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कामचोरी और ईर्ष्या - गुलाम भारत के दोष 20 Feb 2024

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स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः स्वामी जी का लेटर डिस्कस कर रहे हैं अपने गुरु भाइयों को लिखा है ब्रह्मानंद जी महाराज को 18955 में 185 में रामकृष्ण संघ स्थापना के पीछे में जो बेसिक आइडियाज है वह उन्होंने इस पत्र में कह दिए हैं और साथ-साथ में ही उनकी खुद की कार्य प्रणाली अमेरिका गए तो क्यों गए किस तरह से भारत में कार्य शुरुआत करना है वह सब कुछ वह इस पत्र में लिखते हैं और जिसको कहते हैं स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस इसमें एक नया टॉपिक जो आज स्वामी जी निकालते हैं स्वामी जी लिखते हैं कल तो हमने देखा कि किस तरह ते स्त्रियों के लिए मठ शुरू हो उसके लिए स्वामी जी राजा महाराज को कहते हैं कि तीन चार या 5 हजार रुपए तक भी जमीन जद मिल जाए तो उसको खरीद के रखो कोई दिक्कत नहीं अभी आज किंतु स्वामी जी एक बिल्कुल नया टॉपिक स्वामी जी कहते हैं आर देश जावा अनिश्चित मेरा भारत में वापस फिरना अनिश्चित है देशे जावा अर्थात कि देश में वापस आना अनि है शेखाने घोरा एखाने घोरा घोरा अर्थात की घूमना फिरना वहां पर भी घूमना फिरना है यहां पर भी घूमना फिरना है घूमना फिरना अर्थात की कष्ट करके कोई भी कार्य को संपन्न करना तब खाने पंडित संगो सेखाने मूर्ख संगो ही स्वर्ग नरक बेद यहां पर भी वहां पर भी मेहनत करनी है भारत में भी मेहनत करनी है अमेरिका में भी घूमते फिरते मेहनत करनी है किंतु स्वर्ग और नरक का भेद है क्या कि भारत में मुर्ख लोगों का संघ है और यहां पर अमेरिका में पंडित लोगों का संघ ए देशर लोके एटा हुए काज कोरे आर आमदर शकल काज बैरी गी यहां पर अर्थात की अमेरिका में लोग एकजुट होकर के काम कर सकते हैं जबकि वहां पर अर्थ अत की भारत में सब काम में वैराग्य अभी वैराग्य शब्द नहीं यूज करके बैरी गी अर्थात की एक क्या कहेंगे रोगेटरी जिस तरह से स्वामी जी इसका अर्थ करते हैं हिंसा प्रवृति मध्य पड़े चूरमा भारत का जितना भी काम है वह सब वैराग्य हिंसा अर्थात की ईर्षा वगैरे में पढ़कर के चूरमा अर्थात की सत्यानाश हो जाता है देखिए यहां पर स्वामी जी जिस तरह से भारत और अमेरिका को कंपेयर कर रहे हैं हम भारतीयों को थोड़ा सा कष्ट होगा किंतु यहां पर एक बात देखने की है सर्वप्रथम तो स्वामी जी जिस भारत की बात कर रहे हैं वह आज से 150 साल पुराना भारत है यह 1890 की बात है यह सब 1890 के डिकेड की यह बात है तो ऑफकोर्स आज का भारत तो कहीं डेवलप हो चुका है आज हमारे पास में इसरो है आज हमारे पास में आईआईटी है आईआईएम है आईआई एम्स है और क्या-क्या नहीं है आज जिस साइंस और टेक्नोलॉजी को स्वामी जी चाहते थे कि अमेरिका से हम भारत में लाए आज देखेंगे कि अमेरिका की सर्वश्रेष्ठ टेक्नोलॉजी कंपनीज है उसके सीईओ तो हमारे भारतीय है जैसे ग का सीईओ या तो फिर माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ तो आज का भारत उस भारत से बहुत ही डिफरेंट है बहुत ही भिन्न है इस बात को ध्यान में रख कर के एक बात मने स्वामी जी का अभी का यह जो कुछ चलेगा कि भारत के बारे में उनका जो एनालिसिस तो वह एनालिसिस करने के भीतर में हम डीप में जाएं थोड़ा सा डिटेल में एनालिसिस करें इससे पहले यह बात याद दो चीज याद रखने की जरूरत है एक जैसे कि कि उस समय का भारत और आज का भारत बहुत डिफरेंट है उस समय के भारत में स्वामी जी भारत और अमेरिका और जो विश्व था स्वामी जी का प्लान था कि अमेरिका से साइंस को भारत में लाएंगे और भारत में से स्पिरिचुअलिटी योगा वगैरह को अमेरिका ले जाएंगे आज इसका बिल्कुल रिवर्स हो गया है भारत के जो टेक्नोलॉजी इंजीनियर्स वगैरह अमेरिका एक्सपोर्ट होते हैं और अमेरिका में योगा वगैरह जो है यह इंटरनेशनल योगा डे वो तो अमेरिका का था वो हमने उठा लिया है अभी आज का फ्लो