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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

ज्ञान योग स्वामी विवेकानन्द Cosmos Microcosm 8 Feb 2024

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ओ स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कल हम जो डिस्कशन कर रहे थे उसमें एक टॉपिक था कि भक्ति के बारे में जैसे ने कहा है कि अंदर महल तक जा सकती है अर्थात कि जैसे हम वो कल सुधीरा दीदी और सरला दीदी की बात कर रहे थे उसके उपलक्ष में उसको ध्यान करके कि भक्ति अंदर महल अर्थात की पहले के समय ऐसा था ना कि जब वह अपना घर होता है तो उसमें बाहर के कमरे में ही पुरुष लोग जाएंगे जो वहां पर गेस्ट है किंतु स्त्रियां भीतर तक जा सकती है तो तो ठाकुर ने इस बात को लेकर के कहा कि भक्ति उस स्त्री की तरह है जो कि अपने घर में अंदर के कमरे तक जा सकती है और ज्ञान पुरुष की तरह है जो सिर्फ बाहर के कमरे तक ही रह सकता है तो इसका तात्पर्य क्या है तो अभी इसके तात्पर्य तो वैसे आप जो चाहे निकाल सकते हैं ठाकुर की दृष्टि से तो बड़ा सरल कहना है कि भक्ति स्त्री अर्थात की व वो भक्ति करना सहज है जो कि और ज्ञान का जद कहेंगे कि प्रैक्टिस वो थोड़ा सा कठिन है किंतु फिर भी ये जो एनालॉजी यूज की है जेंडर उसका क्या अर्थ तो मेरी दृष्टि से यदि मैं अपना एक एनालिसिस करूं तो स्त्री के साथ में वल्नरेबल जुड़ी हुई है वो थोड़ी सी स्त्रियों को इसीलिए हम सेफ रखते हैं थोड़ा सा सिक्योर रखते हैं और वो समय ही ऐसा था कि स्त्रियों की सेफ्टी की जरूरत ज्यादा थी तो इसीलिए जब जो लोग अपने हृदय में वल्नरेबल होते हैं जो कोई आक्रमण होता है इंद्रियों के भोग का इंद्रियों के विषय का तो उस आक्रमण के सामने अपने को रक्षा ठीक से नहीं कर पाते उनका विल पावर कमजोर होता है उन लोगों के लिए भक्ति मार्ग सहज है इसलिए यह वल्नरेबल की स्त्री की उपमा दी गई है जबकि पुरुष स्ट्रांग होता है अर्थात कि ज्ञान में इतनी शक्ति है कि जब बाहर से आक्रमण हो इंद्रिय के विषय का भोग का तो ज्ञान अर्थात कि पुरुष उसका डट कर के मुकाबला कर सकता है तो ठाकुर ने क्या किया कि वो उनकी एक ऑब्जर्वेशन की शक्ति है ना एक एक ग्रास्पिंग पावर है तो उनको यह पता है कि किसके मन में क्योंकि अपने चारों ओर जो हो रहा है उसको आधार करके उसको उपमा देकर के जद वेदांत के कठिन तत्त्वों को समझाया जाए तो लोग बड़ा ही आसानी से समझ लेंगे तो इसके लिए उनकी ऑब्जर्वेशन शक्ति रहती थी वो हमेशा ऐसा ही है कि स्त्री अंदर के कमरे तक जाएगी पुरुष बाहर ही रहेगा क्यों क्योंकि स्त्री वल्नरेबल है उसको रक्षा की जरूरत है जबकि पुरुष तो अपना मुकाबला कर सकता है हालांकि देखिए कि यह तो सब समय अब ठाकुर खुद रास मणी को पहचानते थे और ये एक इंटरेस्टिंग इंसिडेंट जद पता हो आपको कि एक बार क्या हुआ कुछ गोरे सैनिक गोरे खलासी वो तो नेवल पावर है ना ब्रिटेन तो वो सेलर्स जो सोल्जर सेलर्स होते हैं वो लोग बड़ा उनका बदतमीज रहते थे और शराब बरा बहुत धूर्त की तरह पिया करते थे बहुत शराब पीते थे और धूर्त की तरह वर्तन करते थे स्वामी जी ने भी देखा स्वामी जी ने देखा कि स्वामी जी जब वो सेकंड टाइम यूरोप में ट्रेवल कर रहे थे तो जब उन्होंने बड़ा ही वो उद्बोधन में वो एक आर्टिकल लिखा था एक सीरीज ऑफ आर्टिकल लिखे थे उनकी विदेश यात्रा के बारे में उ उसमें उन्होंने बहुत अच्छे से एक चीज ऑब्जर्व की है कि ऐसा बार-बार कहते हैं कि ब्रिटेन जीत गया भारत हार गया इसके लिए क्योंकि ब्रिटिश जो सोल्जर्स है ब्रिटिश खलासी है सेलर्स है उन लोगों में इतनी स्ट्रेंथ है कि जबक युद्ध होता है तो मैंने सही सही मैंने युद्ध की