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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते स्वामी जी का ज्ञान योग कॉस्मस माइक्रो कोसम अभी स्वामी जी जिस तरह से बात करते हैं हमारे सामने एक के बाद एक लॉजिक और रीजन रखते हैं कि आत्मन का अस्तित्व क्या है आत्मन का अस्तित्व है सबसे पहले तो उसको प्रूव करना है और उसके बाद में उसकी फंक्शनालिस क्या है तो अस्तित्व है वह मैक्रो कजम और माइक्रो कजम व्यष्टि और समष्टि दो लेवल पर डिवाइड करके हमको दिखाया कि एक ऐसी सत्ता एक ऐसा डिवाइन पावर उसकी आवश्यकता है अदर वाइज यह जड़ जगत हमको जिस तरह से दिखता है जिस तरह से फंक्शन करता है वह फंक्शन नहीं करेगा हालांकि ऑफकोर्स वेदांत जिस तरह से लॉजिक लगाता है उसके अगेंस्ट में काउंटर लॉजिक आप लगा सकते हैं और इसका फिर कोई अंत नहीं है किंतु फिर भी बिकॉज कि हम हिंदू है हम स्वामी जी को फॉलो करते हैं बहुत सारी बात हम स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि यदि बहुत ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड लॉजिक यूज करके आर्गुमेंट करने की नौबत आ गई तो हमें वह पहले तो कैपेसिटी नहीं है दूसरा कि हमारे लिए इतनी आवश्यकता नहीं है ज्यादातर हम लोग साधक है साधना करने के लिए हमको क्या एक्स्ट्रा इंफॉर्मेशन चाहिए वही इस वेदांत फिलोसोफी से लेना है हालांकि ऐसे लोग होते हैं जैसे कि मैं कि फिलोसोफी तो फिलोसोफी तो नहीं एटलीस्ट किंतु ये आर्गुमेंट काउंटर आर्गुमेंट उ को पढ़ने में सोचने में आनंद आता है तो इस तरह से आर्गुमेंट और काउंटर आर्गुमेंट यह छोड़ कर के यदि सिर्फ एसेंस ही ले लेना है तो यह कॉस्मो दो लेक्चर है बहुत सुंदर रूप से इसका भी एक बैलेंस किया गया है जैसे हमने कल देखा था कि यह 19 सेंचुरी साइंस और यह फ्यूचर साइंस इन दोनों के बीच में बैलेंस करके स्वामी जी को चलना था तो यहां पर भी जी आउटलाइन और डिटेल यह दोनों के बीच में बैलेंस करके चलते हैं जैसे जद आप शंकराचार्य का भाष्य पढ़ेंगे उपनिषद या तो फिर ब्रह्मसूत्र के ऊपर में तो इतना डिटेल में आर्गुमेंट और काउंटर आर्गुमेंट किया गया है ऐसी कोई आर्गुमेंट ऐसा कोई प्रश्न नहीं होगा जो कि आप अपनी बुद्धि से सोच सके जिसके बारे में डिस्कस शंकराचार्य ने ना किया हो तो स्वामी जी यहां पर इतनी डिटेल में भी नहीं नहीं जाते डिटेल का लेवल थोड़ा सा कम ही रखा है जिससे कि हम इसको ग्रहण कर पाए ज्यादातर लोगों को बहुत ज्यादा डिटेल में जाने की आवश्यकता नहीं होती ऑन द अदर हैंड सिर्फ कंक्लूजन ही हमारे सामने रख दे उपनिषद का कंक्लूजन है महावाक्य अहम ब्रह्मास्मि तत्व मसी तो यह कंक्लूजन ही यदि हमारे सामने रख दे तो शायद आज का मॉडर्न मैन उसको एक्सेप्ट नहीं कर पाएगा यदि स्वामी जी कह दे कि यह है महावाक्य यह है सिद्धांत वाक्य ठाकुर जैसे कहते हैं कि किसी के पास में एक पत्र आया था तो भी पत्र में क्या लिखा था पढ़ने से पहले ही पत्र खो गया तो सभी लोगों ने दौड़ धाम कर दिया घर में कि अरे यह पत्र कहां गया कहां गया आखिर में जब पत्र मिला तो उसमें क्या लिखा था कि हमको एक शेर संदेश और यह थोड़े एक दो वस्त्र भेज दीजिए तो जैसे ही यह सुना तो वैसे ही पत्र को साइड पर रख दिया अभी पत्र की जरूरत नहीं है चलो ये एक शेर संदेश और यह वस्त्र की व्यवस्था करें और इसको यहां से भेजने की व्यवस्था करें तो शास्त्र का इतना ही एक तात्पर्य होना चाहिए प्राधान्य होना चाहिए प्रयोजन होना चाहिए किंतु ऐसा नहीं होता मैंने पढ़ लेने के बाद में भी इस प्रैक्टिस के ऊपर में हम आगे बढ़ेंगे ऐसा कोई नेसेसरी नहीं है तमस आज के जीवन में बड़ा ही गहरा है तो सत्व इतना है नहीं तमस बहुत गहरा है इसके लिए यह मध्यम मार्ग आर्गुमेंट का इतनी डिटेल में भी आर्गुमेंट नहीं करनी है जिससे कि सामने वाला बिल्कुल इसको छोड़ के चला जाए सामने वाला अर्थात कि हम लोग आज के मॉडर्न साधक और फिर इतना ऊपर ऊपर से भी नहीं करना है क्योंकि आज की जो जनरेशन है सभी चीजों को प्रश्न करती है यह जो स्वामी जी को हाजरा के साथ में गप लगाना पसंद क्यों था तो हाजरा सभी चीजों को क्वेश्चन करता था सहज रूप से कुछ स्वीकार नहीं कर लेता था यदि कोई हजरा को मने खास करके धार्मिक जगत में क्या है ना कि ऐसी आस्था के ऊपर में में ले लेने वाली बहुत सारी बातें हैं कोई आकर के कहेगा अरे मैं तो वहां पर परमहंस को देख के आया तो फिर हजरा पूछेगा कि भैया तो परमहंस की क्या डेफिनेशन है बताओ ऐसा मतलब तो स्वामी जी इस तरह का स्केप्टिसिजम पसंद करते थे बोलकर के वो हमेशा हाजरा के साथ में जब भी ठाकुर के साथ में गप लगा दिया फिर थोड़ा सा भी ठाकुर के साथ में गप बड़ा इंटेंस हो जाता है ना नाच गान भजन कीर्तन नृत्य कीर्तन एकदम एक के बाद एक चलता ही रहता है तो फिर थोड़ा सा वो मने व रेस्ट करने के लिए रिफ्रेश होने के लिए यह हजरा के साथ में आकर बैठते थे तो वी आर समवेने द मिडल हमारा स्केप्टिसिजम बड़ा स्ट्रांग है और अपना मुमुक्षा सा वीक है इसके लिए इस तरह से एक बैलेंस आर्गुमेंट स्ट्रक्चर की स्वामी जी ने रचना की है मुझे जब यहां पर कोई आता है कोई कहता है कि हां हमको व उपनिषद सीखना है या मान लीजिए कठोपनिषद यहां पर ही एक कोई मुझे एक दो दिन पहले कह रहा था कि कठोपनिषद के क्लासेस चालू होने वाले हैं तो मैंने कहा कि देखो कठोपनिषद वैसे पढ़ना कोई बुरी बात नहीं है तुम जद श्लोक पढ़ कर के उसका अर्थ पढ समझ लो तो ज्यादातर उसमें आ जाएगा किंतु जिस तरह से ट्रेडिशनल वे में कठोपनिषद पढ़ा जाता है वो शंकराचार्य का भाष्य को लेकर के ऐसा पढ़ने की तुम में क्षमता ही नहीं है क्योंकि भी तुम्हारा फाउंडेशन ही नहीं है वो बेसिक एक साधना का फाउंडेशन होना चाहिए प्लस एक वाइड नॉलेज होना चाहिए यह जो आर्गुमेंट खड़ी कर रहे क्यों खड़ी कर रहे हैं वो भी तो एक बात है ना यहां पर जद स्वामी जी एक के बाद एक हमको आर्गुमेंट देते हैं मॉडर्न मेन की दृष्टि से देते हैं तो हमने यह थोड़ा बहुत बैकग्राउंड रीडिंग है मेरा बैकग्राउंड रीडिंग था बायोग्राफी हिस्ट्री और साइंस ऐसे कुछ सब्जेक्ट है कि जिसमें मेरा बैकग्राउंड रीडिंग था तो जैसे-जैसे मेरे मन में प्रश्न आते जाते हैं मैं देखता हूं स्वामी जी उस जैसे कि उसी प्रश्नों का समाधान देते रहते हैं तो फटाफट करके स्वामी जी को समझने में मुझे कोई असुविधा नहीं हुई किंतु आज से 4000 5000 साल पहले का क्या बैकग्राउंड रीडिंग था उन लोगों के मन में क्या प्रश्न थे उस प्रश्नों का समाधान शास्त्र में किस तरह से दिया है उसके लिए तो उस समय का बैकग्राउंड नॉलेज चाहिए तब कहीं जाकर के उस समय की आर्गुमेंट काउंटर आर्गुमेंट समझ पाएंगे जो कि मेरे पास आज नहीं है ज्यादातर लोगों के पास नहीं होती है जो लोग इस तरह से बचपन से ही शास्त्र का अभ्यास करते हैं जैसे कि हमार में जब ट्रेनिंग सेंटर में था बेलूरमठ में तो एक ब्रह्मचारी आया था साउथ इंडिया से बेंगलोर से तो उसका फैमिली ही इस तरह से शास्त्रीय परंपरा वाला फैमिली था पंडित ब्राह्मण फैमिली तो बचपन से ही बच्चे यही सब सीखते थे ने संस्कृत ग्रामर सीखते थे फिर संस्कृत सब किताबें पढ़ते थे शास्त्र पढ़ते थे उसका बचपन से ही ऐसा था तो बाय द टाइम वो ट्रेनिंग सेंटर में आया वह हमारे आचार्य महाराज से कभी-कभी उसका नॉलेज ज्यादा हो जाता था तो वह जदी कहेगा कि हां मुझे यह शंकर भाष्य पढ़ कर के यह आर्गुमेंट काउंटर आर्गुमेंट क्या है पढ़ना है डिटेल में तो उसके लिए ठीक है क्योंकि वह उस समय की अपनी ट्रेडिशनल भारतीय विद्या को अच्छे से उसने पढ़ा है हम लोगों का क्या है कि हमने आजकल का मॉडर्न सब कुछ बहुत कुछ पढ़ लिया है किंतु ट्रेडिशनल विद्या का अभ्यास हमने बहुत कम किया है और इस उम्र में उसमें में ज्यादा जाने की कैपेसिटी भी नहीं है तो स्वामी जी काउंटर आर्गुमेंट और आर्गुमेंट का चैन तो चलाते हैं यह सीक्वेंस तो चलाते हैं किंतु उसका बैकग्राउंड उसका कॉन्टेक्स्ट वो ट्रेडिशनल थिंकिंग की बजाय ट्रेडिशनल लर्निंग की बजाय मॉडर्न लर्निंग के ऊपर में करते हैं तो यह कॉस्मो लेक्चर जो है बहुत रीत से यूनिक भी है क्योंकि यहां पर मुझे ऐसा लगता है कि जिस जिस तरह से मैंने स्वामी जी की बायोग्राफी का स्टडी किया है फर्स्ट टाइम स्वामी जी के मन में यह जो डिफरेंट डिफरेंट वर्ल्ड व्यूज है वो एक साथ में कनेक्ट हुए हैं इससे