोक्तृत्व से मुक्ति कैसे मिल जाए? तो उन्होंने साथ में ही मुझे यह भी कहा कि मेरी जो सक्सेस है ना उसको मैं भूल जाना चाहता हूं। जिससे कि क्या होगा कि मेरे मन में उसके बारे में कभी घमंड ही ना प्रकट हो। तो मैंने कहा देखिए कि सक्सेस आपको मिली है। उसमें आपका जो मेहनत है वह तो है ही है। किंतु साथ में ईश्वर के भी आशीर्वाद है। यह जो पुरुषार्थ और परमार्थ दोनों मिलकर के ही तो हमारा जीवन है। तो आपका पुरुषार्थ जितना है उतना ही ईश्वर के आशीर्वाद भी है। तो आप सक्सेस को इसके लिए ना भूल जाइए कि इसी वजह से आपका घमंड बढ़ जाएगा। यह कैसा हुआ पता है? थ्रोविंग द बेबी अलोंग विद द बाथ वाटर। यह छोटा सा टब होता है ना पानी का जिसमें आप छोटे बेबी को नहलाने के लिए रखते हैं। अभी वो आपने वो स्नान हो गया बेबी का तो वो टब के भीतर का वाटर है। पानी है फेंक देना। वो भूल गए कि वो टब के भीतर में वो बच्चा अभी भी सोया हुआ है। म बैठा हुआ है। तो पानी फेंका तो बच्चे को भी फेंक दिया। ऐसा नहीं करना है। अपनी जो सक्सेस है, सक्सेस से जो प्राइड प्रकट होता है, उसको आप चैनलाइज कीजिए। उसके ऊपर में आप ध्यान कीजिए। जैसे कि मेरा एक कांसेप्ट है हैप्पीनेस मेडिटेशन। हैप्पीनेस मेडिटेशन क्या है? अपने जीवन की जो सफलता इवेंट्स है जो कि सफलताएं हैं अपने जीवन की खुशियां जो है पॉजिटिव इवेंट्स जो है उन सबके ऊपर में ध्यान करना जिससे कि उन सब से जो आनंद प्रकट हुआ था वो आनंद हमारे भीतर में प्रवेश करें। हमको नरिश करें। हमको नर्चर करें। तो अभी देखिए कि किस तरह से इसको हमको देखना है। हमारी जो सक्सेस है उसके ऊपर ध्यान कीजिए। उसका आनंद उठाइए और इस तरह से उठाइए कि यह जो दो एलिमेंट है अपनी कॉन्शियसनेस के जड़ और चेतन उसमें से चेतन एलिमेंट को वो नरिश करें। अपना यह जो रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस या तो सूरज का जो प्रकाश है आत्मन की जो रिफ्लेक्टेड आत्मन जो है जीवा तो उसको वह नरिश करें। यह आप इस तरह से इसके ऊपर ध्यान कीजिए। मेरी सक्सेस उसको मैं दूसरों के सामने उसका वर्णन करके उन लोगों की प्रशंसा अर्जन करना चाहता हूं। यह यदि मेरा भाव है तो यह मेरा जो जड़ भाग है मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार उसको मैं नरिश करूंगा। उसको मैं स्ट्रेंथन करूंगा। ऐसा मत कीजिए। किंतु साथ में ही उसको इस तरह से यूटिलाइज कीजिए, चैनलाइज कीजिए कि अपना यह जो आत्मसंतोष है, आत्मसंतुष्टि है, आनंद जो है, आनंद को हम ड्रॉ कर पाए। यह कैसा हो गया पता है? यह जो बेल फल की उपमा ठाकुर वैसे देते हैं। मैं थोड़ा अलग से देता हूं। बेल फल है उसका एक बाह्य आवरण होता है जो कि अखाद्य है और उसके भीतर में एक पल्प होता है जो कि खाद्य है। तो बाह्य आवरण हटा दीजिए। भीतर का पल्प ले लीजिए। अर्थात कि मेरी जो सक्सेस है उसका यह यूटिलाइज मत कीजिए कि मैंने यह अच्छा कार्य किया। मैं 10 लोगों को जो भी मेरे सामने आता है सबके सामने मैं गाता फिरता हूं। मैंने ऐसा किया, मैंने ऐसा किया तो वे लोग सब बोले खुश हो जाएंगे। आपकी प्रशंसा करेंगे। प्रशंसा करेंगे तो क्या होगा? यह मेरा अहंकार ही तो बढ़ेगा। यह जो जड़ भाग है मेरी कॉन्शियसनेस का वही तो स्ट्रेंथन होगा। किंतु ऐसा कभी नहीं करना है। एट द सेम टाइम सक्सेस को भूल नहीं जाना है। सक्सेस के साथ में आप क्या कीजिए? उसको याद कीजिए। उसको