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ओम नमो भगवते राम कृष्णाय अच्छा अभी आज की विषय वस्तु पर आते हैं आज का विषय है मां श्री मां शारदा देवी की प्रेरक कहानियां तो देखिए एक कहानी के साथ में ही प्रारंभ करते हैं राममय महाराज गौरीश वरान जी नाम सुना होगा मां के सेवक थे जयराम बाटी में मां की सेवा किया करते थे तो एक दिन क्या हुआ वहां पर मां के एक दूसरे सेवक थे उनका नाम था ज्ञानदा अभी ज्ञानदा अर्थात की ज्ञान महाराज वो शारीरिक बड़े ही स्ट्रांग थे और मां के प्रति भक्ति भी उनकी प्रचंड थी तो एक दिन उन्होंने ठीक किया कि मां के बगीचे में वहां पर पुण्य पुकुर बोलकर के एक तालाब है तालाब के किनारे कुछ केले के पेड़ लगाएंगे जिससे कि जो केले प्राप्त हो तो मां और मां के संतानों की सेवा में उसका सद्व हो सुबह-सुबह अर्ली मॉर्निंग काम प्रारंभ कर दिया ज्ञान महाराज ने ज्ञानदा ने और अपने राममय महाराज ने काम चल रहा है और वहां पर तो आज की तरह यह सब मॉडर्न इक्विपमेंट वगैरह तो थे नहीं कोदासल्ली होती जा रही है सूरज सर के ऊपर में आता जा रहा है यहां पर मां चिंतित हो गई है कि सुबह को थोड़ा सा नाश्ता वगैरह तो कर ले बाद में यह लोग काम चालू रखें तो मां ने पुकारना शुरू किया मां का हृदय जैसा होता है मां ने पुकारना शुरू किया अरे राममय अरे ज्ञान तुमरा चले आओ आकर के कुछ खाना खा लो कुछ नाश्ता कर लो फिर बाद में काम आगे बढ़ाना तो अभी राममय महाराज तो बिल्कुल बच्चे जैसे थे और मां के प्रति उनका लगाव भी बहुत था तो जैसे ही मां ने पुकारा तो वैसे ही दौड़ना शुरू किए तो ज्ञानदा ज्ञान महाराज ने का हाथ पकड़ लिया बोला अरे ठहर जाओ मां का काम करना है पहले मां का काम पूरा करो फिर मां की बात सुनना ये एक एक कांसेप्ट राम महाराज के लिए थोड़ा सा नया था जनरली जो कोई भी रामकृष्ण संघ में आता है तो वह तो वही सोचेगा कि ठाकुर महा स्वामी जी की आज्ञा का पालन करना है जिस तरह से भी यह आज्ञा हमको मिली हो किताब पढ़ कर के साधु सत्संग करके न कि अपने गुरु महाराज जी से कैसे भी आज्ञा हमको मिली है उसका पालन करना है यहां ज्ञान महाराज कुछ नया कि कुछ बता रहे हैं बोला पहला मां का काम खत्म कर दो बाके बाद में मां की आज्ञा का पालन करना अभी रामय महाराज थोड़े से उलझन में पड़ गए ये तो बड़ा ही धर्म संकट है क्या किया जाए और मन के भीतर में से ऐसा लगता भी है यदि यह डायलमाइट्रिप शू कर दिए केला लगाना है अभी मां को पता चला कि मां ने एक दो बार फिर से बुलाया देखा कोई नहीं आ रहा है तो मां समझ गई मां की भी तो साइकोलॉजी मां को बड़ी अच्छी समझ में आती थी और उनके बच्चों के मन में क्या चल रहा है मां को बिल्कुल ठीक-ठीक समझ में आता था तो माने क्या किया ज्ञानदा का नाम छोड़ दिया बोला कि वही उसका ब्रेन वश कर रहा है रामय महाराज को पुकारना शुरू कर दी अरे राममय आओ कुछ खाना खा लो बाद में जाना अभी जैसे ही मां ने ज्ञानदा को छोड़कर करके सीधा राममय महाराज का नाम लेना शुरू किया उन्होंने कुदाल फेंकी और सीधे दौड़ कर के मां के पास चले गए तो मां ने कहा देखो ये ज्ञान जो है ना वो बंगाल है अभी जो लोग बंगाल से आते होंगे उनको पता होगा कि पूर्व ईस्ट बंगोल आज का बांग्लादेश तो वह तो अखंड भारत था तो वहां से जो लोग आते थे बड़ा ही उनके भीतर में यह तेज रहता था जिद रहती थी तो ज्ञान तो बंगाल है अर्थात वहां से आया है उसके भीतर में जीद बहुत है तो वह तो करेगा यह काम किंतु तुमको तो समझ में नहीं आता क्या मैं तुमको इतना पुकार रही हूं मेरी बात सुननी चाहिए कि ज्ञान की बात सुननी चाहिए तो रामई महाराज अच्छा कहते ठीक है चलो अभी आक के बैठे खाना खाने के लिए अभी देखिए कि जहां पर वह खुदाई काम कर रहे थे वहां पर तो नेचरली है कि मिट्टी वगैरह तो लग जाएगी आपको तो वैसे ही मिट्टी वाले हाथ पैर थोड़ा बहुत हाथ पैर धो लिया और बैठ कर के खाना खाने के लिए लिए अभी जदी मां का घर जद जयराम बाटी में देखा होगा तो आप लोगों को पता होगा कि किस तरह से एक वराम वरांडा रहता है रांडे में वहां पर क्योंकि भीतर में तो घर तो बहुत छोटा है मां का वो नया घर कहो कि पुराना घर कहो दोनों घर में आप देखेंगे घर के भीतर में जाकर के ज्यादा कुछ करना संभव नहीं तो ये जो बाहर में जैसे ही खाना खाने के लिए बैठे अभी पता है ना कि यह तो ब्राह्मण परिवार है मां का परिवार उसमें यह काली मामा अर्थात की मा के छोटे भाई फिर ये नलिनी माकू अर्थात की मां की भतीज अर्थात की भाई की पुत्रियां तो एक ब्राह्मण परिवार से आते हैं तो भीतर में थोड़ा सा एक यह रहता है कि सब कुछ टिप टाप सब कुछ नीति नियम अनुसार हो खाने के लिए यदि आप किसी मिट्टी में से आए हैं तो पहले स्नान करें बाद में खाने को बैठे तो अभी जैसे ही वह राममय महाराज खाने को बैठते हैं तो नलिनी आकर के कहती है कि