बातें करना तो सबको अच्छा लगता है किंतु सही सही जब ब्लड शेड आरंभ होता है सही सही मार्कट आरंभ होती है तब यह जितने भी इंडियन है अपने देसी जितने भी सेलर सोल्जर्स वो दुम बगा के भाग जाते हैं और ब्रिटिश लोग उ युद्ध में सही सही वीरता दिखा कर के खड़े रहते हैं इसलिए ब्रिटेन की जीत हुई तो स्वामी जी ने भी ये सब वर्णन सुना था तो उन्होंने यात्रा के दरमियान लिखा है कि अपने इंडियन लोग अपने जो भारती है उसके ऊपर में मुझे थोड़ा सा एक प्रकार का गुस्सा था मेरे मन में कि क्यों इन लोगों के भीतर में करेज नहीं है किंतु यह देखा कि जहाज में जा रहे हैं तब जब तूफान आता है तो तूफान अर्थात की मैंने अब तो जहाज डूब ही जाएगा आज की तरह कोई मॉडर्न टेक्नोलॉजी या फिर सैटेलाइट नेविगेशन और यह फोन कर तो हेलीकॉप्टर आक के बचा ले ऐसा तो कुछ नहीं था डूबे तो फिर बस जीवन गया प्राण वहीं पर समाप्त हो गए आपके तो एकदम तूफान आता है तो ये गोरे सेलर्स क्या करते हैं गोरे खलासी शराब पी के मत हो जाते हैं क्योंकि वह मृत्यु का सामना नहीं कर पाते किंतु यह जो अपने भारतीय खलासी है वो सही सही में वो मैंने करके वह जो कुछ दौड़ धाम करके पानी निकालना है मने जो भी वोह वोट को बचाने के लिए करना होता है यह सब अपने इंडियन खलासी करते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि ऐसे इंडियन खलासी को नाविकों को देख कर के मुझे सही में मेरे हृदय में एक आशा का संचार हुआ कि चलो भारत देश की इतनी भी अवनति नहीं हुई कि हम लोगों में से करेज बिल्कुल समाप्त हो गया है तो ये मैंने यह ब्रिटिश खलासी वैसे ही वो दारू पी करके शराब प करके नशा करके वह सब तमाशा करने में वह माहिर ही थे तो कुछ खलासी ऐसे अ शराब पीकर राणी रास मणी के घर में घुस गए और वो तो बड़े ही ताकतवर होते हैं ना हट्ट कट्टे तो होते ही है तलवार बंदूक सब कुछ होता है और फायरिंग शरू कर दिया और सब चीजों को तोड़फोड़ करना शुरू कर दिया अभी रामनी के पास में दरवां चौकीदार वगैरह तो थे ही किंतु यह तो ब्रिटिश सेलर है ना उसको कुछ हुआ तो ब्रिटिश गवर्नमेंट आकर के सब को सीधा उठा कर के जेल में डाल देगी वहां तो फिर वह कोर्ट मार्शल सीधा हो जाएगा माने सिविलियन कोर्ट में मामला भी नहीं जाएगा शायद यदि मिलिट्री पर्सनल पर अटैक किया तो तो किसी का साहस नहीं था कि यह गोरे खलास हों को उनको घर में से धक्के मार के निकाले और अभी सबको यह डर था कि स्त्रियों के साथ में कोई बदतमीजी ना करें घर में आग ना लगा दे क्यासे क्या ना हो जाए उस समय रानी राजमणि ने वो सैनिक के कपड़े पहन ने वो ढाल तरवार ली और ये खलासिया के साथ में फाइट करने के लिए अपने से आ कर के उसने फाइट की और उनको भगाया तो मैंने अभी यह बात ठाकुर को पता होनी ही चाहिए शायद तो देखिए कि हालांकि ठाकुर के मन में भी ऐसा नहीं है कि जब इस तरह की उपमा देते हैं तो उनको पता नहीं है कि स्त्री सब समय वल्नरेबल नहीं होती कभी-कभी ऐसा एक मौका आ जाता है कि स्त्रियों का साहस पुरुषों से भी बढ़ जाता है किंतु क्या है कि ठाकुर को यह सब उपमा देनी होती है तो इस तरह से व उपमा जनरल होती है जैसे कि एक्सेप्शन तो सभी चीजों में होते हैं किंतु जनरल जो ऑब्जर्वेशन होता है उसको आधार करके ठाकुर उपमा देते हैं तो मैंने इस उपमा से कोई ऐसा ना सोच ले कि ठाकुर हमेशा सोचते हैं कि स्त्रियां वल्नरेबल होती है जो स्त्रियों में जो करेज होता है यह बात ठाकुर ने अपनी नजरों से देखी तो नहीं होगी ऑफकोर्स किंतु सुना अवश्य होगा तो अभी कॉस्मस माइक्रो कोसम ज्ञान योग स्वामी जी का कल हमने देखा कि किस तरह से समय और अवकाश के बारे में स्वामी जी का जो आइडियाज है उनके सामने जो दुविधा थी कि 19th