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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 4 June 2025

Invocation

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद के भारत में दिए हुए भाषणों में से एक माय प्लान ऑफ कैंपेन इसका जो पॉइंट हम डिस्कस कर रहे थे स्वामी जी कह रहे हैं कि उपनिषद का भारत में प्रचार करना है। क्यों करना है? पहले तो स्वामी जी कहते हैं कि जितने भी देश है सभी देशों का एक केंद्र बिंदु है। सभी देशों का एक प्राण जहां पे है। एक कहानी स्वामी जी बताते हैं कि वो पहले वह छोटे हम थे बच्चे तो हमने वह राक्षसों की वह सब कहानियां पढ़ी होंगी। एक राजकुमार है। वह राक्षस का वध करने के लिए जाता है। किंतु राक्षस को कितना ही वह उसके ऊपर में वह तलवार से आघात करें वह राक्षस मरता ही नहीं है। फिर वह कोई एक जादूगर है ना कि कोई साधु महात्मा है। वह आकर के उस राजकुमार को कहते हैं कि देखिए इस राक्षस का प्राण इस चिड़िया में है। और यह चिड़िया जो है वहां वह पहाड़ के ऊपर में इसको रखा गया है। बड़ी सेफ इसको रखा गया है। जब तक वह चिड़िया जिंदा रहेगी तब तक आप राक्षस का कुछ नहीं कर पाएंगे। तो अच्छा फिर राजकुमार क्या करता है? कैसे भी करके एट द एंड ऑफ अ लॉन्ग एडवेंचर वो वहां पर जाता है। चिड़िया का वध करता है। साथ में ही राक्षस मर जाता है। तो क्या है कि राक्षस का प्राण उस चिड़िया में था। उस पक्षी में था। जब तक वह पक्षी नहीं मरेगा आप कितना ही उस राक्षस को मारते रहिए। राक्षस मरेगा नहीं। अभी जैसे कि यह रामायण में भी है कि रावण के एक के बाद एक सिर भगवान राम काटते गए। रावण मरता ही नहीं है। दूसरा एक नया सिर खड़ा हो जाता है। फिर विभीषण ने क्या कहा कि रावण का प्राण है उसकी नाभि में है। नाभि में तीर मारिए तो वह मर जाएगा। तो भगवान राम ने जैसे नाभि में तीर मारा वो रावण मर गया। तो क्या है कि यह राक्षस होते हैं। वह ईजीली मरते नहीं है। उनका प्राण होता है इनकी नाभि में या तो कोई चिड़िया में ना कि और किसी जगह पे। जब तक वह नहीं मरेगा तब तक वो राक्षस मरेगा नहीं। अभी इसी उदाहरण को थोड़ा सा रिवर्स करके हम देख सकते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि जितने भी देश है जितनी भी ग्रेट सिविलाइजेशन है उन सबका एक केंद्र बिंदु है और यह केंद्र बिंदु पर जब तक आघात नहीं होता है तब तक वो देश मरता नहीं है। तो भारत का प्राण भारत का केंद्र बिंदु है धर्म। जब तक धर्म जीवंत है तब तक भारत भी जीवंत है। और यदि भारत का नए तरह से नव उत्थान करना है भारत का नवजागरण यदि करना है तो आपको इसी धर्म को पुनर्जीवित करना होगा। अच्छा धर्म का कोई निधन तो होता नहीं है। धर्म अपने से तो सो नहीं जाता है। किंतु जो धर्म का पालन जो होता है समाज में लोगों के प्रैक्टिकल लाइफ में डे टू डे लाइफ में वो धीरे-धीरे करके उसका ह्रास होता है। उसमें कमी आ जाती है। इसके लिए वो धर्म जो है समाज में से अदृश्य होने लगता है। समाज में डे टू डे लाइफ में प्रैक्टिकल लाइफ में फिर से धर्म के जो जीवंत प्रिंसिपल है हिंदू धर्म के सनातन धर्म के उसको वापस लेकर आइए। वेदांत और उपनिषद को वापस ले आइए। देखिए कि प्रास तरह से फिर से प्राणवंत हो उठता है। तो यह थीम हमारी चल रही थी। अभी देखिए कि स्वामी जी इसमें आगे क्या कहते हैं। द फर्स्ट वर्क दैट डिमांड्स आवर अटेंशन इज दैट द मोस्ट वंडरफुल ट्रुथ्स कनफाइंड इन आवर उपनिषद्स इन आवर स्क्रिप्चर्स इन आवर पुराणाज़ मस्ट बी ब्रॉट आउट फ्रॉम द बुक्स ब्रॉट आउट फ्रॉम द मोनेस्टरीज़ ब्रॉट आउट फ्रॉम द फॉरेस्ट ब्रॉट आउट फ्रॉम द पज़ेशन ऑफ़ सिलेक्टेड बॉडीज़ ऑफ़ पीपल एंड स्कैटर्ड ब्रॉडकास्ट ऑल ओवर द लैंड। सो दैट दिस ट्रुथ्स मे रन लाइक फायर ऑल ओवर द कंट्री फ्रॉम नॉर्थ टू साउथ एंड ईस्ट टू वेस्ट फ्रॉम द हिमालयज टू कोमोरिन फ्रॉम सिंध टू द ब्रह्मपुत्रा। यह एक ही सेंटेंस स्वामी जी वहां पे स्टेज के ऊपर में खड़े रह के चिल्ला करके बोले होंगे। सोच लीजिए कि क्या प्राणायाम की कैपेसिटी चाहिए होगी। इतना लंबा सेंटेंस जोरों की आवाज में बोलना क्योंकि उस समय यह माइक वगैरह तो थे नहीं कि आप यहां पर मृदु स्वर से बोले और पूरे हॉल में यह स्पीकर सिस्टम के माध्यम से सबको सुनाई दे। देखिए यहां पर स्वामी जी क्या कहते हैं। जो कार्य जिस हमारा सबसे पहला अटेंशन मांग लेता है जिसके ऊपर में हमको सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है वह है कि हमारे उपनिषद में जो महत्व सत्य है हमारे उपनिषद के जो फर्स्ट प्रिंसिपल है हमारे शास्त्र के हमारे पुराणों के उनको उस किताबों में से बाहर निकालना होगा। यह मठ जिसमें कि यह सब किताबें सुरक्षित है। उस मठ में से उस आश्रमों में से उस मंदिरों में से इस सत्य को बाहर निकालना होगा। जिस वन में जिस वन में साधु ऋषि मुनि तपस्या करते थे। जिन्होंने इस सत्यों का साक्षात्कार किया है। उस वन में से उस जंगल में से उस सत्यों को बाहर निकालना होगा। यह जो कुछ चंद चुनिंदा लोग हैं कि जिन्होंने अपना पूरा जीवन वेदांत को समर्पित किया है। जो लोग एक ग्रुप बनाकर के तपस्या करते हैं किसी आश्रम में ना कहां पे उनके पास में से यह सत्य को कलेक्ट करना है। एंड स्कैटर्ड ब्रॉडकास्ट ऑल ओवर द लैंड। यह पूरे भारतवर्ष में और सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं स्वामी जी कहते हैं कि मैं सिर्फ यह नहीं चाहता कि भारत का पुनरुत्थान हो। वो तो बड़ी छोटी बात है मेरे लिए। मैं चाहता हूं कि इंडिया मस्ट कॉकर द वर्ल्ड विथ इट्स स्पिरिचुअलिटी। भारत अपनी आध्यात्मिकता से पूरे विश्व पर विजय प्राप्त करें। तो यहां पर जब स्वामी जी कहते हैं कि यह जो महत्व सत्य है यह जो उपनिषद का जो महावाक्य है उसको इस वनराजी में से इस पहाड़ पर्वत में से गुफाओं में से आश्रमों में से मठ में से मोनेस्टरीज में से कलेक्ट करो और पूरी पृथ्वी पे इसको स्कैटर कर दो। पूरी पृथ्वी पे इसको बिखेर दो। पूरी पृथ्वी पे इसका प्रचार करते रहो। सो दैट दिस ट्रुथ मे रन लाइक फायर ऑल ओवर द कंट्री। जिसकी वजह से यह महावाक्य यह महत उपदेश पूरे देश में पूरे विश्व में दावा अगग्नि की तरह फैल जाए। नॉर्थ टू साउथ ईस्ट टू वेस्ट उत्तर से दक्षिण तक पूर्व से पश्चिम तक हिमालयज टू केमोरिन सिंध टू ब्रह्मपुत्र हिमालय से ये यहां पे श्रीलंका फिर ये सिंध से ब्रह्मपुत्र और यह हिमालय से यहां पे ही क्यों आप नॉर्थ पोल टू साउथ पोल यहां पे वो जापान से लेकर के अमेरिका यह पूरा स्पेक्ट्रम जो है पृथ्वी का पूरी पृथ्वी पे इस सत्यों को बिखेर दो। सत्यों को बांट दो। लोगों को इस सत्य का प्राप्त करके पुनर्जीवन प्राप्त होने दो। अच्छा पूरी पृथ्वी की बात अभी छोड़े। सिर्फ भारतवर्ष के बारे में सोचे या तो फिर पूरी पृथ्वी के बारे में सोचे। प्रश्न हो सकता है कि स्वामी जी ने ऐसा क्यों कहा कि उपनिषद के जो महावाक्य है उसके माध्यम से ही भारत का पुनरुद्धार होगा। भारत का पुनर्जीवन होगा। या तो फिर पृथ्वी पर कहीं पे भी यह पददलित जनताएं हैं। पृथ्वी पर कहां पे भी सफरिंग है। पृथ्वी पर जहां पे भी यह जो निराशा हताशा है। सभी लोग वेदांत के इस सत्यों का आश्रय लेकर के अपने जीवन को पुनः फिर से वे लोग उत्तष् जागृत यह जो नींद से जो तमस की नींद में जो डूबे हुए हैं उसमें से उठकर के सत्व के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं। व्हाट इज द पावर ऑफ उपनिषद? उपनिषद में ऐसी कौन सी शक्ति है जो कि हमको यह करने के लिए प्रेरणा देती है? तो यदि इस प्रश्न का उत्तर हमको पाना होगा तो थोड़ा सा डीपर एनालिसिस करना होगा। पहले मैं यह पैराग्राफ पूरा कर लेता हूं। इसके बाद में हम यह देखते हैं कि उपनिषद में ऐसा तो क्या है कि पूरे विश्व को पूरे भारतवर्ष को पुनः जीवित कर सकता है। पुनः उसकी यह जो पुरातन भव्यता है उसके चरम शिखर पर इसको स्थापित कर सकता है। व्हाट इज दैट डीपर पावर ऑफ उपनिषद? पहले हम यह देख लेते हैं पूरा पैराग्राफ। आगे स्वामी जी क्या लिखते हैं? एवरीवन मस्ट नो ऑफ देम बिकॉज़ इट इज सेड दिस हैज़ फर्स्ट टू बी हर्ड देन थॉट अपॉन एंड देन मेडिटेट अपॉन सबको इसको सुनने दो। सबको इसके बारे में जानने दो। क्यों? क्योंकि कहा गया है कि यह जो उपनिषद के महावाक्य है पहले उनको सुनना है फिर उसके बारे में सोचना है फिर उसके ऊपर में ध्यान करना है। श्रोतव्यो मंतव्यो निधिधासितव्यो यह ऐसा कहा गया है। लेट द पीपल हियर फर्स्ट एंड हु एवर हेल्प्स इन मेकिंग द पीपल हियर अबाउट द ग्रेट ट्रुथ इन देयर ओन स्क्रिप्चर्स कैन नॉट मेक फॉर हिमसेल्फ अ बेटर कर्मा टुडे। लोगों को इस महावाक्य को सुनने दो। और जो व्यक्ति जो साधक जो मनुष्य लोगों के पास में गांव-गांव शहर-शहर घर क्लासरूम से क्लास रूम इस सत्यों को लेकर के जाता है। इस महावाक्य को लेकर के जाता है। उसके लिए पुण्य करने का इससे अच्छा और कोई रास्ता नहीं है। यदि आपको पुण्य अर्जन करना है, यदि आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करनी है, यदि अच्छे साधक होना है, साधक जीवन में अग्रसर होना है, तो सबसे ज्यादा जो बड़ी महत्व साधना है आज की वह साधना है कि उपनिषद के महावाक्य को गांवगांव घर ले जाइए। लोगों को यह महावाक्य सुनाइए। इससे जो पुण्य अर्जित होगा इससे जो हमारे कर्मक्षय होंगे और इतने कर्मक्षय और किसी साधना से आज के कलयुग में नहीं होंगे। तो अभी यह प्रश्न

उपनिषद् में ऐसा क्या है जो हमें प्रचंड शक्ति देता है?