अरे छी छी तुम तो मिट्टी में जाकर के आए हो वहां से गंदी जगह से तो बिना स्नान किए तुमको खाने को बैठ गए हो तुमको रुचि कैसे होती है खाने के लिए तो मां एकदम नाराज हो गई कहा तू चुप कर तुमको क्या पता चलेगा ये लोग तो बेटा छले मां इन लोगों को कह दी थी बेटा छले अर्थात कि लड़के हैं ये लोग लड़के बच्चे हैं अभी इन लोगों में इतनी पवित्रता है साधुओ ने को आए हैं तो ये पवित्रता सूची असच ये तो सब मन का खेल है जब तक आप मन के भीतर में अपवित्र भर कर के रखेंगे तब तक आपको सब कुछ अपवित्र दिखेगा और जैसे ही आपका मन पवित्र हो जाएगा तो वैसे ही देखेंगे कि आपका जीवन आपका कार्यकलाप सब कुछ पवित्र हो जाएगा तो मां ने उनको धमक करके शांत किया और फिर राममय महाराज को खाने को बिठाया ऐसी ही एक दूसरी घटना है वह पवित्रता अपवित्र को लेकर के वहां पर मां के घर में एक खाना बनाने के लिए एक ब्राह्मणी को रखा गया था तो अभी एक दिन वह आई और आकर के शाम का समय है ठंडी का समय है व तो आक के मां को कहती है कि मां मैं रास्ते से आई हूं किसी अशुद्ध चीज के ऊपर में पैर गिर गया है मेरा मैं स्नान करके आती हू मां ने कहा कि देखो इस समय क्या स्नान करना बुखार बुखार हो जाएगा छोड़ो गंगाजल स्पर्श कर दो इसी से तुम्हारा काम हो जाएगा हाथ पैर धो दो पूरा स्नान करने की जरूरत नहीं है और यदि मन तभी भी शांत हो तो गंगा जल स्पर्श कर दो तो यह अभी खाना बनाने वाली जो है ब्राह्मणी वह कहती है नहीं नहीं खाना बनाने के सब पहले स्नान करना ही पड़ेगा यदि आप स्नान नहीं करेंगे तो फिर खाना कैसे पके तो जैसे ही उसने ऐसा कहा वैसे ही मां ने क्या कहा अच्छा देखो यदि गंगाजल स्पर्श करके भी तुमको मन को शांति नहीं हो रही है तुम मुझे स्पर्श कर दो जैसे ही मां ने ऐसी बात कही वो ब्राह्मणी की जो चमक है वो भाग गई माने वो जिस एक भ्रम में थी कि यह जो अपनी एक पुरानी एक पवित्रता अपवित्र वाली जो मेंटालिटी है वही मेंटालिटी के साथ में वह मां के घर में काम करेगी पवित्रता स्वरूपिणी मां शारदा स्वयं जहां पर विराजमान है और वह जब आपको आदेश करेगी तो आप कौन होते हैं इस आदेश का अन्यथा करने वाले इस आदेश का पालन ना करने वाले तो देखिए कि यह कहानियां कितनी सिंपल सहज सरल है और एट द सेम टाइम जैसे-जैसे मां की कहानियों का अभ्यास करते जाएंगे हमको पता चलेगा कि हमारे हृदय की जितनी भी अशु च है अपवित्र होता है यह मेलाप जितना भी है धीरे-धीरे करके धुता जाएगा बहुत बार कोई प्रश्न करता है कि स्वामी विवेकानंद ने हमको यह चार योग बताए कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान या तो फिर राज योग तो यह चार योगों का पालन करके मन को किस तरह से शुद्ध पवित्र किया जाए जीवन को कैसे शुद्ध बनाया जाए उच्चतम आध्यात्मिक मार्ग की ओर बढ़ा जाए तो उसमें देखेंगे कि आप योग का पालन करेंगे कर्म हो ना कि ज्ञान हो ना कि भक्ति इसमें क्या है कि बहुत कुछ हमको काम करना पड़ेगा बहुत मेहनत करनी पड़ेगी जबकि यह जो ठाकुर म स्वामी जी की जो कहानियां है गल्प बांगला ते बोले कहानियां जो सब है वो कहानियां आप सुनते जाइए उसमें ना ही कोई बुद्धि खर्च कर करनी है ना ही कोई दिमाग के ऊपर में कोई जोर लगाना है एट द सेम टाइम जैसे कि गरम-गरम हलवा खाते हैं और पेट अपना कितना शांत और एकदम भर जाता है तृप्ति से तो वैसे ही यह सब कहानियां यह गर्म हलवे की तरह है मैंने वो इंग्लिश में वो एक सीरीज ऑफ बुक्स पब्लिश हुई है उसको कहते हैं चिकन सूप फॉर द सोल अर्थात कि अपनी आत्मा के लिए पौष्टिक आहार तो आत्मा के लिए पौष्टिक आहार क्या है अच्छी सुंदर प्रेरणा प्रद कहानियां तो यहां पर भी अपनी आत्मा के लिए हम हिंदुओं के लिए हम श्री राम कृष्ण देव के संतानों के लिए यह चिकन सुख या तो फिर यह आत्मा का आहार क्या है तो यह सब पवित्र कहानियां अभी देखिए कि एक बार यही रामय महाराज की एक दूसरी बड़ी सुंदर कहानी है कि एक बार एक भक्त दम पति जयराम बाटी आया जयराम बाटी आकर के और युवा दंपति था तो युवा व जो महिला थी स्त्री भक्त वह तो बड़ी सहजता से मां के साथ में घुल मिल गई मां के घर का सब काम कर रही है किंतु राममय महाराज के सामने घुमता नती है वो लाज निकालती है तो मां ने कहा कि देखो यह तो मेरा राममय है यह तो मेरी लड़की की तरह ही है बेटी की तरह ही है उसके सामने तुम लज्जा मत करो तो ठीक है वो बहू जो थी उसने फिर मय महाराज के साथ में वो काम जो अभी काम तो सबको मां का करना ही पड़ेगा मां के घर में रह रहे हैं रोटी बना रहे हैं तो राम महाराज ने देखा कि जो बहू है यह जो आई है वो एक साथ में तीन-तीन रोटी बेलती है तो वह तो बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए तीन-तीन रोटी कैसे बेलेग एक साथ में तो एक के ऊपर में एक ऐसा तीन वो रख देगी बीच-बीच में थोड़ा सा आटा रख देगी आटा डालने