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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 4 Sep 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन हम देख रहे थे उसके ऊपर में चर्चा कर रहे थे एक पॉइंट जो आज मैं डिस्कस करना चाहता हूं ऑलरेडी हमने देखा कि वराह नगर मठ की स्थापना हो चुकी है और सुरेश मित्र की कहानी और किस तरह से एक के बाद एक सभी गुरु भाई वहां पर आकर के ज्यादा से ज्यादा समय रहने लगे वह सब हमने कल देखा इनिशियली तो वराह नगर मठ के बारे में ऐसा सोचा गया था कि जिनके पास में रहने के लिए और वाघ घर वापस जाने के लिए कोई जगह नहीं है। जिन्होंने खजूर के पेड़ से दोनों हाथ दोनों पैर माने खोल करके माने मुक्त करके जंप लगाया है। आंख बंद करके ठाकुर के आशीर्वाद और ठाकुर की जो करुणा है उस पर भरोसा करके यह एक ब्लाइंड जंप माने लीप ऑफ फेथ यह जो इन्होंने किया है तो उनके लिए रहने की जगह चाहिए थी। लाटू था, काली था, तारकदा थे, बूढ़ो गोपाल थे। इनके पास में और कहीं पर जाने की जगह नहीं थी। तो वे लोग वहां पर रहने लगे। किंतु धीरे-धीरे करके देखा कि बाकी सब गुरु भाई भी वहां पर आकर के ज्यादा से ज्यादा समय मठ में ही बिताते हैं और इवेंचुअली वहीं पर रह जाते हैं। अभी देखिए कि जहां तक

श्री रामकृष्ण की आध्यात्मिकता, माँ सारदा का परिवार, और स्वामी विवेकानन्द का मानव सभ्यता पे चिंतन