आता है हमारे सामने कि ऐसा तो यह महावाक्य में क्या है? अहम ब्रह्मास्मि इसके भीतर में क्या है जो कि सिर्फ मनुष्य को ही नहीं पूरी सभ्यता को एलिवेट करता है। पूरी सभ्यता को इवॉल्व करके हायर स्टेजेस ऑफ डेवलपमेंट की ओर ले जाता है। तो देखिए कि सभ्यता के एस्पेक्ट कौन से हैं? व्हाट आर द डिफरेंट एस्पेक्ट्स ऑफ ह्यूमन सिविलाइजेशन? तो यदि हम थोड़ा बहुत एनालिसिस करेंगे हिस्ट्री पढ़ करके सिविलाइजेशनल स्टडी को समझ करके रामकृष्ण विवेकानंद या तो फिर अपने शास्त्रों का अध्ययन करके तो हमको पता चलेगा कि देयर आर बेसिकली थ्री एस्पेक्ट ऑफ एनी सिविलाइजेशन। कोई भी सोसाइटी है, कोई भी समाज है, देश है, सभ्यता है, उसके तीन एस्पेक्ट होते हैं। सबसे पहला एस्पेक्ट है स्पिरिचुअल एस्पेक्ट। व्हाट इज द स्पिरिचुअल एस्पेक्ट? आध्यात्मिक पहलू क्या है वो? मनुष्य का ईश्वर के साथ में रिलेशन। मनुष्य का ईश्वर के साथ में संबंध। अभी वह संबंध कोई भी हो वह चाहे द्वैत में विश्वास करता हो, अद्वैत में विश्वास करता हो, जैनिज्म है, सिखिज्म है, इस्लाम है, कोई भी फिलॉसोफी है, उसमें वह विश्वास करता हो। कोई भी साधना है, ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग, भक्ति मार्ग, कोई भी मार्ग ले लीजिए। कोई ना कोई रिलेशन उसका ईश्वर के साथ में होना चाहिए। साकार निराकार ईश्वर आत्मन ब्रह्मन व्हाटएवर एक पूरा वर्ल्ड लिटरेचर है। पूरे विश्व में कोई भी जगह पे जाएंगे आपको धर्म के नाम पे कुछ ना कुछ डेवलपमेंट तो देखने को मिलेगा ही। तो यह है मनुष्य का डिविनिटी के साथ में रिलेशन। यह हो गया स्पिरिचुअल एस्पेक्ट। दूसरा है सोशल एस्पेक्ट। हम लोग मनुष्य है वो ऐसा वो जो वेस्टर्न ये जो ये होता है ना सोशल स्टडीज उसमें कहा जाता है कि ह्यूमन इज अ सोशल एनिमल यानी कि मनुष्य जो है एक सामाजिक प्राणी है। हम भी तो एक एनिमल ही है। जैसे कि ये कुत्ता, बिल्ली, हाथी, वाघ या तो फिर यह कोई भी है जितने भी पशु है दूसरे हम भी तो एक पशु ही है। बट वी आर सोशल एनिमल जो कि हमारे में एक वन एक्स्ट्रा एडेड है ये कि हम लोग रिलेशनशिप बनाते हैं और हमारी जो रिलेशनशिप होती है वो हमारी साइकोलॉजिकल हेल्थ के लिए हमारे डेवलपमेंट के लिए बड़ी महत्वपूर्ण है। कुछ-कुछ स्टडीज मैंने इसके बारे में पढ़े हैं। मनुष्य का जो बच्चा होता है, एक ह्यूमन चाइल्ड होता है, उसका जो डेवलपमेंट पीरियड होता है, सबसे लंबा होता है। क्यों? जैसे कि अभी जैसे गाय को बच्चे को जन्म देते हुए हमने देखा होगा। गाय का बच्चा जैसे ही जन्म लेता है कुछ ही एक दो दिनों में ही वह खड़ा होना भी सीख लेता है और अपनी मां का अनुसरण करके वो मां का दूध तो पीता है किंतु मां का अनुसरण करके पीछे-पीछे घूमता भी है। वो सब कुछ विदिन अ वीक और सो वह सीख लेता है। भले ही चाहे वह अभी उसका जन्म हुआ हो। तो गाय का बच्चा है, किसी भी पशु का बच्चा है, बड़े ही अल्प दिन में ही उसको अपनी रक्षा करना सीख लेना होगा। बड़े ही अल्प दिनों में ही इसको अपनी मां है, पिताजी है उसको फॉलो करना सीख लेना होगा। मैंने एक पहले भी एक बार उदाहरण दिया था। एक वीडियो मैंने नेशनल जियोग्राफिक पर देखा था। वहां पर एक नेवला है। नेवला ना कि ऐसा ही कोई एक प्राणी वो उसकी मां उसको जन्म देती है। अभी होता क्या है कि यह जो जगह है जहां पे यह जन्म देती है मां वहां पर बहुत सारे सांप रहते हैं और यह सांप ये बच्चे को खाने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। अभी बच्चे को क्या है? जैसे ही उसका जन्म हुआ है वैसे ही उसको दौड़ना शुरू कर देना होगा और दौड़ करके एक जो चोटी जैसा है छोटी सी हिल जैसा उसके ऊपर में उठ जाना होगा यदि वह उसके ऊपर में नहीं उठेगा तो ये जैसे ही वह दौड़ना शुरू करता है कितने सारे सांप सैकड़ों सांप उसका पीछा करते हैं और यह बच्चा बेचारा दौड़ रहा है सोच करके देखिए हम लोग यदि ऐसी परिस्थिति में होते अभी तो जन्म हुआ है और अभी प्राण बचाने के लिए दौड़ना शुरू करना है। यदि यह बच्चा थोड़ा सा भी यदि अटक जाएगा रास्ते में तो सीधा यह सांप आकर के उसको खा लेगा। जो बच्चा जिसमें स्ट्रेंथ है जो वो पहाड़ के ऊपर में चढ़ गया वो बच गया। बाकी सब बच्चे मर गए। तो यह क्या है कि नेचर इज रेड इन टूथ एंड क्लो। अर्थात कि यह प्रकृति है। उसके नाखून और उसके दांत। यह लोगों की प्राणियों की हत्या करके उनके लहू से लालंगे हुए हैं। तो यह पशुओं में है कि बहुत ही जल्दी उनको बच्चे का जन्म होने से ही अपनी रक्षा करना सीखना होगा। खाना इकट्ठा करना सीखना होगा। जबकि मनुष्य का बच्चा है आप देखेंगे कि 12-15 साल की उम्र तक वह अपने मां-पिताजी के ऊपर में डिपेंडेंट रहता है। यह यदि कोई वॉरटोन कंट्रीज है सुदान फुदान में चले जाइए। सतत युद्ध होता रहता है। वहां पर भी बच्चों को एटलीस्ट छ साल तक तो अपने पेरेंट्स के ऊपर में फुल्ली डिपेंड होकर के रहना पड़ेगा। उन बच्चों को आप रास्ते में छोड़ दीजिए तो वह अपना बचाव नहीं कर पाएंगे। तो यह मनुष्य का यह बच्चे का डेवलपमेंट पीरियड है। मनुष्य के बच्चे का अपने पेरेंट्स पे यह डिपेंडेंस है। अपनी जान की रक्षा करने के लिए वो बहुत लंबा है। क्यों? क्योंकि सर्वप्रथम तो मनुष्य का ब्रेन जो होता है वह बड़ा ही कॉम्प्लिकेटेड है और बड़े ही कॉम्प्लिकेटेड ब्रेन को डेवलप होने में समय भी लगता है। दूसरा कि जो मनुष्य के जो पेरेंट्स जो होते हैं ह्यूमन पेरेंट्स वो अपने बच्चे की रक्षा करने के लिए बड़े ही तत्पर रहते हैं। अपने बच्चे पे बड़ा ही गहरा उनको प्रेम होता है। इसके लिए ये प्रेम की वजह से ही ये प्रकृति जो है इवोल्यूशन जो है ये इवोल्यूशन बड़ा ही कैलकुलेटिंग है उसका बुद्धि वो थोड़ा सा भी आपके कैलकुलेशन में इधर-उधर नहीं होने देगा। वह देखेगा कि यह नेवले का बच्चा है। उसको यदि बचना है तो इमीडिएटली उसको दौड़ना शुरू कर देना है। तो फिर उसकी मां के भीतर में उस बच्चे के प्रति इतना कंपैशन इतना प्रेम नहीं है। जबकि मनुष्य का बच्चा है उसको मैच्योर होने में, अपनी आत्मरक्षा करने में 12 से 15 साल इजीली लग जाएंगे। तो मनुष्य के पेरेंट्स का अपने बच्चों पे इतना गहरा प्रेम रहता है कि 1215 साल तक ईजीली उसकी रक्षा करेंगे और ज्यादातर तो हम देखते हैं कि पूरा जीवन भर हम अपने मां-बाप पे जब तक मां-बाप जिंदा है तब तक कभी-कभी तो हम उन पे डिपेंडेंट रहते हैं। उनके प्रेम के हम लोग बड़े ही आशा रख के बैठे हैं। तो, यह ह्यूमन लाइफ जो है, उसमें यह रिलेशनशिप है। बड़ा ही इंपॉर्टेंट पार्ट, बड़ा ही इंपॉर्टेंट उसका एस्पेक्ट है। कुछ समय पहले मैं कुछ आर्कियोलॉजिकल एविडेंस पढ़ रहा था। आर्कियोलॉजिकल आर्टिकल उसमें लिखा था अभी हमको तो पता है कि मॉडर्न थ्यरी के अनुसार यह एप में से होमोसेपियंस का इवोल्यूशन हुआ है। पहले ये होमो इरेक्टस उसके बाद में ये होमोसेपियंस बहुत सारी प्रजातियों में से आखिर में आज का जिसको मॉडर्न ह्यूमन कहते हैं होमोसेपियंस वो आया है। अभी ये एक जगह पे ये स ये जो आर्कियोलॉजिस्ट है उन्होंने एक ग्रेव यानी कि ये जो मुर्दे डेड बॉडी को जिसमें गाड़ते हैं वो एक ग्रेव खोजा। उसमें देखा उन्होंने कि जो वृद्ध हो गए हैं इस तरह के कुछ डेड बॉडीज थे उसमें। अभी उसका एज जो है वो हड्डियों को टेस्ट करके पता चलता है। यदि आप बहुत पुरानी कोई डेड बॉडी खोज निकालेंगे तो उसमें तो हड्डियां ही रहेगी। किंतु हड्डियों की एग्जामिनेशन करके आप समझ पाएंगे कि यह जो डेड बॉडी है वो किस उम्र की है। आपको एक रेंज पता चल जाएगा। 810 साल के बच्चे की है। 12-15 साल के युवान की है। 