Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 27 Jun 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन हम पाठ कर रहे हैं। उसमें भी हम देख रहे हैं कि ठाकुर की महासमाधि के बाद के दो महीने वराह नगर मठ प्रारंभ होने के पहले इस दो महीनों में जो सब डिस्कशन हुआ था गुरु भाइयों के बीच में किस तरह से संघ की रचना की जाए कि नहीं यहां तक कि यह जो बाद में जो रामकृष्ण संघ का जो एक मुख्य कार्य सरणी रही है कि धर्म प्रचार रामकृष्ण की श्री रामकृष्ण देव की वाणी उसका प्रचार एक और दूसरा है कि शिव ज्ञान जीव सेवा रामकृष्ण संघ के यदि दो मुख्य कार्य यदि हम गिने तो यह दो भविष्य में होने वाले थे तो यह भी भविष्य में हमको प्रारंभ करने हैं कि नहीं इसके बारे में भी उस समय मतभेद था या तो फिर इवन गुरु गुरु भाइयों में भी इसके बारे में कोई क्लेरिटी नहीं थी। तो यह सब हम देख रहे थे। इसी सिलसिले में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं कि मास्टर महाशय यहां पे यहां पर गंभीरानंद जी महाराज का जो स्वामी जी की बायोग्राफी है युगनायक विवेकानंद उसमें से एक पैसेज गंभीरानंद जी कोट करते हैं कथामृत में से। कथामृत में क्या है? धर्म प्रचारर कथा पढ़

विद्यासागर की कहानी: ईश्वर पर श्रद्धा या समाज सेवा?

