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Swami Vivekananda Raja Yoga ·

राजयोग : Ch.3 प्राण : स्‍वामी विवेकानन्द 22 Nov 2024 | Raja Yoga | Swami Vivekananda

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः आज हम लोग राजयोग में राजयोग का बेसिक एक्चुअली उद्देश्य है कि किस तरह से अपने मन को ट्रेन किया जाए कि जिससे कि हम एकाग्रता सीख पाए और एकाग्रता सीखने के लिए क्या-क्या करना है वह सब स्टेप्स हमको राजयोग में हमको बताए जाते हैं अभी देखिए कि यह जो चैप्टर मैंने सिलेक्ट किया है राजयोग का थर्ड चैप्टर जिसका नाम है प्राण इसको मैंने सिलेक्ट इसलिए किया था इनिशियल स्टडी के लिए प्रारंभ करने के लिए क्योंकि इसमें एक बिल्कुल नए कांसेप्ट प्राण के बारे में स्वामी जी हमको बचा बताते हैं और स्वामी जी हमको कहते हैं कि राज्यों का जो उद्देश्य है वह इस प्राण का नियमन करना है प्राण को यदि हम नियमन कर पाएंगे प्राण को यदि हम कंट्रोल कर पाएंगे तो प्राण के द्वारा पूरा जगत कंट्रोल होता है एक्चुअली तो पूरे जगत को हम कंट्रोल कर पाएंगे इसके साथ में अभी हमको लगेगा कि बाहर में जो चीजें हैं अभी जैसे स्वामी जी कहते हैं वी कैन कंट्रोल इवन स्टार्स एंड गैलेक्सी एंड मैन एंड पीपल एंड एवरीथिंग तो प्रश्न होगा कि आध्यात्मिक मार्ग का जो पथिक है जो योगी है उसको चांद सितारे को ना कि यह पदार्थ को ना कि किसी चीज को कंट्रोल करने से क्या लाभ है एक्चुअली लाभ यही है कि प्राण के द्वारा हम अपने मन को भी कंट्रोल कर सकते हैं प्राणायाम के द्वारा अपने शरीर को भी हेल्दी रख सकते हैं जिस तरह से कहा गया है शरीरं आद्यम खलु धर्म साधन अर्थात कि धर्म का साधन उसके लिए एक श्रेष्ठ साध धर्म के यात्रा करने के लिए धर्म में आगे बढ़ने के लिए धर्म में स्थापित होने के लिए शरीर एक उच्च कोट एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट साधन है यदि शरीर बिगड़ेगा शरीर में रोग प्रवेश करेंगे तो हम आध्यात्मिक ज्यादा प्रगति नहीं कर पाएंगे तो यह तो एक उसका यह हो गया अभी इसके बाद में हम लोग यह तो प्राण का जो चैप्टर है वह ऑलमोस्ट समाप्त होने को आया है अभी एक ओ कल्ट बोलकर के एक टॉपिक रह जाता है जिसको कि हम नेक्स्ट नेक्स्ट टाइम देखेंगे इस बार में और थोड़ा सा ध्यान के रिलेटेड जो कुछ बेसिक थिरी है उसकी थोड़ा सा उसका थोड़ा सा डिस्कशन करना चाहता हूं बेसिकली व्हाट इज मेडिटेशन जब हम यह कहते हैं जहां आजकल जितने भी मोटिवेशनल स्पीकर्स को सुनेंगे या पढ़ेंगे तो वे लोग कहेंगे आपको कि आपको ध्यान करना चाहिए ध्यान करने से मन शांत होता है आपका स्वास्थ्य उत्कृष्ट होता है तो प्रश्न होता है कि ध्यान ऐसा क्या है कि जिसको करने से लाभ होता है और उसके बाद में यह भी प्रश्न होता है कि जो फंडामेंटल थिरी क्या है ध्यान करने के लिए जिसको कि आजकल हम कॉन्शियस नेस स्टडीज के रूप में पहचानते हैं एक डेविड चार्मर बोल कर के एक है जो कि सर्वप्रिया नंद जी उसके साथ में डायलॉग हुआ था सर्वप्रिया अंद जी का और उनके काफी कुछ डिस्कशंस भी के लिए यह थोड़ा सा मैं अपनी दृष्टि से आज थोड़ा सा डिस्कस करता हूं सर्वप्रथम तो देखिए कि मनुष्य देह है या मनुष्य जीवन है उसको आप दो एस्पेक्ट में बांध सकते डिवाइड कर सकते हैं ग्रुप ग्रुपिंग कर सकते हैं एक तो है कि फिजिकल वर्ल्ड और यह हमारा भौतिक देह इस देह के माध्यम से इन कर्मेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय अर्थात कि हमारी वो इंद्रियां जिनके माध्यम से हम इस भौतिक जगत के साथ में इंटरेक्शन करते हैं जैसे कि यह एक पेन है मेरे पास में उसको उठा कर के मुझे कुछ लिखना है तो मैं अपने हाथ का इस्तेमाल करूंगा यह मेरी कर्मेंद्रिय हो गई हाथ और यदि मुझे कुछ देखना है या यदि मुझे कुछ श्रवण करना है सुनना है तो देखने के लिए आंख है सुनने के लिए कान है तो यह मेरी ज्ञानेंद्रिय हो गई ज्ञानेंद्रिय मुझे इंफॉर्मेशन देती है इस जगत के बारे में और कर्मेंद्रिय के माध्यम से मैं जगत के साथ में इंटरेक्शन करता हूं तो ज्ञानेंद्रिय इस हमको इंफॉर्मेशन देगा हम उसको प्रोसेस करेंगे फिर प्रोसेस करके कर्मेंद्रिय के माध्यम से हम इंटरेक्शन करेंगे अभी यह जो प्रोसेस होता है अपने मन में तो कहा गया है कि मन भी एक इंद्रिय ही है मन क्या करता है मन यह जो सब अ दृश्य श्राव्य विषय है दृश्य श्राव्य विषय अर्थात कि ऑडियो विजुअल ऑब्जेक्ट्स जैसे कि मैं अपने हाथ से पेन को ग्रहण करता हूं अपने हाथ से मैं मान लीजिए कि कंप्यूटर पर टाइपिंग करता हूं या अपने हाथों से मैं खाना बनाता हूं तो मैंने अपने हाथों से जो कार्य कर रहा हूं एक दूसरे ऑब्जेक्ट के साथ में यदि खाना बनाना है तो जैसे कि एक निमक का नमक का का डिब्बा है उसमें से मैं नमक इस पात्र में डालूंगा जिसमें कि खाना पक रहा है यदि मेरे सामने सब्जी है तो चाकू से मैं सब्जी को काटू तो मेरा जो देह है इस चाकू रूपी एक जो ऑब्जेक्ट है उसके साथ में इंटरेक्शन कर रहा है तो मेरा देह क्या हो गया मेरे हाथ क्या हो गए वह हो गए सब्जेक्ट और यह चाकू है या तरकारी है वह हो गया ऑब्जेक्ट जैसे कि मैं पेन के साथ में लिख रहा हूं तो मेरा हाथ है सब्जेक्ट और यह पेन है ऑब्जेक्ट यदि मान लीजिए कि मैं अपने मित्र के साथ में कोई कोई भी एक कार्य कर रहा हूं जैसे कि हम लोग ऑफिस में बैठ कर के सब एक साथ में काम करते हैं तो जो भी कार्य है इवन यदि वो इंटेलेक्चुअल वर्क भी है जैसे देखिए कि ये तरकारी काटना या पेन के माध्यम से लिखना वोह बड़े ही भौतिक साधनों के साथ में भौतिक ऑब्जेक्ट्स के साथ में हम कार्य करते किंतु ये जो आइडियाज है इवन जैसे कि मुझे एक किताब लिखनी है मैं अपने मित्र के साथ में कुछ आइडियाज को डिस्कस कर रहा हूं कि हां मैं यदि किताब में इस तरह से लिखूंगा तो वह उसके बारे में लोगों का क्या मानना रहेगा क्या मैं अपने आइडियाज को क्लियर कन्वे करवा पा रहा हूं कि नहीं तो वह जो डिस्कशन होता है वह भी मेरे लिए ऑब्जेक्ट है और मैं सब्जेक्ट के रूप में उस ऑब्जेक्ट के साथ में डिस्कशन करता हूं तो यह जो भौतिक जगत है पूरा भौतिक जगत को हम दो डिवीजन में बांट दे सकते हैं एक तो है ऑब्जेक्ट दूसरा है सब्जेक्ट सब्जेक्ट क्या है मेरा देह मैं यह जो पांच कर्मेंद्रिय और पांच ज्ञानेंद्रिय इस पांच 10 इंद्रियों के माध्यम से मैं जगत के साथ में इंटरेक्शन करता हूं तो यह हो गया मेरा सब्जेक्ट पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय और ऑब्जेक्ट के रूप में ही यह पूरा जगत जदी मैं गार्डनिंग करता हूं राजकोट में मैं पब्लिकेशन में काम करता था तो बैठे-बैठे कभी-कभी मुझे तो पूरा दिन भर बैठा रहना