रिवर्स हो गया है तो यह एक चीज दूसरा की राष्ट्र प्रेम की बात आती है तो स्वामी जी जैसा और कोई नहीं हम लोग भले ही चाहे अपने को कितना ही पैट्रियोट करके बुलाते हो किंतु पैट्रियोटिज्म या तो कोई भी चीज के प्रति प्रेम सिर्फ शब्दों से व्यक्त करने से तो ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता यदि हम उसके लिए कष्ट करें उसके लिए परिश्रम करें तब कहीं जाकर के पता चलता है कि उस चीज के लिए हमारा प्रेम या तो फिर हमारी चाहना कितनी गहन है यदि कोई इंजीनियर होना चाहता है जद बोलता है कि हा मुझे इंजीनियर होना है वो बोलता ही रहेगा और दूसरा आदमी है कि दूसरा स्टूडेंट लड़का है कि दिन प्रतिदिन स्टडी करके अच्छे से मार्क्स लाकर के आईआईटी इस में एडमिशन लेगा यानी कि शब्दों से बोलना और परिश्रम करके साधित करना यह दोनों में फर्क है हमारा पैट्रियोटिज्म बहुत समय तक तो शब्दों तक ही सीमित है जबकि स्वामी जी का पैट्रियोटिज्म परिश्रम के लेवल तक गया था जीवन संपूर्ण स्वामी जी ने दान कर दिया था तो यह दो चीज को ख्याल में रख कर के फिर स्वामी जी के हृदय की जो एक क्या कहेंगे भड़ास है या तो फिर स्वामी जी के हृदय का जो दर्द है वह हमारी नजर के सामने आ जाता है स्वामी जी चाहते हैं कि भारत की उन्नति हो स्वामी जी चाहते हैं कि भारत में लोग ऑर्गेनाइज्ड होकर के काम करें किंतु जब उनकी अभी ऐसा नहीं है कि स्वामी जी की प्रेरणा से चेन्नई है या कोलकाता है यह दो अपने जो फर्स्ट प्राइमरी सेंटर्स थे भारत में वहां पर काम चालू नहीं हुआ था हुआ था प्रॉब्लम क्या है कि स्वामी जी का जो विजन था व इतना लॉन्ग टर्म था कि उतना इतना रेपिडली यह लोग बेचारे काम नहीं कर पा रहे थे इसलिए स्वामी जी थोड़े से बीच-बीच में निराश हो जाते थे और इस तरह से अपना दर्द व्यक्त करते थे जैसे कि एक मां अपने बच्चे के ऊपर में नाराज होकर के कहती है तो अरे यह तो महामूर्ख है किसी काम का नहीं है हालांकि मां के हृदय में बच्चे के प्रति प्रेम है और बच्चा भी मां को जितना हो सके मां की इच्छा के अनुसार स्टडी वगैरह करता ही होगा किंतु मां की एंबिशन होती है ना बहुत बड़ी एंबिशन होती है मेरे बच्चे के लिए मैंने यह राणा प्रताप है ना कि यह आईआईटी का कोई एंजी है ऐसा कोई बड़ा हो जाए ऐसी एक बड़ी एंबिशन होती है तो बच्चा यदि उसके साथ में कदम मिला कर के नहीं चल सकता तो मां का दुख चलाता है तो ऐसा ही स्वामी जी का इस तरह से दुख था ऐसा नहीं कि भारत में कुछ नहीं था किंतु स्वामी जी की जो अपेक्षा थी इतनी पावरफुल थी इतनी स्ट्रांग थी कि स्वामी जी के डिसाइल उस अपेक्षा के अनुसार कार्य नहीं कर पाते थे बोल कर के स्वामी जी कभी-कभी नाराज हो जाते थे तो इस परिप्रेक्ष्य में यह बात अभी प्रारंभ होती है कोई कोई स्वामी जी को कहते थे मैंने इवन गांधी जी को पढ़ा है गांधी जी का एक रेमसंस है यरवा जेल में तो गांधी जी उस समय स्वामी जी को पढ़ रहे थे तो किसी ने उनको पूछा कि स्वामी जी के बारे में आपका क्या मत है तो गांधी जी ने कहा कि वो जो कुछ करना चाहते थे तो उस वो सब उन्होंने भारत में ही किया होता तो बहुत अच्छा रहता अमेरिका जाकर के क्यों अपनी एनर्जी वेस्ट की अमेरिका तो इतना धनी देश है वहां के लोगों को धर्म आध्यात्म की क्या जरूरत है भारत में ही सब रह कर के गरीबों के लिए कार्य करते तो बहुत अच्छा रहता ऐसा गांधी जी कहते हैं तो गांधी जी का यहां पर मेरा खुद का जो ओपिनियन है कि यहां पर शॉर्ट साइटेडनेस है पहली बात तो गांधी जी को खुद को लंडन में जाकर के साउथ अफ्रीका जाकर के बहुत सारा एक्सपीरियंस और ट्रेनिंग लिया तब कहीं जाकर के भारत में वह सक्सेसफुल सत्याग्रही के रूप में वो आए थे तो वो तो गांधी जी का खुद का ट्रेनिंग बिना लंडन या बिना साउथ अफ्रीका गए सक्सेसफुल नहीं होता दूसरी बात कि स्वामी जी के पास में जो रॉ मटेरियल था वो बहुत ही मिनिमम था कौन स्वामी जी की बात सुन करर के काम करेगा ये एक जो भीतर में एक प्रचंड