से क्या होगा रोटी चिपके गी नहीं और तीन लेयर एक साथ में आप उसको सकते हैं तो राममय महाराज को तो बड़ा अच्छा लगा क्योंकि वैसे ही मां के घर में इतने सारे भक्त संतानों का आगमन होता रहता है तो सब समय रोटी बनानी होती है तो रामय महाराज ने कहा आप मुझे भी बड़ा अच्छे से यह बात सिखा दीजिए तो वो जो बहुदी थी मने वो जो बहु थी उसने यह रोटी किस तरह से एक साथ तीन कैसे बनाया जाए राममय महाराज को सिखाया राममय महाराज कहते हैं शुरू शुरू में तो रोटी चिपक जाती थी अर्थात कि बीच में आटा कम पड़ जाता था बाद में वो एक्सपेरिमेंट करते-करते आटे का प्रमाण बढ़ाया और फिर कहते हैं कि बीच में शुरू शुरू में क्या होता था रोटी का जो आकार है भारत के नक्शे के जैसा हो जाता था तो अभी वो नेचरली है कि लड़के लोग जब पहली बार रोटी बनाएंगे तो क्या होगा तो महाराज जी कहते हैं कि धीरे-धीरे करके रोटी गोल बनाना भी मैंने सीखा और फिर एक दिन जो यह जो प्रयत्न किया था एक्सपेरिमेंट किए थे उसकी पूर्णाहुति इस तरह से आई कि बहुत सारे डिवोटा एक एक जगह पर इकट्ठा हो गए थे जयराम बाटी में और मां ने कहा नलिनी को कि मैं और राममय रोटी बेलते हैं और तुम सेको क्योंकि डिवटी बहुत इकट्ठा हो गए सबको एक साथ में मिलकर काम करना है टीम वर्क करना है ठीक है नलिनी दीदी रोटी सेकने को बैठी और मां और राममय महाराज रोटी बेल रहे हैं अभी मां के पास में वो जो मार्बल की एक छोटी सी पत्थर जैसा था और उसके ऊपर में बड़ा ही सुंदर वो बेलन था जिससे मां एक-एक करके रोटी बेलती थी और रामय महाराज के पास में एक बड़ा सा वो एक लकड़ी का एक प्लेटफार्म जैसा था उसमें वो एक साथ में तीन रोटी बेलते हैं और मां एक रोटी बेलती है रामई महाराज तीन बेलते हैं वो सभी मिलाकर के नलिनी दीदी के पास में जाती है रोटियां बात-बात में एकाएक नलिनी दीदी ने कह दिया कि मां तुम जो रोटी देती हो इसकी वजह राममय महाराज जो रोटी देते हैं वो बड़ी अच्छी से फूलती है तो बस जैसे ही ऐसा बोला मां ने अहंकार करके अभिमान करके रोटी बेलना बंद कर दिया और अभिमान से बोल उठी आमी रोटी बेलते बेलते बूढ़ो होए ग लाम मैं रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई राममय है दो दिन का बच्चा उसका गला टीपोंग तो उसमें से दूध निकलेगा अभी ये बांगला में कहावत है अर्थात कि छोटा बच्चा तो दूध पीता है तो अभी उसका गला दबाए तो मुंह में से क्या निकलेगा दूध निकलेगा तो राममय तो अभी छोटा बच्चा है गला दबाओगे तो उसमें से दूध निकलेगा और तुम कहती हो कि राम में मेरे स अच्छी रोटी बेल रहा है चाओ मैं रोटी नहीं बेलगी ये अभी ऐसा तो कैसे चलेगा इतने सारे डिवोटा भी है और मां जद अभिमान करेगी तो मां को तो मनाना ही पड़ेगा तो राममय महाराज बड़े ही नाराज होकर के नलिनी दीदी को कहती है कि अरे हम दोनों लोग साथ में रोटी दे रहे हैं तुमको कैसे पता कि मेरी कौन सी रोटी है मां की कौन सी है बिना मतलब इस तरह से अन्यथा तुम कंपेयर करती हो क्या यह सब पागलपन लगा रखा है छोड़ो यह सब बात मत करो ऐसे बेलो अपना रोटी और मां को फिर विनती की और मां ने भी सोचा कि चलो इतने सारे डिवोटा है मैं जद रोटी नहीं बेलगी तो कैसे चलेगा तो माने भी फिर से रोटी बेलना शुरू किया अभी देखिए कि रामय महाराज यह कहानी बताते हैं जबकि वो बड़े ही वृद्ध हो गए थे वो रामय महाराज कहते हैं कि अभी मेरी उम्र 88 साल की है 88 इयर्स और मैं अभी भी सोचता हूं कि मां तो जगदंबा स्वयं है सभी के ऊपर में इतना अगा प्रेम है किंतु इतनी छोटी सी बात में एक बालिका की तरह नाराज क्यों हो जाती है तो फिर वह कहते हैं कि इसका प्रमाण हमको शास्त्र में मिलता है कि जो महापुरुष होते हैं संत होते हैं अवतार होते हैं वैसे तो जगत कल्याण के लिए आगमन करते ही हैं किंतु बीच-बीच में ऐसा बचपना भी दिखाते हैं जैसे वह ठाकुर की बात है ना परमहंस कैसा होगा तो कभी बालक वत कभी पिशाच वत तो कभी जड़ वत तो मां के जीवन वन में इस तरह से बालिका वत आचरण उसके भी काफी प्रमाण है काफी कहानियां है अच्छा और एक कहानी शरत महाराज अभी शरत महाराज के साथ में मां का जो शरत महाराज ने मां की जिस तरह से सेवा की है शरद महाराज ने मन प्राण देकर के मां के प्रति जो श्रद्धा थी इसका और कोई प्रमाण आध्यात्मिक जगत में नहीं मिलेगा स्वामी जी जब अमेरिका से लौटे और स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ की स्थापना की कभी कर्म योग के बारे में बोल रहे हैं कभी ज्ञान योग के बारे में कभी भक्ति तो कभी राज योग तो फिर शरत महाराज एक बार योगेंद्र महाराज को कहते हैं कि अरे भाई स्वामी जी तो देखो नरेंद्र को तो देखो जब राजयोग के बारे में बोलेगा तो राजयोगी सर्वश्रेष्ठ है ऐसा करके बोलेंगे और जबी कर्म योग के बारे में बोलेंगे तो लगेगा कर्म योग के अलावा और कोई उपाय ही नहीं है तो मैं तो