उसके ऊपर में चिंतन कीजिए और उससे जो आनंद आपको आया है वह आनंद को अपने पूरे भीतर में प्रकाशित होने दीजिए। उसके ऊपर में देखिए ध्यान का क्या अर्थ है? मन भटकता है 1000 जगहों पे। तो मन को तो कंसंट्रेट करके एक जगह पर बिठाना वही तो अल्टीमेटली ध्यान है ना। तो फिर देखिए कि मैं अपनी सक्सेस पे, अपनी खुशियों पे, अपनी सफलता पे, अपने हंसी-खुशी के पलों पे उसको मैं कंटेंप्लेट करता हूं तो मन तो मेरा एकाग्र ही रहेगा उतने समय के लिए। तो देखिए कि मैं अपनी सक्सेस के साथ में तीन चीजें कर सकता हूं। एक तो मैं बहुत ही जड़ तरह का, तामसिक तरह का आदमी हूं। तो मैं अपनी सक्सेस को सबके सामने वर्णन करता घूमूंगा इस आशा में कि लोग मेरी प्रशंसा करें और यदि मेरी प्रशंसा करते हैं तो मेरा घमंड ही बढ़ेगा। इससे क्या होगा? यह जो जड़ पार्ट है मेरी कॉन्शियसनेस का वो स्ट्रेंथन होगा। अभी मैं यदि साधना में प्रवेश करता हूं और मैं कच्चा साधक हूं तो मैं क्या करूंगा? अपनी सक्सेस को भूल जाने का प्रयास करूंगा। किंतु दिस इज वेरी अनफॉर्चूनेट। ईश्वर ने आपको एक मौका दिया है। ईश्वर ने आपको एक तक दी है कि आप समाज का कुछ भला करते हैं। अपना कुछ अच्छा करते हैं। परिवारजनों के लिए कुछ अच्छा करते हैं। क्यों आप इसको भूल जाएंगे? बेटर ऑप्शन है। पक्का साधक जो होता है। कच्चा साधक सक्सेस को भूल जाने का प्रयास करेगा। पक्का साधक है। सक्सेस को यूटिलाइज करेगा आध्यात्मिक जगत के लिए। उसके ऊपर में कंटप्लेशन कीजिए। उसके ऊपर में चिंतन कीजिए। उसमें से जो खुशी प्रकट होती है उसको आप अपने उसके ऊपर में ध्यान कीजिए जिससे कि बाकी सब चीजें चली जाए। आपका मन एकाग्र हो जाए और इस एकाग्रता को आप यूज कर सकते एकाग्रता हो गई तो हम आध्यात्मिक जीवन में आगे से आगे बढ़ सकते हैं। तो देखिए कि यह कर्तृत्व भक्तृत्व से मुक्ति पाने का यह एक उपाय है। तो बेसिक आईडिया क्या है? हमको समझना है कि हमारा इनर आर्किटेक्चर किस तरह से बना। इनर आर्किटेक्चर बना है। जैसे हम लोग यह मेडिकल साइंस आप डॉक्टर बनेंगे। मेडिकल साइंस स्टडी करेंगे तो अपना बॉडी है उसको कितना डिटेल में स्टडी करते हैं। अपना बॉडी में यह नर्वस सिस्टम है उसको स्टडी करना है। यह गैस्ट्रो इंटेस्टिनल सिस्टम है उसको स्टडी करना है। यह लंग्स जो है इसको स्टडी करते हैं। यह अपना ब्रेन के स्पेशलिस्ट होते हैं। हार्ट स्पेशलिस्ट होते हैं। किडनी स्पेशलिस्ट होते हैं। ऑर्थोपेडिक होते हैं। ये आई ईएनटी स्पेशलिस्ट होते हैं। आई आई नोज एंड थ्रोट तो ईएनटी स्पेशलिस्ट होते हैं। इतने सारे स्पेशलिस्ट है अपना बॉडी का स्टडी करते हैं। स्किन स्पेशलिस्ट होते हैं। क्या-क्या आजकल तो नहीं हो गया है। तो अपने भीतर का जो आर्किटेक्चर है, अपने भीतर के जो ऑर्गन है, कॉन्शियसनेस है, उसको स्टडी करने वाले बहुत कम लोग हैं और उसको एज ए साइंस अप्लाई करने वाले उसको लेकर के अपने डे टू डे समस्या का ये करने वाले लोग और भी कम है। देखिए अगेन दिस इज समथिंग ये कर्तृत्व भक्त से याद आया। कल ही एक घटना हुई। मैं यहां पर इवनिंग सैटरडे इवनिंग को एक क्लास करता हूं। युवाओं के लिए है विवेकानंद यूथ फोरम। तो क्या है कि उसमें एक लड़की आती थी। अभी हमारे यहां पे क्या है कि एक रीडिंग रूम है लाइब्रेरी में। तो जो लोग कंपटीशन एग्जाम का तैयारी करते हैं, कोई भी एग्जाम का तैयारी करते हैं, वे