पड़ेगा एडिटिंग करना है ट्रांसलेट करना है लिखना है तो मैंने वहां पे अपना जो टेरेस था फर्स्ट फ्लोर पे पब्लिकेशन था तो टेरेस में मैंने एक टेरेस गार्डन डेवलप किया था इस टेरेस गार्डन में मैं जाकर के बीच बीच में पौधों को पानी देता था तो यह पौधों को पानी देना है ये कुछ भी है ये जो कुछ भी मैं करना है मुझे पब्लिकेशन में मुझे ट्रांसलेट करना है जो कोई भी कर्म करना है जो कोई भी क्रिया करनी है किसी भी ऑब्जेक्ट को मुझे मैनिपुलेट करना है अर्थात कि किसी भी ऑब्जेक्ट के साथ में मुझे कार्य करना है तो वह सब कार्य मैं अपनी ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय के माध्यम से करूंगा इस पूरे जगत को मैं मैं और अन्य मैं और और कुछ ऐसा करके सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट में मैं डिवाइड कर दूंगा तो यह हो गया भौतिक जगत में किंतु यह जो भौतिक जगत है उसी का रिफ्लेक्शन अपनी कॉन्शियस निस में है अभी यह जितने भी विचार हम करते हैं जितनी भी हमारी इमोशंस है जितने भी हमारे सेंटीमेंट्स है जितने भी हमारे आइडियाज है जितने भी अपना क्रिएटिव एक्टिविटी है मान लीजिए कि मैं इस क्लास के लिए सुबह को कुछ किताब पढ़ कर के उसमें से सोच रहा हूं कि यदि मुझे इस टॉपिक के ऊपर में बोलना है तो मुझे कौन-कौन से पॉइंट मुझे प्रिपेयर करने होंगे जिसके माध्यम से मैं अपनी बात को क्लियर कन्वे कर पाऊं वह एक किताब खोल कर के मैं उसमें से देख रहा हूं कि क्या यह पॉइंट ठीक रहेगा मेरा जो बेसिक सब्जेक्ट है उसको कन्वे करने के लिए कि नहीं रहेगा यह जो मेंटल पूरा जो एक्टिविटी होता है यह मेंटल एक्टिविटी भी यह भौतिक जगत का ही रिफ्लेक्शन है अपनी कॉन्शियस निस के भीतर में आप सोचेंगे कि भौतिक जगत में हम सभी चीजों को सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट में डिवाइड कर सकते हैं माइंड में कैसे करेंगे माइंड में विचार भी तो मेरे ही तो है यह तो ऐसा हो गया कि मैं कहूंगा कि यह हाथ सब्जेक्ट है यह हाथ ऑब्जेक्ट है ऐसा हो ही नहीं सकता दोनों हाथ सब्जेक्ट है ऑब्जेक्ट को तो यह पेन है जो कि मेरे से भिन्न है जो मेरे से अलग है यह तो ऑब्जेक्ट है मेरे दो हाथ सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट कैसे हो सकते हैं क्या अब जैसे कि बड़ा ही एक छोटा सा उदाहरण सुंदर उदाहरण कि स्वामी जी जब अमेरिका में क्लासेस लेते थे आत्मन और ब्रह्मण के बारे में तो बीच-बीच में कहा करते थे सर्व खव मदम ब्रह्मण यह जो जगत में जो कुछ देख रहे हो सब कुछ ब्रह्मण है तो फिर वहां पर स्वामी जी का एक फॉलोवर था एक डिसाइल था एक वृद्ध एक व्यक्ति एक पुरुष जो कि मतलब बड़ा था वो उसका नाम में भूल गया तो बड़ा उसका नेचर था बड़ा फनी था बीच-बीच में जोक लगाया करता था तो जैसे ही स्वामी जी का लेक्चर खत्म होता है वो जोर से बोल उठेगा तो अच्छा स्वामी जी यू आर सेइंग दैट एवरीथिंग इज ब्रह्मण राइट सो व्हाट इज अ डिफरेंस बिटवीन दिस कैबेज एंड माइसेल्फ एक जो जद सब कुछ ब्रह्मण है तो ये जो ये ये कोबी है फुल कोबी कैबेज अर्थात की फुल कोबी ना कोबी जो भी है तो कोबी है और यह जो मेरा मैं हूं इन दोनों में फर्क क्या है यदि सब कुछ ब्रह्मण है तो अभी देखिए स्वामी जी थियोरेटिकली यदि देखेंगे सब कुछ ब्रह्मण है किंतु प्रैक्टिकली देयर इज अ डिफरेंस यह बात तो हमको कन्वे करनी पड़ेगी अदर वाइज वी विल बी मिस लीडिंग पीपल तो स्वामी जी ने इमीडिएट उत्तर दिया स्टिक ए नाइफ इन योर लेग एंड यू विल फाइंड आउट व्हाट इज द डिफरेंस अपने पैर में एक चाकू मारो अभी पता चल जाएगा कि ये कैबेज में और अपने में क्या डिफरेंस है यह कैबेज को हम चाकू से काटते हैं तो हमको कोई फील नहीं होता जबकि आप अपने पैर को चाकू से काटेंगे इमीडिएट आपको फील होगा कि हां अरे पेन हो रहा है दर्द हो रहा है सो दैट प्रैक्टिकल डिफरेंस इज देयर तो सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट में जगत बटा हुआ है इवन दो सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों ही ब्रह्मण के बही प्रकाश मात्र है यह डिवीजन प्रैक्टिकल डिवीजन हमको स्वीकार करना होगा तो यह तो हम लोग समझ लिए कि ये दो हाथ है मेरे सब्जेक्ट है यदि मैं इस हाथ में चाकू मारूं तो भी मुझे उतना ही दर्द होगा और इस हाथ में मैं यदि चाकू से वार करता हूं तो फिर मुझे इतना ही दर्द होगा इन दोनों हाथों में मैं डिफरेंशिएबल पर से गिर गई तो फिर मुझ हां यदि महंगी वाली पेन से मैं काम कर रहा हूं तो दुख होगा कि अरे इतनी महंगी पेन है टूट गई या डैमेज हो गई किंतु मुझे एक्चुअल पेन नहीं होने वाला है ऑन दी अदर हैंड यदि मैं अपना सर कहीं पर टकरा दूं तो इतना पेन होगा कि पता नहीं पूछो मत तो वो एक्चुअल पेन जिसके साथ में होता है वह हो गया सब्जेक्ट अर्थात कि मैं और दूसरी चीजें हैं जिसको हानि होने से मुझे एक्चुअल पेन नहीं होता दुख होगा कभी खुशी भी होती है किंतु दैट इज नॉट ए सब्जेक्ट दैट इज अ सेपरेट व्हिच इज ऑब्जेक्ट तो यह भौतिक जगत में तो यह बड़ा क्लियर है हाउ डज दैट रिफ्लेक्ट इन टू कॉन्शियस कॉन्शसनेस में भी यह सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट है और जब हम यह कहेंगे नेचुरली प्रश्न होगा कि अपने मन के भीतर में जो विभिन्न क्रियाएं हैं उनको आप डिफरेंशिएबल में डिफरेंशिएबल हो कि सब्जेक्ट क्या है ऑब्जेक्ट क्या है चाकू मार कर के देख लीजिए यदि मैं चाकू इस टेबल पर मारूंगा तो हो सकता है टेबल में थोड़ा सा स्क्रैच चीज हो हो सकता है टेबल यदि स्ट्रांग है तो चाकू ही टूट जाए किंतु यह चाकू में अपने पैर पर या तो अपने सिर पर मारने का साहस नहीं करूंगा क्योंकि मुझे इंस्टिंक्टिवली पता है कि उससे मुझे बड़ा ही भयानक पेन होगा तो यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डिवीजन भौतिक जगत में बड़े ही क्लियर है तो इस डिवीजन को हम कॉन्शियस लेवल पे कॉन्शियस जगत में किस तरह से समझे तो उसके लिए जो गोल्डन टेस्ट है वह है नेति नेति जिस तरह से यह भौतिक जगत का गोल्डन टेस्ट किने एक चाकू से मारो पता चल जाएगा कि क्या भौतिक मने क्या सब्जेक्ट है क्या ऑब्जेक्ट है अपने मन में जद ये टेस्ट करना है कि क्या सब्जेक्ट है क्या ऑब्जेक्ट है तो जो कुछ भी हम सोच रहे हैं जो कुछ भी हम इमेजिन कर रहे हैं यदि रात को सोने के समय स्वप्न भी देखते हैं यदि हमारी सेंटीमेंट यदि किसी के प्रति हमको प्रेम है या किसी के प्रति हमारी घृणा है ना कि क्रोध है यदि मैं किसी भी तरह के क्रिएटिव विचार करता हूं कि हां मुझे इस तरह से आज नया प्रोग्रामिंग करना है कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करना है मुझे एक कंप्यूटर