बड़ा कंफ्यूज हो जाता हूं मैं क्या करूं योगेंद्र महाराज ने क्या कहा भाई तुम एक काम करो मां की शरण में जाओ मां जो कहेगी वो सब ठीक-ठाक होगा तो ठीक तभी से शरत महाराज ने मां का सेवा भार ग्रहण किया योगेंद्र महाराज का देहांत बड़ी ही छोटी उम्र में हो गया था स्वामी जी के रहते-रहते ही हो गया था उनकी महासमाधि यह तो हमको पता है शरद महाराज ने मां का सेवा भार ग्रहण किया और अपने को रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी होने के बावजूद वह अपने को कहते थे मां के द्वारी तो यही शरत महाराज जयराम बाटी जाते हैं और जयराम बाटी जाकर के राममय महाराज के साथ में बात करते हैं कहते हैं कि देखो तुम तो घर के भीतर में जाते हो तुम अभी क्या है पुरुष लोग तो मा जहां प भीतर में रहती है तो नहीं जा पाएगी बाहर में जो कमरा है वहीं पर तो सबको रहना है और भीतर में तो कौन जाएगा स्त्रियां जाएगी या तो इनकी तरह छोटे बच्चे होंगे वो जाएंगे तो शरत महाराज रामई महाराज को कहते हैं देखो एक काम करना कि तुम जाकर के देखना कि मां कब व्यस्त रहती है और मां कब अपना कार्य समाप्त करके शांति से बैठी हुई है जब मां का कार्य समाप्त हो जाए तुम आकर के मुझे खबर देना मेरे खबरी का काम करना और इस तरह से करना मां को बिल्कुल पता ना चले और बिल्कुल अपनी बुद्धि मत चलाना जैसा मैं कहता हूं वैसा ही करना तो रामम महाराज कहते हैं ठीक है और जैसे ही मां वो सुबह को तरकारी वगैरह वो ये कर रही थी बना रही थी बाद में उसको मां को समय मिला अपने रूम में जाकर के थोड़ा सा विश्राम करने के लिए बैठी तो वैसे ही रामय महाराज ने आकर के शरद महाराज को खबर दे दी कि अभी मां के पास में कोई काम नहीं है मां बैठी हुई है तब शरद महाराज कहते हैं जाओ तुम जाकर के मां को पूछना और एगजैक्टली जैसा मैं कहता हूं वैसा पूछना कि शरत महाराज आपको प्रणाम करने के लिए आना चाहते हैं कि वो आए कि नहीं तो रामई महाराज ने जाकर के मां को जैसे ही शरत महाराज ने बोला था वैसा ही बताया मां ने कहा हां हां भेजो शरत को भेजो तो वैसे ही रामय महाराज ने आकर के शरद महाराज को कहा और शरद महाराज अभी घर के भीतर में जा र रहे हैं अभी प्रॉब्लम यह है शरद महाराज इतने मोटे सोटे और गांव के जद घर देखे होंगे तो दरवाजा होता है छोटा सा तो शरद महाराज बेचारे सीधा घर के भीतर में प्रवेश ही नहीं कर पाते वो टेढा होकर के प्रवेश करते हैं और रामय महाराज पीछे पीछे जाते हैं उनको देखना है पूरा तमाशा क्या हो रहा है छोटे बच्चे की क्यूरियोसिटी होती है ना तो महाराज जी पीछे पीछे जाते हैं शरत महाराज जाकर के मां के प्रणाम मां के श्री चरणों में भूमि होकर के प्रणाम करते हैं और फिर पूछते हैं कि मां तुम कैसी हो अच्छी हो तो और मां उत्तर देती है हां बाबा मैं ठीक हूं तुम कैसे हो तुम अच्छे हो तो और शरद महाराज कहते हैं हां मां मैं भी ठीक हूं बस इतना हो गया मां ने शरद महाराज के सर पर हाथ रख के आशीर्वाद दिया और शरद महाराज फिर से ऐसा टेढा होकर के दरवाजे में से बाहर निकल कर के बाहर का जो रूम है जो अतिथियों के लिए होता है पुरुषों के लिए वहां पर जाकर के बैठे राममय महाराज कहते हैं कि प्रतिदिन यही एक रूटीन और कुछ बात नहीं दोनों के बीच में शरद महाराज जाएंगे मां को प्रणाम करेंगे मां महाराज के सर पर हाथ रखेगी आशीर्वाद देगी महाराज पूछेंगे मां तुम कैसी हो मां कहेगी मैं अच्छी हूं बेटा तुम कैसे हो और शरत महाराज कहेंगे मां मैं भी अच्छा हूं बस यही बात और कोई बात नहीं किंतु इतनी ही बातों में इन दोनों के भीतर में जो श्रद्धा आध्यात्मिकता और गहन प्रेम का जो आभास लिखने को मिल ता था वो अद्भुत इस जगत में और कहीं भी आपको देखने को नहीं मिलेगा बस शरद महाराज की एक ही कंप्लेन थी शरत महाराज कहते हैं कि मां मेरे सामने भी घुमता टान है जैसे कि मैं उनका ससुर हूं इस तरह से मां का तो पता है कि मां सबके सामने घूमता टान करके रहती थी हालांकि ये जो बच्चे हैं राममय महाराज वगैरह या तो फिर यह वरदा महाराज ये जितने भी सन्यासी संतान उनके वहां पर रहते थे उनके सामने गुमटा नहीं टान थी कि तो शरत महाराज के सामने गुमटा टान थी तो शरत महाराज के मन में किंतु यह था एक कंप्लेंट था महाराज बीच-बीच में कंप्लेंट किया करते थे और ये कंप्लेंट का परि समाप्ति कहां पर आया वह भी एक बड़ा सुंदर प्रसंग है कलकाता में मां है मां का आखिरी दिन चल रहे हैं 1920 की बात है बस देह त्याग होने ही वाला है महासमाधि होने ही वाली है उस समय मां की जो सेविका थी सरला दी बाद में शारदा संघ की प्रथम प्रेसिडेंट माता जी भारती प्राणा माता जी वो उस समय मां की सेवा कर रही थी तो अभी क्या है कि मां का मन तो बिल्कुल बच्ची जैसा हो गया है ना ज्वर से भुगत भुगत करके अबब जब बुखार होता है तो ऐसा बुखार कि इतनी पीड़ा कि फिर भुगते भुगत