देश प्रेम की अग्नि जो प्रज्वलित होनी चाहिए वो अग्नि तो बुझ गई थी माने प्राय देश तो संपूर्ण रूप से निरुत्तर के स्वामी जी अमेरिका जाकर के सक्सेसफुल हुए तो पहली बार भारतीयों को ऐसा लगा कि हां हम लोगों में ऐसा भी तो कोई एक है जो कि इन लोगों की जो सर्वोच्च सत्ता है पश्चिमी देशों की सर्वोच्च सत्ता अमेरिका वहां जाकर के हिंदू धर्म का वेदांत का विजय पता का लहरा सकता है ऐसा एक बार खुमार गर्व एक अभिमान अहंकार जागृत हुआ तब कहीं तो जाकर के फिर यह देश प्रेम के बारे में बात करने की शुरुआत होगी वरना वो भी मूर्ख यह भी मूर्ख ये केशव सेन जैसे लोग अमेरिका ब्रिटेन अमेरिका तो नहीं किंतु ब्रिटेन जाकर के इंडिया की भारत की निंदा करके ही वे लोग वहां पे ख्यात नाम होते थे तो भारतीय लोग किसको अपने लीडर के रूप में अपने नेता के रूप में स्वीकृत करें यह तो एक है सही सही एक नेता जो कि विदेश में जाकर के भारत के गुणगान गाकर के उनको उनके मुंह पे उनकी कमियां कमजोरियां उनकी जो प्रॉब्लम्स है उनके मुंह पे उनको बता देना कि अमेरिकन लोगों को कहना कि तुम लोग यह नश्वर वाद में इतने डूब गए हो भौतिकवाद में भौतिकता के इस जीवन में इतना डूब गए हो कि तुम लोगों को यदि योग वेदांत में आगे जाना है तो त्याग तपस्या मय जीवन जीना होगा वहां पर उन लोगों के मुंह पर यह सब बोल देना कितनी कठिन चीज है बाकी ये लोग बाकी सब जाते थे तो कहते थे हरे हम लोग गरीब है हम लोग भिखारी है हमको पैसा दीजिए आप लोग कितने धनी है आप लोग कितने अच्छे हैं माने जाकर के उनकी प्रशंसा करेंगे हमारे देश की निंदा करेंगे तो ऐसा एक जो एक था पूरा प्रवाह उसमें स्वामी जी प्रवाह के विरुद्ध में चल रहे थे पूरे देश को जागृत करना था और देश उनकी इच्छा के अनुसार इतना रेपिडली जागृत नहीं हो रहा था बोलकर के स्वामी जी के हृदय का यह दुख इस तरह के स्टेटमेंट्स के द्वारा हमारी नजर के सामने आ जाता है क्या कहते हैं स्वामी जी हम यदि कोई पूछता है यसे गांधी जी जैसे कोई लोग कहेंगे कि आप भारत में वापस आ जाइए यदि आपको कुछ अच्छा कार्य ही करना है तो भारत में कीजिए यहां पर अमेरिका में आप क्या कर रहे हैं तो स्वामी जी रिप्लाई में कहते हैं मेरा देश में वापस आना अनिश्चित है वहां पर भी घूरना है यहां पर भी चारों ओर फरते घूमते घूमते मुझे कार्य करना है अमेरिका में भी भारत में भी किंतु स्वर्ग और नर्क का भेद है क्या है वहां पर मर्ख लोगों का संघ है यहां पे पंडित लोगों का संघ अर्थात कि वहां पे स्वामी जी का जो एक एक्सपीरियंस था कि उनके जो एडवांस आइडियाज यहां पे भारत में दो तरह के मने एक उस समय का जो मिडल क्लास था दो तरह के जो एक डिवीजन देखने को मिलते थे एक लोग की एक तरह के थे कि बहुत ही ज्यादा ऑर्थोडॉक्स स्वामी जी जो भी कहेंगे कहेंगे कि अरे यह तो हिंदू धर्म का भाग ही नहीं है हिंदू धर्म में तो यह काला पानी क्रॉस करके विदेश में जाना यह सब तो बड़ा ही गलत है स्वामी जी जब और यह शिव ज्ञान जीव सेवा अर्थात कि ये जो ये समाज जिस तरह से ना काष्ट ज्ञाती वगैरह में बट गया है तो सबको जितने भी लोअर कास्ट है जितने भी पद दलित है उन सबको हिंदू फोल्ड के भीतर में हिंदू समाज के भीतर में पुनः स्वीकृत कर देना वहीं से जाकर के नया भारत के गठन की शुरुआत होगी ऐसा नहीं होगा कि आपने ब्रिटिश लोगों से आजादी ले ली तो उसी से काम हो जाएगा हम सबसे पहले तो यह एनालाइज करो कि गुलाम क्यों हुए गुलाम हुए इसलिए कि जो यह नात जात ज्ञाती यह काष्ट यह सब में तो जो समाज बटा है अभी समाज बटा क्यों वो एक दूसरा क्वेश्चन है स्वामी जी का अपना ओपिनियन यह था कि यह विदेशी आक्रमण होने की वजह से यह हुआ है तो जो भी है बटा है समाज यह फैक्ट है तो जो बटा हुआ समाज को इकट्ठा करना ऑर्गेनाइज करना जो कि हिंदू धर्म के बाहर में जिनको कि फेंक दिया गया है उन सबको हिंदू धर्म के भीतर में इक्वल सिटीजन के रूप में स्वीकृत करना यह है सबसे पहला कदम आजादी की ओर का स्वतंत्रता