लो। धर्म प्रचार की बात प्रारंभ हुई। यहां पर नरेंद्र और मास्टर महाशय इन दोनों के बीच में वार्तालाप चल रहा है। नर मास्टर नरेंद्र प्रति विद्यासागर बोलेन आमी निजे ईश्वर विषय किु बुझी ना आ पोरके की लेक्चर देवो मास्टर महाशय नरेंद्र को कहते हैं कि मैं खुद ईश्वर के बारे में कुछ समझता नहीं हूं तो फिर मैं दूसरों को क्या लेक्चर दूंगा यहां पर किस कॉन्टेक्स्ट में यह वार्तालाप हो रहा है कि देखिए कि एक ओर तो विद्यासागर दया के सागर है स्कूल प्रारंभ करके और बच्चों को इतनी शिक्षा दे रहे हैं। गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं। जब ठाकुर विद्यासागर को मिलने के लिए जाते हैं। उस समय मास्टर महाशय ने हमको कहा है कि ये विद्यासागर के टेबल पर बहुत सारे पत्र पड़े हुए हैं। तो ये पत्रों में क्या लिखा है? तो कोई एक स्टूडेंट विलायत माने उस समय का विलायत आज की लैंग्वेज में कहे तो ब्रिटेन। वो ब्रिटेन पढ़ाई लिखाई करने के लिए गया है और यह विद्यासागर उसको स्टाइपेंड देते हैं। या तो फिर उसका जो भी खर्चा है वह दे रहे हैं। तो वह वहां से पत्र लिख के कहता है कि आप मुझे यहां पर रहने की व्यवस्था वगैरह के लिए मुझे और ज्यादा पैसा चाहिए तो आप मुझे मदद कीजिए। फिर एक टीचर विद्यासागर को लिखते हैं कि मेरी बहन अभी मेरे घर में रहने को आई है। वह विधवा हो गई है। तो मेरे परिवार जनों की संख्या बढ़ गई है। तो अभी आपको मेरा सैलरी बढ़ा देना होगा। वरना तो फिर मैं किस तरह से अपने परिवार का गुजरान करूंगा। तो इस तरह से कितने ही लोग विद्यासागर के पास में वो सहाय की अपेक्षा रखकर के जाते थे और विद्यासागर यह सब सहाय उनको पूरी भी करते थे। तो देखिए कि एक ओर वो एजुकेशन इंस्टीटशंस भी चला रहे हैं। दूसरी ओर उनका हृदय भी इतना विशाल है कि जिसको जो भी सहाय चाहिए वो दे देते हैं। यहीं पर वो मास्टर महाशय ये भी लिखते हैं कि विद्यासागर में मातृभक्ति भी कितनी थी। वो जो विद्यासागर के भाई का विवाह होने वाला था। उस समय मां ने विद्यासागर को कहा कि तुमको आना ही होगा। भले ही चाहे कितनी ही तकलीफ तुमको पड़े। हो सकता है कि वहां पर जाने का रास्ता दुर्गम हो। तो विद्यासागर पूरी रात वो नदी तैर करके पूरी रात चल के आखिर में अपनी मां के पास में उपस्थित हुए और कहा कि मां देखो मैं आ गया हूं। यानी कि स्वामी जी एक आदर्श साधक में जो गुण चाहते थे, एक आदर्श संगठ ऑर्गेनाइजेशन में जो गुण चाहते थे, वह सब विद्यासागर में थे। वो एजुकेशन इंस्टीटशंस भी चला रहे थे, हृदय भी विशाल था, मातृभक्ति भी थी। बस वही है कि वो ईश्वर के ऊपर में इनकी ज्यादा श्रद्धा नहीं थी। हालांकि वह जनेऊ पहनते थे, तिलक लगाते थे। फिर वो नारायण वो जो ओम नमो नारायण ऐसा कुछ लिखकर के वह पत्र की शुरुआत करते थे। तो क्या है कि ब्राह्मी शरीर है तो ब्राह्मी शरीर के अनुसार जो सब संस्कार विधि करना है वह सब वो करते थे। यह सब तो उनका था। किंतु यह जो ईश्वर में एक्चुअली विश्वास होना देखिए आज का जो युग का जो सबसे बड़ा प्रॉब्लम हमारे सामने क्या है कि हम लोग लिप सर्विस देते हैं धर्म को। बस वही है कि हृदय में से हमको विश्वास नहीं होता कि ईश्वर सही-सही में है। यह जो बहुत सारे लोगों को आप पूछेंगे कि धर्म की क्या आवश्यकता है समाज में तो यह लोग ऐसा कहेंगे कि धर्म जो है वह असामाजिक तत्वों के ऊपर में कंट्रोल करके रखते हैं। वो लोग यदि चोरी करेंगे, यह लोग झूठ बोलेंगे, हत्या करेंगे तो आप कितने पुलिसों को लगाएंगे यह सब रोकने के लिए क्रिमिनल एक्टिविटी को। बेटर है कि लोग इस तरह के एक भगवान में विश्वास करें जो भगवान कहते हो कि हां चलो तुम लोग झूठ बोलोगे हत्या करोगे लोगों का लोगों का ये शोषण करोगे तो तुमको इसका बुरे कर्म का बुरा फल मिलेगा तो इस जन्म में नहीं तो हो सकता है कि शायद अगले जन्म में आपको भुगतना पड़े तो ऐसा कुछ बोल कर के लोगों को वश में रखने के लिए सोशल कंट्रोल के लिए सोशल इंजीनियरिंग के लिए आपको धर्म चाहिए है किंतु यह कोई ईश्वर सही में है। वह विष्णु की जिस तरह से भगवान विष्णु की कल्पना की की गई है कि क्षिर सागर में वह जो शेषनाग की शैया में वो सोए हुए हैं। विराजमान है और मां लक्ष्मी उनके चरण तले बैठी हुई है। उनको म इस तरह उनके फिर उनकी नाभि में से वह कमल निकला है। उसमें फिर ब्रह्मा जी विराजमान है। तो इस तरह की कल्पना पे लोगों को विश्वास नहीं होता। क्यों? क्योंकि आज का जो मॉडर्न एस्ट्रोनॉमी है, मॉडर्न कॉस्मोलॉजी है, अभी यह जो लेटेस्ट एक टेलीिस्कोप हमने रिलीज किया है, वो वेर रूबिन वो जो है टेलीिस्कोप तो उसकी जो कुछ-कुछ इमेजेस मैं देख रहा था डिजिटल कैमरा उसका है। उसके भीतर में कितनी सुंदर-सुंदर सब इमेज है। हम कितना भूतकाल में देख सकते हैं। आजकल के साइंटिस्ट देखिए कि विश्व की रचना किस तरह से हुई। ये जो बिग बैंग थरी है किस तरह से ये जो मैटर और एनर्जी इवॉल्व हुए किस तरह से ये गैलेक्सी है किस तरह से सोलर सिस्टम है वो इवॉल्व हुई है किस तरह से ये ह्यूमन ये जो बॉडी है हमारा ये जो थ्यरी ऑफ इवोल्यूशन है कि एक कोषी जीव से सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म से मल्टीसेल्यूलर ऑर्गेनिज्म तक आए हैं। और उसके बाद में ये जो पूरा अप टू द ह्यूमैनिटी जो लेवल डेवलपमेंट हुआ है तो ये पूरा हमने इतना दूर भूतकाल में देखा है। हम इतना दूर भविष्य में देख सकते हैं। क्वांटम डायनेमिक्स है। फिर यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। यह सब जो इतनी कटिंग एज टेक्नोलॉजी डेवलप कर रहे हैं। कहां हमको तो कहीं पे क्षीर सागर का संधान नहीं मिला है। ना ही हमको यह शेषनाग देखने को मिला है। तो इसलिए क्या है कि मॉडर्न साइंस ने आज के जो जो बौद्धिक लोग हैं रैशन जो लोग हैं उनके मन के भीतर में एक तरह का संदेह प्रकट कर दिया है। तो यहां पे यह है विद्यासागर। विद्यासागर का एग्जैक्टली आज का जो मॉडर्न इंडियन है उस तरह उसके वो प्रोटोटाइप थे। आज का जो इवन नरेंद्र के वो एक पूर्ववर्ती प्रोटोटाइप जैसे थे। नरेंद्र को ठाकुर मिल गए तो ठाकुर ने नरेंद्र का कान पकड़ करके उसका ब्रेन वाश करके उसको सही डायरेक्शन में ले गए। किंतु विद्यासागर को ऐसा कोई ब्रेन वाश करने वाला मिला नहीं। तो उनके मन में यह सब संदेह रैशनलिटी का एक तरह का इनडाइजेशन उनके भीतर में रह गया था। तो यह है विद्यासागर का बैकग्राउंड। तो इसी बैकग्राउंड को लेकर के अभी मास्टर महाशय कहते हैं नरेंद्र को कि हालांकि विद्यासागर तो दया के सागर थे और यह जो शिव ज्ञान जीव सेवा शिव ज्ञान तो नहीं एटलीस्ट किंतु जीव सेवा तो वह अवश्य करते थे। इतना उनका गुण थे। किंतु वही विद्यासागर ऐसा कहते हैं कि जिस ईश्वर में मुझे विषय जिस ईश्वर के बारे में मुझे कुछ समझ में नहीं आता। उसको मैं दूसरों को किस तरह से लेक्चर दूं उसके बारे में और वो जो कथामृत में मास्टर महाशय यह भी एक चीज एक्स्ट्रा लिखते हैं कि मास्टर महाशय ने विद्यासागर को ईश्वर के बारे में पूछा था तो विद्यासागर ने कहा था कि देखो यह जो अपने शास्त्र में ऋषि मुनि जो कुछ कहने को गए हैं जो कुछ समझाने को गए हैं वे लोग ठीक ठीक से समझा नहीं पाए हैं। यानी कि शास्त्र में ही सब तरह का कंफ्यूजन है। तो नेचुरली कि जो लोग रामकृष्ण विचार सरणी से माहितगार नहीं है रामकृष्ण भावधारा के साथ में और डायरेक्ट स्क्रिप्चर पढ़ने को जाएंगे तो वे लोग तो कंफ्यूज हो ही जाएंगे यहां पर चैतन्य महाप्रभु है वो मधुर भाव की पराकाष्ठा और यहां पे अपने शंकराचार्य है वो त्याग की पराकाष्ठा तो वो कहां पे और फिर वहां पर भगवान बुद्ध है ना ही ईश्वर में मानते हैं ना ही भाव में मानते हैं ना ही आत्मन में मानते हैं तो फिर वो कौन सा किसको लेना ये तीनों तीनों ग्रेट है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। और उपलख दृष्टि से म सुपरफिशियली देखा जाए तो तीनों में बड़ा म ऑोजिट तीनों एक दूसरे के लगते हैं। वह भी हमको समझ में आता है। तो इसलिए यहां पर विद्यासागर ऐसा कहते थे मास्टर महाशय को कि जो ऋषि मुनि जो समझाने को गए हैं तो ऐसा लगता है कि वे हमको ठीक-ठीक समझा नहीं पाए हैं। तो इस बैकग्राउंड के साथ में मास्टर महाशय यह बात कहते हैं। तो नरेंद्र क्या उत्तर देता है जे एटा बुझे नहीं शेर पाटा बुझवे केन कोरे जिसको यह एक बात नहीं समझ में आती उसको यह बाकी की पांच चीजें कैसे समझ में आएगी क्या कहना चाहता है अच्छा मास्टर महाशय पूछ पूछते हैं आरपाष्टा की माने और पांच चीजें जो कि विद्यासागर को समझ में आ रही है वह कौन सी है तो नरेंद्र क्या कहता है ए जेठा बोझे नाई से दया परोपकार बुझले केन कोरे यह बात जिसको समझ में नहीं आती उसको दया और परोपकार कैसे समझ में आया? यह बात अर्थात कि ईश्वर तत्व विद्यासागर कहते हैं मुझे ईश्वर तत्व समझ में नहीं आता इसके लिए मैं उसके बारे में प्रवचन नहीं दूंगा। लोगों को उपदेश नहीं दूंगा। तो नरेंद्र कहता है कि जिसको ईश्वर तत्व समझ में नहीं आता उसको यह दया और परोपकार कैसे समझ में आया? क्योंकि देखिए कि हमारे हृदय में यदि दया है दूसरों के प्रति हमारे हृदय में दूसरों के प्रति एंपैथी है