मां का मन बिल्कुल बच्ची जैसा हो गया है अभी दूध पिलाना है थर्मोमीटर से टेंपरेचर चेक करना है एक डाट इसी तरह का डायट खा उनको आहार करना है वो सब चीजों से बड़ी ही नाराज हो जाती थी एक बार तो क्या किया माने अपने एक सेवक संतान को कहा कि झाल मुड़ी ना कि ऐसा कुछ ले आओ छोला मुड़ी की ऐसा कुछ एग्जैक्ट में बोल गया छोला मोड़ी ऐसा कुछ है ऐसा कुछ लेके आओ मेरे लिए खाने के लिए अभी डॉक्टर ने तो इसको खाने को मना किया है यह जो पार्टिकुलर माने मंगाया तो फिर यह सेवक संतान बेचारा क्या करेगा मां का आदेश है तो मां का आदेश उल्लंघन भी नहीं कर सकते साथ में ही यदि मां यह आहार करेगी तो उनके लिए अच्छा नहीं रहेगा तो मां के हाथ में वह कटोरी तो दी साथ-साथ में ही जा कर के शरत महाराज को जाकर के कंप्लेन कर दी कि मां ने वह मांगा है अब वो कटोरी में लेकर के खा रही है तो बेचारे शरत महाराज धीरे उनका तो मोटा शरीर है उद्बोधन में मां तो फर्स्ट फ्लोर प रहती थी शरत महाराज रहते थे ग्राउंड फ्लोर पे तो धीरे-धीरे करके सीढ़ी चढ़ कर के ऊपर में आए आकर के मां के सामने बैठ कर के हाथ जोड़ कर के बैठे और मां ने पहले ही देख लिया कि शरत महाराज जा रहे है तो उन्होंने क्या किया बच्ची का स्वभाव है बिल्कुल कटोरी अपने पीछे में छुपा दी और एकदम शांति से बैठिए है जैसे कि कुछ नहीं हुआ शरत महाराज आकर के मां के सामने हाथ जोड़ कर के बोलते हैं मां आपके आपके पास में कुछ मांगना है तो मां ने कहा हां बेटा मांगो तुम जो मांगोगे दे दूंगी तो महाराज ने कहा कि वो जो कटोरी छुपाई हुई है आपके पीछे में वो दे दीजिए तो अभी मां बिल्कुल बच्ची की तरह नाराज होकर के अभी वचन तो दे दिया है वो वचन तो पूर्ण करना ही पड़ेगा महाराज ने जो मांगा है देना ही पड़ेगा तो कटोरी महाराज के हाथ में दे दी महाराज ने वो कटोरी लेकर के बड़े ही दुखित हृदय से अपने कमरे में वापस आए मां के पास में से छीन लिया यह तो मां को जो कष्ट होगा कष्ट उनको भी होगा किंतु अभी क्या करें इसके बाद में किंतु देखिए कि मां की जब महासमाधि हुई और एक बार राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद जी रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट तो राजा महाराज उद्बोधन में आए तो शरद महाराज ने वही चीज जो कि उन्होंने मां के पास में से छीन ली थी वह बना कर के राजा महाराज के हाथ में दी और कहा कि महाराज देखो कि मैंने मां के हाथ में से ये छीन लिया था और तब से मेरे मन में बहुत कष्ट है आप इसको ग्रहण कीजिए तो मुझे ऐसा लगेगा कि जैसे मां ही फिर से खा रही है और राजा महाराज ने बैठ कर के कटोरी में से आनंद पूर्णक उसको खाया और शरद महाराज दोनों हाथ जोड़ कर के आंखों में से आंसू निकल रहे हैं पूरा दर्शन किया उनको मन को परितृप्ति हुई कि मां के हाथ में से जो छीन लिया था वो फिर से राजा महाराज के भीतर में जो मां का आविर्भाव है मां को फिर से आहार करवाया और यह राजा महाराज और मां की भी बड़ी ही सुंदर ये है कि उनका राजा महाराज आए हैं उद्बोधन में मां को प्रणाम करने के लिए जाएंगे तो सेवक महाराज राजा महाराज को लेकर के ऊपर के कमरे में जहां पर मां रह रही है लेकर जा रहे हैं आगे-आगे राजा महाराज चल रहे हैं पीछे पीछे सेवक महाराज मेरे सेवक महाराज लिखते हैं मैं देख रहा हूं कि राजा महाराज के पैर कंप रहे हैं धुज रहे हैं वो पूरा शरीर ऐसे कि भई के कि मने जगदंबा के सामने वह जाने जाकर के प्रणाम करने वाले हैं जीवंत जगदंबा हम तो मां के भीतर में सिर्फ मां ही देखेंगे बहुत सारे लोग आकर के मां को कहते थे कि मां तुम्हारे भीतर में हमको अपनी मां ही दिखती है किंतु राजा महाराज को तो स्वयं आध्या शक्ति जगदंबा दिखती थी मां के भीतर में तो जा रहे हैं पैर कंप रहे हैं जाकर के मां के सामने बैठ कर के भूमि होकर के मां को प्रणाम किया और जैसे ही खड़े हुए मां पूछ रही है बेटा कैसे हो तो अभी क्या है कि राजा महाराज के भीतर में वो साहस नहीं है कि मां के साथ में सीधा बात करें वो पूछ रहे हैं कि मां तुम कैसी हो फिर पूछते हैं राधू कैसी है अरे राधू इधर आओ मने जद कहीं से राधू आ जाए तो इन दोनों के बीच में एक ढाल जैसा हो जाए मां का जो सीधा एक उनकी जो दृष्टि है उनके ऊपर ना गिरे मने डर भीतर में डर ही नहीं श्रद्धा मिश्रित एक एक इस तरह की श्र एक इस तरह की भक्ति कि जो कि मां की जो सही प्रकृति है उसको वह दर्शन करती है तो राजा महाराज वो राधु को पुकारने लगे और फिर कैसे भी करके वहां से बच कर के नीचे में ग्राउंड फ्लोर पर आए आकर के शरत महाराज के पास में बैठे और जैसे हाफ छोड़ कर के जैसे कि कितना बड़ा युद्ध करके आए हैं पसीने पसीना हो गया है पूरे शरीर में बड़े ही मने एकदम थक गए हैं बड़ा युद्ध करके ऐसा करके हाप छेड़े वो शरत महाराज के पास में बैठे और अभी देखिए अभी क्या