की ओर का सर्वप्रथम कदम यह है दूसरा है कि विदेश में जाकर के किस तरह से यह लोग एडवांस हो रहे हैं वहां की इंडस्ट्रियल इजेशन की जो मेथड्स है उसको स्वीकार करके सीख करके भारत में लाकर के उसको भी यहां पर इंप्लीमेंट करना जैसे कि जमशेद जी टाटा जैसे कि यह शरद चंद्र चक्रवर्ती दोनों को स्वामी जी ये एडवाइस देते हैं जमशेद जी टाटा को कहते हैं कि यह कोई इंड कॉलेज या तो फिर यह यूनिवर्सिटी होनी चाहिए जिससे कि यह लोग आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर सके और बाद अपने लेटर्स में भी वह लिखते हैं कि यह देखो यह मर्चेंडाइज जो है यह ब्रिटिश लोगों का क्या था कि परचेस फ्रॉम द चीपेस्ट मार्केट एंड सेल इन द डियट मार्केट अर्थात कि जहां पे जो चीज आपको सस्ती मिलती है वहां से वह ले लो और वही चीज को जहां पर सबसे ज्यादा महंगाई उसकी कीमत होती है ज्यादा वहां पर उसको बेचो जैसे कि सिल्क या स्पाइस या तो फिर मसाला ये स्पाइस यह जो स्पाइस आइलैंड है साउथ ईस्ट एशिया के वहां पर सबसे सस्ते मिलते हैं तो वहां से खरीदो और यूरोप में सबसे महंगे बिकते हैं तो यूरोप में जाकर के बेचो यह मर्चेंडाइज नहीं अभी आज का युग है मैन्युफैक्चरिंग का इंडस्ट्रियल इजेशन का तो स्वामी जी ये इसको भी सलाह देते हैं शरद चंद्र चक्रवर्ती को यह जमशेद जी टाटा को पत्रों में भी लिखते हैं कि इंडस्ट्रियल इजेशन को अपनाओ और यह साइंस टेक्नोलॉजी डेवलप करने के लिए सेंटर्स फॉर हायर लर्निंग ये यूनिवर्सिटीज वगैरह स्टार्ट करो वहां पे कार्टेक काटे का नाम आजकल बहुत सारा मने बड़ा ही फेमस एक यूनिवर्सिटी है अमेरिका की कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी तो आज मैंने बहुत सारे नोबेल प्राइज विनर्स वहां से आए हैं तो क्या है कि जब सबसे पहली बार वह स्थापना हुई थी वो स्वामी जी जब वहां पे थे तो उस समय स्वामी जी वो यूनिवर्सिटी देखने को गए थे आज हमको यह सब देख कर के सुनक के आश्चर्य होता है किंतु स्वामी जी का यह क्यूरियोसिटी था कि सबसे एडवांस यूनिवर्सिटीज सायंस की दृष्टि से इंडस्ट्रियल इजेशन की दृष्टि से कौन सी है कहां पर सबसे ज्यादा टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन हो रहा है इस तरह की यूनिवर्सिटीज का लिस्ट बनाया जाए आज तो कार्टेक टॉप फाइव में आएगा तो वही कार्टेक कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी देखने के लिए स्वामी जी वहां पर गए थे उस उस समय उसका और कुछ नाम था किसी जिस व्यक्ति ने उसकी स्थापना की थी उस व्यक्ति के नाम से था पीछे में इंस्टिट्यूट ऐसा कुछ था तो वो स्वामी जी देखने को गए थे और वो बड़े ही प्रभावित हो गए थे तो दिस वाज स्वामी जी आइडिया कि भारत में वो यह सब करना चाहते थे किंतु एक तो एक रूढ़ जुस्त लोगों का एक ऐसा प्रभाव था कि अपनी लड़कियों को स्कूल में पढ़ाई के लिए नहीं भेजेंगे य निवेदिता स्कूल स्टार्ट हुई तब उस समय बलराम भवन में एक मीटिंग हुई हुई थी तो निवेदिता स्वामी जी ने निवेदिता को कहा कि तुम अपनी स्कूल के बारे में प्रेजेंटेशन करो तो निवेदिता तो बड़ी खुश होकर के बड़े ही उत्साह से जो ठाकुर के जो भक्त वहां पर इकट्ठा हुए थे उनको बता रही है कि इस तरह से मैं गर्ल स्कूल प्रारंभ कर रही हूं वहां पर उनको सिलाई है फिर यह थोड़ा सा लैंग्वेजेस है वगैरह सब कुछ उनको प्रैक्टिकल भी सिखाएंगे और एकेडमिक जो सब्जेक्ट है वो भी सिखाएंगे माने ऐसा नहीं कि एकेडमिक शिक्षा दे दी तो फिर उसका कोई प्रैक्टिकल इ एप्लीकेशन नहीं है दोनों एकेडमिक एज वेल एज प्रैक्टिकल ट्रेनिंग उनको दी जाएगी और साथ-साथ में ही वैल्यूज एजुकेशन जो आजकल बहुत चला है तो उस समय वो जो चरित्र निर्माण वगैरह ठाकुर महा स्वामी जी के आध्यात्मिक आदर्श माने तीन चीजें सिखाई जाएगी एक तो एकेडमिक ट्रेनिंग दूसरा है प्रैक्टिकल ट्रेनिंग तीसरा है वैल्यूज एजुकेशन तो निवेदिता बड़े ही उत्साह से ये प्रेजेंटेशन देती है फिर जब प्रेजेंटेशन समाप्त हुआ तो