पहले स्वामी जी शायद इस तरह से सोचे नहीं होंगे प्रत्येक नॉलेज अपने वो जिसको पीजीएन होल कहते हैं ना प्रत्येक नॉलेज अपने-अपने जगह पर वह रहेगा होता हो होगा किंतु सभी नॉलेज को इकट्ठा करके लोगों के सामने किस तरह से प्रस्तुत किया जाए ही इज अ मॉडर्न शंकराचार्य उस समय के शंकराचार्य थे उन्होंने पूरा भारत का भ्रमण करके बहुत सारे विद्वानों पंडितों ब्राह्मणों के साथ में आर्गुमेंट करके उनके माइंड में एक माइंड में एक आर्गुमेंट का स्ट्रक्चर रेडी हो गया था एक टेक्चुअल स्ट्रक्चर रेडी हो गया था कि हां इस स्ट्रक्चर के अनुसार मुझे अपनी बात अपने रीडर्स के सामने प्रस्तुत करनी है तो स्वामी जी ने पूरा यदि वराह नगर मठ का यदि हम थोड़ा सा खास करके स्वामी जी के जो भाई है उन्होंने बहुत सुंदर महेंद्रनाथ दत्त वरा नगर मठ का बड़ा ही सुंदर वर्णन है उनकी किताबों में अनफॉर्चूनेटली सिर्फ बंगोली में है और वोह भी हम लोग पब्लिश नहीं करते पता नहीं उसके अगेंस्ट में क्या है अभी तो कुछ कुछ एक इन एक्यूरेसी है किंतु कुछ इन एक्यूरेसी को दूर कर दिया जाए तो ओवरऑल बड़ा ही सुंदर वरा नगर मठ का वर्णन है गुरु भाई जब दिन रात ऐसा उनका वेव्स की तरह वेव्स की तरह एक के बाद एक मूड मैंने आता जाता रहता था यदि सेवा के बारे में एकदम स्टार्ट होगा तो वहां का लेटन कौन क्लीन करेगा सबसे पहले उसका मतलब एक कंपटीशन स्टार्ट हो जाता फिर जदी भक्ति के बारे में नृत्य कीर्तन का जद वेव आएगा तो तरंग जदी आएगी तो उम नृत्य कीर्तन जैसे कि वो पूरा वो भूतड़े बाड़ी कहते थे ना वो वराह नगर मठ को भूत भूतिया मकान तो पूरी पूरा मकान हिलने लगता जैसे कि अभी गिर के वो जमीन दोस्त हो जा जाएगा और कभी यह शास्त्र चर्चा का यह प्रवाह चलता तो ऐसा चलता इतना एक बार और कभी साधना का प्रवाह चलता एक बार लाटू महाराज ने कहा है अपनी लाटू महाराज की स्मृति में है लाटू महाराज कहते हैं कि मैंने एक बार ठान लिया कि मैं नरेंद्र जितना साधना करता है जितनी तपस्या करता है उतना मैं भी करूंगा तो ऐसा सोच नरेंद तो सबके सामने एक उज्जवल एक उदाहरण स्वरूप थे उज्जवल एक आदर्श के स्वरूप थे प्रेरणा के स्रोत थे ठाकुर ने ही तो उनको रख के गए थे सबके नेता बना करके कि उनकी एसेंस में यह जो डायरेक्ट डिसाइल है गुरुबाई है त्यागी लड़के हैं उनको गाइड करेंगे नरेण तो नरेण की तपस्या तो ऑफकोर्स प्रचंड तपस्या प्रचंड जब ध्यान तो लाटू महाराज ने एक बार ठीक कर लिया कि मैं नरेण के साथ में कंपटीशन करूंगा नरेण को हरा दूंगा य मैंने वहां पे ऐसा सब सुमधुर सब प्रसंग चलते रहते थे तो उन्होंने एक दिन बैठ कर के जब करना ध्यान करना शुरू किया सतत ध्यान किए जा रहे हैं सतत जप किए जा रहे हैं फिर थोड़ा सा उनका मन थोड़ा सामान्य भूमि पर आया उच्च भूमि से उतर कर के और फिर नरेंद्र के सामने देखने लगे नरेंद्र का ऑब्जर्वेशन करने लगे तो लाटू महाराज खुद लिखते हैं कि नरेंद्र जहां पर था उसको वहां तक पहुंचने के लिए मैंने जो इतना समय जो जब ध्यान किया तपस्या किया उतने ही टाइम में नरेंद ने इतनी तपस्या और एक्स्ट्रा कर ली है कि वो और कहीं दूर निकल गया है और कहीं सुदूर दूर निकल गया है तो फिर उन्होंने ठाना कि भले मैं फिर से उसका पीछा करता हूं फिर से उन्होंने जब ध्यान करने की शुरुआत की किंतु फिर जब वापस आए सामान्य भूमि पर और देखा तो जितना समय उन्होंने जब ध्यान किया था उतना ही समय में और कहीं और ज्यादा तपस्या करके स्वामी जी और कहीं आगे निकल गए थे तब लाटू महाराज ने ऐसा चार पांच बार हुआ फिर लाटू महाराज ने हार मान ली कि ना ठीक है ना ठाकुर ने नरेंद्र को हमारा जो नेता बना कर के गए हैं वोह ठीक ही किया है उसमें गलत कुछ नहीं किया है फ मैंने नरन की अथॉरिटी ठाकुर दे कर के गए थे बोलकर के गुरु भाइयों ने स्वीकार कर ली थी आंख बंद करके ऐसा नहीं था वहां पर कंपटीशन भी चलती थी सात्विक कंपटीशन इसको तो सात्विक कंपटीशन ही कहेंगे क्योंकि साधना में हमको आगे लेकर जाती है तो वैसे ही आर्गुमेंट भी प्रचंड आर्गुमेंट होती थी खास करके ये अभेदानंद जी महाराज अभेदानंद जी महाराज अपनी एक स्मृति कथा में कहते हैं कि मैंने एक बार ठीक किया