सेंचुरी के अनुसार उनको पेशकश भी करनी है वेदांत की कि हां वेदांत इस तरह से बोल रहा है साथ में उनको भविष्य देख कर के भी थोड़ा सा अपने लिए लीवे रखना है थोड़ा सा अपने लिए इस तरह से बोलना है कि भविष्य के साइंस के साथ में भी मैच हो क्योंकि ये 19 सेंचुरी का साइंस इनकंप्लीट है यह स्वामी जी को समझ में आ गया था अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं स्वामी जी क्या कहते हैं इट हैज नादर बर्थ नोर डेथ आत्मन के बारे में ही कहते हैं कि इसका मृत्यु नहीं है ना ही जन्म है बट इट इज पासिंग थ्रू ऑल दिस वेरियस स्टेजेस जन्म मृत्यु जरा व्याधि सृष्टि स्थिति प्रलय इस साइकल से यह आत्मन हमेशा गुजर रहा है हालांकि मने आश्चर्य होगा कि किस तरह से जन्म मृत्यु जरा व्याधि की साइकिल से गुजरेगा यदि उसका सही सही में जन्म और मृत्यु नहीं है तो तो इस पैराडॉक्स का उत्तर यहां पर स्वामी जी देने का प्रयास करते हैं इट इज मेनिफेस्टिंग स्लोली एंड ग्रेजुएट हायर एंड सो ऑन मने एक लोअर फॉर्म से हायर फॉर्म तक अर्थात कि एक सरल शरीर से एक क मने कॉम्प्लेक्शन करता है इट इज एक्सप्रेस इट्स ओन ग्रैंडर वर्किंग थ्रू द माइंड ऑन द बॉडी वह अपनी भव्यता अपना प्रकाश प्रकाशित करने के लिए मेनिफेस्ट करने के लिए प्रयास करता है और मन के द्वारा शरीर के ऊपर में काम करता है इट इज ग्रास्पिंग द एक्सटर्नल वर्ल्ड एंड अंडरस्टैंडिंग इट एंड थ्रू द बॉडी इट इज ग्रास्पिंग द एक्सटर्नल वर्ल्ड एंड अंडरस्टैंडिंग इट मन के द्वारा शरीर के ऊपर में संयम करता है और शरीर के द्वारा यह बाह्य जगत है उसको समझने का प्रयास करता है इट टेक्स अप ए बॉडी एंड यूस इट एंड व्हेन दैट बॉडी हैज फेल्ड एंड इज यूज्ड अप इट टेक्स अनदर बॉडी एंड सो ऑन इट गोज एक शरीर धारण करता है और जब यह शरीर वृद्ध हो जाता है क्षय हो जाता है तब इस शरीर को तजक नया शरीर धारण करता है जैसे कि गीता में कहा गया है कि वासांसी नानी अर्थात कि पुराने कपड़ों को तज करके हम जैसे नए कपड़े पहनते हैं वैसे ही आत्मन यह शरीर रूपी वस्त्र धारण करता है और शरीर रूपी वस्त्र जब जीर्ण शीर्ण हो जाता है उसको तज करके उसका त्याग करके नया वस्त्र रूपी नया शरीर धारण करता है अब अभी देखिए छोटा सा पैसेज है बहुत सारे कांसेप्ट स्वामी जी ने कहे हैं ज्यादातर कांसेप्ट हमने ऑलरेडी डिस्कस कर दिए है कि यह बाह्य जगत है ये बाह्य जगत के बा अच्छा अभी सबसे पहला प्रश्न यह होता है कि आत्मा को बाह्य जगत के साथ में कोई लेना देना है ही क्यों माने यदि हम यह मान ले कि एक ब्रह्मण है और ब्रह्मण में ना ही जन्म मृत्यु एकदम मने वो समय और अवकाश भी जिसमें नहीं है इस ब्रह्मण को समय और अवकाश मैटर एंड एनर्जी आज का मॉडर्न फिजिक्स क्या कहता है कि चार चीजें इस जगत को बनाती है एक है स्पेस एंड टाइम रूपी डायमेंशन और दूसरा है इस स्पेस और टाइम में जो कहते हैं मैटर एंड एनर्जी मैटर अर्थात की पदार्थ और एनर्जी अर्थात की ऊर्जा यह शरीर है पशु पंखी है पेड़ पौधे हैं यह सब पदार्थ के बने हुए हैं और यह ऊर्जा है इलेक्ट्रो मैग्नेटिज्म या तो फिर ग्रेविटी या तो फिर स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स या तो वीक न्यूक्लियर फोर्स चार फोर्सेस है आज ये चार फोर्सेस जज आर कन्वर्टेड इनटू एनर्जी तो यह मैटर और एनर्जी यह दोनों का यह चार डायमेंशन के भीतर में यह स्पेस टाइम मैटर एंड एनर्जी इस जगत को बनाता है अभी यह स्पेस टाइम और मैटर एनर्जी इसके साथ में इंटरेक्शन करने के लिए मन को एक इंटरफेस चाहिए वह इंटरफेस है अंतःकरण मन बुद्धि चित्त और अहंकार इस मन बुद्धि चित्त और अहंकार के माध्यम से यह आत्मन एक शरीर का गठन करता है और इस शरीर