देखा कि कोई कुछ बोल नहीं रहा है क्योंकि ये कलकाता का जो समाज था कौन चाहेगा कि अपनी लड़की को इस तरह से कहीं पर भेजे और यह तो फिर विदेश नहीं फिर वहां पर जाएगी अपनी लड़की तो जात जाएगी उसके साथ में शादी कौन करेगा छोटी उम्र में जिस तरह से मां के साथ में हुआ था हालांकि मां का केस अलग है किंतु वो जो प्रथा थी बाल्य विवाह की कि पांच 10 साल की उम्र में शादी करवा दो तो यह सब करने से निवेदिता स्कूल में भेजने से तो कैसे काम चलेगा तो कोई कुछ बोल नहीं रहा है उस समय स्वामी जी निवेदिता को पता नहीं था छुपके से स्वामी जी आकर के पीछे में बैठ गए थे भक्तों के साथ में और फिर ज जैसे ही निवता का वक्तव्य समाप्त हुआ प्रेजेंटेशन और स्वामी जी ने देखा कि कोई कुछ नहीं बोल रहा है तो फिर वोह बाकी जो एक दो लोग आसपास में बैठे थे उनको वो एकदम एकदम एकदम इशारा करके बोल रहे हैं कि जाओ तुम बोलो खड़े होकर के कि हां निवेदिता हम लोग अपने अपनी बच्चियों को आपके स्कूल में भेजेंगे ऐसा करके स्वामी जी उनको मैंने यह कर रहे इनकरेज कर रहे जाओ तुम बोलो तुम बोलो तुम बोलो ऐसा ऐसे ही जब ऐसा देखा ना कि वहां पर पीछे में कुछ आवाज हो रही है कोई शब्द हो रहा है तो निवेदिता ने जैसे ही देखा कि स्वामी जी सब भक्तों को इनकरेज कर रहे है तो बड़ी खुश हो गई और बच्चे की तरह तालियां मार रहे वो माने वो ऐसा ताली मारते मारते वो वहां पर घूमने लगी तो क्या है कि निवेदिता को स्कूल स्टार्ट करना बहुत ही शुरू में तकलीफ हुई थी बहुत कम लोग अपनी बच्ची भेजते थे अपनी लड़कियों को भेजते थे और डोनेशन भी नहीं मिलता था अर्थात कि स्वामी जी का जो आइडियाज थे वहां प इंप्लीमेंट करने में एक तो एक रूढ़ चुस्त ता उसमें एक बहुत बड़ी बाधा थी दूसरा एक वर्ग था ये लोग अल्ट्रा मॉडर्न कहो या कि अल्ट्रा वेस्टर्नाइज्ड यह हिंदू साधक है पंडित है ब्राह्मण है सब वो गोंडा बंगाली शब्द है गोंडा अर्थात की फेनेटिक यह सब लोग फेनेटिक है इन लोगों के पास में से किसी भी तरह की अच्छी अपेक्षा हम लोग नहीं कर सकते तो चलो हिंदू धर्म को ही त्याग कर दो और या तो फिर क्रिश्चियनिटी अपना लो या तो फिर यह नियो सब ट्रेडिशनल कल्चर स्टार्ट हुए थे ब्राह्मण समाज है आर्य समाज है थियोसोफिकल सोसाइटी है वहां पर जाकर के जवाइन कर लो अर्थात कि हिंदू समाज के साथ में कुछ अच्छा होने ही नहीं वाला है इतना वोह करप्शन में डूब गया है इतना वो ये कास्ट ना उसमें बट गया है कि उसका अभी कोई फ्यूचर नहीं है तो ऐसे लोग फिर स्वामी जी का विरोध करते थे यह क्रिश्चियन मिशनरियों के साथ में मिलकर के तो स्वामी जी जब कोई भी ऐसी अपेक्षा करेगा कि आप किसी के लिए कोई अच्छा काम करेंगे तो आप चाहे ग्रेट मान लीजिए कि मैं निष्काम भाव से कर रहा हूं मुझे ग्रेट ूडल में नहीं चाहिए किंतु एटलीस्ट हम लोग ऐसी तो अपेक्षा करेंगे कि सब लोग इकट्ठा होकर फिर मुझे ही गाली देना ना शुरू कर दे कि हम लोग जिस तरह सा है बहुत ही अच्छे हैं बड़े मजे में है आपको आकर के हमको डेवलप करने की कोई जरूरत नहीं है और सब ऐसा तो ना हो कि मने लोग इकट्ठा हो के मुझे गाली देना शुरू कर दे तो स्वामी जी के साथ में ऐसा हुआ था यहां पे एक रूढ़ी चुस्त लोगों का एक दल था जो कि स्वामी जी को क्रिटिसाइज कर रहा था यहां पर एक अल्ट्रा वेस्टर्न लोगों का एक दल था जो कि यह ब्राह्मण समाज जैसी मूवमेंट रिफॉर्म मूवमेंट्स के साथ में जुड़कर के या तो फिर क्रिश्चियन होकर के आउट राइट क्रिश्चियन होकर के उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था तो यह दोनों दल स्वामी जी का विरोध कर रहे थे इसीलिए स्वामी जी यहां पर कहते हैं मेहनत तो मुझे भारत में भी करनी है मेहनत तो मुझे अमेरिका में भी करनी है किंतु इस दोनों में स्वर्ग और नर्क का भेद है भारत में मूर्खों का संग है अर्थात कि मूर्खों के साथ में काम करना है यहां पर पंडितों का संघ अर्थात कि विद्वान लोगों के साथ में काम करना है देखिए आज हम लोग एक