30-40 साल के 30 35 साल के मिडिल एज पर्सन की है। उसका जेंडर क्या है? बहुत कुछ पता चल जाता है। यह हड्डियों की एग्जामिनेशन करके। उसका डाइट कैसा रहा होगा? उसकी लाइफस्टाइल कैसी रही होगी? क्योंकि ये इन्वेस्टिगेटिव टूल जो है अभी अपने पास में काफी सोफिस्टिकेटेड है। तो ये जो आर्कियोलॉजिस्ट है उन्होंने ये जो कुछ स्केलेटल मिले तो वो स्केलेटल्स का उन्होंने एग्जामिनेशन प्रारंभ किया तो वे लोग आश्चर्यचकित हो गए कि यह जो डेड बॉडी या तो यह जो पर्सन होगा वो उसको कोई डिसीज हुआ था और डिसीज होने के बाद में यह काफी लंबे समय तक यह बचा रहा था। अभी यह जब रिजल्ट है जब पब्लिश हुए तब जैसे कि एक पूरा सभी लोग बड़े ही इंप्रेसिव हो गए क्योंकि ये डेड बॉडीज कब की थी ऑलमोस्ट 20-25000 साल पहले की थी एग्जैक्ट मैं नंबर भूल गया किंतु बड़ी पुरानी थी। अभी देखिए कि उस समय जैसा था कि एप एप के भीतर में ये जो सोशल रिलेशन होता है इतना स्ट्रांग नहीं होता। अभी आप अह अभी जैसे कि मान लीजिए कि कोई अह एप है, वह बीमार हो गया, तो उसको अपनी रक्षा अपने से ही करनी है। अपना खाना अपने से ही जुगाड़ करना है और कोई उसको इतना हेल्प करने को नहीं आएगा। थोड़ा बहुत शायद इधर-उधर कोई हेल्प कर दे किंतु इतना ज्यादा कोई लंबा हेल्प नहीं करेगा। यह बीमार ऐप जो है कुछ ही समय में वह मर जाएगा। किंतु यह बीमार यह जो था यह पर्सन जो कि इतने लंबे टाइम तक जिंदा रहा इसका रीजन क्या हो सकता है कि किसी ने उसकी केयर की होगी तो यह केयर करना आपस में हम लोग समझते हैं यह रिसेंट फिनोमिना है कि यह जो मां-बाप भाई-बहन पतिप समाज यह जो हमारे भीतर में कोई बीमार हो जाए तो हम उनकी कितनी केयर करते हैं। कितने सारे एग्जांपल है कि मां बीमार है। पिताजी बीमार है। बच्चे उनकी सेवा कर रहे हैं। कितने प्रतिदिन आपको प्रति घर में यह एग्जांपल देखने को मिल जाएगा। तो बीमार है और लंबे समय तक टिकते हैं। वह तभी संभव है जबकि आपकी स्नेह से कोई केयर करने वाला होगा। तो ये आर्कियोलॉजिस्ट ने यह जो स्केलेटल खोजा तब उनको पता चला कि इतने हजार साल पहले से ही यह जो सोशल बॉन्डिंग है कि कोई बीमार है उसकी केयर करना है आउट ऑफ लव यह उस समय से प्रारंभ हो गया था। तो यह हम लोग जो है हम लोगों में मनुष्य सभ्यता में होमोसेपियंस स्पीशीज में एक दूसरे की केयर करना, एक दूसरे के प्रति सहानुभूति रखना, एक दूसरे के प्रति प्रेम रखना, यह बड़ा ही फंडामेंटल है हमारे इवॉल्यूशन के लिए। देखिए कि अह पहली-पहली बार यह मनुष्य ने शिकार करना प्रारंभ किया। तो आप सोच लीजिए कि हमारा जो बॉडी अभी उस समय के जो ह्यूमंस थे वो आज के ह्यूमन से काफी फिजिकली स्ट्रांग थे। हम लोग क्या है आजकल पूरा वो सेडेंटरी लाइफस्टाइल हो गया है आज की सभ्यता का। किंतु उस समय में जबकि हम लोग हंटर गैदरर्स थे आज से 15,000 साल पहले 20,000 साल पहले तो फिर उस समय तो क्या था कि अपना फिजिकल स्ट्रेंथ बहुत ज्यादा था। किंतु हम हंटर गैदरर्स हैं। और जब हम शिकार करने के लिए जा रहे हैं सामने शेर आ गया तो हमको शेर को मारना है। हाउ इज इट पॉसिबल? कि शेर की जो शक्ति है शेर भी आजकल के शेर की तरह नहीं थे। वो सेबर टू थेड एक शेर आता था। उसका यह जो दांत होता है आधे फुट लंबा होता था। उसकी उसकी वो जिसके ऊपर में वो बिठा देगा अपना मुंह वो उसका वो हो गया कल्याण। उसके शरीर के दो टुकड़े करे बिना वो छोड़ेगा नहीं। तो ऐसे भयानक भयानक वो शिकारी प्राणी उस समय थे। उसके सामने हमको युद्ध करके रहना है। हाउ वास दैट पॉसिबल? एक मनुष्य चाहे जितना भी फिट हो और एक सेबर टूथ है टाइगर उसके साथ दोनों में युद्ध होगा। ऐसा हो ही नहीं सकता कि वो मनुष्य जीतेगा। वो टाइगर ही जीतेगा। किंतु फिर भी हमको पता है कि मनुष्य का हमेशा से जंगली प्राण पशुओं पे विजय होता रहा है। कैसे हुआ है? क्योंकि हम लोग ग्रुप में हंटिंग करते हैं। अभी ग्रुप में हंटिंग दूसरे भी पशु करते हैं। हाईनास है, डॉग्स है। वैसे बहुत सारे पशु हैं जो कि ग्रुप में हंटिंग करते हैं। किंतु हमारे पास में फिर टूल डेवलप करने की भी कैपेसिटी है। यानी कि हम सिर्फ अपने हाथ पे डिपेंडेंट नहीं है। ये तीर है, यह फिर जो यह है बाकी सब ये तलवार है ना कि भाला है। इस तरह के जो अस्त्र हमने डेवलप किए तो ये सोशल अपना जो ऑर्गेनाइजेशन था इट गव अस अ वेरी पावरफुल एज अबव एव्री अदर एनिमल तो ये सोशल एस्पेक्ट है किसी भी सिविलाइजेशन के किसी भी स्पीशीज के डेवलपमेंट के लिए और तीसरा एस्पेक्ट है सिविलाइजेशनल स्टडीज देखिए प्रथम है स्पिरिचुअल एस्पेक्ट सेकंड है सोशल एस्पेक्ट थर्ड इज दी सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट ेक्ट ये सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट क्या है? तो हमारी यह जो हायर थिंकिंग फैकल्टी है इसका इस्तेमाल करके हमने ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन डेवलप किए। हमने फिलॉसोफिस डेवलप की। हमने आर्ट डेवलप किया। हमने पोएट्री डेवलप की। हमने ये स्टोरीज लिखी। हमने ये साइंस डेवलप किया। इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग। आज हमें अभी कुछ दिनों पहले ही एक अ ये मीम होता है ना मीम मीम अर्थात कि कार्टून जैसा ही किंतु बड़ा शॉर्ट सिंगल इमेज होती है और उसमें बड़ा डीप मैसेज रहता है तो एक मीम देख रहा था तो उसमें था कि एक घोड़ा गाड़ी है और दूसरी घोड़ा गाड़ी है। अभी ऊपर में क्या लिखा है? पहली घोड़ागाड़ी के ऊपर में 500 साल पहले की यह घोड़ा गाड़ी है। 500 ना कि 1000 साल पहले की और वो 1000 साल पहले की डेट उसके ऊपर में लिखी है। और दूसरी जो घोड़ा गाड़ी थी उसके ऊपर में यह 18th सेंचुरी की डेट लिखी थी। यानी कि दो घोड़ा गाड़ी है। यह दोनों मोर और लेस एक ही तरह की दिखती है। किंतु दोनों के बीच में 1000 साल का अंतर है। यह पहला पार्ट हो गया। दूसरे पार्ट में वो जो 18th सेंचुरी वाली घोड़ा गाड़ी थी वो बताई है और उसके पास में दूसरा पिक्चर है स्टिल द बमबर का स्टिल द बमबर टेक्नोलॉजी यानी कि एिएशन में या तो फिर ट्रांसपोर्टेशन में सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी तो यह जो पहली घोड़ा गाड़ी है उसके ऊपर में 18th सेंचुरी की डेट है और यह स्टिल द बमबर है उसके ऊपर में आज की डेट है और लिखा है कि 100 साल में हमने घोड़ा गाड़ी से स्टिल द बमबर तक यात्रा की। पहले 1000 साल में घोड़ागाड़ी से घोड़ा गाड़ी तक ही पहुंचे। किंतु दूसरे 100 साल में ही ये घोड़ा गाड़ी से स्टिल द बमबर तक पहुंच गए। तो देखिए कि ये जो डेवलपमेंट होता है ह्यूमन सिविलाइजेशन का यह कैसे होता है? हमने ये हायर आइडियल्स धीरे-धीरे करके खोज निकाले। सबसे पहले यह अग्नि की खोज हुई। इसके बाद में यह विल की खोज हुई। इसके बाद में धीरे-धीरे करके हमने एस्ट्रोनॉमी डेवलप की। जितनी भी पुरानी सभ्यता आप देखेंगे इजिप्ट की देखेंगे, मेसोपोटेमिया की देखेंगे देखेंगे कि वहां पर वो जो टेबलेट होती है या तो इजिप्ट के जो पिरामिड होते हैं वहां पे स्टार्स को जो कॉनस्टलेशंस जिसको हम कहते हैं वो सब डिपिक्ट किए गए हैं कि एक के बाद एक इतने सारे कॉनस्टलेशन है। तो मनुष्य के मन में उस समय क्या चलता होगा कि यह डे टू डे एक्टिविटी को छोड़कर के वो आकाश की ओर देखता रहता है। क्या उसको और कोई कामधाम नहीं है? आकाश को देखेगा। आकाश के तारों की किस तरह से संरचना है। किस तरह की पैटर्न बनती है और उसके ऊपर में फिर अपनी कल्पना बिठाएगा कि यह वुल्फ की ये जो बियर की पैटर्न है ना कि ये मछली की पैटर्न है ना कि ये ये उसकी पैटर्न है बोल करके ये पैटर्न बनाएगा। फिर कॉन्स्टेलेशन बनाएगा। फिर ये सूरज किस तरह से गति करता है? एक्लिप्स क्या है? ये सब हायर थिंकिंग जिसको कहते हैं ये हायर थिंकिंग इज द पार्ट ऑफ द सिविलाइजेशनल स्टडीज। यह हायर थिंकिंग के भीतर में यह आजकल का जो ग्रेटेस्ट नेम हम देखते हैं बेस्ट ऑफ द फिलॉसोफर्स, बेस्ट ऑफ द आर्टिस्ट, बेस्ट ऑफ द स्टेट्समैन, बेस्ट ऑफ द पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव्स, बेस्ट ऑफ द साइंटिस्ट सभी लोग जो है विद इन दिस सिविलाइजेशनल स्टडीज आते हैं। तो, यह तीन एस्पेक्ट है कि एनी स्पीशीज उसको डेवलपमेंट करना है। तो, यह उसके भीतर में स्पिरिचुअलिटी भी चाहिए। उसके भीतर में यह सोशल एबिलिटी भी चाहिए और यह सिविलाइजेशनल डेवलपमेंट भी चाहिए। और देखिए कि रामकृष्ण मिशन में