लोग मेंबरशिप लेते हैं। वहां पे पूरा दिन बैठकर के स्टडी करेंगे। कुछ-कुछ स्टूडेंट बड़े ही सिंसियर होते हैं। दिन भर स्टडी करेंगे। जैसे लाइब्रेरी ओपन होता है आकर बैठ जाएंगे और पूरा दिन बैठे रहेंगे। स्टडी करेंगे। साथ में लंच बॉक्स ले आएंगे और वहां पे बाहर बैठकर के लाइब्रेरी के बाहर में बैठ के खा लेंगे। बीच-बीच में सामने ही तो सी शोर है नदी दरिया का किनारा तो वहां पे चाय वगैरह बढ़िया मिलता है। तो वहां जाकर बीच-बीच में चाय पी के आएंगे। तो दिन भर स्टडी करेंगे। तो एक लड़की वो बिल्कुल नियमित आती है हमारे रीडिंग रूम में। तो मेरे सैटरडे क्लास में भी आती है। अ कल वो मुझे मिलने के लिए आई। मुझे कहा कि यह मेरा आखिरी दिन है। मैं अपने गांव जा रही हूं। अभी शायद मैं वापस नहीं लौटूंगी। तो मैंने पूछा उसको कि मैंने कहा कि अच्छा तो आई विल लॉस अ वेरी गुड स्टूडेंट क्योंकि वह बहुत ही रेगुलर थी। बड़ी सिंसियर थी। सो एनीवे फिर उसने अपनी बात कहना शुरू किया। वह बोलती है कि मुझे आपके साथ वैसे वह क्लास में क्वेश्चन करेगी किंतु ऐसा पर्सनल बात कभी नहीं। पहली बार कल मेरे साथ बात हुआ। मुझे कहती है कि उसकी मां का निधन हो गया और उसकी लाइफ में कुछ पर्सनल प्रॉब्लम्स आ गए थे। बड़े ही सीरियस पर्सनल प्रॉब्लम उसकी लाइफ में स्टार्ट हो गए थे। तो उसका परिणाम यह आया कि उसको इंसोमिया हो गया। वो रात की नींद नहीं आती थी। सोने की गोलियां खाती थी। टेबलेट स्लीपिंग पिल्स लेती थी और उसको हेलुसिनेशन होने लगा था। विचित्र विचित्र आवाजें सुनाई देती थी। जैसे कांच गिर गिर करके टूट गया है। इस तरह की आवाज तो मैंने तो सुना मैं तो एकदम ये हो गया। मैंने कहा अरे बाप रे ये तो बड़ा डेंजरस है। मैंने मुझे कहा हां किंतु देखिए वो मुझे कहती है कि इतने दिन मैंने यह जो सैटरडे का क्लास किया मेरा सब कुछ खत्म हो गया प्रॉब्लम। रात की नींद अभी ठीक से आ रही है। स्लीपिंग पिल्स लेने की जरूरत नहीं है। हेलुसिनेशन जो होता था वह अभी नहीं हो रहा है। एवरीथिंग बिकॉज़ ऑफ दिस सैटरडे क्लास। तो मैं तो इतना खुश हो गया। मैंने कहा अच्छा इतना अच्छा बेनिफिट हुआ तो तो बहुत अच्छी बात है। क्लास स्टार्ट हुआ था जब मैंने यह ठीक किया था कि यदि एक पर्सन को भी बेनिफिट होता है तो क्लास इज वर्थ इट। मैं रेगुलर उसको करूंगा। कभी छुट्टी नहीं लगाऊंगा। तो यस्टरडे मुझे साक्षात इस बात का प्रमाण मिला कि हां यह क्लास सक्सेसफुल है। अनफॉर्चूनेटली अभी यह चली जाएगी अपने गांव। वो अभी वो वापस नहीं आएगी शायद मोस्ट प्रोबेबबली। बट एनीवेयर। सो देखिए अभी दिस इज समथिंग कि आई एम फीलिंग ए लॉट ऑफ प्राइड कि हां चलो मेरे क्लास से किसी को तो इस तरह से बेनिफिट हुआ। अभी मैं क्या करूंगा एज ए साधक यह तो मैंने आपके सामने इसका वर्णन किया। इसका क्या अर्थ है कि मैं इससे आपकी प्रशंसा अर्जन करना चाहता हूं। यदि यह मेरा आशय है तो क्या होगा कि मेरा यह जो जड़ पार्ट है मेरे मन का मन बुद्धि चित्त अहंकार यही स्ट्रांग होगा और मेरे चेतन जो कॉमोनेंट है मेरी कॉन्शियसनेस का उसको खा जाएगा किंतु यदि इसी सक्सेस को मैं एक चैनलाइज करता हूं सुबह को जब मैं बैठता हूं ध्यान करता हूं तो मैं जैसे कि याद करता हूं कि हां वो मेरे साथ बात कर रही थी शी वाज़ वेरी ग्रेटफुल बहुत ही विनम्रता से बहुत ही ग्रेटफुली मेरे साथ बात करिए। सो आई फील