कि नरेंद्र को मैं आर्गुमेंट में हराऊ और एक के बाद एक मैं शास्त्र के मैंने बहुत प्रिपरेशन की और एक के बाद एक शास्त्र के पॉइंट लेकर के नरन के साथ में आर्गुमेंट करने लगा तो एक समय ऐसा आया बाकी सब लोग देख रहे हैं कि देखते हैं कि नरेण हारता है कि जीतता है तो एक समय ऐसा आया कि नरेण अपनी स्वामी जी अपनी एंडोरेंस और लॉजिक के एकदम वो मने क्या कहेंगे कि उसकी बॉर्डर लाइन पे आ गए और एक फाइनल आर्गुमेंट यदि अभेदानंद जी ने किया काली महाराज ने तो उसका उत्तर स्वामी जी नहीं दे पाए तो काली महाराज तो इतने खुश हो गए मैंने नरेद्र को हरा दिया मैंने नरेद्र को हरा दिया तो नरेद्र क्या कहता है स्वामी जी क्या कहते हैं कि अच्छा एक काम करो आज का दिन रुक जाओ कल इसी बात को कल फिर से यहीं से फिर से शुरू करेंगे यहीं से इस बात को इस आर्गुमेंट को आगे बढ़ाएंगे तो काली क्या सोच काली महाराज क्या सोचते हैं वो तो एक कंप्लेसेंसी होता है एक खुशी का माहौल होता है गुरु भाई लोग भी बड़े आश्चर्य हो गए कि काली महाराज में ऐसी तो कौन सी काली महाराज ना काली तपस्वी कहते थे ये लोग एक कमरे में बैठे रहते थे काली महाराज और बहुत पढ़ाई लिखाई किया करते थे और जब ध्यान किया करते थे उस समय क्या था कि मठ का जितना भी कार्यकलाप होता था जो भी काम होता था जैसे बर्तन घिसना ठाकुर की सेवा करना खाना बनाना सबका भार शशि महाराज पर था तो शशि महाराज क्या करते थे कभी-कभी किसी को कुछ ना कुछ कुछ ड्यूटी दे दिया करते थे तो कोई उनको आटा बनाने में वो कोई हेल्प करेगा कोई चावल उठाने में हेल्प करेगा तो कोई ठाकुर के लिए फल काटने में हेल्प करेगा ऐसा कोई कोई लोग निरंजन महाराज है महापुरुष महाराज वगैरह थोड़ी-थोड़ी हेल्प बीच-बीच में किया करते थे बाबू राम महाराज है किंतु काली महाराज है जो कि उन्होंने स्पष्ट ना बोल दिया कि मैं किसी तरह से हेल्प नहीं कर पाऊंगा मैं तो जब ध्यान लेकर रहूंगा तो शशि महाराज ने यह कंप्लेंट स्वामी जी को की कि काली के कार्य में हाथ नहीं बटा रहा है तो स्वामी जी ने कहा कि देखो तुम तुम्हारा एक गुरु भाई तुम्हारा एक भाई तपस्या जब ध्यान लेकर के अभ्यास स्वाध्याय लेकर के रहता है तो उससे तुमको तो गर्व महसूस होना चाहिए उसकी कंप्लेन मत करो उसको जो करना है करने दो तो इस तरह स्वामी जी खुद इनकरेज करते थे तो काली के मन में काली महाराज के मन में ऐसा हो गया कि अभी तो मैं नरेंद्र को हराऊ ही तो एक दिन जब ऐसी बारी आई कि नरेद अपनी आर्गुमेंट की बिल्कुल बॉर्डर लाइन पर चला गया स्वामी जी तो उन्होंने कहा कि ठीक है आज इस बात को यहीं पे रोकते हैं यहीं पर विश्राम लेते हैं कल यहां से फिर से स्टार्ट करेंगे और दूसरे दिन क्या हुआ स्वामी जी ने काली ने काली महाराज ने जो आर्गुमेंट दी थी स्वामी जी ने एक के बाद एक एक के बाद एक इतना सहज रूप से उसका खंडन करने की शुरुआत की कि जितने भी बाकी गुरु भाई लोग यह डिबेट देख रहे थे वे लोग आश्चर्य चकित हो गए कि अरे ये ओवर नाइट नरेंद्र के भीतर में इतने नए-नए विचार नए-नए आइडियाज य नया नया थिंकिंग कहां से आया किंतु यही तो बात है कि ये देखिए कि दोनों तरह से ना इन लोगों का मन इन लोगों का लॉजिक इन लोगों की थिंकिंग प्रोसेस फॉर्मुले कैसे हुई है दो तरह से एक तो आपस में इतनी डिबेट करते हैं तो डिबेटिंग कैपेसिटी आर्गुमेंट करने की क्रिएटिव थिंकिंग करने की कैपेसिटी एक तो उनकी खुल जाती है एक जितने भी दरवाजे थे ब्रेन के वह सब ओपन हो जाते हैं दूसरा है कि रीडिंग इतना था यानी कि जो फैक्ट होना चाहिए जो डाटा होना चाहिए डेटा बैंक आज की लैंग्वेज में कहेंगे तो डेटा बैंक भी डेटाबेस भी इतना इन लोगों का बड़ा था इतना पढ़ेंगे इतना पढ़ेंगे शास्त्र पढ़ेंगे संस्कृत पढ़ेंगे कि उनके अपने शास्त्र में बेसिकली क्या कहां पर क्या कहा गया है उसका पूरा इंफॉर्मेशन इनको था तो दो चीज हुई एक तो है कि डाटा इनफ है इंफॉर्मेशन रॉ इंफॉर्मेशन कहेंगे वह तो सॉलिड उन्होंने अर्जन किया है दूसरा कि बार-बार आर्गुमेंट करने से वह जो एक हाजर जवाबी जिसको कहते हैं एक मैंने ऑन द स्पॉट एक स्पॉन्टेनििटी स्पन निटी जिसको कहते हैं वो उन लोगों में आ गई थी मने एक प्रेजेंस ऑफ माइंड आ गया था एक अलर्ट उनकी आर्गुमेंट करने की कैपेसिटी हो गई थी और तीसरा है ऑफ कोर्स कि जब आप साधना करते करते जब ध्यान करते करते स चेतना के उच्च से उच्च स्तर की ओर यात्रा करेंगे तब एक नया ही आध्यात्मिक जगत सुपरकॉन्शसनेस का एक वर्ल्ड एक मने हायर डायमेंशन वर्ल्ड जद अगेन टू यूज टुडेज मॉडर्न फिजिक्स एक हायर डायमेंशन वर्ल्ड ओपन हो जाता है वो आजकल कहता है ना वो क्वांटम डायनेमिक्स में कहता है कि वैसे क्लासिकल फिजिक्स कहता है चार डायमेंशन है स्पेस की तीन और टाइम की एक किंतु ये क्वांटम डायनेमिक्स कहता है कि 10 डायमेंशन है कोई कोई मैथमेटिकल मॉडल कोई कोई मैथमेटिकल मॉडल कहता है कि 12 डायमेंशन है तो ब हायर डायमेंशन वो फिर वो मैथमेटिक्स करके वो प्रूव करते हैं कि ये सब है तो ये एक हायर डायमेंशन वर्ल्ड ओपन हो जाता है सुपरकॉन्शसनेस लेवल पे और फिर वहां से विद्या और ज्ञान का एक अविरत प्रवाह अपनी जिवा प आकर के उपस्थित होता है जैसे ठाकुर ने कहा ना कि मा रास ठेले दे बंगाली में कहते हैं अर्थात कि वोह सुंदर उपमा कि जहां गांव में वो घंटी होती है ना वो धान को इसको ये करने की पीसने की उसमें घंटी को ऐसा गोल-गोल घुमाते हैं और पास में एक धान का बड़ा सा ढग रखा होता है गेहूं का या चावल का ऐसा कुछ भी और फिर जैसे-जैसे घंटी चलती जाती है और उसके भीतर में चावल या गेहूं उसका आटा बनता जाता है वैसे ही पास में कोई औरत या कोई बैठा होगा तो वो सा धक्का मार के अपने हाथ से और थोड़ा सा गेहूं या चावल उस घंटी में डाल देगा फिर घंटी चलेगी फिर घंटी पिसती रहेगी अर्थात कि घंटी के भीतर में गेहूं या चावल का अभाव नहीं होगा वहां पर चावल का एक बहुत बड़ा ढग है और एक औरत वहां प बैठी है कोई स्त्री बैठी है और अपने हाथ से बीच-बीच में वो चावल उस घंटी में डालती जाती है तो वैसे इसको राश ठेले दे बंगाली में कहते हैं अर्था तो ऐसा ठाकुर कहते थे कि मा राश ठेले दे अर्थात कि उनकी जिवा पर से गेहूं या चावल का अभाव नहीं होने वाला है जैसे ही थोड़ा सा भी अभाव हुआ मां सरस्वती और चावल गेहूं ढाल देगी ढाल देगी तो ये विद्या तीन तरह से इन्होंने अर्जित की थी एक तो डिबेट करते करते क्रिएटिविटी ओपन करती थी फिर ये इतना सॉलिड नॉलेज था कि इंफॉर्मेशन बैंक डाटा प्रॉपर उन्होंने कलेक्ट किया था और फिर एक हायर डायमेंशन वर्ल्ड में से एक हायर डायमेंशन नॉलेज के साथ में उन्होंने कांटेक्ट किया था तो स्वामी जी का यह सब कुछ थिंकिंग डिबेटिंग अ स्मरण मनन निदिद्यासन सब कुछ उस काकड़ी घाट प इकट्ठा हो गया था काकड़ी घाट प ये जो उनका विजन था वह सिर्फ यह नहीं था कि उन्होंने माइक्रो कजम और मैक्रो कजम में कनेक्शन देखा उन्होंने बहुत सारे कनेक्शन और भी देखे थे यह मॉडर्न वर्ल्ड और एसिएंट वर्ल्ड के भीतर में कनेक्शन ये अपना ट्रेडिशनल ईस्टर्न थिंकिंग और मॉडर्न वेस्टर्न थिंकिंग इस दोनों के बीच का कनेक्शन यानी कि यह जो आत्मन और जगत यह दोनों के बीच का जो संधि स्थल है जो संगम है व संगम उस समय स्वामी जी की नजरों के सामने खुल गया था और वही संगम का परिणाम यह दो लेक्चर है ऑफकोर्स स्वामी जी ने इस लॉजिक को बहुत सारे लेक्चर में उन्होंने डिटेल में इसके बारे में मैंने उसी लॉजिक को यूज करके ज्यादातर ले दिए किंतु दिस टू लेक्चर आर वेरी टिपिकल स्वामी जी मने प्योर स्वामी जी स्वामी जी का यदि कहा जाए कि ज्ञान योग में उनका जो स्पेसिफिक अवदान क्या है कि यह संगम किस तरह से करते हैं ट्रेडिशनल लर्निंग का और मॉडर्न लर्निंग का आत्मन की अंडरस्टैंडिंग का आधुनिक मनुष्य को किस तरह से यह सब समझाएंगे सो दिस टू लेक्चर आर वेरी टिपिकल स्वामी विवेकानंद तो कल हमने देखा कि स्वामी जी सबसे पहले तो यह इंजीनियरिंग जगत का इंजीनियरिंग हमको बताते हैं जो हमने देखा कि एक साइड में है कि एक अनंत इटरनल आत्मन है इटरनल भी नहीं कहेंगे शब्द खुट जाते हैं आत्मन का वर्णन करने के लिए इटरनल या तो फिर इम्मोर्टल यह शब्द तो समय के साथ में जुड़े हुए हैं बियोंड टाइम बियोंड स्पेस एक अ सत चित आनंदमय सत्ता ऐसा एक आत्मन है और साथ में ही जगत है जैसे रेल की दो पटरी की तरह