श्री रामकृष्ण = व्यक्तिगत आध्यात्मिकता

ठाकुर मां स्वामी जी यह तीनों एक-एक एस्पेक्ट को रिप्रेजेंट करते हैं। ठाकुर के भीतर में देखिए कि यह इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी मनुष्य का दिव्यता के क्या साथ में क्या संबंध है? ईश्वर के साथ में ना कि आत्मन के साथ में क्या रिलेशन है? परफेक्टली एग्ेंंपलीफाइड परफेक्टली डेवलप बाय श्री रामकृष्ण। सोशल स्टडीज में या तो सोशल रिलेशन में मां शारदा देवी के बारे में हमको बड़े अच्छे से पता है। यह पागली मामी ये राधु वगैरह को तो छोड़ ही दीजिए। मां की जो जया विजया यह गुलाब मां योगेन मां वो भी मां को कितना कष्ट देती थी। वो एक कहानी है। योगेन मां वो गंगा में स्नान करने के लिए गई। देखा उनके मन में गंगा में स्नान करते-करते एक विचार आया कि ठाकुर तो इतने पवित्र थे। इतने त्यागी थे। जबकि मां है कि पूरे परिवार को साथ में लेकर के बैठी रहती है। सब समय यह राधु के हां क्या कर रही है? यह मां को क्या कर रही है? नलिनी क्या कर रही है? अपने भाई है जो काली मामा, वर्दा मामा, प्रसन्न मामा इन सब की चिंता कर रही है। तो यह कहां ठाकुर त्यागीश्वर और ये कहां मां घोर संसारी की तरह उसी समय यह जो जैसे ही विचार आया योगिन मां के मन में उसी समय देखा कि एक छोटा सा बच्चा अभी उसका जन्म हुआ है। जन्म के साथ में ही वह मर भी गया है। तो छोटे से बच्चे का डेड बॉडी उस गंगा में तैरता हुआ उनकी नजर के सामने से जा रहा है। जैसे ही डेड बॉडी को देखा साथ में ही ठाकुर स्वयं उनके सामने योगिन मां के सामने प्रकट होकर के बोले देखो योगिन इस तरह की डेड बॉडीज गंगा में कितनी बहती जाती है क्या इससे गंगा अपवित्र होती है नहीं होगी तो वैसे ही श्री मां को जानना तो कितना ही संसार ऊपर ऊपर से चलता रहता हो भीतर से संपूर्ण त्यागीश्वर मां भी इतनी ही त्यागीश्वर है जितने कि ठाकुर स्वयं थे तो यह जैसे ही ठाकुर ने दर्शन देकर यह बात कही बेचारी योगिन मां दौड़ी दौड़ी गई मां के पास में मां उस समय उद्बोधन में रहती थी मां के पैरों में गिर करके कहा कि मां मुझे क्षमा कर दो कि मैंने आपके ऊपर में इस तरह से संदेह किया तो मां उनकी वो पीठ के ऊपर में हाथ रख के कहती है अरे योगेन अरे योगेन क्या इसमें क्या है इस तरह से संदेश तो कितने माने ये स्वामी जी है योगेन महाराज है कितने लोगों ने ठाकुर के ऊपर में संदेह किया संदेह करके संदेह का निराकरण करना यही तो है आध्यात्मिक जीवन में हमारी प्रशस्ति का मार्ग उज्जवल करता है। एक बार ठाकुर कहां पर गए थे? तो दो-तीन लोग ठाकुर को एक एक जेंटलमैन थे। ठाकुर को प्रश्न कर रहे हैं। प्रश्न के ऊपर में प्रश्न कर रहे हैं और ठाकुर बड़े खुशी से उत्तर भी दे रहे हैं। तो पास में एक आदमी बैठा था। वो उस कहते हैं उस आदमी को दूसरे को जो प्रश्न कर रहा था। अरे तुम मान लो ना बार-बार प्रश्न क्यों करते हैं? वो जो कहते हैं अर्थात ठाकुर जो कहते हैं उसको स्वीकार कर लो। प्रश्न ठाकुर को प्रश्न करने की क्या जरूरत है? वैसे ही ठाकुर इस आदमी के ऊपर में नाराज हो गए। कहा कि शेकी शुद्ध मैंने नेवा माने ये क्या बोल रहे हो? सिर्फ आंख बंद कर स्वीकार कर लेना। ये तो बिल्कुल गलत है। ये तो यानी कि ठाकुर भी पसंद करते थे कि कोई उनको प्रश्न करे। तो देखिए कि यह जो स फैमिली में रहकर के मां ने जो उदार हृदयता दिखाई, फैमिली में रहकर के मां ने जो प्रेम दिखाया सबके ऊपर में दैट इज दी सोशल एस्पेक्ट जो कि हमको डेवलप करना है। हमारा सोशल एस्पेक्ट कैसे डेवलप हो वो हमको मां शारदा देवी से सीखना है। और सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट हमको पता है। स्वामी विवेकानंद स्वयं फिलॉसोफी कहो ना कि साइंस कहो ना कि आर्ट कहो ना कि म्यूजिक कहो जो कि हायर एंडीवोर है। पूरे ह्यूमन सिविलाइजेशन में खोल के देख लीजिए किसको हम सबसे ज्यादा सम्मान देते हैं। कोई बहुत बड़ा गायक है जैसे ये कालिदास थे ना कि उनके गुरु थे ना कि कोई बहुत बड़ा राजनेता है। कोई बहुत बड़ा जनरल है। कोई बहुत बड़ा फिलॉसोफर है। कोई बहुत बड़ा साइंटिस्ट है। कोई बहुत बड़ा जिसने कि कंट्रीब्यूशन किया है। एक्सप्लोरर है। एडममंड हिलरी है ना कि कैप्टन कुक है वगैरह-वगैरह ये ये इन लोगों को हम सम्मान देते हैं क्योंकि उन्होंने जो एक्सप्लोर किया हायर थिंकिंग को और जिस तरह से उन्होंने सिविलाइजेशन को एनरच किया उसकी वजह से हम सभी लोग उनको रिस्पेक्ट करते हैं। तो स्वामी विवेकानंद के भीतर में यह सभी गुण भर-भर करके उनके भीतर में थे। वह चाहे कोई भी क्षेत्र हो स्वामी जी ने उसके भीतर में एक महत योगदान दिया है। हम सबको पता है। सो दिस थ्री एस्पेक्ट इंडिविजुअल

उपनिषद का महावाक्य हमारे आध्यात्मिक, सामाजिक और सभ्यतागत पहलुओं को मजबूत करता है।

स्पिरिचुअलिटी, सोशल लाइफ और ये सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग ये तीनों को यदि हमको तगड़ा बनाना है, तीनों को यदि नरिश करना है, तो यह जो उपनिषद का अहम ब्रह्मास्मि महावाक्य है, उसकी हम ठीक-ठीक से साधना करेंगे। ठीक-ठीक अपने जीवन में अप्लाई करेंगे। तो ये हमारे तीनों एस्पेक्ट वो कि ये जो सहस्त्रदल पद्म होता है थाउजेंड पेटल लोटस इसकी तरह वो ब्लूम होंगे इसकी तरह हमारे हृदय में खिलेंगे। इसके लिए स्वामी जी कहते हैं कि उपनिषद का जो स्टडी है उपनिषद के जो महावाक्य है उसको वन में से मंदिरों में से मठ में से सन्यासी मंडलियों में से जाकर के कलेक्ट कीजिए और घरघर गांवगांव इसका प्रचार कीजिए और यह प्रचार जो करेगा वह सबसे ज्यादा पुण्य बटोरेगा अपने दूसरे जन्म के लिए जो यह साधना करेगा उसके सामने बाकी सब साधनाएं फीकी पड़ जाएगी। यह स्वामी जी का हमको प्रॉमिस है। तो यह हो गया कि स्वामी जी कहते हैं कि उपनिषद का प्रचार किसी देश की उन्नति के लिए क्यों करना है? माने आध्यात्मिक उन्नति के लिए करना है वह तो समझ में आता है। किंतु स्पीशीज लेवल इवोल्यूशन जो है यदि आज हम एक समय था कि हम एप स्पीशीज में थे। अह उसके बाद में होमो इरेक्टस और होमोहबिलिस दिस दैट बहुत सारी इंटरमीडिएट स्पीशीज आई है। टुडे वी आर होमोसेपियंस। तो इस स्पीशीज से भी यदि हमको होमो डिवाइन माने एक दिव्य पुरुष की ये जो हमको यात्रा करनी होगी तो हमको उपनिषद ही सबसे ज्यादा हेल्पफुल होंगे। तो यह एक एस्पेक्ट इसके बाद वाला जो पॉइंट है