प्राइड क्यों नहीं प्राइड क्यों नहीं होगा? हम तो एट द एंड ऑफ द डे हम कोई ब्रह्मज्ञानी थोड़ी ना है। बट सी दिस प्राइड हैज़ टू बी चैनलाइज्ड इन टू ये जो मेरा चेतन कंपोनेंट है कॉन्शियस कंपोनेंट उसको मुझे नरिश करने के लिए उसको चैनलाइज करना है। कच्चा साधक मैंने देखिए मैंने ऐसा पहली बार कई बार किया है। मैं लिमड़ी में एक प्राइमरी स्कूल में जाता था। प्राइमरी पास में ही है गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल तो उस समय ये गदाधर प्रोजेक्ट चलता था स्वामी जी की 150 एनिवर्सरी के उपलक्ष में तो गदाधर प्रोजेक्ट के तहत उस स्कूल में जाना है बच्चों को योगा सिखाना है उनको यह नरिश नरिशिंग फूड देना है रांची के मेरे दिन जो है कि मैंने गांव में इतना सारा काम किया किंतु मैं जब यहां पर आया और यह लिमड़ी के जो स्कूल में काम कर रहा था। रांची में मैं गांव में जाता था। मैंने एक बड़ा ही स्ट्रांग प्रयास किया था कि वह पॉजिटिव मेमोरीज जो है मेरी उसको मैं दबा दूं। उसको मैं छुपा दूं। उसको मैं अपने दिमाग से काट करके फेंक दूं। इस डर में कि यह जो पॉजिटिव कार्य जो मैंने किए हैं वह कहीं मेरे घमंड का म यह आश्रय ना हो जाए। उसकी वजह से मेरा घमंड कहीं ना बढ़ जाए कि अच्छा तुम अच्छा काम करते हो तो अभी जैसे कहते हैं ना कि यह पाप और पुण्य दोनों के परे जाना है। आप अच्छा कार्य करेंगे तो पुण्य मिलेगा। बुरा कार्य करेंगे तो पाप मिलेगा। पाप और पुण्य दोनों के परे जाना है। पाप पाप किया तो नरक भोग करना होगा। पुण्य किया तो स्वर्ग भोग करना होगा। किंतु मुक्ति के रास्ते में दोनों अंतराय है। तो यह मैंने बड़ा ही स्ट्रांग प्रयास किया था एक समय कि मैंने जो जो कुछ अच्छा किया है जितनी भी मेरी पॉजिटिव मेमोरीज है। रांची की मेरी इतनी सारी पॉजिटिव मेमोरीज है। यह लिमड़ी में मैं स्कूल में जाता था। इतनी सारी पॉजिटिव मेमोरीज है। सबको जैसे कि मैंने अपने माइंड में से काट करके फेंकने का प्रयास किया। किंतु अभी इस आज जो मैं जिस जगह पर हूं मुझे लगता है कि इस तरह से नहीं करके अपनी पॉजिटिव मेमोरीज है उसको आप अपना यह जो चेतन कंपोनेंट है यह जो रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस है रिफ्लेक्टेड चैतन्य जो है उसको नरिश करने में लगाइए। इसको आप स्ट्रेंथन करने में लगाइए। इससे क्या होगा कि यह जो चेतन पार्ट है वह जड़ पार्ट के ऊपर में हावी हो जाएगा और यह जड़ पार्ट धीरे-धीरे करके कमजोर हो जाएगा। तो यह एक बात दूसरा एक इंटरेस्टिंग ऑब्जरर्वेशन जो जिस डिवोटी के साथ में मैं बात कर रहा था उनका एक इंटरेस्टिंग ऑब्जरर्वेशन था। मैं जब यह कह रहा हूं कि यह जो पॉजिटिव मेमोरी है यूज़ इट यूटिलाइज इट टू नरिश योर आत्मन नरिश योर रिफ्लेक्टेड आत्मन। तो उन्होंने कहा वेरी वैलिड ऑब्जरवेशन कि आत्मन को आप नरिश कैसे करेंगे? यह जो शब्द प्रयोग आपने किया है क्या वह सही है क्या? आत्मन तो ऑलरेडी सच्चित आनंदमय है। सच्चित आनंद ही है। उसमें आप ऊपर में से तो कुछ डालना नहीं है। तो नरिश करना आत्मन को इज दिस राइट शब्द प्रयोग। मैंने कहा आप ठीक कहते हैं वह जो ओरिजिनल आत्मन है जो माने यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस या तो फिर सूरज अपने उदाहरण में उसको हमको नरिश नहीं करना है। पृथ्वी में से आप 1000 टॉर्च आप सूरज के ऊपर में फेंकेंगे तो टॉर्च के लाइट