भविष्य का रामकृष्ण संघ या रामकृष्ण मिशन या रामकृष्ण मठ रामकृष्ण ऑर्डर जो भी हम नाम देना चाहे उसका प्रश्न है अब तक दो बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाएं घट चुकी है। सर्वप्रथम घटना तो वैसे हमने डिस्कस नहीं किया इस अ कभी किंतु हमको पता है कि वहां पर काशीपुर में ठाकुर ने कुछ त्यागी शिष्यों को गेरुआ वस्त्र प्रदान किया था और आजकल बहुत बार ऐसा कहा जाता है कि रामकृष्ण मिशन या रामकृष्ण ऑर्डर का जो प्रथम मठ है वह काशीपुर ही है क्योंकि काशीपुर में ही सभी त्यागी संतानों ने सबसे पहली बार इकट्ठा होकर के रहना सीखा ठाकुर की सेवा करने के लिए। वैसे तो आप दक्षिणेश्वर को भी कह सकते हैं कि दक्षिणेश्वर ही तो वह जगह थी जहां पर यह त्यागी संतान साथ में रहते थे। हमको पता है कथामृत पढ़ेंगे तो बार-बार उल्लेख आता है। खास करके अभी जो हम पढ़ रहे हैं मास्टर महाशय के दक्षिणेश्वर में निवास के कुछ दिनों की घटनाएं दिसंबर 1883 की यह जो घटनावली जिसका हम पाठ कर रहे हैं कथामृत क्लास में तो हमको पता है कि वो लाटू भी वहां पे है। हरीश भी वहां पे है। राखाल भी वहां पे है और मास्टर महाशय भी वहां पे है कुछ समय के लिए। तो ऑलरेडी यह जो सीड फॉर्म में संघ की स्थापना तो वहां पर दक्षिणेश्वर के दिनों से ही प्रारंभ हो चुकी थी। अह किंतु कहते हैं कि बिकॉज़ कि ठाकुर ने यह जो अंतर से तो त्यागी कर ही दिया था दक्षिणेश्वर में, काशीपुर में, उन्होंने बाहर से भी त्याग के चिन्ह धारण करने के लिए उनको गेरुआ वस्त्र प्रदान किया। और फिर अल्टीमेटली वराह नगर मठ में इन्होंने विधिवत सन्यास लेकर के संपूर्ण रूप से त्याग का जीवन उन्होंने इस अह प्राप्त किया। त्याग के जीवन में उन्होंने कदम रखे। अभी क्या है कि एक तो था कि इनफॉर्मली ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में संतानों को तो त्यागी कर ही दिया था। काशीपुर में त्याग के बाह्य चिन्ह जो है वह प्रदान किए थे और वराह नगर मठ में शास्त्र विधि के अनुसार शास्त्रीय पद्धति के अनुसार उन्होंने सन्यास ग्रहण किया था। अर्थात कि जहां तक गुरु भाइयों के सन्यास जीवन की बात जाती है, हम लोग इस सन्यास जीवन को तीन फेजेस में बांट सकते हैं। दक्षिणेश्वर के वह दिन जबकि ठाकुर इनको उपदेश देकर के आध्यात्मिक साधना किस तरह से करनी है वह समझा करके वह साधना करते थे। सुपरवाइज करते थे। स्टेप बाय स्टेप उनको गाइड करते थे। तो वह दक्षिणेश्वर के दिन और फिर काशीपुर में बाह्य सन्यास के जो सन्यास के जो बाह्य चिन्ह है उसको प्रदान करना और फिर वराह नगर मठ में विधिवत सन्यास ग्रहण करना। तीन स्टेप हमको ऑलरेडी दिखाई देते हैं। अभी अह जैसे कि हम पढ़ते हैं कभी-कभी कि वराह नगर मठ हमारा पहला मठ नहीं हो के काशीपुर को कहना चाहिए कि वो हमारा पहला मठ है। अभी मैं जिस तरह से इसका एनालिसिस करता हूं थोड़ा सा यह फिलॉसोफिकल और थ्योरेटिकल हो जाएगा डिस्कशन। किंतु फिर भी कि मैं किस तरह से इसको देखता हूं। मुझे ऐसा लग रहा है या तो फिर जिस तरह से मैं सोच रहा हूं। मुझे ऐसा लग रहा है कि वराह नगर मठ जो था वो एक इंस्टिट्यूशन का प्रारंभ था। जबकि काशीपुर था ठाकुर ने कम्युनिटी एस्टैब्लिश की थी। अभी यह कम्युनिटी और यह इंस्टट्यूशन आप कहेंगे कि क्या यह हेयर स्प्लिटिंग नहीं है क्या? इन दोनों में डिफरेंस क्या है? तो मैं कहूंगा कि कुछ-कुछ डिफरेंस है। वैसे बहुत मेजर डिफरेंस ऐसा नहीं कह करके उसका जो फंक्शनैलिटी है उसमें कुछ-कुछ डिफरेंस आपको अवश्य दिख जाएंगे। सर्वप्रथम तो कम्युनिटी या तो एक परिवार उसका एक फंक्शन अलग होता है और दूसरा कि यह इंस्टीट्यूशन व्हिच फॉल्स विद इन द कैटेगरी ऑफ सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग या तो फिर सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क उसका एक फंक्शन अलग होता है। जैसे ऑलरेडी हमने देखा कि ठाकुर, मां और स्वामी जी तीन हमको हमने जिस तरह से मैं एनालिसिस करता हूं ठाकुर को यदि यह कहेंगे कि हमारी इंडिविजुअल स्पिरिचुअल जर्नी है। उसके वो गाइड है, टीचर है, मां यदि हमारी कम्युनिटी लाइफ किस तरह से लीड करनी है, वह सिखाती है। तो स्वामी जी हमको सिखाते हैं कि किस तरह से यह एक सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क खड़ी की जाए। तो इस दृष्टि से देखिए कि दक्षिणेश्वर के जो दिन थे वह एक्चुअली ठाकुर का जो टीचिंग था या तो फिर ठाकुर का जो मुख्य पपस था पृथ्वी पर आगमन करने का वह दक्षिणेश्वर में जैसे कि उन्होंने उसको संपूर्ण रूप से उसको निभाया है। दक्षिणेश्वर में जो संतान उनके पास में आते थे वह चाहे गृहस्थ हो कि चाहे यह यंग लड़के हो जिसमें से कोई कोई भविष्य में त्याग का रास्ता अपनाएंगे कोई कोई नहीं भी अपनाएंगे जैसे कि भवनाथ है या तो फिर यह पलटू है या तो पूर्ण है या तो छोटू नारायण है। हमको पता है कि ठाकुर के पास में बहुत सारे लड़के आते थे। उसमें से कुछ-कुछ लोगों ने इंस्पाइट कि बहुत ही हाई आध्यात्मिक उन्नति उनके जीवन में थी। तीन नाम नृत्य गोपाल, नृत्य गोपाल या नित्य गोपाल जो भी है यह दोनों शब्द मैंने पढ़े हैं। वो एक था दूसरा था भवनाथ और तीसरा था पूर्णम। तो इन तीनों के बारे में ठाकुर ने कहा है कि बड़ी उच्च आध्यात्मिक अवस्था थी। इनस्पाइट ऑफ दैट इन तीनों ने त्याग का रास्ता नहीं अपनाया था। जबकि यह लाटू है, सुबोध है, यह विज्ञान महाराज है, योगेन है, काली है, शरद है, शशि है और या तो फिर इवन बूढ़ो गोपाल दास अर्थात कि हमारे अद्वैतानंद जी उम्र में तो बड़े थे, किंतु उन्होंने यह यंग लड़कों के साथ में त्याग का रास्ता अपनाया। तो वह एक था कि चाहे यंग लड़के हो ना कि ऑलरेडी जो गृहस्थ थे वह हो। ठाकुर ने इनको आध्यात्मिक जीवन किस तरह से परिपूर्ण करना चाहिए। किस तरह से इष्ट प्राप्ति हो या आत्म साक्षात्कार हो वो ठाकुर ने उनको दक्षिणेश्वर में सिखाया। यानी कि हम जो ठाकुर को कॉन्शियसनेस इसके साथ में इक्वेट करते हैं इंडिविजुअल स्पिरिचुअल क्वेश या तो फिर आवर जर्नी टुवर्ड्स गॉड आवर जर्नी टुवर्ड्स निर्वाण आवर जर्नी टुवर्ड्स आत्म साक्षात्कार तो यह पोर्शन या यह एस्पेक्ट इसके साथ में ठाकुर और दक्षिणेश्वर एकदम फिट बैठ जाते हैं। काशीपुर को हम कहेंगे कि कम्युनिटी लाइफ एक ऐड होता है। माने ये ऐसा नहीं है कि आपकी इंडिविजुअल स्पिरिचुअल लाइफ है। उसको रिप्लेस करके आपको कम्युनिटी लाइफ बिठानी है। नहीं। दिस इज अ वैल्यू एडिशन। माने एक एक्स्ट्रा एस्पेक्ट ऐड होता है काशीपुर में। और इसीलिए आप देखेंगे कि गंभीरानंद जी महाराज ने मां की जीवनी में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जैसे-जैसे ठाकुर की वाक वाचा रुद्ध होती गई। ठाकुर का वाक रुद्ध होना प्रारंभ हो गया। बोलने में तकलीफ प्रारंभ हो गई। इशारोंइशारों से बात कर रहे हैं, समझा रहे हैं। तो वैसे ही मां का यह लीडरशिप रोल है, वह धीरे-धीरे करके बढ़ने लगा। जो त्यागी संतान अभी तक ठाकुर के ऊपर में भरोसा करके बैठते थे। या तो फिर कहेंगे कि ठाकुर क्या आदेश करते हैं, उसका पालन करने के लिए यह लोग तत्पर रहते थे। तो उनकी यह जो शरणागति या डिवोशन या तो श्रद्धा अभी मां के ऊपर में भी इतनी ही बढ़ने लगी। मां क्वाइटली बैकग्राउंड में रह के धीरे-धीरे करके मां ने लीडरशिप रोल लेना प्रारंभ कर दिया। और यह कम्युनिटी लाइफ यहां पर प्रारंभ होती है। तो मां और कम्युनिटी लाइफ और काशीपुर यह तीनों को हम एक साथ में इक्वेट करेंगे। और फिर बाद में जब वराह नगर मठ की स्थापना होती है और इवेंचुअली जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आएंगे तो वो ट्रस्ट एक्ट जो है उसके तहत रामकृष्ण मिशन उसकी स्थापना एज ए कॉरपोरेट बॉडी एज ए एक कहेंगे कि लीगल इंस्टीट्यूशन के रूप में उसकी जो स्थापना होती है। यह जो पूरा पीरियड है वो एक सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क खड़ा करने के लिए भविष्य की सिविलाइजेशन में हमारा क्या कंट्रीब्यूशन हो सकता है वो प्रोवाइड करने के लिए यह एक स्वामी जी का एक पीरियड था। स्वामी जी का एक युग था। तो स्वामी जी वराह नगर मठ और यह सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क यह तीनों एक जगह पर इक्वेट होते हैं। तो यह तो एक डिफरेंस है। अभी आप एक दूसरी तरह से देखिए कि एक कम्युनिटी और एक इंस्टीट्यूशन इंडिविजुअल में और कम्युनिटी में या तो फिर देखिए ऑन वन हैंड यदि आप एक इंडिविजुअल को रखते हैं और दूसरे साइड पे आप कम्युनिटी और इंस्टीिट्यूशन को रखते हैं तो डिफरेंस बड़ा ही क्लियर है। इंडिविजुअल अर्थात मैं अकेला या तो कहेंगे कि मैं और ईश्वर या तो कहेंगे कि मैं और मेरा सही स्वरूप जो कि आत्मन या तो ब्राह्मण है। तो वो एक इंडिविजुअल तक सीमित है। जबकि कम्युनिटी है इट्स अ ग्रुप ऑफ पीपल। तो इंस्टीट्यूशन इज़ आल्सो ए ग्रुप ऑफ पीपल। तो डिफरेंस बिटवीन एन इंडिविजुअल ऑन वन हैंड एंड इंस्टीट्यूशन एंड कम्युनिटी ऑन दी अदर हैंड वो बड़ा क्लियर है। किंतु जब हम यह कहने को जाएंगे कि व्हाट इज द डिफरेंस बिटवीन कम्युनिटी ऑन वन हैंड एंड इंस्टीट्यूशन ऑन द अदर हैंड एक परिवार और एक संस्था दोनों में क्या डिफरेंस है? तो हमको थोड़ा सा सोचना पड़ेगा। देखिए कि परिवार जो एक होता है, वहां पे एक इंडिविजुअल का काफी इंपोर्टेंस होता है। जबकि ये कॉम इंस्टिट्यूशन होता है वो सेल्फ परपेचुएटिंग होता है और वहां पर इंडिविजुअल का इतना कोई नहीं होता। यह बात कैसी है पता है? देखिए मैं दो उदाहरण देकर समझाता हूं। सर्वप्रथम उदाहरण कम्युनिटी के बारे में। जब योगानंद जी महाराज उनकी महासमाधि हुई। मां ने एक स्टेटमेंट दिया जिसको कि मैंने जब पहली बार पढ़ा मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हो गया। मैंने कहा कि मां इस तरह से बात क्यों करती है? जो कि हमने अभी तक जो रामकृष्ण मिशन के बारे में जो कुछ पढ़ा है उसके साथ में मां का यह स्टेटमेंट किसी भी तरह से कहीं पर भी मिलता नहीं है। मां ने क्या कहा था कि एक ईंट टूटी है। अभी यह पूरी इमारत ढह जाएगी। तो क्या मां यह कहना चाहती है कि रामकृष्ण संघ रामकृष्ण मिशन रामकृष्ण मठ यह तो अभी तो प्रारंभ हुआ है किंतु सिर्फ योगानंद जी महाराज की महासमाधि की वजह से यह पूरा रामकृष्ण मिशन जो है भविष्य में पूरा उसका ये हो जाएगा डिसइीग्रेट हो जाएगा क्या मां यह कहना चाहती है एक्चुअली नहीं थोड़ा सा सोच के देखिए कि ये कम्युनिटी जो है त्यागी संतानों की और मां मां के सेंटर में रख के यह त्यागी संतानों की जो कम्युनिटी जिसको और माने आप ये जो रिंग्स आफ्टर रिंग्स बनाते जाइए। सेंटर में है मां शारदा देवी फिर इनर सर्कल जो है वह त्यागी संतानों का बना है। आउटर सर्कल जो है वह बना है यह गृहस्थ भक्तों का। तो यह मां उसके सेंटर में फिर इनर सर्कल है त्यागी संतानों का और आउटर सर्कल है गृहस्थ भक्तों का। यह जो कम्युनिटी ठाकुर ने काशीपुर में बनाई थी, उसकी पहली ईंट टूटी थी और यह कम्युनिटी धीरे-धीरे करके वो तो मृत्यु की ओर तो जाने ही वाली है। अब जैसे अभी उस समय योगेंद्र महाराज की महासमाधि हुई थी। 