Swami Vivekananda
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः सो वी वर टॉकिंग अबाउट स्वामी विवेकानंदास टीचिंग्स स्पेसिफिकली ऑन अद्वैत वेदांत। आई एम शेयरिंग माय स्क्रीन हियर एस यू कैन सी व्हाट ही सेस। सो वी सॉ यस्टरडे द डे बिफोर यस्टरडे दैट हाउ अह डिफरेंट फिलॉसोफीस ऑफ रिलीजियस थिंकिंग डेवलप्ड ओवर ए पीरियड ऑफ़ टाइम हिस्टोरिकली एंड हाउ अद्वैत वेदा अद्वैत वेदांता इज़ द कलमिनेशन ऑफ ऑल द रिलीजियस फिलॉसोफीज़ दैट हैव कम सो फार बिफोर अस नाउ व्हाट डिफरेंशिएट्स व्हाट इज द मेजर डिफरेंस डिफरेंस बिटवीन अद्वैत एंड नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस। बेसिकली नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस आर अ लिटिल बिट इनसिक्योर। दे ऑलवेज से दैट सी यू विल हैव टू फॉलो अस टू द डॉट एंड वी शो यू द पाथ ऑफ रिडेंशन एंड वी आर द मोस्ट एलिजिबल टू डू सो। दिस इज़ देयर इनेट इनसिक्योरिटी बिकॉज़ दे अंडरस्टैंड दिस ऑल दिस नॉन अद्वैतिक फ़िलॉसोफी मेड बी अ क्रिश्चियनिटी मे इट बी। बुद्धिज्म मेड बी जैनिज्म मेड बी वैष्णविज़्म मेड बी शा स्कूल ऑफ़ अह रिलीजन एनी ऑफ़ दिस नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफी दे आर बिट इनसिक्योर एंड दे ऑलवेज क्लेम दैट इन ऑर्डर टू हैव रिडेंशन अकॉर्डिंग टू डिफाइंड बाय अस एज़ डिफाइंड बाय अस। इफ यू वांट टू अटेंड रिडेंशन एज़ डिफाइंड बाय अस यू विल हैव टू फॉलो द पाथ दैट वी विल ले डाउन। एंड नाउ अ डेज नो वन सेस दैट अदर्स आर रोंग एज इट यूज्ड टू हैपन प्रीवियसली। प्रीवियसली देयर वाज़ सो मच इनटोलरेंस, सो मच द्वेष, सो मच हेट्रेड अमोंग अह फॉर अदर फिलोसोफीस दैट दे यूज्ड टू से देट ओके, इफ यू फॉलो अदर्स, यू मे कम टू हार्म, एंड यू शुड नॉट फॉलो अदर्स। नाउ अ डेज़ पीपल डू नॉट क्लेम दिस आउटराइट। नाउ अ डेज पीपल डू नॉट से दैट ओके फॉलोइंग अदर फिलॉसोफीस इज हार्मफुल टू यू बट दे विल से दैट वी आर द बेस्ट वी आर द बेटर अदर फिलॉसोफीस आर इनफीरियर टू अस अदर स्कूल्स ऑफ रिलीजियस थिंकिंग आर इनफीरियर टू अस दैट इज व्हाट दे क्लेम नाउ डेज बट अद्वैत वेदांता हैज़ नो इनसिक्योरिटी एट ऑल अद्वैत वेदांता इज़ सुप्रीमली कॉन्फिडेंट दे से दैट यू मे फॉलो योर पाथ टू रिडमशन पाथ टू सेल्वेशन और पाथ टू निर्वाणा इन व्हिच एवर वे यू डिफाइन योर पाथ टू योर स्पिरिचुअल जर्नी यू कैन रीच योर गोल बाय एनी मींस दैट इज सूटेबल टू यू अद्वैत वेदांता सेस दिस ऑल द स्कूल्स ऑफ द रिलीजियस फिलॉसोफीस ऑल द स्कूल्स ऑफ स्पिरिचुअल साधना आर वेरियस पाथ्स एज़ डेवलप्ड अकॉर्डिंग टू दी साइकोलॉजिकल नेसेसिटीज़ साइकोलॉजिकल रिक्वायरमेंट्स ऑफ द साधका का दैट मींस ईच एंड एव्री पाथ हैज़ इट्स ओन रिलेवेंस विद इन द ग्रांड स्कीम ऑफ़ थिंग्स विद इन दिस कॉस्मिक यूनिवर्स ईच एंड एव्री पाथ ऑफ साधना एव्री पाथ ऑफ रिलीजियस प्रैक्टिस हैज़ इट्स ओन प्लेस बिकॉज़ ऑन अर्थ वी कैन सी दैट 700 करोड़ ह्यूमन बीइंग्स आर लिविंग एंड एज़ वी डिस्कस दैट इफ एवरी पर्सन हैज़ अ यूनिक फिंगरप्रिंट इफ एव्री पर्सन हैज़ अ यूनिक रेटिना पैटर्न देन एव्री पर्सन माइंड इज सो फार मोर कॉम्प्लिकेटेड कंपेयर टू आवर फिंगरप्रिंट्स और कंपेयर टू आवर रेटिना पैटर्न्स माइंड इज सो फार मोर कॉम्प्लिकेटेड फार मोर कॉम्प्लेक्स अ मशीन दैट मींस एव्री पर्सन हैज़ अ यूनिक माइंड एव्री पर्सन हैज़ अ यूनिक पर्सनालिटी एव्री पर्सन हैज़ अ यूनिक पर्सपेक्टिव ऑन लाइफ एव्री पर्सन हैज़ हिज़ ओन फिलॉसोफी ऑफ़ लाइफ सो फॉर फॉर ईच एंड एवरी पर्सन देयर इज अ डिफरेंट पाथ प्रिस्राइब्ड इन आवर शास्त्राज़। दिस