साथ में चलते जाएंगे कभी विख नहीं होंगे कभी बिछड़ेंगे नहीं कभी उनका मिलन नहीं होगा इसी तरह से साथ-साथ में रेल की दो पटरी की तरह चलते जाएंगे ये स्वामी जी का ही एनालॉजी है रेल की पटरी का तो यह दो एक अनंत सताए हो गई माने अगेन अपनी लैंग्वेज की लिमिटेशन के भीतर में बात करते हुए और इसके भीतर में यह क्षणिक एक्जिस्टेंस हो गया एक तो है कि अपना सूक्ष्म शरीर आत्मन के ऊपर में जन्म धारण करता है यह सूक्ष्म शरीर के अपने देह को धारण करता है स्थूल देह को और यही स्थूल देह यह ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय के द्वारा इस जगत के साथ में संपर्क में आता है तो यह पूरा जगत प्रपंच इस तरह से रचा जाता है तो यह एनालिसिस करने के बाद में स्वामी जी एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग टॉपिक उठाते हैं पुनर्जन्म का स्वामी जी कहते हैं हियर कम्स अ वेरी इंटरेस्टिंग क्वेश्चन यहां पर एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग प्रश्न हमारे सामने उपस्थित होता है दैट क्वेश्चन व्हिच इज जनरली नोन एज द री इंकार्नेट ऑफ द सोल यह प्रश्न जिसको हम सामान्य रूप से आत्मन का पुनर्जन्म इस शब्दों में पहचानते हैं अभी ऑफकोर्स यह आत्मन का पुनर्जन्म तो होता ही नहीं है किंतु तो क्या करें यह अमेरिका में बैठ कर के लेक्चर देने का यह सब एक लिमिटेशंस है कि पुनर्जन्म होता है अंतःकरण का आत्मन तो आने जाने से पर है तो हम थोड़ा सा स्वामी जी के शब्दों को मॉडिफाई करके ट्रांसलेशन करेंगे कि अंतःकरण के पुनर्जन्म का सम टाइम्स पीपल गेट फ्राइटें एट द आइडिया कभी-कभी लोग डर जाते हैं इस विचार से एंड सुपरस्टिशन इज सो स्ट्रांग दैट थिंकिंग मैन इवन बिलीव ट दे आर द आउटकम ऑफ नथिंग एंड देन विद द ग्रांडेस्ट लॉजिक ट्राई टू डिड्यूस द थिरी दैट लद दे हैव कम आउट ऑफ जीरो दे विल बी इटरनल ववर आफ्टरवार्ड्स कभी-कभी लोग इस बात से डर जाते हैं कि वे लोग अनंत काल तक जन्म लेते रहेंगे एक के बाद एक जब तक कि उनकी मुक्ति नहीं होगी या तो फिर जब तक कि प्रलय नहीं आएगा तो लोग इस बात से डर जाते हैं और इसके विरुद्ध में सब थिरी खड़ी करना शुरू करते हैं यहां तक कि जो लोग बहुत ज्यादा बुद्धिशाली है बौद्धिक है वे लोग भी ऐसा सोचना शुरू कर देते हैं कि हम लोग शून्य से प्रकट हुए हैं किंतु हमारे भीतर में ईश्वर की डिविल करर के हम अनंत काल तक रहेंगे अर्थात कि देह नहीं रहेगा यहां पर स्वामी जी ये क्रिश्चन थियोलॉजी के बारे में थोड़ा सा कहते हैं नाम नहीं देकर के कि शून्य में से सर्जन हुआ इस जगत का किंतु फिर मनुष्य की जब मौत होगी मृत्यु होगी तब वह अनंत काल तक पड़ा रहेगा कब्रस्तान में फिर जब डे ऑफ जजमेंट आएगा वह भगवान सभी आत्माओं को खड़ी करेंगे और उनके वह बैलेंस शीट के अनुसार कितना अच्छा कर्म किया कितना बुरा किसी को स्वर्ग में भेजेंगे किसी को नरक में भेजेंगे तो यह तो आप मान लिया कि मेरी आत्मा अमर है मैं शून्य में से सर्जित हुआ हूं किंतु मैं स्वर्ग में और नरक में जाकर के अनंत काल तक जिऊंगा यह आपको स्वीकार है किंतु यह कैसे आप नहीं स्वीकार करते भाई कि शून्य में से सर्जन कैसे हो सकता है कोई चीज अमर है किंतु कोई चीज अनंत नहीं है यह कैसे हो सकता है आप अमर है किंतु अनंत नहीं है यह कैसे हो सकता है कि आपका उद्भव है शून्य में से सर्जन हुआ है किंतु आपका मृत्यु नहीं है यदि जिसका सर्जन हुआ है उसका मृत्यु अवश्यंभावी है जिसका मृत्यु नहीं है उसका अर्थ है कि जिसका सर्जन ही नहीं हुआ है सर्जन नहीं होगा उसी का मृत्यु नहीं होगा जिसका सर्जन होगा जन्म मात्र प्राणी मात्र जो जन्म धारण करता है उसका मृत्यु अवश्यंभावी है ऐसा मत सोचिए कि मैं शून्य में से आया हूं भले ही चाहे मैं शून्य में से आया हूं किंतु स्वर्ग या नर्क में जाकर के मैं अनंत जीवन का उपभोग करूंगा आइडियल है कि मैं स्वर्ग में जाऊंगा और अनंत आनंद का उपभोग करूंगा तो यह तो होने नहीं वाला है यह लॉजिक में बैठता नहीं है इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि बहुत ज्यादा बुद्धिशाली लोग भी इस तरह की अंधश्रद्धा भरी बातें हमको को समझाते हैं तुम्हारा सर्जन शून्य में से हुआ है किंतु तुम स्वर्ग में जाकर के अनंत काल तक स्वर्ग के सुखों का उपभोग किया करोगे दोस ट कम आउट ऑफ जीरो विल सर्टेनली हैव टू गो बैक टू जीरो स्वामी जी कहते हैं ऐसा नहीं होगा शून्य में से यदि सर्जन हुआ है तो मृत्यु के बाद में यही मिट्टी में मिल जाना है इसी शून्य में मिल जाना है नो आफ्टर लाइफ इसके बाद में मृत्यु के बाद का जीवन आप लोगों के लिए नहीं है ऐसा मत सोचिए कि बहुत अच्छे काम किए इसलिए अभी मैं स्वर्ग में जाऊंगा बहुत बुरे काम में देखिए इन लोगों का प्रॉब्लम कहां पर हो जाता है किसी भी धर्म का धर्म का क्या अर्थ है पता है कि आप लोगों को कंट्रोल में करना चाहते हैं या तो फिर आप लोगों को डिसिप्लिन में करना चाहते हैं यदि आप लोगों को डिसिप्लिन नहीं करेंगे तब तक कोई साधना नहीं करेगा आज का समाज ऑलरेडी बहुत ज्यादा डिसिप्लिन है बोलक के हम इस तरह से सोचते नहीं है किंतु अभी जैसे खास करके क्रिश्चियनिटी के शुरुआत के दिनों की प्रारंभिक दिनों की ही बात कर ले उस समय क्या था कि रोमन एंपायर डिस इंटीग्रेट हो रहा था और ये बर्बेरिस के अटैक जो इस जो सिटी स्टेट थे यह रोम था और बाकी उनका जो साम्राज्य उसके ऊपर हो रहे थे अभी जहां पर भी ये बर्बेरिस यानी कि ये जर्मनिक ट्राइब्स वे लोग अटैक करेगी वहां पर पूरा शहर के शहर जला देंगे पुरुषों और बच्चों को मार देंगे स्त्रियों पर अत्याचार करेंगे जो भी धन होगा वह लूट के ले जाएंगे अर्थात कि यदि एक शहर में यह बर्बेरिस प्रवेश किए तो पूरा खंडहर बना कर के शहर को छोड़ेंगे और फिर वह शहर कभी भी फिर से जीवित नहीं होने वाला है इस हद तक ये लोग डिस्ट्रक्शन करते थे तो क्रिश्चियन जो फोर फादर्स थे उस समय के व शरू शरू के जो जिन लोगों में सही सही तपस्या थी उस समय के पादरी उस समय के बिशप उस समय के चर्च एल्डर्स वे लोग क्या करते थे जब यह बर्बेरिस आते थे तो शहर के सामने खुद जाकर खड़े रह जाते थे कहते थे कि देखो मेरे पास में ईश्वरीय शक्ति है तुम लोग ईश्वर को स्वीकार करो तुम लोग क्रिश्चियनिटी को स्वीकार करो तो तुम लोगों को स्वर्ग में जाने को मिलेगा और यदि तुम लोग इस शहर पर आक्रमण करोगे तो तुम नर्क में जाओगे देखिए एक बिशप को एक धार्मिक व्यक्ति को यह सब करना पड़ता है क्योंकि रोमन एंपायर की जो परिस्थिति थी शहर की रक्षा करने के लिए सैनिक थे ही नहीं पुरुषों में वो दम ही नहीं था कि शहर की रक्षा करें तो ऐसा कई बार हुआ है कि यह जो बर्बेरिस जिनका कि पूरा भीतर से राक्षस के जैसे हैं लोगों के ऊपर में अत्याचार करना स्त्रियों के ऊपर में अत्याचार यह सब उनका मन में पूरा भरा हुआ है वे लोग भी सडन सरेंडर कर देते थे कि हां ओके चलो कि एक आफ्टर लाइफ है एक स्वर्ग में जाना है स्वर्ग में जाने के लिए चलो अब जो आप कहते हैं हमको स्वीकार्य है तो मनुष्य को बुरे रास्ते से हटा कर के अच्छे रास्ते की ओर जाने के लिए स्वर्ग तो उनको चाहिए एक लॉजिकल एक बनता है ही बात और बाद बाद में जब चर्च में करप्शन होना स्टार्ट हुआ तो यह पोप क्या करते थे कि स्वर्ग का पासपोर्ट सेल करते थे अर्थात कि आपको कोई दुराचार करना है तो पहले तो चर्च का प्रभाव तो बहुत बढ़ गया था यह मिडिल एजेस की बात है वो चर्च के शुरू शुरू के दिन थे अब ये मिडल एजेस की बात आ गई कि चर्च का पावर पूरे यूरोप में इतना फेल गया था इतना स्ट्रांग हो गया था कि अभी सभी लोग उनसे डरते थे तो थोड़ा सा भी पाप तो अभी मनुष्य के भीतर में तो पाप ही है खास कर के यह राजा और यह जो लैंडलॉर्ड्स है उनके भीतर में तो वे लोग क्या करेंगे वो जो बिशप होगा स्थानिक उसको बोलेंगे आप कुछ व्यवस्था कर दीजिए मुझे ये सब थोड़ा सा करना है तो वो क्या करेंगे कि पोप स्वर्ग का पासपोर्ट सेल करते हैं इतना आप उनको डोनेशन दे दीजिए स्वर्ग में जाने का पासपोर्ट दे देंगे तो जैसे ही स्वर्ग में जाने का पासपोर्ट मिला पासपोर्ट फॉर हेवन तो वैसे ही उन लोगों ने वो गड़बड़ करना शुरू कर दिया ब्रिटेन का एक राजा था दूसरी शादी करनी थी क्या करें वो भी तो शादी को आप डाइवोर्स नहीं ले सकते चर्च में तो इसका बड़ा ही भयानक विरोध होता है तो वह जो वहां का लोकल बिशप था उसको खिला दिया रुपया और वो पोप के पास में से वो पासपोर्ट फॉर हेवन लेके आ गया तो फिर दूसरी शादी कर दी तो यह सब देखिए कि मनुष्य को डिसिप्लिन में रखना है असत रास्ते से यदि उसको सत रास्ते की ओर ले जाना है तो यू हैव टू उनको टेंप्ट करना पड़ेगा एक नर्क का भय दिखाना पड़ेगा ये जो डेंट है ना जिसने ये ये सब नर्क की कल्पना की है भयावह नर्क की कल्पना की है जैसे कि वहां पर मनुष्य को लेकर के जलते हुए तेल के भीतर में डालते हैं उन लोगों के ऊपर में राक्षस लोग अत्याचार करते हैं ऐसे भयानक भयानक नर्क का उन्होंने पेंटिंग किया है जिससे कि लोग डरे हमेशा कि ये भयानक नर्क है और फिर एक सुंदर स्वर्ग की कल्पना की है जिससे कि हम लोगों को ये प्रेरणा मिले कि नहीं मुझे नर्क में नहीं जाना स्वर्ग में जाना है स्वामी जी कहते हैं कि जब वो साउथ ईस्ट एशिया में भ्रमण कर रहे थे ना ये म्यानमार वगैरह ये जो साउथ स्टेशन कंट्रीज है वो देख कर के आश्चर्य हो गए कि बौद्धि नर्क इतना भयानक है ऐसे मने टॉर्चर करते हैं नर्क में मनुष्य को ले जा करर के स्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य की इमेजिनेशन इस हद तक की विकृत कल्पनाएं भी कर सकती है देख कर के मुझे आश्चर्य होता है ऐसे ऐसे मने सब टॉर्चर के सीन वहां पे पेंट किए गए हैं बुद्धिस्ट मॉनेस्ट्रीज में तो ये नर्क की कल्पना और यह स्वर्ग की कल्पना कि हमेशा के लिए आपको रहना है यदि बुरा काम करेंगे तो हमेशा नर्क भोग करना है अच्छे काम करेंगे तो हमेशा स्वर्ग भोग करना है स्वर्ग का उपभोग करना है तो यह तो आपने तो ठीक कर लिया कि स्वर्ग और नर्क तो चाहिए ही चाहिए वरना तो माने आप इस साइ साइनिंग जिसको कहते हैं ना मने एक चतुराई पूर्णक सोच है कि मुझे लोगों को कंट्रोल में रखना है मुझे तो वैसे नर्क और स्वर्ग में विश्वास नहीं किंतु लोगों को कंट्रोल में रखने के लिए मैं स्वर्ग और नर्क सोचूंगा ऐसा एक सिनिसिजम भी हो या तो आप जिनली विश्वास करते हो दोनों तरीके से आपको एक आफ्टर लाइफ तो चाहिए एक इटरनल लाइफ तो चाहिए ही चाहिए एक माने एक ऐसा जीवन जिसका अंत ना हो तो फिर आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि जो जीवन जन्म हुआ है वह उसका अनंत काल तक चलेगा यह लॉजिक में बैठता नहीं है यदि आपको अनंत काल तक मृत्यु के बाद में रहना है अनंत काल तक जीना है तो आपका अनंत काल से आपका अस्तित्व होना चाहिए तभी यह दो पल्ले बैलेंस होंगे आपका शून्य में से सर्जन हुआ है किंतु आप अनंत काल तक चलेंगे ऐसा थोड़ी ना होने वाला है देयर कैन बी नो टू इंफिनिटीज इन दिस वर्ल्ड ये मैथमेटिक्स का सिद्धांत है इंफिनिटी एक ही हो सकती है इंफिनिटी एक से ज्यादा नहीं हो सकती तो एक के बाद एक लोगों का जन्म होता गया और इनफा टाइम तक वो जीवित रहेंगे तो मैथमेटिकली ही गलत हो गया तो स्वामी जी यहां पर कहते हैं कि जो लोग बहुत ज्यादा बौद्धिक है वे लोग हमको ऐसा उल्टा पुल्टा सिखाते हैं कि हमारा एक अनंत जीवन तो है किंतु सर्जन हुआ है शून्य में से नादर यू नोर आई नोर एनी वन प्रेजेंट हैज कम आउट ऑफ जीरो नॉर विल गो बैक टू जीरो ना ही मैं ना ही आप ना ही और कोई ना हम में से कोई भी शून्य में से रजित हुआ नहीं है ना ही हम मृत्यु के बाद में शून्य में मिलने वाले हैं हमारा अस्तित्व अनंत काल तक था हे रहेगा और यह अनंत की कल्पना भी अगेन शब्दों की यह जो लिमिटेशन है वेदांत के बारे में जितना हम डिस्कस करते हैं यह हमारे शब्दों की लिमिटेशन हमको बीच में आती है अनंत का कांसेप्ट समय के भीतर है आत्मन एक्चुअली समय और अवकाश से परे है तो ये हमारा एक्जिस्टेंस ही जद समय और अवकाश से परे हैं तो आपने ऐसा कैसे सोच लिया कि समय के भीतर में कोई एक समय है मेरा बर्थ जैसे मान लीजिए कि 1980 में हुआ है किसी का बर्थ है 1970 में हुआ है किसी का 1990 में हुआ है तो ऐसा समय के भीतर में अपना बर्थ ईयर तो है किंतु एंड ईयर नहीं है ऐसा होने वाला नहीं है हम सभी लोग अनंत काल से थे है और रहेंगे तो आज यही तक कल सैटरडे है तो फिर मंडे को मिलेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम स श्री राम कृष्णर्पण मस्तु