थोड़ा सा इमेजिन करके देख लीजिए स्वामी जी इज एन कंपलीटली अननोन पर्सन उनको कोई पहचानता नहीं था बिल्कुल वह पहने हुए कपड़े लेकर के वह वहां पर गए थे और जैसे ही गए वहां पर देखा कि मिसेस हेल उन्होंने देखा कि अरे एक यंग लड़का यहां पर ठंडी में पड़ा हुआ है रास्ते प तो उसको उनके हृदय में दया आई और अपने घर में ले आए घर में तीन चार जवान लड़कियां है अभी अब ऐसा कौन होगा कौन सा ऐसा परिवार होगा जिसमें परिवार में चार जवान लड़कियां है और एक अनजाने मर्द को एक अनजाने पुरुष को अपने घर में आमंत्रण करके अपने घर में उनको आश्रय देता है ऐसा कौन सा परिवार होगा किंतु देखिए किय लार्ज हार्टेड बस अमेरिका के कुछ परिवार में तो थी ऐसा नहीं है कि सभी परिवार ऐसे होते हैं किंतु कुछ-कुछ परिवार तो ऐसे थे जहां पर जैसे कि ईश्वर स्वयं निवास कर रहे हैं जहां-जहां पर भी स्वामी जी जाते हैं बिल्कुल अनजाने भारत से गए हैं पुरुष है किंतु जहां पर स्त्रियां है वही उनको सबसे ज्यादा आकार देती है वही जता सबसे ज्यादा उनको वेलकम करती है उन के मने हम सोच भी नहीं सकते कि इस तरह से विदेश के कोई देश में स्वामी जी को इस तरह से आमंत्रण य उनको फिर इस तरह से वेलकम मिल सकता है तो वहां पर और सिर्फ यह नहीं कि वो उनको वेलकम करते हैं यह जो के जो डॉक्टर बेरोज थे या तो फिर हेनरी राइट थे जिन लोगों ने स्वामी जी की टैलेंट को पहचाना और स्वामी जी की टैलेंट को प्रमोट करना स्टार्ट किया ये जो डॉक्टर हेन राइट य ये जो देखिए कि स्वामी जी के लिए वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में जाने के लिए उनके लिए इंट्रोडक्शन लिख देते हैं तो क्या लिखते हैं उस इंट्रोडक्शन में टू आस्क स्वामी हिज क्रेडेंशियल इज लाइक आस्किंग द आस्क स्वामी हिज राइट टू स्पीक इन द वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन इज लाइक आस्किंग द सन हिज क्रेडेंशियल टू शाइन स्वामी जी को वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में बोलने के लिए योग्य ता क्या है यह पूछना ऐसा पूछने के बराबर है कि सूर्य प्रकाशमान हो रहा है तो किस योग्यता से प्रकाशित हो रहा है मैंने पोएटिक एक मैंने वहां के न्यूजपेपर्स देखिए जहां पर भी जाएंगे हावर्ड में गए थे हावर्ड इज वन ऑफ द ग्रेटेस्ट यूनिवर्सिटीज इन द वर्ल्ड आज उसका स्टैंडर्ड थोड़ा सा गड़बड़ हो गया है किंतु फिर भी एकेडमिक दृष्टि से देखें तो इट इज स्टिल वन ऑफ द बेस्ट यूनिवर्सिटीज तो इस हावड में स्वामी जी को इंडिया इंडोलॉजी का चेयर ऑफर किया गया था यह संस्कृत स्टडीज का चेयर ऑफर किया गया था माने ये लोग समझते हैं कि स्वामी जी की वैल्यू क्या है स्वामी जी भारत में घूम रहे थे ये गुजरात राजस्थान वहीं पर उनको बात-बात में कहा गया कि स्वामी जी आपकी जो टैलेंट है उसका रियल रिकॉग्निशन पश्चिमी देशों में ही होगा यहां पर नहीं होगा आप वहां पर जाइए और वहां पर जो आप काम करेंगे उसका जो इंपैक्ट है ट पैक्ट विल मल्टीप्लाई 100 टाइम्स इन इंडिया भारत में आप जितना भी काम करेंगे ना तो लोग आपको वैसे ही तुच्छ ता चल्य कर देंगे किंतु विदेश में यदि आप सफलता प्राप्त करते हैं सक्सेसफुल होते हैं तो हम लोग विदेश की सभ्यता से इतने प्रभावित हो गए हैं कि जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि एक बार गांव में कहीं पर भोजन समारोह हुआ तो क्या होता है कि सबसे पहले तो यह जमींदार है धनी व्यक्ति है है उनको पहले खाना खिला दिया गया और उसके बाद में यह जो किसान वगैरह लेबरर वगैरह जो है उनको आहार के लिए बिठाया गया तोब अभी ज ये किसान लोग बैठे हैं खाना खाने के लिए तो किसी ने आचार दिया तो ये लोग बोल रहे हैं कि अरे यह क्या है आचार किस चीज का नाम है या तो फिर किस तरह का यह होता है तो जो परोस रहा था उसने कहा कि अरे यह तो जमींदार लोगों ने भी इसको खाया है तो किसान लोग बड़े ही खुश हो गए अच्छा तो जमींदार ने इसको खाया है तो हमको भी दे दो अर्थात कि माने