आध्यात्मिक ज्ञान का दान सर्वोच्च दान है

स्वामी जी कहते हैं गिफ्ट ऑफ स्पिरिचुअलिटी यह जो स्वामी जी ने पहले कहा ना कि यह सत्यों को जो जितना भी बांटेगा वो सबसे ज्यादा पुण्य कमाएगा इसके बारे में ही यह पॉइंट है। स्वामी जी कहते हैं सेज आवर व्यासा हमारे व्यास कहते हैं इन द कलयुगा देयर इज वन कर्म लेफ्ट सैक्रिफाइसेस एंड ट्रेमेंडस तपस्यास आर ऑफ नो अवेल नाउ। कलयुग में सिर्फ एक ही कर्म बचा है। यह चाहे जितने भी बलिदान दे दीजिए, होम, हवन, यज्ञ कर दीजिए, प्रचंड तपस्या कर दीजिए। उससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं। ऑफ कर्मास वन रिमेंस एंड दैट इज द कर्मा ऑफ गिविंग। कर्मों में एक ही कर्म बचा है। कर्मकांड में एक ही महत कर्म बचा है। वह है दान का कर्म। एंड ऑफ दिस गिफ्ट्स। द गिफ्ट ऑफ स्पिरिचुअलिटी एंड स्पिरिचुअल नॉलेज इज द हाईएस्ट। और यह जो दान है यह दान में आध्यात्मिकता का दान आध्यात्मिक ज्ञान का दान सर्वोच्च है। एंड द नेक्स्ट गिफ्ट इज द गिफ्ट ऑफ सेकुलर नॉलेज। और इसके बाद की जो गिफ्ट है उसके बाद का जो ज्ञान है वो है इस जगत के बारे में ज्ञान जिसको कि हम जनरली साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, इंडस्ट्रियलाइजेशन कहते हैं। वो ज्ञान भी देना। यह आध्यात्मिक ज्ञान से सिर्फ एक ही स्टेप निम्न कक्षा का है। द नेक्स्ट इज द गिफ्ट ऑफ लाइफ। इसके बाद में आता है जीवत दान। एंड द फोर्थ इज द गिफ्ट ऑफ फूड। इसके बाद में आता है अन्नदान। लुक एट दिस वंडरफुली चैरिटेबल लेस रेस। यह जो भारत देश है देखिए कि हम लोग कितना दान करते हैं। हम लोग अन्नदान भी करते हैं। जीवन दान यानी कि आरोग्य दान भी करते हैं। मेडिकल फैसिलिटीज प्रोवाइड करके ज्ञान दान विद्या दान भी करते हैं। सेकुलर नॉलेज को कहेंगे विद्यादान। और फिर जो हाईएस्ट है स्पिरिचुअल नॉलेज इसको कहेंगे ज्ञान दान। यानी कि चार स्टेजेस के दान स्वामी जी ने बताए हैं। अन्नदान, आरोग्य दान, विद्यादान और ज्ञान दान। और यह चारों दान भारत में आदिम समय से आदि काल से चले आ रहे हैं। सनातन काल से चले आ रहे हैं। इसी दान को फिर से हमको पुनः जागृत करना है। लुक एट द अमाउंट ऑफ गिफ्ट्स दैट आर मेड इन दिस पुअर पुअर कंट्री। यह गरीब गरीब देश है। उसमें कितना दान होता रहता है। आप देख लीजिए। लुक एट द हॉस्पिटिटी वेयर अ मैन कैन ट्रैवल फ्रॉम द नॉर्थ टू द साउथ हैविंग द बेस्ट इन द लैंड। हैविंग ट्रीटेड ऑलवेज बाय एवरीवन एज इफ ही वेयर अ फ्रेंड एंड वेयर नो बेगर स्टाफ सो लॉन्ग एस देयर इज अ पीस ऑफ़ ब्रेड एनीवेयर। देखिए भारत में यह जो अतिथि सत्कार की परंपरा है एक आदमी एक मनुष्य नॉर्थ से साउथ तक ट्रैवल करेगा किंतु यदि उसके पास में कुछ भी नहीं है फिर भी जहां पे भी जाएगा जिस गांव में जाएगा जिस शहर में जाएगा लोग उनको खुले हाथों से वेलकम करेंगे खाने के लिए रहने के लिए सब कुछ व्यवस्था करेंगे जैसे कि वह अपना ही जैसे कि बिछड़ा हुआ मित्र हो कितने सालों के बाद में से मिल रहा हो। जहां पर एक भी भिखारी है, वह भूखा नहीं सोएगा। जब तक कि रोटी का एक टुकड़ा कहीं पर भी प्राप्त्य है, वह तब तक वो भिखारी भूखा नहीं सोएगा। देखिए, मैं अपनी खुद की बात बताता हूं। मेरा खुद का ही एक्सपीरियंस है। यहां पे रामकृष्ण मिशन में आने से पहले पहली बार जॉइ करने से पहले उस समय में कन्याकुमारी में था और सडनली मेरे माइंड में ऐसा आ गया कि चलो प्रवृजिया करते हैं। उस समय मेरा ठीक नहीं था कि क्या करना है और संसार में नहीं रहना इतना तो पक्का हो गया। किंतु फिर साधु होना है कि क्या होना है वो ठीक नहीं कर पा रहा था मैं तो सोच लिया कि प्रवरज्या करते हैं कुछ समय तक। फिर जैसे ही वह ठाकुर फिर जो मति दे जो स्वामी जी बताएं बाद में क्या करना है बोल कर के मैं कन्याकुमारी से निकला अभी मैं जा कहां रहा हूं मैं भ्रमण कर रहा हूं केरल में यानी कि देखिए कि नॉर्थ इंडियन आदमी हूं मैं और साउथ इंडिया के बारे में कुछ भी नहीं पता लैंग्वेज फैेंग्वेज कुछ नहीं पता उसमें भी यहां पे यहां पर जो आंध्र प्रदेश में लोग कहते हैं कि केरल सबसे ज्यादा विचित्र वो राज्य है। साउथ इंडिया में वो केरल का एक इस तरह से नाम है। तो वही केरल में मैं पैदल पैदल चल रहा हूं। तो मैं मुझे कभी भी भूखा नहीं रहना पड़ा। मैं कहां पर भी जाता था मैं शेमलेसली मांग लेता था कि अच्छा मुझे खाना दीजिए। मैं इस तरह से पैदल चल रहा हूं। स्वामी विवेकानंद नॉर्थ से साउथ गए थे। मैं साउथ से नॉर्थ जा रहा हूं। तो हो सके तो कुछ खाना बनाना खिला दीजिए। कितने लोगों ने मुझे मदद की है। एक एक लड़का था। मेरे साथ में ऐसी मित्रता हो गई। मुझे अपने घर ले गया। गांव है और देखिए हम लोग तो नॉर्थ इंडिया से खास करके मैं गुजरात से आता हूं तो गुजरात में ऐसे कोई जलाशय वगैरह मैंने नहीं देखे। ये पोंड होता है, लेक होता है। तो केरल में तो पोंड्स है, लेक है, जलाशय है। जहां पे भी जाए वो उसमें कमल खिले रहते हैं। इतना सुंदर लगता है। वो जो कहते हैं ना गॉड जोोन कंट्री वो उसकी वो जो ट्रेवल लोग उस एडवर्टाइजमेंट है उसमें ये लोग लिखते हैं। लिटरली इज़ अ वेरी ब्यूटीफुल स्टेट। तो उसका जो गांव था वो जलाशय है चारों ओर उसमें कमल के कमल के बाद कमल खिले हैं उसके घर पर ले गया घर पर मुझे रहने दिया फिर हम सुबह शाम वो जलाशय में स्विमिंग करने को जाते थे मैं बहुत अच्छा स्विमर था उस समय तो मैं सुबह शाम उसमें स्विमिंग करता रहता था वो जो ठंडा पानी है और ऊपर में वो सुबह का सूरज प्रकाशित हो रहा है। ऐसा लगता था कि आई एम लिविंग इन हेवन। कोई भी रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। खाने की कोई चिंता नहीं है। जहां पे भी इस सुंदर गांव में घूमना चाहो घूमो। जितना चाहे आराम से यह ठंडे पानी में तैरते रहो। वो मित्र था वो मेरा वो उसके साथ में जितना गप लगाना हो लगाओ। तो ऐसा करके मैं तीन से चार महीना इस तरह से घूमा था। कभी एक दिन भी मैं भूखा नहीं गया हूं। दिस इज माय ओन एक्सपीरियंस। और यह मैं केरल की बात बता रहा हूं। जहां पर मुझे कोई पहचानता नहीं। लैंग्वेज का कोई प्रश्न ही नहीं आता। इस तरह से और बहुत सारे लोगों को इंग्लिश भी नहीं आता था। सिर्फ वो इशारोंइशारों में बातें चलती थी और सब वो भी समझ जाते थे। मैं भी समझ जाता था। दिस इज माय ओन पर्सनल एक्सपीरियंस। इसलिए जो स्वामी जी जो कहते हैं कि यदि गांव में एक रोटी भी कहीं पे भी प्राप्त्य है तो वो भिखारी भूखे नहीं मरेगा। हां। जैसे कहते हैं ना ठाकुर कभी-कभी ठाकुर का जो कहना है किसी को सुबह को रोटी मिल जाती है। किसको रात को रोटी मिलती है। किंतु रोटी मिलेगी सबको। तो यह जो दान करने की यह जो विशाल हृदयता है इस भारत देश में है। तो इसी दान को आज हम ज्ञान दान में परिणत करें। उपनिषद के यह जो सत्य है उसको सबके भीतर में इसका प्रचार करें। अन्नदान या तो फिर यह आरोग्य दान या तो फिर यह विद्या दान से भी कहीं ज्यादा पुण्य हमको उपनिषद का प्रचार करके महावाक्य का प्रचार करके प्राप्त होंगे।