ऑल दिस थाउजेंड्स एंड थाउजेंड्स ऑफ महापुरुष ऋषि प्रोफेट सेंट्स बुद्ध मुनिज़ एंड मक्स दे हैव कम ऑन प्लेनेट अर्थ। ईच ऑफ़ देम हैव डन साधना अकॉर्डिंग टू देयर अकॉर्डिंग टू देयर कर्म कर्म प्रवाह एंड दे हैव डिफाइंड अ पाथ। सो ईच एंड एव्री पाथ इज़ अ वैलिड पाथ। यू कैन फॉलो एनी ऑफ़ देम इन ऑर्डर टू अटेन द अल्टीमेट गोल। दिस इज़ दी क्लेम ऑफ़ वेदांता। सो दिस इज़ द यूनिकनेस। दिस इज़ द फर्स्ट यूनिकनेस ऑफ़ वेदांता एंड देन देयर इज़ द सेकंड यूनिकनेस ऑफ़ वेदांता। एवरी अदर रिलीजन मे इट बी अह जैनिज्म एंड बुद्धिज्म हु फॉलो दिस गॉड विदाउट फॉर्म। और रेदर दे डोंट इवन से देयर इज़ अ गॉड दे निर्वाण और अ केवली स्थिति दिस दिस इज़ विदाउट फॉर्म इन अ स्पिरिट फॉर्म। सो मे इट बी दोज़ और एनी ऑफ दिस रिलीजन हु फॉलो द गॉड वि फॉर्म लाइक मदर काली लाइक मदर दुर्गा लाइक जीसस और लाइक कृष्णा और लाइक रामा एनी ऑफ़ दिस रिलीजन दैट फॉलो अ गॉड वि फॉर्म और विदाउट फॉर्म लाइक बुद्धिज्म एंड जैनिज्म दे ऑल सिक देयर गॉड और निर्वाणा आउटसाइड ऑफ अस आउटसाइड ऑफ आवर बॉडी दे डू नॉट से दैट निर्वाणा इज वििन देम दिस क्लेम इज एक्सक्लूसिव टू अद्वैत वेदांता। अद्वैत वेदांता सेस दैट अल्टीमेट रियलिटी ऑफ द वर्ल्ड व्हिच मे वी मे कॉल आत्मन और ब्रह्मन इट रिसाइड्स वििन अस। वी आर द अल्टीमेट रियलिटी ऑफ़ द वर्ल्ड। ऑफ़ कोर्स देयर इज़ अह देयर इज़ अ स्क्रीन ऑफ़ माया बिटवीन अस एंड दैट अल्टीमेट रियलिटी। एंड वी हैव टू गेट रीड ऑफ़ दिस माया। नाउ वी मे गेट रिड ऑफ़ दिस माया इन एनी हाउ इज़ पॉसिबल फॉर अस। बाय कर्मा बाय ज्ञाना बाय भक्ति बाय मेडिटेशन बाय एनी अदर मींस पॉसिबल फॉर अस वैलिड फॉर अस। वी कैन टियर अपार्ट दिस स्क्रीन ऑफ माया एंड देन वी कैन अटेन व्हाट इज राइटफुली आवर्स। व्हाट इज आवर ट्रू नेचर व्हाट इज आवर ब्रह्म नेचर दैट वी कैन अटेन आफ्टरवर्ड्स। सो दिस इज दी मेन डिफरेंस बिटवीन अद्वैतिक फिलॉसोफी एंड नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस। नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस इन टर्न कैन बी डिवाइडेड इन टू कैटेगरीज़। दोज़ फिलॉसोफीस हु फॉलो गॉड वि फॉर्म दैट इज वैष्णविज्म दैट इज बुद्ध दैट इज से क्रिश्चियनिटी और दैट इज़ शाक्त ट्रेडिशन हु फॉलो लॉर्ड शिवा एटसेट्रा एनी ट्रेडिशन दैट फॉलोस गॉड इन ह्यूमन फॉर्म दैट इज़ वन ब्रांच ऑफ़ नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस एंड अनदर ब्रांच ऑफ़ नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस इज़ द श्रमण स्कूल दैट इज़ जैनिज्म एंड बुद्धिज्म दे डू नॉट बिलीव दैट देयर इज़ अ गॉड इन ह्यूमन फॉर्म दे बिलीव दिस निर्वाणा और केवली स्थिति इज़ अल्टीमेट स्टेशन इन ह्यूमन जर्नी एंड दैट कैन बी अटेंड बाय परफेक्ट रनाउंसिएशन बाय परफेक्ट डिसिप्लिन ऑफ लाइफ। सो वी मे से देयर आर थ्री बेसिक ब्रांचेस ऑफ़ फिलॉसोफी। ऑन द टॉप देयर इज़ अद्वैता बिलो अद्वैता देयर इज़ अद्वैतिक फिलॉसोफीज़। और वी मे से नॉन अद्वैतिक फिलॉसोफीस अमोंग द नॉन अद्वैतिक देयर इज़ अ गॉड विथ फॉर्म एंड देयर इज़ अ निर्वाण ब्रांच ऑफ़ फिलॉसोफी और श्रवण ब्रांच ऑफ़ फिलोसोफी। सो व्हेन वी रीड स्वामी विवेकानंदा वी हैव टू अंडरस्टैंड दैट द वर्ड्स दैट ही इज़ यूजिंग टू डिस्क्राइब हिज आइडियाज। समटाइम्स ही इज़ टॉकिंग अबाउट गॉड विथ फॉर्म। समटाइम्स ही इज़ टॉकिंग अबाउट निर्वाणा। समटाइम्स ही इज़ टॉकिंग अबाउट अद्वैता। दैट इज़ आत्मन और ब्रह्मन व्हेन वी अंडरस्टैंड फ्रॉम व्हिच फिल स्वामी विवेकानंदा कंसीडर्स ऑल थ्री ब्रांचेस ऑल थ्री मेजर ब्रांचेस