के माध्यम से फिर यह वाइडर यूनिवर्स जो है स्पेस टाइम मैटर एनर्जी उसके साथ में इंटरेक्शन करता है तो यदि यह चार्ट कहा जाए कि ऑन वन हैंड इज प्योर आत्मन एंड ऑन अनदर हैंड इज प्योर मटेरियल यूनिवर्स तो इन दोनों के बीच में मिसिंग लिंक या तो फिर कनेक्टिंग लिंक क्या है दो कनेक्टिंग लिंक है एक है अंतःकरण दूसरा है बहीण अंतःकरण अर्थात मन बुद्धि चित्त आंकर बहीण अर्थात की यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय पंचप्राण और यह इसके द्वारा जो बना हुआ जो शरीर है वह शरीर तो यह शरीर और मन के माध्यम से आत्मा इस जगत के साथ में इंटरेक्शन करता है इसको समझने का प्रयास करता है प्रश्न हो सकता है कि आत्मन को इस जगत को समझने की जरूरत क्या है इसके साथ में इंटरेक्शन करने की जरूरत क्या है तो यह बड़ा ही आदि प्रश्न है कि माया आई ही क्यों तो स्वामी जी कहते हैं कि इवन अपने शास्त्र भी कहते हैं कि हिंदू स्वामी जी ने ही अपने शास्त्रों में से कहा है कि यदि किसी हिंदू को पूछा जाए कि माया आई ही क्यों आत्मन ही क्यों नहीं है है क्यों हमको इन सब संसार चक्र में हमको डालते हैं और हमसे यह सब करवाते हैं आप कह सकते हैं कि हां चलो संसार चक्र में हमको डाला है मनुष्य को जिससे कि मनुष्य में साधन भजन करने की प्रेरणा जागृत हो कष्ट नहीं होगा जैसे वो एक गार्डन ऑफ इडन है ना वो जैसे कल्पना की गई है कि जब पृथ्वी पर नहीं आए थे तो हम लोग मनुष्य कहां पे था तो एडम एंड इव इसके रूप में मनुष्य गार्डन ऑफ इडन में बड़े ही मजे से रह रहे फिर वो ईव जो थी अर्थात की स्त्री शी एड द फ्रूट ऑफ नॉलेज ज्ञान रूपी फल खाया तो इसकी वजह से ज्ञान हुआ या तो फिर कहेंगे कि अज्ञान हुआ और इसमें से वे लोग पृथ्वी पर आक गिरे और पृथ्वी पर मनुष्य सभ्यता की शुरुआत हुई किंतु वेदांत की दृष्टि से देखें तो हमको तो सबसे पहले प्रश्न यही करना चाहिए कि ये माया की आवश्यकता ही क्यों है माया का जन्म ही क्यों हुआ है माया आई ही क्यों है हमारा जन्म जदी होगा तब तो कहीं जाकर के हमको मुक्ति की जरूरत पड़ेगी जन्म ही नहीं हुआ है तो यह मुक्ति और बंधन का अननेसेसरी ये जाल में हम क्यों फंसे यह प्रश्न हो सकता है तो स्वामी जी कहते हैं कि जब कोई हिंदू को यह प्रश्न पूछा जाएगा कि माया आई ही क्यों है बाकी का प्रश्न तो बाद में है कि माया से छूटा क्यों जाए पहले तो भाई हमको इस माया जाल में जा डाला ही क्यों जाल में डाले तो फिर तो अभी मुक्त होने का प्रश्न आता है वो ठाकुर कहते हैं ना कि कोई बद्ध जीव कोई मुमुक्षु जीव कोई मुक्त जीव और कोई है नित्य मुक्त जीव बद्ध जीव अर्थात कि वो जो माया जाल में फंसा है तो उसको यह पता ही नहीं है कि वो जो वो ये होता है फिशरमैन फिशरमैन जब जाल डालता है तो ये बद्ध जीव क्या करता है अपना मुंह रेती में छुपा देता है वो जो समुंदर की सतह पे बॉटम के वहां प जो रेती होगी वहां पे वो अपना मुंह वो एक मछली छुपा देगी अर्थात कि वो बद्ध जीव है देखना ही नहीं चाहती ये मछली कि वह जाल में फंसी हुई है दूसरी है कि मुमुक्षु जीव अर्थात कि एक मछली है कि जाल में से निकलने का प्रयास करती है किंतु निकल नहीं पाती और तीसरी मछली है नित्य मुक्त जीव अभी मुक्त जीव क्या है बहुत मेहनत करती है उछल उछल करके जाल में से अपने को बचा लेगी और चौथी चौथा प्रकार है नित्य मुक्त नित्य मुक्त अर्थात कि एक ऐसी मछली उसको पता है कि यहां पर मछुआरा जाल डालता है उस एरिया में जाना ही नहीं है खुले समुंदर में घूमते रहो आनंद से आनंद सागर में हम कभी भी माया जाल में नहीं फसें वो जैसे ही किनारे पर गए मछुआरा जाल डालेगा अपने को फसा लेगा तो यह चौथे प्रकार के जीव को नित्य मुक्त जीव कहते हैं तो अभी हम लोग भी नित्य मुक्त क्यों नहीं है या तो फिर यह मछुआरा जाल डालता ही क्यों है लोगों को बंधन में डालता ही क्यों है यह प्रश्न आ सकता है तो इस प्रश्न का स्वामी जी कहते हैं कि हिंदू कहता है कि इसका कोई उत्तर अभी हमा हमारे पास में नहीं है ईश्वर की जो इच्छा ऐसा बोल कर के जाहा कोरेन रघुवीर ऐसा बोल कर के हम इस बात को छोड़ देते हैं सही सही इसके ऊपर में जद आर्गुमेंट करने को जाएंगे तो हेयर स्प्लिटिंग आर्गुमेंट होगी हम सर्कल में घूमते रहेंगे तो इसलिए इस फर्स्ट क्वेश्चन को स्किप करके सेकंड क्वेश्चन पे जब माया के बारे में बात होती है तो फर्स्ट क्वेश्चन ऐसा होना चाहिए कि माया आई ही क्यों हम लोग नित्य मुक्त सभी लोग क्यों नहीं है यदि ईश्वर यदि ऐसी चार कैटेगरी बनाते हैं तो सभी लोग नित्य मुक्त क्यों नहीं है यह सुखदेव को जैसे ही थोड़ा बहुत हश हुआ थोड़ा उनकी उम्र बढ़ी सीधा अपने घर से निकल गए तो पीछे उनके पिताजी व्यास देव दौड़ कर के बोल रहे हैं कि अरे बेटा तुम घर में वापस आओ संसार करो वगैरह किंतु सुखदेव तो नित्य मुक्त है संसार में कभी लिप्त होने ही नहीं वाले हैं तो ऐसा क्यों नहीं कि सभी लोग नित्य मुक्त हो क्यों माया की रचना हुई तो इसका कोई उत्तर नहीं है अभी सेकंड क्वेश्चन पे आओ कि माया में फंस गए हैं तो उससे बचने का उपाय क्या है वो बताएंगे किंतु पहला क्वेश्चन स्किप कर दो तो ऐसा अपने हिंदुइज्म में है स्वामी जी ने खुद ने ऐसा कहा है तो अभी मान लीजिए कि माया की रचना हुई तो माया को समझना है माने माया से मुक्त होने से पहले माया का स्ट्रक्चर क्या है माया और आत्मन का यह एनाटोमी फिजियोलॉजी यह सब क्या है यह किस तरह से कार्य करता है फंक्शनालिस क्या है जैसे कोई इंजीनियर होगा उसके हाथ में कोई भी यंत्र दिया जाएगा तो वैसे ही वो उसको मैंने उसको खोल कर के जैसे घड़ी दी गई तो घड़ी में से जितने भी स्क्रू वगैरह है खोल कर के उसके भीतर में ये जो कांटा है यह स्प्रिंग है ये कोइल है ये जो वो कैसे काम करता है वो समझने का प्रयास करेगा तो वैसे ही क्योंकि जद आपको यह समझ में आए कि घड़ी कैसे काम करती है तब तो आप घड़ी में वो एल आरम रख सकते हैं घड़ी का इस्तेमाल कर सकते हैं तो वैसे ही ये एक मशीन है पूरा एक जगत यह मशीन किस तरह से काम करता है पहले यह समझो और फिर यह मशीन से छुटकारा कैसे पाया जाए इसके मुक्त कैसे हुआ जाए यह समझते हैं तो जब मशीन को समझने की बात आती है तो दो मेजर कंपोनेंट है एक है आत्मन और एक है माया या तो फिर कहेंगे कि एक है आत्मन और दूसरा है यह भौतिक जगत माया इस भौतिक जगत के रूप में अभी वो कन्वर्ट हो गई है तो अब यह भौतिक जगत के साथ में आत्मन किस तरह से इंटरेक्शन करता है आत्मन अपने से तो निर्लिप्त है अचल अटल सुमेरु वत है उसमें तो समय और अवकाश है भी नहीं तो किस तरह से समय और अवकाश में स्थित ये मैटर और एनर्जी के साथ में इंटरेक्ट करेगा तो दो लिंक है दो लिंक के द्वारा वन आफ्टर अनदर एक तो है अपना सूक्ष्म शरीर सर्वप्रथम यह आत्मन के ऊपर में आता है फिर यह सूक्ष्म शरीर एक स्थूल शरीर का गठन करता है फिर इस स्थूल शरीर से यह पूरा विश्व ब्रह्मांड है उसको समझा जा सकता है उसके साथ में इंटरेक्शन किया जा सकता है और फिर इसी स्थूल शरीर में साधना करके रिवर्स में जाया जा सकता है कि पहले तो यह विश्व ब्रह्मांड को तजो उसके बाद में स्थूल शरीर की वासना अब ऐसा नहीं है कि विश्व ब्रह्मांड को छोड़ सकते हैं य वे आप अन्न भी ग्रहण करते हैं सांस भी लेते हैं जिएंगे भी जो कुछ भी करेंगे एवरीथिंग इज विद इन दिस स्पेस टाइम और मैटर एनर्जी इसके बाहर में तो कुछ है ही आप कुछ कर ही नहीं सकते तो इसका त्याग अर्थात कि ये हमारा जो एक्चुअल कनेक्शन जो है इस वर्ल्ड इस पदार्थ के साथ में यह भौतिक जगत के साथ में वो है हमारी इंद्रियों की वासना यह कामना इसका त्याग करना है माने त्याग करना अर्थात कि आप बोलेंगे कि चलो मैं घर छोड़ के जंगल में चला जाऊंगा तो घर भी तो वही स्पेस टाइम मैटर एनर्जी का बना हुआ है जिस मैटर और एनर्जी स्पेस और टाइम का जंगल बना हुआ है तो आपने घर छोड़ के जंगल में गए इस बात का तो कोई अर्थ नहीं है घर और जंगल बोलो ना किय नदी और पहाड़ बोलो ना कि आप आश्रम में रह रहे हो ना कि आप संसार में रह रहे हो ना कि आप गृहस्थ हो ना कि सन्यासी हो जगत के साथ में अपना जो रिलेशन है वह यह भौतिक वासनाओं का रिलेशन है भौतिक इंद्रियों के पदार्थ का रिलेशन है तो अभी आप इस चार्ट को इमेजिन कीजिए एक और है आत्मन आत्मन के ऊपर में बनता है गठित होता है सूक्ष्म शरीर मन बुद्धि चित्त और अहंकार इसके ऊपर में आता है स्थूल शरीर और यह स्थूल शरीर और इसके बाद में जो यह भौतिक जगत है इन दोनों के बीच में और एक मिसिंग लिंक है अपनी वासना एं कामनाएं अवर एंबिशन डिजायर होप एंड एस्पिरेशंस ये अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश पंच क्लेश जिसको कहे जाएंगे यह है हमारा ये शरीर का इस भौतिक जगत के साथ में और एक बंधन अर्थात कि अल्टीमेटली देखें तो आत्मन सूक्ष्म एक सर्वप्रथम हो गया आत्मन दूसरा आ गया सूक्ष्म शरीर तीसरा आ गया भौतिक शरीर अर्थात कि देह चौथा आ गया कि हमारी कामनाए और वासना और पांचवा हो गया यह भौतिक ब्रह्मांड स्पेस टाइम मैटर एंड एनर्जी इस पांच एलिमेंट्स से ये जो कुछ भी कहो जगत प्रपंच ये बना हुआ है एक सर्वप्रिया अंद जी एक बड़ी ही सुंदर कहानी कहा करते थे कि उत्तराखंड में कुछ साधु लोग रह रहे थे तो एक दि एक दिन एक कैसा हुआ एक सेठ ने जाकर के उनको वो मध दे दिया बोतल में तो अभी क्या है कि मध तो मत तो अच्छा है ठंडी के दिनों में वो अपने को बल प्रदान करता है तो अी ये साधु लोग सोए हुए हैं सुबह को उठकर देखा कि मध का बोतल पूरा खत्म हो गया है तो अभी ये लोग तो बड़े नाराज हो गए अरे एक ही रात में पूरा मध का बोतल किसने खा लिया एक्चुअली मध खाने का तरीका क्या है कि एक चम्मच दूध के साथ में या दवाई के साथ में इस तरह से खाया जाता है और एक बोतल यदि छोटा सा आप लेते हैं 100 ग्राम 150 ग्राम का तो आराम से एक महीना के आसपास चल जाएगा अभी तो ये बड़ा बोतल एक ही रात में खत्म हो गया सब साधु लोग नाराज हो गए ये कौन खा गया कौन खा गया कौन चोरी कर गया तो आखिर में एक साधु नींद में से उठा वो बोलता है कि महाराज जी मैंने पूरा प्रपंच खत्म कर दिया एकही रात में प्रपंच अर्थात कि ये पूरा जो जगत है और जगत का जो कुछ भी है लेना देना हमारे साथ में इसको वेदांत में कहते हैं प्रपंच तो पूरे प्रपंच को एक ही रात में खत्म कर दिया यह प्रपंच होता मध की बोतल तो हमारे मन में ये उड़ता कि अरे मध की बोतल है कल सुबह को उठ कर के मध खाएंगे तो ऐसा लालच रहता है ना ये पूरा प्रपंच में नहीं एक रात में खत्म कर दिया यानी कि दिखाता है ऐसा कि मैंने आपके ऊपर में बड़ा उपकार किया है खुद ने भोग कर लिया और ये लॉजिक दिखाता है तो ये ये पूरा प्रपंच है य प्रपंच में पांच इंग्रेडिएंट्स है जद ये मत के बारे में कहा जाए तो ये पांच इंग्रेडिएंट्स से यह प्रपंच रूपी मध बनता है आत्मन सूक्ष्म आत्मन एक सूक्ष्म शरीर दो स्थूल शरीर तीन स्थूल शरीर की इस जगत के प्रति कामनाएं और वासना है या तो फिर कहेंगे पंच क्लेश और पांचवा है यह भौतिक जगत स्पेस टाइम मैटर और एनर्जी का बना हुआ तो स्वामी जी पूरा एक एनाटोमी यह पूरा इंजीनियरिंग किस तरह से काम करता है वह तो एक छोटे से पैराग्राफ में बताते हैं थोड़ा सा आगे जाते हैं तो स्वामी जी क्या अच्छा एक फिर एक दूसरा एक पॉइंट है इट टेक्स अप ए बॉडी एंड यूस इट एंड व्हेन दैट बॉडी हैज फेल्ड एंड इज यूज्ड अप इट टेक्स अनदर बॉडी एंड सो ऑन इट गोज देखिए यहां पे नित्य क्या क्या है और अनित्य क्या है ये आत्म नित्य है और यह भौतिक जगत यह भी नित्य है अभी आपको लगेगा कि भौतिक जगत नित्य कैसे हो सकता है अनित्य क्या है तो यह हमारा ये सूक्ष्म शरीर अर्थात की ये अंतःकरण और बही करण यह भी अर्थात कि हमारा देह यह भी अनित्य है हमारा सूक्ष्म शरीर वो भी अनित्य है और इस जगत के साथ में अपना यह जो प्रपंच है वो भी अनित्य है ये तीन चीजें अनित्य है किंतु यह जगत और ये आत्मन यह दोनों नित्य है स्वामी जी जो हमको एग्जांपल देते हैं रेल की दो पटरी की तरह वह समांतर हमेशा चलता जाएगा अनंत काल तक कभी एक दूसरे के साथ में मिलेगा भी नहीं और कभी एक दूसरे से विख भी नहीं होगा यानी यह है आत्मन और माया का संबंध ये आत्मन जैसे अनंत है या तो फिर कहेंगे कि यह हमेशा के लिए है तो वैसे माया भी हमेशा के लिए माया के भीतर में सृष्टि स्थिति प्रलय होती रहेगी किंतु यह माया इट सेल्फ विल ऑलवेज रिमन देयर आज प्रलय के रूप में या तो फिर बीज स्वरूप में है कल कहीं सृष्टि के रूप में अर्थात कि अपने इवोल्व स्वरूप में अपने स्थूल रूप में है तो सूक्ष्म रूप में रहेगी या कि स्थूल रूप में रहेगी बीज रूप में रहेगी कि विश्व ब्रह्मांड के रूप में रहेगी माया तो रहेगी ही रहेगी माया कहीं जाने वाली नहीं है जैसे यह कॉस्मिक मन या तो कॉस्मिक ब्रह्मण इज इटरनल और रदर वी मे से अबाउ एनी से बर्थ एंड डेथ तो माया भी वैसे ही माया के भीतर में यह बर्थ एंड डेथ चलता रहेगा माया हमेशा रहेगी वो कभी विकसित रूप में कभी बीच के रूप में तो यह फंडामेंटल कांसेप्ट है विदन दिस फंडामेंटल टू थिंग्स एक आत्मन और माया इसके भीतर में यह एक अनित्य अंतः कर प्रकट होता है यह अनित्य अंतःकरण और भी एक उससे भी ज्यादा अनित्य एक देह को धारण करता है और यह देह उससे भी ज्यादा अनित्य कामना वासना प्रपंच को धारण करता है अंतःकरण की जो लोजे विटी है अंतःकरण की जद कहेंगे सेल्फ लाइफ आज की लैंग्वेज में कहेंगे कि अंतःकरण ज्यादा टिकता है लंबा टिकता है व अंतःकरण बहुत सारे शरीर को धारण करता है और जब तक उसकी मु नहीं हो जाती कामना वासनाओं से निर्मूल नहीं हो जाता तब तक अंतःकरण बना रहता है तो यह अंतःकरण की लॉन्जे विटी या तो सेल्फ लाइफ यह बहुत लंबी है किंतु देह एक लाइफ टाइम तक सीमित है और हमारा आज का जो एक एवरेज लाइफ स्पान है 70 इयर्स में कि ऐसा कोई एक एवरेज लाइफ स्पान है हम भारतीयों का तो हम यह ऑलमोस्ट 70 इयर्स तक या 72 इयर्स तक यह देह जनरली रहेगा तो और यह कामना वासना है वो और भी अनित्य है क्योंकि आज मैं मान लो कि अपने मन पर संयम करके बोलता हूं कि मैं मिठाई नहीं खाऊंगा और फिर एक सप्ताह तक तो मैंने यह संयम किया और य यह प्रपंच से बचने का प्रयास किया वो जो साधु होगा उसने जब जैसे ही शेठ जी ने वो मध दिया होगा तभी से उसके मन में हो गया होगा कि मैं अकेला खा लेता हूं क्यों मैं सबके साथ में शेयर करूं तो फिर वो उसके मन में विवेक भी होगा वोह सोचता होगा अरे ऐसा करना तो ठीक नहीं है सबके साथ में रहते हैं तो थोड़ा सा तो सबके साथ में किया जाए तो थोड़ा सा वो उसने वासना पर कंट्रोल किया फिर जैसे जैसे राज जाति होगी फिर से वो अरे नहीं नहीं ये लोग तो सब क्या है वो य रयान जी महाराज एक सरस बढ़िया कहानी कहते थे एक शेठ जी के पास में एक साधु आया तो वैसे वो दक्षिणा मांगने के लिए ये सब उत्तराखंड की कहानियां तो शेठ जी ने पूछा कि अच्छा वो