कंपैजन है दूसरों के प्रति करुणा है तो स निश्चय समझिए कि हमारे भीतर में आध्यात्मिकता जागृत हो चुकी है। वही बात है कि हम इस बात को आध्यात्मिकता के रूप में नहीं लेंगे। क्यों? अब जैसे खास करके अमेरिका में अमेरिका में जब स्वामी जी गए थे तो देखिए कि उस समय चर्च के प्रति एक बड़ा ही सीरियस केप्टिसिज्म था। क्यों? क्योंकि ये जो पिछले 1000 साल का खास करके ये डार्क एजेस प्रारंभ हुआ। तब से ये चर्च का हिस्ट्री जो है बड़ा ही इस तरह से चर्च ने देखिए चर्च का ऐसा है कि पहले 1000 साल में यूरोप को डेवलप करने में काफी सहाय की क्योंकि रोमन एंपायर जब ध्वंस हो गया रोमन एंपायर जब डिसइीग्रेट हो गया तो उस समय जो लॉ एंड ऑर्डर उसका जो यह फैला था केओस फैला था सिविलाइजेशन में उस समय ऐसा ही लगता था कि सिविलाइजेशन कोलैप्स हो जाएगी क्योंकि यह जो रोमन आखिरी आखिरी कुछ एंपरर थे। वो ऐसे पागल थे कि जैसे कि पूरी सिविलाइजेशन को खा जाएंगे। यहां पे युद्ध चल रहा है। वहां पे यह जो जर्मन जो है वे लोग अटैक कर रहे हैं। यहां से एशिया में से सब अटैक करने को आ रहे हैं। हूण वगैरह हुण वगैरह प्रजातियां। तो, यह चारों ओर से अटैक हो रहा है। भीतर में अनरेस्ट है। तो, उस समय यह चर्च ऑर्गेनाइजेशन है। उसने धीरे-धीरे करके ग्राउंड लेवल पे मामला अपने हाथ में लेना शुरू किया। और यह जो कॉन्स्टेंटाइन है, वह अपने को जब पहली बार होली रोमन एपरर के रूप में घोषित करता है। तब वो कहीं जाकर के एक स्टेबिलिटी जैसा आता है। तो, इनिशियल फेसेस में उसने बड़ा हेल्प किया यूरोप को सर्वाइव करने में। किंतु बाद में यूरोप में जैसे ही साइंटिफिक डेवलपमेंट होना शुरू हुआ तो यह साइंटिफिक डेवलपमेंट का गला घोटने को यह चर्च ने प्रयास किया। सबसे बड़ा फेमस उदाहरण है कि गैलीलियो को कहा कि तुम ये जो तुम्हारी थ्यरी है कि यह सोलर सिस्टम के केंद्र में सूर्य है, पृथ्वी नहीं इस थ्यरी को वापस लो वरना तो तुमको टॉर्चर करेंगे। तुम्हारा मर्डर कर देंगे। तो गैलीलियो को अपनी बात वापस लेनी पड़ी थी। तो उन्होंने साइंस और टेक्नोलॉजी को जैसे कि एक तरह से रुकावट डालने का प्रयास किया तो वह तो खैर वह भी एक इतिहास हो गया। उसके बाद में रेनेसा रिफॉर्मेशन और यह इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन वगैरह आया। यूरोप अमेरिका बड़े एडवांस हो गए। किंतु बाय द टाइम स्वामी जी अमेरिका जाते हैं तब तक अमेरिकन लोगों के मन में यह ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन है। उसके प्रति एक तरह का घृणा का भाव आ गया था। सभी के मन में नहीं। हमको पता है कि ये मिशनरी लोग किस तरह से लोगों को ठग करके उन लोगों का जो वीकनेस है उन लोगों की मोरल वीकनेस है उसका बेनिफिट उठा करके उसके उनके पास में से पैसा निकालते थे तो वो सब एक था किंतु जो जनरली थिंकिंग लोग थे जैसे कि निकोला टेस्ला जैसे कि फ्रांसिस फ्रांसिस लेगेट ये जो इंडस्ट्रियलिस्ट है ना साइंटिस्ट है उन लोगों को ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन में इतना इंटरेस्ट नहीं था तो स्वामी जी जब एक प्योर स्पिरिचुअलिटी की बात करते हैं तो बहुत सारे लोग स्वामी जी से अट्रैक्ट हुए थे। तो यह लोग क्या कहेंगे कि वी आर स्पिरिचुअल बट वी आर नॉट रिलीजियस। इस अर्थ में कि इंडिविजुअल हमारे भीतर में कोई एक डिवाइन एंटिटी है जिसको कि हम डिफाइन नहीं करना चाहते। डिफाइन जैसे ही करेंगे कि हां यह है हमारे भीतर में। विष्णु है ना कि शिव है ना कि मां दुर्गा है ना कि आत्मन है ना निर्वाण है। जैसा ही ऐसा बोलेंगे वैसे ही उस धर्म के भीतर में हमको चले जाना पड़ेगा। किंतु हम किसी भी तरह का नाम नहीं लेते हैं। हमारे भीतर में दिव्य तत्व है। इतना हम स्वीकार करते हैं। किंतु किसी भी चर्च में नहीं जाएंगे। किसी धर्म को ज्वाइन नहीं करेंगे। किसी ऑर्गेनाइजेशन का पार्ट नहीं होंगे। तो ये जो स्पिरिचुअल बट नॉट रिलीजियस। ये आजकल का ट्रेंड है वो उसी समय से चलता आ रहा है। तो यहां पे मास्टर महाशय जब विद्यासागर यह कहते हैं कि मुझे धर्म के बारे में ईश्वर के बारे में समझ नहीं आता तो उन्होंने वो फॉर्मल जो धर्म है वह समझ लिया। किंतु नरन का भविष्य के स्वामी विवेकानंद का जो इंसाइट है मनुष्य के हृदय के भीतर में वो इतना डीप था कि वो नरेंद्र समझ गया कि यदि देखिए कि अब जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि फूल यदि प्रस्फुटित होता है तो उसकी सुवास जो है उसकी जो सौरभ है वो चारों ओर फैलती है और फिर यह जो मधुमक्खियां है वो मधुपान करने के लिए अपने से आ जाती है। तो यह सौरभ का फैलना क्या है? यह सुवास क्या है? यह फोरम क्या है? यदि हमारे हृदय में ईश्वर तत्व या तो फिर डिनॉमिनेशनली यदि कहेंगे कि दिव्य तत्व प्रस्फुटित होता है तो उसकी सुवास क्या है? तो यह जो मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा, यह यम, यह नियम यह जो जितने भी सद्गुण है, वह सब धीरे-धीरे करके हमारे में प्रकट होना शुरू होंगे। भले ही चाहे हम कॉन्शियसली अपने को रिलीजियस ना कहें। भले ही चाहे हम लोग यह कहे कि मैं किसी भगवान में विश्वास नहीं करता। भले ही चाहे हम कहे कि यह जितने भी भगवान है, जितने भी मंदिर है, जितने भी साधु बाबा जी हैं उनका एक ही काम है मूर्ख लोगों को ठगना और उनके पैसे पढ़ाना। यह भले ही चाहे हम मुंह से कितना ही कह दें किंतु यदि मेरे हृदय में करुणा है तो समझ लीजिए कि मेरे हृदय में वो दिव्य तत्व प्रस्फुटित हो रहा है। भले ही चाहे मैं उसको एक्सेप्ट करूं ना करूं और इसका रिवर्स भी इतना ही सत्य है। लोग हजार दिखावा करें मंदिर में जाने का वो प्रणामी देने का साधु बाबा का वो जो भी है आप उनका यह करने का रिस्पेक्ट करने का तीर्थ यात्रा करने का जो भी बाह्य जगत में दिखाने के लिए धर्म के नाम पे जो करना होता है हजार चीजें करें किंतु इनका हृदय यदि संकुचित है वे लोग यदि नैरो माइंडेड है यह लोग यदि क्रूल है क्रूर है दूसरों के प्रति बिल्कुल सहानुभूति नहीं है तो मानिए कि वह आदमी सिर्फ दिखावा ही करता है। उसके हृदय में दिव्य तत्व प्रस्फुटित नहीं हुआ है। तो नरेंद्र को यह साइकोलॉजी बड़े अच्छे से पता थी। मास्टर महाशय वैसे तो थे एमए किए हुए वैसे तो थे टीचर वैसे तो थे कथामृत के लेखक किंतु नरेंद्र के सामने नरेंद्र की जो इंसाइट है उतनी इंसाइट उस समय एटलीस्ट उन्होंने नहीं डेवलप की थी। बाद में डेवलप की होगी। इसीलिए यह जो पैसेज है उन्होंने याद रख के रखा है। देखिए कभी-कभी हम लोग मैं जो सीखता हूं उसकी बार मैं किसी टीचर के पास में से कुछ सीखता हूं। अभी टीचर मुझे डांटेगा भी। टीचर कहेगा भी कि तुम जो सोच रहे हो वो गलत है। तो मैं वो बात कभी दूसरों को नहीं कहूंगा। मैं क्या कहूंगा कि मैंने एक बार सीख लिया उसके बाद में जो मैंने समझ लिया वो मैं आपके साथ में शेयर करूंगा। आज मैं आपको बता रहा हूं रामकृष्ण साहित्य के बारे में। मैं आपको यह नहीं बताऊंगा कि मैं जब खुद स्टडी कर रहा था तो मैं खुद किस तरह से संघर्ष कर रहा था। मैं खुद किस तरह के मिसकंसेप्शन लेकर घूम रहा था। बाद में ठाकुर की कृपा से या तो फिर किसी टीचर के आशीर्वाद से मैं सही रास्ते पर आया। ऐसा मैं नहीं कहूंगा। सीधा मेरा जो अल्टीमेट कंक्लूजन है आपके सामने रख दूंगा। आपको लगेगा अरे वाह महाराज इतने होशियार हैं, इतने इंटेलिजेंट है। किंतु मुझे जो स्ट्रगल करनी पड़ी है वो यदि मैं बताऊंगा तो ये फिर क्या है ना कि रहस्य खुल जाएगा। आपको लगेगा अच्छा अच्छा वो तो उनके पास टाइम है तो उन्होंने स्ट्रगल किया है तो वो समझ लिए हैं। मेरे पास टाइम होता मैं इस तरह के स्ट्रगल करता तो मैं भी समझ लेता। तो इस तरह से मेरा जो महत्व है वो बढ़ाने के लिए मैं आपको आपके सामने मेरी स्ट्रगल को छुपा के रखूंगा। किंतु मास्टर महाशय का ऐसा नहीं है। मास्टर महाशय का भविष्य का जीवन जिन्होंने भी देखा है, जिन्होंने भी पढ़ा है, देखिए कि सर्वांग संपूर्ण जीवन उनका था। और यही मास्टर महाशय जब नरेंद्र के पास में से कुछ नया सीखते हैं तो वह लिखने में शर्माते नहीं है कि जो मेरी अंडरस्टैंडिंग थी उससे नरेंद्र की अंडरस्टैंडिंग बेटर है और मैंने नरेंद्र के पास में यह सीखा। यह बताने में यह जो लज्जा घृणा भय वो जो मास्टर महाशय में थी ना वो एक जगह पर वहां पर वो गिरीश घोष कहता है ठाकुर को कि देखिए कि हम लोग तो सब हंसी मजाक कर रहे हैं किंतु मास्टर मुंह बंद करके चुपचाप बैठे हैं। तो फिर ठाकुर थोड़े से नाराज होकर के कहते हैं कि वह स्कूल में जाकर दांत बाहर करेगा। किंतु यहां पर चुप होकर के बैठेगा। दांत बाहर करना यानी ये इडियम है। अर्थात कि वहां पर मुंह खोल के बात करेगा। स्कूल में विद्यार्थियों के सामने किंतु यहां पर चुपचाप बैठा रहेगा। तो वो मास्टर महा माने ठाकुर को पता था कि मास्टर महाशय का ये टेंडेंसी है कि ये सोशल सेटिंग में बड़े ही संकुचित हो जाते हैं। बड़े ही लज्जित हो जाते हैं। तो मास्टर महाशय ने ठाकुर ने एक कथामृत में एक दूसरा भी प्रसंग है। सभी लोग कीर्तन कर रहे हैं। तो मास्टर महाशय चुपचाप साइड में खड़े हैं और ठाकुर वहां पर जाकर