1902 में स्वामी जी की महासमाधि होगी। 1904 में यह निरंजनानंद जी की होगी। फिर यह अद्वैतानंद जी उसके बाद में शशि महाराज उसके बाद में त्रिगुणातीतानंद जी उसके बाद में अपने प्रेमानंद जी लाटू महाराज है उसके बाद में अपने राजा महाराज है तुरियनंद जी है शरद महाराज है फिर सुबोदानंद जी है उसके बाद में महापुरुष महाराज आखिर में फिर अखंडानंद जी विज्ञानानंद जी और अल्टीमेटली 1939 न के आसपास में देखेंगे तो आखिरी जिनका महासमाधि होने वाला था वह थे अपने अभेदानंद जी तो वो योगेन महाराज की महासमाधि से प्रारंभ होकर के और 1920 में ऑफ कोर्स श्री मां तो वही आई थिंक योगेन महाराज की महासमाधि हुई थी 1898 के आसपास में तो वहां से प्रारंभ करके यह 1939 के आसपास यह जो अभेदानंद जी की महासमाधि हुई तो ठाकुर ने जो कम्युनिटी का गठन किया था उस कम्युनिटी के जो ओरिजिनल मेंबर जितने भी थे और साथ में ही देखिए सुरेंद्र बाबू है उनकी महास उनका निधन हुआ बलराम बाबू का निधन हुआ मास्टर महाशय है गिरीश घोष है योगेन मां है गोलाप मां है सब तो एक के बाद एक चल बसे हैं तो जो कम्युनिटी ठाकुर ने रचना की थी काशीपुर में उसमें से तो सभी का मृत्यु होने ही वाला था। महासमाधि होने ही वाली थी। तो इस अर्थ में मां ने कहा है कि इस इमारत की एक ईंट टूटी है। अभी पूरी इमारत डह जाएगी। तो यह हो गया कम्युनिटी के बारे में। ऑन दी अदर हैंड आप इंस्टीट्यूशन के बारे में देखिए। प्रेमेशानंद जी का वो फेमस यह घटना है कि उस समय जो प्रेसिडेंट महाराज थे तो प्रेसिडेंट महाराज की समा महासमाधि हुई थी। प्रेसिडेंट महाराज का मृत्यु हुआ था। तो किसी भक्त ने या तो फिर किसी साधु ने जाकर के प्रेमेशानंद जी के पास में दुख करते हुए कहा कि महाराज की महासमाधि हुई है। महाराज आज रामकृष्ण लोक में चल बसे हैं। तब प्रेमेशानंद जी महाराज ने उनको सांत्वना देने के लिए यह दुर्गा पूजा का उदाहरण दिया था। क्या कहा था कि देखिए कि जैसे प्रत्येक साल हर साल में बेलूर मठ में दुर्गा पूजा होती है। दुर्गा प्रतिमा उसकी प्राण प्रतिष्ठा होती है। और एक के बाद एक षष्ठी सप्तमी अष्टमी नवमी पूजा समाप्त करके दशहरा के दिन मां को जल समाधि करवाई जाती है। तो अब देखिए कि अब जैसे मां की जल समाधि हुई या तो फिर विसर्जन जैसे हुआ तो नेक्स्ट ईयर फिर से नई दुर्गा प्रतिमा करके फिर से यही प्राण प्रतिष्ठा करके फिर से वही पूजा समाप्त करके फिर से मां को इस तरह से विसर्जन करेंगे। हर साल दुर्गा पूजा होती है। हर साल मां की प्रतिमा नई तरह से गठन करते हैं और इसी मां की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके पूजा करते हैं और हर साल उसको विसर्जन करते हैं। तो क्या हम शोक करेंगे कि एक बार मां चली गई तो फिर कभी वापस नहीं आएगी। तो प्रेमेशानंद जी कहते हैं कि रामकृष्ण मिशन को भी इसी तरह से समझना। एक के बाद एक अपने संघ के जो सर्वश्रेष्ठ साधु है उनको संघ गुरु की पदवी पे संघ गुरु की गद्दी पे आसित होने का उनको मौका मिलता है। ठाकुर ही जैसे कि उनको वरण करते हैं। ठाकुर ही जैसे कि प्रेसिडेंट महाराज का चुनाव करते हैं। और फिर जैसे ही करंट प्रेसिडेंट महाराज है उनकी महासमाधि होने से दूसरे प्रेसिडेंट महाराज का वरण होगा। दूसरे प्रेसिडेंट महाराज को उसी संघ गुरु की जो गद्दी है उसके ऊपर में आसित किया जाएगा। तो जैसे दुर्गा प्रतिमा हर साल हम नई गठ गठित करके जैसे विसर्जन करते हैं वैसे ही यह संघ गुरु की परंपरा वो अनंत समय तक चलती रहेगी। और जब तक रामकृष्ण संघ चलेगा तब तक यह संघ गुरु की परंपरा चलती रहेगी। तो ऐसा करके प्रेमेशानंद जी ने इनको सांत्वना दी थी जो साधु जो कि शोक कर रहे थे उनको और ठाकुर का भी एग्जैक्टली ऐसा है कि जब मथुर बाबू के घर में दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन करने का समय आया तो मथुर बाबू बड़े ही क्रोधित हो गए। बड़े ही नाराज हो गए। बोला कि देखिए कि इतने दिनों से इतनी सुंदर पूजा चल रही है। पंडित ब्राह्मण वगैरह पूजा कर रहे हैं। यह युगावतार श्री श्री रामकृष्ण स्वयं मथुर बाबू के घर में उपस्थित है। आप विसर्जन करेंगे ही क्यों? मुझे इतना आनंद आ रहा है। आपको जितना धन चाहिए ले लीजिए। किंतु पूजा अभी अनंत काल तक चलती रहनी चाहिए। तो यह बात सुनकर के जो पुजारी पंडित ब्राह्मण थे डर गए वे लोग कहे कि यह तो शास्त्र के विरुद्ध में हो जाएगा कि दुर्गा पूजा प्रारंभ की है और दशहरा को विसर्जन नहीं कर रहे हैं तो फिर ठाकुर को अपील की गई ठाकुर ही यह पगला जब यह मथुर बाबू का एक बार एक डिटरमिनेशन कर लेते हैं एक बार क्रोधित हो जाते हैं तो उनको ठंडा करने के लिए उनका कान पकड़ के सही दिशा दिखाने के की क्षमता सिर्फ ठाकुर में ही है तो तो फिर ठाकुर गए उस कमरे में जहां पर मथुर बाबू बैठे थे और समझाया कि मां जा कहां रही है? मां तो आपके हृदय में रह रही है। तो ऐसा करके देखिए इंस्टीट्यूशन और कम्युनिटी इन दोनों में यह एक डिफरेंस है। कम्युनिटी जो है वो इंडिविजुअल्स की बनी है और इंडिविजुअल्स के एक के बाद एक जाने से ये कम्युनिटी जैसे कि डिप्लीट होती जाती है। हां कम्युनिटी में नए मेंबर आते जाते हैं। जैसे कि अपना फैमिली है। मां-पिताजी का निधन हुआ तो संतान जो है वो संतान उसी फैमिली को आगे चलाएंगे। किंतु फिर भी वह निधन रूपी जो लॉस है व्हिच इज़ वेरी सिग्निफिकेंट लॉस। जबकि इंस्टीट्यूशन में एक के बाद एक साधु आते जाएंगे जाते जाएंगे। किंतु इंस्टीट्यूशन के कोर प्रिंसिपल्स जो है, इंस्टीट्यूशन की जो कोर फंक्शनैलिटीज है, इंस्टीट्यूशन का जो कोर कॉन्स्टिटशंस है, इंस्टीट्यूशन की जो कोर वैल्यूस है, इंस्टीट्यूशन का जो कोर कल्चर है, वो वैसे का वैसा ही बना रहेगा। यहां पे फैमिली में आप देखेंगे कि मां-पिताजी बड़े ही कंजर्वेटिव थे। किंतु बच्चे आजकल की हवा लग जाने से बड़े ही ये क्या कहेंगे कि उंखल हो गए हैं। तो मां पिताजी के निधन के बाद में परिवार का जो ये कल्चर है या तो फिर उसका यह जो पूरा यह है फंक्शनैलिटी पूरा चेंज हो जाएगा। जबकि इंस्टीट्यूशन में ऐसा नहीं होगा। देखें कि यह 150 साल तो होने को आए ऑलमोस्ट कितने 189 आप वराह नगर मठ से ही प्रारंभ करें इंस्टिट्यूशन का कहे कि वराह नगर मठ से ही एज ए इंस्टीट्यूशन रामकृष्ण संघ प्रारंभ हो चुका है तो आज तक देखेंगे कि हमारी कोर वैल्यूस हमारा कोर कल्चर हमारी कोर फंक्शनैलिटीज वह सब वैसे का वैसा ही है। जबकि साधु जितने भी थे वराह नगर मठ में आज उनमें से एक भी साधु नहीं जीवित है। आज भारत की परिस्थिति विश्व की परिस्थिति संपूर्ण रूप से बदल गई है। कंपेयर टू 1886 उसके बावजूद हमारे जो कोर प्रिंसिपल अपना जो कोर कंस्टिट्यूशन है अपनी जो कोर वैल्यूस है वो वैसी की वैसी ही बनी रहती है। ये इंस्टीट्यूशन का मेजर फंक्शन यही है कि जो उसका जो बेसिक आइडियाज है, बेसिक वैल्यूस है उसको प्रोपगेट करना ईयर आफ्टर ईयर डिकेड आफ्टर डिकेड सेंचुरी आफ्टर सेंचुरी मिलेनिया आफ्टर मिलेनिया एज आफ्टर एज यह बुद्धिस्ट संघ है जो पुराने-पुराने इंस्टीटशंस को देखिए बुद्धिस्ट संघ या तो फिर यह कैथोलिक चर्च इतने कैथ कैथोलिक चर्च खास करके उसने अभी भी अपना एक कॉरपोरेट स्ट्रक्चर बना करके रखा है। सेंट्रलाइज्ड कॉरपोरेट स्ट्रक्चर बुद्धिस्ट संघ जबकि बिखर गया है। बहुत सारी बुद्धिस्ट मोनेस्ट्रीज है। बहुत सारे बुद्धिस्ट ऑर्डर होंगे। किंतु कोई सेंट्रल ऑथॉरिटी जैसा कुछ नहीं वहां पे। जबकि इस्लाम में भी यही है कि खलीफा के जाने के बाद में इस्लाम में ऐसा कोई रिलीजियस सेंट्रल अथॉरिटी नहीं है। हिंदू धर्म में तो कभी नहीं था। किंतु जहां तक ये कैथोलिक चर्च की बात करते हैं तो हम कह सकते हैं कि इतना पुराना इंस्टीट्यूशन विद द सेम एक सेंट्रल ऑथॉरिटी। सपोजेटली अभी भी वही कोर प्रिंसिपल है जो कि जीसस एस्टैब्लिश करके गए थे। अभी बीच-बीच में क्या है कि कोर प्रिंसिपल तो चेंज नहीं होते किंतु जो मनुष्य जो कि वहां पर लीडरशिप पोजीशन में होते हैं उन लोगों में करप्शन आ जाता है। तो दैट इज अनदर मैटर कोर प्रिंसिपल अभी उन लोगों ने चेंज नहीं किए इस अर्थ में कि जीसस को हटा करके और किसी को सेंट्रल फिगर पे नहीं बिठा दिया। तो यहां पर रामकृष्ण मिशन या रामकृष्ण इंस्टिट्यूशन यह जो है जितने भी साल चलेगा स्वामी जी का कहना है 1500 साल तो जो भी है जितना भी चले अपना जो कोर प्रिंसिपल ठाकुर मां स्वामी जी का लाइफ एंड टीचिंग्स वो तो वैसे का वैसा ही बना रहेगा देयर विल बी नो चेंज एट ऑल हां जो हम लोग हैं हम लोगों में इधर-उधर करप्शन आ जा सकता है डज नॉट मैटर किंतु प्रिंसिपल्स जो है, कल्चर जो है, वैल्यूज़ जो है, स्पिरिचुअल प्रैक्टिसेस जो है, वह तो एज़ इट इज़ बनी ही रहेगी। सो, दिस इज़ माय एक पॉइंट मैं चाहता था कि शेयर करना कि ठाकुर, दक्षिणेश्वर और इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी, मां काशीपुर और कम्युनिटी और स्वामी जी, वराह नगर मठ और इंस्टीट्यूशन। तो अभी देखते हैं थोड़ा सा

स्वामी विवेकानन्द के छोटे भाई महेन्द्रनाथ दत्त के संस्मरण

आगे क्या होता है। कल हमने ऑलरेडी देख लिया कि वराह नगर मठ की स्थापना हो चुकी है और जैसे कल हमने कहा था कि वराह नगर मठ के वैसे तो बहुत ज्यादा रेमिनेशंस अवेलेबल नहीं है। अब जो अपने विजानंद जी है, शुद्धानंद जी है उनके आने के बाद का ही कुछ-कुछ मटेरियल अवेलेबल है। और जब तक मास्टर महाशय का डिस्क्रिप्शन जाता है वहां पर अवेलेबल है। तो बीच वाला जो पार्ट है अनफॉर्चूनेटली देखिए ये ये बात मैंने बहुत सालों पहले पढ़ी थी। कहां पर पड़ी थी यह मैं भूल गया किंतु एक ऐसा इंसिडेंट वहां पर वराह नगर मठ में हुआ कि आज पढ़कर के आज सुनकर के जानकर के हमको बहुत दुख होगा। यह गुरु भाई जहांजहां जाते थे प्रवज्जा के लिए तो वहां से लंबे-लंबे लेटर्स लिखते थे अपने अनुभवों के या तो फिर मठ की खबर रखने के लिए ऐसा करके तो मठ से भी लेटर जाते थे और गुरु भाई भी लिखते थे। यह मैं उस समय की बात कर रहा हूं कि स्वामी जी अमेरिका गए होंगे उससे पहले की या तो फिर स्वामी जी अमेरिका गए हैं और अभी उन्होंने वहां से जो पत्र परंपरा अभी तक प्रारंभ नहीं की है। तो ये अह ये उन दिनों की घटना है जो डार्क डेज है अपनी हिस्ट्री के माने मिस्टरियस जो दिन है। उस समय की यह बातें हैं। तो अनफॉर्चूनेटली हुआ ऐसा कि एक दिन निरंजनानंद जी ने मठ में देखा कि बहुत सारे पत्र इकट्ठा हो गए हैं और हम वे लोग तो थे सब नटो सन्यासी म नंगे सन्यासी ना ही कोई परिग्रह करना है ना ही वस्त्र रखने हैं ना ही कोई फर्नीचर रखना है ना ही यह सब कोई चीजों का संग्रह करना है तो झूठमठ के इतने सब पत्र पड़े हैं तो क्या किया जाए तो सबको इकट्ठा करके उन्होंने जला दिया अभी देखिए कि वह पत्र आज हमारे पास में होते तो यह जो पीरियड है वराह नगर मठ का यह 1886 से लेकर के यह 1889 स्वामी जी ने 1889 और 1890 जबकि स्वामी जी ने वराह नगर मठ त्याग किया था तो बहुत अच्छा सा डिस्क्रिप्शन वराह नगर मठ का भी और शायद ये घटना कब हुई मुझे नहीं पता वराह नगर मठ में हुई होगी कि आलम बाजार में हुई होगी आई डू नॉट नो बट जहां पे भी ये लोग इतना सारा मटेरियल जो कि हमको हिस्टोरिकल एक मिलने वाला था वो सब हमने गवा दिया तो व्हाटएवर तो जैसे हमने कल देखा था कि एक सोर्स है स्वामी जी के छोटे भाई मोहिन बाबू जिनको कि इतना ऑथेंटिक नहीं माना जाता अपने ऑर्डर में। मैंने एक दो साधुओं को सीनियर साधुओं को पूछा था कि नहीं मानने का क्या रीजन क्या है? ना उन्होंने कहा कि डेट्स कुछ-कुछ गड़बड़ है। यह तो एक है और दूसरा है कि अह स्वामी जी के भाई है तो तो वह तो गृहस्थ एस सच जो सन्या भक्त थे ठाकुर के जो राजा महाराज माने स्वामी जी को छोड़कर के अन्य गुरु भाइयों को जो रिस्पेक्ट बाकी सब गृहस्थ देते थे भक्त जैसे कि मास्टर महाशय है ना बलराम बाबू है ना कि जो भी है तो राजा महाराज को भी रिस्पेक्ट जो देते थे वगैरह-वगैरह तो ये स्वामी जी के भाई होने की वजह से उनके राइटिंग्स में ना ऐसा लग रहा है कि राजा महाराज को खास करके इतना रिस्पेक्ट नहीं दे रहे हैं। सो व्हाटएवर अभी ये सब चीजों को थोड़ा सा छोड़ दिया जाए और सिर्फ उनके रेमिनेशंस पे थोड़ा सा फोकस किया जाए। पुटिंग असाइड द डेट्स कि स्वामी जी का जीवन उन्होंने लिखा। उसमें स्वामी जी के पिताजी की मृत्यु कौन सी दिन को हुई? स्वामी जी ग्रेजुएट कब हुए? वो जो सब फ़क्चुअल एरर कुछ-कुछ लग गई होगी। अभी क्या है कि वृद्ध अवस्था में उन्होंने लिखा है बिना किसी रिकॉर्ड तो ऐसा कुछ होगा नहीं। तो उन्होंने जो लिखा है तो फ़क्चुअल एरर्स कुछ-कुछ आ गई होगी। कीपिंग दैट असाइड उनके जो एस सच रेमिनेशंस है वह बड़े ही शार्प है और बड़े ही सुंदर है। तो थोड़ा सा पढ़ते हैं श्रीमद स्वामी विवेकानंदर जिबनेर घटनावली यह जो उनका पुस्तक है तीन वॉल्यूम में है। तो उसमें से फर्स्ट वॉल्यूम में यह वराह नगर मठ के दिनों का विवरण क्या लिखते हैं?