वैश्विक वेदांत

इसके बाद का पॉइंट है स्वामी जी कहते हैं ग्लोबल वेदांत यानी कि वेदांत को सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे विश्व में फैलाना है। इन दिस लैंड ऑफ चैरिटी इस दान दक्षिणा की भूमि में लेट अस टेक अप द एनर्जी ऑफ द फर्स्ट चैरिटी द डिफ्यूजन ऑफ स्पिरिचुअल नॉलेज। यह जो प्रथम दान है ज्ञान दान उसको हम सब अपने जीवन में उसका पालन करें। एंड दैट डिफ्यूजन शुड नॉट बी कनफाइंड विद इन द बाउंड्स ऑफ इंडिया। और ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ही उप महावाक्य का प्रचार करें। इट मस्ट गो आउट ऑल ओवर द वर्ल्ड। पूरे विश्व में इसका प्रचार होना चाहिए। दिस हैज़ बीन द कस्टम। यही तो हमारी पुरानी परंपरा है। दोज़ दैट टेल यू दैट इंडियन थॉट नेवर वेंट आउटसाइड ऑफ इंडिया। दोज़ दैट टेल यू दैट आई एम द फर्स्ट सन्यासीन। हु वेंट टू फॉरेन लैंड्स टू प्रीच डू नॉट नो द हिस्ट्री ऑफ देयर ओन रेस। जो लोग आपको कहेंगे कि पहले आज से पहले कभी भी उपनिषदों का यह महत्व संदेश भारत की सीमाओं को लांघ करके विदेश में प्रचारित नहीं हुआ है। जो लोग आपको कहेंगे कि मैं सर्वप्रथम सन्यासी हूं। जिसने कि महावाक्य का प्रचार पूरे विश्व में किया है, वे लोगों को अपने देश का इतिहास बिल्कुल भी पता नहीं है। अगेन एंड अगेन दिस फिनोमिनन हैज़ हैपेंड। बार-बार ऐसा होता आ रहा है। व्हनेवर द वर्ल्ड हैज़ रिक्वायर्ड इट। दिस पेरेनियल फ्लड ऑफ स्पिरिचुअलिटी हैज़ ओवरफोड एंड डलड द वर्ल्ड। जब भी विश्व को आवश्यकता आन पड़ी यह सनातन प्रचंड प्रवाह आध्यात्मिकता का प्रचंड प्रवाह उसने पूरे विश्व में फैल करके पूरे विश्व को इस अमृतमय महासागर में डुबो दिया है। ठाकुर कहते हैं ना स्वामी जी को कि अमृत का सागर है। उसका पान तुम कैसे करोगे? तो स्वामी जी कहते हैं मैं उसके किनारे पर खड़ा रहूंगा और झुक करके संभाल पूर्वक उसमें से धीरे-धीरे करके वह पान करूंगा। ठाकुर कहते हैं भाई यह अमृत का सागर है। उसमें गिरने से तुम मरोगे नहीं अमर हो जाओगे। उसमें सीधा डूब जाओ और पूरा अपने को इसके भीतर में डुबो दो। तो वैसे ही यह अमृतमय महासागर की जो लहरें पूरे विश्व को पव प्लावृत कर देगी और विश्व इससे अमर ही हो जाएगा। कोई सुनामी की तरह विश्व का नाश नहीं होगा। गिफ्ट्स ऑफ स्पिरिचुअल नॉलेज कैन बी मेड विद द गिफ्ट्स ऑफ पॉलिटिकल नॉलेज कैन बी मेड विद द ब्लास्ट ऑफ ट्रंपेट्स इन द मार्च ऑफ कोहस। ये पॉलिटिकल ज्ञान है। ये जो राजनैतिक ज्ञान है ये मॉडर्न सिविलाइजेशन यदि आपको देनी है तो आप बड़े-बड़े वो शंख भेरी बजा करके आर्मीज़ है या तो फिर यह शस्त्र लेकर के जाने वाले सैनिक है उसके माध्यम से आप ये जो पॉलिटिकल सिस्टम है उसका फैलावा कर सकते हैं। कम्युनिस्ट कहेंगे कि मुझे दूसरे देशों में कम्युनिज्म फैलाना है। कैपिटलिस्ट कहेंगे दूसरे देशों में कैपिटलिज्म फैलाना है। मैनचेस्टर की मिल के लिए मार्केट चाहिए। भारत वाले तो इतना अच्छा कपड़ा बनाते हैं। वस्त्र बनाते हैं वह सिल्क का एक अंगूठी में से पूरा वस्त्र पसार कर सकते हैं। इतना वो एकदम फाइन व्यूविंग होता है। तो मैनचेस्टर मिल का कपड़ा कौन लेगा? तो पहले तो यह भारत में जाकर के उसके जो जितने भी राजा रजवाड़े हैं, नवाब है, ये मुगल है सबको हरा दो। उसके बाद में यह जितने भी कारीगर है उनके अंगूठे काट डालो। फिर यह भारत में यह जो फाइन वस्त्र है बनना बंद हो जाएगा। उसके बाद में यह मैनचेस्टर की मिल का जितना कपड़ा हम भारत में बेचेंगे सब लोग खरीदना शुरू कर देंगे। तो यह था उनका पावर कि उन्होंने पहले तो ये नेवल ये सेलर्स को लेकर गन बोट लेकर के आए। ब्रिटेन का डिप्लोमेसी क्या कहलाता था? गनबोट डिप्लोमेसी। तो ये गनबोट लेकर के आए मुगल फुगल को हरा दिया। कब्जा कर लिया पॉलिटिकल और फिर यह अपना जो मैन्युफैक्चरिंग है उनकी मिल का उनकी फैक्ट्रीज का वो सब भारत में लेके आए। बहुत सारे लोग कहते हैं अच्छा भारत में तो ब्रिटिश लोगों ने आकर के बहुत सारा अच्छा कार्य किया। उन्होंने मॉडर्न साइंस भारत में लाए, रेल रोड लाए, टेलीग्राफ लाए ना कि टेलीग्राम लाए वगैरह-वगैरह। तो ये सब आया। उसके पीछे में जो हमको जो कॉस्ट पे करनी पड़ी है हमको जो लहू से अपने सीने के लहू से उसको भरपाई करना पड़ा है वो तो देखिए यानी कि ब्रिटेन का नॉलेज भारत में आया तो सही किंतु भारत का हृदय चिर करके कितना लहू उसने बहाया है। गिफ्ट्स ऑफ सेकुलर नॉलेज एंड सोशल नॉलेज कैन बी मेड विद फायर एंड स्वॉर्ड। अग्नि और तलवार के माध्यम से यह सेकुलर नॉलेज है या तो फिर यह सोशल नॉलेज है। वह आप आप उसको फैला सकते हैं। बट स्पिरिचुअल नॉलेज कैन ओनली बी गिवन इन साइलेंस लाइक द ड्यू दैट फॉल्स अनसीन एंड अनहर्ड येट ब्रिंगिंग इनू ब्लूम मासेस ऑफ रोज। किंतु यह जो आध्यात्मिक ज्ञान है वह मौन रूप से ही निरव रूप से ही आप दे सकते हैं। जैसे कि सुबह की ओस ये गुलाब के फूल पर जब पड़ती है और उसकी जड़े दृढ़ होती है। उसको पोषण तत्व पाप प्राप्त होते हैं और फिर गुलाब का पौधा जो है कितने सारे गुलाब उसमें फैलते हैं। तो इसी तरह से गुलाब को पता भी नहीं चलेगा कि सुबह की ओस उसके ऊपर में गिर रही है। इतना जेंटली ये ओस उसके ऊपर गिरती है। मेरा मैं जब राजकोट में था तो वहां पे वो टेरेस पे एक गार्डन बनाया था। तो ये गार्डन में ये गुलाब के फूल वगैरह रखे थे। तो अभी सर्दी का समय है। मैं अर्ली मॉर्निंग ऑफिस में चला आता था। तो आकर के पहले ही मैं गार्डन में जाता था। गार्डन में जाकर के देखता था कि ये गुलाब के फूलों के ऊपर में वो झाकड़ के जो बिंदु होते हैं वह पूरे जम गए हैं। और इतना सुंदर दिखता था। जैसे छोटे-छोटे मोती है वो गुलाब की पंखुड़ियों के ऊपर में आप चिपका दिए हैं ऐसा दिखता था। तो वो सब समय में इस तरह से वो जो झाकड़ के बिंदु को देखता हूं गुलाब के ऊपर में वो स्वामी जी की यह जो लाइन है मैं याद करता हूं। गुलाब को पता भी नहीं है कि ये ओस उसके ऊपर में घिर रही है। उसको ये कर रही है। पोषक तत्व दे रही है। उसको परिपुष्ट कर रही है। इतना जेंटली इसके ऊपर में गिरता है। अभी कंपेयर टू दैट मेरे पास में वो पाइप था। वो जो स्प्रेयर था एक जिससे कि मैं वो पानी छाटा छिटका करता था। अभी वह स्प्रेयर से मैं वह पानी डालूंगा तो एकदम वो पौधे हैं इधर-उधर होना शुरू हो जाएंगे। और जो गुलाब के जो जिस जो कि पुराने हो गए हैं गुलाब यानी कि जो खिल करके धीरे-धीरे करके वृद्धावस्था की ओर जा रहे हैं उसकी पंखुड़ियां जो है इस स्प्रे में उड़ जाएगी। क्यों? क्योंकि अभी उनकी पंखुड़ियों में जान नहीं रही है। वो मुरझाने को आए हैं। तो ये स्प्रे जो है वाटर का पानी का वो तो जोरों से होगा तो पंखुड़ियां उड़ जाएगी। वो फिर उसका जो स्टेम मात्र है वह रह जाएगा। जो कि नया-नया गुलाब खिला है, उसकी पंखुड़ियां ही इस स्प्रे का जो फोर्स है, उसको सहन कर पाएगी। तो, यह हम लोग जो है स्प्रे करके वो पानी डालते हैं। पुराना गुलाब है, मुरझा हुआ गुलाब वहीं पर खत्म हो जाएगा। जबकि यह ओस जो है यह स्प्रे से भी ज्यादा काम करती है और कितना ही मुरझा हुआ गुलाब हो उसको भी तनिक भर हानि नहीं पहुंचाती। तो यह है डिफरेंस कि आध्यात्मिक जीवन यदि आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं ओस की तरह है। मुरझा हुआ गुलाब भी उसको भी कोई हानि नहीं होगी। जबकि ये जो पॉलिटिकल नॉलेज, सेकुलर नॉलेज ये आर्मी के द्वारा, मिलिट्री के द्वारा, गन बोट के द्वारा जो स्प्रेड किया जाता है वो हमारे द्वारा किए गए हुए वो वाटर स्प्रे की तरह है। जो कि जो कमजोर होगा गुलाब जो कि यह कमजोर सभ्यता होगी उसका वहीं पे वो ध्वंस हो जाएगा। दिस हैज़ बीन द गिफ्ट ऑफ इंडिया टू द वर्ल्ड अगेन एंड अगेन। यह भारत की इस विश्व को बार-बार दी गई गिफ्ट है, दान है, दक्षिणा है। ये पहले बुद्धिज्म आया, उसके बाद में वेदांत स्प्रेड हुआ। साउथ ईस्ट एशिया में जाएंगे तो रामायण महाभारत की कहानियां आपको कितनी ही देखने को मिलेगी। तो बार-बार भारत में से यह आध्यात्मिकता गई है। पूरे विश्व को आध्यात्मिक अमृत से प्लावित किया है और पूरे विश्व को इस ओस सुबह को गिरने वाली ओस की तरह सिंचित किया है। इसके बाद का जो है अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: ठाकुर कहते हैं कि पहले हमें ईश्वर दर्शन करना चाहिए और फिर उपदेश देना चाहिए। यहां स्वामीजी कहते हैं कि हमें ज्ञान-दान देना चाहिए। क्या यह विरोधाभास नहीं है?

यह जो पहला जो आपका प्रश्न है ना वो वार्निंग अगेंस्ट गुरु भाव है कि हमको गुरु भाव लेकर के लोगों के भीतर में नहीं जाना है। जैसे अदरवाइज ठाकुर ने कहा ना कि एक सच्चिदानंद सच्चिदानंद ही गुरु है। इवन ठाकुर खुद कहते हैं कि कोई मुझे गुरु करता बाबा कहता है तो ऐसा लगता है मेरे जिस्म में कोई कांटे चुभो रहा है। तो वो गुरु भाव से लेकर के नहीं साधक भाव से करना है। क्योंकि स्वामी जी ने क्या कहा? दिस इज वन ऑफ द बेस्ट साधना। तो मैं यदि साधना के रूप में करता हूं कि ईश्वर को समर्पित करके जिनको मैं यह वेदांत का संदेश सुनाता हूं वो वही शिव है। उनके हृदय में वही शिव है। मंदिर में बैठकर के मैं स्तोत्र पाठ करता हूं। वहां पर या तो फिर मैं यह ग्लोब है ना कि यह मैप है। इसको ले जाकर के यह ज्योग्राफी का संदेश देता हूं या कठोपनिषद की बातें करता हूं। सो आईडिया इज सेम कि मंदिर में पूजा करते हैं और यहां पे मनुष्य को आप कठोपनिषद की बातें सिखाते हैं। सो साधक भाव के साथ में करना है। नहीं गुरु भाव के साथ में। सो दैट इज वन डिस्टिंक्शन। दूसरा कि पूरे विश्व में प्रचार करना और साथ में ही पब्लिसिटी करना। दिस आर टू डिफरेंट थिंग्स। अभी जैसे मैंने जैसे वो सेंट जोसेफ की बात कही थी ना मैं यहां पे गया था वो वहां वो जो कैथोलिक एंबेसडर जब आया था यहां पे दो-ती महीने पहले 2 महीने पहले एक महीने पहले तो वो मुझे बुलाया था तो मैं वहां पे गया था। अभी देखिए कि ऐसा आप यहां पे घूमते रहेंगे पूरे वजेक में विशाखापटनम में ऐसा नहीं लगेगा कि उनका बहुत बड़ा कोई प्रेजेंस है क्रिश्चियन लोगों का किंतु वो जो सेरेमोनी थी ये बिशप को आर्च बिशप पे प्रमोट करने की सीधा 10,000 लोगों को इकट्ठा कर दिया। यानी कि कितना साइलेंटली ये लोग काम करते हैं। वो हम लोग यहां पर ब्लैंकेट डिस्ट्रीब्यूशन के लिए जाते हैं। तो हम लोग सिलेलेक्ट करते हैं जितने भी इंटीरियर विलेज है जो ट्राइबल विलेजेस है वहां पे हमको जाना है। तो जहां पे भी ट्राइबल विलेज में जाएंगे ना हमको एक चर्च दिखेगा ही दिखेगा। अ मैं रांची की मैंने बात कही थी कि एक बार डिसाइड किया कि सबसे इंटीरियर विलेज में जाना है जहां पे कोई नहीं गए हैं। वो उन लोगों का मॉडर्न सिविलाइजेशन के साथ में कोई कांटेक्ट भी नहीं है। ठीक है? गए वहां पे बड़ी कष्ट करके गए। सबसे पहला क्या देखा? एक बड़ा जो पहली ही जो झोपड़ी है उसके ऊपर में 10 फुट लंबा क्रॉस बिट आया है। तो देखिए कि ये लोग भी तो करते हैं ये सब प्रचार और आपको न्यूज़पेपर में ये सब नहीं देखने को मिलेगा। अपने को बड़ा चालाकी से छुपा करके करते हैं क्योंकि उनको पता है ये सब चीजों को यदि फैला हुआ होगा तो फिर ये गवर्नमेंट लोग नाराज हो जाएंगे वगैरह-वगैरह कन्वर्जन करना है एकदम साइलेंटली करना है ये लोग इन्होंने सीख लिया है सो वी कैन डू द सेम थिंग और और कर भी रहे हैं अभी ये जो 125th एनिवर्सरी थी वो वहां पे एक सेंटर की अमेरिका के कौन सा वेदांता सोसाइटी ऑफ़ नॉर्दन कैलिफोर्निया उसकी तो देखिए कि कितने सारे लोग आए थे अभी न्यूज़पेपर में आपको न्यूयॉर्क टाइम्स है, वाशिंगटन पोस्ट है, पढ़ के कुछ नहीं लगेगा। बट स्लोली एंड साइलेंटली वी आर स्प्रेडिंग आवर वेदांतिक मैसेज।