ऑफ रिलीजन एज वैलिड पाथ बट इन ऑर्डर टू अंडरस्टैंड व्हाट ही इज़ ट्राइंग टू से वी हैव बेटर टू अंडरस्टैंड द वर्ड्स दैट ही इज़ यूजिंग एंड हाउ वी कैन इंटरप्रेट हिज़ वर्ड्स इन द लाइट ऑफ़ 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गॉड आर गॉड गेट फ्रीडम एंड इवन एट द कॉस्ट ऑफ लाइफ। नाउ व्हाट ही सेज़ हियर डिफरेंशिएशन क्रिएट्स दिस वन सेंटेंस दिस अंडरस्टैंडिंग ऑफ दिस वन सेंटेंस इट कैन टेक सच अ लॉन्ग अमाउंट ऑफ टाइम। बेसिकली ही वांट्स टू से दैट इफ वी सी आवरसेल्फ इन एवरीवन इन गीता इज सेड दैट वेदर इट बी अ ब्लेड ऑफ ग्रास वेदर बी ए डॉग वेदर बी अ ह्यूमन बीइंग वेदर इट बी ए एलीफेंट वी हैव टू सी आवरसेल्फ इन एवरीवन व्हाई बिकॉज़ द आत्मन व्हिच इज़ यूनिवर्सल और रेदर वी मे से बियड स्पेस एंड टाइम आत्मन आत्मन व्हिच इज़ आल परवेडिंग दिस सेम आत्मन रिसाइड्स इन एव्रीथिंग दैट इज़ अह इन दिस रियलिटी। सो इफ आई से दैट आई एम दी आत्मन देन आई विल से दैट यू आर आल्सो आत्मन। आई विल से दिस टेबल इज आल्सो आत्मन। दिस दिस बिल्डिंग इज आल्सो आत्मन। दिस गार्डन इज आल्सो आत्मन। दिस ट्रैफिक दिस टेंपल, द ठाकुर स्टोन इमेज इनसाइड दैट टेंपल। एवरीथिंग इज मेड ऑफ दी आत्मन। बट व्हेन आई एम अनेबल टू सी दैट व्हेन आई सी दैट यस आई एम समवन। आई एम इन चार्ज ऑफ दिस पर्टिकुलर डिपार्टमेंट। आई एम डूइंग सच अ गुड वर्क। दैट मींस आई एम बेटर देन अदर्स। आई एम आई हैव सच अ प्राइड इन 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गार्डन। एवरीथिंग दिस बुक्स एंड एवरीथिंग इज ब्रह्मन इटसेल्फ। बट बिकॉज़ ऑफ़ दिस इग्नोरेंस ऑफ़ माया वी कैन नॉट अंडरस्टैंड दैट इट इज़ ब्रह्म। सो वंस वी अंडरस्टैंड दिस अद्वैत वेदांता इट विल लेड अस टुवर्ड्स गॉड। एंड वंस वी अंडरस्टैंड दिस अद्वैत वेदांता व्हेन वी गेट बिय्ड डिफरेंशिएशन व्हेन वी गेट बिय्ड दिस द्वैता देन यू ककर लाइफ एंड डेथ एंड रीच इटरनल सेमनेस एंड आर इन गॉड आर गॉड सी व्हाट स्वामी जी सेस यू विल बिकम गॉड व्हाई बिकॉज़ दिस इज व्हाट अद्वैत वेदांता टीचेस अस दैट आई मसेल्फ आई एम ब्रह्मन आई
श्रीरामकृष्ण कथामृत : चतुर्थ दर्शन
डोंट हैव टू गो लुक आउटसाइड ऑफ मी मुझे कहां वो कहीं आकाश में ब्रह्म है तो मुझे उनको खोजने के लिए जाना है। ऐसा नहीं है। ब्राह्मण जो है मेरे भीतर में ही है। तो इसलिए जब मैं यह अद्वैत वेदांत समझ लेता हूं तब मैं यह समझ लेता हूं कि मैं जो हूं या आप है या इस जगत में जो कुछ भी है हम ब्रह्म से ही बने हुए हैं। जैसे वो जो कथामृत में मास्टर महाशय लिखते हैं ना जब वो दक्षिणेश्वर आते हैं तो देखते हैं सब कुछ वो मोम का बना हुआ है। वैक्स वैक्स में से ये जो कैंडल बनता है ना ये जो मोमबत्ती जो बनती है तो मास्टर महाशय कहते हैं जैसे मोम का वो जो खिलौने के घर होते हैं ना वो मोम का बना हुआ फ्रूट होता है हम डेकोरेशन के लिए रखते हैं वो मोम का बना हुआ खिलौने होते हैं तो जैसे एक ऐसी जगह पर जाएंगे जहां पे ऐसे मोम के खिलौने बिकते हैं वहां आपके जो कुछ भी आप देखेंगे सब कुछ मोम का बना होगा तो वैसे ही मास्टर महाशय जब दक्षिणेश्वर जाते हैं तो कहते हैं कि मुझे ऐसा लगता है जब मैं यहां पे आता हूं तो देखता हूं कि जैसे सब कुछ ये प्रेम से बना हुआ है। ठाकुर का ये जो प्रेम है, ठाकुर का ये जो भलोभासा है, ये जो डिवाइन लव है जो मां काली का सब कुछ जो है वो एक दिव्य आभा से बना हुआ है। और यदि ये जो कालीवाड़ी के पुजारी बाकी जो पुजारी थे भंडारी जो वगैरह थे वो एक नंबर के करप्ट लोग थे। वो इवन वे लोग भी जो है ये जो पशु पंखी जो है पेड़ पर रहते