लैंग्वेज में नया कोडिंग करना है तो एक बहुत ही हाईली इंटेलेक्चुअल एंडेवर हो गया कि मैं जावा में प्रोग्रामिंग करूंगा ना कि सी प्लस प्लस में प्रोग्रामिंग करूंगा मुझे वेबसाइट डेवलप करनी है तो कौन सी टेक्नोलॉजी में जाऊंगा कौन से प्लेटफार्म का इस्तेमाल करूंगा या तो फिर यदि मुझे अकाउंटिंग करना है तो यह पार्टिकुलर वाउचर डेबिट में जाएगा क्रेडिट में जाएगा कौन से अकाउंट हेड में जाएगा इसको किस तरह से हम अपने ऑडिटर के सामने जस्टिफाई करेंगे इस एक्सपेंस को यदि मैं ड्राइविंग कर रहा हूं तो मुझे कौन से रूट प जाने से वहां पर ट्रैफिक कम होगा और रास्ता कम होगा छोटा होगा जिससे कि मैं पेट्रोल को बचा पाऊं जल्दी से वहां पर पहुं जाऊ और रास्ता भी अच्छा हो यह जितना भी डिसीजन मेकिंग प्रोसेस है या क्रिएटिव थिंकिंग है या तो इवन इंस्टिंक्टिव थिंकिंग है अपना कि रास्ते से जा रहे हैं एकाएक एक गाड़ी जोर से अपने सामने आकर के खड़ी दौड़ के अपने सामने आ रही है जब हम रास्ता क्रॉस करते हैं तो इंस्टिंक्टिवली अपना माइंड है वो फट करके अपने बॉडी को कंट्रोल करेगा कमांड करेगा और हम जंप लगा कर के सामने की ओर चले जाएंगे यह इंस्टिंक्टिव एक्शंस बहुत सारी है अपने शरीर में अपने देह में यह ब्लड सर्कुलेट होता है ऑटोमेटिक होता है कहा जाता है ऑटोमेटिक बट देयर इज अ लोअर सिस्टम ऑफ अपने कॉन्शसनेस यह जो ब्रेन के बारे में हमने सोचा था दैट इज अ हायर ब्रेन फंक्शंस एंड देयर आर लोअर मोर मशीन लेवल फंक्शंस यदि कंप्यूटर की लैंग्वेज में कहा जाए तो मशीन लेवल फंक्शंस होते हैं कुछ दैहिक फंक्शन होते हैं जो कि ब्लड सर्कुलेशन है अपने सास प्रस्वावित सिस्टम है यह कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम है इसको कंट्रोल करता है तो यह सब कुछ आप देखते हैं अपनी कॉन्शसनेस में हो रहा है दैट इज नेति नेति यह भी सब्जेक्ट नहीं है यह भी सब्जेक्ट नहीं है यह भी सब्जेक्ट नहीं है यह सब ऑब्जेक्ट है जिस तरह से मैं कहूंगा कि जिसको यह नाइफ टेस्ट यदि हम उसका नाम दे स्वामी जी के शब्दों में नाइफ टेस्ट अर्थात कि चाकू मारने का टेस्ट मुझे यह पक्का पता है चाकू मार के मैं कंफर्म कर सकता हूं कि सब्जेक्ट क्या है ऑब्जेक्ट क्या है मेरे माइंड में कभी भी कोई भी डाउट नहीं रहेगा तो वैसे ही कॉन्शियस लेवल पे सब्जेक्ट क्या है ऑब्जेक्ट क्या है यह नेति नेति टेस्ट है यदि मैं इसको रिकॉग्नाइज कर पाता हूं यदि मैं इसके बारे में कोई भी डिटेक्ट कर सकता हूं यदि मैं इसके बारे में सोच सकता हूं इसको मैं फील कर सकता सकता हूं विचार आते हैं इमोशंस आती है इंस्टिंक्ट चलती है क्रिएटिव थिंकिंग चलता है जो कुछ भी मैं अपने माइंड में डिटेक्ट करता हूं इट इज नेति नेति यह भी मैं सब्जेक्ट नहीं हूं यह भी सब्जेक्ट नहीं है यह भी सब्जेक्ट नहीं है यह सब एक्सटर्नल ऑब्जेक्ट्स है व्हिच इज अ मने एक बड़ा ही आश्चर्यजनक थिंकिंग है आज के यह जिसको हम कहेंगे कॉन्शसनेस स्टडीज करते हैं उन लोगों के लिए कि ये जितना भी आइडियाज जितना भी विचार जितना भी सब कुछ है सब ऑब्जेक्ट है देन व्हाट इज द सब्जेक्ट द सब्जेक्ट इज अन अटैच अवेयरनेस जो भी किसी भी चीज के साथ में इंटरेक्ट नहीं करती वह है मेरा सही स्वरूप या तो मेरा सब्जेक्ट या तो मेरा ट्रू नेचर या तो फिर शास्त्र की भाषा में कहेंगे तो आत्मन या तो ब्रह्मण देखिए अब भी इसी बात को फिर से दोहराते हैं भौतिक जगत में क्या होता है सब्जेक्ट है ऑब्जेक्ट है अर्थात कि मेरे यह दो हाथ है दोनों हाथों से यह मैं अब उसको मैं सब्जेक्ट कहूंगा मेरे सामने तरकारी पड़ी हुई है खाने का सब सामान पड़ा हुआ है मुझे खाना बनाना है तरकारी है नमक है चीनी है फिर ये यह मिर्च है फिर यह तवा है ये आटा है इन सब ऑब्जेक्ट के साथ में मेरा हाथ इंटरेक्ट करेगा इन सब ऑब्जेक्ट के साथ में मेरा हाथ जो है वह कार्य करेगा तो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट और इंटरेक्शन तीन चीजें हो गई देखिए सिर्फ सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट होने से नहीं चलेगा बाहर के जगत में जो कुछ भी है उसके साथ में आप जब इंटरेक्ट करेंगे तब कर्म होगा तो यह हो गया कर्म की डेफिनेशन व्हाट इज कर्मा कि सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट के बीच में इंटरेक्शन जो होता है वह कर्म हो गया अभी ज जैसे कि रसोइया है मैं जद सुबह को यहां पर 7:00 बजे अभी आज आज सुबह को जैसे 7:00 बजे नाश्ते का घंटी लगा तो मैं वो नाश्ता करने के लिए किचन में गया डाइनिंग हॉल में गया देखता हूं कि रसोया जो हमारा है वह चुपचाप एक जगह पर बैठा है और मैं जाकर के अपनी कुर्सी में बैठ गया हूं राह देख रहा हूं कि अभी वो आकर के परोसे का वो कुछ नहीं कर रहा है बैठा है तो मैं उसको पूछूंगा क्यों रे कुछ खाना नहीं बनाया क्या अभी वो बोला कि नहीं यह सब पड़ा है यहां पे देखिए ये तरकारी भी पड़ी है यह इडली का यह वो यह जो कहते हैं वह पेस्ट वह भी पड़ा है यह भी सब चटनी का यह जो सामान है सब पड़ा है और मैं हूं यहां पे सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों है ही है तो और क्या चाहिए आपको एक्चुअली सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट होने से तो नहीं चलेगा वो खाना अपने आप में तो बनता नहीं है सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट को इंटरेक्ट करना पड़ेगा कर्म करना पड़ेगा जब रसोइया यह सब साधन के साथ में कुछ कार्य करेगा तब तो खाना तैयार होगा तो यह तीसरा कांसेप्ट हो गया कर्मा तो वैसे ही जिस तरह से भौतिक जगत में अभी देखिए कि तीन चीजें हो गई एक है रसोइया दूसरा है रसोई का पूरा सामान किंतु सिर्फ रसोइया और रसोई के सामान से कुछ नहीं होने वाला रसोइए को वह सामान के साथ में कार्य करना पड़ेगा कर्म करना पड़ेगा तभी खाना तैयार होगा तो यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट और कर्मा और रदर इंटरेक्शन अपनी कॉन्शसनेस में भी यही चीज रिफ्लेक्ट कर है एक तो है मेरा सेल्फ जिसको मैं कहूंगा आत्मन और दूसरे है यह ऑब्जेक्ट जितने भी डिजायर्स है इस जगत के जितने भी विचार है इस जगत के जितना भी मेरे आइडियाज है यह काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर जिसको कि हम षड रिपु कहते हैं या तो फिर अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश जिसको कि हम पंच क्लेश कहते हैं यह नेगेटिव हो गया किंतु साथ-साथ में पॉजिटिव भी जो है यम और नियम सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप सोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रण दन ये 10 है यम और नियम तो ये पॉजिटिव चीजें हम करते