तो दक्षिणा तो दे दी फिर और किसी साधु के बारे में ऐसे जनरली पूछा अच्छा महात्मा जी आप तो दूसरे महात्मा जी के साथ में रहते हैं वो कैसे हैं कैसा स्वभाव है उनका तपस्या वगैरह कैसा है तो ये पहले वाले महात्मा ने बोल दिया अरे वो तो गैया है अच्छा तो द शेट तो बेचारा थोड़ा ये हो गया क्या एक साधु का दूसरे साधु के बारे में ऐसा नीच ओपिनियन मने इतना खराब ओपिनियन ये तो ठीक नहीं फिर दूसरे महात्मा जी आए तो अभी वो सेठ जी को पता चला गया कि इन दोनों के बीच में कुछ तो है तो इसने दूसरे महात्मा जी से पूछा अच्छा महात्मा जी ये पहले वाले जो महात्मा है वो कैसे है तो ये दूसरे वाले महात्मा ने और भी ऊपर जाके अरे वो तो भैसा है तो अभी शेठ जी तो और भी परेशान अच्छा ठीक है एक बार साधु भंडारा का आयोजन किया ये दोनों महात्मा को बुलाया वो दोनों को साथ-साथ में बिठा करके दोनों के प्लेट में पुवाल रख दिया वो खड़ होता है वो जो खेत में से जो काटते हैं जो गाय और भैस खाती है तो ये दोनों महात्मा जी बड़े ही नाराज हो गए अरे ये ये क्या हमको खाने को दे दिया बाकी सबको मिठाई पकवान देते हो और हमको ये खड़ पुवाल देतो क्या बात है भाई तो शेठ जी ने कहा कि अरे ये गैया है ये एक भैंसा है तो फिर तो आप तो यही खाएंगे ना आपको थोड़ी ना मिठाई पकवान खाएंगे या वो दोनों के मन में सडन हुआ अरे तो हम ऐसा दूसरों के बारे में कह रहे हैं तो माने क्या है कि विवेक कभी-कभी जागृत हो जाता है और कभी-कभी यह विवेक सो भी जाता है तो ये जिस साधु ने मध बारे में सोचता होगा कभी-कभी ये विवेक जा जैसे जैसे रात जाती होगी वो कभी विवेक जागृत हो जाता होगा कि चलो मैं सबके साथ में मद शेयर करूं फिर कभी-कभी सोचता गया अरे क्या जरूरत है मैं ही अकेला खा लेता हूं तो आखिर में ऐसा हुआ कि बेचारे का विवेक सो गया और उसने पूरा मत खा लिया तो ये विवेक जो है यानी कि जगत के साथ में अपना ये जो ये प्रपंच है वो आता जाता रहता है माने और भी क्षणिक है तो क्षणिक की ये जो यदि स्केल बनाया जाए तो सबसे ज्यादा क्षणिक माने सबसे क्षणिक क्या है तो ये जगत प्रपंच ये जगत के साथ में अपनी वासना एं कामनाएं वगैरह कोई भी उसके ऊपर संयम कर सकता है कुछ क्षण तक तो कोई संयम कर ही सकता है जीवन भर के लिए शायद हो ना हो इससे ज्यादा क्षणिक अर्थात कि जिसका आयु ज्यादा है वह है देह देह ऑलमोस्ट यदि आप ठीक से मेंटेन करेंगे 70 इयर्स एवरेज अपना इंडियन लाइफ स्पान है उतना तो जिएंगे ही जिएंगे और इससे भी ज्यादा जिसकी लॉन्जे विटी है जिसका आयु ज्यादा है वह है अंतःकरण क्योंकि अंतःकरण कोटि कोटि जन्म लेता है देह के एक के बाद एक देह लेता है धारण करता है और उसकी तब तक मुक्ति नहीं है ठाकुर कहते हैं हम्मा हम्मा जब तक कहता रहेगा तब तक मुक्ति नहीं है तूह तह जब स्टार्ट होगा तब मुक्ति होगी तो अंतःकरण को तो और भी लंबी जर्नी काटनी है किंतु यह तीनों ये प्रपंच यह देह और यह अंतःकरण तीनों को देखें कि तीनों क्षण भर के लिए है क्षणिक है उनकी क्षणिक की मात्रा कम ज्यादा होती रहेगी किंतु है तो क्षणिक ही तो यह तीन क्षणिक है या तो फिर यह अल्पायु है और यह दो जो है यह आत्मन और यह जगत यह हमेशा के लिए नित्य है विदन दिस नित्य आत्मन और जगत यह पूरा प्रपंच चलता रहता है तो स्वामी जी इसलिए ऐसा कह कि देह या तो फिर अंतःकरण एक के बाद एक देह धारण करके उसको जिस तरह से इस्तेमाल करना है करता है क्षय हो जाने के बाद में नया देह धारण करता है इसके बाद में पूरा पुनर्जन्म वाला चैप्टर पुनर्जन्म वाला टॉपिक स्टार्ट होता है इसके बारे में हम कल से डिस्कस स्टार्ट करेंगे आज ओम शा शांति शाति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु