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Swami Vivekananda's Teachings ·

Swami Vivekananda Hindi 20 May 2023

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सो टीचिंग्स ऑफ स्वामी विवेकानंद स्वामी जी से शेर एस वैकेंसी जो क बट विदाउट अटैचमेंट क पर क सिख नेवर पर योरसेल्फ अर्थात भगवान कृष्णा ने जो कुछ भी किया उन्होंने किया विदाउट अन्य अटैचमेंट स्वामीजी कहते हैं कर्म करना चाहिए कर्म के लिए कर्म की खाती नहीं की कर्मों के फल के लिए कर्मण्येवा ही ठिकारस्ते मां फलेषु कदाचनाम एस आईटी इस सैड इन गीता डी वे हैव एन राइट ऑन डी कर्म ऑन डी हार्ड क ऑन डी स्ट्रगल डेट वे पट बट नोट ऑन डी फ्रूट्स यदि देखिए अभी परीक्षा का टेंशन अभी उसके जब परीक्षा आई है तो अभी यह क्या है की स्ट्रेस मैनेजमेंट वाला कॉन्सेप्ट फिर वो लोग बताना शुरू कर देते हैं की किस तरह से परीक्षा के स्ट्रेस को मैनेज करना है किंतु यहां पर देखिए की यदि हम लोग हालांकि यह बड़ा फर्क है यदि हम लोग यह सोचना शुरू कर दे बच्चे लोग स्टूडेंट लोग की मैं यदि परीक्षा की तैयारी करूंगा किंतु यह मैं फिक्र नहीं करूंगा की रिजल्ट में फर्स्ट ग्रेट तो देखेंगे की उनका वो जो है स्ट्रेस काफी हद तक तो कम हो जाएगा की तो ये भी बात है की ऐसा कोई भी बच्चा मिलन मुश्किल होगा की जो कोई ग्रेट की फिक्र ना करें क्योंकि क्या है ये ह्यूमन साइकोलॉजी है की यदि हमको फ्रूट नजर के सामने दिखेगा फल नजर के सामने दिखेगा तभी हम उसके लिए मेहनत करने को जाएंगे और देखिए की ये जो हमारा कर्म का सिद्धांत कितनी बार वो मिसयूज हुआ है हिस्ट्री में किस तरह से उसको मिस इंटरप्रेट हुआ है इसका भी ये यदि हम बेसिक साइकोलॉजी नहीं समझ करके इसको अप्लाई करेंगे तब ऐसा होगा कोई भी आदमी जैसे ह्यूमन साइकोलॉजी ही है की कोई भी आदमी कम तभी करेगा जब उसको पता चलेगा की उसके सामने उसको जो है कोई उसको रिजल्ट मिलने वाला है यदि आप किसी को अभी यह मेरे मेरे पब्लिकेशन का ऑफिस है अभी यहां पे आज इलेक्ट्रिकल कुछ प्रॉब्लम हो गया है मैं इलेक्ट्रीशियन को बुलाऊंगा तो इलेक्ट्रीशियन आकर के कम तो तभी करेगा जब भी उसको पता है की सामने वो बिल रखेगा और फिर वो हम लोग उसको पेमेंट करेंगे यदि उसको वो ऐसा आकर के सोच के बैठेगा की हां मुझे कर्म की खातिर कर्म करना है फिर ये लोग फिर मेरा पैसा देते हैं की नहीं देते हैं दिस इस एनट्स साइकोलॉजी मैन साइकोलॉजी ऐसा हो ही नहीं सकता आध्यात्मिक जगत में होता है की चलो मैं ईश्वर को पुकारता हूं और फिर ठाकुर ए करके मुझे दर्शन देंगे की नहीं वो एक चलो डीओईएसएन'टी मटर की ठाकुर क्या करते हैं किंतु यहां पर भी देखिए ठाकुर ने खुद कहा था की मैं भक्तों का राजा होना चाहता हूं एक संकल्प लेकर के साधना करते हैं की हां मुझे किस तरह से मतलब मुझे ईश्वर का दर्शन करना है मां मुझे दर्शन दो यह ठाकुर जो बोलते हैं वो पहले दर्शन हुआ था वो काली मंदिर में वो मां का खड़क पड़ा था वो ठाकुर कितने दोनों से बार-बार पुकार रहे थे मां दर्शन में ही दे रही थी तो फिर ठाकुर ने किया किया वो मां का खाद लिया और फिर अपने गले पे करने को गए छड़ी तुम दर्शन नहीं डॉगी तो मैं अपना गला कैट दूंगा ऐसा करके वो करने को गए अपना गला किंतु देखिए की इमीडीएटली फिर आकर के मैन उनका हाथ पकड़ लिया और माननीय उनको दर्शन दिया तो अभी ये प्रश्न हो सकता है की गीता में जो यह निष्काम कर्म का जो उपदेश दिया गया है क्या यह सही सही मतलब प्रैक्टिकल भी है की नहीं है ये वास्तविक है की नहीं है क्या हम इसको रियल लाइफ में इंप्लीमेंट कर पाएंगे की फिर ये विभीषण है ये विदुर है या यह भीष्म पितामह है ऐसे लोग जो की बहुत ही रेयर आइडियल लोग होते हैं कंपलीटली मतलब 100% इड को फॉलो करने वाले वही लोग उसका पालनपुर करेंगे भगवान कृष्णा ने भी यह सब बहुत ज्यादा नीति नियम में नहीं मानते थे वो हालांकि वो उन्होंने कहीं है मतलब धर्मशास्त्र की स्थापना उन्होंने की है किंतु जब करना का वध करने की बड़ी है तब उन्होंने ही का दिया ये धर्म और धर्म का युद्ध है यहां पे इतने सारे नीति नियम नहीं देखें जाते हैं अर्जुन को कहते हैं की करण का वध करो भले ही चाहिए उसका रथ का पहिया वो जमीन में फंसा हुआ क्यों ना हो फिर ये जो द्रोणाचार्य का जो वध था नरोवा कुंजीरों हुआ तो देखिए की ये जो धर्मराज जो युधिष्ठिर थे उन्होंने एक बार क्या सत्य बोल दिया उनका रथ जो था 6 इंच जमीन से ऊपर चला था वो आकर के जमीन को टच हो गया तो भगवान कृष्णा बार-बार गीता देखकर के ऐसा पढ़कर कैसा लगता है की क्या ये लोग जो अपना ये मतलब अपने खुद के वचन है उसको पालनपुर करते हैं की नहीं पुरुषोत्तम भगवान राम ने बाली का वध किया पीछे से अपना तीर मार करके यह करना कम नहीं कम नहीं है यह तो यह प्रश्न हमेशा हमारे धर्मशास्त्र पढ़कर के हमको होता है क्या ये लोग हमको मूर्ख तो नहीं बना रहे ये खुद बोलते एक-एक करते दूसरा है तो ये प्रश्न हो सकता है ठाकुर मां स्वामी जी के जीवन में भी हम देखें स्वामी जी ने ठीक किया की मैं अमेरिका जाऊंगा और भारत में इतनी जो गरीबी है तो मैं उन लोगों को वेदांत का उपदेश दूंगा और भारत में मेरा जो ठाकुर का जो कार्य है आत्मा और मोक्ष थम जगत हिदायत उसके लिए जो है मैं पैसा बटर के आऊंगा वहां से और यहां पे आकर के कुछ सर्च कार्य की शुरुआत करेंगे स्वामी जी ने ऐसा नहीं कहा की मैं चलो अमेरिका जाता हूं चलो पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में बोलना हूं बाद में जो होना हो उन्होंने बहुत ही मतलब देखेंगे की बार-बार अपने पत्र में जब स्वामी जी के पत्र पढ़ने हैं तो एक चीज बार-बार देखने को मिलती है पैसों के बड़े में कितना सब वो कैलकुलेशन करते हैं मैं यहां से वहां गया तो इतना रुपए टिकट का खर्च होगा फिर मैंने इनको इतना रुपया दिया हुआ है तो ऐसा करके पैसा पैसा देखेंगे की सेकंड टाइम जब स्वामी जी गए थे तो उन्होंने बेलूर मठ से रुपया उधर लिया था अपनी मां को अपनी मां का मकान बनाने के लिए या तो मां के लिए मकान और भाडेक पर रखना के लिए तो वो जब भी वो पत्र लिखने हैं तो देखते हैं की वो सन लॉस एंजेल्स में इतना रुपया मिला और सन फ्रांसिस्को में तो मैंने टिकट रखा है मैंने प्रवचन का तो कोई टिकट लेकर प्रवचन नहीं सुनने को आता फ्री है तो सब लोग सुनते को आते हैं तो हमको लगता है की देखिए स्वामी जी खुद जब ऐसा कहते हैं की डू एवरीथिंग विदाउट अन्य अटैचमेंट डू विदाउट अन्य एक्सपेक्टेशन ऑफ डी रिजल्ट क्या यह बात प्रैक्टिकल भी है की नहीं है तो देखिए प्रैक्टिकल है किंतु किस तरह से है यह जब हमारा मन एकदम आध्यात्मिक जगत में सूक्ष्म से सूक्ष्मतर लेवल पर कॉन्शियस लेवल से लेकर के सुपर कॉन्शियस लेवल पे चला जाता है तब क्या होता है की ये जो ठाकुर कहते हैं ना की पहले नेत्री नेत्री करके आपको ऊपर में जाना है फिर छठ पे चढ़ना है नती-नेती करके सीडी से आपको छठ पे चढ़ना है फिर आप जब छठ पे चले जाएंगे फिर आप देखेंगे की जी चीज की यह सीधी बनी हुई है जी आते की जी सीमेंट की जी रेट की ये सीडी बनी हुई है इस मटेरियल का इस पदार्थ का ये मकान भी बना हुआ है इस चीज का ये पूरा जीव जगत बना हुआ है तब जो है जीवात्मा जो है परमात्मा में ली हो जाता है हमारा जो अहंकार है सुकम हमारा जो ये जो स्थल अहंकार है वो विराट में विलेन हो जाता है इसके बाद में किंतु क्या होता है यदि हम समाधि में चले जाएंगे तो जनरली 21 दिन में मृत्यु होता है किंतु कभी कभी मां आदेश देती है की हां तू ही भाव मुकता जैसे की ठाकुर को कहा था की तुम जो है ये कॉन्शसनेस और सुपर कोशिश ये जो बाउंड्री है यह जो डिवाइडिंग लाइन है वहां पर तुम रहो ही फूली कॉन्शियस हो नहीं फूली सुपर कॉन्शियस जिसकी वजह से जब चाहे वो नीचे आकर के हमको उपदेश दे सकते हैं और जब चाहे वो नृत्य कीर्तन करते-करते समय में मगन हो जा सकता है तो ये बॉर्डर लाइन पर रहने के बाद में आईटीआई करके इसी सीडी से नीचे आना है तो ठाकुर कहते हैं की जैसे शंकराचार्य शंकराचार्य ने विद्या का हम रखा था जिससे की वो लोगों को शिक्षा दे पे जैसे की वो भक्ति का आम रखा था ये जो सुखदेव ने जिससे की वो है लोगों को उपदेश दे पे तो ऐसा एक जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक साधना में प्रगति होती है हमारा जो स्थल अहंकार है सत्व राजस्व और तमस तीन गन हैं हमारे तो हमारा अहंकार भी तामसिक अहंकार राजसिक अहंकार और सात्विक अहंकार इसे तीन स्टेज से पसार होता है जब हमारा सात्विक अहंकार हो जाता है साधना करते करते तब हम जो कुछ भी करते हैं वो सब कुछ तो कल्याण के लिए करते हैं मेरा जो हम है वो इतना व्याप्त होता है की पूरे जगत को अपने में सम लेट है फिर जैसे ठाकुर का था ना की वो खड़े थे वो दक्षिणेश्वर गार्डन में एकदम बहुत ही सुंदर फ्रेश जो है वो ग्रास निकाला था घास वो युगा था किसी ने उसके ऊपर में जाकर के चलना शुरू कर दिया तो ठाकुर को इतनी पीड़ा कोई जैसे की उनके शरीर पे किसी ने आघात किया हो लोग वो एकदम ठाकुर जोर से चिल्ला उठे तो आसपास वाले लोग दौड़े दौड़े चले आए देखा की ठाकुर के शरीर पे इससे जिसे किसी ने मारा हो इस लाल लाल हो गया है तो उन्होंने पूछा ठाकुर मैंने किसने आपके ऊपर में आघात किया तो ठाकुर ने कहा किसी ने मारा नहीं है ये तो घास के ऊपर कोई चल रहा था तो देखिए तादात में किस तरह का हो जाता है आईडेंटिफिकेशन किस तरह का हो जाता है तो इसलिए वो घास पर चल रहा था तो ठाकुर के शरीर पे इस तरह से इजाओगे ये विज्ञान आनंद जी महाराज का इस तरह से रिमेंशंस है की एक बार स्वामी जी अपने कमरे में सोए हुए थे और विज्ञान आनंद जी भी वहां पर उनके पास के ही कमरे में थे तो सुद्दनली आदि रात को देखा की स्वामी जी अपने रूम से बाहर निकाल कर के वो गंगा के सामने वाला जो वरांडा है वहां पे जाके खड़ा है चेहरे पे बहुत ही मतलब एक थोड़ा सम एक उनका एक्सप्रेशन है शहर चिंता का भाव है तो विज्ञान महाराज ने देख लिया तो जाकर के पूछते हैं स्वामी जी क्या हुआ तो स्वामी जी कहते हैं कहानी पे बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई है मैं ध्यान कर रहा था तो सुद्दनली मुझे ऐसा लगा तो विज्ञान महाराज बोलते हैं ऐसा तो कैसे हो सकता है अभी आसपास में कहानी अच्छा वॉल्यूम लॉस है अभी अभी बड़ा क्या कुछ थोड़ा सा अच्छा अभी ज्यादा होता है की कम होता है अच्छा अच्छा अच्छा ओके ओके तो विज्ञान महाराज स्वस्थ है की अरे ऐसा कैसे हो सकता है की कहां पर कुछ दुर्घटना हो गए स्वामी जी ध्यान कर रहे हैं तो फिर उनको कहानी से पता चल गया इस डीज एवं पॉसिबल तो विज्ञान हमारा सोचते हैं की होगा उनके मां का ब्रह्म और तो क्या फिर वो सो गए फिर सुबह को उठ करके न्यूज़ पेपर में देखा तो कहानी फिलिपींस में की इंडोनेशिया में कहानी पे इतना भयानक भूकंप आया था कितने हजारों लोगों की जान चली गई कितने सारे घर जो है वो बर्बाद हो गए तो उन्होंने वो टाइम जो लिखा था वो एक्सेप्ट वही टाइम था जी समय स्वामी जी अपने कमरे में से बाहर निकाल कर के वो वहां पे ब्रांडेड में जाकर के खड़े थे तो विज्ञान महाराज कहते हैं लिखने हैं अपने रैम्यूनरेशन में जैसे स्मैक वो जो मेजरमेंट करने का वो जो मशीन होता है सीस्मोग्राफ वो जितना सेंसेटिव होता है तो स्वामी जी का मन भी उसे सीस्मोग्राफ की तरह वो सेंसेटिव है तो देखिए जब हमारा आईडेंटिफिकेशन पूरे जगत के साथ में हो जाता है तो हम इंस्टिनटिवली जगत के बड़े में ही सोचते हैं अभी देखिए इस दृष्टि से यदि हम देखते हैं फिर सब कुछ देखें अभी जो भी हमने डिस्कस किया भगवान कृष्णा ने जो किया भगवान राम ने जो किया वो उन्होंने अपने खुद की स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं किया ये भारतवर्ष का भविष्य में उत्थान हो धर्म की शक्ति भारतवर्ष में से चली जाए और भारत में धर्म की स्थापना हो इसलिए उन्होंने यह किया है अपना उनका खुद का व्यक्तिगत कोई भी स्वार्थ नहीं था भगवान कृष्णा चाहते तो पूरे जगत के राजा होकर के र सकते थे उनको क्या पड़ी है वो पांडवों का सार्थक भी बन करके वो उनको नीति मट्टा का उपदेश दे इस तरह का वह मतलब अपने कोई हैं बनाना उन्होंने अपने खुद के स्वार्थ के लिए तो नहीं कहा वो अपने आप में एक बहुत बड़े राजा है वो जो चाहे वो कर सकते हैं जो चाहे वो का सकते हैं वो अपने जीवन में फिर वह सारथी बनकर के धर्म और धर्म के युद्ध में बीच में जाकर के क्यों खड़े रहे क्योंकि उन्होंने की अपने बड़े में नहीं पूरे जगत संसार के बड़े में सोचता है तो वैसे ही ठाकुर ने जब कहा की मैं भक्तों का राजा होना चाहता हूं तो इसलिए यह नहीं है की उनको खुद को उससे कुछ है मैन जो अवतार है वो तो नित्य मुक्त है अवतार के जो संगी है वो भी नीतियां मुक्त है स्वामी जी को पता था की उनका सही नेचर क्या है वो 70 ऋषि में से एक ऋषि थे शिवा के स्वयं अवतार थे वराह नगर में बहुत ही सुंदर घटना हुई एक दिन सब गुरु भाई लोग साथ में सोए हुए थे तो महापुरुष महाराज सडनली आदि रात को जग गया तो देखा की स्वामी जी जो सोए हुए हैं उनके सर के आसपास में वो बटुक भैरव इतने छोटे-छोटे वो 10-15 वो नृत्य कर रहे हैं गोल गोल घूम रहे हैं तो उन्होंने सोचा की क्या अरे मेरी आंखों का ब्रह्म तो नहीं फिर वो आंखें थोड़ा करके फिर से देखा तो नहीं वो बटुक भैरव वैसे ही दिखाई दिए तब उनको पता चला की नहीं जैसे स्वामी जी के बड़े में वो शिवा का जो अवतार है साथ सनी है वह सही है मैन वह ठीक है वह गलत नहीं है तो यह लोग तो नित्यमुक्त है फिर भी वो पूरे जगत की चिंता अपने सर पे लिए की भारत में ऐसा मैं करूंगा की एक संस्था की एक ऑर्गेनाइजेशन का आरंभ करूंगा फिर मैं यहां से पैसा वो अपने पूरा वो खून पसीना भा करके मैं पैसा ही इकट्ठा करूंगा भारत में भेजूंगा उनको क्या पड़ी थी पता है की उनको हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में वो प्रोफेसर की पोस्ट ऑफर की गई थी यदि वो वहां पे र जाते हैं प्रवचन बहुवचन देते हैं और प्रोफेसर बैंक बढ़िया मजे से रहते हैं उनको क्या दिक्कत है की यह सब अपना वो जो गोवा करके वो मां का चैन गाव करके ये सब करना उनका हृदय जो है वो इतना विराट और विशाल हो गया था की वह अपने बड़े में नहीं सोचते हैं पूरे जगत संसार के बड़े में सोचता है तो इसीलिए यदि देखिए की इसी लॉजिक को हम स्टूडेंट के पास ले आए यदि एक बच्चा सोचता है की वो पढ़ाई लिखी करेगा तो उसकी पढ़ाई अच्छा वह एक्सपेक्ट तो करेगा वो अच्छे मार्क्स तो एक्सपेक्ट करेगा वो आपको साइकोलॉजी तो आप उसका हटाने ही सकते हैं ऐसा कहेंगे की बिना किसी एक्सपेक्टेशन के परीक्षा दो तो फिर वो अगले दिन सोचेगा अरे भाई एक्सपेक्टेशन तो है नहीं चलो एक ध मूवी देख के आते हैं फिर क्या पड़ी है मुझे हर इतना हार्ड क करने की तो लेट डेट भी एक्सपेक्टेशन लेट तेरे बी एक्सपेक्टेशन क्योंकि वो तो होना ही चाहिए जीवन में एक सात्विक एंबीशन तो हनी ही चाहिए किंतु अपने हृदय को इतना विशाल कर दो की जब मैं मुझे जो फल मिलता है वो फल में पूरे जगत संसार को बांट दो ये हमने कुछ दिन पहले विशुद्ध जी की एक बात कहीं थी की वो वहां पे थे वो चेन्नई में जॉइन करने को गए और सुना था की सुन के रखा था की शशि महाराज गिर ठाकुर के साक्षात शिष्य और रामचंद्र डेट का वैसे तो नरेंद्र के साथ में बड़ा झगड़ा चल रहा था किंतु फिलासफी पर आईडियोलॉजिकल किंतु वो जब किताब लिखने हैं परमहंस महाशय का जीवन चरित्र उनमें सिर्फ एक जो ठाकुर के शिष्य है उसकी उनकी वो प्रशंसा करते हैं वो है शशि महाराज बोलते हैं की शशि महाराज ने ठाकुर की जी जी जान से परिचर्या की सेवा की उसका वो जो है की उसका वो मतलब दूसरा एग्जांपल मिलन मुश्किल है तो सब सुन के रखा था विश्वविद्यालय वो इतनी निष्ठा से ठाकुर की सेवा करते हैं इतना पवित्र सन्यास जीवन है मैं जाकर के चेन्नई में जाकर के उनके जॉइन करता हूं वही लोगों ने चेतावनी डीके राखी थी की देखो जो तू पढ़ने हो जो वास्तव में है वो अलग है समझ के रखना तो वो बोलना है की अरे नहीं नहीं वो तो कथामृत में भी तो शशि महाराज का वर्णन में जाता हूं और जाकर गए अभी देखा की शशि महाराज की निष्ठा है किंतु निष्ठा है बड़ी डेंजर है अभी वो विशुद्ध आनंद जी को शरारत में कम दिया शाइन में थोड़ी सी भी त्रुटि या गलती हो गई तो बस शशि महाराज का टेंपल गया और फिर जो गला गली देना शुरू करेंगे और अभी क्या है ना की ये जो मिडिल क्लास लड़के होते हैं ना इन लोगों ने कभी इस तरह से वो जो वृक्ष व्यवहार यह कटु व्यवहार या तो फिर कठोर व्यवहार उन्होंने कभी देखा नहीं है सहन नहीं किया है पहले के जमाने में होता था की पिता जो है अपने बच्चे को मारते थे और ऐसा करके डिसिप्लिन मिल जाते थे किंतु आजकल इस तरह से नहीं होता है तो विशुद्ध जी भी बेचारे अपने मां का प्यार पाया था वो बड़े ही लाडले थे अपने घर में स्कूल में भी कभी इस तरह से किसी की गली गलौज नहीं सनी थी उसे साधु बने को क्या है प्रतिदिन गली सनी पड़ती है और बेचारे साथ हमने वो चुपके चुपके रोटी भी थे क्या करेंगे तो इस दोनों में और राजा महाराजा वहां पे ए गया तो उन्होंने जाकर के विशुद्ध आनंद जी ने राजा महाराज को कहा की देखिए शशि महाराष्ट्र मुझे इतनी गली देते हैं अभी तो सहन नहीं होता आप मुझे अपने साथ में बेलूर मठ वापस ले जाइए तो यह बात सुनकर के राजा महाराज बड़े दीक्षित हो गए उन्होंने कहा अरे तुमने क्या शशि महाराज की यह गली ही सिर्फ तुमने हम याद रखिए मां में राखी वो तुम का तुमको कितना प्यार करते हैं कितना स्नेहा करते हैं ये बात क्या तुम भूल गए तो विशुद्ध जी लिखने हैं अपने रैम्यूनरेशन में की अरे हां राजा महाराज की बात तो सही है शशि महाराज के थल में वो तो मठ के अध्यक्ष हैं ना तो सबसे पहले उनको परोसा जाएगा तो अपने ठाणे में जो भी अच्छी कोई चीज आई है और जैसे वो वो टेस्ट करते हैं लगता है की अच्छा है इम्युनसियेटली वो दूसरों को दे देंगे अपने से वो थोड़ा सा भी उसको खाएंगे नहीं अछाम आया है अच्छी मिठाई आई है अच्छे तो इसी के घर से कोई अच्छा पकवान आया है जैसे ही टेस्ट किया लगा की बहुत टेस्टी है इमीडीएटली विश्वविद्यालय उनको दे देते थे कहते थे अरे खाकी देखो कितना अच्छा कितना सुंदर है अपने से थोड़ा सा भी नहीं खाता थे तो देखिए निष्ठा है आपका एक ये भी है की ठाकुर का कम ठीक से होना चाहिए ऐसा नहीं है की मैं कर्म करता हूं फिर ठाकुर को जो समझना है थोड़ी सी भी त्रुटि होगी तो 10 गली देंगे किंतु साथ-साथ में हृदय इतना बड़ा हो गया सबको अपने जो आईडेंटिफिकेशन मैं कहता हूं की मैं तुझे सिर्फ ये नहीं की मैं यानी शशि या सिर्फ मैं यह जो मेरा शरीर है ये जो सबको मैं अपने में अवरुद्ध कर लेट हूं मैं यानी की ये महात्मा यह ग्रेटर आए रदर थान डिस्चार्ज सो यहां पे ये कर्म का जो सिद्धांत है बहुत लोग इसका वो एक मिस इंटरप्रिटेशन करते हैं कहते हैं की कोई एंबीशन नहीं रखती है कोई एक्सपेक्टेशन नहीं रखना फिर कम करो ऐसा करके कम होगा ही नहीं हार्ड क होगा ही नहीं तमस में हम लोग जो है वो डब जाएंगे भारत के साथ में जो ये हजार साल की ये जो गुलामी है बिना एक्सपेक्टेशन के कर्मों करेंगे ऐसा हो सकता है दिस इस एंटाई साइकोलॉजी मैन साइकोलॉजिकल ये सब पॉसिबल नहीं है की एक आदमी के सामने कोई गोल ना हो ऑब्जेक्टिव ना हो और फिर वो उसके लिए हार्ड क करें ऐसा हो ही नहीं सकता किंतु वो हार्ड क करना है ब्लैक सात्विक एंबीशन रखना है किंतु साथ-साथ है उसको इतना विशाल और व्याप्त कर देना है की पूरा जगत संसार जो है उसमें समाहित हो जाए जिससे की मैं सिर्फ अपने बड़े में एन सोचूं ये जो फल जो मैं बटोरता हूं मैं सबके भीतर में ये बांट दूंगा बाकी सब में वो बांट दो ये जब स्वामी जी जब वो अल्मोड़ा में तपस्या कर रहे थे ये बात हमने डिस्कस की है पहले भी उसे समय क्या हुआ था की उनकी जो बहन है उन्होंने सुसाइड कर लिया अभी उसे दिन कोलकाता में बहुत बारिश हो रही थी और यह समाचार स्वामी जी के छोटे और स्वामी जी के घर में गए महेश छोटे भाई हो बेचारी इतने दुखी हो गए की देखो हमारी ये दुरावस्था है की यह जो डोरी का पैसा नहीं की ऐसा ही कुछ हो सांसारिक चीज के लिए उनकी उनके एक लड़की को मां को तो भुवनेश्वरी देवी को तो कितना दुख होगा की मेरी जो लड़की है उसको सुसाइड करना पड़ा अभी वह स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्र नाथ अभी वह क्या उन्होंने सोचा स्वामी जी को यह खबर तो देनी चाहिए पता तो चले वो साधु बन के घूमता है और हम इस तरह से अभी उन्होंने ऐसा कहानी बोला नहीं है ये तो मैं बोल रहा हूं की हम इस तरह से कष्ट भोग कर रहे हैं तो वो वराह नगर मत जान को निकले अभी इतना बारिश इतना बारिश है कमर तक पहु पानी है उसे पानी में मत पहुंचे और तीन कर गुरु बैठे शशि महाराज थे निरंजन महाराज ऐसे कोई तीन कर लोग के शायद तो जब उनको समाचार मिला वह भी बड़े दुखी हो गए अभी किंतु डिबेट होना शुरू हुआ की क्या स्वामी जी को यह बात बतानी है की नहीं बतानी यदि स्वामी जी को यह बात पता चले की तो कितना कष्ट होगा और वो बोल के गए हैं की इस बार मैं समाधि में जा रहा हूं और बस समाधि में जाकर के मैं प्राण त्याग कर दूंगा अभी मुझे वापस नहीं आना है बार-बार मैं समाधि में जान का पर्यटन करता हूं पता नहीं की तुम गुरु भाइयों का रिस्पांसिबिलिटी ठाकुर मेरे सर पे दाल के गए इसलिए मुझे वापस आना पद रहा है मेरी समाधि जो है पूर्ण नहीं होती अभी मैं जा रहा हूं मुझे डिस्टर्ब मत करना ऐसा बोल के गए हैं तो अभी इतना भयानक दूसरों का देंगे तो मतलब नेचुरल स्वामी जी का हृदय इतना विशाल है जो कष्ट होगा फिर समाधि भांग होगी फिर हो सकता है हम ही को गली दे दे हम क्या करें इसमें तो फिर सब ने मिलकर के ठीक किया की अल्मोड़ा में उनके साथ में शरद महाराज भी है शरद महाराज भिक्षा करके लेट हैं खाना स्वामी जी को खिलाने हैं जैसे की वो 100% अपना जब ध्यान में वो दुबे रहे तो शरद महाराज को टेलीग्राम किया जाए तो उसे घनघोर मैन वो आकाश पूरा बादलों से ढाका हुआ है बिजली हो रही है बारिश गिर रही है जैसे वो भगवान वासुदेव बालकृष्ण को लेकर के वृंदावन में जाते हो किस तरह का वो माहौल इस तरह का माहौल में ये दो-तीन गुरु भाई निकले टेलीग्राम ऑफिस जान के लिए और कमर भर पानी और यदि बा गए तो सीधा गंगा में है और गंगा में गए यानी फिनिश तो टेलीग्राम ऑफिस में जाकर देखा तो वो ब्रिटिश लोगों का रास्ता तो वो भी चल रहा था आजकल होता तो बैंड करके भाग गए क्लर्क बैठा था तो उसको बोला की टेलीग्राम भेज दो तो टेलीग्राम भेजो अभी टेलीग्राम शरदमाराज को मिला तो उन्होंने सोचना शुरू किया की अभी वो भी तो सोच रहे हैं की स्वामी जी ने थोड़ा ट्रिक इनफॉरमेशन दिया है की क्या करना है क्या नहीं करना है तो फिर सोने के बाद में उन्होंने ठीक किया की नहीं स्वामी जी को बताना तो सही होगा ही मैंने स्वामी जी को तो बताना ही चाहिए बोलकर के गुफा में गए स्वामी जी को टेलीग्राम पढ़कर सुनाया अब तो स्वामी जी कहते हैं टर्निंग पॉइंट इन मी लाइफ अब तक मैं सोचता था की मतलब की मैं अपनी जो जो है की समाधि प्राप्त करने के लिए ईश्वर दर्शन करने के लिए आत्म चिंतन में स्थित होने के लिए मैं सब कुछ कर रहा हूं किंतु यह जो भयानक संवाद जिसे मुझे मिला तो उससे मुझे लगा की मेरी बहन की ही यह स्थिति है तो भारत की एक करोड़ करोड़ नारियां जो है वो किस भयानक स्थिति में जीती होगी कितनी दयनीय अवस्था में वो रहती तो क्या मुझे उनके लिए कुछ नहीं मुझे तो करना चाहिए मैं सिर्फ मेरी बहन का बड़ा भाई नहीं भारत की जितनी भी नारियां हैं सबका में बेटा और सबका मैं बड़ा भाई छोटा भाई हूं तो ऐसा सोच कर के स्वामी जी फिर अल्मोड़ा से नीचे है दिस इस देखिए की मेटाफोरिकली हिमालय से नीचे आना अर्थात ही वो आध्यात्मिक उच्च अवस्था में से वो हमारी आम मां के लेवल पे आए और फिर उन्होंने वहां से वो जाकर के वो उन्होंने ठीक किया की अभी ये समाधि ध्यान आत्मा चिंतन वगैरा छोड़ो अभी कुछ समय के लिए भारत घूम करके मैं स्थिति का संवाद लेट हूं की भारत की क्या स्थिति है तो घूम करके उन्होंने देखा और फिर उनको पता चला की अरे जी तरह से भारत गुलाम है और सिर्फ गुलामी ही नहीं इन जनरल जी तरह से राजा लोग जो है निष्ठुर हृदय कठोर हृदय लेकर के इतना भोग करते हैं समझ भी नहीं पाते की ये जो उनकी प्रजा जो है कितनी वह भयानक वो गरीबी है वो बीमारी है वह जो काल है यह सब में वो इनका यह होता है वो जीते हैं उनको पता ही नहीं है वो अपने भोग विलास में मस्त है तो इस समय स्वामी जी ने फिर वो कन्याकुमारी जाकर के उनको एक पहले बार निवेदिता लिखती है कंप्लीट वर्ष के इंट्रोडक्शन में पर डी फर्स्ट टाइम प्रॉफिट ऑफ डी स्टेटर ऑफ स्वामी विवेकानंद ही मेडिटेटेड नोट अपन ए गॉड बट अपन इंडिया इसे एन होल स्वामी विवेकानंद की तरह की उच्च आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त किया हुए एक संत ने पहले बार अपने मां को केंद्रित किया ध्यान किया किसी एक ईश्वर या आत्ममन के ऊपर नहीं किंतु भारत की भूमि के ऊपर में भारत देश के ऊपर में और फिर सामग्र भारत वर्ष का सामग्र इतिहास वर्तमान और भविष्य कल देखा और फिर उनको ये भीतर में से फोड़ना हुई की भारत जो है भूतकाल में स्वर्ण युग में जी रहा था आज का जो वर्तमान है वो हो सकता है थोड़ा सा मालिन है किंतु इसका जो भविष्य है वो भूतकाल से भी कहानी जाता वो जो है वो मैन उज्जवल और स्वर्णमय होगा ये विषम जब स्वामी जी को आया तब कहानी उन्होंने जाकर के ठीक किया की वो जो है अपने गुरु के और वेदांत का प्रचार प्रसार करेंगे बिकॉज़ की रिलिजन और वेदांत इस दी फाउंडेशन ऑफिस स्त्रोंगर सिविलाइजेशन इस ठीक करके उन्होंने फिर वो चेन्नई आए चेन्नई से वो अमेरिका जान का प्लेन बनाया अब देखिए की उन्होंने जितने भी प्लेन बनाए जितने भी उनकी एंबिशियस थी वो तो उनके खुद के लिए नहीं थी अभी हां स्वामी जी के एंबीशन ही नहीं होती तो स्वामी जी कुछ कर ही नहीं पाते एंबीशन यानी की एक एक छह रखना की मैं इस तरह से करना चाहता हूं तो यह जो कर्म का जो सिद्धांत है डू एवरीथिंग बट विदाउट अन्य अटैचमेंट इसका यह अर्थ नहीं है की आपको कोई गोलियां नहीं रखना है आपका हृदय इतना बड़ा होना चाहिए की जो फ्रूट जो मिलता है वो पूरे जगत संसार में बनते सिर्फ आपके लिए एन रखें डेट इसे डी प्रॉपर इंटरप्रिटेशन ऑफ डी कॉन्सेप्ट ऑफ कर्म इन गीता अभी कल संडे है कल क्लास नहीं होगा मंडे को मिलता है ओम शांति शांति