हैं ना कि नेगेटिव चीजें करते हैं किसी के साथ में मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा इसको कहेंगे चित्त प्रसाद तो अपने भीतर में चित्त प्रसाद हो ना कि चित्त क्लेश हो अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश इसको कहेंगे क्लेश तो तो अपना मन प्रसाद से भरपूर हो ना कि अपना मन क्लेश से भरपूर हो अपना मन किसी के प्रति प्रेम से आकृष्ट होता हो ना कि किसी के प्रति क्रोध से उसके प्रति विराग उत्पन्न होता हो जो कुछ भी दिख रहा है वह सब ये कर्म है यह कर्म क्या है यह आत्मन और यह आइडियाज इन दोनों के बीच का इंटरेक्शन इसको कहते हैं कर्म यह सही सही कर्म की डेफिनेशन यह है यदि आप कहेंगे कि सत्कर्म करें तो जिससे कि आपका पॉजिटिव बैंक बैलेंस बढ़ेगा और दुष्कर्म करें तो आपका नेगेटिव बैंक बैलेंस बढ़ेगा तो यह दुष्कर्म या सत्कर्म सही सही देखा जाए तो क्या है बाहर के जगत में अपने देह के माध्यम से हम सत्कर्म या दुष्कर्म करते हैं यदि इसी चाकू से मैं तरकारी भी काट सकता हूं जिससे कि मैं गरीब लोगों के लिए खाना पका रहा हूं तो यह एक चाकू से जो कर्म हुआ वह सत्कर्म हो गया इसी चाकू से मैं किसी का मर्डर करता हूं तो वह दुष्कर्म हो गया तो यह सत्कर्म और दुष्कर्म से जो भौतिक लेवल पर जो होता है उससे निश्चय मेरा पाप और पुण्य बढ़ता रहता है कम होता रहता है मने उसमें इंक्रीज होता है डिक्रीज होता है किंतु इससे भी फार मोर जो उसका जो इफेक्ट होगा कर्म के बैंक बैलेंस प अपना यह जो भवसागर अपना ये जो मने संसार अपना यह जो भवर रूपी यह जो बैंक है अपने ईश्वर के साथ में अपना जो डिपॉजिट करते हैं पाप और पुण्य अपना जो रिजर्व बैंक है जहां पर हम डिपॉजिट करते हैं विड्रॉ करते हैं कौन सा कर्म सबसे ज्यादा डेंजरस है या तो बेनिफिशियल है यह कॉन्शियस लेवल प जो कर्म किया जाता है इट हैज फार ग्रेटर इफेक्ट और इंपैक्ट इन दिस बैंक बैलेंस ऑफ कर्मा जैसे कि यदि मान लीजिए मैं किसी के प्रति घृणा से करता हूं किसी के प्रति मेरे मन में घृणा है या तो क्रोध है किंतु मैं बाहर से उसके साथ में बड़ा अच्छा व्यवहार करता हूं ऐसे बहुत सारे लोग होते हैं आपको मन में मन में गाली देते हैं किंतु मुंह पर बड़ा हंसते हंसते बात करेंगे हम हम लोग इवन हम लोग भी बहुत बार ऐसा दूसरों के साथ करते हैं मैं खुद करता हूं तो मैं दूसरों को क्या बोलूंगा तो यह अपना सबका अनुभव है कि मन में किसी व्यक्ति के बारे में दूसरे विचार है और बाह्य आचरण दूसरे तरीके का है तो ये मन में जो विचार है व सही सही कर है आप यह मत सोचिए कि मैं मन में गाली देकर के और बाहर से अच्छा आचरण करके यह अपना जो कर्म का बैलेंस है उसको मैं नील कर दूंगा या कर्म के जो जो बंधन है उससे मैं मुक्त हो जाऊंगा आप मन में जो सोचते हैं वही सही सही कर्म है बाहर में आप कुछ भी करें उससे फर्क नहीं पड़ने वाला ठाकुर की वह जो फेमस कहानी है कि दो मित्र थे एक मित्र गया जहां पर भागवत का पाठ हो रहा है और दूसरा मित्र गया जहां पे स्त्रियां नृत्य गीत गा रही है तो जहां पर वह नृत्य गीत चल रहा है वह मित्र मन में मन में सोचता है कि अच्छा मेरा जो मित्र जो भागवत सुन रहा है वो कितना नसीबदार है कितना फॉर्चूनेटली है कि भागवत सुन रहा है और मैं कहां यहां पाप में डूबा हुआ हूं तो सुन रहा है नृत्य कीर्तन नृत्य गीत किंतु मन में चल रहा है भागवत का चिंतन और जो जो मित्र भागवत सुन रहा था वो सोच रहा है अरे मैं कैसा मूर्ख हूं और मेरा मित्र कैसा चालक है कहां मैं यह बोरिंग यह सब सब्जेक्ट भागवत सुन रहा हूं और मेरा मित्र सुन रहा है नृत्य गीत सुन रहा है एंजॉय कर रहा है तो बाहर में सुन रहा है भगवत मन में चल रहा है पापा चार तो ठाकुर क्या कहते हैं जब यमदूत आए तो जो मित्र भागवत सुन रहा था उसको ले गए यम लोक में नरक लोक में और जो मित्र यह जो नृत्य गीत सुन रहा था उसको ले गए स्वर्ग लोक में तो बाहर से जो कर्म करते हैं उसका इफेक्ट नेचरली हो होता ही है किंतु उससे कई गुना इफेक्ट जो है कर्मा के मुक्ति और बंधन में वह अपने कॉन्शियस लेवल पे जो कर्म होते हैं उससे होता है यदि एक व्यक्ति है जितने भी ऑब्जेक्ट है बाहर में दिखते हैं उन सबका एक मेंटल रिफ्लेक्शन अपने माइंड में होता है अभी एक मेरा एक व्यक्ति है जिसके साथ में मेरा अच्छा नहीं पड़ रहा है तो वो जो व्यक्ति है ना उसका एक मेंटल रिफलेक्शन मेरे माइंड में होगा और मेरा जो सब्जेक्ट अर्थात कि मेरा जो सेल्फ है ये सेल्फ जो है इस व्यक्ति के साथ में इमेजिनरी व्यक्ति के साथ में अभी वह व्यक्ति तो चला गया जिसके साथ में मेरा अच्छा नहीं पट रहा था मेरे सामने बैठा था अभी खड़ा होकर चला गया किंतु मेरे मन में वह व्यक्ति अभी भी बैठा है और उसके साथ में मैं अभी भी झगड़ा कर रहा हूं अभी भी मैं सोच रहा हूं कि यह कितना बुरा आदमी है यह किस तरह का आदमी है तो जो यह बाहर वाले व्यक्ति का जो मेंटल रिफ्लेक्शन है वो मेरे लिए ऑब्जेक्ट है और मैं जो उसके साथ में झगड़ा कर रहा हूं वो मेरा मेंटल सेल्फ है अभी देखिए कि इन दोनों के बीच में जो इंटरेक्शन हो रहा है मेरा जो मेंटल सेल्फ और यह जो मेंटल ऑब्जेक्ट मेंटल जो व्यक्ति जो बाहर दूसरा व्यक्ति जो मेरे माइंड में बैठा हुआ है यह सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट के बीच में इंटरेक्शन होता है कर्म होता है और यह कर्म किस रूप में है यह कर्म है क्रोध के रूप में यह कर्म है घृणा के रूप में तो जयदिश व्यक्ति का रिफ्लेक्शन जो बैठा है उसके साथ में मेरा जो रियल सेल्फ है जो सब्जेक्ट है वो उसके साथ में नेगेटिव इंटरेक्शन करेगा तो मेरा नेगेटिव कर्म बढ़ेगा यदि मैं उस व्यक्ति को आशीर्वाद देता हूं अपने मन से बाहर में चाहे भले ही उसके साथ में मेरा कितना ही झगड़ा क्यों ना हो मैं यदि मन में उस व्यक्ति को आशीर्वाद देता हूं ठाकुर के पास में प्रार्थना करता हूं कि ठाकुर वह तो उ नासमझ है नादान है उसको तुम क्षमा कर देना तो उस व्यक्ति के साथ में जो मेरा इंटरेक्शन या कर्म हुआ वह पॉजिटिव कर्म हुआ जीसस को जब शूली पर चढ़ाया गया क क्रूसिफिकेशन है उनको पता नहीं है कि वह क्या कर रहे हैं तो शूल विद्ध मने क्रूसिफिकेशन है कि वो हालदार बोलकर के एक व्यक्ति था वहां दक्षिणेश्वर कालीवाड़ा कि ठाकुर यह दर्शन हो रहा है या समाधि में जा रहे हैं वो सब नाटक ही कर रहे हैं बाबू लोगों का मन जीतने के लिए ये रास मणि और मथुर बाबू का तो एक दिन ठाकुर भाव में पड़े हुए थे तो उसने जाकर के ठाकुर को इतनी जोर-जोर से व जूत लाते मारी इतना आघात किया प्रहार किया उनके देह के ऊपर में कि जब ठाकुर भाव में से बाहर आए देखा पूरे देह के ऊपर में यह घाव