बड़े लोग जब इसको स्वीकृत करते हैं तो निश्चय उसमें कुछ तो सार होना ही चाहिए तो वैसे ही जब अमेरिका वासी और ब्रिटेन वासी इनकी स्वामी जी की प्रशंसा करते हैं उनके बारे में अच्छी बातें करते हैं मतलब स्वामी जी में कुछ तो अच्छा होना ही चाहिए भले ही चाहे मुझे कुछ समझ में आए ना आए किंतु स्वामी जी अच्छे हैं ही इज बेटर देन द मोस्ट तो अमेरिका में या तो ब्रिटेन में जो कार्य होगा इसका 100 टाइम्स इंपैक्ट भारत में होगा यह बात स्वामी जी को वहां पर बताई गई थी और स्वामी जी ने इसको अनुभव भी किया अनुभूति भी हुई कि वहां पे कोई भी आप अच्छी बात करेंगे मैंने स्वामी जी कहते हैं कि भारत में यहां पे कोई कोई लोग आते हैं ना तो कोई कोई लोग आकर के इस तरह से लोगों को प्रभावित करने का या तो पैसा बटोरने का प्रयास करते हैं भारत की निंदा करके कि अरे भारत में तो विधवा विवाह नहीं होता बचपन में बाल्य विवाह हो चाइल्ड मैरिज होता है व विडो मैरिज नहीं होता रीमैरिज नहीं होता ऐसा करके कुप्रथा एं इतनी इतनी है और इसका गुणगान करके माने उसको प्रचार करते-करते वे लोग पैसा बटो रेंगे कि भारत को रिफॉर्म करना है हमको पैसा दीजिए स्वामी जी कहते हैं कि किंतु देखिए कि अभी ये अमेरिकन लोग चालाक हो गए हैं भारत में चाइल्ड मैरिज होता है वडियो रीमैरिज नहीं होता ऐसी बात सुन कर के किंतु यह लोग आपको पैसा नहीं देने वाले हैं इनको कुछ सॉलिड चाहिए और ये सॉलिड है योग और वेदांत तो यह योग और वेदांत देकर के उन लोगों की प्रशंसा अर्जित करके बड़े-बड़े डोनर्स को स्वामी जी ने प्रेरित किया था कि यह जो मठ की जमीन है वो खरीदने के लिए पैसा दे तो इस तरह से एक पूरा जगत परिवर्तन स्वामी जी ने अमेरिका में किया था इवन अमेरिकन लोगों की जो एक एटीट्यूड था ये जो किसी ने स्वामी जी को कहा था ना कि 10 साल पहले यदि आप यहां पर आए होते आप अच्छा है कि आप इस समय आए हैं 10 साल पहले यदि आए होते तो आपको अमेरिका के रास्तों में पत्थर मारते मारते आपको मार दिया गया होता तो मैंने अमेरिका का भी एक एक रूढ़ी चुस्त कहो ना कि एक फेनेटिकल कहो कि भारत या तो फिर ये ईस्टर्न कंट्रीज के प्रति एक तुच्छ ता छल का भाव था एक एक सुपीरियोर थी एक वाइट सुप्रीमस आज जिसको कहते हैं ना वो वाइट सुप्रीमस शब्द आजकल का है किंतु उस समय यह शब्द नहीं होता था किंतु वोह सुप्रीम मसी उनके भीतर में पूरी थी ये जो ट रेसस है ये क्रिश्चियन रेसेस है चच आर इन्हेरेंटली बेटर देन ईस्टर्न रेसेस ये एशियन रेसेस तो वो उस समय उन लोगों में था तो उसके ऊपर में आघात करके ये एशिया स्पेसिफिकली इंडिया का क्या महात्म है उनको सिखाना वो एक बहुत बड़ा प्रयास स्वामी जी ने किया तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं फिर यह तो एक हो गया कि कंपेरटिवली वहां पर कार्य करने से यहां पर कार्य करने से वहां का एटीट्यूड यहां का एटीट्यूड उस उसके बाद में स्वामी जी एक बहुत बड़ा स्टेटमेंट देते हैं क्या कहते हैं ए देशेर लोके इकट्ठा हुए काज करे अर्थात कि यहां के लोग अमेरिका के लोग इकट्ठा होकर के ऑर्गेनाइज्ड रूप में काम कर सकते हैं और आदे सकोल काज बैरी गी हिंसा प्रवृति म पड़े चूर मर यानी कि भारत का जितना भी कार्य है वहां पर आप बोलेंगे 10 लोगों को कार्य करो कर्म करो तो वैरी गी अर्थात की झूठ मुठ का वैराग्य और ईर्षा यह दोनों में गिर कर के संपूर्ण रूप से सत्यानाश हो जाता है दो चीज स्वामी जी ने कही है कि हमारे ड्रॉबैक्स क्या है एक तो वैराग्य यानी कि यह त्याग तपस्या रूपी वैराग्य नहीं यह तामसिक वैराग्य झुठ मुठ का वैराग्य कोई भी काम करने से बोलेंगे ठाकुर का एक है ना कि एक गुरु ने अपने शिष्य को कहा कि अरे मेरे लिए तमा मैं मेरे लिए वो जो वो गुरु तो वो हुक्का पीते हैं ना तो हुक्का सजा करके मेरे लिए ले आओ तो उसका शिष्य कहता है कि मैं क्या आपका हुक्का सजाने के लिए योग्य हूं नहीं हूं मैं तो इतना छोटा हूं इसलिए मुझे ये हुक्का नहीं सजाना है काम