वराहनगर मठ का विवरण

ओ समय मास खाने शकले बीमनाय बीमनायमान थाकाय आश्विन बा कार्तिक मासे 1886 साले बराह नगर मठ शकले आशिया एकत्रित होलेले धीरे-धीरे करके सभी लोग 1886 के साल में बराह नगर मठ में आकर के एकत्रित हुए मठ बाड़ीटा अति प्राचीन भग्नो नीचेकार घरग गोली माटी ते डूबिया बोशिया गया छे मठ का जो यह घर है जो यह मकान था इमारत जो थी अति प्राचीन थी भग्न प्राय थी और नीचे के जितने भी कमरे थे वो जैसे कि मिट्टी में धस गए थे श्रीगाल और शरपेर आवास स्थान यह जो शियाल है जिनको कहते हैं और सांप इसका था यह आवास स्थान यहां पे यह सब लोग रहते थे ऊपर उठी बार शर धाप गोली खानिक आकटा प गया छे अभी यह तो ग्राउंड फ्लोर में ऐसा है कि ग्राउंड फ्लोर में तो कुछ-कुछ कमरे जो थे पूरे मिट्टी में ही धस गए थे। यह शियाल है, यह कुत्ते होंगे शायद या तो सांप वगैरह है वो तो रहते ही थे। किंतु जैसे ऊपर जाने का प्रयास करेंगे तो ऊपर जाने की सीढ़ी थी। उसमें से कुछ-कुछ ये जो स्टेप्स थे, वह ठीक थे और कुछ-कुछ स्टेप्स पूरे टूट गए थे। तो, अभी आप कैसे ऊपर में उठेंगे, आप सोच लीजिए। द्वतलेर दालानेर मेझेर खोया दुई हाथ आ तो दुई हाथ उठिया गया छे तो ऊपर में जब फर्स्ट फ्लोर पर जाएंगे जहां पे भी यह सब गुरु भाई रहते थे तो फ्लोरिंग जो है तो थोड़ा सा नीचे है थोड़ा सा ऊपर है अनइवन फ्लोरिंग है चलते-चलते पैर में ठोकर भी लग सकती है आप गिर भी जा सकते हैं दरजानालार तो गुलि खानिक आ खानिक ना यह जो दरवाजा है या तो यह खिड़की की है उसमें से कुछ कुछ है कुछ कुछ नहीं है छातेर बोर्गा पिया गया छे बांस चिरिया ईंट गुली राखा होया छे ये जो छत है छत कहीं-कहीं से धंस गई है और ये जो बांस होता है बांबू जो होता है उसको रख के कुछ-कुछ ईंटें उसके ऊपर में रखी है जिससे कि ऊपर में से शेल्टर मिलता रहे चतुर दिखे जंगल चारों ओर है जंगल भूतेर बाड़ी तो सत्यभूत भूते बाड़ी भूत का भूतिया घर जो कहते थे तो सही सही में भूतिया घर था शणी दिया उठिया उत्तर दिके अर्थात दक्षिण हा जाते प्रथम एकटी नाती बहत ग्रह जब सीढ़ी उठकर के आप दक्ष उत्तर की ओर जाएंगे तो दक्षिण के ओर जाने की समय में पहले तो एक मध्यम साइज का एक कमरा था जेटी के काली वेदांती बा काली तपस्वी घर बोला जाए तो इसको काली वेदांती या काली तपस्वी का घर कहा जाता तहार पर दुई धाब उठ गया एकटी छोटो दर्जा एवा भीतर जाब पथ तो इसके बाद में थोड़ा सा उठेंगे तो मिलेगा एक छोटा दरवाजा मिलेगा और भीतर में जाने का रास्ता मिलेगा आर एक टू ढुकेले बांदी के ठाकुर घर एवं शंभू के एकटी लंबा दालान और दालानेर पश्चिम में एकटी बड़ो घर अभी यह जो पूरा घर का डिस्क्रिप्शन है वो मैं छोड़ देता हूं यहां पे क्योंकि जब जब तक आप वहां की मुलाकात नहीं लेंगे तब तक पता नहीं चलेगा। अभी एक मठ हमारे हाथ में आ गया है वैसे किंतु मुझे पता नहीं ओरिजिनल स्ट्रक्चर वहां का वो कितना है कितना नहीं है एनीवे काशीपुर बागा ने श्री रामकृष्ण देव जे शजजा बाली शो व्यभुत द्रव्यादि छिलो ताहा संरक्षित होलो यहां पे एक घर है एक कमरा है वहां पे काशीपुर के गार्डन में ठाकुर का जो शैया यानी कि बेड बालिश यानी कि यह पिलोम और वह जो व्यवहकृत जो द्रव्य थे वह सब एक जगह पे संग्रहित था मेजर ऊपर शज्जा स्थापन करा हो या छिलो पालंग तखन एकटाओ छिलोना जमीन के ऊपर में ही बेड रखा हुआ था जिसको पलंग या तो फिर यह जो यह कहते हैं एक्चुअल बेड वो उस समय नहीं था दानादेर घरे अर्थात काली तपस्वीर घरटी व्यतीत इ अपरजे जे बोह तहार नाम दानादेर घर अर्थात कि यहां पे जैसे एक बड़ा कमरा जहां पे यह सब गुरु भाई लोग मिलकर के चर्चा करते थे, साधन भजन करते थे, तपस्या करते थे, गप लगाते थे, कीर्तन करते थे। उसको कहते थे दाना देर घर। दाना अर्थात कि दानव दानव दैत्य। दैत्य दानव का कमरा। ये क्यों? क्या इस तरह से नाम क्यों दिया गया? क्योंकि यह सब भी तो अपने को भैरव के समान ही समझते थे। स्वामी जी ने कहा ना कि जीसस को जेले मालारा पूजे छिलो ठाकुर काछे यूनिवर्सिटी दाना दत्तरा ब्रह्म दत्तरा ऐसे छिलो अर्थात कि जीसस के पास में यह जेले अर्थात कि मछुआरा जो है यह सब लोगों ने किसान है मछुआरे हैं ऐसे लोगों ने जीसस को पूजा था किंतु ठाकुर के पास में यह यूनिवर्सिटी के ब्रह्म दैत्य आकर के इकट्ठा हुए हैं। ठाकुर की वो कैपेसिटी थी कि यूनिवर्सिटी के दानव और ब्रह्म दैत्यों को वो ब्रेन वाश कर सके। तो इस हिसाब से कमरे का नाम था दानवों का कमरा या तो दानव दैत्यों का कमरा। थोड़ा सा और मैं स्किप कर देता हूं क्योंकि इसी तरह का वह पूरा कमरे का डिस्क्रिप्शन है। इसके बाद में मोहिन बाबू वराह नगर मठ में आहार का बंदोबस्त कैसा था वह लिखते हैं। आहार कोनो बंदोबस्त ना

वराहनगर मठ में भोजन की व्यवस्था

थाकाय एवं काहारो प्रदत्त किु ग्रहण करबे ना इहा स्थिर कोरिया शकले मुष्टि भिखा कोरते लागी लेन आहार का कोई भी बंदोबस्त नहीं था एवं किसी के पास में से कुछ भी ग्रहण ना करें यह ठीक करके रखा था बोलकर के सभी लोग भिक्षा कर रहे थे। अभी यह यहां पे उन्होंने यह जो स्टेटमेंट दिया है, वह गंभीरानंद जी के स्टेटमेंट के साथ में कंट्रास्ट होता है क्योंकि गंभीरानंद जी ने स्पष्ट लिखा है शशि नाम का एक ब्राह्मण वह वहां पर आकर के खाना बना रहा था और सुरेश बाबू प्रत्येक महीने ₹100 करके पैसा देते थे। तो अभी आप देखिए कि किसका क्या समझना है भिखार जे चावल आशी तो ताहा सिद्ध करा हो तो तत्पर एक वस्त्र खंडेर ऊपर तत समुदय ढालिया ताहा चतुर के शकले मिलिया बोशीतेन एवं लबण और लंकार झोल करिया तहाई दिया भोजन समाप्त करतेन भिक्षा में जो चावल जो मिलता था उसको पकाते थे उसके बाद में एक वस्त्र के ऊपर में पूरा चावल ढाल देते थे और उसके चारों चारों ओर यह गुरु भाई मिलकर के बैठते थे और लवण अर्थात कि यह नमक और मिर्च के साथ में यह चावल जो था वो खाते थे। जस्ट इमेजिन कि किस तरह से वो डाइनिंग हॉल उनका होगा। किस तरह से एक कपड़े में एक वस्त्र पे वो चावल ढाला हुआ है। भात ढाला हुआ है और चारों ओर बैठकर के गुरु भाई खा रहे हैं। तो संबल क्या है? चावल के साथ में ना ही दाल है ना ही तरकारी है बस है थोड़ा सा यह साल्ट और थोड़ा सा मिर्च च्ली बस इसी के सहारे यह चावल खाते थे कखनोबा तेला कुचा पत्तेर झोल हो तो कभी-कभी यह तेला कुचा बोलकर के कुछ यह होते हैं पत्ते वगैरह उसका यह झोल बनाता जूस जैसा बनाते हैं यह सूप जैसा बनाते हैं जल पाने जन एकटी मात्र घटी छिलो जलपान करने के लिए सिर्फ एक ही घटी थी एकटी बाटी ते नून लौकार झोल थाती तो एक कटोरी में नमक और मिर्च उसका थोड़ा सा पानी डालकर के झोल जैसा जूस जैसा बना देते थे शकोले एक ग्रास कोरिया एक बार भात मुखे लेते वो एक बार झोल हाथ कोरिया मुखे लोग क्या करते एक हाथ में से मुट्ठी भर के चावल लेते और दूसरे हाथ में वह झोल था वह थोड़ा सा हाथ में लेते। झोल अर्थात कि यह साल्ट और चिली इसका यह जो सूप जैसा बनाते थे वो वो हाथ में लेते और फिर दोनों एक साथ में खाते जिहवा अत्यंत झाल जाल लागी तो जिहवा के ऊपर में जीभ के ऊपर में बड़ा ही तीखा लगता गुरु सेवा ओ गुरु भाई के

कहानी: वराहनगर मठ में शौचालय सफाई की साधना

सेवा करा एक ए भापटी तो खो अत्यंत प्रबल होइया उठिलो तो यह तो आहार का विवरण इसके बाद में क्या कहते हैं कि गुरु की सेवा करना और गुरु भाइयों की सेवा करना यह एक ही बात है। यह भाव उस समय गुरु भाइयों में बड़ा ही प्रबल हो उठा। ऊपर कार पखाना तते पश्चातेर पुष्करणी झोल आन्या राखा हो तो ऊपर में जो टॉयलेट था उसमें पीछे में जो एक पुष्करणी थी तालाब था वहां से पानी लाकर के रखा जाता गोटा दुई माटी गामला छिलो ताती जोल था तो मिट्टी के दो बर्तन थे उसमें पानी रहता एक दिन प्रसंग क्रमे नरेंद्रनाथ कोलेन तीन शोलो आना कठोर कोरे छिलेन आमरा की तार एक आना करते पारबो ना एक दिन नरेंद्र ने कहा कि ठाकुर ने 16 आना कठोरता की थी तो क्या हम एक आना भी कठोरता नहीं कर पाएंगे परमहंस मोसाई अपरे पायखाना धुए दिए ऐसे छिले और आमरा की तार नाम करे किु ही करते पारबो ना परमहंस महाशय दूसरों के टॉयलेट है पाईखाना जो है वह क्लीन करते थे तो क्या हम लोग उनका नाम लेकर के यहां पर इकट्ठा हुए हैं तो हम क्या कुछ नहीं कर पाएंगे तनी ए कथा ए रूप हृदय स्पर्शी भावे बोलिया छिल शकुलेर भीतर से बार भाव कठोरता करीब बार इच्छा अग्नि शिखार ना प्रज्वलित होइया उठिलो नरेंद्र ने यह बात इतनी हृदय स्पर्शी रूप से कही थी कि सबके भीतर में सेवा का भाव और कठोरता करने की इच्छा तपस्या करने की इच्छा अग्नि शिख की तरह प्रज्वलित हो उठी प्रथम एक दिन शकले अश शाखा ते एक जो पखाना टी धया दिया दुई तीनटी हुकात ते जल बदया दिया कोलकते तामाक टीका ठीकिया राखी लेन पहले तो क्या हुआ एक गुरु भाई ने लोग और किसी को ना दिखे इस तरह से क्या किया कि पायखाना अर्थात टॉयलेट धो दिया और फिर जो हुक्का पान ये लोग करते थे जो सबका हैबिट था वहां पे हुक्का पान सबका तो नहीं किंतु यह नरन और राखाल तो हमको पक्का पता है तो यह जो हुक्का जो स्मोक करते थे उसको उसके भीतर में यह जो ये डालना होता है तंबाकू डालना होता है फिर यह जो कोयला डालना होता है फिर जो पूरा हुक्का एक बार खत्म हो जाता है तो उसमें से जो राख होती है राख निकालनी होती है तो इस तरह से हुक्का सजा दिया दो-तीन हुक्का सजा दिया निद्रा भंगेर और शकले पाई खाना गया देखजे पायखाना परिष्कार तामाक तैयारी जब सब लोग नींद से उठे और टॉयलेट में जाकर के देखा तो टॉयलेट एकदम क्लीन कर दिया गया है और जो हुक्का है हुक्का तैयार हो के रखा गया है। देखिए जो ठाकुर कहते हैं ना मने वने और कोने इस तरह से जप ध्यान करना है जो कि लोग देख ना पाए। आपको यह प्रदर्शन कभी नहीं करना। तो यहां पर भी सेवा का भी प्रदर्शन नहीं करना। जिस गुरु भाई ने यह टॉयलेट क्लीन किया था, जिस गुरु भाई ने स्मोकिंग के लिए हुक्का तैयार किया था। इस तरह से किया कि किसी को पता नहीं है कि यह गुरु भाई यह कर रहा है। और ठाकुर स्वामी जी ने कहा ना कि परमहंस महाशय इतना सब कठोरता करके गए। क्या हम इसका एक अंश भी ना कर पाएंगे? इस तरह से प्राण के आवेग के साथ में यह बात बताई कि सबके हृदय में यह अग्नि शिख की तरह सेवा करने का भाव प्रज्वल हो गया और सेवा भी कैसे करनी है मनने वने और कौन है अर्थात कि किसी को पता ना चलना चाहिए कि मैं सेवा कर रहा हूं तो दूसरे दिन जब गुरु भाई उठकर के देखे तो टॉयलेट भी क्लीन है और फिर वहां पर हुक्का भी तैयार है और अभी का विवरण देखिए निद्रा भंगेर हां जो वहां पे गए अच्छा पखानार मल पतने जन एकटी मात्र गत एक जन शौचे बोशिले तो अपर एक जन शोस शो पाद ध्व ऊपर जानू नत करिया बसिया धूमपान एवं वेदांत और नाना शास्त्र आलोचना करते टॉयलेट करने के लिए एक ही मात्र गड्ढा है वहां पे तो एक गुरु भाई यदि वो शौच कर रहा है तो बाकी सब वहां पर बैठकर के या तो धूम्रपान कर रहे हैं या तो शास्त्र की चर्चा कर रहे हैं पुनराय आर एक जन बेग आशिया छे तो तीन मलत्याग बशी ले अपर को एक जन धूमपान करते करते शास्त्र चर्चा करते छ और किसी को वेग आया है तो वह मलत्याग कर रहे हैं और बाकी के सब धूम्रपान करतेकरते शास्त्र चर्चा करते हैं ए रूप पर जाय क्रो में एक जन कोरिया शौचे बशीते छो अन्य कई जन शास्त्र आलोचना करते छ इस तरह से बारी-बारी से कोई कोई शौच करते हैं तो बाकी के शास्त्र की आलोचना करते हैं शौच स्थल बैठक खाना परिणत हो शौच स्थल बैठक खाने में परिणत हुआ शकले दिगंबर और मध्यम कौतुक रहस्या आदि ओ चलिते छे सभी लोग दिगंबर है और बीच-बीच में हास्य विनोद भी चल रहा है तो अब ये देखिए कि हम लोग सब पढ़ते हैं डिस्क्रिप्शन कि बहुत तपस्या की है। बहुत कठोरता की है और उनके भीतर में आत्मीयता का भाव भी बड़ा प्रचंड था। शास्त्र चर्चा भी बहुत की है। तो एक्चुअली जब हम एक्चुअल डिस्क्रिप्शन पढ़ने को जाते हैं तो हमको लगता है हाय रे ये लोग इस तरह से भी रहते थे। मुझे यदि बोल दिया जाए कि तुम इस तरह से बैठो वहां पे। आई डोंट थिंक कि मैं बैठ पाऊंगा। एक तो ठाकुर कहते हैं लज्जा घृणा भय ये तीन थकते नहीं। यह तो हमारे में है ही है। किंतु देखिए एक कम्युनिटी बनाने का अर्थ क्या है? देखिए यह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट फैक्टर है। पहले कम्युनिटी क्यों? बाद में संस्था क्यों? क्योंकि कोई भी संस्था जो होती है, कोई भी एक इंस्टीट्यूशन होता है, उसका फाउंडेशन है। ये प्रेम भलो भाषा ये प्रेम यदि नहीं होगा, एक कम्युनिटी बॉन्डिंग बड़ा ही स्ट्रांग नहीं होगा। तब तक ना उसके कंधे पर यह संस्था बनेगी नहीं। आज हम यहां पर जो कुछ लोग बैठे हैं 101 लोग मिलकर के यह सोचे कि चलो हम लोग भी एक संस्था बनाते हैं तो वह संस्था ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं। क्यों? क्योंकि अपने भीतर में वो कम्युनिटी का बॉन्ड जो है वो इतना स्ट्रांग नहीं है कि जीवन हमारे सामने जो चैलेंज फेंकेगा वह सब चैलेंज हम अपने साथ में मिलकर के उसका सामना करेंगे। एक दूसरे को हम पीठ में खंजर नहीं मारेंगे। स्वामी जी ने क्या कहा था कि तुम सभी लोग स्वामी जी गुरु भाइयों को एड्रेस करके कहते हैं संबोधित करके कहते हैं कि जब तक तुम लोग कमर कस करके मेरे साथ में खड़े रहते हो तब तक मैं इस पूरे विश्व के साथ में युद्ध कर सकता हूं। अर्थात देखिए वैसे तो स्वामी जी अमेरिका में हैं। अकेले हैं ना ही शशि महाराज, लाटू महाराज, काली महाराज कोई भी उनको सहाय करने के लिए अमेरिका नहीं जाने वाले। किंतु यह जो मेंटल बॉन्डिंग जो है, एक मेंटल सध्यारा है, भरोसा है कि हां यह गुरु भाई लोग मेरे साथ में है। ठाकुर और मां तो है ही है। किंतु साथ में यह गुरु भाई भी मेरे साथ में यह जो एक भीतर में से एक रीश्योरेंस जो मिलता है वो रीअरेंस की वजह से स्वामी जी इतना बड़ा चैलेंज जो है वो स्वीकार करने को तैयार हो गए थे। देखिए हमारे जीवन में जो कोई भी साइकोलॉजिकल मेंटल डिसऑर्डर प्रकट होते हैं हम लोगों के साथ में प्रॉब्लम क्या होता है पता है कि माने और तो बहुत सारे प्रॉब्लम है प्रॉब्लम का कोई अंत नहीं है हमारे जीवन में बट एक एक सिग्निफिकेंट प्रॉब्लम यह है कि एक कम्युनिटी लाइफ का अभाव एक परिवार का अभाव जिसको हुफ कहते हैं गुजराती में या तो फिर यह जो वॉर्म कहते हैं इंग्लिश में एक एक वर्म हमको मिलनी चाहिए ह्यूमन रिलेशन में से और जब नहीं मिलती है तो हमारे साइकोलॉजी में एक अभाव रह जाता है। यह अभाव की वजह से हमारी साइकोलॉजी हमेशा थोड़ी सी एबनॉर्मल सी होती रहेगी। यह जो जितने भी सीरियल किलर्स हैं ये सोशियोपाथ है उन सबके अब जैसे हिटलर वो अभी हिटलर का साइकोलॉजी स्टडी करेंगे। उसके पिताजी उसको बेल्ट से मारते थे। बहुत मारते थे। तो क्या है कि पिताजी से जो एक वार्मथ मिलनी चाहिए। एक प्रेम, एक सहारा मिलना चाहिए। एक केयर मिलनी चाहिए। वह नहीं मिलकर के उसकी साइकोलॉजी में वह गड्ढा हमेशा के लिए बन गया। वो एक ब्लैक होल बन गया। और इसी ब्लैक होल में से बाद में यह इनसिक्योरिटी है, क्रुअल्टी है, वह सब प्रारंभ होता है। जबकि इन बच्चों में जो कि बहुत ही परिवार का प्रेम मिलता है, देखेंगे कि एक रीश्योरेंस होता है। कल हम श्रद्धा की बात कर रहे थे ना बाद में आज मैं सोच रहा था यह कम्युनिटी के बारे में तो मुझे ऐसा लगा कि मेरे भीतर में यह जो एक श्रद्धा आई है कि हां मैं घर छोड़कर के कहां पर भी जा सकता हूं और घर मैंने जब इनिशियली छोड़ा था मैंने यह नहीं सोचा था कि मैं रामकृष्ण मिशन जॉइ करूंगा। मैंने तो यही सोचा था कि मैं ट्राइबल डेवलपमेंट करूंगा। तो ऐसा बोल के मैं बहुत घूमा था। इवेंचुअली ठाकुर मुझे यहां पे ले आए। किंतु इवन फॉर अ सिंगल सेकंड मेरे मन में यह इनसिक्योरिटी या डाउट प्रकट नहीं हुआ कि मैं जो रास्ता अपनाया है वह गलत है मेरे लिए। तो यह जो फेथ है यह रीअरेंस है कहां से आया? मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा जो फैमिली अपब्रिंगिंग है वहां से वो जो केयर और जो लव मुझे प्राप्त हुआ है दैट हैज़ गिवन मी दिस सेल्फ एश्योरेंस। तो वन ऑफ़ द थॉट। तो अपने यहां पर भी देखिए इंस्टीट्यूशन का प्रारंभ करना यानी कि इतनी सारी चैलेंजेस अपने सामने आएगी कि उस समय ना हम हिम्मत हार जाते हैं। हम भरोसा खो बैठते हैं। हम इनसिक्योर फील करने लगते हैं। अब आजकल तो कुछ नहीं है। उस समय तो ब्रिटिश एंपायर के साथ में यह लोग लड़ रहे थे। तो ब्रिटिश पुलिस, यह खुफिया पुलिस, यह सीआईडी, यह पुलिस वाले यह लोग आकर के हमको परेशान करते थे, तंग करते थे। उस समय यदि एक भरोसा रखना कि नहीं मैं यह सब कर पाऊंगा तो ठाकुर और मां का तो आशीर्वाद था ही था। एक स्पिरिचुअल एक अटेनमेंट भी थी। किंतु साथ-साथ में यह गुरु भाइयों का आपस में ये जो बॉन्ड था दैट बॉन्ड दैट गव देम इंक्रेडिबल रीश्योरेंस। तो यहां पर भी देखिए बॉन्ड कैसे बना है। यह डिस्क्रिप्शन पढ़कर के पता चलता है कि कितना डीप बॉन्डिंग है इन लोगों में कि इतनी जिसको कि हम घृणा या तो फिर लज्जा करेंगे ऐसा कोई कार्य करने में उसमें भी इनको घृणा या लज्जा नहीं होती थी। एक मां अपने बच्चे को जैसे छोटा बच्चा को तो पता नहीं है टॉयलेट जाने के लिए उसको बाथरूम में टॉयलेट में जाना है शौच करने के लिए वह तो अपनी डायपर में ही कर देता है तो मां जिसको उसको स्नेह के साथ में उसको क्लीन करती है मां को घृणा नहीं होती तो यहां पे मां और बच्चे का बॉन्डिंग जो है कितना स्ट्रांग है एक मां दूसरे के बच्चे को इस तरह से क्लीन करने को नहीं जाएगी शायद डिपेंड करता है कि उसका मातृत्व का स्ट्रेंथ कितना है और डजंट मैटर अपने बच्चे के साथ में मां का जो बॉन्डिंग होता है इट इज यूनिक। सो इट्स अ वेरी डीप बॉन्ड। यह गुरु भाइयों में था। बोल के यह सब घटनाएं वहां पर घटी है। अच्छा और इसके बाद में जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में करेंगे। डिस्कस आ जाइए। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: श्री रामकृष्ण के त्यागी सन्तानो की तपस्या की हम कल्पना भी नहीं कर सकते!

आइसबर्ग कहते हैं ना कि आइसबर्ग 1/3 ऊपर होता है। 2 थर्ड पानी में रहता है। तो यहां पर तो वन 10थ दिख रहा है। नाइन 10थ अदृश्य है। देखिए उनके माइंडसेट का हम इमेजिनेशन भी नहीं कर सकते। तो उनके साथ में तीन चीजें इकट्ठा हुई थी। तो एक तो है कि ठाकुर के साथ में रहकर के साधना में साधना की है। सिद्धि प्राप्त की है। दूसरा कि ठाकुर और मां का स्वयं आशीर्वाद प्राप्त था। और तीसरा कि आपस में जो बॉन्डिंग था तो में माइंड स्टेट जो है उनका मेंटल स्टेट जो है वह कितना सॉलिडली पावरफुल होगा जिसको हम आत्मश्रद्धा कहते हैं म शास्त्र में जिसको आत्मश्रद्धा कही जाती है वो सही में वो आत्मश्रद्धा का लेवल कितना हाई होगा इन लोगों में जस्ट इमेजिन हम लोग मतलब इमेजिन भी नहीं कर पाएंगे इस हद तक उन लोगों में यह आत्मश्रद्धा थी शरणागति थी तपस्या तितक्षा करने की कैपेसिटी थी यह

परस्पर मैत्री का संबंध है कोई भी संस्था की सफलता की कुंजी

यह बॉन्डिंग था बोलकर के ही इंस्टिट्यूशन खड़ा हुआ ना कोई भी इंस्टिट्यूशन देखिए आप बुद्धिस्ट इंस्टिट्यूशन बुद्धिस्ट संघ है ये क्रिश्चियनिटी है इस्लाम है देखिए उसका सीड क्या है कि जो ओरिजिनल डायरेक्ट डिसाइपल थे इन लोगों में प्रेम ये बुद्धा के जो जीसस के जो एपोस्टल्स थे या तो फिर ये मोहम्मद के जो कंपेनियंस थे बुद्ध के जो डायरेक्ट डिसाइपल थे इन लोगों में जो बॉन्ड था वो इतना स्ट्रांग था कि पूरे पूरे जगत के साथ में लड़ लेंगे और इसी बॉन्ड के ऊपर में तो इंस्टीट्यूशन खड़ा होता है ना। बहुत सारे इंस्टिट्यूशन फेल क्यों हो जाते हैं कि जो लोग पार्टनरशिप में स्टार्ट करते हैं आप थोड़े दिनों के बाद में पता चला कि उस उन्हीं लोगों में मतभेद होना शुरू हो गया है। एक दूसरे के पीछे में बातें करता है। दूसरा उसके सामने गद्दारी करता है। बोल के वो तो इंस्टिट्यूशन बिखर जाएगा कि बॉन्ड नहीं रहने से इंस्टिट्यूशन चलेगा ही नहीं। फिर स्वामी जी कहते हैं ना ठाकुर कहते हैं एक बार पौधा बड़ा हो जाए तो आप उसके साथ में हाथी भी बांध दीजिए फर्क नहीं पड़ता किंतु जब तक पौधा छोटा है उसको आपको वो उसमें रखना पड़ेगा प्रोटेक्शन में सो इनिशियल स्टेजेस में वो बॉन्डिंग होना चाहिए अभी रामकृष्ण मिशन की जो अवस्था है इवन उसी टाइम में देखिए कि अभेदानंद जी छोड़कर के चले गए पर मिशन को फिर कोई फर्क नहीं पड़ा भले ही चाहे गुरु भाइयों का जो बॉन्ड हो उस समय टूटा भी हो म ऊपर ऊपर से किंतु इंस्टीट्यूशन को फर्क नहीं पड़ा है। क्यों? बाय दैट टाइम अभेदानंद जी ने छोड़ा है अपना जो फाउंडेशन है इतना स्ट्रांगली बिल्ड हो गया है कि अभी कुछ भी हो जाए फर्क नहीं पड़ने वाला। तो ये बॉन्डिंग ये फाउंडेशन लगा कहां पे? दैट इज वराह नगर मठ। क्योंकि वराह नगर मठ के आखिर में तो फिर गुरु भाइयों ने प्रवरज्या करना स्टार्ट कर दिया था। स्वामी जी खुद छोड़कर के चले गए थे। इसलिए बोलकर के आलम बाजार मठ का वोेंस नहीं है और उसके बाद में तो सीधा फिर ये बेलूर मठ ही प्रारंभ होता है नीलांबर मुखर्जी गार्डन तो वो तो फिर एक एडवांस स्टेट आ जाता है जिसको सॉलिड फाउंडेशन कहते हैं वो लगा है सिर्फ और सिर्फ वराह नगर मठ में सो दैट इज व्हाई कि उस दिनों की घटनाओं का इतनाेंस है और दैट इज व्हाई इट इज सो अनफॉर्चूनेट कि डिटेल डिस्क्रिप्शन हमारे पास में इतना ज्यादा नहीं है। फॉर्चूनेटली ये मोहिन बाबू का जो है अपने पास में इट इज म बहुत अच्छा डिस्क्रिप्शन है। हम पढ़ेंगे एक के बाद एक घटनाएं बहुत अच्छी-अच्छी घटनाएं हैं। यूनिक घटनाएं हैं जिसको कि आप और कहीं पर नहीं प्राप्त करेंगे। और कहीं लिखी नहीं है। कहीं पढ़ने में नहीं आएगी।

लज्जा, घृणा, भय -- तीन का त्याग

ना देखिए ना ठाकुर ने अपने बालों से रसिक मेहतर का टॉयलेट क्लीन किया। अब आप सोच लीजिए कि वो वो वो जो एक आदमी आया था कि वह कहता है कि यह गंगा का पानी है। वह जो एक आया था ना वह म कपड़े अस्त-व्यस्त थे। चिल्ला चिल्ला करके वो स्तोत्र पाठ किया था कि गंगा का पानी और यह कादो कीचड़ का पानी एक लगने लगे तब बोलना कि ब्रह्म ज्ञान हो गया है। हालांकि यहां पर तामसी लोगों की बात नहीं है। तामसिक लोगों को तो वैसे ही सब इक्वल लगता है। उन लोगों की बात नहीं है। जो हाईली सात्विक है उन लोगों के मन में ये ये होता है। लज्जा घृणा भाई बड़ा स्ट्रांग होता है। होना ही चाहिए। जो ब्राह्मण है पूजा करेंगे देवालय में खाना बनाएंगे तो उनको तो यह सब हेल्थ एंड सैनिटेशन तो बड़ा ही क्लियर होना चाहिए किंतु जब साधना के उच्च आयाम में आप प्रवेश करते हैं तब यह सब आपको छोड़ देना है किंतु एक बात है पहले लज्जा घृणा भय लाना होगा बाद में वह समाप्त होगा जैसे स्वामी जी ने कहा ना कि तुम्हारे पास में त्याग करने के लिए क्या है तो पहले तो त्याग करने के लिए इकट्ठा करो बाद में उसको त्याग करो बुद्ध के पास में त्याग करने के लिए साम्राज्य था तो इसलिए इसलिए मां कहती है कि ठाकुर ने भले कहा लज्जा घृणा भय तीन थकते नहीं आ बोल छी लज्जा घृणा भय तीन थकते होय मैं कहती हूं कि लज्जा घृणा भय तीन रहने से होगा सो पहले तो उसको लाना होगा एक स्वामी जी क्या कहते हैं फर्स्ट बिकम ए जेंटलमैन देन बिकम ए साधु तो पहले तो जेंटलमैन बनना होगा एक स्टैंडर्ड अपना लाइफ का लाना होगा बाद में वह त्याग के पथ पर आगे बढ़ना है मेरा कहना

हमें अपनी किताबें किस क्रम में पढ़नी चाहिए?

है कि सब एक साथ में पढ़ना शुरू कर दीजिए वो ठाकुर कहते हैं ना वो राग रागिणी वो एक-एक करके वो एक एक बजाता है। एक राग मैं मैं तो सब राग रागिणी बजाऊंगा। सो सब एक साथ में पढ़ना चाहिए क्योंकि क्या है कि अपना ह्यूमन माइंड जो है ना वो बोर बहुत इजीली हो जाता है। तो आप एक टॉपिक ले ज्यादा पढ़ेंगे ना वो बोर हो जाएगा। फिर आप बोलेंगे इसको रख दो थोड़ा एंटरटेनमेंट करते हैं। सो व्हिच विल बी वो पूरा एक दूसरी डायरेक्शन में जाएगा। तो ये सब बेटर है। सुबह को कथामृत पढ़ा, दोपहर को मायर कथा पढ़ा, मां की बातें पढ़ी। शाम को डायरेक्ट डिसाइपल के बारे में पढ़ दिया। बीच-बीच में कहीं पर शास्त्र, विवेक चड़ामणि वगैरह उठा दिया। मिक्स एंड मैच करना है। इट्स अ बेस्ट सॉल्यूशन इन स्पिरिचुअल लाइफ। सोचेंगे कि मैं पहले विवेक चूड़ामणि पढ़ लूं और फिर बाकी सब पढूंगा। या तो पहले कथामृत पढ़ लूं, बाकी सब पढूंगा। कुछ ही समय के बाद में ना माइंड बोर हो जाएगा। यह बोर्डम जो है बहुत बड़ा है। तमस दिस इज नथिंग बट तमस। तो तमस आएगा ही आएगा रास्ते में। सो ऑलवेज चेंज चेंज द टॉपिक, चेंज द बुक्स, चेंज द साधना, नो प्रॉब्लम। ओम