का निशान लगा हुआ है तो बाकी सब ने कहा चलो जाकर के मथुर बाबू को कंप्लेन करते हैं तो ठाकुर ने कहा नहीं छोड़ दो उसको उसको पता नहीं वह क्या कर रहा है इसलिए उसने कहा तो एक क्षमा कर देना देखिए कि दो तरह के इंटरेक्शन हुए इस व्यक्ति के साथ में ठाकुर के ठाकुर का बाह्य रूप से उसके साथ में दुश्मना आवट था हालांकि ठाकुर को पता नहीं था कि उसके साथ में उनकी दुश्मना आवट है किंतु वह व्यक्ति दुश्मना आवट पोषण करता था अपने मन में दुश्मना आवट का भाव रखता था ठाकुर के साथ में इस तर तरह का बुरा वर्तन करता था और साथ में ही उस व्यक्ति का जो रिफ्लेक्शन था ठाकुर के माइंड में उसके साथ में किंतु ठाकुर ने आशीर्वाद ही उस व्यक्ति को अपने मन में दिए है तो बाहर में यदि नेगेटिव कर्म भी हो रहा है तो भीतर में पॉजिटिव कर्म होता है इस क्षेत्र में किसी जो व्यक्ति उसका जो बाहर का कर्म काउंट नहीं होगा भीतर का ही कर्म काउंट होगा जनरली ऐसा होता है हम सभी के साथ में कि जद बाहर में किसी के साथ में दुश्मना आवट है तो अपने मन में भी हम उसके साथ में दुश्मना वट ही पोषण करेंगे उसको गाली ही देंगे यदि बाहर के जगत में भौतिक जगत में किसी के साथ में मेरी मित्रता है तो अपने मन में उसके प्रति मित्रता का ही भाव रखेंगे अर्थात कि बाहर में यदि किसी व्यक्ति या किसी ऑब्जेक्ट के साथ में पॉजिटिव कनेक्शन है पॉजिटिव कर्मा है तो मन में भी पॉजिटिव कर्मा रहेगा बाहर में यदि नेगेटिव कर्मा है तो मन में भी नेगेटिव कर्मा रहेगा और ऐसा कई बार होता है कि बाहर में हम अच्छा दिखाते हैं किंतु मन में तो उसके प्रति नेगेटिव भाव पोषण करते हैं तो यह दो चीजें हमको जनरली देखने को मिलती है मेरा एक दुश्मन है और मेरा एक मित्र है तो दुश्मन के साथ में मेरी बाहर में भी दुश्मना आवट है मेरे मन में भी मैं उसको याद करके गाली देता रहता हूं कोसता रहता हूं मेरा एक मित्र है जिसमें बाहर भौतिक जगत में भी उसके साथ मेरी मित्रता है और मेरे मन में भी उ उस मित्र को याद करके व जो पुरानी यादें होती है ना हम लोग साधु लोग कभी इकट्ठा होते हैं तो बोलते अच्छा टीसी में ऐसा हुआ था याद है बहुत अच्छा फिर हम लोग हंसते हैं मिलकर के अभी मेरा एक मित्र यहां पर आया हुआ है मेरा बैचमेट तो कल रात को उसके साथ में वॉकिंग करते करते वो हमारे जितने भी बैचमेट है सबके बारे में अच्छा वो क्या कर रहा है यह क्या कर रहा है ये सब बड़ा आनंद से हमने एक घंटा वॉकिंग किया रात को खाने के बाद में तो मित्र के साथ में बाहर में भी मित्रता है भीतर में भी मित्रता ये बड़ा ही कॉमन देखा जाता है एक जिसको कहेंगे सिनेरियो एक मने एक घटना वली एक सिनेरियो सेकंड सिनेरियो क्या है आजकल हम पोलाइट जगत में रहते हैं तो किसी के साथ में दुश्मनी भी है तो मुंह से या तो कार्य से उसके प्रति दुश्मना आवट प्रकट नहीं करेंगे उसको बात-बात में हम लोग मारना शुरू नहीं करेंगे मारामारी या झगड़ा झांट हम नहीं करेंगे काम तो उसके साथ में बात तो अच्छी करेंगे किंतु क्या करेंगे मन में ना मन में उसको गाली देते रहेंगे तो तो ये सेकंड सिनेरियो हो गया एक सिनेरियो है कि बाहर में जो हो रहा है उसका एग्जैक्ट रिफ्लेक्शन भीतर में है जिस के साथ में दुश्मना आवट मन में भी दुश्मना आवट किसके साथ में बाहर में मित्रता मन में भी उसके साथ में मित्रता फर्स्ट सिनेरियो सेकंड सिनेरियो इज दैट कि बाहर में तो हम अच्छा रखते हैं मन में ही मन में उसको कोसते हैं तो ये दो सिनेरियो हो गए अभी तीसरा सिनेरियो है जो कि ठाकुर का या तो जीसस का बाहर में कोई कोई व्यक्ति उनको बड़े कोसते रहते हैं किंतु यह लोग अपने मन में तो उनको आशीर्वाद ही देते हैं तो अभी देखिए कि कर्म का बंधन किस तरह से किसको लगेगा यदि बाहर में भी नेगेटिव और भीतर में भी नेगेटिव बाहर में भी पॉजिटिव भीतर में भी पॉजिटिव तो बाहर में जो कर्म करेंगे उसी का तो रिफ्लेक्शन मन में होता है तो बुरे कर्म करने से नेगेटिव कर्म बढ़ गए कर्मों का बंधन बढ़ गया अच्छे कर्म करने से कर्मों का बंधन कम हो गया तो ऐसे व्यक्तियों को लगता है कि मैं बाहर में जो कर्म करता हूं उसका डायरेक्ट कोरिले मेरे कर्म के बंधन के साथ में है किंतु यह बात ठीक नहीं है उसका बाहर में और भीतर में परफेक्ट रिफ्लेक्शन है बाहर में पॉजिटिव भीतर में पॉजिटिव बाहर में नेगेटिव भीतर में नेगेटिव इसलिए उसको लगता है कि पॉजिटिव का असर कर्म के बंधन पे पॉजिटिव और नेगेटिव का असर नेगेटिव वो इस तरह के व्यक्ति को महसूस होता है दूसरा व्यक्ति जो है वह सोचता है कि बाहर में तो मैं सबके साथ में अच्छा रख रहा हूं फिर भी मेरे कर्मों का बंधन क्यों बढ़ रहा है इस व्यक्ति को पता नहीं है कि बाहर में तो भले ही चाहे वह मित्रता रखता हो किसी व्यक्ति के साथ में भीतर में तो वह दुश्मना वट रखता है और यह दुश्मना वट है वही काउंट होगी भगवान के साथ में आप मुंह पर अच्छी-अच्छी हजार बातें बोल लीजिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला और तीसरा सिनेरियो है कि हो सकता है आप मुंह पर किसी के साथ में झगड़ा कर दे किंतु भीतर में तो आप उसको आशीर्वाद ही देंगे इस तरह के बहुत सारे सिनेरियो आपको देखने को मिल जाएंगे मां का बच्चे के प्रति जो अनुशासन है मां बच्चे को मारेगी डांटे गी कहेगी यह तुम क्या उल्टा-पुल्टा कर रहे हो किंतु वो डांट या मार के पीछे में मां के मन में तो प्रेम ही है शिक्षक जो होते हैं उच्च कक्षा के शिक्षक अपने स्टूडेंट्स को डिसिप्लिन करेंगे गुजराती में कहावत है सोटी वागे चमचम विद्या आवे दमदम अर्थात कि जितनी फटाफट सोटी लगेगी मने वो लकड़ी मारेंगे वो टीचर उतना ही फटाफट फट विद्या आएगी अभी टीचर को स्टूडेंट को मारने की वैसे कोई इच्छा नहीं है किंतु फिर भी वो उसको कॉर्पोरल पनिशमेंट जिसको आजकल कहा जाता है वो फिर भी वो करेगा क्यों जिससे कि वो स्टूडेंट का भविष्य अच्छा हो तो बाहर में तो वो गुस्सा कर रहा है बाहर में तो उसको गाली दे रहा है कह रहा है अरे मूर्ख ये मैथमेटिक्स का इतना सिंपल इक्वेशन है तुमको नहीं समझ में आ रहा है वो तो बाहर में गाली दे रहा है बाहर में डांट रहा है किंतु भीतर में तो वो वही सोच रहा है कि मेरा ये स्टूडेंट है वो पढ़ाई लिखाई करके एक अच्छा ऑफिसर बने एक अच्छा स्टार्टअप फाउंडर बने ना कि एक अच्छा एक आदमी बने सोसाइटी को कुछ अच्छा कंट्रीब्यूट करें भीतर में आशीर्वाद है बाहर में वह गाली दे रहा है गुस्सा कर रहा है तो उसके केस में पॉजिटिव कर्म ही बढ़ेंगे इन स्पाइट कि वह बाहर में नेगेटिव कर्म कर रहा है भीतर में तो वह पॉजिटिव कर्म कर रहा है बच्चे के साथ में उसका जो कॉन्शियस लेवल पे इंटरेक्शन है वह आशीर्वाद दे रहा है इस बच्चे को तो देखिए कि ये जो स्प्लिट है वो किस तरह का है बहुत बार हम लोग यह सोच ही नहीं पाते कि अपना कॉन्शियस वर्ल्ड है वो कॉन्शियस वर्ल्ड का अपना एक अस्तित्व है उसका एक पावर है और बहुत बार हमको लगता है कि इस जगत में रह कर के मुझे बहुत कुछ करना पड़ता है मैं फंस गया हूं मैं किस तरह से आध्यात्मिक जगत में आगे बढूंगा जैसे कि कल डिस्कशन हो रहा था कि मुझे फैमिली में रहना है मुझे जॉब करनी है मेरे बच्चे हैं तो मैं अपना फैमिली का रिस्पांसिबिलिटी बच्चों का रिस्पांसिबिलिटी जॉब करनी है वो सब रिस्पांसिबिलिटी मेरे सर पे थोड़ा सा भी एप्रिसिएशन नहीं और छोटी-छोटी चीजों में सभी लोग मुझे क्रिटिसाइज करते हैं तो यह तो बाहर का जगत है डोंट थिंक अबाउट दैट थिंक अबाउट योर इनर वर्ल्ड यह कॉन्शियस वर्ल्ड है वो अपने हाथ में है बाहर में किसी किसी के प्रति आपको क्रोध करना ही पड़ेगा अभी जैसे टेररिस्ट अटैक होता है अपने देश पे तो हम लोग चुपचाप थोड़ी ना बैठ कर के देखेंगे हम भी अपने कमांडोज को भेजेंगे जाओ सामने सरहद पार होकर के उनको भी पिटाई करके आओ तो बाहर में तो नेगेटिव कर्म हो गया शायद किंतु भीतर में तो हम अपनी देश की रक्षा कर रहे हैं देश बांधव की रक्षा कर रहे हैं तो उसमें कोई नेगेटिव कर्म नहीं कहा जाता तो यह जो स्प्लिट है भौतिक जगत में और कॉन्शियस वर्ल्ड में इस स्प्लिट को हमको समझना है इस स्प्लिट को समझ कर के ये जो ड्युअलिटी ऑफ नेचर है इसको समझ कर के फिर हम अपने कॉन्शियस वर्ल्ड को अपने कॉन्शियस माइंड को कंट्रोल करना सीखेंगे और कंट्रोल करना ऐसे सीखेंगे ऐसे एक्सट्रीम एग्जांपल है जैसे कि ठाकुर ने कहा कि वेदव्यास वहां पर नदी के सामने खड़े हैं कुछ गोपालन बालाएं भी वहां पे स्त्रियां भी खड़ी है तो उन्होंने कहा कि महाशय हमको नदी पार होनी है आप कुछ रास्ता कर दीजिए तो फिर वेदव्यास ने क्या कहा इन गोपाल अनों को कि आपके पास में जितना भी दूध दही घी वगैरह है मक्कन सब मुझे खिला दो तो उन्होंने सब खिला दिया सब खा कर के वेदव्यास क्या करते हैं नदी को आदेश देते हैं कि यदि मैंने कुछ नहीं खाया तो तुम्हारे बीच में यह रास्ता बन जाए तो सही में नदी के बीच में दो रास्ते पानी है दो जगह पर हट गया और रास्ता बन गया तो ये सब स्त्रियां आश्चर्य चकित होकर के कहती है कि अरे हमारी नजर के सामने ही तो हमने देखा कि आप इतना दूध इतना घी इतना मक्खन खा गए और अभी बोलते हैं कि मैंने कुछ नहीं खाया तो रास्ता हो जाए और नदी ने भी आपकी बात स्वीकार कर ली यह कैसे हो सकता है तो फिर भगवान वेदव्यास क्या कहते हैं उन्होंने नहीं जो भीतर में जो जठराग्नि है उसने खाया है तोय देर इज अ स्प्लिट बिटवीन दिस आउटर वर्ल्ड एंड इनर वर्ल्ड गीता में भगवान कृष्ण क्या कहते हैं यस्य नह कतो भावो बुद्धिर यस्य न निप हत्व पस इमान लोकान न हंति न निब ते अर्थात कि जिसमें किसी भी तरह का अहक भाव नहीं है जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती है वह इन प्राणियों की हत्या करके भी लोगों की हत्या करते भी वह ना हत्या के कर्म से बंधता है ही वह किसी की हत्या करता है एक्सट्रीम एग्जांपल यदि आप किसी की हत्या भी कर दे किंतु यदि आपका यह स्प्लिट क्लियर है कि मैं जिसकी मैं हत्या कर रहा हूं उसका बुरा नहीं मैं अच्छा ही चाह रहा हूं उसको मैं आशीर्वाद दे रहा हूं तो आपका हाथ हत्या करेगा आपका मन किंतु हत्या के बंधन से नहीं बंधेगा जैसे कि सोल्जर है यह सोल्जर सोचे कि मैं दुश्मनों की भले ही चाहे हत्या कर रहा हूं किंतु अपने मन में तो मैं अपने देश बांधव की रक्षा कर रहा हूं जो कि निर्दोष है ये ये जो दुश्मन है मेरे देश में प्रवेश कर देंगे तो निर्दोषों की हत्या करेंगे तो मैं निर्दोषों के बचाव के लिए शत्रुओं की हत्या कर रहा हूं यह कांसेप्ट यदि क्लियर है उसका उसके मन में अपने शत्रु के प्रति शत्रु भाव नहीं है तो वह अपने हाथों से वो मशीन गन भी चलाता है अपने हाथों से गोलाबारी भी वो चलाता है फिर भी उसका मन वह हत्या के पाप में लिप्त नहीं होगा यह स्प्लिट इस स्प्लिट को हमको समझना है तभी हम इस जगत में ठीक-ठीक रह पाएंगे अदर वाइज क्या होगा कि हम लोग सोचेंगे कि मुझे एक आइडियल जगत चाहिए जिसमें कि मेरे पास में समय है जिसमें कि मेरे सर पर किसी भी तरह का प्रेशर नहीं है जिसमें कि मैं बड़ा ही शांति मेरा कोई दुश्मन नहीं है ना ही मेरा किसी के प्रति कटू या वेर भाव है इस तरह के आइडियल जगत में मैं पहले एक बार पहुंच जाऊं फिर मैं साधन भजन करूंगा ऐसा कहना क्या क्या कहने के बराबर है पता है पहले मैं तैरना सीख लूं बाद में मैं पानी में जंप लगाऊंगा तो जब तक आप पानी में जंप नहीं लगाएंगे तब तक आप तैरना ही नहीं सीखेंगे और जदिया कहेंगे मुझे तैरना नहीं आएगा तब तक पानी में नहीं जाऊंगा उस का अर्थ आप कभी पानी में जाने वाले नहीं है आप कभी तैरना सीखने वाले नहीं है तो इस स्प्लिट को हमको रिकॉग्नाइज करना है बाहर के जगत में जो कुछ भी होता है सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट इंटरेक्शन भीतर के जगत में सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट इंटरेक्शन से उसको सेपरेट रखना है यह तो पहला कांसेप्ट हो गया जो मैं बताना चाहता था सेकंड ऑब्जेक्ट है कि यह सब्जेक्ट क्या है बाहर के जगत में सब्जेक्ट को समझना बड़ा ही आसान है चाकू मारो तो अभी पता चल जाएगा ना कि ये तरकारी है ना कि यह मैं हूं यह ऑब्जेक्ट है ना कि यह सब्जेक्ट है भीतर के जगत में हम सब्जेक्ट को कैसे समझे भीतर के जगत में हम कैसे समझ पाए कि यह मेरा अवेयरनेस है यह मेरा आत्मन है यह मेरा सेल्फ है यह मेरा सही नेचर है और यह ऑब्जेक्ट है तो ये समझने से पहले तो यह समझना होगा कि ये सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डिवीजन है और इन दोनों के बीच में इंटरेक्शन होकर के कर्मा होता है पहले तो इस साइंस को समझना होगा इस बेसिक आइडिया को समझना होगा जब तक हम इस आईडिया को नहीं समझेंगे तब तक हम इसके बाहर में रास्ता ही नहीं निकाल पाएंगे यदि मुझे यह पता नहीं चलेगा कि मेरी कॉन्शसनेस के भीतर में मेरे माइंड के भीतर में ऑब्जेक्ट भी है सब्जेक्ट भी है ड्युअलिटी है दो विभिन्न तरह के अस्तित्व है दो विभिन्न तरह के एलिमेंट्स मेरी कॉन्शसनेस में रह रहे हैं और इन दोनों एलिमेंट के बीच में इंटरेक्शन होकर के कर्म होता है यह बेसिक कांसेप्ट में साइ साइकोलॉजी का या तो कॉन्शसनेस स्टडीज का नहीं समझ पाऊंगा तब तक मैं साधन भजन के राज्य में बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाऊंगा जब भी बाहर के जगत में कुछ भी होगा मैं इमीडिएट अपने माइंड में उसका एक रिफ्लेक्शन खड़ा करूंगा और जैसे कि अभी आज मुझे जैसे मान लीजिए कि ऐसा सिचुएशन आ गया कि मुझे अब अभी यहां पे तो नहीं यहां पे ऐसा ज्यादा नहीं होता पब्लिकेशन में राजकोट में था तो सब समय यह डेडलाइन होता था कि यह डेडलाइन है आपको यह किताब सबमिट कर देनी है यह डेडलाइन है मैगजीन प्रेस में जाने वाला है तो 20 तारीख को एवरी 20th को हमारा मैगजीन प्रेस में जाता था उसका अर्थ क्या हुआ कि मुझे 19 तारीख तक पूरा मैगजिन रेडी कर देना है तो बहुत बार ऐसा होता है कि 15 तारीख तक तो ना ही मेरे पास में सब आर्टिकल आए हैं ना ही व डिजाइन उसका तैयार हुआ है ना ही उसका प्रॉपर फॉर्मेटिंग हुआ है 15-16 तारीख को हम काम करने के लिए बैठेंगे मैगजीन तैयार करने को और 19 तक खत्म करना है दो-तीन दिन में तो प्रेशर आ जाता है और चलो अभी बाकी सब काम छोड़ दो यही को करते इसी को करते रहो यह प्रेशर आ गया तो मैं साधन भजन सब भूल जाता हूं मैं यदि चाहे मंदिर में जाके बैठ भी गया तो मेरे मन में वही चलेगा कि अच्छा यह मैगजीन का डिजाइन इस तरह से करना है या उस तरह से करना है चार आर्टिकल आए हैं तो चार लेने हैं ना कि एक लेना है कि कौन सा लेना है एक कौन अच्छा है कौन बुरा आर्टिकल है और फिर बात यह नहीं है कि आर्टिकल अच्छा बुरा है जिसने भेजा उसके साथ में फिर रिलेशन देखना है यदि मैं इसका आर्टिकल रिजेक्ट करूंगा तो वो मेरे पर नाराज हो जाएगा उसका रिजेक्ट करूंगा तो वो नाराज हो जाएगा तो मैं मुझे किसको नाराज करना है दो में से एक को नाराज करना है एक को खुश रखना है तो किसको नाराज करना है किसको खुश रखना है ये सब थिंकिंग में बैठ कर के चलाता रहता हूं वही मंदिर में बैठा हूं क्यों क्योंकि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि भौतिक जगत का रिफ्लेक्शन मैं अपने माइंड में लेकर के वहां मंदिर में जाकर बैठा हूं मैं सोच रहा हूं कि मैं मंदिर में बैठा हूं ठाकुर का आशीर्वाद मिलेगा मुझे पुण्य मिल रहा है नहीं मंदिर में मैं वही पब्लिकेशन ऑफिस लेकर ही बैठा हूं बेटर है कि मैं ऑफिस में जाकर वो काम समाप्त कर दूं पूरे झमेले को खत्म कर दूं फिर अपने माइंड को फ्री रख कर के मंदिर में जाऊं जो कि सब समय होता नहीं सब समय वहां वो डेडलाइन की साइकिल चलती ही रहेगी सब समय कोई ना कोई प्रेशर बना ही रहेगा इन दैट केस मुझे क्या करना है इन दैट केस ये साइकोलॉजिकल वर्ल्ड है कॉन्शियस वर्ल्ड है उसको मुझे ये फिजिकल वर्ल्ड से डीकपल करना है इसको फिजिकल वर्ल्ड से मुझे सेपरेट कर देना है मेरे कॉन्शियस वर्ल्ड को मुझे एक सैंक्चुरी बनाना है उसको एक इडन गार्डन या तो फिर स्वर्ग बनाना है जहां पे यह भौतिक जगत का या मृत्य लोक का किसी भी तरह का रिफ्लेक्शन मेरे यह मेंटल वर्ल्ड में ना रिफ्लेक्ट हो जिससे कि क्या होगा मेरी ये जो आत्मन है मेरा जो सही नेचर है उस ऑब्जेक्ट के साथ में इंटरेक्शन नहीं करेगा उस ऑब्जेक्ट के साथ में इंटरेक्शन या तो कर्म नहीं करेगा और कर्म नहीं करेगा तो वह ज्ञान प्राप्त करेगा शंकराचार्य कहते हैं कर्म और ज्ञान दोनों एक साथ में नहीं रह सकते और इस बात को लेकर के अपने संघ में बहुत ज्यादा आर्गुमेंट होता है कि हम यह हॉस्पिटल चलाते हैं यह स्कूल चलाते हैं यह स्टूडेंट्स को स्टूडेंट्स के साथ में सब एक्टिविटीज करते हैं तो शंकराचार्य ने तो कहा है ट्रेडिशनल वेदांत में कि आपको कर्म नहीं करना है कर्म में जब भी आप लिप्त होंगे तभी आपके साथ में यह वेदांत रूपी ब्रह्म रूप ब्रह्मज्ञान रूपी ये जो फल है आपसे उतना ही दूर जाता जाएगा ज्ञान और कर्म साथ में नहीं रह सकते जितना आप स्कूल चलाएंगे जितना आप हॉस्पिटल चलाएंगे उतना ही यह ब्रह्म ज्ञान रूपी ब्रह्म रूपी ज्ञान आपसे दूर होता जाएगा ठाकुर ने क्या कहा कि कर्मनाशा बोले एकटा नदिया छ तार भीतरे झाप लाले बांच लाम बांच अर्थात कि कर्मनाशा बोलकर के एक नदी है उसके भीतर में जैसे ही मैं जंप लगाऊंगा मैं बच जाऊंगा तो ठाकुर बार-बार कहते हैं कर्म का त्याग करना है अदर वाइज आपको ज्ञान प्राप्त नहीं होगा तो यहां पर कौन सा कर्म त्याग करना है वह जो फिजिकल कर्म का त्याग करने से कोई लाभ नहीं है वह आपका मुक्ति और बंधन का कोई कार्य कारण नहीं है कर्म तो मेंटल कर्म को त्याग करना है और मेंटल कर्म का त्याग का अर्थ क्या है कि ये जितने भी भौतिक पदार्थ है व्यक्ति है इसका जो रिफ्लेक्शन अपने माइंड में चल रहा है उस रिफ्लेक्शन को छोड़ देना है अभी मान लीजिए कि यहां पे एक सेरेब्रल पाल्सी क्लीनिक है वहां पे मैं बीच बीच में वो मैं उसको सुपरविजन के लिए जाता हूं प्रतिदिन जाऊंगा या तो एक एक दिन छोड़ कर के जाऊंगा वहां पर जाऊंगा बच्चों को देखूंगा बच्चों और उनकी माताओं को बड़ा ही कष्ट होता है बच्चे का तो जीवन अभी कैसा क्या करेंगे किंतु मां का जीवन भी देखिए कि कितना कष्टदायक है तो वह देख कर के मैं जब अपने रूम में आकर के थोड़ा सा आंख बंद करके जप करने के लिए बैठूंगा मेरे माइंड में वही चल रहा है कि अरे वह बच्चा बेचारा कैसी परि स्थिति है उसकी मां की भी कैसी परिस्थिति है तो अभी देखिए कि जप करने की बजाय वह सेरेब्रल पाल्सी क्लीनिक सीपी क्लीनिक के साथ में मैं कर्म कर रहा हूं अभी भी कर रहा हूं इसका उसको मैं अपने माइंड में लेकर के अपने कमरे में आया हूं व्हिच इज रंग कर्म क्या त्याग करना है मन में जो कर्म होता है कॉन्शियस लेवल प जो कर्म होता है उसको त्याग करना है भौतिक जगत में आप लाख कर्म भी कर दे यदि किसी की हत्या भी करें जैसे भगवान कृष्ण कहते हैं यदि आप किसी की हत्या भी करें डंट मीन कि आप उनकी हत्या कर रहे जब तक आप उस हत्या रूपी कर्म से आप अपने अहंकार से उसके साथ में लिप्त नहीं होते हैं करणीय कर्म या तो फिर एक आवश्यक ड्यूटी है ड्यूटी समझ करके धर्म समझ कर के यदि आप उस कर्म को करते हैं तो क्या होगा कि उसका एक मेंटल रिफ्लेक्शन अपनी कॉन्शसनेस में नहीं गिरेगा और उस इ ऑब्जेक्ट के साथ में मेरा जो अवेयरनेस है मेरा सेल्फ वो उसके साथ में इंटरेक्ट नहीं करेगा किसी भी तर तरह का कर्म खड़ा ही नहीं होगा तो देखिए कि यदि मैं कर्म नहीं करता हूं मेंटली तो क्या होगा पता है आई विल बिकम एस्टाब्लिशड इन माय प्योर अवेयरनेस एक प्योर अवेयरनेस बोलकर के एक स्टेट ऑफ माइंड है जिसमें कि मैं एस्टेब्लिश हो जाऊंगा और यही है ब्रह्मज्ञान या तो फिर यही है आत्मज्ञान यदि जिस क्षण मेरा जो अवेयरनेस है किसी भी ऑब्जेक्ट के साथ में वो इंटरेक्ट करना शुरू होता है इज टली मैं वो ब्रह्मज्ञान की स्थिति में से फिर से एक संसार की स्थिति में आ जाता हूं हाथ से कुछ नहीं कर रहा हूं मन में सब तरह का कर्म चलता है किंतु जिस क्षण में ये जो मानसिक कर्म है यह जो मेंटल वर्क है उससे मुक्त हो जाता हूं सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट के बीच में जो इंटरेक्शन है उसको तोड़ देता हूं आई विल बी एस्टाब्लिशड इन प्योर अवेयरनेस व्हिच इज माय ट्रू सब्जेक्ट और जब भी मैं इस प्योर अवेयरनेस या ट्रू सब्जेक्ट में स्थित होता हूं उसी समय मैं ब्रह्मज्ञान में स्थित हूं व्हिच इज द हाईएस्ट गोल ऑफ ह्यूमन लाइफ इस स प्योर सब्जेक्ट या तो प्योर अवेयरनेस में स्थित होना यही मनुष्य जीवन का असली उद्देश्य तो आज यही तक अभी नेक्स्ट क्लास होगा अपना मंडे को ओम शांति शांति शांति हरि ओल तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्ते