उसका हाथ खींच करके कीर्तन के दल में लेकर आए और कहा नाच साला तुम नाचोगे नहीं तो कैसे तुम्हारा यह जो भीतर का यह जो पड़ा हुआ है तुम्हारा लज्जा घृणा भय अष्टपाश ये जन्म जन्मांतर के संस्कार वो कटेंगे कैसे यदि तुम यह सोचोगे मैं मास्टर होकर के लोगों के सामने नाचूं हरि नाम से ताली बजाते बजाते कीर्तन करूं लोग क्या कहेंगे यह बात ठाकुर विजय कृष्ण गोस्वामी को कहते हैं मोस्ट प्रोबेबबली कि लोगों को कहने दो कि विजय कृष्ण गोस्वामी हरि महाराज हरि नाम से ताली लगाते लगाते वो हरि नाम कीर्तन कर रहा है। इस तरह का तो तुम्हारा जो भीतर में यह जो घमंड है मेरा एक स्टेटस वो स्टेटस को टूट जाने दो। तो क्या है कि यह सब ठाकुर और स्वामी जी की ये सब शिक्षा थी। तो यहां पर देखिए कि मास्टर महाशय का धर्म और अध्यात्म के बारे में एक धारणा है कि यदि आप प्रोफेस करते हैं, मैं मुंह से बोलता हूं कि मैं धार्मिक हूं, मैं मंदिर में जाता हूं, ठाकुर के पास आता हूं, पूजा करता हूं, तो मैं धार्मिक हूं। जबकि नरेंद्र कहता है कि धर्म को आप उसके गुणों से पहचानेंगे। नहीं कि वह आदमी अपने मुंह से जो बोल रहा है उससे यदि किसी के भीतर में आप सद्गुण की राशि सद्गुण देखेंगे तो फिर आप समझिए कि वह आध्यात्मिक है और यदि किसी के भीतर में आप दुर्गुण देखेंगे तो फिर समझ लीजिए कि मुंह से हजार बातें करता हो। यह आदमी अधार्मिक है। और स्वामी जी का दूसरा भी एक है वो धर्म और अधर्म को पहचाने पहचानने का। स्वामी जी के बहुत सारे क्राइटेरियास थे व्हिच आर वेरी अनकन्वेंशनल जो कि ट्रेडिशनल जो आध्यात्मिकता धर्म को समझे। स्वामी जी क्या कहते हैं? व्हाट मेक्स यू स्ट्रांग इज धर्म। व्हाट मेक्स यू वीक इज अधर्म। जो हमको स्ट्रांग बनाता है वो धर्म है। और हमको जो कमजोर बनाता है वो है अधर्म। तो यह सब स्वामी जी का साइकोलॉजी ऐसा था कि वो समझ लेते थे। इनसाइट उनकी एक होती थी कि हृदय कैसे किसका काम कर रहा है। माइंड कैसे कॉन्शियसनेस कैसे काम करती है। तो यहां पर इसलिए नरेंद्र कहता है कि जिसको यह ईश्वर तत्व समझ में नहीं आता या तो फिर जिसको आध्यात्मिकता समझ में नहीं आती वो बाकी की पांच चीजें कैसे समझा? यह दया है परोपकार है किस तरह से समझा स्कूल बुझले के मन कोे स्कूल स्कूल करे छले दे विद्यााते होवे आर संसारे प्रवेश करे बीए कोे छले मे बाप होवा ठीक एाईबा बुझले केमन करे अर्थात कि ये स्कूल चालू करनी है वो कैसे समझा उन्होंने स्कूल करके फिर बच्चों को विद्या सिखानी होगी और फिर संसार में प्रवेश करके विवाह करके फिर संतानों का बच्चे बच्चियों का बाप होना ठीक है। वो किस तरह से समझा? देखिए उस समय जैसा होता था कि यह अभी शादी कर ली है। छोटी उम्र अभी योगेंद्र महाराज का ही उदाहरण योगेंद्र महाराज को उनकी मां ने कहा शादी कर लो शादी कर लो तो ठीक है शादी कर ली। अभी वो परिवार की संभाल भी तो रखनी होगी। तो इधर-उधर नौकरी करने के लिए प्रयास किया। कहीं पर कुछ हुआ नहीं। तो उनकी मां बार-बार कह रही है अरे तुम नौकरी खोज लो। तुम्हारी बीवी है। तुम्हारे बच्चे होंगे। किस तरह से भरण पोषण करोगे? कितने दिन बाप के पैसों पर पड़े रहोगे? तो फिर वो वियोगिन महाराज कहते हैं देखिए मुझे तो नौकरी करने की कोई इच्छा नहीं थी। आपने झूठ-मूठ का मुझे जबरदस्ती करके वो मेरी शादी करवा दी। मुझे नहीं नौकरी करनी है। मुझे नई शादी करनी है। तो फिर मां कहती है कि अरे तुम्हारी इच्छा नहीं होती तो तुम शादी कैसे करते? तुम्हारी इच्छा है बोलकर के तुमने शादी की। अपनी वासना की पूर्ति के लिए शादी की। तो ये शादी की है तो उसके जो स्त्री है उसके प्रति कर्तव्य का पालन करने के लिए कष्ट करके नौकरी भी कर लो। अभी क्या है? तो देखिए कि अभी यह तो खैर एक योगेंद्र महाराज तो इतने आध्यात्मिक थे। अल्टीमेटली ठाकुर के पास आना था। किंतु इस तरह से उस समय ऐसा ही होता था। छोटी उम्र में शादी कर ली है। बीवी बच्चे हो गए हैं और अभी नौकरी के लिए मारे-मारे खोज रहे हैं। चारों ओर खोज रहे हैं कि मुझे यहां से नौकरी मिल जाए, वहां से नौकरी मिल जाए। किंतु यह जो मॉडर्न थिंकिंग है आज का कि पहले तो स्टडी करो। पहले ग्रेजुएट हो जाओ किसी भी तरह से। उसके बाद में बिजनेस जॉब ठीक कर लो। एक स्टेडी इनकम होना शुरू हो जाए। उसके बाद में शादी करो। बाद में बच्चों का बच्चों को जन्म दो। तभी तो तुम उसका ठीक-ठीक लालनपालन कर पाओगे। कुछ ठिकाना नहीं है करियर का। अभी भी बच्चे बना के बैठ गए हैं और अभी मारे-मारे घूम रहे हैं। हताश होकर के। वो जो ठाकुर की कहानी है ना कि एक ब्राह्मण का लड़का एक स्त्री के पास में जाकर के कहता है कि मैं ब्राह्मण का लड़का हूं। बीवी बच्चे हैं। नौकरी नहीं मिल रही है। वह बड़ा बाबू मुझे नौकरी नहीं दे रहा है। आप कुछ कर दीजिए। तो वह जो औरत थी वह उनकी यह कोई उपपत्नी थी। तो औरत ने उस आदमी के ब्राह्मण के लड़के पर दया करके कहा अच्छा ठीक है। मैं उनको बोलूंगी वो बड़ा बाबू तुमको नौकरी दे देगा। तो फिर दूसरे दिन बड़े बाबू ने बुला करके उसको नौकरी दे दी। किंतु यह जो उस समय का जो मिडिल क्लास जो यूथ का जो प्रॉब्लम था कि आप किसी भी तरह का एडवेंचर नहीं कर सकते। किसी भी तरह का आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग नहीं कर सकते। यह जो ब्रिटेन में जो उस समय चल रहा था, ब्रिटेन ने पूरे जगत पर राज्य क्यों किया? क्योंकि वहां पर वो लड़के लड़कियां शादी करके बच्चे 10 बच्चों के बाप हो के अभी मारे-मारे घूम रहे हैं कि कैसे भी करके एक सेफ जॉब मिल जाए तो बहुत है। ऐसा नहीं। वह पूरा दुनिया घूमेंगे। वह जहाज में बैठकर के एडवेंचर करेंगे। फिर कहीं जाकर के सेटल हुए तो फिर शादी करेंगे। यानी कि यदि आपने एक बार शादी कर दी तो आपका जो यह एडवेंचर है, एक आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग है, एक करेज है, सब चला जाएगा। फिर आपको सब समय यह देखना है कि बॉस के साथ में झगड़ा ना हो जाए। वो झगड़ा झगड़ा हो जाएगा। मैं कुछ नई बात करूंगा। कुछ नया थिंकिंग करने का प्रयास करूंगा। फेल हो जाऊंगा तो नौकरी चली जाएगी। बिजनेस बंद हो जाएगा। बीवी बच्चों का क्या होगा? देखिए कि आज ये जो इंडस्ट्रियलाइजेशन टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट हुआ है ऐसे लोगों ने किया है कि कितना रिस्क उन्होंने उठाया है। रिस्क उठा के ये लोग करते हैं। हजार लोग फेल होंगे उसमें एक सक्सेस होगा तो फिर वो कहीं जाकर के वो इंडस्ट्रियलाइजेशन का फाउंडेशन यूरोप और अमेरिका में डला है। भारत में देखिए मैं खुद का एक एग्जांपल बताता हूं। मैं एक लड़के को पहचानता हूं। बड़ा टैलेंटेड है। तो वह क्या है कि अपने आश्रम में एक जगह पर नौकरी करता था। तो मैंने उसको दो-तीन बार कहा कि देखो तुम थोड़ा सा और साहस करोगे तो तुम इस और क्या है कि गांव से अपडाउन करता है। तो अपडाउन करने में सुबह को डेढ़ घंटा और रात को फिर और ज्यादा दो घंटा लगता है। तो मैंने कहा कि देखो तुम इतना कष्ट करके गांव से सिटी में आकर अपडाउन करके यहां पे जॉब करते हो। तुम यहीं पर एक छोटा सा घर लेकर के रह जाओ या तो फिर अहमदाबाद बेंगलुरु कहीं पर चले जाओ। तुम्हारा जो टैलेंट है हार्ड वर्क और इंटीग्रिटी जो है तुम्हारा अभी जो तुमको सैलरी मिल रहा है उसका तीन गुना तुमको ईजीली मिल जाएगा। तो यह लड़का क्या कहता है कि मेरी मां मुझे मना करती है घर छोड़ के और कहीं जाकर के रहने की। मैंने कहा क्या पागल जैसी बात कर रहे हो? तुम अभी तो एडल्ट हो गए हो। 20 22 तुम्हारी उम्र है। मां कहती है कि घर छोड़ के मत जाओ। तुम घर छोड़ के नहीं जाओगे। क्या पागलपन है? किंतु उसका वही है। भले चाहे पैसा कम मिले, घर में रहना है, मां के पास में रहना है। तो यह जो हम इंडियन लोगों में है कि वह अपने घर से दूर ज्यादा नहीं जाना, एक सेफ फैमिली जॉइंट फैमिली में रहना है। किसी भी तरह का एडवेंचर नहीं सोचना है। बोल कर के ही तो फिर यह हमारी अवनति हुई। स्वामी जी जब विदेश में गए थे, कितना विरोध उनको सहन करना पड़ा था। ये जो ट्रिपलिकन लिटररी सोसाइटी मद्रास की उसके ये जो सब डिसाइपल वहां के जो लड़के आते थे ये आला सिंघा पेरूमल वगैरह स्वामी जी कैसे फायरी लेटर्स इनको लिखते हैं क्या कहते हैं स्वामी जी तुम लोग देश छोड़कर के बाहर जाओ घूमो थोड़ा सा देखो यूरोप अमेरिका देखो जापान देखो देखो किस तरह से ये डेवलपमेंट हो रहा है यह ठाकुर ठाकुर के बारे में स्वामी जी कहते हैं कि तुम लोग ठाकुर ठाकुर कहते हो कोलकाता से 10 किलोमीटर दूर जाओ 10 20 कि.मी. कोई तुम्हारे ठाकुर को नहीं पहचानता। तो माने स्वामी जी क्या कहना चाहते थे? ठाकुर की निंदा करना नहीं चाहते थे। कहना चाहते थे कि देखिए जगत इतना विशाल है। हमको एडवेंचर करना होगा। हमारे में करेज चाहिए। आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग चाहिए। क्रिएटिव कुछ हमको करना होगा। तभी तो कहीं जाकर के जगत का ये जो ये जो सिविलाइजेशन का ये युद्ध है उसमें जीतेंगे ना। आज कोई भी छोटा-मोटा देश आकर के हमको जो भी गाली दे देता है, हम लोग चुपचाप सहन कर लेते हैं। ट्रंप कहेगा कि इंडिया से तो बेटर पाकिस्तान है तो पूरे हमारे भारत के जितने भी न्यूज़ पेपर है सब चिल्लाना शुरू कर देते हैं। किंतु हमको समझ में नहीं आता कि ट्रंप के सामने भारत की कोई कीमत नहीं है। भिखारियों का देश है। उसको यदि काम चाहिए तो मोदी की प्रशंसा करेगा। काम निकाल लेगा। यदि काम नहीं हो रहा है तो हमको गाली देगा। और हम लोग बेचारे क्या कहेंगे? मतलब जो भारत में जो अभी जो प्रॉब्लम है हमारे जियोपॉलिटिकल वीकनेस इसके भीतर में क्या राज है? 150 करोड़ की ये पपुलेशन है। इजराइल की पपुलेशन है मुश्किल से 1 करोड़। पूरे मिडिल ईस्ट को दबा करके बैठा है। हम लोग जो है 150 करोड़ की पपुलेशन के लेकर के कुछ नहीं कर पा रहे हैं। तो यह जो हमारे भीतर में जो कायरता प्रवेश कर गई है। हमारे भीतर में ये जो अपुर जो का पुरुषता प्रवेश कर गई है। इन सबके भीतर में यही है कि हमको एक एडवेंचरस एक करेजियस लाइफ लीड नहीं करना। अभी एक भारत का एस्ट्रोनॉट 40 साल के बाद में स्पेस में गया। 40 साल तक हम कुछ नहीं कर पा रहे थे। तो देखिए कि कैसी परिस्थिति है। यह चाइना अपने खुद के एस्ट्रोनॉट अपने ही स्पेसशिपिप में आकाश में भेजता है। तो यह सब जो है सिविलाइजेशनल रेस जो है उसमें यदि हमको एक्सेल करना है तो हमको करेज चाहिए, इंडिपेंडेंस चाहिए, एडवेंचरस स्पिरिट चाहिए। तभी तो कहीं जाकर के यह सब होगा। वो ब्रिटिश लोग भारत में आकर के हमारे राजाओं के भीतर में यह डिवाइड एंड रूल कर सकते थे। तो ऐसा नहीं था कि ब्रिटेन में वो कहीं सब पूरी 100% यूनिटी थी। वहां के काउंट ड्यूक लॉर्ड ये वो वगैरह सब आपस में लड़ते थे। किंतु एक भी भारतीय ने साहस किया कि वहां जाकर के उनके बीच में ये डिवाइड एंड रूल करवा करके उनके ऊपर में राज करवा ले। यह हमने सपने में भी नहीं सोचा है क्योंकि ये सोचने का डीएनए ही जैसे कि हमारे भीतर में नहीं है। तो इसलिए स्वामी जी यहां पे कहते हैं कि जो स्कूल करके बच्चों को सिखा करके पढ़ाई लिखाई सिखा करके बाद में संसार में प्रवेश करवा करके बाद में विवाह करवा करके बाद में बच्चों का बाप होना यह ठीक है। यह उसको कैसे समझ में आया? यदि उसके भीतर में दिव्य तत्व नहीं है। जे एकटा ठीक बोझे से सब बोझे जो एक ठीक-ठीक समझता है। एक यानी कि दिव्य तत्व जो एक ठीक-ठीक समझता है वह बाकी सब ठीक-ठीक समझता है। तो नरेंद्र ने जब इतना कहा तो क्या मास्टर शोगत मास्टर महाशय अपने मन में ही मन में सोच रहे हैं। स्वगत सोच रहे हैं। क्या सोचते हैं? ठाकुर बोलते बोटे जे ईश्वर के जेने छे से सब बोझ ठाकुर कहते थे सही बात है कि ठाकुर कहते तो थे कि जो ईश्वर को समझता है वह सब समझता है आर संसार करा स्कूल करा संबंध विद्यासागर के बोले छिलेन जे ए सब रजोगुण होए और संसार करना स्कूल करना यह सब संबंध विद्यासागर को कहा था इस सब चीजों के बारे में विद्यासागर को कहा था कि यह सब रजोगुण से होता है विद्या सागर दया आ बोले बोले छिलेन ए रजोगुण शतो ए रजोगुण दोष नहीं विद्यासागर में दया है यह सुनकर के ठाकुर ने कहा था यह रजोगुण का सत्व है इस रजोगुण से कोई दोष नहीं है देखिए वो ठाकुर का खुद का सर्टिफिकेट विद्यासागर के पास में है कि यदि आप दया और देखिए ठाकुर दो तरह की बातें करते हैं जब वो कथामृत खुद जो वो चैप्टर है विद्यासागर वाला उस चैप्टर में उसके बाद वाले चैप्टर में ठाकुर कहते हैं कि देखो विद्यासागर को इतना सारा कार्य कर रहा है किंतु उसको पता नहीं है कि भीतर में सोना पड़ा हुआ है। अर्थात अंतर मन में दिव्य तत्व है। ईश्वर तत्व है। आत्म तत्व है। उसको पता नहीं है। इसलिए बाहर इतना सारा काम कर रहा है। यदि उसको एक बार पता चल जाएगा कि भीतर में ईश्वर तत्व है तो बाहर का काम सब ठंडा हो जाएगा। किंतु जब ठाकुर यह कहते हैं और जब नरेंद्र यह कहता है कि जिसको आध्यात्मिकता समझ में आएगी वही यह सब काम करेगा तो कैसा एग्जैक्ट ऑोजिट हो रहा है विद्यासागर के बारे में इन दोनों का मंतव्य किंतु देखिए कि ठाकुर जो है हाईएस्ट आदर्श की दृष्टि से कहते थे मनुष्य जीवन का हाईएस्ट आइडियल है ईश्वर को प्राप्त करना आत्म साक्षात्कार करना ब्रह्म ज्ञान में स्थित होना यह मनुष्य का हाईएस्ट आइडियल प्रॉब्लम यह है कि इस हाईएस्ट आइडियल को प्राप्त करने के लिए एलिजिबल जो लोग हैं 0.01% होंगे पूरी पृथ्वी में से पृथ्वी का पपुलेशन अभी 700 7 बिलियन है 700 करोड़ का तो मुश्किल से 1 लाख दो लाख ऐसे होंगे 7 आठ लाख होंगे जो कि ब्रह्म साक्षात्कार करने के लिए एलिजिबल है तो बाकी सबका क्या बाकी सब भगवान भगवान ईश्वर ईश्वर करके महा भयानक तमस में डूब जाएंगे महा भयानक करप्शन में डूब जाएंगे। इससे तो बेटर है कि एक बार समझ लो कि हमारे भीतर में आत्म तत्व है और वही आत्मन पूरे जगत में सभी के भीतर में है। और यह समझ के दया करुणा का उद्रेक हो। हमारे में उदय हो और फिर उस दया और करुणा से हम जो कुछ भी कार्य करें वह संसार के लिए बेनिफिशियल हो। यदि मैं साइंटिस्ट हूं मुझे आत्म तत्व नहीं समझ में आता है तो मैं फिर वेपंस ऑफ वॉर बनाऊंगा। वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन बनाऊंगा, एटम बम बनाऊंगा। किंतु यदि मुझे समझ में आ गया कि सभी के भीतर में वही आत्म तत्व है तो फिर मैं वही न्यूक्लियर मेडिसिन ये न्यूक्लियर साइंस जो है उसी से तो केमोथेरेपी वगैरह होता है कैंसर ट्रीटमेंट करने के लिए। तो मैं वही न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी जो मुझे समझ में आती है उसका बम नहीं बना करके मैं उसको मेडिकल साइंस में इसका यूज करूंगा। फ्यूजन रिएक्टर खड़ा कर दूंगा। आज दुनिया का सबसे बड़ा प्रॉब्लम क्या है कि यह फ्यूल ये एनर्जी यह जो हम फॉसिल फ्यूल यूज़ करते हैं उससे एनवायरमेंटल डिजास्टर इस लेवल पर खड़ा होगा देखिए कि ऑलरेडी पोलर आइस वगैरह मेल्ट होना शुरू हो गया है। तो क्या है इसका सॉल्यूशन? बेस्ट सोर्स ऑफ एनर्जी क्या है? सूरज का जो एनर्जी है दैट इज द बेस्ट सोर्स ऑफ एनर्जी कि आप जितना ही जला दें उसको आपका बाय प्रोडक्ट के रूप में सिर्फ ऑक्सीजन और हाइड्रोजन H2O यानी कि पानी वही निकलने वाला है। उससे अलावा और कुछ नहीं निकलने वाला। तो फिर वो है फ्यूजन टेक्नोलॉजी फ्यूज़ रिएक्टर। तो मैं फ्यूज़ रिएक्टर बनाऊंगा नहीं कि मैं फ्यूज़ बम बनाऊंगा। सो सी आत्म तत्व एक बार मुझे मैं यदि एडमिन पॉलिटिशियन हूं तो फिर मैं यदि आत्म तत्व मुझे समझ में आया है तो मैं जो कुछ भी पॉलिटिक्स में करूंगा सही-सही में लोक कल्याण के लिए लोक कल्याण के लिए करूंगा और जो आत्म तत्व समझ में नहीं आता धर्म सिर्फ यदि जुबान पे ही है हृदय में नहीं गया तो फिर मैं हजार करप्शन करूंगा यदि मैं डॉक्टर हूं और यदि मेरे मुझे आत्मत्व नहीं समझ में आता तो लोगों को झूठमूठ का फुसला करके महंगी दवाई महंगी सर्जरी वगैरह करवा दूंगा। मैं पैसे कमा लूंगा। और यदि मुझे आत्म तत्व समझ में आता है तो वही पेशेंट की मैं नारायण ज्ञान से सेवा करूंगा। मैंने ऐसे कितने डॉक्टरों को देखा है कि वो जैसे अपने हॉस्पिटल में आकर के फ्री में सेवा देते हैं। कहते हैं कि महाराज मेरे पास में एक घंटा भी है तो मैं क्यों नहीं ये गरीब पेशेंट की सेवा करूं। इससे मुझे बड़ा संतोष मिलता है। ऐसे ऐसा भी मैंने डॉक्टरों के पास में सुना है और ऐसे भी कुछ-कुछ डॉक्टर होते हैं कि नया-नया डिस्पेंसरी अपना पर्सनल चालू किया है। पेशेंट नहीं आ रहे हैं तो फिर रामकृष्ण मिशन की हॉस्पिटल में जाकर थोड़ा सा सेवा दे दिया। थोड़ी पहचान हो गई। फिर यहां के पेशेंट उठाकर के वहां चले गए। ऐसे भी होते हैं डॉक्टर। तो यह आप ऐसा नहीं है कि आत्म तत्व समझ में आने से फिर आपको साधु हो जाना है, सन्यासी हो जाना है, संसार छोड़ देना है। नहीं वो तो कितने मुश्किल से 0.1% लोग कर पाएंगे। बाकी सबको क्या करना है? आत्म तत्व ईश्वर तत्व समझ के संसार में ही रहना है। किंतु फिर बीवी बच्चे करने हैं। सब कुछ करना है। किंतु अपना जो एटीट्यूड है इस जगत के प्रति उस एटीट्यूड को ट्रांसफॉर्म कर देना है। उस एटीट्यूड को ट्रांसेंड कर देना है। फ्रॉम द वर्ल्डली नेसेसिटीज टू दी अदर वर्ल्डली नीड ऑफ अदर पीपल। तो यह एक माने स्वामी जी का जो हायर आइडियल था वर्ल्ड स्पानिंग। स्वामी जी जो कुछ भी सोचते थे 10,000 साल इधर 10,000 साल उधर पूरी पृथ्वी सब सिविलाइजेशन उस स्केल पे सोचते थे। सिविलाइजेशनल स्केल पे सोचते थे। इवोल्यूशनरी स्केल पर सोचते थे। हिस्टोरिकल स्केल पर सोचते थे। और मास्टर महाशय वगैरह बेचारे जो पंथी वगैरह पढ़कर के ये जो किताब वगैरह पढ़कर के जो एक लिमिटेड थिंकिंग था वही इस तरह का था उनका। नेचुरली मास्टर महाशय ठाकुर और स्वामी जी का संग करके मां का आशीर्वाद प्राप्त करके बहुत इवॉल्व हुए थे। किंतु जब मास्टर महाशय इनके बारे में जब बताते हैं ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में तब हमको पता चलता है कि कंटेंपररी जितने भी थे ठाकुर मां स्वामी जी के उनसे इन तीनों के विचार उनके जो कांसेप्ट समझने की जो क्षमता थी वो कितने इट्स अ टोटली डिफरेंट स्केल इट्स अ टोटली डिफरेंट ऑर्डर ऑल टुगेदर ओके तो ये रेफरेंस समाप्त होता है इसके बाद में फिर गंभीरानंद जी आगे क्या कहते

मास्टर महाशय के मन में "शिव ज्ञान जीव सेवा" के बारे में भ्रान्ति

हैं मास्टर महाशय नरेंद्र यथाशद्धो सहाजो सर्वदा प्रस्तुत थाकिले ओ एवं अन्नानो भक्तो दे न्याय तयो ईश्वर लाभेर पर धर्म प्रचार और निष्काम कर्म संपादन संभावना स्वीकार कर ले ओ स्पष्ट तो बोली तेन ईश्वर लाभेर साधन रूपे सेवा व्रत उद्यापन कथा ठाकुर बोले नहीं मास्टर महाशय नरेंद्र वगैरह को यथा यथासंभव यथासाध्य सहाय करते थे। हमेशा तैयार रहते थे और दूसरे भक्तों की तरह वह भी ईश्वर लाभ के लिए ईश्वर लाभ के बाद में धर्म प्रचार और निष्काम कर्म कर सकते हैं। यह संभावना को स्वीकार भी करते थे। दोनों मास्टर महाशय में था। एक तो नरेंद्र वगैरह के प्रति सहानुभूति थी। त्यागी संतानों के प्रति सहानुभूति थी। उनको सहाय करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। और जो लोग कंपेयर टू दूसरे कुछ भक्त जो कि इनकी निंदा ही किया करते थे उनकी कंपेयर में मास्टर महाशय उनको सहाय करने के लिए तैयार रहते थे। एक चीज और दूसरा यह भी स्वीकार करते थे। ठाकुर की तरह ठाकुर को तो उन्होंने देखा था कि ईश्वर प्राप्ति के बाद में वह वापस आए हैं पृथ्वी लोक पे और दूसरों की अवस्था देखकर के उनका हृदय विगलित होकर के कोलकाता में घर-घर जाकर के ईश्वर का संदेश देते थे। यह तो उन्होंने ठाकुर में देखा। यानी ये लोग यह स्वीकार करते हैं कि पहले ईश्वर लाभ कर दो। फिर जितने भी वह आपको दया परोपकार का कार्य करना है वह करो। यह तो यह दो चीज उनके भीतर में थी। किंतु साथ-साथ में ही स्पष्ट कहते हैं कि ईश्वर लाभ की साधना के रूप में सेवा व्रत का सेवा व्रत की बात ठाकुर ने कभी कही नहीं है। सेवा कब करनी है? जब ईश्वर प्राप्ति हो जाए उसके बाद में ईश्वर प्राप्ति के साधन के रूप में सेवा करना यह तो ठाकुर ने कभी कहा नहीं है। देखिए यह जो कंफ्यूजन है अभी मैं कंफ्यूजन नहीं कहूंगा। कांसेप्ट का लिमिटेशन कहूंगा। देखिए स्वामी जी का जो कांसेप्चुअल जो डेवलपमेंट हुआ है ना कितना ग्रेट है। सबसे पहले तो हमने देखा कल ही देखा कि किस तरह से यह ठाकुर गुरु परंपरा प्रारंभ करके गए हैं। यह बात बहुत कम लोगों को समझ में आती थी। ठाकुर के महासमाधि के बाद में कुछ-कुछ भक्त अपने को ही गुरु बना करके गुरु की पदवी के ऊपर में बैठ गए थे। इसमें यह लक्ष्मी दीदी भी थी। उसमें यह विजय कृष्ण गोस्वामी भी थे। उसमें यह रामचंद्र दत्त भी थे। वगैरह-वगैरह बोलते थे। हम ही लोग अभी गुरु हैं। भले ही चाहे स्पष्ट रूप से अपने को गुरु ना कहे किंतु गुरु की तरह ही अपने शिष्यों के साथ में पेश आते थे। और कुछ-कुछ लोग थे कि वह भले ही चाहे अपने से गुरु भाव उनके भीतर में ना प्रकट हुआ हो किंतु ठाकुर की यह जो गुरु की गद्दी जो है गुरु और इष्ट की गद्दी वो अल्टीमेटली फिर स्वामी जी और मां को जैसे कि ट्रांसमिट हुई ही है। यह गुरु परंपरा प्रारंभ हुई है। यह बात उनको शायद समझ में नहीं आती थी। तो इतना यह सब हमने देखा कि संघ के प्रारंभ में लोगों का जो आदर्श या तो फिर जो कांसेप्ट समझने की लिमिटेशन थी तो वो तो एक लिमिटेशन थी। दूसरा कि मान लीजिए कि गुरु परंपरा तो आपने स्वीकार कर ली। किंतु फिर ये गुरु परंपरा प्रारंभ होने के बाद में ये संघ करेगा क्या? क्या संघ जो 1% 0.1% लोगों के लिए जो पॉसिबल है ईश्वर साधना करके ईश्वर प्राप्ति की उपदेश वही देगा ना कि बाकी के जो 99.99% लोग हैं उनकी जो नीड है कि वे लोग ना ही त्याग कर सकते हैं ना ही वे लोग कोई तपस्या कर सकते हैं। तो उनको उनके अनुसार मॉडरेट हिसाब से मॉडरेट प्रमाण में स्पिरिचुअलिटी देना और उनके जीवन को स्टेप बाय स्टेप स्लोली एंड ग्रेजुअली ट्रांसफॉर्म करना ट्रांसेंडेंस की ओर ले जाना तो ये पूरे जगत की यह जो नीड है उसको देखेंगे ना कि फिर यह 0.01% लोग हैं उत्तम अधिकारी सिर्फ उन्हीं के प्रति उनका यह रहेगा। यानी कि यह रामकृष्ण मिशन ठाकुर की भावधारा पूरी पृथ्वी पर यदि आपको प्रसारित करनी है तो लोएस्ट कॉमन डिनोमिनेटर ये जो जब ये पॉलिटिकल पार्टी इकट्ठा होती है तो क्या है कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाते हैं। एक पार्टी का यह प्रोग्राम है दूसरी पार्टी का यह प्रोग्राम है। किंतु साथ में जो यदि गवर्निंग करना है तो दोनों का जो मिनिमम प्रोग्राम है वह ले चलना होगा। कोई कहेगा मुझे यह करना है। कोई कहेगा ऐसा करना है तो ऐसा नहीं चलेगा। सबको एग्री होना है। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम एक चाहिए। तभी यह गठबंधन होगा। तो यहां पर भी यदि आपको पूरी पृथ्वी पर फैलना है तो जो लोएस्ट कॉमन डिनोमिनेटर है जो लोएस्ट पर्सन है किस तरह की साधना उसके लिए संभव है उसको सोच करके उसके अनुसार आपको कार्य करना होगा। हाईएस्ट साधक यह कर सकता है। बोल करके मैं अपनी कार्यविधि को वहीं तक सीमित रखूंगा। तो मैं मुश्किल से एक छोटा-मोटा सेक्ट होकर के रह जाएंगे हम लोग। किंतु यदि वर्ल्ड रिलीजन बनना है, वर्ल्ड अवतार के रूप में ठाकुर आए थे तो उनका पूरे जगत में मैसेज फैलाना है तो जगत का प्रत्येक व्यक्ति उस मैसेज को समझ पाए ऐसा करना है। फिर ऐसा नहीं है कि आप लोएस्ट लेवल के लिए काम कर रहे हैं तो फिर उसमें और फिर इवोल्यूशन होने की संभावना नहीं है। रामकृष्ण मिशन में आप इनफाइनाइट इवोल्यूशन है। आप जाइए ना आगे बढ़िए ना आध्यात्मिकता में कितना बढ़ना चाहते हैं। प्रत्येक स्टेप पर जाकर के देखेंगे कि अरे ठाकुर मास्वामी जी इन तीनों ने जो अचीव किया है वो तो और भी कितने हायर लेवल पर है। हम इनफाइनाइट प्रोग्रेस कर सकते हैं। हमारे सामने कभी भी ऐसा नहीं होगा। मेरी खाने की बहुत इच्छा है। तो मैं खाते-खाते एक दिन पता चला सब खाना खत्म हो गया है और खाने के लिए कुछ बचा नहीं। ऐसा यहां पर कभी नहीं होगा। मैं चाहे जितनी ही साधना करता रहूं, जितना ही प्रोग्रेस करता रहूं, मेरे सामने और भी ज्यादा लंबा रास्ता प्रशस्त होकर के मेरी राह देख रहा है। कहता है कि तुम यहां पर आ गए हो। ठीक है किंतु और भी एक लंबा रास्ता है। तुम जाओ ना कितना प्रोग्रेस करना चाहते हो। जाते जाओ जाते जाओ जाते जाओ। जो ठाकुर की वो जो बात है वो कठिया वो जो आदमी है उसको कहता है कि वो तुम जंगल में से लकड़ी काट कर आते हो और थोड़ा सा आगे जाओ। देखो कि तुमको रूपा की खान मिलेगी वह जो सिल्वर माइन मिलेगी और थोड़ा सा आगे जाओ सोने की खान मिलेगी और थोड़ा सा आगे जाओ हीरे माणिक मोती मिलेगा यानी जितना आगे जाएंगे उतना आगे जा सकते हैं। सो दैट इज व्हाई कि यहां पे मास्टर महाशय उन्होंने यह तो समझ लिया शायद कि हां संघ की आवश्यकता शायद नहीं है। किंतु ठाकुर और मां ठाकुर के स्वामी जी और मां ठाकुर के वंशज है। इस अर्थ में आध्यात्मिक उनके ये जो है कहेंगे कि लीनिएज में वे लोग आते हैं। किंतु फिर संघ स्थापना करके इस तरह का कुछ कार्य करना है शायद उनको समझ में नहीं आता होगा। इसीलिए कथामृते पंचम भाग तनी लिखिया छ गुरुदेव महामंत्र आगे ईश्वर लाभ तहार पर अन्न कथा उन्होंने लिखा है गुरुदेव का महामंत्र है पहले ईश्वर लाभ बाद में सब बाकी की बातें राजनीति प्रथम हो ते बोलीले चलबे ना माने पहले से ही यदि बता देंगे कि मैं क्या करने वाला हूं मेरे अब तो तो चलेगा नहीं आगे अनन्य मन होया भगवान ध्यान चिंता करो हृदय मध्य त अपरूप रूप दर्शन करो ताहा के लाभ कोरिया तखन स्वदेश मंगल साधन करबे पहले तो अनन्य मन होकर के एकाग्र चित्त होकर के भगवान की ध्यान चिंता करो हृदय में उनके अपरूप रूप का दर्शन करो उनको लाभ करके फिर स्वदेश की जितनी मंगल साधन करनी है वो करो तो यह मास्टर महाशय का मत था अपरदिके स्वामी जी के स्वामी जी शिक्षखा छिलो नारायण बुद्धि ते विभिन्नो विचित्र रूप जी सेवा कोरिया शुद्ध चित्तो होवा एवं शुद्ध चित्ते ओ भगवत दर्शन करा उसकी सामने स्वामी जी की शिक्षा थी स्वामी जी का उपदेश था कि नारायण बुद्धि से विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपे जीव सेवा करके शुद्ध चित्त होना और फिर इस शुद्ध चित्त में भगवान का दर्शन करना तो आज यही तक अभी मिलेंगे नेक्स्ट वीक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: किस अर्थ में ठाकुर ने "शिव ज्ञाने जीव सेवा" की शिक्षा दी थी?

ठाकुर ने ठाकुर ने साधन रूप में नहीं बोला है यह भी सही है और ठाकुर ने साधन रूप में बोला है यह भी तो थोड़ा कंफ्यूजन है। ठाकुर ने सिर्फ बोल दिया है। किंतु जैसे आपने कहा कि इसको एक प्रॉपर वे ऑफ साधना ऐसा करके उन्होंने स्पष्ट रूप से नहीं कहा। आप यदि सेवा करनी है तो शिव ज्ञान करो। बस वहीं पर आकर के अटक जाते हैं। उसके बाद में उसको जो एक प्रॉपर फ्रेमवर्क देना जैसे आपने कहा इलेबोरेट करना फ्रेमवर्क देना वह स्वामी जी ने किया है। यानी ठाकुर की बात सुनकर के आपको यदि यह लगेगा कि हां यह मुक्ति मिलने के बाद की बात नहीं है तो यह भी आपको नहीं लगेगा कि यह साधन के रूप में है।

प्रश्न: ठाकुर कई उपदेशो को दोहराते हैं लेकिन वे शिव ज्ञाने जीव सेवा की बात को नहीं दोहराते हैं।

हृदय हृदय हृदय बोलता है मामा तुम रिपीट तुम रिपीट क्यों कर रहे हो? तो ठाकुर बोलते हैं साला मैं कितना ही रिपीट करूं तुझसे क्या है उससे? सिर्फ स्वामी जी नहीं

ठाकुर = आध्यात्मिकता, माँ = साथ में कैसे रहना, स्वामीजी = सिविलाइज़ेशन और फिलोसोफी

देखिए ठाकुर ने अपने हाथों से तीन का गढ़तर किया था। एक तो है मां दूसरे हैं स्वामी जी, तीसरे हैं राजा महाराज। ये तीनों ठाकुर के क्लोजेस्ट है। तो तीनों जैसे कि एक-एक एस्पेक्ट को एग्लीफाई करते हैं। स्वामी जी जैसे कि सिविलाइजेशनल स्टडीज है, फिलॉसोफी है, आइडियाज एंड आइडियल्स है। वो उसको एक रिप्रेजेंट करते हैं। बट टेकिंग फ्रॉम ठाकुर ओनली। मां है जो कि एक एक जो सोशल लेवल पर जो स्पिरिचुअलिटी होती है उसको एक रिप्रेजेंट करती है। शक्ति तत्व फैमिली लाइफ तो वो भी तो ठाकुर से ही अब जैसे हमने गंभीरानंद जी का लाइफ पढ़ा तो उसमें कितना स्पष्ट रूप से दिखता है कि मां खुद कहती है कि ठाकुर ने मुझे सब कुछ सिखाया है। वो सलते पाकानो थे के माने वो जो दिए की वाट कैसे बनाना है वहां से लेकर के लोगों के साथ में कैसे व्यवहार किया जाए सब यानी कि मां का पूरा जीवन देखेंगे इट्स अ नथिंग बट ट्रांसलेशन ऑफ ठाकुर टीचिंग इन प्रैक्टिकल लाइफ स्वामी जी का पूरा लाइफ है कि नथिंग बट ट्रांसलेशन ऑफ ठाकुर सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग इन अ प्रैक्टिकल लाइफ और राजा महाराज का देखिए कि एक इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी ठाकुर का खुद का जो एक इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी था ईश्वर के साथ में जो संबंध हां वह जो टीचिंग राजा महाराज को दिया दैट इज़ नथिंग बट दैट टीचिंग ट्रांसलेटेड इनू प्रैक्टिकल लाइन। तो यह तीनों को देख के हमको यह एक अंदाज आ जाता है कि वह 3 घंटे वो नरेंद्र के साथ में क्या वार्तालाप होता होगा या तो फिर मां के साथ में मां और ठाकुर का जो दांपत्य जीवन कहेंगे वो तो एकदम सीक्रेसी है ना। वहां पर तो बहुत कम लोगों का प्रवेश था। तो वो किस तरह से उनका वार्तालाप होता होगा। मां का बात का जीवन देखकर के हमको समझ में आ जाता है। यह जो हम सोचते थे ना कि ठाकुर माने ठाकुर मां स्वामी जी ऑल थ्री रिप्रेजेंट वन वन एस्पेक्ट इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी ठाकुर फिर ये सिविलाइजेशनल स्टडीज स्वामी जी और ये फैमिली लाइफ शक्ति तत्व मां तो यहां पे ठाकुर ने अपना जो इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी है उसको रिप्रेजेंट करने के लिए फिर राजा महाराज को रख के गए थे। सो उनके जाने के बाद में ये तीनों एस्पेक्ट हैव बीन डेवलप्ड बाय आवर ऑर्डर। ना यहां

प्रश्न: विद्यासागर की करुणा आध्यात्मिक नहीं थी।

पर मैं एक बात कहूंगा कि यदि आप लोगों पर दया करते हैं ना तो वह घमंड का भाव आता है। दाता का भाव आता है। तो अब मैं लोगों पर दया कर रहा हूं। मैं उसके फोटोग्राफ ले 10 जगह पे वो उसको ये करूंगा। जैसे हम लोग जाते हैं ना रिलीफ करने के लिए एक काम सब वो हमारे वो वालंटियर करते हैं। हम लोग खड़ा हो के ब्लैंकेट हाथ में देते हैं और हमारा फोटो खींच करके सब जगह स्प्रेड होता है। आपको लगेगा कि मैं कुछ कर रहा हूं। एक्चुअली मैंने कुछ नहीं किया। वो गाड़ी में बैठ के जाके ब्लैंकेट से ही सिर्फ हाथ में दिया है। बाकी पूरा काम वो वालंटियर किए हैं। वो जो दाता का जो भाव था वो विद्यासागर में नहीं था। यानी विद्यासागर रिप्रेजेंट्स जस्ट क्यूरियस फिनोमिना। आज के युग में जो है ना कि स्पिरिचुअल है किंतु डिनोमिनेशनल नहीं है। मैं ये किसी भी बात को स्वीकार नहीं करना चाहता। आप बोलेंगे तो अच्छा विष्णु पे विश्वास नहीं है तो आत्मन पे विश्वास कर लो। मुझे आत्मन पे भी विश्वास नहीं करना क्योंकि इसका नाम लेकर के और भी ज्यादा ये शंकराचार्य के भीतर में खुद तक कितना ये कास्टिज्म स्ट्रांग था। यानी इधर जाऊंगा तो यह है। इधर जाऊंगा तो यह खतरा है। मुझे कुछ स्वीकार नहीं करना। बट आई एम स्पिरिचुअल व्हिच आई नो दैट आई एम स्पिरिचुअल। सो विद्यासागर फेल इंटू दैट क्यूरियस ग्रे एरिया बिटवीन कि वो पूरा एक घमंड भी नहीं था। दूसरा कि अभी आज का जो रामकृष्ण संघ का है सबके भीतर में ठाकुर का दर्शन करके हम सेवा करते हैं। सबके भीतर में शिव देख के सेवा करते हैं। उस वो भी नहीं था। ही रिप्रेजेंट्स दैट ग्रे एरिया इन बिटवीन

प्रश्न: आज अध्यात्म कहाँ खड़ा है? -- अध्यात्म को विज्ञान बनना होगा

मैं किस तरह से सोचता हूं पता है? जैसे देखिए ये जो अब अभी जैसे फिजिक्स है फिजिक्स में बहुत सारे उस समय कंट्राडिक्टरी आइडियाज सब चल रहे थे। किंतु जैसे-जैसे एक्सपेरिमेंट करके फिलॉसोफिकल अह इंटेलेक्चुअल शार्पनेस बढ़ता गया, वैसे-वैसे फ़िज़िक्स फिलॉसोफी में से साइंस में कन्वर्ट होता गया। पहले तो थियोलॉजी था। थियोलॉजी में से फिलॉसोफी हुआ। थियोलॉजी में क्या है? भगवान ऐसा कर रहा है बस बात खत्म हो गया। अभी उसको छोड़कर क्या फिलॉसोफी में आया। ओके चलो किसी ना किसी तरह का रैशनलिटी इसके पीछे में है। किंतु फिर 10 तरह का लोग 10 तरह की रैशनलिटी दिखा रहा है। सो फिलॉसोफी में से आखिर में साइंस में कन्वर्ट हुआ कि आप एक्सपेरिमेंट करके प्रूव कर रहे हैं कि ये इसके पीछे में यह है। अभी आज फिजिक्स चाहे चाइना में हो कि भारत में हो ना कि अमेरिका में हो। एक क्रिश्चियन फिजिक्स स्टडी करता है, हिंदू करता है ना कि यह बुद्धिस्ट करता है। फिजिक्स इज़ फिजिक्स। देयर इज़ नो सच अ थिंग इज़ इंडियन फिजिक्स, चाइनीस फिजिक्स। देयर इज नो सच अ थिंग इज हिंदू फिजिक्स और बुद्धिस्ट फिजिक्स। तो वैसे ही स्पिरिचुअलिटी इज अ साइंस। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि यदि ग्रेविटी का नियम पूरे ब्रह्मांड में एक हो तो दिव्य तत्व भी सब जगह पे अलग-अलग हो। व्हिच इज़ माने सोच करके माने इवन थोड़ा सा भी रैशनलिटी आप यूज़ करेंगे तो यह आपको एब्सर्ड लगता है। इतने सारे क्लेम्स, काउंटर क्लेम्स, इतने सारे डीटीज, इतने सारे ईश्वर, इतनी सारी फिलॉसोफी। मुझे लगता है कि हम इवोल्यूशन के उस स्टेज पर खड़े हैं आज धर्म तत्व के आध्यात्मिकता के कि जहां पर यह साइंस ये रेनेसा के समय खड़ा था कि बहुत सारे क्लेम्स काउंटर क्लेम्स थे। किंतु फिर एक जनरेशन ऑफ साइंटिस्ट लीनिएज ऑफ साइंटिस्ट एक के बाद एक आते गए। सभी क्लेम्स काउंटर क्लेम्स को मैथमेटिकल लैंग्वेज में कन्वर्ट करके उसका एक प्रॉपर सॉल्यूशन निकालते गए। टुडे स्पिरिचुअलिटी इज टेंडिंग इन द सेम वे। आई होप फॉर द सेक ऑफ ह्यूमैनिटी कि एक लीनिएज ऑफ ग्रेट टीचर्स आए, ग्रेट मास्टर्स आए और जितने क्लेम्स काउंटर क्लेम्स है उसको साइंटिफिकली प्रूव करके एक प्रॉपर साइंस में इसको कन्वर्ट करें जिससे कि हम घर-घर गांव-गांव स्कूल स्कूल स्कूल कॉलेज कॉलेज उसको पहुंचा सके। यदि ये क्लेम काउंटर क्लेम होते हैं ना तो कहेंगे कि मैं इसको स्टडी करूंगा क्योंकि आई बिलोंग टू दिस डिनॉमिनेशन। किंतु मैं उसको स्टडी नहीं करूंगा बिकॉज़ दैट डजंट बिलोंग टू माय डिनॉमिनेशन। मैं अद्वैती हूं तो मैं यह भाव साधना नहीं करूंगा। अभी यह भाव साधना की जो रिचनेस है मैं जस्ट आउट आउट आउट ऑफ माय आईडियोलॉजिकल कन्विक्शन मैं भाव साधना की रिचनेस को नहीं एक्सेस कर पा रहा हूं। व्हिच इज़ कंप्लीटली स्टूपिड। सो टर्न इट इंटू ए साइंस। ब्रिंग इट आउट ऑफ दिस डिनोमिनेशनल क्लेम्स काउंटर क्लेम्स एंड देन मेक इट अवेलेबल यूनिवर्सली।

प्रश्न: रामकृष्ण मिशन आध्यात्मिकता के विज्ञान को डेवेलोप करने का महान कार्य कर रहा है।

किंतु देखिए कि वी कैन नॉट सीट अपॉन आवर लोरल्स जैसे वह कहते हैं कि इतना अचीव किया तो अभी बहुत हो गया बोल कर के बैठ जाना वो हमारे लिए ठीक नहीं होगा हमारे भारत में जो हमेशा होता आ रहा है कि ग्रेट मैन आएगा वह काम को आगे बढ़ाएगा फिर वह जाएगा तो बाकी सब लोग फिर से सो जाएंगे तो फिर अब नेक्स्ट जो ग्रेट मैन आएगा वह देखें हमको क्या है ऐसा करके जो हमारी एक हैबिट है आई होप कि वह हैबिट को अभी हम तोड़ें एटलीस्ट इस एक कहानी है।

कहानी:: मनोविज्ञान में स्वामीजी की अंतर्दृष्टि

मैं मैं सोच रहा था कल बताऊंगा किंतु अभी इतना डिस्कस हुआ ही है। देखिए स्वामी जी का जो इंसाइट है कितना जबरदस्त है। एक बार वो प्रथम भाग पढ़ रहे थे। अभी प्रथम भाग क्या है? विद्यासागर ने लिखा है लोगों को समझाने के जो अल्फाबेट्स जो होते हैं ना जो फर्स्ट स्टैंडर्ड में सिखाते हैं वो सिखाने के लिए प्रथम भाग लिखा है विद्यासागर ने। तो माने वो 12 म अल्फाबेट है और न्यूमरल इंट्रोडक्शन है वही है। पहली स्टैंडर्ड की वह किताब होगी। तो बलराम भवन की ही बात है। कहानी है। स्वामी जी बैठकर के प्रथम भाग पढ़ रहे हैं। तो बाबूराम महाराज वहां से जा रहे हैं। तो देखा कि स्वामी जी कहां स्वामी जी का इंटेलेक्चुअल लेवल कहां ये फर्स्ट स्टैंडर्ड की ये अल्फाबेट्स और न्यूमरल्स इंट्रोड्यूस करने वाली किताब तो वह कटाक्ष करके कहते हैं क्या रे प्रथम भाग पढ़ रहे हो? तो स्वामी जी ने उत्तर दिया पहले प्रथम भाग पढ़ा था। अभी मैं विद्यासागर को पढ़ रहा हूं। किंतु जस्ट सी द डेप्थ इन दिस स्टेटमेंट। राइट? कि विद्यासागर का साइकोलॉजी क्या है? व्हाट इज हिज अंडरस्टैंडिंग ऑफ एजुकेशन फिलॉसोफी? वो वो प्रथम भाग पढ़कर के समझ में आएगी।