से थोड़ी ना सूरज को उसको कोई बल मिलने वाला है। सूरज का ब्राइटनेस से वो बढ़ने वाला है। कोई फर्क नहीं पड़ता। किंतु क्या है कि यह जो रिफ्लेक्टेड कॉन्शियस सूरज का यह जो रिफ्लेक्शन है घट घट के भीतर में उसको तो आप स्ट्रेंथन कर सकते हैं। देखिए ओरिजिनल सूरज तो जिस प्रकाश वो देता है वह देता है। उसमें ना ही बढ़ने वाला है कुछ ना ही कमने वाला है। किंतु मान लीजिए एक घट के भीतर में मैं पानी रखा है और उसमें यह सूरज का प्रतिबिंब दिख रहा है। अभी पानी स्वच्छ होगा और पानी स्थिर होगा तो ये प्रतिबिंब जो है रिफ्लेक्शन है मुझे ब्राइट दिखाई देगा और पानी यदि उसमें कचरा मिला हुआ है उसमें सतत तरंगे उठती रहती है तो यह जो सूरज का रिफ्लेक्शन है वो धीरे-धीरे करके डीम हो जाएगा उसका लाइट कम हो जाएगा तो जब मैं यह कहता हूं यूज़ दिस पॉजिटिव एक्सपीरियंस टू नरिश द सोल इसका अर्थ यही है कि यह जो अपना यह जो पानी जो है उसको स्वच्छ करना है और उसके ऊपर में से तरंगों को शांत करना है जिससे कि यह जो सूरज का प्रकाश है और ज्यादा ब्राइट और ब्राइट दिखे। इतना तो हम कर सकते हैं। अल्टीमेटली घट टूट गया, प्रतिबिंब नष्ट हो गया, सीधा वह सूरज ही रह गया। अर्थात कि निर्विकल्प समाधि हो गई और यह क्लेश है, दगदबीज हो गए। वह तो कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु जब तक यह डरिपु पंच कक्लेश अष्टपाश कामिनी कांचन इसके फंदे में जब तक पड़े हुए हैं तब तक तो यह घट के भीतर में हम हैं। तब तक तो हमको यह रिफ्लेक्टेड रिफ्लेक्शन के प्रकाश से ही काम चलाना है। तो क्यों नहीं यह रिफ्लेक्टेड लाइट जो है उसको नरिश किया जाए। उसको स्ट्रेंथन किया जाए। उसको ब्राइटर किया जाए। इतना तो हम साधना करके कर सकते हैं। सो यह पूरा कि आत्मन है वैसे इनहरेंटली परफेक्ट किंतु जब यही आत्मन हमारे भीतर में रिफ्लेक्ट होता है तो वह मलन हो जाती है यह मन बुद्धि चित्त अहंकार के साथ में संयुक्त होकर के तो उसी आत्मन को हमको स्ट्रेंथन करना है।

स्वर्ग की प्राप्ति नहीं, बंधन से पूर्ण मुक्ति हमारा लक्ष्य है

एंड फोर्थ पॉइंट क्या है यहां पे? एआई क्या कहता है? द गोल इज फ्रीडम। द गोल इज मुक्ति नॉट हेवन। यह देखिए बहुत ही इंपॉर्टेंट पुण्य उद्देश्य नहीं है। यह फिर वही हमारा पूरा डिस्कशन कि ये पॉजिटिव एक्सपीरियंस है हमारे तो वह तो पुण्य अर्जन करते हैं। तो पुण्य को क्या हमको फेंक देना है तो पुण्य यदि नहीं प्राप्त करना है तो पॉजिटिव एक्सपीरियंस को भूल जाना है नहीं। ऐसा मत कीजिए कभी भी। इस पॉजिटिव एक्सपीरियंस से प्रकट हुए यह जो मन का संतोष है उसको अपना यह जो रिफ्लेक्टेड सूरज है उसको स्ट्रेंथन करने में लगाइए। नॉट हेवन कंप्लीट फ्रीडम फ्रॉम द स्लेवरी ऑफ नेचर। यह जो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी जड़ कंपोनेंट यह जो चेतन के साथ में मिक्स हुआ मिक्स हुआ है, उससे हमको संपूर्ण मुक्ति प्राप्त करनी है। अच्छा यह स्लाइड है। अभी हम कल देखते हैं। आज यहीं तक कल अभी मंडे को अभी हमारा नेक्स्ट क्लास होगा। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: एक तरफ विवेकानंद वेदांत के प्रसार का आह्वान करते हैं, और दूसरी तरफ वेदांत स्वयं सिखाता है कि साधक को गुप्त रहना चाहिए, क्योंकि सफलता अहंकार को जन्म दे सकती है। इन दोनों विरोधी धारणाओं में संतुलन का मार्ग कैसे मिले?