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देखिए मैंने कहा ना कि जब तक संसार में रहेंगे यह सब चलता ही रहेगा किंतु अपने मन से जब अपने मन में उस व्यक्ति के बारे में सोचते हैं तब उसके बारे में किसी नेगेटिव तरह का ना सोचे मुझे पता है कि यह बोलना आसान है करना ऑलमोस्ट इंपॉसिबल है मैंने खुद ने अनुभव किया है बट दिस इज द आइडियल क्या करेंगे हम तो कोई आइडियल जगत में नहीं रहते हैं कि सब कुछ आइडियल हो और हम बैठ कर के साधन भजन करें ऐसा तो भी होने वाला नहीं है तो फिर बाह्य जगत और अंतर जगत इन दोनों के बीच में एक जैसे कि फायरवॉल खड़ी करते बाहर के जगत के जितने भी अपने यह द्वेष विद्वेष जो कुछ भी है उसको हम आंतर जगत में ना लाए इतना हम कर सकते हैं और यह डे टू डे लंबा प्रैक्टिस करने के बाद में ही होगा वह जो एक मूवी था ना बहुत पुराना एक मूवी था एक स्कूल टीचर क्या करता है कुछ कैदियों को लेकर के एक अलग से जगह पर जाता है उनको फम करने का प्रयास करता है अभी स्कूल टीचर बेचारा जितना ही प्रयास करें कैदियों को ठीक नहीं कर पाता है फिर आखिर में उसका डेथ हो जाता है वे लोग व बड़े ही मने उससे यह हो जाते हैं प्रभावित होकर के उनका चरित्र बदल जाता है ऐसा एक मूवी था ना बहुत पुराना था आई थिंक क्या नाम हा दो आंखे 12 हाथ यस यस यस तो देखिए कि आप अपने चरित्र से यदि कैदियों का चरित्र परिवर्तन कर सकते हैं तो फिर परिवार जनों का परि न ना कर पाना या कलीग्स का या तो फिर तो इट इज एनटायर पॉसिबल सेल्फलेसनेस जो मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा और यह सेल्फलेसनेस यह जिसको हम चित्त प्रसाद कहेंगे चित्त प्रसाद डेवलप करने से सामने वाला जो है ही विल पॉजिटिवली रिस्प उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु वही है कि हमको फिर बहुत बड़ी अपेक्षाएं नहीं रखनी है जगत के साथ में कोई कोई व्यक्ति होता है उसके साथ में आप कितना ही अच्छा करता रहे आखिर में तो वह गाली ही देगा आपको तो व्हाट कैन ब डन हमको अपना करके अपने से छूट जाना है देखिए मैं अपना एक उदाहरण देता हूं मैं एक आश्रम में गया था एक बार तो एक साधु के साथ में मेरा अच्छा नहीं पट रहा था तो मैं जब विदाय ले रहा था तो वैसे आइडियल क्या होता है जो जूनियर होते हैं वह सीनियर साधु को सबको प्रणाम करके वहां से विदाय लेंगे तो मैंने सबको प्रणाम किया किंतु जिस साधु के साथ में मेरा अच्छा नहीं पट रहा था उनको अवॉइड करके मैं चला आया तो दूसरे एक साधु वहां पर खड़े-खड़े सब देख रहे थे तो उनको सब पता था कि क्या है भीतर का मामला क्या है तो मुझे पूछा क्यों रे उसको प्रणाम क्यों नहीं किया मैंने कहा अरे महाराज क्या जरूरत है जाने दीजिए ना तो बोला ऐसा नहीं देखो तुम उसको प्रणाम करो और तुम अपनी ओर से कर्म के बंधन से छूट जाओ वो तुम्हारा प्रणाम ग्रहण करता है नहीं ग्रहण करता है वो उसके कर्म जाने तुम अपनी ओर से उस कर्म से छूट जाओ तो मैंने कहा बात तो सही है मुझे यह डर था कि मैं प्रणाम करने को जाऊंगा यदि मेरा इंसल्ट कर बैठेगा फिर मैं सामने कुछ बोल दूंगा बिना मतलब जाने के समय ये कौन झमेला खड़ा करेगा किंतु यह बात भी सही है कि उसको यदि मेरे प्रति द्वेष रखना है तो रखे मेरे प्रणाम स्वीकार नहीं करना है तो मत करें मुझे इंसल्ट करना है तो करें मैं अपनी ओर से प्रणाम करके उनको रिस्पेक्ट दे कर के मैं कर्म के बंधन से छूट जाऊंगा फिर वह जाने कि उसको क्या करना है जैसे बुद्ध है वह एक जगह पर भिक्षा लेने के लिए गए और एक आदमी ने उसको कितनी गाला गाली दे दी तो भगवान बुद्ध कुछ नहीं बोल रहे हैं तो वो पूछा कि क्यों रे आप गुस्सा क्यों नहीं हो रहे कि आपने जो गाली दी है मैं तो स्वीकार तो किया नहीं है मैं स्वीकार कर गा तो मुझे नाराजगी होगी वो तुम्हारे ही पास में रहेगी मुझे उससे कोई लाभ नहीं उहे कोई लेना देना नहीं तो हम अपनी ओर से कर्म करके छूट जाए क्योंकि जगत को हम बहुत बार इतना सीरियसली ले लेते हैं सोचते हैं कि जगत में सब कुछ अच्छा होगा तभी मेरा भला होगा जगत में सब कुछ अच्छा नहीं होने वाला है इट्स नेवर गोइंग टू हैपन तो एक तरह से ना जगत से थोड़ा सा विश्राम ले ले जगत से थोड़ा सा डिटैच हो जाए अपना कर्म करके जगत को छोड़ दे फिर वो मेरे बारे में अच्छा नहीं सोचता क्यों नहीं सोचता उस चीज को लेकर के मैं इतना टेंशन में पड़ जाऊंगा वो ठाकुर ने कहा ना कि एक डिवोटा लेडी डिवोटा ने आकर के ठाकुर को पूछा मैं अभी भी सबके हाथ का खाना नहीं खा सकती अर्थात क्या कि यह ब्राह्मण उच्च परिवार के ब्राह्मण जो है उन लोगों को सबके हाथ का खाना नहीं खाना है ब्राह्मण के हाथ का पकाया हुआ ही ना खाएंगे तो अभी ठाकुर का जो उदाहरण था कि यह ब्राह्मण अब्राह्मण सब तरीके से तो आपको छूट जाना है तो जैसे ही लेडी डिवटी ने ऐसा कहा ठाकुर ने सामने कहा कि अरे सबके हाथ का खाना खाने से कोई आध्यात्मिक जीवन में कोई अपना उद्देश्य थोड़ी ना प्राप्त हो जाएगा साधन भजन करने से होगा तो वो आइडियल तो इस जगत में होने वाला नहीं है कुछ अपने से जो बन पड़ता है करके जगत को छोड़ दे मतलब मेंटली उसके बारे में टेंशन लेना छोड़ दे और ये आपने बिल्कुल ठीक कहा कि अपना कर्म तो आपको करना पड़ेगा यदि हम उसके प्रति जैसे कि मैंने उदाहरण दिया मैं जद उस महाराज को प्रणाम किए बिना जद निकल जाता ना तो मेरे मन में वो हमेशा के लिए बैठ जाता वो रे दुश्मन है करके किंतु जो दूसरे महाराज जिन्होंने मुझे सलाह दी कि नहीं तुम उनको प्रणाम करो बाद में जाओ तो मेरा अकाउंट ना उस महाराज के साथ में वहीं पर क्लोज हो गया मुझे बाद में कभी भी उनको लेकर के ऐसा टेंशन नहीं हुआ तो देखिए कि इतना अच्छा सलाह जो मुझे दिया उनके प्रति मैं हमेशा से एक शुक्र गुजार हूं कि हां महाराज मेरा एक अकाउंट आपने क्लोज करवा दिया बिना मतलब वो मेरे सर पर रहता साधु के प्रति ध् वेष बना रहे मन में यह तो ठीक नहीं है तो अपना अकाउंट क्लोज कर दीजिए जगत में फिर जगत का का जो होना है सो हो