प्रश्न: हमें आध्यात्मिक ज्ञान तो सिखाना है, लेकिन साथ ही हमें गुरु-भाव भी नहीं रखना चाहिए।

वो जो नेम एंड फेम जिसको कि हम पॉपुलरली कहते हैं। प्रवचन देना है किंतु नेम एंड फेम की अपेक्षा नहीं रखनी। वरना क्या होता है? अभी आप लोगों को मैसेज करते ही रहिए। अपने वीडियो भेजते ही रहिए। फिर फोन करके पूछिए। अच्छा मैंने वो लिंक भेजा था। खोल के देखा कि नहीं? तो वो डिवोटी भी बेचारा झूठ-जूट का उत्तर देगा। हां महाराज देखा था बहुत अच्छा लगा। [हंसी] तो ये सब तो देखा है हमने। सो वी हैव टू बी केयरफुल अबाउट इट कि लेक्चर देते हैं। सबको इनवाइट भी करेंगे। किंतु फिर बाद में इनके ऊपर में कोई मोरल प्रेशर नहीं डालना है कि आप आए तो क्यों नहीं आए? सुना तो क्या समझा? बताइए मुझे और फिर भविष्य में फिर से आइएगा। इस तरह से मोरल प्रेशर नहीं डालना है इन लोगों आंख की शर्म। गुजराती में कहिए ना आंखनी शर्म बताई ने लोगों ने बांध नहीं करा जो हरि महाराज के साथ में था स्वामी जी ने कहा कि हरि महाराज को भाई तुमको अमेरिका जाकर वेदांत का प्रचार करना होगा तो हरि भाई किस स्वामी तुरानंद जी किसी भी तरह से राजी नहीं होंगे तो आखिर में स्वामी जी ने इमोशनल ब्लैकमेलिंग किया उनका गला पकड़ करके आलिंगन करके रोना शुरू कर दिया कहा भाई मैं ही सब काम करके मेरा जीवन पात करूंगा तुम लोग मुझे थोड़ी सी भी सहाय नहीं करोगे तो फिर बेचारे वो हरि महाराज जी वो गल गए कहते अच्छा ठीक है किंतु मैं जाऊंगा किंतु मुझे बोलना कुछ नहीं आता है तो स्वामी जी ने कहा बोलने के जो जस्ट लीड योर लाइफ लोगों को जीवन दिखाओ लोगों ने मेरे भीतर में क्षत्रवीर्य देखा है अभी तुम्हारे भीतर में ब्रह्म तेज देखेंगे जस्ट लीड द लाइफ तो हरि महाराज ने शांति आश्रम में जाकर के जो वहां पे वो जो टाइम बिताया समय उसके कितने सुंदर-सुंदर रेमिनेशंस हैं। आइड अनसेल के हैं वो जो इतने बहुत सारे सुंदर रेमिनेशंस हैं। सो देखिए कि जस्ट लीड द लाइफ दैट इटसेल्फ इज इनफ। सो जैसा आपने कहा

प्रश्न: आध्यात्मिकता सिखाना और आध्यात्मिक जीवन जीना - क्या हमें दोनों करना होगा?

बोथ बोथ माने दोनों देखिए अभी मैं सिर्फ क्लासेस लूंगा और आप मुझे मिलने को आएंगे। मेरा लाइफ नहीं देखेंगे तो आप मेरे पे विश्वास तो नहीं करने वाले हैं। है ना? अभी मैं कहूंगा कि ये ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या यहां पे मैं 10 भोग की चीजें ले रह रहा हूं। अब ये देखिए मैथमेटिक्स, सोशल स्टडीज वि आर डिफरेंट सब्जेक्ट्स। मैं आपको मैथमेटिक्स सिखाता हूं। आई एम वेरी गुड टीचर ऑफ मैथमेटिक्स। किंतु मेरा पर्सनल लाइफ बड़ा ही डिसोल्यूट है। मेरा मोरल लाइफ बड़ा ही करप्ट है। इट डज़ नॉट मैटर। एज़ लॉन्ग एज आई एम अ गुड टीचर ऑफ़ मैथमेटिक्स, यू विल कम टू लर्न फ्रॉम मी। बट इफ आई एम टीचिंग स्पिरिचुअल ट्रुथ। और फिर मेरा मोरल लाइफ करप्ट है तो फिर आप कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। इवन देखिए जो लोग अच्छे डॉक्टर होते हैं एग्जैक्टली आपने जो उदाहरण दिया ठाकुर ने भी दिया एक एक डॉक्टर के पास में रोगी आया तो डॉक्टर ने कहा तो एक काम करा कल आकर के मिलना मैं तुमको कुछ सलाह दूंगा तो रोगी बेचारा लंबी जर्नी करके आ रहा था तो दूसरे दिन लंबी जर्नी करके आया डॉक्टर को मिला डॉक्टर ने कहा कि ये गुड़ वगैरह है वो मत खाना मिठाई मत खाना तो वो रोगी बोलता है तो कल भी बोल सकते थे आज मुझे इतना लंबा जर्नी करके क्यों बुलाया तो डॉक्टर क्या कहता है कि मेरे वह वही कमरे में ही वो गुड़ का बहुत सारा गुड़ पड़ा हुआ था। अभी मैं तुमको कहूंगा कि तुम गुड़ मत खाना। तो तुम देखोगे खुद खा रहा है वो मुझे खाने को मना कर रहा है। वो अविश्वास आ जाएगा फिर।

प्रश्न: इसका मतलब यह है कि हमें आध्यात्मिक जीवन जीए बिना आध्यात्मिकता नहीं सिखानी चाहिए, है न?

अब आप कर सकते हैं। देखिए सुनने वाले लोग नहीं है ऐसा नहीं है। आप बट थिंग इज दैट कि फिर जो सिंसियर साधक है ना वे लोग आपके पास में नहीं आएंगे। ऐसे हुजूगे पड़े बांग्ला ते शब्द है म वह जो एक वायरल हो जाते हैं ना कोई कोई लोग तो वायरल हो जाते हैं तो हो जाते हैं फिर कोई यह नहीं देखता कि उनका पर्सनल लाइफ कैसा है 10 लोग बोलते हैं अरे सोशल मीडिया पे उनके पोस्ट बड़े अच्छे चल रहे हैं तो चलो उनको जाकर के सुने तो ये भी है एक वायरल फिनोमिना है आजकल का बट जो लोग आप आप इफ यू आर अ सिंसियर एस्पिरेंट सिंसियर साधक तो फिर आप तो वह सरफेस को भेद करके भीतर में जाने का प्रयास करेंगे ही करेंगे। इसके बारे में एक बात मैं कहूंगा।

प्रश्न: कई लोग कथा को बड़ी श्रद्धा से सुनते हैं लेकिन जब वे घर लौटते हैं तो वे सभी आध्यात्मिक शिक्षाओं को भूल जाते हैं और फिर से झूठ बोलना और धोखा देना शुरू कर देते हैं।

जैसे आपने कहा ना कि यह एज एंटरटेनमेंट लोग सुनते हैं। आई मसेल्फ हैव सीन दैट। मैंने देखा क्या है? मैं भी ऐसा भी मैं खुद बहुत बार करता हूं कि कभी-अभी टाइम है फ्री टाइम है। अभी क्या करेंगे? YouTube खोल करके वो चलो सर्वप्रियनंद जी के लेक्चर सुने ना किसी किसी को सुने। अभी ध्यान होता नहीं है उसके ऊपर में। जस्ट बैकग्राउंड में वह चलता रहता है। अपना माइंड 10 जगह पर भरता है और फिर सुनने के बाद में क्या याद रहा क्या प्रैक्टिस करेंगे उसका कोई ठिकाना नहीं है। वो तो मैंने खुद ने मेरे खुद के साथ में अनुभव किया है। किंतु क्या है जैसे अभी यह कहा ना श्रोतव्यो मंतव्य निधिसितव्य मैं पहले तो सुनना तो पड़ेगा ही। फिर यह धीरे-धीरे करके यह काम करेगा। सो क्या है ना कि लोगों से इतना पहले मेरा था कि बहुत अपेक्षा रहती थी। कोई क्लास में आता है तो फिर यह लोग क्या बाद में करते होंगे? उसको प्रैक्टिस करते होंगे कि नहीं करते होंगे? क्या उनका लाइफ में चेंज आता होगा? ठाकुर के पास में आए तो ठाकुर खुद कहते हैं मास्टर महाशय कहते हैं कि आपके पास जो आते हैं उनका जीवन में कितना परिवर्तन आया है। तो यह अपने क्लास में लोग जो आते हैं उनके जीवन में कितना परिवर्तन आता होगा। वो मैं सोचता था। किंतु अभी मैं जो बात करता हूं ना विदाउट एनी एक्सपेक्टेशन करता हूं। मैं बोल लेता हूं। फिर आपको उसके साथ में जो करना है दैट इज अप टू यू। तो क्या है कि यह एक्सपेक्टेशन बहुत ज्यादा हमको नहीं रखनी है क्योंकि बाय नेसेसिटी यह जन्म जन्मांतर की यात्रा है। भीतर में क्या हो रहा है किसी को पता नहीं है। लगता है कोई सिर्फ ऊपर ऊपर से सुन रहा है। उसका लाइफ इतना ही डिसोल्यूट है। किंतु सडनली कोई क्रिटिकल मोमेंट आ जाएगा। ही विल राइज़ अप टू द एक्सपेक्टेशन। तो वेरी डिफिकल्ट टू से कि भीतर में क्या हो रहा है। वो मां का एक सेवक

पथ से भटके माँ के एक सेवक की कहानी

मां की इतनी सेवा किया फिर सडनली क्या सब गड़बड़ हो गया। नाम नहीं लिखा है और किस परिस्थिति में यह हुआ ऐसा भी नहीं लिखा है। किंतु जो हिस्ट्री मुझे समझ में आती है मतलब जो मैंने पढ़ा है उसके हिसाब से मैं अनुमान कर कह रहा हूं कि ये त्रिगुणातिंद जी का वो जो कजिन था ना वही जो कि आशुतोष मित्र जो कि मां की बहुत सेवा करता था। बाद में वह निवेदिता स्कूल के किसी टीचर के साथ में कुछ हो गया था तो वह फिर छोड़ के चला गया। अभी यह कहानी जो मैं बता रहा हूं उसमें नाम वगैरह कुछ नहीं लिखा। तो यह सेवक मां को छोड़कर के कहीं पर जा रहा है। उत्तरकाशी पहले तो उद्बोधन में ही बाकी सब साधुओं के साथ झगड़ा कर रहा है। फिर वहां से निकला उत्तरकाशी गया तो वहां के जो बाहर के साधु उनके साथ में झगड़ रहा है। तो कोई किसी ने आकर के मां को पूछा मां आपकी इतनी सेवा की। फिर भी यह इतना झगड़ाखोर काम कांचन में मतलब डूबा हुआ ऐसा क्यों हुआ इसके साथ में तो मां ने कहा पहले तो कहा कि देखो बेटा और ठाकुर किसको कहां से किस तरह से कैसे ले जाए वो हमको पता नहीं है इसलिए इस तरह का कोई मंतव्य तुम मत करो किंतु ये लोग जो होते हैं ना जिन लोगों को यह सब सुनकर के आनंद आता है तो यह आदमी भी मां को बार-बार पूछ रहा है तो फिर मां थोड़ी नाराज होकर के बोलती है देखो मैं जब अपने भाई के घर पर रहती थी यानी कि यह सब भक्तों के आने से पहले उसी समय वही मेरे मेरे साथ में रहता था। पूरे शरीर पर राख लगा करके मुझे वह मदद करता था। यह बड़ी-बड़ी हांडियां जो चूल्हे पे रखी है भात बनाने के लिए मैं तो उसको उतार नहीं पाती। वो उसको उतारता था। तो उसने जो मुझे मदद की क्या मैं सब भूल जाऊंगी? मैं क्या उसको श्राप दूंगी क्या? तो ऐसा जब मां ने जोर से कहा तो यह आदमी चुप हो गया।

ठाकुर के सेवक हृदयराम की कहानी

ये हृदय सबसे बड़ा उदाहरण है हृदय। ये ठाकुर का सेवक वो आखिर आखिर में वो वरा नगर मठ में आया था। देखा कि वह शरीर पूरा टूट गया है। हेल्थ खत्म हो गई है। घर-घर कपड़े बेच रहा है। किंतु ऐसे ऐसे हृदय को भी ठाकुर ने उठा लिया होगा। वो हाजरा जिसको कि ठाकुर कहते हैं जटिला कुटीला नहीं रहने से लीला पुष्टाई नहीं होगी। ऐसे हाजरा को भी ठाकुर ने उठा लिया होगा। वो ठाकुर कहते हैं ना मारो काटो वाला भाव ये तमस का सत्व वो ईश्वर को हमको बचाना ही पड़ेगा। कैसे नहीं बचाएगा देखते हैं आखेरे केनो तारो ना शंकरी आखेरे केनो ना तारो देखा जावेगो शंकरी माने आखिर में कैसे मुझे नहीं तारोगी मैं देख लूंगा शंकरी वो ठाकुर वो गीत गाते हैं ठाकुर कहते हैं ना माए पोए मुकदमा धूम हवे राम प्रसाद बोले माए पोए मां और पुत्र में मुकदमा कोर्ट केस होगा धूम हवे राम प्रसाद बोले बड़ी धूम होगी राम प्रसाद कहता है यदि मां तारेगी नहीं तो कोर्ट में जाके केस करेंगे। फिर जो धूम होगी देख लेना फिर तुम। ये कथामृत में ही है। ये ठाकुर का जो भाव है ना कि ईश्वर अपने है। ईश्वर पे जोर कर सकते हैं। ये भाव लेकर ये सब भजन गाते हैं। बंगाली में इसलिए तो आनंद आता है। पता नहीं ट्रांसलेशन इतना डेंजरस है। मुझे तो ट्रांसलेशन आधा समझ में नहीं आता।

प्रश्न: हमें आत्म-श्रद्धा की आवश्यकता क्यों है?

देखिए जो आत्मविश्वास क्यों हमको चाहिए? स्वामी जी कहते हैं ना उपनिषद में जो सबसे ज्यादा स्ट्रेंथ आत्मश्रद्धा जो दिखती है वो क्यों हमको चाहिए? क्योंकि यदि आत्मश्रद्धा नहीं रहेगी ना तो हम एक अच्छे साधक भी नहीं बन पाएंगे। स्वामी जी कहते हैं ना ये हजार साल से ये रोना-धोना जो चलता आ रहा है हमारी जो जाति को जिसने कि कंप्लीटली कमजोर बना के रख दिया है वह सब आइडियाज को हटा दो। मधुर भाव अभी हटा दो। हालांकि ठाकुर का मधुर भाव इतना श्रेष्ठ था वो देखने के बाद में भी स्वामी जी यह बात कहते हैं। क्यों? क्योंकि पहले तो आत्मश्रद्धा जगाओ फिर उसके फाउंडेशन के ऊपर में मधुर भाव चलेगा। आत्मश्रद्धा ही नहीं है। मधुर भाव में चले गए सब उन्हें कायर हो जाएंगे। ना स्ट्रेंथ मींस विल पावर। स्ट्रेंथ मींस विल पावर। कि जब भी ये मन के भीतर में विकार जन्म लेते हैं तो उसको सामने डट करके पवित्रता बनाए रखें। दैट इज द मोस्टेंट थिंग। उसके बेस के ऊपर में बाकी सब आप बिल्ड अप कर सकते हैं। वो जो स्वामी जी कहते हैं ना कि जो भाव में वो ठाकुर का कीर्तन चलता था तो भाव में कितने माने कितने लोगों को भाव हो जाता था। फिर मैंने ऐसे लोगों का इन्वेस्टिगेशन किया पता चला जितना ऊंचे उठे हैं भाव में उतना ही नीचे गिरे हैं वासना में। तो ठाकुर ने खुद कहा वह नृत्य गोपाल को कि साधु सावधान। सो इसलिए यदि त्याग वैराग्य नहीं है भाव बड़ा ही डेंजरस है। किसी स्त्री के साथ में संस्पर्श हुआ और पूरा उसका भाव जो है सत्व है पूरा उड़ गया। वो जो ठाकुर कहते हैं ना वो कहानी है 1200 नेडा 1300 नेड़ी तारशाखी उदमशाड़ी ये 1200 1200 ये नेड़ा यानी कि ये वैष्णव साधक है और 1300 नेड़ी यानी कि 1300 वो वैष्णव साधिका है किस तरह की ये कहानी है वो वीरभद्र थे वो जो उनके से शिष्य चैतन्य महाप्रभु के 1200 उनके वो शिष्य थे बड़ा तेज जहां पे भी जाएंगे जो उनका सम्मान नहीं करेगा उसको श्राप दे देंगे तो वीरभद्र ने सोचा कि यह तो बड़ा डेंजरस है तो उनका जो तेज इतना है समाज में गड़बड़ करेगा तो उनका तेज कम करने के लिए वो 1300 थे उनके शिष्य तो 1300 साधिकाओं को ले आए और कहा कि यह आपकी सेवा करेगी सेवादा दासी होकर रहेगी तो ये 1300 साधक थे वो समुंदर के किनारे ने कहां पर बैठे तपस्या करने के लिए उसमें 100 लोग समझ गए कि यह उनका चाल क्या है तो वे लोग रात को ही वहां से निकल गए बाकी जो 1200 रहे उन्होंने यह सेवादासी को ग्रहण किया और उनका तेज पूरा खत्म हो गया। वो 1200 बच गए किंतु उसमें 100 100 बच गए उसमें।

प्रश्न: क्या गृहस्थ लोग कथामृत का प्रचार कर सकते हैं?

किंतु एक बात मैं यहां पे कहूंगा ये जो आपने कहा ना कि ये जो उपनिषद या तो फिर धर्म शास्त्र सिखाने वाले के जीवन में आपको उसके भी जीवन में तपस्या चाहिए। किंतु देखिए कि अब जैसे मैं टीसी का हमारे ट्रेनिंग सेंटर में ही ये फिलॉसोफी सिखाने के लिए वो एक कॉलेज के प्रोफेसर को बुलाते थे। ही वाज़ अ वेरी गुड आई मीन स्कॉलर कॉलेज वहां का प्रोफेसर था। जेंटलमैन था। बूढ़ी उम्र का था। चेहरा देखने से ही लगेगा कि बड़ा सात्विक उनका है स्वभाव। तो वी वेर वेरी इंप्रेस्ड बाय हिम। तो क्या है कि गृहस्थ है किंतु साधुओं को सिखाने के लिए आता है। तो क्या है नॉलेज का अपना एक मर्यादा होती है। अपना एक सम्मान होता है। नॉट नेसेसरी कि आप साधु होकर के सन्यासी होकर के गृहस्थ आश्रम छोड़कर के तभी आपके पास में यह राइट है। ये जो भागवत पंडित ठाकुर ने क्या कहा मास्टर महाशय को कि भागवत पंडित को मां एक पास देकर के रख देती है। क्यों? क्योंकि एक पास रखेगी तो वो संसार में रहेगा। लोगों को भागवत सिखाएगा। तो एक्चुअली ठाकुर मास्टर महाशय के बारे में कह रहा है कथामृत लिखना है तो यह हरि महाराज की तरह ना कि अखंडानंद जी की तरह त्यागी हो जा तो कथामृत कौन लिखेगा तो एक पास देख कर के मां उनको रखी है तो वैसे ही अपने जीवन में यदि हमको ऐसा लगे ना कि कभी भी ऐसा लगे कि किसी को मुझे कथामृत के बारे में बताना है ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में बताना है तो शर्म शर्माना नहीं है कि मैं गृहस्थ हूं कैसे बताऊं चलो आश्रम में ले जाओ साधुओं को मिलाओ नॉट नेसेसरी आपने जो पढ़ा है बता दीजिए ठाकुर का नाम लेके बता दीजिए कुछ गलत नहीं है। यह यह भाव प्रचार सेंटर के पीछे में यही तो आईडिया है ना अपने अहमदाबाद में भी तो बहुत साल तक भाव प्रचार का ही था। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का प्रचार कीजिए, सेल कीजिए, सेलिब्रेशन कीजिए, उत्सव कीजिए, भजन भजन कीजिए।