हैं। ये जो पेड़ पौधे हैं मां गंगा जो है ये बिल्डिंग जो है ये भक्त लोग जो है जो ठाकुर को मिलने के लिए ठाकुर की अमृतमय वाणी सुनने के लिए आए हैं। सब कुछ ऐसा लगता है सब सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कि ठाकुर के प्रेम से मां के आशीर्वाद से बने हो। तो वैसे ही जब हम अद्वैत वेदांत ठीक-ठीक समझना शुरू करेंगे हमको लगेगा कि ये समग्र जगत जो है वो ब्राह्मण का बना हुआ है। वहां पर मैं यदि किसी के प्रति मुझे द्वेष होता है या किसी के प्रति मेरी ईर्ष्या होती है तो यह कैसे हो सकता है? क्या ऐसा होगा कि मेरा एक हाथ है जो दूसरे हाथ का द्वेष करेगा या जो मेरा एक कान है वो दूसरे कान के प्रति वो ईर्ष्या करेगा या जो एक पैर है वो कहेगा मैं दूसरे पैर से ज्यादा ताकतवर होना चाहता हूं क्या कभी ऐसा होगा ये दो कान हो ना कि दो हाथ हो ना कि दो पैर हो दोनों को पता है कि हम एक ही व्यक्ति के दो अलग-अलग विभिन्न अंग है तो हम आपस में झगड़ा क्यों करें तो वैसे ही ये जो आप हो मैं हूं या समग्र जगत ये 77 बिलियन पपुलेशन जो है हमारी 7 बिलियन पीपल जो पृथ्वी पर रहते हैं हम लोग सभी लोग जो है ब्राह्मण के बने हुए हैं। तो यदि हम सब ब्राह्मण के बने हुए हैं हम सब ब्राह्मण है तो फिर हम लोगों में आपस में द्वेष कैसे हो सकता है? आपस में ये जो ईर्ष्या कैसे हो सकती है? आपस में झगड़ा या तो फिर यह वॉर है यह कैसे हो सकता है? किंतु फिर भी होता है और क्यों होता है? उसके पीछे यह है माया कि जब तक हम माया के जगत में हैं तब तक हमको लगता है कि नहीं मेरा एक इंडिविजुअल एकिस्टेंस है। ये जो स्वामी जी कहते हैं कि जब वो अमेरिका गए तो उन्होंने देखा कि सब लोग जो है वो आपस में बोलते रहते कि यदि मैं अद्वैत वेदांत को समझना शुरू करूंगा तो आई विल लॉस माय इंडिविजुअलिटी। वहां पे अपनी इंडिविजुअलिटी को खो देने का एक बहुत बड़ा डर रहता है। लगता है कि आई विल इफ आई लॉस माय इंडिविजुअलिटी मैं एक गुलाम बन के रह जाऊंगा। जैसे उस समय आज से 100 साल पहले तो ऐसी परिस्थिति थी ना कि ये जो एशिया के जितने भी कंट्री थे यहां पे मनुष्य इस तरह से वो मतलब अपने को हीन मानने लगा था। अपने को इस तरह से निकम्मा मानने लगा था कि जो भी बाहर से आता है वो हमारे पर राज कर लेगा। जो भी आता है हमारी पिटाई करेगा। इतना वो 30 करोड़ का देश हमको चलाने के लिए वो 30 40 300 400 ब्रिटिशर ही काफी थे। वो आपस में हमको लड़ा लड़ा करके हम पर राज्य करते थे। तो ऐसी एक भयानक परिस्थिति आ जाएगी यदि मैं अपनी इंडिविजुअलिटी को खो दूंगा। यदि मैं यह मानना शुरू करूंगा कि ये जो क्राउड मेंटालिटी जो कहते हैं ना कि वो दूसरा जो हर्ड मेंटालिटी जो कहते हैं कि हर्ड मेंटालिटी यानी कि दूसरा जो आदमी करता है मैं भी वही करूंगा। मेरा अपना इंडिपेंडेंट कोई थिंकिंग नहीं है। मेरा इंडिपेंडेंट कोई एक ओपिनियन नहीं है। जो भी कोई कोई भी आकर के मुझे कुछ भी कह लेगा कि मैं तुम मेरे गुलाम हो या जो भी हो तो मैं ऐसा कर लूंगा। तो ये क्या ये इस तरह से अपने को मैं यदि अपनी इंडिविजुअलिटी खो देता हूं तो मैं अपना फ्रीडम भी खो दूंगा। देखिए अद्वैत वेदांत को फॉलो करके भारत की क्या परिस्थिति हुई। 1000 साल की गुलामी और अभी भी हम लोग फ्री है कि नहीं मुझे डाउट है। तो ये विचार जो है वो अमेरिकन के मन में सब समय रहता था। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए ऑन वन पॉइंट वे लोग सही है। हमको जब यह कहते हैं कि सब कुछ ब्राह्मण का बना हुआ है तो उसका यह अर्थ नहीं है कि जो हम अपना एक जो इंडिपेंडेंट ओपिनियन है उसको त्याग करते हैं। हम लोग जो है मेरी जो एक इंडिविजुअल पर्सनालिटी है उसको त्याग कर दे। हमको त्याग क्या करना है? यह जो इंद्रियों के जो सुख भोग है, ये जो दूसरों के प्रति ये जो विद्वेष है, उसका त्याग करना है। नहीं कि मेरा जो एक इंडिपेंडेंट पर्सनालिटी है, उसका त्याग करना है। यदि मैं यह कहूंगा कि मेरे भीतर में किसी भी तरह की क्रिएटिविटी की जरूरत नहीं है। मुझे किसी भी तरह का कोई नया इनोवेशन करने की जरूरत नहीं है। यदि मेरे परिवार पे या मेरे समाज पे हमला होता है तो मुझे डिफेंड करने की जरूरत नहीं है। यदि मैं यह सोचता हूं कि मेरा जो मेरे फैमिली में कोई बड़ा जो है वह वडिल वह जो कहेगा मैं वही करूंगा या तो फिर यह जो जिस कम्युनिटी में मैं रहता हूं वहां के जो लीडर्स जो है वो जो कहेंगे मैं वही करूंगा। मेरा कोई इंडिविजुअल ओपिनियन नहीं रहेगा। तो ये सब जो है वो अद्वैत वेदांत का मिस इंटरप्रिटेशन है। ये जो हर्ड मेंटालिटी जिसको कहते हैं जो क्राउड ब्लाइंडली फॉलोविंग द क्राउड ये जो है इसका जो है वो अद्वैत वेदांत का मिस इंटरप्रिटेशन है। यदि आप सही-सही अद्वैत वेदांत को फॉलो करते हैं तो आप अपना जो स्ट्रांग ओपिनियन है वो कोई आप गवा नहीं देंगे। आप एक मूर्ख नहीं बन जाएंगे। स्वामी विवेकानंद इज द बेस्ट एग्जांपल। यदि स्वामी जी ने ऐसा सुना ठाकुर के पास जाकर के पता है कि ठाकुर जो है वो मतलब वो महापुरुष है सिद्ध महापुरुष है ऐसा नहीं कि स्वामी जी ने पहले से ही स्वीकार लिया कि चलो ईश्वर के अवतार है ईश्वर के अवतार हो भी सकते हैं कि नहीं वो भी उनको डाउट था तो एटलीस्ट उनको ये तो पता था कि वो नरेंद्र से खुद से तो कहीं आगे बढ़े हुए वो महापुरुष सिद्ध है संत है तो क्यों नहीं पहले ही दिन से स्वामी जी ने उनको स्वीकार लिया अच्छा वो ठाकुर जो कहते हैं वो ठीक है ठाकुर कहते हैं कि मेरे हाथ में सिक्का रखेंगे तो मैं उसको पछू ही नहीं पाऊंगा। तो ऐसा क्यों स्वामी जी ने स्वीकार नहीं लिया? क्यों वो टेस्ट किया उनके बिस्तर के नीचे एक सिक्का रख के? क्यों वो बार-बार कहते रहे? ठाकुर कहते हैं कि मुझे यह दर्शन हुआ। मुझे ये मैंने ये सोचा। तो क्यों स्वामी जी बोलते थे कि अरे आपका ये जो है मति भ्रम हो गया है। आपको ये जो हेलुसिनेशन हो रहा है। आपको जो है साइकोलॉजिकल बीमारी हो गई है। ऐसा क्यों स्वामी जी ठाकुर को कहते थे? क्योंकि अद्वैत वेदांत को फॉलो करने का यह अर्थ नहीं है कि हम अपनी जो इंडिविजुअलिटी है, हम अपनी जो ये ओपिनियन है, अपना जो क्रिएटिविटी है, ये जो स्ट्रेंथ फॉर इनोवेशन है, वो सबका त्याग कर दें। त्याग करना है। यह सुख भोग इंद्रियों के सुख भोग का और यह जो दूसरों के प्रति विद्वेष का एक हार्मोनियस लाइफ होना चाहिए और साथ-साथ में ही एक बड़ा ही स्ट्रांग पर्सनालिटी बड़ी ही स्ट्रांग विल पावर संकल्प शक्ति होनी चाहिए। तभी जो है हम अद्वैत वेदांत को ठीक से समझ पाएंगे। उसको ठीक से फॉलो कर पाएंगे। अच्छा अभी कथा अभी हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय घर जा रहे थे किंतु वो फिर उनको उनके मन में आया कि क्यों नहीं ठाकुर का जो भजन है गान है एक बार सुन ले ठाकुर को मिलने के लिए आए ठाकुर ने उन्होंने ठाकुर को पूछा कि क्या आज फिर से गान होगा ठाकुर ने कहा आज नहीं होगा किंतु तुम एक काम करो बलराम बसु के घर आना वहां पर फिर से हम लोग कीर्तन करेंगे किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर जो है मास्टर महाशय को पूछते हैं। जैसे टेस्ट करते हैं ना ऐसा नहीं मास्टर महाशय को पूछते हैं कि अच्छा तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो? म ये नहीं है कि ठाकुर जानना चाहते हैं कि उनका खुद का नेचर क्या है? ठाकुर जानना चाहते हैं कि मास्टर महाशय का उनके बारे में असेसमेंट क्या है? ठाकुर पूछते हैं कि मुझे कितना परसेंटेज ज्ञान हुआ होगा। तो मास्टर महाशय कहते हैं कितना परसेंटेज वो तो मुझे पता नहीं है किंतु आपके जैसा ज्ञान प्रेम भक्ति या विश्वास या वैराग्य या उदार भाव मैंने इस जगत में और कहीं नहीं देखा है। तो यह सुनकर के ठाकुर कहते हैं कि अच्छा यह बच्चा परीक्षा में पास हो गया। अभी जो है उसको दूसरी ग्रेड में नए क्लास में नए स्टैंडर्ड में उसको अपग्रेड कर सकते हैं। उसको ग्रेजुएट कर सकते हैं। पहली कक्षा पास करके दूसरी कक्षा में जाने के लिए वो रेडी हो गए हैं। इस बातचीत के बाद मास्टर महाशय प्रणाम करके विदा हुए फाटक तक जाकर किंतु फिर कुछ बात याद आई। उल्टे पांव लौटकर फिर श्री रामकृष्ण के पास नाट्य मंडप में हाजिर हुए। उस धीमी रोशनी में श्री रामकृष्ण अकेले टहल रहे थे। निसंग जैसे सिंह वन में अकेला अपनी मौज में फिरता रहता है। आत्माराम और किसी की अपेक्षा नहीं। विस्मित होकर मास्टर उन महापुरुष को देखने लगे। श्री रामकृष्ण मास्टर से क्यों जी? फिर क्यों लौटे? मास्टर जी यह बलराम बसु के घर पर जाकर उनसे बात करने की जो बात कही ना तो इसलिए मास्टर महाशय कहते हैं कि मास्टर महाशय कहते हैं कि जी यह बलराम बसु जो है वो अमीर आदमी होंगे शायद मुझे भीतर ना जाने दे इसीलिए सोच रहा हूं कि वहां ना जाऊंगा यहीं आकर आपसे मिलूंगा श्री रामकृष्ण कहते हैं नहीं जी तुम मेरा नाम लेना कहना कि मैं उनके पास जाऊंगा बस कोई भी तुम्हें मेरे पास ले आएगा जैसी आपकी आज्ञा ऐसा ऐसा कहकर मास्टर ने फिर प्रणाम किया और वहां से विदा ली। अभी देखिए यहां पर मास्टर महाशय को यह डर लग रहा है कि बलराम बसु के घर जाएंगे तो बलराम बसु तो कितना धनी आदमी होगा। अदरवाइज ठाकुर को घर पर बुला करके उत्सव कर उत्सव करवाना सभी भक्तों को खिलाना ये सब साहस कौन कर सकता है? वो जो जिसके पास में लक्ष्मी है जिसके पास में धन बल है जनबल है वही तो कर पाएगा। तो उन्होंने सोच लिया ऐसा बड़ा आदमी और मैं तो एक छोटा सा शिक्षक तो मैं यदि उनके घर जाऊंगा तो क्या वो मुझे इनवाइट भी नहीं करेंगे हो सकता है मेरा इंसल्ट करें क्या बिना मतलब उनके घर जाना ऐसा सोच के उन्होंने ऐसा कहा तो जैसे ही कहा ठाकुर कहते हैं कि नहीं तुम जाकर कहना तुम मुझे मिलने के लिए आए हो जब हम ठाकुर को मिलने के लिए जाते हैं तो इस जगत के जितने भी दरवाजे हैं सब खुल जाते हैं। माने सिर्फ यह नहीं है कि बलराम बसु के घर का दरवाजा जहांजहां पे भी इस जगत में हमारे सामने व्यवधान है सब खुल जाएंगे। तो और इसके बाद में दूसरी भी एक बात है। देखिए मास्टर महाशय खुद लिखते हैं जब वो बलराम बसु के घर गए तो बलराम बसु को देख के बलराम को देख के ऐसा नहीं लगता था कि वो घर के मालिक है। ऐसा हाथ जोड़ के विनम्र होकर के वो आज्ञा ग्रहण करने के लिए खड़े थे कि ऐसा लगता है कि घर में कोई नौकर जैसा खड़ा होता है तो वैसे ही वो एक नौकर के घर के जिस ठाकुर के नौकर है नहीं कि वो वो जो घर के मालिक है। वरना जो घर के मालिक होते हैं उनके मन में ऐसा अहंकार होता है कि हां मैं घर का मालिक हूं। ये भक्त लोग जो है उनको मैंने इनवाइट किया है। ठाकुर को मैंने इनवाइट किया है। मैंने उत्सव किया है। हालांकि ठाकुर ऐसे घमंडी के घर जाएंगे ही नहीं पहली बात। किंतु फिर भी ये जो विनम्रता की भी वो मात्राएं होती है। विनम्रता के भी स्टेज होते हैं। तो वो जो हाईएस्ट स्टेज जो है उनमें ये मास्टर ये जो बलराम बसु थे यहां तक कि बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद में हम देखेंगे ठाकुर की महासमाधि के बाद की बात है। ये जो ये जो सन्यासी शिष्य थे ना ये सब लड़के ये सब भैरव शिव की तरह थे सब लोग। एकदम माने क्या बोलेंगे उनका मिजाज भी बड़ा गर्म रहता था और किसी के भी वो भक्तों का घर तो उनके लिए हमेशा खुला रहता था जिस तरह से वो ठाकुर को वेलकम करते थे ये लड़कों को वेलकम करते थे तो ये जो चार पांच लड़के मिलकर के वो बलराम बसु के घर जाएंगे बढ़िया मजे से बैठेंगे गप लगाएंगे और ये बलराम जो है उनको खिलाएगा पिलाएगा स्वागत करेगा और ये जो नरेंद्र जो है बीच-बीच में वो पान खाता था पान खाने की बहुत आदत थी और पान खा के थूकता था तो अभी वो लड़का है तो अभी क्या कहेंगे तो वो जब थूक थूकता था तो ऐसे ही दीवार पे ही थूक देगा तो दीवार खराब हो जाएगी। तो ये बलराम जो है वो जो थूकदानी जो है जिसमें थूका जाता है पान खाने के बाद वो अपने हाथ में ले खड़े रहते थे बगल में और जब भी नरेंद्र थूकना चाहता था तो कहता था कि नरेंद्र इसमें थूको दीवार पे मत थूको। तो ऐसा करके सोच के देखिए कि कहां नरेंद्र ठाकुर की महासमाधि के पास बाद में बच्चों के पास में कुछ नहीं था। वैसे ही वो गली में वो रखते थे। गली में वो भटकते थे। भिक्षा मांग करके रहते थे। वो स्नान भी नहीं करते थे महीनों महीनों तक बाल भी ऐसे वृक्ष ऐसे हो गए थे कपड़े भी ऐसे फटे हाल पहनते थे बिल्कुल भिखारी की तरह दिखेंगे और फिर भी उनके भीतर में जो ब्रह्म तेज तो था ठाकुर के आशीर्वाद का जो तेज था तो जब बातें करेंगे तो ऐसी बातें करेंगे जैसे वो जो हमारे उपनिषद और वेद और पुराण के ऋषि मुनिगण सब एक साथ में इकट्ठा हो गए और उनका जो विज़डम जो है उनका ज्ञान जो है जैसे वह एक घन मात्रा में इकट्ठा इकठा हो के इनके मुंह से सरस्वती के माध्यम से वो प्रगटित हो रहा है। इस तरह के ज्ञान की बातें करेंगे। किंतु मिजाज भी जैसे वो शिव के भूत जैसा था तो वैसे ही इधरउधर थूक देंगे पान खा के। तो ये जो बलराम की विनम्रता या बलराम की जो साधना में सिद्धि देखिए कहां तक अपने अहंकार को कहां तक अपने घमंड को जो है ठाकुर के श्री चरणों में विलय कर दिया है कि वो थूकदानी हाथ में ले खड़े रहेंगे और नरेंद्र को कहेंगे इसमें थूको तो नरेंद्र थूकेगा वो हाथ में लेकर खड़े रहेंगे यहां तक उनकी विनम्रता है तो मास्टर महाशय जो ये लिखते भी है ना अभी मास्टर महाशय को तो सब पता है ये कब लिखा गया ठाकुर की महासमाधि के बाद ये सब लीला हो गई। ये जो बलराम बसु कौन थे ये सब पता होने के बाद मास्टर महाशय लिख रहे हैं। मास्टर महाशय की ये जो जर्नी है स्पिरिचुअल जर्नी वो हमको जर्नी पे ले जा रहा है। ऐसा नहीं है कि पहले ही दिन से उन्होंने भी सब कुछ स्वीकार कर लिया है। हालांकि उन्होंने यहां पे कहा कि ये जो है ठाकुर के साथ में मेरा पहला और आखिरी तर्क था। ये तो उन्होंने कह दिया किंतु जो ठाकुर की ये जो लीला परिकर जो है लीला सहचर जो है वे लोग भी मतलब देवताओं की तरह शुद्ध पवित्र निरहंकारी थे वो उनके मन में शायद अभी तक नहीं आया था वो उनके जो भक्तों को देखेंगे तब उनको ये लगेगा कि हां एक-एक भक्त जो है वो एक-एक जैसे जेम होता है एक-एक डायमंड होता है उस तरह से उनकी एक विशेषता है। नरेंद्र की विशेषता है कि अद्वैत ज्ञान। ये जैसे लाटू महाराज की विशेषता है। इस तरह से सेवा करते थे कि ठाकुर ने खुद उनकी सेवा ग्रहण की। शशि महाराज की विशेषता वही है कि वो मन प्राण डाल के ठाकुर की सेवा की। इसीलिए जब सन्यास के बाद नाम देने की बात आई किसको क्या नाम देंगे? अह नरेंद्र ने एक बार सोचा था कि वो खुद रामकृष्णानंद नाम ग्रहण करेगा। क्योंकि वो तो ठाकुर का प्रधान सेवक था। मतलब प्रधान शिष्य था। किंतु प्रधान सेवक यदि कहे तो वो तो शशि महाराज थे। शशि महाराज ने ही दिन रात ठाकुर के साथ में खड़े रहकर ठाकुर की सेवा की। तो इसलिए यह नाम जो है रामकृष्णानंद उन्होंने शशि महाराज को दिया। शरद महाराज ठाकुर उनके गोद में जाकर के बैठे। बोला कि तुम ये भार कितना सहन कर पाते हो मैं देखना चाहता हूं। बाद में समग्र रामकृष्ण संघ का भार रामकृष्ण मठ मिशन का भार उनके गोद में था। उनके कंधों पे था। क्योंकि वो हमारे सर्वप्रथम जनरल सेक्रेटरी थे। उस समय की जब भारत गुलाम था ये जो बंग भंग की च ये जो रेवोल्यूशन जो है ये मूवमेंट है चल रही थी और दोनों ओर से हम लोग सैंडविच थे। एक ओर से ये गवर्नमेंट कहती है कि ये जितने भी रिवोल्यूशनरी है जितने भी क्रांतिकारी है वो बेलून मठ में जाकर के साधु बन जाते हैं और चाहते हैं कि जो कानून है लॉ है उससे बच जाएंगे। ऑन वन हैंड ये ब्रिटिश गवर्नमेंट हमारे पे खफा थी। तो दूसरी ओर जितने भी ये यंग लड़के लोग आते थे वो हमको बोलते रहते थे टोंट लगाते रहते थे कि आप लोग जो साधु हो के बिल्कुल वो म बकरी की तरह गाय की तरह हो गए हैं। आपको पता नहीं है कि स्वामी विवेकानंद ने आर्म्ड रिवॉल्यूशन ये जो ब्लडी रिवॉल्यूशन की बात की है। चलो हम रेवोल्यूशन करते हैं। चलो वॉर करते हैं। चले ब्रिटिश लोगों को यहां से भगा देते हैं। तो दोनों मतलब गरम उन्हें ये जो निखिलंद जी के बारे में है कि ये जो राजा महाराज ढाका गए राजा महाराज बाबूराम महाराज तो ये निखिलनंद जी तो कॉलेज में पढ़ते हुए लड़के थे तो जाकर के राजा महाराज को कह दिया कि आपको पता नहीं है कि स्वामी जी ने क्या कहा है? स्वामी जी का जो असली टीचिंग है आप लोग यह साधु बनकर के बिल्कुल निकम्मे होकर के बैठ गए तो स्वामी जी ने तो समाज सेवा की बात की है। आज के समय में सबसे बड़ी समाज सेवा है कि ये ब्रिटिश गवर्नमेंट से भारत को मुक्त करना। क्यों नहीं आप क्रांतिकारियों को साथ देते? क्यों नहीं ये जो बाकी के जो मठ थे वो पता है कि 1857 के जो रेवोल्यूशन के बाद बहुत सारे जो रेवोल्यूशनरी साधु बन गए थे और जो सीक्रेट वो आश्रम मठ वगैरह स्थापित किए थे तो उनकी तरह आप भी वो वेपंस इकट्ठा कीजिए हमको वेपन्स ट्रेनिंग दीजिए आर्म्ड रेवोल्यूशन आर्मी बनाइए रेवोल्यूशन लाइए ये क्या सब वो डिस्पेंसरी स्कूल वगैरह खोल के बैठे क्या मंदिर बना करके उसमें पूजा पाठ कर रहे हैं आप बिल्कुल स्वामी जी को समझे नहीं उस समय बाबूराम महाराज बड़े नाराज हो गए बोला ये निखिल ने लड़के थे। बोला तुम घोड़ा बनो। मैं तुम्हारे कंधे पे बैठूंगा। ऐसा करके लिटरली उनको घोड़ा बना करके उनके कंधे पे बैठे। उनको घुमाया चारों ओर वो राजा महाराज के। तब कहीं जाकर देखिए महापुरुष का स्पर्श होता है। तो दिमाग के जो बंद दरवाजे हैं दिमाग के जो अंकट बंकट है वो क्लीन हो जाते हैं। निखिलंद जी को मतलब वो लड़के थे। अकल आया और फिर साधु हुए। बन दो-तीन दिन दो-तीन साल जेल में भी रहे थे। बाद में बेलून मठ में आकर के साधु हुए। वो जो वहां पे होली न्यूयॉर्क न्यूयॉर्क में ही थे न्यूयॉर्क में जाकर के उन्होंने कितना वेदांत प्रचार किया। तो इस तरह से ये जो मास्टर महाशय बेचारे बोल रहे हैं कि मैं बलराम के घर जाऊंगा तो वो धनी आदमी है। घमंडी होगा मुझे घर में भी जाने देगा कि नहीं। किंतु हमको पता है जैसेजैसे हम पढ़ेंगे कि एक एक जो भक्त है ठाकुर का उसमें भी इस तरह के ही आत्मश्रद्धा और यह जो ठाकुर का आशीर्वाद है जैसे कि एक-एक लोग देवता बन सकते हैं।