नहीं करना है इसके लिए वैराग्य या तो फिर ये झूठ मुठ की विनम्रता का बहाना करते हैं कि मैं कौन होता हूं यह सब करने वाला मैं तो इतना छोटा आदमी हूं मेरे में थोड़ी ना ये साहस है कि मैं इतना बड़ा काम कर पाऊंगा ऐसा करके यह झूठ मुठ का वैराग्य एक चीज और दूसरा ईर्षा ईर्षा एक ऐसी चीज है हम भारतीयों के भीतर में कि जो भी थोड़ा बहुत भी ऊपर आने का प्रयास करेगा अच्छा कार्य करने का प्रयास करेगा 10 लोग मिलकर के उसका कार्य नष्ट करने के लिए तैयार हो जाएंगे तो यह दो चीजों में पढ़कर कोई भी ऑर्गेनाइज कार्य अपना सक्सेसफुल नहीं होता ऐसा स्वामी जी का कहना था देखिए किंतु स्वामी जी भारत के बारे में इतना एक अपने हृदय का दर्द प्रगट तो करते हैं किंतु वही भारत में वापस आकर के उन्होंने रामकृष्ण संघ की स्थापना तो की ही किंतु साथ-साथ में ही यह पूरे भारत में यह देश प्रेम जिसको कहते हैं सही सही देशप्रेम ऐसा नहीं कि वह कांग्रेस उस समय क्या थी तो एक डिबेटिंग सोसाइटी थी एक तो एक ब्रिटिशर ने स्टार्ट किया था क्यों स्टार्ट किया था इंडियन नेशनल कांग्रेस को कि इन लोगों के भीतर में जो भी गुस्सा है वह गुस्सा हमारे सामने आकर के बात करके निकाल दे जैसे कि यह प्रेशर कुकर होता है ना उसमें विसल होती है तो जैसे ही भीतर का प्रेशर बढ़ जाता है तो विसल बचती है प्रेशर रिलीज हो जाता है तो ऐसा प्रेशर रिलीज कि बहुत ज्यादा नाराजगी होने से 1857 जैसा एक दूसरा रेवोल्यूशन ना स्टार्ट हो जाए इस इसके लिए एक डिबेटिंग एक टॉकिंग क्लब कि वहां पर सिर्फ बातें हो बातों-बातों में बहुत सारी बातें हो जाए कि ब्रिटिश लोगों को भगा दो हमको स्वराज्य दे दो वगैरह वगैरह बातें करके सब समाप्त हो जाए इसके लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की थी एक ब्रिटिशर ने की थी किंतु स्वामी जी ने हमको जिस तरह से सही सही देश प्रेम की आगुण ज्वाला हमारे हृदय में प्रकट दी तो वही कांग्रेस के भीतर में इंडियन नेशनल कांग्रेस के भीतर में इतने सब यंग इतने एनर्जेटिक लड़के सब इकट्ठा हुए कि जब गांधी जी अमे साउथ अफ्रीका से भारत वापस आए और इंडियन नेशनल कांग्रेस के लीडरशिप उन्होंने ली तब बहुत सारा कार्य हम कर पाए और सिर्फ कांग्रेस ही नहीं ये बंगाल के जितने रेवोल्यूशन थे पंजाब के जो रेवोल्यूशन थे साउथ इंडिया की जितनी भी रिफॉर्म मूवमेंट्स थी सभी प्रोविंस में अपनी अपनी रिफॉर्म मूवमेंट रेवोल्यूशन मूवमेंट स्टार्ट हो गई थी वो वो जो स्वामी जी ने जो एक स्पार्क डाला एक जो चिंगारी जो डाली वही चिंगारी डाल कर के ही यहां से यह आगुण यह स्वतंत्रता का आगुण यह स्टार्ट हो गया था तो इसीलिए यह भारत का पुनरुत्थान करने में स्वामी जी ने सहाय की किंतु वही था स्वामी जी का प्रॉब्लम कि वो जिस स्पीड से जिस गति से जितना रेपिडली यह पुनरुत्थान चाहते थे तो नहीं हो पा रहा था और जो ऐसे रूढ़ी चुस्त लोग या तो फिर ये अल्ट्रा वेस्टर्न लोग जो स्वामी जी का विरोध करते थे उससे स्वामी जी नाराज हो जाते थे और इस तरह के स्टेटमेंट देते थे कि यहां के अर्थात कि अमेरिका के लोग ऑर्गेनाइज होकर के काम कर रहे हैं कर सकते हैं किंतु भारत में कोई भी कार्य करने को बोलेंगे झूठ मुठ का वैराग्य दिखाएंगे और झूठ और एक दूसरे के प्रति ऐसी इर्षद दिखाएंगे कि हम कुछ अच्छा कार्य नहीं कर पाएंगे किंतु स्वामी जी ने ही आकर के हमारा यह जो चरित्र है उसमें संपूर्ण रूप से बदलाव ला लिया यह जो अपना चरित्र है उसको पूरा फंडामेंटली चेंज कर दिया इसीलिए आज का भारत देख कि कितने सारे वर्ल्ड क्लास ऑर्गेनाइजेशंस इस भारत में है कितने सारे अच्छे इंजीनियर साइंटिस्ट डॉक्टर्स टीचर्स सोल्जर स्टेटमेंट्स इसी भारत की मिट्टी में से प्रकट हो रहे हैं तो इसके पीछे जो आशीर्वाद सबसे पहला धक्का लगाने का कार्य स्वामी जी ने किया था बोलक के आज का भारत इतना सक्सेसफुल है तो आज यहीं तक कल फिर से शांति शांति शा हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु