Transcript
ओ स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार षय राम कृष्णा यते तो मैं मेरा सॉफ्टवेयर जो है शारदा कोश उसको इंस्टॉल करने का प्रयास कर रहा था कुछ दिनों से तो अभी वोह हो गया है मैं स्क्रीन शेयर करता हूं जिसमें से वो जो प्रिंट आउट ली थी मैंने वही सॉफ्टवेयर है ये जी अच्छा तो देखिए कि यह इसको यह स्टार्टिंग में ऐसा आता है फिर इसके बाद में यहां पर विभिन्न तरह से हम इसको अभी जैसे कि टुडेज रिपोर्ट तो आज क्या हुआ था तो आज जैसे कि मंथ है 8 और डेट है सेन तो 7 अगस्त को जित नी भी घटनाएं हुई है अपने ऑर्डर में जैसे कि देखिए कि 7 अगत 188 को स्वामी जी ने प्रम दस मित्र को लेटर लिखा था यह ईयर है 188 माने वो आज की सिर्फ आज की घटना है अभी जैसे कि 181 में 181 में खेतड़ी से स्वामी जी का वो जो राजा व खेतड़ी के साथ में स्पिरिचुअल डिस्कोर्स हुआ था फिर यह देखिए कि नाइट क्वार्टर ये एक घटना है मने जितनी भी घटना आज को हुई है आज के दिन को व सब यहां पर आपको दिखेगी माने 7 अगस्त को वही घटना है तो वो टुडेज इवेंट्स बोलके एक है फिर यह है स्वामी जी की लाइफ ये स्वामी जी की लाइफ हमने पूरी देखी कि किस तरह से वो यहां पर मैंने एंट्री करके रखी है तो अभी हम जिस पॉइंट के ऊपर में क्लिक करेंगे उसको वो ओपन कर देगा जैसे कि हमने कल देखा था कि वेदांत इन यूरोप हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी ने अमेरिका का काम समाप्त करके यूरोप में आए यूरोप में फिर जैसे कि वहां पर लंडन में अ वो रुके और लंदन में एक के बाद एक जो प्रवचन दिए यह जो पूरा फेज है स्वामी जी का जो मैक्सिमम वर्क उन्होंने किया है वो इसी फेज में हुआ है तो यह अप्रैल 18966 य चार पाच महीने का ही समय है जो कि उन्होंने लंदन में या यूरोप में बिताया था और वहीं पे उन्होंने अपने जो राज योग वगैरह अ चार योग है स्वामी जी के उसमें से कुछ लेक्चर उन्होंने अमेरिका में दिए थे कुछ दिए थे लंदन में तो जो लंदन में जो प्रवचन उन्होंने दिए थे ज्यादातर इसी समय के दौरान दिए गए थे तो यहां पे क्लिक करने से अप्रैल टू जुलाई क्या हुआ था तो देखिए कि यहां पे यह पूरा डिटेल आ जाएगा यहां तक कि इमेज भी यह जो भी डिटेल है इस डिटेल के साथ में एसोसिएटेड इमेज ये ये भी आपको यहां पर दिखेगी इसके बाद में जैसे कि स्वामी जी का लेक्चर है 7 जून को 18960 ऑफ रिलीजन एक पिका डेली तो उस परे क्लिक करने से ये पूरा लेक्चर आ जाएगा जो कि पूरा लेक्चर कंप्लीट वर्क्स में है एज इट इज उठा कर के मैंने इसको यहां पर पेस्ट कर दिया है तो यह पूरा स्वामी जी का कंप्लीट लाइफ क्रोनोलॉजिकल यहां पर सजाया हुआ है ये बहुत साल हो गए इसके ऊपर में मैंने काम बंद कर दिए हुए तो अभी आज मैं देखता हूं विथ अ फ्रेश आई मुझे लगता है कि काफी कुछ चेंजेज करने की इंप्रूवमेंट करने की जरूरत है किंतु कौन अभी इतना सब करेगा इतना टाइम अभी मिलना मुश्किल है तो जो भी है स्वामी जी का जो लंडन में जो पूरा पार्ट था पूरा डिटेल आपको यहां पर दिखता है इसका पीडीएफ बना करके मैंने सबके साथ में शेयर किया है तो देखिए कि यह फर्स्ट इस समय अ यह भी वहां पे था स्वामी जी के जो भाई थे छोटे भाई महेंद्रनाथ दत्त यहां पे इनका फोटो भी है अ यह रहा महेंद्रनाथ दत्त का फोटो यहां पे है तो वो उस समय लंडन में थे और उन्होंने तीन वॉल्यूम में बंगोली में एक बहुत ही सुंदर किताब लिखी है उसका नाम है लंडन स्वामी विवेकानंद लंडन में स्वामी विवेकानंद उस समय स्वामी जी के साथ में स्वामी जी जहां पर रह रहे थे तो मिस मलर थी स्वामी जी के साथ में फिर ये ईटी स्टर्डी था फिर शारदानंद जी महाराज उस समय इंडिया से आ चुके थे स्वामी जी जब फर्स्ट विजिट लंडन की की थी उस समय वो कह के गए थे कि किसी ना किसी गुरु भाई को यहां पर भेजिए उन लोगों को डिले हो रहा था बोलकर के स्वामी जी नाराज भी हो गए थे बाद में किंतु शरद महाराज आ गए थे तो उस समय स्वामी जी के साथ में गुडविन था जो कि उनके नोट्स सब रिकॉर्ड करता था फिर ये महेंद्रनाथ दत्त उनके छोटे भाई जिन्होंने यह तीन वॉल्यूम में लंडन स्वामी विवेकानंद पुस्तक की रचना की उसके बाद में शारदानंद जी थे और ईटी स्टर्डी था इतने लोग स्वामी जी के साथ में नियमित रूप से वहां पर रह रहे थे और साथ में ही उसी समय सेवियर्स जो कि कैप्टन एंड मिसेस सेवियर्स इनके साथ में स्वामी जी की मुलाकात हुई थी और निवेदिता जो कि स्वामी जी के प्रवचन नियमित रूप से अटेंड करते थे तो इतने लोग स्वामी जी के अंतरंग कहे जाएंगे और बाकी बहुत सारे लोगों के साथ में स्वामी जी की मुलाकात हुई थी उस समय की जो एक दो घटनाएं है वह जो जैसे कि फेस द ब्रूट स्वामी जी की वो जो कहानी है ना इसमें सब समय हम लोग वो बंदर का उदाहरण देते हैं कि किस तरह से स्वामी जी के पीछे बंदर लगे और स्वामी जी दौड़ रहे थे और वहां पर एक साधु ने खड़े रहकर कहा फेस द ब्रूट जितना आप दौड़ो ग उतने ही यह बंदर है या जितने भी ये हमको को सताने वाली यह जो सब परिस्थितियां है हमारे भय को जान लेती है अपने भय को समझ लेती है और जितना हम भय दिखाएंगे उतनी ही हमारे पीछे लगेगी तो इसलिए भई को दूर करके परिस्थितियों का सामना करना चाहिए तो वैसी ही घटना यहां पर लंडन में हुई थी वहां पर एक बार यह मिस मलर और ईटी स्टर्डी के साथ में स्वामी जी कहीं पर टहल रहे थे कहीं पर वॉकिंग करने के लिए गए थे एकाएक देखा कि एक पागल उनको देख कर के उनकी ओर दौड़ कर के आ रहा है अभी स्टर्डी था वैसे वहां पर वहां का लोकल आदमी यह वेदानंद की बातें तो बड़ी करता था किंतु जैसे ही वह साड को आते हुए देखा वह दौड़ कर के भाग गया वहां से अभी साठ को अभी साड के सामने तो आप कैसे उसका मुकाबला करेंगे एक सिंह मारेगा तो कहां से कहां फेंक देगा अभी यह मिस मलर भी बेचारी दौड़ रही है तो अभी क्या करें वो लेडीज लोगों से तो इतना जोर से दौड़ा नहीं जा इतना फास्ट और साड तो एकदम पास में आ गया है तब स्वामी जी ने सोचा यदि मैं इनका बचाव नहीं करूंगा तो इनकी यह जान से जाएगी इनको यह साड अवश्य मार देगा तो स्वामी जी एकदम उसका रास्ता रोक कर के खड़े रह गए और जैसे ही स्वामी जी डट कर के खड़े रह गए सही में यह सांड जो है यह बुल वो स उनको छोड़ कर के चला गया यह घटना का विवरण निवेदिता ने दिया है और मैंने वो जो जैसे कि वो बंदन वाली कहानी है वैसी ही ये एक कहा एजेक्ट सेम मैसेज है जब तक आप डं कर के सामने खड़े नहीं रह जाएंगे तब तक आप इसका सामना इससे आप बच नहीं पाएंगे हालांकि देखिए कि स्वामी जी की जीवन में यह सब कहानियां हम पढ़ते हैं तो हमको लगता है कि अपने खुद के जीवन में इसका कहां तक हम पालन कर पाएंगे यह मुझे याद है कि मैं उस समय नर्मदा परिक्रमा कर रहा था परिक्रमा नहीं भ्रमण कर रहा था सन्यास से पहले मेरा सन्यास था 2015 में तो उससे उस समय सन्यास लिए जाने के पहले बिरूर मट जाने से पहले दो महीना में ओमकारेश्वर रुका था तो ओमकारेश्वर जब रुका था उस समय मैंने सोचा कि मैं भ्रमण करता हूं और वहां पर अपनी ओमकारेश्वर में अपनी एक कुटिया है तो कुटिया छोड़ कर के मैं वॉकिंग में चलना शुरू करूंगा और जहां तक जा पाएगा वहां तक चलूंगा मेरे पास में ऑलमोस्ट एक महीना था एक महीना में वहां पर रुका था कुटिया में और पहले से ही ठीक करके गया था कि एक महीना भ्रमण करूंगा तो एक महीने में जितना मैं भ्रमण कर पाऊंगा उतना मैं करूंगा तो वहां से मैं काफी आई थिंक प्रतिदिन मेरा सात आ किलोमीटर का वॉकिंग होता था तो 30 * 7 ऑलमोस्ट इतने किलोमीटर तक का मैंने वॉकिंग किया था तो मैंने भ्रमण किया था तो एक दिन की बात है एक गांव में से मैं जा रहा था तो वोह तो सब देहाती गांव तो ये बेल गाय वगैरह तो वहां पे होते हैं एकाएक रास्ते से बेल का पूरे एक झुंड पूरा दौड़ के आ रहा है इतना जोर से दौड़ रहा है और सभी लोग मने दौड़ कर के रास्ते के साइड हो जा रहे हैं उस समय मैं मैं इतना डर गया था क्योंकि मैं रास्ते के बीच में ही खड़ा था और यह इतना स्पीड से आते हैं ना कि सोचने का समय तक नहीं मिलता आपको कि हां मैं सोच करके थोड़ा सा समझ करके साइड प हो जाओ गांव वालों को यह सब हैबिट होती है हम शहर में रहने वालों को एकाक बेल का पूरा झुंड दौड़ता दौड़ता आ रहा है तो हम क्या करें क्या ना करें तो आखिर में किंतु ठाकुर ने जान बचा ली आखिरी घड़ी में मैं दौड़ कर के साइड प हो गया और रास्ते से ये बेल चले गए उस समय हम कभी सपने में भी नहीं सोचेंगे जैसे कि चलो उसके सामने रह करके उसका सामना करें क्योंकि ये जो डिसीजन मेकिंग होता है पूरा स्प्लिट सेकंड में लेना है एक सेकंड के एक दसवें भाग में कि मुझे क्या करना है यह मुझे सोचना है उस समय यह फिलोसोफी ये थिरी या स्वामी जी के इंसिडेंट कुछ उस समय मन में नहीं रहता तो ये एक बहुत बड़ी बात है जब स्वामी जी की ग्रेटनेस के बारे में हम सोचते हैं बात यह नहीं है कि उन्होंने सिर्फ यह बेल के सामने खड़े रहकर के इनका सा इनको बचाया किंतु साथ में यह भी एक बात है कि स्प्लिट सेकंड का डिसीजन था आप एक सेकंड इधर-उधर करेंगे वहां उसी में आपका या तो फिर आपको मार देगा यह बेल या तो फिर आपको दौड़ कर के चले जाना पड़ेगा य फाइट और फ्लाइट इंस्टिंक्ट इसको साइकोलॉजी में कहते हैं कि जब भी एक बहुत ही बड़ा मृत्यु भई नजर के सामने आ जाता है तब ये इंस्टिंक्टिवली हम सोचते हैं कि या मैं यहां पर खड़े रह के उसका सामना करूं कि दौड़ कर के अपनी जान बचाओ यह फाइट और फ्लाइट इंस्टिंक्ट ये अ ब्रेन जो अपना ब्रेन स्ट्रक्चर होता है इसका जो फ्रंटल लोब होता है जहां से यह रीजनिंग वगैरह होता है और यह बैक जो है अपने ब्रेन का वहां पे एमिला बोलक के एक यह है एक स्थान है अपने ब्रेन में जहां से यह इमोशनल या इंस्टिंक्टिव डिसीजन होते हैं जैसे कि अपना हार्ट जो धकधक करता है बीट करता है तो वो हार्ट रेट है फिर अपना जो ब्लड सर्कुलेशन है अपनी किडनी का फंक्शन है यह जो सब इंस्टिंक्टिव क्रियाएं हैं वो वहां से उस कंट्रोल होती है एमिक डेला से तो ये इंस्टिंक्टिव डिसीजन है फाइट और फ्लाइट डिसीजन इंस्टिंक्टिव डिसीजन है यह अपने कॉन्शसनेस के कितने गहराई में चला गया है कोई भी विचार वह विचार वहां से होता है अभी हम लोग कोई भी विचार करेंगे तो अपने यह फ्रंटल लोब से करेंगे जिसको कि प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स भी कहा जाता है तो यहां से पूरा रेशनल फिलोसॉफिकल स्पिरिचुअल वह सब थिंकिंग वहां से होता है किंतु जो चीज हमको इंस्टिंक्टिवली करनी है वो इंस्टिंक्टिव करने वाला विचार अपने जहन में कितना गहराई से चला गया होगा स्वामी जी का भीतर में स्वामी जी की कॉन्शसनेस के भीतर में यह विचार कितना गहराई से चला गया होगा दो विचार एक तो दूसरों की रक्षा करनी है दूसरा कि करेज करेज एंड रेस्क्यू इंग अदर्स और करेज एंड सर्विंग अदर्स यह दो विचार स्वामी जी के कॉन्शसनेस के इतने गहराई में चले गए हैं कि जब स्प्लिट सेकंड डिसीजन करना है तो वह एमिक डेला से यह कंट्रो कमांड आता है कि फाइट रदर देन फ्लाइट सामना करो दौड़ कर के भाग जा कर के अपने खुद की रक्षा करने की बजाय इनकी रक्षा करो और मृत्यु भई का सामना करो यह विचार इतना गहराई में उनके चला गया है कि इंस्टिंक्टिवली जो होता है एक्शन तो यही तरह की एक्शन ई यानी कि बात सिर्फ यह नहीं कि स्वामी जी की ग्रेटनेस है स्वामी जी की ग्रेटनेस मल्टीप्लाई होती है यह समझ कर के कि स्प्लिट सेकंड डिसीजन भी जहां पे लेना है वहां पर भी वह इसी तरह का डिसीजन लेंगे अदर वाइज हम लोग रेशनल कितना ही सोचते रहे कि अच्छा ठीक है मैं लोगों की लोगों को हेल्प करूंगा किंतु जब ऐसा एकदम सडन कोई डिसीजन लेना है कि जबकि मेरा मृत्यु अवश्य संभा भी है जबकि मैं दूसरों को मदद करने को जाऊंगा उस समय जद हम अपने खुद के बारे में ही वो इंस्टिंक्टिवली वही सोचेंगे क्योंकि यह जो इवोल्यूशन है इवोल्यूशन ने हमारे जींस और हमारे डीएनए और हमारी साइक हमारी कॉन्शसनेस के भीतर में आत्मरक्षा का कांसेप्ट बहुत ही डीप बिठा दिया है यह जो जितने भी क्लेश है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश या तो फिर यह जितने भी ड़ रिपु कहते हैं हम लोग यह सभी लोगों से छुटकारा पाना इतना मुश्किल क्यों है क्योंकि इवोल्यूशन ने इसको डिजायरेबल प्रॉपर्टी समझ कर के अपनी खुद की रक्षा करने के लिए यह सब चीजें हमारे डीएनए के भीतर में बिटा दी है इसका सामना आप डीएनए लेवल प जाकर के करना पड़ेगा कॉन्शियस लेवल प जाकर के या तो यह प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स से सोचने से नहीं होगा एमक डेला के भीतर में जो हार्ड कोर ये वायरिंग किया गया है हार्ड वायरिंग की गई है जो इमोशंस उसके सामने लड़ना है तो इसीलिए यह सब चीजों से कि आत्मरक्षा या तो फिर सेल्फ सर्वाइवल ये सर्वाइवल इंस्टिंक्ट जो है अपनी उसके सामने लड़ने के लिए यह सब हायर थिंकिंग आपको इतना इंटेंसिवली करने पड़ेंगे कि वह आपकी सबकॉन्शियस के भीतर में चले जाए तब कहीं जाकर के अपने जीवन का परिवर्तन होता है वरना हम लोग सब समय यह सोचते रहते हैं कि अच्छा मैं तो इतना ठाकुर को प्रार्थना करता हूं इतना जब ध्यान करता हूं हो सकता है इतना मैं मंदिर में जाकर के साधु संग करता हूं किंतु फिर भी जब क्रिटिकल डिसीजन मेकिंग की बारी आ जाती है अपने जीवन में तो उस समय ऐसा क्यों नहीं होता कि मैं सही डिसीजन यानी कि अध्यात्म पथ पर आगे ले जाए इस तरह का डिसीजन ना कर पाऊं ऐसा क्यों होता है ऐसा क्यों नहीं होता कि मैं सब समय आध्यात्मिकता के जो मने जो स्पिरिचुअल डिसीजन मेकिंग है वही मैं करूं ऐसा क्यों नहीं होता तो उसका यह रीजन है कि सर्वाइवल इंस्टिंक्ट अपने सबकॉन्शियस में एकदम गहराई में यह जड़ लगा कर के बैठी हुई है और इसको काटने के लिए आपको सबकॉन्शियस में टूप लगानी पड़ेगी डाइव कर लगानी पड़ेगी और वहां पर जाकर के जड़ मुड़ से जब आप इसको काटेंगे तभी कहीं छ कर के हम बचेंगे तो यह है कि आध्यात्मिकता और यह जो सर्वाइवल इंस्टिंक्ट इन दोनों के बीच में फाइट अभी फाइट में स्वामी जी जीत गए थे हम लोगों से पता नहीं कब ये इंस्टिंक्टिवली हम इस तरह के डिसीजन लेंगे तो यह था कुछ समय का और एक मैंने कुछ कुछ घटनाएं बहुत ही सुंदर यह महेंद्रनाथ दत्त ने ही उस समय नोट डाउन करके रखा है कि एक था कि स्वामी जी और शारदानंद जी साइकिल चलाना सीखते हैं तो उनका जो डिस्क्रिप्शन है कि छोटे बच्चे की तरह इतने हसी खुशी से वो साइकल पर चढ़ते हैं कभी गिरते हैं कभी फिर से चढ़ते हैं स्वामी जी को कलकाता में साइकिल चढ़ते हुए ऐसा कोई डिस्क्रिप्शन मैंने कहीं नहीं पढ़ा है हो सकता है कि यहां पर लंदन में ही सबसे पहली बार वह साइकिल चलाना सीखे होंगे क्योंकि उनके डिस्क्रिप्शन में है कि बीच-बीच में गिर जाते हैं और फिर से खड़े होकर फिर से एक प्रयास करते हैं तो वो एक इस किताब में बहुत ही सुंदर सब डिस्क्रिप्शन है हम लोग इसको ट्रांसलेट क्यों नहीं करते आई डू नॉट नो इसके बारे में में कुछ कुछ कंट्रोवर्सी भी है किंतु व्हाट एवर मैंने ज्यादातर इंसिडेंट जो मैंने पढ़े मुझे तो बड़े ही सुंदर लगे एक ऐसा इंसिडेंट था वही महेंद्रनाथ डिस्क्राइब करते हैं कि स्वामी जी प्रवचन दे रहे थे तो भारत के बारे में ऑन इंडिया इंडियन कल्चर इंडियन हिस्ट्री इंडियन ट्रेडिशनल का तो भारत पर राज चल रहा था तो ये एक रिटायर एक आर्मी ऑफिसर होगा तो उस ऑडियंस में बैठा था तो अभी जैसे वह स्वामी जी को सुन रहा है स्वामी जी भारत की इतनी मतलब भव्यता का वर्णन कर रहे हैं गरिमा गौरव का वर्णन कर रहे हैं तो वो सोच रहा है कि ऐसे भारत में जाकर के तो हम सभी लोग भिखारियों को देखते हैं ये भूखे नंगे अकाल होता है तो आधे लोग मर जाते हैं ऐसे लोगों को हम देखते हैं कहां ऐसा गरिमामय भारत तो मैंने देखा नहीं है वो वरना तो थोड़ी ना हम लोग इनके ऊपर में इतना आसानी से राज चला पाते हैं तो ऐसा सोच कर के वो फिर बीच-बीच में क्या बोलता है पता है अच्छा थैंक यू स्वामी जी आपने ये जो सबका मैंने क्या सब उल्टा पुल्टा बोल रहे हैं आप तो ऐसा थैंक यू थैंक यू ऐसा करके वो बीच-बीच में इंटरप्ट करता रहता है तो ये देख कर के सब लोग समझ गए कि ये तो वहां का वो रिटायर्ड ऑफिसर है और देख कर के सब आया है भारत की असली अवस्था क्या है और स्वामी जी क्या लोगों की आंखों में धूल चौक रहे है इसलिए ऐसा सब कर रहा है तो देखिए कि ब्रिटिश लोग जितने भी मतलब वेदांत हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित हो आखिर में तो जो रेशल सुपीरियोर है कि वाइट स्किन ब्लैक स्किन के ऊपर में ब्राउन स्किन के ऊपर में राज करने के लिए ही उनका निर्माण हुआ है यह सब रेशल सुपीरियोर बड़ी ही स्ट्रांग थी इन लोगों में तो उस समय किंतु स्टडी जो था स्टडी थोड़ा वैसे तो बाद में स्वामी जी को धोखा दिया इसने किंतु उस समय स्वामी जी से बहुत ज्यादा प्रभावित था तो वो एकदम खड़ा हो गया और खड़े र स्वामी जी तो कुछ माइंड नहीं करते थे वो जितना ही थैंक यू थैंक यू बोलता रहे बीच-बीच में तो स्वामी जी अपने हिसाब से पूरा मजेस्टिकली जैसे कि वो हाथी चाले बजार कुत्ते बोके हजार उसकी तरह आराम से वो अपना प्रवचन दे रहे थे उसको इग्नोर करके किंतु स्टर्डी को बड़ा गुस्सा आ गया वो खड़े रह कर के वो अभी ऐसा गुस्से से आग बबूला हो गया कि अभी वो मारपीट चालू कर ही देगा वो उसके साथ में ऐसा हो गया यहां पर शारदानंद जी भी थे अभी वोह तो बेचारे गरीब इंडियन इंडिया से आए हैं ये जिनके जहां पर जो जो लोग हमारे पर राज कर रहे हैं उनकी राजधानी में तो ऐसे डर के मारे वोह तो बिल्कुल कांपने लगे कि अरे बाप रे यहां पर जद मार ये जो मार्ग पेट हुई तो मैं तो इंडिया से आया हूं तो मुझे तो सबसे पहले पुलिस वाले पकड़ के ले जाएंगे तो ऐसा कुछ बोले नहीं है मुह से यह सब मेरा इंटरप्रिटेशन है तो किंतु बेचारे डर के मारे कांप रहे हैं और यह सब स्वामी जी देख रहे हैं आखिर में उनको लगा कि नहीं यह बहुत हो गया अभी जद मैं इंटरवेंशन नहीं करूंगा तो मामला पता नहीं कहां से कहां पहुंच जाएगा तो फिर स्वामी जी ने आखिर में इस ब्रिटिश ऑफिसर के सामने देख कर के य ब्रिटेन ने विभिन्न राज्यों में जाकर के किस तरह का कहर बताया है किस तरह से लोगों को गुलाम बना करके इनकी संपत्ति हड़प करके कितना लोगों को सताया है परेशान किया है एक्सप्लोइटेशन किया है इसका पूरा हिस्ट्री एज इट इज स्वामी जी ने उसको सुनाना शुरू किया और वो सुनते सुनते वो ऑफिसर बेचारा ऐसा डर गया ऐसा मने जैसे कि वो चिड़िया बड़ी चिल्लाती है फिर एकाएक सांप उसके सामने जाकर खड़ा रहता है तो चिड़िया का कैसा वो सम्मोहन के भीतर में आके पूरी डर जाती है जो सम्मोहित हो गया स्वामी जी से डर गया एकदम फ्रिज हो गया ना ही उसका मुंह खुल रहा है ना ही मुंह में से एक शब्द निकल रहा है पूरा मतलब वो ये हो गया था डर करके तो स्वामी जी ने पूरा हिस्ट्री सुनाया कि ब्रिटेन ने किस तरह से लोगों को परेशान किया है किस तरह से लोगों के राज्य देश पे गुलाम बना करके एक्सप्लोइटेशन किया है इसलिए ब्रिटिश लोगों को अपने इतिहास के बारे में कोई बहुत गर्व करने लायक बात नहीं है तो यह जब हुआ तब कहीं जाकर के वो डर करके धीरे-धीरे करके वो होल छोड़कर चला गया और जैसे ही वो चला गया स्वामी जी ने अपना प्रवचन इस तरह से प्रारंभ कर दिया सौम्य भाषा में सौम्य चेहरे से सौम्य भाव से जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है तो यह देखिए कि एक एकाएक क्रोध करना क्रोध से किंतु झगड़ा नहीं करना गाली गलोज नहीं करना मारपीट नहीं फिलोसॉफिकली उसको पूरा इसको ठंडा करके रख दिया और फिर ऐसे ही आ गए जैसे कि कुछ नहीं हुआ है तो ये स्वामी जी की जो ग्रेटनेस है छोटे-छोटे इंसीडेंट्स में हमको इतनी सुंदर रूप से वो मिलती है तो वो एक इंपोर्टेंट घटना वहां पर हुई थी और ये जो उनके हाउसहोल्ड का जो वर्णन है बड़ा ही सुंदर वर्णन है इस पुस्तक में महेंद्रनाथ ने किया है कि किस तरह से ये लोग सब एक साथ में रहते थे मिस मलर थी पहले से ही थोड़ी पागल थी छोटी-छोटी बातों में व झगड़ा करती थी वो गुस्सा हो जाती थी यहां तक कि स्वामी जी को भी बड़ा मतलब सोच समझ करके उसके साथ में रहना पड़ता था और यह महेंद्रनाथ को उस समय बुखार हो गया तो उसने क्या किया कि उसको कहा कि यह लोग सब यहां से छोड़ कर के चले जाए मेरे साथ में ना रहे यहां पे ये तो ऐसा बोल कर के व महेंद्रनाथ को वहां से निकाल दिया था यह सब बातों का उल्लेख स्वामी जी ने बहुत बाद में किया है जब स्टर्डी ने स्वामी जी को धोखा दिया और यह स्टर्डी और यह मिस मलर यह दोनों एक तरह से स्वामी जी को बैक स्टेपिंग किए हैं स्वामी जी को आखिर में पैसों का हिसाब मांगना शुरू कर दिया मिस मलर कहती है मैंने इतना रुपया दिया तो मुझे ऐसा लग रहा है कि साधू लोग अपने यशो आराम में इसको उड़ा दिए हैं मुझे हिसाब दो तो यह जो स्वामी जी बार-बार इन लोगों को डांटते हैं ना राजा महाराज को शरद महाराज को कि एक एक पाइप का हिसाब रखना है जो हमारे पास में आते हैं वरना तो याद रखना कि अपनी पूरी यह जो क्रेडेंशियल यह जो पूरा जो य यह है साफ अपनी पूरी चली जाएगी तो क्रेडिबिलिटी पूरी समाप्त हो जाएगी यदि एक एक पैसों का हिसाब नहीं रखेंगे तो यह सब घटनाएं हो रही थी इसलिए य मिस मुलर कहती है कि वो मैंने इतना पैसा दिया तो इसका हिसाब दो बोल कर के तो स्वामी जी ने इमीडिएट इन लोगों को कहा कि एगजैक्टली जहां जहां पे जिस तरह से खर्च किया हो वो सब इसको दे दो और यदि वह चाहती है तो हम उसका पैसा पूरा लौटा भी देंगे हालांकि इतना पैसा कलेक्ट कहां से करना वो एक दूसरी समस्या है किंतु यहां तक स्वामी जी रेडी हो गए थे तो वो जो सब ये मैंने दगा दगाबाजी जब कर रहा था यह स्टडी तब स्वामी जी ने यह सब बातें कि किस तरह से इन लोगों से डरते डरते इन लोगों को रहना पड़ा था स्वामी जी को खाने पीने में वेजिटेरियन खाना बल जबर जोर जबरदस्ती खिलाते थे फिर ये जो चिरो स्मोकिंग करते थे तो उसका पस उसके बारे में कि आपका एक बड़ा ही लग्जरियस लाइफ स्टाइल है इन दोनों के माइंड में यह बैठ गया था कि स्वामी जी के साथ में रह के कि बड़ा ही लग्जरियस लाइफ स्टाइल है अभी किस तरह का लगजरी स्वामी जी कहते हैं कि दिन रात मेहनत करके इतना प्रवचन देक के मैं पैसा इकट्ठा करता हूं और मेरे पैसों से जितना भी एक्स्ट्रा जो आप नहीं दे रहे थे जितना भी एक्स्ट्रा में जद चिरू है ना कि जो कुछ भी है वो सब मेरे पैसों से मैंने किया है आप लोगों को उस क्या परेशानी है तो वह सब बात की बात है किंतु यह जो पीरियड है जबकि स्वामी जी वाज लेंगा उंडेला सोफिक वर्क जबकि आज हम जिसको विवेकानंद का जो हार्ट कहते हैं यह जो चार योग उसका फाउंडेशन जब स्वामी जी डाल रहे थे उस समय बैकग्राउंड में ऐसी बहुत सारी घटनाएं चल रही थी जो कि सुनकर के देख करर के हमको थोड़ा दुख भी होता है कि स्वामी जी यहां पर पूरे विश्व के कल्याण के लिए इतना कार्य कर रहे हैं किंतु उनको सपोर्ट करने के लिए कोई नहीं था यह शतानंद जी तो बेचारे अभी क्या कर रहे हैं वो तो खुद विदेशी राज्य में रहते हैं वो जितना हो पाएगा मेंटल सपोर्ट देंगे इससे ज्यादा तो कुछ कर नहीं पाएंगे और यह बाद में तो यह महेंद्रनाथ है फिर यह जो एक फॉक्स करके एक था जो कि लंडन से अमेरिका से स्वामी जी के साथ में आया था ये जॉन फॉक्स ये जो ये हावर्ड यूनिवर्सिटी के साथ में किसी कैपेसिटी में एसोसिएटेड था स्वामी जी ने हावर्ड में लेक्चर दिए थे उस समय से स्वामी जी के साथ में जुड़ा हुआ था तो वो भी उस समय था लंडन में किंतु इन लोगों का तो कोई ये नहीं कि स्वामी जी को कोई सीरियसली मदद कर पाए तो कितनी कठिनाई में कितनी विषम परिस्थिति में कितनी विपरीत परिस्थिति में स्वामी जी ने अपना मैसेज दिया है वो सुन कर के पढ़ कर के हमको लगता है कि सही में उनकी ग्रेटनेस को समझने वाला आज तो कोई नहीं है उस समय भी कोई नहीं था तो यह पूरा स्वामी जी का लंडन फेज है यहां पर जितना ही डिटेल आप है मेरे पास में अपनी किताबों में लिखा हुआ है पूरा का पूरा डिटेल यहां पर दिया हुआ है फिर वहां से निकले स्वामी जी वेदांत को समा यहां पर कुछ ऐसी घटनाएं हैं जिसको कि पूरे वेस्टर्न मिशन वेस्टन फेस जो था स्वामी जी का उसके साथ में जुड़ी हुई किंतु अनडेटेड उने कोई स्पेसिफिक नहीं है इन जनरल कुछ घटना वली है इसका विवरण यहां पर है एक तो है कि इग्नाइटिंग द इंडियन वर्क हमको पता है कि स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को पत्र लिख कर के बार-बार इनको प्रेरित किया कि संघ बद्ध हो कहां पर वो राजा महाराज इधर उधर भ्रमण कर रहे हैं हरि महाराज कहां प्रव्रज्या कर रहे हैं वो पूरा फेस अभी समाप्त हुआ तुम सभी लोग इकट्ठा हो जाओ एक जगह पर संघ बद्ध होकर के कार्य करना शुरू करो तब कहीं जाकर के क्योंकि यही एक आज के जमाने की यह आवश्यकता है और यह संघ बद्ध होकर के साथ में रहना वगैरह ये उनके गुरु भाइयों को पहले से ही एक संदेह और संशय था कि ठाकुर ने खुद तो ऐसा कुछ कहा नहीं है हां मठ में सब लोग साथ में रहे वो एक चीज है वरा नगर मठ में किंतु एक फॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन की रचना करनी जिसके बायलॉज को जिसके नियमावली हो वो सब कौन फॉलो करेगा जब बेरू मठ में स्वामी जी ने नियम बनाया कि जो मंगलारती में नहीं आएगा वह भिक्षा करके आएगा तो उस समय मने यह सब राजा महाराज को पर्यंत राजा महाराज को भी यह सब पालन करवाते थे एक बार राजा महाराज मने स्वामी जी ने देखा कि ये जो सीनियर गुरु भाई है उनको समझाना बाकी सब जो जूनियर बच्चे आए हैं जवाइन करने के लिए वे लोग तो सब नियम का पालन करेंगे किंतु ये सीनियर जो उनके गुरु भाई है उनसे कैसे नियम का पालन करवाना तो सुबह को एक नियम बनाया कि घंटी बजाने का 4:00 बजे जो मंगलारती होती है उस समय ज घंटी जोर जोर से बजानी है जिससे कि सभी लोग नींद से उठ जाए तो उस समय वो जो शरद चंद्र को एक बार बोला गया कि जाओ घंटी बजाओ तो और यदि राजा महाराज सोते हैं तो उनके कान पर कान के पास जाकर के घंटी बजाना जोर जोर से तो सच में उन्होंने वही किया राजा महाराज सोए थे कान के पास जाकर के इतना जोरो से घंटी बजाई कि राजा महाराज हड़ भर कर के खड़े हो गए और फिर गुस्सा करके बोले किय बांगा लेर दाए मोठे था का शकतो अर्थात की ये तो बंगाल था ईस्ट बंगाल से जो ईस्ट बंगाल में जो रहते हैं आज के बांग्लादेश में उनको बंगाल कहते हैं कोलकाता में तो ये बंगाल ये तो शरदचंद्र तो वहां के थे तो बंगाल ने इतना जो सब मैंने परेशान करके रखा है घंटी बजा करके कि मठ में रहना भी मुश्किल हो गया है तो इन लोगों का था कि जब ध्यान कब करना है जब ध्यान तो जब आध्यात्मिक एक भीतर से टान आती है भीतर से एक ये आती है मने इच्छा डिजायर तब तो कहीं जाकर के आप जब ध्यान करेंगे ना समय के अनुसार बैठ कर के घड़ी के अनुसार चलो अभी समय हो गया जब ध्यान का जब ध्यान करो अभी नाश्ते का समय हो गया तो जब ध्यान छोड़कर खड़े हो जाओ ऐसा क्या है यह सब जब इच्छा होगी तब चालू करेंगे और जब चालू करेंगे तो रुकेगा ही नहीं अविरत चलता रहेगा उस समय यह नाश्ते का समय ना कि ऑफिस का समय ना अकाउंट यह सब भूल जाते हैं यह लोग तो यह जो मतलब बिल्कुल एक परिभ्रजक एक नि रशील जीवन है जहां पर भी किसी भी चीज के ऊपर में आपका आकर्षण नहीं किसी भी चीज का बंधन नहीं घड़ी का बंधन जो है वो एक बहुत बड़ा बंधन है मठ में आज आपको इतने बजे उठना है इतने बजे मंदिर में जाना है इतने बजे नाश्ता करना है इतने बजे भोजन करना है यह बंधन में रहकर सब कुछ करना है और ये लोग तो सब है कि परिव्राजक होकर के बिल्कुल बिना बंधन के मुक्त होकर के घूमे थे पूरे भारत में तो किस तरह से सब मठ में बंधन में रहेंगे है तो वह सबको इकट्ठा करके किंतु रखना और यहां पर उस समय लाटू महाराज का ऐसा था कि उनको यह सब पसंद नहीं आता था तो एक बार सीधा मठ छोड़ के जाना शुरू कर दिए स्वामी जी को कह के कि तुमने ये जो सब नियम बनाए हैं इस बंधन में मैं नहीं रह पाऊंगा मैं जा रहा हूं तो स्वामी जीने उनका हाथ पकड़ करके वापस लेकर आया अच्छा ठीक है चलो लाटू यह सब नियम तुम्हारे लिए नहीं है तो लाटू महाराज के लिए यह एक एक्सेप्शन किया था स्वामी जी ने किंतु बाकी सबको तो फॉलो करना पड़ेगा तो वो जो कि बिल्कुल ही ईश्वर पर निर्भर शल फ्री जो रहने को हैबिटेड है ऐसे गुरु भाइयों को एक नियमावली में बांधना मठ के बंधन में मठ की घड़ी के अनुसार उनके जीवन को नियंत्रित करना एक बहुत बड़ा काम स्वामी जी को करना था अमेरिका से लेटर लिख कर के लिख कर के उन्होंने इके माइंड को तैयार किया बाकी का जो स्वामी जी वापस आएंगे तब होगा तो अभी जो सिक्सथ फेज है स्वामी जी के जीवन का मिशन टू द ईस्ट इसको मैंने यह नहीं कहा कि रिटर्न टू इंडिया क्योंकि य रिटर्न टू इंडिया नहीं है अभी वो यह मेरा भारत देश है मैं भारत देश में वापस आ रहा हूं वो बात अभी स्वामी जी के जीवन से खत्म हो गई है हालांकि स्वामी जी जब कोलंबू आए थे वो जमीन में अलोट आलोट उन्होंने कहा था कि यह सिर्फ मेरी मातृभूमि नहीं पुण्य भूमि भी है किंतु फिर भी यह मातृभूमि और पुण्य भूमि के साथ में भी इससे भी ऊपर है कि स्वामी जी मिशन टू इंडिया यहां पर भारत में ठाकुर के आदर्श के अनुसार संबद्ध होकर के शिव ज्ञाने जीव सेवा के आदर्श को स्थापित करना है पूरे इन मशीन को प्रारंभ करना है यह मिशन था स्वामी जी का सिव घर जैसे कि हम लोग जैसे कि गांव में रहते हैं शहर में जाते हैं नौकरी करने के लिए फिर गांव में आकर के फिर आराम से रहते हैं कि चलो मैं घर वापस आ ग हूं कुछ दिन आराम से सोऊंगा शहर में तो सोने को भी नहीं मिलता है तो यहां पर स्वामी जी आराम करने के लिए रेस्ट लेने के लिए सोने के लिए नहीं आए थे अमेरिका में उन्होंने जितनी मेहनत की थी गांव गांव शहर शहर जाकर के प्रवचन देकर के न्यूयॉर्क वेदांत सोसायटी की स्थापना की थी अपने सब डिसाइल्स थे उनको इकट्ठा किया था उतना ही कठिन कार्य उनको भारत में करना था इसीलिए इसका नाम है मिशन टू द ईस्ट और जब स्वामी जी सर्वप्रथम भारत में लौटे तो ट इज द ट्रायंफ ऑफ द लॉर्ड एक साल पूरा स्वामी जी जगह-जगह घूम करके जिस तरह से उन्होंने यह जो पूरा फेस था ना साइक्लोनिक मंग अमेरिका में पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन के बाद में पूरे अमेरिका के जो नॉर्थ ईस्ट और सदर्न स्टेट इसकी टूर करते करते जितना हमें गांव-गांव शहर शहर जाकर के प्रवचन दिए बाद में कहीं जाकर के वह न्यूयॉर्क में सेटल हो हो करके बैठे और कुछ क्लोज डिसाइल का जीवन गठन करने का प्रारंभ किया यहां पर भी एगजैक्टली उसी बात का रिपीटेशन हो रहा है ट्रायंफ ऑफ द लॉर्ड ये एक साल स्वामी जी कलकाता हालांकि गए थे किंतु उसके बाद में किंतु पूरे भारत में घूम कर के उन्होंने प्रवचन दिए और इसी प्रवचन का कलेक्शन लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा पुस्तक में है और यह पुस्तक आज हम सभी भारतीयों के लिए एक गीता के आधुनिक गीता के समान है कि आधुनिक भारत में आधुनिक युवा को क्या करने की आवश्यकता है किस तरह से अपना खुद का जीवन गठन करें किस तरह से भारत की भव्यता के बारे में सोचे किस तरह से सर्विस एक्टिविटीज प्रारंभ करें यह पूरा इसका आर्किटेक्चरल मैक स्वामी जी ने ब्लूप्रिंट इसमें दे दिया है तो एक के बाद एक सभी कोलंबो में उनका आगमन हुआ वाइल्ड फायर इन द साउथ अर्थात कि चेन्नई से लेकर के विभिन्न साउथ इंडिया के वो सब वहां पे घूम राउसिंग वेलकम इन मद्रास कोलकाता एंड दार्जिलिंग उसके बाद में कोलकाता कोलकाता आए एस्टेब्लिशमेंट ऑफ रामकृष्ण मिशन एसोसिएशन यह सब बहुत ही फेमस घटनाएं हैं इसमें डिटेल में नहीं जाता बीमार हो गए थे तो अल्मोड़ा गए रिकवरी के लिए फिर वहां से भीमताल बरेली अंबाला अमृतसर रावलपिंडी श्रीनगर मुरी रावलपिंडी जम्मू सियालकोट लाहौर देहरादून सहारनपुर दिल्ली राजपूताना खंडा वा रतलाम जबलपुर माने हम लोग इसके बारे में पढ़ते पढ़ते ही थक जाते हैं तो स्वामी जी ने एक साल में यह जो भ्रमण किया है और वो भी आज की तरह नहीं कि चलो सेकंड एसी ना की प्लेन में बैठ कर के इधर से उधर चले जाए उस समय ट्रेवल करना कितना मुश्किल था हमको पता है तो उस समय यह जो सब ट्रेवल की है उन्होंने यह सही में वो जिसका मैंने लोहे का जद कांस्टिट्यूशन नहीं होगा व नहीं कर पाएगा तो पूरा ट्रायंफ ऑफ द लॉर्ड यह एक फेज पूरा समाप्त हुआ जबकि भारत को सोई हुई ंदर से जगाना था यह फेज यहां पर समाप्त होता है उसके बाद में एक जो स्टार्ट होता है कि किस तरह से स्वामी जी के जो वेस्टर्न डिसाइल्स है वो भारत में आना शुरू हुए और भारत में आकर के फिर यह जो निवेदिता है फिर ये मिस अब स्वामी जी के साथ में तीन लोग तो आए ही थे मिस्टर एंड मिसेस सेवियर और ये ये अपना गुडविल ये तीन तो स्वामी जी के साथ में आए थे बाद में किंतु बाकी सब लोग भी आना शुरू हुए ये मिस मलर है निवेदिता है फिर ये जोसेफाइन मैक्लाउड है मिस ओली बोल है मिसेस ओली बोल है तो ये सब जब भारत आए तो उनको लेकर के स्वामी जी ने इनके साथ में जो वार्तालाप किया फिर मठ में रहकर के किस तरह से यह जो शरद चंद्र चक्रवर्ती यह जो पूरा फेज है ये शरद चंद्र चक्रवर्ती ने बड़ा ही सुंदर इसका विवरण दिया है प्र प्र एक फेज में हमको कोई कोई लोग मिल जाते हैं लंडन का जो फेज था उस समय यह था अपना यह अपने महेंद्रनाथ दत्त थे फिर अमेरिका का जो फेस था वहां पे वैसे किसी एक सिंगल व्यक्ति ने इतना सब कुछ नहीं लिखा है किंतु न्यूज़पेपर रिपोर्ट है फिर ये जो मिस ल्डो है इन लोगों य जोसेफाइन मैक्लाउड है इन लोगों के रेमसंस में हमको बहुत सारी बातें मिल जाती है तो यह जो मठ में रहने वाला फेस था स्वामी जी का बेलूर मठ बेलूर मठ का स्थापना तो बाद में हुआ तो उस समय के फेस के बारे में सबसे अच्छा विवरण शरद चक्र चक्रवर्ती शरद चंद्र चक्रवर्ती की स्वामी शिष्य संवाद में मिलता है तो वहां पे एक बड़ा ही सुंदर विवरण है जो मठ में रहकर के स्वामी जी ने अपने सन्यासी शिष्यों को तैयार करना शुरू किया था तो एक दिन स्वामी जी ने एक ऐसा नियम बनाया कि पहले तो ऐसा था ना कि ये सन्यासी गुरुही ऐसा कोई बहुत ज्यादा डिफरेंस नहीं था क्योंकि ये तारक महापुरुष महाराज है ना कि राजा महाराज है लाटू महाराज है वे लोग जिस तरह से ठाकुर के पास में जाते थे तो वैसे ही यह सुरेश मित्र है रामचंद्र दत्त है मास्टर महाशय है बलराम बाबू है योगेन मां गुलाब मां ये लोग भी तो ठाकुर और मां के पास में आते थे तो अभी कुछ कुछ लोगों ने गेरवा धारण किया ग्रहण किया सन्यास क्योंकि उनके पास में वोह परिस्थिति थी यंग थे फिजिकली फिट थे घर से घर की जवाबदारी से कैसे भी करके अपने को छोड़ पाए थे और ये मास्टर महाशय है ना कि बाकी वगैरह ऑलरेडी संसार करके बैठे थे तो किस तरह से वो सन्यास ले तो ऐसा कुछ था तो त्यागी और गृहस्थ में इतना कोई भेद नहीं था किंतु जैसे जैसे समय बीतता गया ये नई जनरेशन आती गई भक्तों की भी और सन्यासियों की भी उस समय स्वामी जी ने नियम बनाया कि पहले जिस तरह से गृहस्थ भक्त मठ में आकर के सन्यासियों के साथ में क्लोजल मिलकर के एक ही बिस्तर पर बैठ कर के एक ही जगह पर बैठ कर के खाना खाएंगे यह सब स्वामी जी ने इसके ऊपर में रोक लगा दी मंगस क्वार्टर में कोई भी गृहस्थ नहीं जा पाएगा सन्यासियों के कमरे में कोई गृहस्थ प्रवेश नहीं कर पाएगा उनके बिस्तर पर बैठ नहीं पाएगा खाने की व्यवस्था थोड़ी सी अलग से कर दी यह सब नियम बनाया स्वामी जी ने उस समय ये शरद चंद्र लिखता है लिखते हैं कि इस बात से मुझे थोड़ा सा दुख हुआ क्योंकि मैं जितना फ्रीली बाकी सब मेरी उम्र के सन्यासियों से मिल पाता था उनके साथ में बात कर पाता था अभी इसके बारे में इसमें थोड़ा सा बंधन आ गया है थोड़ा सा रिस्ट्रिक्शन आ गया है तो स्वामी जी को जाकर के कंप्लेन किया कि स्वामी जी आपने इस तरह के नियम क्यों बनाए हैं तो स्वामी जी ने कहा कि देखो जिस तरह से संन्यास जीवन का गठन करना है एक इंटीग्रिटी चाहिए वो इंटीग्रिटी जद गृहस्थ लोगों के साथ में सतत मिलते रहेंगे बिल्कुल ओपनली तो यह ठीक नहीं रहेगा इसके बाद में औरत स्वामी जी ने बहुत कुछ कहा वो सब वहां पर है तो उसके बाद में एक जो पॉइंट है प्लेग प्लेग रिलीफ की बहुत ने इसके बारे में है बहुत कुछ हमको पता है सबसे इंपोर्टेंट घटना कि स्वामी जी बेलम सेल करने को तैयार हो गए थे उसको बेचने को तैयार हो गए थे कहा कि आमरा तो गास तला सन्यासी हम लोग तो पेड़ के नीचे रहने वाले सन्यासी है हम लोगों के पास में यह मठ और यह सब क्या जरूरत है हमको उस समय मां ने कहा था कि मठ तो तुम्हारा नहीं है कि तुम उसको बेचो ग और बात भी देखिए कि कितना जो लोग स्वामी जी के जीवन को समझे हैं कितना कष्ट करके उन्होंने पैसा कलेक्ट किया है कितना कष्ट करके मठ को बनाया है और उसके बनाने के बाद में जद यह सुनना पड़े मठ तो तुम्हारा नहीं है तो हम लोग जद होते तो हमको कितना आघात लगता य स्वामी जी जिस लेवल पर रहते थे उस लेवल प उन्होंने मां की बात को सही सही समझा कि हां यह मठ तो मेरी वजह से नहीं ठाकुर की मेहनत से सही सही बना है तो बोलकर के वो बात उन्होंने रख दी किंतु प्लेग लिटली बहुत ही अच्छा हुआ था और बहुत ही सुंदर कार्य निवेदिता और ये जो स्वामी जी के जो ये जो थे वो सहारनपुर वाले जो डिसाइल उनके का नाम मैं भूल गया तो उन दोनों ने मिलकर के सदानंद यस स्वामी सदानंद यस यस यस तो इन दोनों ने मिलकर के बहुत ही सुंदर प्लेग रिलीफ किया था और उसके बाद में बाकी के जो फेस है उसके बारे में हम कल बात श श अ श तो देखिए कि यह जो आप कह रहे हैं ना कि सब लोग साथ में मिलकर के रहे यह भी तो विथ हिं साइट ही है उस समय ऐसा तो नहीं था जैसे कि लाटो मरा से ही स्टार्ट करें सीधा मट छोड़ कर के जा रहे हैं कि मैं तुम्हारे नियम को पालन नहीं कर पाऊंगा उस समय स्वामी जी ने जो उदारता दिखाई इन स्पाइट ऑफ एवरीथिंग कि मठ को नियम बद्ध ही चलाना है लाटू महाराज को बोला कि भाई यह नियम तुम्हारे लिए नहीं है तुम वापस आओ दूसरा कि स्वामी अभेदानंद जी महाराज वो ऑलरेडी उनका स्ट्रगल चल रहा था एक इंटरनल स्ट्रगल महापुरुष महाराज के साथ में और वो सही सही में छोड़ के चले गए किंतु फिर भी अपने मठ पर उसका कोई हानि नहीं हुआ ये बहुत बड़ी बात है वरना तो यह जो था ना केशव सैन का वो ब्राह्मण समाज में क्या विजय कृष्ण गोस्वामी ये लोग सेपरेट हो गए सिर्फ सेपरेट ही नहीं हुए आधे चेलो को लेकर के चले गए सब अभेदानंद जी महाराज सही में सेपरेट हुए थे तो किंतु ऐसा क्राइसिस बारबार आया है उद्बोधन अपने हाथ से जाने वाला था ये जो माके जो जो लोग अपने को मां के फेवरेट बताते थे गणदेवता फिर वो रिलीफ वाले थे भूमानंद जी महाराज यह लोग सब शरद महाराज का लाइफ लिखा है स्वामी शारदानंद जी महाराज जीवन ना कि ऐसा कुछ लिखा है वो पढ़ा है मैंने अभी तो बैन है पब्लिश नहीं होता कहीं प मेरे पास में कहीं से बहुत चुना लाइब्रेरी वर्जन आ गया था जिसको मैंने फोटोकॉपी करके रखा है तो उसमें वो लिखते हैं कि शरत महाराज जिस तरह से सबको साथ लेकर के चलते थे तो ये जो नई जनरेशन आई शुद्ध जी फिर ये बाकी विरजानंद जी वगैरह तो वे लोग नहीं कर पाएंगे क्योंकि हम तो सीनियर है वो हमको कैसे कुछ कह पाएंगे वो ट्रस्टी है तो हम कम है क्या ऐसा वैसा तो ऐसा हुआ बहुत था किंतु जो दो लोग थे स्वामी जी के जाने के बाद में जिन्होंने संघ को च मने पूरा एक एक जुट करके रखा वह थी मां और राजा महाराज इन दोनों की बात पर फिर कोई कुछ बोलता नहीं था तो यह एक बात है कि यह दो थे बोलकर के संग टिका वरना तो इसलिए मां को संग जननी इसलिए कहते हैं कि सिर्फ स्वामी जी की तपस्या यहां पर नहीं है मां की तपस्या थी बोलके संग टिका है हा मैंने अंत लीला बहुत ही सुंदर किताब है और वो जो मास्टर महाशय की वो नोट्स जो कि वो लिख नहीं पाए क्यों क्योंकि ठाकुर का कष्ट देखा नहीं जाता था व लिखा किंतु पुस्तका का में वो कर नहीं पाए व शरद महाराज के साथ में भी ऐसा ही हुआ एक तरह से देखा जाए तो मां का देहांत हुआ मां की महासमाधि हुई और काशीपुर के बारे में जद इन दोनों में से एक भी लिखते ना तो बहुत कुछ जानने को मिलता पता नहीं विधि की वैचिंग महाराज कथामृत और लीला प्रसन्न जो कि ठाकुर के ऊपर में दो सबसे प्रमाण भूत ग्रंथ है दोनों में काशीपुर का वर्णन डिटेल में नहीं है बहुत ही ऊपर ऊपर से है तो यह क्यों पता नहीं इसके बारे में अभी देखिए कि वो शॉर्ट हैंड नोट से आप लिख पाएंगे कि तो इन इन दोनों के जैसा तो इनसाइट नहीं ही आएगा प्रभानंद जी कुछ भी कर ले इन दोनों की तरह तो नहीं लिख पाएंगे तो यह मतलब ठाकुर की ही इच्छा होगी कि वह सब चीजों को बातों को सीक्रेट ही रखा जाए व नहीं डीएनए लेवल पर रिप्रोग्रामिंग करना मने कितना कठिन है पूरा इवोल्यूशन देखे कि 4 बिलियन ईयर पृथ्वी को हुआ है उसमें से लास्ट न बिलियन ईयर 100 करोड़ साल से जीवन है पृथ्वी के ऊपर में यह 100 करोड़ साल हमने यही सोचा है कि कैसे आत्मरक्षा की जाए अभी आपको 10 15 साल में यह सोचना है कि आत्मरक्षा कैसे ना की जाए य आर फाइटिंग अगेंस्ट न बिलियन ईयर ऑफ इवोल्यूशन ये अभी ये उद्बोधन है वो ये है ना भक्त मालि का मने गंभीरानंद जी ने जो डायरेक्ट बा ठाकुर के डिसाइल का जीवनी जो लिखा है वो उसका ऑडियो बना रहे है और य पर रख रहा है तो मैं उसको सुन रहा हूं तो अभी नव गोपाल घोष का वो वो वाला चैप्टर ऑडियो में सुन रहा था कुछ दिनों पहले तो ठाकुर वो एक बार ठाकुर के पास आए थे फिर तीन साल हो गए ठाकुर के पास गए नहीं तो ठाकुर ने कहा अरे भाई वो जो आदमी उनके वो जिनके साथ में गए थे 30 साल के बाद में पूछ रहा है अच्छा वो जो आपके साथ में आए थे ना अभी क्यों नहीं आ रहा है तो वो जाकर के नव गपाल को बोलता है कि ठाकुर आपको याद कर रहे हैं तो नव गपाल एकदम आश्चर्य चकित हो जाता है अरे ये सिद्ध महापुरुष जिनको कि सभी लोग परमहंस करके सम्मान देते हैं मुझे न साल के बाद में याद रखा और वह सामने से ठाकुर के पास आते हैं तो देखिए कि ये जो नियमित ठाकुर के पास आना ये एक बहुत बड़ा एक फैक्ट था कि इनके आध्यात्मिक जीवन के लिए बहुत बड़ी सहाय थी नरेंद्र को ठाकुर कहते हैं कि जैसे नया पति होता है तो बार-बार वो अपनी नव वधु के पास में आता है तो यह जो सत्संग है दो फैक्टर है एक तो इंटरनल फैक्टर है कि आपको सेल्फ एफोर्ड करना पड़ेगा दूसरा एक एक्सटर्नल फैक्टर है कि आप सत्संग करें तो यह उसमें से इंटरनल तो आप ही के हाथ में है किंतु एक एक्सटर्नल जो है कि सत्संग जैसे कि आप खुद प्रतिदिन वहां मट में जाते हैं और रात को बैठते हैं वो बहुत बात है कि प्रतिदिन सत्संग यदि चलता रहे तो यह एटलीस्ट बाहर वाला हिस्सा तो एक मैंने प्रज्वलित एक दिया रहेगा भीतर में दिया जलाना वो तो भी अपने हाथ में है सेल्फ एफर्ट वो तो कैसे भी करके विल पावर को हमको बनाना पड़ेगा किंतु ये जो बाह्य उद्दीपन जो होता है एक इंस्पिरेशन जो स्पार्क वो एक जद बना रहता है तो भी तो एक बहुत बड़ी बात है सभी लोगों का सौभाग्य नहीं होता कि प्रतिदिन सत्संग करें प्रतिदिन मंदिर में जाए प्रतिदिन साधु संग करें वो जिनको मिलता है वो धन्य है यह बात मुझे भी नहीं पता थी और आपने सही कहा कि उसके बारे में बहुत ज्यादा नहीं पता है एटलीस्ट मैंने तो कहीं नहीं पढ़ा यह मुझे नहीं पता था और स्वामी जी के पास में आते थे स्वामी जी उनको बहुत स्नेह करते थे इतना हमको पता है और स्वामी जी की वाणी को एज इट इज लिपिबद्ध करना ये जिनको सौभाग्य मिला है गुडविन और यह शरद चंद्र और फिर आई डांसर ये कुछ कुछ लोग है जिनको कि ये सौभाग्य मिला है उनमें से ही एक है स्वामी शिष्य संवाद जो लिखे स्वामी शिष्य संवाद एक्चुअली ये जो किताब है ना इसका महात्म बंगोल के बाहर में ज्यादा नहीं है क्योंकि बंगाली में जो स्वामी जी बोलते हैं ना उसका ट्रांसलेशन मैंने जो किया है मतलब जो पढ़ा है मैंने गुजराती में उससे कोई एक्स्ट्राऑर्डिनरी नहीं लगता क्योंकि ये क्या है ना कि जो ट्रांसलेशन होते है ना उसमें खास करके स्वामी जी की बंगोली लैंग्वेज उसका भाव इतना वो होता नहीं है बंगोली में जो पढ़े इसको उसके लिए किब का अलग ही एक प्रभाव है बहुत सारे लोग ऐसा बोलते हैं कि कंप्लीट वर्ष में सबसे इंपोर्टेंट किताब है यह राजयोग कर्मयोग से भी ज्यादा स् शिष्य संवाद ऐसा बोलने वाले लोग बंगल में