ठाकुर वो कहानी कहता है ना एक गुरु अपने शिष्य को कहता है जाओ चिलम सजा करके ले आओ तो शिष्य कहता है कि मैं क्या आपकी चिलम सजाने के योग्य हूं ऐसा करके फिर वो चिलम नहीं सजाया तो ये कोई सत्त का निशानी ये तमस का निशानी है कि मैं कौन हूं मुझे नहीं आता। मैं तो दीन हीन ये सब क्या है ना एक तरह का गुप्त अहंकार है और फिर ऐसे ही लोग दूसरों की निंदा भी करेंगे। अरे वह ऐसा है वो ऐसा है। जो लोग अपने को छुपा के रखते हैं ना वो बहुत बड़े निंदुक होते हैं। मेरा एक अनुभव रहा है अभी तक का कि जितना अपने को छुपाएंगे उतना ही दूसरों की निंदा करेंगे। यह कुछ नहीं है। गुप्त अहंकार है। देखिए ठाकुर मां स्वामी जी का एक समग्र संदेश है जो कोर्ट अनकोट एक ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी है कि दीन हीन भाव यह अपना भाव नहीं है। देखिए जैसे मैंने कहा अभी हमारा जो डिस्कशन हुआ आप किसको नरिश करते हैं? कोई भी यह कर्तृत्व भोक्तृत्व वाला जो आपका यह है मैं कोई कार्य करता हूं। आप किसको नरिश करते हैं? जड़ पार्ट को नरिश करते मेरा अहंकार बढ़ेगा या मैं चेतन पार्ट को नरिश करता हूं कि मेरा यह जो आत्मज्ञान की ओर मेरी गति है उसमें मुझे हेल्प मिलेगी। राइट? तो थिंक ऑफ इट। आप कोई भी अच्छा कार्य करते हैं तो एक डिवोटी की बात बताता हूं। एक आश्रम में एक काम था। अभी क्या यह डिवोटी रेगुलर नहीं आ पाएंगे आश्रम में। तो जाके बोला कि मुझे थोड़ा सा काम दीजिए। ज्यादा काम मत दीजिए। जो कि मैं रेगुलरली आकर करके खत्म करके अपना जा पाऊं। फिर वो और कोई ज्यादा टेंशन मुझे नहीं लेना। तो वहां से क्या है? वीकली वो डिस्ट्रीब्यूट होता था कुछ बच्चों को ना कि ऐसा कुछ डिस्ट्रीब्यूशन चलता था। बोला आप इसका जिम्मा ले लीजिए। सप्ताह में एक दिन आइए डिस्ट्रीब्यूशन का जिम्मा ले लीजिए। अकाउंट पे अकाउंट रखना है। वो स्टॉक मैनेज करना है। आप चले जाइए अपने से। तो क्या है कि वो आते थे डिस्ट्रीब्यूट करते थे। चले जाते थे। आश्रम में ऐसा कोई ज्यादा लोगों को पता नहीं कि यह वह एक अलग से एक जगह पर जाकर ऐसा डिस्ट्रीब्यूट करते हैं, रेगुलर करते हैं, चले जाते हैं। तो देखिए कि उन्होंने काफी साल तक किया फिर भी आश्रम में एस सच पता नहीं कि वो आते हैं करते हैं। तो दो चीजें हैं। वो जाके अपनी प्रशंसा करवा सकते हैं। क्या वो रेगुलर आता मैं जाकर बोलेंगे आश्रम में। मैं वहां पे हर सप्ताह जाता हूं। यह डिस्ट्रीब्यूट करता हूं। तो 10 लोग उनकी वाहवाह करेंगे। यह पर्पस है ना कि एक मैंने दिया कुछ छुप करके अपने से दिया देकर के मैं चला गया। मेरा यह जो चेतन पार्ट है वह नरिश हुआ। व्हाट इज माय पर्पस? मैं वड़ोदरा की बात बताता हूं। मैं वहां पर वॉलंटियर था। आश्रम नहीं बना था। तो वहां पे एक डिस्पेंसरी था। इस डिस्पेंसरी में एक तो डॉक्टर आते थे और एक आते थे असिस्टेंट के रूप में। तो वह थे एक्चुअली बैंक में नौकरी करते थे और बैंक में क्या है? वो जल्दी छुट्टी हो जाता है तो फिर वो दोपहर को वहां पे बैठे रहते थे तो दवाई देना है डॉक्टर को मैं अभी है एक्चुअली बैंक ऑफिसर वो सैलरी फैलरी काफी हाई है तो किंतु फिर भी एवरीडे वो वहां पे वो डिस्पेंसरी में जाकर बैठेंगे वो डिस्पेंसरी इतनी गरीब जगह पे है कि मतलब सही में आवश्यकता है वहां पे इस तरह का कार्य करने की उसके बाद में वहां पे आश्रम हुआ उस भाई ने बहुत साल तक सेवा दी उसके बाद में वहां पर आश्रम हुआ आश्रम में बहुत सारे डिवोटी आने लगे लगे जो कि बड़े महाराज के साथ में फोटो खिंचवाएंगे सब करेंगे। मैं कभी-कभी पूछता था अच्छा वो जो वो थे वो भाई मैं भी वहां पे जाकर कुछ दिन सेवा दिया था। मैं उनको बड़े अच्छे से पहचानता हूं। तो वो कहां है? आते हैं कि नहीं आते? बोले कौन? उसका तो नाम ही नहीं सुना। मैंने कहा क्या बात करते हो? उस आदमी ने बेचारेन ने आश्रम होने से पहले सही में जो सीरियस काम किया उसको भूल गए और ये जो कुछ वीआईपी आ के फोटो खिंचवाते हैं वो सबको याद है। सो व्हाट इज द मीनिंग ऑफ़ दैट? तो क्या है? देखिए कार्य कीजिए वि दीनहीन भाव छुपा के रखना रामकृष्ण मिशन का ट्रेड मतलब पद्धति नहीं एट द सेम टाइम अंडरस्टैंड कि ये किसको नरिश कर रहा है आपके अहंकार को नरिश कर रहा है कि आपके चेतन तत्व को नरिश कर रहा है सो बी केयरफुल अबाउट दैट तो थे प्रिंसिपल थे अपनी खुद की स्कूल के स्कूल बंद कर दिया उन्होंने ठीक किया कि मैं रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का प्रचार करूंगा तो क्या किया मैंने एव्री तीन तीन चार महीने पे वो अपना एक गाड़ी भाड़ेकर लिया और उसमें अपनी किताबों को लेकर के सूरत है, भरूच है, अंकलेश्वर है जाकर के वो स्कूल में चौराहे पे खड़े हो जाएंगे और बेचेंगे। सॉलिड सेल होता था। दैट इज वन थिंग। किंतु देखिए कि एक स्कूल का प्रिंसिपल जो कि एक खुशी जॉब है। कंफर्टेबल जॉब है। अपना घर से स्कूल पास में ही है। घर से स्कूल जाना है। स्कूल से घर आना है। ही कुड हैव लिव्ड वेरी कंफर्टेबली। इंस्टेड ऑफ दैट टू सिलेलेक्ट अ लाइफ ऑन द रोड वो ट्रक वो बस ले जाते थे मिनी वन किताबें रखी है तो उसी में सोना है फिर ये स्टव ले जाते थे वहीं पे खाना बनाना है इट्स अ एडवेंचर आल्सो बट आल्सो इट इज अ स्ट्रगल तो ये जो उन्होंने साल पर साल उन्होंने किया सॉलिड लिटरेचर का प्रसार किया मेरे साथ में बहुत अच्छा रिलेशन था उनका सो देखिए कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने सही में अभी क्या है वो घमंड जैसा ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा वो आप उनके साथ में बात करेंगे ना लगेगा ही नहीं कि ये फॉर्मर प्रिंसिपल है और इतने इतना सारा काम किया है। बिल्कुल डाउन टू अर्थ पर्सन किंतु देखिए वो दीनहीन भाव का आश्रय ले नहीं बैठे रहे। अग्रेसिवली प्रचार किया है। जहां म कहते हैं कि चौराहे पर जाकर खड़ा रह गया हूं। म लाज शर्म जैसा कुछ नहीं। सीधा किताब लेकर लोगों के हाथ में देना है। और पैसों फैसों की चिंता नहीं करनी है। लॉस हुआ तो हुआ। मेरे साथ में कभी-कभी मैं शुरू-शुर में जब राजकोट पोस्टिंग हुआ था तो मैं डिस्पैच देखता था तो मुझे कभी-कभी मैं गुस्सा हो जाता था क्योंकि क्या अकाउंट तो परफेक्ट रखना है आप 100 किताबें ले गए हैं पैसा देंगे 50 का बोलेंगे 50 मिस हो गई कैसे चलेगा तो उस समय में अनंत महाराज थे अध्यक्ष मैं महाराज को बोलता था महाराज बोलते हैं अरे तुम मैनेज कर दो ना पैसा कम पड़ता है मैं दे देता हूं वो बहुत अच्छा कार्य करता है अब आई एम इन अ क्फ्लिक्ट ऑन वन पॉइंट मैं समझ रहा हूं कि बहुत अच्छा कार्य है एट द सेम टाइम बीइंग ए मक आई हैव टू बी रिस्पांसिबल फॉर दैट अकाउंटिंग एटसेट्रा सो एनीवे फॉरर्चूनेटली वो मेरा डिस्पैच वाला जॉब ज्यादा टिका नहीं वो तो मैं पोस्टिंग हुआ था पब्लिकेशन के लिए वो तो एक टेंपरेरी था सो वंस मैं पोस्ट वो पब्लिकेशन में आ गया आई कैन एप्रिशिएट होडली विदाउट दिस गिल्ट फीलिंग के अकाउंट ठीक से नहीं रख रहा है दिस इज अ ब्यूटी ऑफ़ रामकृष्ण मिशन ना कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हमारे जो एथिकल स्टैंडर्ड है हमको पीछे रख दे रहा है मैं कभी-कभी भी ऐसा सोचता हूं। एट द सेम टाइम देखिए कि जो एक बार यहां पे आ जाते हैं दे ऑल एप्रिशिएट आवर एथिकल स्टार्ट। सत्वगुण को आप घर-घर पहुंचाने का कार्य करेंगे तभी फाइट होगा। वो ठाकुर कहते हैं ना गहने में सोने में थोड़ा सा अशुद्धि मिलाएंगे तभी गहना बनेगा।

प्रश्न: अपने मिशन के प्रसार हेतु हमें असाधारण समर्पण और प्रचंड शक्ति चाहिए!

देखिए प्रत्येक धर्म में एक महाप्रचारक आता है। बुद्धिज्म में जैसे कि अशोक थे। फिर यह क्रिश्चियनिटी में कॉनस्टेंटिनोपल था। तो प्रत्येक धर्म में एक आते हैं जो महाप्रचारक होते हैं। इसके बिना धर्म चलेगा नहीं। एट द सेम टाइम यू कैन नॉट से दैट कॉनस्टेंटिनोपल इज द माने पेरेगोन ऑफ क्रिश्चियन वर्च्यू नहीं है। अशोक ने तो क्या-क्या सब अत्याचार किए थे वो युद्ध में सबको पता है। एट द सेम टाइम ही इज़ वन ऑफ द बिगेस्ट बेनिफेक्टर ऑफ़ बुद्धिज्म व्हिच इज़ अ रिलीजन ऑफ़ पीस। राइट? देखिए स्वामी जी तो एक वृद्ध महिला के बारे में कहते हैं ना कश्मीर में गए एक वृद्ध महिला के पानी पिला रही थी ना कि क्या उनके पास में ले पानी पी रहे थे स्वामी जी ने पूछा कि माता जी आपका धर्म क्या है तो वो कहती है इंशा्लाह मैं मुस्लिम हूं। म स्वामी जी कहते हैं आई स्टिल रिमेंबर जो प्राइड उसका था। सो यू आर राइट इन दैट वे कि क्रिश्चियनिटी और इस्लाम फंडामेंटली मिशनरी रिलीजन है। वहां पर स्प्रेड होना इट इज देयर डीएनए में ही है। जबकि हिंदूइज़्म इज अ मोर ऑफ अ स्टैटिक रिलीजन जहां पे आत्म साक्षात्कार पे ज्यादा भार दिया गया। रामकृष्ण मिशन इज़ सॉर्ट ऑफ ए टेकिंग द बेस्ट ऑफ दिस मिशनरी रिलीजन एंड टेकिंग द बेस्ट ऑफ आवर आत्मज्ञान बेस्ड रिलीजन। सो वी शुड बी प्राउड ऑफ आवर अह अपनी जो गुरु परंपरा है उस पर हमारा एक श्रद्धा होनी चाहिए कि मैं इन गुरु का इंटरेस्टिंगली मैं बेलून मठ में था तो क्या है कि वह उत्सव होता है ना तो ड्यूटी दी जाती है तो मैं स्वामी जी का कंप्लीट वर्ष में काम करता था मेरा एक परमानेंट ड्यूटी था वो स्वामी जी का वो समाधि मंदिर है वहां पर खड़े रहने का बहुत सारे तो बड़ा ही भयानक भीड़ होता है ना तो क्राउड कंट्रोल करना है तो मेरे साथ में 10 15 वॉलंटियर रहेंगे तो मैं कभी-कभी उनकी बात सुनता ना अभी क्या है झगड़ा भी हो जाता है कि इतना बड़ा काम इतना प्रेशर तो एक कहेगा आमी अमुक महाराज दीक्षित दूसरा कहेगा आमी अमुक महाराज दीक्षित तो मैं उनका दीक्षित हूं तो बोला मैं उनका दीक्षित हूं तो मुझे हंसी बहुत आती थी अभी यार गहनानंद जी के दीक्षित हो ना कि गीतानंद जी के हो कि आत्मस्थानंद जी सभी तो रामकृष्ण मिशन के ही है कि प्राइड कि मैं उनका दीक्षित हूं तुम कौन हो मेरे साथ बात करने वाले ओम