एक सुंदर घटना होती है मां ने सेवक महाराज को कहा कि तुम जाओ इस कटोरी में एक रकाबी है रकाबी में कुछ बिस्किट कुछ ऑरेंज और कुछ स्वीट मिठाई यह सब सजा करके राजा महाराज को देके आओ तो सेवक महाराज जब राजा महाराज को देने के लिए आए और राजा महाराज बड़े ही आनंद से मां का प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं उस समय शरद महाराज वहां पर बैठे हैं तो शरद महाराज कहते हैं कि भाई मां का प्रसाद तुम अकेले ही खा जाओगे क्या मुझे थोड़ा सा भी नहीं दोगे देखिए उस पहले ऐसा था कि शरद महाराज ने राजा महाराज के भीतर में जो मां का आविर्भाव था उनको प्रसाद ग्रहण खिलाया अभी राजा महाराज से शरद महाराज मांग रहे हैं मां का प्रसाद अकेले खा जाओगे मुझे थोड़ा सा भी नहीं दोगे तो राजा महाराज क्या कहते हैं कि भाई तुम तो यहीं पर रहते हो प्रतिदिन मां का प्रसाद पाते हो मैं तो आज इतने दिनों के बाद आया अभी मैं प्रसाद क्या खाऊं उसमें भी तुम हिस्सा पढ़ाओ ग अपना उस में भी अपना भागीदारी जता होगे तो ठीक है चलो अभी तुम जदी मांगते हो प्रसाद तुमको तो देना ही पड़ेगा मेरे प्रसाद में से हिस्सा तो देना ही पड़ेगा तुम तो मां के धवारी हो तुम यदि नाराज हो जाओगे तो मां का दर्शन बंद हो जाएगा अभी जैसे ही राजा महाराज ने ऐसा कहा तो शरद महाराज भी हंसते-हंसते कहने लगे भाई तुमने ही तो अपॉइंट्स में मेरी नियुक्ति की है देखिए इसके बाद में दोनों गुरु भ्राता हंसते-हंसते मां का प्रसाद शेयर करके खा रहे है और शरद वो जो सेवक महाराज है जिन्होंने इस घटना का वर्णन किया है कहते हैं कि देखिए इन दोनों के बीच में जिसको बच्चे की तरह वो कभी-कभी बच्चे को भीतर में झगड़ा भी होता है ना किंतु भीतर में कुछ मनो मालिन नहीं है पता भी नहीं है कि वह झगड़ा किस चीज को कहते हैं कौन सी चीज मेरी है कौन सी अपनी नहीं है वो मेरा है मेरा नहीं वो भान भी नहीं होता बच्चे लोग बात-बात में झगड़ा करते हैं और बात बात में हंसी मजाक करके मित्रता भी कर देते हैं तो वैसे ही इन दोनों के बीच में अभी तो झगड़ा कर रहे हैं मां के प्रसाद को लेकर के अभी दोनों मिलकर के इकट्ठा होकर मां का प्रसाद ग्रहण भी कर रहा है अच्छा अभी एक ब्रह्मचारी मां का दर्शन करने के लिए क्वाल पाड़ा आया क्वाल पाड़ा आपको पता है कि जयराम बाटी से कलकत्ता मां आती थी तो वहां पर बीच में क्वाल पाड़ा में रुकती थी और क्वाल पाड़ा के वहां के जो प्रारंभ करने वाले थे केदार बाबू तो केदार बाबू स्कूल के टीचर थे और स्कूल के टीचर होने के नाते उनके कुछ विद्यार्थी थे जो कि बड़े ही ध सबने मिलकर के खवाल पाड़ा में आश्रम का प्रारंभ किया था और आश्रम में पहले तो उन्होंने स्वदेशी वगैरह करना कुछ सोचा किंतु फिर इनको पता चला कि रामकृष्ण देव की सहधर्मिणी अभी भी जीवित है और पास में ही जयराम बाटी गांव में रहती है तो फिर इन्होंने जाकर के उनका दर्शन किया मां ने स्वीकृत मां स्वीकृत हुई कि हां मैं आपके वहां पर आऊंगी और फिर मां ने ही क्वाल पाड़ा आकर के स्व हस्त अपने ही हाथों से ठाकुर की और अपनी दोन दोनों की छवि वहां पर स्थापित की है जैसे कि मां ने अपने हाथों से अपनी छवि की स्थापना करना आध्यात्मिक जीवन में यह मुझे लगता है पहली ऐसी घटना होगी तो यहां पर इस तरह से मा मां का प्रथम आगमन हुआ था और फिर मां जब भी जयराम बाटी से कलकाता जाती आती तो बीच-बीच में क्वाल पाड़ा रुकती तो अभी एक ब्रह्मचारी महाराज वहां पर आए क्वाल पाड़ा में और मां को विनती करके कहने लगे कि मां मैं यहां पर आपके सानिध्य में कुछ दिन रहना चाहता हूं तो आप मुझे अनुमति दीजिए तो मां ने भी कहा ठीक है बेटा तुम रहो और केदार की अनुमति ले लो और अभी ऐसा है कि जद कोवाल पाड़ा आप गए होंगे तो आश्रम एक है फिर जगदंबा आश्रम एक दूसरी जगह है जहां पर की मां राधू के साथ में रहा करती थी तो यह जगदंबा आश्रम में स्त्रियां रहती थी और जो मेन आश्रम है वहां पर यह पुरुष भक्त साधु ब्रह्मचारी लोग रहते थे अभी एक दिन माने इस ब्रह्मचारी को कहा कि बेटा तुम एक काम कर सकते हो क्या राधु के लिए पथ्य अर्थात कि एक एक पार्टिकुलर टाइप का आहार तुम तैयार कर सकते हो राधू की उस समय अवस्था बड़ी खराब थी प्रेग्नेंट थी और वो फिर बीमार भी बहुत रहती थी डॉक्टर ने उसके लिए यह पथ तैयार करने को कहा है तो ब्रह्मचारी बड़े ही आनंद पूर्वक हां बोल दिया कहा कि मां मैं प्रतिदिन आश्रम में तैयार करके जगदंबा आश्रम जहां मां रहती है वहां पे मैं लेकर आऊंगा तो अभी एक दिन वह इस तरह से पथ्य तैयार करके गर्म पात्र है वोह लेकर के रास्ते से आ रहा है अभी ये बच्चे जैसा था बेचारा बड़ा अनुभव भी नहीं था तो क्या करें गर्म पात्र है गर्म लगने से हाथ में से गिर गया गिर गया तो जो कुछ भी आहार बनाया था प्रस्तुत किया था राधु के लिए सब रास्ते पे गिर गया और नष्ट हो गया तो बेचारा वो तो बड़ा ही डर गया मैंने बुद्धि तो काम करती बंद हो जाएगी ना ऐसा एक्सीडेंट होगा तो खाली पात्र लेकर के मां के सामने आकर के उपस्थित हुआ और बोलने लगा बेचारा बड़ा ही दुख पूर्वक कि मां मैं क्या करूं मेरे हाथ से गिर गया तो माने तो उसको उस समय समझा बुझा करके विदाय कर दिया किंतु फिर यह जो सेवक महाराज वहां पर बैठे थे उनको मां कहती है कि देखो यह जो लड़का है साधु के हिसाब से तो ठीक ही है किंतु मेरे यहां पर कामकाज करने में चौकस जो लोग है जो कि कार्य कुशल है वही लोग चलेंगे ये गाज तला साधु दिए अर काज होए ना मां कहती है जो पेड़ के नीचे पड़े रहते हैं तपस्या करते हैं वो औषध हम जहनवी तोयं वैद्यो नारायण हरि अर्थात कि जब बीमार हुए तो वैद्य कौन है तो नारायण हरि और औषध क्या है तो जानवी अर्थात की गंगा का जल तो इस तरह से परिवश तला के नीचे पेड़ के नीचे रहने वाले साधु से मेरा काम नहीं चलेगा यहां पे तो जो कार्य कुशल होंगे उसी का काम है फिर मां क्या कहती है कि देखो लोग बहुत बार क्या होता है कि उत्साह में आकर के बड़ा-बड़ा काम तो कर देते हैं किंतु किसी के भी चरित्र का या व्यक्तित्व का सही सही परिमाण आपको को निकालना है मेजरमेंट करना है तो वो वही है कि प्रत्येक छोटा-छोटा काम वो कितनी कार्य कुशलता से करते हैं उसको देखना छोटे-छोटे कामों में ही कार्य कुशलता ठीक-ठीक दिखती है बड़ा काम तो कोई भी कर लेगा एक दो बार मिलकर के ऐसा उत्साह में आकर ग अच्छा अभी एक लड़का मां के पास में दीक्षा लेने के लिए आया जयराम बाटी में अभी ये वो जयराम बाटी वो पुराने ढंग का वह गांव था वहां पर यह सब ब्राह्मण लोगों की वस्ती थी और एक वोह एक विचारधारा एक ट्रेडिशनल होती है ना कि यह उच्च वर्ण यह उच्च वर्ण का नहीं है यह सब वहां पर काफी कुछ चलता था मां के खुद के परिवार में जैसे मैंने कहा कि नलिनी दीदी यह माखू दीदी फिर यह काली मामा वोह ब्राह्मण होने की वजह से हमको एक ये मेंटेन करना है अपना व्यवहार यह सब था अब यह लड़का आया मां के पास में आकर के बोलने लगा मां मुझे चाहिए दीक्षा तो मां ने तो पहले पूछा थोड़ा सा कहां से आए हो कौन से गांव से आए हो क्या कर रहे हो पता चला यह है बागदी का लड़का अभी बागदी का लड़का उसको उस समय जो कहा आजकल तो अभी हम लोग यह नाथ जात के व सब झंझट से ऊपर हो गए हैं किंतु वह जो समय था गुलाम भारत था और उस समय यह 1890 के आसपास की यह जो सब कहानियां है 18 19वीं सदी के 20वीं सदी के प्रारंभ की उस समय भारत के गांव में खास करके ये थोड़ी सी ऑर्थोडॉक्सी काफी चलती थी तो मां ने जैसे ही मां को पता चला यह बागदी का लड़का है तो मां ने कहा देखो एक काम करो मैं थोड़ी सी बीमार भी हूं और मैं यहां पर बड़े झमेले में रह रही हूं और क्या तुम्हारे कोई कुल गुरु नहीं है क्या तुम चाहते हो तो अपने कुल गुरु के पास में से भी दीक्षा ले सकते हो और यदि ऐसा ना हो तो एक काम करो तुम कोलकात्ता आओ कलकाता दीक्षा हो जाएगी तो अभी यह लड़का बिल्कुल समझ गया कि मां स्पष्ट मना नहीं कर रही है स्पष्ट हां भी नहीं कर रही है क्यों क्योंकि वह है ब्राह्मण और मैं हूं बागदी तो इमीडिएट उसने कहा मां वो तेलो भेलो माठ में जब डाकत बाबा के साथ में मुलाकात हुई थी तब आपको डाका वो बागदी की बेटी होने में कोई असुविधा नहीं हुई कोई संकोच नहीं हुई क्योंकि उस समय आपका जान खतरे में था और आज अभी आपको कोई असुविधा नहीं है तो एक बागदी की मां नहीं हो सकती क्या ऐसा उसने बोल दिया और तेलो भेलो माठ की घटना सबको पता है कि तेलो भेलो के बा वो जो मैदान में से मां आ रही थी एक डकेट के साथ में मुलाकात हो गई तो मां ने कहा बाबा करके कि बाबा मैं तो आपकी बिटिया शारदा हूं मेरे जो संगी है वो मुझे छोड़ कर के चले गए हैं तो मैं बड़ी विपद में हूं तो मेरी रक्षा कीजिए तो इमीडिएट ये जो डकेट था बागदी उसका तो मैंने तो राक्षस जैसे होते हैं ना तो उसका हृदय किंतु मां को देख कर के एकदम पिघल गया कहता है कि तुम डरो मत मेरे साथ में मेरी स्त्री भी आ रही है थोड़ी पीछे है अभी वो भी आ जाएगी फिर इन दोनों ने मिलकर के मां की कितनी सहाय की थी और मां ने कहा था कि दक्षिणेश्वर में आपके जमाई रहते हैं आपको आना पड़ेगा उनको मिलने के लिए और यह दोनों डके बाबा और डकेट मां दक्षिणेश्वर जाते थे ठाकुर भी उनके सामने बड़ा ही श्रद्धापूर्वक अ जैसे जमाई हो इस तरह से व्यवहार करते थे तो यह लड़का किंतु देखिए उसने क्या कह दिया मां के मुंह पे कि आपको जब जरूरत थी एक बागदी की बेटी हो पाई किंतु अभी जरूरत नहीं है तो बागदी की मां नहीं हो सकती क्या तो मां भी एकदम हंस रही है और फिर थोड़ी देर के बाद में कहा अच्छा ठीक है तुम एक काम करो कल सुबह को आ जाना सुबह को क्या था काली मामा भी वहां पर किसी काम से बाहर गए थे और नलिनी भी वो कपड़े वगैरह धोने के लिए गई होगी तो घर में और कोई था नहीं तो मां ने कहा कि उस समय आ जाना दीक्षा हो जाएगी तुम्हारी तो य लड़का आया मां से दीक्षा लेकर के बड़ा खुश होकर के चला गया उस समय जो बाकी एक भक्त वहां पर थे प्रभाकर बाबू डॉक्टर थे आरामबाग के निवासी तो उन्होंने कहा कि ये जो सेवक महाराज जिन्होंने पूरी घटना का आलेखन किया है वो कहते हैं कि देखो दादा ये बागदी का लड़का जैसे कि बागदी का जो हिस्सा होता है ना लाठी के जोर पर उसने अपना हिस्सा अदाई किया है मां के हाथ में से य हिस्सा पड़ा है उसने लाठी के जोर प और हम लोग है ब्राह्मण कुमार ये ऋषि मुनि जन्म जन्मांतर तक मां अध्याशक्ति की आराधना करते फिर भी हमको उनका आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता और यह बागदी ने लाठी के जोर पर जैसे कि मां जगदंबा का आशीर्वाद प्राप्त किया है तो ये ने और फिर ये बागदी का लड़का बीच-बीच में फिर भी आता था और बाद में भी आया था और मां के आशीर्वाद उसने बाद में भी प्राप्त किए थे अच्छा मां एक सुंदर एक कहानी कहती है मां कहती है कि देखो जब हम परिवार में रहते हैं तो सबको मिल झुल कर के सबके साथ में रहना पड़ेगा यदि कोई एक व्यक्ति अपना हुकुम सब समय चलाएगा तो इससे क्या है कि परिवार में झगड़ा ही होगा कभी शांति नहीं आएगी मां कहती है अभी जैसे क्या होता है कि लड़की जो होती है लड़की का घर जो होता है शादी करके चली जाती है तो अपने तो मां-बाप के तो जमाई हुए तो जमाई के घर कुछ ना कुछ कोई उत्सव होता है तो कुछ ना कुछ गिफ्ट जाती है कुछ मिठाई जाएगी कुछ गहने जाएंगे कुछ वस्त्र जाएंगे त्यौहारों के उपलक्ष में जमाई के घर पे वहां से लड़की के मां-बाप कुछ ना कुछ बेचते हैं अभी मां तो मां के खुद के तो कोई संतान नहीं थे किंतु यह राधू है माकू है नलिनी है यह तो मां की लड़कियों जैसी ही थी और मां के घर में आता भी बहुत कुछ था तो जब इन सबके घर पर कुछे भेजना होता था तो उसमें किंतु कॉम्प्लिकेशंस देखिए फैमिली में कैसे कॉम्प्लिकेशन है यह राधू की मां वनी वो पागली मामी और ये जो माकू और नलिनी इन दो इन दोनों के बीच में बड़ा ही झगड़ा होता था य पागली मामी और ये नलिनी और माकू दोनों बहने थी तो नलिनी और माकू सोचेगी कि ये जो राधा राधू को तो मां बड़ा प्रेम करती है तो राधू के घर ज्यादा ज्यादा करके बेजती है और पागली मामी का ऐसा था कि राधू के अलावा मां और किसी को कुछ भी देगी तो तो बड़ी ईर्षा की मारी मर जाएगी तो नलिनी और माकू को क्यों दे दिया कुछ भी बोलकर के वो दोनों के बीच में झगड़ा होता ही रहता था अभी मां को तो व्यवहार करना ही है तो मां देखिए कि किस तरह से ट्रिक अमाती थी किस तरह से चालाकी करती थी चालाकी शब्द हमारे लिए है मां के लिए कहेंगे कि ये दिव्य डिवाइन पॉलिसी मां के लिए ऐसा कोई शब्द यूज करना पड़ेगा तो मां क्या करती थी वो नलिनी को बुला कर के कहेगी अच्छा देखो कि राधु के जमाई के घर पे राधु के पति के घर पे ये सब भेज रही हूं तो तुम्हारा क्या मत है अभी देखिए अभी जैसे नलिनी के सर पर जिम्मा दे दिया तो नलिनी ऊपर से क्या कहेगी कि मां देखिए कि वह राधू तो पागल है और उसको तो कुछ पता नहीं है उसकी मां भी पागल है आपको तो एक अच्छे से व्यवहार करना चाहिए इतना कम कम क्यों भेजती हो और ज्यादा करके भेजो माने जिम्मा उसको दे दिया तो अभी वो व्यवहार करने का वो रिस्पांसिबिलिटी आ गया और बढ़ा देगी वो मां को कहेगी और ज्यादा ज्यादा करके भेजिए इतना कम कम नहीं चलेगा आपको तो अपना स्टेटस मेंटेन करना है राधु और उसकी मां पगली उसको क्या पता चलेगा तो मां कहती है कि मैं मन में मन में हंस रही हूं क्योंकि जदी में छुपके छुपके चोरी छुप के कुछ ज्यादा चीजें वहां राधू के घर भेज दूं और इन दोनों को पता चले तो घर में अभी कुरुक्षेत्र लग जाएगा धूम धड़ाका मत जाएगा किंतु मैंने उसी के सर पर यह जिम्मा दे दिया कि तुम बताओ अभी कि क्या करना है और वह भी बड़ा बड़ा करके बोलेगी तो मां कहती है कि देखो कि हमेशा घर में रहना है किसी भी जगह रहना है दूसरों को थोड़ा सा ज्यादा अधिकार देकर के अपने को थोड़ा नीचा हो कर के रहना है अपने को थोड़ा सा दबा कर के रहना है इससे कि लोगों को एक लगे कि भाई यह जो घर चल रहा है ये जहां पे भी आपको किसी ग्रुप में रहना है किसी ऑर्गेनाइजेशन में रहना है तो लोगों को लगे भा हमारा भी यहां पे एक वॉइस है हमारा भी एक एंपावरमेंट है लोगों का जद डिस एंपावर हो जाएंगे लगेगा कि मेरी कोई बात ही नहीं सुनता तो भीतर में से एक द्वेष प्रकट होगा और सब समय झगड़ा चलता रहेगा तो देखिए कि मां की ये सब प्रैक्टिकल यह सब सलाह भी कितनी सुंदर है अच्छा अभी कहानियां तो बहुत सारी है किंतु मुझे लगता है कि समय होता जा रहा है तो आज यहीं पर करते हैं समाप्त ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत